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गौचारण वन

प्राचीन यमुना तट पर गौचारण वन स्थित है। इस स्थान पर श्रीवाराह देवजी एवं श्रीगौतम मुनि का आश्रम विराजित है। श्रीवाराह देवजी का नामानुसार इस वन का दूसरा नाम वाराह बन भी है। इसी गौचारण वन में श्रीकृष्णजी अपने सखाओं के साथ गौचारण लीला किया करते थे।

ततश्च पौगण्डवयः श्रिती बजे बभूवतुस्ती पशुपालसम्मती । गाश्चारयन्तौ सखिभिः समं पदैवृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुः ।। तन्माधवो वेणुमुदीरयन् वृतो गोपदिनः स्वयशो बलान्वितः। पशुन् पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद् विहर्तुकामः कुसुमाकरं वनम् ।। तन्मञ्जुघोषालिमृगद्विजाकुलं महन्मनः प्रख्यपयः सरखता । वातेन जुष्टं शतपत्रगन्धिना निरीक्ष्य रन्तुं भगवन् मनो दधे।।

अनुवाद श्रीशुकदेवजी कहते है – महाराज परीक्षित् | अब बलराम और श्रीकृष्ण ने पौगण्ड अवस्था में अर्थात् छटे वर्ष में प्रवेश किया है। अब उन्हें गौएँ चराने की स्वीकृति मिल गयी है। वे अपने सखा ग्वालवालों के साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावन में जाते और अपने चरणों से वृन्दावन को अत्यन्त पावन करते। यह वन गौओं के लिये हरी हरी घास से युक्त एवं रंग विरेंगे पुष्पों की खान हो रहा था। आगे आगे गौएँ, उनके पीछे पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदनन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालवाल इस प्रकार बिहार करने के लिये उन्होंने उस वन में प्रवेश किया। उस वन में कहीं तो भौंरे बड़ी मधुर गुंजन कर रहे थे, कहीं झुण्ड के झुण्ड हिरण चौकड़ी भर रहे थे और कहीं सुन्दर सुन्दर पक्षी चहक रहे थे बड़े ही सुन्दर सुन्दर सरोवर थे, जिनका जल महात्माओं के हृदय के समान स्वच्छ और निर्मल था। उनके खिले हुए कमलों के सौरभ से सुभाषित होकर शीतल मन्द सुगन्ध वायु उस वन की सेवा कर रही थी। इतना मनोहर था वह वन कि उसे देखकर भगवान ने मन ही मन उसमें बिहार करने का संकल्प किया।

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ललिता जी और कृष्ण की लीला

काम्यक वन में ललिता कुण्ड है जिसमें ललिता जी स्नान किया करती थी, और सदा राधा और कृष्ण को मिलन की चेष्टा करती थी। एक दिन ललिता जी बैठे-बैठे हार बनाती है और बनाकर तोड देती, हर बार यही करती फिर बनाती और फिर तोड़ देती। फिर बनाती है फिर तोड़ देती है। नारद जी उपर से ये देखते है, तो आकर ललिता से पूछते है–‘आप ये क्या कर रही हो ?’

ललिता जी कहती है–‘मै कृष्ण के लिए हार बना रही हूँ।’
नारद जी ने कहा–‘हाँ वह तो मै देख ही रहा हूँ परन्तु आप बार बार बनाती है और तोड़ देती है–ऐसा क्यों ?’
ललिता जी कहती है–‘नारद जी ! मुझे लगता है कि ये हार छोटा होगा कृष्ण को, तो मैं तोड कर दूसरा बनाती हूँ, पर फिर लगता है कि ये बडा ना हो, तो उसे भी तोड देती हूँ–इसीलिए में बार-बार बनाकर तोडती हूँ।’
नारद जी कहते है–‘इससे तो अच्छा है कि भगवान को बुला लो और उनके सामने हार बना दो।’
नारदजी भगवान श्रीकृष्ण के पास जाकर कहते हैं–‘आज मुझे ललिता-कृष्ण की लीला देखनी है, कृष्ण और ललिता जी को नायक-नायिका के रूप में देखना है।’ और नारदजी श्रीकृष्ण को ले आते है ललिताजी के पास। ललिता जी उनके नाप का हार बनाकर पहना देती हैं।
श्रीकृष्ण ललिता जी से कहते है–‘आओ! मेरे साथ झूले पर बैठो।’
ललिता जी कहती हैं–‘अभी राधा जी आती होगीं–वे ही बैठेगी।
श्रीकृष्ण के जिद करने पर ललिता जी बैठ जाती है, क्योंकि गोपियों का उद्देश्य भगवान का सुख है।
नारद जी दोनों को झूले में देखकर बडे प्रसन्न होते हुए जाते हैं और वहाँ से सीधे राधा जी के पास आकर उनसे सामने ही गाने लगते है–‘कृष्ण-ललिता की जय हो!, कृष्ण-ललिता की जय हो!’
राधा जी कहती हैं–‘क्या बात है नारद जी ? आज कृष्ण-ललिता जी की जय कर रहे है।’
नारद जी कहते है–‘अहा ! क्या प्यारी जोडी है, झूले में ललिता और कृष्ण की। देखकर आनन्द आ गया।’ और नारद जी वहाँ से चले जाते है।
जब राधा रानी ये बात सुनती है तो उन्हें रोष आ जाता है, और वो झट ललिता कुण्ड में आकर देखती है कि कृष्ण ललिता जी के साथ झूला झूल रहे है और सारी सखियाँ झूला झुला रही हैं। वे वहाँ से चुपचाप चली जाती हैं।
जब बहुत देर हो जाती है और राधा रानी आती नहीं हैं, तो भगवान सोचते है, कि राधा जी अभी तक क्यों नहीं आई ? वे ढूँढने जाते है, देखते है कि राधा जी अपने निकुञ्ज में मान करते हुए बैठी हैं।
श्रीकृष्ण उन्हें मनाकर लाते हैं, और वो आकर माधव के साथ झूला झूलती हैं। ललिता-विशाखा सारी सखियाँ झूलाती हैं।
राधाजी की इच्छा होती है कि भगवान मेरे साथ-साथ ललिता जी को भी बिठाए झूले पर, राधा जी का इशारा पाकर भगवान अपनी दूसरी ओर ललिता जी को बिठा लेते हैं।
अब एक ओर राधाजी बैठी हैं तो दूसरी ओर ललिताजी हैं। सभी सखियाँ झूला रही हैं। कुछ देर बाद राधारानी की इच्छा होती है–दूसरी ओर श्रीकृष्ण विशाखा को बैठाए और मैं झूला झुलाऊँ। भगवान वैसा ही करते है।
एक ओर ललिताजी को ओर दूसरी ओर विशाखाजी को बैठा लेते हैं। राधारानी उन्हें झूला झुलाती हैं।
वास्तव में लीला मात्र है। जब भगवान कृष्ण चाहते है, कि राधा जी मान करें तो राधा रानी मान की लीला करती हैं। वरना राधा जी के अन्दर मान, द्वेष का लेशमात्र भी नहीं है, कभी किसी भी सखी के प्रति द्वेष या जलन डाह नहीं है। राधा एक भाव है जो प्रेम कि पराकाष्ठा है।

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श्री प्रेम निधि जी

एक भक्त थे .प्रेम निधि उन का नाम था..सब में भगवान है ऐसा समझ कर प्रीति पूर्वक भगवान को भोग लगाए..और वो प्रसाद सभी को बाँटा करते
यमुनाजी से जल लाकर..भगवान को स्नान कराते….
यमुना जी के जल से भगवान को जल पान कराता थे..
एक सुबह सुबह बहुत जल्दी उठे प्रेम निधि…मन मैं आया कि सुबह सुबह जल पर किसी पापी की, नीगुरे आदमी की नज़र पड़ने से पहेले मैं भगवान के लिए जल भर ले आऊँ ऐसा सोचा…
अंधेरे अंधेरे में ही चले गये..लेकिन रास्ता दिखता नही था..इतने में एक लड़का मशाल लेकर आ गया..और आगे चलने लगा..प्रेम निधि ने सोचा की ये लङका भी उधर ही चल रहा है ? ये लड़का जाता है उधर ही यमुना जी है..तो इस के पिछे पिछे मशाल का फ़ायदा उठाओ..नही तो कही चला जाएगा…फिर लौटते समय देखा जाएगा..
लेकिन ऐसा नही हुआ..मशाल लेकर लड़का यमुना तक ले आया..प्रेम निधि ने यमुना जी से जल भरा..ज़्यु ही चलने लगे तो एकाएक वह लड़का फिर आ गया.. आगे आगे चलने लगा..अपनी कुटिया तक पहुँचा..तो सोचा की उस को पुछे की बेटा तू कहाँ से आया..
तो इतने में देखा की लड़का तो अंतर्धान हो गया! प्रेम निधि भगवान के प्रति प्रेम करते तो भगवान भी आवश्यकता पङनें पर उन के लिए कभी किसी रूप में कभी किसी रूप में उन का मार्ग दर्शन करने आ जाते…
लेकिन उस समय यवनों का राज्य था..हिंदू साधुओं को नीचे दिखाना और अपने मज़हब का प्रचार करना ऐसी मानसिकता वाले लोग बादशाह के पास जा कर उन्हों ने राजा को भड़काया…की प्रेम निधि के पास औरते भी बहोत आती है…बच्चे, लड़कियां , माइयां सब आते है..इस का चाल चलन ठीक नही है..
प्रेम निधि का प्रभाव बढ़ता हुआ देख कर मुल्ला मौलवियों ने , राजा के पिठ्ठुओ ने राजा को भड़काया.. राजा उन की बातों में आ कर आदेश दिया की प्रेम निधि को हाजिर करो..
उस समय प्रेम निधि भगवान को जल पिलाने के भाव
से कुछ पात्र भर रहे थे…
सिपाहियों ने कहा , ‘चलो बादशाह सलामत बुला रहे ..चलो ..जल्दी करो…’ प्रेम निधि ने कहा मुझे भगवान को जल पिला लेने दो परंतु सिपाही उन्हें जबरदस्ती पकड़ ले चले
तो भगवान को जल पिलाए बिना ही वो निकल गये..अब उन के मन में निरंतर यही खटका था की भगवान को भोग तो लगाया लेकिन जल तो नही पिलाया..ऐसा उन के मन में खटका था…
राजा के पास तो ले आए..राजा ने पुछा, ‘तुम क्यो सभी को आने देते हो?’
प्रेम निधि बोले, ‘सभी के रूप में मेरा परमात्मा है..किसी भी रूप में माई हो, भाई हो, बच्चे हो..जो भी सत्संग में आता है तो उन का पाप नाश हो जाता है..बुध्दी शुध्द होती है, मन पवित्र होता है..सब का भला होता है इसलिए मैं सब को आने देता हूँ सत्संग में..मैं कोई संन्यासी नही हूँ की स्रीयों को नही आने दूं…मेरा तो गृहस्थी जीवन है..भले ही मैं गृहस्थ हो भगवान के आश्रय में रहता हूं परंतु फिर भी गृहस्थ परंपरा में ही तो मैं जी रहा हूँ..’
बादशाह ने कहा की, ‘तुम्हारी बात तो सच्ची लगती है..लेकिन तुम काफिर हो..जब तक तुण सही हो तुम्हारायह परिचय नही मिलेगा तब तक तुम को जेल की कोठरी में बंद करने की इजाज़त देते है..’बंद कर दो इस को’
भक्त माल में कथा आगे कहेती है की प्रेम निधि तो जेल में बंद हो गये..लेकिन मन से जो आदमी गिरा है वो ही जेल में दुखी होता है..अंदर से जिस की समझ मरी है वो ज़रा ज़रा बात में दुखी होता है..जिस की समझ सही है वो दुख को तुरंत उखाड़ के फेंकने वाली बुध्दी जगा देता है..क्या हुआ? जो हुआ ठीक है..बीत
जाएगा..देखा जाएगा..ऐसा सोच कर वो दुख में दुखी नही होता…
प्रेम निधि को भगवान को जल पान कराना था..अब जेल में तो आ गया शरीर..लेकिन ठाकुर जी को जल पान कैसे कराए यहां जेल में बंद होने की चिंता बिल्कुल नहीं थी यहां तो भगवान को जल नहीं पिलाया यही दुख मन में था यही बेचैनी तड़पा रही थी?..
रात हुई… राजा को मोहमद पैगंबर साब स्वप्ने में दिखाई दिए.. बोले, ‘ बादशाह! अल्लाह को प्यास लगी है..’
‘मालिक हुकुम करो..अल्लाह कैसे पानी पियेंगे ?’
राजा ने पुछा. बोले, ‘जिस के हाथ से पानी पिए उस को तो तुम ने जेल में डाल रखा है..’
बादशाह सलामत की धड़कने बढ़ गयी…देखता है की अल्लाह ताला और मोहमाद साब बड़े नाराज़ दिखाई दे रहे…मैने जिस को जेल में बंद किया वो तो प्रेम निधि है. बस एकदम आंख खुल गई.जल्दी जल्दी प्रेम निधि को रिहा करवाया…
प्रेम निधि नहाए धोए..अब भगवान को जल पान कराते है.. राजा प्रेम निधि को देखता है…देखा की अल्लाह, मोहमद साब और प्रेम निधि के गुरु एक ही जगह पर विराज मान है!
फिर राजा को तो सत्संग का चसका लगा..ईश्वर, गुरु और मंत्र दिखते तीन है लेकिन यह तीनों एक ही सत्ता हैं..बादशाह सलामत हिंदुओं के प्रति जो नफ़रत की नज़रियाँ रखता था उस की नज़रिया बदल गयी…
प्रेम निधि महाराज का वो भक्त हो गया..सब की सूरत में परब्रम्ह परमात्मा है ..राजा साब प्रेम निधि महाराज को कुछ देते..ये ले लो..वो ले लो …तो बोले, हमें तो भगवान की रस मयी, आनंद मयी, ज्ञान मयी भक्ति चाहिए..और कुछ नही…
जो लोग संतों की निंदा करते वो उस भक्ति के रस को नही जानते..
“संत की निंदा ते बुरी सुनो जन कोई l
की इस में सब जन्म के सुकृत ही खोई ll”
जो भी सत्कर्म किया है अथवा सत्संग सुना है वो सारे पुण्य संत की निंदा करने से नष्ट होने लगते है..
संतो की जय भक्तों की जय…..
करुणानिधान प्रभु की जय…

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मन प्रिया प्रियतम में कैसे लगे?

प्र०-महाराजजी, मैं बड़ा अशान्त रहता हूँ क्योंकि मेरा चित बढ़ा चंचल है, ये कैसे एकाग्र होकर के श्रीप्रिया-प्रियतम में लगेगा ?

समाधान – हमारी श्रीजी का एक नाम है – ‘चंचलचित्त आकर्षिणी अर्थात् जो लाल जू के चंचल चित्त को आकर्षित करती हैं, फिर हम लोग तो साधारण से जीव हैं । जो लाल जू ‘मदनमोहन, विश्वमनमोहन, मुनिमनमोहन और स्वमनमोहन हैं’ – उनके मन को

मोहनता की राशि किसोरी ।

भी मोहने वाली हमारी प्यारी जू मोहिनी हैं

जे मोहन मोहत सबकी मन, बँधे बंक चितवन की डोरी ॥

श्रीवयालीस लीला

वेणुः करान् निपतितः स्खलितं शिखण्डं भ्रष्टं च पीतवसनं व्रजराजसूनोः यस्याः कटाक्षशरपातविमूर्च्छितस्य तां राधिकां परिचरामि कदा रसेन ॥

(श्रीराधासुधानिधि -३८)

श्रीप्यारीजू ने मन्द मुस्कान से, तिरछी चितवन से कटाक्ष कर दिया तो अखिललोकचूड़ामणि मदनमोहन का मुकुट खिसक गया, वंशी गिर गयी, पीताम्बर गिर गया और सरकार बेसुध हो गए । हम सब लोग उन स्वामिनीजू के शरणागत हैं तो हमारा मन कितनी चंचलता करेगा, उसे आकर्षित होना ही पड़ेगा । सोचो, समष्टि मन के अधिष्ठातृ स्वयं श्रीलालजू महाराज हैं,

उनके मन को आकर्षित करने वाली मनमोहिनी प्यारी जू हैं, यदि हम उनके गोरे चरणारविन्द का आश्रय ले लें तो मन की चंचलता सदा सदा के लिए खत्म हो जायेगी, मन पंगु हो जाएगा अरे, ह आपकी बात जाने दो, श्रीलालजू का मन पंगु हो जाता श्रीहितसजनीजू कह रही हैं.

देखी माई अबला कैं बल रासि । अति गज मत्त निरंकुश मोहन, निरखि बँधे लट पाशि ॥ अब हीं पंगु भई मन की गति, बिनु उद्दिम अनियास । तब की कहा कहौं जब पिय प्रति, चाहत भृकुटि विलास ॥

(श्रीहितचतुरासी ५३)

हमारी प्यारी जू सिंहासन पर विराजमान थीं, श्रीलालजू निकुँज में पधार रहे थे उसी समय एक लट निकलकर प्यारी जू के कपोल पर आ गयी अत्यंत मदमत्त गज के समान निरंकुश मनमोहन अर्थात् जो सर्वेश्वर हैं, अखिललोकचूड़ामणि हैं, वे ऐसे प्रभु इनके सुंदर मुख पर लटकी हुई घुँघराले बालों की एक लट के दर्शन मात्र से उसके फंदे में बँध गये ।

श्री प्रियाजू के दर्शनमात्र से आरम्भ में ही श्रीलालजू के मन की गति बिना किसी उद्यम के ही पंगु हो गई अर्थात् लाल जू प्यारी जू की उस रूप माधरी को देखकर के शिथिल हो गए

हे सखि ! इनकी तो अभी ये हालत हो गयी और हाय! तब क्या होगा, जब प्यारी जू मंद-मंद मुस्कुराते हुए, प्यार भरी दृष्टि से लाल की ओर देखेंगी ?

अतः ऐसी श्रीकिशोरीजू के श्रीचरणों का आश्रय लेने के बाद मन से कह दो कि जा आज तुझे मुक्त करता हूँ, भाग ले जितना भाग पाये अब प्यारी जू अपने कृपा पाश से बाँधकर के सदा-सदा के लिए इस मन को पंगु कर देंगी।

हे प्यारी जू ! मैं बलहीन हूँ या मुझ अबला की आप ही बल हो । बस इतना हृदय में दीनता पूर्वक आ जाय तो जो वस्तु बड़ी बड़ी साधनाओं से प्राप्त नहीं होती, वह इससे प्राप्त हो जायेगी. जय श्रीरूपलाल हित हाथ बिकानी, निधि पाई मनमानी ।

मेरे बल श्रीवृन्दावनरानी ।

चंचल मन को वश में करने का दूसरा उपाय

श्रीहितधुवदासजी बता रहे हैं

मन तो चंचल सबनि तें, कीजै कौन उपाइ

साधन कौं हरि भजन है, कै सतसंग सहाइ ॥

प्रधान साधना है श्रीप्रिया प्रियतम का स्मरण और सहायक है सत्संग । यदि संतों के सत्संग को मनन करते हुए सुनें तो उससे बहुत लाभ होगा। निरंतर नाम जपने का अभ्यास और सत्संग ये निश्चित आपके मन को एकाग्र कर देंगे और प्रियालाल के चरणारविन्द में लगा देंगे।

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प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं

सात-आठ साल की एक लड़की अपने से दो-तीन साल छोटे एक बच्चे को गोद में उठाकर कहीं जा रही थी। लड़की कमजोर और दुबली-पतली थी जबकि उसकी गोद में जो बच्चा था वह काफी हृष्ट-पुष्ट था। इसके बावजूद लड़की तेजी से चली जा रही थी। एक राहगीर ने जब यह देखा तो उसने उत्सुकतावश लड़की से पूछा, ‘बेटा, इतना बोझ उठा कर भी तुम इतनी तेजी से कैसे चल लेती हो?’ ‘बोझ? नहीं यह तो मेरा भाई है।’, लड़की ने राहगीर को एक झटके में जवाब दिया और बिना रुके वह उसी रफ्तार में अपने रास्ते पर आगे बढ़ गई।
इस घटना से आश्चर्य हो सकता है कि एक कमजोर और दुबली-पतली लड़की कैसे अपने जितना या अपने से ज्यादा बोझ उठा लेती है। कारण स्पष्ट है, लड़की अपने भाई को बहुत प्यार करती है। इसलिए उसका भाई उसके लिए बोझ नहीं लगता है। इस प्रसंग से कई चीजें स्पष्ट होती हैं।
जिस व्यक्ति, वस्तु या प्राणी को हम मन से चाहते हैं, जिसे प्यार करते हैं, जिसे अपना मानते हैं वह हमें बोझ नहीं लगता। जब कोई अपने लक्ष्य से प्यार करने लगता है तो उसे अपनी परेशानी नजर नहीं आती है। इसके विपरीत प्यार के अभाव में यह संसार हमारे लिए बोझ बना रहता है और इसी से हमारा जीवन भी कष्टमय हो जाता है। अपनेपन से किया गया हर कार्य हमें प्रसन्नता प्रदान करने में सक्षम होता है। बेगार या भार समझकर काम करने से आसान काम भी मुश्किल लगने लगता है और उसमें उत्कृष्टता नहीं आ पाती।
व्यक्ति ही नहीं, कार्य से भी हमें प्रेम करना सीखना चाहिए। हमें जीवनयापन के लिए कोई न कोई नौकरी, कला, व्यवसाय अवश्य अपनाना पड़ता है। अपनी नौकरी, कार्य या व्यवसाय से प्यार करना सीख लीजिए । जीवन में खुश रहने, आनंद पाने के लिए अथवा अपनी अर्जित प्रतिभा का सही इस्तेमाल करने के लिए अपनी पसंद की नौकरी, कार्य या व्यवसाय का चुनाव करना ही श्रेयस्कर होता है, लेकिन यह हमेशा संभव नहीं हो पाता और रुचि के अभाव में हम कार्य में आनंद नहीं ले पाते। ऐसे में किया जाने वाला कार्य ही नहीं, अक्सर पूरा जीवन बोझ लगने लगता है। जीवन से प्रसन्नता दूर होती चली जाती है।
जीवन को आनंदमय बनाने के लिए पहले तो यही जरूरी है कि हमें जो भी कार्य करना पड़ रहा है, उस कार्य में दक्षता व कुशलता प्राप्त करने की कोशिश की जाए। जो चीजें हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं उनसे घृणा करना अथवा उनकी उपेक्षा करना छोड़कर उनसे प्यार करना शुरू कर दीजिए।
दूसरे, उपरोक्त प्रसंग में लड़की अपने भाई को रोज उठाती है और तब से उठा रही थी जब वह बिल्कुल छोटा और हल्का था। उस लड़की की तरह जब हम किसी क्रिया को बार-बार दोहराते हैं तो वह क्रिया न केवल हमारे लिए अत्यंत सरल हो जाती है बल्कि इससे हमारी कार्य करने की क्षमता में भी वृद्धि होने लगती है।
तीसरे यदि कोई कार्य हमें नहीं आता लेकिन उस कार्य में विशेष दक्षता अथवा प्रवीणता हासिल करनी है तो उसे प्रारंभ से ही सीखना शुरू कर दीजिए। काम कितना ही कठिन और बड़ा क्यों न हो निरंतर अभ्यास करते-करते वह सरल व सुगम बन जाता है। अभ्यास के साथ-साथ क्षमता में वृद्धि होने लगेगी और कार्य से प्यार भी होने लगेगा, इसमें संदेह नहीं।

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केशी घाट

केशी घाट- भ्रमर घाट के निकट केशी घाट स्थित है। इस स्थान पर भगवान् श्रीकृष्ण ने केशी दैत्य का वध किया था।

श्रीकेशी दैत्य की मुक्ति

केशीदैत्य प्राचीन काल में श्रीइन्द्र के छत्र धारण करने वाला एक अनुचर था। उसका नाम कुमुद था, इन्द्र द्वारा वृत्रासुर का वध करने से ब्रह्म हत्या पाप में लिखू हुए इस पाप से मुक्त होने के लिये इन्द्र ने एक अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के शुभ अश्व पर आरोहण के लिए कुमुद को इच्छा हुई। उसने घोड़े पर जब आरोहण करने की चेष्टा की तब दूसरे अनुचरों ने उसे देख लिया। वे कुमुद को पकड़ कर इन्द्र के पास ले गये। इन्द्र ने समस्त विवरण सुन क्रोध में कुमुद को अभिशाप दिया कि- “रे दुष्ट! तु राक्षस बन जा एवं अश्व रूप धारण करके मृत्युलोक में गमन कर। उसी अभिशाप से कुमुद ब्रज क्षेत्र में आगमन कर मयदानव के पुत्र केशी नाम से जन्म लेकर कंस का अनुचर बना कंस ने श्रीकृष्ण को हत्या के लिए केशी को वृन्दावन भेजा। केशीदैत्य ने विशाल अश्व का रूप धारण कर मथुरा से वृन्दावन को आगमन किया। उस दैत्य ने श्रीकृष्ण को देख पीछे के पैरों द्वारा आघात् करने को कोशिश की। तभी श्रीकृष्ण ने क्रोध से उसके दोनों पैरों को पकड़ घुमाया और ४०० हाथ दूर फेंक दिया। केशीदैत्य दोबारा उठकर क्रोध में मुहें फाड़कर श्रीकृष्ण की तरफ बढ़ने लगा। श्रीकृष्ण ने हँसते हँसते उसके मुँह में अपना बायां हाथ घुसा दिया। श्रीकृष्ण के हाथों के अति तप्त लौह सङ्कुश स्पर्श से (बराबर) केशी के सारे दाँत नष्ट हो गये एवं श्रीकृष्ण का हाथ बढ़ने लगा और अन्त में इससे केशीदैत्य का मुँह विदीर्ण हो उसके प्राण पखेरू उड़ गये। केशी के प्राण भगवान् श्रीकृष्ण में लीन हो गये।

तथाहि आदिवाराह वचन गंगा शत गुणं पुण्यं यत्र केशी निपतितः ।

तत्रापि च विशेषोऽस्त केशी तीर्थ वसुन्धरे ।

तस्मिन् पिण्ड प्रदानेन गया-पिण्ड फलं लभेत् ।।

जहाँ केशी दैत्य ने प्राण त्यागे थे वह स्थान गंगा से भी शतगुण श्रेष्ठ है। उस स्थान पर पिण्ड दान करने से गया पिण्ड दान करने का फल प्राप्त होता है। इस घाट के निकट प्राणगौर नित्यानन्द मन्दिर, श्रीमुरारीमोहन कुञ्ज, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी की दन्त समाधि मन्दिर इत्यादि दर्शनीय है।

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अपने पुत्र को विष देने वाली दो भक्तिमती नारियाँ

१. पहली कथा : एक राजा बड़ा भक्त था । उसके यहाँ बहुत से साधु-सन्त आते रहते थे । राजा उनकी प्रेम से सेवा करता था । एक बार एक महान संत अपने साथियों समेत पधारे । राजा का सत्संग के कारण संतो से बडा प्रेम हो गया । वे सन्त राजा के यहाँ से नित्य ही चलने के लिये तैयार होते, परंतु राजा एक-न-एक बात ( उत्सव आदि) कहकर प्रार्थना करके उन्हे रोक लेता और कहता क्रि प्रभो ! आज रुक जाइये, कल चले जाइयेगा । इस प्रकार उनको एक वर्ष और कुछ मास बीत गये । एक दिन उन सन्तो ने निश्चय कर लिया कि अब यहां रुके हुए बहुत समय बीत गया ,कल हम अवश्य ही चले जायेंगे । राजाके रोकनेपर किसी भी प्रकर से नही रुकेंगे । यह जानकर राजा की आशा टूट गयी, वह इस प्रकार व्याकुल हुआ कि उसका शरीर छूटने लगा । रानी ने राजा से पूछकर सब जान लिया कि राजा सन्त वियोग से जीवित न रहेगा । तब उसने संतो को रोकने के लिये एक विचित्र उपाय किया । रानी ने अपने ही पुत्र को विष दे दिया; क्योकि सन्त तो स्वतन्त्र है, इन्हे कैसे रोककर रखा जाय ?

इसका और कोई उपाय नही है ,यही एक उपाय है । प्रात: काल होने से पहले ही रानी रो उठी, अन्य दासियाँ भी रोने लगी, राजपुत्र के मरने की बात फैल गयी । राजमहल मे कोलाहल मच गया । संत तो दया के सागर है, दुसरो के दुख से द्रवित हो जाते है । सन्तो ने सुना तो शीघ्र ही राजभवन मे प्रवेश किया और जाकर बालक को देखा । उसका शरीर विष के प्रभाव से नीला पड़ गया था, जो इस बातका साक्षी था कि बालक को विष दिया गया है । महात्माजी सिद्ध थे , उन्होने रानी से पूछा कि सत्य कहो, तुमने यह क्या किया ? रानी ने कहा – आप निश्चय ही चले जाना चाहते थे और हमारे नेत्रों को आपके दर्शनों की अभिलाषा है । आपको रोकने के लिये ही यह उपाय किया गया है ।

राजा और रानीकी संतो के चरणों मे ऐसी अद्भुत भक्ति को देखकर वे महात्मा जोरसे रोने लगे । संतो में राजा रानी की ऐसी प्रीति है कि केवल संतो को रोकने के लिए अपने पुत्र को ही विष दे दिया । संत जी का कण्ठ गद्गद हो गया, उन्हें भक्ति की इस विलक्षण रीति से भारी सुख हुआ । इसके बाद महात्माजी ने भगवान के गुणों का वर्णन किया और हरिनाम के प्रताप से सहज ही बालक को जीवित कर दिया । उन्हे वह स्थान अत्यन्त प्रिय लगा । अपने साथियों को- जो जाना चाहते थे, उन्हें विदा कर दिया और जो प्रेमरस मे मग्न संतजन थे, वे उनके साथ ही रह गये । इस घटना के बाद महात्माजी ने राजा से कहा कि अब यदि हमे आप मारकर भी भगायेंगे तो भी हम यहांसे न जायंगे ।


२. दूसरी कथा : महाराष्ट्र के राजा महीपतिराव जी परम भक्त थे । उनकी कन्या कन्हाड़ के राजा रामराय के साथ ब्याही थी, लेकिन घरके सभी लोग महा अभक्त थे । भक्तिमय वातावरण मे पलने वाली उस राजपुत्री का मन घबडाने लगा । अन्त मे जब उसे कोई उपाय नही सूझा तो उसने अपनी एक दासी से कह दिया कि इस नगर मे जब कभी भगवान के प्यारे संत आये तो मुझे बताना ।

एक दिन दैवयोग से उस नगर मे संतो की ( संत श्री ज्ञानदेवजी की) जमात आयी । उनके आनेका समाचार दासी ने उस राजपुत्री को दिया । अब उस भक्ता से सन्त अदर्शन कैसे सहन होता । उसने अपने पुत्र को विष दे दिया । वह मर गया, अब वह राजकन्या तथा दूसरे घरके लोग रोने तथा विलाप करने लगे । तब उस भक्ता ने व्याकुल होकर उन लोगों से कहा कि अब इसके जीवित होने का एक ही उपाय है, यदि वह किया जाय तो पुत्र अवश्य जीवित हो सकता है । वह चाहती थी कि किसी तरह संत जान यहां पधारे और इन अभक्त लोगो को संतो का महात्म्या पता लगे । रोते-रोते परिवार के सब लोगो ने कहा – जो भी उपाय बताओगी, उसे हम करेंगे । तब उस बाई ने कहा कि संतो को बुला लाइये ।

उन अभक्त लोगों ने पूछा कि सन्त कैसे होते है ? इसपर भक्ता ने कहा कि यह मेरे पिता के घर जो दासी साथ आई है , यह मेरे पिता के घर मे सन्तो को देख चुकी है । यह सब जानती हैंकि संत कैसे होते है, कहाँ मिलेंगे आदि सब बातों को यह बताएगी । पूछनेपर दासी ने कहा कि आज इस नगर मे कुछ सन्त पधारे है और अमुक स्थानपर ठहरे है । वह दासी राजा को साथ लेकर चली और सन्तो से बोलना सिखा दिया । दासी ने राजा से कहा कि संतो को देखते ही पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करते हुए उनके चरणों को पकड लीजियेगा । राजा ने दासी के कथनानुसार ही कार्य

किया । शोकवश राजा की आँखो से आँसुओं की धारा बह रही थी, परंतु उस समय ऐसा लगा कि मानो ये सन्त प्रेमवश रो रहे है । सहज विश्वासी और कोमल हृदय उन सन्तो ने भी विश्वास किया कि ये लोग प्रेम से रुदन कर रहे है । राजाने प्रार्थना की कि प्रभो ! मेरे घर पधारकर उसे पवित्र कीजिये । राजा की विनती स्वीकारकर सन्तजन प्रसन्नतापूर्वक उसके साथ चले । दासी ने आगे ही आकर भक्ता रानी को साधुओं के शुभागमन की सूचना दे दी । वह रानी पौरी मे आकर खडी हो गयी । संतो को देखते ही वह उनके चरणों मे गिर पडी और प्रेमवश गद्गद हो गयी । आँखों मे आँसू भरकर धीरे से बोली – आप लोग मेरे पिता-माता को जानते ही होंगे, क्योंकि वे बड़े सन्तसेवी है । आपलोगों का दर्शन पाकर आज ऐसा मन मे आता है कि अपने प्राणों को आपके श्रीचरणों मे न्यौछावर कर दूँ । संतो ने पहचान लिया कि यह भक्त राजा महिपतिराव जी की पुत्री है।

उस भक्ता रानी की अति विशेष प्रीति देखकर सन्तजन अति प्रसन्न हो गये और बोले कि तुमने जो प्रतिज्ञा क्री है, वह पूरी होगी । राजमहल मे जाकर सन्तो ने मरे हुए बालक को देखकर जान लिया कि इसे निश्चय ही विष दिया गया है । उन्होंने भगवान का चरणामृत उसके मुख मे डाला । वह बालक तुरंत जीवित हो गया । इस विलक्षण चमत्कार को देखते ही राजा एवं उसके परिवार के सभी लोग जो भक्ति से विमुख थे, सभी ने सन्तो के चरण पकड़ लिये और प्रार्थना की कि हमलोग आपकी शरण मे है । संतो का सामर्थ्य क्या है यह उन सब को पता लग गया । बार बार चरणों मे गिरकर प्रार्थना की तब सन्तो ने उन सभी को दीक्षा देकर शिष्य बनाया । जो लोग पहले यह तक नही जानते थे कि संत कैसे होते है- कैसे दिखते है ,उन लोगों ने वैष्णव बनकर सन्तो की ऐसे विलक्षण सेवा करना आरम्भ कर दिया, जिसे देखकर लोग प्रेमविभोर हो जाते थे।

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श्री निवासाचार्य जी-वृन्दावन


(कालावधि-1518-1603)

श्रीनिवासाचार्य जी, गौरांग महाप्रभु के प्रेम की मूर्ति थे। बंगदेश के चाकन्दी ग्राम में इनका जन्म हुआ। अल्प आयु में ही इन्होंने ग्रंथों को कंठस्थ कर लिया। इनका पांडित्य सबके हृदय को आकर्षित कर लेता। श्री गोपाल भट्ट जी सदगुरुदेव हुए और जीव गोस्वामी जी ने इन्हें भक्ति शास्त्रों का अध्ययन कराया। गुरु आज्ञा से बंगाल क्षेत्र में प्रचुर गौड़ीय भक्ति का प्रचार किया। एक बार मानसी सेवा में होली लीला का आस्वादन कर रहे थे और ध्यान टूटने पर देखा कि सारे वस्त्र रंगे हुए हैं।

बंगदेश गंगातटवर्ती चाकंदी ग्रामवासी श्री गंगाधर भट्टाचार्य जी का चैतन्य महाप्रभु जी के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था। महाप्रभुजी के सन्यास ग्रहण के समय चैतन्य-चैतन्य पुकारते हुए विक्षप्त दशा को प्राप्त हो गए। तब से लोग इन्हें चैतन्य दास पुकारने लगे। पूर्णस्वस्थ होने पर एक दिन श्रीजगन्नाथ पुरी की ओर पत्नी के साथ प्रस्थान किया। पूरी पहुँचकर महाप्रभु जी का दर्शन किया। रात्रि में जगन्नाथ भगवान ने स्वपन दिया – तुम घर चले जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे एक सर्वांग सुंदर पुत्र होगा। जो प्रेम और पांडित्य से तुम्हारे कुल को धन्य करेगा। प्रातकाल महाप्रभु जी को प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त करके वापस ग्राम आ गए। कुछ समय पश्चात अचल जगन्नाथ और सचल जगन्नाथ की कृपया से सन 1518 को वैशाखी पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी प्रिया देवी के गर्भ से परम् रूपवान पुत्र का जन्म हुआ। इसी पुत्र का नाम हुआ श्रीनिवास। गौर नाम श्रवण करके अति प्रसन्न हो जाते थे। अपने मधुर स्वर से गौर-गौर का उच्चारण कर नृत्य करने लगते।
जब यह 5 वर्ष के हुए तो पिता जी ने चांकन्दी के महामहोपाध्याय धनंजय वाचस्पति को पढ़ाने लिखाने का भार सौपा। गुरमुख से जो श्रवण कर लेते तुरंत कंठ हो जाता। मेघा शक्ति के अति धनी थे। कुछ ही समय में व्याकरण, दर्शन आदि संपूर्ण शास्त्रों में निष्णात हो गए। संपूर्ण वैष्णव समाज में उनके पांडित्य की चर्चा होने लगी।
एक दिन पूरी में महाप्रभु जी ने कीर्तन करते हुए अचानक श्रीनिवास- श्रीनिवास उच्चारण किया। भक्तों ने कारण पूछा तो महाप्रभु जी बोले मेरे विशुद्ध प्रेम की मूर्ति श्री निवास का चाकंदी ग्राम में आविर्भाव होगा। इसलिए सभी गौर प्रेमी अब श्रीनिवास जी के पास आने जाने लगे।
कर्णानद के अनुसार वृंदावन के गोविंद देव ने गोस्वामी गणों से कहा था। मेरी शक्ति से मेरे प्रेम का ही श्रीनिवास के रूप में अविर्भाव हुआ है।

मोर शक्ति ते जन्म इहार करिला प्रकाश।
प्रेम रुपे जन्म हैल नाम श्रीनिवास॥

एक दिन अकस्मात पिताजी का निकुंज वास हो गया। ह्रदय में अत्यंत वेदना हुई क्योंकि गौर- लीला रसस्वादन के साथी थे। माँ विलाप कर रही थी। श्रीनिवास जी ने अब पुरी में महाप्रभु के दर्शन के लिए जाने का विचार किया। मां से आज्ञा ली, इच्छा ना होते हुए भी माँ ने आज्ञा प्रदान की। गौर प्रेम में अश्रु प्रवाहित करते हुए, बाह्य ज्ञान शून्य नीलाचल के पथ पर चले जा रहे हैं। मार्ग में अचानक किसी ने महाप्रभु जी के अंतर्ध्यान का समाचार सुनाया तो मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
महा प्रभु जी की कृपा हुई स्वपन में बोले – तुम नीलाचल चले जाओ। गदाधर आदि परिक्रमा वहाँ है। मुझे तुम्हारे द्वारा बहुत कार्य कराने हैं। श्रीनिवास जी प्रातः जी उठकर नीलाचल की ओर चल पड़े। कई दिनों के पश्चात पूरी पहुँचे। जगन्नाथ जी का दर्शन किया। जगन्नाथ जी की छद्ध रूप से प्रसाद का थाल दे गये, प्रसाद पाकर प्रभु की कृपा का अनुभव किया। फिर श्री गदाधर जी से मुलाकात की। श्री गदाधर जी ने इन्हें राय रामानंद जी और सार्वभौम जी के पास दर्शन कराने ले गए। गौर – विरह में निमग्न दोनों ने धैर्य धारण करके महाप्रभु जी की कुछ चर्चा की। इस प्रकार गौर- प्रेमियों के दर्शन एवं गौर -चर्चा मैं दिन बीतने लगा।
एक दिन गदाधर जी से भागवत पढ़ाने की प्रार्थना की तो गदाधर बोले – मेरी इच्छा बहुत थी तुम्हें भागवत पढ़ाने की लेकिन महाप्रभु जी के अश्रु जल से भागवत के कुछ अक्षर मिट गए हैं। इसलिए तुम वृंदावन जाकर जीव से भागवत अध्यन करो। कई दिनों की यात्रा के पश्चात भूखे-प्यासे श्रीनिवास जी मथुरा पहुंचे। यहां सूचना प्राप्त हुई के रूप, सनातन और रघुनाथ भट्ट जी का निकुंज प्रवेश हो गया। अत्यंत दुखी हुए और अर्ध वाह्य दशा में वृंदावन के गोविंद देव जी मंदिर में आकर गिर पड़े। जीव गोस्वामी जी दर्शन को पधारे तो देखा कि मंदिर में भीड़ है। वहाँ जाकर सभी को हटाया। अद्भुत दृश्य सामने था। श्रीनिवास जी के वपु में अष्ट सात्विक भाव, अश्रु, कम्प, पुलक रोमांच आदि प्रकट हो रहे थे। जीव गोस्वामी जी पहचान गए कि यह श्रीनिवास है। उनको उठा कर कुटिया में लाए। दो पहर बीतने पर वाह्य ज्ञान हुआ। जीव जी को प्रणाम किया। गोविंद देव जी का प्रसाद पवाया बगल वाली कुटिया में विश्राम करने को कहा।
दूसरे दिन जीव गोस्वामी जी गोपाल भट्ट जी के पास ले गए। और उनके द्वारा श्रीनिवास जी को दीक्षा दिलवा दी। श्रीनिवास ने गुरु सेवा को सर्वस मानकर अंग -सेवा का भार अपने ऊपर ले लिया। शीघ्र ही कविराज आदि संतो के दर्शन करा लाए। अब वृंदावन में गुरु सेवा करते हुए श्री निवास जी जप, ध्यान, कीर्तन आदि दैनिक कृत्य करने लगे और जीव गोस्वामी जी के पास शास्त्र अध्ययन आरंभ किया। लीला स्मरण में श्रीनिवास का असाधारण अभिनिवेश देख श्री गोपाल भट्ट जी बहुत प्रसन्न हुए। एक दिन लीला ध्यान में श्रीनिवास जी सुगंधित तेल, माला, चंदनादि से महाप्रभु जी की सेवा करके उनके पास खड़े होकर चँवर डुला रहे थे। उसी समय महाप्रभु जी के इशारे करने से दूसरे सेवक ने महाप्रभु जी के गले से माला उतारकर श्रीनिवास जी को पहना दी। ध्यान भंग होने पर देखा कि वही माला गले में पड़ी थी।
एक दिन बसंत के अवसर पर ब्रज लीला का ध्यान कर रहे थे। वहाँ होली लीला चल रही थी। अचानक किशोरी जी के हाथ का गुलाल शेष हो गया तो उसी समय मंजरी स्वरूप में श्रीनिवास जी ने गुलाल लाकर श्री किशोरी जी को दिया। ध्यान भंग हुआ तो देखा कि सारे वस्त्र होली के रंग से रंगे हुए हैं।
श्रीनिवास जी का ध्यान में तीव्र अनुराग था। थोड़े ही समय में यह श्रीमद्भागवत और भक्ति शास्त्रों में पारंगत हो गए और जीव गोस्वामी के द्वारा आचार्य ठाकुर की उपाधि प्राप्त की। श्री नरोत्तम ठाकुर, श्री श्यामानन्द प्रभु दोनों श्रीनिवास जी के सहपाठी थे। जीव गोस्वामी जी की बहुत इच्छा थी कि जिन भक्ति ग्रंथों की रचना श्री रूप जी, श्री सनातन जी, और स्वयं ने की है उन का प्रचार गौड़ देश में भली-भांति हो। जीव जी ने सभी भक्तों एवं संतों के मत से श्रीनिवास आचार्य जी को भक्ति के प्रचार के लिए भेजने का निश्चय किया। और नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को उनकी सहायता के लिए सारे ग्रंथों को एक बड़े काठ के संदूक में बंद किया और दस शास्त्र धारी रक्षको को साथ करके दो बैल गाड़ी में बिठा कर विदा किया। गौड़ देश की सीमा के भीतर गोपालपुर ग्राम में विश्राम किया। अचानक एक लुटेरों का दिल आया और मारपीट कर बैलगाड़ी सहित ग्रंथों के संदूक को लेकर अदृश्य हो गए। प्रातः काल तीनो ने बहुत खोजा लेकिन कुछ पता ना चला। एक प्रहरी के हाथ ग्रन्थों की चोरी की सूचना जीव गोस्वामी जी को भेजी और नरोत्तम एवं श्यामानन्द जी ने कहा- तुम गौड़ देश जाकर भक्ति का प्रचार करो।
श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों की खोज में पागल की भांति इधर-उधर भटकते रहे। विष्णुपुर राज्य में कृष्ण बल्लभ नाम के एक ब्राह्मण से मुलाकात हुई। वो इन्हें पाठ सुनने के लिए राज्य के राजा वीरहाम्वीर की सभा में ले गया। व्यास चक्रवती नामक एक ब्राहमण राजा को नित्य भागवत सुनाया करते थे। आज रास पंचाध्यायी का पाठ था। और वक्ता महाशय सिद्धांत विरुद्ध व्याख्या कर रहे थे। तब श्रीनिवासाचार्य जी ने प्रतिवाद कर के अद्भुभुत रसपूर्ण व्याख्या की। राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। राजा ने उन्हें कुछ दिन रुकने का आग्रह करके एक निर्जन स्थान में वास दे दिया। श्रीनिवास जी ने विचार किया कि राजा से ग्रन्थ चोरी की बात कहूँ जो शायद ग्रंथ को खोजने में मेरी मदद कर दे। दूसरे दिन कथा के विश्राम के बाद राजा निवासाचार्य जी को अपने कक्ष में ले गया और परिचय पूछा। श्रीनिवास जी ने संपूर्ण बात कह दी। ग्रंथ चोरी की बात सुनकर राजा रोने लगा और बोला- महाराज! डाकुओं का सरदार मैं ही हूँ। मैं राजा होते हुए भी अपने सैनिकों को लूटने के लिए भेजता हूँ। आपके सारे ग्रंथ मेरे पास है। मैं आपका अपराधी हूँ। आप दंड दे या क्षमा करें। ऐसा कहकर फूट- फूट कर रोने लगा। श्री निवास जी ग्रंथ प्राप्ति की बात सुनकर अति प्रसन्न हुए और राजा का हृदय से लगा लिया।
अगले दिन श्रीनिवास जी ने राजा आदि अनेक परिकरो को अपना शिष्य बनाया, और ग्रंथ प्राप्ति का संदेश वृंदावन जीव गोस्वामी जी को और खेतुरी के निकट गोपालपुर नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को भेजा। दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए और आनन्द में नृत्य करने लगे। अब श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों को लेकर अपनी मां के पास याजिग्राम पहुँचे। माँ अपने पुत्र को देखकर आनन्द में डूब गई। याजिग्राम में श्रीनिवास जी ने एक विद्यालय की स्थापना की अध्यापन का कार्य प्रारंभ कर दिया। कुछ समय पश्चात श्रीनिवास जी का श्री गोपाल चक्रवर्ती की सुपुत्री द्रोपदी नाम की कन्या के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात द्रोपदी का नाम ईश्वरी ठकुरानी रखा। एक दिन श्रीनिवास घर के निकट वृक्ष के नीचे सत्संग कर रहे थे। एक युवक विवाह करके अपनी पत्नी को पालकी में विदा करा कर ला रहा था। श्रीनिवास ने उसे देखा और बोल पड़े- देखो! यह नवयुवक रूपवान और तेजस्वी है। लेकिन इसका यौवन प्रभु सेवा में न लगकर कामिनी सेवा में लगेगा। यह वचन उस युवक के कान में पड़ गए। बस तुरंत वह श्रीनिवास जी के चरणों में गिर पड़ा, और हमेशा के लिए दीक्षा लेकर सेवा में ही रह गया। महापुरुषो की दृष्टि पड़ते ही जीव का कल्याण हो जाता है।
श्री नरोत्तम ठाकुर के आग्रह पर श्रीनिवास जी एक महीने खेतुरी ग्राम पधारे। वहाँ बहुत विशाल उत्सव हुआ। दोल पूर्णिमा के दिन छय विग्रहों की धूम धाम से प्रतिष्ठा हुई। खूब संकीर्तन की धूम मची।
श्रीनिवास जी का दूसरा विवाह गोपालपुर ग्राम के राघव चक्रवर्ती की सुपुत्री श्री पद्मावती के साथ शुभ मुहूर्त में हुआ। विवाह के पश्चात पद्मावती जी का नाम हुआ गौरांग प्रिया। श्रीनिवास जी के तीन पुत्र एवं तीन कन्या हुईं।
एक बार श्रीनिवास जी विष्णु पुर ग्राम में लीला स्मरण कर रहे थे। लीला- स्मरण में मणि मंजरी स्वरूप से लीला के गंभीरतम प्रदेश में प्रवेश कर गए। शरीर निश्चल हो गया, श्वास बंद हो गया। दो दिन तक यही स्थिति रही, सभी घबरा गए सभी विचार करने लगे क्या करें ? उसी समय खेतुरी ग्राम से रामचंद्र जी आ गए और बोले — आप घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा। रामचंद्र जी श्रीनिवास जी के पास बैठकर ध्यान मग्न हो गए। करुणा मंजरी स्वरूप से लीला में प्रवेश कर के देखा कि अन्य मंजरियां यमुना जल के भीतर कुछ खोज रही है। पूछा तो पता चला कि किशोरी जी की बेसर खोज रही है। और जलक्रीडा करते समय गिर गई थी। यह भी खोजने लगे तो कमल पत्र के नीचे बेसर मिल गई। तुरंत गुरुदेव को प्रदान की। गुरुदेव ने गुण मंजरी (गोपाल भट्ट), गुण मंजरी ने रूप मंजरी (रूप गोस्वामी) को रुप मंजरी ने श्री जी को प्रदान की। किशोरी जी ने प्रसन्न होकर करुणा मंजरी को अपना चार्बित ताम्बूल देकर पुरस्कृत किया। उसी समय श्रीनिवास जी की समाधि टूट गई। रामचंद्र जी के हाथ में प्रसादी तांबूल देखकर सभी आश्चर्यचकित हुए। सबको कणिका प्रसाद प्राप्त हुआ। जीव का यही वास्तविक स्वरुप है। रामचंद्र जी खेतुरी में नरोत्तम दास जी के पास थे। एक दिन श्रीनिवास जी ने पत्र द्वारा रामचंद्र जी को शीघ्र याजि ग्राम आने का संदेश भेजा। पत्र पाते ही रामचंद्र जी गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर नरोत्तम ठाकुर से आज्ञा मांगी। दोनों हृदय से मिले क्योंकि अब यह अंतिम मिलन था। नरोत्तम ठाकुर बोले- मैं उस घड़ी की प्रतीक्षा करूँगा, जिस में हमारा मिलन पुनः होगा। रामचंद्र जी वहाँ से चल कर याजि ग्राम श्रीनिवास जी के पास आ गए। आकर गुरुदेव चरणों में प्रणाम किया। दो दिन बाद दोनों गुरु शिष्य श्री वृंदावन धाम प्रस्थान किया।
श्री वृंदावन धाम आने के पश्चात श्रीनिवास जी वापिस कहीं नहीं गए। श्रीराम चंद्रजी निरंतर गुरु सेवा में निरत रहते। सन 1603 कार्तिक शुक्ल अष्टमी को श्रीनिवास जी अपने निज स्वरूप मणि मंजरी रूप में श्यामा-श्याम के नृत्य लीला में प्रवेश कर गए। सन 1612 कार्तिक कृष्ण अष्टमी को रामचंद्रजी ने गुरुदेव के पथ का अनुसरण किया। श्री धाम वृंदावन में गोपेश्वर महादेव के निकट श्रीनिवास जी एवं श्री रामचंद्र जी दोनों की समाधि विराजमान हैं। श्री धाम वृंदावन वास करने का यही फल है कि इसी रज में रज होकर मिल जाए।

तजिकै वृंदाविपिन कौ, अन्य तीरथ जे जात।
छाडि विमल चिंतामणि, कौड़ी को ललचात्॥
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स्रोत: ‘ब्रज भक्तमाल’

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वृंदावन रस निरंतर कैसे मिलता रहे ?

प्र० महाराज श्री अभी मैं करीब १० वर्ष से वृन्दावन वास कर रहा हैं लेकिन अब वह आनंद प्राप्त नहीं होता है जो प्रारम्भ में वृन्दावन को देखकर एक नवीन उत्साह और आनंद की अनुभूति होती थी, इसका क्या कारण है ?

समाधान : वह आनंद कम नहीं हुआ है, जैसे कोई नया व्यक्ति भांग खाए तो उस पर ज्यादा रंग चढ़ता है और जब दो-चार महीने बराबर खाता रहे तो फिर उतने डोज (खुराक) से काम नहीं चलता, भांग का डोज बढ़ाना पड़ता है तब रंग चढ़ता है, अब थोड़ी खुराक से काम नहीं चलेगा । ऐसे ही जब कोई संसार का त्रितापदग्ध थका हुआ जीव नया-नया वृन्दावन आता है तो परम रसमय वृन्दावन के संयोग से उसके मन को परम आनंद की अनुभूति होती है। अब जैसे-जैसे हम यहाँ रहने लगे तो अब हमारी यहाँ खुराक बढ़ गयी । अब जब हमारा वृन्दावन के प्रति चिन्दानंदमय भाव बढ़े तब हमें आनंद की अनुभूति होगी । ये न

समझा जाए कि हमारा भाव कम हो गया है, पर अब हमें उतने में तसल्ली होने वाली नहीं है; अब और खुराक बढ़ायी जाए ‘नाम-जप, वाणी-पाठ, सत्संग आदि’ ।

वृन्दावन धाम के वास से आपके हृदय में आनंद को हजम करने की ताकत बढ़ गयी अब थोड़े आनंद से काम नहीं चलेगा और आनंद चाहिए। जैसे नया साधक थोड़े में ही आनन्दित जाता है, पर जब वह भजन करता है तो उसके हृदय में जलन है क्योंकि अब उसका काम उतने आनंद में नहीं चलेगा, अब और आनंद की अनुभूति हो साधक की उत्तरोत्तर हजम करने की ताकत बढ़ती चली जाती है । जब साधक सत्संग के द्वारा ये बात नहीं समझता है तो उसको लगता है कि हमारा भजन घट रहा है, हमारा आनंद कम हो रहा है और वह विकल होकर अपने मार्ग से इधर उधर भटकने लगता है, इसलिए भटकने की जरूरत नहीं है ।

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श्री राधा रानी के नाम की महिमा

राधे राधे

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श्री राधा रानी के नाम की महिमा अनंत है। श्री राधा नाम को कोई मन्त्र नही है ये स्वयं में ही महा मन्त्र है। श्री राधारानी के नाम का इतना प्रभाव की सभी देवता और यहाँ तक की भगवान भी राधा जी को भी भजते है, जपते है। आपने कभी किसी भगवान को किसी महाशक्ति के पैर दबाते हुए देखता है। पर साक्षात भगवान श्री कृष्ण जी राधा रानी के चरणो में लोट लगते है। आइये किशोरी जी के नाम की महिमा को जानिए।

श्री राधे रानी बरसाने वाली है। सभी कहते है-

राधे, राधे, राधे , बरसाने वारी राधे।
क्योंकि श्री राधारानी साक्षात कृपा करने वाले है। वो गरजने वाली नही है। क्योंकि जो गरजते है वो बरसते नहीं। लेकिन हमारी प्यारी राधारानी बरसाने वारी है। वो बस अपनी कृपा भक्तों पर बरसाती रहती है। ब्रजमंडल की जो अधिष्ठात्री देवी हैं,वो हमारी श्यामा जी श्री राधा रानी हैं! आप जानते हो श्री राधारानी के नाम का जो आश्रय लेते है उसके आगे भगवन विष्णु सुदर्शन चक्र लेके चलते है। और पीछे भगवान शिव जी त्रिशूल लेके चलते है। जिसके दांये स्वयं इंद्र वज्र लेके चलते है और बाएं वरुण देवता छत्र लेके चलते है। ऐसा प्रभाव है हमारी प्यारी श्री राधारानी के नाम का। बस एक बार उनके नाम का आश्रय ले लीजिये। और उन पर सब छोड़ दीजिये। वो जरूर कृपा करेंगी।
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राधा रानी कृपा

राधे राधे जपते रहिये दिन और रात। गुरुदेव एक सीधा सा अर्थ बताते है श्री राधा नाम का- राह-दे । जो आपको रास्ता दिखाए वही वो हमारी श्री राधारानी है।

राधा का प्रेम निष्काम और नि:स्वार्थ है। उनका सब कुछ श्रीकृष्ण को समर्पित है, लेकिन वे बदले में उनसे कोई कामना की पूर्ति नहीं चाहतीं। राधा हमेशा श्रीकृष्ण को आनंद देने के लिए उद्यत रहती हैं। इसी प्रकार मनुष्य जब सर्वस्व-समर्पण की भावना के साथ कृष्ण प्रेम में लीन हो जाता है, तभी वह राधा-भाव ग्रहण कर पाता है। इसलिए कृष्णप्रेमरूपीगिरिराज का शिखर है राधाभाव। तभी तो श्रीकृष्ण का सामीप्य पाने के लिए हर कोई राधारानीका आश्रय लेता है।

महाभावस्वरूपात्वंकृष्णप्रियावरीयसी।
प्रेमभक्तिप्रदेदेवि राधिकेत्वांनमाम्यहम्॥

जब वृन्दावन की महिमा गाई जाती है सबसे पहले यही बात आती है की राधा रानी के पग पग में प्रयाग बसता है।

श्री राधारानी के पग पग पर प्रयाग जहाँ, केशव की केलि-कुञ्ज, कोटि-कोटि काशी है।
यमुना में जगन्नाथ, रेणुका में रामेश्वर, तरु-तरु पे पड़े रहत अयोध्या निवासी हैं।
गोपिन के द्वार पर हरिद्वार बसत जहाँ बद्री, केदारनाथ , फिरत दास-दासी हैं।
तो स्वर्ग, अपवर्ग हमें लेकर करेंगे क्या, जान लो हमें हम वृन्दावन वासी हैं।
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राधा साध्यं, साधनं यस्य राधा |
मन्त्रो राधा, मन्त्रदात्री च राधा |
सर्वं राधा, जीवनं यस्य राधा |
राधा राधा वाचितां यस्य शेषं |

भूमि तत्व जल तत्व अग्नि तत्व पवन तत्व,
ब्रह्म तत्व व्योम तत्व विष्णु तत्व भोरी है।
सनकादिक सिद्ध तत्व आनंद प्रसिद्ध तत्व,
नारद सुरेश तत्व शिव तत्व गोरी है ॥
प्रेमी कहे नाग किन्नरका तत्व देख्यो,
शेष और महेश तत्व नेति-नेति जोरी है ।
तत्वन के तत्व जग जीवन श्रीकृष्ण चन्द्र,
कृष्ण हू को तत्व वृषभानु की किशोरी है।

हे राधे करुणामयी शुललिते हे कृष्ण चिंतामणि
हे श्री रास रसेश्वरी शुविमले वृन्दावनाधिश्वरि |
कान्ते कांति प्रदायनी मधुमयी मोदप्रदे माधवी
भक्तानंद समस्तसाख्य सरिते श्री राधिके पातु मां ||

“राधे तू बड़भागिनी , कौन तपस्या कीन्ह ।
तीन लोक तारन तरन , सो तेरे आधीन ॥ “

ब्रम्हवैवर्तपुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने और श्रीराधा के अभेद का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि श्रीराधा के कृपा कटाक्ष के बिना किसी को मेरे प्रेम की उपलब्धि ही नहीं हो सकती। वास्तव में श्रीराधा कृष्ण एक ही देह हैं। श्रीकृष्ण की प्राप्ति और मोक्ष दोनों श्रीराधाजी की कृपा दृष्टि पर ही निभ्रर हैं।

श्री राधा नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है-“जिस समय मैं किसी के मुख से ’रा’ अक्षर सुन लेता हूँ, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूँ और ’धा’ शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे दौड़(धावति) लगा देता हूँ” ब्रज के रसिक संत श्री किशोरी अली जी ने इस भाव को प्रकट किया है।

आधौ नाम तारिहै राधा।

‘र’ के कहत रोग सब मिटिहैं, ‘ध’ के कहत मिटै सब बाधा॥

राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा।

अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा॥
___________

श्री राधा रानी कौन है |

स्कंद पुराण के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। इसी कारण भक्तजन सीधी-साधी भाषा में उन्हें ‘राधारमण’ कहकर पुकारते हैं।

पद्म पुराण में ‘परमानंद’ रस को ही राधा-कृष्ण का युगल-स्वरूप माना गया है। इनकी आराधना के बिना जीव परमानंद का अनुभव नहीं कर सकता।
यदि श्रीकृष्ण के साथ से राधा को हटा दिया जाए तो श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व माधुर्यहीन हो जाता। राधा के ही कारण श्रीकृष्ण रासेश्वर हैं। भगवान श्री कृष्ण के नाम से पहले हमेशा भगवती राधा का नाम लिया जाता है। कहते हैं कि जो व्यक्ति राधा का नाम नहीं लेता है सिर्फ कृष्ण-कृष्ण रटता रहता है वह उसी प्रकार अपना समय नष्ट करता है जैसे कोई रेत पर बैठकर मछली पकड़ने का प्रयास करता है।

वन्दौं राधा के परम पावन पद अरविन्द।
जिनको मृदु मकरन्द नित चाहत स्याम मिलिन्द।।

श्रीमद् देवीभाग्वत् नामक ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि जो भक्त राधा का नाम लेता है भगवान श्री कृष्ण सिर्फ उसी की पुकार सुनते हैं। इसलिए कृष्ण को पुकारना है तो राधा को पहले बुलाओ। जहां श्री भगवती राधा होंगी वहां कृष्ण खुद ही चले आएंगे।
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भगवान कृष्ण को कौन पसंद है?
पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि राधा उनकी आत्मा है। वह राधा में और राधा उनमें बसती है। कृष्ण को पसंद है कि लोग भले ही उनका नाम नहीं लें लेकिन राधा का नाम जपते रहें।

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रावल ग्राम

भाद्रपदमास की कृष्णपक्ष की अष्टमी ‘श्रीकृष्णजन्माष्टमी’ और भाद्रपदमास की शुक्लपक्ष की अष्टमी ’श्रीराधाष्टमी’ के नाम से जानी जाती है।

कृष्ण के ह्रदय में निवास करने वाली राधारानी बरसाना में पली-बढ़ी थीं,लेकिन उनका जन्‍म यहां से कुछ किमी दूर # रावल गांव में हुआ था जहां आज भी राधा-कृष्ण पेड़ के रूप में मौजूद हैं।
श्रीराधा का ननिहाल रावलग्राम में था। रक्षाबंधन के पर्व पर श्रीराधा की गर्भवती मां कीर्तिरानी अपने भाई को राखी बांधने आईं। राधाष्टमी के एक दिन पहले बरसाने के राजा वृषभानुजी अपनी पत्नी को लिवाने आए। प्रात: यमुनास्नान करते समय भगवान की लीला से कीर्तिरानी के गर्भ का तेज निकलकर यमुना किनारे बढ़ने लगा और यमुनाजी के जल में नवविकसित कमल के केसर के मध्य एक परम सुन्दरी बालिका में परिणत हो गया।

वही पर आज रावल मंदिर का गर्भ गृह है पूरे ब्रज मंडल में ये एक ही मंदिर है जहां घुटुरूनी चलत बाल्य राधारानी के दर्शन मिलते है

हर साल श्री राधाष्टमी यहां बहुत बड़े पैमाने पर मनाया जाता है

रावल गांव में स्थापित राधारानी के मंदिर के ठीक सामने एक प्राचीन बगीचा है यहां पर एक साथ दो पेड़ उसी मुद्रा में हैं जैसे राधा कृष्ण साथ खड़े होते हैं एक पेड़ श्‍वेत है तो दूसरा श्‍याम रंग का। राधा और कृष्‍ण पेड़ स्‍वरूप में आज भी यहां से यमुना जी को निहारते हैं।

वृषभानुजी उस बालिका को अपने साथ ले आए और अपनी पत्नी को लेकर बरसाना आ गए।

बरसाने में खबर फैल गई कि कीर्तिदा ने एक सुन्दर बालिका को जन्म दिया है। वृषभानुभवन में वेदपाठ आरम्भ हो गया, राजद्वार पर मंगल-कलश सजाए गए। शहनाई, नौबत, भेरी, नगाड़े बजने लगे।
श्रीराधा के जन्म का समाचार सुनकर व्रजवासी, जामा, पीताम्बरी, पटका पहनकर सिरपर दूध, दही और माखन से भरी मटकियाँ लेकर गाते-बजाते वृषभानुभवन पहुँच गए और राजा वृषभानु को बधाइयाँ देने लगे। तान भर-भर कर सोहिले गायी जाने लगीं। राजा वृषभानु के ऊंचे पर्वत पर बने महल के जगमोहन में श्रीराधा के पालने के दर्शन हो रहे थे। आँगन में बैठे गोप और बारहद्वारी में बैठी महिलाएँ सुरीले गीत गा रहीं थीं।
राजा वृषभानु ने श्रीराधा के झूलने के लिए चंदन की लकड़ी का पालना बनवाया जिसमें सोने-चांदी के पत्र और जवाहरात लगे थे। पालने में श्रीजी के झूलने के स्थान को नीलमणि से बने मोरों की बेलों से सजाया गया था।
नवजात बालिका श्रीराधा का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ अत: मूलशान्ति के लिए दिव्य औषधियों, वन की औषधियों, सर्वोषधि आदि से स्नान कराकर गाय के दूध, दही, घी, इत्र व सुगन्धित जल से अभिषेक किया गया और फिर सुन्दर श्रृंगार धारण कराकर दुग्धपान कराया गया।
गोपियाँ दही बरसा रही हैं और गोप दही-दूध-घी, नवनीत, हरिद्राचूर्ण, केसर तथा इत्र-फुलेल का घोल (दधिकांदा) बनाकर व्रजवासियों के ऊपर उड़ेल रहे हैं। प्रेममग्न व्रजवासियों के हृदय में जो राधारस भरा था वह मूर्तिमान होकर सबके मुख से निकल रहा है–

राधा रानी ने जन्म लियौ है।
सब सुखदानी ने जनम लियौ है॥
भानु दुलारी ने जनम लियौ है।
कीर्ति कुमारी ने जनम लियौ है॥
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श्रीलाला बाबू (वृन्दावन/गोवर्धन)

कलकत्ता शहर है और शीतकाल की सन्ध्या की बेला। अस्ताचलगामी सूर्य अपनी मधुर किरणें बिखेर रहा है। पवन मन्द;मन्द बह रहा है। लालाबाबू पालकी पर निकले हैं सैर करने। पालकी के आगे हैं बन्दूकची और पोछे सिपाहियों और नौकरों की टोली। गंगा-तटपर पहुँचकर पालकी उतारी गयी, लता-पताओं के बीच एक सुरम्य और सुरभित स्थान में।
हुक्काबरदार ने झट चिलम भरकर लालाबाबू के सामने फरसी पर रख दी। कीनखाबमण्डित नरम तकिये का सहारा लेते हुए उन्होंने फरसी की नली मुँह में दबा ली। छल-छल करती बहती सुरधुनी के मधुर स्वर में हुक्के की गुड़-गुड़ बीच-बीच में सुर मिलाने लगी।
मुख से निकला सुगन्धित अम्बरी तम्बाकू का धुआँ कुण्डली बाँधकर आकाश में उड़ने लगा। लालाबाबू का मन एक अनिर्वचनीय आनन्द के झूले में झूलता हुआ धीमे-धीमे पेंग भरने लगा। उसी समय उनके हृदय में लगी एक चिनगारी ने विस्फोट किया और आनन्द का उत्सविषाद में विलीन हो गया।
पासकी एक झोपड़ी में दिन के परिश्रम से क्लांत, सोते हुए धीमर को जगाते हुए उसकी कन्या कह रही थी–‘बाबा, उठो ! दिन शेष ह्य गयौ–बाबा, उठो ! दिन डूब चला।
धीमर-कन्या का आह्वान तिर्यक् गति से जाकर भेद गया लालाबाबू के मर्मस्थल को। ‘बाबा, उठो दिन शेष हय गयौ’ यह शब्द बार-बार उनके हृदयाकाश में गूँजने लगे।
उनकी मोह-निद्रा भंग हुई। फरसी की नली मुँह से छूट गयी। महा ऐश्वर्यशाली, महाविलासी लालाबाबू अब वह लालाबाबू न रहे। सब कुछ त्यागकर कंगालवेश में वृन्दावन जाने के लिए कृतसंकल्प हो वे चल दिये घर की ओर।
किसी तरह रात व्यतीत की। दूसरे दिन कहा घरके लोगोंसे–‘मेरे जीवन की सन्ध्या आ गयी है। दिन डूबने को है। राधारानी की पुकार सुन पड़ी है। मैं जा रहा हूँ वृन्दावन।’ पत्नी, पुत्र, परिजनों के अनुरोध और कातर क्रन्दन की उपेक्षा कर वे चल दिये वृन्दावन की ओर।
लालाबाबू का असली नाम था श्रीकृष्णचन्द्र सिंह। आनुमानिक सन् १७७५ में उनका जन्म हुआ। उनके दादा गंगागोविन्द सिंह थे अंग्रेज गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवान थे।
उन्होंने अपनी असाधारण योग्यता से अपने वंश के लिए अर्जित की थी विशाल जमींदारी और अपरिमेय धनराशि। उनके भाई राधागोविन्द भी बहुत बड़ी धन-सम्पत्ति के मालिक थे। कृष्णचन्द्र सिंह के पिता प्राणकृष्ण थे। दोनों भाइयों की सम्पत्ति के एकमात्र उत्तराधिकारी और उस समय के पूर्व भारत के सबसे बड़े धनी-मानी व्यक्ति।
कृष्णचन्द्र उनके इकलौते बेटे थे। दादा गंगागोविन्दसिंह उन्हें प्यार से ‛लाला’ पुकारा करते थे। नौकर-चाकर और अन्य सभी लोग उन्हें आदर पूर्वक ‛लाला बाबू’ कहते थे। इसलिए वे इसी नाम से समस्त भारत में विख्यात हुए।
लाला बाबू की मेधा तो असामान्य थी ही, उनके पिता ने बड़े-से-बसे विद्वानों को उन्हें अँग्रेजी, फारसी और संस्कृत पढ़ाने को नियोजित किया। फलस्वरूप अल्प समय में ही उन्होंने इन भाषाओं में व्युत्पत्ति हासिल कर ली। श्रीमद्भागवत से उन्हें बहुत प्रेम था। उनमें इतनी दक्षता थी कि वे उसके किसी श्लोक की सुन्दर और रसमयी व्याख्या कर लोगों को चमत्कृत कर सकते थे।
उनका हृदय इतना कोमल था कि वे किसी का दुःख नहीं देख सकते थे। एक गरीब आदमी अर्थाभाव के कारण अपनी कन्या का विवाह नहीं कर पा रहा था। दुःखी होकर उसने उनसे प्रार्थना की। उन्होंने खजानची को आदेश दिया १०००) उसे तुरन्त दे देने का। खजानची ने प्राणकृष्ण सिंह से पूछा, तो उन्होंने कहा–‘अब लाला ने उस व्यक्ति को वचन दे ही दिया, तो इस बार तो उसे १०००) दे दो। पर लाला से कह दो कि इस प्रकार दान तभी करे जब स्वयं कुछ कमायी करने लगे या जमींदारी की आय बढ़ा ले।’
लाला बाबू को पिता की यह बात शूल की तरह चुभ गयी–‘कोटिपति गंगागोविन्द सिंह का पौत्र होते हुए मुझे इतना भी अधिकार नहीं कि मैं किसी गरीब की सामान्य सेवा कर सकूँ। तो ठीक है, अब अपने पैरों पर खड़ा होकर ही कुछ करूँगा।’
वे अपने संकल्प पर दृढ़ रहे। कुछ ही दिनों में माता-पिता के रोने-धोने की उपेक्षा कर वर्धमान चले गये। फारसी और अँग्रेजी भाषाओं का अच्छा ज्ञान उन्हें था ही। वर्धमान कलेक्टरी के सेरेस्तादार पद पर उनकी नियुक्ति हो गयी। कार्य में असाधारण दक्षता प्रदर्शन करने के कारण पदोन्नति भी जल्दी-जल्दी होने लगी। इसी समय उन्होंने विवाह किया। एक पुत्र रत्न भी उत्पन्न हुआ।
सन् १८०३ में उड़ीसा प्रदेश अँग्रेजी सरकार के अधिकार में आ गया। तब उनकी नियुक्ति उड़ीसा के सर्वोच्च दीवान के पदपर हो गयी। श्रीचैतन्य महाप्रभु की लीला-स्थली श्रीधाम पुरी में रहने का अवसर मिला। भक्तिलता बीज, जो जन्म से ही उनमें रोपित था, अंकुरित हो उठा और क्रमश: पल्लवित और पुष्पित होने लगा। राज-काज को छोड़ उनका बाकी समय भक्ति-शास्त्राध्ययन, नाम-जप और कीर्तनादि में बीतने लगा।
कुछ दिन बाद घर से संवाद आया पिता श्रीप्राणसिंह के परलोक-गमन का। घर छोड़ने के पश्चात् लालाबाबू ने घर लौटकर जाने का पिता का आग्रह कई बार ठुकरा दिया था। वे अपने इकलौते बेटे को एक बार फिर से देख लेने की अपूर्ण साध लिये ही परलोक सिधार गये थे। इसलिए लालाबाबू के हृदय में यह संवाद शूल-सा चुभकर रह गया। नेत्रों से बह पड़ी अविरल अश्रुधारा। हृदय में धधक उठी अनुताप की प्रबल ज्वाला।
कलकत्ते जाकर उन्होंने पिता का पारलौकिक कार्य विधि पूर्वक सम्पन किया। पिता की जमींदारी और धन-सम्पत्ति की देखभाल का भार अब उनके ऊपर आ पड़ा। इसलिए वे उड़ीसा की दीवानी का काम छोड़कर स्थायी रूप से कलकत्ते रहने लगे।
पर उनके जीवन में होने लगा एक अन्तर्द्वन्द। बार-बार मन में उठता एक प्रश्न–यह धन, ऐश्वर्य, मान-सम्मान सब किसलिए ? यह क्या चिरस्थायी हैं ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं इन्हें त्यागकर उस पथ का सन्धान किया जाय, जिससे चिर शान्ति मिल सकती है ?
पर संसार के प्रति उनके दायित्व और कर्तव्य की भावना हर बार इस प्रश्न को दबा देती। उसी समय उन्हें प्राप्त हुआ उस धीमर कन्या के माध्यम से राधारानी का दिव्य आह्वान।
वृन्दावन जाकर उन्होंने अपनाया त्याग, तितीक्षा और कठोर व्रतमय साधन जीवन। सारा दिन भजन करते। सन्ध्या समय एक बार मधुकरी को जाते। जो मिल जाता उसी से उदरपूर्ति करते।
वृन्दावन में भग्न मन्दिरों और विग्रहों की सेवा-पूजा की दुर्दशा देख उनके प्राण रो दिये। कितना अच्छा होता यदि इनकी दशा सुधारने के लिए वे कुछ कर सकते। पर वे ठहरे कंगाल। उनकी लाचारी उन्हें कचोटने लगी। फिर खेल उठी मन में एक नयी तरंग- कंगाल मैं हूँ। प्रभु तो कंगाल नहीं।
उनकी विपुल सम्पत्ति में छोड़कर आया हूँ। उसमें से पत्नी और पुत्र का हिस्सा निकालकर अपना हिस्सा प्रभु की सेवा में लगाऊँ और स्वयं भिक्षा-वृत्ति से जीवन निर्वाह करूँ, तो भजन की दृष्टि से क्या कोई हानि होगी ? देव-देवालयों की सेवा होगी, वृन्दावन के धार्मिक अनुष्ठानों का उज्जीवन होगा।’
उन्होंने तदनुरूप कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। थोड़े ही समय में उनकी बंगाल और उड़ीसा की जमींदारी से पचीस लाख रुपये की धनराशि आ गयी। उनके कर्मचारियों ने वृन्दावन में बहुत-सी जमीन-जायदाद खरीदना प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे व्रजमण्डल के चौहत्तर परगने उन्होंने क्रय कर डालें। इनकी आय से भग्न मन्दिरों की मरम्मत, नये मन्दिर और धर्मशालाओं का निर्माण और जगह-जगह देव सेवा की सुव्यवस्था करने की एक विराट योजना बनायी गयी।
इस योजना में वृन्दावन में एक ऐसा सुरम्य मन्दिर बनवाने की परिकल्पना भी सम्मिलित थी, जिसमें राधा-कृष्ण के अति सुन्दर विग्रहों की स्थापना हो और शत-शत साधु-महात्माओं और गरीब दुःखियों के नित्य महाप्रसाद ग्रहण करने की सुव्यवस्था हो।
मन्दिरका निर्माण-कार्य प्रारम्भ हुआ। जयपुर अञ्चल से कीमती पत्थर क्रय करने के लिए लालाबाबू का कभी-कभी राजस्थान जाना होता। मार्ग में पड़ता भरतपुर। भरतपुर के महाराजा उनके पुराने बन्धु थे। उनके विशेष आग्रह के कारण उन्हें आते-जाते एक-दो दिन उनके यहाँ ठहर जाना पड़ता।
महाराजा के साथ घनिष्टता होने के कारण उन्हें एक बार बड़ी विपदा में पड़ना पड़ा। उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी की राजस्थान के राजाओं के साथ एक सन्धि की बातचीत चल रही थी, जिसमें भरतपुर के महाराजा की प्रधान भूमिका थी।
किसी कारण उन्होंने सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। सर चार्ल्स मेटकॉफ उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरफ से दिल्ली दरबार के रेजिडेन्ट पद पर नियुक्त थे।
उन्हें उनके कुछ कर्मचारियों ने समझा दिया कि महाराजा हस्ताक्षर करने को प्रस्तुत थे परन्तु लालाबाबू की कुमन्त्रणा के कारण नहीं किये। मेटकॉफ ने क्रुद्ध हो लालाबाबू को बन्दी बनाकर दिल्ली बुलवा मँगाया। विचार की व्यवस्था की जाने लगी।
लालाबाबू की गिरफ्तारी का संवाद सारे व्रजमण्डल में फैल गया। इसका विरोध करने के लिए सहस्रों व्रजवासी दिल्ली की ओर उमड़ पड़े। लालाबाबू की लोकप्रियता और उनके प्रभाव को देख मेटकॉफ बहुत चिंतित हुए। उनके और उनके परिवार के सम्बन्ध में गुप्तरूप से जाँच-पड़ताल करवायी।
पता चला कि उनके पूर्वपुरुष सदा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हितैषी रहे हैं। उसका उपकार भी उन्होंने बहुत किया है। मेटकॉफ की आँखें खुल गयीं और लालाबाबू को मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, उन्हें महाराजा की उपाधि देना चाहा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
धीरे-धीरे वृन्दावन का विशाल मन्दिर बनकर तैयार हो गया। मुरलीधर श्रीकृष्णचन्द्र की नयनाभिराम मूर्ति स्थापित हो गयी। अतिथिशाला में सैकड़ों लोगों के प्रसाद की व्यवस्था भी कर दी गयी। पर लालाबाबू स्वयं कंगाल वैष्णवों की तरह ही जीवनयापन करते हुए भजन करते रहे।
माघ का महीना था। कड़ाके की शीत पड़ रही थी। मन्दिर के एक कोने में खड़े लालाबाबू दर्शन कर रहे थे श्रीकृष्णचन्द्र की भुवनमोहन श्रीमूर्ति का। भावावेश में उनका देह विकम्पित हो रहा था। नेत्रों से बह रही थी प्रेमाश्रुधारा। उनके अन्तर में जाग उठी एक विचित्र अभिलाषा। उन्होंने भोग के थाल में से एक टिकिया मक्खन की उठाकर पुजारी को दी और कहा–‘यह मक्खन श्रीमूर्ति की चाँद पर रखना तो।’
पुजारी सुनकर अवाक् ! वह चुपचाप लालाबाबू के मुख की ओर देखता खड़ा रह गया। लालाबाबू ने फिर कहा–‘हाँ, हाँ, रक्खो तो, देखते क्या हो। मुझे आज श्रीमूर्ति की परीक्षा करनी है। इसकी विधिवत् प्राण-प्रतिष्ठा हुई है, सेवा भी षोडशोपचार से विधिवत् हो रही है। तो देखना है कि इसमें सचमुच प्राण हैं या नहीं। यदि हैं, तो इनके मस्तक के ताप से मक्खन पिघल जाना चाहिये।’
पुजारी क्या करता। उसने आज्ञा का पालन करते हुए मक्खन की टिक्की श्रीमूर्ति की चाँद पर रख दी और पूर्ववत् सेवा-पूजा का कार्य करने लगा। कुछ देर पश्चात् सचमुच मक्खन धीरे-धीरे पिघलकर श्रीमूर्ति के अङ्गपर बहने लगा। ऐसी भयंकर शीत में मक्खन का अपने-आप गल जाना सम्भव नहीं था। निश्चय ही उसका पिघलना इस बात का प्रमाण था कि श्रीविग्रह जीवित है।
श्रीकृष्णचन्द्र के मुखारविन्द से मक्खन बहता देख पुजारी और दर्शकगण जयध्वनि करने लगे। लालाबाबू भावावेशमें मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े।
एक और दिन लालाबाबू के मन में एक और ढंग से श्रीमूर्ति की परीक्षा की बात आयी। उन्होंने सोचा कि यदि श्रीमूर्ति के सिर में ताप है तो नासिका में निःश्वास भी होगा अवश्य। क्यों न इसकी भी परीक्षा की जाय। उन्होंने पुजारी को थोड़ी-सी रुई देकर कहा–‘’इसे थोड़ी देर श्रीमूर्ति की नाक के नीचे लगाकर हाथ से पकड़े रहना। देखना कि श्रीमूर्ति में निःश्वास है या नहीं।’
पुजारी ने हँसते-हँसते रुई श्रीमूर्ति की नाक के नीचे लगा दी। देखा कि रुई में कम्पन होने लगा।
लालाबाबू के आनन्द की सीमा न रही। वे भावाविष्ट हो श्रीमूर्ति के सामने नाट्य-मन्दिर में लोट-पोट होने लगे।
एक दिन स्वप्न में श्रीकृष्णचन्द्र ने लाला बाबू से कहा–‘मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूँ। पर मुझे कुछ और भी भिक्षा चाहिये तुमसे।’
लालाबाबू ने चौंककर कहा–‘भिक्षा ? ऐसे क्यों कहते हो प्रभु ? आज्ञा करो न तुम्हारी और क्या सेवा करनी है मुझे ?’
‛जानते नहीं लालाबाबू ! मैं जन्म का भिखारी हूँ ? घर-घर भिक्षा माँगता डोलता हूँ ? मेरे लिए एक और मन्दिर का निर्माण करना है तुम्हें।’
‛एक और मन्दिर ? मैं तो सर्वस्व दानकर चुका हूँ प्रभु। मेरे पास अब बचा ही क्या है नये मन्दिर के लिए ? घर से अपने हिस्से के जो २५ लाख रुपये मँगाये थे, उसमें से तो अब कुछ भी नहीं बचा है।’
‛मैं जिस मन्दिर की बात कह रहा हूँ उसका निर्माण साधक के पास जो कुछ है उसे सबको दे चुकने के बाद ही होता है। सर्वस्व दानकर चुकने के बाद भक्त अपने हृदय में जो मन्दिर बनाता है, वही मेरे रहने का प्रिय स्थान है। तुम हृदय की वेदी पर मेरे रहने योग्य ऐसे हो एक प्रेम-मन्दिर का निर्माण करो। मैं तुमसे यह भिक्षा लेने के लिए ही आज तुम्हारे द्वार पर खड़ा हूँ।’
‛तो प्रभु ! आप ही कृपाकर बतायें, इस हृदय को किस प्रकार बनाऊँ आपकी अवस्थिति के योग्य ?’
‛तुम ब्रजमण्डल के सब तीर्थों का दर्शन करो। उसके पश्चात् गोवर्धन में जाकर भजन करो।’
‛प्रभु ! मेरे द्वारा स्थापित इस श्रीमूर्ति में तो आप जाग्रत हो उठे हैं। इसे छोड़कर कैसे कहीं जाऊँ दयामय ?’
‛तुम समझते हो कि मेरा लीला-विलास तुम्हारे द्वारा स्थापित इस मूर्ति में ही निबद्ध है। वह तो सभी विग्रहों में रूपायित है। श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके पार्षद श्रीरूप-सनातन आदि ने जिन लीला स्थलों का ब्रज में अन्वेषण किया है, वे क्या तुम्हारे द्वारा स्थापित विग्रह से कम जाग्रत हैं ?’
लालाबाबू के सन्देह के लिए अब कोई स्थान न रहा। वे ब्रज के सभी तीर्थों का दर्शन करने के पश्चात् गोवर्धन में एक कच्ची गुफा के भीतर रहकर भजन करने लगे। नित्य प्रातः गोवर्धन की परिक्रमा करते। दिन भर भजन में रहते। सन्ध्या समय एक बार मधुकरी को जाते।
उस दिन, जब वे गोवर्धन की परिक्रमा कर रहे थे, मन्दिर का पुजारी बोला–‘बाबा ! आज आप मधुकरी को न जायें। मैं सन्ध्या समय का ठाकुर का भोग-प्रसाद आपको पहुँचा दूँगा।’
सन्ध्या समय घनघोर वृष्टि हुई। प्रसाद लेकर बाहर जाना सम्भव ही न रहा। रात्रि में भी देर तक वृष्टि होती रही। पुजारी बड़े संकट में पड़ गया। सोचने लगा–‘बाबा कब से भूखे प्रतीक्षा में बैठे होंगे !’ श
वृष्टि जब कम हुई, वह गया मन्दिर के भीतर। यह देखकर अवाक् रह गया कि जो थाल बाबा के लिए सजाकर रखा था ठाकुर के सामने, वह वहाँ नहीं है ! क्या हुआ ? कोई तो मन्दिर के भीतर गया नहीं। पर अब सोच-विचार का समय कहाँ। पुजारी ने एक दूसरे थाल में सजाया भोग-प्रसाद और चला गया बाबा के पास।
उसे देखते ही बाबा बोले–‘यह क्या पुजारी बाबा ? और क्या ले ? आये ? पहले का ही बहुत-सा बच रहा है। वह देखो।’
पुजारी मन्दिर के भोग का थाल और खाद्य सामग्री गुफा में रखा देखकर चौंक पड़ा–‘यह थाल यहाँ कहाँ से आया ? कौन दे गया ?’
‛यह आप क्या कह रहे हैं ? आप ही तो दे गये हैं !’
‛मैं दे गया हूँ। मैं शपथ खाकर कहता हूँ मैं तो वृष्टि के कारण मन्दिर से बाहर ही नहीं हो सका। दृष्टि कम होने पर गया मन्दिर के भीतर, तो देखा, वहाँ ना थाल है और ना थाल में रखी सामग्री। फिर दूसरे मिट्टी के थाल में, जो फलादि मन्दिर में थे, लेकर आया हूँ।’
यह सुन लालाबाबू का देह सात्विक प्रेम-विकारों से परिपूर्ण हो अचेतावस्था में भूमि पर पड़ गया। चेतना आने पर अश्रु-गद्गद कण्ठ से वे कहने लगे–‘हाय प्रभु ! इस अधम के लिए इतना कष्ट किया ! और यह पहचान भी न सका। पहचानता भी कैसे ? यदि आप पहचान में न आना चाहें, तो किसकी शक्ति हैं, जो आपको पहचान सके। आपने क्यों इतने छल के साथ कृपा की प्रभो ? कृपा की तो कृपा में कृपणता क्यों कृपा-सिन्धु ?’
मथुरा के कृष्णदास बाबाजी की उन दिनों सिद्ध महात्मा के रूप में बड़ी ख्याति थी। उनका भक्तमाल का बँगला अनुवाद बँगला-भाषी लोगों में बहुत प्रिय था। लालाबाबू ने बहुत दिनों से मन ही मन उन्हें गुरुरूप में वरण कर रखा था।
उस दिन जब वे गोवर्धन-परिक्रमा के लिए गोवर्धन गये, तो उन्होंने उनके चरणों में गिरकर दीक्षा के लिए प्रार्थना की। वे बोले–‘मैं तुम्हें दीक्षा दूँगा। पर अभी समय नहीं हुआ है। तुम्हारे विषयी जीवन के सूक्ष्म संस्कार अभी कुछ शेष हैं। उन्हें तीव्र वैराग्य की अग्नि में भस्म करना होगा। उपयुक्त समय पर मैं स्वयं ही आकर तुम्हें दीक्षा दूँगा। तुम्हें मेरे पास आने की आवश्यकता नहीं।’
कुछ दिनों के लिए कौपीन कन्थाघारी लालाबाबू वृन्दावन जाकर रहने लगे। उनका वैराग्य और भजन दिनों-दिन बढ़ता गया। दिन भर भजन में रहते। सन्ध्या समय एक बार मधुकरी को जाते। बहुत दिन हो गये इस प्रकार पूर्ण वैराग्यमय जीवन व्यतीत करते-करते। पर गुरुदेव की कृपा फिर भी न हुई।
वे सोचने लगे कि उनमें कौन-सा ऐसा दोष है, जिसके कारण वे गुरुदेव की कृपा से अब तक वंचित हैं। एकाएक मन में आया–‘मैंने सारे ऐश्वर्य का त्याग कर कंगाल वेश तो धारण किया है, पर क्या मैं अपने अभिमान का पूर्ण रूप से त्याग कर पाया हूँ ? मैं मधुकरी के लिए कितने मन्दिरों और कुञ्जों में जाता हूँ; पर उस सेठ के कुञ्ज की ओर क्या मेरे पैर कभी बढ़े हैं ?’
रंगजी के विशाल मन्दिर के निर्माता सेठ लक्ष्मीचन्दजी लालाबाबू के प्रतिद्वन्द्वी थे। मन्दिर निर्माण, साधु-वैष्णव-सेवा और दान-दक्षिणा आदि में उनसे बराबर होड़ लगी रहती थी। जमीन-जायदाद को लेकर उनसे मुकदमा भी चल चुका था, जिसमें उनकी हार हुई थी। उनके प्रति पहले का द्वेष, सूक्ष्मरूप में अब भी बना हुआ था। यही कारण था कि लालाबाबू के पैर उधर नहीं पड़ते थे।
एक दिन रंगजी के मन्दिर में भिखारियों की बड़ी भीड़ थी। भीड़ में कन्धे पर भिक्षा की झोली डाले एक कनक कान्तिपूर्ण दीर्घ देहधारी भिखारी भी था। वह करताल बजा-बजाकर उच्च स्वर से कृष्णनाम कीर्तन कर रहा था। उसे पहचानते किसी को देर न लगी। तुरन्त दरबान ने सेठजी से जा कहा–‘लालाबाबू आपके द्वार पर भिक्षा के लिए खड़े हैं।’
सेठजी यह सुनकर चकित स्तम्भित रह गये। कुछ ही देर में वे स्वयं बाहर आये एक थाल में दाल, चावल, फल-मूल और सौ. अशर्फियाँ लेकर। लालाबाबू के सामने आदर पूर्वक मस्तक झुकाकर बोले–‘बाबूजी, आपके पदार्पण से आज इस दीन की कुटी पवित्र हुई। कृपाकर भिक्षा में यह थाल ग्रहण करें, जिससे मैं कृतार्थ होऊँ।’
लालाबाबू ने उत्तर दिया–‘मैं तो भिक्षा के लिए आया था सेठजी। आप जो दे रहे हैं यह तो भिक्षा नहीं।’
‛आपने ठीक समझा। यह भिक्षा नहीं है। मेरी क्या सामर्थ्य जो आपको भिक्षा दे सकूँ। आप राजा हैं, राजा-भिखारी होकर आपने मुझे पराजित कर दिया हैं। आपसे यह मेरी दूसरी पराजय है। इसलिए यह नजराना है।’
‛यह नहीं हो सकता, सेठजी कंगाल तो सदा कंगाल है। आपका यह थाल स्पर्श करने योग्य मैं नहीं हूँ। इसमें से एक मुट्ठी चावल मेरी झोली में डाल दें। इसके अतिरिक्त एक और भिक्षा देने की कृपा करें। जाने-अनजाने यदि मुझसे कभी कोई अपराध बन गया हो आपके चरणोंमें, तो क्षमा करें और आशीर्वाद दें, जिससे श्रीकृष्ण-भक्ति मेरे हृदय में उदित हो।’
लालाबाबू के इतना कहते ही दोनों ने एक दूसरे को अपनी बाँहों में भरकर एक दूसरे को प्रेमाश्रुओं से अभिषिक्त कर दिया।
लाला बाबू रङ्गजी के मन्दिर से अपनी भजन-कुटी को लौट रहे थे। उसी समय पथ में प्रसन्न मुद्रा में आते दीखे महात्मा कृष्णदास। भक्ति-पूर्वक उन्हें प्रणाम कर जैसे ही उठे, महात्मा ने प्रेम पूर्वक उन्हें आलिंगन कर लिया और कहा–‘लाला ! अब समय हो गया है तुम्हारी दीक्षा का।
शुभ लग्न में लालाबाबू की दीक्षा हो गयी। दीक्षा के उपरान्त उपदेश देते हुए गुरुदेव ने कहा–‘अब गोवर्धन में उसी गुफा में जाकर निरन्तर भजन करो। गुफा से तब तक न निकलना जब तक अभीष्ट की प्राप्ति न हो जाय। इस बीच किसी मनुष्य का मुख भी न देखना।’
लालाबाबू आशानुसार रात-दिन गुफा में रहकर भजन करने लगे। कई वर्ष बाद उन्हें इष्टदेव के दर्शन हुए। उनकी दिव्य लीलाओं के भी दर्शन उन्हें होने लगे। उनकी निभृत तपस्या का अन्त हुआ। व्रजमण्डल के सिद्ध महात्मा के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन करने आने लगे।
एक बार सिंधिया महाराज व्रज गये वहाँ के तीर्थों के दर्शन करने के उद्देश्य से। वे जहाँ भी गये वहाँ उन्होंने प्रशंसा सुनी लालाबाबू के असाधारण त्याग, वैराग्य, भक्ति-भाव और परमार्थ में उनकी असाधारण उपलब्धियों की। उनके हृदय में उत्कण्ठा जागी उनसे दीक्षा लेने की। वे सदलबल गोवर्धन पहुँचे। लालाबाबू के सामने प्रणत हो उनसे दीक्षा के लिए प्रार्थना की।
उन्होंने कहा–‘महाराज ! यदि भगवान् को पाना चाहते हैं, तो केवल दीक्षा से कुछ न होगा। उन्हें पाने के लिए दोनों हाथ बढ़ाने होगे। एक हाथ से संसार को पकड़े रहेंगे, दूसरे से उनके चरण स्पर्श करना चाहेंगे, तो उनके चरणों की प्राप्ति कभी न होगी। आप दोनों हाथ बढ़ाने को तैयार हैं क्या ?’
सिंधिया महाराज तो दोनों हाथ बढ़ाने को तैयार थे नहीं। उन्होंने कहा–‘आप ठीक कहते हैं महाराज यह पथ सबके लिए नहीं है। इसके लिए चाहिये पूर्वजन्म की साधना और सुकृति।’ इतना कह वे लालाबाबू के चरणों में प्रणाम कर गोवर्धन चले गये।
इसी प्रकार जो भी व्रज में आता, लालाबाबू की प्रशंसा सुन उनके दर्शन अवश्य करता। उनकी गुफा के सामने इतनी भीड़ होने लगी कि उन्होंने चुपचाप किसी निर्जन स्थान में चले जाने का निश्चय किया।
अर्धरात्रि में अपनी गुफा से वे चल पड़े। उसी समय ग्वालियर से कुछ अश्वारोही आ रहे थे उनके दर्शन करने। दुर्भाग्य से रात्रि के अँधियारे में एक घोड़े के खुर से उनका पैर कुचल गया। कुछ ही दिनों में घाव ने असाधारण रूप धारण कर लिया।
भक्त लोग उन्हें वृन्दावन के मन्दिर में ले गये। बहुत दिनों तक चिकित्सा चलती रही। पर कोई लाभ न हुआ। भक्तों ने प्रश्न किया–‘प्रभु ! आपके प्राणप्रिय विग्रह श्रीकृष्णचन्द्र के सान्निध्य में भी आपको इतना कष्ट ! ऐसा क्यों ?’
रोगाक्रान्त लालाबाबू का मुखारविन्द एक अपूर्व आनन्द-किरण से मुकुलित हो उठा।
उन्होंने कहा–‘तुमने तो मेरे प्रभु का दिया यह दुःख हो देखा है। तुमने कब देखा है उनका दिया वह दिव्य आलोक, जो सदा मेरे हृदय में झलमल करता रहता है, जिसमें श्रीकृष्णचन्द्र और राधारानी का सुमधुर लीला-विलास चलता रहता है ? कौन-सा पलड़ा भारी है–दुःख का या आनन्द का ??’
धीरे-धीरे महाभागवत लालाबाबू की जीवन-धारा क्षीण पड़ने लगी। उनके इङ्गित पर लोग उन्हें ले गये यमुना तटपर। वहाँ युगल की प्रेममयी लीला का दर्शन करते-करते उन्होंने लीला में प्रवेश किया।

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राधा अष्टमी 2022

आज के इस ब्लॉग में आपको ये सब मिलेगा !


  • राधाष्टमी का व्रत कब करे ?
  • राधा अष्टमी के दिन क्या करें
  • कहाँ हुआ किशोरी जी का प्राकट्य ?
  • श्री राधाकृष्ण क्‍यों गए बरसाना ?
  • बरसाना के महल में राधा अष्टमी के उत्सवों कब है ?
  • श्री राधाजी की आरती

श्री राधा जी के बारे में प्रचलित है कि वह बरसाना की थीं लेकिन सच्चाई है कि उनका जन्‍म बरसाना से पचास किलोमीटर दूर हुआ था।

यह गांव रावल के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर राधा जी का जन्‍म स्‍थान है।



राधा अष्टमी का व्रत कब करें?

3 सितंबर को रात 12 बजे से और 4 सितंबर को सुबह के 5 बजे व्रत का पारण करें


राधाष्टमी का मुहूर्त ?

अष्टमी तिथि प्रारंभ: शनिवार 03 सितंबर 2022, दोपहर 12:25 बजे

अष्टमी तिथि समाप्त: रविवार 4 सितंबर 2022, सुबह 10:40 बजे

उदयातिथि के अनुसार राधा अष्टमी का पर्व 04 सितंबर को मनाया जाएगा


राधा अष्टमी के दिन क्या करें

हम ज्यादा नियमो में विश्वास नहीं करते है पर कुछ जरुरी नियम जरुर पालन करे

  • राधा अष्टमी के दिन सुबह जल्द उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए।
  • इसके बाद राधा और कान्हा की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं और श्रृंगार करें।
  • बरसाना और अन्य जगहों पर राधारानी का अभिषेक सुबह 4 से 5 के बीच कर दिया जाता है इसलिए आप भी सुबह ही अभिषेक सम्पन्न करें
  • वह धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, फल और प्रसाद अर्पित करें।
  • श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र का पाठ करें

कैसे हुआ किशोरी जी का प्राकट्य ?

कमल के फूल पर जन्‍मी थीं श्री राधा रानी, रावल गांव में राधा जी का मंदिर है। माना जाता है कि यहां पर राधा जी का जन्म हुआ था। पांच हजार वर्ष पूर्व रावल गांव को छूकर यमुना जी बहती थी। राधा जी की मां कृति यमुना में स्‍नान करते हुए अराधना करती थी और पुत्री की लालसा रखती थी। पूजा करते समय एक दिन यमुना से कमल का फूल प्रकट हुआ। कमल के फूल से सोने की चमक सी रोशनी निकल रही थी। इसमें छोटी बच्‍ची के नेत्र बंद थे। अब वह स्‍थान इस मंदिर का गर्भगृह है। इसके ग्यारह माह पश्चात् तीन किलोमीटर दूर मथुरा में कंस के कारागार में भगवान श्री कृष्‍ण जी का जन्‍म हुआ था व रात में गोकुल में नंदबाबा के घर पर पहुंचाए गए। तब नंद बाबा ने सभी स्थानों पर संदेश भेजा और कृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव मनाया गया। जब बधाई लेकर वृषभानु जी अपनी गोद में राधारानी को लेकर यहां आए तो राधारानी जी घुटने के बल चलते हुए बालकृष्‍ण के पास पहुंची। वहां बैठते ही तब राधारानी के नेत्र खुले और उन्‍होंने पहला दर्शन बालकृष्‍ण का किया।


श्री राधाकृष्ण क्‍यों गए बरसाना

कृष्‍ण के जन्‍म के बाद से ही कंस का प्रकोप गोकुल में बढ़ गया था। यहां के लोग परेशान हो गए थे। नंदबाबा ने स्‍थानीय राजाओं को एकत्रित किया। उस समय ब्रज के सबसे बड़े राजा वृषभानु जी थे। इनके पास ग्यारह लाख गाय थीं। जबकि नंद जी के पास नौ लाख गाय थीं। जिसके पास सबसे अधिक गाय होतीं थीं, वह वृषभान कहलाते थे। उससे कम गाय जिनके पास रहती थीं, वह नंद कहलाए जाते थे। बैठक के बाद निर्णय हुआ कि गोकुल व रावल छोड़ दिया जाए। गोकुल से नंद बाबा और जनता पलायन करके पहाड़ी पर गए। उसका नाम नंदगांव पड़ा। वृषभान, कृति जी राधारानी को लेकर पहाड़ी पर गए। उसका नाम बरसाना पड़ा।

रावल में मंदिर के सामने बगीचा, इसमें पेड़ स्‍वरूप में हैं राधा व श्‍याम

रावल गांव में राधारानी के मंदिर के ठीक सामने प्राचीन उपवन है। कहा जाता है कि यहां पर पेड़ स्‍वरूप में आज भी श्री राधा जी और श्री कृष्‍ण जी विद्यमान हैं। यहां पर एक साथ दो वृक्ष हैं। एक श्‍वेत है तो दूसरा श्‍याम रंग का। इसकी पूजा होती है। माना जाता है कि श्री राधा जी और श्री कृष्‍ण जी वृक्ष स्‍वरूप में आज भी यहां से यमुना जी को निहारते हैं।


चहक उठी है सृष्टि सारी। बज उठी है देखो शहनाई।
कीरत जू के अंगना में। नन्ही-सी लाली है जाई।
सब मिल कर गाओ बधाई।

आँखों मे बस गया नज़ारा आज अटारी का। धरती पर अवतार हुआ वृषभानु दुलारी का।
झूमो नाचो गाओ जन्मदिन श्यामा प्यारी का।


बरसाना के महल में राधा अष्टमी के उत्सव कब है ?



  • 2 सितंबर ऊंचागांव में राधारानी की प्रधान सखी – ललिताजी का जन्मोत्सव ।
  • 3 सितंबर राधारानी जन्मोत्सव चाव बधाई, श्रीजी मन्दिर बरसाना
  • 4 सितंबर राधारानी मंदिर में प्रात: राधाजी का जन्म एवं शाम को संगमरमरी छतरी में विशेष दर्शन।
  • 5 सितंबर मोर कुटी पर मयूर लीला का मंचन, शाम को लाड़िलीजी मंदिर में ढ़ांढ़ी ढ़ाढिन नृत्य।
  • 6 सितंबर विलासगढ़ एवं नागजी कुटी में जोगिन लीला।
  • 7 सितंबर सांकरी खोर में चोटी गूंथन लीला
  • 8 सितंबर ऊंचा गांव में व्याहवला लीला एवं शाम को प्रिया कुण्ड पर नौका विहार लीला।
  • 9 सितंबर बूढ़ी लीला साँकरी खोर, चिकसौली आयोजन।
  • 10 सितंबर– राजस्थान के कदमखंडी में चीरहरण लीला का मंचन।
  • 11 सितंबर – पिसाया झाड़ी में रास

श्री राधाजी की आरती

जय जय श्री राधे जू मैं शरण तिहारी, हरिवंश दुलारी, श्री लोचन आरती जाऊँ बलिहारी
प्यारी,जय जय मेरी श्यामा जू….

पीत पिताम्बंर ओड़े निली सारी, सीस पे सैंंदूर जाऊँ बलिहारी। पीत पिताम्बंर ओड़े निली सारी, मांग पे सैंंदूर जाऊँ बलिहारी
जय जय….

रतंन सिंहासन बैठो श्री राधे आरती करें हम पिये संग जोरी। फूल सिंहासन बैठे श्री राधे आरती करें हम सब सखी जोरी
जय जय….

झलमल झलमल मानीक मोती अब लख़ मुनि मोहे पिये संग जोरी। झलमल झलमल मानीक मोती अब लख़ मुनि मोहे राधे संग जोरी
जय जय….

श्री राधे पद पकंज भगती की आशा दास मनोहर करत भरोसा। श्री राधे पद पकंज प्रीत की आशा दास मनोहर करत भरोसा
जय जय हो श्यामा जू मैं शरण तिहारी, हरिवंश दुलारी, श्री राधावल्लभ चरनन जाऊँ बलिहारी।।

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सबके प्रति भगवद्भाव नही बने तो क्या करें?

प्रo – महाराज जी, आप कहते हैं सबमें भगवान् के दर्शन करो पर व्यवहार में कुछ ऐसे भी लोग मिलते हैं कि जिनके प्रति भगवद्भाव बन ही नहीं पाता है, अतः हम क्या करें ?

समाधान – अनुकूलता में तो सबको भगवद् बुद्धि करने में सहजता होती है लेकिन प्रतिकूलता में भगवद्-बुद्धि हो जाना इसी बात की साधना करनी है । अगर हम प्रतिकूलता में भगवद्भाव कर गए तो पास हो जायेंगे । जब कोई हमसे मधुर व्यवहार करता है तो उसमें भगवान् को देखना सहज है लेकिन जब आकर हमें कोई गाली दे, धक्का मारे तो वहाँ भगवद्भाव करना कठिन होता है, यहीं तो परीक्षा होती है उपासक की इसीलिये हमें प्रत्येक स्थिति में भगवद्भाव करना ही है

ये क्रूरा अपि पापिनो न च सतां सम्भाष्यदृश्याश्च ये ।

सर्वान् वस्तुतया निरीक्ष्य परमस्वाराध्यबुद्धिर्मम ॥

(श्रीराधासुधानिधि २६४)

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ ( गीता ५/१८)

‘ज्ञानीजन विद्या और विनम्रता से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय हाथी कुत्ता चाण्डाल आदि में समदर्शी होते हैं अर्थात सर्वत्र तत्त्व रूप से प्रभु को ही देखते हैं ।’

पर एक बात की सावधानी रखनी है कि उपासक को व्यवहार सबसे नहीं करना है । ‘समदर्शन’ करना है लेकिन समवर्तन नहीं करना है हम गाय कुत्ता चांडाल ब्राह्मण सभी में भगवद्भाव रखें लेकिन समवर्तन अर्थात् व्यवहार एक समान नहीं करें। यदि व्यवहार सबके साथ समान करोगे तो पतन हो जाएगा क्योंकि कोई सिद्ध पुरुष तो अभी हो नहीं । इसलिए भगवान् ने ‘समदर्शिनः’ कहा है ‘समवर्तिनः’ नहीं ।

सबके साथ समान व्यवहार हो भी नहीं सकता है। जैसे चार स्त्रियाँ हैं- ‘माँ-बहन – पत्नी और बेटी’, चारों में समान भगवद्भाव हम कर सकते हैं लेकिन चारों से व्यवहार समान नहीं कर सकते व्यवहार अलग-अलग यथोचित ढंग से ही करना पड़ेगा । इसी तरह शरीर यद्यपि हमारा ही है हमको शरीर के सभी अंग बराबर प्रिय हैं लेकिन जब अधो अंगों का स्पर्श हो जाता है तो हम हाथ धुलते हैं। तो व्यवहार एक जैसा नहीं हो सकता है इसलिए व्यवहार में विषमता होती है अभी कोई दुष्ट आकर के भगवान्, गुरु या भक्तों की निंदा करे तो भगवद्भाव तो हम उसमें भी रखेंगे लेकिन व्यवहार उसके साथ वैसा ही करेंगे । अतः व्यवहार में समदर्शिता नहीं होती है। व्यवहार में भेद होना आवश्यक है, शास्त्राज्ञानुसार ही व्यवहार हो लेकिन तात्त्विक दर्शन अभेद हो । कहीं भी शरीर में अगर चोट लगती है तो हम समान रूप से उसका इलाज कराते हैं, वहाँ भेद नहीं करते हैं। भगवान् स्वयं भी व्यवहार में भेद करते हैं.

समदरसी मोहि कह सब कोऊ सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ ॥

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ (गी. (२९)

‘मैं सब प्राणियों में समभाव से व्यापक हूँ, न ही मेरा कोई अप्रिय है और न ही प्रिय है, किन्तु जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें और मैं उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ ।’

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श्री कृष्ण और गणेश जी की बाल लीला

जिस दिन कान्हा खडे हुए मैया के सब मनोरथ पूर्ण हुये आज मैया ने गणपति की सवा मनि लगायी है। रात भर बैठ लडडू तैयार किये सुबह कान्हा को ले मन्दिर गयी पूजा करने बैठी और कान्हा को उपदेश देने लगी।

कान्हा! ये जय जय का भोग बनाया है पूजा करने पर ही खाना होगा। सुन कान्हा ने सिर को हिलाया है। ये कह मैया जैसे ही जाने को मुडी इतने मे ही गनेश जी की सूंड उठी उसने एक लडडू उठाया है कान्हा को भोग लगाया है।

कान्हा मूँह चलाने लगे जैसे ही मैया ने मुडकर देखा गुस्से से आग बबूला हुई क्यों रे लाला?

मना करने पर भी क्यों लडडू खाया है इतना सब्र भी ना रख पाया है मैया मैने नही खाया ये तो गनेश जी ने मुझे खिलाया रोते कान्हा बोल उठे।

*सुन मैया डपटने लगी वाह रे! अब तक तो ऐसा हुआ नही इतनी उम्र बीत गयी कभी गनेश जी ने मुझको तो कोई ऐसा फ़ल दिया नही अगर सच मे ऐसा हुआ है तो अपने गनेश से कहो एक लडडू मेरे सामने तुम्हे खिलायें। नही तो लाला आज बहुत मै मारूँगी झूठ भी अब बोलने लगा है । अभी से कहाँ से ये लच्छन लिया है।
सुन मैया की बातें कान्हा ने जान लिया मैया सच मे नाराज हुई कन्हैया रोते हुये कहने लगे।

गनेश जी एक लडडू और खिला दो नही तो मैया मुझे मारेगी।*
इतना सुनते ही गनेश जी की सूंड ने एक लडडू और उठाया और कान्हा को भोग लगाया।
इतना देख मैया गश खाकर गिर गयी और ये तो कान्हा पर बाजी उल्टी पड गयी।
झट भगवान ने रूप बदल माता को उठाया मूँह पर पानी छिडका होश मे आ मैया कहने लगी ।

आज बडा अचरज देखा लाला गनेश जी ने तुमको लडडू खिलाया है। सुन कान्हा हँस कर कहने लगे मैया मेरी तू बडी भोली है।

तूने जरूर कोई स्वप्न देखा होगा इतना कह कान्हा ने मूँह खोल दिया अब तो वहां कुछ ना पाया।

भोली यशोदा ने जो कान्हा ने कहा उसे ही सच माना नित्य नयी नयी लीलाएं करते हैं। मैया का मन मोहते हैं मैया का प्रेम पाने को ही तो धरती पर अवतरित होते हैं ।।

हरी बोल

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फुलवारी कुण्ड और साहसी कुण्ड

फुलवारी कुण्ड – मुक्ता कुण्डके पास ही फुलवारी कुण्ड घने कदम्बके वृक्षोंके बीचमें स्थित है।

प्रसंग – कभी श्रीराधाजी सखियोंके साथ यहाँ पुष्प चयन कर रही थीं। अकस्मात् कृष्णने आकर कहा- तुम कौन हो? प्रतिदिन मेरे बगीचे के पुष्पोंकी चोरी करती हो। इतना सुनते ही श्रीमती राधिकाजीने डपटते हुए उत्तर दिया मुझे नहीं जानते, मैं कौन हूँ? यह सुनते ही कृष्ण अपने अधरॉपर मुरली रखकर बजाते हुए अपने मधुर कटाक्षोंसे राधाजीकी तरफ देखकर चलते बने। कृष्णको जाते देखकर राधिकाजी विरहमें कातर होकर मूर्च्छित हो गई। ललिताजीने सोचा इसे किसी काले भुजंगने से लिया है। बहुत कुछ प्रयत्न करनेपर भी जब वे चैतन्य नहीं हुईं, तो सभी सखियाँ बहुत चिन्तित हो गई। इतनेमें कृष्णने ही सपेरेके देशमें अपने मन्त्र तन्त्रके द्वारा उन्हें झाड़ा तथा श्रीमतीजीके कानमें बोले- मैं आय गयो, देखो तो सही ।’ यह सुनना था कि श्रीमती राधिकाजी तुरन्त उठकर बैठ गयीं तथा कृष्णको पास ही देखकर मुस्कराने लगीं। फिर तो सखियोंमें आनन्दका समुद्र उमड़ पड़ा। यह लीला यहीं हुई थी।


साहसी कुण्ड – फुलवारी कुण्डसे थोड़ी ही दूर पूर्व दिशामें विलास वट और उसके पूर्व में साहसी कुण्ड है। यहाँ सखियों राधिकाजीको ढाढ़स बंधाती हुई उनका कृष्णसे मिलन कराती थीं पास ही वटवृक्षपर सुन्दर झूला डालकर सखियाँ श्रीराधा और कृष्णको मल्हार आदि रागोंमें गायन करती हुई झुलाती थीं। कभी-कभी कृष्ण वहीं राधिकाके साथ मिलनेके लिए अभिसारकर उनके साथ विलास भी करते थे।

इस साहसी कुण्डका नामान्तर सारसी कुण्ड भी है। कृष्ण और बलदेव सदैव एक साथ रहते, एक साथ खाते, एक साथ खेलते और एक साथ सोते भी थे। एक समय यहाँपर दोनों भाई खेल रहे थे। यशोदा मैया दोनोंको झूलती हुई यहाँ आई और बड़े प्यारसे उन दोनोंको सारसका जोड़ा कहकर सम्बोधन किया। तबसे इस कुण्डका नाम सारस कुण्ड हो गया।

इसके पास ही अगल बगलमें श्यामपीपरी कुण्ड, बट कदम्ब और क्यारी

बट कुण्ड आदि बहुतसे कुण्ड हैं। यहाँ वट वृक्षोंकी क्यारी थी।

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श्री हरिवंश महाप्रभु जीवन परिचय

श्री श्यामाश्याम की नित्य निभृत निकुंज लीला का रस अनवरत बरस रहा है। एक समय श्री श्यामा जू की प्रधान सखी श्री ललिता जू ने विचार किया की “यह दिव्य मधुर रस धरा धाम पर मनुष्य मात्र के लिए कैसे सुलभ हो।” ऐसा विचार कर श्री ललिता जू ने महारास के मध्य श्री स्वामिनी जू की ओर प्रार्थनामयि दृष्टि से देखा। श्री श्यामा जू ने श्री श्यामसुंदर की ओर मधुर चितवन भरी दृष्टि से देखा तो श्री श्यामसुंदर श्री श्यामा जू के हृदय की बात समझ गए और प्रेमरस रसास्वादन कराने वाली अपनी वंशी को श्री श्यामा जू के कर कमलों में दे दिया।

प्यारी जू ने वंशी को ललिता जू को दिया और कहा “हे ललिते, आप और ये वंशी दोनों मिलकर हमारे नित्य विहार रस को प्रकाशित करो।” प्यारी जू की वह वंशी श्री हित हरिवंश महाप्रभु के रूप में ब्रज मंडल में श्री राधारानी के ग्राम रावल के निकट बाद ग्राम में प्रकट हुई और तीनो लोकों में इस दिव्य मधुर नित्य विहार रस का विस्तार किया। श्री ललिता जू श्री स्वामी हरिदास जू के रूप में वृन्दावन के राजपुर ग्राम में प्रकट हुए।


व्यासनंदन व्यासनंदन व्यासनंदन गाइये, जाको हित नाम लेत दम्पति रति पाइये ॥

रास मध्य ललितादिक प्रार्थना जू किन्हीं ।, कर ते सुकुमारी प्यारी वंशी तब दीन्हीं ॥

सोइ कलि प्रगट रूप वंशी वपु धार्यौ, कुञ्ज भवन रास रवन त्रिभुवन विस्तार्यौ ॥

गोकुल रावल सु ठाम बाद निकट राजे ।, विदित प्रेमरासि जनम रसिकन हित काजे ॥

तिनको पिय नाम सहित मन्त्र दियौ श्री राधे, सत-चित-आनंद रूप निगम अगम साधे ॥

श्री वृन्दावन धाम तरणि जासु तीर वासी ।, श्री राधापति रति अनन्य करत नित खवासी ॥

अद्भुत हरि जू को वंश भनत नाम श्यामा ।, जय श्री रूपलाल हित चित दै पायौ विश्रामा ॥

– श्री हित रूपलाल जी


उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में एक ग्राम है देववन, जहाँ श्री तपन मिश्र के पुत्र, ज्योतिष के परम विद्वान्, यजुर्वेदीय, कश्यप गोत्रीय, गौड़ ब्राह्मण श्री व्यास मिश्र जी निवास करते थे ।

व्यास मिश्र जी उस समय के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे और इस विद्या के द्वारा उन्होंने प्रचुर संपत्ति प्राप्त की थी। धीरे-धीरे उनकी ख्याति तत्कालीन पृथ्वीपति के कानों तक पहुँची और उसने बहुत आदर सहित व्यास मिश्र जी को बुला भेजा। व्यास मिश्र बादशाह से चार श्रीफल लेकर मिले। बादशाह उनसे बातचीत करके उनके गुणों पर मुग्ध हो गया और उनको ‘चार हजारी की निधि’ देकर सदैव अपने साथ रखने लगा। व्यास मिश्र की समृद्धि का अब कोई ठिकाना नहीं रहा और वे राजसी ठाट-बाट से रहने लगे।

व्यास मिश्र के पूर्ण सुखी जीवन में एक ही प्रबल अभाव था वे निस्संतान थे इस अभाव के कारण वे एवं उनकी पत्नी तारारानी सदैव उदास रहते। व्यास मिश्र जी बारह भाई थे जिनमें एक नृसिंहाश्रम जी विरक्त थे। नृसिंहाश्रम जी उच्चकोटि के भक्त थे, एवं लोक में उनकी सिद्धता की अनेक कथायें प्रचलित थीं। विरक्त होते हुए भी इनका व्यास जी से स्नेह था और कभी-कभी यह उनसे मिलने आया करते थे। एक बार मिश्र-दंपति को समृद्धि में भी उदास देख कर उन्होंने इसका कारण पूछा। व्यास मिश्र ने अपनी संतान हीनता को उदासी का कारण बताया और नृसिंहाश्रम जी के सामने ‘परम भागवत रसिक अनन्य’ पुत्र प्राप्त करने की अपनी तीव्र अभिलाषा प्रगट की। नृसिंहाश्रम जी ने उत्तर दिया “भाई, तुम तो स्वयं ज्योतिषी हो तुमको अपने जन्माक्षरों से अपने भाग्य की गति को समझ लेना चाहिये और संतोष-पूर्ण जीवनयापन करना चाहिये।”

यह सुनकर व्यास मित्र तो चुप हो गए, किन्तु उनकी पत्नी ने दृढ़ता-पूर्वक पूछा “यदि सब कुछ भाग्य का ही किया होता है, यदि विधि का बनाया विधान ही सत्य है, तो इसमें आपकी महिमा क्या रही ?” इस बार नृसिंहाश्रम जी उत्तर न दे सके और विचारमग्न होकर वहाँ से चले गये। एकान्त वन में जाकर उन्होंने अपने इष्ट का आराधन किया और उनसे व्यास मिश्र की मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना की। रात्रि को स्वप्न में प्रभु ने

उनको सन्देश दिया कि “तुम्हारे सत्संकल्प को पूर्ण करने के लिये स्वयं हरि अपनी वंशी सहित व्यास मिश्र के घर में प्रगट होंगे।”

नृसिंहाश्रम जी ने यह सन्देश व्यास मिश्र को सुना दिया और इसको सुनकर मिश्र-दम्पति के आनन्द का ठिकाना नही रहा..!!

बादशाह व्यास मिश्र जी को सर्वत्र अपने साथ तो रखता ही था। श्री हित हरिवंश के जन्म के समय भी व्यास मिश्र अपनी पत्नी सहित बादशाह के साथ थे और ब्रजभूमि में ठहरे थे। वहीं मथुरा से 5 मील दूर ‘बाद’ नामक ग्राम में वैशाख शुक्ला एकादशी सोमवार सम्वत 1559 में अरुणोदय काल में श्रीहित हरिवंश का जन्म हुआ। महापुरुषों के साथ साधारणतया जो मांगलिकता संसार में प्रगट होती है, वह श्री हित हरिवंश के जन्म के साथ भी हुई और सब लोगों में अनायास धार्मिक रुचि, पारस्परिक प्रीति एवं सुख-शान्ति का संचार हो गया। ब्रज के वन हरे-भरे हो गए, लताओं में पुष्प खिलने लगे, सूखे सरोवर जल से भर गए, वातावरण में सुगन्धि व्याप्त हो गयी, आकाश में बिजली चमकने लगी, हलकी हलकी बारिश की बूंदे गिरने लगी, वातावरण सुहावना हो गया, ब्रजवासियों के हृदय अकस्मात ही प्रेम एवं हर्ष से भर गए, पक्षीगण मधुर कलरव करने लगे, मोर नृत्य करने लगे।

जब श्री हिताचार्य 6 मास के थे तब उनके मुख से संस्कृत के श्लोक उद्धृत होने लगे, जिसे वहां उपस्थित श्री नृसिंहाश्रम जी ने श्रवण किया। वह कोई साधारण श्लोक नहीं थे, अपितु श्री श्यामाश्याम की दिव्य निकुंज लीला से सम्बंधित थे। ऐसा बहुत दिनों तक होता रहा और जब श्लोकों की संख्या 270 पहुंची तो श्री हिताचार्य के मुख से श्लोक उद्धृत होना बंद हो गया। उन समस्त 270 श्लोकों को श्री नृसिंहाश्रम जी ने ग्रन्थ में लिपिबद्ध कर लिया जिसका नाम “श्री राधासुधानिधि” हुआ ।

श्री हित हरिवंश के पिता श्री व्यास जी ब्रज दर्शन के उद्देश्य से आये थे अतः उन्होंने ब्रज में छह महीने निवास कर दिव्य लीला स्थलों के दर्शन किये और देववन चले गये। नामकरण के समय ज्योतिषियों ने बतलाया था कि यह बालक अनेक अद्भुत कर्म करने वाला होगा। उनकी भविष्य वाणी बालक की जन्म कुण्डली पर आधारित थी अतः वह सम्पूर्णतः सत्य भी हुई। बालक हरिवंश के उन शैशव कालीन अनेक चमत्कार पूर्ण कार्यों का वर्णन रसिकजन प्रणीत अनेक चरित्र ग्रन्थों में मिलता है। श्री हिताचार्य को समवयस्क कुमारों के साथ साधारण बाल क्रीड़ा करते देखकर ज्ञानू नामक भक्त को ज्योतिषियों की बात पर अविश्वास होने लगा था अतः वह अपना सन्देह दूर करने के उद्देश्य से एक दिन बालक हरिवंश की परीक्षा लेने गया किन्तु उसे श्री हिताचार्य ने अपनी बाल क्रीड़ा में ही श्यामा-श्याम की कुंज केलि के प्रत्यक्ष दर्शन करा दिये और वह देह त्याग कर निकुंज महल में सम्प्रविष्ट हो गया।

एक दिन रात्रि में हित हरिवंश को श्रीजी ने आज्ञा दी कि “बाग़

में एक कुंआ है जिसमे हमारा एक द्विभुज स्वरुप है जो कर में बांसुरी लिए हुए हैं, उन्हें मेरी गादी संग स्थापित कर सेवा करो।”

दूसरे दिन श्री हरिवंश जी कुएँ में कूद पड़े और वहाँ से श्याम वर्ण द्विभुज मुरलीधारी एक श्री विग्रह निकालकर ले आये उन्होंने उस विग्रह को श्रीराधाजी की गद्दी के साथ एक नव निर्मित मन्दिर में विराजमान करके विधि निषेध शून्य अपनी मौलिक सेवा पद्धति का शुभारम्भ किया। बालक हरिवंश ने उस विग्रह का नाम ‘रंगीलाल’ रक्खा; जो अद्यापि देववन नगरस्थ मन्दिर में विराजमान है इस घटना का स्मारक वह कुंआ भी ‘हरिवंश चह’ के नाम से विख्यात आज भी देखा जाता है यह घटना तब की है जब श्री हिताचार्य की आयु सात वर्ष की थी..!!

श्री हिताचार्य को किन-किन विद्वानों से कब और किन-किन शास्त्रों की शिक्षा हुई यह अज्ञात है किन्तु इनके द्वारा विरचित ‘हित चौरासी’ और ‘स्फुट वाणी’ नामक ब्रजभाषा ग्रन्थ तथा ‘राधासुधानिधि’ एवं ‘यमुनाष्टक’ जैसी संस्कृत कृतियों से ज्ञात होता है कि उन्हें संस्कृत व्याकरण, साहित्य, संगीत, ज्योतिष तथा श्रुति पुराणादिकों की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त हुई होगी। उनकी चारों कृतियाँ ही इस तथ्य को प्रमाण बनाती हैं


रसिकों द्वारा विरचित चरित्र ग्रन्थों व वाणी ग्रन्थों के अनुसार श्री हिताचार्य को उनकी ईष्ट श्रीराधाजी ने मंत्र प्रदान किया था ।

एक दिवस सोवत सुख लह्यौ श्री राधे सुपने में कह्यौ ॥, द्वार तिहारे पीपर जो है । ऊँची डार सबनि में सोहै ॥

तामै अरुन पत्र इक न्यारौ । जामें जुगल मंत्र है भारौ ॥, लेहु मंत्र तुम करहु प्रकाश । रसिकजननि की पुजवहु आश ॥

श्री हित चरित्र, उत्तमदास जी, व्यासनंदन व्यासनंदन व्यासनंदन गाइये ।

तिनको पिय नाम सहित मन्त्र दियौ श्री राधे सत-चित-आनंद रूप निगम अगम साधे ॥

– श्री हित रूपलाल जी


स्वयं श्री हिताचार्य ने अपनी ‘राधासुधानिधि’ नामक रचना में अनेक स्थलों पर श्री राधा को अपनी इष्ट के साथ ही गुरु रूप में भी स्मरण किया है ।


यस्याः कदापि वसनाञ्चल खेलनोत्थ, धन्याति धन्य पवनेन कृतार्थ मानी ।, योगीन्द्र दुर्गम गतिर्मधुसूदनोपि, तस्या नमोस्तु वृषभानु भुवनोदिशेऽपि ॥

रहौ कोउ काहू मनहि दिए, मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा शपथ करौं तृण छिये ॥


एक दिन श्री हिताचार्य रात्रि में सो रहे थे, तब श्री राधा जी ने स्वप्न में आदेश दिया “तुम्हारे घर के सामने जो पीपल का वृक्ष है, उसकी सबसे ऊँची डाल पर एक अद्भुत अरुण पत्र है, उसमें हमारा युगल मन्त्र है, उसे ग्रहण कर उसका रसिकजनों में प्रकाश करो ।” इस आदेश को पाकर श्री हिताचार्य ने सुबह उस अरुण पत्र को पीपल वृक्ष की डाल से उतार कर उसका रसिकजनों में प्रकाश किया ।

जब श्री हिताचार्य देववन में निवास करते थे, तब श्री राधा ने स्वयं प्रकट होकर श्री हिताचार्य को “हित” छाप प्रदान किया था। तभी से श्री हिताचार्य का नाम हित हरिवंश हो गया। “हित” का अर्थ है प्रेम ।


रसमय करे चरित परशंश । जगगुरु विदित श्री हरिवंश ॥, श्री राधा अनुग्रह कियौ श्री मुख मंत्र निजु कर दियौ ॥

दयिता कृष्ण जिनके इष्ट । पुनि गुरु भाव प्रीति गरिष्ट ॥, दीनी रीझ हित की छाप । ता करि बढ्यौ भक्ति प्रताप ॥

– चाचा वृन्दावन दास जी


आठ वर्ष की आयु में श्री हिताचार्य जी का उपनयन संस्कार हुआ। इस आयु मे इनकी बुद्धि सामान्य बालकों से कहीं अधिक तीव्र और धारणाशक्ति चमत्कारी थी। इन्होंने अपने स्नेह और सौजन्य से शैशव में ही अपने चारो ओर अच्छा-खासा सखा – मण्डल स्थापित कर लिया था। इन बाल-सखाओं के साथ इनकी क्रीडाएँ असाधारण होती थी। प्रायः भगवद्भक्ति के आश्रित ही कोई न कोई खेल यह खेलते थे। ठाकुर जी की सेवा-पूजा करने की ओर भी इनकी नैसर्गिक रुचि थी और इन्होंने महाप्रसाद का माहात्म्य का शैशव अवस्था में ही अपने बाल सखाओं के समक्ष वर्णन किया था। एकादशी व्रत के प्रति इनका विलक्षण भाव इसी आयु में व्यक्त हो गया था। शनै शनै अपनी अनन्य भावना और सेवा-पूजा के कारण इनकी ख्याति समीपवर्ती प्रदेश में भी हुई और इनके पास रसपिपासुओं का आगमन होना प्रारम्भ हुआ। इस आयु में इन्होंने जो चमत्कार किए उनका वर्णन साम्प्रदायिक वाणी-ग्रंथों में भरा पड़ा है।

सोलह वर्ष की आयु में श्री हिताचार्य जी का विवाह रुक्मिणी देवी के साथ सम्पन्न हुआ। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर भी इन्होंने अपनी धार्मिक निष्ठा में परिवर्तन नही किया। गृहस्थाश्रम के समस्त कर्त्तव्यों का पालन करते हुये ये सच्चे रूप में भक्त और सन्त बने रहे। इस जीवन के प्रति इनके मन मे न तो वैराग्य भावना थी और न इसके प्रति किसी प्रकार का हीन भाव ही ये रखते थे। इनका दाम्पत्य-जीवन सुखी-सम्पन्न और आदर्श था। सर्व प्रकार के ऐश्वर्य एवं भोगविलास की सामग्री इनके पास थी किन्तु इनकी भावना में उसके लिये किसी प्रकार की आसक्ति न होने से उसको लेकर ये कभी व्यग्र, विचलित या लिप्त न होते थे।

श्रीमती रुक्मिणी देवी से श्री हिताचार्य के एक पुत्री और तीन पुत्र उत्पन्न हुए। ज्येष्ठ पुत्र श्री वनचंद्रजी स० 1585, द्वितीय पुत्र श्री कृष्णचंद्रजी संवत् 1587, तृतीय पुत्र श्री गोपीनाथजी सवत् 1588 तथा पुत्री साहिब दे सम्वत् 1589 मे उत्पन्न हुई। श्री हरिवंशजी की माता तारारानी का 1589 में तथा पिता श्री व्यास मिश्र का निकुंजगमन 1590 सम्वत् में हुआ। माता-पिता की मृत्यु के उपरान्त श्री हरिवंशजी के मन में यह भाव आया कि किसी प्रकार भगवान् की लीलास्थली में जाकर वहाँ की रसमयी भक्ति-पद्धति में लीन होकर जीवन सफल करें। उसी समय इनकी ख्याति से प्रभावित होकर तत्कालीन राजा ने इनको अपने दरबार में बुलाने के लिये सादर निमंत्रण भेजा किन्तु इन्होंने अपने अन्तर्मन में भगवान् की लीलाभूमि का निमंत्रण स्वीकार कर लिया था इसलिये राजा के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया और एक श्लोक में यह उत्तर भिजवा दिया कि सृष्टि के आदि से नरेन्द्र-सुरेन्द्र, ब्रह्मा आदि कालग्रसित होते आये हैं अतः हरिचरण में लीन होकर उनका ही ध्यान करना अभीष्ट है।

बत्तीस वर्ष की आयु में श्रीराधा जी ने श्री हित हरिवंश को श्री वृन्दावन-वास एवं धर्म-प्रचार की आज्ञा दी। इस आज्ञा के प्राप्त होते ही श्री हित जी वृन्दावन चल दिए। उन्होंने चलते समय रुक्मिणी जी से साथ चलने को कहा किन्तु वे साथ न आ सकी।

देववन से प्रस्थान के बाद मार्ग में इनको श्री राधा के स्वप्न में दर्शन हुये और उन्होने इनसे कहा कि “आगे एक चिरथावल नाम का गाँव तुम्हारे मार्ग में पड़ेगा, उस गांव में यदि कोई ब्राह्मण अपनी दो कन्याओं का तुम से विवाह करना चाहे तो तुम उसे स्वीकार कर लेना। यह विवाह तुम्हारे भक्ति-पथ मे किसी प्रकार का अन्तराय उत्पन्न करने वाला न होगा। इस विवाह के द्वारा तुम दाम्पत्य जीवन का आदर्श प्रतिष्ठित करोगे।” साथ ही यह भी उस स्वप्न मे उन्हें राधाजी ने कहा कि “मेरा एक विग्रह (राधावल्लभजी के रूप मे ) तुम्हे मिलेगा जिसे तुम वृन्दावन मे ले जाकर मंदिर में विधिवत् स्थापित करना।”

ऐसा ही स्वप्न आत्मदेव नामक ब्राह्मण को भी हुआ जो उसी चिरथावल गाँव का रहने वाला था। इस स्वप्न के बाद श्री हरिवंश जी अपने यात्रा पथ में अग्रसर हुये और उस गाँव मे (चिरथावल) पहुँचे जिसमें आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था। उसके दो नवयुवती कन्याएँ थी और पूर्व दृष्ट स्वप्न के आधार पर वह श्री हरिवंशजी के आगमन की सतत प्रतीक्षा कर रहा था। उनके आते ही उसने अपनी दोनों कन्याओं का पाणिग्रहण करने के लिये हरिवंशजी से प्रार्थना की जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार किया इन कन्यायों के नाम कृष्णदासी और मनोहरीदासी थे। चिरथावल गाँव में कुछ समय तक ठहर कर फिर श्री हरिवंश जी ने अपनी यांत्रा प्रारम्भ की और सम्वत् 1590 को फाल्गुन की एकादशी को वृन्दावन पहुंचे। यहाँ पहुँचने पर मदनटेर नामक स्थान पर विश्राम के लिये डेरा डाला। यह स्थान आज भी वृन्दावन प्रसिद्ध है। वहीँ श्री हिताचार्य ने श्री राधावल्लभ के लिए लता-कुञ्ज निर्माण कर उन्हें स्थापित किया और सेवा प्रारम्भ की..!!

श्री हिताचार्य जिस समय वृन्दावन में आये उस समय वह लता पुंजाकार दल फल और फूलों से परिपूर्ण एक सघन कुंज के रूप में था। यह लता पुंजाकार वृन्दावन शुक पिक-सारस हंस आदि पक्षियों के कलरव से मुखरित और चारों ओर यमुना से समावृत्त था। कहीं-कहीं यमुना तटस्थ ऊँचे टीलों पर यमुना स्नान हेतु आये हुए ब्रजवासीगण अवश्य दिखाई देते थे। समागत श्री हिताचार्य के द्वारा यह ज्ञात होने पर कि इस सघन निर्जन वन में हम निवास करेंगे, उन सभी ब्रजवासियों को अत्यधिक विस्मय और हार्दिक प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्री हिताचार्य के हाथ में तीर कमान देते हुए कहा कि “गुसाईं जी आप तीर चलाइये, आपका तीर जहाँ तक पहुँचेगा वहाँ तक की भूमि आपकी होगी।”

यह श्री हिताचार्य का मधुर प्रभाव ही था कि इन बटमार वृत्ति वाले ब्रजवासियों के चित्तों का पूर्ण परिवर्तन हो गया और वे पंचकोसी वृन्दावन श्री हिताचार्य को भूमि प्रदान करने के लिये तैयार हो गये। ब्रजवासियों के कहने पर श्री हिताचार्य नें एक तीर छोड़ा और वह पर्याप्त दूरी पर जाकर गिरा। श्री हिताचार्य ने जहाँ से तीर फेंका, अपना निवासालय उसी स्थान को बनाया और जहाँ पर वह तीर गिरा, कालान्तर में वह स्थान ‘तीर घाट’ और बाद में ‘चीर घाट’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। श्री हिताचार्य के दिव्य स्वरूप पर मुग्ध होकर ब्रजवासी दर्शनार्थ आने लगे और शीघ्र ही समीपवर्ती गाँवो में इनके आगमन का समाचार फैल गया।

जब श्री हिताचार्य वृन्दावन आये तब उस समय वृन्दावन घनघोर जंगल था। वहां एक नरवाहन नाम का डाकू रहता था जिसके भय से वहां दिन में भी कोई न आता। उसने अपनी शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण ब्रज प्रदेश पर अपना अधिकार ही बना लिया था । उसकी इस शक्ति से बड़े-बड़े राजे महाराजे भी डरते थे यहाँ तक कि दिल्लीश्वर का भी इस नरवाहन पर कोई नियन्त्रण नहीं था। जब नरवाहन को अपने गुप्तचरों द्वारा यह ज्ञात हुआ कि कोई ऐसा चमत्कारी महापुरुष हिंसक जन्तुओं से संसेवित निर्जन वन में आया है; जिसके मधुर प्रभाव से हिंसक जन्तु तथा निर्जन वन के परिसर में बसे बटमारों के मन-बुद्धि और चित्त बदल गये हैं और वे सब उस महापुरुष की सेवा सुश्रुषा में निरत हो गये हैं; तो कुतूहल देखने की दृष्टि से एक दिन नरवाहन भी श्री हिताचार्य के निवास स्थान पर आया। उस समय श्री हिताचार्य अपने शिष्यों तथा ब्रजवासियों से समावृत्त थे और ‘नवल’ नामक शिष्य के साथ कुछ आलाप संलाप कर रहे थे। नरवाहन भी श्री हिताचार्य के मधुर प्रभाव से अछूता न रह सका। वार्तालाप सुनकर उसे अपनी वृत्ति पर बहुत खेद हुआ। उसने अपना हार्दिक दुख प्रकट करते हुए श्री हिताचार्य से स्वयं को शरण में लेने की प्रार्थना की।

श्री हिताचार्य ने उसकी निष्कपट वाणी सुनकर मन्त्रदान के साथ-साथ उपदेश भी दिये जिससे उसके जीवन का आमूलचूल परिवर्तन हो गया। नरवाहन जैसे खूँखार डाकू के जीवन के इस परिवर्तन से पंचकोसी वृन्दावन में निवास करना सबके लिए सुगम हो गया। फलतः बृहद वृन्दावनस्थ ब्रज के नन्दग्राम, बरसाना, राधाकुंड और संकेत आदि ग्रामों में बसे हुए सन्तजन श्री हिताचार्य द्वारा प्रकटित इस पंचकोसी रासस्थल वृन्दावन में निवास करने लगे। इससे पूर्व सभी भक्तगण इस पंचकोसी वृन्दावन से अपरिचित ही थे।

श्री हिताचार्य ने जिस स्थान से तीर फेंका था उसी स्थान पर लता विनिर्मित मन्दिर या पर्ण कुटी में श्री राधाबल्लभलाल जी को विराजमान कर दिया और अपने निवास के लिए किसी प्रकार का निवासालय बनाकर श्री राधाबल्लभलाल जी की अष्टयामी सेवा करने लगे। वे इस पर्ण विनिर्मित मन्दिर में उस समय तक सेवा करते रहे जब तक नरवाहन द्वारा नवीन मन्दिर का निर्माण नहीं हुआ था। नरवाहन ने श्री राधाबल्लभलाल जी का नवीन मन्दिर उसी स्थान पर बनवाया था, जहाँ पर श्री हिताचार्य सपरिवार निवास करते थे। नवीन मन्दिर निर्माण हो जाने पर वि. सं. 1591 की कार्तिक शुक्ल तेरस को श्री हिताचार्य ने श्री राधाबल्लभलाल जी को उसमें विराजमान किया और विशेष समारोह के साथ पाटोत्सव मनाया। अनेक संतगण गोकुल, गोवर्धन, नंदगाव और बरसाने में निवास करते थे। उस समय गोवर्धन, नंदगाव और बरसाना भी वृहद् वृन्दावन था। श्री हरिवंश जी ने यहाँ अनेक लीला स्थलियों को प्रकट किया और वृन्दावन की सीमा पंचकोसी निर्धारित की। उसी दिन से आज भी वृन्दावन प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है..!!


रहें भौगाँव नांव नरबाहन साधुसेवी, लूटि लई नाव, जाकी बन्दीखानै दियौ है ।

लौंड़ी आवै न कछू, खायवे को, आई दया, अति अकुलाई लै, उपाय यह किया है ॥

बोलौ राधवल्लभ औ, लेवौ हरिवंश नाम, पूछे शिष्य नाम कहौ, पूछी नाम लियौ है ।

दई मँगवाय वस्तु, राखियो दुराय बात, आय दास भयौ, कही रीझि पद दियौ है ॥

– श्री भक्तमाल (419)


श्री “नरवाहन” जी श्रीहरिवंशजी के शिष्य हो गए थे, परम संतसेवी बन गए थे, वे “भैगाँव” में रहते थे। वे ब्रज के एक जमींदार थे और लुटेरे भी। एक दिन कोई सेठ लाखों की संपदा नाव में भरे यमुना जी के मार्ग से जा रहा था, नरवाहन ने संतसेवा के लिये सब लूट लिया, और उस सेठ को कारागार (बन्दीघर) में डाल दिया। उस वणिक (सेठ) को भोजन देने एक टहलनी कारागार में जाती थी, सेठ की दुर्दशा देखकर उस टहलनी के हृदय में बड़ी दया आई, तब बहुत अकुला के उसको एक उपाय बताया कि “तुम बड़े ऊँचे स्वर से “राधावल्लभ श्रीहरिवंश !” यह नाम जपो, जब पूछा जाय, तब कहना कि श्रीहरिवंश जी का शिष्य हूँ ।”

उस सेठ ने ऐसा ही किया और उच्च स्वर से “राधावल्लभ श्रीहरिवंश” नाम रटने लगा। जब श्रीनरवाहनजी ने यह सुना तो उस सेठ के पास गए और पूछा कि “तुम यह नाम क्यों जपते हो?” उस सेठ ने कहा “मैं श्रीहरिवंशजी का शिष्य हूँ।” राजा नरवाहन बड़े ही गुरुनिष्ठ थे । सुनते ही उस सेठ को मुक्त कर दिया और धन देकर कहा कि “श्रीगुसाईंजी से यह बात नहीं कहना।” वह सेठ शीघ्र ही श्रीवृन्दावन जाकर श्रीहित हरिवंशजी का शिष्य हो गया, और अपना वृत्तान्त भी सुनाया “नरवाहन जी ने लाखों का धन लेकर मुझे कारागार में डाल दिया सो मैंने आपका नाम लिया और झूठ ही कहा कि “आपका शिष्य हूँ, यह सुनते ही नरवाहन जी ने मुझे मुक्त कर दिया और मेरा सम्पूर्ण धन देकर मुझे घर भेज दिया।”

सुनकर प्रसन्न हो श्री गुसाईंजी ने दोनों को प्रभुपद प्रेम प्रदान किया। श्रीनरवाहन जी की गुरुभक्ति पर रीझकर इन्हीं की छाप देकर श्री हरिवंश जी ने दो पद बनाकर अपनी “चौरासी” ग्रन्थ में रख लिया और श्री नरवाहन जी को नित्य विहार रस का साक्षात्कार करा दिया।

श्री हिताचार्य के परमोपास्य षटैश्वर्य सम्पन्न भगवान नहीं थे; प्रत्युत कोटि ब्रह्म ऐश्वर्य के परकोटे के अन्तर्गत किन्तु उससे दूर पूर्ण माधुर्य मूर्ति, रस-रसिक, अद्वय युगल किशोर थे। भगवान की सेवा पूजा वैदिक विधान द्वारा ही संविधेय होती है किन्तु माधुर्य मूर्ति, ‘प्रेम’ किंवा ‘रस’ विग्रह श्री राधावल्लभलाल जी की सेवा प्रीति-विधान से ही सम्भव थी अतः श्री हिताचार्य ने अपने स्नेह भाजन श्रीराधाबल्लभलाल जी का अहर्निशि समयानुरूप अनेक प्रकार से लाड़-दुलार प्यार किया। इस लाड़-प्यार को ही उन्होंने सात भोग और पाँच आरती वाली विधि निषेध शून्य ‘अष्टयामी सेवा’ तथा वर्ष में आने वाले ऋतु उत्सवों [वसन्त, होली, होरीडोल, जलबिहार, पावस, झूला आदि) की ‘उत्सविक सेवा’ का सुरम्य रूप प्रदान किया, साथ ही अपने आचरणों एवं वाणी द्वारा दैनिक स्वेष्ट की मानसी सेवा करने का भी मूर्त विधान दिया।

श्री हिताचार्य ने ऐसे वृन्दावन का प्रागट्य किया था जोकि भूतलस्थ होते हुए भी ‘देवानामथ भक्त-मुक्त’ और श्री कृष्ण लीला परिकर के लिए भी दुर्लक्ष्य था। इसीलिए यह वृन्दावन परम रहस्य संज्ञक बना रहा और बना रहेगा। ऐसे वृन्दावन में होने वाली लीलायें और लीला स्थलों का प्रागट्य भी अनेक दृष्टियों से अनिवार्य था। अतः श्री हिताचार्य ने उन लीला स्थलों का भी प्रागट्य किया जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवत आदि पुराणों में नहीं है। इन लीला स्थलों का प्रागट्य ही पंचकोसी वृन्दावन का प्रागट्य है और जो रहस्य रूप वृन्दावन के परिचय प्रदाता तथा प्रत्यक्ष प्रतीक हैं। पंचकोसी वृन्दावन में उनके द्वारा प्रकटित लीला स्थल हैं- रासमण्डल, सेवाकुंज, वंशीवट, धीरसमीर, मानसरोवर, हिंडोल स्थल, शृंगारवट और वन विहार


नमो जयति जमुना वृन्दावन ।

नमो निकुंज कुंज सेवा, हित मण्डल रास, डोल, आनंदघन ॥

नमो पुलिन वंशीवट, रसमय धीरसमीर, सुभग भुव खेलन ।

नमो-नमो जै मानसरोवर सुख उपजावन दंपति के मन ॥

नमो-नमो दुम बेली खग-मृग जे-जे प्रगट गोप्य श्री कानन ।

नमो जयति हित स्वामिनि राधा अलबेली अलबेलौ मोहन ॥

– श्री अलबेलीशरण जी


प्रेम किंवा रस मूर्ति श्यामा-श्याम प्रकृतितः रास और विलास प्रिय हैं। रास और विलास प्रियता इनके स्वरूप की प्रकट प्रतीक है। इसीलिए श्री हिताचार्य इन्हें आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि रास-विलास के साथ यह जो सदा विराजमान रहे –

नव निकुंज अभिराम श्याम सँग नीको बन्यो है समाज ।

जै श्री हित हरिवंश विलास रास जुत जोरी अविचल राजु ॥

राधाकिंकरीगण इस रास-रस का पान नेत्र-चक्षुओं द्वारा किया करती हैं। राधाकिंकरी भावानुभावितहृदय रसिकों को भी प्रत्यक्ष दर्शन द्वारा इस रास-विलास का रसास्वाद निरन्तर मिल सके इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए श्री हिताचार्य ने प्रेम मूर्ति श्यामाश्याम की इस नित्य रासलीला के अनुकरण का प्रागट्य किया यह रासलीलानुकरण वृंदावन में होने वाले उस नाद्यन्त नित्यरास का अनुकरण था जो मुक्तजनों, भक्तजनों और गोविन्द प्रिय परिकर से सर्वथा अलक्षित है। यह भागवत वर्णित द्वापरान्त में होने वाले महारास से भिन्न उस नित्यरास का अनुकरण था जिसे केवल राधा-प्रिय किंकरीगण ही देखा करती हैं। इस रासलीलानुकरण का शुभारंभ श्री हिताचार्य ने वि. से. 1592 के लगभग पंचकोसी वृन्दावनस्थ चैन घाट [वर्तमान नाम गोविन्द घाट) में विनिर्मित रास मण्डल पर ब्रजवासी बालकों को श्यामा-श्याम व सहचरियों के वेष से सुसज्जित करके किया था। इसी रासमण्डल में एक समय महारास के मध्य श्री राधा के चरणों की नूपुर टूट गयी थी और वहां उपस्थित श्री हरिराम व्यास जी ने अपने यज्ञोपवीत से नूपुर गूंथ कर श्री प्रिया जी के चरणों में धारण कराया था।

’प्रेम’ किंवा ‘रस’ जब उज्जृम्भित होता है तब उसमें राग की ऊर्मियाँ प्रकृतितः उच्छलित होती हैं श्यामा-श्याम- प्रेम किंवा रस की सघन मूर्ति ही हैं। यही कारण है कि उन्हें रागालापन तथा वीणा-वंशी वादन अत्यधिक प्रिय है। कभी रसिकशेखर श्यामसुन्दर वंशी वादन के माध्यम से श्री प्रिया के साथ गायन करके उन्हें प्रसन्न करते हैं तो कभी केवल प्रिया जी अपने मधुर गायन तथा वीणा वादन-द्वारा अपने प्रियतम को आनंदित करती हैं। इसी प्रकार राग और अनुराग की राजीव मूर्तियाँ सहचरीगण भी समय-समय पर युगल के रागालाप का अनुगमन करके कभी प्रातः, कभी मध्यान्तर, उत्थापन काल में और कभी रात्रि रास में गायन-वादन करके युगलवर का मनोरंजन किया करती हैं।

राधाकिंकरी भावानुभावित रसिक इसी प्रकार से रस लीलाओं के पद्यात्मक गायन द्वारा अपने इष्ट युगल को आनन्दित कर सके तथा स्वयं वृन्दावन रसानन्द का अनुभव कर सके, इस उद्देश्य से श्री हिताचार्य जी ने ‘समाज गायन’ की अभिनव और मौलिक गायन पद्धति का भी समुद्भव किया। यहाँ पर यह नितान्त अविस्मरणीय है कि उन्होंने सामवेद के स्वर प्रधान संगीत को अक्षर प्रधान बनाकर इस मौलिक गान पद्धति को जन्म दिया और रस लीला संबंधी गेय पदों को एक धुन विशेष में आबद्ध करके उन विशिष्ट ‘धुनों’ का भी आविष्कार किया; जो आज भी राधावल्लभीय समाजगान गायको के कण्ठ में परम्परा से सुरक्षित हैं।

रसिकाचार्य गो. हित हरिवंश जी के अनेक शिष्य हुए, उनमें से भगवत मुदित जी द्वारा रचित ‘रसिक अनन्यमाल’ में वर्णित शिष्यों का नामोल्लेख किया जाता है

इन उल्लिखित रसिकों में से श्री नरवाहन, हरिरामव्यास, छबीलेदास, नाहरमल, बीठलदास, मोहनदास, नवलदास, हरीदास तुलाधार, हरीदास जी [कर्मठी बाई के ताऊ ], परमानन्ददास, प्रबोधानन्द सरस्वती, कर्मठी बाई, सेवक जी, खरगसेन, गंगा, जमुना, पूरनदास, किशोर, सन्तदास, मनोहर, खेम, बालकृष्ण, ज्ञानू, गोपालदास नागर, आदि है..!!

श्री हिताचार्य द्वारा विरचित रचनायें निम्नांकित हैं –

1: श्रीराधासुधानिधि

यह एक संस्कृत काव्य है जिसकी श्लोक संख्या 270 है। इस ग्रन्थ में श्री राधाकृष्ण की विभिन्न निकुञ्ज लीलाओं का वर्णन है, संग में अभिलाषा एवं वंदना के श्लोक भी संगृहीत हैं।

2: श्री यमुनाष्टक

श्री यमुनाष्टक संस्कृत में रचित एक अष्टक है जिसकी श्लोक संख्या 9 है। इसमें श्री यमुना जी का यश एवं उनकी वंदना का वर्णन है।

3: श्री हित चौरासी

श्री हित चौरासी ब्रजभाषा में एक पद्य रचना है जिसमें 84 पद संकलित हैं। इस ग्रन्थ में श्री श्यामाश्याम की निकुंज लीला का वर्णन है।

4: स्फुट वाणी

इस ग्रन्थ में ब्रजभाषा में 24 पद संकलित हैं, जिसमें सिद्धांत, आरती, श्री श्यामाश्याम की निकुंज लीला, आदि के पद हैं।

इन 4 रचनाओं के अतिरिक्त श्री हिताचार्य जी के 2 पत्र ब्रजभाषा गद्य में रचित हैं।



जयकृष्ण जी ने श्री हिताचार्य का निकुंज गमन वर्णन करते हुए लिखा है कि

श्री यमुना जी के तट पर मानसरोवर के निकट भांडीरवट है। कुसुमित ललित लतिकाओं से रमणीय इस वन स्थली में ‘भँवरनी भवन’ नामक एक निभृत निकुंज है। इस निकुंज में श्यामा-श्याम रति रस विहार किया करते हैं। शारदीय पूर्णिमा [आश्विन की पूर्णिमा] की चन्द्र-चन्द्रिका में रति रस बिहार के रसासव से आघूर्णित नयन श्री रसिक युगल झूम रहे थे, घूम रहे थे, उनकी श्री अंग की कान्ति चन्द्र-कान्ति को अत्यधिक कान्त बना रही थी। श्री हिताचार्य को प्रिया जी के अंग की सुगन्ध ने अपनी ओर बलात् आकर्षित किया परिणामतः वे उस सुगन्ध के आधार से “प्रिया जी ! आप कहाँ हो ? कहाँ हो ?” यह कहते हुए उस वन में घुसते ही चले गये और थोड़ी देर में प्रिया जी की अंग- चन्द्रिका में घुल मिल गये। इस प्रकार से वि. सं. 1609 की आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में श्री हित जी लोक- दृष्टि से ओझल हो गये।

दिव्य कमल श्री यमुना कूल वट भांडीर निकट रस मूल ॥

संतत जहँ भँवरन की भीर शीतल- मन्द-सुगंध समीर ॥

हँ बिहरत श्री रवनी-रवन । ताकौ नाम भँवरनी भवन ॥

शरद मास राका उजियारी पूरन शशि जु प्रकाशित भारी ॥

प्रिया-जौन्ह में यौं मिलि गई तिहि छिन सहचरि संभ्रम भई ॥

कहत कि कहाँ-कहाँ हो लली। सौंधे के डोरे लगि चली ॥

दृष्टान्तर यौं श्री हरिवंश । मानसरोवर रस के हंस ॥

भँवर भँवरनी में दोउ चलें । श्री हित जू तिन सँग ही रलें ॥

सम्वत सोरह सैरु नव, आश्विन पूनौ मास ।

ता दिन श्री हित जग दृगन, कियौ अप्रगट विलास ॥

श्री हरिराम व्यास जी ने हिताचार्य के निकुंज गमन कर जाने के फलस्वरूप वृन्दावन के रसिक समाज की दुर्दशा और अपनी हार्दिक वेदना का वर्णन किया है –

हुतौ रस रसिकन कौ आधार ।

बिनु हरिवंशहि सरस रीति कौ कापै चलिहै भार ॥

को राधा दुलरावे गावै वचन सुनावै चार ।

वृन्दावन की सहज माधुरी कहिहै कौन उदार ॥

पद रचना अब कापै है है निरस भयौ संसार बड़ौ अभाग अनन्य सभा कौ उठिगौ ठाठ सिंगार ॥

जिन बिनु दिन छिन सत युग बीतत सहज रूप आगार ।

‘व्यास’ एक कुल कुमुद बन्धु बिनु उड़गन जूठौ थार ॥


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“निवृत निकुञ्ज की लीला”




गीताप्रेस गोरखपुर में पूज्य श्रीहरि बाबा महाराज की एक डायरी रखी है उसमें बाबा के द्वारा हस्तलिखित लेख है। उसमें उन्होंने अपने पूज्य गुरुदेव के जीवन की घटना लिखी है वृन्दावन की सेवा कुञ्ज की घटना है–
सेवा कुञ्ज में एक बार बाबा ने रात बिताई कि देखूँ तो सही क्या रास होता भी है ?
एक दिन रातभर रहे कुछ नही दिखा तो मन में यह नही आया की यह सब झूठ है।
दूसरे रात फिर बिताई मन्दिर बन्द होने पर लताओं मेंं छुप कर रात बिताई उस रात कुछ न के बराबर मध्यम-मध्यम सा अनुभव हुआ। एकदम न के बराबर उस दिव्य संगीत को सुना लेकिन उस संगीत की स्वर-लहरियों का ऐसा प्रताप हुआ की बाबा मूर्छित हो गये।
जब सुबह चेतना में आये तो सोचा कि अब दर्शन तो करना ही है ऐसा संकल्प ले लिया। बाबा ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर एक बार और प्रयास किया की देखूँ तो सही रास कैसा होता है ?
तीसरी रात श्रीहरिबाबा के पूज्य गुरुदेव लताओं के बीच कहीं छुप गये आधी रात तक उन्होंने लिखा कि कही कुछ दर्शन नही हुआ। परन्तु प्रतीक्षा में रहे। कहते है मध्य रात्रि होने पर निधिवन (सेवाकुञ्ज) में एक दिव्य सुगन्ध का प्रसार होने लगा ; एक अलौकिक सुगन्ध। अब बाबा सावधान हो गये समझ गये की लीला आरम्भ होने वाली है ; बाबा अब और सावधानी से बैठ गये।
कुछ समय बाद बाबा को कुछ धीरे-धीरे नूपुरों के झन्कार की आवाज आने लगी। छण-छण-छण बाबा को लगा कोई आ रहा है। तब बाबा और सावधान हो गये बाबा ने और मन को संभाला और गौर से देखने का प्रयास जब किया।
बाबा ने देखा की किशोरीजी-लालजी के कण्ठ में गलबहियाँ डालकर धीरे-धीरे एक-एक कदम बढ़ाकर सेवा कुञ्ज की लताओं के मध्य से आ रही हैं। बाबा तो देखकर आश्चर्यचकित हो गये।
बाबा और सम्भल गये और बाबा ने लिखा आज प्रियाजी को देखकर मन में बड़ा आश्चर्य हो रहा है आज प्रिया जी प्रत्येक लता के पास जाकर कुछ सूंघ रही थी।
लाला ने पूछा–‘हे किशोरीजी आप हर एक लता के पास क्या सूंघ रही हैं ? क्या आपको कोई सुगन्ध आ रही है ?’
श्रीकिशोरीजी ने कहा–‘लालजी आज हमें लगता है की हमारे आज इस निकुञ्ज वन में किसी मानव ने प्रवेश कर लिया है हमें किसी मानव की गन्ध आ रही है।’
इतना सब सुनकर बाबा की आँखों से झर-झर अश्रु बहने लगे। बाबा के मन में भाव आया कि सेवा कुञ्ज में प्रिया-प्रियतम विहार कर रहे है क्यों न जिस मार्ग पे ये जा रहे हैं उस मार्ग को थोड़ा सोहनी लगाकर स्वच्छ कर दूँ।
बाबा ने कल्पना कि नही-नही अरे अगर मार्ग को सोहनी से साफ किया तो मैने क्या सेवा की ? सेवा तो उस सोहनी ने की मैने कहाँ की तो फिर क्या करूँ ?
कल्पना करने लगे क्यों न इन पलकों से झाड़ू लगाने का प्रयास करूँ फिर ध्यान आया अगर इन पलकों से लगाऊँगा तो इन पलकों को श्रय मिलेगा आखिर फिर क्या करूँ ?
आँखों से अश्रु प्रवाह होने लगा कि मैं कैसे सेवा करूँ आज साक्षात प्रिया-प्रियतम का विहार चल रहा है मैं सेवा नही कर पा रहा कैसे सेवा करूँ ?
उसी क्षण प्रिया जी ने कहा–‘लालजी आज हमारे नित्यविहार का दर्शन करने के लिये कोई मानव प्रवेश कर गया है ? किसी मानव की गन्ध आ रही है।’
उधर तो बाबा की आँखों से अश्रु बह रहे थे, और इधर लालजी प्रियाजी के चरणों में बैठ गये लालजी का भी अश्रुपात होने लगा!
प्रियाजी ने पूछा–‘लालजी क्या बात है ? आपके अश्रु कैसे आने लगे ?’
श्रीजी के चरणो में बैठ गये श्यामसुन्दर नतमस्तक हो गये तब कहा–‘श्रीजी आप जैसी करुणामयी सरकार तो केवल आप ही हो सकती है। अरे! आप कहती हो की किसी मानव की गन्ध आ रही है!!
हे! श्रीजी जिस मानव की गन्ध आपने ले ली हो फिर वो मानव रहा कहाँ, उसे तो आपने अपनी सखी रूप में स्वीकार कर लिया।’
श्रीजी ने कहा–‘चलो फिर उस मानव की तरफ।’
बाबा कहते है–‘मैं तो आँख बन्द कर ध्यान समाधी में रो रहा हूँ कि कैसे सेवा करूँ? तभी दोनों युगल सामने प्रकट हो गये और बोले–‘कहे बाबा रास देखने ते आयो है ?’
न बाबा बोल पा रहे ; न कुछ कह पा रहे हो; अपलक निहार रहे हैं।
श्रीजी ने कहा–‘रास देखते के ताय तो सखी स्वरुप धारण करनो पड़ेगो। सखी बनैगो ?’ बाबा कुछ नही बोले।
करुणामयी सरकार ने कृपा करके अपने हाथ से अपनी प्रसादी ‘चन्द्रिका’ उनके मस्तक पर धारण करा दी।
इसके बाद बाबा ने अपने डायरी में लिखा, इसके बाद जो लीला मेंरे साथ हुई न वो वाणी का विषय था न वो कलम का विषय था।
यह सब स्वामीजी की कृपा से निवृत-निकुञ्ज की लीलायें प्राप्त होती है। स्वामीजी के रस प्राप्ति के लिये इन सात को पार करना होता है–

प्रथम सुने भागवत, भक्त मुख भगवत वाणी।
द्वितीय आराध्य ईश व्यास, नव भाँती बखानी।
तृतीय करे गुरु समझ, दक्ष्य सर्वज्ञ रसीलौ।
चौथे बने विरक्त, बसे वनराज वसीलौ।
पांचे भूले देह सुधि, तब छठे भावना रास की।
साते पावें रीति रस, श्री स्वामी हरिदास की॥

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रक्षा बंधन


रक्षाबन्धनः 12 अगस्त को मनाया जायेगा


सावन की चतुर्दशी तिथि 11 अगस्त 2022 को सुबह 10 बजकर 13 मिनट से प्रारंभ होगी और अगले दिन यानी 12 अगस्त को सुबह 7 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगी ।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूरब दिशा में और बहन का पश्चिम दिशा में होना चाहिए। सबसे पहले बहनें अपने भाई को रोली, अक्षत का टीका लगाएं। घी के दीपक से आरती उतारें, उसके बाद मिष्ठान खिलाकर भाई के दाहिने कलाई पर राखी बांधें।

(पौराणिक कथा)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि को सबसे पहले राखी बांधी थी। एक बार राजा बलि ने 100 यज्ञ पूरा करके स्वर्ग पर आधिपत्य का प्रयास किया, इससे इंद्र डर गए। वे भगवान विष्णु के पास गए और उनसे रक्षा का निवेदन किया। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया।
वे वामन अवतार में राजा बलि के पास गए और भिक्षा में तीन पग जमीन मांगी। बलि ने उनको तीन पग देने का वचन दिया। तब भगवान विष्णु ने दो पग में सारा भूलोक और ब्रह्मलोक नाप लिया। यह देखकर राजा बलि समझ गए कि यह वामन व्यक्ति कोई साधारण नहीं हो सकता है। उन्होंने अपना सिर आगे कर दिया। यह देखकर भगवान विष्णु राजा बलि से प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा। साथ ही बलि को पाताल लोक में रहने को कहा।
तब राजा बलि ने कहा कि हे प्रभु! पहले आप वचन दें कि जो वह मांगेंगे, वह आप उनको प्रदान करेंगे। उनसे छल न करेंगे। भगवान विष्णु ने उनको वचन दिया। तब बलि ने कहा कि वह पाताल लोक में तभी रहेंगे, जब आप उनके आंखों के सामने हमेशा प्रत्यक्ष रहेंगे। यह सुनकर विष्णु भगवान दुविधा में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि राजा बलि ने तो उनको वचन बन्धन में बाँध दिया।
अपने वचन में बंधे भगवान विष्णु भी पाताल लोक में राजा बलि के यहां रहने लगे। इधर माता लक्ष्मी विष्णु भगवान का इंतजार कर रही थीं। काफी समय बीतने के बाद भी नारायण नहीं आए। इसी बीच नारद जी ने बताया कि वे तो अपने दिए वचन के कारण राजा बलि के पास रह रहे हैं। माता लक्ष्मी ने नारद से उपाय पूछा, तो उन्होंने कहा कि आप राजा बलि को भाई बना लें और उनसे रक्षा का वचन लें।
तब माता लक्ष्मी ने एक महिला का रूप धारण किया और राजा बलि के पास गईं। रोती हुई महिला को देखकर बलि ने कारण पूछा। उन्होंने कहा कि उनका कोई भाई नहीं है। इस पर बलि ने उनको अपना धर्म बहन बनाने का प्रस्ताव दिया। जिस पर माता लक्ष्मी बलि को रक्षा सूत्र बांधीं और रक्षा का वचन लिया। दक्षिणा में उन्होंने बलि से भगवान विष्णु को मांग लिया।
इस प्रकार माता लक्ष्मी ने बलि को रक्षा सूत्र बांधकर भाई बनाया, साथ ही भगवान विष्णु को भी अपने दिए वचन से मुक्त करा लिया।

अन्य कथाए

इंद्र और शचि की कथा

रक्षाबंधन की शुरुआत को लेकर कई धार्मिक तथा पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन माना जाता है कि सबसे पहले राखी या रक्षासूत्र देवी शचि ने अपने पति इंद्र को बांधा था। पौरणिक कथा के अनुसार जब इंद्र वृत्तासुर से युद्ध करने जा रहे थे तो उनकी रक्षा की कामना से देवी शचि ने उनके हाथ में कलावा या मौली बांधी थी। तब से ही रक्षा बंधन की शुरूआत मानी जाती है।

भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कथा

महाभारत में प्रसंग आता है जब राजसूय यज्ञ के समय भगवान कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया तो उनका हाथ भी इसमें घायल हो गया। उसी क्षण द्रौपदी ने अपने साड़ी का एक सिरा कृष्ण जी की चोट पर बांधा दिया। भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को इसके बदले रक्षा का वचन दिया। इसी के परिणाम स्वरूप जब हस्तिनापुर की सभा में दुस्शासन द्रौपदी का चीर हरण कर रहा था तब भगवान कृष्ण ने उनका चीर बढ़ा कर द्रौपदी के मान की रक्षा की थी।

एक अन्य प्रसंग के अनुसार रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा अपने राज्य पर हमला करने की सूचना मिली। रानी ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजी। हुमायूं ने राखी की लाज रखी और बहादुरशाह के विरुद्ध युद्ध कर कर्मावती के राज्य की रक्षा की। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के शत्रु पुरू को राखी बांधकर अपना भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को नहीं मारने का वचन लिया। पुरू ने बहन को दिए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवन दान दिया।


राखी के मौके पर इन देवताओं को राखी बांधना होता है शुभ


रक्षा बंधन के दिन भाईयों को तो राखी बांधी ही जाती है लेक‍िन क्‍या आप जानते हैं क‍ि इस दिन देवताओं को भी राखी बांधने की पुरानी परंपरा है। सनातन धर्म के अनुसार रक्षाबंधन के द‍िन अगर भगवानों को राखी बांध दी जाए तो वर्षभर वह आपकी खुश‍ियों और मान-सम्‍मान की रक्षा करते हैं। साथ ही जीवन में आने वाले संकट और परेशान‍ियां भी दूर करते हैं। आइए जानते हैं क‍ि रक्षाबंधन के द‍िन क‍िन भगवानों को और कौन से रंग का रक्षासूत्र बांधना चाह‍िए?

गणपत‍ि बप्‍पा को प्रथम पूज्‍य माना गया है इसल‍िए राखी के द‍िन सर्वप्रथम गणेशजी को राखी बांधनी चाह‍िए। लेक‍िन ध्‍यान रखें क‍ि गणपत‍ि को लाल रंग की ही राखी बांधें। मान्‍यता है क‍ि ऐसा करने से लाइफ की सारी टेंशन और प्रॉब्‍लम्‍स खत्‍म हो जाती हैं। साथ ही जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

राखी का पर्व सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और यह सावन का अंत‍िम द‍िन होता है। इसल‍िए इस द‍िन भोलेनाथ को राखी जरूर बांधनी चाह‍िए। मान्‍यता है क‍ि इस द‍िन श‍िवजी को नीले रंग का रक्षासूत्र बांधने से जीवन की सारी समस्‍याएं दूर हो जाती हैं और सुख-सम्पन्नता वास होता है।

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार राखी बांधने की परंपरा द्रौपदी के कन्‍हैया को रक्षासूत्र बांधने से ही हुई थी। कन्‍हैयाजी द्रौपदी को अपनी बहन मानते थे और उनकी रक्षा का वचन भी दिया था। कथा के अनुसार चीरहरण के समय भगवान कृष्ण ने चीर बढ़ाकर द्रौपदी के मान-सम्‍मान की रक्षा की थी। मान्‍यता है क‍ि श्रीकृष्‍ण को हरे रंग की राखी बांधने से वह जीवन की सारे दु:ख दूर कर देते हैं।

हनुमानजी को राखी जरूर बांधनी चाह‍िए। मान्‍यता है क‍ि पवनपुत्र को राखी बांधने से मंगल दोष दूर होते हैं और बल-बुद्धि की प्राप्ति होती है। लेक‍िन ध्‍यान रखें क‍ि हनुमानजी को लाल रंग अत्‍यंत प्र‍िय है इसल‍िए उन्‍हें लाल रंग या फ‍िर स‍िंदूरी रंग का रक्षासूत्र बांधना चाह‍िए। इससे संकटमोचक अत‍िशीघ्र प्रसन्‍न होते हैं।

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श्रीकृष्ण जन्मभूमि

आजसे लगभग ५२०४ वर्ष पहले वर्तमान द्वापरयुगके अन्तमें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी महाअत्याचारी कंसके कारागारमें पिता श्रीवसुदेवजी एवं माता देवकीजीके पुत्रके रूपमें आविर्भूत हुये थे। उस समय वसुदेव एवं देवकीने चतुर्भुज स्वरूपमें उनका दर्शन किया। चारों हाथोंमें क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए, वक्षस्थलपर श्रीवत्स चिह्न, गलेमें कौस्तुभ मणि तथा मेघ श्यामल कान्तियुक्त अद्भुत दिव्य बालकको देखकर वे दोनों उनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति एवं प्रार्थनासे भगवानने शिशुरूप धारण कर लिया तथा भगवानकी प्रेरणासे ही वसुदेवजी नवजात शिशुको गोदीमें उठाकर गोकुल महावन स्थित नन्दभवनमें रखनेके लिए चल पड़े। कारागारसे निकलते समय उनके हाथोंकी हथकड़ियाँ, पैरोंकी बेड़ियाँ, लोहे के कपाट स्वतः ही खुल गये । प्रहरी सो गये। रिमझिम वर्षा भी होने लगी। सारा मार्ग साफ हो गया। उफनती यमुनाको पारकर वसुदेवजी गोकुल नन्दभवनमें पहुँचे। वहाँ नन्दभवनमें यशोदाजीके गर्भसे द्विभुज श्यामसुन्दर और कुछ क्षण पश्चात् ही एक बालिका भी ( योगमाया) पैदा हुई थी। यशोदा प्रसव पीड़ासे कुछ अचेतन सी थी। वसुदेवजीके गृहमें प्रवेश करते ही द्विभुज कृष्णने वसुदेव पुत्रको आत्मसात् कर लिया। वसुदेवजी इस रहस्यको समझ नहीं पाये। कन्याको गोदमें लेकर चुपकेसे पुनः कंस कारागारमें लौट आये। पहलेकी भाँति कारागारके लौह कपाट बंद हो गये। वसुदेव और देवकीके हाथोंकी हथकड़ियाँ और पैरोंकी बेड़ियाँ पूर्ववत् लग गई। उसी रातमें कंसको पता लगते ही वह पागल सा विक्षिप्त हुआ हाथमें तलवार लेकर कारागारमें उपस्थित हुआ । उसने बहन देवकीके हाथोंसे कन्याको छीन लिया और कन्याके दोनों पैरोंको पकड़कर पृथ्वीपर पटक कर मारना चाहा, किन्तु कन्या अष्टभुजावाली दुर्गाका रूप धारणकर कंसको दुत्कारते हुए आकाश मार्गमें अन्तर्ध्यान हो गई।

श्रीकृष्णकी इस जन्मभूमिपर सर्वप्रथम श्रीकृष्णके प्रपीष श्रीवजनाभजीने एक विशाल मंदिरकी स्थापना की थी। कालान्तरमें उसी स्थानपर भारतके धार्मिक राजाओंने बड़े विशाल- विशाल मंदिरोंका क्रमशः निर्माण कराया। जिस समय श्रीचैतन्य महाप्रभु जन्म भूमिमें पधारे थे, उस समय वहाँ एक विशाल मंदिर था । श्रीमन् महाप्रभुके भावपूर्ण मधुर नृत्य और कीर्त्तनको देख सुनकर उस मंदिरमें लाखों लोगोंकी भीड़ एकत्र हो गई। नृत्य-कीर्त्तन करते हुए श्रीमन् महाप्रभुजीके भावोंको देख दर्शकगण भाव विभोर हो गये।

यहीं पर श्रीचैतन्य महाप्रभुजीने बंगालके सुबुद्धिराय नामक राजाको आत्महत्या से बचाकर उन्हें परम भगवद्भक्त बना दिया। सुबुद्धिरायको बंगालके धर्मान्ध मुस्लिम शासकके द्वारा बलपूर्वक जातिभ्रष्ट किया गया था। वह पुनः हिन्दू बनना चाहता था, किन्तु उस समयके कट्टर हिन्दू पुरोहितों एवं व्यवस्थापकोंके निर्देशानुसार मृत्युसे पूर्व हिन्दू धर्ममें पुनः प्रवेश करनेके लिए कोई भी मार्ग शेष नहीं था। परन्तु करुणासागर श्रीचैतन्य महाप्रभुने एक बार श्रीकृष्णनामका उच्चारण करा कर उसे शुद्ध कर दिया तथा जीवन भर हरिनाम सङ्कीर्तन एवं वैष्णवोंकी सेवा करते रहनेका उपदेश प्रदानकर उसे कृतार्थ कर दिया। श्रीमन् महाप्रभुका ब्रज आगमन मुगल सम्राट हुमायूँके राजत्व काल में श्रीमन् महाप्रभुका ब्रज आगमन मुगल सम्राट हुमायूँके राजत्व कालमें हुआ। तत्पश्चात् यवनोंके द्वारा वह मंदिर ध्वंस कर दिये जानेके बाद ओरछाके महाराज वीरसिंह देवने १६१० ई. में तैंतीस लाख रुपया लगाकर आदिकेशवका बहुत विशाल श्रीमंदिर बनवाया। किन्तु, धर्मान्ध औरंगजेबने १६६९ ई. में उसे ध्वंस कर उसके बाहरी स्वरूपमें कुछ परिवर्तनकर उसे मस्जिदके रूपमें परिवर्तित कर दिया श्री आदिकेशवनीके पुजारियोंने प्राचीन विग्रहको जिला कानपुरमें स्थित राजधान नामक ग्राममें वर्तमान ईटावा शहरसे सतरह मील दूर छिपा दिया। आज भी वह विग्रह वहीं छोटेसे मंदिरमें स्थित है। किन्तु इनका विजय विग्रह वर्तमान जन्मस्थानके पीछे मल्लपुरा नामक स्थानमें आदिकेशव मन्दिरमें आज भी सेवित हो रहा है। उस श्रीविग्रहकी विशेषता यह है कि उसमें भगवान्‌के चौब्बीस अवतारोंकी मूर्त्तियाँ अङ्कित हैं। आदिकेशव कहे जानेसे वैष्णव भक्त लोग इसी मन्दिरमें दर्शन करते हैं। आजकल प्राचीन जन्मस्थानपर श्रीमदनमोहन मालवीय द्वारा संग्रहीत केशव कटरेपर एक विशाल श्रीमंदिरका निर्माण हुआ है। गीताप्रेस गोरखपुरके स्वर्गीय श्रीहनुमान प्रसाद पोद्दारजीकी प्रेरणा और श्रीडालमियाजी आदि सेठोंके प्रयाससे इस मंदिरका निर्माण हुआ। जन्मभूमि मथुराके मल्लपुरा मौहल्लेमें स्थित है। महाराज कंसके चाणूर आदि मल्ल इसी स्थानके निकटमें ही रहते थे। पासमें पोतरा नामक विशाल कुण्ड है। यह पहले कंस कारागारके अंदर ही स्थित था, जिसमें श्रीवसुदेव देवकीजी स्नान करते तथा अपने वस्त्रोंको धोते थे। कहा जाता है कि पुत्रोंके उत्पन्न होनेपर देवकीजीके वस्त्र इसीमें साफ किये जाते थे। पवित्रा कुण्डसे अपभ्रंश रूपमें इसका नाम पोतरा कुण्ड हुआ है।

पोतरा कुंड
प्रवेश द्वार
भव्य मंदिर
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“श्री नारायणदास भक्तमाली (मामा जी)”

“श्री नारायणदास भक्तमाली (मामा जी)”
मामाजी महाराज का जन्म बक्सर जिले के अंतर्गत बक्सर प्रखंड के पाण्डेयपट्टी ग्राम में एक चतुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में अश्विन कृष्ण षष्ठी संवत् 1990 तदनुसार दिन रविवार “10 सितम्बर 1933 ई.” को हुआ था।
इनके दादाजी का नाम मेघवर्ण चतुर्वेदी था, जो प्यार से मामाजी महाराज को मन्नाजी कह कर पुकारते थे। इनके पिताजी का नाम मधुसुधन चतुर्वेदी था, जो बहुत बड़े कर्मकांडी एवं ज्योतिषी में पारंगत थे। इनकी माताजी का नाम श्रीमती रामा देवी था, जो बिल्कुल संत ह्रदय, ममता की मूरत, कुशल गृहिणी थी।
मामाजी महाराज के माता पिता ने इनका शुभ नाम “श्रीमन्ननारायण चतुर्वेदी” रखा था। जो प्यार से “नारायण” जी भी कह कर पुकारा करते थे। मामाजी महाराज की प्रारंभिक शिक्षा बक्सर से ही संपन्न हुई तथा उच्च शिक्षा आरा तथा रांची से वाणिज्य विभाग से स्नातक की शिक्षा संपन्न हुई। बचपन से ही भगवद् गीता के प्रति झुकाव था, तथा प्रभु श्री राम में अनन्य भक्ति थी। धीरे-धीरे समय बीतता गया और 1952 ई. में मामाजी महाराज ने किसी शासकीय सेवा में पदाधिकारी के तौर पर नियुक्ति हुई। शासकीय पद पर तैनात रहने के दौरान आरा में पहली बार “महर्षि खाकी बाबा सरकार” के किसी कार्यक्रम में दर्शन का सौभाग्य मिला, दर्शन के उपरान्त मामाजी महाराज, खाकी बाबा से इतने प्रभावित हुए की 1955 ई. में ही शासकीय पदाधिकारी की सेवा त्याग कर तथा पद से इस्तीफा देकर “श्री खाकी बाबा सरकार” से दीक्षा लेकर उनका शिष्य बन गए, तथा उनके साथ रहने लगे। बाद में संत शिरोमणि स्वामी श्री रामचरण दास जी “श्री फलाहारी बाबा” के संपर्क में आए तथा उनकी खूब निष्ठा-भाव से सेवा की, इससे “श्री फलाहारी बाबा” ने प्रसन्न होकर मामाजी महाराज को “श्री नारायण दास” की उपाधि से विभूषित किया।
युगल सरकार की नित्य लीला स्थली श्रीधाम वृन्दावन में मामाजी ने साधना करने हुए श्रीधाम वृन्दावन में निवास करने लगे। वही साधना करते हुए सुदामाकुटीर में इन्हें भक्तमाल के रसज्ञ, मर्मज्ञ, “पं. श्री जगरनाथप्रसाद भक्तमाल” जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। जिनसे इन्होंने संत शिरोमणि “नाभादास” जी द्वारा रचित भक्तमाल का अध्ययन किया। संत सेवा तथा संतो के आशीर्वाद से भागवत कथा भी कहने लगे, तथा सरस कथा व्यास हुए। बिना भाव के व्यक्ति कितना भी ज्ञानी हो, उसकी अभिव्यक्ति में मधुरता नहीं आ पाती है। युगल सरकार के प्रति भक्तिभाव तथा जगजननी माँ सीताजी जनकपुर की उपासना से भक्ति रस में आकंठ डूब गए, तथा कथा के माध्यम से भक्ति के मधुर रस का वितरण करने लगे। बिहार के होने के नाते तथा श्री सीता माँ का मिथिलांचल का होने के नाते श्री सीता माँ को वो इस भक्ति भाव में कब बहन मानने लगे कुछ पता नहीं चला। सीताजी को अपनी बहन मानने के नाते प्रभु श्री राम को अपना बहनोई मानने लगे। इसी रिश्ते के कारण आगे चलकर “मामाजी” महाराज के नाम से विश्वविख्यात हुए।
मामाजी महाराज ने अनेकों नाटकों, पुस्तकों, दोहों, कविताओं की रचना की। जिसमें प्रमुखता से उनकी विश्वविख्यात भोजपुरी कविता जो प्रभु श्री राम को “पाहुन” कह गाए थे :-
“ए पहुना अब मिथिले में रहु ना,
जवने सुख बा ससुरारी में, तवने सुख कहू ना,,
ए पहुना अब मिथिले में रहु ना।…”
अद्भुत क्षमता थी मामाजी महाराज की लेखनी में, साथ ही उन्हें अंग्रेजी भाषा का भी बहुत ज्ञान था उन्होंने अंग्रेजी में भी टी शब्द से सैकड़ो वाक्य एक कविता के माध्यम से लिख डाले थे :-
“जगत में कोई ना परमानेन्ट, जगत में प्रभु ही परमानेंट…”
इस कविता में अंतिम शब्द में सैकड़ो बार टी शब्द का प्रयोग अलग-अलग वाक्यों का प्रयोग कर प्रमुखता से मामा जी द्वारा किया गया था।
भाषा का ज्ञान मामा जी महाराज के अंदर कूट-कूट कर भरा था, संस्कृत हो, हिंदी हो, अंग्रेजी हो, सही शब्द का सही प्रयोग मामाजी की लेखनी की महानतम श्रेणी को दर्शाता था। “मामाजी महराज” तथा उनके परम प्रिय गुरु महाराज “महर्षि खाकी बाबा सरकार” के प्रयासों के बदौलत आज भी बक्सर में “श्री सिय पिय मिलन महामहोत्सव” का कार्यक्रम हर वर्ष नवम्बर-दिसम्बर महीनें में होता है।
भक्तमाल रसज्ञ, मर्मज्ञ “पं. श्री जगरन्नाथप्रसाद जी भक्तमाली” की प्रथम पुण्यतिथि पर आयोजित “प्रिया प्रीतम मिलन महोत्सव” में पधारे जगतगुरु “श्री निम्बकाचार्य जी महाराज” ने “श्री मामाजी” महाराज के अंदर “जगरन्नाथप्रसाद भक्तमाल” जी के प्रति भाव देखकर उन्हें “पं. श्री जगरन्नाथप्रसाद भक्तमाल” जी का उत्तराधिकारी घोषित कर उन्हें “भक्तमाली” की उपाधि से विभूषित किया। इस तरह से मामाजी महाराज का पूरा नाम ” श्री नारायण दास भक्तमाली जी” हुआ।
ऐसी अद्भुत भाव, अभिव्यक्ति के स्वामी होते हुए भी मामाजी महाराज अत्यंत विनयशील, निराभिमानी एवं सरल थे, अतिथि सत्कार उनकी सबसे बड़ी विशेषता रही थी। जो मानव एक बार परम पूज्य मामाजी महाराज का सान्निध्य का सुख पा लेता था, वह सदा के लिए उनका हो जाता था। हमेशा अपनी कथा के माध्यम से मामाजी ने सदा जीवन उच्च विचार जीवन जीने की कथा अपने भक्तों श्रोताओं के बीच कहा करते थे, जिससे भक्त तथा श्रोता जीवन जीने की कला सीखते थे। ऐसे सरस कथा अपनी मधुर वाणी से कहते थे की श्रोता जीवन जीने की इच्छा छोड़ कर बाकी बची जीवन की अभिलाषा भगवत भजन में लगाने लगते थे। मामाजी महाराज को दूसरे साधु, महात्माओं द्वारा उन्हें संतो की वाणी, भक्तों के चरित्र तथा मार्ग खोजने वाला व्यक्ति कहा गया है।
अचानक एक ऐसा दिन आया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, इस महान पुण्यात्मा की मृत्यु 75 वर्ष की आयु में एक सड़क दुर्घटना में अपने कृपा पात्र शिष्य श्री लक्ष्मणशरण दास जी तथा श्री ओम प्रकाश जी सहित 24 फरवरी 2008 में हो गई।
इस घटना से पूरे बक्सर सहित बिहार की जनता में शोक की लहर दौड़ गई, उनके अंतिम दर्शन को देश, विदेश से उनके अनेक शिष्यों भक्तों के साथ-साथ बक्सर की लाखों लाख जनता सड़को पर अपने बक्सर के गौरव की एक झलक देखने के लिए उमड़ पड़ी। सबकी आँखों में आश्रु भरे पड़े थे, सब नियति को दोष दे रहे थे, सबके अंदर उस दिन भगवान् की आस्था के प्रति गुस्सा का भाव था। किसी तरह भक्तों को समझा बुझाकर तथा मामाजी द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने की संकल्प के साथ “मामाजी” का अंतिम संस्कार हुआ।
पूज्य मामाजी द्वारा रचित कविता, दोहे, कहानी, नाटक, ग्रन्थ, श्लोक इत्यादि मामाजी महाराज से हमलोगों को दूर कभी नहीं होने देती हैं। साथ ही आपके द्वारा शुरू किया हुआ “श्री सिय पिय मिलन महामहोत्सव” में एक बार ऐसा लगता है हर साल आपके दर्शन हो जाते हैं।
आज भी मामाजी महाराज का आश्रम बक्सर नई बाजार में स्थित है, दर्शन की अभिलाषा लिए आए हुए भक्त यहाँ जाकर मामाजी के प्रति-मूर्ति के दर्शन कर उनकी यादों को जी सकते है। बक्सर वासी अपने आपको धन्य समझते हैं कि मामाजी जैसे महान सन्त ने बक्सर की धरती पर जन्म लेकर बक्सर का मान पूरे देश में बढ़ाया है। आप सदैव बक्सर के मनुष्य रूपी जीवों के दिलों में जिन्दा रहेंगे।
श्री नारायण दास भक्तमालि मामा जी महाराज की जय।
“जय जय श्री राधे”

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भोली गोपी का कमाल


वृंदावन की एक गोपी रोज दूध दही बेचने मथुरा जाती थी,एक दिन व्रज में एक संत आये,गोपी भी कथा सुनने गई,संत कथा में कह रहे थे,भगवान के नाम की बड़ी महिमा है,नाम से बड़े बड़े संकट भी टल जाते है.नाम तो भव सागर से तारने वाला है,यदि भव सागर से पार होना है तो भगवान का नाम कभी मत छोडना.

कथा समाप्त हुई गोपी अगले दिन फिर दूध दही बेचने चली, बीच में यमुना जी थी. गोपी को संत की बात याद आई,संत ने कहा था भगवान का नाम तो भवसागर से पार लगाने वाला है,जिस भगवान का नाम भवसागर से पार लगा सकता है तो क्या उन्ही भगवान का नाम मुझे इस साधारण सी नदी से पार नहीं लगा सकता? ऐसा सोचकर गोपी ने मन में भगवान के नाम का आश्रय लिया भोली भाली गोपी यमुना जी की ओर आगे बढ़ गई.

अब जैसे ही यमुना जी में पैर रखा तो लगा मानो जमीन पर चल रही है और ऐसे ही सारी नदी पार कर गई,पार पहुँचकर बड़ी प्रसन्न हुई,और मन में सोचने लगी कि संत ने तो ये तो बड़ा अच्छा तरीका बताया पार जाने का,रोज-रोज नाविक को भी पैसे नहीं देने पड़ेगे.

एक दिन गोपी ने सोचा कि संत ने मेरा इतना भला किया मुझे उन्हें खाने पर बुलाना चाहिये,अगले दिन गोपी जब दही बेचने गई,तब संत से घर में भोजन करने को कहा संत तैयार हो गए,अब बीच में फिर यमुना नदी आई.संत नाविक को बुलाने लगा तो गोपी बोली बाबा नाविक को क्यों बुला रहे है.हम ऐसे ही यमुना जी में चलेगे.

संत बोले – गोपी! कैसी बात करती हो,यमुना जी को ऐसे ही कैसे पार करेगे ?

गोपी बोली – बाबा! आप ने ही तो रास्ता बताया था,आपने कथा में कहा था कि भगवान के नाम का आश्रय लेकर भवसागर से पार हो सकते है. तो मैंने सोचा जब भव सागर से पार हो सकते है तो यमुना जी से पार क्यों नहीं हो सकते? और मै ऐसा ही करने लगी,इसलिए मुझे अब नाव की जरुरत नहीं पड़ती.

संत को विश्वास नहीं हुआ बोले – गोपी तू ही पहले चल! मै तुम्हारे पीछे पीछे आता हूँ,गोपी ने भगवान के नाम का आश्रय लिया और जिस प्रकार रोज जाती थी वैसे ही यमुना जी को पार कर गई.

अब जैसे ही संत ने यमुना जी में पैर रखा तो झपाक से पानी में गिर गए,संत को बड़ा आश्चर्य,अब गोपी ने जब देखा तो कि संत तो पानी में गिर गए है तब गोपी वापस आई है और संत का हाथ पकड़कर जब चलि है तो संत भी गोपी की भांति ही ऐसे चले जैसे जमीन पर चल रहे हो.

संत तो गोपी के चरणों में गिर पड़े,और बोले – कि गोपी तू धन्य है! वास्तव में तो सही अर्थो में नाम का आश्रय तो तुमने लिया है और मै जिसने नाम की महिमा बताई तो सही पर स्वयं नाम का आश्रय नहीं लिया.

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राधा तत्व का वर्णन शास्त्रो मे क्यों नही है?

प्र० महाराज जी ! जब हम शास्त्रों को पढ़ते हैं तो उसमें भगवत्तत्व, जीव-तत्त्व, माया – तत्त्व, भक्ति-तत्त्व आदि का तो स्पष्ट वर्णन मिलता है, परन्तु जिस राधा-तत्त्व की आप व्याख्या करते हैं, उसका वर्णन स्पष्ट रूप से शास्त्रों में नहीं मिलता, ऐसा क्यों?

समाधान : सबका सार है प्रेम और घनीभूत प्रेम का मूर्तिमान् स्वरुप हैं – ‘श्रीलाड़िलीजू; ‘सान्द्रानन्दामृतरसघनप्रेममूर्तिः किशोरी ।’
जैसे राजा का सारा वैभव (राज-काज आदि ) शास्त्रों में वर्णित होता है, लेकिन महारानी का वैभव ये प्रकट में वर्णित नहीं होता है क्योंकि वह राजा के हृदय की गुप्त बात है राजा जिसे पर्सनल मान लेता है उसे ही महल का रहस्य बताता है ये और यहाँ की अधीश्वरी श्रीराधा हैं, ‘जाके अधीन सदा ही साँवरो या ब्रज को सिरताज’, श्रीहरिवंशमहाप्रभुजी कह रहे हैं – वृन्दावन निजमहल है
जो रस नेति नेति श्रुति भाख्यो ।
ताको तैं अधरसुधारस चाख्यो ॥
श्रीकिशोरीजू श्रीलाल जू के हृदय का मूर्तिमान आह्लाद, मूर्तिमान प्रेम हैं तो हृदय की बात तो उसी को बताई जाती है जो पर्सनल होता है । इसीलिये आगम निगम अगोचर बात है किशोरी जू की । आगम-निगमादि ने जिसे नहीं देखा ‘नेति-नेति’ कहकर जिसे सम्बोधित किया वो परमतत्त्व वृन्दावन के रसिकाचार्यों ने अनुभव किया । श्रीहरिवंशमहाप्रभु जी लिखते हैं –

यद्वृन्दावनमात्रगोचरमहो यन्न श्रुतीकं शिरो
प्यारोढुं क्षमते न यच्छिवशुकादीनां तु यद्-ध्यानगम् ॥ (रा.सु.नि ७६)

‘जो केवल वृन्दावन में ही गोचर है, जिस तक श्रुति शिरोभाग (वेदान्त) भी पहुँचने में समर्थ नहीं है तथा जो शिव शुकादि के भी ध्यान में नहीं आता वो है ‘राधा-तत्त्व’ ।
‘ अलक्ष्यं राधाख्यं निखिलनिगमैरप्यतितरां
रसाम्भोधेः सारं किमपि सुकुमारं विजयते ॥ (रा.सु.नि. ५१)

‘जो समस्त आगम-निगम समुदाय से भी अलक्षित है, रससागर के सार उस किसी अनिर्वचनीय श्रीराधानामक सुकुमारतत्त्वकी जय हो।’

श्रीराधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्य सद्वैभवे (रा.सु.नि. २६९)

‘श्रुतियों, बुधजनों तथा भगवान् के द्वारा भी अन्वेषणीय है – श्रीकिशोरीजू का श्रेष्ठ वैभव ।’

अतः यह वृन्दावन का गूढ़ रहस्य है, ये किसी शास्त्र में लिखा नहीं मिलेगा, ये तो केवल सहचरी भावापत्र रसिकाचार्यों की वाणियों से ही उनके शरणागत होने पर जाना जा सकता है, तभी तो श्रीभगवतरसिकजी को कहना पड़ा
‘भगवत रसिक रसिक की बातें, रसिक बिना कोऊ समुझि सकै न ।

ज्यादा-से-ज्यादा पुराणों ने इतना ही वर्णन किया कि श्रीकृष्ण ‘शक्तिमान’ हैं और श्रीराधा एक ‘शक्ति’ हैं, बस इतना ही शास्त्र समझ पाए, इससे आगे ये नहीं समझ पाए कि वो शक्तिमान श्रीकिशोरीज के प्रति कैसे आसक्त चित्त हैं और पूर्ण रूप से उनके अधीन हैं। ये तो यहाँ के रसिक जन ही देख पाए

जै श्रीहित हरिवंश प्रताप रूप-गुन, वय बल श्याम उजागर
जाकी भ्रूविलास बस पशुरिव, दिन विथकित रस-सागर ॥ (श्रीहितचतुरासी ५२)

श्रीहिताचार्य कह रहे हैं कि जो श्यामसुन्दर प्रताप, रूप, गुण, वय और बल के लिए प्रसिद्ध हैं, वे रससिन्धु श्रीलालजू श्रीराधा के भृकुटि – विलास के वशीभूत होकर पशु की भाँति लाचार बने रहते हैं। इसी तरह से श्रीस्वामीहरिदासजी महाराज केलिमालजी में कहते हैं..

श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी चरन लपटाने दुहूँन री ॥ ४९॥
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी रीझि रीझि पग परनि ॥ ५० ॥

ये जो श्यामा-श्याम की एकान्तिक नवनिभृत निकुँज की रसमयी क्रीड़ाएँ हैं, सहचरी भावापन्न महापुरुषजन एकान्त में जिनके चिन्तन में निमग्न रहते हैं – ये लीलाएँ वेदों के द्वारा भी अलक्षित हैं इसी कारण ‘राधा – तत्त्व’ का स्पष्ट वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता है ।

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“झूलन लीला”

श्रावण का प्रिय मास है। आकाश में काली घटाएँ छायी हुयी हैं। बिजली कड़क रही है। बादल भी जोर-जोर से गर्जना कर रहे हैं। रिमझिम फुहारों की शीतलता शरीर को आनन्दित कर रही हैं। चम्पा, चमेली, मोगरा, मालती आदि पुष्पों की सुगन्ध हवा में फैली हुयी है। कोयल कुहू कुहू की मीठी तान छेड़ रही हैं। सरोवरों में हंस अठखेलियाँ कर रहे है। दादुर, मोर, पपीहे की आवाजों से सारा ब्रज क्षेत्र आनन्दित हो रहा है।
ऐसे सुखद वातावरण में ललिता सखी ने अपनी अन्य सखियों–विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा, सुदेवी, चम्पकलता, रंगदेवी और तुंगविद्या आदि को बुला लिया। आज के सुहावने मौसम को और भी अधिक मधुर बनाने के लिये ये सखियाँ अपने वाद्य-यन्त्र भी साथ लायी हैं। वन में जाकर जब सखियों ने देखा कि कृष्ण अकेले ही कदम्ब वृक्ष के नीचे वंशी वादन कर रहे हैं तो वे तुरन्त ही बृषभानु भवन जा पहुँची और श्रीराधाजी को वन में ले जाने के लिये कहने लगीं। सखियों ने श्रीराधाजी को कुसुंभी रंग की साड़ी पहनायी और नख से सिर तक उनका फूलों से श्रृंगार किया और चल पड़ी अपने प्रियतम स्याम सुंदर से मिलने। जैसे कोई नदी सागर में मिलने को आतुर होती है उसी प्रकार श्रीराधा अपने प्रियतम स्याम सुंदर के अंक में समा जाने को आतर हो रही थीं।
रिमझिम बरसती फुहारों के बीच इन सखियों ने यमुना तट के पास के कुँज में एक दिव्य झूले का निर्माण किया। सखियों के आमन्त्रण पर श्रीराधा कृष्ण उस झूले पर विराजमान हो गये। ढोल, मृदंग आदि की थाप पर सखियाँ श्रीराधा कृष्ण को झूला झुलाने लगीं।
श्रीराधा माधव की इस माधुरी लीला से सारा वन क्षेत्र जीवन्त हो उठा। कोयल कूकने लगीं, मयूर नृत्य करने लगे, हिरन कुलाँचे मारने लगे। जिसने भी इस दिव्य आनन्द का दर्शन किया उसका जीवन धन्य हो गया।

हिंडोरे झूलत स्यामा-स्याम।
नव नट-नागर, नवल नागरी, सुंदर सुषमा-धाम।।
सावन मास घटा घन छाई, रिमझिम बरसत मेह।
दामिनी दमकत, चमकत गोरी बढ़त नित्य नव नेह।
हँसत-हँसावत रस बरसावत सखी-सहचरी-बृंद।
उमग्यौ आनँद-सिंन्धु, मगन भए दोऊ आनँद-कंद।।
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रमणीय टटिया स्थान

श्री कुंज बिहारी श्री हरीदास
रमणीय टटिया स्थान, वृंदावन: (Ramaniy Tatiya Sthan Vrindavan) आइए जानिए हमारे गुरु स्थान के बारे में-

स्थान: श्री रंग जी मंदिर के दाहिने हाथ यमुना जी के जाने वाली पक्की सड़क के आखिर में ही यह रमणीय टटिया स्थान है। विशाल भूखंड पर फैला हुआ है।
किन्तु कोई दीवार, पत्थरो की घेराबंदी नहीं है केवल बांस की खपच्चियाँ या टटियाओ से घिरा हुआ है इसलिए तटिया स्थान के नाम से प्रसिद्ध है। यह संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदास जी महाराज की तपोस्थली है।

यह एक ऐसा स्थल है जहाँ के हर वृक्ष और पत्तों में भक्तो ने राधा कृष्ण की अनुभूति की है, संत कृपा से राधा नाम पत्ती पर उभरा हुआ देखा है।

स्थापना: स्वामी श्री हरिदास जी की शिष्य परंपरा के सातवे आचार्य श्री ललित किशोरी जी ने इस भूमि को अपनी भजन स्थली बनाया था। उनके शिष्य महंत श्री ललितमोहनदास जी ने सं १८२३ में इस स्थान पर ठाकुर श्री मोहिनी बिहारी जी को प्रतिष्ठित किया था।

तभी चारो ओर बांस की तटिया लगायी गई थी तभी से यहाँ के सेवा पुजाधिकारी विरक्त साधू ही चले आ रहे है.उनकी विशेष वेशभूषा भी है।
विग्रह: श्रीमोहिनी बिहारी जी का श्री विग्रह प्रतिष्ठित है।

मंदिर का अनोखा नियम…
ऐसा सुना जाता है कि श्री ललितमोहिनिदास जी के समय इस स्थान का यह नियम था कि जो भी आटा-दाल-घी दूध भेट में आवे उसे उसी दिन ही ठाकुर भोग और साधू सेवा में लगाया जाता है।

संध्या के समय के बाद सबके बर्तन खाली करके धो माज के उलटे करके रख दिए जाते है,कभी भी यहाँ अन्न सामग्री की कमी ना रहती थी।

एक बार दिल्ली के यवन शासक ने जब यह नियम सुना तो परीक्षा के लिए अपने एक हिंदू कर्मचारी के हाथ एक पोटली में सच्चे मोती भर कर सेवा के लिए संध्या के बाद रात को भेजे।

श्री महंत जी बोले: वाह खूब समय पर आप भेट लाये है। महंत जी ने तुरंत उन्हें खरल में पिसवाया ओर पान बीडी में भरकर श्री ठाकुर जी को भोग में अर्पण कर दिया कल के लिए कुछ नहीं रखा।

ऐसे संग्रह रहित विरक्त थे श्री महंत जी।
उनका यह भी नियम था कि चाहे कितने मिष्ठान व्यंजन पकवान भोग लगे स्वयं उनमें से प्रसाद रूप में कणिका मात्र ग्रहण करते सब पदार्थ संत सेवा में लगा देते ओर स्वयं मधुकरी करते।
आज भी स्थान पर पुरानी परंपराओं का निर्वाहन किया जाता है जैसे की मिट्टी के दीपकों से उजाला किया जाता है किसी भी प्रकार से मन्दिर की सेवा में विद्युत का प्रयोग नही किया जाता है रागों के द्वार ही मोहिनी बिहारी जू को प्रसाद पवाया जाता है जगाया जाता है शयन कराया जाता है ।

मंदिर में विशेष प्रसाद:
इस स्थान के महंत पदासीन महानुभाव अपने स्थान से बाहर कही भी नहीं जाते स्वामी हरिदास जी के आविर्भाव दिवस श्री राधाष्टमी के दिन यहाँ स्थानीय ओर आगुन्तक भक्तो कि विशाल भीड़ लगती है। आज भी इस स्थान पर प्रतिदिन दर्शन करने हेतु पधारे सभी भक्तों एवं संतो के लिए गौ माता के शुद्ध घी में प्रसाद पवाया जाता है

श्री स्वामी जी के कडुवा ओर दंड के उस दिन सबको दर्शन लाभ होते है।
उस दिन विशेष प्रकार कि स्वादिष्ट अरबी का भोग लगता है ओर बटता है। जो दही ओर घी में विशेष प्रक्रिया से तैयार की जाती है यहाँ का अरबी प्रसाद प्रसिद्ध है। इसे सखी संप्रदाय का प्रमुख स्थान माना जाता है।

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“लालिहारण लीला”

एक समय की बात है, जब किशोरी जी को यह पता चला कि कृष्ण पूरे गोकुल में माखन चोर कहलाता है तो उन्हें बहुत बुरा लगा उन्होंने कृष्ण को चोरी छोड़ देने का बहुत आग्रह किया। पर जब ठाकुर अपनी माँ की नहीं सुनते तो अपनी प्रियतमा की कहाँ से सुनते। उन्होंने माखन चोरी की अपनी लीला को जारी रखा। एक दिन राधा रानी ठाकुर को सबक सिखाने के लिए उनसे रूठ गयीं। अनेक दिन बीत गए पर वो कृष्ण से मिलने नहीं आईं। जब कृष्णा उन्हें मनाने गया तो वहाँ भी उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। तो अपनी राधा को मनाने के लिए इस लीलाधर को एक लीला सूझी।
ब्रज में लील्या गोदने वाली स्त्री को लालिहारण कहा जाता है। तो कृष्ण घूंघट ओढ़ कर एक लालिहारण का भेष बनाकर बरसाने की गलियों में पुकार करते हुए घूमने लगे। जब वो बरसाने, राधा रानी की ऊँची अटरिया के नीचे आये तो आवाज देने लगे।

मैं दूर गाँव से आई हूँ, देख तुम्हारी ऊँची अटारी,
दीदार की मैं प्यासी, दर्शन दो वृषभानु दुलारी॥
हाथ जोड़ विनंती करूँ, अर्ज मान लो हमारी,
आपकी गलिन गुहार करूँ, लील्या गुदवा लो प्यारी॥

जब किशोरी जी ने यह आवाज सुनी तो तुरन्त विशाखा सखी को भेजा और उस लालिहारण को बुलाने के लिए कहा। घूंघट में अपने मुँह को छिपाते हुए कृष्ण किशोरी जी के सामने पहुँचे और उनका हाथ पकड़ कर बोले कि कहो सुकुमारी, तुम्हारे हाथ पे किसका नाम लिखूँ। तो किशोरी जी ने उत्तर दिया कि केवल हाथ पर नहीं मुझे तो पूरे श्री अंग पर लील्या गुदवाना है और क्या लिखवाना है, किशोरी जी बता रही हैं।

माथे पे मदन मोहन, पलकों पे पीताम्बर धारी,
नासिका पे नटवर, कपोलों पे कृष्ण मुरारी,
अधरों पे अच्युत, गर्दन पे गोवर्धन धारी,
कानो में केशव, भृकुटी पे चार भुजा धारी,
छाती पे छलिया, और कमर पे कन्हैया,
जंघाओं पे जनार्दन, उदर पे ऊखल बंधैया,
गालों पर ग्वाल, नाभि पे नाग नथैया,
बाहों पे लिख बनवारी, हथेली पे हलधर के भैया,
नखों पे लिख नारायण, पैरों पे जग पालनहारी,
चरणों में चोर चित का, मन में मोर मुकुट धारी,
नैनो में तू गोद दे, नंदनंदन की सूरत प्यारी,
और रोम रोम पे लिख दे मेरे, रसिया रास बिहारी॥

जब ठाकुर जी ने सुना कि राधा अपने रोम रोम पर मेरा नाम लिखवाना चाहती है, तो खुशी से बौरा गए प्रभू, उन्हें अपनी सुध न रही, वो भूल गए कि वो एक लालिहारण के वेश में बरसाने के महल में राधा के सामने ही बैठे हैं। वो खड़े होकर जोर-जोर से नाचने लगे। उनके इस व्यवहार से किशोरी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ की इस लालिहारण को क्या हो गया। और तभी उनका घूंघट गिर गया और ललिता सखी को उनकी साँवरी सूरत का दर्शन हो गया और वो जोर से बोल उठी कि “अरे ! ये तो बांके बिहारी ही है।” अपने प्रेम के इजहार पर किशोरी जी बहुत लज्जित हो गयीं और अब उनके पास कन्हैया को क्षमा करने के अलावा कोई रास्ता न था। ठाकुरजी भी किशोरी का अपने प्रति अपार प्रेम जानकर गदगद् और भाव विभोर हो गए।
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श्यामांगी कवियित्री

एकबार श्यामसुन्दर श्यामांगी कवियित्री का वेश धरकर श्री राधारानी से मिलने पहुँचे। कवियित्री वेश में श्यामसुन्दर बोले– ‘हे गुणनिधे! आप सकल कला पारङ्गत हो आपकी प्रशंसा सुनकर मैं दूर मथुरा से आई हूँ। उज्जयिनी के परम विद्वान से मैंने काव्यशास्त्र का अध्ययन किया है। मेरे श्री गुरुदेव भी मुझसे सदा प्रसन्न रहते हैं, परन्तु मेरे मनमे एक ग्लानि है।’
श्री राधारानी ने कहा– ‘कहो क्या ग्लानि है।’
श्यामांगी कवियित्री बोली– ‘रानी! मुझे केवल एक ही ग्लानि है, मेरे काव्यशात्र को यथार्थ में समझे ऐसा कोई मुझे आजतक मिला नही। मैंने आपकी कीर्ति सुनी है, रस शास्त्र में, भाषा शास्त्र में, आप बेजोड़ हैं। बस अपनी कुछ रचनाएं सुनाना चाहती हूँ।’
राधारानी ने मुस्कुराकर अनुमति दे दी। तब कवियित्री वेश धारी श्यामसुन्दर ने अद्भुत रस सिक्त कविता सरिता से सभी को आप्लुत कर दिया। एक तो कविता की अपूर्व रचना, तिस पर विषय माधुर्य सिंधु श्री राधा श्यामसुन्दर का अपूर्व केली विलास।
कविताओं को सुनकर सखियों में सात्विक भाव उदय हो गए। हिरणियाँ अपने पतियों के संग स्तम्भित हो श्यामसुन्दर की वाणी सुधा का पान करने लगीं। यमुना जी की गति स्तम्भित हो गई। कोकिलायें, भ्रमर ऐसे शांत हो गए मानो वे भी श्यामसुन्दर के मुख से केली विलास वर्णन सुन रहे हों। राधारानी भी विलासानन्द के स्मरण से अतिशय आनन्द में डूब गयीं।
जब राधारानी को थोड़ा चेत होते ही उन्हें शंका हुई कि ये कवियित्री निकुञ्ज विलास का वर्णन कैसे कर रही है ? ये रहस्य तो केवल श्यामसुन्दर जानते हैं। ललिता भी ये रहस्य नही जानती। रूप रति जानती हैं, पर वो किसी अनजानी स्त्री से कहेंगी नही। फिर इसे कैसे पता ? ध्यान से राधारानी ने उनके श्यामल अंगों को देखा, और देखते ही पहचान गयीं कि ये स्वयं श्यामसुन्दर ही हैं।
राधारानी बोली– ‘हे कवियित्री! तुम्हारी कला से हम सब अत्यन्त प्रसन्न हैं। हम तुम्हें एक प्रशस्ति पत्र देना चाहती हैं।’
यह कहकर उन्होंने एक कमल पत्र में अपनी उंगली को कलम बनाकर, अपने मस्तक कुमकुम की स्याही बनाकर लिखा– ‘प्रियतम श्याम! राधा आज आपको कवि अलंकार* की उपाधि देती है। परन्तु साथ में एक नाम भी देती है, ‘छल कला पण्डित’।’
ऐसा लिखकर श्रीराधा ने उस पर अपने लीला कमल की छाप लगा दी, फिर चुपचाप अपनी ही वेणी माला से उस पत्र को बांध दिया।
श्रीराधा बोली– ‘हे प्रिय कवियित्री! यह प्रशस्ति पत्र मैंने तुम्हेंं दिया। परन्तु यहाँ नही अपने गृह जाकर खोलना।’
श्यामसुन्दर प्रसन्न हो गए कि प्रिया जी ने कम-से-कम आज तो उन्हें नही ही पहचाना। आनन्द तो तब आएगा जब कल उनसे कहूँगा– ‘वाहः री तुम सबकी चतुराई तुम सब कल मुझे पहचान न पायीं।’ हाय! ललिता का मुँह तो देखते बनेगा।
यही सब सोचते हुए श्रीराधा के चरण वन्दन कर श्यामसुन्दर दौड़ते हुए निज गृह लौटे। वचन जो दिया था प्यारी को,घर लौटकर ही पढूंगा। घर आकर प्रशस्ति पत्र खोलकर पढ़ते ही श्यामसुन्दर हँस दिए– ‘वाहः प्यारी सबको छल सकता हूँ परन्तु तुम्हें नही।’

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हरियाली तीज

भाद्रपद की शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में कुमारी तथा सौभाग्यवती स्त्रियाँ पति सुख को प्राप्त करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। इस व्रत को तीज, हरितालिका तीज, अखंड सौभाग्यवती व्रत इत्यादि के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को करने से स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्यवती का वरदान तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मुहूर्त

तृतीया तिथि प्रारम्भ – जुलाई 31, 2022 को 02:59 बजे, सुबह

तृतीया तिथि समाप्त – अगस्त 01, 2022 को 04:18 बजे सुबह

पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर शुरू होकर 8 बजकर 33 मिनट तक है.

प्रदोष पूजा सायंकाल में 6:33 बजे से रात 8:51 बजे तक की जा सकती है.

महत्व

यह व्रत वास्तव में “सत्यम शिवम् सुंदरम” के प्रति आस्था और प्रेम का त्यौहार है, कहा जाता है की इसी दिन शिव और माँ पार्वती का पुनर्मिलन इसी दिन हुआ था। हरियाली तीज शिव-पार्वती के मिलन का दिन है। सुहागिनों द्वारा शिव-पार्वती जैसे सुखी पारिवारिक जीवन जीने की कामना का पर्व है।
वास्तव में हरतालिका तीज सुहागिनों का त्यौहार है लेकिन भारत के कुछ स्थानों में कुँवारी लड़कियाँ भी मनोनुकूल पति प्राप्त करने के लिए यह व्रत रखती हैं।

हरतालिका का अर्थ

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। यह एक ऐसा समय है, जब प्रकृति अपने पूरे यौवन पर होती है, सभी ओर हरियाली ही हरियाली होती है, इस हरियाली की सुन्दरता, मधुरता मोहकता को देखकर भला कौन नहीं मंत्रमुग्ध हो जाएगा। इस मौसम में नव नव शाखा नवकिसलय नवपल्लव एक दूसरे से स्पर्श कर अपने प्यार का इजहार करते है और मानव जीवन को भी मधुर मिलन का एहसास कराते है।
कहा जाता है कि माता पार्वती महादेव को अपना पति बनाना चाहती थी इसके लिए पार्वती ने कठिन तपस्या भी की इसी तपस्या के दौरान पार्वती की सहेलियाँ पार्वती का हरण अर्थात अगवा कर ली थी इसी कारण इस व्रत को हरतालिका तीज कहा जाता है। हरत शब्द हरण शब्द से बना है हरण का अर्थ होता है अपहरण करना तथा आलिका का अर्थ होता है सखी इसी कारण इस तीज व्रत को हरतालिका तीज भी कहा जाता है।

पूजन सामग्री

हरतालिका व्रत पूजा में निम्नलिखित सामग्री को एकदिन पूर्व ही इकट्ठा कर लेना चाहिए ताकि पूजा के समय किसी भी प्रकार की दिक्कत न हो।
सामग्री: पंचामृत (घी, दही, शक्कर, दूध, शहद) दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर,चन्दन, अबीर, जनेऊ, वस्त्र, श्री फल, कलश, बैल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, अकाँव का फूल, तुलसी, मंजरी।
काली मिट्टी अथवा बालू रेत, केले का पत्ता, फल एवं फूल। माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामान जैसे – चूड़ी, बिछिया, बिंदी, कुमकुम, काजल, माहौर, मेहँदी, सिंदूर, कंघी, वस्त्र आदि लेनी चाहिए।

नियम विधि

यह व्रत तीन दिन का होता है प्रथम दिन व्रती नहाकर खाना खाती है जिसे नहा खा का दिन भी कहा जाता है तथा दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रहकर संध्या समय में स्नान करके तथा शुद्ध वस्त्र धारण कर पार्वती तथा शिव की मिट्टी या रेत के प्रतिमा बनाकर गौरी-शंकर की पूजा करती है। तीसरे दिन व्रती अपना उपवास तोड़ती है तथा चढ़ाये गए पूजन सामग्री ब्राह्मण को देती है तथा पूजन में प्रयुक्त रेत मिट्टी आदि को जलप्रवाह करती है।
हरतालिका पूजा में शिव, पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा रेत, बालू या काली मिट्टी की अपने हाथों से बनानी चाहिए। रंगोली तथा फूल से सजाना चाहिए। चौकी पर एक सातिया बनाकर उस पर थाल रखे तथा उस थाल में केले के पत्ते को रखना चाहिए उसके बाद तीनो प्रतिमा को केले के पत्ते पर स्थापित करना चाहिए। उसके बाद कलश के उपर श्रीफल अथवा दीपक जलाना चाहिए। कलश के मुँह पर लाल धागा बाँधना चाहिए। घड़े पर सातिया बनाकर उसपर अक्षत चढ़ाये तत्पश्चात जल चढ़ाना चाहिए। फिर कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प से कलश का पूजन करना चाहिए।
कलश पूजा के उपरान्त गणपति पूजा, उसके बाद शिव जी तथा बाद में माता गौरी की पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान सुहाग की पिटारी में सुहाग की साड़ी रखकर पार्वती को चढ़ानी चाहिए तथा शिवजी को धोती और अंगोछा चढ़ाना चाहिए। पूरे विधि-विधान से पूजा करने के बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़नी अथवा सुननी चाहिए।
कथा पढ़ने अथवा सुनने के बाद सर्वप्रथम गणेश जी कि आरती, फिर शिव जी की आरती तथा अंत में माता गौरी की आरती करनी चाहिए। आरती के बाद भगवान् की परिक्रमा। इस दिन रात भर जागकर गौरी शंकर की पूजा कीर्तन स्तुति इत्यादि करनी चाहिए।
दूसरे दिन प्रातः काल स्नान कर पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेना चाहिए। उसके बाद चढ़ाये हुए प्रसाद या हलवा या क्षेत्र विशेष के विधान के अनुसार अपना उपवास तोड़ना चाहिए। उसके बाद सुहाग की सामग्री को किसी ब्राह्मणी तथा धोती और अंगोछा ब्राह्मण को दे देना चाहिए।

व्रत की ध्यान योग्य बातें

01. जो स्त्री या कन्या इस व्रत को एक बार करता है उसे प्रत्येक वर्ष पूरे विधि-विधान के साथ करना चाहिए।
02. पूजा का खंडन किसी भी सूरत में नहीं करना चाहिए।
03. इस दिन नव वस्त्र ही पहनना चाहिए।
04. हरतालिका तीज पूजन मंदिर तथा घर दोनों स्थान में किया जा सकता है।
05. इस दिन अन्न, जल या फल नही खाना चाहिए।

माहात्म्य कथा

पार्वतीजी को पूर्व जन्म का स्मरण कराने के लिए महादेव शिव ने इस प्रकार कहा:-
“हे गौरी ! पर्वतराज हिमालय पर भागीरथी के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर कठिन तप किया था। इस दौरान तुमने अन्न का त्याग कर रखा था तथा केवल हवा तथा सूखे पत्ते चबाकर तपस्या की थी।
माघ की शीतलता में तुमने लगातार जल में प्रवेश कर तप किया था। वैशाख की तप्त गर्मी में पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मुसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न, जल ग्रहण किये व्यतीत किया। तुम्हारी इस तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दु:खी और नाराज रहते थे। एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराजगी को देखकर नारद जी तुम्हारे आये।
तुम्हारे पिता नारद जी आने का कारण पूछा तब नारद जी बोले, “हे गिरिराज ! मुझे भगवान विष्णु भेजा है। आपकी कन्या की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान उससे विवाह करना चाहते है। बताये आपकी इच्छा है।”
नारदजी की बात से पर्वतराज बहुत ही प्रसन्न होकर बोले, “श्रीमान ! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते है तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात् परब्रह्म है। यह तो सभी पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-संपत्ति से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने।”
नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णुजी के पास गए और उन्हें विवाह तय होने का शुभ समाचार सुनाया। किन्तु जब तुम्हें इस शादी के सम्बन्ध में पता चला तो तुम बहुत दु:खी हुई। तुम्हें दु:खी देखकर तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछा तब तुम बोली, “मैंने सच्चे मन से भगवान शिव का वरण किया है, परन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है। मैं धर्मसंकट में हूँ। अब मेरे पास प्राण त्यागने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं बचा है।”
तुम्हारी सखी ने कहा, “प्राण त्यागने का यहाँ कोई कारण नहीं लगता। दुःख के समय धैर्य से काम लेना चाहिए। वास्तव में भारतीय नारी जीवन की सार्थकता इसी में है कि एक बार स्त्री जिसे पुरुष मन से पति रूप में वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त सच्चे मन तथा तन से निर्वहन करे। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के सामने तो भगवान भी असहाय हैं। मैं तुम्हें घने वन में ले चलती हूँ जो साधना स्थल भी है और जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हें ढूंढ़ भी नहीं पायेंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि भगवान् अवश्य ही तुम्हारी इच्छा की पूर्ति करेंगे।”
अपनी सखी के साथ तुम जंगल में चली गई। इधर तुम्हारे पिता तुम्हे घर में नहीं देखकर बड़े चिंतित और दु:खी हुए। वे सोचने लगे कि मैंने तो विष्णु जी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया हैं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर नहीं मिली तो बहुत ही अपमान होगा।
ऐसा विचार कर पिता ने तुम्हारी खोज शुरू करवा दी। तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर के गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगी।
भाद्रपद में शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि तथा हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया। रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मैं शीघ्र ही प्रसन्न होकर तुम्हारे पास आ गया और तुमसे वर माँगने को कहा।
तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा, “मैं सच्चे मन से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहाँ आये है तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिये। तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया प्रात: होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया।
उसी समय गिरिराज अपने बंधु-बाँधवो के साथ तुम्हे ढूँढते हुए वहाँ पहुँचे। तुम्हारी मन तथा तन की दशा देखकर अत्यंत दु:खी हुए और तुम्हारी इस कठोर तपस्या का कारण पूछा। तब तुम बोली, “पिताजी मैंने अपने जीवन का अधिकांश वक्त कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का एकमात्र उद्देश्य महादेवजी को पति रूप में प्राप्त करना था। आज मैं अपनी तपस्या फल पा चुकी हूँ। आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय किया इसलिए मैं अपने अराध्य महादेव शिवजी की तलाश में घर से चली गई। अब मैं इसी शर्त पर घर लौटूँगी की आप मेरा विवाह महादेव जी के साथ ही करेंगे।”
पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार कर ली और तुम्हें घर वापस ले आए। किंचित समय उपरांत उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ तुम्हारा विवाह मेरे साथ किया।”
महादेव शिव ने पुनः कहा, “हे पार्वती ! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी पूजा-अर्चना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरुप हम दोनों का विवाह संभव हो पाया। अतः इस व्रत का महत्त्व यही है कि जो स्त्री तथा कन्या पूरी निष्ठा के साथ व्रत करती है उसको मै मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ।



श्री हरिदास…
हरियाली अमावस्या तक श्री बिहारी जी महाराज अपने फूल बंगले में विराजमान होते है, फूल बंगले समाप्त होने पर ठाकुर जी फिर से गर्भ गृह में दर्शन देते है. बंगले में बैठे ठाकुर जी थोड़े और ज्यादा करीब आ जाते है भक्त के… पर पुनः गर्भ गृह में जाते है तो लगता है प्रभु फिर थोड़ा दूर हो गए है 🙁
उनके करीब आने की ललक तो हर प्रेमी को रहती है.
भगत की उदासी को प्रभु समझते है, छटपटाते भगत की तड़प को ठाकुर जी कुछ ऐसे मिटाते है
फूल बंगले में तब भी थोड़े दूर थे..
हरियाली तीज पर तो बिलकुल मंदिर से बाहर आ जाते है और मानो अपने भक्त के दिल में समाने को तैय्यार ठाकुर अपने निकुंजों की हरियाली से भक्त के दिल की बगिया भी हरी भरी कर देते है.
और प्रभु अकेले नहीं आते अपनी अष्ट सखियों को किसी न किसी रूप में लेकर नित्य निकुंज बिहारी हरियाली तीज पर प्रगट हो जाते है…
प्यारए का ऐसा बैभव सोने चांदी का हिंडोला संग प्रभु के सुवर्णो के आभूषणों में सजी प्रिया प्रीतम पर तो करोङो कुबेर इन्द्रादि भी फीके पड़ जाये..
स्वामी श्री हरिदास जी महाराज राग मल्हार सुनाये ठाकुर ठकुरानी मुस्कुराये ऐसा अनुभव भी भक्तो को होता है.
श्री बिहारी जी अपने भक्त के भाव की डोरी से बांधकर झूला झूलते है तो कभी कभी भीड़ के धक्के में भगत भी पूरे मंदिर में झूल जाता है इसे असुविधा नहीं बिहारी जी की लीला समझना क्यूंकि हमारा ठाकुर आज भी मंदिर में अपने भक्तों के साथ खेलता है
कोई कुछ कह भी दे तो बुरा नहीं मानना कियुँकि बिहारी जी देखते है मेरा भगत मेरे लिए कितना सहन कर सकता है..
बुराइयों को देखोगे तो बुराइया ही ले जाओगे और अनेकों परेशानियों को दर किनारे कर बिहारी जी को निहारोगे तो बिहारी जी का अनन्य प्रेम ले जाओगे.
आइये इस 31 जुलाई 2022 रविबार को ठाकुर जी को झूला झुलाने हिंडोला उत्सव पर अपने प्रभु बांके बिहारी जी के महलन में.
*दर्शन समय*

– पट खुलने का समय: सुबह 7.45 बजे।

– श्रृंगार आरती: सुबह 7.55 बजे।

– राजभोग आरती: दोपहर 1.55 बजे।

– दर्शन बंद होने का समय दोपहर 2 बजे।

-सायंकालीन सेवा- पट खुलने का समय: शाम 5 बजे।

– शयन आरती: रात 10.55 बजे।

– दर्शन बंद होने का समय: रात 11 बजे।

कुंजबिहारी श्री हरिदास



भगवान श्रीकृष्ण व राधारानी का सबसे प्रिय मास है सावन, जिसमें वह अपनी सखी सहेलियों के साथ झूला झूलते हैं। विश्व प्रसिद्ध लाड़ली जी मंदिर में भी वृषभान नंदनी अपने प्रियतम के साथ प्राचीन स्वर्ण जड़ित हिंडोले में झूला झूलेंगी। बरसाना में मौजूद मुगलकालीन प्राचीन झूलों पर भी राधाकृष्ण के स्वरूपों को झुलाया जाएगा।ब्रज मंडल में झूलन की परंपरा बहुत ही पुरानी है। हरियाली तीज के दिन से ब्रज में शुरू होने वाले झूलन महोत्सव यहां के सभी मंदिरों में होतेहैं। ब्रज में झूलन का यह पर्व सावन के समाप्ति तक चलता है। हरियाली तीज पर लाड़ली जी मंदिर को हरे परिधानों से सजाया जाएगा। वृषभान दुलारी अपने कृष्ण के साथ गर्भगृह से बाहर निकल हरे वस्त्रों में जगमोहन में स्थित प्राचीन स्वर्ण हिंडोले में विराजमान होंगी और झूलन महोत्सव की शुरुआत करेंगी।राधाकृष्ण की इस अद्भुत झाकी के दर्शन करने के लिए देस-विदेश से श्रद्धालु का सैलाब श्रीजी मंदिर में उमड़ेगा। बरसाना के बृषभान मंदिर, दादी बाबा मंदिर, मान मंदिर, मोर कुटी, राधारस मंदिर, कुशल बिहारी मंदिर, गोपाल जी मंदिर, श्यामा श्याम मंदिर, राम मंदिर मे देव विग्रहों को झूलों में झुलाया जाएगा। सोने-चादी से जड़ित प्राचीन हिंडोला साल में सिर्फ एक बार ही निकलता है। इस हिंडोले का निर्माण गोस्वामी समाज द्वारा कराया गया था। रासलीलानुकरण के आविष्कार और ब्रज के प्राचीन स्थलों व चिन्हों का प्राकट्य करने वाले श्रीलनारायण भट्ट ने करीब छह सौ साल पूर्व ब्रज मेंपाच स्थानों को झूलन लीला मानकर चिन्हित किया था।।हरियाली तीज पर सफेद छतरी में दर्शन देंगी लाड़लीहरियाली तीज के दिन वृषभान नंदनी गर्भगृह से बाहर निकलकर नीचे बनी संगमरमर की सफेद छतरी में विराजमान होकर अपने भक्तों को दर्शन देंगी। राधा रानी साल में तीन बार इस सफेद छतरी में भक्तों को नजदीक से दर्शन देती है। सर्व समाज को दर्शन के लिए साल के राधाष्टमी, हरियाली तीज, धुलैंडी के दिन बृषभान नंदनी अपने गर्भगृह से बाहर निकलती हैं। इस दिन किशोरी जी की संध्या आरती की जगह आरता होता है। यह आरता गोस्वामी समाज की कुंवारीकन्या द्वारा किया जाता है। देर शाम को लाड़ली जी को पुन: मंदिर में ले जाया जाता है।

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प्रिया प्रियतम की चर्चा

“परमानन्दकन्द लीलापुरूषोत्तम श्रीकृष्ण ने एक बार देखा कि श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीराधिकारानी के हाथ मे एक ताज़ी चोट है , पूछने लगे- “यह चोट कब लगी?” कैसे लगी? कहॉं लगी?

श्रीराधा ने हँसकर कहा:-“यह तो महीनों से है!”

श्रीकृष्ण ने कहा :-“ यह तो ताज़ी है?”

श्रीराधा ने कहा:- “इस पर आने वाली पपड़ी निकाल देती हुँ , इस प्रकार इसे ताज़ी रखती हुँ ।”

श्रीकृष्ण ने कहा:- क्यों?

श्रीराधा ने कहा:- “यह घाव बड़ा सुखद है, यह तुम्हारे नख लगने से हुआ है,तुम्हारा स्मरण दिलाया करता है ,इसलिये मै कभी इसे सुखने नही देती !”

“ प्रियतम का दिया दु:ख भी सुखदायक होता है,इसीलिये कोई कष्ट,अभाव,चिन्तित नही करती, क्योंकि वह उसे प्रियतम का दिया दिखता है।”

“एक बार श्यामसुन्दर, श्रीराधा के साथ बैठे थे, और वंशी बजा रहे थे , उनके मन मे इच्छा हुई कि प्रिया जी का वंशी वादन सुनना चाहिये ,पर यह बात कहें कैसे? एक उपाय सोच लिया , जान-बूझकर एक तान बजाने मे भूल कर दी , प्रियाजी से नही रहा गया,और उन्होंने उन्हें स्वयं बजाकर बतला दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण को अपने संगीत से अधिक आनन्द श्रीराधिकारानी के संगीत मे आता है।”

“एक बार गोलोक में बडे़- बडे़ देवता , श्रीकृष्ण का दर्शन करने आये।

श्रीकृष्ण सो रहे थे , और उनके रोम रोम से “राधा-राधा” निकल रहा था,

श्रीराधा ने यह देखा तो सोचा- इतना अपार प्रेम है इनका मुझसे!

वे “कृष्ण -कृष्ण” कहती हुई प्रेमावेश मे मूर्छित हो गयीं। श्रीकृष्ण जागे , और उन्होंने देखा कि प्रियाजी के रोम -रोम से कृष्ण नाम निकल रहा है तो उन्हें अङ्क मे ले लिया और “राधे -राधे” बोलते मूर्छित हो गये , प्रेम मे।

यह क्रम देर तक चलता रहा, एक चैतन्य हो,और दूसरे का प्रेम देखे तो मूर्छित हो जाये, दूसरा चैतन्य हो तो उसकी भी वही दशा हो।

जब बहुत देर हुई तो श्रीराधिकारानी की परमसखी ललिता जी निकुञ्ज मे आयी ,उन्होंने यह अवस्था देखी तो चकित रह गयीं –

“अङ्कस्थितेऽपि दयिते किमपि प्रलापम्।”

संयोग मे वियोग का यह अद्भुत संवेदन!

तात्पर्य है कि जिसे प्रेम प्राप्त होता है , उसे एकाङ्गी, अथवा वियोगात्मक-संयोगात्मक प्रेम नही मिलता। प्रेम का सामरस्य, सामञ्जस्य,ऐकरस्य, प्रेमी-प्रियतम दोनो के एक हुये बिना नही होता।

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11 . REJOICING AT GOKULA

HEN YOGAMAYA WAS bom to Yasoda, everyone in Gokula was in a trance and nobody was aware of the exchange of children by Vasudeva. When they woke up from deep sleep, news spread from Yasoda’s house that a son had been born to her. Nanda, Yasoda’s husband was the chief of Gokula. So the entire Gokula rushed there to greet the child. There the Lord of the Universe, Vishnu, lay in the form of a child by the side of his mother. The holy men recited the sacred mantras to avert all evil. Nanda distributed rich gifts to everyone. The entire Gokula wore a festive look. Musicians sang and drums, kettle-drums and other instruments sounded again and again. Every house was decorated and the streets were all sprinkled with perfumed water. A little earlier, Rohini, another wife of Vasudeva, had also given birth to a son. She was hiding in Gokula to escape the tyranny of Kamsa. So Yasoda and Rohini were glowing like queens in the midst of the Gopis with their sons. Rohini’s son was fair and Yasoda’s son was dark.

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श्रीतिलोक जी सुनार



श्री त्रिलोक भक्त जी पूर्व देश के रहने वाले थे और जाति के सोनार थे। उन्होंने हृदय में भक्तिसार संत सेवा का व्रत धारण कर रखा था। एक बार वहां के राजा की लड़की का विवाह था।

उसने इन्हें एक जोड़ा पायजेब बनाने के लिए सोना दिया। परंतु इनके यहां तो नित्य प्रति अनेकों संत महात्मा आया करते थे। उनकी सेवा से इन्हें किंचित मात्र भी अवकाश नहीं मिलता था ।अतः आभूषण नहीं बना पाए। जब विवाह के दो ही दिन रह गए और आभूषण बनकर नहीं आया तो राजा को क्रोध हुआ और सिपाहियों को आदेश दिया कि तिलोक सुनार को पकड़ लाओ ।

सिपाहियों ने इन्हें तुरंत ही पकड़ कर ला कर राजा के सम्मुख कर दिया ।राजा ने इन्हें डाँट कर कहा कि ‘ तुम बड़े धूर्त हो ‘ ।समय पर आभूषण बनाकर लाने को कह कर भी नहीं लाए ।उन्होंने कहा- महाराज ! अब थोड़ा काम शेष रह गया है। अभी आपकी पुत्री के विवाह के दो दिन शेष हैं। यदि मै ठीक समय पर ना लाऊं तो आप मुझे मरवा डालना।

राजा की कन्या के विवाह का दिन भी आ गया, परन्तु इन्होंने आभूषण बनाने के लिए जो सोना आया था उसे हाथ से स्पर्श भी नहीं किया।फिर इन्होंने सोचा समय पर आभूषण न मिलने से अब राजा मुझे जरूर मार डालेगा ।

अतः डर के मारे जंगल में जाकर छिप गये । यथा समय राजा के चार-पांच कर्मचारी आभूषण लेने के लिए श्री तिलोक जी के घर आए । भक्त के ऊपर संकट आया जानकर भगवान ने श्री तिलोक भक्त का रूप धारण कर अपने संकल्प मात्र से आभूषण बनाया और उसे लेकर राजा के पास पहुंचे ।वहां जाकर राजा को पायजेब का जोड़ा दिया ।राजा ने उसे हाथ में ले लिया ।

आभूषण को देखते ही राजा के नेत्र ऐसे लुभाये कि देखने से तृप्त ही नहीं होते थे। राजा श्री तिलोक जी पर बहुत प्रसन्न हुआ। उनकी पहले ही सब भूल चूक माफ कर दी और उन्हें बहुत सा धन पुरस्कार में दिया ।श्री तिलोक रूप धारी भगवान मुरारी इस प्रकार धन लेकर श्री तिलोक भक्त के घर आकर विराजमान हुए ।

श्री तिलोक रूप धारी भगवान ने दूसरे दिन प्रातः काल ही महान उत्सव किया ।उसमें अत्यंत रसमय , परम स्वादिष्ट अनेकों प्रकार के व्यंजन बने ।साधु ब्राह्मणों ने खूब पाया। फिर भगवान एक संत का स्वरूप धारण कर झोली भर प्रसाद लिए वहां गए ।जहां श्री तिलोक भक्त छिपे बैठे थे ।

श्री तिलोक जी को प्रसाद देकर संत रूप धारी भगवान ने कहा – श्री तिलोक भक्त के घर गया था।उन्होंने भी खूब प्रसाद पवाया और झोली भी भर दी। श्री तिलोक भक्त ने पूछा – कौन तिलोक ?भगवान ने कहा- जिसके समान त्रैलोक्य में दूसरा कोई नहीं है। फिर भगवान ने पूरा विवरण बताया ।संत रूप धारी भगवान के वचन सुनकर श्री तिलोक जी के मन को शांति मिली ।

फिर भगवत प्रेम में मग्न श्री तिलोक जी रात्रि के समय घर आए। घर पर साधु-संतों की चहल-पहल तथा घर को धन-धान्य से भरा हुआ देखकर श्री तिलोक जी का श्री प्रभु के चरणों की ओर और भी अधिक झुकाव हो गया । वे समझ गए कि श्री प्रभु ने मेरे ऊपर महान कृपा की है। निश्चय ही मेरे किसी महान भाग्य का उदय हुआ है।

भक्त की कोई जाती नहीं होता

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राधा जू की कृपा

एक दिन श्री राधा रानी जी श्यामसुन्दर जी से मिलने निकुञ्ज जा रही थीं। मंजरियों ने श्री राधा रानी जी अनुपम माधुर्य श्रृंगार किया। श्री राधा रानी को सुन्दर मणि मनिकों से सुसज्जित लहँगा धारण कराया। लहँगा इतना अनुपम सुन्दर है कि उसे देख कर सभी सखियाँ हर्षित और पुलकित हो गयीं। सखियाँ सोचती हैं जब श्याम सुन्दर इसे देखेगे तो आनंदित हो जायेंगे।

प्रियाजी श्रृंगार करके निकुञ्ज की ओर चली जा रही हैं, सभी सखियाँ पीछे-पीछे उनके नामों के गुणों का गान करती चल रही हैं। लहँगा को छूकर कभी ब्रजरज अपने को धन्य कर रही है तो कभी निकुञ्ज की लता-पतायें अपने को धन्य कर रही हैं। मानों आज सभी में श्रीजी का स्पर्श पाने की होड़ लगी है।

वृक्ष की ऊँची डाल पर टंगा सूखा पत्ता भी श्री राधा की कृपा पाने के लिये व्याकुल हो रहा है। किस विधि श्रीजी की कृपा पा सके, उनकी राह में होते हुए भी उनकी कृपा से दूर है। यही विचार करते-करते उदास हो रहा है। तभी एक शीतल पवन का झोंका आया और सूखे पत्ते को डाल से अलग करके ले उड़ा। पत्ता उड़कर सीधा राधाजी के लहराते लहँगे पर जा गिरा। राधाजी की कृपा देखिये कि पत्ता लहँगे से टकरा कर नीचे नहीं गिरा अपितु लहँगे ने ही उसे गिरने से थाम लिया, और अपने साथ ही निकुञ्ज में ले चला।

निकुञ्ज का द्वार आया तो सभी सखियाँ द्वार पर रुक गयीं। श्री रूपमंजरी प्रिया जी को निकुञ्ज के अंदर ले गयी साथ में प्रियाजी की कृपा से सूखा पत्ता भी निकुञ्ज में प्रवेश कर गया। जो निकुञ्ज शिवजी, ब्रह्माजी, बड़े-बड़े महा मुनियो को दुर्लभ है उस निकुञ्ज में सूखे पत्ते का प्रवेश मिल गया। जिस निकुञ्ज में केवल सखियों और मंजरियों को ही आने की आज्ञा है उस परम आलौकिक निकुञ्ज के दर्शन आज श्री राधाजी की अहैतुकी कृपा से उसे सुलभ हो गये।

जब प्रियाजी सुकोमल फूलो से बने शय्या पर पर विराजमान हुई तो प्रिया जू ने उस सूखे पत्ते को अपने हाथो में लिया और अपने कपोलो से लगा लिया। प्रिया जी स्पर्श पाते ही वो सूखा पत्ता एक सुबासित कली बन गया और प्रिया जी ने उसे अपने निकुञ्ज में हमेशा के लिए रख लिया।

ऐसी है प्रियाजी की अहैतुकी कृपा जो एक बार उनकी शरण में आ जाये हमेशा-हमेशा के लिये वे उसे अपने आश्रय में ले लेती हैं।

“जय जय श्री राधे”

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क्या अयोग्य को गुरु की शरणागति प्राप्त होती है?

प्र०- महाराजश्री, मैं बिलकुल अयोग्य हूँ क्या आप मुझे भी शरणागति प्रदान करेंगे ?

समाधान शरणागति का प्रारम्भ ही यहाँ से होता है, जब तक कोई योग्यता, समझ या ज्ञान होता है तब तक पूर्ण शरणागति नहीं होती है । अर्जुन जब तक अपनी समझ का आश्रय लेते रहे तब तक गीत प्रारंभ नहीं हुई और जब अर्जुन ने कह दिया कि –

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता २/७)

‘कायरता रूप दोष से उपहत स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित चित्त वाला मैं आपसे कल्याणकारी साधन के विषय में जानना चाहता हूँ, आप मुझे बताइये क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण में हूँ।’ तब भगवान् ने गीता सुनाना प्रारम्भ की। जब अपने में अयोग्यता नजर आती है, तभी ये भाव उदय होता है कि मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण में हैं; यही सच्ची शरणागति है ।

सुने री मैंने निरबल के बलराम ।

अपबल तपबल और बाहुबल चौथो बल है दाम ।

सूर किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरिनाम ॥

जब तक कोई भी बल है तब तक शरणागत होने का नाटक हो सकता है, वास्तविक रूप से शरणागति नहीं हो सकती । जब तक साधक में साधकपना है, कर्तृत्वाभिमान है, तब तक मूढ़ता उसका संग नहीं छोड़ती, ‘अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।” ‘मैं कुछ कर सकता हूँ’, ऐसे अहंकार से जो युक्त है, वह विमूढात्मा है; और जहाँ ये भाव आया कि मैं किसी योग्य नहीं हूँ, में हार गया हे प्रभो ! बस वहीं से शरणागति प्रारम्भ होती है और जहाँ वह शरणागत हुआ तो समस्त दैवी सम्पदा उसके हृदय में प्रकाशित हो जाती है ।

अगर कुछ समझ, ज्ञान या सामर्थ्य है तो पूर्ण समझ, ज्ञान या सामर्थ्य नहीं आने वाली जब कोई सामर्थ्य नहीं रह जाती तो प्रभु बहुत सामर्थ्य दे देते हैं। जब तक द्रौपदी में सामर्थ्य रही तब तक प्रभु नहीं आये और जब कोई सामर्थ्य नहीं रहीं दोनों हाथ उठा दिए तो इतनी बड़ी सामर्थ्य प्रकट हो गयी कि १० हजार हाथियों का भुजाओं में बल रखने वाला दुस्सासन हार गया लेकिन साड़ी नहीं खींच पाया। इसीलिये शरणागति का तो सच्चा अधिकारी ही वही है जो अपने को पूर्ण अयोग्य समझता है।

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किशोरी जी की चोटी”



राधाकुण्ड सेवा के दौरान श्री रूप गोस्वामीजी ने कई ग्रंथों की रचना की, एक दिन उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में राधारानी के बालों की चोटी की महिमा में लिखा कि-राधारानी के बालों की चोटी काले नाग की तरह है जो उनके कमर पर ऐसे लहराती है जैसे कोई काला विषधर भुजंग लहरा रहा हो। रूप गोस्वामी के बड़े भाई श्री सनातन गोस्वामी ने जब यह पढ़ा तो उन्होंने श्री रूप गोस्वानी को इसके लिए डांट लगाईं और कहा तुम्हें कोई बढ़िया उपमा नहीं मिली ? राधारानी की चोटी को तुम विषधर भुजंग कहते हो, इसमें तुरन्त सुधार करो।
यह आदेश देकर श्री सनातन गोस्वानी स्नान हेतु यमुनाजी की ओर चल दिए, मार्ग में एक वन पड़ा और वन में श्री सनातन गोस्वामी ने देखा कि वन के एक कोने में कुछ नवयुवतियाँ एक पेड़ में झूला बनाकर झूल रही हैं। एक नवयुवती झूले में बैठी थी एवं बाकी युवतियाँ उसे घेरे हुए थी और उसे झूला झुला रही थीं। सनातन गोस्वामी ने देखा कि जो नवयुवती झूला झूल रही है उसकी पीठ पर एक काला नाग चढ़ रहा है जो किसी भी समय उस नवयुवती को डस सकता है। सनातन गोस्वामी दौड़ते हुए उन नवयुवतियों की ओर भागे और जोर से चिल्लाए- ओ लाली जरा देखो तो तुम्हारी पीठ पर एक बड़ा ही भयंकर काला नाग चढ़ा जा रहा है सावधान रहो। किन्तु युवतियों ने उनकी आवाज नहीं सुनी और झूलने में व्यस्त रहीं।
दौड़ते हुए सनातन उन नवयुवतियों के निकट पहुँचे और फिर से उन्हें सावधान किया, उनकी आवाज सुनकर झूले में बैठी हुए अति सुन्दर नवयुवती ने झूले में बैठे-बैठे ही मुड़कर सनातन गोस्वामी को देखा और मुस्कुरा कर अपनी समस्त सखियों के साथ अन्तर्धान हो गई।
सनातन उसी समय वापस मुड़े और रूप गोस्वामी के निकट जाकर बोले- “अपने लेखन में सुधार करने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुमने ठीक ही लिखा है राधारानी की चोटी सचमुच काले नाग जैसी ही है।”
~~~०~~~

“जय जय श्री राधे”

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रोम रोम मे कृष्ण

. “रोम-रोम में कृष्ण”

एक बार की बात है महाभारत के युद्ध के बाद भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन द्वारिका गये पर इस बार रथ अर्जुन चलाकर के ले गये। द्वारिका पहुँचकर अर्जुन बहुत थक गये इसलिए विश्राम करने के लिए अतिथि भवन में चले गये।
शाम के समय रूक्मणी जी ने कृष्ण को भोजन परोसा तो कृष्ण बोले–’घर में अतिथि आये हुए हैं हम उनके बिना भोजन कैसे कर लें ?’
रूक्मणी जी ने कहा–’भगवन आप आरम्भ करिये मैं अर्जुन को बुलाकर लाती हूँ।’ जैसे ही रूक्मणी जी वहाँ पहुँचीं तो उन्होंने देखा कि अर्जुन सोये हुए हैं और उनके रोम-रोम से कृष्ण नाम की ध्वनि प्रस्फुटित हो रही है तो ये जगाना तो भूल गयीं और मन्द-मन्द स्वर में ताली बजाने लगीं।
इधर नारद जी ने कृष्ण से कहा–’भगवान भोग ठण्डा हो रहा है।’
कृष्ण बोले–’अतिथि के बिना हम नहीं करेंगे।’
नारद जी बोले–’मैं बुलाकर लाता हूँ।’ नारद जी ने वहाँ का नजारा देखा तो ये भी जगाना भूल गये और इन्होंने वीणा बजाना शुरू कर दिया।
इधर सत्यभामा जी बोली–’प्रभु भोग ठण्डा हो रहा है आप प्रारम्भ तो करिये।’
भगवान बोले–’हम अतिथि के बिना नहीं कर सकते।’
सत्यभामा जी बोलीं–’मैं बुलाकर लाती हूँ।’ ये वहाँ पहुँची तो इन्होंने देखा कि अर्जुन सोये हुए हैं और उनका रोम-रोम कृष्ण नाम का कीर्तन कर रहा है और रूक्मनी जी ताली बजा रही हैं नारद जी वीणा बजा रहे हैं तो ये भी जगाना भूल गयीं और इन्होंने नाचना शुरू कर दिया।
इधर भगवान बोले–’सब बोल के जाते हैं भोग ठण्डा हो रहा है पर हमारी चिन्ता किसी को नहीं है, चलकर देखता हूँ वहाँ ऐसा क्या हो रहा है जो सब हमको ही भूल गये।’
प्रभु ने वहाँ जाकर के देखा तो वहाँ तो स्वर लहरी चल रही है। अर्जुन सोते-सोते कीर्तन कर रहे हैं, रूक्मणी जी ताली बजा रही हैं, नारद जी वीणा बजा रहे हैं, और सत्यभामा जी नृत्य कर रही हैं।
ये देखकर भगवान के नेत्र सजल हो गये और प्रभु ने अर्जुन के चरण दबाना शुरू कर दिया। जैसे ही प्रभु के नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की बूँदें अर्जुन के चरणों पर पड़ी तो अर्जुन छटपटा के उठे और बोले–’प्रभु ये क्या हो रहा है।’
भगवान बोले–’अर्जुन तुमने मुझे रोम-रोम में बसा रखा है इसीलिए तो तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो’ और गोविन्द ने अर्जुन को गले से लगा लिया।
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“जय जय श्री राधे”
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चोर श्रीनाथ जी

श्रीनाथ जी, एक भाव विभोर कथा।

श्रीनाथजी एक दिन भोर में अपने प्यारे कुम्भना के साथ गाँव के चौपाल पर बैठे थे।

कितना अद्भुत दृश्य है – समस्त जगत का पिता एक नन्हें बालक की भांति अपने प्रेमीभक्त कुम्भनदास की गोदी में बैठ क्रीड़ा कर रहा है तभी निकट से बृज की एक भोली ग्वालन निकट से निकली।

श्रीनाथ जी ने गुजरी को आवाज दी – इधर आ!

गुजरी ने कहा – बाबा! आपको प्यास लगी है क्या?

श्रीनाथजी ने कहा – मुझे नहीं, मेरे कुभंना को लगी है।

श्रीनाथजी कुभंनदास को प्यार से कुभंना कहते।

कुभंनदास जी कह रहे हैं – श्रीनाथ जी! मुझे प्यास नही लगी है।

श्रीनाथ जी ने गुजरी से कहा – इसको छाछ पिला!

जैसे ही गुजरी ने कुभंनदास जी को छाछ पिलायी, पीछे से श्रीनाथ जी ने उसकी पोटली मे से एक रोटी निकाली व
कुभंनदास जी ने देख लिया।

श्रीनाथ जी ने गुजरी से कहा – अब तू जा!

भोली ग्वालन बाबा को छाछ पिलाकर अपने कार्य को चली गयी।

गुजरी के जाते ही कुंभनदास जी ने श्रीनाथ जी से कहा – श्रीजी आपकी ये चोरी की आदत गई नहीं।

श्रीनाथजी ने आधी रोटी कुभंना को दी और आधी रोटी आप ने ली।

जैसे ही कुभंनदास जी ने ली तो श्रीनाथजी ने कहा – अरे कुभंना! तू चख तो सही।

कुभंनदास जी ने एक निवाला लिया और कहने लगे – बाबा! ये कैसा स्वाद है?

श्रीनाथ जी कह रहे है कि, ये गुजरी जब रोटी बनाती है तो मेरा नाम ले-ले कर बेलती है तो इसमें मेरे नाम की मिठास भरी है।

बाबा अब तू ही बतला इस प्रेमभरी रोटी को आरोगे बिना में कैसे रह सकूँ हूँ। ये भोली गुजरी लज्जावश श्रीमंदिर में मुझे ये सूखी रोटी पवाने तो कभी आयेगी नहीं इसीलिए बाबा मैंने स्वयं ही चुरा ली।


जय श्रीनाथ जी🙏

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वंशीवट

अमल प्रमाण श्रीमद्भागवतमें वर्णित प्रसिद्ध राधाकृष्णयुगलकी सखियों के साथ रासलीलाको प्रसिद्ध स्थली यही वंशीवट है गोपकुमारियोंकी कात्यायनी पूजाका फल प्रदान करनेके लिए रसिक बिहारी श्रीकृष्णाने जो वरदान दिया था, उसे पूर्ण करनेके लिए उन्होंने अपनी मधुर वेणुपर मधुर तान छेड़ दी। जिसे सुनकर गोपियाँ प्रेमोन्मत्त होकर राका रजनीमें यहाँ उपस्थित हुई।” रसिकेन्द्रशेखर श्रीकृष्णने अपने प्रति समर्पित गोपियोंको धर्मव्यतिक्रमके बहानेसे अपने पतियोंकी सेवाके लिए उनके घरोंमें लौटनेकी बहुत-सी युक्तियाँ दीं किन्तु विदग्ध गोपियोंने उनकी सारी युक्तियोंका सहज रूपमें ही खण्डन कर दिया। शतकोटि गोपियोंके साथ यहींपर शारदीय रास आरम्भ हुआ। दो-दो गोपियोंके बीचमें एक कृष्ण अथवा दो कृष्णके बीच में एक गोपी। इस प्रकार विचित्र नृत्य और गीतयुक्त रास हो ही रहा था कि अन्यान्य गोपियोंको सौभाग्यमद और श्रीमती राधिकाजीको मान हो गया। इसे देखकर रसिकशेखर श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाजीका मान प्रसाधन तथा अन्यान्य गोपियोंके सौभाग्यमदको दूर करनेके लिए यहींसे अन्तर्धान हो गये। पुनः विरहिणी गोपियोंने ‘जयतितेऽधिकम्…’ विरह गीतको रोते-रोते उच्च स्वरसे गायन किया, जिसे सुनकर कृष्ण यहींपर प्रकट हुए। यहींपर इन्होंने मधुर शब्दोंसे गोपियोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट की थी कि मेरे लिए अपना सर्वस्व त्याग करनेका तुम्हारा अवदान है। मैं इसके लिए तुम्हारा चिरऋणी हूँ, जिसे मैं कभी भी नहीं चुका सकता। यह रासलीला स्थली सब लीलाओंकी चूड़ामणि स्थली स्वरूप है। श्रीवज्रनाभ महाराजने इस रासस्थलीमें स्मृतिके लिए जिस वृक्षका रोपण किया था, कालान्तरमें वह स्थान यमुनाजीमें आप्लावित हो गया। साढ़े पांच सौ वर्ष पूर्व श्रीगदाधर पण्डितके शिष्य श्रीमधुपण्डितने उसकी एक शाखा लेकर इस स्थानमें गाढ़ दी थी। जिससे वह शाखा प्रकाण्ड वृक्षके रूपमें परिणत हो गई। यहाँपर भजन करते हुए श्रीमधुपण्डितने ठाकुर श्रीगोपीनाचनीको प्राप्त किया था। इस समय वंशीवटके चतुष्कोण परकोटेके चारों कोनोंमें चार छोटे-छोटे मन्दिर हैं। उनमें क्रमशः श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीविष्णुस्वामी एवं श्रीनिम्बार्काचार्यकी मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। आजकल इन मूर्तियोंके बदले कुछ दूसरी मूर्तियाँ भी यहाँ प्रविष्ट हो गई हैं। पहले इस स्थानमें गौड़ीय वैष्णव सेवा करते थे। बादमें ग्वालियर राजाके गुरु ब्रह्मचारीजीने इस स्थानको क्रय कर लिया। अतः तबसे यह स्थान निम्बार्क सम्प्रदाय के अन्तर्गत हो गया है।

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श्री जी के आभूषण

एक दिन श्यामसुंदर श्री राधा रानी की श्रृंगार कक्ष में गए और वहाँ एक पेटी जिसमें राधा रानी के सारे अलंकार आभूषण रखे थे, उस को खोला। एकांत ना मिलने के कारण बहुत दिनों से सोच रहे थे, आज मौका मिला भंडार गृह में कोई नहीं था एकांत था।
सबसे पहले श्यामसुंदर जी ने राधा रानी का हरिमोहन नामक कंठ हार निकाला और अपने हृदय से लगाया और सोचने लगे यह हार कितना सौभाग्यशाली है जो हमेशा प्रिया जी के हृदय के समीप रहता है। हमेशा उनकी करुणामयी धड़कन को सुनता है। उनकी हर धड़कन में श्याम-श्याम नाम को प्रतिपल सुनता है। कैसा अद्भुत सौभाग्य है इस हार का जो मेरी किशोरी जी के ह्रदय के समीप रहता है फिर हार को अपनी अधरों से लगा कर और अपने नैनों से लगाकर रख दिया।
फिर प्रिया जू की मांग की मोतियों की माला को अपने हृदय से लगाया और कहा- मोतियों की माला ये मेरा जीवन है, इसे प्रिया जी अपनी सिंदूर रेखा भरी मांग पर धारण करती हैं उसी से मेरा जीवन अस्तित्व है इसकी सौभाग्य की कैसे वंदना करो कैसे वंदना करूं ? अपने कपोलो से लगा कर भाव बिभोर हो गए नयन सजल हो गये प्रियतम के।
फिर श्याम सुंदर ने प्रिया जी की नथ को अपने हाथों से उठाया और कहने लगे नथ की सौभाग्य की बात कैसे करूं यह नथ प्रेम रीति से प्रिया जी के कोमल कपोलो (गालों) का अखंड सानिध्य प्राप्त है कैसे प्रिया जी के कपोलो की काँति स्पर्श प्राप्त है। कैसे नथ की सुधरता का वर्णन करूँ ?श्री प्रिया जू के नथ में प्रभाकरी नाम का मोती है यही मेरे जीवन का उजाला है।
फिर श्यामसुंदर ने विपक्ष मद मांर्दिनी नामक राधा जी की अंगूठियों को अपने हृदय से लगा लिया और कहने लगे- इन की अंगूठियों को पहनकर राधा रानी के हाथ सभी भक्तों को प्रेम और कृपा का दान करते हैं। कैसा अनुपम सौभाग्य है अंगूठियों का जिन्हें प्रिया जू अपने कोमल हाथों में धारण करती हैं तो फिर श्यामसुंदर अंगूठियों को अपनी उंगलियों में पहन लिया। इन अंगूठियों का कैसा अनुपम सौभाग्य है जो प्रिया जी की करुणामयी कृपामयी कोमल हाथों का सानिध्य प्राप्त है।
फिर श्यामसुंदर श्री राधा रानी के नूपुर पायलों को अपने हाथों से उठाया और अपने ह्रदय से लगा लिया। श्यामसुंदर भाव विभोर हो गए थे। उनके नैन सजल हो गए नैनों से अश्रु धारा बहने लगी। श्यामसुंदर ने प्रिया जी के नूपुरों को अपने अधरों से लगाया और उन्हें चूमा और कहने लगे कैसे सराहना करूं इन नूपुरों की ? परम करुणा में श्री राधा रानी अपने श्री चरणों में धारण करती हैं। प्रिया के श्री चरणों में मेरी जीवन धन है। कैसा सौभाग्य है इन नूपुरों का जो जिन्हें प्रिया जू श्री चरणों का सानिध्य मिला हुआ है। प्रिया जी के बिछिया और नुपर को देख कर कहने लगे प्रिया जी चाहे कोई योग्य हो या अयोग्य हो हर किसी को अपने उन्मुक्त भाव से आश्रय देती हैं।

राधा रानी की हाथ में अंगूठियां इस बात की साक्षी हैं कि राधा रानी की कर कमलों में जिनको जो वरदान दिया है वह सदा अमोघ है, और यह राधा रानी के कुंडल इस बात के साक्षी है की प्रिया जी सदा सब की सुनती हैं कोई भी सखी हो यह मंजरी हो ऐसी कोई नहीं जिसके कथन पर तो प्रिया ने ध्यान ना दिया हो। पिया जू हर अपने भक्तों की बात का ध्यान देती हैं यह कुंडल इस बात के साक्षी हैं कि प्रिया जी अपने भक्तों की बातें कितनी ध्यान से सुनती हैं। प्रिया जो की नथ इस बात की साक्षी है कि वह अपने हर भक्त की जीवन की सांसो का संचार करती हैं, जीवन प्राण हैं। अपने भक्तों पर प्रिया जी का हार इस बात का साक्षी है कि प्रिया जी अपने भक्तों को अपने हृदय में स्थान देती हैं। सभी आभूषणों को श्यामसुंदर ने अपने हृदय से लगाया श्यामसुंदर के नयन सजल हो गए और

उनके नैनों से अश्रुधारा बहने लगी। फिर श्यामसुंदर ने एक-एक करके सारे अलंकार पहने अपनी उंगलियों में प्रिया जू की अंगूठी पहनी। अपने पैरों में प्रिया जी की पायल पहनी अपने कानों में प्रिया जू का कुंडल पहना अपने गले में प्रिया जू का कंठहार पहना अपने कमर में प्रिया जू की करधनी जू पहनी। सभी अलंकारों को एक-एक करके धारण किया और भावुक होकर इस आनंद का अनुमोदन करने लगे जो प्रिया जी अलंकारों को पहन कर आनंद पाती हैं। उसी समय प्रिया जी रति और रूप मंजरी के साथ श्रृंगार कक्ष में आई और देखा श्यामसुंदर उनके अलंकारों की अपने अंगों पर पहने हुए हैं। श्यामसुंदर के इस छवि को देखकर प्रियाजी परम परमानंद पाया। प्रियाजी पुलकित कायमान हो गई। अपने प्रियतम का अद्भुत प्रेम अपने अलंकारों के प्रति देखकर कभी रूप मंजरी रतिमंजरी से कहने लगीं- कैसा अनुपम सौभाग्य है इन अलंकारों को जो आज श्यामसुंदर अपना प्रेम रस भर रहे हैं इन अलंकारों को। जिससे प्रिया जी जब इन्हें धारण करें श्याम सुंदर की प्रेम से सराबोर हो जाएँ ऐसे अलंकारों के सौभाग्य की जय हो।

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कृष्ण और बलराम जी की शरारत

एक दिन माता यशोदा दही मथकर माखन निकाल रहीं थीं। अचानक माँ को आनन्द देने के लिए बलराम और श्याम उनके निकट पहुँच गए। कन्हैया ने माँ की चोटी पकड़ ली और बलराम ने मोतियों की माला। दोनों माँ को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करने लगे।

बलराम कहते थे, माँ तुम पहले मेरी सुनो और कन्हैया कहते थे कि नहीं, माँ तुम्हें पहले मेरी सुननी पड़ेगी, मैया! मुझे भूख लगी है। भूख से मेरा बुरा हाल है। चलो ना जल्दी से मुझे माखन रोटी दे दो यशोदा जी ने कहा- बेटा! दूध पी लो या घर में अनेक प्रकार के पकवान बने हैं जो तुम्हारी इच्छा हो खा लो। कन्हैया ने कहा- नहीं, मैं तो केवल माखन रोटी ही खाऊँगा। मेवा पकवान मुझे अच्छे नहीं लगते। जब तक तुम मुझे माखन नहीं दे दोगी तब तक मैं तुम्हारी चोटी खीचता ही रहूँगा। माँ ने कहा- कन्हैया अगर तू माखन खायेगा तो तेरी यह चोटी छोटी रह जाएगी, कभी नहीं बढ़ेगी। कन्हैया ने कहा- माँ, तुम दाऊ भैया को तो कभी मना नहीं करती, वह जब भी माँगते हैं तुम उन्हें माखन रोटी दे देती हो। मुझे क्यों नहीं दे रहीं हो? माँ ने कहा- कान्हा देखो, पहले मैं दाउ को भी माखन रोटी नहीं देती थी, वह भी मेवा पकवान खाता था और दूध पीता था, तभी तो उसकी चोटी लंबी-चौड़ी है। यदि तुम भी दूध पीओगे तो तुम्हारी भी चोटी लंबी हो जाएगी। जाओ मेरे लाल अच्छे बच्चे जिद नहीं करते। कान्हा ने कहा- माँ तुम झूठ बोलती हो, कितनी बार मैने दूध पिया है पर मेरी चोटी अब तक नहीं बढ़ी।। आज तुम्हारा बहाना नहीं चल सकता। तुम्हें मुझे माखन रोटी देनी ही पड़ेगी। मैया ने कहा कान्हा दाउ अब बड़ा हो गया है। इसने तुमसे अधिक दिनों तक दूध पिया है। इसलिए दाउ की चोटी बढ़ गयी, जब तुम भी उतने ही दिनों तक दूध पी लोगे तब तुम्हारी भी चोटी बढ़ जाएगी। कन्हैया ने कहा- मैया मैं यह सब नहीं सुनूँगा तुम साफ-साफ बताओ मुझे माखन रोटी देती हो कि नहीं, यदि तुम मुझे माखन रोटी नहीं दोगी तो, जाओ मैं तुमसे बात नहीं करूँगा। ना ही तुम्हारी गोदी में आऊँगा। अब दाऊ भैया ही तुम्हारे पुत्र हैं, मैं भला तुम्हारा क्या लगता हूँ। माता यशोदा ने कहा- कान्हा तू तो मेरा प्राण है मैं भला तेरे बिना कैसे रह सकती हूँ। मेरे नन्हे लाल मैं तेरी बलैया लेती हूँ। तनिक रूको। मुझे माखन तो निकाल लेने दो, फिर तुम्हे जितना माखन चाहिए ले लेना। इस प्रकार माता यशोदा की आँखों से प्रेमाश्रु छलक पड़े। यशोदा मैया धन्य हैं। त्रिभुवन का भरण पोषण करने वाले प्रभु माखन के लिए बार-बार उनके हाथ फैलाते हैं। यशोदा मैया से बड़ा सौभाग्य भला किसका होगा।

“जय जय श्री राधे”

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एक अद्भुद लीला

“नागा बाबा (कदम खण्ड़ी)”

वृन्दावन में एक महात्मा जी का निवास था लोग उन्हें नागा बाबा के नाम से जानते थे जो युगल स्वरुप की उपासना किया करते थे। एक बार वे महात्मा जी संध्या वन्दन के उपरान्त कुंजवन की राह पर जा रहे थे, मार्ग में महात्मा जी जब एक वटवृक्ष के नीचे होकर निकले तो उनकी जटा उस वट-वृक्ष की जटाओं में उलझ गईं, बहुत प्रयास किया सुलझाने का परन्तु जब जटा नहीं सुलझी तो महात्माजी आसन जमा कर बैठ गए, कि जिसने जटा उलझाई है वो सुलझाने आएगा तो ठीक है नही तो मैं ऐसे ही बैठा रहूँगा और बैठे-बैठे ही प्राण त्याग दूँगा।

तीन दिन बीत गए महात्मा जी को बैठे हुए। एक सांवला सलोना ग्वालिया आया जो पाँच-सात वर्ष का रहा होगा। वो बालक ब्रजभाषा में बड़े दुलार से बोला- “बाबा ! तुम्हारी तो जटा उलझ गईं, अरे मैं सुलझा दऊँ का” और जैसे ही वो बालक जटा सुलझाने आगे बढ़ा महात्मा जी ने डाँट कर कहा “हाथ मत लगाना पीछे हटो कौन हो तुम ?” ग्वालिया बोला “अरे हमारो जे ही गाम है महाराज ! गैया चरा रह्यो तो मैंने देखि महात्माजी की जटा उलझ गईं हैं, तो मैंने सोची ऐसो करूँ मैं जाए के सुलझा दऊँ।” महात्माजी बोले, न न न दूर हट जा। ग्वालिया- चौं ! काह भयो ? महात्माजी बोले, “जिसने जटा उलझाई हैं वो आएगा तो ठीक नहीं तो इधर ही बस गोविन्दाय नमो नमः” ग्वालिया, “अरे महाराज तो जाने उलझाई है वाको नाम बताए देयो वाहे बुला लाऊँगो।” महात्माजी बोले, “न जिसने उलझाई है वो अपने आप आ जायेगा। तू जा नाम नहीं बताते हम।”

कुछ देर तक वो बालक महात्मा जी को समझाता रहा परन्तु जब महात्मा जी नहीं माने तो उसी क्षण ग्वालिया के भेष को छुपा कर ग्वालिया में से साक्षात् मुरली बजाते हुए मुस्कुराते हुए भगवान बाँकेबिहारी प्रकट हो गए। सांवरिया सरकार बोले “महात्मन मैंने जटा उलझाई हैं ? लो आ गया मैं।” जैसे ही सांवरिया जी जटा सुलझाने आगे बढे। महात्मा जी ने कहा- “हाथ मत लगाना, पीछे हटो, पहले बताओ तुम कौन से कृष्ण हो ?” महात्मा जी के वचन सुनकर सांवरिया जी सोच में पड़ गए, अरे कृष्ण भी दस-पाँच होते हैं क्या ? महात्मा जी फिर बोले “बताओ भी तुम कौन से कृष्ण हो ?” सांवरिया जी, “कौन से कृष्ण हो मतलब ?” महात्माजी बोले, “देखो कृष्ण भी कई प्रकार के होते हैं, एक होते हैं देवकीनंदन कृष्ण, एक होते हैं यशोदानंदन कृष्ण, एक होते हैं द्वारकाधीश कृष्ण, एक होते हैं नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण। सांवरिया जी, “आपको कौन-सा चाहिए ?” महात्माजी, “मैं तो नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण का परमोपासक हूँ।” सांवरिया जी बोले, “वही तो मैं हूँ। अब सुलझा दूँ ?” जैसे ही जटा सुलझाने सांवरिया सरकार आगे बढे तो महात्माजी बोल उठे, “हाथ मत लगाना, पीछे हटो, बड़े आये नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण, अरे नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण तो किशोरी जी के बिना मेरी स्वामिनी श्री राधारानी के बिना एक पल भी नहीं रहते। तुम अकेले सौंटा से खड़े हो।”

महात्मा जी के इतना कहते ही सांवरिया जी के कंधे पर श्रीजी का मुख दिखाई दिया, आकाश में बिजली सी चमकी और साक्षात् वृषभानु नंदिनी, वृन्दावनेश्वरी, रासेश्वरी श्री हरिदासेश्वरी स्वामिनी श्री राधिका जी अपने प्रीतम को गल-बहियाँ दिए महात्मा जी के समक्ष प्रकट हो गईं और बोलीं, “बाबा ! मैं अलग हूँ क्या अरे मैं ही तो ये कृष्ण हूँ और ये कृष्ण ही तो राधा हैं, हम दोनों अलग थोड़े न है हम दोनों एक हैं।” अब तो युगल स्वरुप का दर्शन पाकर महात्मा जी आनंदविभोर हो उठे। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी, और जैसे ही किशोरी राधा-कृष्ण जटा सुलझाने आगे बढे़ महात्मा जी चरणों में गिर पड़े और बोले, “अब जटा क्या सुलझाते हो युगल जी अब तो जीवन ही सुलझा दो मुझे नित्य-लीला में प्रवेश देकर इस संसार से मुक्त करो दो।” महात्मा जी ने ऐसी प्रार्थना करी और प्रणाम करते-करते उनका शरीर शांत हो गया स्वामिनी जी ने उनको नित्य लीला में स्थान प्रदान किया। बरसाने से आठ किलोमीटर दूर वह स्थान ‘कदम खण्ड़ी’ गाँव में स्थित है, जहाँ नागा बाबा की समाधि है।

जय जय श्री राधे

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राधारानी का दिव्य नुपुर

श्री जीव गोस्वामी ने दुखी कृष्णदास को भक्ति शास्त्र का ज्ञान दिया इसीलिए श्री जीव गोस्वामीजी दुखी कृष्णदास प्रभु के शिक्षा गुरु थे एवं उन्होंने ही इन्हें प्रिया-प्रियतम की नित्य रासलीला के क्षेत्र निधिवन में झाड़ू लगाने की सेवा प्रदान की। दुखी कृष्णदास सदा श्रीराधा-कृष्ण की निकुंज-लीला के स्मरण में निमग्न रहते थे और प्रतिदिन कुंज की सोहिनी और खुरपे से सेवा करते थे। 12 साल तक दुखी कृष्ण दास इस तरहां ठाकुरजी की सेवा करते रहे और उनकी भक्ति में दिनों दिन डूबते रहे।
एक दिन जब कृष्णदास अपनी सोहिनी और खुरपा लेकर कुंज में आए तो उन्हें झाड़ू लगाते समय पहले तो रास लीला के निशान मिलते हैं और फिर अनार के पेड के नीचे वह दुर्लभ अलौकिक नूपुर दिखाई पडा, जिसे देखकर वे विस्मित हो गए उस अति सुन्दर अद्वितीय नुपुर कि चकाचौध से निधिवन प्रकाशमान हो रहा था, वे सोचने लगे यह अलौकिक नुपुर किसका है ? उन्होंने खुशी-खुशी उसे सिर माथे से लगाया, और उसे उठाकर उन्होंने अपने उत्तरीय में रख लिया और फिर वे रासस्थली की सफाई में लग गए।
जब ठाकुर जी के साथ राधा रानी रास लीला में नाच गा रहें थे, उसी दौरान राधारानी जब श्रीकृष्ण को अधिक आनंद प्रदान करने के लिए तीव्र गति से नृत्य कर रही थीं। उस समय रासेश्वरी के बाएं चरण से इन्द्रनील मणियों से जडित उनका मंजुघोष नामक नूपुर रासस्थली में गिर गया, किंतु रासलीला में मग्न होने के कारण उन्हें इस बात का पता न चला। नृत्य की समाप्ति पर राधा कृष्ण कुंजों में सजाई हुई शैय्या पर शयन करने चले जाते हैं, और अगली सुबह उठकर वे सब अपने घर चले जाते हैं। इधर प्रात: जब राधा रानी को यह मालूम हुआ कि उनके बाये चरण का मंजुघोषा नाम का नुपुर निधिवन में गिर गया है। थोडी देर पश्चात राधारानी उस खोए हुए नूपुर को ढूंढते हुए अपनी सखियों ललिता, विशाखा आदि के साथ जब वहां पधारीं तो वे लताओं की ओट में खडी हो गयीं, और ललिता जी को ब्रह्माणी के वेश में कृष्ण दास के पास भेजा, तब श्री ललिता सखी दुखी कृष्ण दास के पास पहुँची और उनसे कहा,- बाबा क्या तुम्हें यहाँ पर कोई नूपुर मिला है ? मुझे दे दो, किशोरी जी का है।
मंजरी भाव में दुखी कृष्णदास ने डूबे हुए उत्तर दिया, हम अपने हाथों से प्रियाजी को पहनाएँगी। इस पर राधारानी के आदेश से ललिताजी ने कृष्णदास को राधाजी का मंत्र प्रदान करके उन्हें राधाकुंड में स्नान करवाया, इससे कृष्णदास दिव्य मंजरी के स्वरूप को प्राप्त हो गए सखियों ने उन्हें राधारानीजी के समक्ष प्रस्तुत किया…उन्होंने वह नूपुर राधाजी को लौटा दिया। राधारानी ने प्रसन्न होकर नूपुर धारण करा उसके पहले ललिताजी ने उस नूपुर का उनके ललाट से स्पर्श कराया तो उनका तिलक राधारानीजी के चरण की आकृति वाले नूपुर तिलक में परिवर्तित • हो गया। राधारानी ने स्वयं अपने करकमलों द्वारा उस तिलक के मध्य में एक उज्ज्वल बिंदु लगा दिया। इस तिलक को ललिता सखी ने ‘श्याम मोहन तिलक’ का नाम दिया। कहीं काली बिंदी लगाते हैं। विशाखा सखी ने बताया की दुखीकृष्ण दास जी कनक मंजरी के अवतार हैं।

राधारानी ने श्री दुखीकृष्ण दास जी को मृत्युलोक में आयु पूर्ण होने तक रहने का जब आदेश दिया तो वे स्वामिनी जी से विरह की कल्पना करते ही रोने लगे। तब राधारानी ने उनका ढांढस बंधाने के लिए अपने हृदयकमल से अपने प्राण-धन श्रीश्यामसुंदर के दिव्य विग्रह को प्रकट करके ललिता सखी के माध्यम से श्यामानंद को प्रदान किया। यह घटना सन् 1578 ई. की वसंत पंचमी वाले दिन की है। श्यामानंदप्रभु श्यामसुंदरदेव के उस श्रीविग्रह को अपनी भजन कुटीर में विराजमान करके उनकी सेवा-अर्चना में जुट गए। सम्पूर्ण विश्व में श्री श्याम सुन्दर जी ही एक मात्र ऐसे श्री विग्रह हैं जो श्री राधा रानी जी के हृदय से प्रकट हुए हैं।

दुखी कृष्ण दास ने जब यह वृतांत श्री जीव गोस्वामी को सुनाया तो किशोरीजी की ऐसी • विलक्षण कृपा के बारे में सुनकर जीव गोस्वामी जी कृष्ण भक्ति में पागल हो गये और खुश होकर नृत्य करने लगे। कृष्ण प्रेम में रोते हुए जीव गोस्वामी ने दुखी कृष्ण दास से कहा कि “तुम इकलौते ऐसे व्यक्ति हो इस संसार में जिसपर श्री राधारानी की ऐसी कृपा हुई है, और तुम्हारा स्पर्श पाकर में भी उस कृपा को प्राप्त कर रहा हूँ। आज से वैष्णव भक्त तुम्हें ‘श्यामानंद” नाम से जानेंगे, और तुम्हारे तिलक को “श्यामानन्दी” तिलक और श्री राधा रानी ने जो तुम्हें श्री विग्रह प्रदान किया है वो श्यामसुंदर नाम से प्रसिद्ध होंगे और अपने दर्शनों से अपने भक्तों पर कृपा करेंगे।

मन्दिर के पथ के उस पार एक गृह में श्री श्यामानंद प्रभु का समाधि स्थल है। राधाश्यामसुन्दर जी का मन्दिर वृन्दावन का पहला मन्दिर है जिसने मंगला आरती की शुरुआत की, और जो आज तक सुचारू रूप से हो रही है। कार्तिक मास में इस मन्दिर में प्रतिदिन भव्य झाँकियों के दर्शन होते हैं और अक्षय तृतीया पर दुर्लभ चन्दन श्रृंगार किया जाता है।

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श्रीगोपालदास बाबाजी ‘उत्सवी’

(वृन्दावन)


गङ्गा-तटपर एक निर्जन स्थान में श्रीमद्भागवत की कथा बैठी है। वक्ता हैं एक महात्मा, जिनके शरीर पर एक लंगोटी के सिवा और कुछ नहीं है। श्रोता हैं स्वयं गङ्गा महारानी। महात्मा तन्मय हो गङ्गा माता को लक्ष्य कर उच्च स्वर से कथा कह रहे हैं। गङ्गा कल-कल करती हुँकारें भर रही हैं। और कोई श्रोता वहाँ नहीं है। किसीको निमन्त्रण भी नहीं है।

पर भ्रमर निमन्त्रण की प्रतीक्षा कब करता है ? जहाँ भी पुष्प खिलता है, वहाँ पहुँच जाता है। पुष्प के सौरभ को पवन दिक्-विदिक् ले जाता है। उसी को भ्रमर निमन्त्रण मान लेता है। श्रीमद्भागवत की कथा में भी कुछ ऐसा ही दिव्य आकर्षण है। कथा की स्वर-लहरी से स्पन्दित आकाश के अणु-परमाणुओं ने जाकर स्पर्श किया कहीं दूर ध्यानमग्न बैठे परमहंस वृत्ति के एक महात्मा को। वे वहाँ आ विराजे कथा के दूसरे श्रोता के रूप में।

तीसरे श्रोता स्वयं श्रीनन्दनन्दन तो अलक्षित रूप से वहाँ रहे होंगे ही। उन्होंने कहा जो है-‘मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद-हे नारद ! मेरे भक्त जहाँ मेरा गुणगान करते हैं, मेरी लीला-कथा कहते हैं, वहाँ मैं जा बैठता हूँ।’ उन्हीं को लक्ष्य कर परमहंसजी ने कहा-‘जिनकी कथा हो रही है, उनके लिए कुछ भोग तो रखा नहीं। उन्हें माखन-मिश्री बहुत प्रिय हैं।

उसी समय शुभ्र वस्त्र धारण किये एक वृद्धा माखन-मिश्री लेकर वहाँ लायीं। नन्दनन्दन को माखन-मिश्री का भोग लगाया गया। कथा के पश्चात् दोनों महात्माओं ने उसका सेवन किया। उसके अलौकिक स्वाद और गंध से दोनों चमत्कृत हो गये। उसे ग्रहण करने के पश्चात् सात दिन तक उन्हें भूख नही लगी। एक दिव्य मस्ती बराबर छायी रही। दोनों ने समझ लिया कि माखन-मिश्री लाने वाली वृद्धा स्वयं गङ्गा महारानी ही थीं, अन्य कोई नहीं।

गङ्गा महारानी में इतनी निष्ठा रखने वाले और उन्हें श्रीमद्भागवत की कथा सुनाने वाले यह महात्मा थे निम्बार्क सम्प्रदाय के श्रीमत् स्वभू-रामदेवाचार्य की परम्परा में जूनागढ़ के गोदाबाव स्थान के महन्त श्रीमत-सेवादासजी महाराज के शिष्य श्रीगोपालदासजी। टीकमगढ़के निकट किसी ग्राम में गौड़ ब्राह्मण कुल में सम्वत् १८६८ में उनका प्रादुर्भाव हुआ। बाल्यकाल में ही जूनागढ़ के श्रीसेवादासजी महाराज से दीक्षा ले वे चारों धाम की यात्रा को निकल पड़े। यात्रा समाप्त कर व्रज के अन्तर्गत कामवन में रहने लगे। परसरामद्वारे के पण्डित रघुवरदासजी से श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों का अध्ययन किया। भगवत्कथादि में आसक्ति के साथ-साथ उनका वैराग्य दिन-पर-दिन बढ़ता गया। कुछ दिन बाद वे केवल एक लंगोटी लगाये, बगल में श्रीमद्भागवत दबाये गंगा-तट पर चले गये। गङ्गा के किनारे-किनारे जहाँ-तहाँ विचरते रहे और गङ्गाजी को श्रीमद्भागवत सुनाते रहे। गंगा महारानी का आशीर्वाद ले व्रज लौट आये और वृन्दावन में रहने लगे।

वृन्दावनमें वे उदरपूर्ति मधुकरी द्वारा करते और आत्मपूर्ति भगवान् कघ लीला-कथाओं द्वारा। राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं के मनन और कीर्तन में ही उनका सारा समय व्यतीत होता। उनकी श्रीमद्भागवत की कथा वृन्दावन में कहीं-न-कहीं होती रहती। कथा बड़ी रसमय होती। शुक सम्प्रदाय के रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरीजी भी कथा में आया करते।

वैष्णव सेवा में उनकी बड़ी निष्ठा थी। कथाओं में जो भेंट आती, उससे महावन के निकट दाऊजी के मन्दिर में जाकर वैष्णव-सेवा कर दिया करते एक बार दाऊजी ने स्वप्न में वृन्दावन में ही वैष्णव-सेवा करते रहने का आदेश दिया। तब से वे वृन्दावन में सेवा करने लगे।

उन्हें प्रेरणा हुई श्रीनिम्बार्काचार्य का जन्मोत्सव मनाने की। उन्होंने इस उत्सव की प्रथा डाली, जो आज तक चली आ रही है। प्रतिवर्ष वे श्रीनिम्बार्काचार्य की जन्म-तिथि पर विशाल शोभायात्रा, श्रीमद्भागवत-सप्ताह, रास-लीला, समाज-गान और ब्राह्मण-वैष्णव-भोजन आदि की व्यवस्था करते। बड़ी धूमधाम से सारा उत्सव मनाते। उसके लिए उनके प्रभाव से धन भी पर्याप्त मात्रा में आ जाता। उसका एक-एक पाई खर्च कर अन्त में अपने लंगोटी और करुआ ले किनारे हो जाते। संचय एक पैसा भी न करते।

एक बार इस उत्सव के अवसर पर उन्होंने २०० ब्राह्मणों द्वारा श्रीमद्भागवत-पाठ की व्यवस्था की। पर उन्हें ज्वर हो आया। अतः धन की समुचित व्यवस्था न हो सकी। पाठ आरम्भ हो गया। वे चिन्ता में पड़ गये कि ब्राह्मणों को दक्षिणा कहाँ से दी जायगी। तब प्रियाजी ने स्वप्न में दर्शन दे ढाढ़स बंधाया। दूसरे दिन एक परदेसी साहूकार आया। उसने उत्सव का सारा भार अपने ऊपर ले लिया। कई दिन तक कथा-कीर्तन, रास और वैष्णव-भोजनादि का दौर आनन्दपूर्वक चलता रहा। अन्त में साहूकार ने मोहरों की दक्षिणा दे ब्राह्मणों को तृप्त किया। इन उत्सवों के कारण ही गोपालदासजी का नाम ‘उत्सवीजी’ पड़ गया।

गोपालदासजी भक्तमाल की कथा भी बहुत सुन्दर कहते। जिस शैली में भक्तमाल की कथा का आज प्रचलन है, उसका सूत्रपात्र उन्हीं से हुआ। उन्ही से प्रसिद्ध भक्तमाली टोपीकुञ्ज के श्रीमाधवदास बाबाजी ने भत्तमाल का अध्ययन किया।

उनकी जैसी कथनी थी, वैसी ही करनी थी। इसलिए उनकी वाणी में ओज था। उसका लोगों पर स्थायी और गंभीर प्रभाव पड़ता था। बहुत-से लोगों में उससे चमत्कारी परिवर्तन हुआ। बहुत-से उनसे मन्त्र-दीक्षा ग्रहण कर भक्ति-पथ के पथिक बने।

उनके शिष्यों में प्रधान थे बाबा हंसदासजी, बाबा श्यामदासजी, बाबा कारे कृष्णदासजी, बाबा किशोरीदासजी, बाबा राधिकादासजी, राजा भवानीसिंहजी और श्रीमती गोपाली बाई। इनके अतिरिक्त श्रीसुदर्शनदासजी (ललित प्रियाजी) जैसे बहुत-से रसिक महानुभावों ने उनसे भजन-प्रणाली- की शिक्षा ग्रहण की।

सम्वत् १९५२ में उन्हें निकुञ्ज-प्राप्ति हुई।

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क्या श्रीस्वामिनी जू ने मेरी पुकार नहीं सुनी ?

प्र०- महाराज जी ! मेरी वृन्दावन वास करने की दृढ़ इच्छा है, कई वर्षों से वृन्दावन भी आ रहा हूँ लेकिन यहाँ अभी तक वास नहीं हो पाया, मुझे लगता है कि श्रीस्वामिनी जू ने मेरी पुकार नहीं सुनी ?

समाधान : ऐसा हम नहीं मान सकते; इसलिये नहीं मान सकते क्योंकि श्रीकिशोरीजू का बहुत करुणामय स्वभाव है । यदि आपकी अन्यत्र आसक्ति या राग बना हुआ है और फिर आप प्रार्थना कर रहे हैं तो अलग बात है अन्यथा ऐसा हो ही नहीं सकता कि श्रीजी पुकार न सुनें ।

जैसे श्रीरामजी की शरण में विभीषणजी आये और प्रभु को प्रणाम करके अविरल भक्ति की याचना करने लगे तो रामजी ने पहले अविरल भक्ति नहीं दी, पहले समुद्र का जल मँगाकर उनका तिलक किया लंकाधिपति पद का तो विभीषणजी भगवान् की तरफ देखे कि प्रभु मैं तो ये नहीं चाहता, मैं तो आपके चरणारविन्दों की अविरल भक्ति चाहता हूँ । प्रभु बोले ‘नहीं नहीं, ये थी तुम्हारे अन्दर वासना। विभीषण जी ने स्वयं स्वीकार भी किया- ‘उर कछु प्रथम वासना रही ।’ (सुन्दरकाण्ड-५९) अतः आपके अन्दर जो अन्य कामना है, उसके हटने पर जब हृदय में सिर्फ एक माँग रह जाएगी कि मुझे वृन्दावन वास मिल जाए तो हम निश्चित कहते हैं स्वामिनी जू जैसा कृपालु कोई है ही नहीं और वृन्दावन वास के लिए कभी ऐसा हो ही नहीं सकता कि स्वामिनी जू अनसुना कर दें । बात होती है हमारी अन्य आसक्ति, अन्य चाह, अन्य माँग की; इसलिए फिर स्वामिनी जू अन्दर की बात देखती हैं। हम बाहर से कह रहे हैं ‘हा राधे ! – आपके सिवाय मेरा कोई नहीं’ लेकिन अन्दर से जाने कितनों को हम अपना माने बैठे हैं, इसलिए श्रीजी कहती हैं थोड़ा और ये संसार का राग देख ले, फिर जब असलियत में आकर के कहेगा कि आपके सिवाय मेरा कोई नहीं, उसी समय मैं इसे स्वीकार कर लूँगी और धामवास दे दूँगी ।

यदि उनकी अभी कृपा प्राप्त करनी है तो अन्य राग, अन्य आसक्ति का अभी इसी समय से त्याग कर दो । जितने सांसारिक सम्बन्ध हैं ये सब मिथ्या अर्थात् स्वापनिक हैं –

मात- तात – सुत-दार देह में, मति अरुझै मति मंदा ।

हित किशोर कौ है चकोर तू, लखि ‘वृन्दावन चन्दा’ ॥ अभी निश्चय करो कि प्रियालाल के सिवाय हमारा कोई नहीं है फिर आप देखो वृन्दावन वास होता है कि नहीं ।

श्रीलाड़िलीजू जैसा दयालु कोई है ही नहीं, दया की समुद्र हैं, कोई ये कहे कि राधा किशोरी हमारी बात नहीं सुनती हैं तो ये बात – हमारी समझ में नहीं आती है । श्रीहितध्रुवदास जी कहते हैं.

सहज सुभाव पर्यो नवल किसोरी जू की, मृदुता दयालुता कृपालुता की रासि हैं । नॅकहू न रिस कैहूँ भूलेहूँ न होत सखी, रहत प्रसन्न सदा हियै मुख हाँसि हैं ।

श्रीहितजू महाराज भी यही बात श्रीमद् राधासुधानिधि जी में

र्वात्सल्यसिन्धुरतिसान्द्र कृपैकसिन्धुः ।

कहते हैं – वैदग्ध्यसिन्धुरनुराग रसैकसिन्धु

लावण्यसिन्धु रमृतच्छवि रूपसिन्धुः

श्रीराधिका स्फुरतु मे हृदि केलिसिन्धुः ॥ (१७)

श्रीस्वामिनीजू कृपा, दया, वात्सल्य आदि की अगाध समुद्र हैं। अब अगाध समुद्र का हम कैसे भाव समझ पायेंगे । हमारे वात्सल्य सिन्धु प्रभु श्रीकृष्ण के एक अंश से अनंत माताओं का वात्सल्य है और एक माँ में इतना वात्सल्य होता है कि उसका लड़का उसके थप्पड़ मारे, लेकिन अगर बालक को जरूरत पड़ जाए उसके कलेजे की तो वह अपना कलेजा चीरकर उसी बालक को दे देगी, जिसने थप्पड़ मारा है । श्रीशंकराचार्य जी ने लिखा है –

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।

‘पुत्र कुपुत्र हो सकता है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती ।’ श्रीकबीरदास जी भी एक पद में कहते हैं. –

66/118

सुत अपराध करै दिन केते, जननी के चित रहे न तेते ।

कर गहि केस करे जो घाता, तऊ न हेत उतारै माता ॥

ये है वात्सल्य का एक छोटा-सा नमूना । ऐसे हमारे श्रीकृष्ण बात्सल्यसिन्धु हैं और ऐसे श्रीलालजू को भी दुलार जहाँ से मिलता है, ऐसी हमारी महावात्सल्यमयी श्रीप्यारीजू हैं । इसलिए वह हमारी बात सुनती हैं लेकिन जब अन्दर अन्य आसक्तियों होती हैं तो फिर श्रीजी इन्तजार करती हैं कि जब पूर्ण तन्मय होकर के ये मेरी और देखेगा, तब मैं इसे स्वीकार कर लूँगी

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क्यों करते है कृष्ण राधारानी की पूजा?

राधा में ‘रा’ धातु के बहुत से अर्थ होते हैं। देवी भागवत में इसके बारे में लिखा है कि जिससे समस्त कामनायें, कृष्ण को पाने की कामना तक भी, सिद्ध होती हैं। सामरस उपनिषद में वर्णन आया है कि राधा नाम क्यों पड़ा ?

राधा के एक मात्र शब्द से जाने कितने जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं

र शब्द का अर्थ है = जन्म-जन्मान्तर के पापों का नाश ।

अ वर्ण का अर्थ है = मृत्यु, गर्भावास, आयु, हानि से छुटकारा ।

ध वर्ण का अर्थ है = श्याम से मिलन।

अ वर्ण का अर्थ है = सभी बन्धनों से छुटकारा

भगवान सत्य संकल्प हैं। उनको युद्ध की इच्छा हुई तो उन्होंने जय विजय को श्राप दिला दिया। तपस्या की इच्छा हुई तो नर-नारायण बन गये । उपदेश देने की इच्छा हुई तो भगवान कपिल बन गये। उस सत्य संकल्प के मन में अनेक इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं। भगवान के मन में अब इच्छा हुई कि हम भी आराधना करें। हम भी भजन करें।

अब किसका भजन करें? उनसे बड़ा कौन है? तो श्रुतियाँ कहती हैं कि स्वयं ही उन्होंने अपनी आराधना की। ऐसा क्यों किया? क्योंकि वो अकेले ही तो हैं, तो वो किसकी आराधना करेंगे। तो श्रुति कहती हैं कि कृष्ण के मन में •आराधना की इच्छा प्रगट हुई तो श्री कृष्ण ही राधा रानी के रूप में आराधना से प्रगट हो गये।

“जय जय श्री राधे”

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मोती या मुक्ता कुण्ड

नन्दीश्वर तड़ागके उत्तरमें लगभग एक मीलपर मुक्ता कुण्ड अवस्थित है। करील और पीलूके वृक्षोंसे परिवेष्टित बहुत ही रमणीय स्थान है। कृष्ण गोचारणके समय सखाओंके साथ इस कुण्डमें गायोंको जल पिलाकर स्वयं भी जलपानकर विविध प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते थे। किसी समय कृष्णने यहाँपर मुक्ताओंकी खेतीकर प्रचुर रूपमें मुक्ताएँ पैदा की थीं।

प्रसंग –

जब कृष्णने पौगण्ड अवस्थाको पारकर किशोर अवस्थामें प्रवेश किया, उस समय यशोदा मैया कृष्णकी सगाईके लिए चिन्ता करने लगीं। उनको वृषभानु महाराजकी कन्या सर्वगुणसम्पन्ना किशोरी राधिका बड़ी पसन्द थी। यह बात कीर्तिकाजीको मालूम हुई। उन्होंने अपने पति वृषभानुजीसे कहकर विविध प्रकारके कपड़े-लत्ते, अलंकार, प्रचुर मुक्ताओंको एक डलियामें भरकर नन्दभवनमें सगाईके लिए भेजा। ब्रजराजनन्द एवं ब्रजरानी यशोदा इसे देखकर बड़े प्रसन्न हुए, किन्तु सिरपर हाथ रखकर यह सोचने लगे कि हमें भी बरसानामें इसके बदले सगाईके लिए इससे भी अधिक मुक्ताएँ भेजनी पड़ेगीं। किन्तु घरमें उतनी मुक्ताएँ नहीं हैं। इस प्रकार बहुत चिन्तित हो रहे थे। इतनेमें कृष्णने कहींसे घरमें प्रवेशकर माता-पिताको चिन्तित देख चिन्ताका कारण पूछा। मैयाने अपनी चिन्ताका कारण बतलाया। कृष्णने कहा कोई चिन्ताकी बात नहीं। मैं शीघ्र ही इसकी व्यवस्था करता हूँ। इसके पश्चात् कृष्णने अवसर पाकर उन मुक्ताओंको चुरा लिया और इसी कुण्डपर मिट्टी खोदकर उनको बो दिया। गायोंके दूधसे प्रतिदिन उन्हें सींचने लगे। इधर नन्दबाबा और मैया यशोदा मुक्ताओंको न देखकर और भी चिन्तित हो गयीं। उन्होंने कृष्णसे मुक्ताओंके सम्बन्धमें पूछा। कृष्णने

कहा- हाँ! मैंने उन मुक्ताओंकी खेती की है और उससे प्रचुर मुक्ताएँ निकलेंगी। ऐसा सुनकर बाबा और मैयाने कहा- अरे लाला! कहीं मुक्ताओंकी भी खेती होती है। कृष्णने मुस्कराकर कहा- हाँ, जब मेरी मुक्ताएँ फलेगीं तो तुम लोग देखना। बड़े आश्चर्यकी बात हुई। कुछ ही दिनोंमें मुक्ताएँ अंकुरित हुईं और उनसे हरे-भरे पौधे निकल आये। देखते-ही-देखते कुछ ही दिनों में उन पौधोंमें फल लग गये। अनन्तर उन फलोंके पुष्ट और पक जानेपर उनमेंसे अलौकिक प्रभा सम्पन्न उज्ज्वल दिव्य लावण्ययुक्त मुक्ताएँ निकलने लगीं। अब तो मुक्ताओंके ढेर लग गये। कृष्णने प्रचुर मुक्ताएँ मैयाको दीं। फिर तो मैयाने बड़ी-बड़ी सुन्दर ३-४ डलियाँ भरकर मुक्ता, स्वर्णालंकार और वस्त्र बरसाने में राधाजीकी सगाईके उपलक्ष्यमें भेज दिये।

इधर श्रीमती राधिकाजी एवं उनकी सखियोंको यह पता चला कि श्रीकृष्णने मुक्ताओंकी खेती की है और उससे प्रचुर मुक्ताएँ पैदा हो रही हैं। तो उन्होंने कृष्णसे कुछ मुक्ताएँ माँगीं। किन्तु कृष्णने कोरा उत्तर दिया कि जब मै मुक्ताओंको सींचनेके लिए तुमसे दूध माँगता था, तब तो तुम दूध देनेसे मना कर देती थीं। मैं अपनी गऊओंको इन मुक्ताओंके अलंकारसे सजाऊँगा, किन्तु तुम्हें मुक्ताएँ नहीं दूंगा। इसपर गोपियोंने चिढ़कर एक दूसरी जगह अपने-अपने घरोंसे मुक्ताओंकी चोरीकर जमीन खोदकर उन मुक्ताओंको बीजके रूपमें बो दिया। फिर बहुत दिनोंतक गऊओंके दूधसे उन्हें सींचा। वे अंकुरित तो हुई, किन्तु उनसे मुक्ता वृक्ष न होकर बिना फलवाले काटोंसे भरे हुए पौधे निकले।

गोपियोंने निराश होकर पुनः कृष्णके पास जाकर सारा वृत्तान्त सुनाया। कृष्णने मुस्कराकर कहा- चलो ! मैं स्वयं जाकर तुम्हारे मुक्तावाले खेतको देखूँगा। कृष्णने वहाँ आकर पुनः सारे मुक्ताके पौधोंको उखाड़कर उसमें पुनः अपने पुष्ट मुक्ताओंको बो दिया और उसे गायोंके दूधसे सींचा। कुछ ही दिनोंमें उनमें भी मुक्ताएँ लगने लगीं। यह देखकर गोपियाँ भी अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं।

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10 . EVIL ADVISERS OF KAMSA

Kamsa had a great weakness. As long he was in the company of noble men, he would behave like a good man. But once he left their company he forgot himself and evil nature took possession of him. The next morning he called the assembly of ministers and told them about the strange happenings in the prison and about the words of Goddess Durga. His ministers were all demons in the shape of men and had natural hatred towards Devas. They said, “You say that your enemy has taken birth somewhere else. Then it is obvious that the child is guarded very carefully. Most probably it will be somewhere away from Mathura. May be in another city or village, in the suburbs, perhaps where the cowherds live. We shall immediately start killing all babies born in the past ten day. Further, the holy men are dear to the gods. The Devas will hide in the houses of the Brahmanas only when they come on earth. So let us also persecute all holy men.” By the evil advice of his friends Kamsa lost the little of goodness that he had evinced earlier. He gave his consent to the evil plans of his advisers. The Asuras went about happily killing the new-born babies and harassing the men. Of course, they were least aware. that death was fast approaching every one of them for their evil acts.

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9 . KAMSA ATTEMPTS TO KILL THE CHILD

THE LITTLE BABY began to cry. The guards, hearing the baby’s cry, rushed to Kamsa and reported, “My Lord, Devaki has given birth to a child. We have hurried here at once to inform you about it.”
Kamsa was lying on his bed, trying to sleep. Sleep had forsaken him for many days. The coming of the eighth child was haunting his mind day and night. He knew no peace, and he could not sleep. When he heard that the child was born, he snatched a sword and rushed to the prison to kill it. Devaki saw him coming with that dire intent. She thought it was Yama himself coming in the form of Kamsa. She at once fell at his feet and said,” O dear brother, this is your daughter-in-law, as it were. Do not kill her. It is only a girl. What can a poor girl do? I am sure, being a girl she will be incapable of fulfilling the prophecy which has frightened you. Spare her. You have already killed so many of my children. Spare for me at least this one daughter.”

She held the child to her bosom crying piteously. Her tears bathed the child. But Kamsa’s ears were deaf to the implorings of Devaki. Like one Devi, the Goddess Durga with eight arms, sporting a variety of weapons. Literally looking down on Kamsa She said, “O Fool! Why this vain effort to kill me? The child destined to kill you has already been born and is growing somewhere else. Do not kill innocent children unnecessarily. Search for your real enemy.” Having said so she disappeared. possessed, he snatched the child away from the hands of Devaki. He seized the child by its tender legs and tried to dash it against a hard stone slab. But the child, which was really Yoga Maya, slipped from his hands and rose into the sky. It appeared there as Kamsa was a devotee of the Goddess Durga.

The appearance of Durga, in Her eight-armed form, holding various weapons, had an immediate effect on his mind. He told himself that if Devaki had given birth to Goddess Durga, she could not be an ordinary woman. He was suddenly ashamed of himself for his cruelty against Vasudeva and Devaki. He immediately removed with his own hands the handcuffs and chains which had bound their hands and feet. He then said to them with humility, “O my dear sister! O Brother! Alas, I am a veritable sinner. I feel extremely sorry for my cruel deeds. I have been guilty of child murder. I dread to think of the hell that will be waiting for me when I die. Pardon my heartless action.” With tears in his eyes, he touched the feet of his sister and her husband, seeking their pardon. Devaki and Vasudeva being very noble, accepted Kamsa’s words and became free from their ill-feeling towards him. They returned to their home. When Kamsa found how noble and forgiving they were, he felt even more humble and returned to his palace with a lighter heart.

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गुरु पूर्णिमा 2022



महर्षि वेदव्यास जी अमर हैं। महान विभूति वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। महर्षि व्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया, इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है।
भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के कालावतार माने गए हैं। द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा।
व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं।
इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की।
इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
वेदांत दर्शन के रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ने वेदांत दर्शन को छोटे-छोटे सूत्रों में लिखा गया है, लेकिन गंभीर सूत्रों के कारण ही उनका अर्थ समझने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार ही गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव की पूजा के साथ ही महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म के सभी भागों को व्यासजी ने पुराणों में भली-भांति समझाया है। महर्षि व्यास सभी हिन्दुओं के परम पुरुष हैं।

गुरु मिले तो बंधन छूटे ” एक कहानी जो जीवन में एक सच्चे गुरु के महत्व को दर्शाती है.
एक बार एक राजा के पास बोलने वाला तोता था .एक पंडित महीने में दो बार राजा के पास कथा सुनाने आता था.पंडित को आदत थी कहने की “हरि मिले तो बंधन छूटे”. जब भी पंडित जी ऐसा कहते तो तोता उन्हें झूठा कहता था.

पंडित जी जब भी आते तोता हर बार ऐसा ही कहता .पंडित जी को राजा के सामने बहुत असहज महसूस होता था . पंडित जी ने यह बात अपने गुरु को बताई .गुरुजी ने कहा कि तुम मुझे उस तोते के पास ले जाओ .
पंडित अपने गुरु को तोते के पास ले गए .गुरुजी ने तोते से पूछा तुम ऐसा क्यों कहते हो.तोते ने बोला कि मैंने एक बार बोल क्या दिया ,’हरि मिले तो बंधन छूटे ‘मेरा तो बंधन छूटने को नहीं आ रहा .

मैं एक बार उड़ता हुआ एक पेड़ पर बैठा था.उसके पास ही साधुओं का आश्रम था . वहा पर एक साधु ने बोला ‘हरि मिले तो बंधन छूटे’ ,मेरा स्वभाव है बोलने का,मैंने भी ऐसा ही बोल दिया .यह सुनकर उस साधु के सेवकों ने देखा कि यह हरि नाम बोलने तोता है.मुझे पकड़ कर लोहे के पिंजरे में बंद कर दिया.

उसके बाद एक व्यापारी आश्रम में आया.उसने भी देखा बोलने वाला तोता तो मुझे आश्रम से अपने साथ ले आया और मुझे चांदी के पिंजरे में बंद कर दिया .एक दिन राजा के महल में भोज था .उसमें उस व्यापारी को भी बुलाया गया था.उस ने मुझे राजा को भेंट कर दिया.

रानी को मेरा बोलना इतना पसंद आया उसने मुझे सोने के पिंजरे में बंद कर दिया.मेरे पिंजरे बदलते रहे लेकिन मेरा बंधन छुटने को नहीं आ रहा.इसीलिए मैं पंडित को झूठा कहता हूं.

गुरु जी तोते के कान में कुछ कहते हैं और चले जाते हैं .अगले दिन तोता निष्प्राण सा पिंजरे में पड़ा मिलता है .एक सेवक राजा को बताने जाता है ,राजा जी तोता निष्प्राण पिंजरे में पड़ा है, हिल डुल नहीं रहा .पीछे से दूसरे सेवक ने सोचा लगता है कि मर गया क्यों ना इसे पिंजरे में से निकाल दूं.

जैसे ही सेवक ने पिंजरे का दरवाजा खोला तो वह तोता फुर्र से उड़ गया और साथ में कहने लगा।
“गुरु मिले तो बंधन छूटे ” ,” गुरु मिले तो बंधन छूटे”
इस लिए तो गुरु को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। इस लिए गुरुपूर्णिमा के दिन अपने गुरु की पूजा करनी चाहिए।


“आईये जाने ,”गुरुपूर्णिमा का अर्थ”-, गुरुपूर्णिमा का महत्त्व ,आषाढ़ की पूर्णिमा ही क्यूँ है गुरु पूर्णिमा ! और आखिर क्यूँ मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा का यह पर्व !!

गुरु का अर्थ है -:,गु का अर्थ है – अन्धकार और रु- का अर्थ है – उसका निरोधक ! गुरु को गुरु इसीलिए कहा जाता है -“,कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानार्जन शलाका से निवारण कर देता है ,अर्थात-“, अन्धकार को हटा कर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को “गुरु “कहा जाता है !
“पूर्णिमा का अर्थ है” – चांद मास के शुल्क पक्ष की अन्तिम तिथि, पूर्णमासी अर्थात” पूर्णिमा “कहलाती है!


गुरु पूर्णिमा का महत्त्व-“, कहा जाता है -“,कि आषाढ़ पूर्णिमा को आदि गुरु वेद व्यास का जन्म हुआ था ! उनके सम्मान में ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है ! मगर गूढ़ अर्थों को देखना चाहिए -“,क्योंकि आषाढ़ मास में आने वाली पूर्णिमा तो पता ही नहीं चलती ,आकाश में बादल घिरे हो सकते हैं, और ऐसी स्थिति में चंद्रमा के दर्शन भी मुशिकल हो सकते हैं, बच्चों को जन्म भले ही माँ बाप देते हो ,लेकिन उसको जीवन का अर्थ और संसार के बारे में समझाने का कार्य गुरू ही करता है !गुरु को ब्रह्मा कहा गया है -“,क्योंकि जिस प्रकार से वह जीव का सृजन करते हैं, ठीक उसी प्रकार गुरु शिष्य का सृजन करते हैं, हमारी आत्मा को ईश्वर रुपी सत्य का साक्षात्कार करने के लिए बेचैन हैं और ये साक्षात्कार वर्तमान शरीर धारी पूर्ण गुरु के मिले बिना सम्भव नहीं है ,इसलिए वो हर जनम में गुरु की तलाश करती है!!


चंद्रमा के चंचल किरणो के बिना तो पूर्णिमा का अर्थ ही भला क्या हो सकता है ! बिना चंद्रमा के कैसी पूर्णिमा! अगर किसी पूर्णिमा का जिक्र होता है, तो वो है शरद पूर्णिमा का होता है ! तो फिर शरद की पूर्णिमा को क्यूँ ना श्रेष्ठ माना जाये-“, क्यूंकि उस दिन चंद्रमा की पूर्णता मन को मोह लेती है ,मगर महत्त्व तो आषाढ़ पूर्णिमा का ही सबसे श्रेष्ठ है ,क्यूंकि इसका विशेष महत्त्व है !!


आषाढ़ की पूर्णिमा ही क्यूँ हैं गुरु पूर्णिमा-“,आषाढ़ की पूर्णिमा ही गुरु पूर्णिमा इसीलिए है-“, क्यूंकि गुरु तो पूर्णिमा की चांद की तरह है, जो पूर्ण प्रकाशमान है और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह, आषाढ़ में चन्द्रमा बादलों से घिरा रहता है! जैसे- बादल रुपी शिष्यों से गुरु घिरे हो शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, जन्मों के अँधेरे को लेकर आ जायें ,वे अंधेरे बादल की तरह ही हैं ,उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अँधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके ! तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है -“,इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है ! इसमें गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी! यह इशारा तो है ही-“, कि दोनों का मिलन जहाँ हो वही कोई सार्थकता है, इसलिए मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा का यह पर्व !!

गुरु के प्रति आदर सम्मान और अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आषाढ़ शुल्क पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का विशेष पर्व माना गया है ! इस बार यह गुरु पूर्णिमा 13 जुलाई दिन बुधवार को है ! भारतीय सँस्कृति में गुरु देवता को तुल्य माना गया है ,गुरु को हमेशा से ही ब्रह्मा विष्णु और महेश के समान पूज्य माना गया है ,वेद उपनिषद और प्रणयन करने वाले वेद व्यास जी को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है !

गुरु को पारस जानिए, करे लौह को स्वर्ण।
गुरु और शिष्य जगत में ,केवल दो ही वर्ण।।

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ

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श्री निवासाचार्य जी-वृन्दावन

(कालावधि-1518-1603)

श्रीनिवासाचार्य जी, गौरांग महाप्रभु के प्रेम की मूर्ति थे। बंगदेश के चाकन्दी ग्राम में इनका जन्म हुआ। अल्प आयु में ही इन्होंने ग्रंथों को कंठस्थ कर लिया। इनका पांडित्य सबके हृदय को आकर्षित कर लेता। श्री गोपाल भट्ट जी सदगुरुदेव हुए और जीव गोस्वामी जी ने इन्हें भक्ति शास्त्रों का अध्ययन कराया। गुरु आज्ञा से बंगाल क्षेत्र में प्रचुर गौड़ीय भक्ति का प्रचार किया। एक बार मानसी सेवा में होली लीला का आस्वादन कर रहे थे और ध्यान टूटने पर देखा कि सारे वस्त्र रंगे हुए हैं।

बंगदेश गंगातटवर्ती चाकंदी ग्रामवासी श्री गंगाधर भट्टाचार्य जी का चैतन्य महाप्रभु जी के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था। महाप्रभुजी के सन्यास ग्रहण के समय चैतन्य-चैतन्य पुकारते हुए विक्षप्त दशा को प्राप्त हो गए। तब से लोग इन्हें चैतन्य दास पुकारने लगे। पूर्णस्वस्थ होने पर एक दिन श्रीजगन्नाथ पुरी की ओर पत्नी के साथ प्रस्थान किया। पूरी पहुँचकर महाप्रभु जी का दर्शन किया। रात्रि में जगन्नाथ भगवान ने स्वपन दिया – तुम घर चले जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे एक सर्वांग सुंदर पुत्र होगा। जो प्रेम और पांडित्य से तुम्हारे कुल को धन्य करेगा। प्रातकाल महाप्रभु जी को प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त करके वापस ग्राम आ गए। कुछ समय पश्चात अचल जगन्नाथ और सचल जगन्नाथ की कृपया से सन 1518 को वैशाखी पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी प्रिया देवी के गर्भ से परम् रूपवान पुत्र का जन्म हुआ। इसी पुत्र का नाम हुआ श्रीनिवास। गौर नाम श्रवण करके अति प्रसन्न हो जाते थे। अपने मधुर स्वर से गौर-गौर का उच्चारण कर नृत्य करने लगते।
जब यह 5 वर्ष के हुए तो पिता जी ने चांकन्दी के महामहोपाध्याय धनंजय वाचस्पति को पढ़ाने लिखाने का भार सौपा। गुरमुख से जो श्रवण कर लेते तुरंत कंठ हो जाता। मेघा शक्ति के अति धनी थे। कुछ ही समय में व्याकरण, दर्शन आदि संपूर्ण शास्त्रों में निष्णात हो गए। संपूर्ण वैष्णव समाज में उनके पांडित्य की चर्चा होने लगी।
एक दिन पूरी में महाप्रभु जी ने कीर्तन करते हुए अचानक श्रीनिवास- श्रीनिवास उच्चारण किया। भक्तों ने कारण पूछा तो महाप्रभु जी बोले मेरे विशुद्ध प्रेम की मूर्ति श्री निवास का चाकंदी ग्राम में आविर्भाव होगा। इसलिए सभी गौर प्रेमी अब श्रीनिवास जी के पास आने जाने लगे।
कर्णानद के अनुसार वृंदावन के गोविंद देव ने गोस्वामी गणों से कहा था। मेरी शक्ति से मेरे प्रेम का ही श्रीनिवास के रूप में अविर्भाव हुआ है।

मोर शक्ति ते जन्म इहार करिला प्रकाश।
प्रेम रुपे जन्म हैल नाम श्रीनिवास॥

एक दिन अकस्मात पिताजी का निकुंज वास हो गया। ह्रदय में अत्यंत वेदना हुई क्योंकि गौर- लीला रसस्वादन के साथी थे। माँ विलाप कर रही थी। श्रीनिवास जी ने अब पुरी में महाप्रभु के दर्शन के लिए जाने का विचार किया। मां से आज्ञा ली, इच्छा ना होते हुए भी माँ ने आज्ञा प्रदान की। गौर प्रेम में अश्रु प्रवाहित करते हुए, बाह्य ज्ञान शून्य नीलाचल के पथ पर चले जा रहे हैं। मार्ग में अचानक किसी ने महाप्रभु जी के अंतर्ध्यान का समाचार सुनाया तो मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
महा प्रभु जी की कृपा हुई स्वपन में बोले – तुम नीलाचल चले जाओ। गदाधर आदि परिक्रमा वहाँ है। मुझे तुम्हारे द्वारा बहुत कार्य कराने हैं। श्रीनिवास जी प्रातः जी उठकर नीलाचल की ओर चल पड़े। कई दिनों के पश्चात पूरी पहुँचे। जगन्नाथ जी का दर्शन किया। जगन्नाथ जी की छद्ध रूप से प्रसाद का थाल दे गये, प्रसाद पाकर प्रभु की कृपा का अनुभव किया। फिर श्री गदाधर जी से मुलाकात की। श्री गदाधर जी ने इन्हें राय रामानंद जी और सार्वभौम जी के पास दर्शन कराने ले गए। गौर – विरह में निमग्न दोनों ने धैर्य धारण करके महाप्रभु जी की कुछ चर्चा की। इस प्रकार गौर- प्रेमियों के दर्शन एवं गौर -चर्चा मैं दिन बीतने लगा।
एक दिन गदाधर जी से भागवत पढ़ाने की प्रार्थना की तो गदाधर बोले – मेरी इच्छा बहुत थी तुम्हें भागवत पढ़ाने की लेकिन महाप्रभु जी के अश्रु जल से भागवत के कुछ अक्षर मिट गए हैं। इसलिए तुम वृंदावन जाकर जीव से भागवत अध्यन करो। कई दिनों की यात्रा के पश्चात भूखे-प्यासे श्रीनिवास जी मथुरा पहुंचे। यहां सूचना प्राप्त हुई के रूप, सनातन और रघुनाथ भट्ट जी का निकुंज प्रवेश हो गया। अत्यंत दुखी हुए और अर्ध वाह्य दशा में वृंदावन के गोविंद देव जी मंदिर में आकर गिर पड़े। जीव गोस्वामी जी दर्शन को पधारे तो देखा कि मंदिर में भीड़ है। वहाँ जाकर सभी को हटाया। अद्भुत दृश्य सामने था। श्रीनिवास जी के वपु में अष्ट सात्विक भाव, अश्रु, कम्प, पुलक रोमांच आदि प्रकट हो रहे थे। जीव गोस्वामी जी पहचान गए कि यह श्रीनिवास है। उनको उठा कर कुटिया में लाए। दो पहर बीतने पर वाह्य ज्ञान हुआ। जीव जी को प्रणाम किया। गोविंद देव जी का प्रसाद पवाया बगल वाली कुटिया में विश्राम करने को कहा।
दूसरे दिन जीव गोस्वामी जी गोपाल भट्ट जी के पास ले गए। और उनके द्वारा श्रीनिवास जी को दीक्षा दिलवा दी। श्रीनिवास ने गुरु सेवा को सर्वस मानकर अंग -सेवा का भार अपने ऊपर ले लिया। शीघ्र ही कविराज आदि संतो के दर्शन करा लाए। अब वृंदावन में गुरु सेवा करते हुए श्री निवास जी जप, ध्यान, कीर्तन आदि दैनिक कृत्य करने लगे और जीव गोस्वामी जी के पास शास्त्र अध्ययन आरंभ किया। लीला स्मरण में श्रीनिवास का असाधारण अभिनिवेश देख श्री गोपाल भट्ट जी बहुत प्रसन्न हुए। एक दिन लीला ध्यान में श्रीनिवास जी सुगंधित तेल, माला, चंदनादि से महाप्रभु जी की सेवा करके उनके पास खड़े होकर चँवर डुला रहे थे। उसी समय महाप्रभु जी के इशारे करने से दूसरे सेवक ने महाप्रभु जी के गले से माला उतारकर श्रीनिवास जी को पहना दी। ध्यान भंग होने पर देखा कि वही माला गले में पड़ी थी।
एक दिन बसंत के अवसर पर ब्रज लीला का ध्यान कर रहे थे। वहाँ होली लीला चल रही थी। अचानक किशोरी जी के हाथ का गुलाल शेष हो गया तो उसी समय मंजरी स्वरूप में श्रीनिवास जी ने गुलाल लाकर श्री किशोरी जी को दिया। ध्यान भंग हुआ तो देखा कि सारे वस्त्र होली के रंग से रंगे हुए हैं।
श्रीनिवास जी का ध्यान में तीव्र अनुराग था। थोड़े ही समय में यह श्रीमद्भागवत और भक्ति शास्त्रों में पारंगत हो गए और जीव गोस्वामी के द्वारा आचार्य ठाकुर की उपाधि प्राप्त की। श्री नरोत्तम ठाकुर, श्री श्यामानन्द प्रभु दोनों श्रीनिवास जी के सहपाठी थे। जीव गोस्वामी जी की बहुत इच्छा थी कि जिन भक्ति ग्रंथों की रचना श्री रूप जी, श्री सनातन जी, और स्वयं ने की है उन का प्रचार गौड़ देश में भली-भांति हो। जीव जी ने सभी भक्तों एवं संतों के मत से श्रीनिवास आचार्य जी को भक्ति के प्रचार के लिए भेजने का निश्चय किया। और नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को उनकी सहायता के लिए सारे ग्रंथों को एक बड़े काठ के संदूक में बंद किया और दस शास्त्र धारी रक्षको को साथ करके दो बैल गाड़ी में बिठा कर विदा किया। गौड़ देश की सीमा के भीतर गोपालपुर ग्राम में विश्राम किया। अचानक एक लुटेरों का दिल आया और मारपीट कर बैलगाड़ी सहित ग्रंथों के संदूक को लेकर अदृश्य हो गए। प्रातः काल तीनो ने बहुत खोजा लेकिन कुछ पता ना चला। एक प्रहरी के हाथ ग्रन्थों की चोरी की सूचना जीव गोस्वामी जी को भेजी और नरोत्तम एवं श्यामानन्द जी ने कहा- तुम गौड़ देश जाकर भक्ति का प्रचार करो।
श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों की खोज में पागल की भांति इधर-उधर भटकते रहे। विष्णुपुर राज्य में कृष्ण बल्लभ नाम के एक ब्राह्मण से मुलाकात हुई। वो इन्हें पाठ सुनने के लिए राज्य के राजा वीरहाम्वीर की सभा में ले गया। व्यास चक्रवती नामक एक ब्राहमण राजा को नित्य भागवत सुनाया करते थे। आज रास पंचाध्यायी का पाठ था। और वक्ता महाशय सिद्धांत विरुद्ध व्याख्या कर रहे थे। तब श्रीनिवासाचार्य जी ने प्रतिवाद कर के अद्भुभुत रसपूर्ण व्याख्या की। राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। राजा ने उन्हें कुछ दिन रुकने का आग्रह करके एक निर्जन स्थान में वास दे दिया। श्रीनिवास जी ने विचार किया कि राजा से ग्रन्थ चोरी की बात कहूँ जो शायद ग्रंथ को खोजने में मेरी मदद कर दे। दूसरे दिन कथा के विश्राम के बाद राजा निवासाचार्य जी को अपने कक्ष में ले गया और परिचय पूछा। श्रीनिवास जी ने संपूर्ण बात कह दी। ग्रंथ चोरी की बात सुनकर राजा रोने लगा और बोला- महाराज! डाकुओं का सरदार मैं ही हूँ। मैं राजा होते हुए भी अपने सैनिकों को लूटने के लिए भेजता हूँ। आपके सारे ग्रंथ मेरे पास है। मैं आपका अपराधी हूँ। आप दंड दे या क्षमा करें। ऐसा कहकर फूट- फूट कर रोने लगा। श्री निवास जी ग्रंथ प्राप्ति की बात सुनकर अति प्रसन्न हुए और राजा का हृदय से लगा लिया।
अगले दिन श्रीनिवास जी ने राजा आदि अनेक परिकरो को अपना शिष्य बनाया, और ग्रंथ प्राप्ति का संदेश वृंदावन जीव गोस्वामी जी को और खेतुरी के निकट गोपालपुर नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को भेजा। दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए और आनन्द में नृत्य करने लगे। अब श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों को लेकर अपनी मां के पास याजिग्राम पहुँचे। माँ अपने पुत्र को देखकर आनन्द में डूब गई। याजिग्राम में श्रीनिवास जी ने एक विद्यालय की स्थापना की अध्यापन का कार्य प्रारंभ कर दिया। कुछ समय पश्चात श्रीनिवास जी का श्री गोपाल चक्रवर्ती की सुपुत्री द्रोपदी नाम की कन्या के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात द्रोपदी का नाम ईश्वरी ठकुरानी रखा। एक दिन श्रीनिवास घर के निकट वृक्ष के नीचे सत्संग कर रहे थे। एक युवक विवाह करके अपनी पत्नी को पालकी में विदा करा कर ला रहा था। श्रीनिवास ने उसे देखा और बोल पड़े- देखो! यह नवयुवक रूपवान और तेजस्वी है। लेकिन इसका यौवन प्रभु सेवा में न लगकर कामिनी सेवा में लगेगा। यह वचन उस युवक के कान में पड़ गए। बस तुरंत वह श्रीनिवास जी के चरणों में गिर पड़ा, और हमेशा के लिए दीक्षा लेकर सेवा में ही रह गया। महापुरुषो की दृष्टि पड़ते ही जीव का कल्याण हो जाता है।
श्री नरोत्तम ठाकुर के आग्रह पर श्रीनिवास जी एक महीने खेतुरी ग्राम पधारे। वहाँ बहुत विशाल उत्सव हुआ। दोल पूर्णिमा के दिन छय विग्रहों की धूम धाम से प्रतिष्ठा हुई। खूब संकीर्तन की धूम मची।
श्रीनिवास जी का दूसरा विवाह गोपालपुर ग्राम के राघव चक्रवर्ती की सुपुत्री श्री पद्मावती के साथ शुभ मुहूर्त में हुआ। विवाह के पश्चात पद्मावती जी का नाम हुआ गौरांग प्रिया। श्रीनिवास जी के तीन पुत्र एवं तीन कन्या हुईं।
एक बार श्रीनिवास जी विष्णु पुर ग्राम में लीला स्मरण कर रहे थे। लीला- स्मरण में मणि मंजरी स्वरूप से लीला के गंभीरतम प्रदेश में प्रवेश कर गए। शरीर निश्चल हो गया, श्वास बंद हो गया। दो दिन तक यही स्थिति रही, सभी घबरा गए सभी विचार करने लगे क्या करें ? उसी समय खेतुरी ग्राम से रामचंद्र जी आ गए और बोले — आप घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा। रामचंद्र जी श्रीनिवास जी के पास बैठकर ध्यान मग्न हो गए। करुणा मंजरी स्वरूप से लीला में प्रवेश कर के देखा कि अन्य मंजरियां यमुना जल के भीतर कुछ खोज रही है। पूछा तो पता चला कि किशोरी जी की बेसर खोज रही है। और जलक्रीडा करते समय गिर गई थी। यह भी खोजने लगे तो कमल पत्र के नीचे बेसर मिल गई। तुरंत गुरुदेव को प्रदान की। गुरुदेव ने गुण मंजरी (गोपाल भट्ट), गुण मंजरी ने रूप मंजरी (रूप गोस्वामी) को रुप मंजरी ने श्री जी को प्रदान की। किशोरी जी ने प्रसन्न होकर करुणा मंजरी को अपना चार्बित ताम्बूल देकर पुरस्कृत किया। उसी समय श्रीनिवास जी की समाधि टूट गई। रामचंद्र जी के हाथ में प्रसादी तांबूल देखकर सभी आश्चर्यचकित हुए। सबको कणिका प्रसाद प्राप्त हुआ। जीव का यही वास्तविक स्वरुप है। रामचंद्र जी खेतुरी में नरोत्तम दास जी के पास थे। एक दिन श्रीनिवास जी ने पत्र द्वारा रामचंद्र जी को शीघ्र याजि ग्राम आने का संदेश भेजा। पत्र पाते ही रामचंद्र जी गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर नरोत्तम ठाकुर से आज्ञा मांगी। दोनों हृदय से मिले क्योंकि अब यह अंतिम मिलन था। नरोत्तम ठाकुर बोले- मैं उस घड़ी की प्रतीक्षा करूँगा, जिस में हमारा मिलन पुनः होगा। रामचंद्र जी वहाँ से चल कर याजि ग्राम श्रीनिवास जी के पास आ गए। आकर गुरुदेव चरणों में प्रणाम किया। दो दिन बाद दोनों गुरु शिष्य श्री वृंदावन धाम प्रस्थान किया।
श्री वृंदावन धाम आने के पश्चात श्रीनिवास जी वापिस कहीं नहीं गए। श्रीराम चंद्रजी निरंतर गुरु सेवा में निरत रहते। सन 1603 कार्तिक शुक्ल अष्टमी को श्रीनिवास जी अपने निज स्वरूप मणि मंजरी रूप में श्यामा-श्याम के नृत्य लीला में प्रवेश कर गए। सन 1612 कार्तिक कृष्ण अष्टमी को रामचंद्रजी ने गुरुदेव के पथ का अनुसरण किया। श्री धाम वृंदावन में गोपेश्वर महादेव के निकट श्रीनिवास जी एवं श्री रामचंद्र जी दोनों की समाधि विराजमान हैं। श्री धाम वृंदावन वास करने का यही फल है कि इसी रज में रज होकर मिल जाए।

तजिकै वृंदाविपिन कौ, अन्य तीरथ जे जात।
छाडि विमल चिंतामणि, कौड़ी को ललचात्॥
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स्रोत: ‘ब्रज भक्तमाल’