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सेवा कुंज रास स्थली

“सेवा कुंज या निकुंज वन “
रासलीला के श्रम से व्यथित राधाजी की भगवान् द्वारा यह सेवा किए जाने के कारण इस स्थान का नाम सेवाकुंज पडा. सेवाकुंज वृंदावन के प्राचीन दर्शनीय स्थलों में से एक है. राधादामोदर जी मन्दिर के निकट ही कुछ पूर्व-दक्षिण कोण में यह स्थान स्थित है.

स्थापना – गोस्वामी श्रीहितहरिवंश जी ने सन 1590 में अन्य अनेक लीला स्थलों के साथ इसे भी प्रकट किया था.

श्री विग्रह – यहाँ एक छोटे-से मन्दिर में राधा जी के चित्रपट की पूजा होती है. लता दु्रमों से आच्छादित सेवाकुंज के मध्य में एक भव्य मंदिर है, जिसमें श्रीकृष्ण राधाजी के चरण दबाते हुए अति सुंदर रूप में विराजमान है. राधाजी की ललितादि सखियों के भी चित्रपट मंदिर की शोभा बढा रहे हैं.साथ में ललिता विशाखा जी भी दर्शन है.

सेवा कुंज में ललिता-कुण्ड है. जहाँ रास के समय ललिताजी को प्यास लगने पर कृष्ण ने अपनी वेणु(वंशी) से खोदकर एक सुन्दर कुण्ड को प्रकट किया. जिसके सुशीतल मीठे जल से सखियों के साथ ललिता जी ने जलपान किया था.सेवाकुंज के बीचोंबीच एक पक्का चबूतरा है, जनश्रुति है कि यहाँ आज भी नित्य रात्रि को रासलीला होती है.

सेवाकुंज का इतिहास :
वृंदावन श्यामा जू और श्रीकुंजविहारीका निज धाम है. यहां राधा-कृष्ण की प्रेमरस-धाराबहती रहती है. मान्यता है कि चिरयुवाप्रिय-प्रियतम श्रीधामवृंदावन में सदैव विहार में संलग्न रहते हैं.

भक्त रसखान ब्रज में सर्वत्र कृष्ण को खोज खोज कर हार गये, अन्त में यहीं पर रसिक कृष्ण का उन्हें दर्शन हुआ। उन्होंने अपने पद में उस झाँकी का वर्णन इस प्रकार किया है –

देख्यो दुर्यों वह कुंज कुटीर में।
बैठ्यो पलोटत राधिका पायन ॥

मन्दिर में एक शय्या शयन के लिए है, जिसके विषय में कहा जाता है की रात्रि में प्रिया प्रितम साक्षात् रूप में आज भी इसपर विश्राम करते हैं । साथ ही सेवाकुंज के बीचोंबीच एक पक्का चबूतरा है, ब्रजवासियों का कहना है कि आज भी प्रत्येक रात्रि में श्री राधाकृष्ण-युगल साक्षात् रूप से यहाँ विहार करते हैं.

इस विहार लीला को कोई नहीं देख सकता,दिन भर में हजारों बंदर, पक्षी,जीव जंतु सेवा कुंज में रहते है पर जैसे ही शाम होती है,सब जीव जंतु बंदर अपने आप निधिवन में चले जाते है एक परिंदा भी फिर वहाँ पर नहीं रुकता.

यहाँ तक कि जमीन के अंदर के जीव चीटी आदि भी जमीन के अंदर चले जाते है रास लीला को कोई नहीं देख सकता क्योकि रास लीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है रास तो अलौकिक जगत की “परम दिव्यातिदिव्य लीला” है कोई साधारण व्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता. जो बड़े बड़े संत है उन्हें सेवा कुंज से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है.

जब रास करते करते राधा रानी जी थक जाती है तो बिहारी जी उनके चरण दबाते है. और रात्रि में शयन करते है आज भी यहाँ शय्या शयन कक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान,फुल और प्रसाद रखते है, और जब सुबह पट खोलते है तो जल पिया हुआ मिलता है पान चबाया हुआ मिलता है और फूल बिखरे हुए मिलते है

बोलो सेवा कुंज वारी की जय

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कार्तिक माह 2021

कार्तिक मास कब से कब तक है ?

इस साल कार्तिक माह की शुरुआत 21 अक्टूबर 2021 से प्रारंभ हो रही है. ये 19 नंवबर तक रहेगा


कार्तिक मास में तुलसी की महिमा

ब्रह्मा जी कहे हैं कि कार्तिक मास में जो भक्त प्रातः काल स्नान करके पवित्र हो कोमल तुलसी दल से भगवान् दामोदर की पूजा करते हैं, वह निश्चय ही मोक्ष पाते हैं। पूर्वकाल में भक्त विष्णुदास भक्तिपूर्वक तुलसी पूजन से शीघ्र ही भगवान् के धाम को चला गया और राजा चोल उसकी तुलना में गौण हो गए। तुलसी से भगवान् की पूजा, पाप का नाश और पुण्य की वृद्धि करने वाली है। अपनी लगाई हुई तुलसी जितना ही अपने मूल का विस्तार करती है, उतने ही सहस्रयुगों तक मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित रहता है। यदि कोई तुलसी संयुत जल में स्नान करता है तो वह पापमुक्त हो आनन्द का अनुभव करता है। जिसके घर में तुलसी का पौधा विद्यमान है, उसका घर तीर्थ के समान है, वहाँ यमराज के दूत नहीं जाते। जो मनुष्य तुलसी काष्ठ संयुक्त गंध धारण करता है, क्रियामाण पाप उसके शरीर का स्पर्श नहीं करते। जहाँ तुलसी वन की छाया हो वहीं पर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिसके कान में, मुख में और मस्तक पर तुलसी का पत्ता दिखाई देता है, उसके ऊपर यमराज दृष्टि नहीं डाल सकते।


प्राचीन काल में हरिमेधा और सुमेधा नामक दो ब्राह्मण थे। वह जाते-जाते किसी दुर्गम वन में परिश्रम से व्याकुल हो गए, वहाँ उन्होंने एक स्थान पर तुलसी दल देखा। सुमेधा ने तुलसी का महान् वन देखकर उसकी परिक्रमा की और भक्ति पूर्वक प्रणाम किया। यह देख हरिमेधा ने पूछा कि ‘तुमने अन्य सभी देवताओं व तीर्थ-व्रतों के रहते तुलसी वन को प्रणाम क्यों किया ?’ तो सुमेधा ने बताया कि ‘प्राचीन काल में जब दुर्वासा के शाप से इन्द्र का ऐश्वर्य छिन गया तब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मन्थन किया तो धनवंतरि रूप भगवान् श्री हरि और दिव्य औषधियाँ प्रकट हुईं।

उन दिव्य औषधियों में मण्डलाकार तुलसी उत्पन्न हुई, जिसे ब्रह्मा आदि देवताओं ने श्री हरि को समर्पित किया और भगवान् ने उसे ग्रहण कर लिया। भगवान् नारायण संसार के रक्षक और तुलसी उनकी प्रियतमा है। इसलिए मैंने उन्हें प्रणाम किया है।’
सुमेधा इस प्रकार कह ही रहे थे कि सूर्य के समान अत्यंत तेजस्वी विशाल विमान उनके निकट उतरा। उन दोनों के समक्ष वहाँ एक बरगद का वृक्ष गिर पड़ा और उसमें से दो दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उन दोनों ने हरिमेधा और सुमेधा को प्रणाम किया। दोनों ब्राह्मणों ने उनसे पूछा कि आप कौन हैं ? तब उनमें से जो बड़ा था वह बोला, मेरा नाम आस्तिक है।

एक दिन मैं नन्दन वन में पर्वत पर क्रीड़ा करने गया था तो देवांगनाओं ने मेरे साथ इच्छानुसार विहार किया। उस समय उन युवतियों के हार के मोती टूटकर तपस्या करते हुए लोमश ऋषि पर गिर पड़े। यह देखकर मुनि को क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि स्त्रियाँ तो परतंत्र होती हैं। अत: यह उनका अपराध नहीं, दुराचारी आस्तिक ही शाप के योग्य है।

ऐसा सोचकर उन्होंने मुझे शापित किया – “अरे तू ब्रह्म राक्षस होकर बरगद के पेड़ पर निवास कर।” जब मैंने विनती से उन्हें प्रसन्न किया तो उन्होंने शाप से मुक्ति की विधि सुनिश्चित कर दी कि जब तू किसी ब्राह्मण के मुख से तुलसी दल की महिमा सुनेगा तो तत्काल तुझे उत्तम मोक्ष प्राप्त होगा। इस प्रकार मुक्ति का शाप पाकर मैं चिरकाल से इस वट वृक्ष पर निवास कर रहा था। आज दैववश आपके दर्शन से मेरा छुटकारा हुआ है।
तत्पश्चात् वे दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण परस्पर पुण्यमयी तुलसी की प्रशंसा करते हुए तीर्थ यात्रा को चल दिए। इसलिए भगवान् विष्णु को प्रसन्नता देने वाले इस कार्तिक मास में तुलसी की पूजा अवश्य करनी चाहिए।


तुलसी विवाह की विधि व महत्व

कार्तिक शुक्ला नवमी को द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। इस तिथि को नवमी से एकादशी तक मनुष्य शास्त्रोक्त विधि से तुलसी विवाह का उत्सव करें तो उसे कन्यादान का फल होता है। पूर्वकाल में कनक की पुत्री किशोरी ने एकादशी के दिन संध्या के समय तुलसी की वैवाहिक विधि संपन्न की थी इससे वह वैधव्य दोष से मुक्त हो गई थी। अब तुलसी विवाह की विधि सुनिये-
एक तोला स्वर्ण की भगवान् विष्णु की प्रतिमा बनवाएँ या अपनी शक्ति के अनुसार आधे या चौथाई तोले की बनवाएँ अथवा यह भी न होने पर उसे अन्य धातुओं के सम्मिश्रण से ही बनवाएँ। फिर तुलसी और भगवान् विष्णु की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करके स्तुति आदि के द्वारा भगवान् को निन्द्रा से जगावें। फिर पुरुष सूक्त से व घोडशोपचार से पूजा करें। पहले देशकाल स्मरण करके गणेश पूजन करे, फिर पुण्याह वाचन करके वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए बाजे आदि की ध्वनि से भगवान् विष्णु की प्रतिमा को तुलसी के निकट लाकर रख दें। प्रतिमा को सुंदर वस्त्रों व अलंकारों सजाए रहें उसी समय भगवान् का आह्वान इस मंत्र से करें-

आगच्छ भगवत् देव अर्चयिष्यामि केशव।
तुभ्यं दासयामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव॥

अर्थात्-हे भगवान् केशव ! आइए देव, मैं आपकी पूजा करूँगा, आपकी सेवा में तुलसी को समर्पित करूँगा आप मेरे सब मनोरथों को पूर्ण करें। इस प्रकार आह्वान के बाद तीन-तीन बार अर्ध्य, पाद्य और विष्टर का उच्चारण करके इन्हें भी भगवान् को समर्पित कर दे।

तत्पश्चात् काँसे के पात्र में दही, घी और शहद रखकर उसे कांसे के ढक्कन से ढककर भगवान् को अर्पण करते हुए इस प्रकार कहें- ‘हे वासुदेव, आपको नमस्कार है। यह मधुपर्क ग्रहण कीजिए।’ तब दोनों को एक-दूसरे के समक्ष रखकर मंगल पाठ करें। इस प्रकार गोधूलि बेला में जब भगवान् सूर्य कुछ-कुछ दिखाई दे रहे हों, तब कन्यादान का संकल्प करें और भगवान् से यह प्रार्थना करें- “आदि, मध्य और अंत से रहित त्रिभुवन प्रतिपालक परमेश्वर ! इस तुलसी को आप विवाह की विधि से ग्रहण करें।

यह पार्वती के बीज से प्रकट हुई है, वृंदावन की भस्म में स्थित रही है तथा आदि, मध्य और अंत में शून्य है। आपको तुलसी अत्यंत प्रिय है अतः इसे मैं आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। मैंने जल के घड़ों से सींचकर और अन्य सभी प्रकार की सेवाएँ करके, अपनी पुत्री की भाँति इसे पाला-पोसा है, बढ़ाया है और आपकी तुलसी आपको ही दे रहा हूँ।

हे प्रभो ! कृपा करके इसे ग्रहण करें।” इस प्रकार तुलसी का दान करके फिर उन दोनों (तुलसी और विष्णु) की पूजा करें। अगले दिन प्रातः काल में पुनः पूजा करें। अग्नि की स्थापना करके उसमें द्वादशाक्षर मंत्र से खीर, घी, मधु और तिल मिश्रित द्रव्य की 108 आहुति दें। आप चाहें तो आचार्य से होम की शेष पूजा करवा सकते हैं।

तब भगवान् से प्रार्थना करके कहें- “प्रभो ! आपकी प्रसन्नता के लिए मैंने यह व्रत किया, इसमें जो कमी रह गई हो, वह आपके प्रसाद से पूर्णताः को प्राप्त हो जाए। अब आप तुलसी के साथ बैकुण्ठ धाम में पधारें। आप मेरे द्वारा की गई पूजा से सदा संतुष्ट रहकर मुझे कृतार्थ करें।” इस प्रकार तुलसी विवाह का परायण करके भोजन करें, और भोजन के बाद तुलसी के स्वत: गिरे हुए पत्तों को खाऐं, यह प्रसाद सब पापों से मुक्त होकर भगवान् के धाम को प्राप्त होता है। भोजन में आँवला और बेर का फल खाने से उच्छिष्ट-दोष मिट जाता है


तुलसी दल चयन

स्कन्द पुराण का वचन है कि जो हाथ पूजार्थ तुलसी चुनते हैं, वे धन्य हैं-

तुलसी ये विचिन्वन्ति धन्यास्ते करपल्लवाः।

तुलसी का एक-एक पत्ता न तोड़कर पत्तियों के साथ अग्रभाग को तोड़ना चाहिए। तुलसी की मंजरी सब फूलों से बढ़कर मानी जाती है। मंजरी तोड़ते समय उसमें पत्तियों का रहना भी आवश्यक माना जाता है। निम्नलिखित मंत्र पढ़कर पूज्यभाव से पौधे को हिलाए बिना तुलसी के अग्रभाग को तोड़े। इससे पूजा का फल लाख गुना बढ़ जाता है।


तुलसी दल तोड़ने का मंत्र

तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया।
चिनोमी केशवस्यार्थे वरदा भव शोभने॥
त्वदङ्गसम्भवैः पत्रैः पूजयामि यथा हरिम्।
तथा कुरु पवित्राङ्गि! कलौ मलविनाशिनि॥


तुलसी दल चयन में निषेध समय

वैधृति और व्यतीपात-इन दो योगों में, मंगल, शुक्र और रवि, इन तीन वारों में, द्वादशी, अमावस्या एवं पूर्णिमा, इन तीन तिथियों में, संक्रान्ति और जननाशौच तथा मरणाशौच में तुलसीदल तोड़ना मना है। संक्रान्ति, अमावस्या, द्वादशी, रात्रि और दोनों संध्यायों में भी तुलसीदल न तोड़ें, किंतु तुलसी के बिना भगवान् पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती, अत: निषेध समय में तुलसी वृक्ष से स्वयं गिरी हुई पत्ती से पूजा करें (पहले दिन के पवित्र स्थान पर रखे हुए तुलसीदल से भी भगवान् की पूजा की जा सकती है)। शालिग्राम की पूजा के लिए वर्जित तिथियों में भी तुलसी तोड़ी जा सकती है। बिना स्नान के और जूता पहनकर भी तुलसी न तोड़ें।

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शरद पूर्णिमा 2021

शरद पूर्णिमा कब है ?

20 अक्टूबर, 2021 बुधवार

पूर्णिमा तिथि आरंभ-19 अक्टूबर 2021 को शाम 07 बजे से 
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 20 अक्टूबर 2021 को रात्रि 08 बजकर 20 मिनट पर


शरद पूर्णिमा को क्या खास है ?

मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल…

आज के दिन ठाकुर बिहारी जी महाराज महारास रूप मैं दर्शन देते है आज के दिन ठाकुर जी सफ़ेद रंग की पोसाक ओर कटी काछिनी मस्तक पर मोर मुकुट धारण कर जगमोहन मैं दर्शन देते है ।
आज के दिन ठाकुर जी को खीर ओर बुरे की चँद्रकला का भोग लगाया जाता है ।


आज के दिन ही ठाकुर जी बंशी ओर छड़ी धारण करते है ।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणें श्रीबांकेबिहारी के चरणों की वंदना करेंगी। इसके लिए ठाकुर जी भी जगमोहन में विराजमान हो बांसुरी वादन करेंगे। इस अदभुत नजारे को दखने के लिए हजारों भक्तों की वृंदावन में मौजूदगी रहेगी।

इस रात की धवल चांदनी ठाकुर जी की चरण वंदना करती हैं। इसके लिए मंदिर की छत को खोल दिया जाता है।
दिन और रात की आरती का समय भी एक-एक घंटा अतिरिक्त रहेगा।

राजभोग आरती दोपहर एक बजे होगी तो रात में 10.30 बजे शयन आरती की जाएगी। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में भगवान श्रीकृष्ण ने महारास किया था। अन्य देवी-देवता भी श्रीकृष्ण के इस महारास के दर्शनों के लिए यहां आते हैं।


शरद पूर्णिमा को क्या करे ?

  • आप ठाकुर जी को रात्री को स्नान कराए
  • उनको रात को भोग लगाये
  • भोग और ठाकुर जी पर चाँद की किरणें जरुर पदनी चाहेये
  • सुबह उस प्रशादी को सब घर वालो के साथ बाँट कर पाए
  • इस दिन दान करना शुभ माना जाता है क्योंकि आज ठाकुर जी अत्यत प्रसन्न होते है तो उनकी प्रशन्नता हेतु हम गौ माता या संत दान करे ( आप राधेकृष्णावर्ल्ड एप के संत सेवा पर क्लिक करके भी दान कर सकते है जो की सीधा वृंदावन सेवा में लगता है )
  • फिर भोर में ठाकुर जी को नहीं उठाए उनको देर से उठाए फिर भोग लगाये ! क्योकि ठाकुर जी रास से थक जाते है तो उनको अधिक नींद की अवश्यकता होती है !
  • अन्य किसी प्रकार के प्रश्न हेतु व्हात्सप्प करे : 9460500125

शरद पूर्णिमा व्रत कथा

एक साहूकार था जिसके दो बेटियॉं थी। उसकी दोनो बेट‍ियॉं पूर्णिमा का व्रत रखती थी, किन्‍तु बड़ी पुत्री पूर्णिमा का पूरा व्रत करती और छोटी बेटी अधूरा व्रत रखती थी। अर्थात वह शुभ समय से पहले ही व्रत खोलकर खाना खा लेती थी। धीरे-धीरे दोनो पुत्री बड़ी हो गई और उस साहूकार ने दोनो की शादि कर दी।

शादी के बाद साहूकार की बड़ी बेटी के पुत्र हो गया किन्‍तु छोटी बेटी के जो भी संतान होती वह मर जाती। जिससे वह बहुत दुखी रहती थी। एक दिन उसने और उसके पति ने किसी विद्धावान पंडित से इसका कारण पूछा। तो पंडित जी ने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती है जिसके कारण तुम्‍हारी सन्‍तान पैदा होते ही मर जाती है।

दोनो ने पूर्णिमा के व्रत की पूरी विधि के बारे में पूछा और तब पंडित ने उसे पूर्णिमा के व्रत के बारे में विधिपूर्वक बतया। और कहा यदि तुम इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करोगी मो तुम्‍हारी सभी इच्‍छाए पूर्ण हो जाऐगी। ऐसा कहकर वह पंडित तो वहा से चला गया और कुछ दिनो के बाद शरद पूर्णिमा आई।

साहूकार की छोटी बेटी ने शरद पूर्णिमा का व्रत वैसे ही किया जैसे की पंडित ने बताया था। इस व्रत के प्रभाव से उसको पुत्र रत्‍न की प्राप्‍ती हुई किन्‍तु उसका बेटा शीघ्र ही मर गया। उसने अपने मरे हुऐ पुत्र को एक पीढ़े पर लिटाकर एक लाल रंग के कपड़े से ढक दिया। और अपनी बड़ी बहन को बुलाकर लाई और उसने उस पीढ़ के ऊपर बैठने को कहा।

जैसे ही उसकी बड़ी बहन उस पीढ़ पर बैठने लगी तो उस बच्‍चे को उसका घाघरा लग गया जिससे वह बच्‍चा जोर-जोर से रोने लगा। उसने पीछे मुड़कर पीढ़े की तरफ देखा तो उसके ऊपर उसकी छोटी बहन का पुत्र सो रहा था। यह सब देखकर बड़ी बहन अपनी छोटी बहन से बोली -”तू मुझे कलंक लगाना चाहती थी। अभी तो यह मेरे बैठने से मर जाता।

तब उसकी छोटी बहन बोली नही बहन ”यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे ही भाग्‍य से यह जीवित हो गया, तेरे पुण्‍य व्रत के प्रभाव से यह पुन: जीवित हुआ है। यह देखकर उसकी बड़ी बहन बहुत खुश हुई और दोनो बहनों ने पूरे नगर में पूर्णिमा के व्रत के प्रभाव के बारे में बताया। जिसके बाद उस नगर की सभी औरते पूर्णिमा का व्रत करने लगी।

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नरसी मेहता जी

गुजरात के जूनागढ़ में एक नरसी मेहता नाम के कृष्ण भगवान के एक अनन्य भक्त थे। किसी समय नरसी मेहता की बहुत बड़ी सी हवेली और जिमीदारी हुआ करती थी। इन की 2 बेटियां थी। एक बेटी का विवाह हो चुका था। और इनकी दूसरी बेटी इनके साथ रहती थी। और उस बेटी ने भी अपने आप को कृष्ण भगवान की भक्ति में लगाया हुआ था। नरसी मेहता जी का एक सारंग नाम का भाई था। जो जिमीदार भी था और मुगल सम्राट हुमायूं के समय पुलिस में बड़ा ऑफिसर था ।नरसी मेहता जी की सारी जिमीदारी चली गई थी। और वह बड़ा गरीबी का जीवन जीते थे। एक बार उनकी बड़ी बेटी कुंवर सेन के यहां उसकी छोटी बेटी का रिश्ता हो गया। कुंवर सेन के ससुराल वाले धन के नशे में चूर थे । उन्हें धन का बहुत अहंकार था । उन्होंने भात के लिए एक लंबी सी लिस्ट तैयार की। और कुंवर सेन को कहा- तुम्हारे घर से यह भात आना चाहिए। हमारी भी इज्जत का सवाल है।

पहले के जमाने में विवाह की पत्रिका लेकर नाई जाता था। अब एक नाई जूनागढ़ के लिए रवाना हुआ। उसने वहां जाकर पूछा -नरसी मेहता जी की हवेली कहां है? एक व्यक्ति ने मंदिर की तरफ इशारा करके कहा- आपको नरसी मेहता जी वही मिलेंगे। जब उस नाई ने नरसी मेहता जी को देखा तो मन ही मन सोचने लगा। यह मेरी क्या खातिरदारी करेगा ?क्योंकि यह तो खुद ही फटे हाल है। उस समय पत्रिका लाने वाले नाईयों की खूब आवभगत की जाती थी । नरसी मेहता जी ने नाई को ठंडा पानी पिलाया और कहा- आप बैठिए मैं कुछ भोजन की व्यवस्था करता हूं ।

उधर उनकी बेटी कुंवर सेन अपने भाग्य को रो रही थी और गोविंद को कह रही थी। मेरे पिताजी की लाज बचाओ । उधर उनकी दूसरी बेटी ने विवाह की पत्रिका गोविंद के चरणों में डाल दी। गोविंद अब तुम्हें ही यह सारी व्यवस्था करनी है। उधर नरसी मेहता जी अपने भाई सांरग के घर पहुंचे। और उन्होंने कहा- बेटी के घर विवाह है। नाई पत्रिका लेकर आया है। कुछ मदद हो जाती तो अच्छा था । उनके भाई सारंग ने उन को लात मारकर भगा दिया और कहा- सारा दिन द्वारिकाधीश द्वारिकाधीश करता है ।आप बुलाओ ना अपने द्वारिकाधीश को। और नरसी मेहता को वहां से भगा दिया। अब नरसी मेहता अपने एक मित्र किसान के खेत में पहुंचा वहां जाकर बथुए का साग तोड़ा उसके घर पर ही उबाल लिया और उसमें नमक मिलाकर नाई के लिए तैयार करने लगे।

उधर भगवान समझ गए। आज नरसी मेहता को मेरी जरूरत है। कृष्ण भगवान मुनीम का वेश बनाकर मंदिर में बैठे नाई के पास पहुंचे और उनके हाथ में एक बड़ा सा थाल भोजन का था। उन्होंने नाई को कहा- मैं नरसी मेहता जी का मुनीम हूं। उनको कोई जरूरी काम आन पड़ा है। उन्होंने आपके लिए छप्पन भोग भिजवाया है। आप भोजन कीजिए । नाई ने अपनी जिंदगी में ऐसा अलौकिक भोजन कभी नहीं किया था। वह बहुत प्रसन्न हुआ। अब कृष्ण भगवान ने 1000 सोने की मोहरों का भरा हुआ पर्स उस नाई को दक्षिणा सवरूप दिया और कहा- बेटी को बोलिए विवाह की तैयारी करो। हम समय पर भात लेकर पहुंच जाएंगे। अब भगवान तो भोजन का खाली थाल लेकर अंतर्ध्यान हो गए। तभी नरसी मेहता जी आए उन्होंने नाई को कहा- आइए साग का भोजन कीजिए । नाई ने मना कर दिया कि मेरा पेट भरा हुआ है। नरसी मेहता जी ने सोचा नाई मेरे ऊपर व्यंग्य कर रहा है। परंतु जब उसने सोने की मोहरों का पर्स दिखाया तब नरसी मेहता जी समझ गए। आज गोविंद अपने आप आए थे ।

नरसी मेहता जी बेटी के यहां जाने लगे तो जूनागढ़ में अंधे साधुओं का एक अखाड़ा था। नरसी मेहता जी सारा दिन संतो के बीच में रहते थे ।उन्होंने 16 संतो को बेटी के यहां जाने के लिए तैयार कर लिया उसने सोचा संतों के आशीर्वाद से बढ़कर और क्या भात हो सकता है। नरसी मेहता जी ने अपने किसान मित्र से एक टूटी फूटी बैलगाड़ी चार-पांच दिन के लिए उधार मांग ली और उस बैलगाड़ी में उन 16 अंधे साधुओं को बिठा लिया। जब वह जूनागढ़ से बाहर आए तभी उनकी गाड़ी एक गड्ढे में चली गई और उसका पहिया निकल गया सारे साधु नीचे गिर गए। बड़ी कोशिश की ना तो वह गाड़ी ठीक हुई नाही वह गाड़ी गड्ढे से बाहर आई। नरसी मेहता जी ने फिर भगवान को पुकारा- हे! भगवान इस गरीब की इतनी परीक्षा क्यों है। इतने में ही भगवान एक बढ़ई का रूप बनाकर वहां प्रगट हो गए उन्होंने नरसी मेहता जी की गाड़ी को दोबारा बना दिया और नरसी मेहता जी को कहा- मुझे भी उस गांव तक जाना है। मुझे अपनी बैलगाड़ी में जगह दे दो। मैं तुम्हारी गाड़ी भी हांक दूंगा। अब भगवान नरसी मेहता जी की बैलगाड़ी हांकने लगे। अब भगवान ने गाड़ी ठीक करने की अपनी मजदूरी मांगी। नरसी मेहता जी ने कहाकहा- हम तो साधु संत हैं हमारे पास कोई पैसे नहीं है हम सब आपको दिहाडी के रूप में भजन सुना देते हैं। भगवान भी अपने भक्तों का भजन सुनना चाहते थे । क्योंकि उस दिन नरसी मेहता उन्हें बेटी के यहां जाने की जल्दी में भजन नहीं सुना सके। अब सारे साधुओं ने अपनी सारंगी उठाई और नरसी मेहता जी भजन गाने लगे।

जब नरसी मेहता जी अपनी बेटी के गांव पहुंचे तो उस बढ़ई ने कहा- क्या मैं भी आपकी बेटी के भात में शामिल हो सकता हूं? नरसी मेहता जी ने कहा- इससे अच्छी बात और क्या होगी । बड़ई ने कहा- मैं अपनी पत्नी को लेकर भात के समय पहुंच जाऊंगा। जब नरसी मेहता जी बेटी के यहां पहुंचे। अंधे साधुओं को साथ में देखकर उसके बेटी के ससुराल वालों ने बुरा मूंह बना लिया और उनकी कोई आवभगत नहीं की। बेटी के ससुराल वाले पिता का बार-बार अपमान कर रहे थे। बेटी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। अब नरसी मेहता जी समझ गए ।यह लोग सब धन के नशे में चूर हैं । और इन लोगों को इंसानियत नहीं धन चाहिए। वह फिर गोविंद को पुकारने लगे- हे! गोविंद मेरी बिगड़ी बना दो नंदलाल ।मेरी बिगड़ी बना दो नंदलाल।तभी

वह बढ़ई अपनी पत्नी समेत गाड़ी भर कर भात के लिए लाया। उन्होंने नरसी मेहता जी को कहा- भात के लिए समान आ गया है ।अब तो नरसी मेहता जी समझ गए यही गोविंद है। उन्होंने प्रभु को कहा -प्रभु मुझे दर्शन दीजिए । अब तो गोविंद ने उन्हें लक्ष्मी और नारायण के रूप में दर्शन दिए और कहा- अपने भक्तों की इज्जत बचाने के लिए भगवान कभी देर नहीं करते। देर सिर्फ उनके पुकारने में होती है। आप भात भरने की तैयारी कीजिए और बेटी के ससुराल वालों की समान की लिस्ट के हिसाब से भात भरा जाएगा। पर आप किसी को यह मत बताना कि लक्ष्मी नारायण बेटी का भात भरने आए हैं। आप कहना- यह मेरा मुनीम और उसकी पत्नी है।

अब रात को 10:00 बजे भात भरने की तैयारी शुरू हुई और जितनी ससुराल वालों ने एक एक चीज की लिस्ट भेजी थी ।उससे कई गुना करके भगवान ने उनका भात भरा। राशन की बोरियां की बोरियां थी। सोने ,चांदी हीरे ,जवा राहत इस भात में सब कुछ था । कुंवर सेन की सास को जो कुछ भात में दिया गया बिल्कुल वैसे ही घर के नौकर चाकारो को भी दिया गया। कपड़े और हीरे जवाहरात सब था। रात के 10:00 बजे से भात भरना शुरू हुआ। सुबह 4:00 बजे तक भगवान ने भात भरा। कुंवर सेन भी समझ गई । यह लक्ष्मीनारायण है । आज जो मेरे भाई भाभी बनकर आए हैं। भगवान ने कुंवर सेंन को दर्शन दिए और चुप रहने के लिए कहा । 4:00 बजे भगवान ने नरसी मेहता जी को वापस चलने का आदेश दिया ।भगवान 4:00 बजे नरसी मेहता जी को गाड़ी में बिठा कर अंतर्ध्यान हो गए और रास्ते में भी थोड़े बहुत हीरे मोती बिखरे पड़े थे। जो नौकर चाकर उस भात में शामिल ना हो सके उन्होंने भी वह रास्ते में पड़े हुए हीरे मोती उठाए ।ऐसा भात देखकर बेटी के ससुराल वाले भी दंग रह गए ।लेकिन यह कृपा भगवान सिर्फ उन पर करते हैं। जो बड़े निर्मल हृदय से भगवान को चाहते हैं । यह वह भक्त होते है। जिन्होंने अपना पूरा जीवन बिना किसी कामना के भगवान की भक्ति में लगा रखा होता है। भगवान भी जानते हैं अपने भक्तों को किस समय क्या देना है। यह भक्त और भगवान का प्रेम है
जय जय श्री राधे

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विजय दशमी (दशहरा)

राधेकृष्णावर्ल्ड की और से विजय दशमी की शुभकामनाएं

दशहरा पर्व की कहानी क्या है, क्यों मनाया जाता है?

दशहरे के इस पर्व को विजयादशमी भी कहा जाता है, इसे जश्न का त्यौहार कहते हैं. आज के वक्त में यह बुराई पर अच्छाई की जीत का ही प्रतीक हैं. बुराई किसी भी रूप में हो सकती हैं जैसे क्रोध, असत्य, बैर,इर्षा, दुःख, आलस्य आदि. किसी भी आतंरिक बुराई को ख़त्म करना भी एक आत्म विजय हैं और हमें प्रति वर्ष अपने में से इस तरह की बुराई को खत्म कर विजय दशमी के दिन इसका जश्न मनाना चाहिये, जिससे एक दिन हम अपनी सभी इन्द्रियों पर राज कर सके.

दशहरा या विजयादशमी महत्व

यह बुरे आचरण पर अच्छे आचरण की जीत की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं.सामान्यतः दशहरा एक जीत के जश्न के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं. जश्न की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं. जैसे किसानो के लिए यह नयी फसलों के घर आने का जश्न हैं. पुराने वक़्त में इस दिन औजारों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्यूंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के जश्न के तौर पर देखते थे. लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत. किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं.

दशहरा के दिन के पीछे कई कहानियाँ हैं, जिनमे सबसे प्रचलित कथा हैं भगवान राम का युद्ध जीतना अर्थात रावण की बुराई का विनाश कर उसके घमंड को तोड़ना.

राम अयोध्या नगरी के राजकुमार थे, उनकी पत्नी का नाम सीता था एवम उनके छोटे भाई थे, जिनका नाम लक्ष्मण था. राजा दशरथ राम के पिता थे. उनकी पत्नी कैकई के कारण इन तीनो को चौदह वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या नगरी छोड़ कर जाना पड़ा. उसी वनवास काल के दौरान रावण ने सीता का अपहरण कर लिया.

रावण चतुर्वेदो का ज्ञाता महाबलशाली राजा था, जिसकी सोने की लंका थी, लेकिन उसमे अपार अहंकार था. वो महान शिव भक्त था और खुद को भगवान विष्णु का दुश्मन बताता था. वास्तव में रावण के पिता विशर्वा एक ब्राह्मण थे एवं माता राक्षस कुल की थी, इसलिए रावण में एक ब्राह्मण के समान ज्ञान था एवम एक राक्षस के समान शक्ति और इन्ही दो बातों का रावण में अहंकार था. जिसे ख़त्म करने के लिए भगवान विष्णु ने रामावतार लिया था.

राम ने अपनी सीता को वापस लाने के लिए रावण से युद्ध किया, जिसमे वानर सेना एवम हनुमान जी ने राम का साथ दिया. इस युद्ध में रावण के छोटे भाई विभीषण ने भी भगवान राम का साथ दिया और अन्त में भगवान राम ने रावण को मार कर उसके घमंड का नाश किया. इन

दशहरा पर्व से जुड़ी कथाएं –
1. राम की रावन पर विजय का पर्व
2. राक्षस महिसासुर का वध कर दुर्गा माता विजयी हुई थी
3. पांडवों का वनवास
4. देवी सती अग्नि में समां गई थी.

आज दहशरा कैसे मनाया जाता हैं ?
आज के समय में दशहरा इन पौराणिक कथाओं को माध्यम मानकर मनाया जाता हैं. माता के नौ दिन की समाप्ति के बाद दसवे दिन जश्न के तौर पर मनाया जाता हैं. जिसमे कई जगहों पर राम लीला का आयोजन होता है, जिसमे कलाकार रामायण के पात्र बनते हैं और राम-रावण के इस युद्ध को नाटिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं.

दशहरा का मेला
कई जगहों पर इस दिन मैला लगता है, जिसमे कई दुकाने एवम खाने पीने के आयोजन होते हैं. उन्ही आयोजनों में नाट्य नाटिका का प्रस्तुतिकरण किया जाता हैं.

इस दिन घरों में लोग अपने वाहनों को साफ़ करके उसका पूजन करते हैं. व्यापारी अपने लेखा का पूजन करते हैं. किसान अपने जानवरों एवम फसलो का पूजन करता हैं. इंजिनियर अपने औजारों एवम अपनी मशीनों का पूजन करते हैं.

इस दिन घर के सभी पुरुष एवम बच्चे दशहरे मैदान पर जाते हैं. वहाँ रावण, कुम्भकरण एवम रावण पुत्र मेघनाथ के पुतले का दहन करते है. सभी शहर वासियों के साथ इस पौराणिक जीत का जश्न मनाते हैं. मेंले का आनंद लेते हैं. उसके बाद शमी पत्र जिसे सोना चांदी कहा जाता हैं उसे अपने घर लाते हैं. घर में आने के बाद द्वार पर घर की स्त्रियाँ, तिलक लगाकर आरती उतारकर स्वागत करती हैं. माना जाता हैं कि मनुष्य अपनी बुराई का दहन करके घर लौटा है, इसलिए उसका स्वागत किया जाता हैं. इसके बाद वो व्यक्ति शमी पत्र देकर अपने से बड़ो के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेता हैं. इस प्रकार घर के सभी लोग आस पड़ोस एवम रिश्तेदारों के घर जाकर शमी पत्र देते हैं एवम बड़ो से आशीर्वाद लेते हैं, छोटो को प्यार देते हैं एवम बराबरी वालो से गले मिलकर खुशियाँ बाटते हैं.

अगर एक पंक्ति में कहे तो यह पर्व आपसी रिश्तो को मजबूत करने एवम भाईचारा बढ़ाने के लिए होता हैं, जिसमे मनुष्य अपने मन में भरे घृणा एवम बैर के मेल को साफ़ कर एक दुसरे से एक त्यौहार के माध्यम से मिलता हैं.

इस प्रकार यह पर्व भारत के बड़े- बड़े पर्व में गिना जाता हैं एवम पुरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं.

हमारे देश में धार्मिक मान्यताओं के पीछे बस एक ही भावना होती हैं, वो हैं प्रेम एवं सदाचार की भावना. यह पर्व हमें एकता की शक्ति याद दिलाते हैं जिन्हें हम समय की कमी के कारण भूलते ही जा रहे हैं, ऐसे में यह त्यौहार ही हमें अपनी नींव से बाँधकर कर रखते हैं.

दशहरे का बदलता रूप
आज के समय में त्यौहार अपनी वास्तविक्ता से अलग जाकर आधुनिक रूप ले रहे हैं, जिसने इसके महत्व को कहीं न कहीं कम कर दिया हैं| जैसे-

दशहरे पर एक दुसरे के घर जाने का रिवाज था, अब ये रिवाज मोबाइल कॉल एवम इंटरनेट मेसेज का रूप ले चुके हैं.

खाली हाथ नहीं जाते थे, इसलिए शमी पत्र ले जाते थे, लेकिन अब इसके बदले मिठाई एवम तौहफे ले जाने लगे हैं, जिसके कारण यह फिजूल खर्च के साथ प्रतिस्पर्धा का त्यौहार बन गया हैं.

रावण दहन के पीछे उस पौराणिक कथा को याद रखा जाता था, जिससे एक सन्देश सभी को मिले कि अहंकार सर्वनाश करता हैं, लेकिन अब तरह- तरह के फटाके फोड़े जाते हैं, जिनके कारण फिजूल खर्च बढ़ गया हैं. साथ ही प्रदुषण की समस्या बढ़ती जा रही हैं एवम दुर्घटनायें भी बढती जा रही हैं.

इस प्रकार आधुनिकरण के कारण त्यौहारों का रूप बदलता जा रहा हैं. और कहीं न कहीं आम नागरिक इन्हें धार्मिक आडम्बर का रूप मानकर इनसे दूर होते जा रहे हैं. इनका रूप मनुष्यों ने ही बिगाड़ा हैं. पुराणों के अनुसार इन सभी त्योहारों का रूप बहुत सादा था. उसमे दिखावा नहीं बल्कि ईश्वर के प्रति आस्था थी. आज ये अपनी नींव से इतने दूर होते जा रहे हैं कि मनुष्य के मन में कटुता भरते जा रहे हैं. मनुष्य इन्हें वक्त एवम पैसो की बर्बादी के रूप में देखने लगा हैं.

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राधा ❤️ कृष्ण ❤️ कृष्ण ❤️ राधा

एक बार राधाजी के मन में कृष्ण दर्शन की बड़ी लालसा थी, ये सोचकर महलन की अटारी पर चढ़ गईं और खिडकी से बाहर देखने लगीं कि शायद श्यामसुन्दर यहीं से आज गईया लेकर निकलें। (अब हमारी प्यारी जू के ह्रदय में कोई बात आये और लाला उसे पूरा न करें ऐसा तो हो ही नहीं सकता।)

जब राधा रानी जी के मन के भाव श्याम सुन्दर ने जाने तो आज उन्होंने सोचा क्या क्यों न साकरीखोर से (जो कि लाडली जी के महलन से होकर जाता है) होते हुए जाएँ, अब यहाँ महलन की अटारी पे लाडली जी खड़ी थीं। तब उनकी मईया कीर्ति रानी उनके पास आईं और बोली- “अरी राधा बेटी ! देख अब तू बड़ी है गई है, कल को दूसरे घर ब्याह के जायेगी, तो सासरे वारे काह कहेंगे, जा लाली से तो कछु नाय बने है, बेटी कुछ नहीं तो दही बिलोना तो सीख ले।” अब लाडली जी ने जब सुना तो अब अटारी से उतरकर दही बिलोने बैठ गईं, पर चित्त तो प्यारे में लगा है। लाडली जी खाली मथानी चला रही हैं, घड़े में दही नहीं है इस बात का उन्हें ध्यान ही नहीं है, बस बिलोती जा रही हैं। उधर श्याम सुन्दर नख से शिख तक राधारानी के इस रूप का दर्शन कर रहे हैं, बिल्वमंगल जी ने इस झाँकी का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है।

लाला गईया चराके लौट तो आये हैं पर लाला भी प्यारी जू के ध्यान में खोये हुए हैं, और उनका मुखकमल पके हुए बेर के समान पीला हो गया है। पीला इसलिए हो गया है, क्योंकि राधा रानी गोरी हैं और उनके श्रीअंग की काँति सुवर्ण के समान है, इसलिए उनका ध्यान करते-करते लाला का मुख भी उनके ही समान पीला हो गया है।

इधर जब एक सखी ने देखा कि राधा जी ऐसे दही बिलो रही हैं, तो वह झट कीर्ति मईया के पास गई और बोली मईया जरा देखो, राधा बिना दही के माखन निकाल रही है, अब कीर्ति जी ने जैसे ही देखा तो क्या देखती हैं, श्रीजी का वैभव देखो, मटकी के ऊपर माखन प्रकट है। सच है लाडली जी क्या नहीं कर सकतीं, उनके के लिए फिर बिना दही के माखन निकलना कौन सी बड़ी बात है।

इधर लाला भी खोये हुए है नन्द बाबा बोले लाला- जाकर गईया को दुह लो। अब लाला पैर बाँधने की रस्सी लेकर गौ शाला की ओर चले है, गईया के पास तो नहीं गए वृषभ (सांड) के पास जाकर उसके पैर बाँध दिए और दोहनी लगाकर दूध दुहने लगे।

अब बाबा ने जब देखा तो बाबा का तो वात्सल्य भाव है बाबा बोले- देखो मेरो लाला कितनो भोरो है, इत्ते दिना गईया चराते है गए, पर जा कू इत्तो भी नाय पता है, कि गौ को दुहो जात है कि वृषभ को, मेरो लाल बडो भोरो है। और जब बाबा ने पास आकर देखा तो दोहनी दूध से लबालब भरी है, बाबा देखते ही रह गए, सच है हमारे लाला क्या नहीं कर सकते, वे चाहे गईया तो गईया, वृषभ को भी दुह सकते हैं।

“जय जय श्री राधे”
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9. मां सिद्धिदात्री

नवरात्र का आज अंतिम दिन है और इस दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा और अर्चाना का विधान है। जैसा कि इनके नाम से स्पष्ट हो रहा है कि मां सभी प्रकार की सिद्धी और मोक्ष को देने वाली हैं। मां सिद्धिदात्री की पूजा देव, यक्ष, किन्नर, दानव, ऋषि-मुनि, साधक और गृहस्थ आश्रम में जीवनयापन करने वाले पूजा करते हैं। नवरात्र के अंतिम दिन मां की पूजा पूरे विधि विधान के साथ करने वाले उपासक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। साथ ही यश, बल और धन की भी प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं मां सिद्धिदात्री के बारे में विशेष बातें…


मां सिद्धिदात्री के पास अणिमा, महिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, गरिमा, लघिमा, ईशित्व और वशित्व यह आठ सिद्धियां हैं। ये आठों सिद्धियां मां की पूजा और कृपा से प्राप्त की जा सकती हैं। मान्यता है कि सभी देवी-देवताओं को मां से ही सिद्धियों की प्राप्ति हुई हैं। हनुमान चालिसा में इन्हीं आठ सिद्धियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ‘अष्टसिद्धि नव निधि के दाता, अस वर दीन्ह जानकी माता’।

पुराणों के अनुसार, भगवान शिव ने भी इन्ही देवी की कठिन तपस्या कर इनसे आठों सिद्धियों को प्राप्त किया था। साथ ही मां सिद्धिदात्री की कृपा से महादेव का आधा शरीर देवी की हो गई थी और वह अर्धनारीश्वर कहलाए। नवरात्र के नौवें दिन इनकी पूजा के बाद ही नवरात्र का समापन माना जाता है। नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन और नौ प्रकार के फल फूल आदि का अर्पण करके नवरात्र का समापन करना चाहिए।

देवी भागवत पुराण के अनुसार, महालक्ष्मी की तरह मां सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान रहती हैं और इनके चार हाथ हैं। जिनमें वह शंख, गदा, कमल का फूल तथा चक्र धारण किए रहती हैं। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं, जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती हैं।

दुर्गासप्तशती के नवें अध्याय के साथ मां सिद्धिदात्री की पूजन करना चाहिए। इस दिन मौसमी फल, हलवा-चना, पूड़ी, खीर और नारियल का भोग लगाया जाता है। साथ ही नवरात्र के अंतिम दिन उनके वाहन, हथियार, योगनियों और अन्य देवी-देवताओं के नाम से हवन-पूजन करना चाहिए, इससे मां प्रसन्न होती हैं और भाग्य का उदय भी होता है। बैंगन या जामुनी रंग पहनना शुभ रहता है। यह रंग अध्यात्म का प्रतीक होता है।


मां सिद्धिदात्री का मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।


मां सिद्धिदात्री का ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यै:, असुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात्, सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
अर्थात सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, असुर और अमरता प्राप्त देवों के द्वारा भी पूजित किए जाने वाली और सिद्धियों को प्रदान करने की शक्ति से युक्त मां सिद्धिदात्री हमें भी आठों सिद्धियां प्रदान करें और अपना आशीर्वाद हमेशा हम पर बनाए रखें।


नवरात्रि की नवमी के दिन किए जाने वाले कन्या पूजन को कंजक भी कहा जाता है। इस पावन दिन छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानते हुए पूजा की जाती है और उनसे सुख-समृद्धि एवं निरोगी होने का आशीर्वाद लिया जाता है। मान्यता है कि देवी स्वरूप इन नौ कन्याओं के आशीर्वाद मां दुर्गा की कृपा लेकर आता है। ऐसे में नवरात्रि का व्रत रखने वाला हर साधक अष्टमी या नवमी के दिन कन्या का पूजन अवश्य करता है ।

कन्या पूजन यदि पूरे विधि-विधान से किया जाए तो माता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है, लेकिन कई बार जाने-अनजाने लोग इसमें कुछ गलतियां भी कर देते हैं। ऐसे में माता की कृपा साधक पर नहीं होती है। चूंकि कन्या पूजन के बिना नवरात्रि पूजा के फल की प्राप्ति नहीं होती है, इसलिए आइए जानते हैं


कन्या पूजन की सही विधि:

01. अष्टमी के दिन कन्या पूजन के लिए प्रात:काल स्नान ध्यान कर भगवान गणेश और मां महागौरी की पूजा करें।

02. देवी स्वरुपा नौ कन्याओं को घर में सादर आमंत्रित करें और उन्हें ससम्मान आसन पर बिठाएं।

03. सर्व प्रथम शुद्ध जल से कन्या के पैर धोएं। ऐसा करने से व्यक्ति के पापों का शमन होता है।

04. पैर धोने के पश्चात् कन्याओं को तिलक लगाकर पंक्तिबद्ध बैठाएं।

05. कन्याओं के हाथ में रक्षासूत्र बांधें और उनके चरणों में

पुष्प चढ़ाए।

06. इसके बाद नई थाली में कन्याओं को पूड़ी, हलवा, चना आदि श्रद्धा पूर्वक परोसें।

07. भोजन में कन्याओं को मिष्ठान और प्रसाद देकर अपनी क्षमता के अनुसार द्रव्य, वस्त्र आदि का दान करें।

08. कन्याओं के भोजन के उपरांत उन्हें देवी का स्वरूप मानते हुए उनकी आरती करें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

09. अंत में इन सभी कन्याओं को सादर दरवाजे तक और संभव हो तो उनके घर तक जाकर विदा करना न भूलें।

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प्रभु मिलन को लालसा कैसे बढ़े ?

प्र०-गुरुदेव, हृदय में प्रभु से मिलने की व्याकुलता कैसे बढ़े ?

समाधान – जो श्रीप्रिया- प्रियतम से मिलन के लिए व्याकुल है, ऐसे किसी भगवत्प्रेमी रसिक संत का संग करना प्रारम्भ कर दो, ये छुआछूत का रोग है उनके संग से तुम्हारे अन्दर भी आ जाएगा । भगवत्प्रेमियों के संग के बिना व्याकुलता आ ही नहीं सकती –

रे मन रसिकनि संग बिनु, रंच न उपजै प्रेम ।
या रस कौ साधन यहै, और करी जिनि नेम ॥
दंपति-छबि में मत्त जे, चाहत दिन इक रंग ।
हित सौं चित चाहत रहौ, निशि- दिन तिनकौ संग ॥

(श्रीबयालीसलीला)

‘अर्थात् चाहे जितना नियम साधन कर लो लेकिन रसिकों का संग किये बिना प्रेम छटा का लेश भी प्राप्त नहीं हो सकता है, प्रेम प्राप्ति का एकमात्र साधन रसिक संतों का सत्संग ही है । अतः जो श्रीश्यामा-श्याम की रूप-माधुरी में मग्न हैं या जो श्रीश्यामा श्याम की रूप माधुरी में मग्न होना चाहते हैं रात-दिन ऐसे ही रसिकों के संग की चाह करो ।”

श्रीनारदजी महाराज ने भी ‘भक्तिसूत्र’ में यही कहा

‘तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम् ॥’

उस ( महत्संग) की ही साधना करो, अर्थात् भगवत्प्रेम की प्राप्ति के लिए भगवत्प्रेमी महापुरुषों के संग की ही प्रबल चाह करो ।

यहाँ तक कि प्रभु के संग से भी व्याकुलता नहीं प्राप्त होती है, श्रीउद्धवजी श्रीकृष्ण के साथ ही हर समय रहते हैं लेकिन अभी ज्ञानी उद्धव हैं, प्रेमी उद्धव नहीं; जब प्रेम-स्वरूपा ब्रजगोपियों का संग मिला, वे उनकी चरणरज में लोटे, तब वे प्रेमी उद्धव बने ।

सुनि ऊषो प्रेम मगन भयो ।
लोटत घर पर ज्ञान गरब गयो ॥ (श्रीसूरदासजी)

इसलिए भगवद्दर्शन प्राप्त हो जाने से भी बड़ी चीज है भगवत्प्रेमी महात्माओं का संग प्राप्त हो जाना । कितने ऐसे भक्त हुए हैं जिन्होंने भगवत् साक्षात्कार करने के बाद भी प्रभु से यही माँगा कि हमें अपने प्रेमी-भक्तों का संग दे दो । भगवान् शंकर स्वयं प्रभु से याचना करते हैं

बार-बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥

(श्रीरामचरितमानस ७/१४)

हिताचार्य श्रीहरिवंश महाप्रभु जी कहते हैं

जैश्रीहित हरिवंश प्रपंच बंच सब, काल-व्याल की खायी ।
यह जिय जानि श्याम-श्यामा-पद-कमल-संगी सिर नायौ ।

श्रीहितध्रुवदासजी ने भी कहा –

जहँ जहँ पिय की बात सुनें, खोजत तिन गैननिं ।
छिन छिन प्रति ‘ध्रुव’ लेत, प्रेम-जल भरि-भरि नैननिं ॥

(श्रीबयालीसलीला)

जो भगवत्प्रेमी महात्माजन श्रीप्रिया प्रियतम की चर्चा कर रहे हैं, उस चर्चा को सुनने का अगर चाव बढ़ जाए तो हमारे अन्दर प्रिया- प्रियतम से मिलने की निश्चित व्याकुलता आ जायेगी ।

बार-बार हम जिसकी चर्चा सुनते हैं तो उससे मिलने की आकाँक्षा हृदय में स्वतः आ ही जाती । जैसे रुक्मिणी जी ने श्रीकृष्ण को देखा नहीं था केवल उनके गुणों को ही सुना था, इतने से ही उन्हें श्रीश्यामसुन्दर से प्रेम हो गया था ।

ऐसे ही जब हम भगवत्प्रेमी महात्माओं के द्वारा प्रियालाल के स्वभाव, रूप- माधुरी, गुण- माधुरी आदि की चर्चा निरन्तर सुनेंगे तो उनसे मिलने की मन में स्वयमेव तीव्र चाह पैदा हो जायेगी ।

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8. मां महागौरी

नवरात्र के नौ दिनों का पावन पर्व अब अपने अंतिम पड़ाव पर है. नवरात्र के नौ दिनों में प्रति दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है लेकिन नवरात्र के आठवें और नौवें दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों के प्रतीक में कन्या पूजन का भी विधान है जो इस पर्व के महत्व को और भी बढ़ा देता है. महागौरी को भगवान गणेश की माता के रूप में भी जाना जाता है. आइए आज के इस अंक में हम महागौरी से जुड़े कथा और मंत्रों पर ध्यान दें.

महागौरी का स्वरूप

नवरात्र के आठवें दिन मां के आठवें स्वरूप महागौरी की उपासना की जाती है. मां की चार भुजाएं हैं. वह अपने एक हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए हैं, दूसरे हाथ से अभय मुद्रा में हैं, तीसरे हाथ में डमरू सुशोभित है तथा चौथा हाथ वर मुद्रा में है. मां का वाहन वृष है. साथ ही मां का वर्ण श्वेत है.


महागौरी की कथा

अपने पूर्व जन्म में मां ने पार्वती रूप में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी तथा शिव जी को पति स्वरूप प्राप्त किया था.

शिव जी की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करते हुए मां गौरी का शरीर धूल मिट्टी से ढंककर मलिन यानि काला हो गया था. जब शिवजी ने गंगाजल से इनके शरीर को धोया तब गौरी जी का शरीर गौर व दैदीप्यमान हो गया. तब ये देवी महागौरी के नाम से विख्यात हुईं.


महागौरी की पूजा का फल

नवरात्र के दिनों में मां महागौरी की उपासना का सबसे बड़ा फल उन लोगों को मिलता है जिनकी कुंडली में विवाह से संबंधित परेशानियां हों. महागौरी की उपासना से मनपसंद जीवन साथी एवं शीघ्र विवाह संपन्न होगा. मां कुंवारी कन्याओं से शीघ्र प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा जीवन साथी प्राप्त होने का वरदान देती हैं. महागौरी जी ने खुद तप करके भगवान शिवजी जैसा वर प्राप्त किया था ऐसे में वह अविवाहित लोगों की परेशानी को समझती और उनके प्रति दया दृष्टि रखती हैं. यदि किसी के विवाह में विलंब हो रहा हो तो वह भगवती महागौरी की साधना करें, मनोरथ पूर्ण होगा.


महागौरी सदैव मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं. माता की पूजा अर्चना करने के लिए एक सरल मंत्र निम्न है :

मंत्र : या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:


अर्थ: हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है. हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो.


ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित कामार्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।

सिंहारूढाचतुर्भुजामहागौरीयशस्वीनीम्॥

पुणेन्दुनिभांगौरी सोमवक्रस्थितांअष्टम दुर्गा त्रिनेत्रम।

वराभीतिकरांत्रिशूल ढमरूधरांमहागौरींभजेम्॥

पटाम्बरपरिधानामृदुहास्यानानालंकारभूषिताम्।

मंजीर, कार, केयूर, किंकिणिरत्न कुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांत कपोलांचैवोक्यमोहनीम्।

कमनीयांलावण्यांमृणालांचंदन गन्ध लिप्ताम्॥


स्तोत्र मंत्र

सर्वसंकट हंत्रीत्वंहिधन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।

ज्ञानदाचतुर्वेदमयी,महागौरीप्रणमाम्यहम्॥

सुख शांति दात्री, धन धान्य प्रदायनीम्।

डमरूवाघप्रिया अघा महागौरीप्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यमंगलात्वंहितापत्रयप्रणमाम्यहम्।

वरदाचैतन्यमयीमहागौरीप्रणमाम्यहम्॥


कवच मंत्र

ओंकार: पातुशीर्षोमां, हीं बीजंमां हृदयो।

क्लींबीजंसदापातुनभोगृहोचपादयो॥

ललाट कर्णो,हूं, बीजंपात महागौरीमां नेत्र घ्राणों।

कपोल चिबुकोफट् पातुस्वाहा मां सर्ववदनो॥

भगवती महागौरी का ध्यान स्तोत्र और कवच का पाठ करने से सोमचक्र जाग्रत होता है, जिससे चले आ रहे संकट से मुक्ति होती है, पारिवारिक दायित्व की पूर्ति होती है व आर्थिक समृद्धि होती है. मां गौरी ममता की मूर्ति मानी जाती हैं जो अपने भक्तों को अपने पुत्र समान प्रेम करती हैं.


माँ महागौरी भोग
माँ महागौरी की नारियल का भोग लगाए

मां महागौरी का प्रिय पुष्प
मां महागौरी को पूजा के दौरान सफेद या पीले रंग का पुष्प अर्पित करना चाहिए। ऐसे में पजा के दौरान मां दुर्गा को चमेली व केसर का फूल अर्पित किया जा सकता है


मां महागौरी की आरती

जय महागौरी जगत की माया ।
जय उमा भवानी जय महामाया ॥

हरिद्वार कनखल के पासा ।
महागौरी तेरा वहा निवास ॥

चंदेर्काली और ममता अम्बे
जय शक्ति जय जय मां जगदम्बे ॥

भीमा देवी विमला माता
कोशकी देवी जग विखियाता ॥

हिमाचल के घर गोरी रूप तेरा
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा ॥

सती ‘सत’ हवं कुंड मै था जलाया
उसी धुएं ने रूप काली बनाया ॥

बना धर्म सिंह जो सवारी मै आया
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया ॥

तभी मां ने महागौरी नाम पाया
शरण आने वाले का संकट मिटाया ॥

शनिवार को तेरी पूजा जो करता
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता ॥

‘चमन’ बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो ॥

पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना जरूर पढ़े
अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥1॥

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥2॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥3॥

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7. मां कालरात्रि

नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा होती है। इसको महासप्तमी भी कहते हैं। माता का यह रूप शत्रु या दुष्ट लोगों का संहार करने वाला होता है। दुर्गा मां ने रक्तबीज का संहार करने के लिए मां कालरात्रि को अपने तेज से उत्पन्न किया।मां कालरात्रि ने मधु- कैटभ जैसे राक्षसों का संहार किया था। मां कालरात्रि को यंत्र, तन्त्र और मंत्र की देवी भी कहा जाता है। भूत-प्रेत, दानव, पिशाच इनका नाम लेने मात्र से भाग जाते हैं। माता कालरात्रि को काली, महाकाली, भद्रकाली, चंडी, भैरवी भी कहते हैं।

रात्रि के सप्तमी तिथि को जगड़ना भी होता है। इस दिन पुरा घर अच्छी तरह शाम में साफ सुथरा कर अरवा‌ चावल पानी में फूला कर 2-3 घंटे के लिए रख देते हैं। फिर शाम में पीस कर घर के हर सामान पर वो चौरठ छिड़का जाता है और सिंदुर किया जाता है। माता का पट इसी दिन खुलता है। इस बार जगरना मंगलवार 12 अक्टूबर को हैं। माना जाता है कि इस दिन हर चीज को फिर से एक बार जीवित कर देते। पहले पूजा के बाद से बाल में तेल सिन्दूर सब नहीं करते। इस दिन बाल धोकर नहा कर तब शाम‌ में जगरना के साथ ही पुरे श्रृंगार करते और फिर मेला का आयोजन शुरू हो जाता है। यह हमारे बिहार, झारखंड, बंगाल में तो होता है।

सप्तमी के रात ही बहुत जगह बली देने का विधान है।
वैष्णव लोगों के घर या मंदिर जहां कलश‌ बैठता वहां भूआ (कोहरे) या केला का बली दिया जाता है। इस दिन घरों में ‌या मंदिर में माता को चावल, दाल, पापड़, भुजिया, सब्जी, बैंगनी, रसगुल्ले ‌‌का‌ भोग लगाते। फिर अष्टमी के‌ दिन उपवास करते खोइंचा भरते और‌ नवमी को माता को खोइंचा भरते हैं। क्योंकि नवमी माता के मायके का आखिरी दिन होता है।‌ नवमी को हवन‌ कर‌ कन्या पुजन करते।


मां कालरात्रि का स्वरूप

आज माँ दुर्गा के सातवें रूप को “माँ कालरात्रि के नाम से पूजा जाता है। माँ कालरात्रि का वर्ण रात्रि के समान काला है परन्तु वे अंधकार का नाश करने वाली हैं।

दुष्टों व राक्षसों का अंत करने वाला माँ दुर्गा का यह रूप देखने में अत्यंत भयंकर लेकिन शुभ फल देता है इसलिए माँ “शुभंकरी” भी कहलाई जाती हैं।

माँ कालरात्रि के ब्रह्माण्ड के समान गोल नेत्र हैं। अपनी हर श्वास के साथ माँ की नासिका से अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं। अपने चार हाथों में खड्ग, लोहे का अस्त्र, अभयमुद्रा और वरमुद्रा किये हुए माँ अपने वाहन गर्दभ पर सवार हैं।
मां कालरात्रि का स्वरूप अंधेरे के जैसे एकदम काला है, बाल लंबे लंबे बिखरे हुए हैं।गले में मुंड की माला चमक रही है। माता के चार हाथ हैं बायें हाथ में खड्ग, दाहिने हाथ में वरमुद्रा, एक अभयमुद्रा में है और बायें हाथ शस्त्र लिए हैं। माता कालरात्रि का वाहन गधा है।


मां कालरात्रि की पूजा विधि

मां कालरात्रि की पूजा बहुत फलदाई होती है। इस‌ दिन लोग तंत्र पूजा करते हैं।‌इस दिन आधी रात को पूजा किया जाता है। बहुत लोग इस दिन मां को मदिरा भी अर्पित करते हैं। इस दिन मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी चीजें से भोग लगाया चाहिए। माता का पसंदीदा रंग लाल है हो सके तो लाल वस्त्र पहन कर पूजा करें।

माता कालरात्रि की पूजा अक्षत, धूप, दीप, गंध, रोली, चन्दन, रातरानी का फूल चढ़ाएं। माता को पान का पत्ता, सुपारी फिर कपूर से आरती करें। इस दिन काला‌ छागर बली पड़ता है। पहले स्नान ध्यान कर लें फिर कलश पूजा कर तब मां कालरात्रि की पूजा करें। ये मंत्र पढ़ें –

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥
ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम:।

यह कालरात्रि देवी का सिद्ध मंत्र है। आज रात इस मंत्र के जप से पा सकते हैं माता की कृपा। सप्तमी के रात में तिल या सरसों तेल का अखंड दीप जलाना चाहिए। रात में पूजा के समय सिद्धधकुंजिका स्तोत्र, अर्गला स्तोत्र, काली चालीसा या काली पुराण या दुर्गा सप्तशती पाठ पुरा पढ़ें।

घर में सुख शांति नहीं हो, शत्रु से परेशान हैं तो माता का ये मंत्र 108 बार जपें। माता की कृपा बनी रहेगी।

जय त्वं देवि चामुंडे जय भूतार्ति हारिणि।
जय सार्वगते देवी कालरात्रि नमोस्तुते।।

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कुसुम सरोवर

भगवान श्री राधाकृष्ण की लीलास्थली
श्री कुसुम सरोवर, गोवर्धन

मथुरा जिले के गोवर्धन धाम में श्री गिरिराज महाराज की सप्तकोसीय परिक्रमा में कुसुम वन क्षेत्र में स्थित कुसुम सरोवर, ब्रज के अति प्राचीन पांच प्रमुख सरोवरों में से एक है। कुसुम सरोवर के प्राचीन कच्चे कुंड को ओरछा (मध्य प्रदेश) के राजा बीर सिंह जू देव ने 1619 में पक्का कराया था। सन 1723 में भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल ने इसे कलात्मक स्वरूप प्रदान किया। महारजा सूरजमल के पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने 1768 में यहां अपने पिता और अपनी तीनों माताओं की याद में एक ऊंचे चबूतरे पर अत्यंत कलात्मक छतरियों का निर्माण कराया। जो कि स्थापत्यकला कला की एक बेजोड़ मिसाल है।


उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में 20 किलोमीटर दूर गोवर्धन कस्बे से लगभग 2 किलोमीटर दूर राधाकुंड परिक्रमा मार्ग पर स्थित है ऐतिहासिक कुसुम सरोवर। जो 450 × 450 फीट लंबा और 60 फीट गहरा है।
पौराणिक महत्व के अनुसार कुसुम सरोवर से जुड़ी कई पौराणिक उल्लेख मिलते हैं। इसमें सबसे अहम है श्रीराधा रानी और श्री कृष्ण जी मधुर लीला । ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण, राधा जी से छिप-छिप कर कुसुम सरोवर पर ही मिला करते थे। एक समय राधा रानी और सारी सखियां भगवान कृष्ण के लिए फूल चुनने कुसुम सरोवर गोवेर्धन ही जाया करतीं थीं। कुसुम सरोवर गोवर्धन के परिक्रमा मार्ग में स्थित एक रमणीक स्थल है जो अब सरकार के संरक्षण में है। यहां पर श्री कुसुमवन बिहारी जी का प्राचीन मंदिर भी है।


सरोवर की खासियत
इस सरोवर के चारों तरफ सैंकड़ों सीढ़ियां हैं। इस सरोवर के ईर्द-गिर्द ढेरों कदम्ब के पेड़ हैं और कहा जाता है कि कदम्ब का पेड़ भगवान कृष्ण को बेहद पसंद है और यही वजह है कि सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर से मथुरा-वृंदावन आने वाले श्रद्धालु कुसुम सरोवर जाना नहीं भूलते। इस सरोवर का पानी तैरने के लिहाज से बेहतर माना जाता है और यहां आने वाले पर्यटक बेहतरीन समय बिता सकते हैं। कुसुम सरोवर के आसपास कई आश्रम और मंदिर भी हैं। साथ ही यहां की शाम की आरती भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
मथुरा से टैक्सी, ऑटो रिक्शा या प्राइवेट कार के जरिए आसानी से कुसुम सरोवर पहुंचा जा सकता है।


कुसुम सरोवर ब्रज की एक अनूठी धरोहर है, मगर सरकार द्वारा समुचित रख रखाव नही किया जा रहा है।


कुसुम सरोवर का एक सुंदर प्रसंग

एक समय राधा रानी और सारी सखियाँ फूल चुनने कुसुम सरोवर गोवर्धन में पहुँची, राधा रानी और सारी सखियाँ फुल चुनने लगी और राधा रानी से बिछड़ गयी और राधा रानी की साड़ी कांटो में उलझ गई।

इधर कृष्ण को पता चला के राधा जी और सारी सखियाँ कुसुम सरोवर पे है। कृष्ण माली का भेष बना कर सरोवर पे पहुँच गये और राधा रानी की साड़ी काँटो से निकाली और बोले हम वन माली है इतने में सब सखियाँ आ गई।


माली रूप धारी कृष्ण बोले हमारी अनुपस्थिति मे तुम सब ने ये बन ऊजाड़ दिया इसी नोक झोक मे सारे पुष्प पृथ्वी पे गिर गये। राधा रानी को इतने मे माली बने कृष्ण की वंशी दिख गई और राधा रानी बोली ये वन माली नही वनविहारी है। राधा रानी बोली ये सारे पुष्प पृथ्वी पे गिर गये और इनपे मिट्टी लग गई कृष्ण बोले मे इन्हें यमुना जल में धो के लाता हूँ। राधा रानी बोली तब तक बहुत समय हो जायेगा हमे बरसाना भी जाना है। तब कृष्ण ने अपनी वंशी से एक सरोवर का निर्माण किया जिसे आज कुसुम सरोवर कहते हैं

“पुष्प धोये और राधा रानी की चोटी का फुलों से श्रृंगार किया। राधा रानी हाथ में दर्पण लेकर माली बने कृष्ण का दर्शन करने लगी। आज भी कुसुम सरोवर पर प्रिया-प्रियतम जी का पुष्पो से श्रृंगार करते है पर हम साधारण दृष्टी बाले उस लिला को देख नहीं पाते !

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6. मां कात्यायनी

नवरात्रि का छठा दिन, माता का छठा स्वरूप:-

“माँ कात्यायनी”

कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी पार्वती (शक्ति) के नौ रूपों में छठवें रूप है। यह अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हैमावती, इस्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थी, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतांजलि के महाभाष्य में किया गया है, जिसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में लिखी गयी थी। उनका वर्णन देवी-भागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे ४०० से ५०० ईसा में लिपिबद्ध किया गया था। बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका-पुराण (१०वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है।

परंपरागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी में उनकी पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।


माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली

कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं। ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं


मां कात्यायनी की पूजा विधि

मां कात्यायनी की पूजा नवरात्रि की षष्ठी तिथि को होती है। इस दिन प्रातः काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर मां की प्रतिमा की स्थापना करें। सबसे पहले मां का गंगा जल से आचमन करें। इसके बाद मां को रोली,अक्षत से अर्पित कर धूप, दीप से पूजन करें। मां कात्यायानी को गुड़हल या लाल रंग का फूल चढ़ाना चाहिए तथा मां को चुनरी और श्रृगांर का सामान अर्पित करें। इसके बाद दुर्गा सप्तशती, कवच और दुर्गा चलीसा का पाठ करना चाहिए। इसके साथ ही मां कात्यायनी के मंत्रों का जाप कर, पूजन के अंत में मां की आरती की जाती है। मां कात्यायनी को पूजन में शहद को भोग जरूर लगाएं। ऐसा करने से मां प्रसन्न होती हैं और आपकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करती हैं।


माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है


मां कात्यायनी की आरती

जय जय अंबे जय कात्यायनी ।
जय जगमाता जग की महारानी ।।

बैजनाथ स्थान तुम्हारा।
वहां वरदाती नाम पुकारा ।।

कई नाम हैं कई धाम हैं।
यह स्थान भी तो सुखधाम है।।

हर मंदिर में जोत तुम्हारी।
कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी।।

हर जगह उत्सव होते रहते।
हर मंदिर में भक्त हैं कहते।।

कात्यायनी रक्षक काया की।
ग्रंथि काटे मोह माया की ।।

झूठे मोह से छुड़ानेवाली।
अपना नाम जपानेवाली।।

बृहस्पतिवार को पूजा करियो।
ध्यान कात्यायनी का धरियो।।

हर संकट को दूर करेगी।
भंडारे भरपूर करेगी ।।

जो भी मां को भक्त पुकारे।
कात्यायनी सब कष्ट निवारे।।


नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए।

‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

अर्थ : हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।


इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो, उन्हें इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है। विवाह के लिये कात्यायनी मन्त्र-

ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि !
नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:।

माँ को जो सच्चे मन से याद करता है उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मांतर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ की शरणागत होकर उनकी पूजा-उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए।

“जय माता दी”
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5. मां स्कंदमाता

नवरात्रि का पांचवां दिन, माता का पांचवां स्वरूप:-



“माँ स्कंदमाता”


नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।

भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है।

स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है।

नवरात्रि-पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।


माँ स्कंदमाता की पूजा विधि

– माँ के श्रृंगार में खूबसूरत रंगो का इस्तेमाल करें। –

– माँ को सफ़ेद एवं पीले रंग के फूल अर्पित करें।

– माँ को केले का भोग लगाएँ।

– आज के दिन माँ के प्रिय सफ़ेद रंग के वस्त्र धारण करें


माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। एक अलौकिक प्रभामंडल अदृश्य भाव से सदैव उसके चतुर्दिक्‌ परिव्याप्त रहता है। यह प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है।

हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिए। इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है


प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में पाँचवें दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै। नमस्तस्यै नमो नम:॥


अर्थ : हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं।


सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

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4. मां कुष्मांडा

नोट : इस साल नवरात्रि के तृतीय और चतुर्थ एक ही दिन है अतः एक ही दिन माँ चंद्रघंटा के साथ मां कुष्मांडा की उपासना एवम पूजन करना है



नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा पूजा की जाती है। जो भक्त कुष्मांडा की उपासना करते हैं, उनके समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। आपको बता दें, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता कूष्मांडा ने ही ब्रहांड की रचना की थी। इन्हें सृष्टि की आदि- स्वरूप, आदिशक्ति माना जाता है। मां कूष्मांडा सूर्यमंडल के भीतर के लोक में निवास करती हैं। मां के शरीर की कांति भी सूर्य के समान ही है और इनका तेज और प्रकाश से सभी दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं। मां को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में जपमाला है। मां सिंह का सवारी करती हैं।


कैसा है मां कुष्मांडा का स्वरूप?

ऐसी मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था तब देवी दुर्गा के कुष्मांडा स्वरूप ने भी मंद-मंद मुस्कुराते हुए इस ब्रह्मांड यानी सृष्टि की रचना की थी. ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में जो तेज मौजूद है वह देवी कुष्मांडा की ही छाया है. मां की आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है. इनके सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत कलश, चक्र और गदा है. आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है. देवी कुष्मांडा का वाहन सिंह है.


ये है पूजा विधि

– सुबह उठकर सबसे पहले स्नान कर लें।

– साफ- सुधरे कपड़े पहन लें।

– इसके बाद मां कूष्मांडा का ध्यान कर उनको धूप, गंध, अक्षत्, लाल पुष्प, सफेद कुम्हड़ा, फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान अर्पित करें।

-फिर मां कूष्मांडा को हलवे और दही का भोग लगाएं। आप फिर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकते हैं।

– मां का अधिक से अधिक ध्यान करें।

– पूजा के अंत में मां की आरती करें।


ये है भोग

जानकार बताते हैं कि मां कुष्मांडा लगाए गए भोग को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करती हैं। यह कहा जाता है कि मां कुष्मांडा को मालपुए बहुत प्रिय हैं इसीलिए नवरात्रि के चौथे दिन उन्हें मालपुए का भोग लगाया जाता है।


कूष्मांडा मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्‍मांडा रूपेण संस्थिता.
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:


मां कूष्मांडा आरती

चौथा जब नवरात्र हो, कूष्मांडा को ध्याते।
जिसने रचा ब्रह्मांड यह, पूजन है

उनका आद्य शक्ति कहते जिन्हें, अष्टभुजी है रूप।
इस शक्ति के तेज से कहीं छांव कहीं धूप॥

कुम्हड़े की बलि करती है तांत्रिक से स्वीकार।
पेठे से भी रीझती सात्विक करें विचार॥

क्रोधित जब हो जाए यह उल्टा करे व्यवहार।
उसको रखती दूर मां, पीड़ा देती अपार॥
सूर्य चंद्र की रोशनी यह जग में फैलाए।
शरणागत की मैं आया तू ही राह दिखाए॥

नवरात्रों की मां कृपा कर दो मां
नवरात्रों की मां कृपा करदो मां॥

जय मां कूष्मांडा मैया।
जय मां कूष्मांडा मैया॥

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3. मां चंद्रघंटा

नोट : इस साल नवरात्रि के तृतीय और चतुर्थ एक ही दिन है अतः एक ही दिन माँ चंद्रघंटा के साथ मां कुष्मांडा की उपासना एवम पूजन करना है



पिण्डजप्रवरारुढा
चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं
चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन माँ के चंद्रघंटा विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है।

माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।

मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है।

माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं।


माता चंद्रघंटा की कथा
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देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला. असुरों का स्‍वामी महिषासुर था और देवाताओं के इंद्र. #महिषासुर ने देवाताओं पर विजय प्राप्‍त कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्‍वर्गलोक पर राज करने लगा।

इसे देखकर सभी #देवतागण परेशान हो गए और इस समस्‍या से निकलने का उपाय जानने के लिए त्र‍िदेव ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के पास गए।
देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्‍हें बंधक बनाकर स्‍वयं स्‍वर्गलोक का राजा बन गया है।

देवाताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्‍याचार के कारण अब देवता पृथ्‍वी पर #विचरण कर रहे हैं और स्‍वर्ग में उनके लिए स्‍थान नहीं है।

यह सुनकर ब्रह्मा, विष्‍णु और भगवान शंकर को अत्‍यधिक क्रोध आया. क्रोध के कारण तीनों के मुख से ऊर्जा उत्‍पन्‍न हुई. देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस #ऊर्जा से जाकर मिल गई. यह दसों दिशाओं में व्‍याप्‍त होने लगी।

तभी वहां एक देवी का #अवतरण हुआ. भगवान #शंकर ने देवी को त्र‍िशूल और भगवान विष्‍णु ने चक्र प्रदान किया. इसी प्रकार अन्‍य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अस्‍त्र शस्‍त्र सजा दिए।

इंद्र ने भी अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतरकर एक घंटा दिया.
सूर्य ने अपना तेज और तलवार
दिया और सवारी के लिए शेर दिया।

देवी अब महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थीं. उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर यह समझ गया कि अब उसका काल आ गया है. महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने को कहा. अन्‍य देत्‍य और दानवों के दल भी
युद्ध में कूद पड़े।

देवी ने एक ही झटके में ही दानवों का संहार कर दिया. इस युद्ध में महिषासुर तो मारा ही गया, साथ में अन्‍य बड़े दानवों और राक्षसों का संहार मां ने कर दिया. इस तरह मां ने सभी देवताओं को असुरों से अभयदान दिलाया।


उपासना मन्त्र एवं विधि
===================
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ
चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है।
प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में तृतीय दिन इसका जाप करना चाहिए।

इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।


माँ चंद्रघंटा ध्यान मन्त्र
=================
वन्दे वांछित लाभाय
चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
#सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम
कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या
नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि,
#रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा
कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां
क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

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2. मां ब्रह्मचारिणी

नवरात्रि का दूसरा दिन माता का दूसरा स्वरूप:-



“माँ ब्रह्मचारिणी”

नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा होती है। इस रूप में देवी को समस्त विद्याओं का ज्ञाता माना गया है। देवी ब्रह्मचारिणी भवानी माँ जगदम्बा का दूसरा स्वरुप है। ब्रह्मचारिणी ब्रह्माण्ड की रचना करने वाली। ब्रह्माण्ड को जन्म देने के कारण ही देवी के दूसरे स्वरुप का नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। देवी के ब्रह्मचारिणी रूप में ब्रह्मा जी की शक्ति समाई हुई है। माना जाता है कि सृष्टी कि उत्पत्ति के समय ब्रह्मा जी ने मनुष्यों को जन्म दिया। समय बीतता रहा , लेकिन सृष्टी का विस्तार नहीं हो सका। ब्रह्मा जी भी अचम्भे में पड़ गए। देवताओं के सभी प्रयास व्यर्थ होने लगे। सारे देवता निराश हो उठें तब ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है। भोले शंकर बोले कि बिना देवी शक्ति के सृष्टी का विस्तार संभव नहीं है। सृष्टी का विस्तार हो सके इसके लिए माँ जगदम्बा का आशीर्वाद लेना होगा, उन्हें प्रसन्न करना होगा। देवता माँ भवानी के शरण में गए। तब देवी ने सृष्टी का विस्तार किया। उसके बाद से ही नारी शक्ति को माँ का स्थान मिला और गर्भ धारण करके शिशु जन्म कि नीव पड़ी। हर बच्चे में १६ गुण होते हैं और माता पिता के ४२ गुण होते हैं। जिसमें से ३६ गुण माता के माने जातें हैं।
देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है। माँ दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली माँ ब्रह्मचारिणी। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं। इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित साधक माँ ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है।
ब्रह्मचारिणी : ब्रह्मचारिणी अर्थात् जब उन्होंने तपश्चर्या द्वारा शिव को पाया था। एक हाथ में रुद्राक्ष की माला और दुसरे हाथ में कमंडल धारण करने वाली देवी का यह ब्रह्मचारिणी स्वरुप कल्याण और मोक्ष प्रदान करने वाला है। देवी के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की आराधना का विशेष महत्व है। माँ के इस रूप की उपासना से घर में सुख सम्पति और समृद्धि का आगमन होता है।


देवी ब्रह्मचारिणी कथा

माता ब्रह्मचारिणी हिमालय और मैना की पुत्री हैं। इन्होंने देवर्षि नारद जी के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें मनोवांछित वरदान दिया। जिसके फलस्वरूप यह देवी भगवान भोले नाथ की वामिनी अर्थात पत्नी बनी। जो व्यक्ति अध्यात्म और आत्मिक आनंद की कामना रखते हैं उन्हें इस देवी की पूजा से सहज यह सब प्राप्त होता है। देवी का दूसरा स्वरूप योग साधक को साधना के केन्द्र के उस सूक्ष्मतम अंश से साक्षात्कार करा देता है जिसके पश्चात व्यक्ति की ऐन्द्रियां अपने नियंत्रण में रहती और साधक मोक्ष का भागी बनता है। इस देवी की प्रतिमा की पंचोपचार सहित पूजा करके जो साधक स्वाधिष्ठान चक्र में मन को स्थापित करता है उसकी साधना सफल हो जाती है और व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है। जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धादुर्गा पूजा के दूसरे दिन मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है और प्रसन्न रहता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता है।


पूजा विधि

नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है।
देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान इस प्रकार है, सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है, उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें. प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें- “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”। इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भाँति-भाँति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एक विशेष फूल) व कमल काफी पसन्द है। उनकी माला पहनायें. प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी”।


ब्रह्मचारिणी मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥



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नवरात्री स्पेशल

 नवरात्रि का पर्व आरंभ होने जा रहा है. घरों में नवरात्रि के पर्व को मनाने के लिए तैयारियां आरंभ हो चुकी हैं. हिंदू धर्म में मां दुर्गा को विशेष स्थान प्राप्त है. मां दुर्गा को शक्ति प्रतीक माना गया है. ऋगवेद के अनुसार माँ दुर्गा ही आदि-शक्ति हैं. पौराणिक कथाओं में मां दुर्गा को सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी माना गया है. इसके साथ ही जीवन में आने वाली हर परेशानियां को दूर करने में मां दुर्गा की पूजा को प्रभावशाली माना गया है. नवरात्रि यानी मां दु्र्गा की उपासना के पावन नौ दिन। नवरात्रि में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा क्रमश: की जाती है जिनके बारे में नित्य जानकारी एप पर उपलब्ध होगी

  1. मां शैलपुत्री
  2. मां ब्रह्मचारिणी
  3. मां चंद्रघंटा
  4. मां कुष्मांडा
  5. मां स्कंदमाता
  6. मां कात्यायनी
  7. मां कालरात्रि
  8. मां महागौरी
  9. मां सिद्धिदात्री


नवरात्रि कब से आरंभ हो रहे हैं

06 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ श्राद्ध समाप्त हो जाएंगे, जिसके अगले दिन यानी 07 अक्टूबर से नवरात्रि प्रारंभ हो जाएंगे।

इस साल शारदीय नवरात्रि आठ दिन के पड़ रहे हैं। तृतीया और चतुर्थी तिथि एक साथ पड़ने के कारण 07 अक्टूबर से शुरू हो रहे नवरात्रि 14 अक्टूबर को संपन्न होंगे। 15 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) का त्योहार मनाया जाएगा।

नवरात्रि में माता की सवारी

नवरात्रि में मां दुर्गा की सवारी को विशेष माना गया है. माता की सवारी दिन के अनुसार निर्धारित होती है. इस वर्ष शरद नवरात्रि का पर्व गुरुवार को आरंभ हो रहा है. माता की सवारी का वर्णन देवीभागवत पुराण में मिलता है. देवीभागवत पुराण के इस श्लोक में दुर्गा जी की सवारी के बारे में बताया गया है-

शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे। 
गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥



घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

घटस्थापना का शुभ समय सुबह 06 बजकर 17 मिनट से सुबह 07 बजकर 07 मिनट तक ही है।

कलश स्थापना नवरात्रि के पहले दिन यानी 07 अक्टूबर, गुरुवार को ही की जाएगी।

श्री दुर्गा सप्तशती में स्वयं दुर्गा भगवती ने कहा है-

“ शरदकाले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी …

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्य सुतान्वित:।

मनुष्यो मतप्रसादेन भविषयति:न संशय:।।”

“जो शरद काल की नवरात्रि में मेरी पूजा-आराधना तथा मेरे तीनों चरित्र का श्रद्धा पूर्वक पाठ करता है एवं नवरात्रि पर्यंत व्रत रहते हुए तप करता है, वह समस्त बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य से समपन्न हो यश का भागीदार बन जाता है, इसमें किंचित संशय नहीं है

 इस वर्ष दुर्गाष्टमी 13 अक्टूबर दिन बुधवार को है


पूजा विधि

  • नवरात्रि के दिन सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ पानी से स्नान कर लें।
  • पानी में कुछ बूंदें गंगाजल की डालकर स्नान करें या स्नान के पश्चात शरीर पर गंगा जल का छिड़काव करें।
  • कलश स्थापना के स्थान पर दीया जलाएं और दुर्गा मां को अर्घ्य दें।
  • इसके बाद अक्षत और सिंदूर चढ़ाएं।
  • लाल फूलों से मां को सजाएं और फल, मिठाई का भोग लगाएं।
  • धूप, अगरबत्ती जलाकर दुर्गा चालीसा पढ़े और अंत में आरती करें।

दुर्गा चालीसा और आरती एप के नवरात्री स्पेशल आइकॉन में उपलब्ध है

नवरात्र‍ि के दौरान कुछ महत्वपूर्ण चीजें

ऐसी मान्यता है कि नवरात्र‍ि के दौरान कुछ चीजें घर लाई जाएं तो माता रानी जरूर प्रसन्न होती हैं

कमल पर विराजमान मां की तस्वीर- 

आप घर में धन-समृद्धि लाने के लिए नवरात्रि के दौरान देवी लक्ष्मी का ऐसा चित्रपट लाएं, जिसमें वे कमल पर विराजमान हों. इसके साथ ही उनके हाथों से धन की वर्षा हो रही हों. कमल देवी लक्ष्मी का प्रिय फूल है. नवरात्रि में कमल का फूल या उससे संबंधित चित्र घर में लेकर आने से देवी लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है.

सोलह श्रृंगार का सामान-

नवरात्रि के दौरान महिलाओं को घर में सोलह श्रृंगार का सामान जरूर लाना चाहिए. श्रृंगार के सामान को घर के मंदिर में स्थापित करने से मां दुर्गा की कृपा सदैव घर पर बनी रहती है.

सोने या चांदी का सिक्का –

नवरात्रि के दौरान घर में सोने या चांदी का सिक्का लाना शुभ माना जाता है. सिक्के पर माता लक्ष्मी या भगवान गणेश की चित्र बना हुआ हो तो और भी शुभ होता है अपने पर्स में सोने या चांदी का सिक्का जरूर रखें, इससे आप पर मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहेगी.

मोर पंख-

शास्त्रों में मोर पंख को बहुत शुभ माना गया है. नवरात्रि में मां सरस्वती का प्रिय मोर पंख घर लाकर मंदिर में रखने से कई फायदे होते हैं. मोर पंखविद्यार्थियों के कमरे में रखने से उन्हें विद्या की प्राप्ति होती है. लॉकर के पास मोर पंख रखने से आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगता है. ये नकारात्मक ऊर्जा से भी बचाता है.

केले का पौधा-

नवरात्रि में केले का पौधे घर में लाना चाहिए. इसे घर के आंगन में लगाएं और पूजा करने के बाद इस पर रोजाना जल चढ़ाएं. गुरुवार के दिन इस पर दूध भी चढ़ाना चाहिए.


आपको रोज के ब्लॉग जैसे आज किसकी पूजा करे कल किसकी और कैसे ये सब जानकारी आपको रोज इसी आइकॉन पर क्लिक करके मिलेगी ! निवेदन है की एप ज्यादा से ज्यादा शेयर करे

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The young team of Franziska Hildebrand, Franziska Preuss, Vanessa Hinz and Dahlmeier clocked 1 hour, 11 minutes, 54.6 seconds to beat France by just over 1 minute. Italy took bronze, 1:06.1 behind.

Germany missed six targets overall, avoiding any laps around the penalty loop.

Maria Dorin Habert of France, who has two individual gold medals at these worlds, passed Russia and France on the last leg and to take her team from fourth to second.

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Looks from the Roswana, 2015

For Joesendra, this is only her second fashion week showing, following her presentation at a Fashion World on this January. It was meant to be about getting back out there and doing it on its own over Street Market in New York and London, as well as IT Hong Kong, approached her about orders.

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A Paradise for Holiday

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Thai Fried Noodle

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Kayaking: Adventurous Sport

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Tennis Match: Go Federer

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Etiam eu orci luctus est pulvinar egestas.

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Praesent ornare luctus quam

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Sed sagittis risus

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Quisque nec viverra dui. Duis dolor purus, venenatis ac lacus id, pellentesque lacinia lectus. Nulla sed lectus condimentum, aliquam eros sit amet, vulputate nisl. Maecenas sit amet hendrerit nibh. Duis mattis metus orci, feugiat feugiat nisl mattis ac. Vivamus bibendum dapibus congue. Morbi quis turpis eget augue hendrerit venenatis. Maecenas ut pulvinar mi. Ut dictum auctor diam, at faucibus lacus condimentum vitae. Nunc at consectetur odio. Vestibulum vel leo ullamcorper, dictum nibh dictum, maximus lorem.

Morbi vitae porta felis. Etiam aliquet ex nisi, nec feugiat enim condimentum quis. Aliquam consequat est eget odio sollicitudin sagittis. Nulla porta ultrices nibh, at bibendum libero pellentesque eu. Duis ac aliquet magna. Sed malesuada luctus nisi et ullamcorper. Vestibulum tempus ornare eros ultricies fringilla. Integer rhoncus arcu quis neque condimentum faucibus. Nulla sollicitudin ultrices aliquam. Etiam ligula velit, commodo eget ultrices ac, tempor non libero. Fusce ut libero a mi dapibus aliquam et eget est. Sed blandit tellus vitae ex placerat pretium.

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Vestibulum maximus quis

Vestibulum maximus quis odio a faucibus. Nunc iaculis tristique porta. Maecenas eu rhoncus arcu. Sed pretium auctor urna sed venenatis. Praesent condimentum egestas ornare. Pellentesque ac tortor vel libero mollis pulvinar et vitae justo. Curabitur maximus pretium dui, in accumsan felis mollis non. Donec placerat, lectus eu faucibus consequat, sem nibh dapibus tortor, sed ultrices nibh nunc et arcu. Pellentesque rutrum, libero ac suscipit volutpat, massa ex faucibus diam, et porta neque felis et ante. Nulla facilisi. Vivamus feugiat neque sed tincidunt interdum.

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