Posted on Leave a comment

तुलसी जी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी

तुलसी का पौधा भगवान विष्णु को अति प्रिय है। भगवान विष्णु की पूजा में किसी भी तरह से तामसिक चीजों का प्रयोग वर्जित माना गया है। इसलिए जहां पर भी तुलसी का पौधा लगा हो वहां पर कभी मांस मदिरा का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। जो लोग अपने गले में तुलसी की माला धारण करते हैं, उन्हें भी तामसिक चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।



तुलसी दल और मंजरी चयन समय कुछ बातों का ख्याल रखें

  • तुलसी की मंजरी सब फूलों से बढ़कर मानी जाती है। मंजरी तोड़ते समय उसमें पत्तियों का रहना भी आवश्यक माना गया है। तुलसी का एक-एक पत्ता तोड़ने के बजाय पत्तियों के साथ अग्रभाग को तोड़ना चाहिए. यही शास्त्रसम्मत भी है.प्राय: पूजन में बासी फूल और पानी चढ़ाना निषेध है, पर तुलसीदल और गंगाजल कभी बासी नहीं होते। तीर्थों का जल भी बासी नहीं होता।
  • ब्रह्म वैवर्त पुराण में श्री भगवान तुलसी के प्रति कहते है –
    पूर्णिमा, अमावस्या , द्वादशी, सूर्यसंक्राति , मध्यकाल रात्रि दोनों संध्याए अशौच के समय रात में सोने के पश्चात उठकर,स्नान किए बिना,शरीर के किसी भाग में तेल लगाकर जो मनुष्य तुलसी दल चयन करता है वह मानो श्रीहरि के मस्तक का छेदन करता है.
  • द्वादशी तिथि को तुलसी चयन कभी ना करे, क्योकि तुलसी भगवान कि प्रेयसी होने के कारण हरि के दिन -एकादशी को निर्जल व्रत करती है.अतः द्वादशी को शैथिल्य,दौबल्य के कारण तोडने पर तुलसी को कष्ट होता है.
  • तुलसी चयन करके हाथ में रखकर पूजा के लिए नहीं ले जाना चाहिये शुद्ध पात्र में रखकर अथवा किसी पत्ते पर या टोकरी में रखकर ले जाना चाहिये.
  • इतने निषिद्ध दिवसों में तुलसी चयन नहीं कर सकते,और बिना तुलसी के भगवत पूजा अपूर्ण मानी जाती है अतः वारह पुराण में इसकी व्यवस्था के रूप में निर्दिष्ट है कि निषिद्ध काल में स्वतः झडकर गिरे हुए तुलसी पत्रों से पूजन करे.और अपवाद स्वरुप शास्त्र का ऐसा निर्देश है कि शालग्राम कि नित्य पूजा के लिए निषिद्ध तिथियों में भी तुलसी दल का चयन किया जा सकता है.

साधकों के कुछ प्रश्न है जो इस प्रकार है और उनके हम उत्तर देने का प्रयाश करते है ।


प्रश्न : किस उम्र के व्यक्ति इसे पहने ?

उत्तर : तुलसी कंठी माला पहनने के लिए न किसी उम्र की सीमा है, और न ही ऐसा है कि सिर्फ पुरूष ही पहने , तुलसी कंठी माला किसी भी उम्र के और कोई भी बच्चा, वृद्ध, शादीशुदा, विवाहित, अविवाहित, तलाकसुद कोई भी हो सब पहन सकते है ।


प्रश्न : किस समय माला को उतारे ?

उत्तर : सबसे पहले बता देते है कि स्त्रियों के मासिक धर्म के समय इसे बिल्कुल नही उतारे बस उस समय इसे ढक कर रखे और गंदे हाथों से न छुये

एवं घर मे सूतक ( बच्चा होना, किसी का निधन हो जाना आदि ) होने पर भी ऐसा ही करें ।


प्रश्न : वेबसाइट से माला मंगाने के बाद क्या करें ?

उत्तर : कृपया इसे सीधा मिलते ही नही पहने, सबसे पहले माला को देशी घी में, या सरसों के तेल में कम से कम 48 घंटे डुबो के रखें इससे माला मजबूत होगी और लंबे समय तक चलेगी । और यहाँ से माला कच्ची भेजी जाती है इसे घी में रखना ही उसे पकाना होता है ।


प्रश्न : माला पहनने के क्या नियम है ?

उत्तर : वैसे हम इतने नियमों में विश्वास नही रखते पर जो महत्वपूर्ण नियम हर संतो द्वारा बताये गए है वो निम्न है :
माला अगर पहने तो माँस, मदिरा अंडे, और लहसुन, प्याज नहीं सेवन करें ।
माला पहनने के साथ राधा नाम का जाप जरूरी है ।
बाकी इसे उतारने की या नई लेने की जरूरत पड़े तो पहले गुरुजनों की आज्ञा ले ।
धन्यवाद ।


तुलसी जी की आरती

तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।

धन तुलसी पूरण तप कीनो,
शालिग्राम बनी पटरानी ।
जाके पत्र मंजरी कोमल,
श्रीपति कमल चरण लपटानी ॥

धूप-दीप-नवैद्य आरती,
पुष्पन की वर्षा बरसानी ।
छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन,
बिन तुलसी हरि एक ना मानी ॥

सभी सखी मैया तेरो यश गावें,
भक्तिदान दीजै महारानी ।
नमो-नमो तुलसी महारानी,
तुलसी महारानी नमो-नमो ॥

तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।

तुलसी विवाह

कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी को तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है, आज के पावन पर्व पर शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह कराकर पुण्यात्मा लोग कन्या दान का फल प्राप्त करते है,

पदम पुराण में कहा गया है की तुलसी जी के दर्शन मात्र से सम्पूर्ण पापों की राशि नष्ट हो जाती है,उनके स्पर्श से शरीर पवित्र हो जाता है,उन्हे प्रणाम करने से रोग नष्ट हो जाते है,सींचने से मृत्यु दूर भाग जाती है,तुलसी जी का वृक्ष लगाने से भगवान की सन्निधि प्राप्त होती है,और उन्हे भगवान के चरणो में चढाने से मोक्ष रूप महान फल की प्राप्ति होती है.अंत काल के समय ,तुलसीदल या आमलकी को मस्तक या देह पर रखने से नरक का द्वार बंद हो जाता है

धात्री फलानी तुलसी ही अन्तकाले भवेद यदिमुखे चैव सिरास्य अंगे पातकं नास्ति तस्य वाई

श्रीमद्भगवत पुराण के अनुसार प्राचीन काल में जालंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ़ बड़ा उत्पात मचा रखा था। वह बड़ा वीर तथा पराक्रमी था। उसकी वीरता का रहस्य था, उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। उसी के प्रभाव से वह सर्वजंयी बना हुआ था। जालंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गये तथा रक्षा की गुहार लगाई। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया। उधर, उसका पति जालंधर, जो देवताओं से युद्ध कर रहा था, वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही मारा गया। जब वृंदा को इस बात का पता लगा तो क्रोधित होकर उसने भगवान विष्णु को शाप दे दिया, ‘जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया है, उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छलपूर्वक हरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे।’ यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। जिस जगह वह सती हुई वहाँ तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ।

एक अन्य प्रसंग के अनुसार वृंदा ने विष्णु जी को यह शाप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है। अत: तुम पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, ‘हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।’

बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह है।


तुलसी जी के नामो के अर्थ 

  1. वृंदा :- सभी वनस्पति व वृक्षों की आधि देवी 
  2. वृन्दावनी :- जिनका उदभव व्रज में हुआ 
  3. विश्वपूजिता :- समस्त जगत द्वारा पूजित
  4. विश्व -पावनी :- त्रिलोकी को पावन करनेवाली 
  5. पुष्पसारा :- हर पुष्प का सार 
  6. नंदिनी :- ऋषि मुनियों को आनंद प्रदान करनेवाली 
  7. कृष्ण-जीवनी :- श्री कृष्ण की प्राण जीवनी 
  8. तुलसी :- अद्वितीय

Posted on

श्री कृष्ण बने मूर्तिकार

गोपाल जी एक कटोरे में मिट्टी लेकर उससे खेल रहे थे।

राधा रानी ने पूछा:- गोपाल जी ये क्या कर रहे हो ?

गोपाल जी कहने लगे:- मूर्ति बना रहा हूँ।

राधा ने पूछा:- किसकी ?

गोपालजी मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखा। और कहने लगे:- एक अपनी और एक तुम्हारी।

राधा भी देखने के उद्देश्य से उनके पास बैठ गयी। गोपाल जी ने कुछ ही पल में दोनों मूर्तियाँ तैयार कर दी।और राधा रानी से पूछने लगे:- बताओं कैसी बनी है ?

मूर्ति इतनी सुंदर मानों अभी बोल पड़ेंगी। परन्तु राधा ने कहा:- मजा नहीं आया। इन्हें तोड़ कर दुबारा बनाओ। गोपाल जी अचरज भरी निगाहों से राधा की ओर देखने लगे, और सोचने लगे कि मेरे बनाए में इसे दोष दिखाई दे रहा है। परन्तु उन्होंने कुछ नहीं कहा, और दोबारा उन मूर्तियों को तोड़कर उस कटोरे में डाल दिया और उस मिट्टी को गुथने लगें। उन्होंने फिर से मूर्तियाँ बनानी शुरू की। और हुबहू पहले जैसी मूर्तियाँ तैयार की। अबकी बार प्रश्न चिन्ह वाली दृष्टि से राधे की ओर देखा ?

राधा ने कहा:- ये वाली पहले वाली से अधिक सुंदर है।

गोपाल जी बोले:- तुम्हें कोई कला की समझ वमझ हैं भी के नहीं। इसमें और पहले वाली में मैंने रति भर भी फर्क नहीं किया। फिर ये पहले वाली से सुंदर कैसे हैं ?

राधा ने कहा:- “प्यारे” यहाँ मूर्ति की सुंदरता को कौन देख रहा है। मुझे तो केवल तेरे हाथों से खुद को तुझमें मिलवाना था।

गोपाल जी:- अर्थात ?????

राधा रानी गोपाल जी को समझा रही थी:- देखों मोहन, तुमनें पहले दो मूर्ति बनाई। एक अपनी और एक हमारी।

गोपाल जी:- हाँ बनाई।

राधा:- फिर तुमनें इन्हें तोड़कर वापस कटोरे में डालकर गुथ दिया।

गोपाल जी:- हाँ तो ?

राधा रानी:- बस इस गुथने की प्रक्रिया मे ही मेरा मनोरथ पूरा हो गया। मैं और तुम मिलकर एक हो गए।

गोपाल जी बैठे-बैठे मुस्कुरा रहे थे।

Posted on

श्रीगोवर्धन परिक्रमा

श्रीराधाकुण्ड और श्रीश्यामकुण्ड गिरिराज श्रीगोवर्धनके दो नेत्र हैं। अतः श्रीगिरिराजजीके ही ये सर्वश्रेष्ठ अङ्ग हैं। यहींसे गिरिराजजीकी परिक्रमा आरम्भ करनेपर जो-जो कृष्णलीला स्थलियाँ दर्शनीय हैं, उनका नीचे उल्लेख किया जा रहा है

(१) मुखराई – राधाकुण्डके दक्षिणमें एक मीलकी दूरीपर यह स्थान है। यह राधिकाजीकी मातामही वृद्धा मुखराजीका वासस्थान है। यशोदाजीको बाल्यावस्थामें इन्होंने दूध पिलाया था। मातामही मुखरा कौतुकवश श्रीराधाकृष्ण युगलकिशोर-किशोरीका अलक्षित रूपमें मिलन कराकर बड़ी प्रसन्न होती थीं। ये महाराज वृषभानुकी सास और कृतिका मैयाकी माता हैं। ब्रजवासी इनको “बढ़ाई” नामसे पुकारते थे प्रति प्रातःकाल बड़ी उत्कंठा से श्रीमती राधिका एवं कृष्णका दर्शन करने जाती थीं। यहाँ मुखरा देवीका दर्शन है।

(२) रत्न सिंहासन – यह श्रीराधाकुण्डसे गोवर्धनकी ओर परिक्रमा मार्गमें एक मील दूरीपर कुसुमसरोवरके दक्षिणमें स्थित है। यहाँका लीला-प्रसङ्ग इस प्रकार है- शिवचतुर्दशीके उपरान्त पूर्णिमाके दिन श्रीकृष्ण एवं श्रीबलराम गोपरमणियोंके साथ विचित्र रंगोंकी पिचकारियोंके साथ परस्पर होली खेल रहे थे। मृदंग-मञ्जीरे, वीणादि वाद्य-यन्त्रोंके साथ वासंती आदि रागोंसे मधुर सङ्गीत भी चल रहा था। श्रीमती राधिकाजी पास ही रत्न सिंहासनपर बैठ गईं। उसी समय कुबेरका अनचर शंखचूड़ भगवान् श्रीकृष्णको मनुष्य समझकर परम सुन्दरी इन गोप ललनाओंको हरण करनेके लिए चेष्टा करने लगा। गोपियाँ राम और कृष्णको पुकारती हुई आर्त्तनाद करने लगीं। कृष्णने बड़े वेगसे दौड़कर शंखचूड़का बध किया और उसके मस्तककी मणि निकालकर श्रीबलरामजीको प्रदान की। बलरामजीने उस मणिको धनिष्ठाके हाथों श्रीमती राधिकाको प्रदान किया। यह उसी रत्न सिंहासनका स्थान है जहाँ राधिकाजी बैठी थीं।

(३) श्यामकुटी – यह स्थान रत्न सिंहासनके पास ही सघन वृक्षावलीके मध्यमें स्थित है। यहाँ श्रीश्यामसुन्दरने श्यामरंगकी कस्तूरीका अङ्गोंमें अनुलेपनकर श्याम रङ्गके अलंकार तथा श्याम रङ्गके ही वस्त्र धारणकर श्याम रङ्गके निकुञ्जमें प्रवेश किया तो गोपियाँ भी उनको पहचान न सकीं।
तत्पश्चात् पहचाननेपर उनकी बड़ी मनोहारी लीलाएँ सम्पन्न हुई। पास ही बाजनी शिला है, जिसे बजानेसे मधुरनाद उत्पन्न होता है।

(४) ग्वाल पोखर- श्यामकुटीके पास ही सघन सुन्दर वृक्ष और लताओंसे परिवेष्टित मनोहर लीला स्थली है। गोचारणके समय श्रीकृष्ण मध्याह्न कालमें यहाँ विश्राम करते हैं। बाल सखाओंके द्वारा कृष्णकी प्रेममयी सख्य रसकी सेवा तथा ग्वाल बालोंकी छीना-झपटी आदि मनोहारी लीलाओंके कारण बाल पोखरा अत्यन्त प्रसिद्ध है। यहाँका एक प्रसङ्ग इस प्रकार है – श्रीकृष्ण पुरोहित बालकका वेश धारणकर बटु मधुमङ्गलके साथ सूर्यकुण्डमें श्रीमती राधिकाका सूर्यपूजन सम्पन्न कराकर यहाँ सखाओंके साथ बैठ गये। मधुमङ्गलके पास दक्षिणासे मिले हुए मनोहर लड्डू और एक स्वर्ण मुद्रिका थी। मधुमङ्गलने अपने वस्त्रों में उन्हें विशेष सावधानीके साथ बाँध रखा था। कौतुकी बलरामने मधुमङ्गलसे पूछा- भैया मधुमङ्गल ! तुम्हारी इस पोटलीमें क्या है? मधुमङ्गलने झिझकते हुए उत्तर दिया- कुछ नहीं। इतनेमें बलदेवजीने सखाओंकी ओर इशारा किया। उसमेंसे कुछ सखाओंने मधुमङ्गलके दोनों हाथोंको पकड़ लिया। एक सखाने अपनी हथेलियोंसे उसके नेत्र बंदकर दिये। कुछ सखाओंने बलपूर्वक मधुमङ्गलके हाथोंसे वह पोटली छीन ली। फिर ठहाके लगाते हुए मधुमङ्गलके सामने ही उन लड्डुओंको परस्पर बाँटकर खाने लगे। छीना-झपटीमें मधुमङ्गलका वस्त्र भी खुल गया । वह बड़े जोरसे बिगड़ा और हाथमें यज्ञोपवीत धारणकर बलराम तथा श्रीदामादि सखाओंको अभिशाप देनेके लिए प्रस्तुत हो गया। तब कृष्णने उसे किसी प्रकार शान्त किया । तब मधुमङ्गल भी हँसता हुआ उन सखाओंसे लड्डुके कुछ अवशिष्ट चूर्णको मांगने लगा। यह ग्वाल पोखरा इन लीला स्मृतियोंको संजोए हुए आज भी विद्यमान है। श्रीचैतन्य महाप्रभुने गिरिराज गोवर्धनकी परिक्रमा के समय इन लीलाओंका स्मरण करते हुए यहाँ पर कुछ क्षण विश्राम किया था। इसके पास में ही दक्षिणकी ओर किल्लोल कुण्ड है।

(५) किल्लोल कुण्ड – अपने नामके अनुरूप ही यह कुण्ड श्रीराधाकृष्ण युगलकी जलकेलि तथा कृष्णका सखाओंके साथ जल क्रीड़ाका स्थल है।

(६) कुसुम सरोवर – यह श्रीराधाकुण्डसे डेढ़ मील दक्षिण-पश्चिममें परिक्रमा मार्गके दाहिनी ओर स्थित है। यहाँ बेली- चमेली, जूही, यूथी, मल्लिका, चम्पक आदि विविध प्रकारके पुष्पोंकी लताओं और तरुओंसे परिपूर्ण कुसुमवन था। यहाँ श्रीकृष्णसे मिलनेके बहाने श्रीमती राधिका सहेलियोंके साथ पुष्प चयन करने आती थीं तथा उनका रसिक कृष्णके साथ रसपूर्ण केलि कलह एवं नोक-झोंक हुआ करता था।

प्रसङ्ग (१) – कृष्णभावनामृतमें प्रसङ्गके अनुसार एक दिन श्रीमती राधाजी सहेलियोंके साथ यहाँ पुष्प-चयन कर रही थीं। इतनेमें कृष्ण वहाँ उपस्थित हुए।

कृष्णने पूछा- कौन है ?

राधाजी- कोई नहीं !

कृष्ण- ठीकसे बताओ, तुम कौन हो?

राधाजी- कोई नहीं।

कृष्ण-बड़ी टेड़ी-मेढ़ी बातें कर रही हो।

राधाजी- तुम बड़ी सीधी साधी बातें करते हो ।

कृष्ण-मैं पूछ रहा हूँ, तुम कौन हो?

राधाजी- क्या तुम नहीं जानते ?

कृष्ण- क्या कर रही हो?

राधाजी – सूर्य पूजाके लिए पुष्प चयन कर रही हूँ।

कृष्ण – क्या किसीसे आदेश लिया ?

राधाजी- किसीसे आदेशकी आवश्यकता नहीं।

कृष्ण- अहो ! आज चोर पकड़ी गई। मैं सोचता था कि प्रतिदिन कौन हमारी इस पुष्पवाटिकासे पुष्पोंकी चोरी करता है तथा इस पुष्पोद्यानको सम्पूर्ण रूपसे उजाड़ देता है। आज तुम्हें पकड़ लिया है। अभी इसका दण्ड देता हूँ।

राधाजी – तुम इस पुष्पवाटिकाके स्वामी कबसे बने? क्या यहाँ एक पौधा भी कभी लगाया है ? अथवा किसी एक पौधेका सिञ्चन भी किया है ? उल्टे तुम तो लाखों गऊओं तथा उद्धत सखाओंके साथ इस कुसुमवनको उजाड़नेवाले हो । भला रक्षक कबसे बने ?

कृष्ण- मुझ धर्मात्माके ऊपर आक्षेप मत करो। मैं अभी इसके उचित शिक्षा दे रहा हूँ।

राधाजी – अहा हा ! (मुस्कराते हुए) बड़े भारी धर्मात्मा हैं। पैदा होते ही एक नारीका बध किया, बचपनमें मैयासे भी झूठ बोलते, पास-पड़ोसकी गोपियोंके घरोंमें मक्खन चुराते, कुछ बड़े होनेपर गोप कुमारियोंके वस्त्रोंका हरण करते, अभी कुछ ही दिन पूर्व एक गायके बछड़ेका बध किया। यह तो तुम्हारे धर्माचरणकी हद हो गई ।

उत्तर सुनकर कृष्ण सिर खुजलाते हुए मधुमङ्गलकी ओर देखने लगे। चतुर मधुमङ्गलने समझाया- चुप रहनेमें ही भलाई है। इतनेमें सभी सखियोंने तालियाँ बजाते हुए श्यामसुन्दरको घेर लिया।

दूसरा प्रसङ्ग – एक दिन प्रातःकाल श्रीमती राधिकाजी अपनी सहेलियोंके साथ पुष्प चयन करनेके लिए कुसुम सरोवरके तटपर उपस्थित हुई। कुसुम सरोवरके तटपर बेली, चमेली, जूही, कनेर, चंपक आदि विविध प्रकारके पुष्प खिल रहे थे। श्रीमतीजी एक वृक्षकी टहनीमें प्रचुर पुष्पोंको देखकर उस टहनीको हाथसे पकड़कर दूसरे हाथसे पुष्पोंका चयन करने लगीं। इधर कौतुकी श्रीकृष्णने, श्रीमती राधिकाको यहाँ पुष्प चयन करनेके लिए आती हुई जानकर, पहले से ही उस वृक्षकी डाल पर चढ़कर अपने भारसे उसे नीचे झुका दिया और स्वयं डाल पर पत्तोंकी आढ़में छिप गये, जिससे श्रीमतीजी उन्हें देख न सकें। श्रीमतीजी पुष्प चयनमें विभोर थीं। उसी समय कृष्ण दूसरी डाल पर चले गये, जिससे वृक्षकी वह डाल काफी ऊपर उठ गई, राधिकाजी भी उस डालको पकड़ी हुए ऊपर उठ गई। फिर तो वे बचाने के लिए चिल्लाने लगीं। उसी समय श्रीकृष्णने पेड़की डालीसे कूदकर डालीमें टंगी हुई श्रीमतीजीको गोदीमें पकड़ कर उतारा। इधर सखियाँ यह दृश्य देखकर बड़े जोरसे ताली बजाकर हँसने लगीं। श्रीमती राधिकाजी श्रीकृष्णके आलिङ्गन पाशसे मुक्त होकर श्रीकृष्णकी भर्त्सना करने लगीं।
वर्तमान समयमें यहाँका कुसुमवन सम्पूर्ण रूपसे उजड़ गया है। भरतपुरके महाराजा जवाहरसिंहने १७६७ ई. में दिल्लीका खजाना लूटकर उस धनसे कुसुम सरोवरमें सुन्दर सोपानों सहित पक्के घाट बनाये थे। सरोवरके पश्चिममें राजा सूरजमलकी छत्री तथा उसके दोनों ओर दोनों रानियोंकी छत्रियाँ और पास ही दाऊजीका मन्दिर है।

(७) नारद कुण्ड- कुसुम सरोवरसे दक्षिण-पूर्व दो फर्लांग दूर नारदजीकी तपस्या स्थली नारद-कुण्ड है। वृन्दावनकी अधिष्ठात्री देवी वृन्दादेवीके मुख से उच्चतम गोपीभावकी महिमा सुनकर गोपी- देहसे श्रीराधाकृष्ण युगलकी प्रेममयी उन्नत उज्ज्वलसेवा प्राप्त करनेके लिए नारदजीके हृदयमें तीव्र लालसा उत्पन्न हुई। उन्होंने लोकपितामह ब्रह्मासे गोपाल – मंत्र प्राप्तकर इसी स्थानपर गोपियोंके आनुगत्यमें रागमार्गसे साधन भजन करना आरम्भ किया। बहुत युगोंतक आराधनाके पश्चात् योगमाया पौर्णमासीने नारदजीको कुसुमसरोवरमें स्नान कराया, जिससे साथ ही साथ उन्हें गोपी देहकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् उन्हें रागमार्गके एकादश भाव प्रदानकर युगलसेवामें अधिकार प्रदान किया। यहाँ नारद-कुण्ड दर्शनीय है।

(८) पालेई – नारदकुण्डसे डेढ़ मील पूर्व मथुरामार्गके पास ही यह गाँव स्थित है। कभी यमुनाजी यहाँ बहती थीं। मिट्टी खोदनेपर अभी भी यमुनाकी रेत निकलती है। कृष्णने सखाओंके साथ यहाँ गोचारण किया था तथा सखियोंके साथ नाना प्रकारके लीला-विलास किये थे। अष्टछापके कवि कुम्भनदासजीका यहाँ निवास स्थल था । यहाँपर उनके नामका सरोवर और खिड़क प्रसिद्ध है।

Posted on

मकर संक्रांति

दिनांक 14.01.2022 शुक्रवार को भगवान् सूर्यदेव 14:12:26 पर मकर राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। इस दिन को सम्पूर्ण भारतवर्ष में अलग-अलग नामों के साथ, अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। जिनमें सबसे प्रचलित है:-

“मकर संक्रान्ति”


सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रान्ति कहते हैं। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति के बीच का समय ही सौर मास है। वैसे तो सूर्य संक्रान्ति 12 हैं, लेकिन इनमें से चार संक्रान्ति महत्वपूर्ण हैं जिनमें मेष, कर्क, तुला, और मकर। सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश का नाम ही मकर संक्रान्ति है। धनु राशि बृहस्पति की राशि है। इसमें सूर्य के रहने पर मलमास होता है। इस राशि से मकर राशि में प्रवेश करते ही मलमास समाप्त होता है और शुभ मांगलिक कार्य हम प्रारंभ करते हैं। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है।

मकर संक्रान्ति के दिन पूर्वजों को तर्पण और तीर्थ स्नान का अपना विशेष महत्व है। इससे देव और पितृ सभी संतुष्ट रहते हैं। सूर्य पूजा से और दान से सूर्य देव की रश्मियों का शुभ प्रभाव मिलता है और अशुभ प्रभाव नष्ट होता है। इस दिन स्नान करते समय स्नान के जल में तिल, आंवला, गंगा जल डालकर स्नान करने से शुभ फल प्राप्त होता है।

मकर संक्रान्ति का दूसरा नाम उत्तरायण भी है क्योंकि इसी दिन से सूर्य उत्तर की तरफ चलना प्रारंभ करते हैं। उत्तरायण के इन छः महीनों में सूर्य के मकर से मिथुन राशि में भ्रमण करने पर दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। इस दिन विशेषतः तिल और गुड़ का दान किया जाता है। इसके अलावा खिचड़ी, तेल से बने भोज्य पदार्थ भी किसी गरीब ब्राह्मण को खिलाना चाहिए। छाता, कंबल, जूता, चप्पल, वस्त्र आदि का दान भी किसी असहाय या जरूरत मंद व्यक्ति को करना चाहिए।

राजा सागर के 60,000 पुत्रों को कपिल मुनि ने किसी बात पर क्रोधित होकर भस्म कर दिया था। इसके पश्चात् इन्हें मुक्ति दिलाने के लिए गंगा अवतरण का प्रयास प्रारंभ हुआ! इसी क्रम में राजा भागीरथ ने अपनी तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया। स्वर्ग से उतरने में गंगा का वेग अति तीव्र था इसलिए शिवजी ने इन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। फिर शिव ने अपनी जटा में से एक धारा को मुक्त किया। अब भागीरथ उनके आगे-आगे और गंगा उनके पीछे-पीछे चलने लगी। इस प्रकार गंगा गंगोत्री से प्रारंभ होकर हरिद्वार, प्रयाग होते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुँचीं यहां आकर सागर पुत्रों का उद्धार किया। यही आश्रम अब गंगा सागर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही राजा भागीरथ ने अपने पुरखों का तर्पण कर तीर्थ स्नान किया था। इसी कारण गंगा सागर में मकर संक्रान्ति के दिन स्नान और दर्शन को मोक्षदायक माना है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था इसीलिए उन्होंने शर-शैय्या पर लेटे हुए दक्षिेणायन के बीतने का इंतजार किया और उत्तरायण में अपनी देह का त्याग किया। उत्तरायण काल में ही सभी देवी-देवताओं की प्राण प्रतिष्ठा शुभ मानी जाती है। धर्म-सिंधु के अनुसार-मकर संक्रान्ति का पुण्य काल संक्रान्ति समय से 16 घटी पहले और 40 घटी बाद तक माना गया है। मुहूर्त चिंतामणि ने पूर्व और पश्चात् की 16 घटियों को ही पुण्य काल माना है।

भारतीयों का प्रमुख पर्व मकर संक्रान्ति अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में वहाँ की परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। इसी दिन से अलग-अलग राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। मकर संक्रान्ति त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है।

उत्तर प्रदेश : मकर संक्रान्ति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है।

गुजरात और राजस्थान : उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है।

आंध्रप्रदेश : संक्रान्ति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है।

तमिलनाडु : किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। घी में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है।

महाराष्ट्र : लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं।

पश्चिमबंगाल : हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है।

असम: भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

पंजाब : एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। धूमधाम के साथ समारोहों का आयोजन किया जाता है।

मकर संक्रान्ति मुहूर्त पुण्य काल मुहूर्त : 14:12:26 से 17:45:10 तक
अवधि: 03 घंटे 22 मिनट

महापुण्य काल मुहूर्त : 14:12:26 से 14:36:26 तक
अवधि : 0 घंटे 24 मिनट

Posted on

सांवरी सुनारन

मान सरोवर के पास से एक सुन्दर साँवरी सुनारन जा रही थी।
कोई बिछिया ले लो, अरे कोई तो ले लो ! ऐसे वैसी नही है ये बिछिया अनमोल रतन जड़े हैं इसमें। अरी ! तू तो ले ले, देख ! इस बिछिया को मन्त्र तन्त्र से बांध दिया है मैंने इसको जो लगाकर चलेगी इसकी ध्वनि जिस पति, प्रियतम के कानों में जायेगी बस वो तो गुलाम बन गया समझो।
आहा ! कितना सुन्दर बोलती थी वो साँवरी सब बरसानें की सखियाँ उसकी आवाज सुनकर बाहर आ गयीं। वो साँवरी थी, सब देखनें लगीं सुन्दर थी, नही-नहीं,सुन्दर ही नही बहुत सुन्दर थी ; रँग साँवरा था ज्यादा ही साँवरा था।
उसकी आवाज में जादू था साँवरी तो थी, पर गजब की लग रही थी। किसी अच्छे घर की सुनारन लग रही थी।

‘तुम्हारे बरसानें में पानी मिलेगो ?’
थक गयी थी चिल्लाते चिल्लाते–”बिछिया ले लो”–सुबह से ही तो चिल्लाये जा रही थी।
‘तो क्या तुम्हारी बिछिया एक भी नही बिकी ?’ एक गोपी पानी ले आयी थी और पानी पिलाते हुये पूछ रही थी।

‘ना जी ! कछु नाय बिको’–सुनारन बोली
‘अजी ! हम तो ऐसे ही आय गयीं, नही तो हम नहीं जातीं ऐसे वैसे किसी भी गाँव में।’ पानी पी लिया था और वहीं बैठे बैठे बातें बनानें लगी थी वो सुनारन।
‘अब देखो ! हम महलन की सुनारन हैं ऐसे कोई गली कूचे में घूम के बेचवे वारी थोड़े ही हैं। वो तो आग यीं यहाँ।’
‘तो क्या कहना चाह रही हो ?’–बरसानें की एक गोपी, वो भी तुनक गयी।
‘हाँ तो सही कह रही हूँ, हमारे इतनें कीमती बिछिया या गाँव में कौन लेगा ?’ सुनारन बोली
‘तू हमारे बरसानें के महल में ना गयी ?’ गोपी नें फिर पूछा।
‘देख लियो बरसाना कछु नाय यहाँ हम तो चलीं अब।’ इतना कहकर अपना थैला उठाया सुनारन नें और चल दी।
‘अरी ! रुक तो सुन ! महल में चली जा वहाँ खूब तेरी खातिरदारी होगी और तेरे सारे गहनें भी बिक जायेंगें।’
‘बीर ! अब ना बेचनो मोय गर्मी में वैसे ही परेशान हो गयी हूँ।’
‘अच्छा ! रुक तो चल मेरे साथ !’ वो गोपी चल दी उस सुनारन के आगे-आगे।
‘पर कहाँ ले जा रही है तू’–सुनारन भी पूछती जा रही है।
‘बृषभानु जी के महल में’–गोपी इतना ही बोली और चलती रही।
‘ये सुनारन है पास के गांव से आयी है कुछ गहनें लाई है देख लो नही तो ये बातूनी बहुत है यहाँ बरसानें में इसके कुछ भी गहनें नही बिके ना तो ये बदनामी करेगी’–बरसानें की गोपी इतना ललिता सखी को कहकर चली गयी।
‘क्या लाइ हो ? दिखाओ ?’–ललिता सखी बोली।
‘तुमको लेना है ?’–सुनारन सच में ही ज्यादा बोलती है।
‘नही मुझे तो नही लेना पर हाँ हमारी लाडिली को लेना है’–ललिता सखी नें कहा और ये भी कहा कि ‘पहले हमें दिखाओ हमें अच्छा लगेगा तो……’ पर इतना कहते हुए ललिता सखी नजरें गढ़ाकर सुनारन को देखनें लगी थी–तुम्हें कहीं देखा है ?’ ललिता सखी नें कहा।
‘अजी ! नजर न लगाओ अब हम पर’–घूँघट खींच लिया था उस सुनारन नें।
‘अब देखो ! अपनी लाडिली को कहो कि उन्हें लेना है तो रुकूँ मैं नही तो जाऊँ’–सुनारन बोली।
‘हूँ’–ललिता सखी निज महल में गयीं, बड़ी गहरी नींद में सो रही थीं श्रीजी, देखकरलौट आई–’नहीं जाओ अभी लाडिली सो रही हैं।
ठीक है सो रही हैं ? तो जगा दो’
‘सुनारन तू विचित्र है, ऐसे कैसे जगा दें ?’ ललिता सखी नें जबाब दिया।
‘अब हम इतनी दूर से आयी हैं तो क्या तुम्हारी लाडिली उठ भी नही सकतीं ?’–हद है ये सुनारन तो लड़नें पर उतारू हो गयी थी।
‘कौन ! कौन है ललिते !’–श्रीराधा रानी उठ गयीं।
‘अरे ! एक काली सुनारन आयी है’–ललिता नें वहीं से बोला।
‘देखो जी ! नही लेना है तो मत लो, पर ये काली गोरी का भेद न करो यहाँ। अरे ! मैं सब जानती हूँ उस काले कन्हैया नें तुम्हारे बृजमण्डल को घुमा रखा है क्या मुझे काली-काली कहती हो ये काले बादल न बरसें ना तो तुम अन्न न खा सकतीं।’
‘अरे ! तू तो नाराज हो गयी’–ललिता सखी ने कुछ मनुहार किया।
‘काहे नही हों हम नाराज’
‘पर तू है बहुत सुन्दर’–ललिता मुस्कुराईं। ‘इतनी सुन्दरता कहाँ से पाई तैनें बता ना ?’–ललिता बोलनें लगीं।
‘मेरा हृदय अब ठीक नही है इसलिये मैं जा रही हूँ’–सुनारन तो जानें लगी।
‘अच्छा ! अच्छा ! रुक जा रुक फिर पूछ के आती हूँ’–ललिता सखी फिर गयी, और इस बार महल के भीतर से वापस आकर सुनारन को भी ले गयी।
जब जा रही थी निज महल में साँवरी सुनारन तब उसकी खुशी देखने जैसी थी। वो गदगद् भाव से भरी थी वो बोलती भी जा रही थी–स्वर्ग फेल है, वैकुण्ठ भी तुच्छ है, इस बरसानें की शोभा के आगे तो आहा ! कितना दिव्य है ये बरसाना और बरसानें में भी ये लाडिली का महल’–बातूनी सुनारन बोलती ही गयी श्रीजी के निज महल में।
‘ये रहीं हमारी श्रीराधा रानी’–ललिता सखी नें दिखाया।
‘हे लाडिली ! ये है वो साँवरी सुनारन कह रही है पास के गांव से आयी हूँ आभूषण लेकर आयी है बातें तो बड़ी बड़ी करती है बोलती भी खूब है।’
श्रीराधा रानी नें सुनारन की ओर देखा वो हाथ जोड़े खड़ी थी। ‘सुन्दर है’–श्रीराधा जी के मुख से निकल गया।
‘हम काहे की सुन्दर हैं सुन्दर तो आप हैं !’–साँवरी सुनारन नें अब बोलना शुरू कर दिया था।
‘आप का ही नाम है ना ! श्रीराधा ! आहा ! मैंने आपका नाम बहुत सुना है और जब से सुना है तब से ही आपको देखनें की इच्छा थी’–सुनारन बोली।
‘आहा ! कितना मीठा बोलती है सुनारन ! सच में तू मुझे बहुत अच्छी लगी पर तुझे देख कर मुझे ऐसा लगता है कि तेरा और मेरा परिचय जन्मों जन्मों का है’–श्री राधा रानी बोलीं।
‘अजी ! ये तो आपकी महानता है नही तो हम कहाँ सुनारन’
‘अच्छा ! बता क्या चाहिये तुझे ?’–श्रीराधा रानी उसके पास गयीं और उसका हाथ पकड़ उठाया–’बोल ! क्या चाहती है तू ?’–ध्यान से देखनें लगीं उस सुनारन को।
‘ये घुँघराले बाल मैने छूए हैं’ ये कपोल जानें पहचानें से लग रहे हैं’ ये हाथ…’श्रीराधा जी को रोमांच होनें लगा।
तुरन्त सुनारन नीचे बैठ गयी–’मैं आपको पायल पहनाऊँगीं।’
‘पर तू मोल क्या लेगी ?’–सुनारन का चिबुक पकड़ कर उठाया।
मोल ? मोल मैं जो कहूँ’–सुनारन बोली।
‘नही ऐसे नही होता’ जो मोल भाव हो पहले ही बता’–ललिता नें स्पष्ट कहा।
‘आप बरसानें की राजदुलारी हो, फिर ये मोल भाव ?’
श्रीराधा जी उस सुनारन की एक-एक बात पर गद्गद हुयी जा रही थीं। ‘अच्छा ! ठीक है ठीक है तू जो कहेगी।’
सुनारन खुश हो गयी और उसनें अपनें झोला से आभूषण निकालनें शुरू किये–’ये पायल, हे भानु दुलारी ! ये है पायल। इसमें मेरा हृदय है लो आपके पांवों को मेरा हृदय सौंपती हूँ।’
पायल लगा दिया सुनारन ने–’ये कुण्डल आपको बहुत जंचेंगे’–लगा दिए कुण्डल। ‘ये हार शुद्ध मोतियों का हार है बहुत कीमती है’–आँखें मटकाती हुयी बोली।
‘सुनारन ! अब बता क्या लेगी ?’–श्रीराधा रानी ने अन्त में पूछा।
‘मुझे हिसाब तो आता ही नही इसलिये मैं क्या कहूँ !’–साँवरी सुनारन अब मटक रही थी।
‘पर तूनें तो कहा था कुछ नही लूँगी’–ललिता सखी नें कहा।
‘गलत बात है ! आप अपनी लाडिली से पूछ लो, मैने कहा था ना, आपसे मोल जो मैं कहूँगी।
‘हाँ कहा था कहो क्या चाहिये’–श्रीजी नें मुस्कुरा के पूछा। मौन ही हो गयी थी कुछ देर तक वो साँवरी कुछ बोल ही नही पाई।
‘अरी ! कुछ तो कह क्या दूँ मैं तुझे।’–उठकर खड़ी हो गयी नेत्र सजल हो गए उस सुनारन के। जब नयनों को देखा श्रीराधा रानी ने तब वो चौंक गयीं।
‘मुझे एक बार अपने हृदय से लगा लो नेत्र बरस पड़े थे।’
श्रीराधा रानी बस देखती ही रहीं उनके भी समझ नही आ रहा था कि ये सुनारन तो पहचानी सी लग रही है।
‘प्यारी ! बस एक बार अपनें हृदय से लगा लो फिर’–वही बात दोहराये जा रही थी सुनारन।
श्रीराधा रानी से रहा नही गया वो दौड़ीं और उस सुनारन को जैसे ही गले से लगाया–’तुम ? प्यारे श्याम सुन्दर ?’ आनन्दित हो उठीं श्रीजी।
‘ओह ! तो तुम हो, वही मैं कह रही थी कि इस सुनारन को कहीं तो देखा है’–ललिता सखी नें हँसते हुए कहा।
‘प्यारे ! मेरे प्राण ! मेरे सर्वस्व ! क्यों ऐसी लीला करते हो ?’–कपोल को छूते हुये श्रीराधा रानी बोल रही थीं।
‘तुम्हारे बिना एक पल भी चैन नही आता सच प्यारी !’
पर ये क्या ? अन्य समस्त सखियाँ भी वहाँ आ गयीं और ललिता के कहने पर सबने पकड़ लिया। अब श्याम सुन्दर वहाँ से भाग भी तो नही सकते थे।

श्रीराधा जी बस हँस रही थीं आनन्दित थीं क्यों न हों आनन्दित, उनका प्यारा जो उनके सामने था।

Posted on

भगवती यमुना


श्रीराधाकृष्ण युगलके केलि-विलासमें सब प्रकारसे सहायिका श्रीकृष्ण स्वरूपिणी भगवती कृष्णा या महारानी यमुनाजीने वृन्दावनको तीन ओर घेर रखा है। ये अपने सुरम्य तटपर दोनों ओर नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे लदे हुए सघन वृक्षों और लताओंसे असंख्य रमणीय निकुञ्जोंका सृजनकर प्रिया प्रियतमके रस-विलासमें सम्पूर्ण रूपसे अपना सहयोग प्रदान करती हैं।

दिव्य मणिमय घाटोंसे सुसज्जित कदम्ब, तमाल, आम्र, बकुल आदि वृक्षों और उनसे निर्मित विविध कुञ्जोंसे परिमण्डित, सप्तदल-कमलोंसे सर्वदा सुशोभित श्रीयमुनाकी प्रेममय वारिमें सखियोंके साथ श्रीराधाकृष्ण युगल जलकेलि और नौकाविहार करते हैं। ऐसी भगवती यमुना सदैव युगल किशोरकी सेवाकर परम वन्दनीय हैं

चिदानन्दभानोः सदा नन्दसूनोः परप्रेमपात्री द्रवब्रह्मगात्री ।
अघानां लवित्री जगत्क्षेमधात्री पवित्री क्रियान्नो वपुमिंत्र पुत्री ।।

चिदानन्द-सूर्य-स्वरूप नन्दनन्दन श्रीकृष्णके उन्नत उज्ज्वल प्रेमको प्रदान करने वाली साक्षात् परब्रह्मकी द्रवितविग्रह-स्वरूपा, अपने स्मरण मात्रसे सम्पूर्ण प्रकारके अघों, महापापोंको दूरकर हृदयको पवित्र बनाने वाली, जगत् मङ्गलकारिणी, मरु हृदयमें भी ब्रज-रसका सञ्चार करनेवाली सूर्यपुत्री श्रीयमुनाजीकी पुनः पुनः वन्दना करता हूँ। वे हमें पवित्र करें।

गङ्गादि- तीर्थ – परिषेवित-पादपद्मा गोलोक-सौख्यरस-पूरमहिं महिम्ना ।
आप्लाविताखिल-सुधासु- जलां सुखाब्धी राधामुकुन्द-मुदितां यमुनां नमामि ॥

गंगा, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु आदि तीर्थोंके द्वारा जिनके श्रीचरणकमल सर्वदा परिसेवित होते हैं, जो गोलोक-वृन्दावनके श्रीश्रीराधाकृष्ण युगलकी रसपरिपाटी युक्त सेवाको प्रदान करनेवाली महिमासे युक्त हैं जो अपने अमृतपूर्ण जल प्रवाहके द्वारा श्रीराधा-मुकुन्दको सुख-समुद्रमें निमग्न रखती हैं, उन कृष्ण प्रिया श्रीयमुनाजीको पुनः पुनः प्रणाम है।

Posted on

भक्त जोग परमानन्द जी

दक्षिण भारत के वारसी नामक प्रांत में महान भक्त जोग परमानन्द जी का जन्म हुआ था। जब ये छोटे बालक थे, इनके गाँव में भगवान की कथा तथा कीर्तन हुआ करता था। इनकी कथा सुनने में रुचि थी। कीर्तन इन्हें अत्यन्त प्रिय था। कभी रात को देर तक कथा या कीर्तन होता रहता तो ये भूख प्यास भूलकर मन्त्रमुग्ध से सुना करते।

एक दिन कथा सुनते समय जोग परमानन्द जी अपने आपको भूल गये। व्यासगद्दी पर बैठे वक्ता भगवान् के त्रिभुवन कमनीय स्वरूप का वर्णन कर रहे थे। जोग परमानन्द का चित्त उसी श्यामसुन्दर की रूपमाधुरी के सागर में डूब गया। नेत्र खेला तो देखते हैं कि वही वनमाली, पीताम्बर धारी प्रभु सामने खडे हैं। परमानन्द की अश्रुधारा ने प्रभु के लाल-लाल श्री चरणों को पखार दिया और कमललोचन श्रीहरि के नेत्रों से कृपा के अमृत बिन्दुओं ने गिरकर परमानन्द के मस्तक को धन्य बना दिया। लोग कहने लगे कि जोग परमानन्द पागल हो गये। संसार की दृष्टि मे जो विषय की आसक्ति छोडकर, इस विष के प्याले को पटककर व्रजेन्द्र सुन्दर मे अनुरक्त होता है, उस अमृत के प्याले को होठों से लगाता है, उसे यहाँ की मृग मरीचिका में दौड़ते, तड़पते, जलते प्राणी पागल ही कहते हैं। पर जो उस दिव्य सुधा रस का स्वाद पा चुका, वह इस गढ्ढे जैसे संसार के सड़े कीचड़ की और केसे देख सकता है। परमानन्द को तो अब परमानन्द मिल गया।

जगत् के भोग और मान बड़ाई से उन्हे क्या लेना-देना। अब तो वे बार-बार राम कृष्ण हरि जपते हैं और कभी नाचते हैं, कभी रोते हैं, कभी हँसते हैं, कभी भूमि पर लोटते हैं और विट्ठल-विट्ठल कहते हुए, उनका चित्त अब और कुछ सोचता ही नहीं। जोग परमानन्द जी अब पंढरपुर आ गये थे।

श्री परमानंद जी विलक्षण महात्मा थे, पंढ़रीनाथ का षोडशोपचार से नित्य पूजन करते और उसके पश्चात् मन्दिर के बाहर भगवान् के सामने गीता जी का एक श्लोक पढकर साष्टाङ्ग दण्डवत् करते। इस प्रकार सात सौं श्लोक पढ़कर सात सौ दण्डवत नित्य करने का उन्होंने नियम बना लिया था। सम्पूर्ण गीता का पाठ कर के सात सौ दण्डवत पूरी हो जाने पर ही वे भिक्षा करने जाते और भिक्षा में प्राप्त अन्न से भगवान को नैवेद्य अर्पण करके प्रसाद पाते। गरमी हो या सर्दी, पानी पड़े या पत्थर, श्री परमानन्द-जी को तो सात सौ दण्डवत नित्य करनी ही थीं। नेत्रों के सम्मुख पंढरीनाथ का श्री विग्रह, मुख मे गीता के श्लोक और हदय मे भगवान का ध्यान, सारा शरीर दण्डवत करने में लगा है। ज्येष्ठ में पृथ्वी तवे सी जलती हो तो भी परमानन्द जी की दण्डवत चलेगी और पौष माघ मे बरफ सी शीतल हो जाय तो भी दण्डवत् चलेगी। वर्षा हो रही है, भूमि कीचड़ से ढक गयी है, पर परमानन्द जी भीगते हुए, कीचड़ से लथपथ दण्डवत करते जा रहे हैं।

एक बार एक साहूकार बाजार करने पण्ढरपुर आया। श्री जोग परमानन्द जी की तितिक्षा देखकर उसके मन में श्रद्धा हुई। रेशमी कपड़े का एक थान लेकर वह उनके पास पहुँचा और स्वीकार करने की प्रार्थना करने लगा। परमानन्दजी ने कहा- “भैया ! मैं इस वस्त्र को लेकर क्या करूँगा। मेरे लिये तो फटे-चिथड़े ही पर्याप्त हैं। इस सुन्दर वस्त्र को तुम श्री भगवान् को भेंट करो।” परन्तु व्यापारी समझाने से मान नहीं रहा था। वह आग्रह करता ही जाता था। वस्त्र न लेने से उसके ह्रदय को दुख होगा, यह देखकर परमानन्द जी ने वह रेशमी वस्त्र स्वीकार कर लिया। जोग परमानन्द जी ने रेशमी वस्त्र स्वीकार तो लिया था व्यापारी को कष्ट न हो इसलिये। पर जब वस्त्र ले लिया, तब इच्छा जगी कि उसे पहनना भी चाहिये। दूसरे दिन वे रेशमी वस्त्र पहनकर भगवान की पूजा करने आये। आज भी वर्षा को रही थी। पृथ्वी कीचड़ से भरी थी। परमानन्द जी का मन वस्त्र पर लुभा गया। पूजा कर के दण्डवत करते समय उन्होंने वस्त्र समेट लिये। आज उनकी दृष्टि भगवान् विट्ठल प्रभुपर नहीं थी, वे बार-बार वस्त्र देखते थे, वस्त्र संभालते थे। दण्डवत् ठीक नहीं होती थी, क्योंकि मूल्यवान् नवीन रेशमी वस्त्र के कीचड़ से खराब हो जाने का भय था। भक्ति मार्ग में दयामय भगवत अपने भक्त की सदा उसी प्रकार रक्षा करते रहते हैं, जैसे स्नेहमयी माता अपने अबोध शिशु की करती है। बालक खिलौना समझ कर जब सर्प या अग्नि के अंगारे लेने दौड़ता है तब जननी उसे उठाकर गोद में ले लेती है। जहाँ माया के प्रलोभन दूसरे साधकों को भुलावे में डालकर पथ भ्रष्ट कर देते हैं, वहाँ भक्त का उनसे कुछ भी नहीं बिगड़ता। जो अपने को श्रीहरि के चरणों में छोड़ चुका, वह जब कहीं भूल करता है, तब झट उसे वे कृपा-सिन्धु सुधार देते हैं। वह जब कहीं मोह में पड़ता है, तब वे हाथ पकड़कर उसे वहाँ से निकाल लाते हैं। आज जोग परमानन्द रेशमी वस्त्रों के मोह में पड़ गये थे। अचानक किसी ने पूछा- ‘परमानन्द ! तू वस्त्र को देखने लगा। मुझे नहीं देखता आज तू ?” परमानन्द जी ने दृष्टि उठायी तो जैसे सम्मुख श्री पांडुरंग भगवान् कुछ मुस्कराते, उलाहना देते खड़े हों। झट उस रेशमी वस्त्र को टुकड़े-टुकड़े फाड़कर उन्होंने फेंक दिया। मुझ से बड़ा पाप हुआ। मैं बड़ा अधम हूँ। जोग परमानन्द जी को बड़ा ही दु:ख हुआ। वे अपने इस अपराध का प्रायश्चित्त करने का विचार करके नगर से बाहर चले गये। दो बैलों को जुए में बाँधा और अपने को रस्सी के सहारे जुए से बाँध दिया। चिल्लाकर बैलों को भगा दिया। शरीर पृथ्वी में घसिटता जाता था, कंकडों से छिल रहा था, काँटे चुभते और टूटते जाते थे, रक्त की धारा चल रही थी, किन्तु परमानन्द उच्चस्वर से प्रसन्न मन से राम ! कृष्ण ! गोविन्द ! की टेर लगा रहे थे। जैसे-जैसे शरीर छिलता, घसिटता, वैसे-वैसे उनकी प्रसन्नता बढ़ती जाती थी। वैसे-वैसे उनका स्वर ऊँचा होता जाता था, और वैसे-वैसे बैल भड़क कर जोर से भागते जाते थे। भक्तवत्सल प्रभु से अपने प्यारे भक्त का यह कष्ट देखा नहीं गया। श्री कृष्ण एक ग्वाले के रूप में प्रकट हो गये। बैलों को रोककर जोग परमानन्द को उन्होंने रस्सी से खोल दिया और बोले- “तुमने अपने शरीर को इतना कष्ट क्यों दिया। भला, तुम्हारा ऐसा कौन सा अपराध था ? तुम्हारा शरीर तो मेरा को चुका है। तुम जो कुछ खाते हो, वह मेरे ही मुख में जाता है। तुम चलते हो तो मेरी उससे प्रदक्षिणा होती है। तुम जो भी बातें करते हो, वह मेरी स्तुति है। जब तुम सुख से लेट जाते हो तब वह मेरे चरणों में तुम्हारा साष्टाङ्ग प्रणाम हो जाता है। तुमने यह कष्ट उठाकर मुझे रुला दिया है।” प्रभु ने उठाकर उन्हें हृदय से लगा लिया और सारी पीड़ा गायब हो गयी। जोग परमानन्द जी श्याम सुन्दर से मिलकर उनमें एकाकार हो गये। श्री जोग परमानन्द जी का नाम इस लीला के कारण आगे दण्डवती अथवा दण्डवत् जोग परमानन्द जी पड़ गया

Posted on

आखिर ऐसा क्यों होता हैं कि श्री धाम में बस जाने को हर पल जी चाहता है?

अनन्त सृष्टि में कितने ऐसे है जिनको वृन्दावन का नाम सुनने को मिलता है, कितने ऐसे है जिनको वृन्दावन का महत्व सुनने को मिलता है, उनमें से कितने ऐसे है जिनके हृदय में उल्लास होता है वृन्दावन आने का, वृन्दावन दर्शन करने का और कोई ही विरलय ऐसे है जिनके हृदय में छट पताहट, व्याकुलता होने लगती है कि अब मुझे वृन्दावन वास करना है, कुछ बने बिगड़े उसकी परवाह नहीं अब जैसे भी है हम राधा रमण के धाम श्री वृन्दावन धाम का निरंतर वास स्वीकार करेंगे यह कोई बहुत विरलय महा भाग्यशाली है

सभी धामों से ऊपर है ब्रज धाम और सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है श्री वृन्दावन। इसकी महिमा का बखान करता एक प्रसंग—भगवान नारायण ने प्रयाग को तीर्थों का राजा बना दिया। अतः सभी तीर्थ प्रयागराज को कर देने आते थे। एक बार नारद जी ने प्रयागराज से पूँछा-“क्या वृन्दावन भी आपको कर देने आता है?” तीर्थराज ने नकारात्मक उत्तर दिया। तो नारद जी बोले-“फ़िर आप तीर्थराज कैसे हुए।” इस बात से दुखी होकर तीर्थराज भगवान के पास पहुँचे। भगवान ने प्रयागराज के आने का कारण पूँछा। तीर्थराज बोले-“प्रभु! आपने मुझे सभी तीर्थों का राजा बनाया है। सभी तीर्थ मुझे कर देने आते हैं, लेकिन श्री वृन्दावन कभी कर देने नहीं आये। अतः मेरा तीर्थराज होना अनुचित है।”भगवान ने प्रयागराज से कहा-“तीर्थराज! मैंने तुम्हें सभी तीर्थों का राजा बनाया है। अपने निज गृह का नहीं। वृन्दावन मेरा घर है। यह मेरी प्रिया श्री किशोरी जी की विहार स्थली है। वहाँ की अधिपति तो वे ही हैं। मैं भी सदा वहीं निवास करता हूँ। वह तो आप से भी ऊपर है।

एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका, तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।चार बार चित्रकूट, नौ बार नासिक, बार-बार जाके बद्रिनाथ घूम आओगे॥कोटि बार काशी, केदारनाथ रामेश्वर, गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम श्यामा के, वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥

वृन्दावन की छवि प्रतिक्षण नवीन है। आज भी चारों ओर आराध्य की आराधना और इष्ट की उपासना के स्वर हर क्षण सुनाई देते हैं। कोई भी अनुभव कर सकता है कि वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करते ही एक अदृश्य भाव, एक अदृश्य शक्ति हृदय स्थल के अन्दर प्रवेश करती है और वृन्दावन की परिधि छोड़ते ही यह दूर हो जाती है।

Posted on

गौ दोहन की एक लीला



एक बार नन्द जी कृष्ण को लेकर गउओं के बाड़े में गए। उन्होंने वहां पर राधा जी को खड़े देखा; नन्द ने राधा को पहचान कर कहा की तुम दोनों मिलकर खेलो पर कहीं दूर मत जाना, मैं गायों की गिनती कर रहा हूँ। तुम आसपास ही रहना। हे वृषभानु की बेटी राधा, तुम अपने साथ कृष्ण को भी खेला लो,

(सूरदास जी कहते हैं) और जरा श्याम का ध्यान भी रखना, कहीं ऐसा न हो की कोई गाय इसे मारने लगे।
अब नन्द बाबा जी चले गए हैं। राधा कृष्ण से कहती हैं- कृष्ण! नन्द बाबा की बात ध्यान से सुन लो, मुझे छोड़कर अगर कहीं जाओगे तो मैं तुमको पकड़कर अपने पास ले आउंगी। यह तो अच्छा हुआ की नंदबाबा तुम्हे मेरे हवाले कर गए हैं, अब चाहे जो हो, मैं तो तुम्हे कहीं भी नहीं जाने दूंगी।

तुम्हारी बांह भी नहीं छोडूंगी, अन्यथा महर(नन्द बाबा) हमसे नाराज हो जायेंगे(की मैं कृष्ण को तुम्हे सौंप गया था, तुमने उसे कहीं जाने क्यों दिया?)
राधा की इन प्रेम अधिकार बातों परिहास भरी बातों से ऊपरी करोड़ दिखाते हुए कृष्ण कहने लगे- राधा! तू मेरी बांह छोड़ दे, ये बेकार की अनाप शनाप बात ना कर। सूरदास जी कहते हैं इस प्रकार राधा कृष्ण अद्भुत प्रेम लीला कर रहे हैं।

तुम पै कौन दुहावै गैया..…….

सूरदास जी बता रहे हैं, राधा रानी भगवान श्री कृष्ण से कहती है- मनमोहन ! तुमसे कौन अपनी गाय को दुहावेगा? तुम सोने की दोहनी लिए रहते हो, और आधे पैरों से पृथ्वी पर बैठते हो। तुम मेरी प्रीति को अत्यंत रसमयी जानकर ही गोष्ठ में गायों को दुहने के लिए आते हो तो पर तुम्हे तो दूध दुहना आता ही नही है।
तुम इधर मेरी और देखते ही रहते हो, और उधर दूध की धार निकलते रहते हो, क्या तुम्हे तुम्हारी माँ ने यही सिखाया है?
हे मोहन! तुम उसी युवती से गुप्त प्रीति करो, जो तुम्हारी प्रिया हो। सूरदास जी कहते हैं की मेरे प्रभु श्री कृष्ण से राधा ने इस प्रकार झगड़ा करना सीख लिया है, जैसे कोई झगड़ालू स्त्री घर के स्वामी अपने खसम से झगड़ती है।

दुहि दीन्ही राधा की गाइ……..

गो दोहन लीला का सूरदास जी वर्णन करते हैं- श्री कृष्ण जी ने राधा जी की गाय का दूध तो निकल दिया, लेकिन वे अपने हाथ से दूध की दोहनी राधा जी को नही दे रहे हैं। जिसे वे हा-हा करती हुई उनके चरणों पर गिर रही हैं। ज्यों-ज्यों राधा प्रिया हा-हा करती हैं, त्यों-त्यों कन्हैया और अधिक हँसते हैं।

भगवान श्री कृष्ण राधा जी से कहते हैं- हे प्यारी ! तुम फिर हा-हा करो। मैं अपने पिता नंदजी की सौगंध खाकर कहता हूँ की तब मैं अपनी दोहनी तुम्हे दे दूंगा।’ तब राधा जी से पुनः पुनः हा-हा करवाकर श्रीकृष्णजी ने दोहनी प्रिया जी के हाथों में दे दी। सूरदास जी कहते हैं इस प्रकार श्यामसुंदर ने रसमय हाव-भाव करके कुमारी राधा जी को उनके घर भेज दिया।

Posted on

राधा टीला

ये वृन्दावन परिक्रमा मार्ग में ठाकुर जी का लीला स्थान है l अगर आप विशुद्ध भाव के साथ यहां आते हैं तो आप भी अपने रोम-रोम में दिव्याता को पाएंगे। साधना करते विरक्त संतों के अनुभवों को आत्मसात करने में जरा भी संकोच न होगा जो कहते हैं, “यहां राधा रहती है।” शांति के इस धाम में बिहारी विहारिणी का सरस वृंदावन बसता है। संतों ने इस स्थान की पावनता, रमणीयता और दिव्या को भीड़-भाड़ और प्रचार-प्रसार से बचाए रखा है। राधा टीला हरिदासी संप्रदाय की छोटी गद्दी है।

वृंदावन में रोज 4:00 बजे राधा टीला में दाना डाला जाता है और …यहाँ आप हजारो की संख्या में कई सारे तोते, मोर, और बहुत ही अद्भुत पक्षियों के दर्शन कर सकते हैं, और वो कोई साधारण पक्षी नही होते हैं वो सभी श्यामा जू के भक्त होते हैं।

कहते है राधाटीला में आज भी यहाँ श्यामा श्याम जूँ लीला करने पधारते है l इसलिये निधीवन और सेवा कुँज की तरह संध्या के बाद यहाँ के दर्शन भी बंद कर दिये जाते है l कहते है दिन के समय श्यामा श्याम जी पेड का रूप धारण कर लेते है और संध्या में पुनः अपने स्वरूप में प्रकट होते है l आज भी हम ये दर्शन राधाटीला में कर सकते है.. वहाँ एक ही जड से निकले हुए है दो पेड है, एक जड में से निकले हुये होने के बावजुद भी एक पेड सफेद और एक पेड श्याम वर्ण का है l……… जो स्वयं श्यामा श्याम जी है l
कहते है एक लीला यहाँ यह हुई थी कि एक समय जब श्यामा श्याम जी जब रास कर रहे थे तो ठाकुर जी के भक्त गोपीयों को भुख लगने लगी l तब वहाँ खीर का भोग तो था पंरतु सभी खीर खाये कैसे.??

तब कान्हा जी ने एक पेड के पत्ते को लिया और उसे दोने का आकार दिया ( दोने:- वो जो पत्ते का होता है और प्रसाद वितरण के लिये उपयोग किया जाता है…) फिर सभी ने मिलकर ठाकुर जी के द्वारा बनाये हुये दोनो में खीर ग्रहण कर अपनी भुख शांत की l ठाकुर जी की लीला वश आज भी उस पेड में दोने के आकार में पत्ते आते है l ये दर्शन हम राधाटीला श्री वृन्दावन धाम में कर सकते है l

प्रेम से बोलो राधे राधे

Posted on

विश्राम घाट

विश्राम घाट मथुराका सर्वप्रधान एवं प्रसिद्ध घाट है।

सौर पुराणके अनुसार विश्रान्ति तीर्थ नामकरणका कारण बतलाया गया है

ततो विश्रान्ति तीर्थाख्यं तीर्थमहो विनाशनम् ।

संसारमरु संचार क्लेश विश्रान्तिदं नृणाम ।

संसाररूपी मरुभूमिमें भटकते हुए, त्रितापोंसे प्रपीड़ित, सब प्रकारसे निराश्रित, नाना प्रकारके क्लेशोंसे क्लान्त होकर जीव श्रीकृष्णके पादपद्म धौत इस महातीर्थमें स्नान कर विश्राम अनुभव करते हैं। इसलिए इस महातीर्थका नाम विश्रान्ति या विश्राम घाट है। कहा जाता है कि भगवान् श्रीकृष्णने महाबलशाली कंसको मारकर ध्रुव घाटपर उसकी अन्त्येष्टि संस्कार करवाकर बन्धु-बान्धवोंके साथ यमुनाके इस पवित्र घाटपर स्नान कर विश्राम किया था। श्रीकृष्णकी नरलीलामें ऐसा सम्भव है; परन्तु षडैश्वर्यपूर्ण अघटन घटन पटीयसी सर्वशक्तियोंसे सम्पन्न सच्चिदानन्द स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको विश्रामकी आवश्यकता नहीं होती है। किन्तु भगवानसे भूले भटके जन्म मृत्युके अनन्त, अथाह सागरमें डूबते-उतराते हुए क्लान्त जीवोंके लिए यह अवश्य ही विश्रामका स्थान है।

इस महातीर्थमें स्नान एवं आचमनके पश्चात् प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु लोग ब्रजमण्डलकी परिक्रमाका संकल्प लेते हैं और पुनः यहींपर परिक्रमाका समापन करते हैं।

कार्तिक माहकी यमद्वितीयाके दिन बहुत दूर दूर प्रदेशोंके श्रद्धालुजन यहाँ स्नान करते हैं। पुराणोंके अनुसार यम (धर्मराज) एवं यमुना (यमी) ये दोनों जुड़वा भाई-बहन हैं। यमुनाजीका हृदय बड़ा कोमल है। जीवोंके नाना प्रकारके कष्टोंको वे सह न सकीं। उन्होंने अपने जन्म दिनपर भैया यमको निमन्त्रण दिया। उन्हें तरह-तरहके सुस्वादु व्यज्जन और मिठाईयाँ खिलाकर सन्तुष्ट किया। भैया यमने प्रसन्न होकर कुछ माँगनेके लिए कहा। यमुनाजीने कहा- भैया ! जो लोग श्रद्धापूर्वक आजके दिन इस स्थानपर मुझमें स्नान करेंगे, आप उन्हें जन्म-मृत्यु एवं नाना प्रकारके त्रितापोंसे मुक्त कर दें। ऐसा सुनकर यम महाराजने कहा- ‘ऐसा ही हो। यूँ तो कहीं भी श्रीयमुनामें स्नान करनेका प्रचुर माहात्म्य है, फिर भी ब्रजमें और विशेषकर विश्राम घाटपर भैयादूजके दिन स्नान करनेका विशेष महत्व है। विशेषकर लाखों भाई-बहन उस दिन यमुनामें इस स्थलपर स्नान करते हैं।

Posted on

खिचड़ी उत्सव स्पेशल

सभी को राधे राधे ! श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश

इस उत्सव के बारे में काफी लोगो को बहुत कम जानकारी है तो इस ब्लॉग में हम आपके सब प्रश्नों को रखेगे !

वैसे तो राधावल्लभ जी मंदिर में ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन कोई उत्चसव नहीं होता हो ! इसमें से एक उत्सव है खिचड़ी उत्सव जो राधावल्लभ  सम्प्रदाय में बहुत प्राचीन काल से मनाया जाता है

ये उत्सव इस साल पौष शुक्ला दौज ( 4 जनवरी 2022 से 3 फरवरी 2022 ) एक महीने तक चलेगा !

मंदिर में सुबह 5 बजे से ही ये उत्सव रोज प्रारंभ हो जाता है और समाज गायन होता है ( मतलब की इनके पदों को राधावल्लभ जी को सुनाया जाता है ) आप खिचड़ी उत्सव के  पदों को अगर ध्यान से पढेगे तो अपने आप समझ जायेगे ! इसके बाद मंगला आरती होती है ! और राधावल्लभ जी जो भेष धारण करते है उनको बांटा भी जाता है वो धन्य है जिनको उनके वस्त्र परशादी में मिलते है !

एकादशी के दिन श्रीराधावल्लभलाल ‘ श्रीबिहारीजी बनते हैं


आप घर पर कैसे उत्सव मनाये ?

आप घर पर भी खूब अच्छे से उत्सव मना सकते है ! इस ब्लॉग में दिए दिए  सभी पदों को आप जैसा आपको समय मिले रोज अपने ठाकुर जी को सुनाये और उनको नए नए भेष में सजाये और भोग में खिचड़ी या अन्य गर्म चीज बना कर भोग लगाये !
और आपको रोज इसी राधे कृष्णा वर्ल्ड एप के हित स्पेशल में खिचड़ी उत्सव स्पेशल दर्शन में जाकर रोज दर्शन कर सकते है !


आप हमारे साथ भी आपके ठाकुरों की छवियो को शेयर कर सकते है जो की एप के खिचड़ी उत्सव स्पेशल में जाकर कर सकते है !

( If Anyone Want To Donate For This Seva : You May Click On Sant Seva Icon For Donation )


राधावल्लभ जी के खिचड़ी उत्सव के सभी पदों का हिंदी अनुवाद सहित वाख्या है
सभी हिंदी अनुवाद से समझ पायेगे की पदों का मतलब क्या है


खिचड़ी उत्सव के पद


प्रथम श्री सेवक पद सिर नाऊँ
करहु कृपा श्री दामोदर मोपै. श्री हरिवंश चरण रति पाऊँ ||
गुण गम्भीर व्यास नन्दन जू के तुव परसाद सुयश रस गाऊँ ||
नागरीदास के तुम ही सहायक, रसिक अनन्य नृपति मन भाऊँ ।।1।।

सर्वप्रथम मैं भी सेवक जी के चरणों मे नमस्कार करता हूँ। हे श्री दामोदरजी (सेवकजी का नाम) आप मेरे ऊपर कृपा करिये जिसके फलस्वरूप श्रीहस्विंश चरणाविन्द में मेरी प्रीति हो, प्रेम हो ।

व्यासनन्दन भीडित हस्तिंश प्रभु के सबसे दुर्ज्ञेय, अद्भुत रसमय गुण, ईसता, दीनता, उदारता इत्यादि करके गम्भीर है। आपका कृपा प्रसाद पाकर उनके रस का सुयश मान करूँ। हित नागरीदास जी कहते है कि मुझे केवल आपका ही भरोसा है आप ही मेरे सहायक होतेंगे रसिक अनन्य नृपति-श्रीहित हरिवंश सम्पूर्ण प्रभु के मन को भाने वाला बन जाऊँ ।


जयति जगदीश जस जगमगत जगत गुरु, जगत वंदित सु हरिवंश बानी|
मधुर, कोमल, सुपद, प्रीति-आनंद-रस, प्रेम विस्तरत हरिवंश बानी ॥
रसिक रस मत श्रुति सुनत पीवंत रस, रसन गावन्त हरिवंश बानी ।
कहत हरिवंश हरिवंश हरिवंश हित जपत हरिवंश हरिवंश बानी ।।2।।

श्री सवेक जी महाराज जयति कहकर वाणी और नाम को नमस्कार करते हैं, क्योंकि नाम और वाणी अभेद है “वानी श्री हस्विंश की, के हरिवंश ही नाम “

भी हरिवंश नाम के अर्थ अक्षर हरि ही का ऐश्वर्य यह सब लीला अवतार और उनके लोक, प्राणी मात्र, पशु पंछी, चराचर सब, सर्व-व्यापक तत्व ‘श्रीहित का भजन करते हैं, सब वेद पुराणादिक हरि से जीव तक, इसके आधीन है, परन्तु इस रहस्य को कोई जान नहीं सका। तव भीहरिवंश हित सम्पूर्ण प्रभु, आचार्य रूप में प्रगटे और श्रीहित का वाणी रूपी भजन देकर सबको अलभ्य लाभ दिया इसलिए तुम हे हरिवंश प्रभु, “जगत के ‘ईश हो और गुरू हो यह वाणी जो केवल रस ही भवित करती है जगत चंदनीय है, इसमें आणित जन भी आ गए।

श्री हरिवंश वाणी, एक रस, विशुद्ध नेह गई, मिलन रूपा, रास विलास, नित्य विहार का निरूपण करने वाली है, जो केवल रस ही भक्ति करती है. इसमें भिन्न-भिन्न और रसों की मिलौली नहीं है ‘अब या में मिलौनी मिलै न कछु जो खेलत यस सदा बन में इसलिए पद-पद प्रति केवल इसी वाणी को माधुर्यता और कोमलता की यथार्थ पढ़ती है, इसलिए यह वाणी प्रीतिरूप आनन्द रस पदती को प्राप्त है, और प्रेम का विस्तार करने वाली है।

‘रसिक – प्रिया-प्रीतम और परिकर, जो इस रस में मस्त है वे श्रवण करके इस वाणी द्वारा भवित रस का पान करते हैं “श्याम श्याम प्रगट-प्रगट अक्षर निकट प्रगट रस भवत अति मधुर वाणी और आगे सेवक जी महाराज कहते हैं “नाम वाली निकट श्याम श्यामा प्रगट रहत निशिदिन परम प्रीति जानी।”

और फिर स्वाद पाकर इसी वाणी को गाने लगते हैं प्रशंसा सूचक कहते हैं “हरिवंश, हरिवंश हरिवंश हित ऐसे प्रशंसा करते एक हरिवंश नाम को ही अथवा वाणी को ही जपते हैं।”


जयति वृषभानुजा कुँवरि यथे।
सच्चिदानन्द घन रसिक सिरमौर वर, सकल वाँछित सदा रहत साथे |
निगम आगम सुमति रहे बहु भाषि जहाँ , कहि नहीं सकत गुण गण अगाथे ।
जै श्री हित रूपलाल पर करहु करुणा प्रिये, देहु वृन्दाविपिन मित अबाथे ।।3।

तृषभानु कुँवरी वृष शब्द का एक अर्थ काम है सो यहाँ निकुंज रस के अन्तर्गत का अर्थ ‘प्रेम’ “हित, महापुरुषों ने किया है। प्रेम रूपी भानु यानी ‘श्रीहित मूर्तिवंत श्रीहित “कुंवरी राधे की जै हो ।

पीछे पदों में बता आये है कि यहां निकुंज रस में और रसों की मिलौनी नहीं है समाई नहीं है।

ब्रज वृन्दावन जहाँ दास्यरस, वात्सल्य रस, सख्य रस इत्यादि भिन्न-भिन्न रसों की मिलौनी है और जहाँ इन रसों में सक की लहरें है, उसे तो निगम आगम ने गाया ही है, उनकी गम्य यही तक है, परन्तु यह तो ‘श्रीहित’ का नित्य वृन्दावन है, यहां और की तो कौन कहे- हरि की भी गम्य नहीं, दुर्ज्ञेय है। यदि यहाँ व्रज की श्री वृषभानु जी की कुँवरी ऐसा अर्थ करें तो निगम आगम सुमति रहे बहु भाषि जहां, कहीं नही सकत गुण-गण अगाशे यह कहते नहीं बनता। क्योंकि निगम-आगम ने तो ब्रज वृन्दावन गाया। सेवक वाणी प्रमाण है ” निगम आगम अगोवर राधे, सहज माधुरी रूप निधि तहां श्रीजी की वाणी “अलक्ष राधास्त्र्यं निखलनिगमैरप्यतितरां इत्यादि राधासुध्धानिधि

नागरीदास जी ने सर्वप्रथम पद मे ही कहा है “गुण गम्भीर व्यासनन्दन जू के व्यासनन्दन कौ ? ‘श्रीहित ही तो हैं जो व्यास मिश्र जी के यहाँ प्रगटे “कृपा रूप जो वपु धरयों और श्री राधा कौन ? जो राह य श्रीहित ही तो हैं तहां नागरीदास को अष्टक “रसिक हरिवंश सरवंश श्रीराधिका, राधिका सरवंश, हरिवंश वंशी “पूरा अष्टक देख लेनो इति ।

इसलिये है ‘श्रीहित की मूर्तिवंत कुंवरी श्रीराधे तुम्हारी जय हो तुम सच्चिदानन्द घन स्वरूप हो और रसिकों की सिरमौर हो, जो आपके चरण कमलों की रति प्राप्त करने की वांछ करते हैं। आपके अपार गुण के गणों को वेद पुराण और बहुत भांति के ‘सुमति कहिये विद्वान और वेद आदि पर भाष्य लिखने वाले भाषी, वर्णन नहीं कर सकते।

श्रीहित रूपलाल जी महाराज कहते हैं ऐसी जो श्रीहित राधे है वह मुझ पर करुणा करके मुझे वृन्दावन में बाधा रहित बास प्रदान करें- अर्थात् मुझे अपना सहवारी स्वरूप प्रदान करके ‘नित्य वृन्दावन की कुंजो में स्थान दें।


श्री व्यानन्दन दीनबन्धु सुनि पुकार मेरी मूढ़ मन्द मति लबार भ्रमी जन्म बार-बार, कष्टातुर होरु नाथ शरण गही तरी ।
भजन-भाव बनत नाहिं मनुज देह वृथा जाय, करौ कृपा बेगि प्रभु बहुत भई देरी ।
त्रिगुण जनित सृष्टि मांझ दरसत महिं दिवा साँझ, हृदय तिमिरछाय रह्यो झुक सघन अंधेरी ।
कृपा दृष्टि वृष्टि करी राजत फूलवारी हरी, आतुर पर श्रवौ बूंद शुष्क होत जेरी|
ललित हित किशोरी नाम राखत प्रभु तुमसों काम, याम जात युगन तुल्य करौ नाथ चेरी ।।4।।

हे दीनबन्धु श्रीहरिवंश प्रभु, आप मेरी वन्दना सुनें। मैं मूद मन्द मति, लबार-बक करती रहने वाली, बार बार जन्म लेकर हर जन्म में भटकती रही हूँ। अर्थात् कहीं विश्राम नहीं मिला, और अब कष्टों से आतुर हे नाथ, आप की शरण में आई हूँ। मुझ से भजन-भाव बनता नहीं, यह मनुष्य देह वृशा ही बीत रही है । बहुत काल बीत चुका है, हे प्रभु अब आप मेरे ऊपर शीघ्र कृपा करें। इस त्रिभुणत्मक सृष्टि अर्थात् संसार में चारों ओर त्रिगुणात्मक विषयों की सघन अंधेरी सी मंडराती रहती है और मेरे हृदय में अन्धकार छाया हुआ है जिसके कारण मुझे सुबह-शाम का बोध नहीं होता यानी ओपेड़वन में पता ही नहीं पड़ता कब सुबह हो गई और कब शाम ढल गई।

आप मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि की वर्षा करें, मुझ आतुर पर कृपा की बूँदें भवित होने पर मेरी हृदय रूपी फुलवाड़ी जो सूख रही है फिर से हरी हो जाएगी। मैं हित ललित किशोरी नाम वाली, हे प्रभु केवल आप ही से संबन्ध रखती हूँ, मेरा प्रत्येक प्रहर युगों के समान व्यतीत हो रहा हे नाथ मुझे अपनी दासी बना लें।


जय जय जय राधिके पद सन्तत आराधिके, साधिके शुक, सनक, शेष नारदादि सेवी ।
वृन्दावन विपुल धाम रानी नव नृपति श्याम, अखिल लोकपालदादि ललितादिक नेवी ।
लीला करि विविध भाय बरसत रस अमित चाय, कमल प्राय गुण पराग लालन अलि खेवी।
युग वर पद कंज आस वांछत हित कृष्णदास कुल उदार स्वामिनि मम सुन्दर गुरु देवी ।।5।।

श्रीहित कृष्णदास जी महाराज अपने ही निज स्वरूप हितानन्द में डूबकर कहते हैं, ‘हे श्रीराधे- आपकी जय हो, जय हो, जय हो। वे श्री राधा कैसी है ? जिनके पद कमलों की मै निरन्तर आराधना करता हूँ, और परम भागवत शुक्र, सनक, शेष नारदादि के लिए भी सेव्य रूपा है, क्योंकि उनकी भी वहां गति नहीं है रानी नव नृपति श्याम नवल वृन्दावन नाथ की पद्महिषी, सव धामों के धाम सर्वोच्च धाम नित्य वृन्दावन में ललित आदि सखियों सहित विराजती है और वह वृन्दावन सम्पूर्ण लोकों के लोकपालों द्वारा वंदनीय है। उसी वृन्दावन में रास-विलास की लीला करती हुई, श्रीराधा विविध भावों को दरशाती हुई अनन्त चाव भरे चीजों से रस की वर्षा करती है। प्रियाजी अनन्त चोज भरे हाव-भाव दरशाने के गुणों में निपुण हैं, ऐसे हाव-भाव जब दरशाती है तब श्री मुस्ख कमल से जो मकरन्द निस्झरित होता है उसे लाल जी भंवर की वृत्ति लेकर पान करते हैं।

श्रीहित गोस्वामी कृष्णदास जी महाराज कहते हैं कि श्री राधा के युगल चरण कमलों में मेरी लालसा सदा लगी रहे, भीहित कुल की गुरु-देवी मेरी उदार स्वामिनान से मेरी यही आकांक्षा है।


राधिका सम नागरी प्रवीन को नबीन सखी, रूप गुण सुहाग भाग आगरी न नारी ।
वरून लोक, नाग भूमि, देवलोक की कुमारि, प्यारी जू के रोम ऊपर डारौ सब वारि ।
आनन्दकंद नन्दनन्दन जाके रस रंग रच्यौ, अंग भरि सुधंग नच्यौ मानत हँसि हारि ।
जाके बल गर्व भरे रसिक व्यास से न डरे, कर्म-धर्म-लोक- वेद छौंडि मुक्ति चारि ॥6॥

निकुंज बिलासिनी श्रीराधा के समान हे सखी, कोई भी अन्य नारी नहीं है, क्योंकि यह नागरी है-तहां श्रीजी की वाणी ‘नागरता की रासि किशोरी और ऐसी नागरी है कि चतुरों के समूह के मुकुटमणि सांवरों जो प्रीतम, उनको वितै के, नेक मुख की मोरन मात्र में निवेश कर देती है। और फिर प्रवीन है-गान में कठिन ताल सुर विकटताने सहज में लेती है, नृत्य की विविध गतियों को लेने में, लालजी भी इनसे हारे है। नवीन है-इनका नेह, रंग रस सदा नवीन ही बना रहता है। रूप की सहज माधुरी लाल जी के मन को हरण कर लेती है, तहां श्रीजी की वाणी “रोमालीमिहिरात्मजा सुललिते बन्धूकबन्धु प्रभा” राधासुधानिधि | कोक कलान इत्यादि के विशेष गुणों में निपुन है। इसलिए, हे सखी जो यह श्री हित राधे हैं, इनके भाग की क्या कहिये जिनका सुहाग, सकल लोक चूडामणि रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर भी सदा इनको जपते हैं इन ही का भजन करते रहते हैं। तहां श्रीजी की वाणी “ज्योतिश्यांनपरः सदा जपति या प्रेमापूर्णो हरि” राधासुध निधि |

श्रीजी के इन गुणों का अनन्त विस्तार है। तहां श्रीजी की वाणी ‘वृषभानुनन्दिनी मधुर कला पद संख्या ८१ इत्यादि ऐसे बहुत कही है। वाणी जी में रत्ति भर सोना दिखा के सुमेरु का ध्यान करने के से संकेत है। प्रियाजी की रूप माधुरी, गुणों का वर्णन करने में आज तक कोई पार नहीं पा सका और न ही कभी कोई पा सकेगा जितनों कहो, सो थोड़ा सारांश में इतनो समझ लेनो- अनिर्वचनीय है।

वरून लोक, नागलोक, भूलोक, देलोक की कुमारियों के रूप गुण इत्यादि प्यारी जू के एक रोम पर न्यौजवर है। तहां श्रीजी की वाणी देक्लोक, भूलोक, रसातल सुनि कवि कुल मति डरियो, सहज माथ चुरी अंग अंग की कहि कासों पटतरिये ” देलोक के कवि शुक्रचार्य जी, श्लोक के व्यास जी, रसातल के शेषनाम जी, इन सब कवियों को अपने-अपने लोकों की कुमारियों के रूप गुण का ज्ञान है, परन्तु इनकी भी मति भयभीत है कि इनकी बराबरी किससे करें। इसलिये इनकी उपमा यह स्वयं ही है, इनकी उपमा नहीं

आनंद कंद आनन्द के मूल, नंद-नन्दन, आनन्द को भी आनन्दित करने वाले, इनके रस रंग में डूबे है। महा हर्ष में अंग में भर कर सुगंध नृत्य करते हैं, परन्तु जब प्रियाजी नृत्य की गतिविधियों लेती है- तो हँसते-हँसते अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं। इस हार के ऐसे प्यार भरे दोज है कि कहते नहीं बनता, व्यास जी को पढ़ “पिय को नाचन सिखावत प्यारी ” मान-भुमान लकुट लीए ठाढ़ी डस्पत कुंजबिहारी व्यास स्वामिनी की ठवि निरखत, हँसि-हँसि दे दे करतारी सुहृदयों के हृदयगम्य है।

श्री ‘व्यास जी महाराज कहते हैं, ऐसी स्वामिनी का कृपा रूपी बल प्राप्त करने का मुझे गर्व है और इसी बल के प्रताप से कर्म, धर्म, लोक, वेद यह चारों प्रकार की मुक्तियों को त्यागते मुझे डर नहीं लगा।

नित्य वृन्दावन निकुंज विलासिनी, श्रीहित राधा की कृपा प्राप्त कर व्यास जी मुक्तियों को त्याग दें तो कोई आश्चर्य बात नहीं है। निकुंज की बात तो दूर रही यहाँ तो भूतल पर प्रकट वृन्दावन में सोहनी लगाने वाली की ऐसी स्थिति है कि विहारिनिदास जी बोल उठे “वृन्दावन की हरी चली मुक्ति दुवराड, बिहारिनिदास अवरज कहा. श्यामा महल कमाए। औरों की क्या कहिये ? राधे-राधे !! इति ।


प्यारी जे के चरणारविनद शीतल सुखदाई।
कोटि चन्द मन्द करत नख-विधु जुन्हाई ॥
ताप-शाप-रोग-दोष दारुण दुख हारी लाल इष्ट दुष्ट दवन कुंज भजन चारी ।
श्याम हृदय भूषण जित दूषण हित संगी।
वृन्दावन धूर धूसर यस रसिक रंगी।
शरणागत अभय विरद पतित पावन बानै ।
व्यास से अति अधम आतुर को-को न समानै ।।7।।

श्रीहित राधा प्यारी के चरणकमल शीतल और सुख देने वाले हैं। कैसे है यह चरणारविन्द और इनकी शतलता ? ऐसे अद्भुत चरण है कि जब रसिक शिरोमणि श्रीश्यामसुन्दर इनको अपने अपने वक्षस्थल पर रते है तो इन चरणों की शीतलता प्रेम-काम के ताप को शान्त कर देती है। तहाँ श्रीजी की वाणी –

“वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दम् प्रेमामृतकमकरन्दरसौघपूर्णम् ।
हृदयर्पितं मधुपतेः स्मरताप मुझे निर्वापयत्परमशीतलमाभयामि ||

अतः लालजी को सुख देने वाले हैं। इन चरणारविन्द की शोभा कैसी है ? नखचन्द्र से छिटकने वाली छटा कोटि-कोटि चन्द्रमा की चाँदनी को मन्द करती है, ऐसी है।

ताप, शाप, रोग-दोष दारुन दुखहारी- (भुमिका) इनकी कोक-कलान को देखकर कोटि-कोटि कामदेव लज्जित हो जायें है। क्योंकि वह देखें कि क्रियायें तो सब हमारी है, परन्तु हम इनमें है नहीं। रतिपति ने विचार कियौ- ठीक है, लज्जित तो हम है ही शाप देते हैं- ‘काम-रोग से ग्रसित रहोगे। लालजी से कहा, “तुम्हारी बड़ी कृपा है नहीं तो मिलन में स्वाद कहाँ से आता, परन्तु यह तो बताओ इस रोग का उपचार क्या? “

उत्तर मिला

“रोग हरन निज चरन सरोरुह नैननि धरि कर पंकज चारु ।”

प्रियाजी के चरणारविन्द का आश्रय लेना रोग नास हो जायेगा। लालजी ने सोची इससे तो नित्य हर समय काम पड़ता है। “काम सौ स्याम ही काम पस्यो इस काम के बिना तो विलसन का सारा मजा ही किरकिरा हो जायेगा, ‘शाप स्वीकार कर लिया, चुप्पी साध ली।

प्रियाजी मानवती हुई और तो और लालजी पर दोष मड़ने लभी सखी ने प्रम भरी डाँट लगाई

साँची झूठ बात सुनत तू, करत नहीं निरजोष ।
कवन भवन तें सुन्दर देख्यौ, जाहि लगावत दोषा

श्यामसुन्दर को कौन से भवन में देख लिया जो ‘दोष’ लगा रही हो। लालजी को विरह व्याप गया। दारुन दुःख लालजी को हो गया। क्या करें ?

तेरे विरह भय दारुन दुःख, के ले जाल बखान्यौ ।
तेरे चरन सरन हो सुन्दरी, ‘व्यास’ सखी गढी आन्यौ ।

हो गया उपचार | इति (भूमिका)

कहने का अर्थ है कि प्रेम के चोज, रसास्वादन के हेतु की गई प्रिया-प्रीतम की निज नई हितमई केली का कोई चारापार नहीं है, उसको समझना, अथाह अगाध समुद्र की तह से मोती चुनने के समान है। शब्दकोष में शबद नहीं है जो प्रिया- प्रियतम की केली का यथार्थ वर्णन कर सकें। जो कुछ इन टूटेफुटे शब्दों का सहारा लेकर कहा जाता है वह संकेत मात्र है, उस भाव स्थिति को उर में जाने का, जिसे रसिकजन हित की विलसन कहते हैं।

प्रियाजी की मन्द-मन्द मुस्कान, कटाक्ष भरी चितवन से लेकर ‘अबोलनों तक केवल प्रेम ही का स्वाद लेने को है, ‘काम’ जब-जब, जो जो गजब लालजी पर ढाता है, यह शब्द “ताप, शाप, रोग, दोष, दुष्ट दवा इत्यादि उसी गजब की पराकाष्ठा को सूचित करने का तुच्छ प्रयास करते हैं।

‘कौन-कौन दुख बरनौ प्रिय को, जो दुख करनी कस्यौ । ‘व्यास’ स्वामिनी करुणा करि, हरि को सब ताप हस्यौ ।। “

लोकवत् शब्दार्थ की यहाँ समाई नहीं जहाँ कुंज भवन है, प्रियाजी के चरणारविनंद की बात चली है, वहाँ निकुंज रस है, और सब अर्थ उस रस के अन्तर्गत ही होगा और यदि नहीं तो ऊपर कहे गये शब्दों का अर्थ लोक दृष्टि से तो स्पष्ट है ही, व्याख्या की आवश्यकता नहीं ।

कुंज भवन में विचरण करने वाले यह चरण “गोविन्द जीवन धनम्” तालजी के इष्ट है। इनके हृदय के भूषण है. श्रीहित के सभी है। वहाँ श्रीजी की वाणी “पद अम्बुज जावक जुत भूषण प्रियतम उर अवनी । यह श्रीवरण, रास में रंगे, वृन्दावन की घर में ‘धूसरित हो रहे हैं कैसी है यह वृन्दावन की ‘पूर ? तहाँ श्रीजी की वाणी “घुसरित हो रहे विविध निर्मित घर, नव कपूर पराग न थोरी महापुरुषों ने ठौर-ठौर कहा है ‘क्युखत् है बल्कि ‘नव कपूखद् है। यदि शब्दार्थ की सांकल में बधा रहना है, जो कहिये इस घरको जिसमें प्यारी जू के चरणारविन्द ‘धूसरित हो रहे हैं, कैसी मानेंगे ? नेक संभालियेगा अपने भाव को, शब्द कोष में छूर रेत को, मिट्टी को कहते हैं ‘कपूखत् रेत के लिए कोई शब्द नहीं है।

व्यास जी महाराज कहते हैं कैसी ही पतित क्यों न हो, उसके लिए इन चरणारविन्द की शारण पावन बाना है, जो अभय का दान देने वाले हैं। व्यास जी कहते हैं इन चरणों की शरण ग्रहण करके मेरे जैसे अ म आतुर को को अर्थत्, कौन-कौन, ‘न समाने यानि नहीं तर भए अर्थात् सब तर गए ।

नोट- पद की व्याख्या प्रचलित पाट के आधार पर की गई है। पाठान्तर भेद बहुत है वासुदेव गोस्वमी जी द्वारा रचित, प्रभुदयाल जी मित्तल द्वारा “भक्त कवि व्यास जी के नाम से प्रकाशित व्यास वाणी में यह पद इस प्रकार है

श्रीराधा प्यारी के चरणारविन्द शीतल सुखदाई । कोटि चन्द मन्द करत नख विद्यु जुम्हाई ||
ताप साप रोग सोग दारुण दुख हारी। कालकूट-दुष्ट-दवन, कुंज भवन चारी ॥
स्थाम हृदय भूषण जुत, द्वेषन जित संगी।
श्रीवृन्दावन धूलि धूसर, यस रसिक रंगी ||
सरनामत अभय विरद पतित पावन बाने ।
व्यास से अति अथम आतुर को, कौन समानौ।।


व्यासनन्दन, व्यासनन्दन, व्यासनन्दन गाईये
जिनको हित नाम लेत दम्पति रति पाईये ||
रास मध्य ललितादिक प्रार्थना जु कीनी
कर तें सुकुंवारि प्यारी वंशी तब दीनी ।।
सोई कलि प्रगट रूप वंशी वपु धारयौ
कुंज भवन रास रवन त्रिभुवन विस्तारयौ |
गोकुल रावल सु ठॉम निकट बाद राजै ।
विदित प्रेम राशि जनम रसिकन हित काजै ॥
तिनकों पिय नाम सहित मंत्र दियौ (श्री) राधे ।
सत चित आनन्द रूप निगम अगम साधे ||
(श्री) वृन्दावन धाम तरणिजा सुतीर वासी
श्रीराधा पति रति अनन्य करत नित खवासी ॥
अद्भुत हरि युक्त वंश भनत नाम श्यामा ।
जै श्री रूपलाल हित चित दै पायौ विश्रामा ॥ 8॥

श्रीहितहरिवंश के नाम अथवा वाणी का नाम यानि सुमिरन सदा करना चाहिये। कैसे ? जाम घटी बिसरे नहीं” ऐसे इन श्रीहिस्वंश का नाम जपने से दम्पति प्रिया-प्रियतम में रति होती है। सेवक जी कहते है। “हरिवंश सु नाम सदा तिनके, सुख-सम्पति, दम्पति जु जिनकै ।

श्रीहरिवंशचन्द्र, सम्पूर्ण प्रभु के प्राकट्य की भूमिका खोजते हैं। यस के मध्य में किसी समय | ललितादिक सस्तियों ने प्रार्थना करी हे प्यारी जू अब आगे तो कलयुग में ऐसा समय आने वाला है जब | वेद-विधि को जानने वाले बहुत ही कम रह जाएँगे, भक्ति के मर्म को समझने वाले नहीं होंगे, आप कृपा कीजिए जिससे जीवों को प्रेम लक्षणा भक्ति मिले तब प्रियाजी ने अपने हाथों से वंशी लेकर सखियों को प्रदान कर दी रस की मूल तो वंशी ही है “बाजत रस मूल मुर्तिका आनन्दिनी वही ‘वंशी कलियुग में श्रीहरिवंश आचार्य रूप में व्यास मिश्रजी के यहां अवतारित हुए अथवा वही कलि रूपी वंशी हरिवंश आचार्य रूप में तय मिश्रजी के यहाँ मुकलित हुई। और कुंज भवन के रास रंग को त्रिभुवन में विस्तार कियौ । गोकुल और रावल गातों के निकट “बाद ग्राम है। (बड़ों के मुख से सुना है कि बाद का प्राचीन नाम याच ग्राम था और जब हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य हुआ तो घर-घर पंच शब्द सुनाई देने लगे- “घर-घर पंच शब्द बाजिये सेवक वाणी 11)

यह तो विदित ही है कि प्रेमराशी, श्रीहित हरिवंश, सम्पूर्ण प्रभु का जन्म (अवतार) रसिकों के हित के लिए ही हुआ था। श्रीहित हरिवंश प्रभु को स्वयं श्रीराधा ने अपने प्रियतम के नाम से संयुक्त मन्त्र प्रदान किया। इससे यह समझना चाहिए कि महाप्रभु श्रीहित हरिवंश जी द्वारा स्थापित श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय है जिसकी प्रवर्तक आचार्य मनत्रदाता गुरु स्वयं श्रीराधा है। तहाँ हरिलाल व्यासजी का कथन:

यथैवेष्टं सम्प्रदायकै कर्ताऽऽचार्यो यथा मंत्रदः सद्गुरुश्च ।
मंत्री राधा यस्य सर्वात्मजैव वंदे राधा-पाद-पद्म प्रधानम् ||

पर भीहित राधा कैसी है! सतूचित आनन्द रूप है और वेदों द्वारा आलक्षित हैं। श्रीहितहस्विंश महाप्रभु जी ने यमुना के तीर श्रीधाम वृन्दावन में निवास कियौ श्रीहित राधा और उनके पति श्रीहित लालजी, जो दोऊ मन मिलि एक भए. राधावल्लभलाल, में अनन्य प्रेम रखकर उनकी सेवा में नियुक्त रहते थे।

“हर में वंश जुड़कर यह अद्भुत नाम सम्पूर्ण प्रभु हरिवंश बना है, तहाँ सेवक वाणी -नाम अरद्ध हरै अघ पुंज, जगत्र करे हरि नाम बड़ाई सो हरि वंश समेत सम्पूर्ण प्रेमी अनन्यानि को सुखदाई।” इस सम्पूर्ण नाम का प्रियाजी प्रेम से उच्चारण करती है। “प्रज्ञा हरिवंश प्रतीति प्रमानत प्रीतम श्री हरिवंश प्रियम् । माथा (श्री) हरिवंश गीत गुन गोचर, मुफ्ति मुनत हस्विंश मियं ॥” श्रीरूपलाल जी महाराज कहते हैं कि इन श्रीहित हरिवंश प्रभु के चरणों में वित्त लगाने से मुझको विश्राम मिला है।



प्रथमहिं भावुक भाव विचारै |
बनी तनु-मन नवकिशोर सहचरि वपु हितत गुरु कृपा निहारै ||
भूषन वसन प्रसाद स्वामिनी पुलकि-पुलकि अंग धारै।
भूषन वसन प्रसाद स्वामिनी पुलकि-पुलकि अंग धारै ।
जे श्री रूपलाल हित ललित त्रिभंगी रंग रस विस्तारै ||9||

सर्वप्रथम भजन के आरम्भ में, भजनी को भाव से, अपने सखी स्वरूप का विचार करना चाहिये । श्रीहित गुरु की कृपा का मनन करते हुए तन मन से नवकिशोर सहवरी रूप अपने आपको देखना चाहिये, अपने स्वामिनी द्वारा दिये गए भूषणों और वस्त्रों को रोमांचित होकर धारण करना चाहिये (मानसी में)।

तहाँ श्रीजी की वाणी (श्रीराधासुधानिधि)

“दूकूलं विभ्राणामथ कुचतरे कंधुकपट प्रसादम् स्वामिन्याः स्वकरतलदत्तं प्रणयतः स्थितां नित्यं पायें विविध परिचयैक चतु किशोरीमात्मानम् किमिठ सुकुमारी मुकलये 1॥”

महात्मा भीरतनदासी इस स्तोत्र की टीका कहते है:-(भाषा रूपान्तर) “अब इस श्लोक के भाव में भीहित प्रभुजी, अपना जो सुन्दर सखी स्वरूप, यद्यपि महल में नित्य श्रीहित अली और वंशी रूप है, तहाँ दोहा :
हित स्वरूप विवि हिय में वंशी विवि फरमाहि ।
सखी स्वरूप सखीन में, यो हित निकट रहांहि ॥

फिर भी स्वामिनी जू की दासी भाव की उत्कंठा करते हैं। मेरी श्रीस्वामिनी जु मेरे पर अति कृपा करके अपनी प्रसादी सारी (साड़ी) और कंचुकी अपने कर कमल से जो दी उसको पहर कर “स्थितां नित्य पार्श्वे” नित पास बैठी रहूँ अथवा खड़ी रहूं। वहां क्या करूं? “विविध परिचयैक चतुरा” नाना प्रकार की समयानुर सेवा में चतुर जैसी “किशोरीमात्मानं” किशोरी अवस्था बुवाई परै ” किमहि सुकुमारी नु कलये जैसी सुकुमार सखी स्वरूप अपने में कब देखूं। इति ।

श्रीरूपलाल जी महाराज हिते हैं कि इस सहवरी भाव में स्थित होने से श्रीश्यामा श्याम की कृपा से रंग-रस हृदय में प्रकाशित होने लगता है।


सखी, लखी कुंजधाम अभिराम ।
मनिनु प्रकाश हुलास युगल वर, राजत श्यामा श्याम || हास विलास मोद मद होत न पूरण काम ।
जै श्रीरूपलाल हित अली दंपति रस सेवत आठौ याम ||10||

हे सखी, देख तो सही जो प्रिया प्रियतम का निज धाम उसमें जो कुंज है, कितनी सुन्दर है।
“स्याम सुभग तन विपिन घन थाम विचित्र बनाई सेवकवाणी ||

मनियों के प्रकाश में श्रीश्यामा-श्याम उल्लासपूर्वक सुशोभित है, हास विलास, विनोद मोद विहार में होता रहता है, विहार में चाव बढ़त ही रहता है, कभी घटता नहीं, इसलिए कभी भ्क्षी पूरण काम, तृप्त नहीं होते ।

कामकेलि सतु पाइ दाइ-छल प्रिय ही रिझावत ।
थाइ धरत उर अंक भाइ मन कोक लजावत ॥
चाय चवम्गुन चतुर राइ रसरति संग्रामहि ।
छाड़ सुजस जम प्रकट गाड़ मुन जीवत श्यामहि ।

-सेवक वाणी

श्रीरूपलाल जी महाराज अपने ही हित स्वरूप को नमस्कार करके कहते हैं कि सखी युगल सरकार के लीला रस का सेवन आठों प्रहर करती है –

चोर चित्त ललितादि कोर स्न्यनि निजु निरखतिं ।
थोर प्रीति अन्तर न भोर दंपति छवि परखतिं ॥

-सेवक वाणी

तहाँ श्रीजी की वाणी:
अनुपम सुख भर भरित क्विस असु आनन्द-वारि कण्ठ दम रोकत ।


लाड़िली लालहि भावत है सखि, आनन्दमय हिम की ऋतु आई।
ऐसे रहे लपटाय दोऊ जन चाहत अंग में अंग समाई || हार उतार धरे सब भूषन स्वादी महारज की निधि पाई।
महासुख को ध्रुव सार विहार है, श्रीहरिवंशजू केलि लड़ाई ||11||

हे सखी, प्रिया- प्रियतम के मन भावती आनन्द प्रदान करने वाली सदी की ऋतु आई है। ऐसे गाढ़ आलिंगन में दोनों आबद्ध है, फिर भी यह इच्छ बनी हुई है कि एक दूसरे के अंगों में समा जायें। विहार के सूख का अतिशय करके भोग करने के हेतु दोनों ने अपनी माला एवं भूषण इत्यादि उतार दिये हैं, रसरूपी “निधि का स्वाद पाकर दोनों मत्त है। ध्रुवदासजी महाराज कहते हैं- परम सुस्त जो कोई वस्तु है, उसका सार केवल ‘हित’ का यह विचार है, जिसे श्रीहस्विंश महाप्रभु जी ने अपनी वाणी में गायौ है।


प्रात समै नव कुंज द्वार है ललिताजू ललित बजाई बीना पौढ़े सुनत श्याम श्रीश्यामा, दम्पति चतुर
प्रवीन प्रवीना ॥
अति अनुराग सुहास परस्पर कोक कला गुण निपुण नवीना |
श्रीबिहारिदास बलि बलि पंदसि यह मुदित प्राण न्यौछावर कीना ||12||

वृन्दावन की नवीन कुंज में जहाँ प्रिया प्रियतम ने सिज्जा पर सारी रात व्यतीत करी, तहाँ भोर होने पर, कुंज द्वार पर ललिता जी ने बहुत ही सरस, वीणा पर अलाप छेड़ी अलसाये दोनों सिज्जा पर सोये सोये ही मधुराको रहे हैं। ललिताजी वाणी तो बजाई कि अब उठिये सखियाँ दर्शन को खड़ी हैं, परन्तु वीणा के मधुर सुरों को सुनकर इनकी तो चाह और बढ़ी, दोनों कोक कलाओं में प्रवीन, चतुराई से पौढ़े ही है। एक दूसरे से परस्पर सुहाग है, अति अनुराग है, और कोक-कला के नतीन गुणों से दोनों निपुण है।

श्रीविहारिनदास जी यह इस छवि का अनुभव करते हुए अति प्रसन्न होकर वन्दना को हुए

बलिहार- बलिहार करते प्राण न्यौछावर करते हैं।


जगाय री भई बेर बड़ी ।
अलबेली खेली पिय के संग अलकलड़े के लाड़ लड़ी ।।
तरलि किरन रन्धन है आई, लगी निवाई जानि सुकर वर तहाँ हहौ ही है रही अड़ी।
श्रीविहारिनिदासि रति को कवि वरनै जो छवि मो मन मांझ गड़ी ||13||

सखी के बोल-सखी के प्रति बहुत देर हो गई है, अरी (प्रेम का सम्बोधन है), अब तो जगा सारी रात, अपने अलक लड़े प्रीतम के संग लाडिली जी ने विहार कियौ है (अभी भी पूर्ण ज भए क्या ?) देखो सूर्य की किरणें कुंज लताओं के झरोखों में से छिटक रही है, यह जानकर कि किरणें प्रिया-प्रियतम पर पड़ेगी तो उन्हें गरमी लगने लगेगी, मैं ही लताओं के छिद्रों पर अड़ी खड़ी रही।

श्रीविहारिनि दास जी कहते हैं कि प्रेम की सुरतांत छति का यह दृश्य जो मेरे मन में गड़ा है, इसे कौन कवि वर्णन कर सकता है ? अर्थात् अनिर्वचनीय है।


जागो मोहन प्यारी राधा ।
ठाड़ी सखी दरस के कारण, दीजै कुंवरि जु होइ न बाधा |
हँसत-हँसत दोऊ उठे हैं युगल वर मरगजे बामे फबि रहे दुहुँ तन ।
चारत तन मन लेत बलैयाँ देखि देखि फूलत मन है ही मन ||
रंग भरे आनंद जम्हावत अंस अंस धरि बाहु रहे कसि।
जय श्री कमलनैन हित या छवि ऊपर वारों कोटिक भानु मधुर शशि ||14||

सखियाँ कहती है प्यारेलाल जी, प्रियाजी, अब जानिये आपके दर्शन को सखियों द्वार पर खड़ी है, प्यारी जू यदि आपको किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं पड़ती हो तो, इन्हें (सुस्तांत) छवि का दर्शन देकर कृतार्थ करें बाधा का शब्द सुनते ही दोनों हंस दिये बड़ी चतुर है यह सखियाँ, हमारे रात्रि के विहार का सारा हाल, हमारी छवि का दर्शन देखकर ही जान लेंगी, हम दुरायो चाहें पर सम्भलने का समय ही नहीं दे रही है- द्वार पर खड़ी उतावली हो रही हैं, ऊपर से व्यंग और कस रही है- यदि बाधा नहीं पड़ती हो तो !! दर्शन दीजिये। क्या करते ? उठ बैठे-सस्चियों के मनोरथ पूर्ण करने को दोनों के श्री अंग में सुशोभित हैं। (सुरतांत छवि की शोभा तो मरगजी बागों से ही है जो समस्त विहार के सार को सूचित कर दें।) रतनदास जी लिखते हैं: “सुरतांत के समय अष्टयाम का जो विलास है, इसके सब सुखों का निचोर है। इस समय प्रिया- प्रियतम जू का हृदय और समस्त अंग सर्व सुख करके पूरन महा आनन्दित रसमय होता है ऐसे अद्भुत दर्शन पाकर सखियाँ तन-मन से बलिहार है, मन ही मन फूली नहीं समात है। प्रेम-रंग में सने, आनन्द में प्रिया-प्रीतम जमाई लेते हैं, दोनों के बाहु एक दूसरे में कसे हैं, जैसे कह रहे हों-सखियों हम तो तो रात भर गहरी नींद सो रहे थे-तुम तो यो ही हर बात का बतंगड़ बनाप देती हो। श्रीकमतलजैन जी महाराज अपने श्रीहित वरूप को नमस्कार करते हुए कहते हैं इस अद्भुत छवि पर कोटि-कोटि भानु की उज्ज्वलता और कोटि-कोटि चन्द्रमा की मधुर शीतलता न्यौछवर है “चंदन मयंक जगमगत अतिसे रवि-ससि ही को तेज छियावे ।”


अवहि निसि बीती नाहिंन वाम।
तुम मुख इन्दु किरण छवि व्यापी, कहत प्रिया सों श्याम।।
अंग-अंग अरसान वाम छबि मानि लेढु अभिराम
रहसि माधुरी रूप हित चित्त में होत न पूरन काम ||15||

यह सम्पूर्ण पद अभिवचनीय हितानन्द की लहरों से ऐसा गर्शित है कि इसपद की उपमा को कोई और पद ही दिखाई नही देता । और यदि किसी महात्मा में इस भाव को इतनी ही सुन्दरता से व्यक्त कियौ है तो उन्हें मेरी दण्डवत् स्वीकार हो । भीरूपलाल जी महाराज की कृपा मनाऊँ, जो मुझे बुद्धि प्रकाश दें तो पद के भाव को तनिक खोल सहूँ। जै जै श्रीहरिवंश

वह चैन’ जब थोड़ा-सा अपने स्थान से सरका, तो विपरीत रति के वैम ने प्रियाजी को तनिक झकझोरा-डड़ बैठी। लालजी ने देखा पहले से ही अमित है अब फिर विहार में रत हायेंगी तो और भमित हो जायेंगी, लगे बतराने-प्यारी प्रिया, अभी से क्यों उठ बैठी है- अभी तो रात्रि बीती नहीं है, यह जो ऊपाकालीन प्रकाश आप देख रही है यह तो आपके चन्द्रमुखी मुखारविन्द की कान्ति की किरणें है जिनसे सारा कुंज मन्द-मन्द प्रकाशित हो रहा है और आपके अंग-अंग की अरसान से जो छवि की तरंने उठ रही है, देखिये ना वह कितनी सुन्दर है। प्रियाजी तो भोरी है ही आगे क्या हुआ ? यह तो रहसि माधुरी “एकान्त में माध् पुरी की तरंगे है जो वित्त में उठती रहती है तो प्रिया प्रीतम कभी तृप्त नही होते श्रीरूपलाल जी महाराज कहते है। इति। जै श्रीराधे ।


आजु देख ब्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि
अंस-अंस बाहु दै किशोर जोर रूप राशि,
मनौ तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि पिकनि अपने सुर सो मेलि
मदन मुदित अंग-अंग बीच-बीच सुरत रंग, पल-पल हरिवंश पिवत जैन चषक झेलि ॥16॥

यह श्रीहित चतुरासी जी का पद है। अनेक टीकारों हो चुकी है। प्रेमदासजी महाराज, श्रीलोकनाथ जी महाराज, महात्मा श्रीस्तनदास जी, सुखलाल जी महाराज इत्यादि की प्राचीन टीकाएँ बड़ी भावपूर्ण है। इसके अतिरिक्त आधुनिक टीकाएँ भी है।

प्राचीन टीकाओं से ऊपर उठकर कुछ कहने की मेरी क्षमता नहीं है। इसलिए इस पद का अर्थ प्राचीन टीकाओं के आधार पर ही कर रहा हूँ।

आजु देखी व्रज सुन्दरी मोहन बनी केली: प्रिया- प्रियतम नित नवीन बने रहे हैं और इनके विहार का आदि-अन्त नहीं। इसलिए यहाँ एकरस सदा ‘आज’ भी है। ब्रज-यानि समूह सो सखियों के समूह में जो महासुन्दर प्रियाजी है उनकी और मोहनलाल की केलि बनी है बनी है, यानि जैसी होनी चाहिये वेसी ही, जिसने तुम दोनों को मोहित कर रखा है।

अंस अंबा दें किशोर जोर रूप राशी, मनी तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि:

दोनों के बाहु परस्पर एक दूसरे के भौर – श्याम अंसों पर विराजे है और तुम दोनों किशोर हो , केलि की चाह सदा बनी रहती है । तुम दोनों रूप की राशि हो सो मानों सरस रूप रसमय कनक की बेलि लपट रही है । प्रिया प्रियतम के महा कोमल अंग हैं , जो विहार के समय बेलि और वृक्ष की तरह लपटे रहते हैं ।

नव निकुंज भ्रमर गुंज मंजु घोष प्रेम पुंज , गान करत मोर विकानि अपने सुर सो मेलि :

इन दोनों की जो लपटान है सोई नव निकुंज है । इस नव निकुंज में इन दोनों के अमर रूपी मन मधुर गंजार करते हैं सो प्रेम कौ पुंज है । विलास ही में रास की रचना हो रही है , मनोहर मोर जो श्रीमोहन और कलित कोकिला जो कंतरी जू की परस्पर की रस भरी गोलन है वही गान है जिसे सुर से मिलाकर कर रहे हैं । यह दोनों एक दूसरे को पोषने में तदाकार है , प्रेम के मिले सुर से गा रहे है ।

मदन मुछित अंग – अंग बीच बीच सुरत रंग पल पल श्रीहरिवंश पीवत नैने चाषक झेलि :

तुम्हारे अंग – अंग प्रेममय मदन के आनन्द से भरे है और बीच – बीच में प्रेम के वोज , चुम्बन परिरंभन आदि हो रहे है । श्रीहित सखी जी कहती है तुम्हारा यह प्रेममयी रसासब मैं पल – पल जैन रूपी पात्रों से पान करके जीती है इति ।।


आजु सखी, अद्भुत भाँति निहारि।
प्रेम सुदृढ़ की ग्रंथि जु परि गई, गौर स्याम भुज चारि॥
अबहीं प्रातः पलक लागी है मुख पर श्रमकन वारि।
नागरीदास निकट रस पीवहु अपने वचन विचारि॥17॥

हित नागरीदासजी अपने सखी स्वरूप में स्थित निकटवर्ती सखी से कहते है ।

‘ हे सखी , प्रिया प्रियतम विहार से अमित , अलसाय कर , अभी – अभी नेक सोए है । तुम जगा मत देना ) ।


अबही नेंकु सोए है अलसाय ।
काम केलि अनुराग रंग भरे जागे रैन विहाय ।।
बार – बार सपनेहूँ सूचत रंग के भाय ।
यह सुख निरखि सखीजन प्रमुदित नागरीदास बलि जाय।।18 ।।


परस्पर अनुराग के रंग में भरे प्रेम विहार करते सारी रात बीत गई प्रेम के भर में स्वप्न में भी बार – बार उसी प्रेम के भावों को प्रकट कर रह है

सिज्जा महल में सुख को देखकर सखियाँ आनन्दित हो रही है , नागरीदास जी स्वयं संबोधन करके कहते हैं , ‘ बलिहार जाऊँ । इति ।


सिटपिटात किरनन के लागे ।
उठि न सकत लोचन चकचौधत , ऐचि ऐचि ओढ़त बसन जागे ।
हिय सौ हिय मुख सौ मुख मिलवत रस लम्पट सुरत रस पागे ।
नागरीदास निरखि नैनन सुख मति कोऊ बोलौ जिन आगे ।।19 ।।

सिज्जा महल में , ऊषाकालीन , कुंज के सन्ध्रों में से सुनहरी किरणें सुबह होने का संदेश देती छिटको लगी प्रिया प्रियतम पर पड़ी तो नेक बेवैन से होने लगे । कोमल नेत्र अचानक किरणों का स्पर्श पाकर टि या गए । आनसवलित , जैसे तैजे नेक जागे , और अपने अपने वसन धीरे धीरे खींचातानी करते ओळने लगे , ” देखि संभार पीतपट ऊपर कहाँ चुनरी राती । ” इसी खींचातानी में प्रेम का भर हो आया हिय से हिय , मुख से मुख मिल गए . अधयमृत का आदान – प्रदान होने लगा । दोनों रस – लम्पट सुरत रस में पगे हैं ।

हित नागरीदास जी कहते हैं , हे सखियो अपने नैनों के पुट से इसको झेलो , चुप रहो , और सामने मत जाना , क्योंकि तुम्हे आया देखकर संकुचा जाएंगे तो विहार का सुख जाता रहेगा । तहाँ ध्रुवदास जी का मार्मिक दोहा – “

नाइक तहां न नाइका , रस करवावत केलि । सखी उभै संगम सरस , पियत नैन पुट झेलि ॥


भोर भये सहचरि अब आई ।
यह सुख देखत करत बधाई ।।
कोऊ बीना सारंगी बजावै ।
कोऊ इक राग विभासहिं गावै ।।
एक चरण हित सों सहरावै ।
एक बचन परिहास सुनावें ।
उठि बैठे दोऊलाल रंगीले ।
विधुरी अलक सबै अंग ढीले ।
घूमत अरुण नैन अनियारे ।
भूषण बसन न जात संभारे ।।
हार बार मिलि के उरुझानि । निशि के चिन्ह निरखि मुसिकाने ।।
निरखि निरखि निसि के चिह्न रोमांचित है जाहिं ।
मानौ अंकुर मैन के फिर उपजे तन माहिं।।
20 ।।

प्रातः हुई और सखियाँ सुरतांत छवि का दर्शन करने सेवा में आ पहुँची । दर्शन का सुख पाकर और एक दूसरे को बधाई देती है ।

कोई वीणा तो कोई सारंगी बजा रही है तो कोई राग विभास ही गा रही है । आनुसंगिक अर्थ है कि गाना बजाना एक ही राग में सुर से सुर मिलकर हो रहा है । एक चरण पलोटत है तो हास परिहास कर रही है । सखियों के मनोरथ पूर्ण करने हेतु दोनों उठ बैठे है । प्रियाजी की अलकें बिथुरी है और सभी अंग अंग में अरसान छाई है । प्रेम के भर में मैन अरुण है और गोलाक धूम रहें है । ” अरुण जैन धूमत आलस जुत कुसुम गलित लट पाँती । “

भूषण तसन सब अस्त व्यस्त हो रहे है । प्रियाजी का अंजन लाल जी पर और लालजी की पीक प्यारी के कपोलों पर लगी है । कपोलों की शोभा ऐसी बढ़ी मानों पीक कपोल कमल पर झोरी । ” ऐसी सुन्दर छवि भला कैसे वर्णन की जा सकती है । विहार के समय दोनों के हार और बाल जो परस्पर उलझ गए थे सुरझा रहे है । जैसे – जैसे सुरझाते हैं , और उलझते जाते है । ‘ नख सिखलों दोऊ उरझि रहे , नेकहूँ सुरझत नाहि । ज्यों – ज्यौ रूचि बाढ़ अधिक , त्यौ – त्यौ अधिक उरझाहिं ” ध्रुवदासजी ।

प्रेम बिहार में , श्री अंगों पर रात्रि में लगे चिह्नों को देखकर मुस्करा रहे हैं । ” फूले अधर पयोधर लोचन , उर नख भुज अभिरामिनी । गंडनि पीक मषि न दुरावति , ‘ व्यास ‘ लाज नहीं कामिनी । “

रात्रि के चिन्हों को देख – देखकर फिर दोनों को रोमांच हो रहा है , मानों प्रेम के अंकुर फिर से तन में अंकुरित हो उठे हैं । चाचा श्रीवृन्दावन दास जी अपने एक पद में कहते हैं

सकुचत सुरतांत चिन्ह देवि देखि समुझि – समुझि सुखहि लियें मनहि दिये हितु बढ़ायौ । लसत मरगजे सुवीर , भवन भई शोभा भीर , दुहुन को सुहाग भाग छकि छकि दुलरायो । ” सुहृदयों के हृदयगम्य है ।


राधा प्यारी मेरे नैने सलोल ।
तै निज भजन कनक तन जौवन , लियौ मनोहर मोल ।।
अधर निरंग अलिक लट छूट , रंजित पीक कपोल ।
तू रस मगन भई नहिं जानत , ऊपर पीत निचोल ।।
कुच युग पर नख रेख प्रगट मानौ , शंकर शिर शशि टोल ।
जय श्रीहित हरिवंश कहति कछु भामिनी अति आलस सों बोल ।।21 ।।

यह भी श्रीहित चतुरासी जी का पद है । प्राचीन टीकाओं के आधार पर अर्थ प्रस्तुत है ।

मूल : – राधाप्यारी तेरे नैन सलोल ।
राधाप्यारी तेरे नैन अतिशय करके ललिता सों भरे चंचल है ।
अपार गुण है इन नैनों के । ऐसे रंग भरे कटाक्ष चलते है कि लाल जी के प्राण अपने वश में करते हैं , अति बाँके है , किसी के बस नहीं , अति रिझावर है , नेक चोज की बात देखि , तुरन्त रीझ जाते है ।

मूल : – तै निज भवन कनक तन जीवन लियों मनोहर मोल :
भजन शब्द के दो अर्थ है । एक तो सेवा दूसरा अंगीकार करना । तै निज भजन – भक्ति रति विपरीत सों , कनक तन- जिस श्री अंग में ओटे हुए कनक की सी आभा है , जीवन करके प्यारे को मोल लीयो है । कहने का अभिप्राय यह है कि प्यारो आप पर न्यौछावर हो गयो है ।

मूल : – अधर निरंग अलिक लट छूटी रंजित पीक कपोल :
तुम्हारे अधरों में रस रंग का भर रहा , जो प्रीतम को महा विलास में परमान्द दियौ , जिससे बेनी के बन्ध ढीले हो गए है और चिकुर चन्द्रिका से लटें छूटकर भालस्थली पर राजे है , कपोलों पर पीक लगी है । ।

मूल : – तू रस मगन भई नहीं जानति ऊपर पीत निचोल :
तू रस में ऐसी मगन भई कि तुम्हे पता नहीं पड़ा कि प्रीतम का पीताम्बर तुम्हारे ऊपर कब आ गया । श्रीअंगों की अद्भुत शोभा बढ़ी है ।

मूल : – कुच युग पर नख – रेख प्रगट मानों , शंकर शिर शाशि टोल :
दोनों कुतों पर विहार में प्रीतम के नखों की रेखा सी बन गई है । सो ऐसा प्रतीत होता है , शंकरजी के सिर पर जैसे अर्ध चन्द्रमा विराजे है , वैसे नव रूपी चन्द्रमा के समूह की अबली बन गई है ।
कुच नखरेख धनुष की आकृति मनो शिव शिर शाशि राजै ।
सुनत ‘ सूर ‘ प्रिय वचन सखी मुख , नागरी हँसि मन लाजै ।।

मूल : – जै श्रीहित हरिवंश कहत कछु भामिनी अति आलस सों बोल :
जब प्रियाजी ने ऐसे रंग भरे वचन सुने तब अन्तर में तो अति आनन्दित हुई पर ऊपर से सकुच के आलसवंत भइ बोली ” हित सखे तुम तो ऐसी बातें बनाती ही कि आशचर्य को भी आश्चर्य होता है । इसी प्रकार आनन्द की अलसान में प्रियाजी कुछ कहती रही . ” हित सखी जू कहती है । इति ।


मंगल समय खिचरी जेंवत है श्रीराधावल्लभ कुंजमहल में ।
रति रसमसे गसे गुण तन मन नाहिन संभारत प्रेम गहल में ||
चुटकी देत सखी संभरावत हंसत हंसावत चहल पहल में ।
जै श्रीकुंजलाल हित यह विधि सेवत समै समै सब रहत टहल में ||22||

श्रीवृन्दावन कुंज महल में प्रिया प्रियातम खिचरी आरोग रहे हैं ।
प्रेम रस में भीजे , दोनों के तन मन परस्पर एक दूसरे से जुड़े है , प्रेम की उन्मत्तता के कारण अपने को संभाल नहीं पा रहे हैं ।

प्रेम की गहर में से यह निकलें तो सखियों के मनोरथ पूर्ण हों अत : सखी चुटकी बजाकर सावधान करती है , चहल पहल है हास परिहास कर रही है ।

श्रीकुंजलाल जी महाराज कहते है कि इसी प्रकार सखियाँ हर समय , समय के अनुसार सेवा में रहती है ।


खिचरी जेवत है पिय प्यारी ।
सीत समै रुचि जानि सुगंधन मेलि सखीनु सँवारी || पहले प्रियह जिवावह जेंवत रसिक नरेस महा री
जै श्रीकुंजलाल पिय की बातन की घातन जानन हारी ||23||

प्रिया प्रियतम खिचड़ी आरोग रहे है । शीत समय जानकर सखियों ने सुगन्धित पदार्थ डालकर खिचड़ी को संवार दिया है । रसिक नरेश पहिले प्रियाजी को जिमाते हें फिर स्वयं पाते है । श्रीकुंजलाल जी महाराज कहते हैं । कि प्रीतम बातों में जो खुशामद कर रहे हैं , इन घातों को , प्रियाजी खूब जानती है ।


खिचड़ी राधाबल्लभ जू कौ प्यारौ ।
किसमिस दाख चिरौजी पिस्ता अद्रक सौ रुचिकारी ||
दही कचरिया वर सैधाने बरा पापर बहु तरकारी ।
जायफल जावित्री मिरचा घृत सों सीच संवारी ||24||

अर्थ स्पष्ट है ।


खिचरी जेंवत जुगल किशोर ।
निसि अनुरागे दम्पति उठे उनीदे भोर |
अंग अंग की छवि अवलोकत ग्रास लेत मुख सुखहि निहोर ।
जै श्रीरूपलाल हित ललित त्रिभंगी बिबि मुखचन्द्र चकोर ।।25।।

श्री श्यामा श्याम खिचड़ी आरोग रहे है । सम्पूर्ण रात्रि विहार करने के बाद , अति अनुराग का भर लिए दोनों उनीदे उठे है ।

एक दूसरे के अंग की छवि देख – देखकर सुख का अनुभव करते , बड़े – बड़े निहोरे से खिचड़ी का ग्रास मुख में लेते उजाते हैं ।

श्रीरूपलाल जी महाराज कहते है कि प्रिया – प्रीतम एक दूसरे के मुख को चन्द्र और चकोर की भाँति निहारते रहते हैं ।


अधिक हेत सों पावें पिय प्यारी ।
थार सैंजोये धरें कर आवति , सीत समै रुचिकारकी ।।
बहुत मेवा मिलबारी अचारी , बासौधी लीये सब ठाड़ी ।
यह सेवा हित नित्त कृपा प्रिय सों राधालाल संवारी ।।26।।

प्रिया प्रीतम बड़े प्रेम से खिचरी पा रहे हैं । खिचड़ी के थार संजोकर हाथों में लिए सखियाँ लिए आ रही है , सदी में रुचिकारी है । बहुत प्रकार का मेवा , मिलबरी , अचार बासौधी ( एक प्रकार की बड़ी ) लिए सखियाँ खड़ी है । श्रीराधालाल जी ने यह सेवा श्रीप्रिया प्रीतम की कृपा से संवारी नोट – बड़ों से सुना है कि श्रीराधालाल जी महाराज बड़े अनुराग आ पाए । जब दूसरे सहयोगी बनाने बैठे तो कहते हैं मनो – मन लकड़ी फुक गई परन्तु खिचड़ी सिद्ध नहीं हुई । आखिर उन्हें जैसे तैसे बुलाया गया उन्होंने आकर खिचड़ी को संवारा तो भोग लगा ।


रूप रसासव माते दोऊ श्रीराधाबल्लभ जेंवत खिचरी ।
अरस परस मुसिकात जात बतरात बात बात बोलत बिच बिचरी ।।
खाटे सरस सँधाने नव – नव पापर कचरी लेत रुचि – रुचि री ।
नेह निहोर जिवाँवत हित सखी कोमल मधुर ग्रास घृत निचुरी ।।
फरगुल सुरंग रजाई कनक अंगीठी अगरसत सचरी ।।27।।

रूप रसासब में दोनो मत्त , प्रिया प्रीतम खिचरी पा रहे हैं ।
दानों मुस्कराते जाते है और पाते समय परस्पर बीच – बीच में बतबताते जाते हैं । कई प्रकार के खाटे और सरस आचार , पापर , कचरी बड़े प्रेम से आरोग रहे हैं ।

श्रीहित सखी जू घृत से निवुड़ि खिचरी के कोमल मधुर ग्रास बड़े नेह और निहोरा कर करके प्रियालाल को जिमा रही है ।
श्रीयुगल ने सुरंग ( लाल ) रजाई , फरगुल ओढ़ रखी है और पास में सोने की अंगीठी ‘ अगरसत ‘ डाली हुई रखी है ।
नोट : – अगर मगर एक विशेष प्रकार के वृक्षों को कहते है जिसकी छाल का इत्र भी बनता है जो बहुत कीमती होता है ।


चलौ चलौ सखी देखें दोऊ जैवै ।
भरे थार खिचरी घृत निचुरी के आगे , हँसि हँसि सुकुमार प्यारे कैसे दोऊ जैवें ।।
प्रिया के मुख पीये देत पिय के मुख प्यारी ।
बीच – बीच अधर पान प्रानन सो हेरै ||28||

अर्थ स्पष्ट है ।


प्यारे जैवत है सुकुंवार ।
सरस सुगंध उठत उछगारें भरि खिचरी के थार ।।
पापर कचरी तलप कटाक्षन भृकुटी मुरन को अचार ।
जुरे परस्पर नैन दुहुन के प्रेम रूप को अहार ।।
पहिलै प्रियहिं जिवाँवत जैवत रहत है वदन निहार ।
ऐसी विधि सों जेंवत प्यारे हित सुख की ज्यौनार ।।29।।

दोनों सुकुमार लाड़िली लाल खिचरी आरोग रहे है ।
अब आरोगने की रीति कहते हैं । सिज्जा महल में खिचरी के भरे थाल रखे है , पापर , कचरी भृकुटि मुरन कौ आचार ( सेम का आचार है ) सरस सुगन्ध की उगारें उठ रही है ।

सिज्जा पर परस्पर दोनों के मैने जुड़े है , कटाक्ष चल रहे हैं , लालजी प्रियाजी की प्रेम रूप माधुरी का आहार करते जाते है और संग – संग प्रिया जी को जिमाते हैं और स्वयं जैमते जाते हैं हैं । ऐसी विधि से यह हित रूपी सुख की ज्यौनार परस्पर हो रही है ।


भोर मिलि जैबै दोऊ बनी – बनरा खिचरी ।
झमक सेज तें उठे उनींदे ब्रजजीवन घृत सों निवुरी ।।
मंगल रूप समै मंगल में रूचि सौ खिचरी पावै ।
ओढ़े फरगुल रंग सहानी छवि जीव जिबावै ।
झुकि – झुकि परत नैन अलसोहें हित सजनी फैनी अरु बासौदी ब्रजजीवन मन भावै ।
अदरक कूचा बन्यौ चटपटौ कर पल्लव दोऊ चाटें ।
वे उनके वे उनके मुख सों हँसि – हँसि सों लावै ।।
नथ उठाय बेला पय पीवैं कौतुक रंग मचावै ।
ब्रजजीवन हित कहाँ लगि बरनौ कुंज महल के ठाठै ||30||

प्रिया प्रीतम प्रातः दोनों मिलकर घृत से निचुरी खिचरी आरोग रहे हैं ; बनी बनरा- कहा , सो श्रृंगार सहित विराजे है- ऐसे जानिए । बड़ी छवि सों सिज्जा पर से उनीदें उठे हैं । बड़ी रूचि सों , ये दोनों मंगल रूप , सबेरे के मंगलमय समय में , खिचड़ी आरोग रहे है । सहानी रंग की फर्मुल ओढ़ रखी है , सुन्दर छवि को देखकर सखियां बलिहार है । युगल एक झुकने लगते है तब हित सजनी सम्हार करती है । माखन , मिश्री मगढ़ के लड्डू , पाक , मुरब्बा पाते है ।

अदरक कूचा चटपटा बना है जिसे पल्लू की ओट में दोनों चाट रहे हैं । दोनों हँसते जाते है और एक दूसरे को पवाते जाते है । प्रियाजी नथ उठाकर बेला में से दूध पी रही है । ( बेला एक विशेष प्रकार का चपटा गोल पात्र होता है जिसके किनारे थोड़े ऊपर की ओर उठे हुए होते हैं । और ऊपर से किनारे भीतर की ओर मुड़े रहते हैं । यह ब्रज का बहुत मांगलिक पात्र माना जाता है । घर में पुत्र जन्म होने पर बेला बजाते हैं , शादी व्याह में इसका प्रयोग तरह – तरह के मांगलिक कार्यों में होता है ।

ब्रजजीवन जी महाराज कहते हैं कुंज महल के इस ठाठ का कहाँ तक वर्णन करूँ ।

खिचरी युगल रुचि सों खात ।
पौष शुक्ला दोज तें लै मास एक प्रभात ||
दही कचरी वर संधाने बरा पापर घीय ।
ढिग अंगीठी धरी मीठी लगत प्यारी पीय जल पिवाय धुवाह हाथ अगौछ बीरी देत ||
सखीजन बाँटति तहाँ हित ब्रजलाल जूठन लेत ||31||

अर्थ स्पष्ट है ।


अचवन बीरी दै मंगल आरती सजि बाढ़यौ सखिन मन मोद ।
जै श्रीकुंजलाल हित असीसत एसै ही करौ विनोद ।।
जै श्रीकिशोरलाल हित रूप अलि बाँटत देति लेति सब सखी सहचरि कृष्णदास आसपास निरखत हित को विलास , दौरि – दौरि आवें सखी जूठन कौ लेवै । चलौ चलौ सखी देखै दौऊ जै चुके , जै चुके , जै चुके ||32||

अर्थ स्पष्ट है । 


निरखि आरती मंगल भोर |
मंगल स्यामा स्यामा किशोर ।।
मंगल श्रीवृन्दावन धाम ।
मंगल कुंज महल अभिराम ।।
मंगल घंटा नाद मु होत ।
मंगल थार मणिनु की जोति ।।
मंगल दुंदुभी धुनि छबि छाई ।
मंगल सहचरी दरसन आई ।
मंगल वीणा मृदंग बजावै ।
मंगल ताल झाँझ झरलावै ।।
मंगल सखी यूथ कर जोरै ।
मंगल चंवर लिये चहुँ ओरै ।।
मंगल पुष्पावलि बरसाई ।
मंगल जोति सकल बन छाई ।।
जै श्रीरूपलाल हित हृदय प्रकाश ।
मंगल अद्भुत युगल विलास ||33 ||


यहि विधि मंगल आरती करी ।
निज मंदिर आगै चिक परी ।।
ललितादिक भीतर अनुसरी ।
जै श्रीकमलनेंन हित सेवा भई ।
श्रीराधे , किशोरी राधे , लड़ैती राधे ।
श्यामा प्यारी जय राधे || 34 ||

अर्थ स्पष्ट है ।


इति खिचरी उत्सव श्रृंखला की जै जै श्रीहरिवंश

Posted on

गुलाब सखी का चबूतरा

बरसाने की पीली पोखर से प्रेम सरोवर जाने वाले रास्ते से कुछ हटकर वन प्रांत में एक पुराना चबूतरा है। लोग उसे गुलाब सखी का चबूतरा कहते हैं और आते-जाते उस पर माथा टेकते हैं।
आइये जानते है क्या है इस चबूतरे की कथा।

गुलाब एक एक निर्धन व्यक्ति का नाम था । बरसाने की पवित्र धरती पर उसका जन्म हुआ । ब्रह्मा आदि जिस रज की कामना करते हैं उसका उसे जन्म से ही स्पर्श हुआ था। पढ़ा लिखा कुछ नहीं था पर सांरगी अच्छी बजा लेता था। श्री राधा रानी के मंदिर के प्रांगण में जब भी पदगान हुआ करता था उसमें वह सांरगी बजाया करता था। यही उसकी अजीविका थी। मंदिर से जो प्रशाद और दान दक्षिणा प्राप्त होती उसी से वो अपना जीवन र्निवाह करता था ।
उसकी एक छोटी लड़की थी । जब गुलाब मंदिर में सारंगी बजाता तो लड़की नृत्य करती थी । उस लड़की के नृत्य में एक आकर्षण था, एक प्रकार का खिंचाव था।उसका नृत्य देखने के लिए लोग स्तंभ की भांति खड़े हो जाते। गुलाब अपनी बेटी से वह बहुत प्यार करता था, उसने बड़े प्रेम से उसका नाम रखा राधा।
वह दिन आते देर न लगी जब लोग उससे कहने लगे, “गुलाब लड़की बड़ी हो गई है। अब उसका विवाह कर दे।”
राधा केवल गुलाब की बेटी न थी वह पूरे बरसाने की बेटी थी। सभी उससे प्यार करते और उसके प्रति भरपूर स्नेह रखते। जब भी कोई गुलाब से उसकी शादी करवाने को कहता उसका एक ही उत्तर होता,” शादी करूं कैसे? शादी के लिए तो पैसे चाहिए न? “
एक दिन श्री जी के मंदिर के कुछ गोस्वामियों ने कहा, ” गुलाब तू पैसों की क्यों चिन्ता करता है? उसकी व्यवस्था श्री जी करेंगी। तू लड़का तो देख? “
जल्दी ही अच्छा लड़का मिल गया। श्री जी ने कृपा करी पूरे बरसाने ने गुलाब को उसकी बेटी के विवाह में सहायता करी, धन की कोई कमी न रही, गुलाब का भण्डार भर गया, राधा का विवाह बहुत धूम-धाम से हुआ। राधा प्रसन्नता पूर्वक अपनी ससुराल विदा हो गई।
क्योंकि गुलाब अपनी बेटी से बहुत प्रेम करता था और उसके जीवन का वह एक मात्र सहारा थी, अतः राधा की विदाई से उसका जीवन पूरी तरहा से सूना हो गया। राधा के विदा होते ही गुलाब गुमसुम सा हो गया। तीन दिन और तीन रात तक श्री जी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा रहा। लोगो ने उसको समझने का बहुत प्रयास किया किन्तु वह सुध-बुध खोय ऐसे ही बैठा रहा, न कुछ खाता था, ना पीता था बस हर पल राधा-राधा ही रटता रहता था। चौथे दिन जब वह श्री जी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा था तो सहसा उसके कानों में एक आवाज आई, ” बाबा ! बाबा ! मैं आ गई। सारंगी नहीं बजाओगे मैं नाचूंगी।”
उस समय वह सो रहा था या जाग रहा था कहना कठिन था। मुंदी हुई आंखों से वह सांरगी बजाने लगा और राधा नाचने लगी मगर आज उसकी पायलों में मन प्राणों को हर लेने वाला आकर्षण था। इस झंकार ने उसकी अन्तरात्मा तक को झकझोर दिया था। उसके तन और मन की आंखे खुल गई। उसने देखा उसकी बेटी राधा नहीं बल्कि स्वयं राधारानी हैं, जो नृत्य कर रही हैं।
सजल और विस्फरित नेत्रों से बोला, बेटी! बेटी! और जैसे ही कुछ कहने की चेष्टा करते हुए स्नेह से कांपते और डगमगाते हुए वह उनकी अग्रसर ओर हुआ राधा रानी मंदिर की और भागीं। गुलाब उनके पीछे-पीछे भागा ।
इस घटना के पश्चात गुलाब को कभी किसी ने नहीं देखा। उसके अदृश्य होने की बात एक पहेली बन कर रह गई। कई दिनों तक जब गुलाब का कोई पता नहीं चला तो सभी ने उसको मृत मान लिया। सभी लोग बहुत दुखी थे, गोसाइयों ने उसकी स्मृति में एक चबूतरे का निर्माण करवाया।
कुछ दिनों के पश्चात मंदिर के गोस्वामी जी शयन आरती कर अपने घर लौट रहे थे। तभी झुरमुट से आवाज आई,” गोसाई जी! गोसाई जी! “
गोसाई जी ने पूछा, ” कौन?”
गुलाब झुरमुट से निकलते हुए बोला, ” मैं आपका गुलाब। “
गोसाई जी बोले, “तू तो मर गया था। “
गुलाब बोला, ” मुझे श्री जी ने अपने परिकर में ले लिया है। अभी राधा रानी को सांरगी सुना कर आ रहा हूं। देखिए राधा रानी ने प्रशाद के रूप में मुझे पान की बीड़ी दी है। गोस्वामी जी उसके हाथ में पान की बीड़ी देखकर चकित रह गए क्योंकि यह बीड़ी वही थी जो वह राधा रानी के लिए अभी-अभी भोग में रखकर आ रहे थे। “
गोसाई जी ने पूछा,”तो तू अब रहता कहां है?”
उसने उस चबूतरे की तरफ इशारा किया जो वहां के गोसाइयों ने उसकी स्मृति में बनवाया था।
तभी से वह चबूतरा “गुलाब सखी का चबूतरा” के नाम से प्रसिद्द हो गया और लोगो की श्रद्धा का केंद्र बन गया।
राधा राधा रटते ही भव बाधा मिट जाए।
कोटि जन्म की आपदा श्रीराधे नाम से जाए।।
बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय ।
जय जय श्री राधे।
श्री राधा- कृष्ण की कृपा सब की ऊपर बरसता रहे ।
श्री राधाकृष्ण शरणम ममः

Posted on

श्री जयदेव जी

निम्बार्क सम्प्रदाय के महान संत महाकवि श्रीजयदेव जी संस्कृत के कविराजों के राजा चक्रवर्ती सम्राट थे । शेष दूसरे सभी कवि आपके सामने छोटे बड़े राजाओं के समान थे । आपके द्वारा रचित  गीतगोविन्द महाकाव्य तीनों लोको में बहुत अधिक प्रसिद्ध एवं उत्तम सिद्ध हुआ । यह गीतगोविन्द कोकशास्त्र का, साहित्य के नवरसो का और विशेषकर उज्वल एवं सरस श्रृंगार रस का सागर है ।

इसकी अष्टपदियो का जो कोई नित्य अध्ययन एवं गान करे, उसकी बुद्धि पवित्र एवं प्रखर होकर दिन प्रतिदिन बढेगी । जहां अष्टपदियो का प्रेमपूर्वक गान होता है, वहाँ उन्हें सुनने के लिये भगवान् श्रीराधारमण जी अवश्य आते हैं और सुनकर प्रसन्न होते हैं । श्री पद्मावती जी के पति श्री जयदेव जी सन्तरूपी कमलवन को आनन्दित करनेवाले सूर्य के समान इस पृथ्वीपर अवतरित हुए ।

श्री जयदेव जी का जन्म और बाल्यकाल की लीलाएं –
कविसम्राट श्री जयदेव जी बंगाल प्रान्त के वीरभूमि जिले के अन्तर्गत किन्दुबिल्व नामक ग्राममें बसंत पंचमी के दिन पाँवह सौ साल पूर्व प्रकट हुए थे । आप के पिता का नाम भोजदेव और माता का नाम वामदेवी था । भोजदेव कान्यकुब्ज से बंगाल मे आये हुए पञ्च ब्राह्मणो में भरद्वाजगोत्रज श्रीहर्ष के वंशज थे । पांच वर्ष के थे तब इनके माता पिता भगवान् के धाम को पधार गए। ये भगवान ला भजन करते हुए किसी प्रकार अपना निर्वाह करते थे । पूर्व संस्कार बहुत अच्छे होने के कारण इन्होंने कष्टमें रहकर भी बहुत अच्छा विद्याभ्यास कर लिया था और सरल प्रेमके प्रभाव से भगवान् श्री कृष्ण की परम कृपा के अधिकारी हो गये थे ।

इनके पिता को निरंजन नामक उसी गांव के एक ब्राह्मण के कुछ रुपये देने थे । निरंजन ने जयदेव को संसार से उदासीन जानकर उनकी भगवद्भक्ति से अनुचित लाभ उठाने के विचार से किसी प्रकार उनके घर द्वार हथियाने का निक्षय किया । उस ने एक दस्तावेज बनाया और आकर जयदेव से कहा- देख जयदेव! मैं तेरे राधा कृष्ण को और गोपी कृष्ण को नहीं जानता ,या तो अभी मेरे रुपये ब्याज समेत है दे, नहीं तो इस दस्तावेज पर सही करके घर द्वारपर मुझें अपना कब्जा कर लेने दे ।

जयदेव तो सर्वथा नि:स्पृह थे । उन्हें घर द्वार में रत्तीभर भी ममता नहीं थी । उन्होंने कलम उठाकर उसी क्षण दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये । निरञ्जन कब्जा करने के तैथारी से आया ही था । उसने तुरंत घरपर कब्जा कर लिया । इतनेमें ही निरञ्जन की छोटी कन्या दौड़ती हुई आकर निरञ्जन से कहने लगी- बाबा ! जल्दी चलो, घरमें आग लग गयी; सब जल गया । भक्त जयदेव वहीं थे । उनके मनमें द्वेष हिंसा का कहीं लेश भी नहीं था, निरञ्जन के घरमें आग लगने की खबर सुनकर वे भी उसी क्षण दौडे और जलती हुई लाल लाल लपटोंके अंदर उसके घरमें घुस गये ।

जयदेव, घरमें घुसना ही था है कि अग्नि वैसे ही अदृश्य को गयी, जैसे जागते ही सपना! जयदेव की इस अलौकिक शक्ति को देखते ही निरञ्जन के नेत्रों मे जल भर आया । अपनी अपवित्र करनीपर पछताता हुआ निरंजन जयदेव के चरणो में गिर पड़ा और दस्तावेज़ को फाड़कर कहने लगा- देव ! मेरा अपराध क्षमा हो, मैने लोभवश थोडे से पैसों के लिये जान बूझकर बेईमानी से तुम्हारा घर द्वार छीन लिया ।

आज तुम न होते तो मेरा तमाम घर खाक हो गया होता । धन्य हो तुम ! आज़ मैंने भगवद्भक्त का प्रभाव जाना । उसी दिनर से निरञ्जन का हदय शुद्ध हो गया और वह जयदेव के संग से लाभ उठाकर भगवान के भजन कीर्तन में समय बिताने लगा । भगवान की अपने उपर इतनी कृपा देखकर जयदेव का हृदय द्रवित हो गया । उन्होंने घर द्वार छोड़कर पुरुषोत्तम क्षेत्र -पूरी जाने का विचार किया ।

पराशर नामक ब्राह्मण को साथ लेकर वे पुरी की ओर चल पड़े । भगवान का भजन कीर्तन करते हुए जयदेव जी चलने लगे । एक दिन मार्ग में जयदेव जी को बहुत दूरतक कहीं जल नहीं मिला । बहुत जोर की गरमी पड़ रही थी, वे प्यास के मारे व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े । तब भगवान् स्वयं गोपाल बालक के वेष में पधारकर जयदेव को कपड़े से हवा की और जल तथा मधुर दूध पिलाया । तदनन्तर मार्ग बतलाकर उन्हें शीघ्र ही पुरी पहुंचा दिया । अवश्य ही भगवान् को उस वेषमे स समय जयदेव जी और उनके साथी पराशर ने पहचाना नहीं ।

जयदेव जी प्रेम मे डूबे हुए सदा श्रीकृष्ण का नाम गान  करते रहते थे । एक दिन भावावेश मे अकस्मात् उन्होंने देखा मानो चारों ओर सुनील पर्वत श्रेणी है, नीचे कलकल निनादिनी कालिन्दी बह रही है । यमुना तीस्पर कदम्ब के नीचे खडे हुए भगवान् श्री कृष्ण मुरली हाथ में लिये मुसकरा रहे हैं । यह दृश्य देखते ही जयदेवजी के मुखसे अकस्मात् यह गीत निकल पडा –

मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुव: श्यामास्तमालद्रुमैर्नक्तं
भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे गृहं प्रापय ।
इत्थं नन्दनिदेशतश्चलितयो: प्रत्यध्वकुञ्जद्रुमं राधामाधवयोर्जयन्ति यमुनाकूले रह:केलय: ।। 

पराशर इस मधुर गान को सुनकर मुग्ध हो गया । कहा जाता है, यहीं जयदेव जी  ने भगवान के दशावतारों के प्रत्यक्ष दर्शन हुए और उन्होंने जऐ जगदीश हरे की टेर लगाकर दसों अवतारों की क्रमश: स्तुति गायी । कुछ समय बाद जब उन्हें बाह्य ज्ञान हुआ, तब पराशर को साथ लेकर वे चले भगवान् श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करने ।

आपका वैराग्य ऐसा प्रखर था कि एक वृक्ष के नीचे एक ही दिन निवास करते थे, दूसरे दिन दूसरे वृक्षके नीचे आसक्ति रहित रहते थे । जीवन निर्वाह करने की अनेक सामग्रियों मे से आप केवल एक गुदरी(मोटी चादर) और एक कमण्डलु ही अपने पास रखते थे और कुछ भी नहीं ।

श्री जयदेव जी का विवाह –

जगन्नाथ पुरी में ही सुदेव नामके एक ब्राह्मण श्री जगन्नाथ भगवान् के भक्त थे । उनके कोई सन्तान न थी, उन ब्राह्मण ने श्री जगन्नाथजी से प्रार्थना की कि यदि मेरे सन्तान होगी तो पहली सन्तान आपको अर्पण कर दूंगा । कुछ समय के बाद उसके एक कन्या हुई और जब द्वादश वर्षकी विवाह-के योग्य हो गयी तो उस ब्राह्मण ने श्री जगन्नाथ जी के मंदिर में उस कन्या (पद्मावती) को लाकर प्रार्थना की के हे प्रभो ! मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार आपको भेंट करने के लिये यह कन्या लाया हूं । उसी समय श्री जगन्नाथ जी ने आज्ञा दो कि इस समय हमारे ही स्वरुप परमरसिक जयदेव नामके भक्त पुरी में विराज रहे हैं, अत: इसे अभी ले जाकर उन्हें अर्पण कर दो और उनसे कह देना कि जगन्नथ जी की ऐसी ही आज्ञा हुई है ।

भगवान् की आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण वनमें वहां गया, जहां कविराजराज भक्त श्री जयदेव जी बैठे थे और उनसे बोला -हे महाराज ! आप मेरी इस कन्या को पत्नी रूप से अपनी सेवामें लीजिये, जगन्नाथजी की ऐसी आज्ञा है । जयदेवजीने कहा – जगन्नाथ जी की बात जाने दीजिये, वे यदि हजारों स्त्रियां भी सेवा में रखें तो उनकी शोभा है, वे समर्थ है । परंतु हमको तो एक ही पहाड के समान भारवाली हो जायगी। अत: अब तुम कन्या के साथ यहा से लौट जाओ ।

ये भगवान् की आज्ञाको भी नहीं मान रहे हैं, यह देखकर ब्राह्मण खीज गया और अपनी लड़की से बोला -मुझे तो जगन्नाथजी की आज्ञा शिरोधार्य है, मैं उसे कदापि टाल नहीं सकता है । तुम इनके ही समीप स्थिर होकर रहो । श्री ज़यदेव जी अनेक प्रकार की बातो से समझाकर हार गये, पर वह ब्राह्मण नहीं माना और अप्रसन्न होकर चला गया । तब वे बड़े भारी सोचमे पड़ गये । फिर वे उस ब्राह्मण की कन्यासे बोले -तुम अच्छी प्रकार से मनमें विचार करो कि तुम्हारा अपना क्या कर्तव्य है ? तुम्हारे योग्य कैसा पति होना चाहिये ? यह सुनकर उस कन्या ने हाथ जोड़कर कहा की मेंरा वश तो कुछ भी नहीं चलता है । चाहे सुख हो या दुख, यह शरीर तो मैंने आपपर न्यौछावर कर दिया है ।

श्री पद्मावती का भावपूर्ण निश्चय सुनकर श्री जयदेव जी ने प्रसन्न हुए । उन्होंने सोचा की भगवान् जगन्नाथ ही यही  इच्छा है ऐसा लगता है और प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा को मिला दिया। श्री जयदेव जी और श्री पद्मावती की का विवाह संपन्न हुआ । निर्वाह के लिये झोपडी बना कर छाया कर ली । अब छाया हो गयी तो उसमें भगवान् श्यामसुन्दर की एक मूर्ति सेवा करने के लिये पधरा ली ।

श्री गीतगोविन्द महाकाव्य की रचना :

श्री जयदेव जी प्रभु की सुमधुर लीला का दर्शन नित्य करते परंतु एक दिन मन में आया कि जिन प्रभु की लीलाओ का मै अपने उर अंतर में दर्शन करता हूं उसका गान करुँ ।परम प्रभु की ललित लीलाएँ जिसमें वर्णित हों, ऐसा एक ग्रन्थ बनाऊं और अपनी वाणी पवित्र करू। जिन जिन संतो ने प्रभु के मधुर स्वरुप का भजन किया उन्होंने गाकर किया है। उनके इस निश्चय के अनुसार अति सरस गीतगोविन्द महाकाव्य की रचना वे करने लगे ।

गीतगोविन्द लिखते समय एक बार श्री जयदेव जी को एक विलक्षण भाव का दर्शन हुआ की श्री श्यामसुंदर विरह कें ताप से तप्त है, वे श्री किशोरी जी से विनती करते है के आप अपना चरणकमल  मेरे मस्तकपर पधरा दीजिये । इस आशय का पद ग्रन्थ में लिखते समय सोच विचार मे पड़ गये कि इस गुप्त रहस्य को कैसे प्रकट किया जाय ?इस महाश्रृंगार रस को संसार के सामने प्रकट कैसे करू? कलम रुक गयी और सोचने लगे की क्या करे । सोच विचार करते करते संध्या हो गयी और संध्या में गंगा स्नान का नियम था ।आप स्नान करने चले गये ।

पीछे से श्रीकृष्ण जयदेव जी का रूप धारण कर आये और पद्मावती जी से पोथी मांगने लगे । पद्मावती ने कहा – प्रभु आज आप बिना स्नान किये लौट आये? जयदेव रूप धारी भगवान् ने कहा की एक भाव मन में आया है वह लिख देता हूं कही विस्मरण न हो जाए, पोथी में प्रभु ने जयदेव जी के मन में आयी हुई पंक्ति लिख दी ।पद्मावती जी का नियम था की से जयदेव जी को भोजन प्रसाद परोस कर ही वे भोजन करती थी। प्रभु ने सोचा आज आया हूं तो इनका आतिथ्य स्वीकार करना चाहिए । प्रभु ने कहा हमें जोर की भूख लगी है । पद्मावती ने भोजन परोसा और भोजन पाकर भगवान् चले गए और बाद में पद्मावती जी ने भी भोजन पाया । इतने में श्री जयदेव जी स्नान करके लौट आये और देखा तोह पद्मावती भोजन पा रही है ।उन्होंने कहा – पद्मावती आज तुमने पहले ही भोजन पा लिया ? तुम्हारा तो नित्य नियम है की हमारे भोजन पाने के बाद ही तुम भोजन करती हो।

पद्मावती ने कहा – जी प्रभु आप कैसी बाते कर रहे है ? अभी अभी अभी मैंने आपको भोजन पवाया है । आप ही ने आकर पोथी मांगी और उसमें कोई पद लिखा और भोजन करके चले गए । श्री जयदेव जी ने देखा कि वह पद जो अभिव्यक्त करने में संकोच हो रहा था वह पद पोथी में लिख दिया गया है । जयदेव जी समझ गए की प्रभु ने ही यह लीला की है  ।

जयदेव वेषधारी महमायावी श्री कृष्ण ने देहि मे पदपल्लवमुदारं लिखकर कविता की पूर्ति कर दी थी।

श्री जयदेवजी अति प्रसन्न हुए और पद्मावती से कहने लगे की तुम धन्य हो ,तुम्हारा सौभाग्य अखंड है की प्रभु ने तुम्हारे हाथ का भोजन पाया है। लपक कर पद्मावती जिस थाली में खा रही थी उसमे का उच्चिष्ठ जयदेव जी पाने लगे । यह देख कर पद्मावती जी को संकोच हुआ की मेरे पतीदेव आज ये क्या कर रहे है ।श्री जयदेव जी प्रभु की कृपा का अनुभव कर के कहने लगे – हे कृष्ण ! हे नंदनंदन !हे राधावल्लभ! हे व्रजांगनाधव आज आपने लिस अपराध से इस किंकर त्यागकर केवल पद्मावती का मनोरथ पूर्ण किया ? इस घटना के बाद उन्होंने  गीत गोविन्द को शीघ्र ही समाप्त कर दिया ।

श्री गीतगोविन्द की महिमा :

जगन्नाथ धाम में एक राजा पण्डित था । उसने भी एक पुस्तक बनायी और उसका गीतगोविन्द नाम रखा ।
उसमें भी से कृष्ण चरित्रों का वर्णन था । राजा ने ब्राहाणो को बुलाकर कहा कि यही गीतगोविन्द है । इसकी प्रतिलिपियां करके पढिये और देश देशांतर में प्रचार करिये ।

इस बात को सुनकर विद्वान् ब्राह्मणोंने असली गीत-गोविन्द को खोलकर दिखा दिया और मुसकराकर बोले कि यह तो कोई नयी दूसरी पुस्तक है, गीतगोविन्द नहीं है । राजा का तथा राजभक्त विद्वानोंका आग्रह था कि यही गीतगोविन्द है । अब इस बात से लोगों की बुद्धि भ्रमित हो गयी । कौन सी पुस्तक असली है, यह निर्णय करने के लिये दोनों पुस्तकें श्री जगन्नाथ देव जी के मन्दिर में रखी गयी । बाद में जब पट खेले गये तो देखा गया कि जगन्नाथ जी ने राजाकी पुस्तक को दूर फेंक दिया है और श्री जयदेव कवि कृत गीत-गोविन्द को अपनी छाती से लगा लिया है ।

इस दृश्यको देखकर राजा अत्यन्त लज्जित हुआ । अपनी पुस्तक का अपमान जानकर बड़े भारी शोक में पड़
गया और निश्चय किया कि अब मैं समुद्र में डूबकर मर जाऊँगा । जब राजा डूबने जा रहा था तो उस समय  प्रभुने दर्शन देकर आज्ञा दी कि तू समुद्र में मत डूब । श्री जयदेव कवि कृत गीतगोविन्द जैसा दूसरा ग्रन्थ नहीं को सकता है । इसलिये तुम्हारा शरीर त्याग करना वृथा है । अब तुम ऐसा करो कि गीतगोविन्द के बारह सर्गो में अपने बारह शलोक मिलाकर लिख दो । इस प्रकार तुम्हारे बारह रलोक उसके साथ प्रचलित हो जायेंगे, जिसकी प्रसिद्धि तीनों लोकों में फैल जायगी ।

श्री गीतगोविन्द का गान सुनने श्री जगन्नाथ जी का पधारना :

एकबार एक माली की लड़की बैंगन के खेत मे बैंगन तोड़ते समय गीतगोविन्द के पांचवें सर्ग की धीर समीरे यमुनातीरे वसति वने वनमाली  इस अष्टपदी का गान कर रही थी । उस मधुर गान को सुनने के लिये श्री जगन्नाथ जी जो उस समय अपने श्री अंगपर महीन एवं ढीली पोशाक धारण किये हुए थे, उसके पीछे पीछे डोलने लगे । प्रेमवश बेसुध होकर उस माली की लड़की के पीछे पीछे घूमन से कांटों में उलझकर श्री जगन्नाथ जी के वस्त्र फट गये । उस लड़की के गान बन्द करने पर भगवान मंदिर में पधारे ।

संध्या का दर्शन खुला तब फटे वस्त्रो को देखकर पुरीके राजाने आश्चर्य चकित होकर पुजारियों से पूछा -अरे ! यह क्या हुआ, ठाकुर जी के वस्त्र कैसे फट गये हैं ? पुजारियों ने कहा कि हमें तो कुछ भी मालूम नहीं है ।राजा ने सैनिको को भेजा तब खेत में भगवान् के फाटे हुए वस्त्र कांटो में फसे मिले।  तब स्वयं ठाकुर जी ने ही सब बात बता दी । जयदेव जी ने कहा – राजन् ! जो भीं इन अष्टपदियो का गान करता है ,श्री श्यामसुंदर वहा जाकर उसे सुनते है । राजा ने प्रभु की रुचि जानकर पालकी भेजी, उसमें बिठाकर उस लड़की को बुलाया । उसने आकर ठाकुर जी के सामने नृत्य करते हुए उसी अष्टपदी को गाकर सुनाया । प्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए । तब से राजा ने मंदिर में नित्य गीत गोविन्द गान की व्यवस्था है ।

उक्त धटना से गीत गोविन्द के गायन को अति गम्भीर रहस्य जानकर पुरीके राजाने सर्वत्र यह ढिंढोरा पिटवाया कि कोई राजा हो या निर्धन प्रजा हो, सभी को उचित है कि इस गीत गोविन्द का मधुर स्वरों से गान करे । उस समय ऐसी भावना रखे कि प्रियाप्रियतम श्री राधा श्यामसुन्दर समीप विराजकर श्रवण कर रहे हैं ।

गीतगोविन्द के महत्व को मुलतान के एक मुगल सरदार ने एक ब्राह्मण से सुन लिया । उसने घोषित रीति के अनुसार गान करने का निश्चय करके अष्टपदियों को कणठस्थ कर लिया । जब वह घोड़ेपर चढकर चलता था तो उस समय घोड़ेपर आगे भगवान् विराजे हैं ऐसा ध्यान कर लेता था, फिर गान करता था । एकदिन उसने घोड़ेपर प्रभु को आसन नहीं दिया और गान करने लगा, फिर क्या देखा कि मार्ग में घोड़े के आगे आगे मेरी ओर मुख किये हुए श्यामसुन्दर पीछे को चलते हैं और गान सुन रहे हैं । घोड़े से उतरकर उसने प्रभु के चरणस्पर्श किये तथा नौकरी छोड़कर विरक्त वेश धारण कर लिया ।

अतः आगे जो भी गीतगोविन्द का गान् करना चाहे वे लोग भगवान् को पहले आसान निवेदन करे ऐसी घोषणा राज्य में कर दिया गया । गीतगोविन्द का अनन्त प्रताप है, इसकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जिसपर स्वयं रीझकर भगवान ने उसमें अपने हाथसे पद लिखा है ।

श्री जयदेव जी की साधुता :

श्रीजयदेव जी को एक बार एक सेवक ने अपने घर बुलाया । दक्षिणा में आग्रह करके कुछ मुहरें देने लगा, आपके मना करने पर भी उसने आपको चद्दर में मुहरें बाँध दीं । आप अपने आश्रम को चले, तब मार्ग में उन्हें ठग मिल गये । आपने उनसे पूछा कि तुमलोग कहाँ जाओगे ? ठगोंने उत्तर दिया- जहाँ तुम जा रहे हो, वहीं हम भी जायेंगे । श्री जयदेवजी समझ गये कि ये ठग हैं । आप तो परम संत थे ,आपने गाँठ खेलकर सब मुहरें उन्हें दे दीं और कहा कि इनमे से जितनी मोहर आप लेना चाहें ले लें ।

उन दुष्टो ने अपने मनमें सोच समझकर कहा कि इन्होंने हमारे साथ चालाकी की है । अभी तो भयवश सब धन बिना माँगे ही हमें सोंप दिया है । परंतु इनके मनमें यही है कि यहाँ से तो चलने दो, आगे जब नगर आयेगा तो शीघ्र ही इन सबों को पकडवा दूँगा और दण्डित करवाऊंगा ।

चार ठगों ने आपस में विचार किया कि क्या करे । एक ने कहा धन लेकर इनके प्राण लेकर भाग चलो, दूसरे ने कहा मारकर क्या करे ?धन तो मिल गया। तब सबने निर्णय किया के न मारो न छोडो ,यह सोचकर उन ठगोंने श्री जयदेवजी के हाथ -पैर काटकर बड़े गड्ढे में डाल दिया और अपने अपने घरोंको चले गये ।जयदेव जी वहा पड़े पड़े मधुर स्वर में श्री युगल नाम संकीर्तन करने लगे।

थोड़े समय बाद ही वहाँ से एक राजा जिनक नाम लक्ष्मणसेन था ,वहाँ से निकल रहे थे ।राजा भक्तहृदय थे, उन्होंने युगलनाम संकीर्तन सुना तो सैनिको को आदेश दिया की ये वाणी कहा से आ रही है यह ढूंढ कर निकालो । सैनिको ने देखा की एक अंधकूप में श्रीज़यदेव जी संकीर्तन कर रहे हैं और गड्ढे में दिव्य प्रकाश छाया है तथा हाथ पैर  कटे होनेपर भी वे परम प्रसन्न हैं । तब उन्हें गड्डेसे बाहर निकालकर राजा ने हाथ पैर कटने का प्रसंग पूछा । जयदेवजी ने उत्तर दिया कि मुझे इस प्रकार का ही शरीर प्राप्त हुआ है । राजा समझ गए की ये परम संत है,किसीकी निंदा शिकायत नहीं करना चाहते ।

सच्चे संत को परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती उनका आभामंडल ही सब बता देता है । श्री जयदेव जी के दिव्य दर्शन एवं मधुर वचनामृत को सुनकर राजाने मनमें विचारा कि मेरा बड़ा भारी सौभाग्य है कि ऐसे सन्तके दर्शन प्राप्त हुए । राजा उन्हें पालकी में बिठाकर घर ले आया । चिकित्सा के द्वारा कटे हुए हाथ पैरो के घाव ठीक करवाये, फिर श्री जयदेव जी से प्रार्थना  कि अब आप मुझे आज्ञा दीजिये कि कौन सी सेवा करूं ? श्री जयदेवजी ने कहा कि राजन्! भगवान् और भक्तो की सेवा कीजिये । ऐसी आज्ञा पाकर राजा साधु सेवा करने लगा ।

इसकी ख्याति चारों ओर फैल गयी की राजा लक्ष्मण सेन ने संत सेवा आरम्भ की है और सब सम्प्रदायो के संतो को केवल वेश देखकर राजा सेवा करते है।  एक दिन वे ही चारों ठग सुन्दर कण्ठी माला धारण कर राजा के यहां आये । उन्हें देखते ही श्री जयदेव जी पहचान गए । ठग डर गए की अब दंड मिलेगा । श्री जयदेव जी ने नाही उन्हें अन्य संतो के साथ रखने का विचार किया न अपने साथ रखाने का सोचा ,उनका विशेष सत्कार करवाने का विचार किया जिससे उनका सत्य सामने न आये और दंड से बच जाए। जयदेव जी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा – देखो, आज तो मेरे बड़े गुरु भाई लोग पधारे है।उन सबका उन्होंने बड़ा स्वागत किया।

श्री जयदेव जी ने शीघ्र राजा को बुलवाकर कहा कि इनकी प्रेम से यथोचित सेवा करके संत सेवाकर फल प्राप्त कर लो । आज्ञा पाकर राजा उन्हें भीतर महल में ले गया और अनेक सेवको को उनकी सेवा-में लगा दिया, परंतु उन चारोंके मन अपने पापसे व्याकुल थे, उन्हें भय था कि यह हमें पहचान गया है, राजासे कहकर मरवा देगा । वे राजासे बार बार विदा मांगते थे, पर राजा उन्हें जाने नहीं देता था । तब श्री जयदेव जी के कहनेपर राजाने अनेक प्रकार के वस्त्र रत्न आभूषण आदि देकर उन्हें विदा किया । धन और कीमती सामान साथ में था अतः राज ने साथमें कई मनुष्यों को भी भेजा ।

राजा के सिपाही गठरियों को लेकर उन उग सबको पहुंचा ने के लिये उनके साथ साथ चले, कुछ दूर जानेपर राजपुरुषो ने उन सन्तो से पूछा कि भगवन् ! राजा के यहां नित्य संत महात्मा आते जाते रहते हैं, परंतु राज के गुरुदेव जी ने जितना सत्कार आपका किया और राजासे करवाया है, ऐसा किसी दूसरे साधु सन्त का सेवा सत्कार आजतक नहीं हुआ । इसलिये हम प्रार्थना करते हैं कि आप बताइये कि स्वामी जी से आपका क्या सम्बन्ध है ?

उन्होंने कहा यह बात अत्यन्त गोपनीय है, हम तुम्हें बताते है पर तुम किसीसे मत कहना । पहले तुम्हारे स्वामी जी और हम सब एक राजा के यहां नौकरी करते थे । वहाँ इन्होंने बड़ा भारी अपराध किया,इन्होंने राजा का बहुत सा धन लूट लिया । राजा ने इन्हें मार डालने की आज्ञा दी परंतु हमने अपना प्रेमी जानकर इनको मारा नहीं ।केवल हाथ पैर काटकर राजा को दिखा दिया और कह दिया कि हमने मार डाला । उसी उपकार के बदले में हमारा सत्कार विशेष रूप से कराया गया है ।

उन साधु वेषधारियो के इस प्रकार झूठ बोलते ही पृथ्वी फट गयी और वे सब उसमें समा गये । इस दुर्धटना से राजपुरुष लोग आश्चर्य चकित हो गये । वे सब के सब दौड़कर स्वामीजी के पास आये और जैसा हाल था, कह खुनाया । उसके सुनते ही से जयदेव जी दुखी होकर हाथ-पैर मलने लगे । उसी क्षण उनके हाथ पैर पहले जैसे वापस आ गए ।  राजपुरुषो ने दोनों आश्चर्यजनक घटनाओ को राजा से कह सुनाया । हाथ पैर पहले जैसे पूरे हो जाने की घटना सुनकर राजा अति प्रसन्न हुआ । उसी समय वह दौड़कर श्री जयदेव जी के समीप आया और चरणों में सिर रखकर पूछने लगा  -प्रभो! मैं अधिकारी तो नहीं हूं परंतु कृपा करके इन दोनों चरित्रों का रहस्य खोलकर कहिये कि क्यों धरती फटी और उसमें सब साधु कैेसे समाये ? आपके ये हाथ पैर कैसे निकल आये ?

श्री जयदेव जी ने पहले बात को टालना चाहा । राजा ने स्वामीजी से जब अत्यन्त हठ किया तब उन्होंने सब बात खोलकर कह दी, फिर बोले कि देखो राजन् ! यह संतो का वेश अत्यन्त अमूल्य है, इसकी बडी भारी महिमा है । संतो।के साथ कोई चाहे जैसी और चाहे जितनी बुराई करे तो भी वे उस बुराई करनेवाले का बुरा न सोचकर बदले में उसके साथ भलाई ही करते हैं । साधुता का त्याग न करनेपर सन्त, महापुरुष एवं भगवान् श्री श्यामसुन्दर मिल जाते हैं ।

श्री जयदेव जी की पत्नी श्री पद्मावती जी का पतिप्रेम :

अब तक राजा ये नहीं जनता था की ये हमारे स्वामी जी जो महल में विराजते है यही जयदेव जी है ।राजा ने श्रीज़यदेव जी  का नाम तो सुना था, पर उसने कभी दर्शन नहीं किया था । आज जब उसने जाना की यही श्री जयदेव जी है ,उनके  नाम और गांव को जाना तो प्रसन्न होकर कहने लगा कि आप कृपाकर यहां विराजिये । आपके यहां विराजने से मेरे पूरे देश में प्रेमभक्ति फैल गयी है ।

राजा की अब इच्छा हुई की श्री जयदेव जी की पत्नी को भी महल में ही निवास करवाना चाहिए । श्री जयदेव जी की आज्ञा से राजा कीन्दुबिल्ब आश्रम से उनकी पत्नी श्री पद्मावतीजी को लिवा लाये । श्री पद्मावती जी रानी के निकट रनिवास में रहने लगी । एक दिन जब रानी पद्मावती के निकट बैठी थी उसी समय किसीने आकर रानीको सूचित किया कि तुम्हारा भाई युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ है और तुम्हारी भाभी जी उनके साथ सती हो गयी ।

यह सुनकर रानी को अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि हमारी भाभी कितनी श्रेष्ठ सती साध्वी थी । श्री पद्मावती जी कोे इससे कुछ भी आश्चर्य न हुआ । उन्होंने रानी को समझाया कि पति के स्वर्गवासी होनेपर उनके मृत शरीर के साथ जल जाना उत्तम पातिव्रत सूचक है, परंतु सबसे श्रेष्ठ पातिव्रत की यह रीति है कि प्रियतम के प्राण छूट जायं तो अपने प्राण भी तुरंत उसी क्षण शरीर को छोड़कर साथ चले जायं ।

श्री पद्मावती जी ने रानी के भाभी की प्रशंसा नहीं की, इससे रानीने व्यंग्य करते हुए कहा कि आपने जैसी पतिव्रता बतायी ऐसी तो केवल आप ही हो । समय पाकर सब बात रानी ने राजा से कहकर फिर यों कहा आप स्वामी जी को थोडी देर के लिये बाग में ले जाओ, तब मैं इनके पातिव्रत की परीक्षा करुँगी । राजाने रानी-का विचार सुनकर कहा कि यह उचित नहीं है ।

जब रानीने बड़ा हठ किया, तब राजाने उसकी बात मानकर वैसा ही किया, राजा के साथ स्वामी जी के बागमें चले जानेपर रानी की सिखायी हुई एक दासी ने आकर पद्मावतीजी से कहा कि स्वामीजी भगवान के धाम को चले गये । यह सुनते ही रानी और समीप बैठी हुई स्त्रीयां दुख प्रकट करने के ढोंग को रचकर धरतीपर लेटने और रोने लगी । ध्यान लगाकर पद्मावती जी ने पति को जीवित जानकर थोडी देर बाद कहा -अजी रानीजी! मेरे स्वामी जी तो बहुत अच्छी तरह से हैं, तुम अचानक ही इस प्रकारर क्यों धोखे में आकर डर रही हो ?

रानी की माया का श्री पद्मावती जी पर कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ, भेद खुल गया, इससे रानी को बडी लजा हुई । जब कुछ दिन बीत गये तो फिर दूसरी रानी ने उसी प्रकार की तैयारी कर के माया जाल रचा । श्री पद्मावती जी अपने मनमें समझ गयी कि रानी परीक्षा लेना चाहती है तो परीक्षा ही देना चाहिये । इस बार जैसे ही किसी दासी ने आकर कहा की स्वामी जी तो प्रभुको प्राप्त हो गये । वैसे ही झट पतिप्रेम से परिपूर्ण होकर श्री पद्मावती जीने अपना शरीर छोड़ दिया । इनके मृत शरीर को देखकर रानीका मुख कान्तिहीन सफेद हो गया ।

राजा आये और उन्होंने जब यह सब जाना तो कहने लगे कि इस स्त्री के चक्कर में आकर मेरी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गयी, अब इस पाप का यही प्रायश्चित्त है कि मैं भी जल मरूं । श्री जयदेव-जी को जब यह समाचार मिला तो वे दौड़कर वहाँ पर आये और मरी हुई पद्मावती को तथा मरने के लिये तैयार राजा को देखा । राजाने कहा कि इनको मृत्यु मैंने दी है । जयदेव जी ने कहा -तो अब तुम्हारे जलने से ये जीवित नहीं हो सकती हैं । अत: तुम मत जलो। राजाने कहा-महारज ! अब तो मुझे जल ही जाना चाहिये; क्योकि मैंने आपके सभी उपदेशों को धुलमें मिला दिया ।

श्री जयदेवजी ने राजा को अनेक प्रकार से समझाया, परंतु उसके मन को कुछ भी शान्ति नहीं मिली, तब आपने गीत गोविन्द की एक अष्टपदी का गान आरम्भ किया । संगीत विधि से अलाप करते ही पद्मावती जी जीवित हो गयी । इतने पर भी राजा लज्जा के मारे मरा जा रहा था और आत्महत्या कर लेना चाहता था ।

वह बार बार मनमें सोचता था कि ऐसे महापुरुष का संग पाकर भी मेरे मनमें भक्ति का लेशमात्र भी नहीं आया । श्री जयदेव जी ने समझा बुझाकर राजा को शान्त किया  परंतु इस घटना के बाद श्री जयदेव ने कहा की अब हम महल में नहीं रह सकते ,हम अपने गाँव वापस जा रहे है क्योंकि न तुम इस घटना को भूलोगे न हम अतः रस में नीरस होगा और सेवा भजन ठीक से नहीं हो पायेगा ।वैसे भी साधू को अधिक समय दूसरे स्थान पर नहीं निवास करना चाहिए।  तुम भजन और संत सेवा में लगे रहना ।

श्री जयदेव जी की गंगा के प्रति निष्ठा और गंगा जी का आश्रम के निकट प्राकट्य :

श्री जयदेवजी का जहाँ आश्रम था, वहांसे गंगाजी की धारा अठारह कोस दूर थी । परंतु आप नित्य गंगा स्नान करते थे । जब आपका शरीर अत्यन्त वृद्ध हो गया, तब भी आप अपने गंगा स्नान के नित्य नियम को कभी नहीं छोड़ते थे । इनके बड़े भारी प्रेम को देखकर इन्हें सुख देनेके लिये रांत को स्वप्न में श्री गंगा जी ने कहा अब तुम स्नानार्थ इतनी दूर मत आया करो, केवल ध्यान में ही स्नान कर लिया करो । धारा में जाकर स्नान करनेका हठ मत करो ।

श्री जयदेव जी को धरा में न जाने पर अच्छा नहीं लगता। अतः इस आज्ञा को स्वीकार नहीं किया । तब फिर गंगाजी ने स्वप्न में कहा – तुम नहीं मानते को तो मैं ही तुम्हारे आश्नम के निकट सरोवर में आ जाऊँगी । तब आपने कहा-मैं कैसे विश्वास करुंगा कि आप आ गयी हैं । गंगाजी ने कहा जब आश्रम के समीप जलाशय में कमल खिले देखना, तब विश्वास करना कि गंगा जी आ गयी ।

ऐसा ही हुआ, खिले हुए कमलो को देखकर श्री जयदेव जी ने वहीं स्नान करना आरम्भ कर दिया ।अंतकाल में आपको श्री ब्रजभूमि में जाने का विचार हुआ। आपने अन्तकाल में श्री वृन्दावनधाम को प्राप्त किया और श्री राधामाधव के चरणकमलों की प्राप्ति की।

Posted on

ब्रह्मगिरी पर्वत

वराहपुराण में और पद्मपुराण में ऐसा लिखा है कि पहले ब्रह्मा जी ने 60 हजार वर्ष तक तप किया फिर भी गोपियों की रज नहीं मिली। उसके बाद सतयुग के अन्त में ब्रह्मा जी ने फिर तप किया भगवान ने कहा, कि तुम क्या चाहते हो ?
ब्रह्मा जी बोले, कि सब गोपियों की रज मिल जाये व माधुर्यमयी लीलाएँ देखने को मिले।
भगवान ने कहा, कि वहाँ पुरुषों का प्रवेश नहीं है।
ब्रह्मा जी बोले, फिर ?
भगवान ने कहा, कि तुम पर्वत बन जाओ।
ब्रह्मा जी बोले, कहाँ ?
भगवान ने कहा, कि तुम ब्रज में चले जाओ।
ब्रह्मा जी ने कहा, कि ब्रज तो बहुत बड़ा है, कहाँ जायें ?
भगवान बोले, कि वृषभानुपुर यानि बरसाना चले जाओ। वहाँ पर्वत बन जाना, अपने आप सब लीला मिल जायेगी व गोपियों की चरण रज भी मिल जायेगी। बरसाना वहाँ नित्य श्री राधा रानी के चरण मिलेंगे।
तब ब्रह्मा जी यहाँ आकर पर्वत बन गए।

एक कथा आती है बरसाने के पर्वतों के बारे में कि जब भगवान सती अनुसुइया की परीक्षा लेने गये थे तो वहाँ उसने ब्रह्मा विष्णु शिव को श्राप दिया कि तुमने बड़ा अमर्यादित व्यवहार किया है इसीलिए जाओ पर्वत बन जाओ। तो तीनों देवता पर्वत बन गये और उनका नाम त्रिंग हुआ।

जब श्री राम जी का सेतु बंधन हो रहा था तो पर्वत लाये जा रहे थे। त्रिंग को जब हनुमान जी ला रहे थे तो आकाशवाणी हुई कि अब पर्वत मत लाओ क्योंकि सेतु बंधन हो चुका है। तो जब हनुमान जी ने उसे यहाँ पर रख दिया तो गिरिराज जी बोले कि हनुमान जी हम तुमको श्राप दे देंगे। हे वानर राज तुमने हमारा प्रभु से मिलन नहीं होने दिया। तो हनुमान जी ने प्रभु से प्रार्थना की। तब राम जी ने कहा कि मैं स्वयं श्री कृष्ण के रूप में उनको अपने हाथों से धारण करूँगा जब की औरों को तो सिर्फ चरण स्पर्श ही दूँगा।

एक पुराण में लिखा है कि स्वयं राम जी आये और उन्होंने जो त्रिंग थे, ब्रह्मा विष्णु शिव, इन तीनों को अलग-अलग करके यहाँ स्थापित किया। ‘नन्दगाँव’ में शिव जी को स्थापित किया, ’नन्दीश्वर‘ के रूप में, और ‘गोवर्धन‘ में विष्णु को ‘गिरिराज’ जी के रूप में, ब्रह्मा जी यहाँ ‘बरसाने’ में स्थापित किये ‘ब्रह्मगिरी पर्वत‘ के रूप में। ब्रह्मगिरी के चार शिखर हैं, चार गढ़ है, मानगढ़, दानगढ़, भानुगढ़, विलासगढ़। ये जितने शिखर हैं ये ब्रह्मा जी के मस्तक हैं।

Posted on

बिहार पंचमी

ब्रज में  प्रकटे हैं बिहारी, जय बोलो  श्री हरिदास की।
भक्ति ज्ञान मिले जिनसे, जय बोलो गुरु महाराज की॥

मार्गशीर्ष, शुक्ल पक्ष, पंचमी को ही श्री धाम वृन्दावन में बिहारी श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। इसी दिन अप्रकट रहने वाले प्रभु साक्षात् नित्य वृन्दावन में निधिवन में प्रकट हुए थे। तीनो लोकों के स्वामी को इस दिन रसिक सम्राट स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ने अपनी भक्ति से जीत लिया था और वो अपने सभी भक्तों को दर्शन देने के लिए उनके सामने आ गए।

स्वामी श्री हरिदास जी निधिवन के कुंजो में प्रतिदिन नित्य रास और नित्य विहार का दर्शन किया करते थे, और अत्यंत सुंदर पद भी गाया करते थे। वो कोई साधारण मनुष्य नहीं थे, भगवान की प्रमुख सखी श्री ललिता सखी जी के अवतार थे। जब तक वो धरती पर रहे, उन्होंने नित्य रास में भाग लिया और प्रभु के साथ अपनी नजदीकियों का हमेशा आनन्द उन्हें प्राप्त हुआ। उनके दो प्रमुख शिष्य थे। सबसे पहले थे उनके अनुज गोस्वामी जगन्नाथ जी जिनको स्वामी जी ने ठाकुर जी की सेवा के अधिकार दिए और आज भी वृन्दावन में बांके बिहारी मन्दिर के सभी गोस्वामी जगन्नाथ जी के ही कुल के हैं। उनके दूसरे शिष्य थे उनके भतीजे श्री विठ्ठल विपुल देव जी। बिहार पंचमी के दिन विठ्ठल विपुल देव जी का जन्मदिन भी होता है।

स्वामी जी के सब शिष्य उनसे रोज आग्रह किया करते थे कि वो खुद तो हर दिन नित्य विहार का आनन्द उठाते है कभी उन्हें भी यह सौभाग्य दें जिससे वो भी इस नित्य रास का हिस्सा बन सके। पर स्वामी जी ने कहा की सही समय आने पर उन्हें स्वतः ही इस रास का दर्शन हो जायेगा क्योंकि रास का कभी भी वर्णन नहीं किया जा सकता। इसका तो केवल दर्शन ही किया जा सकता है और वो दर्शन आपको भगवान के अलावा कोई नहीं करा सकता। स्वामी जी का एक कुञ्ज था वो जहाँ वे रोज साधना किया करते थे। उनके सभी शिष्य इस बात को जानने के लिए काफी व्याकुल थे कि ऐसा क्या खास है उस कुञ्ज में।

एक दिन जिस दिन विठ्ठल विपुल देव जी का जन्मदिन था, स्वामी जी ने सबको उस कुञ्ज में बुलाया। जब सब विठ्ठल विपुल देव जी के साथ उस कुञ्ज में गए तो सब एक दिव्या प्रकाश से अन्धे हो गए और कुछ नजर नहीं आया। फिर स्वामी जी सबको अपने साथ वह लेकर आये और सबको बिठाया। स्वामी जी प्रभु का स्मरण कर रहे थे, उनके सभी शिष्य उन का अनुसरण कर रहे थे, और सबकी नजरे उस कुञ्ज पर अटकी हुई थी और सब देखना चाहते थे कि क्या है इस कुञ्ज का राज। तो सबके साथ स्वामी जी यह पद गाने लगे।

माई री सहज जोरी प्रगट भई जू रंग कि गौर श्याम घन दामिनी जैसे।
प्रथम   हूँ   हुती   अब   हूँ   आगे    हूँ   रही   है   न   तरिहहिं   जैसें॥
अंग     अंग     कि     उजराई     सुघराई    चतुराई    सुंदरता    ऐसें।
श्री हरिदास    के    स्वामी    श्यामा    कुंजबिहारी   सम   वस्  वैसें॥

स्वामी जी कि साधना शक्ति से उन दिन उन सबके सामने बांके बिहारी जी अपनी परम अह्लादनी शक्ति श्री राधा रानी के साथ प्रकट हो गए।

चेहरे पे मंद मंद मुस्कान, घुंघराले केश, हाथों में मुरली, पीताम्बर धारण किया हुआ जब प्रभु कि उस मूरत का दर्शन सब ने किया तो सबका क्या हाल हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे अपनी पलक झपकाना भी भूल गए हुए हैं। और ऐसे बैठे मानो कोई शरीर नहीं बल्कि एक मूर्ति हैं।

स्वामी जी कहते है कि देखो प्रभु प्रकट हो गए हैं। प्रभु कि शोभा ऐसी ही है जैसी घनघोर घटा कि होती है। यह युगल जोड़ी हमेशा विद्यमान रहती है। प्रकृति के कण-कण में युगल सरकार विराजमान है। और ये हमेशा किशोर अवस्था में ही रहते हैं। स्वामी जी के आग्रह से प्रिय और प्रीतम एक दूसरे के अन्दर लीन हो गए और फिर वही धरती से स्वामी जी को एक दिव्या विग्रह प्राप्त हुआ जिसमे राधा और कृष्ण दोनों का रूप है और इसी विग्रह के माध्यम से ठाकुर जी हमें श्री धाम वृन्दावन में दर्शन देते हैं। यही कारण है कि ठाकुर जी का आधा श्रृंगार पुरुष का होता है और आधा श्रृंगार स्त्री का होता है।

यह त्यौहार श्री धाम वृन्दावन में आज भी बहुत धूम धाम से मनाया जाता है। सुबह सबसे पहले निधिवन में प्रभु के प्राकट्य स्थल में जो भगवन में प्रतीक चरण चिन्ह है उनका पंचामृत अभिषेक किया जाता है। फिर एक विशाल सवारी स्वामी जी की वृन्दावन के प्रमुख बाजारों से होती हुई ठाकुर जी के मन्दिर में पहुँचती हैं। स्वामी जी की सवारी में हाथी, घोड़े, कीर्तन मंडली इत्यादि सब भाग लेते हैं। सवारी के सबसे आगे तीन रथ चलते हैं। इनमे से एक रथ में स्वामी श्री हरिदास जी, एक में गोस्वामी जगन्नाथजी और एक रथ में विठ्ठल विपुल देव जी के चित्र विराजमान होते हैं। ये रथ राज भोग के समय ठाकुर जी के मन्दिर में पहुँचते हैं और फिर तीनो रसिकों के चित्र मन्दिर के अन्दर ले जाये जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन ठाकुर जी हरिदास जी महाराज कि गोद में बैठकर उनके हाथों से भोग लगाते हैं।

यदि आपको किशोरी जी इस दिन अपने धाम वृन्दावन में बुला ले तो आपका सौभाग्य है परन्तु यदि किशोरी जी नहीं भी बुलाती हैं तो आप सुबह अपने घर पे ही बिहारी जी को भोग लगाये और संध्या के समय प्रभु की आरती करिये और उनके भजन में झूमते रहिये। आप पर कृपा जरूर बरसेगी। और आपको यह जानकार बहुत खुशी होगी कि इसी दिन भगवन श्री राम का जानकी जी के साथ विवाह भी हुआ था। इसलिए बिहार पंचमी को विवाह पंचमी भी कहा जाता है।

Posted on

श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु

श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु
(श्रृंगारवट वृन्दावन)

बंग देश के बाँकुड़ा जिले के पुरुणिया पाट के श्रीरसिकानन्द प्रभु के कनिष्ठ पुत्र श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी श्रीश्रीमन् नित्यानन्द प्रभुकी सातवीं पीढ़ी में थे। वे शैशव से ही विषयविरक्त थे। नित्यानन्द-सन्तान होने के नाते वैष्णव शिष्टाचार के अनुसार वैष्णव मात्र के पूज्य थे। छोटे-बड़े, गृहस्थ और त्यागी सब उसी दृष्टि से उनका आदर करते थे। पर यह उनके ‘तृणादपि सुनीचेन’ भाव के प्रतिकूल था। इससे उन्हें हार्दिक कष्ट होता था। उनकी प्रबल इच्छा थी भगवत्-कृपालब्ध किसी विशिष्ट वैष्णव के आनुगत्य में भजन-शिक्षा ग्रहण करने की। यह भी नित्यानन्द प्रभु के वंशज होने के कारण उनके लिए सम्भव नहीं था। जो सभी वैष्णवों के पूज्य थे और स्वयं आचार्य स्वरूप थे, उन्हें कोई वैष्णव अपने अनुगत मानकर भजन-शिक्षा कैसे देता ?

इसलिए वे चुपचाप घर छोड़कर वृन्दावन चले गये। उस समय गौड़ीय वैष्णव समाज के मुकुटमणि श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीपाद वृन्दावन में रहते थे। उनसे उन्होंने बिना अपने स्वरूप का परिचय दिये भजन-शिक्षा देने और शास्त्राध्ययन कराने की प्रार्थना की। विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। कुछ दिन वे उनके आनुगत्य में भजन और शास्त्राध्ययन करते रहे। किसी ने न जाना कि वे नित्यानन्द-सन्तान हैं।

पर उनकी मां उनके बिना किसी से कहे घर छोड़कर चले जाने के कारण बहुत दुःखी थीं। उन्होंने उन्हें खोजने के लिए कई भक्तों को इधर उधर भेज रखा था। उनमें से एक उन्हें खोजते-खोजते वृन्दावन में चक्रवर्तीपाद के पास जा पहुंचे। चक्रवर्तीपाद को उन्होंने नंदकिशोरदास जी का परिचय देते हुए उनकी मां की दारुण व्यथा का वर्णन किया और घर लौटकर उनकी इच्छानुसार विवाह करने की आज्ञा देने का अनुरोध किया।

चक्रवर्तीपाद परमपूज्या माँ गोस्वामिनी की इच्छा की अवहेलना कैसे करते ? उन्होंने नन्दकिशोर गोस्वामी से कहा–’आपने मुझे अपने शिक्षा गुरु के रूप में अङ्गीकार किया है। मैं यदि कुछ गुरु-दक्षिणा माँगूं तो देंगे ?’
‘क्यों नहीं ? आप आज्ञा करें।’ नन्दकिशोरजी ने तुरन्त कहा।
‘मेरी गुरु-दक्षिणा रूप में आप अब माँ की आज्ञानुसार घर लौट जायें और विवाह करें।’

नन्दकिशोरजी घर लौट गये, विवाह किया और एक पुत्र को जन्म दिया। उसके पश्चात् वे फिर गृह त्यागकर वृन्दावन चले गये। अपने साथ सम्वत् १८१५ की वादशाही सनद के साथ श्रीश्रीनिताइ-गौरांग विग्रह लेते गये, जिनकी आज भी शृङ्गारवट में विधिवत् सेवा-पूजा चल रही है। उनका अलौकिक प्रभाव देख तत्कालीन जोधपुर के राजा ने उन्हें बहुत-सी भू-सम्पत्ति प्रदान की, जिसका उनके वंशज निताइ-गौरांग की सेवा में उपयोग कर रहे हैं।

श्रीपाद नन्दकिशोरजी के पास भोंदू नाम का एक व्रजवासी बालक रहता था, जो उनकी गैयों की देखभाल करता था। उसे लोग भोंदू इसलिए कहते थे कि उसे छल-कपट और चतुराई छूकर भी नहीं गये थे। उससे यदि उपहास में कोई कुछ झूठ भी कह देता, तो वह उसे मान लेता। शंका करना तो उसे आता ही न था। वह नित्य बालभोग-प्रसाद पाकर श्रीपाद की गायें चराने जमुनापार भांडीरवन में जाया करता। उससे किसी ने कहा था कि भांडीरवन में नन्दलाल ग्वाल-वाल सहित गायें चराने जाते हैं। वह यह सोचकर खुश होता कि किसी दिन उनसे भेंट होगी, तब वह उनसे मित्रता कर लेगा और उनके साथ खेला-कूदा करेगा।

भोले-भाले भोंदू के हृदय की भाव-तरङ्ग उमड़-घुमड़कर जा टकरायी भक्तवत्सल भगवान् के मन-मन्दिर से। उनमें भी एक अपूर्व आलोड़न की सृष्टि हुई और जाग पड़ी एक नयी वासना भोंदू के साथ मित्रता कर खेल-कूद का आनन्द लेने की।
तो हो गयी एक दिन भेंट दोनों में। भेंट को मित्रता में बदलते देर न लगी। भोंदू नित्य कुछ खाने-पीने की सामग्री अपने साथ ले जाता। नन्दलाल और उनके साथी ग्वाल-बाल उसके साथ खाते-पीते, खेलते और नाचते कूदते। कई दिन श्रीपाद ने देखा भोंदू को सामान सिर पर ढोकर ले जाते। एक दिन उन्होंने पूछा–’भोंदू, यह क्या ले जा रहा है ?”
‘जे दाल-बाटी के ताईं है श्रीपाद।’
‘दाल-बाटी ? किसके लिए ?’
‘नन्दलाल और बिन के साथी ग्वाल-बालन के लिए। हम सब मिलके रोज दाल-बाटी बनामें हैं।’
‘नन्दलाल ! कौनसे नन्दलाल रे ?’
‘बेई बंसीबारे, जो भांडीरवन में गैया चरामें हैं।’
‘बंसीबारे ! भांडीरवन में गैया चरामें हैं ! अच्छा, बता तो उनका मुखारविन्द और वेशभूषा कैसी है ?’
‘बे बड़े मलूक हैं। सिर पै मोर-मुकुट धारन करे हैं। कानन में कुण्डल, गले में बनमाला धारन करे हैं और पीरे रंग को ओढ़ना ओढ़े हैं। सच बे बड़े मलूक लगै हैं।’
श्रीपाद आश्चर्यचकित नेत्रों से भोंदू की ओर देखते रह गये। उन्हें उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। पर वे विश्वास किये बिना रह भी नहीं सक रहे थे; क्योंकि वे जानते थे भोंदू झूठ नहीं बोलता।
उन्होंने कहा–’अच्छा भोंदू, एक दिन नन्दलाल और उनके साथियों को यहाँ ले आना। उनसे कहना श्रीपाद के यहाँ आपका दाल-बाटी का निमन्त्रण है। वे आ जायेंगे न ?’
‘आमेंगे च्यौं नई। मैं विनकू ले आऊँगो’ भोंदूने खुश होकर कहा।
उस दिन भाँडीरवन जाते समय भोंदू सोच रहा था–’आज नन्दलाल से श्रीपाद के निमन्त्रण की कहूँगा, तो वह कितना खुश होगा !’ पर जब उसने उनमे निमन्त्रण की बात कही, तो वे बोले–’हम काऊकौ नौतौ-औतौ नायं खामें।’
भोंदू का चेहरा सुस्त पड़ गया। उसने कहा–’नायँ नन्दलाल, तोको चलनौ परैगौ। मैंनै श्रीपाद से कह दी है, मैं तोय ले जाऊँगौ।’
‘नायें, हम नायें जायें। हमकू श्रीपाद सों कहा करनौ ?’ नन्दलाल ने गरदन हिलाकर मुँह बिचकाते हुए कहा।
भोंदू रोष करना नहीं जानता था, पर उस समय उसे रोष आ गया। उसने नन्दलाल से कुछ नहीं कहा। पर वह अपनी गैयों को अलग कर कहीं अन्यत्र जाने लगा, जैसे वह नन्दलाल से कह रहा हो–’तुझे श्रीपाद से कुछ नहीं करना, तो मुझे भी तुझमे कुछ नहीं करना। बस, हो चुकी मेरी-तेरी मैत्री।’
वह थोड़ी दूर ही जा पाया था कि नन्दलालने पुकारा–’भोंदू, ओ भोंदू ! नैक सुन जा।’
भोंदू क्या अब सुनने वाला था ? वह और भी तेजी से गैयों को हाँकने लगा। भोंदू सुनने वाला नहीं था, तो भगवान् भी उसे छोड़ने वाले कब थे ? वे भागे उसके पीछे-पीछे।
वाह रे व्रज के भगवान् ! तुम्हें ‘भगवान्’ कहते भी वाणी लजाती है। भगवान्, जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकर्ता हैं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश जिनके अंश के भी अंश हैं, वे क्या किसी व्यक्ति के पीछे ऐसे भागते हैं, जैसे उनकी उससे कोई अपनी गरज अटकी हो, जैसे उसके रूठ जाने से उनका त्रिलोकी का साम्राज्य छिन जाने वाला हो !
पर वे जिसके पीछे भागें वह भागकर जाय कहाँ ? नन्दलाल जा खड़े हुए भोंदू का रास्ता रोककर उसके सामने और बोले–’सुनें नायँ ?’
उनका स्वर ऊँचा था, पर उसमें विनय का भाव था। भोंदू ने उनके नेत्रों की ओर देखा, तो वे सजल थे। उसने कहा–’कहा कहँ ?’
‘मैं कहूँ, मैं श्रीपाद को निमन्त्रण अस्वीकार नायँ करूँ। मैं तो कहूँ, मैं शृङ्गारवट नायँ जाऊँगौ तू तौ भोरौ है, जानें नायँ शृङ्गारवट राधारानी को ठौर है। हुआँ दाऊ दादा कैसे जायगौ ? मेरे सखा कैसे जायेंगे ? श्रीपादकूँ ह्याँई आवनी होयगौ अपने माथे पै सामग्री लैकें। वे अपने हाथ से दाल-बाटी बनामेंगे, तो हम पामेंगे।’ भोंदू प्रसन्न हो गया। उसने उसी प्रसन्न मुद्रा में श्रीपाद से जाकर सब कुछ निवेदन किया।
श्रीपाद दूसरे दिन प्रचुर सामग्री अपने मस्तक पर वहनकर भांडीरवन ले गये। वे राम-कृष्ण और ग्वाल-बालो के साथ उनका क्रीड़ा विनोद देखकर कृतार्थ हुए। थोड़ी देर में सब कुछ अन्तर्हित हो गया। तब वे मूच्छित हो भूमि पर गिर पड़े। उस समय उन्हें आदेश हुआ–’अधीर न हो। घर जाओ और मेरी लीला स्थलियों का वर्णन करो।’
इस आदेश का पालन कर श्रीपाद ने ‘श्रीवृन्दावन-लीलामृत’ और ‘श्रीश्रीरसकलिका’ नाम के दो ग्रंथों का प्रणयन किया।

Posted on

आनन्दी बाई

गोकुल के पास ही किसी गाँव में एक महिला थी जिसका नाम था आनंदीबाई। देखने में तो वह इतनी कुरूप थी कि देखकर लोग डर जायें। गोकुल में उसका विवाह हो गया, विवाह से पूर्व उसके पति ने उसे नहीं देखा था। विवाह के पश्चात् उसकी कुरूपता को देखकर उसका पति उसे पत्नी के रूप में न रख सका एवं उसे छोड़कर उसने दूसरा विवाह रचा लिया। आनंदी ने अपनी कुरूपता के कारण हुए अपमान को पचा लिया एवं निश्चय किया कि ‘अब तो मैं गोकुल को ही अपनी ससुराल बनाऊँगी।

वह गोकुल में एक छोटे से कमरे में रहने लगी। घर में ही मंदिर बनाकर आनंदीबाई श्रीकृष्ण की भक्ति में मस्त रहने लगी। आनंदीबाई सुबह-शाम घर में विराजमान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ बातें करती, उनसे रूठ जाती, फिर उन्हें मनाती, और दिन में साधु सन्तों की सेवा एवं सत्संग-श्रवण करती। इस प्रकार कृष्ण भक्ति एवं साधुसन्तों की सेवा में उसके दिन बीतने लगे।

एक दिन की बात है गोकुल में गोपेश्वरनाथ नामक जगह पर श्रीकृष्ण-लीला का आयोजन निश्चित किया गया था। उसके लिए अलग-अलग पात्रों का चयन होने लगा, पात्रों के चयन के समय आनंदीबाई भी वहाँ विद्यमान थी। अंत में कुब्जा के पात्र की बात चली। उस वक्त आनंदी का पति अपनी दूसरी पत्नी एवं बच्चों के साथ वहीं उपस्थित था, अत: आनंदीबाई की खिल्ली उड़ाते हुए उसने आयोजकों के आगे प्रस्ताव रखा “सामने यह जो महिला खड़ी है वह कुब्जा की भूमिका अच्छी तरह से अदा कर सकती है, अतः उसे ही कहो न, यह पात्र तो इसी पर जँचेगा, यह तो साक्षात कुञ्जा ही है।”

आयोजकों ने आनंदीबाई की ओर देखा, उसका कुरूप चेहरा उन्हें भी कुब्जा की भूमिका के लिए पसंद आ गया। उन्होंने आनंदीबाई को कुब्जा का पात्र अदा करने के लिए प्रार्थना की। श्रीकृष्णलीला में खुद को भाग लेने का मौका मिलेगा, इस सूचना मात्र से आनंदीबाई भाव विभोर हो उठी। उसने खूब प्रेम से भूमिका अदा करने की स्वीकृति दे दी। श्रीकृष्ण का पात्र एक आठ वर्षीय बालक के जिम्मे आया था।

आनंदीबाई तो घर आकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे विह्वलता से निहारने लगी, एवं मन-ही-मन विचारने लगी कि ‘मेरा कन्हैया आयेगा, मेरे पैर पर पैर रखेगा, मेरी ठोड़ी पकड़कर मुझे ऊपर देखने को कहेगा। वह तो बस, नाटक में दृश्यों की कल्पना में ही खोने लगी।

आखिरकार श्रीकृष्णलीला रंगमंच पर अभिनीत करने का समय आ गया। लीला देखने के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुए। श्रीकृष्ण के मथुरागमन का प्रसंग चल रहा था, नगर के राजमार्ग से श्रीकृष्ण गुजर रहे हैं, रास्ते में उन्हे कुब्जा मिली। आठ वर्षीय बालक जो श्रीकृष्ण का पात्र अदा कर रहा था उसने कुब्जा बनी हुई आनंदी के पैर पर पैर रखा और उसकी ठोड़ी पकड़कर उसे ऊँचा किया। किंतु यह कैसा चमत्कार..। कुरूप कुब्जा एकदम सामान्य नारी के स्वरूप में आ गयी। वहाँ उपस्थित सभी दर्शकों ने इस प्रसंग को अपनी आँखों से देखा। आनंदीबाई की कुरूपता का पता सभी को था, अब उसकी कुरूपता बिल्कुल गायब हो चुकी थी। यह देखकर सभी दाँतो तले ऊँगली दबाने लगे। आनंदीबाई तो भाव विभोर होकर अपने कृष्ण में ही खोयी हुई थी।

उसकी कुरूपता नष्ट हो गयी यह जानकर कई लोग कुतुहल वश उसे देखने के लिए आये। फिर तो आनंदीबाई अपने घर में बनाये गये मंदिर में विराजमान श्रीकृष्ण में ही खोयी रहतीं। यदि कोई कुछ भी पूछता तो एक ही जवाब मिलता “मेरे कन्हैया की लीला कन्हैया ही जाने”।

आनंदीबाई ने अपने पति को धन्यवाद देने में भी कोई कसर बाकी न रखी। यदि उसकी कुरूपता के कारण उसके पति ने उसे छोड़ न दिया होता तो श्रीकृष्ण में उसकी इतनी भक्ति कैसे जागती ? श्रीकृष्णलीला में कुब्जा के पात्र के चयन के लिए उसका नाम भी तो उसके पति ने ही दिया था, इसका भी वह बड़ा आभार मानती थी।
प्रतिकूल परिस्थितियों एवं संयोगों में शिकायत करने की जगह प्रत्येक परिस्थिति को भगवान की ही देन मानकर धन्यवाद देने से प्रतिकूल परिस्थिति भी उन्नतिकारक हो जाती है।

Posted on

बाँवरी गोपी का मनोरथ

वृंदावन की गली में एक छोटा सा मगर साफ सुथरा, सजा संवरा घर है। एक गोपी माखन निकाल रही है और मन ही मन अभिलाषा करती है कि, आज कन्हैया अपनी टोली के साथ उसके घर माखन चोरी करने पधारे तो कितना ही अच्छा हो। आज “कन्हैया” आये और मैं अपनी आँखों से कान्हा की वो माखन लीला निहार सकूँ।

उसके सांवरे सलोने मुखड़े पर लिपटा सफ़ेद माखन कितना मनोहर दिखाई देगा ? काश आज कान्हा मेरे घर आ जाये। ऐसा करती हूँ, आज माखन में थोड़ा केसर मिला देती हूँ, थोड़ा बादाम, इलायची और किशमिश, मिश्री भी मिलाती हूँ। कान्हा को कितना भायेगा न। माखन की सुवास और स्वाद उसे कितना अच्छा लगेगा। लो, अब तो माखन भी तैयार हो गया। अब ऐसा करती हूँ कि मटकी में थोड़ा शीतल जल डाल कर माखन का पात्र उसमें रख देती हूँ। इससे माखन पिघलेगा नहीं।
गोपी सोचती है कि कान्हा को कैसे बुलाऊँ ? कौन सी तरकीब लगाऊँ कि वो आ जाये, क्या करूँ ? और गोपी का विरह बढता जाता है। चलो गली में देखती हूँ, शायद कोई बात बन जाए।

तभी मनसुखा दिखाई देता है। अरे! यह मनसुखा कहाँ भागा जा रहा है ? जरूर कान्हा संग खेलने जा रहा होगा। इसे बुलाती हूँ। मनसुख!! ओ मनसुखा!! तनिक यहाँ तो आ। मेरा एक काम कर दे। तुझे माखन दूँगी आज मैंने बहुत अच्छा माखन निकाला है। तनिक आ तो।

मनसुखा के दिमाग में तुरंत नयी क्रीड़ा आई, दौड़ते दौड़ते बोला मुझे देर हो रही है, और वहाँ कान्हा खेलने के लिए इंतजार कर रहा होगा।
अब यह गोपांगना क्या करे ? कैसे बुलाये कान्हा को ? लेकिन आज इस गोपी का बाँवरा मन कह रहा है कि वो छलिया जरूर आएगा। यहाँ से छुप के उसकी लीला देखूँगी। बस अब आ जाये। आ जा न कान्हा… देख अब और सता मत…। गोपी की आँखों से विरह के अश्रु निकलने लगते हैं।

बाँवरी गोपी सोचती है कि जरा देखूँ, बाहर कहीं आया तो नहीं? फिर मन में सोचने लगती है। अरे, वो क्यों आएगा… मैं गरीब जो हूँ… वो तो अच्छे अच्छे घरों में जाता होगा… मेरा माखन भला उसे कहाँ भायेगा ? क्या करूँ, यह तड़प तो बढ़ती ही जाती है … सुन ले न कान्हा मेरी पुकार…।

गोपी तो रुदन करते-करते कान्हा जी के बारे में सोचते-सोचते ही सो गयी। और हमारा लाला कन्हैया भी इसी अवसर की ताक में था। सारी बाल गोपाल मंडली चुपके चुपके आँगन से भोजन शाला की ओर बढने लगी और माखन की खोज शुरू हो गयी। कान्हा जी ने कहा, ‘अरे मनसुखा!! तू तो कह रहा था कि गोपी ने बड़ा अच्छा माखन निकाला है। यहाँ तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा।”

अरे! अरे!! वो देखो, एक सुन्दर सी मटकी पड़ी है उसमें देखो … अरे वाह!! मिल गया मिल गया!! आओ-आओ सभी आओ!! ढक्कन खोलो … अहा कितनी सुन्दर सुवास है। तनिक खा कर तो बताओ कैसा है। अरे! स्वाद का तो कोई जवाब ही नहीं … ऐसा माखन तो मैया ने भी कभी नहीं बनाया …

मित्रों अब कान्हा जी का मनोरथ भी देखिए। कहते हैं, “आज तो मन यह कर रहा है कि यह गोपी अपनी गोद में बिठा कर अपने हाथों से यह माखन खिलाये। जरा कोयल की आवाज तो निकालो या ताली लगाओ ताकि गोपी जाग जाये।”

सखा बोले कि मार पडेगी हम सभी को, जो कोई आवाज भी निकली तो। कान्हा जी ने कहा, “कुछ नहीं होगा। मैं कहता हूँ वैसा करो।” बस फिर क्या? सभी ताली बजाने और कोयल की आवाज निकालने लगे।

बाँवरी गोपी तो पहले ही मंडली की आवाज से ही जागकर यह सब संवाद सुन सुन कर मन ही मन आनंदित हो रही है। और गोपी की आँखों में अब विरह के बदले हर्षाश्रु बह रहे हैं और अपनी सुध-बुध भूलती जा रही है।

कान्हा जी को ज्ञात था कि गोपी अंदर ही है। तो कान्हा जी अंदर गये तो देखा कि एक कक्ष में गोपी अपनी सुध-बुध खोए बैठी है और आँखों से अश्रु बह रहे हैं। कान्हा जी गोपी के पास जाकर कहते हैं, “अब यहाँ छुप के क्यों बैठी हो, आओ न माखन खिलाओ न। आज तो तेरे हाथों से ही माखन खाऊँगा। तेरा मनोरथ था कि आज मैं तेरे घर का माखन खाऊँ। तो मेरा भी यह मनोरथ है कि तेरे हाथों से माखन खाऊँ मैं तेरा मनोरथ पूर्ण करता हूँ तो तू भी मेरा मनोरथ पूर्ण कर।”

बाँवरी गोपी का तो मानों जन्म सफल हो गया। जन्मों की कामना फलीभूत हो गयी। अब गोपी कान्हा को गोद में लेकर माखन खिलाने लगी। आँखों से आँसुओं की धारा निरन्तर बहे जा रही है और कान्हा जी अपने नन्हें नन्हें हाथों से गोपी के आँसू पोंछ रहे है और खुद भी आँसू बहाते हुए कह रहे हैं – “अरी, तू रो क्यों रही है, देख मैं आ गया हूँ न, देख मैं हूँ न, देख मैं हूँ न।” गोपी रोते हुए माखन खिला रही है और कान्हा जी भी रोते हुए माखन खा रहे हैं। कितना अद्भुत और अलौकिक दृश्य है। ऐसे गोपी के भाग्य के क्या कहने।

Posted on

सती अनुसूईया

सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थीं। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थीं। एक दिन देव ऋषि नारद जी बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहा की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। नारद जी की बातें सुनकर तीनो देवियाँ सोचने लगीं कि आखिर अनुसुइया के पतिव्रत धर्म में ऐसी क्या बात है जो उसकी चर्चा स्वर्गलोक तक हो रही है ? तीनों देवीयों को अनुसुइया से ईर्ष्या होने लगी।
नारद जी के वहाँ से चले जाने के बाद सावित्री, लक्ष्मी तथा पार्वती एक जगह इक्ट्ठी हुई तथा अनुसूईया के पतिव्रत धर्म को खंडित कराने के बारे में सोचने लगी। उन्होंने निश्चय किया कि हम अपने पतियों को वहाँ भेज कर अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराने की जिद्द की। तीनों देवों ने बहुत समझाया कि यह पाप हमसे मत करवाओ। परन्तु तीनों देवियों ने उनकी एक ना सुनी और अंत में तीनों देवो को इसके लिए राजी होना पड़ा।
तीनों देवों ने साधु वेश धारण किया तथा अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुँचे। उस समय अनुसूईया जी आश्रम पर अकेली थीं। साधुवेश में तीन अतिथियों को द्वार पर देख कर अनुसूईया ने भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। तीनों साधुओं ने कहा कि हम आपका भोजन अवश्य ग्रहण करेंगे। परन्तु एक शर्त पर कि आप हमें निवस्त्र होकर भोजन कराओगी। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें। अनुसूईया ने साधुओं के शाप के भय से तथा अतिथि सेवा से वंचित रहने के पाप के भय से परमात्मा से प्रार्थना की कि हे परमेश्वर ! इन तीनों को छः-छः महीनें के बच्चे की आयु के शिशु बनाओ। जिससे मेरा पतिव्रत धर्म भी खण्डित न हो तथा साधुओं को आहार भी प्राप्त हो व अतिथि सेवा न करने का पाप भी न लगे। परमेश्वर की कृपा से तीनों देवता छः-छः महीने के बच्चे बन गए तथा अनुसूईया ने तीनों को निःवस्त्र होकर दूध पिलाया तथा पालने में लेटा दिया।
जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियाँ व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहाँ आकर सारी बात बताई की तीनों देवों को तो अनुसुइया ने अपने सतीत्व से बालक बना दिया है। यह सुनकर तीनों देवियों ने अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुँचकर माता अनुसुइया से माफ़ी माँगी और कहा कि हमसे ईर्ष्यावश यह गलती हुई है। इनके लाख मना करने पर भी हमने इन्हें यह घृणित कार्य करने भेजा। कृप्या आप इन्हें पुनः उसी अवस्था में कीजिए। आपकी हम आभारी होंगी। इतना सुनकर अत्री ऋषि की पत्नी अनुसूईया ने तीनों बालक को वापस उनके वास्तविक रूप में ला दिया। अत्री ऋषि व अनुसूईया से तीनों भगवानों ने वर मांगने को कहा। तब अनुसूईया ने कहा कि आप तीनों हमारे घर बालक बन कर पुत्र रूप में आएँ। हम निःसंतान हैं। तीनों भगवानों ने तथास्तु कहा तथा अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए। कालान्तर में दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का, तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म अनुसूईया के गर्भ से हुआ।


Posted on

विरह की अग्नि

रणवाड़ी के बाबा कृष्णदास जी बंगवासी थे, संपन्न ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे, जब घर में अपने विवाह की बात सुनी तो ग्रहत्याग कर पैदल भागकर श्रीधाम वृंदावन आ गए। जिस समय वृंदावन आये थे उस समय वृंदावन भीषण जंगल था, वहीं अपनी फूस की कुटी बनाकर रहने लगे, केवल एक बार ग्राम से मधुकरी माँग लाते थे। बाबा बाल्यकाल में ही व्रज आ गए थे इसलिए किसी तीर्थ आदि का दर्शन नहीं किया था, प्रायः ५० वर्ष का जीवन बीत गया था।

एक बार मन में विचार आया कि चारधाम यात्रा कर आऊँ, किन्तु प्रिया जी ने स्वपन में आदेश दिया इस धाम को छोड़कर अन्यत्र कही मत जाना, यही रहकर भजन करो, यही तुम्हे सर्वसिद्धि लाभ होगा। किन्तु बाबा ने श्री जी के स्वप्नदेश को अपने मन और बुद्धि की कल्पना मात्र ही समझकर उसकी कोई परवाह न की और तीर्थ भ्रमण को चल पड़े।

भ्रमण करते करते द्वारिका जी में पहुँच गए तो वहाँ तप्तमुद्रा की शरीर पर छाप धारण कर ली। चारो संप्रदायो के वैष्णवगण द्वारिका जाकर तप्तमुद्रा धारण करते है, परन्तु ये श्री वृंदावननीय रागानुगीय वैष्णवों की परंपरा के सम्मत नहीं है। बाबा जी ने व्रज के सदाचार की उपेक्षा की तत्क्षण ही उनका मन खिन्न हो उठा और तीर्थ में अरुचि हो उठी और वे तुरंत वृंदावन लौट आये।

जिस दिन लौटकर आये उसी रात्रि में श्री प्रिया जी ने पुन: स्वप्न दिया और बोली- तुमने द्वारिका की तप्तमुद्रा ग्रहण की है अतः तुम अब सत्यभामा के परिकर में हो गए हो, अब तुम व्रजवास के योग्य नहीं हो, द्वारिका चले जाओ। इस बार बाबा को स्वप्न कल्पित नहीं लगा इन्होने बहुत से बाबा से जिज्ञासा की, सबने श्रीप्रिया जी के ही आदेश का अनुमोदन किया। गोवर्धन में भी एक बाबा कृष्णदास जी नाम के ही थे, वे इन बाबा के घनिष्ठ मित्र थे। (श्रीजी की चरण सेवा” की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें) एक बार आप उनके पास गोवर्धन गए तो उन्होंने गाढ़ आलिंगन किया और पूछा इतने दिनों तक कहाँ थे ? तो बाबा ने कहा- कि द्वारिका गया था और अपनी तप्त मुद्रायें भी दिखायीं। यह देखते ही बाबा अचानक ठिठक गए और लंबी श्वास लेते हुए बोले- ओहो ! आज से आपके स्पर्श की मेरी योग्यता भी विनष्ट हो गई, कहाँ तो आप “महाराजेश्वरी की सेविका (सत्यभामा)” और कहाँ मैं “एक ग्वारिनी की दासी (राधारानी)”। इतना सुनते ही बाबा एक दम स्तंभित हो गए और प्रणाम करने वापस लौट आये, और इनको सब वैष्णवों ने कहा – इसका कुछ प्रतिकार नहीं परन्तु श्री प्रिया जी के साक्षात् आदेश के ऊपर भी क्या कोई उपदेश मन बुद्धि के गोचर हो सकता है ? हताश हो कुटिया में प्रवेश कर इन्होने अन्नजल त्याग दिया। अपने किये के अनुताप से और श्रीप्रिया जी के विरह से ह्रदय जलने लगा। कहते है इसी प्रकार ३ महीने तक रहे, अंतत: अन्दर की विरहानल बाहर शरीर पर प्रकट होने लगी। तीन दिन तक चरण से मस्तक पर्यंत क्रमशः अग्नि से जलकर इनकी काया भस्म हो गई, अचानक रात में सिद्ध बाबा जगन्नाथ दास जी जो वहीं पास में ही रहते थे, उन्होंने अपने शिष्य श्री बिहारीदास से कहा- देखो ! तो इस बाबा की कुटिया में क्या हो रहा है ? उसने अनुसन्धान लगाया तो कहा- रणवाडी के बाबा की देह जल रही है, भीतर जाने का रास्ता नहीं था अंदर से सांकल बंद थी।

सिद्ध बाबा समझ गए और बोले- ओं विरहानल ! इतना कहकर बाबा की कुटिया के किवाड़ तोड़कर अंदर गए, और व्रजवासी लोग भी गए। सबने देखा कंठपर्यंत तक अग्नि आ चुकी थी, बाबा ने रुई मंगवाई और तीन बत्तियाँ बनायीं और ज्यों ही उन्होंने उनके माथे पर रखी कि एकदम अग्नि ने आगे बढ़कर सारे शरीर को भस्मसात कर दिया।

जगन्नाथ बाबा वहाँ के लोगो से बोले- तुम्हारे गाँव में कभी दुःख न आएगा, भले ही चहुँ ओर माहमारी फैले, और आज भी बाबा कि वाणी का प्रत्यक्ष प्रमाण देखा जाता है। इस घटना को १०० वर्ष हो गए, आज भी सिद्ध बाबा की समाधि बनी हुई है और व्रजवासी जाकर प्रार्थना करके जो भी मांगते है मनोकामना पूरी होती है। धन्य है ऐसे राधारानी जी के दास और उनकी व्रजनिष्ठा जो शरीर तो छोड़ सकते है पर श्री धाम वृन्दावन नहीं।

“जय जय श्री राधे”

Posted on

मोती कुंड

।।राधे राधे।।
.
मोती कुंड नंदगांव-ब्रज का कण-कण कान्‍हां की लीलाओं से भरा है आपको बताने जा रहा है ऐसे खास पेड़ों के बारे में जिनसे फल नहीं, बल्कि मोती झड़ते हैं। आज भी ब्रज आने वाले भक्‍त इन मोतियों को बटोरकर घर ले जाते हैं। माना जाता है कि इनसे घर में सुख समृद्धि और शांति का वास होता है।
.
मथुरा में बरसाना और नंदगांव के बीच में मोती कुंड मौजूद है। यह कुंड तीन तरफ से पीलू के पेड़ों से घिरा हुआ है। इस पेड़ में मोती जैसे फूल होते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि इन पेड़ों को कान्‍हा ने नंदबाबा के दिए कीमती मोतियों को बोकर उगाया था।
.
बरसाना के विरक्‍त संत रमेश बाबा बताते हैं कि गर्ग संहिता, गौतमी तंत्र समेत कई ग्रंथों में इस महान कुंड और राधा-कृष्‍ण की सगाई का वर्णन है। गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला के बाद दोनों की सगाई हुई थी। सगाई के दौरान राधा के पिता वृषभानु ने नंदबाबा को उपहार में मोती दिए। तब नंद बाबा चिंता में पड़ गए कि इतने कीमती मोती कैसे रखें।
.
श्रीकृष्‍ण चिंता समझ गए। उन्‍होंने मां यशोदा से लड़कर मोती ले लिए। घर से बाहर निकलकर कुंड के पास जमीन में मोती बो दिए। जब यशोदा ने कृष्‍ण ने पूछा कि मोती कहां है। तब उन्‍होंने इसके बारे में बताया।
.
नंद बाबा भगवान कृष्‍ण के कार्य से नाराज हुए और मोती जमीन से निकालकर लाने को लोगों को भेजा। जब लोग यहां पहुंचे तो देखा कि यहां पेड़ उग आए हैं और पेड़ों पर मोती लटके हुए हैं। तब बैलगाड़ी भरकर मोती घर भेजे गए। तभी से कुंड का नाम मोती कुंड पड़ गया। माना जाता है कि श्रीकृष्‍ण और राधा के बीच सांसारिक रिश्‍ते नहीं थे, लेकिन नंदगाव का यह मोती कुंड आज भी दोनों की सगाई की गवाही देता है। आज भी ब्रज 84 कोस यात्रा के दौरान यहां लोग यहां पर मोती जैसे फल बटोरने आते हैं। यह डोगर (पीलू) का पेड़ है।पूरे ब्रज में कुछ ही जगह ये पेड़ हैं, लेकिन मोती जैसे फल सिर्फ मोती कुंड के पास मौजूद पेड़ में ही मिलते हैं।।
.
मथुरा में बरसाना और नंदगांव के बीच में मोती कुंड मौजूद है। यह कुंड तीन तरफ से पीलू (डोगर) के पेड़ों से घिरा हुआ है। इस पेड़ में मोती जैसे फूल होते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि इन पेड़ों को कान्‍हा ने नंदबाबा के दिए कीमती मोतियों को बोकर उगाया था।
.


जय जय श्री राधे

Posted on

दोहनी कुण्ड

दोहनी कुण्ड (Dohini Kund)

एक बार गोदोहन के समय किशोरी श्रीराधाजी खड़ी-खड़ी गोदोहन होते देख रही थीं। देखते-देखते उनकी स्वयं भी गोदोहन करने की इच्छा हुई।

वे भी एक मटकी लेकर एक गइया का दूध दुहने लगीं।

उसी समय कौतुकी कृष्ण भी वहाँ आ पहुँचे और बोले-‘सखी ! तोपे दूध काढ़वो भी नहीं आवे है, ला मैं बताऊँ।’

यह कहकर पास ही बैठ गये। श्रीराधाजी ने उनसे कहा-‘अरे मोहन मोए सिखा।’

यह कहकर सामने बैठ गयी।

कृष्ण ने कहा-‘अच्छौ दो थन आप दुहो और दो मैं दुहों, आप मेरी ओर निगाह राखो।’

कृष्ण ठिठोली करते हुए दूध की धारा निकालने लगे।

उन्होंने हठात् एक धारा राधाजी के मुखमण्डल में ऐसी मारी कि राधाजी का मुखमण्डल दूध से आच्छादित हो गया।

इस प्रकार लीला करते हुए दोनों आनन्दित होकर हँसने लगे।

यह लीला जिस स्थान पर हुई थी, वह आज भी ‘दोहनी-कुण्ड’ नाम से प्रसिद्ध है। दोहनी कुण्ड बरसाना, मथुरा से लगभग 50 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह स्थान बरसाना के पास ही है। गहवर वन की पश्चिम दिशा के समीप ही चिकसौली ग्राम के दक्षिण में यह स्थित है। यहाँ प्राकट्य लीला के समय गोदोहन सम्पन्न होता था। यह स्थान महाराज वृषभानु की लाखों गायों के रहने का खिड़क था।

प्रस्तुत दोहे इस लीला को जीवंत करते है

आमें सामें बैठ दोऊ दोहत करत ठठोर।
दूध धार मुख पर पड़त दृग भये चन्द्र चकोर॥

वारसाना की परिक्रमा करते हुए, अगर गहवरवन जाने के लिए आप बाएं मुड़ते हैं, तो आपको दोहनी कुंड मिलता है।
बहुत से भक्त इस स्थान पर नहीं आते हैं और वास्तव में मैंने देखा कि बहुत से लोग इस कुंड के अस्तित्व के बारे में नहीं जानते थे।
यह तालाब गहवरवन के दक्षिण और सिसौली गाँव के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।

श्री बरसाने के परिक्रमा के दौरान कुछ और लीला स्थली आते है जिनमे –

डभरारो (Dabhararo)

कहते है यहाँ श्री राधिका के दर्शन से कृष्ण की दोनों आँखों में आँसू भर आये। डभरारो शब्द का अर्थ आँसुओं का डब–डबाना है। अब इस गाँव का नाम डभरारो है। यह स्थान बरसाना से दो मील दक्षिण में हैं।

रसोली (Rasoli)

डभरारो से डेढ़ मील दूर नैऋत कोण में रसोली स्थान है यहाँ राधा-कृष्ण का गोपियों के साथ सर्वप्रथम रासलीला सम्पन्न हुआ था। इस स्थान को तुंग विद्या सखी की जन्मस्थली भी कहते है। तुंग विद्या के पिता का नाम पुष्कर गोप, माता का नाम मेधा गोपी तथा पति का नाम वालिश है। तुंग विद्या जी अष्टसखियों में से एक हैं। वे नृत्य–गीत–वाद्य, ज्योतिष, पद्य-रचना, पाक क्रिया, पशु–पक्षियों की भाषाविद राधा-कृष्ण का परस्पर मिलन कराने आदि विविध कलाओं में पूर्ण रूप से निपुण हैं।

———-:::×:::———-
“जय जय श्री राधे”

Posted on

“सखी सम्प्रदाय” क्या होता है ?

अक्सर हम वृंदावन में स्त्रियों की तरह सोलह-श्रृंगार किये हुये पुरुषों को देखते हैं, जो कि बहुत मस्त भाव से श्रीकृष्ण को रिझाते हुये उनके आगे नृत्य करते हैं। जो लोग उनके इस भाव को नहीं जानते हैं उनके मन में उन्हें देख कई तरह के विचार आते हैं। ये कौन हैं, क्या रूप बना रखा है, स्त्रीवेश में क्यों घुमते हैं, इत्यादि।

ये लोग सखी सम्प्रदाय के होते हैं, जिसे सखीभाव सम्प्रदाय भी कहा जाता है। सखी सम्प्रदाय, निम्बार्क मत की एक शाखा है जिसकी स्थापना स्वामी हरिदास (जन्म सं० १४४१ वि०) ने की थी। इसे हरिदासी सम्प्रदाय भी कहते हैं। इसमें भक्त अपने आपको श्रीकृष्ण की सखी मानकर उसकी उपासना तथा सेवा करते हैं और प्रायः स्त्रियों के भेष में रहकर उन्हीं के आचारों, व्यवहारों आदि का पालन करते हैं। सखी सम्प्रदाय के ये साधु अधिकतर ब्रजभूमि में ही निवास करते हैं।

स्वामी हरिदास जी के द्वारा निकुंजोपासना के रूप में श्यामा-कुंजबिहारी की उपासना-सेवा की पद्धति विकसित हुई, यह बड़ी विलक्षण है। निकुंजोपासना में जो सखी-भाव है, वह गोपी-भाव नहीं है। निकुंज-उपासक प्रभु से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि उसके समस्त कार्य अपने आराध्य को सुख प्रदान करने हेतु होते हैं। श्री निकुंजविहारी की प्रसन्नता और संतुष्टि उसके लिए सर्वोपरि होती है।

यह सम्प्रदाय “जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझे सो ही भेष धरूंगी” के आधार पर अपना समस्त जीवन “राधा-कृष्ण सरकार” को न्यौछावर कर देती है। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को “सोलह सिंगार” नख से लेकर चोटी तक अलंकृत करते हैं। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को सखी के रूप में मानते हैं, यहाँ तक कि रजस्वला के प्रतीक के रूप में स्वयं को तीन दिवस तक अशुद्ध मानते हैं।

ऐसे ही कोई भी व्यक्ति सखी नहीं बन जाता, इसके लिए भी एक विशेष प्रक्रिया है जो की आसान नहीं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति पहले साधु ही बनता है, और साधु बनने के लिए गुरु ही माला-झोरी देकर तथा तिलक लगाकर मन्त्र देता है। तथा इस साधु जीवन में जिसके भी मन में सखी भाव उपजा उसे ही गुरु साड़ी और श्रृंगार देकर सखी की दीक्षा देते हैं। निर्मोही अखाड़े से जुड़े सखी सम्प्रदाय के साधु अथवा सखियाँ कान्हा जी के सामने नाच कर तथा गाकर मोहिनी सूरत बना उन्हें रिझाते हैं।

सामान्यतया सभी सम्प्रदायों की पहचान पहले उनके तिलक से होती है, उसके बाद उनके वस्त्रों से। गुरु रामानंदी सम्प्रदाय के साधु अपने माथे पर लाल तिलक लगाते हैं और कृष्णानन्दी सम्प्रदाय के साधु सफेद तिलक, जो की राधा नाम की बिंदिया होती है, लगाते हैं और साथ ही तुलसी की माला भी धारण करते हैं।

सखी सम्प्रदाय से जुडी एक और बात बहुत दिलचस्प है की इस सम्प्रदाय में कोई स्त्री नहीं, केवल पुरुष साधु ही स्त्री का रूप धारण करके कान्हा को रिझाती हैं। सखी सम्प्रदाय की भक्ति कोई मनोरंजन नहीं बल्कि इसमें प्रेम की गंभीरता झलकती है, और पुरुषों का यह निर्मल प्रेम इस सम्प्रदाय को दर्शनीय बनाता है।
“जय जय श्री राधे”

Posted on

संसारी-प्रेम और दिव्य प्रेम में क्या अन्तर है ?

प्र०-महाराजजी, प्रेम का स्वरूप क्या है, संसारी-प्रेम और दिव्य प्रेम में क्या अन्तर है ?

समाधान : विशुद्ध दिव्य-प्रेम का स्वरूप उज्जवलता, निर्मलता,
सरसता, स्निग्धता एवं मृदुता की सीमाओं के मिलने से बनता है । यह नित्य नूतन, एक रस एवं नित्य नई रुचि उत्पन्न करने वाला होता है। वास्तव में अद्भुत और सरस प्रेम वह है जिसके उदय होने के साथ मन को सम्पूर्ण एकाग्रता प्राप्त हो जाती है। जिसके दुःख (वियोगजन्य दुःख) की समानता संसार का कोई सुख नहीं कर सकता फिर उसके सुख की गति का वर्णन कौन कर सकता है ?

ब्रह्मादिक के भोग सुख विष सम लागत ताहि ।
नारायन ब्रज-चन्द्र की लगन लगी है जाहि ॥
नारायन हरि लगन में यह पाँचों न सुहात ।
बिषय भोग निद्रा हँसी जगत प्रीति बहु बात ॥
नहीं खान-पान तेहि भावै है, नहीं कोमल वसन सुहावै है ।

सब विषय लगै तेहि खारा है, हरि आशिक का मग न्यारा है ॥ रसिक संतों ने प्रेम के विशुद्ध रूप को प्रकाशित करने वाली उसकी मुख्य वृत्ति को बताया है, वह है- तत्सुख-सुखित्व भाव । प्रियतम के सुख में सुखानुभव करना शुद्ध प्रेम का सहज स्वभाव है। प्रेम में जहाँ तक अपने सुख की कामना है, वहाँ तक वह काम वासना से अधिक ऊँचा नहीं उठता । अपने सुख की मृग मरीचिका नष्ट हो जाने पर ही दिव्य-प्रेम की प्राप्ति होती है ।

श्रीहित चतुरासी जी की पहली दो पंक्तियों से श्रीप्रियाजू इस तत्सुख प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शा रहीं हैं –

जोई जोई प्यारी करै, सोई मोहि भावै,
भावै मोहि जोई, सोई सोई करें प्यारे । (हितचतुरासी १)

अपने सुख के लिए प्रेम करता है अतः वह स्वार्थी होता है, कामी इसके विपरीत जो संसारी-प्रेमी होता है वह प्रेमास्पद होता है, भोगी होता है, उसे प्रेम थोड़े ही कहते हैं। प्रेम तो विशुद्ध होता है, सुख देने की भावना प्रेम में होती है सुख लेने की नहीं; और ये प्रेम सिर्फ सच्चिदानन्द प्रभु से होता है ।

नाशवान देह को लेकर के, नाशवान रूपों को लेकर के जो प्रेम होता है उसमें मोह होता है, आसक्ति होती है, राग होता है, काम होता है ।

अभी सच पूछो तो हम अपने शरीर और परिवारवालों से प्रेम करते हैं प्रभु से नहीं; जिस दिन प्रभु से वास्तविक हृदय से प्रेम हो जायेगा, फिर भजन-साधन करना थोड़े ही पड़ता है बल्कि स्वाभाविक होने लगता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्रभ से वरदान माँगा –

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम ।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥ (श्रीरामचरितमानस ७ / १३०)

हे मेरे राम ! आप हमें ऐसे प्यारे लगो जैसे कामी पुरुष कामिनी से प्यार करता है, वह कभी कामिनी के ध्यान का प्रयत्न थोड़े ही करता है लेकिन बिना ध्यान किये उसके हृदय में हर समय कामिनी वसी रहती है; इसी तरह लोभी पुरुष धन के चिंतन का प्रयत्न थोड़े ही करता है, स्वाभाविक उसे धन का चिंतन होता है, ऐसे ही हे मेरे राम ! हे मेरे प्रियतम ! हे मेरे प्रभो ! मैं आपकी यादमें मतवाला रहूँ, आपके सिवाय कुछ भी मुझे अच्छा न लगे ।

Posted on

Govardhana Lila

Govardhana Lila of Lord Krishna has an important message. The same message is also stated in the biography of Lord Chaitanya.

It is stated in the Chaitanya Charitamrita (a biographical account of the Life and Teachings of Lord Chaitanya written by Krishnadasa Kaviraja Gosvami) that a devotee who is engaged in the service of Krishna is free from all obligations. He has no other duty to perform. He need not perform any ritualistic functions enjoined in the Vedas; nor is he required to worship any demigods. Krishna wanted to firmly establish this principle during His presence in Vrindavana.

When Krishna saw the residents of Vrindavana arranging for Indra-yajna (a traditional ceremony to please Indra, the chief-of-demigods, who is responsible for supplying water) He suggested that they forgo the worship of Indra and instead worship Govardhana Hill.

When Indra understood that the sacrifice which was to be offered by the cowherd men in Vrindavana had been stopped by Krishna, he became angry. He ordered Samvartaka (the cloud of devastation) to go over Vrindavana and inundate the whole area with an extensive flood. Riding on his elephant Airavata, he personally came to punish the inhabitants of Vrindavana.

Ordered by King Indra, all the dangerous clouds appeared above Vrindavana and began to pour water incessantly, with all their strength and power. There was constant lightning and thunder, blowing of severe wind, and incessant falling of rain. The rain seemed to fall like piercing sharp arrows.

All the inhabitants of Vrindavana prayed to the Supreme Lord Krishna and took shelter at His lotus feet. Lord Krishna immediately picked up Govardhana Hill with one hand, and asked everyone to come under the umbrella of Govardhana Hill along with their properties and animals. For one week, they remained there without being affected by hunger, thirst or any other discomforts. Indra was astonished to see the little boy Krishna holding the Govardhana Hill on His little finger and protecting Vrindavana from the devastating rainfall. He immediately called for all the clouds and asked them to desist. The sky became completely cleared of all clouds and there was sunrise again, the strong wind stopped. All the inhabitants of Vrindavana came out and Krishna replaced the Govardhana Hill in its place.

Indra, the King of heaven, became conscious of his offense before Krishna; therefore he stealthily appeared before Him and immediately fell down at the lotus feet of Krishna and offered his prayers.

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 35

इतनी कथा सुनकर सभी ऋषि सूतजी से बोले – हे सूतजी! अब आप हमें तुलसी विवाह की विधि बताइए। सूतजी बोले – कार्तिक शुक्ला नवमी को द्वापर युग का आरम्भ हुआ है। अत: यह तिथि दान और उपवास में क्रमश: पूर्वाह्नव्यापिनी तथा पराह्नव्यापिनी हो तो ग्राह्य है। इस तिथि को, नवमी से एकादशी तक, मनुष्य शास्त्रोक्त विधि से तुलसी के विवाह का उत्सव करे तो उसे कन्यादान का फल प्राप्त होता है। पूर्वकाल में कनक की पुत्री किशोरी ने एकादशी तिथि में सन्ध्या के समय तुलसी की वैवाहिक विधि सम्पन्न की। इससे वह किशोरी वैधव्य दोष से मुक्त हो गई।
अब मैं उसकी विधि बतलाता हूँ – एक तोला सुवर्ण की भगवान विष्णु की सुन्दर प्रतिमा तैयार कराए अथवा अपनी शक्ति के अनुसार आधे या चौथाई तोले की ही प्रतिमा बनवा ले, फिर तुलसी और भगवान विष्णु की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा कर के षोडशोपचार से पूजा करें। पहले देश-काल का स्मरण कर के गणेश पूजन करें फिर पुण्याहवाचन कराकर नान्दी श्राद्ध करें। तत्पश्चात वेद-मन्त्रों के उच्चारण और बाजे आदि की ध्वनि के साथ भगवान विष्णु की प्रतिमा को तुलसी जी के निकट लाकर रखें। प्रतिमा को वस्त्रों से आच्छादित करना चाहिए। उस समय भगवान का आवाहन करें :-
भगवान केशव! आइए, देव! मैं आपकी पूजा करुंगा। आपकी सेवा में तुलसी को समर्पित करुंगा। आप मेरे सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करें।
इस प्रकार आवाहन के पश्चात तीन-तीन बार अर्ध्य, पाद्य और विष्टर का उच्चारण कर के इन्हें बारी-बारी से भगवान को समर्पित करें, फिर आचमनीय पद का तीन बार उच्चारण कर के भगवान को आचमन कराएँ। इसके बाद कांस्य के बर्तन में दही, घी और मधु(शहद) रखकर उसे कांस्य के पात्र से ही ढक दें तथा भगवान को अर्पण करते हुए इस प्रकार कहें – वासुदेव! आपको नमस्कार है, यह मधुपर्क(दही, घी तथा शहद के मिश्रण को मधुपर्क कहते हैं) ग्रहण कीजिए।
तदनन्तर हरिद्रालेपन और अभ्यंग-कार्य सम्पन्न कर के गौधूलि की वेला में तुलसी और विष्णु का पूजन पृथक-पृथक करना चाहिए। दोनों को एक-दूसरे के सम्मुख रखकर मंगल पाठ करें। जब भगवान सूर्य कुछ-कुछ दिखाई देते हों तब कन्यादान का संकल्प करें। अपने गोत्र और प्रवर का उच्चारण कर के आदि की तीन पीढ़ियों का भी आवर्तन करें। तत्पश्चात भगवान से इस प्रकार कहें :- “आदि, मध्य और अन्त से रहित त्रिभुवन-प्रतिपालक परमेश्वर! इस तुलसी दल को आप विवाह की विधि से ग्रहण करें। यह पार्वती के बीज से प्रकट हुई है, वृन्दा की भस्म में स्थित रही है तथा आदि, मध्य और अन्त से शून्य है, आपको तुलसी बहुत ही प्रिय है, अत: इसे मैं आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। मैंने जल के घड़ो से सींचकर और अन्य प्रकार की सेवाएँ कर के अपनी पुत्री की भाँति इसे पाला, पोसा और बढ़ाया है, आपकी प्रिया तुलसी मैं आपको दे रहा हूँ। प्रभो! आप इसे ग्रहण करें।”
इस प्रकार तुलसी का दान कर के फिर उन दोनों अर्थात तुलसी और भगवान विष्णु की पूजा करें, विवाह का उत्सव मनाएँ। सुबह होने पर पुन: तुलसी और विष्णु जी का पूजन करें। अग्नि की स्थापना कर के उसमें द्वादशाक्षर मन्त्र से खीर, घी, मधु और तिलमिश्रित हवनीय द्रव्य की एक सौ आठ आहुति दें फिर ‘स्विष्टकृत’ होमक कर के पूर्णाहुति दें। आचार्य की पूजा करके होम की शेष विधि पूरी करें। उसके बाद भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करें – हे प्रभो! आपकी प्रसन्नता के लिए मैंने यह व्रत किया है। जनार्दन इसमें जो न्यूनता हो वह आपके प्रसाद से पूर्णता को प्राप्त हो जाये।
यदि द्वादशी में रेवती का चौथा चरण बीत रहा हो तो उस समय पारण न करें। जो उस समय भी पारण करता है वह अपने व्रत को निष्फल कर देता है। भोजन के पश्चात तुलसी के स्वत: गलकर गिरे हुए पत्तों को खाकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। भोजन के अन्त में ऊख, आंवला और बेर का फल खा लेने से उच्छिष्ट-दोष मिट जाता है।
तदनन्तर भगवान का विसर्जन करते हुए कहे – ‘भगवन! आप तुलसी के साथ वैकुण्ठधाम में पधारें। प्रभो! मेरे द्वारा की हुई पूजा ग्रहण करके आप सदैव सन्तुष्टि करें।’ इस प्रकार देवेश्वर विष्णु का विसर्जन कर के मूर्त्ति आदि सब सामग्री आचार्य को अर्पण करें। इससे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है।
यह विधि सुनाकर सूतजी ने ऋषियों से कहा – हे ऋषियों! इस प्रकार जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक सत्य, शान्ति और सन्तोष को धारण करता है, भगवान विष्णु को तुलसीदल समर्पित करता है, उसके सभी पापों का नाश हो जाता है और वह संसार के सुखों को भोगकर अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

हे ऋषिवरों! यह कार्तिक माहात्म्य सब रोगों और सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला है। जो मनुष्य इस माहात्म्य को भक्तिपूर्वक पढ़ता है और जो सुनकर धारण करता है वह सब पापों से मुक्त हो भगवान विष्णु के लोक में जाता है। जिसकी बुद्धि खोटी हो तथा जो श्रद्धा से हीन हो ऎसे किसी भी मनुष्य को यह माहात्म्य नहीं सुनाना चाहिए।

(समाप्त)
“इति श्री कार्तिक मास माहात्म्य”

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 34

ऋषियों ने पूछा – हे सूतजी! पीपल के वृक्ष की शनिवार के अलावा सप्ताह के शेष दिनों में पूजा क्यों नहीं की जाती?
सूतजी बोले – हे ऋषियों! समुद्र-मंथन करने से देवताओं को जो रत्न प्राप्त हुए, उनमें से देवताओं ने लक्ष्मी और कौस्तुभमणि भगवान विष्णु को समर्पित कर दी थी। जब भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से विवाह करने के लिए तैयार हुए तो लक्ष्मी जी बोली – हे प्रभु! जब तक मेरी बड़ी बहन का विवाह नहीं हो जाता तब तक मैं छोटी बहन आपसे किस प्रकार विवाह कर सकती हूँ इसलिए आप पहले मेरी बड़ी बहन का विवाह करा दे, उसके बाद आप मुझसे विवाह कीजिए। यही नियम है जो प्राचीनकाल से चला आ रहा है।
सूतजी ने कहा – लक्ष्मी जी के मुख से ऎसे वचन सुनकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी की बड़ी बहन का विवाह उद्दालक ऋषि के साथ सम्पन्न करा दिया। लक्ष्मी जी की बड़ी बहन अलक्ष्मी जी बड़ी कुरुप थी, उसका मुख बड़ा, दाँत चमकते हुए, उसकी देह वृद्धा की भाँति, नेत्र बड़े-बड़े और बाल रुखे थे। भगवान विष्णु द्वारा आग्रह किये जाने पर ऋषि उद्दालक उससे विवाह कर के उसे वेद मन्त्रों की ध्वनि से गुंजाते हुए अपने आश्रम ले आये। वेद ध्वनि से गुंजित हवन के पवित्र धुंए से सुगन्धित उस ऋषि के सुन्दर आश्रम को देखकर अलक्ष्मी को बहुत दु:ख हुआ। वह महर्षि उद्दालक से बोली – चूंकि इस आश्रम में वेद ध्वनि गूँज रही है इसलिए यह स्थान मेरे रहने योग्य नहीं है इसलिए आप मुझे यहाँ से अन्यत्र ले चलिए।
उसकी बात सुनकर महर्षि उद्दालक बोले – तुम यहाँ क्यों नहीं रह सकती और तुम्हारे रहने योग्य अन्य कौन सा स्थान है वह भी मुझे बताओ। अलक्ष्मी बोली – जिस स्थान पर वेद की ध्वनि होती हो, अतिथियों का आदर-सत्कार किया जाता हो, यज्ञ आदि होते हों, ऎसे स्थान पर मैं नहीं रह सकती। जिस स्थान पर पति-पत्नी आपस में प्रेम से रहते हों पितरों के निमित्त यज्ञ होते हों, देवताओं की पूजा होती हो, उस स्थान पर भी मैं नहीं रह सकती। जिस स्थान पर वेदों की ध्वनि न हो, अतिथियों का आदर-सत्कार न होता हो, यज्ञ न होते हों, पति-पत्नी आपस में क्लेश करते हों, पूज्य वृद्धो, सत्पुरुषों तथा मित्रों का अनादर होता हो, जहाँ दुराचारी, चोर, परस्त्रीगामी मनुष्य निवास करते हों, जिस स्थान पर गायों की हत्या की जाती हो, मद्यपान, ब्रह्महत्या आदि पाप होते हों, ऎसे स्थानों पर मैं प्रसन्नतापूर्वक निवास करती हूँ।
सूतजी बोले – अलक्ष्मी के मुख से इस प्रकार के वचन सुनकर उद्दालक का मन खिन्न हो गया। वह इस बात को सुनकर मौन हो गये। थोड़ी देर बाद वे बोले कि ठीक है, मैं तुम्हारे लिए ऎसा स्थान ढूंढ दूंगा। जब तक मैं तुम्हारे लिए ऎसा स्थान न ढूंढ लूँ तब तक तुम इसी पीपल के नीचे चुपचाप बैठी रहना। महर्षि उद्दालक उसे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठाकर उसके रहने योग्य स्थान की खोज में निकल पड़े परन्तु जब बहुत समय तक प्रतीक्षा करने पर भी वे वापिस नहीं लौटे तो अलक्ष्मी विलाप करने लगी। जब वैकुण्ठ में बैठी लक्ष्मी जी ने अपनी बहन अलक्ष्मी का विलाप सुना तो वे व्याकुल हो गई। वे दुखी होकर भगवान विष्णु से बोली – हे प्रभु! मेरी बड़ी बहन पति द्वारा त्यागे जाने पर अत्यन्त दुखी है। यदि मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ तो आप उसे आश्वासन देने के लिए उसके पास चलिए। लक्ष्मी जी की प्रार्थना पर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सहित उस पीपल के वृक्ष के पास गये जहाँ अलक्ष्मी बैठकर विलाप कर रही थी।
उसको आश्वासन देते हुए भगवान विष्णु बोले – हे अलक्ष्मी! तुम इसी पीपल के वृक्ष की जड़ में सदैव के लिए निवास करो क्योंकि इसकी उत्पत्ति मेरे ही अंश से हुई है और इसमें सदैव मेरा ही निवास रहता है। प्रत्येक वर्ष गृहस्थ लोग तुम्हारी पूजा करेगें और उन्हीं के घर में तुम्हारी छोटी बहन का वास होगा। स्त्रियों को तुम्हारी पूजा विभिन्न उपहारों से करनी चाहिए। मनुष्यों को पुष्प, धूप, दीप, गन्ध आदि से तुम्हारी पूजा करनी चाहिए तभी तुम्हारी छोटी बहन लक्ष्मी उन पर प्रसन्न होगी।
सूतजी बोले – ऋषियों! मैंने आपको भगवान श्रीकृष्ण, सत्यभामा तथा पृथु-नारद का संवाद सुना दिया है जिसे सुनने से ही मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है और अन्त में वैकुण्ठ को प्राप्त करता है। यदि अब भी आप लोग कुछ पूछना चाहते हैं तो अवश्य पूछिये, मैं उसे अवश्य कहूँगा।
सूतजी के वचन सुनकर शौनक आदि ऋषि थोड़ी देर तक प्रसन्नचित्त वहीं बैठे रहे, तत्पश्चात वे लोग बद्रीनारायण जी के दर्शन हेतु चल दिये। जो मनुष्य इस कथा को सुनता या सुनाता है उसे इस संसार में समस्त सुख प्राप्त होते हैं।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 33

सूतजी ने कहा – इस प्रकार अपनी अत्यन्त प्रिय सत्यभामा को यह कथा सुनाकर भगवान श्रीकृष्ण सन्ध्योपासना करने के लिए माता के घर में गये। यह कार्तिक मास का व्रत भगवान विष्णु को अतिप्रिय है तथा भक्ति प्रदान करने वाला है। 1) रात्रि जागरण, 2) प्रात:काल का स्नान, 3) तुलसी वट सिंचन, 4) उद्यापन और 5) दीपदान – यह पाँच कर्म भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले हैं इसलिए इनका पालन अवश्य करना चाहिए।
ऋषि बोले – भगवान विष्णु को प्रिय, अधिक फल की प्राप्ति कराने वाले, शरीर के प्रत्येक अंग को प्रसन्न करने वाले कार्तिक माहत्म्य आपने हमें बताया। यह मोक्ष की कामना करने वालो अथवा भोग की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को यह व्रत अवश्य ही करना चाहिए। इसके अतिरिक्त हम आपसे एक बात पूछना चाहते हैं कि यदि कार्तिक मास का व्रत करने वाला मनुष्य किसी संकट में फंस जाये या वह किसी वन में हो या व्रती किसी रोग से ग्रस्त हो जाये तो उस मनुष्य को कार्तिक व्रत को किस प्रकार करना चाहिए? क्योंकि कार्तिक व्रत भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय है और इसे करने से मुक्ति एवं भक्ति प्राप्त होती है इसलिए इसे छोड़ना नहीं चाहिए।
श्रीसूतजी ने इसका उत्तर देते हुए कहा – यदि कार्तिक का व्रत करने वाला मनुष्य किसी संकट में फंस जाये तो वह हिम्मत करके भगवान शंकर या भगवान विष्णु के मन्दिर, जो भी पास हो उसमें जाकर रात्रि जागरण करे। यदि व्रती घने वन में फंस जाये तो फिर पीपल के वृक्ष के नीचे या तुलसी के वन में जाकर जागरण करे। भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर विष्णुजी का कीर्तन करे। ऎसा करने से सहस्त्रों गायों के दान के समान फल की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य विष्णुजी के कीर्तन में बाजा बजाता है उसे वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है और हरि कीर्तन में नृत्य करने वाले मनुष्यों को सभी तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त होता है। किसी संकट के समय या रोगी हो जाने और जल न मिल पाने की स्थिति में केवल भगवान विष्णु के नाममात्र से मार्जन ही कर लें।
यदि उद्यापन न कर सके तो व्रत की पूर्त्ति के लिए केवल ब्राह्मणों के प्रसन्न होने के कारण विष्णुजी प्रसन्न रहते हैं। यदि मनुष्य दीपदान करने में असमर्थ हो तो दूसरे की दीप की वायु आदि से भली-भांति रक्षा करे। यदि तुलसी का पौधा समीप न हो तो वैष्णव ब्राह्मण की ही पूजा कर ले क्योंकि भगवान विष्णु सदैव अपने भक्तों के समीप रहते हैं। इन सबके न होने पर कार्तिक का व्रत करने वाला मनुष्य ब्राह्मण, गौ, पीपल और वटव्रक्ष की श्रद्धापूर्वक सेवा करे।
शौनक आदि ऋषि बोले – आपने गौ तथा ब्राह्मणों के समान पीपल और वट वृक्षों को बताया है और सभी वृक्षों में पीपल तथा वट वृक्ष को ही श्रेष्ठ कहा है, इसका कारण बताइए।
सूतजी बोले – पीपल भगवान विष्णु का और वट भगवान शंकर का स्वरूप है। पलाश ब्रह्माजी के अंश से उत्पन्न हुआ है। जो कार्तिक मास में उसके पत्तल में भोजन करता है वह भगवान विष्णु के लोक में जाता है। जो इन वृक्षों की पूजा, सेवा एवं दर्शन करते हैं उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
ऋषियों ने पूछा – हे प्रभु! हम लोगों के मन में एक शंका है कि ब्रह्मा, विष्णु और शंकर वृक्ष स्वरुप क्यों हुए? कृपया आप हमारी इस शंका का निवारण कीजिए।
सूतजी बोले – प्राचीनकाल में भगवान शिव तथा माता पार्वती विहार कर रहे थे। उस समय उनके विहार में विघ्न उपस्थित करने के उद्देश्य से अग्निदेव ब्राह्मण का रुप धारण करके वहाँ पहुँचे। विहार के आनन्द के वशीभूत हो जाने के कारण कुपित होकर माता पार्वती ने सभी देवताओं को शाप दे दिया।
माता पार्वती ने कहा – हे देवताओं! विषयसुख से कीट-पतंगे तक अनभिज्ञ नहीं है। आप लोगों ने देवता होकर भी उसमें विघ्न उपस्थित किया है इसलिए आप सभी वृक्ष बन जाओ।
सूतजी बोले – इस प्रकार कुपित पार्वती जी के शाप के कारण समस्त देवता वृक्ष बन गये। यही कारण है कि भगवान विष्णु पीपल और शिवजी वट वृक्ष हो गये। इसलिए भगवान विष्णु का शनिदेव के साथ योग होने के कारण केवल शनिवार को ही पीपल को छूना चाहिए अन्य किसी भी दिन नहीं छूना चाहिए।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 32

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा – हे प्रिये! यमराज की आज्ञा शिरोधार्य करते हुए प्रेतपति धनेश्वर को नरकों के समीप ले गया और उसे दिखाते हुए कहने लगा – हे धनेश्वर! महान भय देने वाले इन नरकों की ओर दृष्टि डालो। इनमें पापी पुरुष सदैव दूतों द्वारा पकाए जाते हैं। यह देखो यह तप्तवाचुक नामक नरक है जिसमें देह जलने के कारण पापी विलाप कर रहे हैं। जो मनुष्य भोजन के समय भूखों को भोजन नहीं देता वह बार-बार इस नरक में डाले जाते हैं। वह प्राणी, जो गुरु, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वेद और राजा – इनको लात मारता है वह भयंकर नरक अतिशय पापों के करने पर मिलते हैं।
आगे देखो यह दूसरा नरक है जिसका नाम अन्धतामिस्र है। इन पापियों को सुई की भांति मुख वाले तमोत नामक कीड़े काट रहे हैं। इस नरक में दूसरों का दिल दुखाने वाले पापी गिराये जाते हैं।
यह तीसरा नरक है जिसका नाम क्रकेय है। इस नरक में पापियों को आरे से चीरा जाता है। यह नरक भी असिमत्रवण आदि भेदों से छ: प्रकार का होता है। इसमें स्त्री तथा पुत्रों के वियोग कराने वाले मनुष्यों को कड़ाही में पकाया जाता है। दो प्रियजनों को दूर करने वाले मनुष्य भी असिमत्र नामक नरक में तलवार की धार से काटे जाते हैं और कुछ भेड़ियों के डर से भाग जाते हैं।
अब अर्गल नामक यह चौथा नरक देखो। इसमें पापी विभिन्न प्रकार से चिल्लाते हुए इधर-उधर भाग रहे हैं। यह नरक भी वध आदि भेदों से छ: प्रकार का है। अब तुम यह पांचवाँ नरक देखो जिसका नाम कूटशाल्मलि है। इसमें अंगारों की तरह कष्ट देने वाले बड़े-बड़े कांटे लगे हैं। यह नरक भी यातना आदि भेदों से छ: प्रकार का है। इस नरक में परस्त्री गमन करने वाले मनुष्य डाले जाते हैं।
अब तुम यह छठा नरक देखो। उल्वण नामक नरक में सिर नीचे कर के पापियों को लटकाया जाता है। जो लोग भक्ष्याभक्ष्य का विचार नहीं करते दूसरों की निन्दा और चुगली करते हैं वे इस नरक में डाले जाते हैं। दुर्गन्ध भेद से यह नरक भी छ: प्रकार का है।
यह सातवाँ नरक है जिसका नाम कुम्भीपाक है। यह अत्यन्त भयंकर है और यह भी छ: प्रकार का है। इसमें महापातकी मनुष्यों को पकाया जाता है, इस नरक में सहस्त्रों वर्षों तक यातना भोगनी पड़ती है, यही रौरव नरक है। जो पाप इच्छारहित किये जाते हैं वह सूखे और जो पाप इच्छापूर्वक किये जाते हैं वह पाप आर्द्र कहलाते हैं। इस प्रकार शुष्क और आर्द्र भेदों से यह पाप दो प्रकार के होते हैं। इसके अलावा और भी अलग-अलग चौरासी प्रकार के पाप है। 1) अपक्रीण, 2) पाडाकतेय, 3) मलिनीकर्ण, 4) जातिभ्रंशकर्ण, 5) उपाय, 6) अतिपाप, 7) महापाप – यह सात प्रकार के पातक हैं। जो मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे इन सातों नरकों में उसके पाप कर्मों के अनुसार पकाया जाता है। चूंकि तुम्हें कार्तिक व्रत करने वाले प्रभु भक्तों का संसर्ग प्राप्त हुआ था उससे पुण्य की वृद्धि हो जाने के कारण ये सभी नरक तुम्हारे लिए निश्चय ही नष्ट हो गये हैं।
इस प्रकार धनेश्वर को नरकों का दर्शन कराकर प्रेतराज उसे यक्षलोक में ले गये। वहाँ जाकर उसे वहाँ का राजा बना दिया। वही कुबेर का अनुचर ‘धनक्षय’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में महर्षि विश्वामित्र ने उसके नाम पर तीर्थ बनाया था।
कार्तिक मास का व्रत महाफल देने वाला है, इसके समतुल्य अन्य कोई दूसरा पुण्य कर्म नहीं है। जो भी मनुष्य इस व्रत को करता है तथा व्रत करने वाले का दर्शन करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति है।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 31

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – पूर्वकाल में अवन्तिपुरी (उज्जैन)में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था।वह रस, चमड़ा और कम्बल आदि का व्यापार करता था। वह वैश्यागामी और मद्यपान आदि बुरे कर्मों में लिप्त रहता था। चूंकि वह रात-दिन पाप में रत रहता था इसलिए वह व्यापार करने नगर-नगर घूमता था। एक दिन वह क्रय-विक्रय के कार्य से घूमता हुआ महिष्मतीपुरी में जा पहुंचा जो राजा महिष ने बसाई थी। वहाँ पापनाशिनी नर्मदा सदैव शोभा पाती है। उस नदी के किनारे कार्तिक का व्रत करने वाले बहुत से मनुष्य अनेक गाँवों से स्नान करने के लिए आये हुए थे। धनेश्वर ने उन सबको देखा और अपना सामान बेचता हुआ वह भी एक मास तक वहीं रहा।
वह अपने माल को बेचता हुआ नर्मदा नदी के तट पर घूमता हुआ स्नान, जप और देवार्चन में लगे हुए ब्राह्मणों को देखता और वैष्णवों के मुख से भगवान विष्णु के नामों का कीर्तन सुनता था। वह वहाँ रहकर उनको स्पर्श करता रहा, उनसे बातचीत करता रहा। वह कार्तिक के व्रत की उद्यापन विधि तथा जागरण भी देखता रहा। उसने पूर्णिमा के व्रत को भी देखा कि व्रती ब्राह्मणों तथा गऊओं को भोजन करा रहे हैं, उनको दक्षिणा आदि भी दे रहे हैं। उसने नित्य प्रति भगवान शंकर की प्रसन्नता के लिए होती दीपमाला भी देखी।
त्रिपुर नामक राक्षस के तीनों पुरों को भगवान शिव ने इसी तिथि को जलाया था इसलिए शिवजी के भक्त इस तिथि को दीप-उत्सव मनाते हैं। जो मनुष्य मुझमें और शिवजी में भेद करता है, उसकी समस्त क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। इस प्रकार नर्मदा तट पर रहते हुए जब उसको एक माह व्यतीत हो गया तो एक दिन अचानक उसे किसी काले साँप ने डस लिया। इससे विह्वल होकर वह भूमि पर गिर पड़ा। उसकी यह दशा देखकर वहाँ के दयालु भक्तों ने उसे चारों ओर से घेर लिया और उसके मुँह पर तुलसीदल मिश्रित जल के छींटे देने लगे। जब उसके प्राण निकल गये तब यमदूतों ने आकर उसे बाँध लिया और कोड़े बरसाते हुए उसे यमपुरी ले गये।
उसे देखकर चित्रगुप्त ने यमराज से कहा – इसने बाल्यावस्था से लेकर आज तक केवल बुरे कार्य ही हैं इसके जीवन में तो पुण्य का लेशमात्र भी दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि मैं पूरे एक वर्ष तक भी आपको सुनाता रहूँ तो भी इसके पापों की सूची समाप्त नहीं होगी। यह महापापी है इसलिए इसको एक कल्प तक घोर नरक में डालना चाहिए। चित्रगुप्त की बात सुनकर यमराज ने कुपित होकर कालनेमि के समान अपना भयंकर रुप दिखाते हुए अपने अनुचरों को आज्ञा देते हुए कहा – हे प्रेत सेनापतियों! इस दुष्ट को मुगदरों से मारते हुए कुम्भीपाक नरक में डाल दो।
सेनापतियों ने मुगदरों से उसका सिर फोड़ते हुए कुम्भीपाक नरक में ले जाकर खौलते हुए तेल के कड़ाहे में डाल दिया। प्रेत सेनापतियों ने उसे जैसे ही तेल के कड़ाहे में डाला, वैसे ही वहाँ का कुण्ड शीतल हो गया ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार पूर्वकाल में प्रह्लादजी को डालने से दैत्यों की जलाई हुई आग ठण्डी हो गई थी। यह विचित्र घटना देखकर प्रेत सेनापति यमराज के पास गये और उनसे सारा वृत्तान्त कहा।
सारी बात सुनकर यमराज भी आश्चर्यचकित हो गये और इस विषय में पूछताछ करने लगे। उसी समय नारदजी वहाँ आये और यमराज से कहने लगे – सूर्यनन्दन! यह ब्राह्मण नरकों का उपभोग करने योग्य नही है। जो मनुष्य पुण्य कर्म करने वाले लोगों का दर्शन, स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप करता है, वह उनके पुण्य का छठवाँ अंश प्राप्त कर लेता है। यह धनेश्वर तो एक मास तक श्रीहरि के कार्तिक व्रत का अनुष्ठान करने वाले असंख्य मनुष्यों के सम्पर्क में रहा है। अत: यह उन सबके पुण्यांश का भागी हुआ है। इसको अनिच्छा से पुण्य प्राप्त हुआ है इसलिए यह यक्ष की योनि में रहे और पाप भोग के रुप में सब नरक का दर्शन मात्र कर के ही यम यातना से मुक्त हो जाए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – सत्यभामा! नारदजी के इस प्रकार कहकर चले जाने के पश्चात धनेश्वर को पुण्यात्मा समझते हुए यमराज ने दूतों को उसे नरक दिखाने की आज्ञा दी।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 30

भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा से बोले – हे प्रिये! नारदजी के यह वचन सुनकर महाराजा पृथु बहुत आश्चर्यचकित हुए। अन्त में उन्होंने नारदजी का पूजन करके उनको विदा किया। इसीलिए माघ, कार्तिक और एकादशी – यह तीन व्रत मुझे अत्यधिक प्रिय हैं। वनस्पतियों में तुलसी, महीनों में कार्तिक, तिथियों में एकादशी और क्षेत्रों में प्रयाग मुझे बहुत प्रिय हैं। जो मनुष्य इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर इनका सेवन करता है वह मुझे यज्ञ करने वाले मनुष्य से भी अधिक प्रिय है। जो मनुष्य विधिपूर्वक इनकी सेवा करते हैं, मेरी कृपा से उन्हें समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण के वचन सुनकर सत्यभामा ने कहा – हे प्रभो! आपने बहुत ही अद्भुत बात कही है कि दूसरे के लिए पुण्य के फल से कलहा की मुक्ति हो गयी। यह प्रभावशाली कार्तिक मास आपको अधिक प्रिय है जिससे पतिद्रोह का पाप केवल स्नान के पुण्य से ही नष्ट हो गया। दूसरे मनुष्य द्वारा किया हुआ पुण्य उसके देने से किस प्रकार मिल जाता है, यह आप मुझे बताने की कृपा करें।
श्रीकृष्ण भगवान बोले – प्रिये! जिस कर्म द्वारा बिना दिया हुआ पुण्य और पाप मिलता है उसे ध्यानपूर्वक सुनो।
सतयुग में देश, ग्राम तथा कुलों को दिया पुण्य या पाप मिलता था किन्तु कलियुग में केवल कर्त्ता को ही पाप तथा पुण्य का फल भोगना पड़ता है। संसर्ग न करने पर भी वह व्यवस्था की गई है और संसर्ग से पाप व पुण्य दूसरे को मिलते हैं, उसकी व्यवस्था भी सुनो।
पढ़ाना, यज्ञ कराना और एक साथ भोजन करने से पाप-पुण्य का आधा फल मिलता है। एक आसन पर बैठने तथा सवारी पर चढ़ने से, श्वास के आने-जाने से पुण्य व पाप का चौथा भाग जीवमात्र को मिलता है। छूने से, भोजन करने से और दूसरे की स्तुति करने से पुण्य और पाप का छठवाँ भाग मिलता है। दूसरे की निन्दा, चुगली और धिक्कार करने से उसका सातवाँ भाग मिलता है। पुण्य करने वाले मनुष्यों की जो कोई सेवा करता है वह सेवा का भाग लेता है और अपना पुण्य उसे देता है।
नौकर और शिष्य के अतिरिक्त जो मनुष्य दूसरे से सेवा करवाकर उसे पैसे नहीं देता, वह सेवक उसके पुण्य का भागी होता है। जो व्यक्ति पंक्ति में बैठे हुए भोजन करने वालों की पत्तल लांघता है, वह उसे(जिसकी पत्तल उसने लांघी है) अपने पुण्य का छठवाँ भाग देता है। स्नान तथा ध्यान आदि करते हुए मनुष्य से जो व्यक्ति बातचीत करता है या उसे छूता है, वह अपने पुण्य का छठवाँ भाग दे डालता है।
जो मनुष्य धर्म के कार्य के लिए दूसरों से धन मांगता है, वह पुण्य का भागी होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि दान करने वाला पुण्य का भागी होता है। जो मनुष्य धर्म का उपदेश करता है और उसके बाद सुनने वाले से याचना करता है, वह अपने पुण्य का छठवाँ भाग उसे दे देता है। जो मनुष्य दूसरों का धन चुराकर उससे धर्म करता है, वह चोरी का फल भोगता है और शीघ्र ही निर्धन हो जाता है और जिसका धन चुराता है, वह पुण्य का भागी होता है।
बिना ऋण उतारे जो मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है, उनको ऋण देने वाले सज्जन पुरुष पुण्य के भागी होते हैं। शिक्षा देने वाला, सलाह देने वाला, सामग्री को जुटाने वाला तथा प्रेरणा देने वाला, यह पाप और पुण्य के छठे भाग को प्राप्त करते हैं। राजा प्रजा के पाप-पुण्य के षष्ठांश का भोगी होता है, गुरु शिष्यों का, पति पत्नी का, पिता पुत्र का, स्त्री पति के लिए पुण्य का छठा भाग पाती है। पति को प्रसन्न करने वाली आज्ञाकारी स्त्री पति के लिए पुण्य का आधा भाग ले लेती है।
जो पुण्यात्मा पराये लोगों को दान करते हैं, वह उनके पुण्य का छठा भाग प्राप्त करते हैं। जीविका देने वाला मनुष्य जीविका ग्रहण करने वाले मनुष्य के पुण्य के छठे भाग को प्राप्त करता है। इस प्रकार दूसरों के लिए पुण्य अथवा पाप बिना दिये भी दूसरे को मिल सकते हैं किन्तु यह नियम जो कि मैंने बतलाये हैं, ये कलियुग में लागू नहीं होते। कलियुग में तो एकमात्र कर्त्ता को ही अपने पाप व पुण्य भोगने पड़ते हैं। इस संबंध में एक बड़ा पुराना इतिहास है जो कि पवित्र भी है और बुद्धि प्रदान करने वाला कहा जाता है, उसे ध्यानपूर्वक सुनो –

(यह इतिहास 31वें अध्याय में बताया जाएगा।)

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 29

राजा पृथु ने कहा – हे मुनिश्रेष्ठ! आपने कलहा द्वारा मुक्ति पाये जाने का वृत्तान्त मुझसे कहा जिसे मैंने ध्यानपूर्वक सुना। हे नारदजी! यह काम उन दो नदियों के प्रभाव से हुआ था, कृपया यह मुझे बताने की कृपा कीजिए।
नारद जी बोले – हे राजन! कृष्णा नदी साक्षात भगवान श्रीकृष्ण महाराज का शरीर और वेणी नामक नदी भगवान शंकर का शरीर है। इन दोनों नदियों के संगम का माहात्म्य श्रीब्रह्माजी भी वर्णन करने में समर्थ नहीं है फिर भी चूंकि आपने पूछा है इसलिए आपको इनकी उत्पत्ति का वृत्तान्त सुनाता हूँ ध्यानपूर्वक सुनो –
चाक्षसु मन्वन्तर के आरम्भ में ब्रह्माजी ने सह्य पर्वत के शिखर पर यज्ञ करने का निश्चय किया। वह भगवान विष्णु, भगवान शंकर तथा समस्त देवताओं सहित यज्ञ की सामग्री लेकर उस पर्वत के शिखर पर गये। महर्षि भृगु आदि ऋषियों ने ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें दीक्षा देने का विचार किया। तत्पश्चात भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी की भार्या त्वरा को बुलवाया। वह बड़ी धीमी गति से आ रही थी। इसी बीच में भृगु जी ने भगवान विष्णु से पूछा – हे प्रभु! आपने त्वरा को शीघ्रता से बुलाया था, वह क्यों नहीं आई? ब्रह्ममुहूर्त निकल जाएगा।
इस पर भगवान विष्णु बोले – यदि त्वरा यथासमय यहाँ नहीं आती है तो आप गायत्री को ही स्त्री मानकर दीक्षा विधान कर दीजिएगा। क्या गायत्री पुण्य कर्म में ब्रह्माजी की स्त्री नहीं हो सकती?
नारदजी ने कहा – हे राजन! भगवान विष्णु की इस बात का समर्थन भगवान शंकर जी ने भी किया। यह बात सुनकर भृगुजी ने गायत्री को ही ब्रह्माजी के दायीं ओर बिठाकर दी़क्षा विधान आरंभ कर दिया। जिस समय ऋषिमण्डल गायत्री को दीक्षा देने लगा, उसी समय त्वरा भी यज्ञमण्डल में आ पहुँची।
ब्रह्माजी के दायीं ओर गायत्री को बैठा देखकर ईर्ष्या से कुपित होकर त्वरा बोली – जहाँ अपूज्यों की पूजा और पूज्यों की अप्रतिष्ठा होती है वहाँ पर दुर्भिक्ष, मृत्यु तथा भय तीनों अवश्य हुआ करते हैं। यह गायत्री ब्रह्माजी की दायीं ओर मेरे स्थान पर विराजमान हुई है इसलिए यह अदृश्य बहने वाली नदी होगी। आप सभी देवताओं ने बिना विचारे इसे मेरे स्थान पर बिठाया है इसलिए आप सभी जड़ रूप नदियाँ होगें।
नारदजी राजा पृथु से बोले – हे राजन! इस प्रकार त्वरा के शाप को सुनकर गायत्री क्रोध से आग-बबूला होकर अपने होठ चबाने लगी। देवताओं के मना करने पर भी उसने उठकर त्वरा को शाप दे दिया। गायत्री बोली – त्वरा! जिस प्रकार ब्रह्माजी तुम्हारे पति हैं उसी प्रकार मेरे भी पति हैं। तुमने व्यर्थ ही शाप दे दिया है इसलिए तुम भी नदी हो जाओ तब देवताओं में खलबली मच गई। सभी देवता त्वरा को साष्टांग प्रणाम कर के बोले – हे देवि! तुमने ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं को जो शाप दिया है वह उचित नहीं है क्योंकि यदि हम सब जड़ रुप नदियाँ हो जाएंगे तो फिर निश्चय ही यह तीनों लोक नहीं बच पाएंगे। चूंकि यह शाप तुमने बिना विचार किए दिया है इसलिए यह शाप तुम वापिस ले लो।
त्वरा बोली – हे देवगण! आपके द्वारा यज्ञ के आरम्भ में गणेश पूजन न किये जाने के कारण ही यह विघ्न उत्पन्न हुआ है। मेरा यह शाप कदापि खाली नहीं जा सकता इसलिए आप सभी अपने अंगों से जड़ीभूत होकर अवश्यमेव नदियाँ बनोगे। हम दोनों सौतने भी अपने-अपने वंशों पश्चिम में बहने वाली नदियाँ बनेगी।
नारदजी राजा पृथु से बोले – हे राजन! त्वरा के यह वचन सुनकर भगवान विष्णु, शंकर आदि सभी देवता अपने-अपने अंशों से नदियाँ बन गये। भगवान विष्णु के अंश से कृष्णा, भगवान शंकर के अंश से वेणी तथा ब्रह्माजी के अंश से ककुदमवती नामक नदियाँ उत्पन्न हो गई। समस्त देवताओं ने अपने अंशों को जड़ बनाकर वहीं सह्य पर्वत पर फेंक दिया। फिर उन लोगों के अंश पृथक-पृथक नदियों के रूप में बहने लगे। देवताओं के अंशों से सहस्त्रों की संख्या में पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ उत्पन्न हो गई। गायत्री और त्वरा दोनों पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ होकर एक साथ बहने लगी, उन दोनों का नाम सावित्री पड़ा।
ब्रह्माजी ने यज्ञ स्थान पर भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर की स्थापना की। दोनों देवता महाबल तथा अतिबल के नाम से प्रसिद्ध हुए। हे राजन! कृष्णा और वेणी नदी की उत्पत्ति का यह वर्णन जो भी मनुष्य सुनेगा या सुनायेगा, उसे नदियों के दर्शन और स्नान का फल प्राप्त होगा।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 28

धर्मदत्त ने पूछा – मैंने सुना है कि जय और विजय भी भगवान विष्णु के द्वारपाल हैं। उन्होंने पूर्वजन्म में ऎसा कौन सा पुण्य किया था जिससे वे भगवान के समान रूप धारण कर के वैकुण्ठधाम के द्वारपाल हुए?
दोनों पार्षदों ने कहा – ब्रह्मन! पूर्वकाल में तृणविन्दु की कन्या देवहूति के गर्भ से महर्षि कर्दम की दृष्टिमात्र से दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें से बड़े का नाम जय और छोटे का नाम विजय हुआ। पीछे उसी देवहूति के गर्भ से योगधर्म के जानने वाले भगवान कपिल उत्पन्न हुए। जय और विजय सदा भगवान की भक्ति में तत्पर रहते थे। वे नित्य अष्टाक्षर मन्त्र का जप और वैष्णव व्रतों का पालन करते थे। एक समय राजा मरुत्त ने उन दोनों को अपने यज्ञ में बुलाया। वहां जय ब्रह्मा बनाए गए और विजय आचार्य। उन्होंने यज्ञ की सम्पूर्ण विधि पूर्ण की। यज्ञ के अन्त में अवभृथस्थान के पश्चात राजा मरुत्त ने उन दोनों को बहुत धन दिया।
धन लेकर दोनों भाई अपने आश्रम पर गये। वहाँ उस धन का विभाग करते समय दोनों में परस्पर लाग-डाँट पैदा हो गई। जय ने कहा – इस धन को बराबर-बराबर बाँट लिया जाये। विजय का कहना था – नहीं, जिसको जो मिला है वह उसी के पास रहे तब जय ने क्रोध में आकर लोभी विजय को शाप दिया – तुम ग्रहण कर के देते नहीं हो इसलिए ग्राह अर्थात मगरमच्छ हो जाओ।
जय के शाप को सुनकर विजय ने भी शाप दिया – तुमने मद से भ्रान्त होकर शापो दिया है इसलिए तुम मातंग अर्थात हाथी की योनि में जाओ। तत्पश्चात उन्होंने भगवान से शाप निवृति के लिए प्रार्थना की। श्री भगवान ने कहा – तुम मेरे भक्त हो तुम्हारा वचन कभी असत्य नहीं होगा। तुम दोनों अपने ही दिये हुए इन शापों को भोगकर फिर से मेरे धाम को प्राप्त होगे।
ऎसा कहकर भगवान विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर वे दोनों गण्ड नदी के तट पर ग्राह और गज हो गये। उस योनि में भी उन्हें पूर्वजन्म का स्मरण बना रहा और वे भगवान विष्णु के व्रत में तत्पर रहे। किसी समय वह गजराज कार्तिक मास में स्नान के लिए गण्ड नदी गया तो उस समय ग्राह ने शाप के हेतु को स्मरण करते हुए उस गज को पकड़ लिया। ग्राह से पकड़े जाने पर गजराज ने भगवान रमानाथ का स्मरण किया तभी भगवान विष्णु शंख, चक्र और गदा धारण किये वहां प्रकट हो गये उन्होंने चक्र चलाकर ग्राह और गजराज का उद्धार किया और उन्हें अपने ही जैसा रूप देकर वैकुण्ठधाम को ले गये तब से वह स्थान हरिक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है। वे ही दोनों विश्वविख्यात जय और विजय हैं जो भगवान विष्णु के द्वारपाल हुए हैं।
धर्मदत्त! तुम भी ईर्ष्या और द्वेष का त्याग करके सदैव भगवान विष्णु के व्रत में स्थिर रहो, समदर्शी बनो, कार्तिक, माघ और वैशाख के महीनों में सदैव प्रात:काल स्नान करो। एकादशी व्रत के पालन में स्थिर रहो। तुलसी के बगीचे की रक्षा करते रहो। ऎसा करने से तुम भी शरीर का अन्त होने पर भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होवोगे। भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाले तुम्हारे इस व्रत से बढ़कर न यज्ञ हैं न दान है और न तीर्थ ही हैं। विप्रवर! तुम धन्य हो, जिसके व्रत के आधे भाग का फल पाकर यह स्त्री हमारे द्वारा वैकुण्ठधाम में ले जायी जा रही है।
नारद जी बोले – हे राजन! धर्मदत्त को इस प्रकार उपदेश देकर वे दोनों विमानचारी पार्षद उस कलहा के साथ वैकुण्ठधाम को चले गये। धर्मदत्त जीवन-भर भगवान के व्रत में स्थिर रहे और देहावसान के बाद उन्होंने अपनी दोनों स्त्रियों के साथ वैकुण्ठधाम प्राप्त कर लिया। इस प्राचीन इतिहास को जो सुनता है और सुनाता है वह जगद्गुरु भगवान की कृपा से उनका सान्निध्य प्राप्त कराने वाली उत्तम गति को प्राप्त करता है।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 27

पार्षदों ने कहा – एक दिन की बात है, विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के पश्चात भोजन तैयार किया किन्तु कोई छिपकर उसे चुरा ले गया। विष्णुदास ने देखा भोजन नहीं है परन्तु उन्होंने दुबारा भोजन नहीं बनाया क्योंकि ऎसा करने पर सायंकाल की पूजा के लिए उन्हें अवकाश नहीं मिलता। अत: प्रतिदिन के नियम का भंग हो जाने का भय था। दूसरे दिन पुन: उसी समय पर भोजन बनाकर वे ज्यों ही भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने के लिए गये त्यों ही किसी ने आकर फिर सारा भोजन हड़प लिया।
इस प्रकार सात दिनों तक लगातार कोई उनका भोजन चुराकर ले जाता रहा। इससे विष्णुदास को बड़ा विस्मय हुआ वे मन ही मन इस प्रकार विचार करने लगे – अहो! कौन प्रतिदिन आकर मेरी रसोई चुरा ले जाता है। यदि दुबारा रसोई बनाकर भोजन करता हूँ तो सायंकाल की पूजा छूट जाती है। यदि रसोई बनाकर तुरन्त ही भोजन कर लेना उचित हो तो मुझसे यह न होगा क्योंकि भगवान विष्णु को सब कुछ अर्पण किये बिना कोई भी वैष्णव भोजन नहीं करता। आज उपवास करते मुझे सात दिन हो गये। इस प्रकार मैं व्रत में कब तक स्थिर रह सकता हूँ। अच्छा! आज मैं रसोई की भली-भाँति रक्षा करुँगा।
ऎसा निश्चय कर के भोजन बनाने के पश्चात वे वहीं कहीं छिपकर खड़े हो गये। इतने में ही उन्हें एक चाण्डाल दिखाई दिया जो रसोई का अन्न हरकर जाने के लिए तैयार खड़ा था। भूख के मारे उसका सारा शरीर दुर्बल हो गया था मुख पर दीनता छा रही थी। शरीर में हाड़ और चाम के सिवा कुछ शेष नहीं बचा था। उसे देखकर श्रेष्ठ ब्राह्मण विष्णुदास का हृदय करुणा से भर आया। उन्होंने भोजन चुराने वाले चाण्डाल की ओर देखकर कहा – भैया! जरा ठहरो, ठहरो! क्यों रूखा-सूखा खाते हो? यह घी तो ले लो।
इस प्रकार कहते हुए विप्रवर विष्णुदास को आते देख वज चाण्डाल भय के मारे बड़े वेग से भागा और कुछ ही दूरी पर मूर्छित होकर गिर पड़ा। चाण्डाल को भयभीत और मूर्छित देखकर द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास बड़े वेग से उसके समीप आये और दयावश अपने वस्त्र के छोर से उसको हवा करने लगे। तदन्तर जब वह उठकर खड़ा हुआ तब विष्णुदास ने देखा वहाँ चाण्डाल नहीं हैं बल्कि साक्षात नारायण ही शंख, चक्र और गदा धारण किये सामने उपस्थित हैं। अपने प्रभु को प्रत्यक्ष देखकर विष्णुदास सात्विक भावों के वशीभूत हो गये। वे स्तुति और नमस्कार करने में भी समर्थ न हो सके तब भगवान ने सात्विक व्रत का पालन करने वाले अपने भक्त विष्णुदास को छाती से लगा लिया और उन्हें अपने जैसा रूप देकर वैकुण्ठधाम को ले चले।
उस समय यज्ञ में दीक्षित हुए राजा चोल ने देखा – विष्णुदास एक श्रेष्ठ विमान पर बैठकर भगवान विष्णु के समीप जा रहे हैं। विष्णुदास को वैकुण्ठधाम में जाते देख राजा ने शीघ्र ही अपने गुरु महर्षि मुद्गल को बुलाया और इस प्रकार कहना आरम्भ किया – जिसके साथ स्पर्धा करके मैंने इस यज्ञ, दान आदि कर्म का अनुष्ठान किया है वह ब्राह्मण आज भगवान विष्णु का रुप धारण करके मुझसे पहले ही वैकुण्ठधाम को जा रहा है। मैंने इस वैष्णवधाम में भली-भाँति दीक्षित होकर अग्नि में हवन किया और दान आदि के द्वारा ब्राह्मणों का मनोरथ पूर्ण किया तथापि अभी तक भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न नहीं हुए और इस विष्णुदास को केवल भक्ति के ही कारण श्रीहरि ने प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अत: जान पड़ता है कि भगवान विष्णु केवल दान और यज्ञों से प्रसन्न नहीं होते। उन प्रभु का दर्शन कराने में भक्ति ही प्रधान कारण है।
दोनों पार्षदों ने कहा – इस प्रकार कहकर राजा ने अपने भानजे को राज सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया। वे बचपन से ही यज्ञ की दीक्षा लेकर उसी में संलग्न रहते थे इसलिए उन्हें कोई पुत्र नहीं हुआ था। यही कारण है कि उस देश में अब तक भानजे ही राज्य के उत्तराधिकारी होते हैं। भानजे को राज्य देकर राजा यज्ञशाला में गये और यज्ञकुण्ड के सामने खड़े होकर भगवान विष्णु को सम्बोधित करते हुए तीन बार उच्च स्वर से निम्नांकित वचन बोले – भगवान विष्णु! आप मुझे मन, वाणी, शरीर और क्रिया द्वारा होने वाली अविचल भक्ति प्रदान कीजिए।
इस प्रकार कहकर वे सबके देखते-देखते अग्निकुण्ड में कूद पड़े। बस, उसी क्षण भक्तवत्सल भगवान विष्णु अग्निकुण्ड में प्रकट हो गये। उन्होंने राजा को छाती से लगाकर एक श्रेष्ठ विमान में बैठाया और उन्हें अपने साथ लेकर वैकुण्ठधाम को प्रस्थान किया।
नारद जी बोले – हे राजन्! जो विष्णुदास थे वे तो पुण्यशील नाम से प्रसिद्ध भगवान के पार्षद हुए और जो राजा चोल थे उनका नाम सुशील हुआ। इन दोनों को अपने ही समान रूप देकर भगवान लक्ष्मीपति ने अपना द्वारपाल बना लिया।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 26

नारद जी बोले – इस प्रकार विष्णु पार्षदों के वचन सुनकर धर्मदत्त ने कहा – प्राय: सभी मनुष्य भक्तों का कष्ट दूर करने वाले श्रीविष्णु की यज्ञ, दान, व्रत, तीर्थसेवन तथा तपस्याओं के द्वारा विधिपूर्वक आराधना करते हैं। उन समस्त साधनों में कौन-सा ऎसा साधन है जो भगवान विष्णु की प्रसन्नता को बढ़ाने वाला तथा उनके सामीप्य की प्राप्ति कराने वाला है।
दोनों पार्षद अपने पूर्वजन्म की कथा कहने लगे – हे द्विजश्रेष्ठ आपका प्रश्न बड़ा श्रेष्ठ है। आज हम आपको भगवान विष्णु को शीघ्र प्रसन्न करने का उपाय बताते हैं। हम इतिहास सहित प्राचीन वृत्तान्त सुनाते हैं, सावधानीपूर्वक सुनो। ब्रह्मन! पहले कांचीपुरी में चोल नामक एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। उन्हीं के नाम पर उनके अधीन रहने वाले सभी देश चोल नाम से विख्यात हुए। राजा चोल जब इस भूमण्डल का शासन करते थे, उस समय उनके राज्य में कोई भी मनुष्य दरिद्र, दुखी, पाप में मन लगाने वाला अथवा रोगी नहीं था।
एक समय की बात है, राजा चोल अनन्तशयन नामक तीर्थ में गये जहाँ जगदीश्वर भगवान विष्णु ने योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन किया था। वहाँ भगवान विष्णु के दिव्य विग्रह की राजा ने विधिपूर्वक पूजा की। दिव्य मणि, मुक्ताफल तथा सुवर्ण के बने हुए सुन्दर पुष्पों से पूजन कर के साष्टांग प्रणाम किया। प्रणाम कर के ज्यों ही बैठे उसी समय उनकी दृष्टि भगवान के पास आते हुए एक ब्राह्मण पर पड़ी जो उन्हीं की कांची नगरी के निवासी थे। उनका नाम विष्णुदास था। उन्होंने भगवान की पूजा के लिए अपने हाथ में तुलसीदल और जल ले रखा था। निकट आने पर उन ब्राह्मण ने विष्णुसूक्त का पाठ करते हुए देवाधिदेव भगवान को स्नान कराया और तुलसी की मंजरी तथा पत्तों से उनकी विधिवत पूजा की। राजा चोल ने जो पहले रत्नों से भगवान की पूजा की थी, वह सब तुलसी पूजा से ढक गई।
यह देखकर राजा कुपित होकर बोले – विष्णुदास! मैंने मणियों तथा सुवर्ण से भगवान की जो पूजा की थी वह कितनी शोभा पा रही थी, तुमने तुलसीदल चढ़ाकर उसे ढक दिया। बताओ, ऎसा क्यों किया? मुझे तो ऎसा जान पड़ता है कि तुम दरिद्र और गंवार हो। भगवान विष्णु की भक्ति को बिलकुल नहीं जानते।
राजा की यह बात सुनकर द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास ने कहा – राजन! आपको भक्ति का कुछ भी पता नहीं है, केवल राजलक्ष्मी के कारण आप घमण्ड कर रहे हैं। बतलाइए तो आज से पहले आपने कितने वैष्णव व्रतों का पालन किया है?
तब नृपश्रेष्ठ चोल ने हंसते हुए कहा – तुम तो दरिद्र और निर्धन हो तुम्हारी भगवान विष्णु में भक्ति ही कितनी है? तुमने भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाला कोई भी यज्ञ और दान आदि नहीं किया और न पहले कभी कोई देवमन्दिर ही बनवाया है। इतने पर भी तुम्हें अपनी भक्ति का इतना गर्व है। अच्छा तो ये सभी ब्राह्मण मेरी बात सुन लें। भगवान विष्णु के दर्शन पहले मैं करता हूँ या यह ब्राह्मण? इस बात को आप सब लोग देखें फिर हम दोनों में से किसकी भक्ति कैसी है, यह सब लोग स्वत: ही जान लेगें। ऎसा कहकर राजा अपने राजभवन को चले गये।
वहाँ उन्होंने महर्षि मुद्गल को आचार्य बनाकर वैष्णव यज्ञ प्रारम्भ किया। उधर सदैव भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले शास्त्रोक्त नियमों में तत्पर विष्णुदास भी व्रत का पालन करते हुए वहीं भगवान विष्णु के मन्दिर में टिक गये। उन्होंने माघ और कार्तिक के उत्तम व्रत का अनुष्ठान, तुलसीवन की रक्षा, एकादशी को द्वादशाक्षर मन्त्र का जाप, नृत्य, गीत आदि मंगलमय आयोजनों के साथ प्रतिदिन षोडशोपचार से भगवान विष्णु की पूजा आदि नियमों का आचरण किया। वे प्रतिदिन चलते, फिरते और सोते – हर समय भगवान विष्णु का स्मरण किया करते थे। उनकी दृष्टि सर्वत्र सम हो गई थी। वे सब प्राणियों के भीतर एकमात्र भगवान विष्णु को ही स्थित देखते थे। इस प्रकार राजा चोल और विष्णुदास दोनों ही भगवान लक्ष्मीपति की आराधना में संलग्न थे। दोनों ही अपने-अपने व्रत में स्थित रहते थे और दोनों की ही सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा समस्त कर्म भगवान विष्णु को समर्पित हो चुके थे। इस अवस्था में उन दोनों ने दीर्घकाल व्यतीत किया।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 25

तीर्थ में दान और व्रत आदि सत्कर्म करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं परन्तु तू तो प्रेत के शरीर में है, अत: उन कर्मों को करने की अधिकारिणी नहीं है। इसलिए मैंने जन्म से लेकर अब तक जो कार्तिक का व्रत किया है उसके पुण्य का आधा भाग मैं तुझे देता हूँ, तू उसी से सदगति को प्राप्त हो जा।
इस प्रकार कहकर धर्मदत्त ने द्वादशाक्षर मन्त्र का श्रवण कराते हुए तुलसी मिश्रित जल से ज्यों ही उसका अभिषेक किया त्यों ही वह प्रेत योनि से मुक्त हो प्रज्वलित अग्निशिखा के समान तेजस्विनी एवं दिव्य रूप धारिणी देवी हो गई और सौन्दर्य में लक्ष्मी जी की समानता करने लगी। तदन्तर उसने भूमि पर दण्ड की भाँति गिरकर ब्राह्मण देवता को प्रणाम किया और हर्षित होकर गदगद वाणी में कहा – हे द्विजश्रेष्ठ! आपके प्रसाद से आज मैं इस नरक से छुटकारा पा गई। मैं तो पाप के समुद्र में डूब रही थी और आप मेरे लिए नौका के समान हो गये।
वह इस प्रकार ब्राह्मण से कह रही थी कि आकाश से एक दिव्य विमान उतरता दिखाई दिया। वह अत्यन्त प्रकाशमान एवं विष्णुरूपधारी पार्षदों से युक्त था। विमान के द्वार पर खड़े हुए पुण्यशील और सुशील ने उस देवी को उठाकर श्रेष्ठ विमान पर चढ़ा लिया तब धर्मदत्त ने बड़े आश्चर्य के साथ उस विमान को देखा और विष्णुरुपधारी पार्षदों को देखकर साष्टांग प्रणाम किया। पुण्यशील और सुशील ने प्रणाम करने वाले ब्राह्मण को उठाया और उसकी सराहना करते हुए कहा – हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें साधुवाद है, क्योंकि तुम सदैव भगवान विष्णु के भजन में तत्पर रहते हो, दीनों पर दया करते हो, सर्वज्ञ हो तथा भगवान विष्णु के व्रत का पालन करते हो। तुमने बचपन से लेकर अब तक जो कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उसके आधे भाग का दान देने से तुम्हें दूना पुण्य प्राप्त हुआ है और सैकड़ो जन्मों के पाप नष्ट हो गये हैं। अब यह वैकुण्ठधाम में ले जाई जा रही है। तुम भी इस जन्म के अन्त में अपनी दोनों स्त्रियों के साथ भगवान विष्णु के वैकुण्ठधाम में जाओगे और मुक्ति प्राप्त करोगे।
धर्मदत्त! जिन्होंने तुम्हारे समान भक्तिपूर्वक भगवान विष्णु की आराधना की है वे धन्य और कृतकृत्य हैं। इस संसार में उन्हीं का जन्म सफल है। भली-भांति आराधना करने पर भगवान विष्णु देहधारी प्राणियों को क्या नहीं देते हैं? उन्होंने ही उत्तानपाद के पुत्र को पूर्वकाल में ध्रुवपद पर स्थापित किया था। उनके नामों का स्मरण करने मात्र से समस्त जीव सदगति को प्राप्त होते हैं। पूर्वकाल में ग्राहग्रस्त गजराज उन्हीं के नामों का स्मरण करने से मुक्त हुआ था। तुमने जन्म से लेकर जो भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाले कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उससे बढ़कर न यज्ञ है, न दान और न ही तीर्थ है। विप्रवर! तुम धन्य हो क्योंकि तुमने जगद्गुरु भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला कार्तिक व्रत किया है, जिसके आधे भाग के फल को पाकर यह स्त्री हमारे साथ भगवान लोक में जा रही है।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 24

राजा पृथु बोले – हे मुनिश्रेष्ठ! आपने तुलसी के इतिहास, व्रत, माहात्म्य के विषय में कहा। अब आप कृपाकर मुझे यह बताइए कि कार्तिक मास में क्या और भी देवताओं का पूजन होता है? यह भी विस्तारपूर्वक बताइए। नारद जी बोले – पूर्व काल की बात है। सह्य पर्वत पर करवीकर में धर्मदत्त नामक विख्यात कोई धर्मज्ञ ब्राह्मण रहते थे। एक दिन कार्तिक मास में भगवान विष्णु के समीप जागरण करने के लिए वे भगवान के मन्दिर की ओर चले। उस समय एक पहर रात बाकी थी। भगवान के पूजन की सामग्री साथ लिये जाते हुए ब्राह्मण ने मार्ग में देखा कि एक भयंकर राक्षसी आ रही है।
उसका शरीर नंगा और मांस रहित था। उसके बड़े-बड़े दाँत, लपकती हुई जीभ और लाल नेत्र देखकर ब्राह्मण भय से थर्रा उठे। उनका सारा शरीर कांपने लगा। उन्होंने साहस कर के पूजा की सामग्री तथा जल से ही उस राक्षसी के ऊपर प्रहार किया। उन्होंने हरिनाम का स्मरण कर के तुलसीदल मिश्रित जल से उसको मारा था इसलिए उसका सारा पातक नष्ट हो गया। अब उसे अपने पूर्व जन्म के कर्मों के परिणाम स्वरुप प्राप्त हुई दुर्दशा का स्मरण हो आया। उसने ब्राह्मण को दण्डवत प्रणाम कर के इस प्रकार कहा – ब्रह्मन्! मैं पूर्व जन्म के कर्मों के फल से इस दशा को पहुंची हूँ। अब मुझे किस प्रकार उत्तम गति प्राप्त होगी?
धर्मदत्त ने उसे इस प्रकार प्रणाम करते देखकर आश्चर्यचकित होते हुए पूछा – किस कर्म के फल से तुम इस दशा को पहुंची हो? कहां की रहने वाली हो? तुम्हारा नाम क्या है और आचार-व्यवहार कैसा है? ये सारी बातें मुझे बताओ।
उस राक्षसी का नाम कलहा था, कलहा बोली – ब्रह्मन! मेरे पूर्व जन्म की बात है, सौराष्ट्र नगर में भिक्षु नामक एक ब्राह्मण रहते थे, मैं उनकी पत्नी थी। मेरा नाम कलहा था और मैं बड़े क्रूर स्वभाव की स्त्री थी। मैंने वचन से भी कभी अपने पति का भला नहीं किया, उन्हें कभी मीठा भोजन नहीं परोसा। सदा अपने स्वामी को धोखा ही देती रही। मुझे कलह विशेष प्रिय था इसलिए मेरे पति का मन मुझसे सदा उद्विग्न रहा करता था। अन्ततोगत्वा उन्होंने दूसरी स्त्री से विवाह करने का निश्चय कर लिया तब मैंने विष खाकर अपने प्राण त्याग दिये, फिर यमराज के दूत आये और मुझे बाँधकर पीटते हुए यमलोक में ले गये। वहाँ यमराज ने मुझे देखकर चित्रगुप्त से पूछा – चित्रगुप्त! देखो तो सही इसने कैसा कर्म किया है? जैसा इसका कर्म हो, उसके अनुसार यह शुभ या अशुभ प्राप्त करे।
चित्रगुप्त ने कहा – इसका किया हुआ कोई भी शुभ कर्म नहीं है। यह स्वयं मिठाईयाँ उड़ाती थी और अपने स्वामी को उसमें से कुछ भी नही देती थी। इसने सदा अपने स्वामी से द्वेष किया है इसलिए यह चमगादुरी होकर रहे तथा सदा कलह में ही इसकी प्रवृति रही है इसलिए यह विष्ठाभोजी सूकरी की योनि में रहे। जिस बर्तन में भोजन बनाया जाता है उसी में यह सदा अकेली खाया करती थी। अत: उसके दोष से यह अपनी ही सन्तान का भ़ाण करने वाली बिल्ली हो। इसने अपने पति को निमित्त बनाकर आत्मघात किया है इसलिए यह अत्यन्त निन्दनीय स्त्री प्रेत के शरीर में भी कुछ काल तक अकेली ही रहे। इसे यमदूतों द्वारा निर्जल प्रदेश में भेज देना चाहिए, वहाँ दीर्घकाल तक यह प्रेत के शरीर में निवास करे। उसके बाद यह पापिनी शेष तीन योनियों का भी उपभोग करेगी।
कलहा ने कहा – विप्रवर! मैं वही पापिनी कलहा हूँ। इस प्रेत शरीर में आये मुझे पाँच सौ वर्ष बीत चुके हैं। मैं सदैव भूख-प्यास से पीड़ित रहा करती हूँ। एक बनिये के शरीर में प्रवेश कर के मैं इस दक्षिण देश में कृष्णा और वेणी के संगम तक आयी हूँ। ज्यों ही संगम तट पर पहुंची त्यों ही भगवान शिव और विष्णु के पार्षदों ने मुझे बलपूर्वक बनिये के शरीर से दूर भगा दिया तब से मैं भूख का कष्ट सहन करती हुई इधर-उधर घूम रही हूँ। इतने में ही आपके ऊपर मेरी दृष्टि पड़ गई। आपके हाथ से तुलसी मिश्रित जल का संसर्ग पाकर मेरे सब पाप नष्ट हो गये हैं। द्विजश्रेष्ठ! अब आप ही कोई उपाय कीजिए। बताइए मेरे इस शरीर से और भविष्य में होने वाली भयंकर तीन योनियों से किस प्रकार मुक्त होऊँगी?
कलहा का यह वचन सुनकर धर्मदत्त उसके पिछले कर्मों और वर्तमान अवस्था को देखकर बहुत दुखी हुआ, फिर उसने बहुत सोच-विचार करने के बाद कहा –
(धर्मदत्त ने जो भी कहा उसका वर्णन पच्चीसवें अध्याय में किया गया है)

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 23

नारद जी बोले – हे राजन! यही कारण है कि कार्तिक मास के व्रत उद्यापन में तुलसी की जड़ में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। तुलसी भगवान विष्णु को अधिक प्रीति प्रदान करने वाली मानी गई है। राजन! जिसके घर में तुलसीवन है वह घर तीर्थ स्वरुप है वहाँ यमराज के दूत नहीं आते। तुलसी का पौधा सदैव सभी पापों का नाश करने वाला तथा अभीष्ट कामनाओं को देने वाला है। जो श्रेष्ठ मनुष्य तुलसी का पौधा लगाते हैं वे यमराज को नहीं देखते। नर्मदा का दर्शन, गंगा का स्नान और तुलसी वन का संसर्ग – ये तीनों एक समान कहे गये हैं। जो तुलसी की मंजरी से संयुक्त होकर प्राण त्याग करता है वह सैकड़ो पापों से युक्त ही क्यों न हो तो भी यमराज उसकी ओर नहीं देख सकते। तुलसी को छूने से कामिक, वाचिक, मानसिक आदि सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
जो मनुष्य तुलसी दल से भगवान का पूजन करते हैं वह पुन: गर्भ में नहीं आते अर्थात जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाते हैं। तुलसी दल में पुष्कर आदि समस्त तीर्थ, गंगा आदि नदियाँ और विष्णु प्रभृति सभी देवता निवास करते हैं। हे राजन! जो मनुष्य तुलसी के काष्ठ का चन्दन लगाते हैं उन्हें सहज ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है और उन द्वारा किये गये पाप उनके शरीर को छू भी नहीं पाते। जहाँ तुलसी के पौधे की छाया होती है, वहीं पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिसके मुख में, कान में और मस्तक पर तुलसी का पत्ता दिखाई देता है उसके ऊपर यमराज भी दृष्टि नहीं डाल सकते फिर दूतों की तो बात ही क्या है। जो प्रतिदिन आदर पूर्वक तुलसी की महिमा सुनता है वह सब पापों से मुक्त हो ब्रह्मलोक को जाता है।
इसी प्रकार आंवले का महान वृक्ष सभी पापों का नाश करने वाला है। आँवले का वृक्ष भगवान विष्णु को प्रिय है। इसके स्मरण मात्र से ही मनुष्य गोदान का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य कार्तिक में आंवले के वन में भगवान विष्णु की पूजा ततह आँवले की छाया में भोजन करता है उसके भी पाप नष्ट हो जाते हैं। आंवले की छाया में मनुष्य जो भी पुण्य करता है वह कोटि गुना हो जाता है। जो मनुष्य आंवले की छाया के नीचे कार्तिक में ब्राह्मण दम्पत्ति को एक बार भी भोजन देकर स्वयं भोजन करता है वह अन्न दोष से मुक्त हो जाता है। लक्ष्मी प्राप्ति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को सदैव आंवले से स्नान करना चाहिए। नवमी, अमावस्या, सप्तमी, संक्रान्ति, रविवार, चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण के दिन आंवले से स्नान नही करना चाहिए।
जो मनुष्य आंवले की छाया में बैठकर पिण्डदान करता है उसके पितर भगवान विष्णु के प्रसाद से मोक्ष को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य आंवले के फल और तुलसी दल को पानी में मिलाकर स्नान करता है उसे गंगा स्नान का फल मिलता है। जो मनुष्य आंवले के पत्तों और फलों से देवताओं का पूजन करता है उसे स्वर्ण मणि और मोतियों द्वारा पूजन का फल प्राप्त होता है। कार्तिक मास में जब सूर्य तुला राशि में होता है तब सभी तीर्थ, ऋषि, देवता और सभी यज्ञ आंवले के वृक्ष में वास करते हैं। जो मनुष्य द्वादशी तिथि को तुलसी दल और कार्तिक में आंवले की छाया में बैठकर भोजन करता है उसके एक वर्ष तक अन्न-संसर्ग से उत्पन्न हुए पापों का नाश हो जाता है।
जो मनुष्य कार्तिक में आंवले की जड़ में विष्णु जी का पूजन करता है उसे श्री विष्णु क्षेत्रों के पूजन का फल प्राप्त होता है। आंवले और तुलसी की महत्ता का वर्णन करने में श्री ब्रह्मा जी भी समर्थ नहीम है इसलिए धात्री और तुलसी जी की जन्म कथा सुनने से मनुष्य अपने वंश सहित भक्ति को पाता है।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 22

राजा पृथु ने नारद जी से पूछा – हे देवर्षि! कृपया आप अब मुझे यह बताइए कि वृन्दा को मोहित करके विष्णु जी ने क्या किया और फिर वह कहाँ गये?
जब देवता स्तुति कर मौन हो गये तब शंकर जी ने सब देवताओ से कहा – हे ब्रह्मादिक देवताओं! जलन्धर तो मेरा ही अंश था। उसे मैंने तुम्हारे लिए नहीं मारा है, यह मेरी सांसारिक लीला थी, फिर भी आप लोग सत्य कहिए कि इससे आप सुखी हुए या नहीँ?
तब ब्रह्मादिक देवताओं के नेत्र हर्ष से खिल गये और उन्होंने शिवजी को प्रणाम कर विष्णु जी का वह सब वृत्तान्त कह सुनाया जो उन्होंने बड़े प्रयत्न से वृन्दा को मोहित किया था तथा वह अग्नि में प्रवेश कर परमगति को प्राप्त हुई थी। देवताओं ने यह भी कहा कि तभी से वृन्दा की सुन्दरता पर मोहित हुए विष्णु उनकी चिता की राख लपेट इधर-उधर घूमते हैं। अतएव आप उन्हें समझाइए क्योंकि यह सारा चराचर आपके आधीन है।
देवताओं से यह सारा वृत्तान्त सुन शंकर जी ने उन्हें अपनी माया समझाई और कहा कि उसी से मोहित विष्णु भी काम के वश में हो गये हैं। परन्तु महादेवी उमा, त्रिदेवों की जननी सबसे परे वह मूल प्रकृति, परम मनोहर और वही गिरिजा भी कहलाती है। अतएव विष्णु का मोह दूर करने के लिए आप सब उनकी शरण में जाइए। शंकर जी की आज्ञा से सब देवता मूल-प्रकृति को प्रसन्न करने चले। उनके स्थान पर पहुंचकर उनकी बड़ी स्तुति की तब यह आकाशवाणी हुई कि हे देवताओं! मैं ही तीन प्रकार से तीनों गुणों से पृथक होकर स्थित सत्य गुण से गौरा, रजोगुण से लक्ष्मी और तमोगुण से ज्योति रूप हूँ। अतएव अब आप लोग मेरी रक्षा के लिए उन देवियों के पास जाओ तो वे तुम्हारे मनोरथों को पूर्ण कर देगीं।
यह सब सुनकर देवता भगवती के वाक्यों का आदर करते हुए गौरी, लक्ष्मी और सरस्वती को प्रणाम करने लगे। सब देवताओं ने भक्ति पूर्वक उन सब देवियों की प्रार्थना की। उस स्तुक्रमशःति से तीनों देवियाँ प्रकट हो गई। सभी देवताओं ने खुश होकर निवेदन किया तब उन देवियों ने कुछ बीज देकर कहा -इसे ले जाकर बो दो तो तुम्हारे सब कार्य सिद्ध हो जाएंगे। ब्रह्मादिक देवता उन बीजों को लेकर विष्णु जी के पास गये। वृन्दा की चिता-भूमि में डाल दिया। उससे धात्री, मालती और तुलसी प्रकट हुई।
विधात्री के बीज से धात्री, लक्ष्मी के बीज से मालती और गौरी के बीज से तुलसी प्रकट हुई। विष्णु जी ने ज्योंही उन स्त्री रूपवाली वनस्पतियों को देखा तो वे उठ बैठे। कामासक्त चित्त से मोहित हो उनसे याचना करने लगे। धात्री और तुलसी ने उनसे प्रीति की। विष्णु जी सारा दुख भूल देवताओं से नमस्कृत हो अपने लोक बैकुण्ठ में चले। वह पहले की तरह सुखी होकर शंकर जी का स्मरण करने लगे। यह आख्यात शिवजी की भक्ति देने वाला है।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 21

अब ब्रह्मा आदि देवता नतमस्तक होकर भगवान शिव की स्तुति करने लगे। वे बोले – हे देवाधिदेव! आप प्रकृति से परे पारब्रह्म और परमेश्वर हैं, आप निर्गुण, निर्विकार व सबके ईश्वर होकर भी नित्य अनेक प्रकार के कर्मों को करते हैं। हे प्रभु! हम ब्रह्मा आदि समस्त देवता आपके दास हैं। हे शंकर जी! हे देवेश! आप प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिए। हे शिवजी! हम आपकी प्रजा हैं तथा हम सदैव आपकी शरण में रहते हैं।
नारद जी राजा पृथु से बोले – जब इस प्रकार ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं एवं मुनियों ने भगवान शंकर जी की अनेक प्रकार से स्तुति कर के उनके चरण कमलों का ध्यान किया तब भगवान शिव देवताओं को वरदान देकर वहीं अन्तर्ध्यान हो गये। उसके बाद शिवजी का यशोगान करते हुए सभी देवता प्रसन्न होकर अपने-अपने लोक को चले गये।
भगवान शंकर के साथ सागर पुत्र जलन्धर का युद्ध चरित्र पुण्य प्रदान करने वाला तथा समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। यह सभी सुखदायक और शिव को भी आनन्ददायक है। इन दोनों आख्यानों को पढ़ने एवं सुनने वाला सुखों को भोगकर अन्त में अमर पद को प्राप्त करता है।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 20

अब राजा पृथु ने पूछा – हे देवर्षि नारद! इसके बाद युद्ध में क्या हुआ तथा वह दैत्य जलन्धर किस प्रकार मारा गया, कृपया मुझे वह कथा सुनाइए। नारद जी बोले – जब गिरिजा वहां से अदृश्य हो गईं और गन्धर्वी माया भी विलीन हो गई तब भगवान वृषभध्वज चैतन्य हो गये। उन्होंने लौकिकता व्यक्त करते हुए बड़ा क्रोध किया और विस्मितमना जलन्धर से युद्ध करने लगे। जलन्धर शंकर के बाणों को काटने लगा परन्तु जब काट न सका तब उसने उन्हें मोहित करने के लिए माया की पार्वती का निर्माण कर अपने रथ पर बाँध लिया तब अपनी प्रिया पार्वती को इस प्रकार कष्ट में पड़ा देख लौकिक-लीला दिखाते हुए शंकर जी व्याकुल हो गये।
शंकर जी ने भयंकर रौद्र रूप धारण कर लिया। अब उनके रौद्र रूप को देख कोई भी दैत्य उनके सामने खड़ा होने में समर्थ न हो सका और सब भागने-छिपने लगे। यहाँ तक कि शुम्भ-निशुम्भ भी समर्थ न हो सके। शिवजी ने उन शुम्भ-निशुम्भ को शाप देकर बड़ा धिक्कारा और कहा – तुम दोनो ने मेरा बड़ा अपराध किया है। तुम युद्ध से भागते हो, भागते को मारना पाप है। इससे मैं तुम्हें अब नहीं मारूंगा परन्तु गौरी तुमको अवश्य मारेगी।
शिवजी के ऎसा कहने पर सागर पुत्र जलन्धर क्रोध से अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा। उसने शिवजी पर घोर बाण बरसाकर धरती पर अन्धकार कर दिया तब उस दैत्य की ऎसी चेष्टा देखकर शंकर जी बड़े क्रोधित हुए तथा उन्होंने अपने चरणांगुष्ठ से बनाये हुए सुदर्शन चक्र को चलाकर उसका सिर काट लिया। एक प्रचण्ड शब्द के साथ उसका सिर पृथ्वी पर गिर पड़ा और अंजन पर्वत के समान उसके शरीर के दो खण्ड हो गये। उसके रुधिर से संग्राम-भूमि व्याप्त हो गई।
शिवाज्ञा से उसका रक्त और मांस महारौरव में जाकर रक्त का कुण्ड हो गया तथा उसके शरीर का तेज निकलकर शंकर जी में वैसे ही प्रवेश कर गया जैसे वृन्दा का तेज गौरी के शरीर में प्रविष्ट हुआ था। जलन्धर को मरा देख देवता और सब गन्धर्व प्रसन्न हो गये।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 19

राजा पृथु ने पूछा – हे नारद जी! अब आप यह कहिए कि भगवान विष्णु ने वहाँ जाकर क्या किया तथा जलन्धर की पत्नी का पतिव्रत किस प्रकार भ्रष्ट हुआ?
नारद जी बोले – जलन्धर के नगर में जाकर विष्णु जी ने उसकी पतिव्रता स्त्री वृन्दा का पतिव्रत भंग करने का विचार किया। वे उसके नगर के उद्यान में जाकर ठहर गये और रात में उसको स्वप्न दिया।
वह भगवान विष्णु की माया और विचित्र कार्यपद्धति थी और उसकी माया द्वारा जब वृन्दा ने रात में वह स्वप्न देखा कि उसका पति नग्न होकर सिर पर तेल लगाये महिष पर चढ़ा है। वह काले रंग के फूलों की माला पहने हुए है तथा उसके चारों हिंसक जीव हैं। वह सिर मुड़ाए हुए अन्धकार में दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। उसने नगर को अपने साथ समुद्र में डूबा हुआ इत्यादि बहुत से स्वप्न देखे। तत्काल ही वह स्वप्न का विचार करने लगी। इतने में उसने सूर्यदेव को उदय होते हुए देखा तो सूर्य में उसे एक छिद्र दिखाई दिया तथा वह कान्तिहीन था।
इसे उसने अनिष्ट जाना और वह भयभीत हो रोती हुई छज्जे, अटारी तथा भूमि कहीं भी शान्ति को प्राप्त न हुई फिर अपनी दो सखियों के साथ उपवन में गई वहाँ भी उसे शान्ति नहीं मिली। फिर वह जंगल में में निकल गई वहाँ उसने सिंह के समान दो भयंकर राक्षसों को देखा, जिससे वह भयभीत हो भागने लगी। उसी क्षण उसके समक्ष अपने शिष्यों सहित शान्त मौनी तपस्वी वहाँ आ गया। भयभीत वृन्द उसके गले में अपना हाथ डाल उससे रक्षा की याचना करने लगी। मुनि ने अपनी एक ही हुंकार से उन राक्षसों को भगा दिया।
वृन्दा को आश्चर्य हुआ तथा वह भय से मुक्त हो मुनिनाथ को हाथ जोड़ प्रणाम करने लगी। फिर उसने मुनि से अपने पति के संबंध में उसकी कुशल क्षेम का प्रश्न किया। उसी समय दो वानर मुनि के समक्ष आकर हाथ जोड़ खड़े हो गये और ज्योंही मुनि ने भृकुटि संकेत किया त्योंही वे उड़कर आकाश मार्ग से चले गये। फिर जलन्धर का सिर और धड़ लिये मुनि के आगे आ गये तब अपने पति को मृत हुआ जान वृन्दा मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी और अनेक प्रकार से दारुण विलाप करने लगी। पश्चात उस मुनि से कहा – हे कृपानिधे! आप मेरे इस पति को जीवित कर दीजिए। पतिव्रता दैत्य पत्नी ऎसा कहकर दुखी श्वासों को छोड़कर मुनीश्वर के चरणों पर गिर पड़ी।
तब मुनीश्वर ने कहा – यह शिवजी द्वारा युद्ध में मारा गया है, जीवित नहीं हो सकता क्योंकि जिसे भगवान शिव मार देते हैं वह कभी जीवित नहीं हो सकता परन्तु शरणागत की रक्षा करना सनतन धर्म है, इसी कारण कृपाकर मैं इसे जिलाए देता हूँ।
नारद जी ने आगे कहा – वह मुनि साक्षात विष्णु ही थे जिन्होंने यह सब माया फैला रखी थी। वह वृन्दा के पति को जीवित कर के अन्तर्ध्यान हो गये। जलन्धर ने उठकर वृन्दा को आलिंगन किया और मुख चूमा। वृन्दा भी पति को जीवित हुआ देख अत्यन्त हर्षित हुई और अब तक हुई बातों को स्वप्न समझा। तत्पश्चात वृन्दा सकाम हो बहुत दिनों तक अपने पति के साथ विहार करती रही। एक बार सुरत एवं सम्भोग काल के अन्त में उन्हीं विष्णु को देखकर उन्हें ताड़ित करती हुई बोली – हे पराई स्त्री से गमन करने वाले विष्णु! तुम्हारे शील को धिक्कार है। मैंने जान लिया है कि मायावी तपस्वी तुम्हीं थे।
इस प्रकार कहकर कुपित पतिव्रता वृन्दा ने अपने तेज को प्रकट करते हुए भगवान विष्णु को शाप दिया – तुमने माया से दो राक्षस मुझे दिखाए थे वही दोनों राक्षस किसी समय तुम्हारी स्त्री ला हरण करेगें। सर्पेश्वर जो तुम्हारा शिष्य बना है, यह भी तुम्हारा साथी रहेगा जब तुम अपनी स्त्री के विरह में दुखी होकर विचरोगे उस समय वानर ही तुम्हारी सहायता करेगें।
ऎसा कहती हुई पतिव्रता वृन्दा अग्नि में प्रवेश कर गई। ब्रह्मा आदि देवता आकाश से उसका प्रवेश देखते रहे। वृन्दा के शरीर का तेज पार्वती जी के शरीर में चला गया। पतिव्रत के प्रभाव से वृन्दा ने मुक्ति प्राप्त की।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 18

अब रौद्र रूप महाप्रभु शंकर नन्दी पर चढ़कर युद्धभूमि में आये। उनको आया देख कर उनके पराजित गण फिर लौट आये और सिंहनाद करते हुए आयुद्धों से दैत्यों पर प्रहार करने लगे। भीषण रूपधारी रूद्र को देख दैत्य भागने लगे तब जलन्धर हजारों बाण छोड़ता हुआ शंकर की ओर दौडा़। उसके शुम्भ निशुम्भ आदि वीर भी शंकर जी की ओर दौड़े। इतने में शंकर जी ने जलन्धर के सब बाण जालों को काट अपने अन्य बाणों की आंधी से दैत्यों को अपने फरसे से मार डाला।
खड़गोरमा नामक दैत्य को अपने फरसे से मार डाला और बलाहक का भी सिर काट दिया। घस्मर भी मारा गया और शिवगण चिशि ने प्रचण्ड नामक दैत्य का सिर काट डाला। किसी को शिवजी के बैल ने मारा और कई उनके बाणों द्वारा मारे गये। यह देख जलन्धर अपने शुम्भादिक दैत्यों को धिक्कारने और भयभीतों को धैर्य देने लगा। पर किसी प्रकार भी उसके भय ग्रस्त दैत्य युद्ध को न आते थे जब दैत्य सेना पलायन आरंभ कर दिया, तब महा क्रुद्ध जलन्धर ने शिवजी को ललकारा और सत्तर बाण मारकर शिवजी को दग्ध कर दिया।
शिवजी उसके बाणों को काटते रहे। यहां तक कि उन्होंने जलन्धर की ध्वजा, छत्र और धनुष को काट दिया। फिर सात बाण से उसके शरीर में भी तीव्र आघात पहुंचाया। धनुष के कट जाने से जलन्धर ने गदा उठायी। शिवजी ने उसकी गदा के टुकड़े कर दिये तब उसने समझा कि शंकर मुझसे अधिक बलवान हैं। अतएव उसने गन्धर्व माया उत्पन्न कर दी अनेक गन्धर्व अप्सराओं के गण पैदा हो गये, वीणा और मृदंग आदि बाजों के साथ नृत्य व गान होने लगा। इससे अपने गणों सहित रूद्र भी मोहित हो एकाग्र हो गये। उन्होंने युद्ध बंद कर दिया।
फिर तो काम मोहित जलन्धर बडी़ शीघ्रता से शंकर का रूप धारण कर वृषभ पर बैठकर पार्वती के पास पहुंचा उधर जब पार्वती ने अपने पति को आते देखा, तो अपनी सखियों का साथ छोड़ दिया और आगे आयी। उन्हें देख कामातुर जलन्धर का वीर्यपात हो गया और उसके पवन से वह जड़ भी हो गया। गौरी ने उसे दानव समझा वह अन्तर्धान हो उत्तर की मानस पर चली गयीं तब पार्वती ने विष्णु जी को बुलाकर दैत्यधन का वह कृत्य कहा और यह प्रश्न किया कि क्या आप इससे अवगत हैं।
भगवान विष्णु ने उत्तर दिया – आपकी कृपा से मुझे सब ज्ञात है। हे माता! आप जो भी आज्ञा करेंगी, मै उसका पालन करूंगा।
जगतमाता ने विष्णु जी से कहा – उस दैत्य ने जो मार्ग खोला है उसका अनुसरण उचित है, मै तुम्हें आज्ञा देती हूं कि उसकी पत्नी का पतिव्रत भ्रष्ट करो, वह दैत्य तभी मरेगा।
पार्वती जी की आज्ञा पाते ही विष्णु जी उसको शिरोधार्य कर छल करने के लिए जलन्धर के नगर की ओर गये।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 17

उस समय शिवजी के गण प्रबल थे और उन्होंने जलन्धर के शुम्भ-निशुम्भ और महासुर कालनेमि आदि को पराजित कर दिया। यह देख कर सागर पुत्र जलंधर एक विशाल रथ पर चढ़कर – जिस पर लम्बी पताका लगी हुई थी – युद्धभूमि में आया। इधर जय और शील नामक शंकर जी के गण भी युद्ध में तत्पर होकर गर्जने लगे। इस प्रकार दोनो सेनाओं के हाथी, घोड़े, शंख, भेरी और दोनों ओर के सिंहनाद से धरती त्रस्त हो गयी।
जलंधर ने कुहरे के समान असंख्य बाणों को फेंक कर पृथ्वी से आकाश तक व्याप्त कर दिया और नंदी को पांच, गणेश को पांच, वीरभद्र को एक साथ ही बीस बाण मारकर उनके शरीर को छेद दिया और मेघ के समान गर्जना करने लगा। यह देख कार्तिकेय ने भी दैत्य जलन्धर को अपनी शक्ति उठाकर मारी और घोर गर्जन किया, जिसके आघात से वह मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। परन्तु वह शीघ्र ही उठा पडा़ और क्रोधा विष्ट हो कार्तिकेय पर अपनी गदा से प्रहार करने लगा।
ब्रह्मा जी के वरदान की सफलता के लिए शंकर पुत्र कार्तिकेय पृथ्वी पर सो गये। गणेश जी भी गदा के प्रहार से व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़े। नंदी व्याकुल हो गदा प्रहार से पृथ्वी पर गिर गये। फिर दैत्य ने हाथ में परिध ले शीघ्र ही वीरभद्र को पृथ्वी पर गिरा देख शंकर जी गण चिल्लाते हुए संग्राम भूमि छोड़ बड़े वेग से भाग चले। वे भागे हुए गण शीघ्र ही शिवजी के पास आ गये और व्याकुलता से युद्ध का सब समाचार कह सुनाया। लीलाधारी भगवान ने उन्हें अभय दे सबका सन्तोषवर्द्धन किया।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 16

राजा पृथु ने कहा – हे नारद जी! ये तो आपने भगवान शिव की बडी़ विचित्र कथा सुनाई है। अब कृपा करके आप यह बताइये कि उस समय राहु उस पुरूष से छूटकर कहां गया ?
नारद जी बोले उससे छूटने पर वह दूत बर्बर नाम से विख्यात हो गया और अपना नया जन्म पाकर वह धीरे-धीरे जलन्धर के पास गया। वहां जाकर उसने शंकर की सब चेष्टा कही। उसे सुनकर दैत्यराज ने सब दैत्यों को सेना द्वारा आज्ञा दी। कालनेमि और शुम्भ-निशुम्भ आदि सभी महाबली दैत्य तैयार होने लगे। एक से एक महाबली दैत्य करोडों – करोडों की संख्या में निकल युद्ध के लिए जुट पड़े। महा प्रतापी सिन्धु पुत्र शिवजी से युद्ध करने के लिए निकल पड़ा। आकाश में मेघ छा गये और बहुत अपशकुन होने लगे। शुक्राचार्य और कटे सिर वाला राहु सामने आ गये। उसी समय जलंधर का मुकुट खिसक गया, परंतु वह नहीं रूका।
उधर इन्द्रादिक सब देवताओं ने कैलाश पर शिवजी के पास पहुंच कर सब वृतांत सुनाया और यह भी कहा कि आपने जलंधर से युद्ध करने के लिए भगवान विष्णु को भेजा था। वह उसके वशवर्ती हो गये हैं और विष्णु जी लक्ष्मी सहित जलंधर के अधीन हो उनके घर में निवास करते हैं। अब देवताओं को भी वहीं रहना पड़ता है। अब वह बली सागर पुत्र आपसे युद्ध करने आ रहा है। अतएव आप उसे मारकर हम सबकी रक्षा कीजिये।
यह सुनकर शंकरजी ने विष्णु जी को बुलाकर पूछा हे ऋषिकेश! युद्ध में आपने जलंधर का संहार क्यों नहीं किया और बैकुण्ठ छोड़ आप उसके घर में कैसे चले गये?
यह सुन कर विष्णु जी ने हाथ जोड़ कर नम्रतापूर्वक भगवान शंकर से कहा – उसे आपका अंशी ओर लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण ही मैने नहीं मारा है। यह बड़ा वीर और देवताओं से अजय है। इसी पर मुग्ध होकर मैं उसके घर में निवास करने लगा हूं।
विष्णु जी के इन वचनों को सुनकर शंकर जी हंस पड़े उन्होंने कहा – हे विष्णु! आप यह क्या कहते हैं! मैं उस दैत्य जलंधर को अवश्य मारूंगा अब आप सभी देवता जलंधर को मेरे द्वारा ही मारा गया जान अपने स्थान को जाइये।
जब शंकर जी ने ऎसा कहा तो सब देवता सन्देह रहित होकर अपने स्थान को चले गये। इसी समय पराक्रमी जलंधर अपनी विशाल सेना के साथ पर्वत के समीप आ कैलाश को घोर सिंहनाद करने लगा। दैत्यों के नाद और कोलाहल को सुनकर शिवजी ने नंदी आदि गणों को उससे युद्ध करने की आज्ञा प्रदान की, कैलाश के समीप भीषण युद्ध होने लगा। दैत्य अनेकों प्रकार के अस्त्र शस्त्र बरसाने लगे, भेरि, मृदंग, शंख और वीरों तथा हाथी, घोडों और रथों के शब्दों से शाब्दित हो पृथ्वी कांपने लगी। युद्ध में कटकर मरे हुए हाथी, घोड़े और पैदलों का पहाड़ लग गया। रक्त-मांस का कीचड़ उत्पन्न हो गया। दैत्यों के आचार्य शुक्रजी अपनी मृत संजीवनी विद्या से सब दैत्यों को जिलाने लगे। यह देखकर शिव जी के गण व्याकुल हो गये और उनके पास जाकर सारा वृतांत सुनाया, उसे सुनकर भगवान रूद्र के क्रोध की सीमा न रही। फिर तो उस समय उनके मुख से एक बड़ी भयंकर कृत्या उत्पन्न हुई, जिसकी दोनों जंघाएं तालवृक्ष के समान थीं । वह युद्ध भूमि में जा सब असुरों का चवर्ण करने लग गयी और फिर वह शुक्राचार्य के समीप पहुंची और शीघ्र ही अपनी योनी में गुप्त कर लिया फिर स्वयं भी अन्तर्धान हो गयी।
शुक्राचार्य के गुप्त हो जाने से दैत्यों का मुख मलिन पड़ गया और वे युद्धभूमि को छोड़ भागे इस पर शुम्भ निशुम्भ और कालनेमि आदि सेनापतियों ने अपने भागते हुए वीरों को रोका। शिवजी के नन्दी आदि गणों ने भी – जिसमें गणेश और स्वामी कार्तिकेयजी भी थे – दैत्यों से भीष्ण युद्ध करना आरंभ कर दिया।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 15

राजा पृथु ने नारद जी से पूछा – हे मुनिश्रेष्ठ! तब दैत्यराज ने क्या किया? वह सब मुझे विस्तार से सुनाइए।
नारद जी बोले – मेरे (नारद जी के) के चले जाने के बाद जलन्धर ने अपने राहु नामक दूत को बुलाकर आज्ञा दी कि कैलाश पर एक जटाधारी शम्भु योगी रहता है उससे उसकी सर्वांग सुन्दरी भार्या को मेरे लिए माँग लाओ।
तब दूत शिव के स्थान में पहुंचा परन्तु नन्दी ने उसे भीतर सभा में जाने से रोक दिया। किन्तु वह अपनी उग्रता से शिव की सभा में चला ही गया और शिव के आगे बैठकर दैत्यराज का सन्देश कह सुनाया। उस राहु नामक दूत के ऎसा कहते ही भगवान शूलपानि के आगे पृथ्वी फोड़कर एक भयंकर शब्दवाला पुरुष प्रकट हो गया जिसका सिंह के समान मुख था। वह नृसिंह ही राहु को खाने चला। राहु बड़े जोर से भागा परन्तु उस पुरुष ने उसे पकड़ लिया। उसने शिवजी की शरण ले अपनी रक्षा माँगी। शिवजी ने उस पुरुष से राहु को छोड़ देने को कहा परन्तु उसने कहा मुझे बड़ी जोर की भूख लगी है, मैं क्या खाऊँ?
महेश्वर ने कहा – यदि तुझे भूख लगी है तो शीघ्र ही अपने हाथ और पैरों का माँस भक्षण कर ले और उसने वैसा ही किया। अब केवल उसका सिर शेष मात्र रह गया तब उसका ऎसा कृत्य देख शिवजी ने प्रसन्न हो उसे अपना आज्ञापालक जान अपना परम प्रिय गण बना लिया। उस दिन से वह शिव जी के द्वार पर ‘स्वकीर्तिमुख’ नामक गण होकर रहने लगा।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 14

तब उसको इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते हुए देख देवता क्षुब्ध हो गये। उन्होंणे देवाधिदेव शंकर का मन में स्मरण करना आरंभ किया तब भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले शंकर ने नारद जी को बुलाकर देव कार्य की इच्छा से उनको वहाँ भेजा। शम्भु भक्त नारद शिव की आज्ञा से देवपुरी में गये। इन्द्रादिक सभी देवता व्याकुल हो शीघ्रता से उठ नारद जी को उत्कंठा भरी दृष्टि से देखने लगे। अपने सब दुखों को कहकर उन्हें नष्ट करने की प्रार्थना की तब नारद जी ने कहा – मैं सब कुछ जानता हूँ इसलिए अब मैं दैत्यराज जलन्धर के पास जा रहा हूँ। ऎसा कह नारद जी देवताओं को आश्वासित कर जलन्धर की सभा में आये। जलन्धर ने नारद जी के चरणों की पूजा कर हँसते हुए कहा – हे ब्रह्मन! कहिए, आप कहाँ से आ रहे हैं? यहाँ कैसे आये हैं? मेरे योग्य जो सेवा हो उसकी आज्ञा दीजिए।
नारद जी प्रसन्न होकर बोले – हे महाबुद्धिमान जलन्धर! तुम धन्य हो, मैं स्वेच्छा से कैलाश पर्वत पर गया था, जहाँ दश हजार योजनों में कल्पवृक्ष का वन है। वहाँ मैंने सैकड़ो कामधेनुओं को विचरते हुए देखा तथा यह भी देखा कि वह चिन्तामणि से प्रकाशित परम दिव्य अद्भुत और सब कुछ सुवर्णमय है। मैंने वहाँ पार्वती के साथ स्थित शंकर जी को भी देखा जो सर्वांग सुन्दर, गौर वर्ण, त्रिनेत्र और मस्तक पर चन्द्रमा धारण किये हुए है। उन्हें देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इनके समान समृद्धिशाली त्रिलोकी में कोई है या नहीं? हे दैत्येन्द्र! उसी समय मुझे तुम्हारी समृद्धि का स्मरण हो आया और उसे देखने की इच्छा से ही मैं तुम्हारे पास चला आया हूँ।
यह सुन जलन्धर को बड़ा हर्ष हुआ। उसने नारद जी को अपनी सब समृद्धि दिखला दी। उसे देख नारद ने जलन्धर की बड़ी प्रशंसा की और कहा कि निश्चय ही तुम त्रिलोकपति होने के योग्य थे। ब्रह्माजी का हंसयुक्त विमान तुम ले आये हो और द्युलोक, पाताल और पृथ्वी पर जितने भी रत्नादि हैं सब तुम्हारे ही तो हैं। ऎरावत, उच्चै:श्रवा घोड़ा, कल्पवृक्ष और कुबेर की निधि भी तुम्हारे पास है। मणियों और रत्नों के ढेर भी तुम्हारे पास लगे हुए हैं। इससे मैं बड़ा प्रसन्न हूँ परन्तु तुम्हारे पास कोई स्त्री-रत्न नहीं है। उसके बिना तुम्हारा यह सब फीका है। तुम किसी स्त्री-रत्न को ग्रहण करो।
नारद जी के ऎसे वचन सुनकर दैत्यराज काम से व्याकुल हो गया। उसने नारद जी को प्रणाम कर पूछा कि ऎसी स्त्री कहाँ मिलेगी जो सब रत्नों में श्रेष्ठ हो।
नारद जी ने कहा – ऎसा रत्न तो कैलाश पर्वत में योगी शंकर के ही पास है। उनकी सर्वांग सुन्दरी पत्नी देवी पार्वती बहुत ही मनोहर हैं। उनके समान सुन्दरी मैं किसी को नहीं देखता। उनके उस रत्न की उपमा तीनों लोकों में कहीं नहीं है। देवर्षी उस दैत्य से ऎसा कहकर देव कार्य करने की इच्छा से आकाश मार्ग से चले गये।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 13

दोनो ओर से गदाओं, बाणों और शूलों आदि का भीषण प्रहार हुआ। दैत्यों के तीक्ष्ण प्रहारों से व्याकुल देवता इधर-उधर भागने लगे तब देवताओं को इस प्रकार भयभीत हुआ देख गरुड़ पर चढ़े भगवान युद्ध में आगे बढ़े और उन्होंने अपना सारंग नामक धनुष उठाकर बड़े जोर का टंकार किया। त्रिलोकी शाब्दित हो गई। पलमात्र में भगवान ने हजारों दैत्यों के सिरों को काट गिराया फिर तो विष्णु और जलन्धर का महासंग्राम हुआ। बाणों से आकाश भर गया। लोक आश्चर्य करने लगे।
भगवान विष्णु ने बाणों के वेग से उस दैत्य की ध्वजा, छत्र और धनुष-बाण काट डाले। इससे व्यथित हो उसने अपनी गदा उठाकर गरुड़ के मस्तक पर दे मारी। साथ ही क्रोध से उस दैत्य ने विष्णु जी की छाती में भी एक तीक्ष्ण बाण मारा। इसके उत्तर में विष्णु जी ने उसकी गदा काट दी और अपने शारंग धनुष पर बाण चढ़ाकर उसको बींधना आरंभ किया। इस पर जलन्धर इन पर अपने पैने बाण बरसाने लगा। उसने विष्णु जी को कई पैने बाण मारकर वैष्णव धनुष को काट दिया। धनुष कट जाने पर भगवान ने गदा ग्रहण कर ली और शीघ्र ही जलन्धर को खींचकर मारी, परन्तु उस अग्निवत अमोघ गदा की मार से भी वह दैत्य कुछ भी चलायमान न हुआ। उसने एक अग्निमुख त्रिशूल उठाकर विष्णु पर छोड़ दिया।
विष्णु जी ने शिव के चरणों का स्मरण कर नन्दन नामक त्रिशूल से उसके त्रिशूल को छेद दिया। जलन्धर ने झपटकर विष्णु जी की छाती पर एक जोर का मुष्टिक मारा, उसके उत्तर में भगवान विष्णु ने भी उसकी छाती पर अपनी एक मुष्टि का प्रहार किया। फिर दोनों घुटने टेक बाहुओं और मुष्टिको से बाहु-युद्ध करने लगे। कितनी ही देर तक भगवान उसके साथ युद्ध करते रहे तब सर्वश्रेष्ठ मायावी भगवान उस दैत्यराज से मेघवाणी में बोले – रे रण दुर्मद दैत्यश्रेष्ठ! तू धन्य है जो इस महायुद्ध में इन बड़े-बड़े आयुधों से भी भयभीत न हुआ। तेरे इस युद्ध से मैं प्रसन्न हूँ, तू जो चाहे वर माँग।
मायावी विष्णु की ऎसी वाणी सुनकर जलन्धर ने कहा – हे भावुक! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो यह वर दीजिए कि आप मेरी बहन तथा अपने सारे कुटुम्बियों सहित मेरे घर पर निवास करें।
नारद जी बोले – उसके ऎसे वचन सुनकर विष्णु जी को खेद तो हुआ किन्तु उसी क्षण देवेश ने तथास्तु कह दिया। अब विष्णु जी सब देवताओं के साथ जलन्धरपुर में जाकर निवास करने लगे। जलन्धर अपनी बहन लक्ष्मी और देवताओं सहित विष्णु को वहाँ पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ फिर तो देवताओं के पास जो भी रत्नादि थे सबको ले जलन्धर पृथ्वी पर आया। निशुम्भ को पाताल में स्थापित कर दिया और देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध, सर्प, राक्षस, मनुष्य आदि सबको अपना वंशवर्ती बना त्रिभुवन पर शासन करने लगा। उसने धर्मानुसार सुपुत्रों के समान प्रजा का पालन किया। उसके धर्मराज्य में सभी सुखी थे।

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 12

नारद जी ने कहा – तब इन्द्रादिक देवता वहाँ से भय-कम्पित होकर भागते-भागते बैकुण्ठ में विष्णु जी के पास पहुंचे। देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए उनकी स्तुति की। देवताओं की उस दीन वाणी को सुनकर करुणा सागर भगवान विष्णु ने उनसे कहा कि हे देवताओं! तुम भय को त्याग दो। मैं युद्ध में शीघ्र ही जलन्धर को देखूंगा।

ऎसा कहते ही भगवान गरुड़ पर जा बैठे तब सनुद्र-तनया लक्ष्मी जी ने कहा कि हे नाथ! यदि मैं सर्वदा आपकी प्रिया और भक्ता हूँ तो मेरा भाई आप द्वारा युद्ध में नहीं मारा जाना चाहिए।
          इस पर विष्णु जी ने कहा – अच्छा, यदि तुम्हारी ऎसी ही प्रीति है तो मैं उसे अपने हाथों से नहीं मारूंगा परन्तु युद्ध में अवश्य जाऊँगा क्योंकि देवताओं ने मेरी बड़ी स्तुति की है।
          ऎसा कह भगवान विष्णु युद्ध के उस स्थान में जा पहुंचे जहाँ जलन्धर विद्यमान था। जलन्धर और विष्णु का घोर युद्ध हुआ। विष्णु के तेज से कम्पित देवता सिंहनाद करने लगे फिर तो अरुण के अनुज गरुड़ के पंखों की प्रबल वायु से पीड़ित हो दैत्य इस प्रकार घूमने लगे जैसे आँधी से बादल आकाश में घूमते हैं तब अपने वीर दैत्यों को पीड़ित होते देखकर जलन्धर ने क्रुद्ध हो विष्णु जी को उद्धत वचन कहकर उन पर कठोर आक्रमण कर दिया।
                     

Posted on

कार्तिक माहात्म्य – 11

एक बार सागर पुत्र जलन्धर अपनी पत्नी वृन्दा सहित असुरों से सम्मानित हुआ सभा में बैठा था तभी गुरु शुक्राचार्य का वहाँ आगमन हुआ। उनके तेज से सभी दिशाएँ प्रकाशित हो गई। गुरु शुक्राचार्य को आता देखकर सागर पुत्र जलन्धर ने असुरों सहित उठकर बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया। गुरु शुक्राचार्य ने उन सबको आशीर्वाद दिया। फिर जलन्धर ने उन्हें एक दिव्य आसन पर बैठाकर स्वयं भी आसन ग्रहण किया फिर सागर पुत्र जलन्धर ने उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा – हे गुरुजी! आप हमें यह बताने की कृपा करें कि राहु का सिर किसने काटा था?
इस पर दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने विरोचन पुत्र हिरण्यकश्यपु और उसके धर्मात्मा पौत्र का परिचय देकर देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन की कथा संक्षेप में सुनाते हुए बताया कि जब समुद्र से अमृत निकला तो उस समय देवरूप बनाकर राहु भी पीने बैठ गया। इस पर इन्द्र के पक्षपाती भगवान विष्णु ने राहु का सिर काट डाला।

अपने गुरु के मुख से इस प्रकार के वचन सुनकर जलन्धर के क्रोध की सीमा न रही, उसके नेत्र लाल हो गये फिर उसने अपने धस्मर नामक दूत को बुलाया और उसे शुक्राचार्य द्वारा सुनाया गया वृत्तान्त सुनाया। तत्पशचत उसने धस्मर को आज्ञा दी कि तुम शीघ्र ही इन्द्रपुरी में जाकर इन्द्र को मेरी शरण में लाओ।

धस्मर जलन्धर का बहुत आज्ञाकारी एवं निपुण दूत था। वह जल्द ही इन्द्र की सुधर्मा नामक सभा में जा पहुंचा और जलन्धर के शब्दों में इन्द्र से बोला – हे देवताधाम! तुमने समुद्र का मन्थन क्यों किया और मेरे पिता के समस्त रत्नों को क्यों ले लिया? ऎसा कर के तुमने अच्छा नहीं किया। यदि तू अपना भला चाहता है तो उन सब रत्नों एवं देवताओं सहित मेरी शरण में आ जा अन्यथा मैं तेरे राज्य का ध्वंस कर दूंगा, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है।

इन्द्र बहुत विस्मित हुआ और कहने लगा – पहले मेरे भय से सागर ने सब पर्वतों को अपनी कुक्षि में क्यों स्थान दिया और उसने मेरे शत्रु दैत्यों की क्यों रक्षा की? इसी कारण मैंने उनके सब रत्न हरण किये हैं। मेरा द्रोही सुखी नहीं रह सकता, इसमें सन्देह नहीं।
इन्द्र की ऎसी बात सुनकर वह दूत शीघ्र ही जलन्धर के पास आया और सब बातें कह सुनाई। उसे सुनते ही वह दैत्य मारे क्रोध के अपने ओष्ठ फड़फड़ाने लगा और देवताओं पर विजय प्राप्त करने के लिए उसने उद्योग आरम्भ किया फिर तो सब दिशाओं, पाताल से करोड़ो-2 दैत्य उसके पास आने लगे। शुम्भ-निशुम्भ आदि करोड़ो सेनापतियों के साथ जलन्धर इन्द्र से युद्ध करने लगा। शीघ्र ही इन्द्र के नन्दन वन में उसने अपनी सेना उतार दी। वीरों की शंखध्वनि और गर्जना से इन्द्रपुरी गूंज उठी। अमरावती छोड़ देवता उससे युद्ध करने चले। भयानक मारकाट हुई। असुरों के गुरु आचार्य शुक्र अपनी मृत संजीवनी विद्या से और देवगुरु बृहस्पति द्रोणागिरि से औषधि लाकर जिलाते रहे।

इस पर जलन्धर ने क्रुद्ध होकर कहा कि मेरे हाथ से मरे हुए देवता जी कैसे जाते हैं? जिलाने वाली विद्या तो आपके पास है।

इस पर शुक्राचार्य ने देवगुरु द्वारा द्रोणाचार्य से औषधि लाकर देवताओं को जिलाने की बात कह दी। यह सुनकर जलन्धर और भी कुपित हो गया फिर शुक्राचार्य जी ने कहा – यदि शक्ति हो तो द्रोणागिरि को उखाड़कर समुद्र में फेंक दो तब मेरे कथन की सत्यता प्रमाणित हो जाएगी। इस पर जलन्धर कुपित होकर जल्द ही द्रोनागिरि पर्वत के पास पहुंचा और अपनी भुजाओं से पकड़कर द्रोणागिरि पर्वत को उखाड़कर समुद्र में फेंक दिया। यह तो भगवान शंकर का तेज था इसमें जलन्धर की कोई विचित्रता नहीं थी।

तत्पश्चात यह सागर पुत्र युद्धभूमि में आकर बड़े तीव्र गति से देवताओं का संहार करने लगा। जब द्रोनाचार्य जी औषधि लेने गये तो द्रोणाचल को उखड़ा हुआ शून्य पाया। वह भयभीत हो देवताओं के पास आये और कहा कि युद्ध बन्द कर दो। जलन्धर को अब नहीं जीत सकोगे।

पहले इन्द्र ने शिवजी का अपमान किया था, यह सुन सेवता युद्ध में जय की आशा त्याग कर इधर-उधर भाग गये। सिन्धु-सुत निर्भय हो अमरावती में घुस गया, इन्द्र आदि सब देवताओं ने गुफाओं में शरण ली।