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तुलसी जी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी

तुलसी का पौधा भगवान विष्णु को अति प्रिय है। भगवान विष्णु की पूजा में किसी भी तरह से तामसिक चीजों का प्रयोग वर्जित माना गया है। इसलिए जहां पर भी तुलसी का पौधा लगा हो वहां पर कभी मांस मदिरा का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। जो लोग अपने गले में तुलसी की माला धारण करते हैं, उन्हें भी तामसिक चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।



तुलसी दल और मंजरी चयन समय कुछ बातों का ख्याल रखें

  • तुलसी की मंजरी सब फूलों से बढ़कर मानी जाती है। मंजरी तोड़ते समय उसमें पत्तियों का रहना भी आवश्यक माना गया है। तुलसी का एक-एक पत्ता तोड़ने के बजाय पत्तियों के साथ अग्रभाग को तोड़ना चाहिए. यही शास्त्रसम्मत भी है.प्राय: पूजन में बासी फूल और पानी चढ़ाना निषेध है, पर तुलसीदल और गंगाजल कभी बासी नहीं होते। तीर्थों का जल भी बासी नहीं होता।
  • ब्रह्म वैवर्त पुराण में श्री भगवान तुलसी के प्रति कहते है –
    पूर्णिमा, अमावस्या , द्वादशी, सूर्यसंक्राति , मध्यकाल रात्रि दोनों संध्याए अशौच के समय रात में सोने के पश्चात उठकर,स्नान किए बिना,शरीर के किसी भाग में तेल लगाकर जो मनुष्य तुलसी दल चयन करता है वह मानो श्रीहरि के मस्तक का छेदन करता है.
  • द्वादशी तिथि को तुलसी चयन कभी ना करे, क्योकि तुलसी भगवान कि प्रेयसी होने के कारण हरि के दिन -एकादशी को निर्जल व्रत करती है.अतः द्वादशी को शैथिल्य,दौबल्य के कारण तोडने पर तुलसी को कष्ट होता है.
  • तुलसी चयन करके हाथ में रखकर पूजा के लिए नहीं ले जाना चाहिये शुद्ध पात्र में रखकर अथवा किसी पत्ते पर या टोकरी में रखकर ले जाना चाहिये.
  • इतने निषिद्ध दिवसों में तुलसी चयन नहीं कर सकते,और बिना तुलसी के भगवत पूजा अपूर्ण मानी जाती है अतः वारह पुराण में इसकी व्यवस्था के रूप में निर्दिष्ट है कि निषिद्ध काल में स्वतः झडकर गिरे हुए तुलसी पत्रों से पूजन करे.और अपवाद स्वरुप शास्त्र का ऐसा निर्देश है कि शालग्राम कि नित्य पूजा के लिए निषिद्ध तिथियों में भी तुलसी दल का चयन किया जा सकता है.

साधकों के कुछ प्रश्न है जो इस प्रकार है और उनके हम उत्तर देने का प्रयाश करते है ।


प्रश्न : किस उम्र के व्यक्ति इसे पहने ?

उत्तर : तुलसी कंठी माला पहनने के लिए न किसी उम्र की सीमा है, और न ही ऐसा है कि सिर्फ पुरूष ही पहने , तुलसी कंठी माला किसी भी उम्र के और कोई भी बच्चा, वृद्ध, शादीशुदा, विवाहित, अविवाहित, तलाकसुद कोई भी हो सब पहन सकते है ।


प्रश्न : किस समय माला को उतारे ?

उत्तर : सबसे पहले बता देते है कि स्त्रियों के मासिक धर्म के समय इसे बिल्कुल नही उतारे बस उस समय इसे ढक कर रखे और गंदे हाथों से न छुये

एवं घर मे सूतक ( बच्चा होना, किसी का निधन हो जाना आदि ) होने पर भी ऐसा ही करें ।


प्रश्न : वेबसाइट से माला मंगाने के बाद क्या करें ?

उत्तर : कृपया इसे सीधा मिलते ही नही पहने, सबसे पहले माला को देशी घी में, या सरसों के तेल में कम से कम 48 घंटे डुबो के रखें इससे माला मजबूत होगी और लंबे समय तक चलेगी । और यहाँ से माला कच्ची भेजी जाती है इसे घी में रखना ही उसे पकाना होता है ।


प्रश्न : माला पहनने के क्या नियम है ?

उत्तर : वैसे हम इतने नियमों में विश्वास नही रखते पर जो महत्वपूर्ण नियम हर संतो द्वारा बताये गए है वो निम्न है :
माला अगर पहने तो माँस, मदिरा अंडे, और लहसुन, प्याज नहीं सेवन करें ।
माला पहनने के साथ राधा नाम का जाप जरूरी है ।
बाकी इसे उतारने की या नई लेने की जरूरत पड़े तो पहले गुरुजनों की आज्ञा ले ।
धन्यवाद ।


तुलसी जी की आरती

तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।

धन तुलसी पूरण तप कीनो,
शालिग्राम बनी पटरानी ।
जाके पत्र मंजरी कोमल,
श्रीपति कमल चरण लपटानी ॥

धूप-दीप-नवैद्य आरती,
पुष्पन की वर्षा बरसानी ।
छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन,
बिन तुलसी हरि एक ना मानी ॥

सभी सखी मैया तेरो यश गावें,
भक्तिदान दीजै महारानी ।
नमो-नमो तुलसी महारानी,
तुलसी महारानी नमो-नमो ॥

तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।

तुलसी विवाह

कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी को तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है, आज के पावन पर्व पर शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह कराकर पुण्यात्मा लोग कन्या दान का फल प्राप्त करते है,

पदम पुराण में कहा गया है की तुलसी जी के दर्शन मात्र से सम्पूर्ण पापों की राशि नष्ट हो जाती है,उनके स्पर्श से शरीर पवित्र हो जाता है,उन्हे प्रणाम करने से रोग नष्ट हो जाते है,सींचने से मृत्यु दूर भाग जाती है,तुलसी जी का वृक्ष लगाने से भगवान की सन्निधि प्राप्त होती है,और उन्हे भगवान के चरणो में चढाने से मोक्ष रूप महान फल की प्राप्ति होती है.अंत काल के समय ,तुलसीदल या आमलकी को मस्तक या देह पर रखने से नरक का द्वार बंद हो जाता है

धात्री फलानी तुलसी ही अन्तकाले भवेद यदिमुखे चैव सिरास्य अंगे पातकं नास्ति तस्य वाई

श्रीमद्भगवत पुराण के अनुसार प्राचीन काल में जालंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ़ बड़ा उत्पात मचा रखा था। वह बड़ा वीर तथा पराक्रमी था। उसकी वीरता का रहस्य था, उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। उसी के प्रभाव से वह सर्वजंयी बना हुआ था। जालंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गये तथा रक्षा की गुहार लगाई। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया। उधर, उसका पति जालंधर, जो देवताओं से युद्ध कर रहा था, वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही मारा गया। जब वृंदा को इस बात का पता लगा तो क्रोधित होकर उसने भगवान विष्णु को शाप दे दिया, ‘जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया है, उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छलपूर्वक हरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे।’ यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। जिस जगह वह सती हुई वहाँ तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ।

एक अन्य प्रसंग के अनुसार वृंदा ने विष्णु जी को यह शाप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है। अत: तुम पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, ‘हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।’

बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह है।


तुलसी जी के नामो के अर्थ 

  1. वृंदा :- सभी वनस्पति व वृक्षों की आधि देवी 
  2. वृन्दावनी :- जिनका उदभव व्रज में हुआ 
  3. विश्वपूजिता :- समस्त जगत द्वारा पूजित
  4. विश्व -पावनी :- त्रिलोकी को पावन करनेवाली 
  5. पुष्पसारा :- हर पुष्प का सार 
  6. नंदिनी :- ऋषि मुनियों को आनंद प्रदान करनेवाली 
  7. कृष्ण-जीवनी :- श्री कृष्ण की प्राण जीवनी 
  8. तुलसी :- अद्वितीय

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एकादशी सूची

भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त भी एकादशी, जन्माष्टमी, रामनवमी, गौर पौर्णिमा, नरसिंह जयंती, व्यास पूजा या और अन्य वैष्णव तिथि को उपवास करते है, व्रत रखते है। इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य होता है ? वस्तुतः भक्तोंकी कोई भी भौतिक कामना नही होती । भक्त अपने आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह व्रत करते है ।

व्रत का पालन करना यह मूल सिद्धांत न होकर, भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा बढाना यह कारण है । उपवास करनेसे मन शुद्ध होता है, मन को वश में करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा बढाना यह कारण है । मन को वश में करके भगवान श्रीकृष्ण की सेवा उत्तम प्रकारसे करने के लिए उपवास सहायक होता है। भगवान श्रीकृष्ण को एकादशी का व्रत सर्वाधिक प्रिय है अतः प्रत्येक वैष्णव जन को एकादशी करनी ही चाहिए।


साल 2022 मे आने वाली सभी एकादाशियों की सूची


जनवरी 2022: एकादशी व्रत


13 जनवरी: पौष पुत्रदा एकादशी
28 जनवरी: षट्तिला एकादशी


फरवरी 2022: एकादशी व्रत


12 फरवरी: जया एकादशी
27 फरवरी: विजया एकादशी


मार्च 2022: एकादशी व्रत


14 मार्च: आमलकी एकादशी
28 मार्च: पापमोचिनी एकादशी


अप्रैल 2022: एकादशी व्रत


12 अप्रैल: कामदा एकादशी
26 अप्रैल: बरूथिनी एकादशी


मई 2022: एकादशी व्रत


12 मई: मोहिनी एकादशी
26 मई: अपरा एकादशी


जून 2022: एकादशी व्रत


10 जून: निर्जला एकादशी
24 जून: योगिनी एकादशी


जुलाई 2022: एकादशी व्रत


10 जुलाई: देवशयनी एकादशी
24 जुलाई: कामिका एकादशी


अगस्त 2022: एकादशी व्रत


08 अगस्त: श्रावण पुत्रदा एकादशी
23 अगस्त: अजा एकादशी


सितंबर 2022: एकादशी व्रत


06 सितंबर: परिवर्तिनी एकादशी
21 सितंबर: इन्दिरा एकादशी


अक्टूबर 2022: एकादशी व्रत


06 अक्टूबर: पापांकुशा एकादशी
21 अक्टूबर: रमा एकादशी


नवंबर 2022: एकादशी व्रत


04 नवंबर: देवुत्थान एकादशी
20 नवंबर: उत्पन्ना एकादशी


दिसंबर 2022: एकादशी व्रत


03 दिसंबर: मोक्षदा एकादशी
19 दिसंबर: सफला एकादशी

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श्री राधारमण प्राकट्य

राधारमण मंदिर में पिछले पौने पांच सौ वर्ष से बिना माचिस के प्रयोग के ही ठाकुरजी की आरती हो रही है।

इस मंदिर के मुख्य श्रीविग्रह का प्राकट्योत्सव 16 मई को मनाया जा रहा है। गोपाल भट्ट स्वामी पर ठाकुर की बहुत अधिक कृपा थी इसी वजह से ठाकुर ने प्राकट्य के लिए उन्हें ही माध्यम बनाया था। मंदिर की प्रथम आरती के लिए अग्नि वैदिक मंत्रों के माध्यम से आज से 476 वर्ष पहले प्रकट की गई थी। इसके लिए अरण्य मंथन का सहारा लिया गया था।

उसके बाद ही ठाकुर ने गोपाल भट्ट स्वामी के मन में यह भाव पैदा किया कि इसी अग्नि से भविष्य में ठाकुर की आरती की जाय। यहीं कारण है कि इस मंदिर में करीब पौने पांच सौ वर्ष से माचिस का प्रयोग नहीं किया गया। आज भी ठाकुर की आरती पौने पांच सौ वर्ष पूर्व प्रकट अग्नि से की जाती है।


इस मंदिर की दूसरी विशेषता यह है कि इस मंदिर के श्रीविगृह में मदनमोहन, गोपीनाथ एवं गोविन्ददेव के दर्शन होते हैं, ऐसा अदभुत दर्शन ब्रज के किसी मंदिर में नही मिलेगा। राधा रमण मंदिर के सेवायत गोस्वामी जी ने तीन मंदिरों के विगृह के राधारमण मंदिर में दर्शन के रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया कि ठाकुर हमेशा भक्त के भक्ति के वशीभूत रहते हैं। गोपाल भट्ट की अटूट भक्ति के कारण ही उन्हेांने उनकी मनोकामना पूरी हुई।

उन्होंने बताया कि माता-पिता की आज्ञा पाकर जब गोपाल भट्ट वृन्दावन को रवाना हुए तो उनके मुख से हरिनाम की ध्वनि गूंज रही थी। उनकी भक्ति ऐसी अटूट थी कि बीहड़ जंगलों से होकर जब वे वृन्दावन जा रहे थे तो रास्ते में हिंसक जीव भी उन्हें आगे जाने का रास्ता दे देते थे। श्रीकृष्ण के दर्शन की अभिलाषा में वृन्दावन जा रहे गोपाल भट्ट को एक दिन निद्रा आ गई और उसी समय उन्होंने देखा कि पीताम्बर धारण किए मुरली लिए ठाकुर उनके सामने खड़े हुए हैं।

निद्रा खुलने पर उन्होंने अपने आपको वृन्दावन में यमुना तट पर तमाल, कदम्ब, आम, मौलश्री से युक्त रमणीक वन में पाया। वे इस अनुपम छटा को देखकर नृत्य करने लगे। जब वे रूप, सनातन के साथ कृष्णभक्ति का प्रचार करने लगे तो एक दिन चैतन्य महाप्रभु ने उनके पास अपना डोर कौपीन और अपने बैठने का पट्टा भेजा था जो राधारमण मंदिर के विशेष उत्सवों में दर्शनीय होता है।

आचार्य गोस्वामीजी ने बताया कि गोपाल भट्ट हरीनाम की धारा प्रवाहित करते हुए एक दिन नेपाल पहुंचे जहां तीसरे दिन गंडकी नदी में स्नान के दौरान जैसे ही उन्होंने गोता लगाया उनके उत्तरीय में दिव्य शालिग्राम आ गए। उन्होंने एक बार उसे नदी में ही प्रवाहित कर दिया किंतु दूसरी बार गोता लगाते ही वे फिर उनके उत्तरेय में आ गए और आकाशवाणी हुई कि गोपाल भट्ट इसी के अन्दर तुम्हारी अमूल्य निधि विराजमान है। वे उसे लेकर वृन्दावन आ गए। यहां वे उसकी सेवा पूजा करने लगे।

गोस्वामी जी ने बताया कि वृन्दावन में सनातन गोस्वामी मदनमोहनजी की, रूप गोस्वामी गोविन्द देवजी की तथा मधु पण्डित गोपीनाथ जी की सेवा और श्रंगार किया करते थे। ठाकुर- श्रंगार में प्रवीण होने के कारण गोपाल भट्ट उक्त तीनों विगृह का श्रंगार नित्य किया करते थे। अधिक आयु होने पर तीन तीन जगह का श्रंगार करने में जब उन्हें कुछ अधिक समय लगने लगा तो नृसिंह चतुर्दशी को संध्या समय शालिग्राम जी का अभिषेक करते समय उन्होंने राधारमण मंदिर के श्रीविगृह के सामने ठाकुर जी से आराधना की और कहा कि हे प्रभु छोटे बालक प्रहलाद के लिए तो आप खंभ चीरकर प्रकट हुए थे किंतु उन पर कृपा क्यों नही हो रही है।

उन्होंने स्वयं ठाकुर से कहा कि तीनों विगृह का श्रंगार करने में काफी समय लग जाता है यदि तीनों ही स्वरूप (मदनमोहन, गोपीनाथ एवं गोविन्ददेव मंदिरों के श्री विगृह) इसी श्रीविगृह में समाहित हो जांय तो वे इसका और भव्य श्रंगार कर अपने को धन्य कर सकते हैं। इतना कहने के साथ ही गोपालभट्ट गोस्वामी उसी रासस्थली की पुलिन भूमि पर मूर्छित हो गए और आज ही के दिन 476 वर्ष पहले ठाकुर जी का त्रिभंग ललित श्री राधारमण विग्रह का प्राकट्य हुआ

बोलिये श्री राधारमण लाल की जय हो

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भक्त नंददास

विक्रम संवत् 1570 में सूकर क्षेत्र में श्री नंददास का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम जीवाराम था। कहा जाता है कि श्री नंददास ‘रामचरितमानस’ के प्रणेता और भगवान श्रीराम के परम भक्त तुलसी दास जी के चचेरे भाई थे। तुलसी दास जी इन्हें बहुत स्नेह करते थे। तुलसी दास के भक्तिमय जीवन का इन पर भी गहरा प्रभाव था। इसी कारण श्री नंददास जी भक्ति रस के पूर्ण मर्मज्ञ और ज्ञानी थे।

एक बार काशी में वैष्णवों का एक दल भगवान कृष्य के दर्शन हेतु द्वारिका जा रहा था। नन्ददास भी अपने राम के कृष्णरूप के दर्शन को उद्वेलित हो उठे। उन्होंने तुलसी दास जी से आज्ञा मांगी। ”मैं भगवान राम के कृष्ण रूप के दर्शन हेतु द्वारिका जाने की आज्ञा चाहता हूँ। मर्यादा पुरुषोत्तम का प्रेमरूप कितना मन मोहक होगा ?” अवश्य जाओ भाई !” तुलसी दास जी ने आज्ञा दे दी। और नंददास उस वैष्णव दल के साथ द्वारिका की तरफ चल पडे।

मार्ग में यह दल कितने ही संतों भक्तों के दर्शन कर रहा था। हर स्थान पर कृष्ण महिमा का गुणगान होता। कृष्ण के मनोहर रूप की झांकी का वर्णन संत इस प्रकार करते कि नंददास को प्रतीत होता कि श्यामल सूरत मयूर पंखधारी भगवान श्रीकृष्ण उनके समक्ष खड़े हैं। उन्हें भगवान कृष्ण में प्रीति लग गई और हर क्षण उनका हृदय व्याकुल हो उठा। उनका हृदय चाहता कि उन्हें पंख लग जाए और वह क्षण-भर में द्वारिका पहुँच जायें। प्रीति एक जलतरंग वायुतरंग की तरह होती है। जिससे प्रीति हो जाए उसके हृदय से वह तरंगित होकर टकराती है। नंददास की व्याकुलता चरम पर थी। वैष्णव दल ने उनकी यह स्थिति देखी तो उन्हें चलने में असमर्थ मानकर मथुरा में ही छोड़ कर द्वारिका की तरफ बढ़ गया।

नंददास अकेले रह गए। आगे बड़े तो महावन में मार्ग भटक गए । कालिन्दी के तट पर पहुँच गए। वहाँ श्री यमुनाजी के पावन दर्शन पाकर हृदय प्रफुल्लित हो उठा। मोह-माया ने भी अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और नंददास जी को प्रणाम कर भाग ली। लौकिक माया के बंधन हटे तो अलौकिक माया का ज्ञान हो गया। द्वारिका में ही क्या, कृष्ण तो ब्रज के कण-कण में निहित हैं जिसे चाह होती है उसे भगवान वहीं दर्शन दे देते हैं।

उधर वैष्णव समाज द्वारिका पहुँचा तो गोसाईं विट्ठलनाथ जी के प्रथम दर्शन हुए। सर्वज्ञ और परमभक्त श्री स्वामी विट्ठलनाथ ने सबको देखा। “ब्राह्मण देवता को कहाँ छोड़ दिया भक्तगणों ?” गोसाईं ने पूछा। ”कौन” सभी आश्चर्य से बोले। ”नंददास जी ? आपके साथ ही तो थे ? दिखाई तो नहीं दे रहे ?” ”वे तो चलने में असमर्थ थे। थकान के कारण जाने क्या-क्या बातें करने लगे।” ”भक्तो, जिसे स्वयं ब्रजराय ने बुलाया हो उसे थकान कैसे सता सकती है ? नंददास जी तो ठाकुर जी के परम प्रिय हैं। आप लोग निश्चिंत रहें। हम अभी उन्हें सादर बुलाते हैं।”

विट्ठलनाथ जी ने अपना एक शिष्य नंददास जी को सविनय बुला लाने भेज दिया। शिष्य ने नंददास जी को खोज लिया और गोसाई जी की प्रार्थना कह डाली। नंददास तत्काल चल पड़े और गोसाई जी के दर्शन पाकर धन्य हो गए। गोसाईं ने स्नेह से उन्हें हृदय से लगाया और उन्हें दीक्षा देकर माखन चोर का दर्शन कराया। तत्पश्चात नंददास ने बडे ही भाव और प्रेम से भगवान कृष्ण की लीला का काव्य वाणी में सरस गान किया। उनके हृदय में भगवतेम की सरिता बहने लगी। गोसाई जी भी भक्ति की उस सरिता के साक्षी थे। गुरु स्तुति का गान भी नंददास ने बड़े ही मधुर स्वर में किया। नंददास केवल भक्त ही नहीं थे बल्कि उच्च कोटि के कवि भी थे। उन्होंने सम्पूर्ण भागवत को भाष्य रूप दे दिया। यह एक अनूठी उपलब्धि थी। भागवत का यह रूप बड़ा ही सरल और सुबोध था। विट्ठलनाथ जी बड़े हर्षित हुए। ”नंददास तुम्हारा यह अनुवाद अति उत्तम है परन्तु इससे अन्य भक्त लोगों की जीविका चली जाएगी।” गोसाई जी ने कहा। और नंददास ने अपूर्व त्याग और निस्पृहता दिखाते हुए अपनी लिखित टीका यमुना की पवित्र धारा में अर्पण कर दी। ऐसे गुरुभक्त और संत शिरोमणि वक पाकर विट्ठलनाथ जी भी आह्वादित हो उठे। महाकवि नंददास संत समाज में श्रद्धैय हो गए।

परम कृष्ण भक्त सूरदास जी नंददास के घनिष्ठ मित्रों में थे। कवि से कवि की मित्रता साहित्य का सोपान है। महाकवि सूर ने नंददास को बोध कराने के लिए ‘साहित्य लहरी’ की रचना कर दी। फिर एक दिन उन्होंने नंददास से कह दिया। ”मित्र, एक सच्चे संत की तरह तुममें वैराग्य का अभाव है। वैराग्य की भावना कुछ पाकर उसे छोड़ देने से प्रबल होती है। अत: तुम्हें घर जाकर वैराग्य का ज्ञान लेना चाहिए।” मित्र की राय अमूल्य होती है। नंददास घर लौट आए और अपना विवाह कर लिया। गृहस्थाश्रम में रहकर वैराग्य की उत्पत्ति कर लेना ही भक्ति है। उन्होंने अपने गांव रामपुर का नाम श्यामपुर रख दिया। गृहस्थ में रहकर भी कृष्ण की प्रेममयी लीलाओं को माध्यम मान कर काव्य लिखते रहे। परन्तु कृष्ण का आकर्षण किसे चैन से रहने देता है ? एक दिन सब कुछ त्यागकर गोवर्धन चले आए। मानसी गंगा पर निवास किया। आजीवन वहीं उन्होंने कृष्णनाम जपा।

एक बार अकबर बादशाह की सभा में गायनगुरु तानसेन ने नंददास जी के एक पद को प्रेमपूर्वक गाया। उनके गायन में तो विशेषता थी ही परन्तु उस पद ने भी सारे दरबार को प्रेमोन्मत्त कर दिया। बादशाह अकबर तो जैसे झूम ही उठे। ”तानसेन इस सुंदर पद के रचयिता कौन हैं ?” सम्राट ने पूछा। ”महाकवि नंददास।” तानसेन ने बताया। तत्काल बादशाह ने तानसेन के साथ जाकर नंददास के दर्शन किए और उनसे सत्सर्ग का लाभ लिया।
कृष्णनाम को काव्य के रूप में आयाम देने वाले और अपनी भक्ति से सबको कृष्णमय कर देने वाले महाकवि नंददास जी ने संवत् 1640 (सन् 1583) में कृष्णलोक में वास कर परमधाम प्राप्त किया।

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मोहिनी एकादशी

मोहिनी एकादशी : गुरुवार 12 मई
पारण समय : अगली सुबह 05:26 से 08:10 के मध्य

वर्ष के सबसे पवित्र महीनों में वैशाख माह की भी गिनती की जाती है। पुराणों में इसे कार्तिक माह की तरह ही पुण्य फलदायी माना गया है। इसी कारण इस माह में आने वाली एकादशी भी बहुत महत्व रखती है। वैशाख शुक्ल एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति मोह-माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है। उसके सारे पाप कट जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। यह एकादशी भगवान श्रीकृष्ण को परम प्रिय है। जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी करता है इस संसार में उसका आकर्षण प्रभाव बढ़ता है। वह हर किसी को अपने मोह पाश में बाँध सकता है और मृत्यु के बाद वह मोहमाया के बंधनों से मुक्त होकर श्रीहरि के चरणों में पहुँच जाता है।

“नामकरण”

समुद्र मंथन से निकले अमृत को लेकर देवताओं और दानवों में खींचतान मची हुई थी। चूंकि ताकत के बल पर देवता असुरों को हरा नहीं सकते थे इसलिए चालाकी से भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों को अपने मोहपाश में बाँध लिया और सारे अमृत का पान देवताओं को करवा दिया। इससे देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया। वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन यह सारा घटनाक्रम हुआ, इस कारण इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है।

“कथा”

किसी समय भद्रावती नामक एक बहुत ही सुन्दर नगर हुआ करता था, जहाँ धृतिमान नामक राजा का राज था। राजा बहुत ही दान-पुण्य किया करते थे। उनके राज में प्रजा भी धार्मिक कार्यक्रमों में डूबी रहती थी। इसी नगर में धनपाल नाम का एक वैश्य भी रहता था। धनपाल भगवान विष्णु का भक्त और एक पुण्यकारी सेठ था। उसकी पांच संतान थी। सबसे छोटे पुत्र का नाम था धृष्टबुद्धि। उसका यह नाम उसके बुरे कर्मों के कारण ही पड़ा। बाकि चार पुत्र पिता की तरह बहुत ही नेक थे, लेकिन धृष्टबुद्धि ने कोई ऐसा पाप कर्म नहीं छोड़ा जो उसने न किया हो। तंग आकर पिता ने उसे घर और संपत्ति से बेदखल कर दिया। भाइयों ने भी ऐसे पापी भाई से नाता तोड़ लिया। जो धृष्टबुद्धि पिता व भाइयों की मेहनत पर ऐश करता था अब वह दर-दर की ठोकरें खाने लगा। ऐशो आराम तो दूर उसे एक वक्त का खाना भी नहीं मिलता था। भटकते-भटकते वह कौण्डिल्य ऋषि के आश्रम में पहुँच गया और उनके चरणों में जाकर गिर पड़ा। उसने महर्षि को अपनी पूरी व्यथा बताई और पश्चाताप का उपाय जानना चाहा। ऋषि को उस पर दया आई और उन्होंने कहा कि वैशाख शुक्ल की एकादशी बहुत ही पुण्य फलदायी होती है। इसका उपवास करो तुम्हें पाप कर्मों से मुक्ति मिल जायेगी। धृष्टबुद्धि ने महर्षि की बताई विधि अनुसार वैशाख शुक्ल एकादशी का व्रत किया। इससे उसे सारे पापकर्मों से मुक्ति मिल गई।

“व्रत की पूजा विधि”

एकादशी व्रत के लिए व्रती को दशमी तिथि से ही नियमों का पालन करना चाहिए। दशमी तिथि को एक समय ही सात्विक भोजन ग्रहण करे। ब्रह्मचर्य का पूर्णत: पालन करे। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद लाल वस्त्र से सजाकर कलश स्थापना कर भगवान विष्णु की पूजा करें। दिन में मोहिनी एकादशी व्रत कथा सुनें या पढ़ें। रात्रि के समय श्री हरि का स्मरण करते हुए, भजन कीर्तन करते हुए जागरण करे। द्वादशी के दिन एकादशी व्रत का पारण किया जाता है। सर्व प्रथम भगवान की पूजा कर किसी योग्य ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजनादि करवाकर दान दक्षिणा भेंट दें। इसके बाद स्वयं भोजन कर व्रत खोले।

“व्रत के पुण्यफल”

01. मोहिनी एकादशी का व्रत करने से पापकर्मों से छुटकारा मिलता है।
02. व्यक्ति मोह माया के बंधनों से मुक्त होकर सत्कर्मों की राह पर चलता है।
03. मृत्यु के पश्चात व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
04. जीवित रहते हुए इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के आकर्षण प्रभाव में वृद्धि होती है।
05. सुख-संपदा में वृद्धि होती है। पारिवारिक जीवन सुखी होता है

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कैसे पड़ा तिरुपति बालाजी का नाम “गोविंदा”



एक अत्यंत रोचक घटना है, माँ महालक्ष्मी की खोज में भगवान विष्णु जब भूलोक पर आए, तब यह सुंदर घटना घटी।
भूलोक में प्रवेश करते ही, उन्हें भूख एवं प्यास मानवीय गुण प्राप्त हुए, भगवान श्रीनिवास ऋषि अगस्त्य के आश्रम में गए और बोले, “मुनिवर मैं एक विशिष्ट कार्य से भूलोक पर (पृथ्वी) पर आया हूँ और कलयुग का अंत होने तक यहीं रहूँगा। मुझे गाय का दूध अत्यंत पसंद है और और मुझे अन्न के रूप में उसकी आवश्यकता है। मैं जानता हूँ कि आपके पास एक बड़ी गौशाला है, उसमें अनेक गाएँ हैं, मुझे आप एक गाय दे सकते हैं क्या ?”
ऋषि अगस्त्य हँसे और कहने लगे, “स्वामी मुझे पता है कि आप श्रीनिवास के मानव स्वरूप में, श्रीविष्णु हैं। ऐसी ही अनेकानेक रोचक एवं ज्ञानवर्धक कथाओं को पढ़ने के लिये हमारे फेसबुक पेज–’श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें। मुझे अत्यंत आनंद है कि इस विश्व के निर्माता और शासक स्वयं मेरे आश्रम में आए हैं, मुझे यह भी पता है की आपने मेरी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए यह मार्ग अपनाया है, फिर भी स्वामी, मेरी एक शर्त है कि मेरी गौशाला की पवित्र गाय केवल ऐसे व्यक्ति को मिलनी चाहिए जो उसकी पत्नी संग यहाँ आए, मुझे आप को उपहार स्वरूप गाय देना अच्छा लगेगा, परंतु जब तुम मेरे आश्रम में देवी लक्ष्मी संग आओगे, और गौदान देने के लिए पूछोगे, तभी मैं ऐसा कर पाऊँगा।”
भगवान श्रीनिवास हँसे और बोले’ “ठीक है मुनिवर, तुम्हें जो चाहिए वह मैं करूँगा।” ऐसा कहकर वे वापस चले गए।

बाद में भगवान श्रीनिवास ने देवी पद्मावती से विवाह किया। विवाह के कुछ दिन पश्चात भगवान श्रीनिवास, उनकी दिव्य पत्नी पद्मावती के साथ, ऋषि अगस्त्य महामुनि के आश्रम में आए पर उस समय ऋषि आश्रम में नहीं थे। भगवान श्रीनिवासन से उनके शिष्यों ने पूछा, “आप कौन हैं ? और हम आपके लिए क्या कर सकते हैं ?”
प्रभु ने उत्तर दिया, “मेरा नाम श्रीनिवासन है, और यह मेरी पत्नी पद्मावती है। आपके आचार्य को मेरी प्रतिदिन की आवश्यकता के लिए एक गाय दान करने के लिए कहा था, परंतु उन्होंने कहा था कि पत्नी के साथ आकर दान मांगेंगे तभी मैं गाय दान दूँगा। यह तुम्हारे आचार्य की शर्त थी, इसीलिए मैं अब पत्नी संग आया हूँ।”
शिष्यों ने विनम्रता से कहा, “हमारे आचार्य आश्रम में नहीं है इसीलिए कृपया आप गाय लेने के लिए बाद में आइये।”
श्रीनिवासन हंँसे और कहने लगे, “मैं आपकी बात से सहमत हूंँ, परंतु मैं संपूर्ण जगत का सर्वोच्च शासक हूंँ, इसीलिए तुम सभी शिष्यगण मुझ पर विश्वास रख सकते हैं और मुझे एक गाय दे सकते हैं, मैं फिर से नहीं आ सकता।”
शिष्यों ने कहा, “निश्चित रूप से आप धरती के शासक हैं बल्कि यह संपूर्ण विश्व भी आपका ही है, परंतु हमारे दिव्य आचार्य हमारे लिए सर्वोच्च हैं, और उनकी आज्ञा के बिना हम कोई भी काम नहीं कर सकते।”

धीरे-धीरे हंसते हुए भगवान कहने लगे, “आपके आचार्य का आदर करता हूँ कृपया वापस आने पर आचार्य को बताइए कि मैं सपत्नीक आया था।” ऐसा कहकर भगवान श्रीनिवासन तिरुमाला की दिशा में जाने लगे।
कुछ मिनटों में ऋषि अगस्त्य आश्रम में वापस आए, और जब उन्हें इस बात का पता लगा तो वे अत्यंत निराश हुए। “श्रीमन नारायण स्वयं माँ लक्ष्मी के संग, मेरे आश्रम में आए थे। दुर्भाग्यवश मेैं आश्रम में नहीं था, बड़ा अनर्थ हुआ। फिर भी कोई बात नहीं, प्रभु को जो गाय चाहिए थी, वह तो देना ही चाहिए।”
ऋषि तुरंत गौशाला में दाखिल हुए, और एक पवित्र गाय लेकर भगवान श्रीनिवास और देवी पद्मावती की दिशा में भागते हुए निकले, थोड़ी दूरी पर श्रीनिवास एवं पत्नी पद्मावती उन्हें नजर आए।

उनके पीछे भागते हुए ऋषि तेलुगु भाषा में पुकारने लगे, स्वामी (देवा) गोवु (गाय) इंदा (ले जाओ) तेलुगु में गोवु अर्थात गाय, और इंदा अर्थात ले जाओ।
स्वामी, गोवु इंदा… स्वामी, गोवु इंदा… स्वामी, गोवु इंदा… स्वामी, गोवु इंदा… (स्वामी गाय ले जाइए).. कई बार पुकारने के पश्चात भी भगवान ने नहीं देखा, इधर मुनि ने अपनी गति बढ़ाई, और स्वामी ने पुकारे हुए शब्दों को सुनना शुरू किया।
भगवान की लीला, उन शब्दों का रूपांतर क्या हो गया। स्वामी गोविंदा, स्वामी गोविंदा, स्वामी गोविंदा, गोविंदा गोविंदा गोविंदा !!
ऋषि के बार बार पुकारने के पश्चात भगवान श्रीनिवास वेंकटेश्वर एवं देवी पद्मावती वापिस मुड़े और ऋषि से पवित्र गाय स्वीकार की।

श्रीनिवासन जी ने ऋषि से कहा, “मुनिवर तुमने ज्ञात अथवा अज्ञात अवस्था में मेरे सबसे प्रिय नाम गोविंदा को 108 बार बोल दिया है, कलयुग के अंत तक पवित्र सप्त पहाड़ियों पर मूर्ति के रूप में भूलोक पर रहूँगा, मुझे मेरे सभी भक्त “गोविंदा” नाम से पुकारेंगे। इन सात पवित्र पहाड़ियों पर, मेरे लिए एक मंदिर बनाया जाएगा, और हर दिन मुझे देखने के लिए बड़ी संख्या में भक्त आते रहेंगे। भक्त पहाड़ी पर चढ़ते हुए, अथवा मंदिर में मेरे सामने मुझे, गोविंदा नाम से पुकारेंगे।

मुनिराज कृपया ध्यान दीजिए, हर समय मुझे इस नाम से पुकारे जाते वक्त, तुम्हें भी स्मरण किया जाएगा क्योंकि इस प्रेम भरे नाम का कारण तुम हो, यदि किसी भी कारणवश कोई भक्त मंदिर में आने में असमर्थ रहेगा, और मेरे गोविंदा नाम का स्मरण करेगा। तब उसकी सारी आवश्यकता मैं पूरी करूँगा। सात पहाड़ियों पर चढ़ते हुए जो गोविंदा नाम को पुकारेगा, उन सभी श्रद्धालुओं को मैं मोक्ष दूँगा।

गोविंदा हरि गोविन्दा वेंकटरमणा गोविंदा, श्रीनिवासा गोविन्दा वेंकटरमणा गोविन्दा!!
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“जय जय श्री राधे”
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मोर कुटी

बरसाने के पास एक छोटा सा स्थान है मोर-कुटी। एक समय की बात है जब लीला करते हुए राधाजी प्रभु से रूठ गयी और वो रूठ के मोर-कुटी पर जा के बैठ गयी और वहां एक मोर से लाड करने लगीं। जब हमारे ठाकुर जी उन्हें मनाने के लिए मोर-कुटी पर पधारे तो देखा कि राधे जू हमसे तो रूठ गयी और उस मोर से प्यार कर रही है। ठाकुर जी को उस मोर से ईर्ष्या होने लगी। वो राधारानी को मनाने लगे तो किशोरी जी ने ये शर्त रख दी कि हे! बांके बिहारी मेरी नाराजगी तब दूर होगी जब तुम इस मोर को नृत्य प्रतियोगिता में हरा कर दिखाओगे। ठाकुर जी इस बात पर तैयार हो गए क्योंकि उस नन्द के छोरे को तो नाचने का बहाना चाहिए। जब राधारानी के सामने नाचने कि बात हो तो कौन पीछे हटे।

प्रतियोगिता प्रारंभ हुई, एक तरफ मोर जो पूरे विश्व में अपने नृत्य के लिए विख्यात है, और दूसरी ओर हमारे नटवर नागर नन्द किशोर। प्रभु उस मयूर से बहुत अच्छा नाचने लगे पर फिर किशोरी जी को लगा कि यदि बांके बिहारी जीत गए तो बरसाने के मोर किसी को मुँह नहीं दिखा पाएंगे। स्वयं राधा के गांव के मोर एक ग्वाले से न जीत सके। इसलिए किशोरी जी ने अपनी कृपामयी दृष्टि उस मोर पर डाल दी और फिर वो मोर ऐसा नाचा कि उसने ठाकुर जी को थका दिया। सच है जिस पर राधे जू कृपा दृष्टि डाल दे, वो तो प्रभु को भी हरा सकता है।

जिसने राधारानी के प्यार को जीत लिया समझो उसने कृष्ण जी को भी जीत लिया क्योंकि ठाकुर जी तो हमारी किशोरी जी के चरणों के सेवक हैं। हम यदि अपनी जिह्वा से राधा नाम गाते हैं, तो उसमे हमारा कोई पुरुषार्थ नहीं है, वो तो उनकी कृपा ही है जो हमारे मुख पर उनका नाम आया। पूरा राधा कहने कि भी आवश्यकता नहीं है, आप अपनी वाणी कहो सिर्फ “रा”, ये रा सुनते ही बांके बिहारी के कान खड़े हो जाते हैं, और जब आप आगे बोलते हो “धा” मतलब आप बोलते हो “राधा”, तो बांके बिहारी के कान नहीं फिर तो बांके बिहारी ही खड़े हो जाते हैं। उस भक्त के साथ चलने के लिए।

तो कहिये:-
“जय जय श्री राधे”

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6 . BRAHMA AND SIVA APPEAR BEFORE DEVAKI

NOW lord brahma and Lord Siva accompanied by great sages like Narada, and Vyasa invisibly approached the cell of Devaki, and stood in front of her With folded hands and offered their prayer to welcome the advent of Lord Narayana in the form of baby Krishna.

They prayed, “O Lord! You appeared in the past in different forms as Matsya, Kurma, Narasimha, Yaraha, Parasurama, Rama, Vamana, etc., to protect us and the world at large.

Even so protect us now and the earth from the great suffering we are undergoing. We respectfully offer our salutations unto you.”
They then spoke to Devaki and said, “O mother, by your good fortune and ours, God Himself is now in your womb.

Therefore you need not fear Kamsa anymore. He will be killed by your son, who is the protector of the entire world.” Having pacified Devaki thus, all the gods departed to their heavenly abodes

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श्रीदयालदास बाबाजी

श्रीदयालदास बाबा कब कहाँ से आये, किसके शिष्य थे और क्या भजन करते थे कोई नहीं जानता। पर वे अपने वैराग्य और भजनावेश के लिए जितना व्रजमण्डल में प्रसिद्ध थे, उतना ही गौड़मण्डल में भी। वे अपने पास कथा, करुआ, कौपीन और बहिर्वास के सिवा और कुछ न रखते। प्रायः ब्रज में ही जहाँ-तहाँ घूमते रहते। अकसर कंथा से सिर ढककर एक ही स्थान पर निश्चल भाव से चौबीस-चौबीस घण्टे बैठे रहते। दूर से लगता जैसे कोई गठरी रखी हो।
वे अधिकतर मौन रहते। पर मधुकरी भिक्षा के समय व्रजवासी गृहस्थ के दरवाजे पर उच्च स्वर से ‘हरे कृष्ण’ कहते। यदि वह उससे भी ऊँचे स्वर से ‘हरे कृष्ण’ कहता, तो भिक्षा के लिए रुक जाते, नहीं तो आगे बढ़ जाते। वे अन्धे थे, फिर भी चुटकी (आटा या चावल) भिक्षा करते थे और स्वयं पकाकर खाते थे।

राजार्षि वनमालीराय से वे कभी-कभी व्रजवासियों की सेवा के लिए कुछ अर्थ माँग लेते थे। पर अपने व्यवहार में पैसा-कौड़ी कभी नहीं लाते थे। यदि कोई कुछ दे जाता था, तो उसे राजर्षि बहादुर की पत्नी के पास रख देते थे। इस प्रकार राजार्षि बहादुर की पत्नी के पास तीन सौ रुपये हो गये तब एक दिन उन्होंने सब रुपये माँग लिए और यमुना किनारे बैठकर एक-एककर यमुना में फेंक दिये।

उनकी अलौकिक शक्ति का पता चला जब एक दिन उन्होंने राजरर्षि बहादुर के बड़े भाई श्रीगिरधारीदास बाबाजी (पूर्वाश्रम के श्रीअन्नदाबाबू) पर विशेष कृपा की। गिरिधारीदासजी उन दिनों गोवर्धन में गोविन्दकुण्ड पर भजन करते। वे दयालदास बाबा को साथ ले व्रज के कुछ गाँवों में प्राचीन लीला-स्थलियों के दर्शन करने गये। उन्हें हरनियां की बीमारी थी और वे ट्रस (कमर में बाँधने का एक यन्त्र) पहना करते थे। दूसरे दिन किसी कुण्ड में स्नान करते समय उन्होंने ट्रस खोला। दयालदास बाबा ने पूछा- ‘यह क्या है ?’ उन्होंने कहा-मुझे हरनियां है। हरनियां में इसे पहनना आवश्यक होता है।’
बाबा ने कहा-‘उसे फेंक दो। अब उसकी आवश्यकता न होगी।’

उन्होंने ट्रस फेंक दी। उसी समय से उनका हरनियां भी न जाने कहाँ चला गया। उन्हें सारा जीवन हरनियां की शिकायत फिर नहीं हुई। शेष जीवन में बाबा वृन्दावन में कालीदह पर सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबा की कुटिया के पीछे एक कुटिया में रहने लगे थे। श्रीप्राणकृष्णदास बाबा तब उनकी सेवा करते थे

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भजन के जगह जब मन संसार मे लगे तो क्या करें?


प्रश्न


महाराजजी, मेरा मन भजन में नहीं लगता है, जब भी भजन करने बैठती हूँ मन बार-बार संसार में ही जाता है तो मैं क्या करूँ ?


समाधान


मन तो भजन में किसी का भी स्वतः नहीं लगता, अगर भजन में मन लग जाए तो सभी सिद्ध पुरुष न हो जाएँ; मन लगाने से लगता है। आप बार-बार उसे संसार से हटाकर भजन में लगाईये जरूर एक दिन सहज रूप से लगने लगेगा। श्रीगीताजी में भगवान् ने कहा है –

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।

ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ (६/२६)

‘जहाँ-जहाँ जिस-जिस विषय में यह अस्थिर और चंचल मन जाये, उस उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे अन्तर्मुख करो अर्थात् मेरे (प्रभु के) चिंतन में लगाओ ।’

यदि सतत् अभ्यास के द्वारा भजन में मन नहीं लगता होता तो फिर अपने लोग इस मार्ग के पथिक न बनते । सबका मन प्रारम्भ में संसार में ही भागता है क्योंकि अनादिकाल का अभ्यास है। जैसे जल को कहीं से भी छोड़ो वह नीचे की ओर ही बहता है, लेकिन अगर हमें उसे ऊपर चढ़ाना है तो किसी यंत्र का सहारा लेना पड़ता है, ऐसे ही मन को कहीं भी छोड़ो विषयों में ही जाएगा, उसको विषयों से ऊपर उठाने के लिए मन्त्र की आवश्यकता होती है। यही प्रश्न भगवान् श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा था कि हे प्रभो ! मन तो बड़ा चंचल है, इस (चंचल चित्त) को वश में करने का उपाय क्या है ?

चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम् ।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ (६/३४)

द्वारा इस चलायमान दुर्निग्रह मन को वश में किया जा सकता है

तब भगवान् बोले- हे अर्जुन ! सतत् अभ्यास और वैराग्य के

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ (६/३५)

सतत् अभ्यास से सब कुछ संभव है । यदि अभ्यास के द्वारा भगवान् में मन लगता न होता तो प्रभु ऐसा क्यों कहते कि मेरे में मन लगाओ, मेरे में बुद्धि को लगाओ

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।’ (गी. १२/८)

अभ्यास के द्वारा निश्चित मन लगता है, तभी तो ऐसा प्रभु कह रहे हैं ।

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ठाकुर जी की मुस्कान

एक मैया अपने श्याम सुन्दर की बड़ी सेवा करती थी। वह प्रातः उठकर अपने ठाकुर जी को बड़े प्यार दुलार और मनुहार से उठाती और स्नान श्रृंगार के बाद उनको आइना दिखाती। उसके बाद भोग लगाती थी। एक बार उसको एक मास की लंबी यात्रा पर जाना पड़ा। जाने से पूर्व उसने ठाकुर जी की सेवा अपनी पुत्रवधू को सौंपते हुई समझा रही थी। ठाकुर जी की सेवा में कोई कमी न करना। उनको श्रृंगार के बाद आइना दिखाना इतना अच्छा श्रृंगार करना कि ठाकुर जी मुस्करा दें।


दूसरे दिन बहू ने सास की आज्ञानुसार ठाकुर जी की सेवा की। उनको श्रृंगार के बाद दर्पण दिखाया और उसी दर्पण में धीरे से देखने लगी कि ठाकुर जी मुस्कराए या नहीं। ठाकुर जी को जब मुस्कराता न देखा तो सोचा श्रृंगार में कमी हो गई होगी। पगड़ी बंसी पोशाक सब ठीक करके फिर दर्पण दिखा कर झुक कर देखा ठाकुर जी पहले जैसे खड़े थे। एक बार पुनः पोशाक श्रृंगार ठीक किया, फिर से दर्पण दिखाया ठाकुर जी नहीं मुस्कराए। अब बेचारी डर गई सोचा शायद ठीक से नहीं नहलाया है।

फिर से कपडे उतार कर ठाकुर जी को स्नान कराया, पोशाक और श्रृंगार पधराया। पुनः दर्पण दिखाया, किंतु ठाकुर जी की मुस्कान न देख सकी। एक बार फिर पोशाक उतार कर पूरा क्रम दुहराया। ठाकुर जी की मुस्कान तो नहीं मिली।

इस प्रकार उसने 12 बार यही उपक्रम किया। सुबह से दोपहर हो चुकी थी। घर का सब काम बाकी पड़ा था। न कुछ खाया था न पानी पिया था। बहुत जोर की भूख प्यास लगी थी, किंतु सास के आदेश की अवहेलना करने की उसकी हिम्मत नहीं थी। तेरहवीं बार उसने ठाकुर जी के वस्त्र उतारे। पुनः जल से स्नान कराया। ठाकुर जी सुबह से सर्दी के मौसम में स्नान कर कर के तंग हो चुके थे। उन्हें भी जोर की भूख प्यास लगी थी, इस बार फिर से वस्त्र आभूषण पहन रहे थे, किन्तु उनके मन में भी बड़ी दुविधा थी क्या करूँ ? श्रृंगार होने के बाद आसन पर विराज चुके थे। बहू ने दर्पण उठाया, ठाकुर जी ने निश्चय कर लिया था मुस्कराने का।

जैसे ही उसने दर्पण दिखाया और झुक कर बगल से देखने की चेष्टा की श्याम सुन्दर मुस्करा रहे थे। उनकी भुवन मोहिनी हंसी देख कर बहू विस्मित हो गई। सारी दुनिया को भूल गई। थोड़ी देर में होश में आने के बाद उसको लगा। शायद मेरा भ्रम हो, ठाकुर जी तो हँसे नहीं। उसने पुनः दर्पण दिखाया। ठाकुर जी ने सोचा प्यारे अगर भोजन पाना है तो हँसना पड़ेगा। वे मध्यम-मध्यम हँसने लगे, ऐसी हँसी उसने पहले नहीं देखी थी।

वह मन्द हास उसके ह्रदय में बस गया था। उस छवि को देखने का उसका बार-बार मन हुआ। एक बार फिर उसने दर्पण दिखाया और ठाकुर जी को मुस्कराना पड़ा। अब तो मारे ख़ुशी के वह फूली न समाई बड़े प्रेम से उनको भोग लगाया और आरती की। दिन की शेष सेवाएं भी की और रात्रि को शयन कराया।

अगले दिन पुनः उसने पहली बार ही जैसे ठाकुर जी को स्नान करा के और वस्त्राभूषणों को पहना कर सुन्दर श्रृंगार करके आसन पर विराजमान किया और दर्पण दिखाया ठाकुर जी कल की घटनाओं और भूख को याद किया। ठन्डे जल से 13 बार का स्नान याद करके ठाकुर जी ने मुस्कराने में ही अपनी भलाई समझी। उसने तीन बार ठाकुर जी को दर्पण दिखाया और उनकी मनमोहक हँसी का दर्शन किया। आगे की सेवा भी क्रमानुसार पूरी की। अब तो ठाकुर जी रोज ही यही करने लगे दर्पण देखते ही मुस्करा देते। बहू ने सोचा शायद उसको ठीक से श्रृंगार करना आ गया है, वह इस सेवा में निपुण हो गई है।

एक मास बाद जब मैया यात्रा से वापस आई आते ही उसने बहू से सेवा के बारे में पूछताछ की। बहू बोली मैया मुझे एक दिन तो सेवा मुश्किल लगी, किन्तु अब मैं निपुण हो गई हूँ। अगले दिन मैया ने स्वयं अपने हाथों से सारी सेवा की श्रृंगार कराया अब दर्पण लेने के लिए हाथ उठाया ठाकुर जी स्वयं प्रकट हो गए। मैया का हाथ पकड़ लिया बोले–”मैया ! मैं तेरी सेवा से प्रसन्न तो हूँ, पर दर्पण दिखाने की सेवा तो मैं तेरी बहूरानी से ही करवाऊंगा, तू तो रहने दे।” मैया बोली–”लाला ! क्या मुझसे कोई भूल हुई। ठाकुर जी ने कहा–”नहीं मैया ! भूल तो नहीं हुई, पर मेरा मुस्कराने का मन करता है, और मैं तो तेरी बहूरानी के हाथ से दर्पण देखकर मुस्कराने की आदत डाल चुका हूँ, अब ये सेवा तू उसी को करने दे।”

मैया ने बहूरानी को आवाज लगाई और उससे सारी बात पूँछी, बहू ने बड़े सहज भाव से बता दिया हाँ ऐसा रोज मुस्कराते हैं ये केवल पहले दिन समय लगा था। मैया बहू रानी की श्रद्धा और उसकी लगन और ठाकुर जी दर्शन से अति प्रसन्न हो गई। उसे पता चल गया कि उसकी बहू ने ठाकुर जी को अपने प्रेम से पा लिया है। मैया अपनी बहू रानी को ठाकुर जी की सेवा सौप कर निश्चिन्त हो गई।

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अक्षय तृतीया , 2022



अक्षय तृतीया वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया कहते हैं।

ऐसी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अगर किसी कार्य का शुभारंभ किया जाए तो वह कार्य कभी समाप्त नहीं होता। केवल कार्य ही नहीं, जो भौतिक संसाधन भी इस अवधि में जुटाए जाएं वे भी हमारे जीवन में चिर स्थाई हो जाते हैं। इस तिथि का कुछ लोगों यह भी सदुपयोग किया है कि वे इस दिन दान पुण्य करते हैं, ताकि उनके किए दान अक्षय हो जाएं।

ऐसे में अक्षय तृतीया के दिन नया काम शुरू करने, नए भौतिक संसाधन जैसे बरतन, सोना, चांदी और अन्य कीमती वस्तुएं, विवाह और दान पुण्य करने का रिवाज बन गया है।
चूंकि यह दिन अपने आप में महत्वपूर्ण है, अत: इस पूरे दिन को अपने आप में अबूझ मुहुर्त कहा गया है, इस दिन न तो राहुकाल देखा जाता है, न चौघडि़या और न ही होरा, पूरे दिन में कभी भी किसी भी समय शुभ कार्य संपन्न किए जा सकते हैं।

आप सभी को अक्षय तृतीय की ढेरों शुभकामनाएं। नए वस्त्र खरीदिए, मांगलिक कार्य कीजिए, कीमती आभूषण खरीदिए और दान पुण्य कीजिए, सभी कुछ अक्षय रहे इस कामना के साथ।


“चन्दन उत्सव कथा”


एक बार माधवेंद्रपुरी जी व्रज मंडल जतीपुरा (गोवर्धन) में आये, जब वे रात में सोये तो गोपाल जी उनके स्वप्न ने आये, और बोले, “पुरी! देखो में इस कुंज में पड़ा हूँ, यहाँ सर्दी, गर्मी, वरसात, में बहुत दुःख पता हूँ। तुम इस कुंज से मुझे बाहर निकालो और गिरिराज जी पर मुझे स्थापित करो।”
जब माधवेंद्रपुरी जी सुबह उठे तो उन्होंने व्रज के कुछ ग्वालो को लेकर उस कुंज में आये और कुंज को ध्यान से खोदा, तो मिट्टी में एक श्री विग्रह पड़ा था, उसे लेकर स्नान अभिषेक करके पुरी जी ने स्थापित कर दिया।
एक दिन फिर श्री गोपाल जी स्वप्न में आये और माधवेंद्रपुरी से कहा, “भीषण ग्रीष्म की तपिश से मेरा शरीर तप रहा है। तुम जगन्नाथपुरी स्थित मलयाचल से वहाँ का चंदन लाकर मेरे शरीर पर लेप करो।”
माधवेंद्रपुरी गोस्वामी चंदन लेने हेतु मलयाचल चले गए। रास्ते में रेमूणाय नामक ग्राम आया, वहाँ ‘ठाकुर गोपीनाथ’ का मंदिर था। मंदिर के दर्शन कर फिर वे मलयाचल से अत्यधिक मात्रा में चन्दन लेकर लौट रहे थे, तब वे रात्रि विश्राम के लिए फिर रेमूणाय ग्राम में ठहर गए।
रात्रि में श्रीनाथ जी ने उन्हें यह स्वप्न दिया कि तुम जो चन्दन लाए हो, उसका यही रेमूणाय गोपीनाथ के शरीर पर ही लेप करवा दो। मेरे अंग में लेपन करने से उनके श्री अंग का ताप भी दूर हो जाएगा क्योंकि ठाकुर गोपीनाथ और मैं एक ही हूँ। माधवेंद्रपुरी ने ऐसा ही किया। यह घटना अक्षय तृतीया के दिन की ही है।
इस प्रकार चंदन-यात्रा की सेवा का समर्पण क्रम सर्वप्रथम जगन्नाथपुरी स्थित ठाकुर जगन्नाथ मंदिर में अक्षय-तृतीया के दिन प्रारम्भ हुआ। वहाँ यह महोत्सव “वैशाख शुक्ल तृतीया से ज्येष्ठ पूर्णिमा” की जल यात्रा तक पूरे एक महीने अत्यंत श्रद्धा व धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
उक्त घटना से प्रेरणा लेकर वृंदावन में चंदन यात्रा की विशिष्ट सेवा की परम्परा का शुभारंभ श्रीलजीव गोस्वामी ने अक्षय-तृतीया के दिन यहाँ के समस्त सप्त देवालयों में कराया। यह सेवा अब यहाँ वृहद् रूप से होती है। एक दिन की यह ठाकुर सेवा अत्यंत समय साध्य व श्रम साध्य है। समस्त सप्त देवालयों के गोस्वामी व भक्त-श्रद्धालु अक्षय-तृतीया के कई माह पूर्व से अपने-अपने मंदिर प्रांगणों में बडे-बडे पत्थरों पर चंदन घिसने का कार्य इस भाव से करते हैं कि प्रभु उनकी इस सेवा को अवश्य ही स्वीकार करेंगे।
अक्षय-तृतीया के एक दिन पूर्व घिसे हुए चंदन को एक जगह एकत्रित कर पुन:और अधिक महीन पीसा जाता है ताकि ठाकुर विग्रहों के किसी भी श्रीअंग को किसी प्रकार का कष्ट न हो।
अक्षय-तृतीया के दिन प्रात: महीन चंदन में यमुना जल, गुलाब जल, इत्र, कर्पूर का पाउडर व केसर आदि का मिश्रण गोस्वामी गणों द्वारा किया जाता है। तत्पश्चात उक्त मंदिरों के सेवायतों द्वारा ठाकुर विग्रहों के श्री अंगों पर इस मिश्रण का लेप किया जाता है। इस लेपन के अंतर्गत ठाकुरजी के शीश मुकुट, पोशाक, वंशी, लकुटि,बाजूवंद, कंधनी, पटका आदि चंदन से ही निर्मित कर कलात्मक रूप से सुशोभित किए जाते हैं।
“जय जय श्री राधे”


बांके बिहारी जी विशेष


इस दिन वृन्दावन के लाड़ले ओर श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के लाड़ले हम सब के प्यारे श्री बाँके बिहारी लाल जी के चरण दर्शन होते है।

श्री बाँके बिहारी जी लाल के चरणों के दर्शन साल में सिर्फ एक बार ही होते है अन्यथा वो पोशाक में छिपे रहते है।

इस दिन श्री बाँके बिहारी जी पेजेब भी पहनाई जाती है कहा जाता है जिनकी शादी में रुकावटे बहुत आती हो वो अक्षय तृतीया को बिहारी जी को पेजेब भेंट कर दे तो उनका वर जल्दी मिल जाता है।

इस दिन अधिक गर्मी होने के कारण श्री बाँके बिहारी जी को चंदन का लेप भी किया जाता है जिससे उनको गर्मी से राहत मिल सके।*देगेl

अक्षय तृतीया के दिन श्री बाँके बिहारी जी पीले वस्त्रों में अपने भगतो को फूल बंगले में विराजकर दर्शन देगे।

अक्षय तृतीया को जो के आटे का सत्तू ,चने के आटे का सत्तू ,गेंहू के आटे का सत्तू,ओर भी अनेक प्रकार के सत्तू का शर्बत बनाकर ठाकुरजी की भोग लगता है परन्तु अब बड़े बड़े शहर होते जा रहे तो वहाँ सत्तू नही मिल पाता तो उसकी जगह आप मीठे शर्बत का प्रसाद भी लगा सकते है

सभी अपने लड्डू गोपाल, जुगल जोड़ी आदि सब का सुंदर श्रृंगार कर चंदन का लेप जरूर लगाए और ठाकुर जी को पायल भी पहनाए ओर शर्बत का भोग भी लगाए


प्रचलित मान्यताएं



पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप–तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने–अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है। ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन–जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥


अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है। ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।


सतयुग और त्रेता का आरंभ बिंदू



भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर–नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं।

वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। पद्म पुराण के अनुसा इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता। मदनरत्न के अनुसार:


अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥



व्रत कथाएं



एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी–देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म–कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी–पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, गौरी–पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक फरसा रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।

मांगलिक कार्य इस दिन से शादी–ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है। बड़े–बुजुर्ग अपने पुत्र–पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरंभ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति–रिवाज के साथ अपने गुड्डा–गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बच्चे सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। कई जगह तो परिवार के साथ–साथ पूरा का पूरा गाँव भी बच्चों के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो सगुन कृषकों को मिलते हैं, वे शत–प्रतिशत सत्य होते हैं।
बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक बडी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव–घर और कुटुंब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है, वर्षा की कामना की जाती है, लड़कियाँ झुंड बनाकर घर–घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और लड़के पतंग उड़ाते हैं। यहाँ इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर ख़रबूज़ा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरंभ किसानों को समृद्धि देता है।
पहले समझते हैं कि तिथि क्या है, सूर्य और चंद्रमा की निश्चित कोणीय दूरी को एक तिथि कहा जाता है। यही कारण है कि अंग्रेजी कलेण्डर में जब दिन जारी रहता है, तभी तिथि समाप्त हो जाती है अथवा अंग्रेजी कलेण्डर में तारीख वही रहती है और तिथि बदल जाती है।
इसके साथ ही हम यह भी देखते हैं कि किसी तिथि का लोप हो जाता है तो किसी तिथि की वृद्धि हो जाती है। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि सनातन कलेण्डर के अनुसार एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच की अवधि को एक दिन कहा जाता है। अगर कोई तिथि एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के बीच ही समाप्त हो जाती है, तो उसे तिथि का लोप होना कहते हैं और अगर एक दूसरे दिन के सूर्योदय के बाद भी तिथि जारी रहती है तो उसे तिथि वृद्धि होना कहा जाता है।
सूर्य और चंद्रमा के कोणीय संबंधों में अक्षय तृतीया एक ऐसा बिंदू है, जहां यह संबंध बिल्कुल सटीक होता है, और सूर्योदय के साथ तिथि का उदय होता है और अगले दिन सूर्योदय से पहले तिथि समाप्त हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अक्षय तृतीया ऐसी तिथि है, जिसमें कभी वृद्धि अथवा लोप नहीं होता। इसी कारण इसे अक्षय कहा गया है, इसका कभी क्षरण नहीं होता।

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धीर – समीर




श्रीयमुनाजीके तटपर रासलीला स्थली वंशीवटके समीप ही यह स्थान वर्तमान है। यह श्रीराधाकृष्ण युगलके नित्य निकुञ्ज केलिविलासका स्थान है। युगल केलिविलासका दर्शनकर समीर भी धीर स्थिर हो जाता था। वह एक कदम भी आगे बढ़नेमें असमर्थ हो जाता था। इसलिए इस स्थानका

नाम धीर-समीर पड़ा है। धीर-समीरका कुञ्ज और देवालय नित्यानन्द प्रभुके ससुर, जाहवा एवं वसुधाके पिता सूर्यदास सरखेलके छोटे भ्राता श्रीगौरीदास पण्डितके द्वारा स्थापित हैं। श्रीगौरीदास पण्डित श्रीमन् महाप्रभुजीके प्रधान परिकरोंमेंसे एक हैं। उन्होंने अपने जीवनके अंतिम समयमें वृन्दावन आकर धीर-समीर कुञ्जकी स्थापना की और वहीं पर अपने आराध्यदेव श्रीश्यामरायकी सेवा पूजा आरंभकी। यहींपर उनकी भजन एवं समाधिस्थली भी विद्यमान है। प्रसिद्ध वैष्णव पदकर्ता श्रीजयदेव गोस्वामीने अपने प्रसिद्ध पदमें


धीरसमीरे यमुनातीरे वसति वने वनमाली ।

गोपीपीन पयोधरमर्दन चञ्चलकरयुगशाली ||

(श्रीगीतगोविन्द)


जिस कुञ्जका उल्लेख किया है, वह यही केलिवट धीर समीर कुञ्ज है। श्रीवक्रेश्वर पण्डित श्रीमन् महाप्रभुजीके प्रसिद्ध परिकरोंमेंसे एक हैं। वे अपने अंतिम समयमें कृष्णविरहमें इतने व्याकुल हो गये कि लौकिक लोगोंके लिए उनका पार्थिव शरीर छूट गया। कुछ दिनोंके पश्चात् उनके प्रिय शिष्य श्रीगोपालगुरु भी अप्रकट लीलामें प्रविष्ट हो गये।

गोपालगुरुके प्रियशिष्य ध्यानचन्द गोस्वामी भी परम रसिक एवं विद्वान भक्त हुए हैं। उनके समयमें राजकर्मचारी राधाकान्त मठ तथा उसके अन्तर्गत हरिदास ठाकुरकी भजन कुटीमें कुछ अत्याचार करने लगे। इससे वे बड़े मर्माहत हुए। उसी समय उन्हें वृन्दावनके किसी वैष्णवने यह समाचार दिया कि अरे! तुम इतने चिन्तित क्यों हो रहे हो? तुम्हारे परमगुरु श्रीवक्रेश्वर गोस्वामीको हमने धीर-समीरमें भजन करते हुए देखा है। तुम उनके पास चले जाओ। वे सारी व्यवस्था ठीक कर देंगे। ऐसा सुनकर वे बड़े आह्लादित हुए और उन्होंने तत्क्षणात् पैदल ही वृन्दावनके लिए यात्रा की।

कुछ दिनोंमें वे श्रीवृन्दावनमें पहुँचे। धीर समीरमें प्रवेश करते ही वे आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने देखा कि श्रीवक्रेश्वर पण्डित हाथमें नामकी माला लिये हुए भाव विभोर होकर नाम सङ्कीर्तन कर रहे थे। लीला स्मृतिके कारण उनके नेत्रोंसे निरन्तर अश्रुप्रवाह विगलित हो रहा था। श्रीध्यानचन्दजी लकुटिकी भाँति उनके चरणों में गिरकर रोने लगे और उनसे पुरी धाममें लौट चलनेका आग्रह करने लगे। वक्रेश्वर पण्डितने साक्षात् रूपसे जानेके लिए मना तो किया, किन्तु बोले- तुम निश्चिन्त मनसे पुरी लौट जाओ।

राजकर्मचारियोंका उपद्रव सदाके लिए बंद हो जायेगा। उनके आदेशसे ध्यानचन्द गोस्वामी पुरीमें राधाकान्त मठमें लौटे। राजकर्मचारियोंने अपने कृत्यके लिए उनसे पुनः पुनः क्षमा मांगी। यह वही धीर समीर है, जहाँ श्रीध्यानचन्द गोस्वामीने अप्रकट हुए श्रीवक्रेश्वर पण्डितका साक्षात् दर्शन किया था। इन सब लीलाओंको अपने हृदयमें संजोये हुए भक्तोंको आनन्दित करने वाला धीर समीर आज भी विराजमान है।

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5. DEVAKI ESCAPES DEATH


Lord Narayana, having decided to be born as the son of Vasudeva and Devaki, first entered into the heart of Vasudeva. Vasudeva’s face began to shine like the sun. People were amazed to see the glow that emanated from him. After sometime, Lord
Narayana entered the womb of Devaki. Her form became radiant. Was she not to be the mother of the Lord of Lords?

Kamsa saw her resplendent and smiling. She was illumining the
whole prison by her lustre. He was amazed to see her beautiful form.

He said to himself, “Surely, my greatest enemy Narayana must be within her. For never before have I seen her with such divine lustre. What shall I do now? Shall I kill her? But then she is a woman; she is my sister; she is now pregnant too. If she is killed now, the world will condemn me.

All my fame, all my wealth and even my life-span will suffer because of this sin.” Pondering thus, ultimately he desisted from killing Devaki and awaited the birth of the child
with utmost restlessness.

The thought of the coming child was haunting him. While sitting down on a seat, he would suddenly stop and look at the seat since he thought he saw a child on the seat. He would tell himself; “There was a child on the seat and I was about to sit on it. Terrible!” He would then go to bed. But there he would see the child again on the bed. At every step the child would haunt him.

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श्रीसीतानाथदास बाबाजी

( गोवर्धन )

पूर्वाश्रम के उत्कलवासी गोप, श्रीसीतानाथदास बाबाजी महाराज अनपढ़, पर अति सरल और उदार थे। गोविन्दकुण्ड, गोवर्धनमें श्रीनाथजी के मन्दिर के उत्तर एक कुटियामें रहते थे। शेष रात्रि में स्नानादिकर गिरधारी की सेवा के पश्चात् उनके सामने पाँच घण्टे लगातार क्रन्दन करते हुए नृत्य कीर्तन करते थे। उसके पश्चात् तुलसी की सेवा पूजाकर श्रीनाथजी के सम्मुख उत्कल भाषा में रो-रोकर प्रार्थनादि करते थे। दोपहर २ बजे मधुकरी को जाते थे । ज्येष्ठ मास में सूर्य की प्रखर किरणों से गिरिराज तट की बालु का अतिशय तप्त हो जाती थी। फिर भी बाबाके नियम में कोई परिवर्तन नहीं होता था । बिना छत्र पादुकाbके घर-घर मधुकरी के लिए जाते थे। लौटते समय प्रत्येक वैष्णव की कुटिया में जाकर कुछ-कुछ मधुकरी दे आते थे।

उन्हें कुछ गोप-गीत याद थे। उन्हीं का वे अधिकांश समय बड़े मधुरभाव से कीर्तन करते । नियमपूर्वक दो बार गोविन्दकुण्ड में स्नान करते । रात्रि में दो बजे उठ बैठते और तीन बजे प्रथम स्नान करते। एक बार श्रीअद्वैतदास बाबाजी ने, जो उनके निकट रहते थे, कहा- ‘इस समय स्नान करना उचित नहीं, क्योंकि यह आंसुरिककाल होता है । उन्होंने उत्तर दिया – मैं क्या करूँ ? बिलकुल अस्वतन्त्र हूँ। श्रीनाथजी, जिस समय जगा देते हैं, उसी समय उठ बैठता हूँ।’ जिस दिन सीतानाथजी अप्रकट हुए, उसके दो-तीन दिन पहलेसे उन्हें सान्निपातिक ज्वरातिसार था। उसमें भी उनका स्नानादि का नियम नहीं छूटा । अन्तिम रात्रि में वे अवश हो शय्या पर पड़े थे। माघ मास की भयंकर शीत थी । उस रात श्रीमतदासजी बराबर जागते रहे । ठीक तीन बजे कुण्डमें किसी के डुबकी लगाने का शब्द हुआ। बाहर निकलकर देखा तो वृद्ध सोतानाथ बाबा स्नान कर रहे थे।

बारह बजे दिनमें वे श्रीजद्व तदाससे बोले- ‘अद्वैतदास ! मुझे श्रीनाथजीके सामने ले चलो।’ ‘मैं अकेला कैसे ले चलूं ?” अद्वै तदास जी ने उत्तर दिया।

‘सहारा तो लगा सकोगे।’ उन्होंने फिर आग्रह किया। श्रीअ दास बाबा हाथ पकड़कर उन्हें श्रीनाथजीके सामने ले गये।

श्रीनाथजीके सामने वरुण वृक्षके नीचे बेदीपर बैठा दिया। तब वे बोले ‘कुण्डका जल लाकर स्नान करा दो ।’ स्नानके पश्चात् कहा- ‘तिलक कर दो।’ तिलक हो जाजैपर पूछा- सब लोगोंने प्रसाद पा लिया है ?”

अर्द्ध तदासजीने कहा- ‘पा लिया है ?’

तो तुलसीजीको स्नान करा स्नानीय जल मुझे पान करा दो।’

तुलसीका स्नान-जल जैसे ही उनके मुखमें दिया, उन्होंने शरीर छोड़ दिया। कहने को आवश्यकता नहीं कि वृन्दादेवीने उन्हें ले जाकर राधारानी के चरणोंमें समर्पित कर दिया।

वृन्दादेवीका साक्षात्कार उन्हें पहले ही हो चुका था; यह बात सर्वविदित थी। एक अद्वै तदास बाबासे उन्होंने कहा, वृन्दादेवीको माधुरीका वर्णन करनेको। वे बोले- मैं क्या जानूं उनकी माधुरी। मैंने

क्या उन्हें देखा है ?”

‘तो सुनो’ श्रीसीतानाय बाबाने कहा और भावाविष्ट हो वृन्दादेवी की रूपमाधुरीका इस प्रकार वर्णन किया कि उसकी स्फूति अद्वै तदास बाबाके हृदय में स्वतः होने लगी ।

बृन्दादेवीकी उनपर कितनी कृपा थी, यह इस बातसे भी स्पष्ट है कि जिस तुलसीके पौधेको कीड़ा चाट जाता और जिसके हरा होनेकी कोई सम्भावना न रहती, वह उनके स्नान कराने मात्रसे फिर हरा-भरा हो जाता ।

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क्या अपने हिसाब से भजन-साधन करना सही है?

प्रश्न :


मैं अपने हिसाब से भजन-साधन करता हूँ, क्या यह ठीक है?


समाधान :

अपने हिसाब से चलने पर जीव का पतन सुनिश्चित है; –

जब हम शास्त्र – सद्गुरु या आचार्य के हिसाब से अर्थात् उनके द्वारा बताई हुयी उपासना पद्धति के अनुसार चलते हैं तभी ठीक ढंग से चल पाते हैं क्योंकि मार्ग में आने वाली बाधाओं से उनकी कृपा रूपी कवच हमारी रक्षा करता है।

जब हम मनमुखी होकर चलते हैं तो हमारा हिसाब तो ये है कि दो मिनिट में वैराग्य और दो मिनिट में राग यानी विषयों का चिंतन ।

एक क्षण तो दिखाई पड़ता है कि बात बन गयी लेकिन दूसरे ही क्षण ये मन इतनी गंदी जगह लाकर के खड़ा कर देता है, जो किसी को बताया भी नहीं जा सकता ।

हम सबके मन की जो दशा है वह बड़ी विचित्र है । मन थोड़ी देर तो प्रभु के प्रेम में रुला देगा – हा नाथ! और अगले ही क्षण उसी मन में गंदे-गंदे विचार आने लगते हैं।

ये मन अंकुश में रहता है तो केवल गुरु-कृपा से । अतः शास्त्र और सद्गुरु की आज्ञानुसार ही चलो, मनमुखी होकर नहीं ।

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माखन चोर (एक अनसुनी लील)

एक दिन ठाकुर जी ने ग्वालबालो से कहा की आज तो हम प्रभा काकी के यहाँ माखन चोरी करने चलेंगे।

एक ग्वारिया ने कहा की लाला फिर तो आज हम एकादशी करेंगे, ठाकुर जी बोले क्यों ?
ग्वारिया बोला लाला तुझे पता नही है प्रभा गोपी कैसी है। एक हाथ कमर पे पड़ जावे तो पाँच दिन तक गर्म नमक का सेक करना पड़ता है।
ठाकुर जी बोले तुझे कैसे पता ?
ग्वारिया बोला मैं उसका पति हूँ, भुगत भोगी हूँ।

ठाकुर जी बोले तू उसका पति है तो हमारी मण्डली में क्या कर रहा है ?
ग्वारिया बोला मुझे भी खाने को कुछ देती नही तो मुझे भी तुम्हारी मण्डली में आना पड़ा।
ठाकुर जी कहते हैं, ‘मैंने तो आज तय कर लिया, में तो प्रभावती गोपी के यहाँ, जाऊँगा, सो जाऊँगा।’

गोपियाँ मैया से शिकायत बहूँत करती थी, तो मैया ने ठाकुर जी के पग में नुपुर पहना दिए, और गोपियाँ से कहा की जब मेरा लाला तुम्हारे यहाँ माखन चोरी करने आवेगा, तो घुघरूँ की छम-छम की आवाज आयेगी, तब तुम लाला को पकड लेना।
ठाकुर जी देखा की गोपी के घर के बाहर गोबर पड़ा है, ठाकुरजी उस गोबर में दोनों पैर डाल कर जोर जोर से कूदे तो घुँघुरु में गोबर भर गया, और आवाज आना बन्द हो गयी। अब ठाकुर जी धीरे-धीरे पाँव धरते हूँए, दोनों हाथ मटकी में ड़ाल कर माखन खाने लगे।
प्रभा गोपी पीछे ही खड़ी थी, और पीछे से आकर ठाकुर जी को पकड़कर बोली, ‘ऐ धम्म’
ठाकुरजी बोले, ‘रे ये कौन आ गयी’, पीछे मुड़ के देखे तो गोपी ! ठाकुर जी बोले, ‘ओ गोपी तुम।’

गोपी बोली, ‘रे चोर कहीं के, चोरी करने आया।’
ठाकुर जी बोले, ‘मैंने चोरी कहा की, नहीं मैं चोरी करने नही आया, मैं तो मेरे घर आया।’
गोपी बोली, ‘ये तेरा घर है, जरा देख तो ?’
ठाकुरजी ने ऐसी भोली-सी शक्ल बनाई, और इधर उधर देख के बोले, ‘अरे सखी क्या करूँ मुझे तो कुछ खबर ही नही पड़ती, क्या बताऊँ दिन भर गैया चराता हूँ, और श्याम को बाबा के साथ हथाई पे जाता हूँ, इतना थक जाता हूँ की मुझे तो खबर ही नही पड़ती, की मेरा घर कौन-सा, तेरा घर कौन-सा। कोई बात नही गोपी तू भी तो मेरी काकी है, तेरा घर सो मेरा घर, तेरा घर सो मेरा घर।’
गोपी बोली, ‘रे कब से तेरा घर सो मेरा घर बोले जा रहा है, एक बार भी ये नही कहें की मेरा घर सो तेरा घर, बड़ा चतुर है, चोरी करता है ?’
ठाकुरजी बोले सखी, मैंने चोरी नही की।’

गोपी बोली, ‘लाला अगर तूने चोरी नही की तो तेरे हाथों पे माखन कैसे लग गयो ?’
ठाकुर जी बोले, ‘सखी वो तो मैं भीतर आयो तो देखा की मटकी पे चींटियाँ चिपक रही है, तो मैंने सोचा की मेरी मैया को सूजे ना है ! संध्या के समय मैया माखन के संग-संग चींटियाँ परोस देगी ! सो माखन से चींटियाँ निकालीं तो हाथों पर माखन लग गयो। बाकि मैंने खाया तो नही।’

सखी बोली, ‘लाला तू ने खाया नही तो तेरे मुख पे कैसे लग गयो ?’
ठाकुरजी बोले, ‘सखी मैं तो ठहरो सीधो पर एक चींटी तेरे जैसी चंचल थी, वो मेरे जंघा पे चढ़ गयी, मैंने कछु ना कियो, फिर वो मेरे पेट पे चढ़ी, मैंने कछु ना कियो, जब वो मेरे मुख पे चढ़ी तो खुजली होने लगी, तकब खुजली करते हुए माखन मुँह पे लग गयो, बाकि मैंने खाया तो नहीं।’

गोपी बोली, ‘आज में तोहे छोड़ने वाली नही हूँ।’
ठाकुरजी बोले, ‘सखी मोहे जाने दे, सखी मोहे छोड़ दे, सखी अब कभी चोरी नही करूँगा।’ सखी तेरी कसम, सखी तेरे बाबा की कसम, सखी तेरे भैया की कसम, सखी तेरे फूफा की कसम, सखी तेरे फुआ की कसम, सखी तेरे मामा की कसम, सखी तेरे खसम की कसम, अब कभी चोरी नही करूँगा।’

गोपी बोली, ‘रे मेरे रिश्तेदरो को ही मार रहा है, एक, दो, तो तेरे भी नाम ले।’
मन-ही-मन गोपी ठाकुरजी की इस अद्भुत लीला को देखकर आनन्दित हो रही है। सोच रही है, ‘मेरे अहोभाग्य जो आज ठाकुरजी मेरे घर पधारे अपने हाथों से भोग लगाने के लिये।’
ठाकुरजी की कोमल वाणी से गोपी को दया आ गई की छोटो सो लालो है शायद घर भूल गया होगा, और ठाकुर जी बच निकले।
ऐसे कौतुक करते हैं ठाकुरजी गोपियाँ को सुख पहुँचाने के लिये।

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दानगढ़ और मानगढ़


दानगढ़


ब्रह्माचल पर्वतके ऊपर दानगढ़ बहुत ही रमणीय स्थल है।

प्रसंग – एक दिन रसिक श्रीकृष्ण दानी बनकर सुबल सखाको लेकर यहाँपर सखियोंके साथ श्रीमती राधिकाके आगमनकी प्रतीक्षामें बड़े उत्कण्ठित हो रहे थे। श्रीमती राधिका सखियोंके साथ सूर्यपूजाका बहानाकर पूजाके विविध द्रव्योंको लेकर इधरसे निकल रहीं थीं। उन्हें देखकर श्रीकृष्ण उनका मार्ग रोकते हुए डपटकर बोले- तुम कौन हो? कहाँ जा रही हो? श्रीमती राधिकाने उत्तर दिया- क्या तुम नहीं जानते कि हम कौन हैं? और बेधड़क होकर आगे बढ़ने लगीं।

कृष्णने सुबल सखाके साथ उन्हें रोककर कहा- क्या तुमलोग नहीं जानतीं कि मैं यहाँ इस प्रदेशके राजाका बैठाया हुआ दानी हूँ। बिना दान दिये हुए तुमलोग यहाँसे निकल नहीं सकतीं। तुमलोग प्रतिदिन नाना प्रकारके बहुमूल्य द्रव्योंको लेकर यहाँसे बिना दान दिये ठुमक ठमक कर चली जाती हो। ठहर जाओ। दान देकर यहाँसे जाओ। विशाखाजी कड़क कर बोलीं- यह राधिकाका राज्य है। वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिका ही वृन्दावनेश्वरी हैं। बिना उनके आदेशके तुम यहाँ दानी कैसे बन बैठे? तुमने यह अक्षम्य अपराध किया है। इसका दण्ड तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- इतनी बहककर बातें मत करो। यहाँके राजा तो कन्दर्पदेव हैं। तुम प्रतिदिन लुक-छिपकर नाना प्रकारके मूल्यवान द्रव्योंको लेकर यहाँसे आती-जाती हो। किन्तु दान (कर) नहीं देतीं। अतः महाराज कन्दर्पने क्रोधित होकर मुझे भेजा है। यदि दान देनेके लिए अस्वीकार करती हो, तो मैं तुम सबको बाँधकर राजाके पास उपस्थित करूँगा। वे विचारकर जैसा दण्डके लिए आदेश देंगे, वैसा दण्ड तुमको भोगना पड़ेगा।

कृष्णकी बातोंको सुनकर विशाखाजीने कहा- तुम्हारा राजा क्या कर सकता है? हमारी महारानी वृन्दावनेश्वरीजी हैं। उनके रहते हमें किसीका भय नहीं है। हम तुम्हारे महाराज कन्दर्पका पराक्रम भलीभाँति जानती हैं। श्रीमती राधिकाके कटाक्षरूपी बाणोंसे उनका सारा गर्व चकनाचूर हो जाता है। ऐसा कहकर श्रीमती राधिकाको आगेकर सब सखियाँ अग्रसर होने लगीं। कृष्ण आगे बढ़कर सौकरी खोरके बीचमें खड़े हो गये और बोले-अरी ढीठी ब्रजरमणियों! तुम निर्भीक होकर नाना प्रकारके रत्नोंको छिपाकर प्रतिदिन इस प्रकार इस मार्गसे चली जाती हो। आज तुम्हें इन रत्नोंका दान अवश्य ही देना होगा। इस प्रकार हास्य उपहासके उपरान्त युगल किशोर-किशोरी दोनों निभृत केलिकुञ्जमें नाना प्रकार से क्रीड़ा – विलास करने लगे। सारी सहेलियाँ आनन्दमें भर गईं। यहाँ दानमन्दिर है।

दानवेषधरायैव दध्युपास्याभिलाषिणे ।

राधानिर्भत्सितायैव कृष्णाय सततं नमः ।।


मानगढ़


ब्रह्माचल पर्वतके ऊपर मानगढ़ एक बहुत ही रमणीय स्थान है। श्रीमती राधिकाजीने यहाँ मान किया था। रसिक कृष्णने बड़े कौशलसे यहाँपर उनका मान भङ्ग किया था।

(ब्राह्म)

प्रसंग- एक दिन प्रियनर्म सखा सुबल और वृन्दादेवीके माध्यमसे संकेत देकर श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाके निकट अभिसार कर रहे थे। अर्थात् उनके निकट आ रहे थे। अकस्मात् मार्गमें चन्द्रावलीजीकी सखी पद्माजी मिलीं। पद्माजीने श्रीमती चन्द्रावलीकी विरहोत्कण्ठाका वर्णन करते हुए उन्हें चन्द्रावलीसे मिलनेके लिए बार-बार अनुरोध किया। श्रीकृष्ण उसके अनुरोधको टाल नहीं सके। वे कुछ समयके लिए चन्द्रावलीके कुञ्जमें ठहर गये ।

फिर चन्द्रावलीके साथ रसमयी बातें तथा क्रीड़ा विनोदमें इस प्रकार रम गये कि उनको और किसी भी बातका स्मरण नहीं रहा। श्रीमती राधिकासे मिलनेका समय भी व्यतीत हो गया। इसी बीच श्रीमती राधिकाकी एक सुशिक्षित सारी (मैना) उसी कुञ्जमें एक वृक्षके ऊपर बैठ गई। उसने चन्द्रावली और श्रीकृष्णके परस्पर रसालाप और उनके परस्पर विलासादिका सारा संवाद लौटकर श्रीमती राधिकाको सुनाया। वे बड़ी उदास हो गई और उन्हें बड़ा ही दुर्जेय मान हुआ। उन्होंने मन-ही-मन ठान लिया कि ऐसे उद्धत कृष्णसे मुझे कोई प्रयोजन नहीं।

इधर समय बीतनेपर श्रीकृष्ण जब उनके निकट आये, तब श्रीमतीजीने उनकी तरफसे अपना मुख मोड़ लिया। श्रीकृष्णने उनका कठोर मान देखकर साम, दाम, दण्ड, भेद नीतिके द्वारा उन्हें समझानेकी सारी चेष्टाएँ कीं, फिर भी जब उनका मान नहीं टूटा, तब कृष्ण निराश और दुःखी होकर वहाँसे चले गये। रास्ते में उन्हें विशाखाजी मिलीं। उनके परामर्शसे उन्होंने एक नवीन सखीका रूप धारणकर वीणावादन करते हुए विशाखाजीके साथ श्रीमती राधिकाके निकट आये। विशाखाजीने इस नवेली सखीका श्यामा सखीके रूपमें परिचय देकर उनके वीणावादनके साथ संगीतकी कला तथा अन्यान्य गुणोंकी बहुत प्रशंसा की। श्रीमती राधिकाने बड़े आदर और सम्मानके साथ श्यामा सखीको निकट बैठाकर उसके अपूर्व संगीतको श्रवणकर आनन्दमें भरकर उसका आलिंगन किया। किन्तु ज्योंहि आलिंगन किया, त्योंहि उनके आलिंगनके स्पर्शमात्रसे अपने प्रियतमको पहचान गई फिर तो उनका मान जहाँका तहाँ धरा रह गया। सखियोंसे परिवेष्टित हो वे प्राणप्रियतमके सहित लीला-विलासमें रम गई

देवगन्धर्वरम्याय राधामानबिधायिने ।

मानमन्दिरसंज्ञाय नमस्ते रत्नभूमये ।।

( आदि वाराहे )

मानगढ़में मान मन्दिर, झूला, रासमण्डल और रत्नाकर सरोवर आज भी दर्शनीय हैं

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4. YOGAMAYA’S MISSION


As years rolled on, Kamsa killed six of Devaki’s children. The seventh child was growing in the womb of Devaki. Adisesha, one of the aspects of Narayana, was the seventh child. Lord Narayana felt that the time had come for Him to appear in the world. He called Yoga Maya, his supreme power and commanded Her.

“Devi, go at once to Gokula where live many cowherd men and women. Vasudeva’s second wife Rohini is also there. My spiritual power Adisesha is within the womb of Devaki. You go to Gokula, extract the child from the womb of Devaki and place it inside Rohini. That child, when born, will be known as Balarama.

I myself will be born as the eighth son of Devaki under the name of Krishna. You will, at the same time, be born as the daughter of Nanda and Yasoda. Yoga Maya accordingly descended to the earth to carry out the order of the Lord.

Devaki fell into a trance and Yoga Maya transferred the child from her womb to Rohini’s. So it appeared as if Devaki had a miscarriage. All the inhabitants of the place loudly lamented, “Alas, Devaki has lost her child.” On hearing this gossip Kamsa felt relieved thinking that Devaki would not give birth to an eighth child.

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श्रीस्वामी बलदेवदासजी


( वृन्दावन )

जगत का नियम है पहले साधन, पीछे सिद्धि; पहले कुआ खोदना, फिर पानी पीना। पर परमार्थं जगत में कभी-कभी इसका उल्टा होता है- पहले सिद्धि होती है, पीछे साधना होती है। भगवान् के नित्य-सिद्ध या कृपा-सिद्ध भक्तों के जीवन में ऐसा ही होता है। उनके नित्य-सिद्ध परिकरों को सिद्धि के लिए साधना नहीं करनी होती सिद्धि तो उन्हें अनादिकाल से ही प्राप्त रहती है। वे जगत में आविर्भूत होते हैं भगवदिच्छा से जगत के जीवों के लिए साधना का आदर्श उपस्थित करने । कृपा सिद्ध जीवों को भी सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना नहीं करनी होती। उन पर बिना साधना के ही भगवत कृपा बरस पड़ती है। सच तो यह है कि भगवत कृपा साधन-सापेक्ष है ही नहीं। भगवान् परम स्वतन्त्र हैं। जिसपर इच्छा होती है कृपा करते हैं। कभी-कभी ऐसे व्यक्ति पर भी अनायास कृपा कर देते हैं, जिसने कोई साधन-भजन किया ही नहीं । पर जब उसके ऊपर कृपा हो जाती है, तब वह साधन-भजन के सिवा और कुछ करता ही नहीं। उसपर पहले कृपा होती है पीछे उसका भजन होता है। श्रीस्वामी वलदेवदास जी के जीवन में भी ऐसा ही हुआ। उन्हें बाल्यावस्था में ही पहले भगवत्प्राप्ति हुई। फिर अबाध गति से वह चली उनके भजन-साधनमय पावन जीवन की निर्मल धारा ।

व्रज के किसी ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर वे आठ वर्ष की अवस्था में ही बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात् वीतराग हो घर से निकल पड़े और द्वारिका जाने वाले साधुओं की मण्डली के साथ हो लिये। द्वारिका में जब रणछोर जी के मन्दिर में गये, रणछोर जी का भोग लग रहा था। मन्दिर के दरवाजे पर परदा पड़ा हुआ था और पुजारी जगमोहन में इधर-उधर डोल रहा था। उस समय वलदेवदास जी को एकाएक न जाने कैसा आवेश हुआ, वे पुजारी की पीठ मुड़ते ही परदा उठाकर मन्दिरके भीतर घुस गये। वहाँ उन्हें रणछोर जी के साक्षात् दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि मूर्तिरूप में तो वे सिंहासन पर विराजमान हैं और प्रत्यक्षरूप में नीचे बैठे भोग आरोग रहे हैं। वे तन्मय हो, उनका रूप निहारते रहे। थोड़ी देर में जत्र भोग आरोगने वाले स्वरूप अन्तर्धान हो गये,वे भी चुपके से बाहर निकल आये। उन्हें किसी ने न मन्दिर के भीतर जाते देखा, न बाहर आते। इसलिए किसी के द्वारा रोक-टोक या डाँट-फटकार भी नहीं की गयी। जिसे रणछोर जी स्वयं भीतर बुलाकर दर्शन देना चाहें और जिसका मार्ग उनकी शक्ति योगमाया अपने आप प्रशस्त कर दें, उसे किसी के द्वारा रोका जाना सम्भव ही कब है ?

उसी दिन रात में रणछोर जी ने बलदेवदास जी को स्वप्न में आज्ञा की –’दिल्ली के निकट लुकसर ग्राम में ठाकुरदास मेरा परम भक्त रहता है। उससे जाकर दीक्षा लो और वह जिस रीति से उपदेश करे, उस रीति से भजन करो।’ उधर ठाकुरदास जी को भी उन्होंने इसी प्रकार आज्ञा देकर कहा ‘मेरा भक्त बलदेवदास तुम्हारे पास आ रहा है। बालक जानकर उसकी उपेक्षा न करना। उसे दीक्षा देकर भजन की रीति बता देना ।’

रणछोर जी ने जिसके लिए इतना किया, उसका दिल्ली का मार्ग भी अपने-आप प्रशस्त हो जाना था। द्वारिकाजी में बालक वलदेवदासकी भेंट हुई कुछ चरणदासी सन्तों से, जो दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने प्रेम से उसे ठाकुरदास जी के पास ले चलने का आश्वासन दिया। वह उनके साथ वहाँ पहुँच गया। उसे देखते ही ठाकुरदास जी ने कहा- ‘आओ वत्स, मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा में था और उसे हृदय से लगा लिया । मन्त्र दीक्षा देकर भजन की रीति का उपदेश किया।

बलदेवदासजी उनके पास रहकर उनकी और उनके ठाकुर श्रीयुगलबिहारीजी की तन-मनसे सेवा करने लगे । उस अल्पावस्था में ही उन्होंने ठाकुर-सेवा की सारी विधि सीख ली। युगलबिहारीजी की रसोई भी वह स्वयं बनाने लगे।

ठाकुरदास जी एक उच्चकोटि के सन्त थे। उनके सम्बन्ध में एक घटना प्रसिद्ध है। एक बार उनके आश्रम में एक अभ्यागतका अचानक देहान्त हो गया। पुलिस ने आश्रमवासियों को परेशान करना शुरू किया। उस समय ठाकुरदासजी ने मुर्दे को अपनी खड़ाऊँ से ठोकर मारते हुए कहा- ‘उठ, ऐसे क्यों पड़ा है साधुओं को परेशान करने के लिए।’ वह झट उठ खड़ा हुआ । तभी से लोग उन्हें एक सिद्ध सन्त के रूपमें जानने लगे ।

वे मानसी सेवा में दो-दो दिन एक ही आसनपर बैठे रह जाते। उन्हें देह की बिलकुल सुध न रहती प्रसाद सेवन करते समय वे कभी रोदन करने लगते, कभी बहुत प्रसन्न होने लगते । वलदेवदास जी यह देखकर विस्मय में डूब जाते। जब वे उनसे इसका कारण पूछते, तो वे टाल जाते । एक दिन उन्होंने इसका रहस्य जानने का बहुत हठ किया। तब ठाकुरदास जी ने कहा -‘जब मै भोजन करता हूँ, तब गोपाल जी भी मेरे साथ बैठकर मेरे थाल में से भोजन करने लगते हैं। मैं कभी यह सोचकर रो देता हूँ कि गोपालजी मेरा जूठा खाते हैं, कभी यह सोचकर प्रसन्न होता हूं कि वे मुझमे कितना प्रेम करते हैं।’ ठाकुरदासजी वलदेवदासजीको अपने इस प्रकार के अनुभवोंbकी बातें अकसर बताया करते गलदेवदासजी पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। उनका भक्तिभाव गुरुदेव के सान्निध्य में दिन-पर-दिन बढ़ता गया। वे भी गुरुदेव की तरह मानसिक चिन्तन में लीन रहने लगे।

कुछ दिन पश्चात् ठाकुरदासजी धाम पधार गये। बलदेवदासजी उनके स्थान के महन्त हुए। महन्ताई का भार वे अधिक दिन तक न झेल सके । उसे अपने गुरुभाई श्रीध्यानदासजी पर डाल केवल गुरुदेव की खड़ाऊं लेकर वे भ्रमण के लिए निकल पड़े। चारों धामों की यात्रा की । उसके पश्चात् अधिकतर वृन्दावन में कालीयदह पर या व्यास घेरे में सन्त गोविन्ददास जी के पास रहने लगे। उन्होंने अपने लिए कभी किसी कुटिया का निर्माण नहीं किया।

उन दिनों शुक-सम्प्रदाय के दिल्ली गुरुद्वारे के रसिक सन्त श्रीमोहनदासजी जिनका प्रेम पयोधि’ नामका ग्रन्थ है, वृन्दावनके युगल घाटपर ग्वालियर वाले प्राचीन मन्दिर में आकर रहा करते। उनका संग बलदेवदासजी अधिक में अधिक करते और उसमें अनिर्वचनीय सुख का अनुभव करते। दोनों मन्न प्रिया प्रियतमकी रसमयी बातें करते-करते भाव-समाधि में डूब जाते ।

वलदेवदासजी नित्य प्रातः ३ वजे वृन्दावन की परिक्रमा को जाया करते। एक दिन परिक्रमा के मार्ग में उन्होंने देखा कि एक जगह बड़ा भण्डारा हो रहा है और बहुत से साधु बैठे प्रसाद पा रहे हैं। उन्होंने वलदेवदास जी को भी प्रसाद पाने को कहा । बलदेवदासजीने कहा- ‘मैं इस समय प्रसाद नहीं पाऊँगा ।’ ‘तो परोमा लेते जाओ’, उन्होंने आग्रह करते हुए कहा । बलदेवदासजीने परोसा अंगोछे में बाँध लिया। कुटियापर पहुँच कर नित्य नियमसे निवृत्त हो जब अंगोठा खोला, तो यह देखकर वे आश्चर्यचकित हुए कि उसमें अखाद्य भरा है। उन्होंने अंगोछे सहित उसे फेंक दिया और फिरसे यमुना-स्नान कर अपने आपको पवित्र किया ।

दूसरे दिन जब वे फिर परिक्रमाको गये, तो साधु-रूप में उन भूतोंकी मण्डली से फिर उनकी भेंट हुई। वे कौतूहलवश रुककर उनसे बातें करने लगे। उन्होंने कहा – ‘क्या तुम बता सकते हो, तुम्हारी ऐसी गति क्यों हुई ?”

उत्तरमें उन्होंने कहा – ‘हम वृन्दावनके ही हैं। हमने ठाकुर-सेवा के – लिए प्राप्त धन और सामग्री का स्वयं उपभोग किया था। इसलिए हमें यह योनि प्राप्त हुई है । वृन्दावन में रहने के कारण यमराज का हमारे ऊपर अधिकार नहीं था। वे हमें न ले जा सके। इसलिए धाम में रहकर ही हम भुतेश्वरके शासन में अपने किये का फल भोग रहे हैं।’

वलदेवदास जी अच्छे संगीतज्ञ थे। वे नित्य तानपूरे पर आवेश में देर तक ठाकुरजी के सामने गान करते थे। श्रीमद्भागवत का नित्य पाठ करते थे और एक हजार दानों की तुलसी को मालापर नाम-जप करते थे। जपके साथ प्रेम-मञ्जरी के आनुगत्य में मानसिक स्मरण करते थे। व्रज को लताओ के नीचे बैठकर लीला स्मरण करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। कभी-कभी किसी लता के नीचे बैठकर स्मरण करते उन्हें सारा दिन बीत जाता था। क्षुधा तृष्णा का भी लोप हो जाता था।

एक बार वे बरसाने गये हुए थे। यहाँ विलासगढ़ के निकट लताओंके नीचे बैठे भजन कर रहे थे। भजनमें इतना आवेश हो गया कि वे लगातार तीन दिन तक उसी स्थानपर बैठे भजन करते रहे। उनकी अयाचक वृति थी। किसी से खाने के लिए कुछ मांगने का प्रश्न ही न था। किसी के यहां जाकर उन्हें कुछ दे आने का भी प्रश्न नहीं था, क्योंकि उनका किसी को पता ही न था। उस समय श्रीराधारानी ने पुजारी से स्वप्न में कहा- ‘मेरा अनन्य भक्त बलदेवदास विलासगढ़ के निकट तीन दिनसे भूखा पड़ा है। उसे मेरा प्रसाद पहुंचा दो।’ पुजारी ने तुरन्त श्रीजी की आज्ञाका पालन किया ।

बलदेवदासजीने प्रेमाश्रु विसर्जन करते हुए श्रीजीका प्रसाद प्रेमसे ग्रहण किया। फिर प्रतिष्ठाके भयसे तुरन्त उस स्थानको छोड़ वे गहवरवन चले गये। वहां एकान्त में रो-रोकर श्रीजीसे कहने लगे- ‘हाय, करुणामयी ! तुम इस अधमपर इतनी कृपा करती हो। फिर अदृश्य रहकर विरहकी वेदना क्यों देती हो ? परोक्ष में कृपाकर उत्कण्ठाका वर्धन करती हो । प्रत्यक्ष में दूररहकर प्राणोंका मर्दन करती हो। कब तक इस तरह प्यास बढ़ाकर बिना बुझाये तड़पाती रहोगी स्वामिनी ?’

इस प्रकार मन-ही-मन जब वे आक्षेप कर रहे थे, उन्होंने राधारानी को देखा सखियों सहित वन-बिहार में फूल चयन करते और उनकी ओर प्यार से दृष्टि फेरकर कहते- ‘मैं दूर कब हूँ तुझसे पगली ?”

तभी से उनकी स्वरूप सिद्धि हो गयी और वे सिद्ध देह से मञ्जरी रूप में राधा-कृष्ण की अटकालीन सेवा में तल्लीन रहने लगे। बाहरी सेवा पूजा उन्हें कुछ भार-स्वरूप लगने लगी। वे किसी योग्य शिष्य की कामना करने लगे जिसे अपने ठाकुर और गुरुदेव की पादुका सौंप सकें। उसी समय उन्हें श्रीजी की प्रेरणा हुई अलवर के पास बहादुरपुर जाने की, जहाँ चरणदासी सन्त श्रोडण्डोती रामजी का स्थान और उनके बिहारीजीका मन्दिर है। वहाँ श्रीशिवदयालजी नाम के एक नव किशोर अपनी ननिहाल में रहकर विद्याध्ययन करते थे। उनकी बिहारी जी के मन्दिर में बलदेवदासजी से भेंट हुई। बलदेवदास जी जान गये कि उनके द्वारा भविष्य में चरणदासी सम्प्रदायका विशेष उत्कर्ष होगा। इसलिए उन्हें शिष्य बनाकर और उन्होंको अपने ठाकुर और गुरुदेव की पादुका सोंपकर वे निश्चिन्त हुए। वही श्रीसरसमाधुरी शरणजी के नामसे चरणदासी सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध रसिक सन्त हो गये हैं।

गुरुदेव की पादुका और अपने सेवित श्रीविग्रह को सरसमाधुरीजी को सौंप देने के पश्चात् अब उनके पास अपने शरीर के सिवा और कुछ न रह गया। सरसमाधुरी शरणजीको अपनी इस अलौकिक सम्पत्ति को सौंप देना इस बात का संकेत था कि वे शरीर को भी वसुन्धरा को सौंपकर अपनी लीला संवरण करने जा रहे हैं । तदनुसार सं० १६५८, आषाढ़ सुदी नवमी को उन्होंने अपनी लौकिक लीला संवरण कर राधा-कृष्णकी दिव्य लीला में प्रवेश किया “

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ईश्वर की कृपा : निराशा से आशा


एक बार एक किसान जंगल में लकड़ी बिनने गया तो उसने एक अद्भुत बात देखी। एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे, फिर भी वह खुशी-खुशी घसीट कर चल रही थी। यह कैसे जीवित रहती है जबकि किसी शिकार को भी नहीं पकड़ सकती, किसान ने सोचा। तभी उसने देखा कि एक शेर अपने दांतो में एक शिकार दबाए उसी तरफ आ रहा है। सभी जानवर भागने लगे, वह किसान भी पेड़ पर चढ़ गया। उसने देखा कि शेर, उस लोमड़ी के पास आया। उसे खाने की जगह, प्यार से शिकार का थोड़ा हिस्सा डालकर चला गया। दूसरे दिन भी उसने देखा कि शेर बड़े प्यार से लोमड़ी को खाना देकर चला गया। किसान ने इस अद्भुत लीला के लिए भगवान का मन में नमन किया। उसे अहसास हो गया कि भगवान जिसे पैदा करते है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देते हैं।

यह जानकर वह भी एक निर्जन स्थान चला गया और वहां पर चुपचाप बैठ कर भोजन का रास्ता देखता। कई दिन व्यतीत हो गए, कोई नहीं आया। वह मरणासन्न होकर वापस लौटने लगा, तभी उसे एक विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने उसे भोजन पानी कराया, तो वह किसान उनके चरणों में गिरकर वह लोमड़ी की बात बताते हुए बोला, महाराज, भगवान ने उस अपंग लोमड़ी पर दया दिखाई पर मैं तो मरते-मरते बचा; ऐसा क्यों हुआ कि भगवान् मुझ पर इतने निर्दयी हो गए ?

महात्मा उस किसान के सिर पर हाथ फिराकर मुस्कुराकर बोले, तुम इतने नासमझ हो गए कि तुमने भगवान का इशारा भी नहीं समझा इसीलिए तुम्हें इस तरह की मुसीबत उठानी पड़ी। तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह मदद करने वाला बनते देखना चाहते थे, निरीह लोमड़ी की तरह नहीं।

हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। ईश्वर ने हम सभी के अंदर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियाँ दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं। चुनाव हमें करना है, शेर बनना है या लोमड़ी।

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मन मे विकार होने के बाद भी क्या प्रभु की शरण मिलेगी?

प्रश्न


महाराज जी, मेरे अन्दर बहुत से विकार हैं तो मुझे भय लगता है कि क्या मुझे भी प्रभु की शरण में आने का अवसर मिलेगा ।


समाधन


अगर नीरोग होकर के अस्पताल जाने की कोई सोचे तो फिर उसे अस्पताल जाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ेगी। यदि अस्पताल के बाहर लिख दिया जाए कि जिसको ‘खाँसी, जुखाम या बुखार न हो’ वह आये हमारे यहाँ; तो बोलो वह फिर अस्पताल किस बात का, अस्पताल तो होता ही है बीमारियों को दूर करने के लिए । हम धोबी के पास कपड़ा धुलने केl लिए तभी देते हैं जब कपड़ा गंदा होता है, अगर गंदा नहीं है तो देने की जरूरत ही नहीं है । इसी तरह हम जन्म-जन्मान्तर से गंदे हैं, हरि और गुरु के चरणों में हम समर्पित ही इसीलिये होते हैं कि आप धोओ । बच्चे को फिकर नहीं होती है कि हम मल लगाए हुए हैं, ये तो माँ की चिंता का विषय होता है । बच्चा तो मल से लिपटा होने पर भी दौड़कर माँ की गोद में चढ़ता है, माँ को भी उसका मल नहीं दिखाई पड़ता, माँ को तो सिर्फ बच्चा ही दिखाई पड़ता है; ऐसे ही प्रभु भी देखते है कि ये जैसा भी है लेकिन मेरे शरणागत है तो –

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

इसलिए हमें कुछ सोच-विचार करने की जरूरत नहीं है, मैं जैसा हूँ प्रभु का हूँ, ऐसा मानकर आगे बढ़ जाना चाहिए ।
( श्रीमद्भगवद्गीता ९ / ३०)

जो हम भले बुरे सो तेरे ।
सब तजि तब सरनागत आयौ, दृढ़ गहि चरन गहेरे ॥

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प्रेमसरोवर


बरसाना से नन्दगाँव जाने के रास्ते में एक मील की दूरी पर यह कुण्ड विराजमान है। कुण्ड का आकार नौका की भाँति है। चारों ओर हरे-भरे कदम्ब वृक्षों से ऐसे सुसज्जित हैं मानो प्रेम ही मूर्तिमान होकर कुण्ड के रूपमें विराजमान हो। यह स्थान परम मनोहर तथा भक्तों के चित्त को आकर्षित करने वाला है। यह श्रीमती राधिका और श्रीकृष्ण के क्रीड़ा-विनोद का स्थल है। विशेषतः यह श्रीमती राधिका के प्रेमवैचित्र्य भावोदय का स्थान है।



प्रसंग


एक समय श्रीराधाकृष्ण-युगल ललिता आदि सखियों से परिवेष्टित – होकर विविध प्रकार के प्रेमलीला विलास में मग्न थे। उसी समय एक भ्रमर श्रीमती राधिका जी के मुखकमल के पास इधर-उधर उड़ता हुआ उनके मुखमण्डल पर बैठना चाहता था। वह उनके मुख को कमल समझकर उसका मकरन्द पान करना चाहता था। इसलिए वह बार-बार मुख के चारों ओर मँडरा रहा था । श्रीमतीजी भयभीत होकर अपने मुखमण्डल को अपनी दोनों हथेलियों से ढककर उसे भगाने की चेष्टा कर रही थीं, किन्तु वह भाग नहीं रहा था। श्रीमती राधिका जी को उद्विग्न देखकर मधुमंगल जी ने आकर अपनी लठिया से उसे बहुत दूर भगा दिया तथा वह लौटकर इस प्रकार कहने लगा कि मैंने मधुसूदन को यहाँ से बहुत दूर भगा दिया है। वह यहाँ से चला गया, अब नहीं लौटेगा। मधुमंगल की बात सुनकर कृष्णकी गोदी में बैठकर भी श्रीमती राधिका जी ने ऐसा समझा कि मधुसूदन (कृष्ण) मुझे यहाँ छोड़कर चले गये। वे हाय-हाय करती हुई विरह से कातर हो गई । उस समय वे यह समझ नहीं पायीं कि भ्रमर का भी एक नाम मधुसूदन है। वे बारम्बार हा प्राणनाथ ! कहाँ चले गये। हा प्राणनाथ ! कहाँ चले गये – इस प्रकार रोदन करने लगीं। राधिका जी के इस अद्भुत प्रेमवैचित्र्य भाव को देखकर कृष्ण भी यह भूल गये कि मेरी प्रियतमा राधिका मेरी गोद में ही है। वे भी हा प्रिये कहकर रोदन करने लगे। दोनों के नेत्रों से अश्रुजल और शरीर से पसीने का जल इस प्रकार निकलकर बहने लगा कि उससे यह सरोवर पूर्ण हो गया तथा दोनों मूर्छित हो गये। उनकी ऐसी दशाको देखकर सखियाँ भी अचेतन हो गईं। उस समय श्रीमती जी की सारिका श्रीराधा नाम और शुक श्रीकृष्ण नाम का जोर-जोर से उच्चारण करने लगे। वाणीकार श्रीमाधुरी जीने इस लीला का बहुत ही सरसता के साथ वर्णन किया है। इस प्रकार दोनों का नाम एक दूसरे के कानों में प्रवेश किया। दोनों बाह्य ज्ञान प्राप्तकर वे परस्पर एक दूसरे को सतृष्ण नयनों से देखने लगे। क्रमशः सखियाँ भी चेतन होकर जय-जय शब्द करने लगीं। फिर तो आनन्द की सीमा ही नहीं रही।


यहीं पर श्रीकृष्णने विचार किया- मैं निकट रहकर भी अपनी प्रियतमा श्रीमती राधिका जी की विरह वेदना शान्त करने में असमर्थ रहता हूँ। भावी विरह के ताप से वे सदा झुलसती रहती हैं। इन्हें समझाने का कोई उपाय नहीं देखता। जब मैं इनसे दूर होता हूँ, तो वे विप्रलम्भ अवस्था में मेरा चिन्तन करते-करते भाव में विभोर हो जाती हैं तथा तमाल वृक्ष से हँसकर आलाप करती हैं, सखियों के साथ विनोद करती हैं और कभी मान भी करती हैं। इसके विपरीत मेरे अत्यन्त समीप रहने पर भी विप्रलम्भ की स्फूर्ति होने से मेरे लिए विरह में कातर होकर रोदन करती हैं। अतः निकट रहकर भी मैं इन्हें सांत्वना नहीं दे पाता हूँ। (यही श्रीमती राधिका का सर्वोत्तम मादनभाव है, जो केवल श्रीमती राधिका में ही देखा जाता है। ललिता इत्यादि सखियों में भी इसका प्रकाश नहीं देखा जाता। इस मादनभावमें आश्चर्यजनक रूपसे संभोग और विप्रलम्भ आदि परस्पर विरोधी सभी प्रकारके भावों का भी समावेश देखा जाता है।)

अतः मेरा इनसे दूर रहना ही इनकी सांत्वना का एकमात्र विषय हो सकता है, क्योंकि उस विप्रलम्भ अवस्थामें मेरी स्फूर्ति होने से अथवा मेरी कान्ति जैसे तमाल वृक्षादि वस्तुओं को देखने से ‘ये मेरे प्रियतम हैं’ ऐसा मानकर उनका विरह-ताप कुछ प्रशमित हो सकता है। ऐसा सोचकर कृष्णने मन-ही-मन कहीं दूर प्रवास का निश्चय किया। यही उनके वृन्दावन से मथुरा या द्वारका जाने का प्रधान कारण हुआ।


प्रेम सरोवर प्रेमकी भरी रहे दिन रैन ।
जँह जँह प्यारी पग धरत श्याम धरत तँह नैन ।।


इस सरोवर में स्नान करने से राधाकृष्ण युगल के प्रेम की प्राप्ति होती है इसमें कोई सन्देह नहीं है। यहाँ ललिता मोहन जी, रासमण्डल, झूला-स्थल, प्रेमविहारी जी का मन्दिर, श्रीवल्लभाचार्य और श्रीविट्ठलनाथ जी की बैठकें तथा पूर्व दिशा में गाजीपुर गाँव है। भाद्र शुक्ला द्वादशी को यहाँ बूढ़ी लीला होती है।

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“मथुरामण्डल की महिमा”

पूर्व काल में नैमित्तिक प्रलय के समय एक महान दैत्य प्रकट हुआ, जो शंखासुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शंखासुर देवताओ को जीतकर ब्रह्लोक गया वहाँ सोते हुए ब्रह्मा के पास से वेदों की पोथी चुराकर समुद्र में जा घुसा। वेदों के जाते ही देवताओ का सारा बल चला गया। तब पूर्ण भगवान यज्ञेश्वर श्री हरि ने मतस्य रूप धारण करके उस दैत्य के साथ युद्ध किया, और और अंत में चक्र से उसका मस्तक काट डाला।

इसके बाद देवताओ के साथ भगवान श्री हरि प्रयाग में आये, और वे चारों वेद ब्रह्मा जी को दे दिए। फिर यज्ञ अनुष्ठान किया और प्रयाग तीर्थ के अधिष्ठाता देवताओ को बुलाकर उसे ”तीर्थराज” पद पर अभिषिक्त किया। मुनि कन्या गंगा और सूर्यसुता यमुना अपनी तरंगरुपी चामरो से से उनकी सेवा करने लगीं।

उसी समय सारे तीर्थ भेट लेकर बुद्धिमान तीर्थ रज के पास आये और उनकी पूजा और वंदना करने लगे। फिर अपने अपने स्थानो को चले गए। जब सब चले गए तो देवर्षि नारद जी वहाँ आये और सिंहासन पर विराजमान तीर्थ राज से बोले।

नारद जी ने कहा, “महातपस्वी तीर्थराज ! निश्चित ही तुम सभी तीर्थो द्वारा विशेष रूप से पूजित हुए हो सभी ने तुम्हे भेंटे दी है। परन्तु व्रज के वृंदावन आदि तीर्थ यहाँ तुम्हारे सामने नहीं आये तुम तीर्थो के राजाधिराज हो व्रज के प्रमादी तीर्थो ने यहाँ न आकर तुम्हारा तिरस्कार किया है।”

यह कहकर देवर्षि नारद चले गए। तीर्थराज को मन में क्रोध हुआ और तुरन्त श्री हरि के लोक में गए। तीर्थराज ने हाथ जोड़कर भगवान से कहा, “हे देव ! मैंं आपकी सेवा में इसलिए आया हूँ, कि आपने तो मुझे तीर्थराज बनाया है और समस्त तीर्थ मेरे पास आये परन्तु मथुरामंडल के तीर्थ मेरे पास नहीं आये। उन प्रमादी व्रजतीर्थ ने मेरा तिरस्कार किया है। अतः यह बात मैं आपसे कहने के लिए आया हूँ।”

भगवान ने कहा, “मैंंने तुम्हे तीर्थो का राजा तीर्थराज अवश्य बनाया है किन्तु अपने घर का राजा तुम्हे नहीं बनाया है। फिर भी तुम मेरे गृह पर भी अधिकार जमाने की इच्छा लेकर प्रमत्त पुरुष के समान बात कैसे कर रहे हो ? तीर्थराज तुम अपने घर जाओ और मेरा यह शुभ वचन सुनो ! मथुरामंडल मेरा साक्षात् परात्पर धाम है त्रिलोकी से परे है उस दिव्यधाम का प्रलयकाल में भी संहार नहीं होता।”

भगवान की बात सुनकर तीर्थराज बड़े विस्मित हुए और उनका सारा अभिमान टूट गया फिर वहाँ से आकर उन्होंने मथुरामंडल के व्रज मंडल का पूजन किया और प्रतिवर्ष आने लगे।

इसी प्रकार वारह कल्प में श्री हरि ने जब वारह रूप में अपनी दाढ पर पृथ्वी को उठाकर रसातल से बाहर लाकर उसका उद्धार किया, तब पृथ्वी ने पूछा कि, “प्रभो ! सारा विश्व पानी से भरा दिखायी देता है। अतः बताईये आप किस स्थल पर मेरी स्थापना करेंगे ?”

भगवान ने कहा, “जब वृक्ष दिखायी देने लगे और जल में उद्वेग का भाव प्रकट हो तब उसी स्थान पर स्थापना करूँगा।” पृथ्वी ने कहा, “भगवान ! स्थावर वस्तुओ कि रचना तो मेरे ही ऊपर हुई है क्या कोई दूसरी भी धरणी है ? धारणामई धरणी तो केवल मैं हूँ।”

तभी पृथ्वी ने जल में वृक्ष देखे उन्हें देखकर पृथ्वी का अभिमान दूर हो गया और बोली, “देव ! किस स्थल पर ये वृक्ष है ? इसका क्या रहस्य है ? मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है ?”

भगवान ने कहा, “यह दिव्य ”मथुरा मंडल” दिखायी देता है, जो गोलोक कि धरती से जुड़ा हुआ है प्रलय काल में भी इसका संहार नहीं होता। इस प्रकार इस व्रज मंडल की महिमा प्रयाग से भी उत्कृष्ट है। ये पृथ्वी का हिस्सा नहीं है।”

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रामनवमी 2022


इस साल रामनवमी 10 अप्रैल को है


पूजा का मुहूर्त

नवमी तिथि की शुरुआत 10 अप्रैल को देर सुबह 01:32 मिनट से होगी और 11 अप्रैल को तड़के 03:15 मिनट पर समाप्त होगी. भगवान श्रीराम की पूजा का शुभ मुहूर्त 10 अप्रैल 2022 को सुबह 11:10 मिनट से 01: 32 मिनट तक रहेगा.


रामनवमी क्यों मनाई जाती है

भारत में अनेकों पर्व मनाये जाते हैं खासकर हिन्दू धर्म त्यौहारों का धर्म है. हिन्दू कैलेंडर त्यौहारों से भरा पड़ा रहता है. राम नवमी भी हिन्दू त्यौहार है जिसे पूरे भारत में हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. यह त्यौहार वर्ष में एक बार आता है.

राम नवमीं भगवान राम के जन्मोत्सव के तौर पर मनाया जाता है. भगवान राम को आदर्श पुरुष के रूप में जाना जाता है. पौराणिक कथाओं और कहानियों को खंगाले तो आपको यही सीख मिलती है कि एक पुरुष का चरित्र भगवान राम की तरह होना चाहिए. यही वजह है कि भारतवर्ष में भगवान राम के अनुगामी बहुत है. इसलिए मैंने सोचा की क्यूँ न आपको लोगों को रामनवमी क्यूँ मानते है के विषय में पूरी जानकारी प्रदान करें. तो फिर चलिए शुरू करते हैं.

राम नवमी एक ऐसा हिन्दू त्यौहार है जिसमें पूरे भारतवर्ष में भगवान राम का जन्मदिन हर्शोल्लाश के साथ मनाया जाता है. इस दिन देश में हिन्दू धर्म के अनुयायियों के इस अवसर को काफी धूमधाम से मनाते हैं. कहा जाता है की राम नवमी के दिन भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था.

यही कारण है की हर वर्ष इसी दिन हिन्दू धर्म के अनुयायी भगवान राम के जन्मदिवस को राम नवमी के तौर पर धूम धाम से मनाया जाता है. इस दिन बहुत से लोग अपना आस्था प्रकट करने के लिए भगवान राम के लिये व्रत रखते हैं और साथ में भगवान राम का स्मरण भी करते हैं. चूँकि यह पर्व भगवान राम से जुड़ा हुआ हैं इसीलिए हिन्दू धर्म के लोगों के लिए यह दिन काफी शुभ होता है.

शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि भगवान विष्णु ने सातवे अवतार में भगवान राम के रूप में त्रेतायुग में जन्म लिया था. भगवान राम का जन्म रावण के अत्याचारों को खत्म करने एवं पृथ्वी से दुष्टों को खत्म कर नए धर्म स्थापना के लिए हुआ था. इसीलिये भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में रामनवमी का पर्व मनाया जाता है.

शास्त्रों के अनुसार यह भी माना जाता है कि भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए मां दुर्गा की उपासना की थी. चैत्र मास की नवरात्रि के समापन के बाद ही राम नवमी का पर्व आता है.


रामनवमी का त्यौहार


राम नवमी के दिन ही चैत्र की नवरात्रि का समापन होता है. इस दिन बहुत से हिन्दू लोग अयोध्या जाकर सरयू नदी में स्नान करते हैं. इस दिन बहुत से जगहों में व्रत भी रखे जाते हैं और हवन कराये जाते हैं. ऐंसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से उपासक की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है.


रामनवमी का इतिहास


महाकाव्य के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियां थी और तीनों ने राजा को संतान सुख नही दे पाया जिससे राजा काफी चिंतित थे. राजा को संतान प्राप्ति के लिए महर्षि वशिष्ठ ने कमेष्टि यज्ञ कराने को कहा. उनकी बातें मानकर राजा दशरथ ने महर्षि ऋषि श्रंगी से कमेष्टि यज्ञ कराया.

यज्ञ समापन के पश्चात महर्षि ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को खीर ग्रहण करवाया. इसके ठीक 9 महीने पश्चात सबसे बड़ी रानी कौशल्या ने भगवान राम को, कैकयी ने भारत को और सुमित्रा ने दो जुड़वा बच्चे लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया. भगवान राम कृष्ण जी के सातवे अवतार थे. भगवान श्री राम का अवतरण पृथ्वी से दुष्टों का संहार कर नए धर्म की स्थापना करने के लिए हुआ था.


राम जन्मकथा हिंदी में


शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने सातवे अवतार में भगवान राम के रूप में जन्म लिया था. भगवान राम का जन्म राजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी कौशल्या की कोख से त्रेतायुग में मृत्युलोक में हुआ था.

भगवान राम का जन्म रावण के अत्याचारों को खत्म करने एवं दुष्टों का संहार कर पुनरधर्मस्थापना के लिए हुआ था. भगवान श्री राम का जन्म चैत्र मास की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में हुआ था. प्रभु श्रीराम ने लंका पर भी विजय हासिल किया और दुष्टों का भी वध किया था. भगवान राम को आदर्श पुरुष माना जाता है और भगवान राम ने बहुतों को सद्मार्ग के दर्शन भी कराया.

भगवान राम का सातवां अवतार माने जाने वाले प्रभु श्री राम ने हमेशा की अधर्म पर धर्म की विजय हेतु अवतार धारण किया है। टीवी पर तो हम सभी ने रामायण देखी होगी लेकिन फिर भी कई ऐसे प्रसंग रह जाते हैं जिनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं होती है। कुछ ऐसी ही है प्रभु श्री राम की जन्म कथा। आज जागरण आध्यात्म के इस विशेष प्रस्तुति में हम आपको श्री राम की जन्म कथा के कुछ उन पहलुओं के बारे में बताएंगे जिनसे लोग अंजान हैं। महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। महाराज दशरथ ने श्यामकर्ण घोड़े को चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वाने का आदेश दिया। महाराज ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को बुलावा भेजा। वो चाहते थे कि सभी यज्ञ में शामिल हों। यज्ञ का समय आने पर महाराज दशरख सभी अभ्यागतों और अपने गुरु वशिष्ठ जी समेतअपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि के साथ यज्ञ मण्डप में पधारे। फिर विधिवत यज्ञ शुभारंभ किया गया। यज्ञ की समाप्ति के बाद समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट दी गई हैं और उन्हें सादर विदा किया गया। यज्ञ के प्रसाद में बनी खीर को राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को दी। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों गर्भवती हो गईं। सबसे पहले महाराज दशरश की बड़ी रानी कौशल्या ने एक शिशु को जन्म दिया जो बेहद ही कान्तिवान, नील वर्ण और तेजोमय था। इस शिशु का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस समय पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजित थे। साथ ही कर्क लग्न का उदय हुआ था। फिर शुभ नक्षत्रों में कैकेयी और सुमित्रा ने भी अपने-अपने पुत्रों को जन्म दिया। कैकेयी का एक और सुमित्रा के दोनों पुत्र बेहद तेजस्वी थे। महाराज के चारों पुत्रों के जन्म से सम्पूर्ण राज्य में आनन्द का माहौल था। हर कोई खुशी में गन्धर्व गान कर रहा था और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवताओं ने पुष्प वर्षा की। महाराज ने ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी और उन सभी ने महाराज के पुत्रों को आशीर्वाद दिया। प्रजा-जनों को महाराज ने धन-धान्य और दरबारियों को रत्न, आभूषण भेंट दी। महर्षि वशिष्ठ ने महाराज के पुत्रों का नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखा।


रामनवमी कैंसे मनाई जाती है?


रामनवमी पूरे भारतवर्ष में हिंदू धर्म के अनुयायियों के द्वारा मनाई जाती है. रामनवमी के दिन बहुत से राम जी के स्मरण में व्रत रखते हैं. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से उपासक की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस दिन काफी जगह रामचरित मानस का पाठ होता है.

बहुत से लोग रामनवमी के दिन भगवान राम की कथाएं सुनते है और भजन सुनते हैं. इस दिन अयोध्या में चैत्र राम मेले का आयोजन होता है और असंख्य लोग अयोध्या जाकर सलिला सरयू नदी में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं.

पूजा विधि

इस पावन दिन शुभ जल्दी उठ कर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहन लें. अपने घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें. घर के मंदिर में देवी- देवताओं को स्नान कराने के बाद साफ स्वच्छ वस्त्र पहनाएं. भगवान राम की प्रतिमा या तस्वीर पर तुलसी का पत्ता और फूल अर्पित करें. भगवान को फल भी अर्पित करें. अगर आप व्रत कर सकते हैं, तो इस दिन व्रत भी रखें. भगवान को अपनी इच्छानुसार सात्विक चीजों का भोग लगाएं. इस पावन दिन भगवान राम की आरती भी अवश्य करें. आप रामचरितमानस, रामायण, श्री राम स्तुति और रामरक्षास्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं. भगवान के नाम का जप करने का बहुत अधिक महत्व होता है. आप श्री राम जय राम जय जय राम या सिया राम जय राम जय जय राम का जप भी कर सकते हैं. राम नाम के जप में कोई विशेष नियम नहीं होता है, आप कहीं भी कभी भी राम नाम का जप कर सकते हैं.

हवन सामग्री

आम की लकड़ी, आम के पत्ते, पीपल का तना, छाल, बेल, नीम, गूलर की छाल, चंदन की लकड़ी, अश्वगंधा, मुलैठी की जड़, कपूर, तिल, चावल, लौंग, गाय की घी, इलायची, शक्कर, नवग्रह की लकड़ी, पंचमेवा, जटाधारी नारियल, गोला और जौ आदि हवन में प्रयोग होने वाली सभी सामग्री जुटाएं.

हवन की विधि

हवन पर बैठने वाले व्यक्ति को रामनवमी के दिन प्रातः जल्दी उठना चाहिए. शौच आदि से निवृत्त होकर स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े धारण करने चाहिए. वैदिक शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि यदि हवन पति-पत्नी साथ में करें तो उसका विशेष फल प्राप्त होता है. सबसे पहले किसी स्वच्छ स्थान पर हवन कुंड का निर्माण करें. हवन कुंड में आम लकड़ी और कपूर से अग्नि प्रज्जवलित करें. इसके बाद हवन कुंड में ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चै नमः का जाप करते हुए घी से माता के नाम की आहुति दें. इसी के साथ अन्य देवी-देवताओं के नाम की आहुति दें. इसके बाद संपूर्ण हवन सामग्री से 108 बार हवन सामग्री को आहुति दें. हवन के बाद माता जी की आरती करें. इसके बाद माता को खीर, हलवा, पूड़ी और चने का भोग लगाएं. कन्याओं को भी भोजन कराएं. प्रसाद बांटें. उन्हें दक्षिणा भी दें.


रामनवमी का पर्व कब मनाया जाता है


भगवान राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी कौशल्या की कोख से चैत्र मास की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में हुआ था. इस दिन को बहुत शुभ माना गया है. रामनवमी हर वर्ष हिंदी कैलेंडर के चैत्र मास की नवमी तिथि को मनाई जाती है. रामनवमी चैत्र मास के समापन के दिन मनाई जाती हैं


रामनवमी की कहानी


रामनवमी की कहानी लंकापति रावण से जुड़ी है. कथाओं के अनुसार रावण अपने राज्यकाल में इतना अत्याचार करने लगा था कि रावण के अत्याचार से जनता के साथ साथ देवता भी परेशान. अत्यंत परेशान होकर सारे देवतागण भगवान विष्णु के पास विनती करने गए क्योंकि भगवान विष्णु ने ही रावण को अमर होने का वरदान दिया था.

भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ की पहली रानी कौशल्या की कोख से भगवान राम के अवतार में चैत्र मास की नवमी तिथि को जन्म लिया. तब से चैत्र मास की नवमी तिथि को हर वर्ष भगवान राम के जन्मदिवस के रूप में रामनवमी मनाई जाती है.


रामनवमी का महत्व


हिन्दू धर्म में रामनवमी के त्यौहार को विशेष महत्व दिया गया है. राम नवमी के आठ दिन पहले से मतलब चैत्र मास की पहली तिथि से नवमी तिथि तक कई लोग स्नान कर शुद्ध सात्विक रूप से भगवान राम की पूजा अर्चना एवं उपासना करते हैं.

रामनवमी के व्रत को इसीलिए महत्व दिया गया है क्योंकि मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति सच्चे मन से भगवान राम का स्मरण कर व्रत रखता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है.

इस दिन अयोध्यावासी और बाहरी लोग भी अयोध्या आकर सरयू नदी में स्नान करते हैं क्योंकि मान्यता है कि ऐंसा करने से भगवान राम सारे पाप हर लेते हैं और गलतियां माफ कर देते हैं. रामनवमी चैत्र की नवरात्रि के नवे दिन पूरे भारत मे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है.


रामनवमी की महिमा


रामनवमी की महिमा बहुत ही खास है क्योंकि यह पर्व भगवान राम से जुड़ा हुआ है. हिन्दू धर्म के बहुत से लोग आज भी नमस्कार के रूप में राम-राम कहते हैं और कोई विपत्ति, भय या संकट होने पर हे राम! कहते हैं.

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार राम का नाम भगवान राम से भी बड़ा है. खुद महादेव भी राम का नाम जाप करते है| राम का नाम दुखों को हरने वाला होता है. माना जाता है राम नाम का जप करने वालों के ऊपर कोई भी परिस्थिति हावी नही होती . वहीँ यदि कोई मनुष्य अपने अंतिम क्षणों में भगवान राम का नाम लेता है तब उसकी आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है.


राम लला की आरती

आरती कीजे श्रीरामलला की । पूण निपुण धनुवेद कला की ।।
धनुष वान कर सोहत नीके । शोभा कोटि मदन मद फीके ।।
सुभग सिंहासन आप बिराजैं । वाम भाग वैदेही राजैं ।।
कर जोरे रिपुहन हनुमाना । भरत लखन सेवत बिधि नाना ।।
शिव अज नारद गुन गन गावैं । निगम नेति कह पार न पावैं ।।
नाम प्रभाव सकल जग जानैं । शेष महेश गनेस बखानैं
भगत कामतरु पूरणकामा । दया क्षमा करुना गुन धामा ।।
सुग्रीवहुँ को कपिपति कीन्हा । राज विभीषन को प्रभु दीन्हा ।।
खेल खेल महु सिंधु बधाये । लोक सकल अनुपम यश छाये ।।
दुर्गम गढ़ लंका पति मारे । सुर नर मुनि सबके भय टारे ।।
देवन थापि सुजस विस्तारे । कोटिक दीन मलीन उधारे ।।
कपि केवट खग निसचर केरे । करि करुना दुःख दोष निवेरे ।।
देत सदा दासन्ह को माना । जगतपूज भे कपि हनुमाना ।।
आरत दीन सदा सत्कारे । तिहुपुर होत राम जयकारे ।।
कौसल्यादि सकल महतारी । दशरथ आदि भगत प्रभु झारी ।।
सुर नर मुनि प्रभु गुन गन गाई । आरति करत बहुत सुख पाई ।।
धूप दीप चन्दन नैवेदा । मन दृढ़ करि नहि कवनव भेदा ।।
राम लला की आरती गावै । राम कृपा अभिमत फल पावै ।।

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स्वामी श्रीकृष्णानन्ददासजी ( हिंडौल )


स्वामी कृष्णानन्दजी के पूर्वाश्रमका नाम था श्रीकर्मचन्द । उनका जन्म सन् १८८३ में पंजाब के जालंधर जिले के अन्तर्गत बुण्डाला नामक उपनगर में उच्च गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता का नाम था श्रीभोलाराम, माता का श्रीमती रली । दोनों बड़े सदाचारी और धर्मात्मा व्यक्ति थे। गीता और रामायण के पाठ और साधु-महात्माओ के संग में ही उनका अधिकांश समय व्यतीत होता था।

माता-पिता के धार्मिक संस्कारों का प्रभाव बालक कर्मचन्द पर पड़ना स्वाभाविक था । वह घ व प्रह्लादादिके चरित्रोंको बड़े चावसे सुनता और उनका मनन करता । हिन्दी और संस्कृत पढ़ने में उसकी स्वाभाविक रुचि थी। पर पंजाब में उर्दू का प्रचार अधिक था। माता-पिता ने उसे उर्दू मिडिल रास कराकर बड़े भाई श्रीदोलतरामजीके पास अंग्रेजी पढ़ने के लिए कालका ज दिया।कर्मचन्द की उम्र उस समय चौदह वर्ष की थी। उसने अपने जीवनका लक्ष्य पहले हो स्थिर कर लिया था। उसे घ व प्रह्लादकी तरह साधनामय जीवन व्यतीतकर भगवत साक्षात्कार लाभ करमा था। अंग्रेजीकी शिक्षाका उस लक्ष्यसे कोई सम्बन्ध था नहीं । उसे संस्कृत पढ़कर शास्त्राध्ययन द्वारा अपने भगवत प्राप्तिके मार्गको प्रशस्त करना था। पर माता-पिता उसके सस्कारोंसे प्रसन्न होते हुए भी उसे एक सुशिक्षित, सुसम्पन्न उच्च पदाधिकारी के रूप में देखना चाहते थे। इसलिए उसे अंग्रेजी पढाना आवश्यक समझते थे।

कर्मचन्द इस समय अपने जीवन पथके एक महत्वपूर्ण चौराहेपर खडा था उसे निर्णय करना था, वहाँ से उसे किधर जाना है। निर्णय करते उस देर न लगी। उसने सोचा कि माता-पिता और बड़े भाईके अधीन रहकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में उसे बड़ी मुश्किलोंका सामना करना पड़ेगा। इसलिए उसने संसार त्यागकर एक स्वतन्त्र पथका पथिक बननेका निश्चय कर लिया।

आज कर्मचन्द घरसे भागकर काशी चला आया है। विश्वनाथ के दर्शन कर गंगा के तटपर चिन्तित बैठा है और विश्वनाथ बाबा से मन-ही-मन कुछ प्रार्थना कर रहा है। उसके गौरवर्ण और तेजपूर्ण कलेवर पर काशी के एक बड़े मठाधीशकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने निकट जाकर पूछा- वत्स, तुम कहाँसे आये हो ? कैसे चिन्ता में बैठे हो ?’

कर्मचन्द ने अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। साथ ही विद्याध्ययन और सन्यास- ग्रहण करने का अपना निश्चय प्रकट किया। मठाधिपति ऐसे ही एक नवयुवक की खोज में थे। उन्होंने उसके अध्ययनादि को समुचित व्यवस्था देने का वचन दिया और उसे अपने साथ मठ में ले गये।

दस वर्ष तक कर्मचन्दने उस मठ में रहकर संस्कृत व्याकरण, न्याय मिमांस और शांकर-वेदान्तका अध्ययन किया। इसी बीच संन्यास-दीक्षा भी ग्रहण की। नाम हुआ श्रीकृष्णानन्द । स्वामी कृष्णानन्दजी को मठाधिपति ने मठका सारा भार सौप देने का पहले ही निश्चय कर लिया था। उन्हें गद्दी पर बैठा देने के लिए वे एक शुभ तिथि की प्रतीक्षा करने लगे ! स्वानी कृष्णान्दजी अब अपने जीवन के एक और चौराह पर आ खड़े हुए थे। उन्हें निश्चय करना था कि उन्हें मठाधीशका वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत करना है, हाथी घोड़े, नौकर-चाकर, सोने-चाँदीके छत्र-सिंहासन और विलास की अन्य सामग्री का उपभोग करना है, या विरक्त संन्यासी के कंटकाकीर्ण पथका अवलम्बन करना है। मठाधीशका वैभव उन्हें अपने निर्दिष्ट पथसे विचलित करने में असमर्थ था। पर वे एक धर्मसंकट में पड़ गये थे। जिस मठाधिपतिने उनके लिए इतना कुछ किया था उन्हें अपना भार सौंप देनेके उद्देश्य से उसकी सारी आशाओं पर वे सहसा पानी कैसे फेर देते ? एक वे दिन यही सब सोचते सोचते उन्हें झपकी लग गयी। अर्धनिद्रित अवस्था में उन्होंने देखा कि एक सुन्दर गौरवर्ण बालक उनसे कह रहा है-‘यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो, तो इस स्थानको छोड़कर चले जाओ।’

दूसरे दिन प्रातः वे दण्ड-कमण्डलु और ‘खण्डनखाद्य’ नामक ग्रन्थ लेकर मठसे निकल पड़े। गंगा स्नानकर श्रीविश्वनाथजी के दर्शन किये और गंगाके किनारे-किनारे पश्चिमकी ओर चल दिये। ढाई साल तक गंगा भ्रमण करते रहे। दिनमें एक बार किसी गाँवसे भिक्षा कर लेते। यदि गांव मार्गमें न पड़ता तो गङ्गाजल पीकर ही रह जाते। अधिकतर मौन धारणकर रहते। आवश्यकतानुसार किसीसे थोड़ा बहुत आलाप करते ।

इस बीच उन्होंने यथासम्भव साधुसंग भी किया और जिसने जो बताया उसके अनुसार ध्यान प्राणायामादि कर शान्ति लाभ करने की चेष्टा की पर उन्हें वास्तविक शान्ति न मिली। अन्त में चलते-चलते वे अनूपशहर पहुँचे, जहाँ गङ्गा-किनारे नावमें श्री अच्युत मुनि रहते थे। वे एक विद्वान और अनुभवी महात्मा थे। उनके दर्शन और उपदेशसे उन्हें कुछ शान्ति मिली । उन्होंने उन्हें भावुक और रसिक जान ब्रजमे रहकर भजन करनका उपदेश किया |

कृष्णानन्दजी वृन्दावन पहुँच गये। वहां रासबिहारीकी रासलीला देख एकाएक उनका कायापलट हो गया। उनका ब्रह्मज्ञान वैसे ही विलीन हो गया, जैसे सूर्यके प्रकाश में दीप का प्रकाश विलीन हो जाता है। रासनृत्यमें रास-बिहारी की थिरकन के साथ उनके प्राण भी थिरकने लगे। उनका हृदय रस से परिपूर्ण हो गया। वे समझ गये कि जिस शान्ति की वे इतने दिनों से खोज में थे वह उन्हें रासबिहारी के चरणतल में ही मिल सकती है, अन्यत्र कहीं नहीं । रासलीला देखकर उनकी इच्छा हुई श्रीमद्भागवत का अध्ययन करने ।

वे दिनभर रास देखते और श्रीमद्भागवत का अध्ययन करते । जहां कहीं रास होता वहीं पहुँच जाते। रासमें बराबर खड़े रहकर ठाकुरजी को पंखा झलते या घमर हुलाते। रास-लीला का चिंतन करते-करते रात में जहाँ स्थान मिलता सो जाते।

उस समय व्रज में बहुत से भजनानन्दी और सिद्ध गौड़ीय महात्मा रहते थे, जिनमें पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी महाराज मुख्य थे । कृष्णानन्दजीने उनका संग किया। उनके संग से उनमें परम करुण, पतित पावन श्रीगौरांग महाप्रभु की भक्ति का उन्मेष हुआ बँगला भाषा सीखकर व श्रीचैतन्य चरितामृत और श्रीचैतन्य भागवतादि ग्रन्थों का पाठ करने लगे । दिन पर दिन श्रीगौरांग महाप्रभु में उनकी निहा-भक्ति बढ़ती गयी। उन्होंने किसी गौड़ीय महात्मामे दीक्षा लेकर महाप्रभु के चरणोंमें आत्मसमर्पण करने का निश्चयकर लिया।

कुछ दिन बाद वे किवाठिवन में एक कुटियामें रहकर भजन करने लगे। उस समय श्री माधवदास बाबाजी भी किवाढ़िवन में रहते थे। जैसा हम पहले वर्णन कर आये हैं श्रीमाधवदास बाबाजी एक सिद्धकोटिके वैष्णव सन्त थे। उन्हीं की कृपा से कृष्णानन्दजी को वैष्णव गुरु की प्राप्ति हुई। उन्होंने मध्वगोड़ीय सम्प्रदाय में दीक्षा ग्रहण करने के लिए उन्हें उत्कण्ठित देखकर कहा- ‘तुम्हारे से विद्वान और तेजस्वी पुरुषके लिए योग्य गुरु हैं १०८ श्रीप्राणगोपाल गोस्वामी प्रभुपाद वे नित्यानन्द प्रभु के वंशज और माध्वगौडीय वैष्णव सम्प्रदायके मुख्य स्तम्भ हैं। कुछ दिन उनके वृन्दावन आनेकी प्रतीक्षा करो। मैं उन्हींसे तुम्हें दीक्षा दिलबाऊंगा।’

कृष्णानन्दजी श्रीप्राणगोपाल प्रभुपादके वृन्दावन आगमनकी उत्कण्ठा सहित प्रतीक्षा करने लगे। कुछ ही दिनों बाद प्रभुपादका शुभागमन हुआ।

उनके शुभागमनके साथ ही उनकी अमृतमयो कथाका शुभारम्भ हुवा कथा सुनकर कृष्णानन्दजी इतना प्रभावित हुए कि मन-ही-मन उन्हें गुरु रूप वरण किये बिना न रह सके पीछे एक शुभ दिन शुभ महूर्तमें उनसे दीक्षा ग्रहण की । दीक्षा ग्रहण कर वे व्रज के हिंडील ग्राम में रहकर भजन करने लगे यह मांट तहसील में नन्दघाट से दो मील दूर एक सुन्दर ग्राम है। इसके उत्तर में कुछ प्राचीन खण्डहर और जंगल हैं। यहीं एक ऊँचे स्थानपर, जहाँनन्दघाटके दर्शन होते हैं, गांववालों ने अपने आय से एक कुटियां का निर्माण किया। कृष्णानन्द बाबा उसी में रहने लगे। बीच-बीच में व्रज के अन्य स्थानांपर चले जाते या व्रज में भ्रमण करते। पर घूम-फिरकर वहीं आ जाते

कुछ दिन भजन करते हो गये, तो उन्हें एक बड़ी समस्याका सामना करना पड़ा। गुरुदेवने उन्हें मधुर भाव की उपासना का उपदेश किया था। पर उनका हृदय उसे नहीं स्वीकार करता जान पड़ रहा था। उनकी स्वाभाविक रुचि सख्य-भावकी उपासनामें थी। बहुत चेष्टा करनेपर भी वे मधुर भाव को नहीं अपना पा रहे थे। उनका सख्य-भाव दिनपर दिन और दृढ़ होता जा रहा था। चिन्ता यह थी कि गुरुदेव की आज्ञाके विरुद्ध समय रस की उपासना में क्या उन्हें सफलता मिल सकेगी। एक दिन जब उन्हें गुरुदेव के वृन्दावन आगमन का सम्वाद मिल चुका था, वे उनसे इस समस्या का समाधान कराने के उद्देश्य से वृन्दावन चल पड़े। वृन्दावन के निकट मार्ग में उन्हें एक कागज पड़ा दिखा प्रभु की प्रेरणा से उन्होंने उसे उठा लिया। खोलकर देखा तो उसमें उनकी समस्या के उनके भावानुकूल समाधान का स्पष्ट इंगित था। उसे पढ़ उनका हृदय भर आया। नेत्रों मे अश्रुधार बह निकली । उसी भाव-विभोर अवस्था में उन्होंने गुरुदेव के निकट अपनी स्थिति का और कागज द्वारा प्राप्त उस दंवो इंगित का वर्णन करते हुए उनसे आवश्यक निर्देश की प्रार्थना की। गुरुदे वने सख्य भाव में उनकी स्वाभाविक रुचि देख सहर्ष उस भाव की उपासना के लिए आज्ञा दे दी।

तबसे दिन-प्रतिदिन उनकी भजन में तल्लीनता बढ़ती गयी। जन्म जन्मान्तर के अपने सखा श्रीकृष्ण से मिलने के लिए उनके प्राण छटपटाने लगे। हर समय उसकी याद में अश्रु बहाते रहते। कब सोते, कब जागते, कोई जानता नही; क्योंकि सन्ध्यांकाल के एक-दो घण्टे का समय छोड़ और किसी समय उनके पास कोई न जा पाता। कई बार लोग कौतूहलवश जब अर्धरात्रि में उनकी कुटियापर गये, तो देखा कि वे नहीं हैं और कहीं दूर जलसे उनके कृष्ण-विरह में रोदन करने की आवाज आ रही है। एक बार उनके एक अनन्य भक्त श्रीरामचरणदासने उस आवाज का अनुसरण करते जंगल में प्रवेश किया, तो देखा कि वे अपने दोनों हाथोंसे एक वृक्ष की डाल पकड़कर गद्गद कण्ठ से एक श्लोक गा रहे हैं, जिसकी प्रथम पंक्ति थी
‘श्यामेन साकं गवां चारणाय मातस्तवाप्र प्रवदामि योनः ।
‘अर्थात्, हे मात यशोदा ! मैं दीन भावसे तुमसे प्रार्थना करता हूँ । मुझे श्यामसुन्दरके साथ गोचारण की आज्ञा प्रदान करो।

इस प्रकारको उनकी दिव्योन्मादकी अवस्था कई वर्ष रही। अन्त में एक दिन नन्दग्राम में जब वे श्रीकृष्णचन्द्र के मन्दिर में उनके दर्शन करते हुए उन्हें खरी-खोटी सुना रहे थे, उन्होंने देखा कि श्रीकृष्णचन्द्र अपनी दिव्य श्यामकान्ति बिखेरते हुए मन्दिरसे निकलकर बाहर आये और थोड़ी देर में वापस जाकर पुजारीसे बोले-‘जा बाबाजी मोते छेड़खानी करे है। जाको खायबेको रोटी दे दे।

बस अब भक्त और भगवान्‌की परस्पर छेड़-छाड़ आरम्भ हो गयी। • इसी समय कृष्णानन्दजी की ग्वारिया बाबासे मैत्री हो गयी। ग्वारिया बाटा भी सध्य-भाव के एक सिद्ध महात्मा थे। उस समय वे रंगजी के मन्दिरvके पूर्वी फाटकbके ऊपरवाले कमरे में रहते थे। कृष्णानन्दजी भी वहाँ जाकर उनके साथ रहने लगे। दोनों सखाओं की खूब घुटती। दोनों प्रौढ़ावस्था को प्राप्त होते हुए भी बालकृष्णके बाल सखा होनेbका अभिमान करते। दोनों एक अनिर्वचनीय भाव-जगत्में विचरते हुए कृष्णचन्द्र के साथ तरह-तरह के लीला रंग में खोये रहते। एक दिन ग्वारिया बाबा ने कृष्णानन्दजी से कहा ‘नन्दबावाने आज्ञा की है पाठशाला में पढ़ने जानेbकी उन्होंने कहा है- तुम लोग कृष्णके साथ मिलकर बहुत ऊधम करते हो। इसलिए पाठशाला जाय करो। तो चलो पाठशाला चला करें, नहीं तो बाबा मारेंगे।’ दोमं वृन्दावनके प्रेम महाविद्यालय की प्रथम कक्षामें जाकर बैठने लगे। उस समय कृष्णानन्दजी का पाण्डित्य न जाने कहाँ लुप्त हो गया। जो बड़े- बड़े पण्डितोंकी वेद-वेदान्त सम्बन्धी शंकाओ का समाधान करते थे, वे ग्वारि बाबाके साथ अ, आ, इ, ई पढ़नेमें लग गये। यह क्रम तबतक चलता रह जबतक दोनोंको इस भावमें स्थिति रही। विद्यालयके अध्यापक दोन महात्माओंसे भली-भांति परिचित थे। इसलिए वे उनके इस लीलारंग सहयोग देते रहे।

भाव-जगत्की लोलाएँ साधारण लोगों के समझने की नहीं होतीं। भले ही इन्हें नाटक समझें, पर भावुक भक्तों के लिए इसमें नाटक नहीं होती। श्रीरामकृष्ण परमहंस गोपालेर माँ को देख अपने व्यक्तित्वव भूल जाते थे। वे बालसुलभ भावसे उनकी गोदीमें जा बंठते थे और उन खानेकी तरह-तरह की चीजोंकी फरमाइश करने लगते थे। प्राणगोपाल गोस्वामीने आशा की थी कि स्वामी कृष्णानन्दजी जैसे सुयोग्य शिष्य द्वारा जगत्‌में भक्तिका प्रचार होगा और अनेकों नास्तिक और अधर्मी लोगोंका उद्धार होगा। उन्हें यह देखकर चिन्ता हो गयी कि वे ग्वारिया बाबाके साथ भाव-समुद्र में निरन्तर डूबे रहकर इस लक्ष्य से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने एक दिन उन्हें अपने निकट बुलाकर आज्ञा की ‘तुम्हें प्रभुकी कृपासे जो मिला है, उसका दूसरे लोगों में बांटकर उपभोग करो। जगत्में कृष्ण भक्ति और कीर्तनका प्रचार करो।’

उन्होंने गुरुदेवको आशाका पालन करनेका निश्जय किया। पर स्वतन्त्र रूपसे प्रचार करने में उनके सामने एक बहुत बड़ी बाधा थी। उन्होंने सङ्कल्प कर रखा था यथासम्भव किसी स्त्रीका मुख न देखनेका। वर्षोंसे वे इस सङ्कल्पको निभाते आ रहे थे। उनकी कुटियापर स्त्रियोंको आना मना था। वे जब मधुकरीको जाते, तो सिरपर कपड़ा डालकर निगाह नीची किये जाते ।

एक दैवी घटनाके कारण उन्हें अपना सङ्कल्प तोड़ना पड़ा। घटना इस प्रकार है। हिंदील ग्रामके निकट नगला लक्ष्मणपुरमें श्रीलालारामजीको पुत्री श्रीमती देवा ग्यारह वर्षकी अवस्थामें विधवा हो गयी थी। वह मन-ही-मन स्वामी कृष्णानन्दजीको गुरु मानकर तन-मनसे ठाकुर सेवामें लगी रहती थी। पर गुरुजीके दर्शन न कर सकनेके कारण वह बहुत दुःखी थी। लोगांके बहुत आग्रह करनेपर स्वामीजीने एक कागजपर महामन्त्र लिखकर उसका जप करने और सरूप भावसे श्रीकृष्णका चिन्तन करने को उसे कहला भेजा। वह तदनुसार जप और चिन्तन करने लगी। पर उसने यह प्रण कर लिया कि जबतक गुरुजी के दर्शन न होंगे, सूर्यके दर्शन नहीं करूंगी। वह प्रातः ४ बजेसे अपनी भजन कुटी में बैठ जाती और सूर्यास्ततक भजन करतो रहती। तीन वर्ष इस प्रकार बीत गये। पर गुरुदेवके दर्शन न हुए। अन्त में उसने अन्न-जल त्याग दिया। नौ दिन हो गये बिना अन्न-जल ग्रहण किये तब कृष्णानन्दजीको दाऊजीका दिव्य सन्देश प्राप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप उन्हें स्त्रीका मुख न देखनेका सङ्कल्प त्यागकर उसे दर्शन देने पड़े।

थोड़े ही दिनों में उस लड़कीका सख्य-प्राव सिद्ध हो गया। उसकी चाल, रहन-सहन सब कुछ श्रीकृष्ण के सखाक़े समान हो गया। लोग उसे ‘भैया’ कहकर पुकारने लगे। श्रीकृष्ण अंयाके साथ बातें करते, खेलते और भाँति-भांतिकी लीलाए करते। भैयाका पार्थिव शरीर श्रीकृष्णके दिष्य सान्निध्यको कबतक झेल सकता था। उसकी शारीरिक अवस्था दिन पर दिन शोचनीय होती गयी । अन्तमें एक दिन जब वह मूर्छित अवस्था में गुरुदेवकी गोदमें सिर रखे लेटा था, उसने एकदम आँखे खोलकर गुरुजी की ओर देखा और कहा ‘भैया ! चलो चलें। देखो राम-कृष्णादि सखा बुलाने आये हैं। गुरुदेवने अश्रु गद्गद कण्ठसे कहा- भैया, तुम चलो मैं पीछे आऊँगा।’ गुरुदेव की आज्ञा प्राप्त करते ही वह राम-कृष्णके साथ उनके दिग्य धाममें प्रवेश कर गया।

स्वामीजी ने भंवासे उसका अनुगमन करने को कहा था पर ऐसा करने को अभी उन्हें गुरुदेव की आशा नहीं थी। उन्हें उनकी आज्ञानुसार जगत्के कल्याणके लिए कुछ करना था। वे इस कार्य में जुट गये। गाँव-गाँव में जाकर कीर्तनका प्रचार किया। अद्वैतवाद, आयंसमाज और नास्तिक मतोंका खण्डन कर वहाँ घंष्णय-धर्मकी जड़ सुदृढ़ की। उनके गौरकान्तियुक्त प्रभावशाली वपु, विद्या, वैराग्य और भक्ति-भाव से आकर्षित हो अनेकों लोगोंने उनका अनुगत्य स्वीकार किया। आज भी महामण्डलेश्वर श्रीरामदास शास्त्री तथा महाकवि श्रीबनमालीदास शास्त्री जैसे बहुत-से विद्वान और गणमान्य व्यक्ति उनके शिष्य हैं।

प्रचारके उद्देश्यसे उन्होंने बहुत से ग्रंथोंकी रचना भी की, जिनमें से

नाम इस प्रकार हैं

१. वैदिक प्रमाण-पत्रिका. २. भक्ति रत्नावली, ३. श्रीमद्भागवत-तत्व रिमर्श, ४. श्रीरामकृष्ण लीलामृत, ५. अद्वैत-भेदक- प्रश्नावली, ६. आर्य समाज मत-समीक्षा, ७. भक्ति-सिद्धान्त विवेचन, ८. श्रीमद्भगवतगीता ( विस्तृत हिन्दी टीका सहित ) ।

इनना सब कर चुकनेपर उन्होंने भी अपनी पूर्वघोषणाके अनुसार

सन् १८४१ की फाल्गुन कृष्णा सप्तमीके दिन रात्रिके ठीक १२ बजे ‘हरेकृष्ण’

उच्चारण करते हुए प्रसन्न मुद्रामें राम-कृष्णके धाममें प्रवेश किया।

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भक्ति पर कुसंग का क्या प्रभाव पड़ता है?


प्र०-महाराज जी, यदि कुसंग समीप में है तो उससे हमारी भक्ति की गति अवरुद्ध हो सकती है क्या ?


समाधान


भगवान् श्रीरामने विभीषणजी से कहा था

बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥

(श्रीरामचरितमानस ५/४६)

नरक मिल जाना अच्छा है लेकिन भगवद्विमुखों का संग अच्छा नहीं । जो दुष्ट प्रवृत्ति के लोग हैं, गन्दे आचरण करने वाले हैं, हमें कभी भी उनका संग नहीं करना चाहिए, अगर संग करेंगे तो – काजर की कोठरी में कैसोहू सयानो जाय, काजर की एक लीक लागि है पै लागि है ।



जैसे सुसंग (सत्संग) का रंग चढ़ता है, ऐसे ही कुसंग का भी रंग चढ़ता है । सुसंग का रंग तो धीरे-धीरे चढ़ता है लेकिन कुसंग का बहुत शीघ्र चढ़ता है; जबकि सुसंग प्रबल है, कुसंग में प्रबलता नहीं है पर जल्दी कुसंग का रंग इसलिए चढ़ता है क्योंकि बहुत काल से अर्थात् जब से सृष्टि रची गई तब से हम कुसंग में ही रहे हैं, हमें सत्संग नहीं मिला; अगर सत्संग मिला होता तो –

‘सतसंगति संसृति कर अंता ।”

अब तक हम संसृति चक्र से मुक्त हो गये होते, लेकिन अभी भी जन्म-मरण के चक्र में पड़े हुए हैं तो इसका मतलब हमें सत्संग नहीं मिला, हमें कुसंग ही मिलता रहा। अतः कुसंग का हमारा पुरातन अभ्यास है, जैसे ही कुसंग मिलता है तत्काल हमारा मन उसमें राजी हो जाता है और जब सत्संग मिलता है तो बड़े सोच विचार और मुश्किल से सत्संग की तरफ मन बढ़ता है। इसलिए हमें चाहिए कि हर स्थिति में हम कुसंग से बचें, यदि हम कुसंग करेंगे तो निश्चित भगवन्मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकते हैं । कुसंग से बड़ा हानिकारक और कोई जहर नहीं है। एक बार जहर खा लो तो वह एक ही शरीर नष्ट करेगा लेकिन कुसंग ऐसे संस्कार डाल देगा जो कई जन्मों तक चलते रहेंगे । अतः कुसंग का त्याग अत्यावश्यक है । यदि कुसंग को हम नहीं त्याग पा रहे तो बात नहीं बनेगी । जैसे काला सर्प धोखे से हमारी गोद में आकर के गिर जाए तो हम बिना कुछ सोचे-समझे एकदम डरकर के उसे दूर फेंक देंगे, इससे ज्यादा खतरनाक विषयी (भगवद्विमुख) जन हैं, इसलिए बिना कुछ सोच विचार किये उनका संग त्याग देना चाहिए । अब काले सर्प को दुलार करोगे तो वो तो काट लेगा ही। विषयी पुरुषों का संग करोगे नो बुद्धि भ्रष्ट होगी ही, बड़ों-बड़ों की हो जाती है

को न कुसंगति पाइ नसाई । रहइ न नीच मतें चतुराई ॥

(श्रीरामचरितमानस २/२४)

जो नीच पुरुषों का संग करेगा, उसकी बुद्धि निश्चित मलिन हो जायेगी । कुछ आंतरिक वृत्तियाँ भी हैं वे भी कुसंग देती हैं तो पहले हम बाहरी कुसंग से बचें फिर आंतरिक वृत्तियों से संघर्ष करें, कुमति द्वारा आसुरी प्रवृत्तियों का जो प्रादुर्भाव होता है, उनसे हम अपने-आप को बचायें; तभी हम आगे इस मार्ग में बढ़ सकते हैं । यदि हम इतना नहीं कर सकते हैं तो फिर हम साधक या उपासक किस बात के हैं ।

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राधाकृष्ण का अनूठा प्रेम




राधाजी और श्रीकृष्ण का प्रेम अलौकिक था। राधा कृष्ण के प्रेम को सांसारिक दृष्टि से देखेंगे तो समझ ही नहीं पायेंगे। इसे समझने को तो पहले आपको राधा और कृष्ण दोनों से स्वयं प्रेम करना होगा।

श्रीकृष्ण का हृदय तो व्रज में ही रहता था परन्तु उनकी बहुत सी लीलाएँ शेष थीं। इसलिए उन्हें द्वारका जाना पड़ा। गए तो थे यह कहकर कि कुछ ही दिनों में वापस ब्रजलोक आयेंगे, पर द्वारका के राजकाज में ऐसे उलझे कि मौका ही नहीं मिल पाया। राधा कृष्ण दूर-दूर थे।
गोपाल अब राजा बन गए थे। स्वाभाविक है कि राजकाज के लिए समय देना ही पड़ता। स्वयं भगवान ही जिन्हें राजा के रूप में मिल गए हों उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा होगी। द्वारकावासी दिनभर उन्हें घेरे रहते। जो एकबार दर्शन कर लेता वह तो जाने का नाम नहीं लेता। बार-बार आता। प्रभु मना कैसे करें और क्यों करें?

ब्रज से दूर श्रीकृष्ण हमेशा अकेलापन महसूस करते। उन्हें गोकुल और व्रज हमेशा याद आता। जिस भी व्रजवासी के मन में अपने लल्ला से मिलने की तीव्र इच्छा होती श्रीकृष्ण उसे स्वप्न में दर्शन दे देते। स्वप्न में आते तो उलाहना मिलती, इतने दिनों से क्यों नहीं आए। यही सिलसिला था। भक्त और भगवान वैसे तो दूर-दूर थे। फिर भी स्वप्न में ही दर्शन हों जायें, तो ऐसे भाग्य को कोई कैसे न सराहे।

श्रीकृष्ण से विरह से सबसे ज्यादा व्याकुल तो राधाजी थीं। राधा और कृष्ण मिलकर राधेकृष्ण होते थे पर दोनों भौतिक रूप से दूर थे।

एक दिन की बात है। राधाजी सखियों संग कहीं बैठी थीं। अचानक एक सखी की नजर राधाजी के पैर पर चली गई। पैर में एक घाव से खून बह रहा था।

राधा जी कै पैर में चोट लगी है, घाव से खून बह रहा है। सभी चिन्तित हो गए कि उन्हें यह चोट लगी कैसे। लगी भी तो किसी को पता क्यों न चला।

सबने राधा जी से पूछा कि यह चोट कैसे लगी? राधाजी ने बात टालनी चाहा। अब यह तो इंसानी प्रवृति है आप जिस बात को जितना टालेंगे, लोग उसे उतना ही पूछेंगे।

राधा जी ने कहा–एक पुराना घाव है। वैसे कोई खास बात है नहीं। चिंता न करो सूख जाएगा।
सखी ने पलटकर पूछ लिया–पुराना कैसे मानें? इससे तो खून बह रहा है। यदि पुराना है, तो अब तक सूखा क्यों नहीं ? यह घाव कैसे लगा, कब लगा? क्या उपचार कर रही हो ? जख्म नहीं भर रहा कहीं कोई दूसरा रोग न हो जाए!

एक के बाद एक राधाजी से सखियों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। उन्हें क्या पता, जिन राधाजी की कृपा से सबके घाव भरते हैं, उन्हें भयंकर रोग भला क्या होगा!

राधाजी समझ गईं कि अगर उत्तर नहीं दिया तो यह प्रश्न प्रतिदिन होगा। इसलिए कुछ न कुछ कहके पीछा छुड़ा लिया जाए, उसी में भला है।

राधा जी बोलीं–एक दिन मैंने खेल-खेल में कन्हैया की बांसुरी छीन ली। वह अपनी बांसुरी लेने मेरे पीछे दौड़े। बांसुरी की छीना-झपटी में अचानक उनके पैर का नाखून मेरे पांव में लग गया। यह घाव उसी चोट से बना है।

राधा जी ने गोपियों को बहलाने का प्रयास तो किया पर सफल नहीं रहीं। किसी ने भी उनकी इस बात का विश्वास न किया। प्रश्नों से भाग रही थीं, अब पलटकर फिर से प्रश्न शुरू हो गए।

सखियों ने पूछा–यदि यह घाव कान्हा के पैरों के नाखून से हुआ तो अबतक सूखा क्यों नहीं? कान्हा को गए तो कई बरस हो गए हैं। इतने में तो कोई भी घाव सूख जाए। देखो कुछ छुपाओ मत। हमसे छुपा न सकोगी। आज नहीं तो कल पता तो चल ही जाएगा। सो अच्छा है कि आज ही बता दो।

राधा जी समझ गईं कि सखियों को आधी बात बताकर बहलाया नहीं जा सकता। वह तो अपने कन्हैया से आज ही रात स्वप्न में पूछ लेंगी। बात तो खुल ही जाएगी इसलिए बता ही देना चाहिए।

राधा जी बोलीं–घाव सूखता तो तब न, जब मैं इसे सूखने देती। मैं रोज इसे कुरेदकर हरा कर देती हूँ।

सखियों की तो आँख फटी रह गई ये सुनकर कि राधा जी घाव को हरा कर रही हैं। यह तो बड़ी विचित्र बात हुई। सबके चेहरे पर एक साथ कई भाव आए। अब राधा जी से फिर से प्रश्नों की झड़ी लगने वाली थी। इससे पहले कि कोई कुछ कहे राधाजी ने ही बात पूरी कर दी।
राधाजी थोड़े दुखी स्वर में बोलीं–कान्हा रोज सपने में आकर इस घाव का उपचार कर देते हैं। घाव के उपचार के लिए ही सही, कन्हैया मेरे सपनों में आते तो हैं। अगर यह सूख गया तो क्या पता वह सपने में भी आना छोड़ दें।

प्रभु दूर बैठे सब सुन रहे थे। उनकी आँखों में आँसू भर आए। वहीं पास में उद्धव जी बैठे थे। उन्होंने प्रभु की आँखों से छलकते आँसू देख लिए।
उद्धवजी हैरान-परेशान हो गए। सबके आँसू दूर करने वाले श्रीकृष्ण रो रहे हैं। यह क्या हो रहा है। कौन सा अनिष्ट देख लिया। कौन सा अनिष्ट घटित होने वाला है। उद्धवजी चाह तो नहीं रहे कि प्रभु के नितान्त निजी बात में हस्तक्षेप करें पर कौतूहल भी तो है।

उद्धवजी स्वयं को रोक ही न पाए। उन्होंने श्रीकृष्ण से आँसू का कारण पूछ ही लिया। भगवान ने भी अपने सखा उद्धव से कुछ भी न छुपाया। सारी बात साफ-साफ बता दी।

उद्धव को यकीन नहीं हुआ कि ब्रजवासी श्रीकृष्ण से इतना प्रेम करते हैं। भगवान नित्य उन्हें सपने में जाते हैं। उनके उलाहने लेते हैं, उनका उपचार करते हैं। इतनी फुर्सत कहाँ है इन्हें। यह सब भाव उद्धव के मन में आ रहे थे। भगवान उद्धव की शंका ताड़ गए।

उन्होंने उद्धव से कहा–उद्धव आप तो परमज्ञानी हैं। किसी को भी अपने वचन से सन्तुष्ट कर सकते हैं। मेरे जाने से पहले आप एक बार ब्रज हो आइए। ब्रजवासियों को अपनी वाणी से मेरी विवशता के बारे में समझाकर शांत करिए। उसके बाद मैं जाऊँगा।

उद्धव ब्रज गए। उन्हें गर्व था कि वह ज्ञानी हैं और किसी को भी अपनी बातों से समझा लेंगे। चिकनी-चुपड़ी बातों से गोपियों को समझाने की कोशिश की। गोपियों ने इतनी खिंचाई की, कि सारा ज्ञान धरा का धरा रह गया।

गोपियों के मन भगवान के प्रति प्रेम देखकर वह स्तब्ध रह गए। द्वारका में श्रीकृष्ण के आँसू देखकर जो शंका की थी उसके लिए बड़े लज्जित हुए।

गोपियों ने श्रीकृष्ण से अपने प्रेमभाव का जो वर्णन शुरू किया तो उद्धव की आँखें स्वयं झर-झरकर बहने लगीं। वह भाव-विभोर हो गए। राधा और कृष्ण के बीच अलौकिक प्रेम को उद्धव ने तभी समझा।

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संकेत


नन्दगाँव और बरसाना दोनोंके बीचमें संकेत स्थित है। श्रीमती राधिका एवं श्रीकृष्ण इन युगलके पूर्व रागके पश्चात् सर्वप्रथम मिलन यहींपर हुआ था।

श्रीमती राधिका अपनी ससुराल जावटसे और श्रीकृष्ण नन्दगाँवसे परस्पर इस स्थानपर मिलते थे। वृन्दादेवी, वीरादेवी और सुबलसखा ये दूत और दूतीका कार्यकर संकेतके द्वारा प्रिया प्रियतम दोनोंका मिलन कराते थे। इसलिए इस स्थानका नाम संकेत है। कभी-कभी श्रीमती राधिकाजी और कभी-कभी कृष्ण इस स्थानपर परस्पर मिलनेके लिए अभिसार करते थे। कृष्णदास कविराज द्वारा रचित गोविन्दलीलामृत तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित कृष्णभावनामृत ग्रन्थमें नैश एवं निशान्त लीलाका इस संकेत स्थलमें राधाकृष्णके मिलन एवं विलासका अद्भुत सरस रूपमें वर्णन किया गया है। योगमायाकी अभिलाषाके अनुसार श्रीवीरा एवं वृन्दादेवी ये दोनों प्रधान दूतियाँ श्रीराधाकृष्ण युगलका परस्पर मिलन कराती हैं। श्रीवृन्दादेवी निशान्तके समय युगलके मधुर जागरणकी व्यवस्था करती हैं। शुक-सारी अपने सुमधुर वचनोंसे उनका प्रबोधन कराते हैं। कोकिल अपने मधुर काकलि और कुहु कुहु स्वरोंसे, मयूर मयूरी अपने के का शब्दों से उनको जगानेमें सहायक होते हैं। ललिता, विशाखादि सखियाँ उनकी आरती उतारती हैं। कक्खटी (बूढ़ी मरकटी या वानरी) के ‘जटिला’ शब्दके उच्चारणसे संकुचित हो श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण अपने-अपने भवनमें पधारकर शयन करते हैं।

यहाँ संकेत विहाराजीका मन्दिर, रासमण्डलका चबूतरा और झूलामण्डप – ये स्थान दर्शनीय हैं। रास चबूतराके सामने पूर्व दिशामें श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीकी भजन कुटी है। यहींपर श्रीचैतन्य महाप्रभुने द्वादश वन भ्रमणके समय बैठकर विश्राम किया था। रासमण्डल चबूतराके पास ही संकेत देवी (श्रीवीरादेवी) का दर्शन है। पास ही विह्वलादेवी, विह्वलकुण्ड, रंगमहल, शय्यामन्दिर तथागाँवके पश्चिममें कृष्णकुण्ड दर्शनीय हैं। कृष्णकुण्डकेट श्रीवल्लभाचार्यजीकी बैठक है ।

कोई-कोई संकेत गाँव से नन्दगाँव की यात्रा करते हैं। कोई-कोई आसपासकी लीलास्थलियाँ रिठौर, भाण्डोखोर, श्रीमेहेरान, साँतोया, पाई, तिलोयार, शृंगारवट, बिछोर, अन्धोप, सोन्द, वनचारी, होडल, दईगाँव, लालपुर, हारोयान गाँव, साञ्चुली, गेण्डो गाँव आदिका दर्शन और परिक्रमाकर नन्दगाँवका दर्शन करते हैं।


संकेत देवी मंदिर

संकेत बिहारी मंदिर
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3 . KAMSA’S PERSECUTION OF THE YADAVAS


Once narada, the divine sage, visited Kamsa. He spoke to Kamsa about many things. He also said that most of the inhabitants of Gokula, with Nanda as their head, were all Devas born on the earth at the command of Lord Vishnu to destroy all the Asuras living on earth. Kamsa was taken aback. Once again fear seized him. As soon as Narada left the place, he chained Vasudeva and Devaki and imprisoned them in a cell. He thought that it was his mistake to
have spared the life of their first child. He went to Devaki, snatched the child from her hand and killed it mercilessly. He began to hate the Yadavas and started harassing them. He imprisoned his father Ugrasena also, since he was the leader of the Yadavas. He began
persecuting the Yadavas, who had therefore to run here and there to save their lives.

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2 . MARRIAGE OF VASUDEVA AND DEVAKI

Lord Vishnu promised that He would be born as the son of Vasudeva and Devaki. Who were they? At that time there was a clan called Yadavas, who were the descendants of King Yadu. Sura was the Lord of the Yadus. His kingdom was divided into two parts, Mathura and Surasena. There were two brothers Ugrasena and Devaka. Ugrasena was the king of Mathura. He had a son called Kamsa. Devaka had a daughter named Devaki. Kamsa was very fond of his cousin Devaki since he had no sister of his own. Sura had a son called Vasudeva. A marriage was arranged between Vasudeva and Devaki. After the marriage celebrations were over, Vasudeva was getting ready to take his bride home. Elaborate arrangements had been made for the journey, by Kamsa. A hundred golden chariots, four hundred elephants and a huge army were to escort the bride and bridegroom. Kamsa was feeling very sad at the prospect of the separation from his sister. He came near the chariot and asked the charioteer to get down and he himself took his place. He took up the reins in his hand and started driving the chariot himself as a gesture of his affection for her. As he was driving, all on a sudden he heard a celestial voice.

The mysterious voice said, “You fool, the eighth child of the woman you are now taking in your chariot will kill you.”

Kamsa was startled and seized with fear. As soon as he heard the warning, he dropped the reins, caught hold of his sister’s hair and with his right hand drew his sword to kill her. Only a few minutes earlier he had been so affectionate that he desired to be his sister’s charioteer. But as soon as he heard that his life was in danger, all his affection for her evaporated and he wanted to kill her. Kamsa thundered at Devaki. “You wretch, on whom I showered so much affection! You are

going to be the mother of my killer. Let me see how it happens. I will, this moment, kill you.

Then I shall have nothing to fear.”

Vasudeva tried to pacify Kamsa and save Devaki. He said to Kamsa, “How can you think of

killing your own sister and that too at the time of her wedding? As your younger sister, she deserves all kindness from you. Please take pity on her and spare her life. But these words of Vasudeva failed to change the mind of Kamsa. When Vasudeva saw that

Kamsa could not be persuaded in this manner, he thought of another plan to restrain Kamsa.

He said to Kamsa, “Look, dear Sir, you have nothing to fear from your sister Devaki despite what you have heard from the unseen voice. You are afraid that her son will kill you. I promise that I shall hand over to you every one of her children as soon as they are born. On hearing this liberal proposition of Vasudeva, Kamsa was much relieved. He was confident that Vasudeva would keep his word. So he refrained from killing his sister. He let her go.

Vasudeva, happy at the success of his plan, praised Kamsa and returned home with his bride. in due coures, a son was born to Devaki. Vasudeva invited learned Brahmanas for the naming ceremony. They examined the child’s horoscope and named it Kirtiman, the famous one. The happiness of the parents however was short-lived. According to the promise given by him, Vasudeva had to deliver the child to Kamsa. He was a man of his word. So he carried the child to Kamsa and said, “Here is my child. I have brought it to you as I have promised. Do whatever you like with the child. Kamsa was pleased with the-truthfulness of Vasudeva. With a smiling face he took the child and replacing it in the hands of Vasudeva said, “I do not want to kill this tender child. After all,
I have been told that your eighth child only will kill me. Since it is your first born, I have no fear from it.” Vasudeva was pleased with Kamsa and took his child back home. But he was also aware that he could not rely on the words of a wicked man like Kamsa. Any moment he might change his mind and kill the child. And that was exactly what happened.

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श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी


( वृन्दावन )

श्रीस्वामी रूपमाधुरी शरणजी का जन्म संम्वत् १८५५ में ज्येष्ठ मास की शुक्ला नवमी को जयपुर के एक कुलीन माहेश्वरी तोपनीवाल वंश में हुआ। आपके पिता का नाम था श्री दामोदर जी और माता का श्रीमती गणेशी देवी । दोनों बड़े धर्मपरायण और सत्संगी थे।

श्री रूपमाधुरी जी की प्रारम्भ से ही भजन-साधन में विशेष रुचि थी। इसलिए उन्होंने शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। पर उन्हें हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी का सामान्य ज्ञान था। उन्होंने अपनी शिक्षा के सम्बन्ध में लिखा है

पढ़ो लिखो में कछु नहीं, मूरख हूं मतिहीन । हरिदासन को दास हूँ, रूप माधुरी बीन ॥

विद्या में व्युत्पन्नता न होते हुए भी विद्या का जो चरम-फल है सरलता, निश्छलता, विषय-वैराग्य, दैन्य और भक्ति वह सब उनकी नैसगिक सम्पति था। छोटी अवस्था में ही उन्होंने शुक सम्प्रदाय के प्रसिद्ध रसिक सन्त श्री सरस माधुरी जी महाराज से दीक्षा प्राप्त कर ली और आजीवन ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करते हुए भक्ति-पथ का पथिक बनने का निश्चय कर लिया। उन्होंने स्वयं तो भक्ति-पथ का अवलम्बन किया हो, जयपुर के असंख्य लोगों को भी उस पर ले चले। उनके प्रयास से जयपुर में भक्ति मन्दाकिनी बह निकली वे अपने निवास स्थान पर प्रति गुरुवार को सत्संग का आयोजन करते। कभी कभी नगर कीर्तन द्वारा मोह-निद्रा में पड़े जयपुर वासियों को झकझोर कर जगा देते, उनसे तुलसीदास को निम्न पंक्तियों को दोहराते हुए हरिनाम का दीपक जलाकर अपने हृदय के अन्धकार को दूर करने का आग्रह करते ।

राम नाम मनिदीप घर जोह देहरी द्वार।

तुलसी भीतर बाहिरं जो चाहे उजियार ।

उनको गुरु भक्ति सराहनीय थी। जयपुर में ही शुक सम्प्रदाय का एक प्रमुख स्थान है, जहां श्री सरस माधुरी जी रहते थे। वे उनके सान्निध्य में रहकर उनकी अधिक-से-अधिक सेवा करते। गुरु-स्थान के सभी उत्सवों में उनका महत्वपूर्ण योगदान होता सरस माधुरी जी के संग के प्रभाव से उनका सरस हृदय और अधिक सरस हो गया। वे राधा-कृष्ण की अटयाम-लीला के चिन्तन में तल्लीन रहने लगे।

गुरुदेव की आज्ञा से उन्होंने श्री गोपाल मन्त्र के १८ पुरश्चरण किये। पुरश्चरण के दिनों में वे केवल दूध पीकर और मौन धारण कर रहते। गुरुवार को सत्संग के समय मौन तोड़ देते। पुरश्चरण के समय एक दिन उन्हें एक विचित्र अनुभव हुआ। उन्होंने सुनी बहुत बाजों की गगनभेदी ध्वनि । वह ध्वनि धीरे-धीरे उनके घर के निकट जाती जान पड़ी, जैसे कोई बड़ी बारात चली आ रही हो। थोड़ी देर में उन्होंने देखा बाजों के साथ एक देवी और उसके अनेक गणों को घर के भीतर प्रवेश करते। देवी उनके सामने आकर खड़ी हो गयीं, उनका कुछ अनिष्ट करने के उद्देश्य से। पर वे निविघ्न मन्त्र जप करते रहे। उसी समय अकस्मात् देवी और उसके गणों में भगदड़ मच गयी श्री शुकदेव जी को आते देख।
शुकदेव जी ने पधार कर देवी से तो उनकी रक्षा की ही, उनके मस्तक पर अपना वरद हस्त रखकर आशीर्वाद भी दिया। शुकदेव जी का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात् उनका गृहस्थ में रहना असम्भव हो गया। उन्होंने शुक सम्प्रदाय की संगरूर की गद्दी के महंत श्री बालमुकुन्ददास महाराज से संन्यास-दीक्षा ली और शेष जीवन वृन्दावन में एकान्त भजन में व्यतीत करने के उद्देश्य से वृन्दावन चले गये। वहां युगल पाट पर ‘सरजकुञ्ज’ के नाम से एक स्थान का निर्माण किया। उसमें युगल सरकार की प्रतिष्ठा कर उनकी रसमयी सेवा की व्यवस्था की । वृन्दावन में भी ये भगवत्स्वरूपों और आचार्यों की जयन्तियाँ बड़े उत्साह से मनाते । संतों की सेवा भी खूब करते। पर यह सब करते हुए भी जगत के प्रपंच से दूर रहते। एक पल भी बिना भजन के न जाने देते_
जग प्रपञ्च परस्यो नहि, करि वृन्दावन वास। निमिष में खोयो भजन बिन रूप माधुरी दास ॥

( श्रीजगदीश राठौर )

उन्होंने शुक्र सम्प्रदाय की श्री रामसखी जी के अप्रकाशित ( गुप्त ) वाणीग्रन्थ ‘भक्तिरस मञ्जरी’ का अपने गुरुजी के पास अध्ययन किया था। उसी के अनुसार वे प्रातः ३ बजे से राधा-कृष्ण की अष्टयाम लीला-चिन्तन में लगे रहते । साथ-साथ ‘राधा’ नाम का जप करते। राधा-कृष्ण के भक्त होते हुए भी वे राधारानी के अनन्य उपासक थे, जैसा कि राधाजी के प्रति उनके कुछ विनय-सूचक पदों से विदित है—

किशोरी मैं तो भलो बुरी सो तेरी ।
अब जिन करो अबेर लडै़ती, रक्खियो चरणन नेरी।
अवगुण मेरे सफल बिसारो, जानि आपनी चेरी ॥

भक्तिरस-मञ्जरी के अनुसार राधा जी की उपासना ही सर्वोपरि है—

साधन एक अनूप है, सो मैं कहत सुनाय ।
राधा राधा भजन सम, दूजो नाहि उपाय ॥ (भक्तिरस मञ्जरी)

श्री रूपमाधुरी जी बोलते बहुत कम थे। खाते-पीते भी उतना ही थे, जितना शरीर धारण करने के लिए नितान्त आवश्यक समझते थे। उनके स्थान में जगह भी उतनी ही थी, जितनी उनके और उनके कुछ शिष्यों के रहने के लिए आवश्यक थी। उसका विस्तार करने के लिए जब कोई धन देना चाहता, तो उसे अस्वीकार कर देते रातमें किसीको अपने स्थानपर टहरने न देते।

वृन्दावन आने के पश्चात् उनका परिवार बहुत बढ़ गया । अनेकों शिष्य हो गये। शिष्य सेवक बराबर उनके स्थान पर जाते रहते। पर उनके आने से उनके अपने कार्यक्रम में कोई अन्तर न पड़ता। घड़ी की सुई के अनुसार नियमित समय पर ठाकुर-सेवा, प्रसाद-सेवा, भजन-कीर्तनादि होता रहता। सभी को उसके अनुसार चलना पड़ता। प्रसादादि के समय यदि कोई न पहुंच पाता, तो उससे वंचित रहता। गरीब-अमीर, छोटे-बड़े सभी के साथ उनका व्यवहार एक-सा होता।

वे बड़े सत्संग-प्रेमी थे। साम्प्रदायिक भेद-भाव उनमें लेशमात्र भी न था। सभी सम्प्रदायों के ऊंचे सन्तों का वे सत्संग करते थे। गौड़ीय सम्प्रदाय के पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी, श्रीगौरांगदास बाबाजी, श्रीप्राण कृष्णदास बाबाजी, श्रीअवध्दास बाबाजी और निम्बार्क सम्प्रदाय के श्री हंसदासजी तथा प्रियाशरणजी से उनकी विशेष प्रीति थी। उन्होंने ‘श्रीनवसन्तमाल’ नामक अपने ग्रन्थ में ४१ सन्तों का उल्लेख किया है, जिनका उन्होंने सत्संग किया । उनमें से प्रत्येक का गुणगान करते हुए उन्होंने उन पर कवित्त लिखे हैं, जैसे श्रीगौरांगदास बाबाजी के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है—

रहते बंगदेश खास, अब कीनों व्रजवास,
जिनकी वाणी रसरास, सन्त गौरांगदासजु । गौरहरि नित गावे, लाल-लली के लड़ावे,
संग किये प्रेम प्यावे, छटी, मोह-माया फांस जु।
राधा नामके उपासी सखीभाव सुखीरासी,
सेवा मानसो विलासो, सुख पावे गये पास जु सम्पत्ति लाखनकी त्यागी, ऐसे भारी अनुरागो,
ये तो पूरे बड़भागी, बन्दे रूपदास जु ।

भजन और सत्संग के प्रभाव से रूपमाधुरी जी की चित्तवृत्ति युगल के चरणों में अधिकाधिक लीन रहने लगी। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति हो गयी कि सोते-जागते, चलते-फिरते हर समय युगल की नयी-नयी रूपमाधुरी का सहज ही आस्वादन होने लगा –

सुरत भई सहजानन्दमई ॥ टेक ॥
या सुख आगे कह कछु नाहीं, दुविधा दूर भई। सोवत जागत, डोलत-बोलत, छिन छिन मौज नई ॥ युगल लालकी सरस रुप छबि, मो उर माहि छई ॥ ‘रूपमाधुरी’ गुरु कृपा करि, ऐसो मौज दई ॥

उस समय की उनकी अलौकिक स्थिति का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है उस समय की एक-दो घटनाओ से जो उनके द्वारा घटीं । श्री सरसमाधुरी जी के शिष्य रांची के श्री रामचरणजी भाला उनमें गुरुबुद्धि रखते थे। जब सम्भव होता वे गुरुपूर्णिमा पर उनका पूजन करते थे। एक बार वे आषाढ़ के महीने में सपरिवार वृन्दावन आये। गुरुपूर्णिमा से कुछ पहले बिना किसी से कुछ कहे वृन्दावन से निकल पड़े मुजफ्फरनगर के निकट शुकताल जाने के उद्देश्य से, जहाँ शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को भागवत सुनायी थी और श्री शुक सम्प्रदाय के आचार्य श्री चरणदास जी महाराज को मन्त्र दिया था। वहाँ श्री शुकदेवजी के मन्दिर में शुकदेवजी के दर्शन कर गुरुपूर्णिमा तक वे वृन्दावन लौट आना चाहते थे। उनकी पत्नी श्रीमती सूरजबाई को बहुत चि चिंता हुई। उन्होंने जब रूपमाधुरीजी से उनके अकस्मात अन्तर्धान हो जाने की बात कही, तो उन्होंने कहा- ‘चिंता मत करो। वह शीघ्र आ जायेगा।’

पूर्णिमा के एक दिन पूर्व रामचरणजी मार्ग में किसी बीहड़ जंगल में भटक गये। यह सोचकर कि अब वे गुरुपूर्णिमा पर न तो शुकताल ही पहुँच सकेंगे, न श्रीरूपमाधुरीजी का पूजन कर सकेंगे बहुत दुःखी होने लगे। उसी समय एक घुड़सवार यहाँ आ निकला। उसने पूछा- “आप यहाँ कैसे भटक रहे हैं ?” उन्होंने अपनी दुःखभरी कहानी कह सुनायी। तब घुड़सवार कहा- ‘आप चिंता न करें। मैं मयुरा की ओर ही जा रहा हूँ । कल प्रातः आपको वृन्दावन पहुँचा दूंगा।’ वे उसके पीछे घोड़े पर बैठ लिये और दूसरे दिन प्रातः वृन्दावन पहुंच गये। उन्हें देखते ही श्रीरूपमाधुरी जी ने कहा गुरु-पूजा वहीं क्यों न कर ली, जहाँ गया था ? जानता नहीं, तुझे यहाँ लाने के लिए ठाकुरजी को घुड़सवार भेजना पड़ा।

श्रीराधाकृष्णदासजी, जो आजकल श्रीरूपमाधुरीजी के स्थान के महन्त हैं, उस समय उनके ठाकुरकी सेवा किया करते थे। उन्हें हैजा हुआ और वृन्दावन के हैजा अस्पताल में दाखिल किया गया। अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गयी। संध्या समय अस्पताल से रूपमाधुरीजी को खबर भेजी गयी। खबर पाकर वे बहुत दुःखी हुए। मन ही मन श्री चरणदासजी महाराज से कहने लगे-‘यह आपने क्या किया ? मेरी अवस्था ठाकुर-सेवा करने लायक है नहीं अब सेवा कैसे होगी, आप जाने।’ अस्पताल उन्होंने कहला दिया— ‘इस समय मेरे पास आदमी है नहीं। प्रातः शव को उठाने की व्यवस्था कर दी जायगी।’ प्रातः जब लोग इस व्यवस्था में लगे हुए थे, डाक्टर के यहां से संवाद आया- ‘मरीज अब जीवित दिख रहा है। आप कोई व्यवस्था न करें।’

कार्तिक कृष्णा १४ सम्वत् २०३२ को सतहत्तर वर्ष की आयु में श्रीरूपमाधुरीजी ने नित्य धाम में प्रवेश किया। उनके प्रमुख शिष्यों में हैं श्रीराधाकृष्णदास जी और श्रीवंशीदास जी।

उनकी वाणियों का संग्रह ‘श्रीरूपमाधुरीजी की वाणी के नाम से प्रकाशित है। कई और भी छोटे-छोटे ग्रन्थ उन्होंने लिखे हैं, जिनमें मुख्य हैं (१) श्रीगुरुपरत्व, (२) श्रीशुक महत्व, (३) चरणावत-वैष्णव-सदाचार, (५) शुकसम्प्रदाय रहस्य, (५) तिमिर-प्रकाश, (६) नवसन्तमाल।

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जीवन की प्रतिकूलता से निवृत्ति का क्या उपाय है?


प्र०- मेरे जीवन में पग-पग पर प्रतिकूलतायें आती हैं, मैं उनसे बड़ा दुःखी हूँ । महाराज जी, उनकी निवृत्ति का कोई उपाय बताइये ?


समाधान


जो भी अच्छी-बुरी परिस्थिति सामने आये उसमें राजी – (प्रसन्न) होना सीखो;

‘जोई जोई प्यारो करै सोई मोहि भावै,

क्योंकि प्रभु मंगलभवन हैं, वह सदैव वही करते हैं जिसमें हमारा परममंगल छिपा होता है, वह चाहें भी तो भी हमारा अमंगल नहीं कर सकते हैं; जैसे सूर्य चाहकर भी अँधेरा नहीं कर सकता है, जब तक रहेगा प्रकाश ही देता रहेगा । यहाँ तक कि प्रभु ने जिनको मारा उनको भी उस परमपद की प्राप्ति हुई जो बड़े-बड़े मुनियों के लिए भी दुर्लभ है। जिन शिशुपाल आदि ने प्रभु को गालियाँ दीं उनको भी परमपद मिला, जिन्होंने प्रभु से बैर किया, प्रभु से द्रोह किया, प्रभु को कष्ट पहुँचाना चाहा उनको परमपद मिला । जो पूतना अपने स्तनों में जहर लगाकर ठाकुरजी को मारने के लिए आयी थी, उन्होंने उसको भी वह गति दी जो यशोदा जी को प्राप्त हुई ।

गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाई । मातु की गति दई ताहि कृपालु जादवराई ॥



फिर जो प्रभु से प्यार करते हैं, उनकी शरण में हैं, उनका अमंगल कैसे हो सकता है;

‘कं वा दयालुं शरणं व्रजेम् ।’

इसीलये जो भगवान् के स्वभाव को जानते हैं वे हर परिस्थिति में प्रसन्न रहते हैं कि मेरे प्रभु के द्वारा किया गया हर विधान मंगलमय है। जरूर इस विधान में मेरा परममंगल छिपा हुआ है, इसीलिये प्रभु सर्वसमर्थ होते हुए भी मुझे ऐसी परिस्थिति दे रहे हैं । अतः सच्चा भक्त हर स्थिति में राजी (प्रसन्न) रहता है, कभी प्रभु से कोई शिकायत नहीं करता है ।

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विह्वल कुण्ड

यह कुण्ड संकेतके पास दक्षिण पूर्व कोणमें है। यहाँ श्रीकृष्ण श्रीराधानाम सुनकर परम विह्वल हो गये थे।


प्रसंग


एक दिन श्रीकृष्ण सुबलसखाके साथ इस मनोहर कुण्डके निकट एक रमणीय कुञ्जमें बैठे हुए रसालाप कर रहे थे। उसी समय एक सारिका पास ही एक वृक्षकी डालीपर बैठकर श्रीराधिकाजीके गुणोंका गान करने लगी। राधिकाजीके नाम और गुणोंका श्रवणकर कृष्णके हृदयमें नाना प्रकारके भावोंका उदय हुआ। उन्हें इधर-उधर सर्वत्र राधिकाकी स्फूर्ति होने लगी। उत्कण्ठित होकर वे उनको पकड़नेके लिए इधर-उधर भागने लगे। श्रीकृष्णक अङ्गोंमें महाभावके अत्यन्त उन्नत अष्टसात्त्विक भावोंका दर्शनकर सुबल सखा, कृष्णकी भाव-शान्तिके लिए विचार करने लगे। उन्होंने सोचा श्रीमती राधिकासे मिलन हुए बिना कृष्णके इन भावोंकी शान्ति नहीं हो सकती ।

ऐसा सोचकर उन्होंने किसी प्रकार विशाखा सखी द्वारा कृष्णकी इस अद्भुत विह्वलताका संवाद भेजकर वहाँपर श्रीमती राधिकाको लानेकी प्रार्थना की। जिस समय विशाखादि सखियोंके साथ श्रीराधिकाका आगमन हुआ, उस समय सुबलने उन्हें दूरसे विरहातुर श्रीकृष्णको दिखलाया। उत्कण्ठित हो दोनों एकदूसरेको दर्शनकर परमानन्दित हुए। श्रीराधिकाके श्री अंगका स्पर्श पाकर कृष्ण कृतकृतार्थ हो गये। जो साधक प्रीतिपूर्वक यहाँ भजन करता है, वह राधाकृष्णक प्रेममें अवश्य ही विह्वल होगा।

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1 . LORD VISHNU PROMISES TO BE BORN ON EARTH

Once upon a time Mother Earth was burdened with innumerable Asuras disguised as violent and haughty kings. Unable to bear the burden, the Earth took the form of a cow and appeared before Lord Brahma.

Crying piteously, she narrated to him her tale of woe. Brahma felt sorry at her distress. He said, “My dear child, there is only One Being who can help you. That is Narayana. We shall take refuge in Him.” Accordingly, accompanied by Lord Shiva, they proceeded to Narayana, or Lord Vishnu, who dwelt on snake Adisesha in the milk ocean. Reaching the shore of the ocean, they all prayed to Lord Vishnu with the utmost devotion. Brahma stood there in deep meditation. He heard a ringing voice within him. It was the voice of Lord Vishnu.

Brahma woke up from his meditation and addressed the other gods: ‘ ‘Listen to the words of Narayana which I heard in my meditation,” Brahma said to others,
“The Lord Vishnu is already aware of the distress of Mother Earth. He has decided to born on earth as the son of Devaki and Vasudeva. You are all to be born on earth in the Yadu clan to be His helpers as long as He remains there.” Hearing the words of Brahma, Mother Earth and all the gods were fully satisfied. The assurance of Lord Vishnu delighted them. All returned to their respective places.

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शुभ नववर्ष

ग्रंथों में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी १ रविवार था। हिन्दू नववर्ष अंग्रेजी माह के मार्च – अप्रैल में पड़ता है। इसी कारण भारत मे सभी शासकीय और अशासकीय कार्य तथा वित्त वर्ष भी अप्रैल (चैत्र) मास से प्रारम्भ होता है।

चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था। हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शरू होता है। इस दिन ग्रह और नक्षत्र मे परिवर्तन होता है। हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है।

पेड़-पोधों मे फूल,मंजर,कली इसी समय आना शुरू होते है, वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है। जीवो में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है। इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था। भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी इसी दिन हुआ था। नवरात्र की शुरुआत इसी दिन से होती है। जिसमे हमलोग उपवास एवं पवित्र रह कर नव वर्ष की शुरूआत करते है।

परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का ही रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया।

न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऎसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं श्रीराम रूप धारण कर उतर आए, श्रीराम का अवतार चैत्र शुक्ल नवमी को होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के ठीक नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी। यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है। संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है हमारा अपना नया साल विक्रम संवत्सर विक्रम संवत का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है।

कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चैत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत मेे ही काल गणना की शुरूआत मानी होगी।

चैत्र मास का वैदिक नाम है-मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त होता है चैत्र में। सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है, पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में।

चारों ओर पकी फसल का दर्शन, आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा गई।

नई फसल घर मे आने का समय भी यही है। इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है, जिससे पेड़ -पौधे, जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है। लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय गीत गुनगुनाने लगते है। गौर और गणेश कि पूजा भी इसी दिन से तीन दिन तक राजस्थान मे कि जाती है। चैत शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है, मेषार्क प्रवेश के दिन जो वार होता है वही संवत्सर का मंत्री होता है इस दिन सूर्य मेष राशि मे होता है।

नव वर्ष एक उत्सव की तरह पूरे विश्व में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग तिथियों तथा विधियों से मनाया जाता है। विभिन्न सम्प्रदायों के नव वर्ष समारोह भिन्न-भिन्न होते हैं और इसके महत्त्व की भी विभिन्न संस्कृतियों में परस्पर भिन्नता है।

भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। प्रायः ये तिथि मार्च और अप्रैल के महीने में पड़ती है। पंजाब में नया साल बैशाखी नाम से १३ अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलंडर के अनुसार १४ मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिळ नव वर्ष भी आता है। तेलगु नया साल मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग+आदि का अपभ्रंश) के रूप में मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नया साल विशु १३ या १४ अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल १५ जनवरी को नए साल के रूप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेंडर नवरेह १९ मार्च को होता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के रूप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड नया वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरूविजा नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है। गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है।लेकिन यह व्यापक नहीं है। अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नया साल पोहेला बैसाखी १४ या १५ अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नया साल होता है।


चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व :

1) इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।

2) सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।

3) प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है।

4) शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।

5) सिखो के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है।

6) स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया।

7) सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।

8) राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। विक्रम संवत की स्थापना की ।

9) युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।

10) संघ संस्थापक प.पू.डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिन।

11) महर्षि गौतम जयंती


भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व :

1) वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।

2) फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।

3) नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।


भारतीय नववर्ष कैसे मनाएँ :

1) हम परस्पर एक दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ दें। पत्रक बांटें , झंडे, बैनर….आदि लगावे ।

2) आपने परिचित मित्रों, रिश्तेदारों को नववर्ष के शुभ संदेश भेजें।

3) इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों पर भगवा पताका फेहराएँ।

4) आपने घरों के द्वार, आम के पत्तों की वंदनवार से सजाएँ।

5) घरों एवं धार्मिक स्थलों की सफाई कर रंगोली तथा फूलों से सजाएँ।

6) इस अवसर पर होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें अथवा कार्यक्रमों का आयोजन करें।

7) प्रतिष्ठानों की सज्जा एवं प्रतियोगिता करें। झंडी और फरियों से सज्जा करें।

8) इस दिन के महत्वपूर्ण देवताओं, महापुरुषों से सम्बंधित प्रश्न मंच के आयोजन करें।

9) वाहन रैली, कलश यात्रा, विशाल शोभा यात्राएं कवि सम्मेलन, भजन संध्या , महाआरती आदि का आयोजन करें।

10) चिकित्सालय, गौशाला में सेवा, रक्तदान जैसे कार्यक्रम।


कब तक मनायें नववर्ष

नववर्ष की पूर्व सन्ध्या से लेकर श्री रामनवमी के दिन तक एक दूसरे को मंगलकामनायें अवश्य दें।अशोक अष्टमी तो आठ अशोक कलिका खाने के लिए ही बनी है।यह नववर्ष का अंग दिवस है।

विगत शोक करे अशोक


श्री राम का मास है चैत्र। नवमी उनकी तिथि है। भगवती चण्डी उनकी आराध्या हैं।

आईये
श्रीरामको सिंहासनपर बैठायें।
नववर्ष का उल्लास बढायें।
आने वाले सम्वत्सर का एक एक दिन मंगलमय हो।
जय हो , विजय हो , सुजय हो ।।
नववर्ष मंगलमय हो।

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ललिता कुण्ड

सूर्यकुण्डसे पूर्व दिशामें हरे-भरे वनोंके भीतर एक बड़ा ही रमणीय सरोवर है। यह ललिताजीके स्नान करनेका स्थान है। कभी-कभी ललिताजी किसी छल-बहानेसे राधिकाको यहाँ लाकर उनका कृष्णके साथ मिलन कराती थीं। यह कुण्ड नन्दगाँवके पूर्व दिशामें है।

प्रसंग – एक समय कृष्णने श्रीमती राधिकाको देवर्षि नारदसे सावधान रहनेके लिए कहा। उन्होंने कहा- देवर्षि बड़े अटपटे स्वभावके ऋषि हैं। कभी-कभी ये बाप-बेटे, माता-पिता या पति-पत्नीमें विवाद भी करा देते हैं। अतः इनसे सावधान रहना ही उचित है। किन्तु श्रीमतीजीने इस बातको हँसकर टाल दिया।

एक दिन ललिताजी वनसे बेली, चमेली आदि पुष्पोंका चयनकर कृष्णके लिए एक सुन्दर फूलोंका हार बना रहीं थीं। हार पूर्ण हो जानेपर वह उसे बिखेर देतीं और फिरसे नया हार गूंथने लगतीं। वे ऐसा बार-बार कर रही थीं। कहीं वृक्षोंकी ओटसे नारदजी ललिताजीके हार गूंथनका दृश्य देख रहे थे। उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ। वे ललिताजीके पास पहुँचे और उनसे पुनः पुनः हारको गूंथने और बिखेरनेका कारण पूछा। ललिताजीने कहा कि मैं हार गूंथना पूर्णकर लेती हूँ तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह हार कृष्णके लिए या तो छोटा है, या बड़ा है। इसलिए मैं ऐसा कर रही हूँ। कौतुकी नारदजीने कहा-कृष्ण तो पास ही में खेल रहे हैं। अतः क्यों न उन्हें पास ही बिठाकर उनके गलेका माप लेकर हार बनाओ ? ऐसा सुनकर ललिताजीने कृष्णको बुलाकर कृष्णके अनुरूप सुन्दर हार गूंथकर कृष्णको पहनाया। अब कृष्ण ललिताजीके साथ राधाजीकी प्रतीक्षा करने लगे। क्योंकि श्रीमती राधिकाने ललितासे पहले ही ऐसा कहा था कि तुम हार बनाओ, मैं तुरन्त आ रही हूँ। किन्तु उनके आनेमें कुछ विलम्ब हो गया। सखियाँ उनका शृंगार कर रही थीं।

नारदजीने पहलेसे ही श्रीकृष्णसे यह वचन ले लिया था कि वे श्रीललिता और श्रीकृष्ण युगलको एक साथ झूले पर झूलते हुए दर्शन करना चाहते हैं। अतः आज अवसर पाकर उन्होंने श्रीकृष्णको वचनका स्मरण करा कर ललिताजीके साथ झूलेपर झूलनेके लिए पुनः पुनः अनुरोध करने लगे। नारदजीके पुनः पुनः अनुरोधसे राधिकाकी प्रतीक्षा करते हुए दोनों झूलेमें एकसाथ बैठकर झूलने लगे। इधर देवर्षि, ललिता-कृष्णकी जय हो, ललिता-कृष्णकी जय हो’, कीर्तन करते हुए श्रीमती राधिकाके निकट उपस्थित हुए। श्रीमती राधिकाने देवर्षि नारदजीको प्रणाम कर पूछा- देवर्षि! आज आप बड़े प्रसन्न होकर ललिता-कृष्णका जयगान कर रहे हैं। कुछ आश्चर्यकी बात अवश्य है। आखिर बात क्या है? नारदजी मुस्कुराते हुए बोले- ‘अहा ! क्या सुन्दर दृश्य है। कृष्ण सुन्दर वनमाला धारणकर ललिताजीके साथ झूल रहे हैं। आपको विश्वास न हो तो आप स्वयं वहाँ पधारकर देखें। परन्तु श्रीमतीजीको नारदजीके वचनोंपर विश्वास नहीं हुआ। मेरी अनुपस्थितिमें ललिताजीके साथ झूला कैसे सम्भव है? वे स्वयं उठकर आई और दूरसे उन्हें झूलते हुए देखा। अब तो उन्हें बड़ा रोष हुआ। वे लौट आई और अपने कुञ्जमें मान करके बैठ गईं। इधर कृष्ण राधाजीके आनेमें विलम्ब देखकर स्वयं उनके निकट आये। उन्होंने नारदजीकी सारी करतूतें बतलाकर किसी प्रकार उनका मान शान्त किया तथा उन्हें साथ लेकर झूलेपर झूलने लगे। ललिता और विशाखा उन्हें झुलाने लगीं। यह मधुर लीला यहीं पर सम्पन्न हुई थी। कुण्डके निकट ही झूला झूलनेका स्थान तथा नारद कुण्ड है।

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“फाल्गुन आयो रे”

हिन्दू पंचाग का आखिरी महीना होता है फाल्गुन, इसके बाद हिन्दू नववर्ष की शुरुआत होती है। हिन्दू पंचाग के अनुसार चैत्र पहला माह होता है और फाल्गुन आखिरी माह माना जाता है। इस माह में दो महत्वपूर्ण पर्व आते हैं जो हिन्दू धर्म में अपना खास महत्व रखते हैं। महाशिवरात्रि, इस दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है और होली, इस दिन होलिका दहन किया जाता है और अगली सुबह रंगों से होली खेली जाती है। फाल्गुन माह में ही चंद्र देव का जन्म माना जाता है, इस कारण से फाल्गुन में चंद्र देव का पूजन शुभ माना जाता है। इस माह में ऋतु में बड़ा परिवर्तन हो रहा होता, बसंत ऋतु के समय नए फूल आ रहे होते हैं जो प्रकृति को खूबसूरत बनाते हैं।

(ब्रज होली की सूची)


इस साल होली 19 मार्च को है। लेकिन ब्रज में होली का खुमार अभी से छाने लगा है। बरसाने की लट्ठमार होली देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। ब्रज भूमि में होली धूमधाम के साथ खेली जाती है। यहां दुनियाभर से लोग होली देखने आते हैं। होली से एक सप्ताह पहले ब्रज में विशेष प्रकार की होली खेलना शुरू हो जाती है। आइए जानते हैं कौन सी होली मनाई जाती है

लड्डू की होली:- इस दिन राधा रानी के गांव बरसाना में फाग आमंत्रण का उत्सव होता है और फिर लड्डू से होली खेली जाती है।

रंगीली गली में लट्ठमार होली:- रंगीली गली में बरसाना में ही नंदगांव के हुरयारों संग लट्ठमार होली खेली जाती है । बरसाने की लट्ठमार होली न सिर्फ देश में मशहूर है बल्कि पूरी दुनिया में भी काफी प्रसिद्ध है। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को बरसाने में लट्ठमार होली मनाई जाती है। नवमी के दिन यहां का नजारा देखने लायक होता है। यहां लोग रंगों, फूलों के अलावा डंडों से होली खेलने की परंपरा निभाते है।
बरसाना में राधा जी का जन्म हुआ था। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को नंदगांव के लोग होली खेलने के लिए बरसाना गांव जाते हैं। जहां पर लड़कियों और महिलाओं के संग लट्ठमार होली खेली जाती है। इसके बाद फाल्गुन शुक्ल की दशमी तिथि पर रंगों की होली खेली होती है।
लट्ठमार होली खेलने की परंपरा भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण अपने दोस्तों संग नंदगांव से बरसाना जाते हैं। बरसाना पहुंचकर वे राधा और उनकी सखियों संग होली खेलते हैं। इस दौरान कृष्णजी राधा संग ठिठोली करते है जिसके बाद वहां की सारी गोपियां उन पर डंडे बरसाती है।
गोपियों के डंडे की मार से बचने के लिए नंदगांव के ग्वाले लाठी और ढालों का सहारा लेते हैं। यही परंपरा धीरे-धीरे चली आ रही है जिसका आजतक पालन किया जा रहा है। पुरुषों को हुरियारे और महिलाओं को हुरियारन कहा जाता है। इसके बाद सभी मिलकर रंगों से होली का उत्सव मनाते है।


नंदगांव में लट्ठमार होली:- बरसाना के बाद अगले दिन नंदगांव में लट्ठमार होली का आयोजन किया जाता है।


फूलों की होली और रंगभरनी होली:- मथुरा के श्री द्वारकाधीश मंदिर में फूलों की होली खेली जाएगी तो वहीं वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में रंगभरनी होली खेली जाएगी।

छड़ीमार होली:- गोकुल में छड़ीमार होली का आयोजन होगा।


गुलाल की होली:- वृंदावन में अबीर और गुलाल से होली खेली जाएगी। यहां वृंदावन में रहने वाली विधवाएं रंगों वाली होली खेलेंगी।
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“होली श्यामा-श्याम की”

व्रज-बरसाने में श्री श्यामा-श्याम रस की होरी खेल रहे हैं। आज बरसाने में श्याम सुन्दर बन-ठन कर आये हैं। यह दोनों ललित हैं

श्री किशोरी जी जब चलती हैं तो कमर में लचक आती है। इन दोनों का रूप ऐसा है, जैसे चमकती हुई ज्योति।
जैसे हवा में दीपक की ज्योति चञ्चल होती है, ऐसे ही इन प्रिया-प्रियतम की लटें गालों पर आती हैं। श्री जी का मन नित्य लुटा हुआ है। दोनों ही चंचल और चपल हैं।
श्रीजी की नासिका में उलझ जाती हैं। श्री जी की लट क्या हैं ? मानो मछली फाँसने वाला काँटा।
जैसे काँटे के नीचे आटे की गोली लगा देते हैं और मछली आकर उसमे फँस जाती है वैसे ही श्रीजी की जो घुँघराली लट जो लटकी लट तो थी काँटा। जो मोती में उलझी वह था काँटे के आगे लगा आटा और मछली फँस गयी। मछली क्या था ? श्याम सुन्दर का मन।
अब होरी का खेल शुरू हुआ। चारों ओर सखियाँ और बीच में श्रीजी। यह गौर चाँद है। अब खेल शुरू होने से पहले सब सखियों ने मिल कर केसर वाला रंग घोला।
जब ठुमकता हुआ यह व्रज का छोरा आया तो, सुन्दर श्याम के बदन पर सोने की कटोरियों में रंग भर-भर के डाला।
श्री राधा और सखियाँ सब उल्लास से विभोर हो गयीं। श्रीजी के और सखियों के हाथ में पिचकारियाँ हैं। निशाना लगा-लगा कर सब श्याम सुन्दर के मुख पर गुलाल छोड़ रही हैं।
कई सखियों ने तो श्याम सुन्दर के हाथ पकड़े और कुछ ने उनके मुख पर रंग मल दिया। श्याम सुन्दर का मुख लाल हो गया।
श्याम सुन्दर ने देखा कि किशोरी जी सखियों के संग प्रसन्न मन हैं, तो श्याम सुन्दर को शरारत सूझी, होरी में नटखटपन न हो तो होरी काहे की ?
गुलाल के खेल में जब श्यामसुन्दर हारने लगे तो नटखटपन करने लगे। नजर बचाकर श्रीजी को रंग की पिचकारी मार दी।
श्रीजी बहुत चतुर हैं, वे जानती हैं कि यह हारेंगे तो कोई-न-कोई नटखटपन जरूर करेंगे। यह 16 कला सम्पूर्ण हैं तो श्रीजी 64 कला सम्पूर्ण।
श्यामसुन्दर ने जैसे ही पिचकारी मारी श्रीजी ने बाएँ हाथ से रंग की धार को रोक दिया।
श्यामसुन्दर ने ताक कर मौका देखकर पिचकारी तो ऐसे ही मारी थी कि श्रीजी को रंग से ऊपर से नीचे तक तर-बतर कर देंगे, पर श्री जी होरी की बड़ी खिलाड़ी हैं।
सारी धारा को तो श्रीजी ने बाएँ हाथ से रोक दिया पर फिर भी कुछ छींटे श्री जी के गोर-कपोलों पर लग गए जैसे अमरूद पर लाल छींटे पर जाते हैं। तो बहुत अच्छे लगते हैं।
यह देखकर श्याम सुन्दर के ह्रदय में आनन्द का सिन्धु लहरा उठा यही ह्रदय की उमंग और उल्लास ही तो होरी है।
जब श्याम-सुन्दर के ह्रदय में आनन्द का सागर लहराया उसी उमंग और उल्लास से श्रीराधा और सखियों को श्याम सुन्दर ने रंग से रंग दिया।
अब जो रंग से भरा संग्राम मचा। श्री प्रिया-प्रियतम के सौन्दर्य की क्या उपमा दी जा सकती है। मानस नेत्रों से हम दर्शन करें और अपने ह्रदय में बसन्त की होरी की उमंग ओर उल्लास भर लें। फिर देखें, बरसाने में होरी का उल्लास।
जब ह्रदय में उल्लास छा गया तब श्री जी-प्रियतम नृत्य करने के लिये उद्यत हुए। कोई सखी के मृदंग सम्भाल ली, किसी ने तबला किसी ने ढोलकी अनन्त वाद्य बजने लगे।
सभी नृत्य कर-कर के राग गाने लगे। अबीर की सभी ने झोलियाँ भर लीं और क्या पुकार रहे हैं-

हो-हो होरी है।
ऐरी सखी चल बरसाने। चलो बरसाने खेलें होरी।
मैं तो बरसाने में जाऊँ मेरी वीर, नाय माने मेरा मनुवा॥

होली प्रसंग (श्रीगर्ग- संहिता)

वीतिहोत्र, अग्निभुक्, साम्बु, श्रीकर, गोपति, श्रुत, व्रजेश, पावन तथा शान्त– ये व्रज में उत्पन्न हुए नौ उपनन्दों के नाम हैं।
ये सब-के-सब धनवान, रूपवान, पुत्रवान बहुत-से शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले, शील-सदाचारादि गुणों से सम्पन्न तथा दान परायण हैं।
इनके घरों में देवताओं की आज्ञा के अनुसार जो कन्याएँ उत्पन्न हुई, उनमें से कोई दिव्य, कोई अदिव्य तथा कोई त्रिगुणवृत्ति वाली थीं।
ये सब नाना प्रकार के पूर्वकृत पुण्यों के फलस्वरूप भूतलपर गोपकन्याओं के रूप में प्रकट हुई थीं। ये सब श्रीराधिका के साथ रहने वाली उनकी सखियाँ थी।
एक दिन की बात है, होलिका-महोत्सव पर श्रीहरि को आया हुआ देख उन समस्त व्रज गोपिकाओं ने मानिनी श्रीराधा से कहा-
रम्भोरू ! चन्द्रवदने ! मुध-मानिनि ! स्वामिनि ! ललने ! श्रीराधे ! हमारी यह सुन्दर बात सुनो।
ये व्रजभूषण नन्दनन्दन तुम्हारी बरसाना नगरी के उपवन में होलिकोत्सव विहार करने के लिये आ रहे हैं।
शोभा सम्पन्न यौवन के मद से मत्त उनके चंचल नेत्र घूम रहे हैं। घुँघराली नीली अलकावली उनके कंधों और कपोलमण्डल को चूम रही है।
शरीर पर पीले रंग रेशमी जामा अपनी घनी शोभा बिखेर रहा है। वे बजते हुए नूपुरों की ध्वनि से युक्त अपने अरूण चरणाविन्दों द्वारा सबका ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं।
उनके मस्तक पर बालक रवि के समान कान्तिमान मुकुट है। वे भुजाओं में विमल अंगद, वक्ष:स्थल पर हार और कानों में विद्युत को भी विलज्जित करने वाले मकराकार कुण्डल धारण किये हुए हैं।
इस भूमण्डल पर पीताम्बर की पीत प्रभा से सुशोभित उनके श्याम कान्ति मण्डल उसी प्रकार उत्कृष्ट शोभा पा रहा है, जैसे आकाश में इन्द्रधनुष से युक्त मेघ मण्डल सुशोभित होता है। अबीर और केसर के रस से उनका सारा अंग लिप्त है।
उन्होंने हाथ में नयी पिचकारी ले रखी है तथा सखि राधे ! तुम्हारे साथ रासरंग की रसमयी क्रीड़ा में निमग्न रहने वाले वे श्याम सुन्दर तुम्हारे शीघ्र निकलने की राह देखते हुए पास ही खडे़ है।
तुम भी मान छोड़कर फगुआ (होली) के बहाने निकलो। निश्चय ही आज होलिका को यश देना चाहिये और अपने भवन में तुरंत ही रंग-मिश्रित जल, चन्दन के पंख और कमकरन्द (इत्र आदि पुष्परस) का अधिक मात्रा में संचय कर लेना चाहिये।
परम बुद्धिमति प्यारी सखी ! उठो और सहसा अपनी सखीमण्डल के साथ उस स्थान पर चलो, जहाँ वे श्याम सुन्दर भी मौजूद हों। ऐसा समय फिर कभी नहीं मिलेगा। बहती धारा में हाथ धो लेना चाहिये- यह कहावत सर्वत्र विदित है।
तब मानवती राधा मान छोड़कर उठीं और सखियों के समूह से घिरकर होली का उत्सव मनाने के लिये निकलीं।
चन्दन, अगर, कस्तुरी, हल्दी तथा केसर के घोल से भरी हुई डोलचियाँ लिये वे बहुसंख्यक व्रजांगनाएँ एक साथ होकर चलीं।
रँगे हुए लाल-लाल हाथ, वासन्ती रंग के पीले वस्त्र, बजते हुए नूपूरों से युक्त पैर तथा झनकारती हुई करधनी से सुशोभित कटिप्रदेश बड़ी मनोहर शोभा थी उन गोपाङ्गनाओं की। वे हास्ययुक्त गलियों से सुशोभित होली के गीत गा रही थीं।
अबीर-गुलाल के चूर्ण मुठ्ठियों में ले-लेकर इधर-उधर फेंकती हुई वे व्रजाङ्गनाओं भूमि, आकाश और वस्त्र को लाल किये देती थीं।
वहाँ अबीर की करोड़ों मुठ्ठियाँ एक साथ उड़ती थीं। सुगन्धित गुलाल के चूर्ण भी कोटि-कोटि हाथों से बिखेरे जाते थे।
इसी समय व्रजगोपियों ने श्रीकृष्ण को चारों ओर से घेर लिया, मानों सावन की साँझ में विद्युन्मालाओं ने मेघ को सब ओर से अवरूद्ध कर लिया हो पहले तो उनके मुँह पर खूब अबीर और गुलाल पोत दिया, फिर सारे अङ्गों पर अबीर-गुलाल बरसाये तथा केसर युक्त रंग से भरी डोलचिायों द्वारा उन्हें विधिपूर्वक भिगोया।
वहाँ जितनी गोपियाँ थी, उतने ही रूप धारण करके भगवान भी उनके साथ विहार करते रहे।
वहाँ होलिका महोत्सव में श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ वैसी ही शोभा पाते थे, जैसे वर्षाकाल की संध्या-वेला में विद्युन्माला के साथ मेघ सुशोभित होता है।
श्रीराधा ने श्रीकृष्ण के नेत्रों में काजल लगा दिया। श्रीकृष्ण ने भी अपना नया उत्तरीय (दुपट्टा) गोपियों को उपहार में दे दिया। फिर वे परमेश्वर श्रीनन्दभवन को लौट गये। उस समय समस्त देवता उनके ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे

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राधा रानी का पोशाक

बरसाने में एक संत किशोरी जी का बहुत भजन करते थे और रोज ऊपर दर्शन करने जाते थे राधा रानी के महल में। बड़ी निष्ठा, बड़ी श्रद्धा थी किशोरी जी के चरणों में उन संत की।

एक बार उन्होंने देखा की भक्त राधा रानी को बरसाने मन्दिर में पोशाक अर्पित कर रहे थे। उन महात्मा जी के मन में भाव आया की मैंने आज तक किशोरी जी को कुछ भी नहीं चढ़ाया, और लोग आ रहे हैं तो कोई फूल चढ़ाता है, कोई भोग लगाता है, कोई पोशाक पहनाता है, और मैंने कुछ भी नही दिया, अरे मैं कैसा भक्त हूँ। तो उन महात्मा जी ने उसी दिन निश्चय कर लिया की मैं अपने हाथों से बनाकर राधा रानी को सुन्दर सी एक पोशाक पहनाऊँगा। ये सोचकर उसी दिन से वो महात्मा जी तैयारी में लग गए और बहुत प्यारी सुंदर सी एक पोशाक बनाई, पोशाक तैयार होने में एक महीना लगा। कपड़ा लेकर आयें, अपने हाथों से गोटा लगाया और बहुत प्यारी पोशाक बना ली। पोशाक जब तैयार हो गई तो वो पोशाक अब लेकर ऊपर किशोरी जी के चरणों में अर्पित करने जा रहा थे।

बरसाने की तो सीढियाँ हैं काफी ऊँची तो वो महात्मा जी उपर चढ़कर जा रहे हैं। अभी महात्मा आधी सीढियों तक ही पहुँचे होंगे की तभी बरसाने की एक छोटी सी लड़की उस महात्मा जी को बोलती है कि बाबा ये कहाँ ले जा रहे हो आप ? आपके हाथ में ये क्या है ? वो महात्मा जी बोले की लाली ये मै किशोरी जी के लिए पोशाक बना के उनको पहनाने के लिए ले जा रहा हूँ। वो लड़की बोली अरे बाबा राधा रानी पे तो बहुत सारी पोशाक हैं, तो ये पोशाक मेरे को दे दो ना ? महात्मा जी बोले की बेटी तुझे मैं दूसरी बाजार से दिलवा दूँगा ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जा रहा हूँ। लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया। बाबा ये मेरे को दे दे, पर सन्त भी जिद करने लगे की दूसरी दिलवाऊँगा ये नहीं दूँगा लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी, की संत के हाथ से छुड़ाकर पोशाक ले भागी।

महात्मा जी बहुत दुखी हो गए, बूढ़े महात्मा जी अब कहाँ ढूंढे उसको तो वही सीढ़ियों पर बैठकर रोने लगे। जब कई संत मंदिर से निकले तो पूछा महाराज क्यों रो रहे हो ? तो सारी बात बताई की जैसे-तैसे तो बुढ़ापे में इतना परिश्रम करके ये पोशाक बनाकर लाया राधा रानी को पहनाता पर उससे पहले ही एक छोटी सी लाली लेकर भाग गई तो क्या करुँ मै अब ? बाकी संत बोले अरे अब गई तो गई कोई बात नहीं अब कब तक रोते रहोगे चलो ऊपर दर्शन कर लो। रोना बन्द हुआ लेकिन मन खराब था क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई तो अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थे और मन में ये ही सोच रहे है की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थी , शायद राधा रानी मेरे हाथो से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थी, ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे है।

महात्मा जी अन्दर जाकर खड़े हुए दर्शन खुलने का समय हुआ और जैसे ही श्री जी का दर्शन खुला, पट खुले तो वो महात्मा क्या देख रहें है की जो पोशाक वो बालिका लेकर भागी थी उसी वस्त्र को धारण करके किशोरी जी बैठी हैं। ये देखते ही महात्मा की आँखों से आँसू बहने लगे और महात्मा बोले कि किशोरी जी मैं तो आपको देने ही ला रहा था लेकिन आपसे इतना भी सब्र नहीं हुआ मेरे से छीनकर भागीं आप तो। किशोरी जी ने कहा- ‘बाबा ! ये केवल वस्त्र नहीं, ये केवल पोशाक नहीं है या में तेरो प्रेम छुपो भयो है और प्रेम को पाने के लिए तो दौड़ना ही पड़ता है, भागना ही पड़ता है।
हमारी राधा रानी ऐसी प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं। प्रेम की अद्भुत परिभाषा हैं श्री किशोरीजी।

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“भक्ता श्रीवारमुखीजी”

एक वेश्या भक्ता थी। उसका घर धन-सम्पति से भरा था परन्तु वह किसी काम का न था, क्योंकि भक्त भगवान की सेवा में नहीं आ रहा था। एक दिन एक विशाल सन्त मंडली रास्ते-रास्ते जा रही थी। सायंकाल हो रहा था, विश्राम योग्य स्थान की आवश्यकता थी। वेश्या के घर के सामने छाया युक्त, स्वच्छ सुन्दर स्थान देखकर संतों के मनको अच्छा लगा। सभी ने यत्र-तत्र अपने ठाकुर पधरा दिये, आसन लगा लिये। अच्छी ठौर देखकर ठहर गए, उनके मन में धन का लोभ कदापि न था। इतने में ही वह वेश्या आभूषणों से लदी हुई बाहर द्वार पर आई। हंसों के समान स्वच्छ चित्त वाले दर्शनीय सन्तों को देखकर वह मन में विचारने लगी- आज मेरे कौनसे भाग्य उदय हो गए ? जो यह सन्त गण मेरे द्वार पर विराज गये। निश्चय ही इन्हें मेरे नाम या जाति का पता नहीं है। इस प्रकार वह सोच विचार कर घर में गई और एक थाल में मुहरें भरकर ले आई। उसे महंतजी के आगे रखकर बोली- ‘प्रभो ! इस धन से आप अपने भगवान का भोग लगाइये।’ प्रेमवश उसकी आँखों में आँसू आ गये।

मुहरें भेंट करती देख कर श्रीमहन्तजी ने पूछा- ‘तुम कौन हो, तुम्हारा जन्म किस कुल में हुआ है ?’ इस प्रश्न को सुनकर वह वेश्या चुप हो गई। उसके चित्त में बड़ी भारी चिंता व्याप्त हो गई। उसे चिन्तित देख कर श्रीमहन्तजी ने कहा कि तुम नि:शंक हो कर सच्ची बात खोल कर कह दो, मन में किसी भी प्रकार की शंका न करो। तब वह बोली ‘मैं वेश्या हूँ’, ऐसा कहकर वह महन्तजी के चरणों में गिर पड़ी। फिर सँभलकर प्रार्थना की- ‘प्रभो ! धन से भण्डार भरा हुआ है। आप कृपा कर इसे स्वीकार कीजिये। यदि आप मेरी जाति का विचार करेंगे और धन को नहीं लेंगे, तब तो मुझे मरी हुई समझिये, मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।’ तब श्रीमहन्तजी ने कहा- ‘इस धन को भगवान की सेवा में लगाने का बस यही उपाय मेरे हाथ में है और वह यह कि- इस धन के द्वारा श्रीरंगनाथजी का मुकुट बनवाकर उन्हें अर्पण कर दो। इसमें जाति बुद्धि दूर हो जायगी। श्रीरंगनाथ जी इसे स्वीकार करेंगे।’ वेश्या बोली- ‘भगवन् ! जिसके धन को ब्राह्मण छूते तक नहीं हैं, उसके द्वारा अर्पित मुकुट को श्रीरंगनाथजी कैसे स्वीकार करेंगे ?’ महन्तजी ने कहा- ‘हम तुम्हें विश्वास दिलाते हैं कि वे अवश्य ही तुम्हारी सेवा स्वीकार करेंगे। इस कार्य के लिए हम तब तक यहीं रहेंगे, तुम मुकुट बनवाओ।’

वेश्या ने अपने घर का सब धन लगाकर सुन्दर मुकुट बनवाया। अपना श्रृंगार करके थाल में मुकुट को रखकर वह चली। सन्तों की आज्ञा पाकर वह वेश्या नि:संकोच श्रीरंगनाथजी के मन्दिर में गई, पर अचानक ही सशंकित हो कर लौट पड़ी, अपने को धिक्कारने लगी क्योंकि उसे संयोगवश मासिक-धर्म हो गया था वह अपवित्र हो गई थी। सन्तों ने संकोच का कारण पूछा। उसने बताया कि- ‘मैं अब जाने योग्य नहीं हूँ।’ तब भक्तवत्सल श्रीरंगनाथजी ने वेश्या की दैन्यता एवं प्रेम को देख कर अपने पुजारियों को आज्ञा दी- ‘इसे ले आओ और यह अपने हाथ से हमें मुकुट पहनावे।’ ऐसा ही किया गया, जैसे ही उसने हाथ में मुकुट लेकर पहनाना चाहा, वैसे ही श्रीरंगनाथजी ने अपना सिर झुका दिया और मुकुट को धारण कर लिया। इस चरित्र से भक्त-भगवान की मति रीझ गई। पतित-पावनता देख कर लोग भक्त-भगवान की जय-जयकार करने लगे। भक्तवत्सल भगवान की जय हो।

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पूर्व के पापो से कैसे झुटकारा मिले ?

प्र०-महाराज जी, जाने-अनजाने में हमसे जो पूर्व में दुष्कर्म हुए हैं, मुझे बार-बार वही याद आते हैं और उनको याद कर-करके मैं बड़ा दुःखी होता हूँ, अतः इस स्थिति में मैं क्या करूँ ?

समाधान – हमारा प्रत्येक क्षण श्रीप्रियाप्रियतम के चिंतन में जाना – चाहिए, जो हो चुका है हमें न उसका चिंतन करके शोक करना है ‘गतं न शोचामि’, और भविष्य में क्या होगा, दुर्गात होगी कि सद्गति होगी, प्रभु मिलेंगे कि नहीं मिलेंगे – न उसकी चिंता करनी है ।

हमें वर्तमान सम्भालना है। हमारा जो वर्तमान है उसका हर क्षण प्रियालाल के चिंतन में बीते, फिर चाहे जब शरीर छूट जाए समझलो आपका काम हो गय । श्रीगीताजी में लिखा है – अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुत्तवा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ (८/५)

हम हर क्षण प्रभु का चिंतन करते रहें, पता नहीं कौन-सा क्षण हमारा अंतिम है; यदि प्रभु का चिंतन करते हुए शरीर छूटेगा तो निश्चित भगवत्प्राप्ति होगी । हम भविष्य में भजन कर लेंगे ये आशा नहीं रखनी है, जो समय बीत चुका न उसके विषय में सोचना है । बस, वर्तमान का एक क्षण भी हमारा चिंतन से रहित न जाय; समझ लो आज ही हम मुक्त हो गए । श्रीमद्भागवत में कपिल भगवान् ने भी कहा –

चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम् ।

गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ॥ (३/२५/१५)

‘मन का सतत् भगवच्चिन्तन करना यही मोक्ष का स्वरूप है और शरीर-संसार का चिंतन करना यही बंधन का स्वरूप है।’

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । (ब्रह्मविन्दुपनिषद्)

‘मनुष्यों का मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है ।”

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धीर- समीर

श्रीयमुनाजीके तटपर रासलीला स्थली वंशीवटके समीप ही यह स्थान वर्तमान है। यह श्रीराधाकृष्ण युगलके नित्य निकुञ्ज केलिविलासका स्थान है। युगल केलिविलासका दर्शनकर समीर भी धीर स्थिर हो जाता था। वह एक कदम भी आगे बढ़नेमें असमर्थ हो जाता था। इसलिए इस स्थानका

नाम धीर-समीर पड़ा है। धीर- समीरका कुञ्ज और देवालय नित्यानन्द प्रभुके ससुर, जाहवा एवं वसुधाके पिता सूर्यदास सरखेलके छोटे भ्राता श्रीगौरीदास पण्डितके द्वारा स्थापित हैं। श्रीगौरीदास पण्डित श्रीमन् महाप्रभुजीके प्रधान परिकरोंमेंसे एक हैं। उन्होंने अपने जीवनके अंतिम समयमें वृन्दावन आकर धीर-समीर कुञ्जकी स्थापना की और वहीं पर अपने आराध्यदेव श्रीश्यामरायकी सेवा पूजा आरंभकी। यहींपर उनकी भजन एवं समाधिस्थली भी विद्यमान है। प्रसिद्ध वैष्णव पदकर्ता श्रीजयदेव गोस्वामीने अपने प्रसिद्ध पदमें

धीरसमीरे यमुनातीरे वसति वने वनमाली ।
गोपीपीन पयोधरमर्दन चञ्चलकरयुगशाली ।।

(श्रीगीतगोविन्द)

जिस कुञ्जका उल्लेख किया है, वह यही केलिवट धीर समीर
कुञ्ज है। श्रीवक्रेश्वर पण्डित श्रीमन् महाप्रभुजीके प्रसिद्ध परिकरोंमेंसे एक हैं। वे अपने अंतिम समयमें कृष्णविरहमें इतने व्याकुल हो गये कि लौकिक लोगोंके लिए उनका पार्थिव शरीर छूट गया। कुछ दिनोंके पश्चात् उनके प्रिय शिष्य श्रीगोपालगुरु भी अप्रकट लीलामें प्रविष्ट हो गये। गोपालगुरुके प्रियशिष्य ध्यानचन्द गोस्वामी भी परम रसिक एवं विद्वान भक्त हुए हैं। उनके समयमें राजकर्मचारी राधाकान्त मठ तथा उसके अन्तर्गत हरिदास ठाकुरकी भजन कुटीमें कुछ अत्याचार करने लगे। इससे वे बड़े मर्माहत हुए। उसी समय उन्हें वृन्दावनके किसी वैष्णवने यह समाचार दिया कि अरे! तुम इतने चिन्तित क्यों हो रहे हो? तुम्हारे परमगुरु श्रीवक्रेश्वर गोस्वामीको हमने धीर-समीरमें भजन करते हुए देखा है। तुम उनके पास चले जाओ। वे सारी व्यवस्था ठीक कर देंगे। ऐसा सुनकर वे बड़े आह्लादित हुए और उन्होंने तत्क्षणात् पैदल ही वृन्दावनके लिए यात्रा की। कुछ दिनोंमें वे श्रीवृन्दावनमें पहुँचे। धीर समीरमें प्रवेश करते ही वे आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने देखा कि श्रीवक्रेश्वर पण्डित हाथमें नामकी माला लिये हुए भाव विभोर होकर नाम सङ्कीर्तन कर रहे थे। लीला स्मृतिके कारण उनके नेत्रोंसे निरन्तर अश्रुप्रवाह विगलित हो रहा था। श्रीध्यानचन्दजी लकुटिकी भाँति उनके चरणों में गिरकर रोने लगे और उनसे पुरी धाममें लौट चलनेका आग्रह करने लगे। वक्रेश्वर पण्डितने साक्षात् रूपसे जानेके लिए मना तो किया, किन्तु बोले- तुम निश्चिन्त मनसे पुरी लौट जाओ। राजकर्मचारियोंका उपद्रव सदाके लिए बंद हो जायेगा। उनके आदेशसे ध्यानचन्द गोस्वामी पुरीमें राधाकान्त मठमें लौटे। राजकर्मचारियोंने अपने कृत्यके लिए उनसे पुनः पुनः क्षमा मांगी। यह वही धीर समीर है, जहाँ श्रीध्यानचन्द गोस्वामीने अप्रकट हुए श्रीवक्रेश्वर पण्डितका साक्षात् दर्शन किया था। इन सब लीलाओंको अपने हृदयमें संजोये हुए भक्तोंको आनन्दित करने वाला धीर समीर आज भी विराजमान है।

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“भक्ता सखूबाई”

महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के किनारे करहाड़ नामक एक स्थान है, वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। उसके घर में चार प्राणी थे- ब्राह्मण, उसकी स्त्री, पुत्र और साध्वी पुत्रवधू। ब्राह्मण की पुत्रवधू का नाम था ‘सखूबाई’।
सखूबाई जितनी अधिक भक्त, आज्ञा कारिणी, सुशील, नम्र और सरल हृदय थी उसकी सास उतनी ही अधिक दुष्टा, अभिमानी, कुटिला और कठोर हृदय थी। पति व पुत्र भी उसी के स्वभाव का अनुसरण करते थे। सखूबाई सुबह से लेकर रात तक बिना थके-हारे घर केे सारे काम करती थी। शरीर की शक्ति से अधिक कार्य करने के कारण अस्वस्थ रहती, फिर भी वह आलस्य का अनुभव न करके इसे ही अपना कर्तव्य समझती। मन ही मन भगवान् के त्रिभुवन स्वरूप का अखण्ड ध्यान और केशव, विठ्ठल, कृष्ण गोविन्द नामों का स्मरण करती रहती।
दिन भर काम करने के बाद भी उसे सास की गालियाँ और लात-घूंसे सहन करने पड़ते। पति के सामने दो बूँद आँसू निकालकर हृदय को शीतल करना उसके नसीब में ही नहीं था। कभी-कभी बिना कुसूर के मार गालियों की बौछार उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थीं, परन्तु अपने शील स्वभाव के कारण वह सब बातें पल में ही भूल जाती। इतना होने पर भी वह इस दुःख को भगवान् का आशीर्वाद समझकर प्रसन्न रहती और सदा कृतज्ञता प्रकट करती कि मेरे प्रभु की मुझ पर विशेष कृपा है। जो मुझे ऐसा परिवार दिया वरना सुखों के बीच में रहकर मैं उन्हें भूल जाती और मोह वश माया जाल में फँस जाती।
एक दिन एक पड़ोसिन ने उसकी ऐसी दशा को देखकर कहा- ‘‘क्या तेरे पीहर में कोई नहीं है जो तेरी खोज ख़बर ले’। उसने कहा ‘‘मेरा पीहर पण्ढ़रपुर है, मेरे माँ-बाप रुक्मिणी-कृष्ण हैं। एक दिन वे मुझे अपने पास बुलाकर मेरा दुःख दूर करेंगे।’’
सखूबाई घर के काम ख़त्म कर कृष्णा नदी से पानी भरने गयी, तभी उसने देखा कि भक्तों के दल नाम-संकीर्तन करते हुए पण्ढ़रपुर जा रहे हैं। एकादशी के दिन वहाँ बड़ा भारी मेला लगता है। उसकी भी पण्ढ़रपुर जाने की प्रबल इच्छा हुई पर घरवालों से आज्ञा का मिलना असम्भव जान कर वह इस संत मण्डली के साथ चल दी। यह बात एक पड़ोसिन ने उसकी सास को बता दी।
माँ के कहने पर पुत्र घसीटते हुए सखू को घर ले आया और उसे रस्सी से बाँध दिया, परन्तु सखू का मन तो प्रभु के चरणों में ही लगा रहा। वह प्रभु से रो-रोकर दिन-रात प्रार्थना करती रही, क्या मेरे नेत्र आपके दर्शन के बिना ही रह जायेंगे ? कृपा करो नाथ ! मैंने अपने को तुम्हारे चरणों मे बाँधना चाहा था, परन्तु बीच में यह नया बंधन कैसे हो गया ? मुझे मरने का डर नहीं है पर सिर्फ एक बार आपके दर्शन की इच्छा है। मेरे तो माँ-बाप, भाई, इष्ट-मित्र सब कुछ आप ही हो, मैं भली-बुरी जैसी भी हूँ, तुम्हारी हूँ।
सच्ची पुकार को भगवान् अवश्य सुनते हैं और नकली प्रार्थना का जवाब नहीं देते। असली पुकार चाहे धीमी हो, वह उनके कानों तक पहुँच जाती है। सखू की पुकार को सुनकर भगवान् एक स्त्री का रूप धारण कर उसके पास आकर बोले- “मैं तेरी जगह बँध जाऊँगी, तू चिन्ता मत कर।” यह कहकर उन्होंने सखू के बंधन खोल दिये और उसे पण्ढ़रपुर पहुँचा दिया।
इधर सास-ससुर रोज उसके पास जाकर खरी-खोटी सुनाते, वे सब सह जाती। जिनके नाम स्मरण मात्र से माया के दृढ़ बन्धन टूट जाते हैं, वे भक्त के लिए सारे बंधन स्वीकार करते हैं। आज सखू बने भगवान् को बँधे दो हफ्ते हो गये, उसकी ऐसी दशा देखकर पति का हृदय पसीज गया। उसने सखू से क्षमा माँगी और स्नान कर भोजन के लिए कहा। आज प्रभु के हाथ का भोजन कर सबके पाप धुल गये।
उधर सखू यह भूल गयी कि उसकी जगह दूसरी स्त्री बँधी है। उसका मन वहाँ ऐसा लगा कि उसने प्रतिज्ञा की कि शरीर में जब तक प्राण हैं, वह पण्ढ़रपुर में ही रहेगी। प्रभु के ध्यान में उसकी समाधि लग गयी और शरीर अचेत हो जमीन पर गिर पड़ा। गाँव के लोगों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया।
माता रुक्मिणी को चिन्ता हुई कि मेरे स्वामी सखू की जगह पर बहू बने हैं। उन्होंने शमशान पहुँचकर सखू की अस्थियों को एकत्रित कर उसे जीवित किया और सब स्मरण कराकर करहड़ जाने की आज्ञा दी।
करहड़ पहुँचकर जब वह स्त्री बने प्रभु से मिली तो उसने क्षमा-याचना की। जब घर पहुँची तो सास-ससुर के स्वभाव में परिवर्तन देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। दूसरे दिन एक ब्राह्मण सखू के मरने का समाचार सुनाने करहड़ आया और सखू को काम करते देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सखू के ससुर से कहा- ‘‘तुम्हारी बहू तो पण्ढ़रपुर में मर चुकी थी।” पति ने कहा- ’’सखू तो पण्ढ़रपुर गयी ही नहीं, तुम भूल से ऐसा कहते हो।”
जब सखू से पूछा तो उसने सारी घटना सुना दी। सभी को अपने कुकृत्यों पर पश्चाताप हुआ। अब सब कहने लगे कि निश्चित ही वे साक्षात् लक्ष्मीपति थे, हम बड़े ही नीच और भक्ति हीन हैं। हमने उनको न पहचानकर व्यर्थ ही बाँधे रखा और उन्हें न मालूम कितने क्लेश दिये।
अब तीनों के हृदय शुद्ध हो चुके थे और उन्होंने सारा जीवन प्रभु भक्ति में लगा दिया। प्रभु अपने भक्तों के लिए क्या कुछ नहीं करते।

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क्या सब शास्त्रों को पढ़ना आवश्यक है ?

प्र०-महाराज जी, ज्ञान-प्राप्ति के लिए क्या सब शास्त्रों को पढ़ना आवश्यक है ?

समाधान – सतत् नामजप और प्रभु की शरणागति से ज्ञान-विज्ञान स्वतः (अपने-आप ) हृदय में स्फुरित हो जाता है; जैसे- महर्षि वाल्मीकि जी को ‘मरा-मरा जपने से ऐसा ज्ञान प्रकट हुआ कि उन्हें रामोपासना का सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ ‘वाल्मीकि रामायण’ की रचना की योग्यता प्राप्त हो गयी ।

इसी तरह अर्जुन को पूर्ण शरणागति

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’

से सर्वोपनिषद् सार गीता के दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई । भगवन्नाम में इतनी सामर्थ्य है कि कभी कोई ‘क-ख-ग’ भी न पढ़ा हो, जिसने कभी स्कूल न देखा हो, अगर ऐसा व्यक्ति भी निरंतर अभ्यास से नामाकार वृत्ति कर ले तो चारों वेद बोलने की सामर्थ्य उसके अन्दर आ जायेगी; सारे वेद उसके अन्तःकरण में स्फुरित हो जायँगे ये लौकिक पढ़ाई उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि ‘नामजप’ । श्रीकबीरदासजी ने एक पद में कहा है.

“तू तो राम सुमिर जग लड़वा दे।”
“कोरा कागज काली स्याही जगत पढ़त वाको पढ़वा दे।”

सतत् नामजप से विशुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हो जायेगी, विशुद्ध ज्ञान का फल है – शरीर-संसार से पूर्ण वैराग्य हो जाना और श्यामा श्याम में प्रेम हो जाना । गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं

संयम नियम फूल फल ग्याना ।

हरिपद रति रस वेद बखाना ॥

(श्रीरामचरितमानस १/५)

‘संयम और नियम ये फूल हैं, उन फूलों का फल है ज्ञान और प्रभु के चरणों में प्रेम हो जाना यह ज्ञानरूपी फल का रस है ।”

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हरि नंगमनंगा

श्रीकृष्ण को जिस प्रकार का श्रृंगार धारण कराया जाता था, बाह्य दृष्टिहीन होने के उपरान्त भी, भक्ति के पर्याय श्रीसूरदास जी, श्री ठाकुर जी के श्रृंगार का ज्यों का त्यों वर्णन, उसी समय अपना पद गाते हुये कर देते थे।

गुसाँई जी के शिष्य श्री गिरधरजी से तीनों बालकों (श्री गोविन्दरायजी, श्री बालकृष्णजी और श्री गोकुलनाथजी) ने सूरदास जी के दृष्टि हीन होने के विषय में, संशयवश कहा कि हम श्री नवनीतप्रियजी (श्रीकृष्णजी) को जो भी श्रृंगार धराते हैं, सूरदासजी वैसे का वैसा ही उनके वस्त्र व आभूषणों का वर्णन करते हैं। आज कुछ ऐसा अद्भुत अनोखा श्रृंगार करें कि सूरदासजी पहचान ही नहीं पायें।

श्री गिरधरजी ने समझाते हुये उत्तर दिया कि–’सूरदास जी भगवदीय है और इनके हृदय में स्वरूपानन्द का अनुभव है। तुम जो भी श्रृंगार करोगे वो उसी भाव का वर्णन अपने पदों में ज्यों का त्यों कर देंगें, अतः भगवदीय की परीक्षा नहीं करनी चाहिए।’

तब भी तीनों बालकों ने कहा–’फिर भी हमारा मन है अतः हम अपना संशय दूर करने के लिए कल ठाकुरजी को अद्भुत श्रृंगार धारण करायेगें।’

अगले दिन प्रातः तीनों बालक श्रीठाकुर जी के मन्दिर में पधारे, सर्वप्रथम सेवा में नहाये, तदोपरान्त श्री ठाकुरजी को जगाकर भोग धरे, मंगलभोग धरे, ततपश्चात ठाकुरजी को नहला कर श्रृंगार धारण कराना प्रारम्भ किया।

ज्येष्ठ मास था, ऊष्णकाल के दिन थे और कुछ अलग भी करना था। अतः उन्होनें ठाकुरजी को वस्त्र धारण ही नहीं कराये, श्रृंगार में केवल मोती की दो लड़ श्रीमस्तक पर, मोती के बाजूबन्द, कटि किंकिणी नुपूर, हार आदि सभी मोती के, तिलक, नकवेसर, कर्णफूल ही धारण कराये। ऊपर से नीचे तक वस्त्र हीन….केवल मोतियों व आभूषणों का ही अद्भुत अनोखा श्रृंगार।

श्रीसूरदासजी जगमोहन में बैठे थे अपने आराध्य श्री कृष्ण के ध्यान में मग्न, उनके हृदय में गहन अनुभूति हुई, अन्तर्मन के मानस-पटल पर आकृति उकरने लगी और उन्होंने अनुभव किया–’आज तो श्री ठाकुर जी ने अद्भुत श्रृंगार धारण किया है जो अभूतपूर्व है, न पहले कभी देखा है न सुना है। आज तो मेरे बाल-गोपाल ने केवल मोती व आभूषण ही धारण किये हैं, वस्त्र तो है ही नहीं। मुझे भी इस अद्भुत श्रृंगार के लिए कुछ अद्भुत अनोखा भावपूर्ण पद गाना चाहिए’

जब श्रृंगार दर्शन खुले और सूरदासजी को पद गायन हेतु बुलाया गया तो अपने अन्तर्मन के चक्षुओं से अपने आराध्य के अद्भुत दर्शन करते हुये उन्होंने राग-बिलावल में यह सुन्दर अद्वितीय अन्तर्मन को स्पर्श कर लेने वाला यह अद्भुत पद गाया–

“देखे री हरि नंगमनंगा।
जलसुत भूषन अंग विराजत बसन हीन छबि उठि तरंगा॥
अंग अंग प्रति अमित माधुरी निरखि लज्जित रति कोटि अनंगा।
किलकत दधिसुत मुख लेपन करि ‘सूर’ हसत ब्रज युवतिन संगा॥

यह सुनकर श्री गिरधर जी सहित सभी बालक अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले–’सूरदास जी, आज आपने ऐसा पद-गायन क्यों किया है ?’

तब सूरदास जी ने विनम्रता से कहा–’जैसा अद्भुत श्रृंगार आपने किया है वैसा ही अद्भुत पद रचित कर मैनें गाया है।’

सभी बालक सूरदास जी के रोम-रोम में समाहित इस भवदीय भावना पर बहुत ही आश्चर्यचकित हुये। कुछ दिन पश्चात श्री गिरधरजी सूरदासजी को लेकर नाथद्वारा पधारे और श्री गुसांईजी को उस अद्भुत घटना का सविस्तार विवरण दिया।

तब श्री गुसांईजी ने श्री गिरधरजी से कहा–’सूरदासजी पर संशय नहीं करना चाहिए था। ये तो पुष्टिमार्ग के जहाज हैं अतः इन्हें भगवदलीला का अनुभव आठों पहर होता रहता है।’

आज भी, इस प्रसंग के अनुष्ठान में ब्रज में, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में किसी भी दिन श्रीजी को बसरा के मोतियों से गूंथा हुआ आड़बंद धारण कराया जाता है और कोई वस्त्र धारण नहीं कराये जाते। आज भी यह भाव-प्रथा निरन्तर चली आ रही है कि केवल आभूषणों का श्रृंगार और केवल मोती-लड़ियों की करधनी-ऊपर से नीचे तक केवल मोती व आभूषण।

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गोपीश्वर महादेव

देवो के देव महादेव शंकर को श्रीमद्भागवत में एक प्रधान वैष्णव बतलाया गया है। वे सदैव भगवती पार्वती के साथ कृष्ण की अष्टकालीय लीलाओं के चिन्तनमें विभोर रहते हैं। श्रीकृष्ण की प्रकट लीलामें एक समय अपने नेत्रों से कृष्ण की मनमोहक रासलीला के दर्शनों की अभिलाषासे वे कैलाश से सीधे वृन्दावनमें बड़े उत्कण्ठित होकर पधारे। किन्तु वृन्दावनके बाहरी द्वारपर ही गोप-परिचारिकाओं ने उन्हें रोक दिया। क्योंकि इसमें श्रीकृष्णके सिवा अन्य किसी पुरुष का प्रवेश निषेध है। किन्तु शंकर जी कब मानने वाले थे। वे परिचारिका गोपियों से प्रवेशका उपाय पूछने लगे । गोपियों ने भगवती योगमाया पौर्णमासीजी की आराधना करनेके लिए कहा। तत्पश्चात् योगमाया पौर्णमासीजी की कठोर आराधना से शंकर जी को योगमायाजी के दर्शन हुए। उन्होंने शंकर जी की अभिलाषा जानकर उनके हाथों को पकड़कर पास ही ब्रह्मकुण्ड में डुबो दिया। उस कुण्ड से निकलते ही शङ्कर जी एक परम सुन्दरी किशोरी गोपीके रूपमें परिवर्तित हो गये।

पौर्णमासी जी ने गोपी बने शंकर को रासस्थली के निकट ईशान कोण में एक कुञ्ज के भीतर बैठा दिया और वहीं से रासलीला दर्शनके लिए कहकर स्वयं अन्तर्धान हो गईं। कुछ देर बाद ही रासलीला आरम्भ हुई। गोपियों ने सोचा न जाने क्यों आज नृत्य, गीतमें उल्लास नहीं हो रहा है। वे समझ गई कि किसी विजातीय व्यक्ति का यहाँ प्रवेश हुआ है।

सभी गोपियाँ उस विजातीय व्यक्ति को ढूंढने लगीं ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब वे इस स्थानपर पहुँचीं तो उन्होंने एक नवेली अपरिचित गोपी को बैठी हुई देखा। फिर तो उन्होंने उस नवेली गोपी को पकड़ लिया और पूछने लगीं- तुम्हारा नाम क्या है? तुम्हारा गाँव कौन-सा है ? तुम्हारा पति कौन है? तुम्हारा ससुर कौन है ? किन्तु नवेली गोपी रोने के अतिरिक्त कोई उत्तर नहीं दे सकी। क्योंकि योगमाया ने इसे गोपी गर्भ से न तो जन्म ही दिलवाया था, न इसे कोई नाम दिया था, न इसका विवाह किसी गोपसे हुआ था। इसलिए क्या उत्तर देती? कोई उत्तर न पाकर गोपियोंने इसके गालोंमें गुल्चे मार-मारकर गाल फुला दिये। पौर्णमासी जी महादेव की दुर्दशा देखकर द्रवित हो गईं। उन्होंने वहाँ पहुँचकर गोपियों से अनुरोध किया कि ये मेरी कृपापात्री गोपी है। आप लोग श्रीकृष्ण के साथ इसपर कृपा करें। पौर्णमासीजीकी आन्तरिक अभिलाषा जानकर कृष्णने उसका गोपीश्वर नामकरण किया तथा यह वरदान दिया कि बिना तुम्हारी कृपाके कोई भी साधक इस वृन्दावनमें विशेषकर मेरी मधुर लीलाओंमें प्रवेश नहीं कर सकेगा।

गोस्वामी ग्रन्थोंमें भी ऐसा वर्णन पाया जाता है कि प्रकट कष्णलीला के समय कृष्ण सेवा प्राप्ति की कामना से गोपियाँ भी इनकी आराधना करती थीं। इनके प्रणाम मंत्र से भी यह स्पष्ट है कि ये विशुद्ध कृष्णप्रेम देने वाले है

मुदा गोपेन्द्रस्यात्मज- भुज-परिष्वंग-निधये स्फुरद – गोपी- वृन्दैर्यमइह भगवन्तं प्रणयिभिः ।

भजद्भिस तैर् भक्त्या स्वम भिलष्तिं प्राप्तुम चिराद् यमी-तीरे गोपीश्वरमनुदिनं तं किल भजे ॥

(श्रीब्रजविलास स्तव-८७)

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भक्त राजा जयमल्ल सिंहजी

राजा जयमल्लसिंहजी मेड़ता के राजा थे। ये बड़े ही नीतिज्ञ, सदाचारी, साधु-स्वभाव नियमों में तत्पर और दृढ़निश्चयी भगवद्भक्त थे। यद्यपि ये भगवान् का स्मरण रखते हुए ही राज्य का सारा काम करते थे, तथापि प्रात:काल डेढ़ पहर दिन चढ़ने तक तो प्रतिदिन एकान्त स्थल में नियमितरूप से भगवान् का ध्यान-भजन करते थे। इस समय बड़े-से-बड़े जरूरी काम के लिये भी कोई आपके पास नहीं जा सकता था। वे भगवत्-पूजन के आनन्द सागर में ऐसे डूबे रहते थे कि किसी प्रकार के बाहरी विध्न से उनका ध्यान नहीं टूटता था। इस समय उनकी अन्तर और बाहर की दृष्टि मिलकर एक हो जाती थी, और वह देखती थी-केवल एक श्याम-सुन्दर की त्रिभुवन-मोहन अनूप रूपराशि को। इस समय की उनकी प्रेम विह्नलता और समाधिनिष्ठा को सौभाग्यवश जो कोई देख पाता, वहीं भगवत् प्रेम की ओर बलात् आकर्षित हो जाता था। इस प्रतिदिन की नियमित साघना के समय अत्यन्त आवश्यक कार्य उपस्थित हुए। परन्तु जयमल्ल अपने प्रण से नहीं डिगे।

जयमल्लसिंहजी इस प्रण की बात चारों ओर फैल गयी। एक दूसरा राजा, जो इनके कुटुम्ब का ही था, ईर्ष्यां और दुर्बद्धि-वश जयमल्ल से वैर रखता और इन्हें सताने का मौका ढूँढ़ा करता था। उसे यह बात मालूम हुई तो उसने एक दिन प्रात:काल के समय बहुत-सी सेना साथ लेकर मेड़ता आ घेरा लोगों ने आकर राज्य में सूचना दी। राजा का कड़ा हुक्म था कि उसकी आज्ञा बिना किसी से युद्ध आदि न किया जाय। अतएव दीवान ने आकर महलो में खबर दी, परन्तु राजा जयमल्ल के

पास तो इस समय कोई जा नहीं सकता था। आखिर राजमातासे नहीं रहा गया। राज्यनाश की आशंका से राजमाता साहस करके पुत्र के पास उनकी कोठरी में गयी। उसने जाकर देखा – जयमल्ल समाधिनिष्ठ बैठे हैं, वाह्यज्ञान बिल्कुल नहीं है, नेत्रों से प्रेमात्रु बह रहे हैं, बीच बीच में अनुपम आनन्द की हँसी हँस देते हैं उनके मुखमण्डल पर एक अपूर्व ज्योति फैल रही है माता एक बार तो रुक गयी, परन्तु पुत्र के अनिष्ट की सम्भावना से उसने कहा, ‘बेटा! शत्रु ने चढ़ाई कर दी, कुछ उपाय करना चाहिये।’ जयमल्ल का चित्त तो भगवान् की रूप-छटा में निरुद्ध था। उसको कुछ भी सुनायी नहीं दिया। जब तीन-चार बार पुकारने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला, तब माता ने हाथ से जयमल्ल के शरीर को हिलाया। ध्यान छूटने से जयमल्ल ने आश्चर्य चकित हो नेत्र खोले। मन में बड़ा क्षोभ हुआ परन्तु सामने विषण्ण-वदना जननी को खड़ी देखकर तुरन्त ही भाव बदल गया और उन्होंने माता को प्रणाम किया। माता ने शत्रु के आक्रमण का समाचार सुना दिया। परन्तु जयमल्ल को इस समय भगवत चर्चा के सिवा दूसरी बात सुनने का अवसर ही नहीं था उन्होंने चाहा कि माता को नम्रता से समझा दूँ, लेकिन डनकी वृत्तियाँ तो भगवत्- रूप की ओर प्रबल वेग से खिची जा रही थीं, समझावे कौन ? जयमल्ल कुछ भी बोल नहीं पाये और उनकी समाधि होने लगी। माता ने फिर कहा, तब परमविश्वासी भक्त जयमल्लजी के मुँह से केवल इतने शब्द निकले भगवान् सब कल्याण ही करते हैं।’ तदनन्तर उनकी आँखें मुँद गयी। वह फिर सुख-दुःख, हानि-लाभ और जय पराजय की भावना से बहुत परे के मनोहर नित्यानन्दमय प्रेम-राज्य में प्रवेश कर गये। जगत् की क्षुद्र आँधी उनकी मनरूपी हिमालय के अचल शिखर को तनिक भी नहीं हिला सकी। माता दुःखी मन से निराश होकर लौट आयी।
रणभेरी बजने लगी, शत्रु सेना कोई बाधा न पाकर नगर में घुसने लगी। अब योगक्षेम का भार वहन करने वाले भक्तभावन से नहीं रहा गया। श्यामसुन्दर त्रिभुवन-कँपाने वाले वीरेन्द्रवेश में शस्त्रादि सुसज्जित हो अकस्मात् शत्रु-सैन्य के सामने प्रकट हो गये महाणज रघुराजसिंह जी
लिखते हैं-

जानि निज सेवक निरत निज पूजनमें,
चढ़िकै तुरंग श्याम रंग को सवार है।
कर करवाल धारि कालहू को काल मान,
पहुँच्यो उताल जहाँ सैन्य बेशुमार है।
चपलासों चमकि चहुँकित चलाइ बाजी,
भटनकी राजी कादि करत प्रहार है।
रघुराज भक्तराज-लाज राखिबेके काज,
समर बिरान्यो वसुदेवको कुमार है।

ब्रह्मा और यमराज जिसके शासन से सृष्टि की उत्पति और संहार करते हैं, उनके सामने क्षुद्र राजपूत सेना किस गणना में थी? बात की बात में सब धराशायी हुए। उनका पुण्य आज सर्वतोभाव से सफल हो गया! भगवान् के हाथ से निधन हो वे सदा के लिये परम धन पा गये। शत्रु राजा घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा। पलों में इतना काम कर घोड़े को घुड़साल में बाँध सवार अन्तघ्यान हो गये।

इघर जयमल्लजी की पूजा शेष हुई। उन्होंने तुरन्त अपना घोड़ा मँगवायाः देखते हैं तो घोड़ा थक रहा है, उसका शरीर पसीने से भींग रहा है और वह हाँफ रहा है। राजा ने पूछा कि इस घोड़े पर कौन चढ़ा था? परन्तु किसी ने कोई जबाब नहीं दिया। इस रहस्य को कोई जानता भी हो नहीं था। इतने में लोगों ने दौड़ते हुए आकर खबर दी कि ‘शत्रुसेना तो सब मरी पड़ी है।’ राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह घोड़े की बात भूलकर तुरन्त नगर के बाहर पहुँचे। देखते हैं, लाशों का ढेर लगा है और विपक्षी-राजा घायल-से पड़े हैं। जयमल्ल उसके पास गये और प्रेमभाव से ‘जय श्रीकृष्ण’ करने के बाद उससे युद्ध का विवरण पूछने लगे। उसने हाथ जोड़कर कहा, ‘महाराज! आपके यहाँ अनूप-रूप-शिरोमणि श्यामलमूर्ति महावीर कौन हैं ? उन्होंने अकेले ही मेरी सारी सेना का संहार कर डाला और मुझको भी घायल करके गिरा दिया। अहा! कैसा अनौखा उनका रूप है, जबसे मैंने उन नौजवान त्रिभुवन-मन-मोहन को देखा है, मेरा चित्त उन्हें फिर से देखने के लिये व्याकुल हो रहा है।’ जयमल्ल अब समझे कि यह सारी मेरे प्रभु की लीला है! उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वे गद्गद-बाणी से बोले- ‘भाई! तुम थन्य हो, तुम्हारे सौभाग्य की ब्रह्म भी प्रशंसा करेंगे। अहा! मेरी तो आँखें उस साँवरे सलोने के लिये तरस ही रही हैं, तुम धन्य हो जो सहज ही में उसका दर्शन पा गये?

अब उसका सारा वैरभाव जाता रहा, जयमल्ल ने बड़े सम्मान और आराम के साथ उसे अपने घर पहुँचा दिया, वहाँ पहुँचकर वह भी सपरिवार भगवान् का परमभक्त हो गया!
बोलो भक्त और उनके भगवान् की जय!

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क्या इस युग में भी प्रभु के दर्शन संभव है ?

प्रश्न हम सबके उत्तर श्री हनुमानप्रसाद पोद्दारजी के

प्रश्न- भगवदर्शन का सर्वोत्तम उपाय क्या है?

उत्तर- भगवदर्शन का सरल और सर्वोत्तम उपाय उनकी कृपा पर अपने को छोड़ देना है और दिन-रात उनके नाम का प्रेमपूर्ण हृदय से चिन्तन करना है। इससे दूसरे नम्बर का उपाय दर्शन के लिये व्याकुल होकर उनसे दर्शन की प्रार्थना करना है। यह दूसरा उपाय पहले की अपेक्षा अधिक सरल है परन्तु जल्दी दर्शन पहले उपाय से होते हैं।

प्रश्न – क्या इस युग में भगवान् के दर्शन हो सकते हैं?

उत्तर- मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस युग में भगवान् के दर्शन अवश्य हो सकते हैं, बल्कि अन्यान्य युगों की अपेक्षा थोड़े समय में और थोड़े प्रयास से ही हो सकते हैं।

प्रश्न- भगवान् के दर्शन कैसे हो?

उत्तर- जप, तप, साधन सब अच्छे हैं, करने चाहिये पर मुख्य साधन है आत्यन्तिक व्याकुलता, हृदय का जलने लगना, बिना मिले शान्त न हो।

प्रश्न- क्या साधक अपने साधन-बल से भगवान् से मिल सकता है?

उत्तर- भगवान् के साथ मिलने के लिये कोई साधन यदि है तो भगवान् की एकमात्र कृपा ही है। कोई साधक यह चाहे कि भगवान् की कृपा को बाँधकर अपनी शक्ति से भगवान् से हम मिल लेंगे तो यह संभव नहीं है। कितना ही साधन किया जाए और किसी भी योग का आश्रय लिया जाए परन्तु भगवद्दर्शन, भगवत्-मिलन बिना भगवान् की कृपा के संभव नहीं है।

प्रश्न- क्या दो मित्रों की तरह भगवान् से वार्तालाप हो सकता है?

उत्तर- यदि भक्त चाहे तो वह दो मित्रों की तरह एक स्थान पर मिलकर भगवान् से परस्पर वार्तालाप कर सकता है।

प्रश्न- जब एकान्त में भक्त और भगवान् बातें कर रहे हैं तो क्या कोई व्यक्ति बाहर से भगवान् के दर्शन कर सकता है या उनकी बातें सुन सकता है?

उत्तर- वास्तव में इस विषय में कोई खास नियम देखने में नहीं आता। भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, वे चाहें तो सबके सामने प्रकट हो सकते हैं। वे चाहें तो बहुत से लोगों के सामने भक्त से चुपचाप बातचीत करके जा सकते हैं। वे चाहें तो दूसरों को पता लगने पर भी उनको अपना दर्शन नहीं देते या अपनी वाणी नहीं सुनाते।

प्रश्न- भगवदर्शन के पूर्व की क्या स्थिति होती है ?

उत्तर- श्रीभगवान् के दिव्य स्वरूप के साक्षात्कार के पहले प्रकाश के दर्शन प्रायः हुआ करते हैं। उस प्रकाश के दर्शन के समय यदि दर्शन करने वाले का शरीर अस्थायी रूप से दर्शन-योग्य दिव्यता को नहीं प्राप्त हुआ रहता है तो वह तेज सहन नहीं हो सकता और उसका एक ऐसा धक्का लगता है, जिसको समझाने के लिये बिजली के करेंट-सा कह सकते हैं- होता तो वह है और ही तरह का।

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श्री कृष्ण बने मूर्तिकार

गोपाल जी एक कटोरे में मिट्टी लेकर उससे खेल रहे थे।

राधा रानी ने पूछा:- गोपाल जी ये क्या कर रहे हो ?

गोपाल जी कहने लगे:- मूर्ति बना रहा हूँ।

राधा ने पूछा:- किसकी ?

गोपालजी मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखा। और कहने लगे:- एक अपनी और एक तुम्हारी।

राधा भी देखने के उद्देश्य से उनके पास बैठ गयी। गोपाल जी ने कुछ ही पल में दोनों मूर्तियाँ तैयार कर दी।और राधा रानी से पूछने लगे:- बताओं कैसी बनी है ?

मूर्ति इतनी सुंदर मानों अभी बोल पड़ेंगी। परन्तु राधा ने कहा:- मजा नहीं आया। इन्हें तोड़ कर दुबारा बनाओ। गोपाल जी अचरज भरी निगाहों से राधा की ओर देखने लगे, और सोचने लगे कि मेरे बनाए में इसे दोष दिखाई दे रहा है। परन्तु उन्होंने कुछ नहीं कहा, और दोबारा उन मूर्तियों को तोड़कर उस कटोरे में डाल दिया और उस मिट्टी को गुथने लगें। उन्होंने फिर से मूर्तियाँ बनानी शुरू की। और हुबहू पहले जैसी मूर्तियाँ तैयार की। अबकी बार प्रश्न चिन्ह वाली दृष्टि से राधे की ओर देखा ?

राधा ने कहा:- ये वाली पहले वाली से अधिक सुंदर है।

गोपाल जी बोले:- तुम्हें कोई कला की समझ वमझ हैं भी के नहीं। इसमें और पहले वाली में मैंने रति भर भी फर्क नहीं किया। फिर ये पहले वाली से सुंदर कैसे हैं ?

राधा ने कहा:- “प्यारे” यहाँ मूर्ति की सुंदरता को कौन देख रहा है। मुझे तो केवल तेरे हाथों से खुद को तुझमें मिलवाना था।

गोपाल जी:- अर्थात ?????

राधा रानी गोपाल जी को समझा रही थी:- देखों मोहन, तुमनें पहले दो मूर्ति बनाई। एक अपनी और एक हमारी।

गोपाल जी:- हाँ बनाई।

राधा:- फिर तुमनें इन्हें तोड़कर वापस कटोरे में डालकर गुथ दिया।

गोपाल जी:- हाँ तो ?

राधा रानी:- बस इस गुथने की प्रक्रिया मे ही मेरा मनोरथ पूरा हो गया। मैं और तुम मिलकर एक हो गए।

गोपाल जी बैठे-बैठे मुस्कुरा रहे थे।

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श्रीगोवर्धन परिक्रमा

श्रीराधाकुण्ड और श्रीश्यामकुण्ड गिरिराज श्रीगोवर्धनके दो नेत्र हैं। अतः श्रीगिरिराजजीके ही ये सर्वश्रेष्ठ अङ्ग हैं। यहींसे गिरिराजजीकी परिक्रमा आरम्भ करनेपर जो-जो कृष्णलीला स्थलियाँ दर्शनीय हैं, उनका नीचे उल्लेख किया जा रहा है

(१) मुखराई – राधाकुण्डके दक्षिणमें एक मीलकी दूरीपर यह स्थान है। यह राधिकाजीकी मातामही वृद्धा मुखराजीका वासस्थान है। यशोदाजीको बाल्यावस्थामें इन्होंने दूध पिलाया था। मातामही मुखरा कौतुकवश श्रीराधाकृष्ण युगलकिशोर-किशोरीका अलक्षित रूपमें मिलन कराकर बड़ी प्रसन्न होती थीं। ये महाराज वृषभानुकी सास और कृतिका मैयाकी माता हैं। ब्रजवासी इनको “बढ़ाई” नामसे पुकारते थे प्रति प्रातःकाल बड़ी उत्कंठा से श्रीमती राधिका एवं कृष्णका दर्शन करने जाती थीं। यहाँ मुखरा देवीका दर्शन है।

(२) रत्न सिंहासन – यह श्रीराधाकुण्डसे गोवर्धनकी ओर परिक्रमा मार्गमें एक मील दूरीपर कुसुमसरोवरके दक्षिणमें स्थित है। यहाँका लीला-प्रसङ्ग इस प्रकार है- शिवचतुर्दशीके उपरान्त पूर्णिमाके दिन श्रीकृष्ण एवं श्रीबलराम गोपरमणियोंके साथ विचित्र रंगोंकी पिचकारियोंके साथ परस्पर होली खेल रहे थे। मृदंग-मञ्जीरे, वीणादि वाद्य-यन्त्रोंके साथ वासंती आदि रागोंसे मधुर सङ्गीत भी चल रहा था। श्रीमती राधिकाजी पास ही रत्न सिंहासनपर बैठ गईं। उसी समय कुबेरका अनचर शंखचूड़ भगवान् श्रीकृष्णको मनुष्य समझकर परम सुन्दरी इन गोप ललनाओंको हरण करनेके लिए चेष्टा करने लगा। गोपियाँ राम और कृष्णको पुकारती हुई आर्त्तनाद करने लगीं। कृष्णने बड़े वेगसे दौड़कर शंखचूड़का बध किया और उसके मस्तककी मणि निकालकर श्रीबलरामजीको प्रदान की। बलरामजीने उस मणिको धनिष्ठाके हाथों श्रीमती राधिकाको प्रदान किया। यह उसी रत्न सिंहासनका स्थान है जहाँ राधिकाजी बैठी थीं।

(३) श्यामकुटी – यह स्थान रत्न सिंहासनके पास ही सघन वृक्षावलीके मध्यमें स्थित है। यहाँ श्रीश्यामसुन्दरने श्यामरंगकी कस्तूरीका अङ्गोंमें अनुलेपनकर श्याम रङ्गके अलंकार तथा श्याम रङ्गके ही वस्त्र धारणकर श्याम रङ्गके निकुञ्जमें प्रवेश किया तो गोपियाँ भी उनको पहचान न सकीं।
तत्पश्चात् पहचाननेपर उनकी बड़ी मनोहारी लीलाएँ सम्पन्न हुई। पास ही बाजनी शिला है, जिसे बजानेसे मधुरनाद उत्पन्न होता है।

(४) ग्वाल पोखर- श्यामकुटीके पास ही सघन सुन्दर वृक्ष और लताओंसे परिवेष्टित मनोहर लीला स्थली है। गोचारणके समय श्रीकृष्ण मध्याह्न कालमें यहाँ विश्राम करते हैं। बाल सखाओंके द्वारा कृष्णकी प्रेममयी सख्य रसकी सेवा तथा ग्वाल बालोंकी छीना-झपटी आदि मनोहारी लीलाओंके कारण बाल पोखरा अत्यन्त प्रसिद्ध है। यहाँका एक प्रसङ्ग इस प्रकार है – श्रीकृष्ण पुरोहित बालकका वेश धारणकर बटु मधुमङ्गलके साथ सूर्यकुण्डमें श्रीमती राधिकाका सूर्यपूजन सम्पन्न कराकर यहाँ सखाओंके साथ बैठ गये। मधुमङ्गलके पास दक्षिणासे मिले हुए मनोहर लड्डू और एक स्वर्ण मुद्रिका थी। मधुमङ्गलने अपने वस्त्रों में उन्हें विशेष सावधानीके साथ बाँध रखा था। कौतुकी बलरामने मधुमङ्गलसे पूछा- भैया मधुमङ्गल ! तुम्हारी इस पोटलीमें क्या है? मधुमङ्गलने झिझकते हुए उत्तर दिया- कुछ नहीं। इतनेमें बलदेवजीने सखाओंकी ओर इशारा किया। उसमेंसे कुछ सखाओंने मधुमङ्गलके दोनों हाथोंको पकड़ लिया। एक सखाने अपनी हथेलियोंसे उसके नेत्र बंदकर दिये। कुछ सखाओंने बलपूर्वक मधुमङ्गलके हाथोंसे वह पोटली छीन ली। फिर ठहाके लगाते हुए मधुमङ्गलके सामने ही उन लड्डुओंको परस्पर बाँटकर खाने लगे। छीना-झपटीमें मधुमङ्गलका वस्त्र भी खुल गया । वह बड़े जोरसे बिगड़ा और हाथमें यज्ञोपवीत धारणकर बलराम तथा श्रीदामादि सखाओंको अभिशाप देनेके लिए प्रस्तुत हो गया। तब कृष्णने उसे किसी प्रकार शान्त किया । तब मधुमङ्गल भी हँसता हुआ उन सखाओंसे लड्डुके कुछ अवशिष्ट चूर्णको मांगने लगा। यह ग्वाल पोखरा इन लीला स्मृतियोंको संजोए हुए आज भी विद्यमान है। श्रीचैतन्य महाप्रभुने गिरिराज गोवर्धनकी परिक्रमा के समय इन लीलाओंका स्मरण करते हुए यहाँ पर कुछ क्षण विश्राम किया था। इसके पास में ही दक्षिणकी ओर किल्लोल कुण्ड है।

(५) किल्लोल कुण्ड – अपने नामके अनुरूप ही यह कुण्ड श्रीराधाकृष्ण युगलकी जलकेलि तथा कृष्णका सखाओंके साथ जल क्रीड़ाका स्थल है।

(६) कुसुम सरोवर – यह श्रीराधाकुण्डसे डेढ़ मील दक्षिण-पश्चिममें परिक्रमा मार्गके दाहिनी ओर स्थित है। यहाँ बेली- चमेली, जूही, यूथी, मल्लिका, चम्पक आदि विविध प्रकारके पुष्पोंकी लताओं और तरुओंसे परिपूर्ण कुसुमवन था। यहाँ श्रीकृष्णसे मिलनेके बहाने श्रीमती राधिका सहेलियोंके साथ पुष्प चयन करने आती थीं तथा उनका रसिक कृष्णके साथ रसपूर्ण केलि कलह एवं नोक-झोंक हुआ करता था।

प्रसङ्ग (१) – कृष्णभावनामृतमें प्रसङ्गके अनुसार एक दिन श्रीमती राधाजी सहेलियोंके साथ यहाँ पुष्प-चयन कर रही थीं। इतनेमें कृष्ण वहाँ उपस्थित हुए।

कृष्णने पूछा- कौन है ?

राधाजी- कोई नहीं !

कृष्ण- ठीकसे बताओ, तुम कौन हो?

राधाजी- कोई नहीं।

कृष्ण-बड़ी टेड़ी-मेढ़ी बातें कर रही हो।

राधाजी- तुम बड़ी सीधी साधी बातें करते हो ।

कृष्ण-मैं पूछ रहा हूँ, तुम कौन हो?

राधाजी- क्या तुम नहीं जानते ?

कृष्ण- क्या कर रही हो?

राधाजी – सूर्य पूजाके लिए पुष्प चयन कर रही हूँ।

कृष्ण – क्या किसीसे आदेश लिया ?

राधाजी- किसीसे आदेशकी आवश्यकता नहीं।

कृष्ण- अहो ! आज चोर पकड़ी गई। मैं सोचता था कि प्रतिदिन कौन हमारी इस पुष्पवाटिकासे पुष्पोंकी चोरी करता है तथा इस पुष्पोद्यानको सम्पूर्ण रूपसे उजाड़ देता है। आज तुम्हें पकड़ लिया है। अभी इसका दण्ड देता हूँ।

राधाजी – तुम इस पुष्पवाटिकाके स्वामी कबसे बने? क्या यहाँ एक पौधा भी कभी लगाया है ? अथवा किसी एक पौधेका सिञ्चन भी किया है ? उल्टे तुम तो लाखों गऊओं तथा उद्धत सखाओंके साथ इस कुसुमवनको उजाड़नेवाले हो । भला रक्षक कबसे बने ?

कृष्ण- मुझ धर्मात्माके ऊपर आक्षेप मत करो। मैं अभी इसके उचित शिक्षा दे रहा हूँ।

राधाजी – अहा हा ! (मुस्कराते हुए) बड़े भारी धर्मात्मा हैं। पैदा होते ही एक नारीका बध किया, बचपनमें मैयासे भी झूठ बोलते, पास-पड़ोसकी गोपियोंके घरोंमें मक्खन चुराते, कुछ बड़े होनेपर गोप कुमारियोंके वस्त्रोंका हरण करते, अभी कुछ ही दिन पूर्व एक गायके बछड़ेका बध किया। यह तो तुम्हारे धर्माचरणकी हद हो गई ।

उत्तर सुनकर कृष्ण सिर खुजलाते हुए मधुमङ्गलकी ओर देखने लगे। चतुर मधुमङ्गलने समझाया- चुप रहनेमें ही भलाई है। इतनेमें सभी सखियोंने तालियाँ बजाते हुए श्यामसुन्दरको घेर लिया।

दूसरा प्रसङ्ग – एक दिन प्रातःकाल श्रीमती राधिकाजी अपनी सहेलियोंके साथ पुष्प चयन करनेके लिए कुसुम सरोवरके तटपर उपस्थित हुई। कुसुम सरोवरके तटपर बेली, चमेली, जूही, कनेर, चंपक आदि विविध प्रकारके पुष्प खिल रहे थे। श्रीमतीजी एक वृक्षकी टहनीमें प्रचुर पुष्पोंको देखकर उस टहनीको हाथसे पकड़कर दूसरे हाथसे पुष्पोंका चयन करने लगीं। इधर कौतुकी श्रीकृष्णने, श्रीमती राधिकाको यहाँ पुष्प चयन करनेके लिए आती हुई जानकर, पहले से ही उस वृक्षकी डाल पर चढ़कर अपने भारसे उसे नीचे झुका दिया और स्वयं डाल पर पत्तोंकी आढ़में छिप गये, जिससे श्रीमतीजी उन्हें देख न सकें। श्रीमतीजी पुष्प चयनमें विभोर थीं। उसी समय कृष्ण दूसरी डाल पर चले गये, जिससे वृक्षकी वह डाल काफी ऊपर उठ गई, राधिकाजी भी उस डालको पकड़ी हुए ऊपर उठ गई। फिर तो वे बचाने के लिए चिल्लाने लगीं। उसी समय श्रीकृष्णने पेड़की डालीसे कूदकर डालीमें टंगी हुई श्रीमतीजीको गोदीमें पकड़ कर उतारा। इधर सखियाँ यह दृश्य देखकर बड़े जोरसे ताली बजाकर हँसने लगीं। श्रीमती राधिकाजी श्रीकृष्णके आलिङ्गन पाशसे मुक्त होकर श्रीकृष्णकी भर्त्सना करने लगीं।
वर्तमान समयमें यहाँका कुसुमवन सम्पूर्ण रूपसे उजड़ गया है। भरतपुरके महाराजा जवाहरसिंहने १७६७ ई. में दिल्लीका खजाना लूटकर उस धनसे कुसुम सरोवरमें सुन्दर सोपानों सहित पक्के घाट बनाये थे। सरोवरके पश्चिममें राजा सूरजमलकी छत्री तथा उसके दोनों ओर दोनों रानियोंकी छत्रियाँ और पास ही दाऊजीका मन्दिर है।

(७) नारद कुण्ड- कुसुम सरोवरसे दक्षिण-पूर्व दो फर्लांग दूर नारदजीकी तपस्या स्थली नारद-कुण्ड है। वृन्दावनकी अधिष्ठात्री देवी वृन्दादेवीके मुख से उच्चतम गोपीभावकी महिमा सुनकर गोपी- देहसे श्रीराधाकृष्ण युगलकी प्रेममयी उन्नत उज्ज्वलसेवा प्राप्त करनेके लिए नारदजीके हृदयमें तीव्र लालसा उत्पन्न हुई। उन्होंने लोकपितामह ब्रह्मासे गोपाल – मंत्र प्राप्तकर इसी स्थानपर गोपियोंके आनुगत्यमें रागमार्गसे साधन भजन करना आरम्भ किया। बहुत युगोंतक आराधनाके पश्चात् योगमाया पौर्णमासीने नारदजीको कुसुमसरोवरमें स्नान कराया, जिससे साथ ही साथ उन्हें गोपी देहकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् उन्हें रागमार्गके एकादश भाव प्रदानकर युगलसेवामें अधिकार प्रदान किया। यहाँ नारद-कुण्ड दर्शनीय है।

(८) पालेई – नारदकुण्डसे डेढ़ मील पूर्व मथुरामार्गके पास ही यह गाँव स्थित है। कभी यमुनाजी यहाँ बहती थीं। मिट्टी खोदनेपर अभी भी यमुनाकी रेत निकलती है। कृष्णने सखाओंके साथ यहाँ गोचारण किया था तथा सखियोंके साथ नाना प्रकारके लीला-विलास किये थे। अष्टछापके कवि कुम्भनदासजीका यहाँ निवास स्थल था । यहाँपर उनके नामका सरोवर और खिड़क प्रसिद्ध है।

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मकर संक्रांति

दिनांक 14.01.2022 शुक्रवार को भगवान् सूर्यदेव 14:12:26 पर मकर राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। इस दिन को सम्पूर्ण भारतवर्ष में अलग-अलग नामों के साथ, अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। जिनमें सबसे प्रचलित है:-

“मकर संक्रान्ति”


सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रान्ति कहते हैं। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति के बीच का समय ही सौर मास है। वैसे तो सूर्य संक्रान्ति 12 हैं, लेकिन इनमें से चार संक्रान्ति महत्वपूर्ण हैं जिनमें मेष, कर्क, तुला, और मकर। सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश का नाम ही मकर संक्रान्ति है। धनु राशि बृहस्पति की राशि है। इसमें सूर्य के रहने पर मलमास होता है। इस राशि से मकर राशि में प्रवेश करते ही मलमास समाप्त होता है और शुभ मांगलिक कार्य हम प्रारंभ करते हैं। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है।

मकर संक्रान्ति के दिन पूर्वजों को तर्पण और तीर्थ स्नान का अपना विशेष महत्व है। इससे देव और पितृ सभी संतुष्ट रहते हैं। सूर्य पूजा से और दान से सूर्य देव की रश्मियों का शुभ प्रभाव मिलता है और अशुभ प्रभाव नष्ट होता है। इस दिन स्नान करते समय स्नान के जल में तिल, आंवला, गंगा जल डालकर स्नान करने से शुभ फल प्राप्त होता है।

मकर संक्रान्ति का दूसरा नाम उत्तरायण भी है क्योंकि इसी दिन से सूर्य उत्तर की तरफ चलना प्रारंभ करते हैं। उत्तरायण के इन छः महीनों में सूर्य के मकर से मिथुन राशि में भ्रमण करने पर दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। इस दिन विशेषतः तिल और गुड़ का दान किया जाता है। इसके अलावा खिचड़ी, तेल से बने भोज्य पदार्थ भी किसी गरीब ब्राह्मण को खिलाना चाहिए। छाता, कंबल, जूता, चप्पल, वस्त्र आदि का दान भी किसी असहाय या जरूरत मंद व्यक्ति को करना चाहिए।

राजा सागर के 60,000 पुत्रों को कपिल मुनि ने किसी बात पर क्रोधित होकर भस्म कर दिया था। इसके पश्चात् इन्हें मुक्ति दिलाने के लिए गंगा अवतरण का प्रयास प्रारंभ हुआ! इसी क्रम में राजा भागीरथ ने अपनी तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया। स्वर्ग से उतरने में गंगा का वेग अति तीव्र था इसलिए शिवजी ने इन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। फिर शिव ने अपनी जटा में से एक धारा को मुक्त किया। अब भागीरथ उनके आगे-आगे और गंगा उनके पीछे-पीछे चलने लगी। इस प्रकार गंगा गंगोत्री से प्रारंभ होकर हरिद्वार, प्रयाग होते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुँचीं यहां आकर सागर पुत्रों का उद्धार किया। यही आश्रम अब गंगा सागर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही राजा भागीरथ ने अपने पुरखों का तर्पण कर तीर्थ स्नान किया था। इसी कारण गंगा सागर में मकर संक्रान्ति के दिन स्नान और दर्शन को मोक्षदायक माना है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था इसीलिए उन्होंने शर-शैय्या पर लेटे हुए दक्षिेणायन के बीतने का इंतजार किया और उत्तरायण में अपनी देह का त्याग किया। उत्तरायण काल में ही सभी देवी-देवताओं की प्राण प्रतिष्ठा शुभ मानी जाती है। धर्म-सिंधु के अनुसार-मकर संक्रान्ति का पुण्य काल संक्रान्ति समय से 16 घटी पहले और 40 घटी बाद तक माना गया है। मुहूर्त चिंतामणि ने पूर्व और पश्चात् की 16 घटियों को ही पुण्य काल माना है।

भारतीयों का प्रमुख पर्व मकर संक्रान्ति अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में वहाँ की परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। इसी दिन से अलग-अलग राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। मकर संक्रान्ति त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है।

उत्तर प्रदेश : मकर संक्रान्ति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है।

गुजरात और राजस्थान : उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है।

आंध्रप्रदेश : संक्रान्ति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है।

तमिलनाडु : किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। घी में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है।

महाराष्ट्र : लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं।

पश्चिमबंगाल : हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है।

असम: भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

पंजाब : एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। धूमधाम के साथ समारोहों का आयोजन किया जाता है।

मकर संक्रान्ति मुहूर्त पुण्य काल मुहूर्त : 14:12:26 से 17:45:10 तक
अवधि: 03 घंटे 22 मिनट

महापुण्य काल मुहूर्त : 14:12:26 से 14:36:26 तक
अवधि : 0 घंटे 24 मिनट