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राधा ❤️ कृष्ण ❤️ कृष्ण ❤️ राधा

एक बार राधाजी के मन में कृष्ण दर्शन की बड़ी लालसा थी, ये सोचकर महलन की अटारी पर चढ़ गईं और खिडकी से बाहर देखने लगीं कि शायद श्यामसुन्दर यहीं से आज गईया लेकर निकलें। (अब हमारी प्यारी जू के ह्रदय में कोई बात आये और लाला उसे पूरा न करें ऐसा तो हो ही नहीं सकता।)

जब राधा रानी जी के मन के भाव श्याम सुन्दर ने जाने तो आज उन्होंने सोचा क्या क्यों न साकरीखोर से (जो कि लाडली जी के महलन से होकर जाता है) होते हुए जाएँ, अब यहाँ महलन की अटारी पे लाडली जी खड़ी थीं। तब उनकी मईया कीर्ति रानी उनके पास आईं और बोली- “अरी राधा बेटी ! देख अब तू बड़ी है गई है, कल को दूसरे घर ब्याह के जायेगी, तो सासरे वारे काह कहेंगे, जा लाली से तो कछु नाय बने है, बेटी कुछ नहीं तो दही बिलोना तो सीख ले।” अब लाडली जी ने जब सुना तो अब अटारी से उतरकर दही बिलोने बैठ गईं, पर चित्त तो प्यारे में लगा है। लाडली जी खाली मथानी चला रही हैं, घड़े में दही नहीं है इस बात का उन्हें ध्यान ही नहीं है, बस बिलोती जा रही हैं। उधर श्याम सुन्दर नख से शिख तक राधारानी के इस रूप का दर्शन कर रहे हैं, बिल्वमंगल जी ने इस झाँकी का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है।

लाला गईया चराके लौट तो आये हैं पर लाला भी प्यारी जू के ध्यान में खोये हुए हैं, और उनका मुखकमल पके हुए बेर के समान पीला हो गया है। पीला इसलिए हो गया है, क्योंकि राधा रानी गोरी हैं और उनके श्रीअंग की काँति सुवर्ण के समान है, इसलिए उनका ध्यान करते-करते लाला का मुख भी उनके ही समान पीला हो गया है।

इधर जब एक सखी ने देखा कि राधा जी ऐसे दही बिलो रही हैं, तो वह झट कीर्ति मईया के पास गई और बोली मईया जरा देखो, राधा बिना दही के माखन निकाल रही है, अब कीर्ति जी ने जैसे ही देखा तो क्या देखती हैं, श्रीजी का वैभव देखो, मटकी के ऊपर माखन प्रकट है। सच है लाडली जी क्या नहीं कर सकतीं, उनके के लिए फिर बिना दही के माखन निकलना कौन सी बड़ी बात है।

इधर लाला भी खोये हुए है नन्द बाबा बोले लाला- जाकर गईया को दुह लो। अब लाला पैर बाँधने की रस्सी लेकर गौ शाला की ओर चले है, गईया के पास तो नहीं गए वृषभ (सांड) के पास जाकर उसके पैर बाँध दिए और दोहनी लगाकर दूध दुहने लगे।

अब बाबा ने जब देखा तो बाबा का तो वात्सल्य भाव है बाबा बोले- देखो मेरो लाला कितनो भोरो है, इत्ते दिना गईया चराते है गए, पर जा कू इत्तो भी नाय पता है, कि गौ को दुहो जात है कि वृषभ को, मेरो लाल बडो भोरो है। और जब बाबा ने पास आकर देखा तो दोहनी दूध से लबालब भरी है, बाबा देखते ही रह गए, सच है हमारे लाला क्या नहीं कर सकते, वे चाहे गईया तो गईया, वृषभ को भी दुह सकते हैं।

“जय जय श्री राधे”
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श्रीराधा बनीं जानकी

आज ब्रज में बहुत बड़ा उत्सव सा हो रहा है। जहाँ देखो तहाँ ब्रजवासी गीत गाने में मगन है। सब अपने अपने घरों में मिठाई बना मंदिरो में भोग लगा रहे हैं। जहाँ देखो तहाँ ब्रजवासी अच्छे अच्छे वस्त्र पहन नाच रहे है। ब्रज में तो उत्सव है परंतु कन्हैया को कुछ समझ नहि आता वो अपनी मैया से जा पूछते हैं, मैया जे ब्रज में का हो रह्यो है, काहे को उत्सव है यह ?
मैया लाला पर वारी जाती है और बोलती है, ‘लाला तू अब बड़ों ह्य गयो है। हर वर्ष तुझे नाँय मालूम कैसा उत्सव होते हैं।’ मैया लाल के मुख पर स्नेहभारी चपत लगाती हुई बोलीं, ‘अरे लाला आज जानकी को जनम है। श्रीरामचंद्र की शक्ति सीता माता का।’

सीता माता का नाम सुन कन्हैया बोले, ‘मैया अब समझ आयो यह वो ही है ना जिसको दुष्ट रावण लै गयों था, और रामजी ने उसे मार दिया था।’ मैया बोली, ‘हाँ हाँ वही।’
बस फिर क्या था, कन्हैया को एक रसमय लीला सूझी। सोचा आज वो यह लीला करेंगे, और सीता होंगी मेरी राधारानी।

कन्हैया पहुँच गए सखामंडल में और बोले, ‘देखो रे मधुमंगल, श्रीदामा आदि आज मेरो रामजी की लीला करिवै को मन ह्य रह्यो है। आप सब मेरो संग दोगे ?’

मधुमंगल टेढ़ों सा मुख बनाय के बोला, ‘राम जी की लीला” अरे कन्हैया हमने तो कहीं नाँय रामलीला पड़ी ना सुनी हम कैसे करेंगे ?’

कन्हैया कूदकर गर्दन हिला बोले, ‘अरे मेरे प्राण प्रिय सखा मैं लीला करूँगा। जैसा कहूँ वैसा करना।’

मधुमंगल डंडा बजाय के बोला, ‘अब जब संग गोपाल है, तो काहे का डर। करेंगे कन्हैया करेंगे, बहुत आनंद आएगो ना ?’
कन्हैया बोला, ‘देखो मैं राम बनूँगा, श्रीदामा लक्ष्मण और मधुमंगल आप ब्राह्मण हो तो पंडित बनोगे शादी कराने वाले।’

मधुमंगल ठहाका मार हंस कर बोले, ‘शादी को पंडित, अरे लाला यहाँ जंगल में शादी कौन ते कारेगो। वृक्ष से लता पता से या अपनी गईया से।’ और सब हँसने लगे।
कन्हैया मुख से जीभ निकाल बोले, ‘ब्राह्मण तू केवल दान दक्षिणा ते मतलब रख और मेरो विवाह करा।’
सखा बोले, ‘पर कन्हैया हमने तो सुना था राम की पत्नी भी थी, सीता माता। तो तेरी पत्नी कौन होवेगी ? ऐसा बोला सब सखा एक दूसरे को आँख मार देखने लगे।
कन्हैया बोले, ‘देखो आज जानकी दिवस है। ब्रज में और मैंने सुबह-सुबह मैया संग मंदिर में जानकी जी से विनय करी के मोको भी आप जैसी पत्नी देना। तभी अचानक मंदिर में आकाशवाणी हुई


‘ओह कान्हा! तेरी विनय मैंने सुन ली तेरी पत्नी, (श्याम कुछ शर्माते हुए बोले) तेरी पत्नी वृषभानु की पुत्री राधा होवेगी।’
सखा भोला-सा मुख बनाकर बोले, ‘हैं लाला! ऐसा बोला जानकी मैया ने।
कन्हैया बोले, ‘हाँ हाँ तुम्हारे धोती लंगोटन डंडा की क़सम।’
मधुमंगल बोले, ‘तो लाला तू राम बनेगो, तो सीता कौन होवेगी ?’
कन्हैया सर पर हाथ मार बोले, ‘अरे भोले ब्राह्मण सीता बनेगी वृषभान की पुत्री। ‘राधारानी। बस सब सखामंडल डंडा बजान लग गए।
कन्हैया बोले, ‘अब राधारानी को यहाँ कौन लावेगो मेरी दुल्हन बनाने को ?’ कन्हैया टेडी हँसी हँसते हुए बोले, ‘मैं तो राम हूँ ना।’
सखा बोले, ‘कन्हैया तू ही बता कौन जा लेकर आवेगों राधारानी को ?’
कन्हैया बोले, ‘हमने सुना है राम अवतार में हनुमान ने मदद करी थी राम को सीता से मिलाने में। तो यहाँ हनुमान होगा हमारा सबसे प्रिय मित्र सुबल।’
सुबल राधारानी के चाचा का लड़का है, और उसका रूप रंग सब राधारानी से मिलता जुलता है। तो कन्हैया ने सुबल को बोला और सुबल तैयार हो गया।
अब सुबल चला बरसाने की और वहाँ स्वामिनीजी अपने निज महलन में अपनी मैया मंजरीगण आदि से घिरी हो जानकी जी की उपासना कर रही थीं।
सुबल बरसाना पहुँच राधारानी के निज महल में पहुँचकर बोला, ‘ओह कीर्तिकुमारी कुल उज़ियारी आपको श्यामसुंदर ने भांडीर वन में बुलाया है।’
जब स्वामिनीजी ने यह सुना श्याम बुला रहे है तब उनका रोम रोम आनंद से प्रफुलित हो गया, गला रूँध गया। राधा बोलीं, ‘कहाँ कहाँ है मेरे श्यामसुंदर ?’
सुबल बोला, ‘जल्दी चलो, आज जानकी दिवस पर वो कुछ लीला रस का अस्वादन आपको कराना चाहते हैं।’
स्वामिनीजी मंजरी आदि को देख भोए उठा बोलीं, ‘लीला रस! चलो-चलो भांडीरवन, पर सुबल मैया को क्या बोलूँ ?’
सुबल मुस्कुराकर बोला, ‘अरे राधाजी आपका और मेरा रूप रंग एक समान है, मैं यहाँ आपकी चोली वस्त्रदी पहन बैठता हूँ मैया को कुछ पता नहीं चलेगा। आप जाओ जल्दी, कन्हैया आधीर है आपके लिए।’
जैसे-तैसे स्वामिनीजी बरसाने से निकलीं। संग तीन चार मंजरी और ललिता आदि सखियों को संग लिए कन्हैया से मिलने भाण्डीरवन को चल दीं। वहाँ कन्हैया राम स्वरूप में तैयार हो रहे थे।
कन्हैया बोला, ‘अरे मधुमंगल मैंने तो सुना था राम के हाथ में धनुष भी होता है। मेरो धनुष ?’
मधुमंगल हँसता हुआ बोला, ‘अरे लाला देख तेरे लिए मैंने लकड़ी तोड़ अपने जनेऊ से डोरी बाँध कर तेरा धनुष बना दिया है।’
स्वामिनी लीला रस को देखने को उत्सुक हो रही हैं। रास्ते में कभी सखी से पूछती हैं, ‘सखी क्या लीला कर रहे होगा मेरा गोपाल ?’ फिर मंजरी से (अपनी भोए चढ़ा बोलती है) सब लीला आवे है मेरे श्याम को।’ कभी आधीर हुए बोलती हैं, ‘सखी आज यह रास्ता लंबा कैसो लग रह्यो है। मोय श्याम से मिलन को है, कोई छोटा कर दो इस रास्ते को।’
मंजरियाँ स्वामिनीजी के आगे-आगे चल काँटे-पत्थर आदि चुनती हुई जा रही है, और उन्हें तसल्ली भी देती हैं कि, ‘आ गए स्वामिनीजी, बस आ गए, पहुँच गए। देखो-देखो आवाज सुनाई दे रही है श्याम की।’
स्वामिनीजी कहती हैं, ‘अरी कींकरी जे रास्ता खत्म नाहिं ह्य रह्यो, वो मेरी बाँट देख रह्ये होंगे। लीला कैसे करेंगे मेरे बिन। कींकरी तू कुछ कर। अरे शुक, अरे सारिका, अरे कोयल, आज मोहे अपने पीठ पर बैठाय के उड़ाय ले चलो।’ मोहे श्याम मिलन की आस है।’ स्वामीनीजी अधीर हो रही हैं। उन्हें अधीर देख मंजरी भी विचलित हो रोने लगी है।
मंजरी सोचती हैं, ‘स्वामिनी की अधीरता बढ़ती जा रही है। मैं इन्हें यहीं रोक कहतीं हूँ के पहुँच गए, और फिर चुपके से श्यामसुंदर को ले आती हूँ।’ विचार कर मंजरी ने ऐसा ही किया
मंजरी पहुँची श्यामसुन्दर के पास। वहाँ श्यामसुंदर रामचंद्र बन चुके थे मधुमंगल ब्राह्मण पंडित के वेश में था। श्यामसुन्दर मंजरी के मुख को देख समझ गए कि स्वामिनी अधीर हैं। श्यामसुन्दर बिना कुछ विचारे मंजरी की ओर दौड़ते हुए बोले, ‘कहाँ हैं, कहाँ हैं, ले चल मोहे।’
मंजरी आगे और श्यामसुंदर मंजरी के पीछे पुकारते हुए दौड़ रहे हैं, कहाँ है मेरी स्वामिनी।’ ऐसा लगा जैसे, त्रेतायुग में राम दौड़ रहे है वनवास में सीता से मिलन के लिए। ऐसा लगता है मानो, त्रेतायुग में जैसे राम आधीर हुए सीता के मिलन के लिए जब वो रावण की लंका में थी।
मंजरी आगे-आगे, श्यामसुन्दर उसके पीछे-पीछे, सखामंडल उनके पीछे और ब्रज के सारे पशु पक्षी भी उनके पीछे दौड़ रहे हैं। जैसे त्रेतायुग में वानरो ने राम सीता के मिलन की सुन्दर लीला के रस का आस्वादन किया था, बैसे ही उसी रसास्वादन के लिये यह सब भी दौड़ रहे हैं। सारा ब्रज आनंद में मगन है। पशु पक्षी में मुख से मधुर गीत गा रहे है, ‘सीताराम राधेश्याम, सीताराम, राधेश्याम।’
जैसे-तैसे मंजरी वहाँ पहुँची। श्यामसुन्दर ने जब स्वामिनी को दुखी देखा तो उनके चरणों में गिर गए। स्वामिनी उस समय नैन बन्द किए अश्रु बहाय श्याम ध्यान में मगन थीं। जैसे ही स्वामिनीजी ने श्यामसुन्दर का और श्यामसुन्दर ने स्वामीनीजी का स्पर्श पाया तभी प्रेम के अनन्तभाव दोनों को जकड़ लिया और दोनो प्रेम की महासमाधि में एक पल के लिए चले गए।
जैसे तैसे जब बाहर आए उस महाप्रेमभाव लहरों से तब स्वामिनी ने पूछा, ‘अरे श्यामसुन्दर यह कैसा भेष है आपकी वंशी कहाँ है, आपका मोरपंख कहाँ है ? वही तो मेरे प्राण हैं,बोलो.., बोलो ना प्राणप्रिय।’
श्यामसुंदर मुस्कुराते हुए बोले, ‘स्वामिनीजी आज जानकी दिवस पर हम रामरूप धरे हैं, श्रीदामा लक्ष्मण, और यह मधुमंगल पंडित बना है, विवाह कराने वाला।’
इससे पहले श्यामसुन्दर आगे कुछ कहते स्वामिनी ताली मारती हुई बोल पड़ीं, और हम सीता महारानी बनेंगे।:
श्यामसुन्दर बोले, ‘तभी तो आपको यहाँ बुलाया है।’
पण्डित बना हुआ मधुमंगल बोला, ‘ओह रामचंद्र लगन का मुहुर्त निकला जा रहा है आप अपनी शक्ति सीतामाता को संग लिए बैठिए तब मैं विवाह के मंत्र पड़ देता हूँ।’
राधारानी बोली, ‘कन्हैया हमें श्रृंगार तो करने दें। जैसे दुल्हन सजती है।’
सारे वन में सब पशु पक्षी उस विवाह के साक्षी बन खड़े हो गए। राधारानी को ललिताजी सीतामाता का श्रृंगार करा रही हैं। कितनी मोतियों की माला जूड़े में लगायी, कितनी गले में पहनायी। कितना सुंदर चंदन से मकरी आदि का मुख पर निर्माण किया। देवियों को भी लज्जित करने वाले सुन्दर कंगन पहनाये। ललिताजी ऐसे श्रृंगार कर रही है जैसे सीता माँ की माता ने सीता माँ के विवाह के समय किया था।
अब सीता माँ तैयार थी और वहाँ राम तो कब से तैयार थे। दोनो बीच में बैठ गए। ललिताजी ने अग्नि प्रज्वलित की’ मधुमंगल पंडित बन मंत्र गाने लगे। ललिताजी सीतामाता की माता का अभिनय करने लगी और माता की तरह सीतामाता के पास बैठ गयी और विशाखा सखी को पिता जनक बना कर सीतामाता के दूसरी तरफ़ बिठा दिया। सारे ब्रज के पशु पक्षी ऐसे लगे जैसे जनक के आँगन में राजारानी आदि विवाह समारोह में आए हैं। सखियाँ सीतामाता (राधा) के संग खड़ी गीत गाने लगीं।
मधुमंगल ने जनकजी (विशाखा सखी) से कहा, ‘महाराज आप अब अपनी पुत्री का हाथ रामचंद्र के हाथ में दे कन्यादान करें।’
महाराज जनक (विशाखा सखी) ने कन्यादान कर विवाह की रस्म को पूरा किया। रस्मों के पूर्ण होते ही श्रीसीताराम रूपी प्रेमीयुगल श्रीराधा और श्यामसुन्दर प्रेमभावलीला में लीन हो गये।

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स्वामिनी राधिका



श्रीकिशोरी जु का एक एक मधुर मधुर नाम, जिसकी मधुरता में गुँथित उनका प्रेम, उनका माधुर्य, उनकी नवलता, उनकी कोमलता, उनकी प्रेममयता, उनकी उज्जवलता, उनकी स्निग्धता…..न बरणो जावै री… साँची कहूँ न बरणो जावै। जे तो लोभ होय री जाकी मधुरता के पान कौ , याकी कृपा सौं मधुर मधुर नामावली कौ पान करूँ री अपने श्रवण पुट सौं ।कोटि कोटि माधुर्यमई नाम धारण करने वाली मेरी स्वामिनी श्रीराधिके …..आह री ! कैसी शीतलता उतरे है री एक बार पुनः पुकार लेऊँ री मेरी स्वामिनी श्रीराधिके …..

साँची कहूँ री , जिव्हा स्थिर ही होई जावै री , कछु और कहते ही न बने री …कहूँ भी क्यों री …जेई की मधुर मधुर नामावली में डूबी रहूँ री …कभी डबड़बाते नेत्रों से रुन्धती हुई वाणी से पुकारूँ तो कभी लाड में भर भर पुकारूँ, कभी याचक बन स्वामिनी की एक कृपा कटाक्ष की याचना करूँ री …..हा किशोरी कौन भाँति तुमको रिझाऊँ, कौन सौं नाम से तुम्हें पुकारूँ । आपकी चरण रज का एक एक अणु अनन्त कोटि माधुर्य समेटे हुए है किशोरी जु …हा स्वामिनी …और कछु कहते ही न बने मेरी स्वामिनी श्रीराधिके मेरी स्वामिनी श्रीराधिके…..

सखी ! तू भी पुकारेगी न मेरे सँग स्वामिनी जु के ये मधुर मई नाम, अपने कर्णपुटों मे इस अमृत को भर ले , हृदय की गहराइयों से बस एक ही नाम पुकार बन बन उठे मेरी स्वामिनी श्रीराधिके ….

हे स्वामिनी ! हे बिहारिणी ! हे किशोरी ! हे प्रफुल्लै ! हे नववय ! हे निहारिणी ! हे नवयौवनी ! हे विस्मृते ! हे सुखगामिनी ! हे मनहरचातिकी ! हे बसंते ! हे नवक्रीडे ! हे मनोरमे ! हे नवसाजिनी ! हे रसकामिनी ! हे विपुले ! हे उत्सवे ! हे उन्मादिते ! हे सौभाग्य ! हे नवपोषिते ! हे स्वामिनी ! हे रसाम्रते ! हे निहारिणी ! हे निभृते ! हे मदनमदनी ! हे केलिकामिनी ! हे अभिरामिनी ! हे धवले ! हे कौमार्या ! हे स्फुरणे ! हे वनमालिके ! हे नवसाजिनी ! हे विपुले ! हे उन्मादिते !……..

जयजय श्रीश्यामाश्याम जी!!

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भगवान के घर की मालकिन

ऐसा माना जाता है, कि सभी तीर्थों का राजा “प्रयागराज” है।

एक बार “प्रयागराज” के मन में ऐसा विचार आया, कि सभी तीर्थ मेरे पास आते है, केवल वृन्दावन मेरे पास नही आता….

प्रयागराज वैकुण्ठ में गए और प्रभु से पूछा….

प्रभु, आपने मुझे तीर्थों का राजा बनाया, लेकिन वृंदावन मुझे टैक्स देने नहीं आते ??

भगवान बहुत हंसे और हंसकर बोले….
हे “प्रयाग” मैंने तुझे केवल तीर्थो का राजा बनाया, मेरे घर का राजा नहीं बनाया।
ब्रज वृन्दावन कोई तीर्थ नही है,वो मेरा घर है…. और घर का कोई मालिक नही होता…. घर की मालकिन होती है !!!!

वृन्दावन की अधीश्वरी श्रीमती राधारानी है और राधारानी की कृपा के बिना ब्रज में प्रवेश नहीं हो सकता….

कर्म के कारण हम शरीर से ब्रज में नहीं जा सकते, लेकिन मन ही मन में हम सब ब्रज वृन्दावन में वास कर सकते है….

भगवान कहते है…. शरीर से ब्रज में जाना…. इससे वह करोड़ों गुना बेहतर है, कि मन से ब्रज वृन्दावन में वास करना

इसीलिए भगवान कहते है….

राधे मेरी स्वामनी,
मै राधे को दास
जन्म जन्म मोहे दीजियो श्री बृंदावन वास,
श्री चरणो में वास

जय जय श्री राधे

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मोहन की माया

सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण ने पूछा कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूं… कैसी होती है?” श्री कृष्ण ने टालना चाहा, लेकिन सुदामा की जिद पर श्री कृष्ण ने कहा,

“अच्छा, कभी वक्त आएगा तो बताऊंगा” और फिर एक दिन कहने लगे… सुदामा, आओ, गोमती में स्नानकरने चलें। दोनों गोमती के तट पर गए। वस्त्र उतारे। दोनों नदी में उतरे… श्रीकृष्ण स्नान करके तट पर लौट आए।

पीतांबर पहनने लगे… सुदामा ने देखा, कृष्ण तो तट पर चला गया है, मैं एक डुबकी और लगा लेता हूं… और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई… भगवान ने उसे अपनी माया का दर्शन कर दिया।

सुदामा को लगा, गोमती में बाढ़ आ गई है, वह बहे जा रहे हैं, सुदामा जैसे-तैसे तक घाट के किनारे रुके। घाट पर चढ़े। घूमने लगे। घूमते-घूमते गांव के पास आए। वहां एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला पहनाई।

ऐसे दिखाई थी श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपनी माया
सुदामा हैरान हुए। लोग इकट्ठे हो गए। लोगों ने कहा, “हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है। हमारा नियम है, राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला पहना दे, वही हमारा राजा होता है।

हथिनी ने आपके गले में माला पहनाई है, इसलिए अब आप हमारे राजा हैं। “सुदामा हैरान हुआ। राजा बन गया। एक राजकन्या के साथ उसका विवाह भी हो गया। दो पुत्र भी पैदा हो गए।

एक दिन सुदामा की पत्नी बीमार पड़ गई… आखिर मर गई… सुदामा दुख से रोने लगा… उसकी पत्नी जो मर गई थी, जिसे वह बहुत चाहता था, सुंदर थी, सुशील थी… लोग इकट्ठे हो गए… उन्होंने सुदामा को कहा, आप रोएं नहीं, आप हमारे राजा हैं… लेकिन रानी जहां गई है, वहीं आप को भी जाना है, यह मायापुरी का नियम है।

आपकी पत्नी को चिता में अग्नि दी जाएगी… आपको भी अपनी पत्नी की चिता में प्रवेश करना होगा… आपको भी अपनी पत्नी के साथ जाना होगा। सुना, तो सुदामा की सांस रुक गई… हाथ-पांव फुल गए… अब

मुझे भी मरना होगा… मेरी पत्नी की मौत हुई है, मेरी तो नहीं… भला मैं क्यों मरूं… यह कैसा नियम है? सुदामा अपनी पत्नी की मृत्यु को भूल गया… उसका रोना भी बंद हो गया।

ऐसे डूबे गए चिंता में
अब वह स्वयं की चिंता में डूब गया… कहा भी, ‘भई, मैं तो मायापुरी का वासी नहीं हूं… मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता… मुझे क्यों जलना होगा।’ लोग नहीं माने, कहा, ‘अपनी पत्नी के साथ आपको भी चिता में जलना होगा… मरना होगा… यह यहां का नियम है।’

आखिर सुदामा ने कहा, ‘अच्छा भई, चिता में जलने से पहले मुझे स्नान तो कर लेने दो…’ लोग माने नहीं… फिर उन्होंने हथियारबंद लोगों की ड्यूटी लगा दी… सुदामा को स्नान करने दो… देखना कहीं भाग न जाए… रह-रह कर सुदामा रो उठता।

सुदामा इतना डर गया कि उसके हाथ-पैर कांपने लगे… वह नदी में उतरा… डुबकी लगाई… और फिर जैसे ही बाहर निकला… उसने देखा, मायानगरी कहीं भी नहीं, किनारे पर तो कृष्ण अभी अपना पीतांबर ही पहन रहे थे… और वह एक दुनिया घूम आया है।

मौत के मुंह से बचकर निकला है…सुदामा नदी से बाहर आया… सुदामा रोए जा रहा था। श्रीकृष्ण हैरान हुए… सबकुछ जानते थे… फिर भी अनजान बनते हुए पूछा, “सुदामा तुम रो क्यों रो रहे हो? ” सुदामा ने कहा, “कृष्ण मैंने जो देखा है, वह सच था या यह जो मैं देख रहा हूं।”

श्रीकृष्ण मुस्कराए, कहा, “जो देखा, भोगा वह सच नहीं था। भ्रम था… स्वप्न था… माया थी मेरी और जो तुम अब मुझे देख रहे हो… यही सच है… मैं ही सच हूं…मेरे से भिन्न, जो भी है, वह मेरी माया ही है।

और जो मुझे ही सर्वत्र देखता है, महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श नहीं करती। माया स्वयं का विस्मरण है…माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न… माया नर्तकी है… नाचती है… नचाती है…

लेकिन जो श्रीकृष्ण से जुड़ा है, वह नाचता नहीं… भ्रमित नहीं होता… माया से निर्लेप रहता है, वह जान जाता है, सुदामा भी जान गया था… जो जान गया वह श्रीकृष्ण से अलग कैसे रह सकता है!!!

जय जय श्रीहरि

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श्री राधा का आंख का आंसू

दिव्य अलौकिक, अनन्य, अनन्त, आत्मा और परमात्मा का मिलन है। श्री श्यामा श्याम आठों पहर एक दुसरे को मिलने को व्याकुल रहते हैं। इसी प्रेम से सृष्टि का कण-कण स्पंदित और रोमांचित है। राधा कृष्ण प्रेम के प्रतीक हैं। श्रीकृष्ण की समस्त चेष्टा राधा जी की प्रसन्नता हेतु और श्रीराधा जी की अपूर्व निष्ठां श्रीकृष्ण की प्रसन्नता का प्राण है।

श्रीकृष्ण वृन्दावन छोड़ मथुरा को जा रहे हैं, गोप गोपिकाओं से विदा ले अक्रूर जी संग मथुरा के रास्ते पर निकल पड़े हैं। दूर एक पेड़ के नीचे बैठ श्रीराधा जी श्रीकृष्ण को निहार रहीं हैं। मौन, आँखें भरी पर आँसू नहीं गिरने दिए।

राधा पर दृष्टि जाते ही श्रीकृष्ण बोले- “काका रथ रोको” श्रीकृष्ण राधा जी की ओर भागे। उनके पास पहुँच कर बोले- “राधे ! मैं जा रहा हूँ, मुझे रोकोगी नहीं” श्रीराधा जी मौन रहीं तो कृष्ण फिर बोले “राधे मुझे रोकोगी नहीं”। राधाजी रूंधे गले से धीरे से बोल उठी-“कान्हा जब आप ने जाने का निश्चय कर ही लिया है तो अब आप को कौन रोक सकता है।”

कृष्ण बोले- नहीं, राधे ! तुम एक बार मुझे कहो तो मैं नहीं जाऊँगा” श्रीराधा कहती हैं “कान्हा ! अगर आप सब से पहले मेरे पास आते तो मैं आप को रोक लेती, और तब आप कहाँ जाते, पर अब नहीं क्या राधा इतनी स्वार्थी हो गई राधा की ख़ुशी तो अपने कान्हा की ख़ुशी में ही है।” कृष्ण ने कहा- “मुझ से एक वादा करो प्रिये कभी आँख न छलके और वृज न छूटे, गोप-गोपिकाएँ सब तुम्हारी शरण में हैं अब।” श्रीकृष्ण का मन भर आया झट से बांसुरी राधाजी के चरणों में रख और रथ की ओर भागे।

“काका ! जल्दी चलो” कान्हा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा “जल्दी रथ हाँको जल्दी” अक्रूर जी परेशान हो गए। कान्हा बोले-“काका, अगर मेरी आँख छलक गई तो राधा के आँसुओं से पूरा ब्रह्माण्ड डूब जाएगा।”

संत कहते हैं श्री राधा जी ने पूरी लीला के दौरान एक भी आंसू नहीं गिरने दिया। और न ही वृज से कभी बाहर गई कोई गोप गोपी भी वृज से बाहर नहीं गया। जब तक गोविन्द ने उन्हें 100 वर्ष बाद मिलने को बुलाया नहीं। अपने प्रेमास्पद की प्रसन्नता के लिए अपने आँसुओं को विरह रुपी अग्नि में जला दिया।

यही तो है “प्रेम की प्रकाष्ठा”।
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“जय जय श्री राधे”

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श्री वंशी अली जी



परी रहौं वृषभानु के द्वारैं, जहाँ मेरी लाड़िली राधा।
खेलत आवै सुख उपजावै, प्राणन की ये साधा॥
कीरति कुल उजियारी प्यारी, हिय की चैन अगाधा।
ठौर नहीं ‘वंशीअलि’ हिय में, और लगै सब बाधा॥



श्री वंशी अली जी 1821 ई को अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को श्रीमती कृष्णावती जी के गर्भ से श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी के सुपुत्र प्रगट हुए।

माता पिता ने इनका नाम वंशीधर रखा। आगे यही आचार्य के रूप में वंशी अली के नाम से प्रसिद्ध हुए।

जन्म के पश्चात बालक वंशीधर ने माताजी के बहुत प्रयास करने के बाद भी स्तनपान नहीं किया, सभी परिवार के लोग चिंतित हो गए। सब विचार करने लगे की यदि बालक दूध नहीं पिएगा तो जीवित कैसे रहेगा। उसी समय एक ब्रजवासी बरसाने से आया और बालक के पास आकर राधा राधा रटते हुए बालक को खिलाने लगा। राधा नाम सुनते ही बालक ने स्तनपान करना आरंभ कर दिया। सभी परिवार के लोग प्रसन्न हुए और बृजवासी को भेंट प्रदान की।

अब वंशीधर जी की आयु धीरे- धीरे बढ़ने लगी। 5 वर्ष की अवस्था में उनके आसाधारण राधा प्रेम की अभिव्यक्ति खेल के माध्यम से प्रकट होने लगी। खेल में यह राधा राधा नाम का कीर्तन करते और राधा संबंधी भजन गाया करते। उनको सभी बहुत स्नेह करते। वंशीधर जी नित्य ही यमुना स्नान को जाते और लौटकर भागवत की कथा करते।

जन्म से ही श्रीवंशी अली जी दिव्य प्रतिभा संपन्न थे। इन्होंने बाल्य अवस्था में ही सम्पूर्ण वेद-शास्त्र व अनेकों संस्कृत ग्रन्थों को हृदयङ्गम कर लिया था, तर्कशास्त्र के अद्वितीय विद्वान थे, श्रीमद्भागवत के गूढ़ श्लोकों का इस प्रकार व्याख्यान करते की बड़े-बड़े प्रकाण्ड पण्डित भी आश्चर्य चकित हो जाते।

बालक वंशीधर का विवाह 15 वर्ष की अवस्था में संपन्न हुआ। जब वे बीस वर्ष के हुए तो उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुयी जिसका नाम पुण्डरीकाक्ष रखा गया।

जब श्री वंशी अली 28 वर्ष के हुए तो पिता जी का धाम गमन हो गया। पिताजी के धाम गमन के एक वर्ष पश्चात राधा प्रेम में सहसा बाढ़ सी आ गई। जब राधा कुंड के एक पंडित राधाकृष्ण ने दिल्ली के मंदिर में राधा अष्टमी के उत्सव में बधाई गाई –

“रस बरसे री हेली कीरत महल में।”

उस समय श्री वंशी अली ऐसे प्रेम मगन हुए की प्रेमाश्रुओं की झड़ी लग गई। डेढ़ घंटे तक मूर्छित होकर भूमि पर पड़े रहे। चेतना आने पर हृदय में इतना प्रेम उल्लास भर गया कि उस वर्ष राधाष्टमी के उत्सव में तीन हजार रुपए खर्च कर बहुत धूमधाम से उत्सव मनाया। दूसरे वर्ष भी राधाष्टमी के उत्सव में दो हजार रूपए खर्च किए। माताजी अधिक धन खर्च करने से नाराज होकर बोली – भविष्य में इतना खर्च नहीं करना। वंशीधर को बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने कहा
“धन किस लिए है ? ठाकुर जी की सेवा के लिए ही न।”

वंशीधर जी रुष्ट हो कर अकेले वृंदावन आ गए। कुछ दिन बाद ही नादिरशाह का दिल्ली में लूट और कत्लेआम का दौर चला। उसी में मंदिर का सारा धन चले गया जिसे माता ने राधा अष्टमी के उत्सव में खर्च करने को मना किया था। वृंदावन में रास मंडल के पास ललित कुंज में वंशीधर जी तन्मयता पूर्वक भजन करने लगे।

ललित कुञ्ज में श्रीराधारानी की आज्ञा से महासखी श्री ललिता जी ने श्री वंशीधर जी को मन्त्र-दीक्षा प्रदान किया

मन्त्र दीक्षा उपरांत श्री ललिता जी ने वंशीधर को बरसाने जाकर भजन करने की आज्ञा दी। साथ ही साथ यह आशीर्वाद भी दिया कि बरसाने में श्रीजी के दर्शन होंगे।

वंशीधर जी बरसाने आ गए। अब सभी लोग वंशी अली के नाम से पुकारने लगे। बरसाने में रंगीली गली में आसन जमा कर भजन करने लगे।

वंशीअली जी परम वैराग्यमय एवं निरंतर लीलाओं के चिंतन में जीवन यापन करते। बहुत से धनवान सेवक के होते हुए भी अपने पास तुम्बी और अंगोछे के सिवा और कुछ भी नहीं रखते। लेकिन राधा अष्टमी का उत्सव जब आता तो बीस पचीस हजार रुपए खर्च करके बहुत धूमधाम से उत्सव मनाते। श्रीमद् भागवत की कथा कहते-कहते भाव विह्वल हो जाते। भागवत जी के श्लोकों का अनेक बार अनेक प्रकार से अलौकिक नविन अर्थ करते।

वृन्दावन स्थित ललित कुंज में ही श्री किशोरी जी का नाम रटते हुए वंशी अली जी 1879 ई में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को नित्य निकुंज में अपनी दिव्य सखी स्वरुप में अवस्थित हो गए।

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ब्रह्मचारी कृष्ण

एक बार गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा- “हे कृष्ण ! हमें अगस्त्य ऋषि को भोग लगाने को जाना है, और ये यमुना जी बीच में पड़ती हैं। अब तुम बताओ हम कैसे जायें ?” भगवान श्री कृष्ण ने कहा – “जब तुम यमुना जी के पास जाओ तो उनसे कहना कि, हे यमुनाजी, अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी हैं तो हमें रास्ता दो।” गोपियाँ हँसने लगी कि, लो ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझते है, सारा दिन तो हमारे पीछे-पीछे घूमता है, कभी हमारे वस्त्र चुराता है कभी मटकियाँ फोड़ता है।

खैर फिर भी हम बोल देंगी। गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर कहती हैं, “हे यमुनाजी ! अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी हैं तो हमें रास्ता दें।” और गोपियों के कहते ही यमुनाजी ने रास्ता दे दिया। गोपियाँ तो सन्न रह गई ये क्या हुआ ? कृष्ण और ब्रह्मचारी ? अब गोपियाँ अगस्त्य ऋषि को भोजन करवा कर वापस आने लगीं तो उन्होंने अगस्त्य ऋषि से कहा- “मुनिवर ! अब हम घर कैसे जायें ? यमुनाजी बीच में हैं।” अगस्त्य ऋषि ने कहा कि तुम यमुना जी को कहना- “अगर अगस्त्यजी निराहार हैं तो हमें रास्ता दें।” गोपियाँ मन में सोचने लगी कि अभी हम इतना सारा भोजन लाई सो सब गटक गये और अब अपने आप को निराहार बता रहे हैं ? गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर बोली, “हे यमुनाजी ! अगर अगस्त्य ऋषि निराहार हैं तो हमे रास्ता दें।

” यमुनाजी ने उन्हें तुरन्त रास्ता दे दिया। गोपियाँ आश्चर्य करने लगीं कि जो खाता है वो निराहार कैसे हो सकता है ? और जो दिन रात हमारे पीछे-पीछे फिरता है वो कृष्ण ब्रह्मचारी कैसे हो सकता है ? इसी उधेड़बुन में गोपियों ने कृष्ण के पास आकर फिर से वही प्रश्न किया। भगवान श्री कृष्ण ने कहा- “गोपियों मुझे तुमारी देह से कोई लेना देना नहीं है, मैं तो तुम्हारे प्रेम के भाव को देख कर तुम्हारे पीछे आता हूँ। मैंने कभी वासना के तहत संसार नहीं भोगा मैं तो निर्मोही हूँ। इसीलिए यमुना ने आप को मार्ग दिया।” तब गोपियाँ बोली – “भगवन् ! मुनिराज ने तो हमारे सामने भोजन ग्रहण किया फिर भी वो बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवासी हो तो हे यमुना मैया मार्ग दें, और बड़े आश्चर्य की बात है कि यमुना ने मार्ग दे दिया ? श्री कृष्ण हँसने लगे और बोले- “अगत्स्य आजन्म उपवासी हैं। अगत्स्य मुनि भोजन ग्रहण करने से पहले मुझे भोग लगाते हैं। उनका भोजन में कोई मोह नहीं होता उनको कतई मन में नहीं होता कि मैं भोजन करूँ या भोजन कर रहा हूँ। वो तो अपने अन्दर रह रहे मुझे भोजन करा रहे होते हैं, इसलिए वो आजन्म उपवासी हैं

श्री राधे राधे जी
“जय जय श्री राधे”

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श्री जी को कौन सी वस्तु प्रिय है?

जब हम अपनी छोटी कुटिया में थे २४ घंटे में थोडा सा मिश्री का भोग लगाते थे, जिस दिन मनोकरी मांगने नहीं गए श्री जी को ज़रा सा मिश्री भोग लगा दिया और वही पा लिया , भावना भाव से कढ़ी, चावल, फुल्का सब भावना से कर दिया थोड़ी मिश्री रखदी भोग लगाया और पा लिया पानी पि लिया बस , मनोकरी मांगने गए तो रोटी मिली जो मिली वो श्री जी को सामने दिखा दिया, श्री जी को बाहरी भोग नहीं चाहिए वो तो है अपनी दिनचर्या चलानी है बस इसलिए, श्री जी को आप से प्यार है उनको आप चाहिए , आप अपने को समर्पित कर दीजिये, अब देह पोषण के लिए मुझे जल चाहिए , मुझे भोजन चाहिए वही भोजन और जल जो श्री जी ने ही हमको दिया है श्री जी को अर्पित कर देते है और पा लेते है I
श्री जी की प्रशंसता का विषय इतर , मिठाई, फल, भोग नहीं है अगर ऐसा हो तो इसी से प्रशंस हो जाये पर ऐसा कही नहीं पाया गया है श्री जी की प्रशंसता का हित है श्री जी के प्रति आत्मसमर्पण कर देना I
हे राधे शरीर से मन से वाणी से मैं आपके आश्रित हो गया , श्री जी का स्मरण करना खास बाते है प्रभु की प्रशंसता प्रभु के मिलने का उपाय सहज भाव से प्रभु का मनन चिंतन एवं उनके प्रति समर्पित हो जाना यही सबसे बड़ी प्रभु की प्रशंसता का विषय है
हाँ अगर अप सक्षम है तो आप करिए कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर नहीं है तो कोई आवश्यकता है ही नहीं जो स्वाभाविक आपके पास हो प्रिय प्रीतम को अर्पित करके ग्रहण करो, बाहरी प्रसाद से शरीर का पोषण होता है और भाव से स्वरुप पोषण होता भजन रुपी प्रसाद से स्वरुप पोषित होता है श्री जी को भोग नहीं चाहिए श्री जी को सिर्फ आप का भाव चाहिए

जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश

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“उलटे भजन का सीधा भाव”

“उलटे भजन का सीधा भाव”

एक बार एक व्यक्ति श्रीधाम वृंदावन में दर्शन करने गया। दर्शन करके लौट रहा था तभी एक संत अपनी कुटिया के बाहर बैठे बड़ा अच्छा पद गा रहे थे कि “हो नयन हमारे अटके श्री बिहारी जी के चरण कमल में” बार-बार यही गाये जा रहे था तभी उस व्यक्ति ने जब इतना मीठा पद सुना तो वह आगे न बढ़ सका और संत के पास बैठकर ही पद सुनने लगा और संत के साथ-साथ गाने लगा।
कुछ देर बाद वह इस पद को गाता-गाता अपने घर गया और सोचता जा रहा था कि वाह! संत ने बड़ा प्यारा पद गाया। जब घर पहुँचा तो पद भूल गया अब याद करने लगा कि संत क्या गा रहे थे? बहुत देर याद करने पर भी उसे याद नहीं आ रहा था फिर कुछ देर बाद उसने गाया “हो नयन बिहारी जी के अटके, हमारे चरण कमल में” उलटा गाने लगा। उसे गाना था “नयन हमारे अटके बिहारी जी के चरण कमल में” अर्थात बिहारी जी के चरण कमल इतने प्यारे हैं कि नजर उनके चरणों से हटती ही नहीं हैं। नयन मानो वही अटक के रह गए हैं पर वो गा रहा था कि बिहारी जी के नयन हमारे चरणों में अटक गए। अब ये पंक्ति उसे इतनी अच्छी लगी कि वह बार-बार बस यही गाये जाता। आँखे बंद है बिहारी के चरण हृदय में है और बड़े भाव से गाये जा रहा है। जब बहुत समय तक गाता रहा तो अचानक क्या देखता है सामने साक्षात् बिहारी जी खड़े हैं। झट चरणों में गिर पड़ा।
बिहारी जी बोले,”भईया! एक से बढ़कर एक भक्त हुए पर तुम जैसा भक्त मिलना बड़ा कठिन है। लोगो के नयन तो हमारे चरणों में अटक जाते हैं पर तुमने तो हमारे ही नयन अपने चरणों में अटका दिए और जब नयन अटक गए तो फिर दर्शन देने कैसे नहीं आता।”
भगवान बड़े प्रसन्न हो गए। वास्तव में बिहारी जी ने उसके शब्दों की भाषा सुनी ही नहीं क्योंकि बिहारी जी शब्दों की भाषा जानते ही नहीं हैं। वे तो एक ही भाषा जानते है, वह है भाव की भाषा! भले ही उस भक्त ने उलटा गाया पर बिहारी जी ने उसके भाव देखे कि वास्तव में ये गाना तो सही चाहता है। शब्द उलटे हो गए तो क्या! भाव तो कितना उच्च है! सही अर्थो में भगवान तो भक्त के हृदय का भाव ही देखते हैं।

श्री Զเधॆ__Զเधॆ

श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास

जय श्री कुंजबिहारी श्री हरिदास जी।
जय श्री राधेस्नेहबिहारी जी।
जय श्री राधे राधे।

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सत्संग सुनने का फल

एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गए और प्रणाम करते हुए बोले, “भगवान मुझे स त्संग की महिमा सुनाइये।” भगवान मुस्कराते हुए बोले, नारद! तुम यहां से आगे जाओ, वहां इमली के पेड़ पर एक रंगीन प्राणी मिलेगा। वह सत्संग की महिमा जानता है, वही तुम्हें समझाएगा भी।
नारद जी खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गए और गिरगिट से बातें करने लगे। उन्होंने गिरगिट से सत्संग की महिमा के बारे में पूछा। सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिए। नारदजी आश्चर्यचकित होकर लौट आए और भगवान को सारा वृत्तांत सुनाया।

भगवान ने मुस्कराते हुए कहा, इस बार तुम नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहां जो तोता पिंजरे में दिखेगा, उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना। नारदजी क्षण भर में वहां पहुंच गए और तोते से सत्संग का महत्व पूछा। थोड़ी देर बाद ही तोते की आंखें बंद हो गईं और उसके भी प्राणपखेरू उड़ गए। इस बार तो नारद जी भी घबरा गए और दौड़े-दौड़े भगवान कृष्ण के पास पहुंचे।

नारद जी कहा, भगवान यह क्या लीला है। क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है?” भगवान हंसते हुए बोले, यह बात भी तुमको जल्द ही समझ आ जाएगी। इस बार तुम नगर के राजा के महल में जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”

नारदजी तो थरथर कांपने लगे और बोले, अभी तक तो पक्षी ही अपने प्राण छोड़ रहे थे। इस बार अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।” भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया। नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आए। वहां उनका बड़ा सत्कार किया गया। अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी। अतः पुत्र के जन्म पर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था। नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारे में पूछा। नारदजी को राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राजपुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नवजात शिशु हंस पड़ा और बोलाः “महाराज! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता। ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते, इसलिए मुझसे पूछ रहे हैं। वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका। आपके सान्निध्यमात्र से मेरी कितनी सारी योनियां कट गईं और मैं सीधे मानव-तन में ही नहीं पहुंचा अपीतू राजपुत्र भी बना। यह सत्संग का ही अदभुत प्रभाव है। बालक बोला- हे ऋषिवर, अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य को पा लूं। नारदजी ने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बता दिया। भगवान ने कहा, सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा है। संत का सही गौरव या तो संत जानते हैं या उनके सच्चे प्रेमी भक्त! इस लिए जब कभी मौका मिले। सत्संग का लाभ जरूर ले लेना चाहिए। क्या पता किस संत या भक्त के मुख से निकली बात जीवन सफल कर दें।

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अद्भुद गुरुभक्ति

सहजोबाई

आज सहजो अपनी कुटिया के द्वार पर बैठी है, उसकी गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर परमात्मा उसके सामने प्रकट हुए हैं । लेकिन सहजो के अन्दर कोई उत्साह नहीं है

परमात्मा ने कहा – सहजो हम स्वयं चलकर आऐ हैं क्या तुम्हे हर्ष नही हो रहा ?

सहजो ने कहा — प्रभु ! ये तो आपने अहेतुक कृपा की है, पर मुझे तोआपके दर्शन की भी कामना नही थी।

परमात्मा को झटका लगा।
सहजो तेरे पास ऐसा क्या है ?,
जो तू मेरा आतिथ्य भी नही करती है !

सहजो ने कहा- मेरे पास मेरा सद्गुरु पूर्ण समर्थ है। भगवन ! मैने आपको अपने सद्गुरु मे पा लिया है, मैं परमात्म तत्व का दर्शन भी करना चाहती हूँ तो केवल अपने सद्गुरु के ही रूप मे। मुझे आपके दर्शनो की कोई अभिलाषा नही है

यदि मै गुरुदेव को कहती तो वह कभी का आपको उठाकर मेरी झोली मे डाल देते।

ये भाव देखकर आज परमात्मा पिघल गया। कहते है – सहजो मुझे अदंर आने के लिए नही कहोगी ?

सहजो कहती है- प्रभु मेरी कुटिया के भीतर एक ही आसन है और उस पर भी मेरे सद्गुरु विराजते हैं, क्या आप भूमि पर बैठकर मेरा आतिथ्य स्वीकार करेंगें ?

भगवान् कहे तुम जहाँ कहोगी हम वहाँ बैठेंगें, भीतर तो आने दो।

भगवान् देखते हैं सचमुच एक ही आसन है, वे भूमि पर ही बैठ गए।

कहा — सहजो ! मैं जहाँ जाता हूँ कुछ न कुछ देता हूँ ऐसा मेरा नियम है । कुछ माँग ही लो। सहजो कहती है — प्रभु! मेरे जीवन मे कोई कामना नही है। प्रभु ने कहा फिर भी कुछ तो माँग लो । सहजो ने कहा प्रभु ! आप मुझे क्या दोगे ?

आप तो स्वयं एक दान हो, जिसे मेरा दाता सद्गुरु अपने अनन्य भक्त को जब चाहे दान कर देता है। अब बताओ प्रभु ! दान बड़ा या दाता ?

आपने तो प्राणी को जन्म मरण, रोग भोग, सुख दुख मे उलझाया, ये तो मेरे सदगुरु दीनदयाल ने कृपा कर हर प्राणी को विधि बताकर, राह पकड़ा कर, शरण में आये हुए को सहारा देकर उसे निर्भय बनाकर उस द्वन्द से छुड़ाया।

प्रभु मुस्कराते हुए कहते हैं, सहजो ! आज मेरी मर्यादा रख ले, कुछ सेवा ही दे दे।
सहजो ने कहा – प्रभु एक सेवा है, मेरे सद्गुरु आने वाले हैं, जब मैं उन्हे भोजन कराऊँ तो क्या आप उनके पीछे खड़े होकर चमर डुला सकते हो ?

कथा कहती है कि प्रभु ने सहजो के गुरु चरणदास पर चमर डुलाया। यही है सद्गुरु के प्रति सच्ची समर्पण! , साधक के अंदर अगर स्वर्ग तक की कामना जागृत हो जाय

उसे दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मुझे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, यह तो मेरे सच्चे बादशाह यूं ही दे देंगे, लेकिन कब ? जब उसमे मेरा कल्याण होगा

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ईश्वर अवश्य देगा

एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 भिखारी उसके दाएं और बाएं बैठा करते..
दाईं तरफ़ वाला कहता: “हे ईश्वर, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे.!”
बाईं तरफ़ वाला कहता: “ऐ राजा.! ईश्वर ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे.!”
दाईं तरफ़ वाला भिखारी बाईं तरफ़ वाले से कहता: ईश्वर से माँग वह सबकी सुनने वाला है..
बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: “चुप कर मुर्ख..”
एक बार राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो भिखारी बैठता है वह हमेशा ईश्वर से मांगता है तो अवश्य ईश्वर उसकी ज़रूर सुनेगा..
लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें स्वर्ण मुद्रा डाल दो और वह उसको दे आओ.!
मंत्री ने ऐसा ही किया.. अब वह भिखारी मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे भिखारी को चिड़ाता हुआ बोला: “हुह… बड़ा आया ईश्वर देगा..’, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना.?”
खाते खाते जब इसका पेट भर गया तो इसने बची हुई खीर का बर्तन उस दूसरे भिखारी को दे दिया और कहा: “ले पकड़… तू भी खाले, मुर्ख..”
अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला भिखारी तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है..
राजा नें चौंक कर उससे पूछा: “क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला.?”
भिखारी: “जी मिला था राजा जी, क्या स्वादिस्ट खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी.!”
राजा: फिर..?
भिखारी: “फ़िर जब मेरा पेट भर गया तो वह जो दूसरा भिखारी यहाँ बैठता है मैंने उसको दे दी, मुर्ख हमेशा कहता रहता है: ‘ ईश्वर देगा, ईश्वर देगा.!’ ले खा ले !
राजा मुस्कुरा कर बोला: “अवश्य ही, ईश्वर ने उसे दे ही दिया.!”
ईश्वर पर भरोसा रखें..
जय जय श्री राधे

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भगवान की डायरी : बड़ी सुंदर कथा !!

भगवान की डायरी : बड़ी सुंदर कथा !!

एक बार की बात है वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे। नारायण नारायण !!

नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।

हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि ! कहाँ जा रहे हो?

नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है?

हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है, प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है।

नारदजी: अच्छा?? क्या लिखा पढ़ी कर रहे है?

हनुमानजी बोले: मुझे पता नहीं मुनिवर आप खुद ही देख आना।

नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है।

नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है?
ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।

प्रभु बोले: नहीं नारद, मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता।

नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है? ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो?

प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।

नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते हैं?

प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ।

नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है?

नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान ! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं पर आप का नाम उस में कहीं नहीं है?

हनुमानजी ने कहा कि: मुनिवर,! होगा, आप ने शायद ठीक से नहीं देखा होगा?

नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था।

हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक अन्य दैनंदिनी भी रखते है उसमें भी वे नित्य कुछ लिखते हैं।

नारदजी बोले:अच्छा?

हनुमानजी ने कहा: हाँ!

नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु ! सुना है कि आप अपनी अलग से दैनंदिनी भी रखते है! उसमें आप क्या लिखते हैं?

प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नहीं है।

नारदजी: ”प्रभु ! बताईये ना, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं?

प्रभु मुस्कुराये और बोले मुनिवर मैं इनमें उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।

नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जिह्वा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं और जो हृदय से भजते हैं उन भक्तों के वे स्वयं भक्त हो जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपनी हृदय रूपी विशेष सूची में रखते है

।। जय श्री राम ।।

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मन चंगा तो कठौती में गंगा


एक बार की बात है, एक परिवार में पति पत्नी एवं बहू बेटा याने चार प्राणी रहते थे। समय आराम से बीत रहा था।
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चंद वर्षो बाद सास ने गंगा स्नान करने का मन बनाया। वो भी अकेले पति पत्नी। बहू बेटा को भी साथ ले जाने का मन नहीं बनाया।
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उधर बहू मन में सोच विचार करती है कि भगवान मेंने ऐसा कौन सा पाप किया है जो में गंगा स्नान करने से वंचित रह रही हूँ।
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सास ससुर गंगा स्नान हेतु काशी के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगे तो बहू ने सास से कहा कि माँसा आप अच्छी तरह गंगा स्नान एवं यात्रा करिएगा।
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इधर घर की चिंता मत करिएगा। मेरा तो अभी अशुभ कर्म का उदय है वरना में भी आपके साथ चलती।
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सारी तैयारी करके दोनों काशी के लिए रवाना हुए। मन ही मन बहू अपने कर्मों को कोस रही थी, कि आज मेरा भी पुण्य कर्म होता तो में भी गंगा स्नान को जाती। खेर मन को ढाढस बंधाकर घर में रही।
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उधर सास जब गंगाजी में स्नान कर रही थी। स्नान करते करते घर में रखी अलमारी की तरफ ध्यान गया और मन ही मन सोचने लगी कि अरे अलमारी खुली छोडकर आ गई, कैसी बेवकूफ औरत हूँ बंद करके नहीं आई।
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पीछे से बहू सारा गहना निकाल लेगी। यही विचार करते करते स्नान कर रही थी कि अचानक हाथ में पहनी हुई अँगूठी हाथ से निकल कर गंगा में गिर गई।
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अब और चिंता बढ़ गई की मेरी अँगूठी गिर गई। उसका ध्यान गंगा स्नान में न होकर सिर्फ घर की अलमारी में था।
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उधर बहू ने विचार किया कि देखो मेरा शुभ कर्म होता तो में भी गंगा जी जाती। सासु माँ कितनी पुण्यवान है जो आज गंगा स्नान कर रही है।
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ये विचार करते करते एक कठौती लेकर आई और उसको पानी से भर दिया, और सोचने लगी सासु माँ वहाँ गंगा स्नान कर रही है और में यहाँ कठौती में ही गंगा स्नान कर लूँ।
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यह विचार करके ज्योंही कठौती में बैठी तो उसके हाथ में सासु माँ के हाथ की अँगूठी आ गई और विचार करने लगी ये अँगूठी यहाँ कैसे आई ये तो सासु माँ पहन कर गई थी।
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इतना सब करने के बाद उसने उस अँगूठी को अपनी अलमारी में सुरक्षित रख दी और कहा कि सासु माँ आने पर उनको दे दूँगी।
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उधर सारी यात्रा एवं गंगा स्नान करके सास लौटी तब बहू ने उनकी कुशल यात्रा एवं गंगा स्नान के बारे में पूछा..
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तो सास ने कहा कि बहू सारी यात्रा एवं गंगा स्नान तो की पर मन नहीं लगा।
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बहू ने कहा कि क्यों माँ ? मेंने तो आपको यह कह कर भेजा था कि आप इधर की चिंता मत करना में अपने आप संभाल लूँगी।
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सास ने कहा कि बहू गंगा स्नान करते करते पहले तो मेरा ध्यान घर में रखी अलमारी की तरफ गया और ज्योंही स्नान कर रही थी कि मेरे हाथ से अँगूठी निकल कर गंगाजी में गिर गई। अब तूँ ही बता बाकी यात्रा में मन कैसे लगता।
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इतनी बात बता ही रही थी कि बहू उठकर अपनी अलमारी में से वह अँगूठी निकाल सास के हाथ में रख कर कहा की माँ इस अँगूठी की बात कर रही है क्या ?
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सास ने कहा, हाँ ! यह तेरे पास कहाँ से आई इसको तो में पहन कर गई थी। और मेरी अंगुली से निकल कर गंगाजी मे गिरी थी।
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बहू ने जबाब देते हुई कहा कि, माँ जब गंगा स्नान कर रही थी तो मेरे मन में आया कि देखो माँ कितनी पुण्यवान है जो आज गंगा स्नान हेतु गई।
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मेरा कैसा अशुभ कर्म आड़े आ रहा था जो में नहीं जा सकी। इतना सब सोचने के बाद मेंने विचार किया कि क्यों में यही पर कठौती में पानी डाल कर उसको ही गंगा समझकर गंगा स्नान कर लूँ।
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जैसे मेंने ऐसा किया और कठौती में स्नान करने लगी कि मेरे हाथ में यह अँगूठी आई। में देखा यह तो आपकी है और यह यहाँ कैसे आई।
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इसको तो आप पहन कर गई थी। फिर भी में आगे ज्यादा न सोचते हुई इसे सुरक्षित मेरी अलमारी में रख दी।
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सास ने बहू से कहा, बहू में बताती हूँ कि यह तुम्हारी कठौती में कैसे आई।
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बहू ने कहा, माँ कैसे ?
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सास ने बताया, बहू देखो “मन चंगा तो कठौती में गंगा”। मेरा मन वहाँ पर चंगा नहीं था। में वहाँ गई जरूर थी परंतु मेरा ध्यान घर की आलमारी में अटका हुआ था..
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और मन ही मन विचार कर रही थी की अलमारी खुली छोडकर आई हूँ कहीं बहू ने आलमारी से मेरे सारे गहने निकाल लिए तो।
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तो बता ऐसे बुरे विचार मन में आए तो मन कहाँ से लगनेवाला और अँगूठी जो मेरे हाथ से निकल कर गिरी वह तेरे शुद्ध भाव होने के कारण तेरी कठौती में निकली।
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इस कथा का सार यह ही है कि जीवन में पवित्रता निहायत जरूरी है। वर्तमान में हर प्राणी का मन अपवित्र है, हर व्यक्ति का चित्त अपवित्र है।
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चित्त और चेतन में काम, क्रोध, मोह, लोभ जैसे विकार इस तरह हावी है कि हम उन्हें समझ नहीं पा रहे हैं। उस विकृति के कारण हमारा जीना बहुत दुर्भर हो रहा है।
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बाहर की गंदगी को हम पसंद नहीं करते, वह दिखती है, तत्क्षण हम उसे दूर करने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारे भीतर में जो गंदगी भरी पड़ी है उस और हमारा ध्यान नहीं जाता है।
आज जिस पवित्रता की बात की जानी है, उस पवित्रता का सम्बद्ध बाहर से नहीं है, भीतर की पवित्रता से है

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शेर की संत भक्ति


वृंदावन में करह आश्रम नामक श्री रामानंदी संतो का एक स्थान है। वहाँ पर एक सिद्ध संत रहते थे, जिनका नाम था श्री रामरतनदास बाबाजी महाराज।
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जहां वे अपनी साधना करते थे वहाँ एक पहाड़ है और ऊपर नीचे दो गुफाएं हैं।
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नीचे वाली गुफा में महाराज जी अपनी साधना करते थे और ऊपर वाली गुफा में एक बड़ा भारी बब्बर शेर रहता था।
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उस शेर का वहाँ बड़ा आतंक था, अच्छे अच्छे लोग वहाँ भटकने नहीं आते थे।
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कभी कभी वे शेर नीचे वाली गुफा में महाराज जी की पीठ के पीछे आकर चुपचाप बैठ जाता..
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और जब महाराज जी की आँख खोलकर देखते थे तब कहते थे, बच्चा ! तू जानता है की महाराज जी बहुत समय से नाम जप में बैठे है..
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उनकी पीठ के पीछे कोई सहारा नहीं है इसीलिए आकर तकिये का काम देता है, हमें आराम देता है।
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वैसे तो वहाँ उस स्थान पर कोई नहीं आता था परंतु कुछ भक्त लोग महाराज जी के दर्शन के लिए आया करते थे और उनके लिए फल अन्न आदि लाकर देते थे।
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जब वे लोग महाराज जी के पास आते थे तब वह शेर जोरदार दहाड़ लगाता।
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शेर को दहाड़ता देखकर महाराज जी कहते, देखो तुम्हारे दहाड़ने से भक्त लोग डर रहे है, तुम जब तक बैठे रहोगे तब तक भक्त लोग यहां हमारे पास नहीं आएंगे।
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तुम ऐसा करो, तुम अभी ऊपर वाली गुफा में चले जाओ।
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महाराज जी की बात सुनकर वह शेर चुपचार ऊपर गुफा में चला जाता और जब कोई नहीं होता तब पुनः महाराज जी की पीठ से लगकर संत के मुख से बैठकर नाम जप सुनता रहता।
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साभार :- भक्तमाल कथा

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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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जब कृष्ण खो गए..


श्रीराधा रानी, उनकी सखियां, गोपियां सब कृष्ण प्रेम में खो गई थीं। हर जगह, हर समय श्रीकृष्ण ही उन्हें दिखाई देते थे, मुरली की ध्वनि कानों में गुंजायमान रहती थी। प्रभु भी भली प्रकार से जानते थे कि गोपियां मुझसे बहुत प्यार करती हैं।
Se lllá बार उन्होंने गोपियों के साथ महारासलीला करने का विचार किया। बांके बिहारी सताते तो सभी को हैं। गोपियों को पहले ही अपने प्रेम जाल में फंसा रखा था। अब उन्होंने गोपियों को और सताने की ठान ली। प्रात: यमुना किनारे पहुंचकर बंशी बजाने लगे। गोपियां बंशी की ध्वनि सुनते ही उन्हें ढूंढने लगीं।
लेकिन कृष्ण ने आज मन बना लिया था, आज वे यह देखना चाहते थे कि गोपियां अपने प्रेम को किस प्रकार उजागर करती हैं। तो प्रभु अंतर्ध्यान हो गए। बंशी की आवाज तो गोपियों के कानों में आ रही थी, लेकिन कृष्ण के दर्शन नहीं हो पा रहे थे। बंशी के स्वर जिस ओर से आएं उसी ओर गोपियां चल पड़तीं।

सुध-बुध तो पहले खो ही बैठी थीं। प्रभु के दर्शन के लिए व्याकुल हो रही थीं। प्रात: से दोपहर हो गई चलते-चलते। भूख-प्यास से गोपियां व्याकुल हो रही थीं, लेकिन प्रभु के दर्शन नहीं हो रहे। अब गोपियां धीर न बांध पा रही थीं।
प्रभु से विनती करने लगीं कि हे कान्हा तुम कहां हो, आज हमें अपनी झलक नहीं दिखाओगे।
तुम कहां छिप गए हो, सामने आ जाओ। तुम्हारी याद में हम तड़प रहे हैं। दर्शन दो प्रभु, दर्शन दो।
कहती हुई गोपियां ढूंढ रही हैं कान्हा को। लेकिन प्रभु सामने नहीं आए। ढूंढते-ढूंढते शाम हो गई, रात हो गई।
सुबह से गोपियों न कुछ खाया न पीया, बेसुध होकर बस कान्हा-कान्हा कह रही हैं, बुला रही हैं प्रभु को।

आकाश में चंद्र देव छा गए। गोपियां वन में पेड़ों, जीवों से गुहार लगा रही हैं कि किसी ने मेरे कान्हा को देखा है, कोई मुझे बता दे कि कान्हा कहां है?
लेकिन कान्हा नहीं मिले। अब गोपियों की दशा अत्यंत हीन हो गई। आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। अधीर हो रही थीं। चिंता में डूब गर्इं कि कहीं कान्हा को कुछ हो तो नहीं गया। सवेरा होने को है। रो रो कर गोपियों की दुर्दशा हो गई है। गोपियां कहती हैं कि

सूनी यमुना, सूना मधुबन, सूना गोकुल गांव
चले आओ मेरे घनश्याम
हो चले आओ मेरे घनश्याम
चले आओ मेरे घनश्याम

गोपियां कहती हैं कि प्रभु आप बिना बताए हमको छोड़कर चले गए। कम से कम बोल तो देते कि हमसे गलती क्या हो गई। एक बार बता तो देते। आप तो कुछ बोले भी नहीं और चले गए।
सोचो कितनी वेदना होगी गोपियों को।

ये तो उसी तरह से हो गया जैसे किसी को अनमोल हीरा मिले और वो गलती से उसे गंवा दे। ये तो लौकिक उदाहरण है, और जब साक्षात परमात्मा मिलने के बाद बिछड़े होंगे तो कितनी पीड़ा होगी। सोचो गोपियों की दशा कैसी होगी। गोपियां यही कह रही हैं

जय जय श्री राधे श्याम

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घड़े की आत्मकथा

सन्तों की एक सभा चल रही थी। किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहाँ रखवा दिया ताकि सन्त जनों को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें।

सन्तों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था। उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा- अहा ! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है। एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। सन्तों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा। ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है।

घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बन्धु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा सिर्फ मिट्टी का ढेर था। किसी काम का नहीं था। कभी ऐसा नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है। फिर एक दिन एक कुम्हार आया।उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और मुझे बोरी में भर कर गधे पर लादकर अपने घर ले गया।

वहाँ ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाकपर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया। बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आँवे के आग में झोंक दिया जलने को।

इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में बेचने के लिए लाया गया। वहाँ भी लोग मुझे ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं ? ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या, बस 20 से 30 रुपये।

मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था। रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो। मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है। लेकिन ईश्वर की योजना कुछ और ही थी, किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी प्रभु ही कृपा थी। उसका मुझे वह गूंथना भी प्रभु की कृपा थी। मुझे आग में जलाना भी प्रभु की मर्जी थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भी प्रभु ही इच्छा थी। अब मालूम पड़ा कि मुझ पर सब परमात्मा की कृपा ही थी।

बुरी परिस्थितियाँ हमें इतनी विचलित कर देती हैं कि हम परमात्मा के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं और खुद को कोसने लगते हैं, क्यों हम सबमें शक्ति नहीं होती उनकी लीला समझने की। कई बार हमारे साथ भी ऐसा ही होता है हम खुद को कोसने के साथ परमात्मा पर अंगुली उठा कर कहते हैं कि उसने मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया, क्या मैं इतना बुरा हूँ ? भगवान ने सारे दुःख दर्द मुझे ही क्यों दिए। लेकिन सच तो ये है कि भगवान ने उन तमाम पत्थरों की भीड़ में से तराशने के लिए एक आप को चुना है। अब तराशने में तो थोड़ी तकलीफ तो झेलनी ही पड़ती है।

“जय जय श्री राधे”

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राधारानी का अमानिया



एक बार श्यामसुंदर सुंदर श्रृंगार करके, सुन्दर पीताम्बर पहनकर, रंगीन धातुओ से भांति-भांति के श्रीअंग पर आकृतियाँ बनाकर, खूब सजधज कर निकुज में गए।
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तभी एक “किंकरी सखी” उस निकुंज में विराजमान थी…
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राधा रानी जी की सेवा में अनेक प्रकार की सखियाँ है “किंकरी”, “मंजरी”, और “सहचरी” ये सब सखियों के यूथ है.
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तो जैसे ही कृष्ण ने उस गोपी को देखा तो उसके पास आये…
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भगवान का अभिप्राय यही था कि मैंने इतना सुन्दर श्रृंगार किया, गोपी मेरे इस रूप को देखे.
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जैसे ही पास गए तो गोपी श्री कृष्ण को देखकर एक हाथ का घूँघट निकाल लेती है, और कहती है…
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खबरदार! श्यामसुंदर! जो मेरे पास आये मेरे धर्म को भ्रष्ट मत करो.
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भगवान को बड़ा आश्चर्य हुआ, बोले…
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गोपी! ये तुम क्या कह रही हो? सभी धर्मो का, कर्मो का, फल, सार मेरा दर्शन है…
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योगी यति हजारों वर्ष तप, ध्यान करते है, फिर भी मै उनको दर्शन तो क्या, ध्यान में भी नहीं आता…
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और मै तुम्हे स्वयं चलकर दर्शन कराने आ गया, तो तुम कहती हो कि मेरा धर्म भ्रष्ट हो?
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गोपी बोली.. देखो श्यामसुंदर! तुम हमारे आराध्य नहीं हो, हमारी आराध्या राधारानी जी हैं…
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और जब तक किसी भी चीज का भोग उन्हें नहीं लगता तब तक वह वस्तु हम स्वीकार नहीं कर सकते, क्योकि हम “अमनिया” नहीं खाते…
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इसलिए पहले आप राधारानी के पास जाओ, जब वे आपके इस रूपामृत का पान कर लेगी…
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तब आप प्रसाद स्वरुप हो जायेगे, तब हम आपके रूप अमृत के दर्शन के अधिकारी हो जायेगे.
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अभी राधा रानी जी ने आपके रूप के दर्शन किये नहीं, फिर हम कैसे कर सकते है.
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सेवक तो प्रसाद ही पाता है.

जय जय श्री राधे

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श्रीनाथ जी को भक्त का थप्पड़ ….



गोवर्धन बड़ा सुन्दर गाँव है। गाँव के बीच में एक मन्दिर है, जिसमें श्रीनाथजी महाराज की बड़ी सुन्दर मूर्ति विराजमान है।

उनके चरणों में नूपुर, गले में मनोहर वनमाला और मस्तक पर मोरमुकुट शोभित हो रहा है।

घुँघराले बाल हैं, नेत्रों की बनावट मनोहारिणी है और पीताम्बर पहने हुए हैं।

मूर्ति में इतनी सुन्दरता है कि देखने वालों का मन ही नहीं भरता।

मन्दिर के पास ही एक गरीब ब्राह्मण का घर था। ब्राह्मण था गरीब, परन्तु उसका हृदय भगवद्भक्ति के रंग में रँगा हुआ था।

ब्राह्मणी भी अपने पति और पति के परमात्मा के प्रेम में रत थी। उसका स्वभाव बड़ा ही सरल और मिलनसार था।

कभी किसी ने उसके मुख से कड़ा शब्द नहीं सुना। पिता-माता के अनुसार ही प्राय: पुत्र का स्वभाव हुआ करता है।

इसी न्याय से ब्राह्मण- दम्पत्ति का पुत्र गोविन्द भी बड़े सुन्दर स्वभाव का बालक था।

उसकी उम्र दस वर्ष की थी। गोविन्द के शरीर की बनावट इतनी सुन्दर थी कि लोग उसे कामदेव का अवतार कहने में भी नहीं सकुचाते थे।

गोविन्द गाँव के बाहर अपने साथी सदानन्द और रामदास के साथ खेला करता था।

एक दिन खेलते- खेलते संध्या हो गयी। गोविन्द घर लौट रहा था तो उसने मन्दिर में आरती का शब्द सुना।

शंख, घण्टा, घड़ियाल और झाँझ की आवाज सुनकर गोविन्द की भी मन्दिर में जाकर तमाशा देखने की इच्छा हुई और उसी क्षण वह दौड़कर नाथजी की आरती देखने के लिये मन्दिर में चला गया।

नाथजी के दर्शन कर बालक का मन उन्हीं में रम गया। गोविन्द इस बात को नहीं समझ सका कि यह कोई पाषाण की मूर्ति है।

उसने प्रत्यक्ष देखा कि एक जीता-जागता मनोहर बालक खड़ा हँस रहा है।

गोविन्द नाथ जी की मधुर मुस्कान पर मोहित हो गया। उसने सोचा, ‘यदि यह बालक मेरा मित्र बन जाय और मेरे साथ खेले तो बड़ा आनन्द हो।’

इतने में आरती समाप्त हो गयी। लोग अपने-अपने घर चले गये।

एक गोविन्द रह गया, जो मन्दिर के बाहर अँधेरे में खड़ा नाथजी की बाट देखता था।

गोविन्द ने जब चारों और देखकर यह जान लिया कि कहीं कोई नहीं है, तब उसने किवाड़ों के छेद से अंदर की ओर झाँककर अकेले खड़े हुए श्रीनाथजी को हृदय की बड़ी गहरी आवाज से गद्गद्- कण्ठ हो प्रेमपूर्वक पुकारकर कहा-

‘नाथजी ! भैया ! क्या तुम मेरे साथ नहीं खेलोगे ? मेरा मन तुम्हारे साथ खेलने के लिये बहुत छटपटा रहा है।

भाई ! आओ, देखो, कैसी चाँदनी रात है, चलो, दोनों मिलकर मैदान में गुल्ली- डंडा खेलें।

मैं सच कहता हूँ, भाई ! तुमसे कभी झगड़ा या मारपीट नहीं करूँगा।’

सरल हृदय बालक के अन्त:करण पर आरती के समय जो भाव पड़ा, उससे वह उन्मत्त हो गया।

परमात्मा के मधुर और अनन्त प्रेम की अमृतमयी मलयवायु से गोविन्द प्रेममग्न होकर मन्दिर के अंदर खड़े हुए उस भक्त-प्राण-धन गोविन्द को रो-रोकर पुकारने लगा।

बालक के अश्रुसिक्त शब्दों ने बड़ा काम किया। ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता4/11) की प्रतिज्ञा के अनुसार नाथजी नहीं ठहर सके।

भक्त के प्रेमावेश ने भगवान् को खींच लिया। गोविन्द ने सुना, मानो अंदर से आवाज आती है- ‘भाई ! चलो ! चलो आता हूँ, हम दोनों खेलेंगे !’

सरल बालक का मधुर प्रेम भगवान् को बहुत शीघ्र खींचता है।

बालक ध्रुव के लिये चतुर्भुज धारी होकर वन में जाना पड़ा।

भक्त प्रह्लाद के लिये अनोखा नरसिंह वेषधारण किया और व्रज- बालकों के साथ तो आप गौ चराते हुए वन-वन घूमे।

आज गोविन्द की मतवाली पुकार सुनकर उसके साथ खेलने के लिये मन्दिर से बाहर चले आये !

धन्य प्रभु ! न मालुम तुम माया के साथ रमकर कितने खेल खेलते हो तुम्हारा मर्म कौन जान सकता है ?

मामूली मायावी के खेल से लोग भ्रम में पड़ जाते हैं, फिर तुम तो मायावियों के सरदार ठहरे !

बेचारी माया तो तुम्हारे भक्त चंचरीकसेवित चरण- कमलों की चेरी है, अतएव तुम्हारे खेल के रहस्य को कौन समझ सकता है ?

इतना अवश्य कहा जा सकता है कि तुम्हें अपने भक्तों के साथ गायें दुहते फिरे थे और इसीलिये आज बालक गोविन्द के पुकारते ही उसके साथ खेलने को तैयार हो गये !

गोविन्द ने बड़े प्रेम से उनका हाथ पकड़ लिया। आज गोविन्द के आनन्द का ठिकाना नहीं है, वह कभी उनके कर- कमलों का स्पर्श कर अपने को धन्य मानता है।

कभी उनके नुकीले नेत्रों को निहार कर मोहित होता है, तो कभी उनके सुरीले शब्दों को सुनकर फिर सुनना चाहता है।

गोविन्द के हृदय में आनन्द समाता नहीं। बात भी ऐसी है। जगत् का समस्त सौन्दर्य जिसकी सौन्दर्य- राशि का एक तुच्छ अंश है,

उस अनन्त और असीम रूपराशि को प्रत्यक्ष प्राप्त कर ऐसा कौन है जो मुग्ध न हो !

नये मित्र को साथ लेकर गोविन्द गाँव के बाहर आया। चन्द्रमा की चाँदनी चारों ओर छिटक रही थी, प्रियतम की प्राप्ति से सरोवरों में कुमुदिनी हँस रही थी,

पुष्पों की अर्धविकसित कलियों ने अपनी मन्द-मन्द सुगन्ध से समस्त वन को मधुमय बना रखा था।

मानो प्रकृति अपने नाथ की अभ्यर्थना करने के लिये सब तरह से सज-धजकर भक्ति पूरित पुष्पांजलि अर्पण करने के लिये पहले से तैयार थी।

ऐसी मनोहर रात्रि में गोविन्द नाथजी को पाकर अपने घर-बार, पिता-माता और नींद-भूख को सर्वथा भूल गया।

दोनों मित्र बड़े प्रेम से तरह-तरह के खेल खेलने लगे।

गोविन्द ने कहा था कि मैं झगड़ा या मारपीट नहीं करूँगा; परन्तु विनोद प्रिय नाथजी की माया से मोहित होकर वह इस बात को भूल गया।

खेलते-खेलते किसी बात को लेकर दोनों मित्र लड़ पड़े।

गोविन्द ने क्रोध में आकर नाथ जी के गाल पर एक थप्पड़ जमा दिया और बोला कि ‘फिर मुझे कभी रिझाया तो याद रखना मारते-मारते पीठ लाल कर दूँगा।’

सूर्य-चन्द्र और अनल-अनिल जिसके भय से अपने-अपने काम में लग रहे हैं, स्वयं देवराज इन्द्र जिसके भय से समय पर वृष्टि करने के लिये बाध्य होते हैं और भयाधिपति यमराज जिसके भय से पापियों को भय पहुँचाने में व्यस्त हैं,

वही त्रिभुवननाथ आज नन्हें-से बालक भक्त के साथ खेलते हुए उसकी थप्पड़ खाकर भी कुछ नहीं बोलते।
धन्य है ! गोवर्धनधारी धन्य है !

" जय जय श्री राधे "

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संवारी धोबन

बहुत ही सुंदर वृतांत


सांवरी जात की धोबन थी। उसका पति हमेशा बीमार रहता था पति की देखभाल बच्चों का पालन पोषण और धोबन होने के कारण उसको कपड़े धोने का काम भी करना पड़ता था। अत्यधिक काम होने के कारण सांवरी के पास शरीर के नाम पर हड्डियों का ढांचा ही था लेकिन सांवरी बहुत हिम्मत वाली और सदा प्रसन्न रहने वाली बड़ी खुशमिजाज स्वभाव वाली औरत थी । अत्यंत गरीबी,पति की देखभाल , बच्चों का ध्यान घर का सारा काम वह हंसते हंसते करती ।किसी को उससे कोई शिकायत नहीं थी गांव में भी वह सबकी प्यारी थी अगर किसी को किसी मदद की जरूरत होती तो वह झट से उसकी मदद कर देती ।

बच्चों और पति के उठने से पहले ही सांवरी सुबह-सुबह ही जाकर नदी में सारे कपड़े धो आया करती थी। 1 दिन सांवरी को कपड़े धोने में थोड़ा सा विलंब हो गया तो गांव की सारी औरतें अब धीरे-धीरे वहां आने लगी सब मिलकर वहां बैठकर कुछ देर के लिए बातें करती थी आज उन्होंने सांवरी को वहां देखा तो उन्होंने उसको भी बिठा लिया और कहा कि कभी हमारे पास भी बैठ जाया करो । सांवरी को घर बैठे बीमार पति और की बच्चे फिक्र थी लेकिन अपनी सखियों के आग्रह को वो टाल न सकी और वही कुछ देर के लिए बैठ गई। तभी अचानक उन औरतें ने कान्हा के बारे में उसकी शरारतों के बारे में उसकी सुंदरता के बारे में उसकी चतुराई के बारे में बातें करना शुरू कर दी। सावंरी को कान्हा की बातें सुनकर बहुत ही आनंद आया उस की सब सखियों ने उसको बताया कि कान्हा नदी के उस पार वाले गांव में रहता है क्योंकि उस से पहले उसने कभी भी कान्हा की बातों को नहीं सुना था कान्हा के बारे में मीठी मीठी बातों को सुनकर सांवरी उन बातों में इतना खो गई कि उसको वक्त का पता ही ना चला ।

कान्हा की बातें सुनते सुनते अब तो जैसे उसे कान्हा से प्यार हो गया अब तो वह हर रोज कान्हा की बातों को सुनने के लिए वह वहां नदी किनारे बैठी रहती। यहां नदी पर सखियों की बातें सुनकर फिर घर जाकर उन बातों को सोचती रहती धीरे-धीरे कान्हा की छवि उसके उसके हृदय में ऐसे घर कर गई कि अब तो हर समय कान्हा की याद ही उसका जीवन बन गई धीरे धीरे कान्हा की बातों को सोच और सुने बिना उसको तो अब सांस भी नहीं आती थी ।हमेशा उसकी आंखों के सामने कान्हा की ही छवि रहती थी । अब सांवरी जब भी नदी में कपड़े धोने जाती तो कान्हा की याद में अपने आप ही उसके आंसू बहने लगते गरीब होने के कारण उसकी साड़ी का पल्लू इतना छोटा था कि वह उस पल्लू से अपने आंसू भी न पौंछ पाती और सारे आंसू उसके नदी में गिरते रहते।

सांवरी ने कान्हा की अपने मन में एक ऐसी छवि अंकित कर ली थी कि कान्हा टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलता है उसके पितांबर पर बांसुरी लटकी हुई है सर पर मोर मुकुट कानों में कुंडल गले में वैजयंती माला पांव में प्यारे प्यारे से छम छम करके घुंघरू और कोमल कोमल से पांव से कान्हा इधर उधर भाग रहा है इसी को याद करते करते सांवरी तड़पती और उसके आंखों में झर झर आंसू बहने लगते ।सांवरी हमेशा यह सोचती की सारे गांव के मैं कपड़े धोती हूं कितना अच्छा होता अगर कान्हा के वस्त्रों को भी मैं धोती उसको अच्छे से स्त्री करती ऐसा सोचते सोचते उसका मन व्याकुल हो उठता अश्रुओं की जलधार उसके आंखों से बह कर उसके वक्ष स्थलों को भिगोती हुई नदी की जलधार में मिल जाती ।एक दिन ऐसे ही सावंरी नदी पर वस्त्रों को धो रही थी और नदी के उस पार कान्हा राधा संग एक उपवन में सखियों द्वारा सजाए हुए सावन के झूले पर बड़े आनंद से झूला झूल रहा था सावन अपने पूरे यौवन पर था चारों ओर प्रकृति ने अपनी अत्यंत अलौकिक और अद्भुत छटा बिखेरी हुई थी हरे हरे वृक्ष के पत्तों पर पक्षी ऐसे विराजमान थे जैसे कि अभी-अभी वह सब नहा धोकर आए हैं चारों ओर का वातावरण आनंदित और मन को पुलकित करने वाला था । राधा संग झूला झूलते हुए बीच में राधा की अत्यंत सुंदर छवि को देखकर कान्हा बीच-बीच में मुस्कुराते और राधा रानी सर को लज्जा से झुका लेती। दोनों की प्रसन्नता से भरे चित को देखकर सखियां और जोर से झूला झुलाने लगती ।

आज तो आकाश में बादल अठखेलियां खेल रहे थे। कभी तो अचानक श्याम सुंदर की तरह काले बादल आ जाते हैं और कभी-कभी गोरी राधा की तरह आसमान बिल्कुल साफ हो जाता ऐसे ही बादलों की आंख में मिचोली चल रही थी तभी अचानक से ऐसी बदली आई कि कान्हा एकदम से झूले से उठकर उपवन के बीच में जाकर खड़े हो गए राधा ने कान्हा के पल्लू को एकदम से खींचकर कहां हे शामसुंदर थोड़ी देर और झूला झूलो लेकिन कान्हा तो किसी और ही सोच में डूबा हुआ था तभी अचानक से उस बदली ने बरखा करनी शुरू कर दी और कान्हा उस बरखा में आंखें बंद करके भीगने लगे जब राधा ने भी कान्हा संग उस बारिश का आनंद लेना चाहा तो कान्हा ने हाथ के इशारे से राधा को झूले पर बैठने के लिए कहा राधा रानी असमंजस में पड़ गई और एकदम से हैरान हो गई आज कान्हा अकेले ही बारिश का आनंद क्यों ले रहे हैं कान्हा बारिश के पानी से पूरी तरह से भीग चुका था और अचानक से बारिश बंद हो गई राधा झूले से उठकर जब कान्हा के पास आई और उसने कान्हा को छुआ और उसकी आंखों में देखा तो कान्हा एकदम से तप रहा था और उसकी आंखों एकदम से लाल हुई थी जब राधा रानी ने आश्चर्य से कान्हा की तरफ देखा तो कान्हा ने राधा को कंधे से पकड़ते हुए कहा प्रिये कुछ देर के लिए हुई यह जो बारिश थी यह बारिश ना होकर यह सांवरी के वो आंसू थे जो हर रोज मुझे याद करके मुझसे मिलने की तड़प में मेरे विरह में से उसकी आंखों से झर झर बह कर नदी की जलधारा में मिल जाया करते थे और आज यह बदली उन आंसुओं को खींच लाई और सांवरी की बरसों से अधूरी इच्छा को पूर्ण किया कि सांवरी कैसे हरपल सोचती और तड़पती थी कि वह भी मेरे वस्त्रों को धोए और देखो प्रिया कैसे आज उस के गरम गरमआंसुओं में भीग कर मेरे सारे वस्त्र धूल गए । मेरा शरीर सांवरी के गरम आंसुओं से भीग कर तभी तप रहा है आज सांवरी की इच्छा पूरी हो गई ।

आज सांवरी के प्रेम के आंसुओं में उसका सांवरा भीग कर अत्यंत आनन्दित हो रहा है किशोरी जू सांवरी के प्रेम भाव और कान्हा के भक्तों के प्रति भाव को देख कर कान्हा की और एक टक देखती हुई म़ंद मंद मुस्कुरा उठी और सोचने लगी भगत के वश में है भगवान।
“पाना है यदि प्रभु को तो प्यार से मिलेगा।
प्रेम अश्रुओं में नहाता जलधार में मिलेगा”।
बोलो भगत वत्सल भगवान की जय हो।

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झूलन लीला

वैसे तो प्रिया प्रीतम की हर लीला अद्भुत होती है ।
पर उसमें झूलन लीला बड़ी ही दिव्य है अपने नेत्र बंद करके इस लीला का दिव्य दर्शन कीजिए ।
कितना सुंदर प्रेम है जिसमें निज प्रेमी के लिए समर्पण है।

झूलनलीला

सावन मास का महीना था।प्रिया प्रीतम के मन में झूलन की उमंग जागी बस सखियों ने सोचा प्रिया प्रीतम के साथ आज झूलन लीला की जाय।ललिता जी ने पूछा प्रिया प्रीतम से जैसा आपका मन हो वैसी ही व्यवस्था की जाए श्यामसुंदर ने कहा एक साथ दो झूले होंगे एक कदम्ब की डाल पर और दूसरा उसके पास तमाल वृक्ष पर। यह दोनों झूले आस पास होंगे। एक पर प्रिया जी झूलेंगे और एक पर मैं झुलूंगा और दोनों में आज प्रतियोगिता होगी देखें कौन जीतता है।
ललिता बोली जीत तो हमारी स्वामिनी की ही होगी।प्रियतम बोले थे तुम अभी से कैसे भविष्यवाणी कर सकती हो ललिता जी बोली हमारी प्रिया जी दुबली-पतली हैं उनकी कमर की लचक बहुत गहरी है तो प्रिया जी ही जीतेगी।
लीला के अनुसार दो वृक्षों पर अलग-अलग झूले डाल दिए गए कदम्ब वृक्ष पर प्रिया जी झूल रही हैं और तमाल वृक्ष पर प्रियतम झूल रहे हैं।ललिता विशाखा चित्रा जी इंदु लेखा श्री प्रिया जी को झुला रही हैं।चंपक लता रंग देवी तुंग विद्या और सुदेवी प्रियतम को झुला रही हैं।
अब प्रिया जी ने झूला झूलना आरंभ कर दिया झूला हवा से बातें करने लगा ललता जी ने आज बहुत जोर से झूला रही है।प्रिया जी की कमर बहुत सुंदर लचक ले रही थी प्रिया जी कभी सामने वृक्ष की ऊंची डाल को छू आती और जब पीछे जाती तो उनकी बेणी ऊची डाल को छू लेती उनका नीलांबर उन्मुक्त रूप से लहरा रहा है।प्रिया जी के कंठ में सुमन हार स्वर्ण हार हीरों का हार मुक्ता हार आदि प्रिया जी के साथ लहरा रहे हैं, जब प्रिया जी सामने की ओर जाती तो यह प्रिया जी के लिए हृदय से लग जाते और जब पीछे आती यह हार कंठ से झूले लगते।हारो के चिपकने और झूले की शोभा अनुभव सुंदर है।प्रिया जी के कुंडल भी लहरा रहे थे उनकी शोभा अद्भुत सुंदर सी है। प्रिया जी के नूपुर झूले के साथ मधुर नृत्य कर रहे हैं। मानों सरगम बज रही हो अनुपम शोभा प्रिया जी के झूलने की।
तुंगविद्या जी ने कहा प्रियतम तुम क्यों नहीं झूलते हम तुम्हें झुला देंगी विश्वास करो तुम्हारी झूलन में विजय होगी।प्रियतम बोले मैं अभी थोड़ी देर से झुलुगा प्रियतम धीमे धीमे झूल रहे हैं। चार पग आगे आते चार पग पीछे जाते आते बस इतना ही झूल रहे थे तुंगविद्या जी ने कहा ऐसे तो आप हार जाओगे।प्रियतम ने कहा यह मेरे झूलन का आनंद आज महान है।प्रीतम ने कहा मे झूलन का आनंद आज अत्यधिक है मेरे मन के भीतर देखो-
आज मेरा मन प्रिया जू के नीलाम्बर के साथ झूल रहा है।
मैं प्रिया जू के बेणी के साथ झूल रहा हूँ।
मैं प्रिया जू के हार के साथ झूल रहा हूँ और ह्रदय से लग जाता हूँ झूलते झूलते।
मैं प्रिया जी कमर की साथ झूल रहा हूँ।
प्रिया जू करधनी को पकड़ कर जब प्रिया जी एक डाल को छु कर मुस्कुराती हैं तो उनकी मुस्कान के साथ झूलता हूँ।
मैं प्रिया जी के कुंडल के साथ झूल रहा हूँ।
अद्भुत झूलन है।
मैं प्रिया जू के नुपुर की मधुर ध्वनि के साथ झूल रहा हूँ।
ललिता जी पूछो जीत किसकी हुई मेरी या प्रिया जी की।भले जीत प्रिया जी हुए पर महा आनंद मुझे मिला।ललिता जी निर्णय करे किसका झूलन श्रेष्ठ है।
चम्पकलता जी बोली आपकी प्रिया जी में प्रेम अतुलनीय है।आपको प्रिया जी के प्रति प्रेम पर बलिहार।प्रियतम बोले में हमेशा प्रिया जू से हारता हूँ।प्रिया जू की जीत में मेरी ही जीत है।जब जीत कर प्रिया जी आनंद पाती है तब मैं महाआनंद पाता हूँ उनके आनंद पर बलिहार जाता हूँ।

प्रिया जू के मनोहर झूलन लीला की जय हो

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ठाकुर जी को छप्पन भोग क्यों लगाते है ?


भगवान को लगाए जाने वाले भोग
की बड़ी महिमा है। इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है।
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यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है।
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अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं।
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ऐसा कहा जाता है कि यशोदा जी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी। अर्थात् श्री बालकृष्ण लाल आठ बार भोजन करते थे।
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जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत
को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक
भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया।
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आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा..
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तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मैया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ।
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भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया।
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गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग…
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श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों।
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श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी।
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व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के
उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया।
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छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां…
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ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं।
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उस कमल की तीन परतें होती हैं। प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह”
और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं।
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प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में श्री भगवान विराजते हैं।
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इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है। 56 संख्या का यही अर्थ है।
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छप्पन भोग इस प्रकार है…


  1. भक्त (भात),
  2. सूप (दाल),
  3. प्रलेह (चटनी),
  4. सदिका (कढ़ी),
  5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी),
  6. सिखरिणी (सिखरन),
  7. अवलेह (शरबत),
  8. बालका (बाटी),
  9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
  10. त्रिकोण (शर्करा युक्त),
  11. बटक (बड़ा),
  12. मधु शीर्षक (मठरी),
  13. फेणिका (फेनी),
  14. परिष्टïश्च (पूरी),
  15. शतपत्र (खजला),
  16. सधिद्रक (घेवर),
  17. चक्राम (मालपुआ),
  18. चिल्डिका (चोला),
  19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
  20. धृतपूर (मेसू),
  21. वायुपूर (रसगुल्ला),
  22. चन्द्रकला (पगी हुई),
  23. दधि (महारायता),
  24. स्थूली (थूली),
  25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
  26. खंड मंडल (खुरमा),
  27. गोधूम (दलिया),
  28. परिखा,
  29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
  30. दधिरूप (बिलसारू),
  31. मोदक (लड्डू),
  32. शाक (साग),
  33. सौधान (अधानौ अचार),
  34. मंडका (मोठ),
  35. पायस (खीर)
  36. दधि (दही),
  37. गोघृत,
  38. हैयंगपीनम (मक्खन),
  39. मंडूरी (मलाई),
  40. कूपिका (रबड़ी),
  41. पर्पट (पापड़),
  42. शक्तिका (सीरा),
  43. लसिका (लस्सी),
  44. सुवत,
  45. संघाय (मोहन),
  46. सुफला (सुपारी),
  47. सिता (इलायची),
  48. फल,
  49. तांबूल,
  50. मोहन भोग,
  51. लवण,
  52. कषाय,
  53. मधुर,
  54. तिक्त,
  55. कटु,
  56. अम्ल.

जानकारी कैसी लगी कमेंट में बताएं

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कान्हा का चित्र



एक बार कन्हैया को जिद्द चढ़ गई कि मैं अपना चित्र बनवाऊँगा
ये बात कान्हा ने मईया ते कही, मईया मै अपना चित्र बनवाऊँगो,
मईया बोली चित्र बनवाय के का करेगो,
कन्हैया बोले, मोय कछू ना पतो मैं तो बनवाऊँगो,
मईया कन्हैया को एक औरत के पास ले गई जिसका नाम था चित्रा,

वो ऐसा चित्र बनाती थी कि कोई पहचान भी ना पावे था कि असली कौन है…
मईया कान्हा को चित्रा के पास ले कर गई और कहा कि कान्हा का चित्र बना दो,
चित्रा ने कान्हा को कभी देखा नही था
चित्रा ने जैसे ही कान्हा को देखा वो देखती ही रह गयी
और मन मे सोचने लगी इतना प्यारा लल्ला और बहुत ही प्रेम मे खो गयी

जब मैया ने चिकोटी काटी तब कही जाकर उसकी तन्द्रा भंग हुई ,
चित्रा ने कान्हा को सीधे खडे होने या बैठ जाने को कहा –
लेकिन कान्हा टेढे होने के कारण , बार-बार टेढे खडे हो जाते या बैठ जाते,

!कान्हा बोले चित्र बनाना है
तो ऐसे ही बनाओ.
मे तो एसो ही हूँ टेडो मेडो सो,

लेकिन जब चित्रा ने कान्हा की सूरत देखती तो उनकी शरारत आँखों मैं बस गयी
चित्रा का चित कान्हा मे ही कहीं खो गया

मईया कान्हा को ले कर चली गई और
चित्रा से बोली चित्र बना कर कल हमारे घर दे जाना
लेकिन चित्रा जब भी कान्हा का चित्र बनाती तो रोने लग जाती
और सारा चित्र खराब हो जाता

किसी तरह उसने चित्र बनाया और मईया के घर गई.
जब मईया ने चित्र देखा तो ,ख़ुशी के मारे झूम उठी और

चित्रा को वचन दिया की
इस चित्र के बदले तू जो माँगेगी मैं दुँगी चित्रा बोली सच मईया..
मईया बोली हाँ जो माँगेगी मैं दुँगी..
चित्रा बोली तो जिसका चित्र बनायो है वाको ही दे दिओ

मईया ये बात सुन रोने लगी और
बोली तू चाहे मेरे प्राण मांग ले पर कान्हा को नही….

चित्रा बोली मईया तू अपना वचन तोड़ रही है
मईया रोते हुए बोली तू कान्हा के समान कुछ भी माँग ले मैं दूँगी
चित्रा बोली तो कान्हा के समान जो भी वस्तु हो तुम मुझे दे दो…

मईया ने घर और बाहर बहुत देखा पर कान्हा के समान कुछ ना मिला..

इतने मे कान्हा चित्रा को थोङा कौने मे ले जा कर बोले
देख तू मुझे ले जायेगी तो मेरी माँ मर जायेगी

चित्रा बोली अगर तू मुझे ना मिलो तो मै मर जाउँगी.
तब कान्हा ने चित्रा को समझाया की मे तो बृज मे आया ही इस ही लिए हूँ

तू क्या जो भी मुझ को एक बार दिल से याद करेगा
मैं खुद ही उसके सामने आ जाऊँगा मे सब
गोपियों का लाला हूँ और मेरी तो बहुत सारी मैया हैं
तू भी तो मेरी मैया है ,और मैं अपनी मैया कू रोते नाय देख सकू
कान्हा की भोली भोली बातो मे चित्रा रीझ गयी

और बोली जब बुलाऊगी तब आयेगो न तब कान्हा बोले तेरी सो आऊंगा
तब चित्रा खुश हो कर मईया से बोली अरी मईया मैं तो मजाक कर रही थी,

मुझे तेरा लाला नही चाहिये..ये सुन कर मईया की जान मे जान आई

यहाँ गोपी का कृष्ण के प्रति अनुराग और
मैया के कृष्ण प्रेम की लीला
का अद्भुत और विलक्षण द्रश्य है,

हे कृष्ण

भक्त्ति से अधिक आनंदित करने वाली
सृस्टि में कोई वस्तु नहीं है
जिसने एक बार इस सुख को पा लिया
वह सदा सदा केे लिए प्यासा हो गया…….


जय जय श्री राधेश्याम

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निधिवन की लीला


एक बार कृष्ण और राधा जू निधिवन में रात्रि में सभी गोपियों के साथ हास परिहास कर रहे थे। राधा जू ने कृष्ण से कहा, 'आप मुझे कोई कहानी सुनाइए या फिर ये बताइये कि भक्त कष्ट क्यों पाते हैं ?' कृष्ण बोले, 'राधे! सुनो, एक भक्त थे, वो ह्रदय से मेरी भक्ति करते थे। उन्हें लगता था की भगवान की भक्ति करने से उनके जीवन में सुख ही सुख रहेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्हें भक्ति करते कई साल बीत गए और वो निर्धन होते चले गए। यही नहीं उनके समकालीन लोग उनसे बहुत धनी हो गए और वे सब उन भक्तजन का बड़ा परिहास उड़ाते। भक्त को लगता, 'उनसे अच्छा तो ये लोग ही जीवन जी रहे हैं इन्हे तो भगवान की भक्ति भी नहीं करनी पड़ती। मैंने भी इतना समय लगा कर देख लिया न तो प्रभु मिले और ना ही जीवन में कुछ सुख आया। अब तो मैं भक्ति भी नहीं छोड़ सकता वरना लोग मुझे और भटका हुआ समझेंगे।' ऐसा विचार करते-करते उन्होंने ये अनुभव किया कि लगता है मुझे प्रभु कृष्ण की प्रतीति ही नहीं है, मुझे ये कैसे विश्वास हो कि वो सचमुच हैं या नहीं । उस भक्त ने सुन रखा था कि, 'भगवान श्रीकृष्ण निधिवन में प्रतिदिन आते हैं और कोई छुप के देख ले तो उसका अहित हो जाता है।' उसने सोचा अब मेरा क्या अहित होगा ये विचारकर वो साँझ को सबसे आँख बचाकर निधिवन में छुप गया और रात्रि कि बाट जोहने लगा। अब बताओ राधा मैं उन संत जन को कैसे बताऊँ कि यदि सांसारिक इच्छा उनकी शेष रहेगी तो उन्हें जाने कितने जन्म और कितनी योनियों में भटकना पड़ेगा। इसीलिए मैं उन्हें सांसारिक सुख नहीं दे रहा, और अगर वो संसार की आसक्ति हटा दें तो उन्हें सब कुछ मिल जाएगा। इसके लिए उन्हें मुझमे ही मन लगाना पड़ेगा। इन भक्त जन को ये लगता है कि भगवान निधिवन में आते नहीं हम उन्हें कैसे बताएं हम आते भी हैं और अपने भक्त जनो की बात भी चलाते हैं।' ऐसा कहकर कृष्ण मुस्कुरा दिए। तभी वो भक्त जो वहां छुपे बैठे थे भगवान कि अद्भुत दिव्य लीला देखकर चमत्कृत रह गए। वे दौड़ के आये और प्रभु के चरणो में गिर गए। वे राधा रानी का भी बहुत आभार करना चाहते थे जो उन्होंने ऐसा प्रश्न किया लेकिन वो कुछ कह ही न पाये। प्रभु कि अनुकम्पा से जब वे कुछ बोल सके और जब उनसे वर मांगने का कहा गया तो बार-बार आग्रह करने लगे कि उनके इस दिव्य स्वरुप को ही वो नित्य देखना चाहते हैं। प्रभु ने कहा ठीक है तुम यहीं निधिवन में लता बनकर रहो अबसे तुम भी हमारे साथ नित्य रात्रि में रहोगे, और प्रभु ने उस भक्त-गोपी को जो कई जन्मों से प्रभु से बिछड़ी हुई थी कृतार्थ कर दिया ।


"जय जय श्री राधे"

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फूल तोड़ने की लीला


श्री रूप गोस्वामी जी पर राधाकृष्ण की कृपा की वृष्टि जब निरन्तर होने लगी.
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उन्हें प्राय: हर समय उनकी मधुर लीलाओं की स्फूर्ति होती रहती.
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पहले तो जो कोई उनके पास आता अपनी कुछ शंकाए लेकर या भजन-साधन में अपनी कुछ समस्याएं लेकर,  
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वे बड़े ध्यान से उसकी बात सुनते, मृदु वचनों से उसकी शंकाओं का समाधान करते, आवश्यक निर्देश देकर साधन-संबंधी उसकी समस्याओं को हल करते.
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जो भी उनके पास आता म्लान मुख लेकर उनसे विदा होता एक अकथनीय आनन्द लहरी से व्याप्त मन और प्राण लेकर.  
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पर अब अक्सर उन्हें किसी के आने-जाने का पता भी न चलता.
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लोग आते उनके पास, उनके वचनामृत से तृप्त होने. पर कुछ देर उनके पास बैठकर प्यासे ही लौट आते.
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एक बार कृष्णदास नाम के एक विशिष्ट वैष्णव-भक्त, जो पैर से लंगड़े थे, उनके पास आये कुछ सत्संग के लिए.
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उस समय वे राधा कृष्ण की एक दिव्य लीला के दर्शन कर रहे थे.
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राधा एक वृक्ष की डाल से पुष्प तोड़ने की चेष्टा कर रही थीं. डाल कुछ ऊँची थी.
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वे उचक-उचक कर उसे पकड़ना चाह रही थीं, पर वह हाथ में नहीं आ रही थी.
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श्यामसुन्दर दूर से देख रहे थे. वे आये चुपके से और राधारानी के पीछे से डाल को पकड़कर धीरे-धीरे इतना नीचा कर दिया कि वह उनकी पकड़ में आ जाय.
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उन्होंने जैसे ही डाल पकड़ी श्यामसुन्दर ने उसे छोड़ दिया.
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राधारानी वृक्ष से लटक कर रह गयीं. यह देख रूप गोस्वामी को हंसी आ गयी.  
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कृष्णदास समझे कि वे उनका लंगड़ापन देखकर हंस दिये.
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क्रुद्ध हो वे तत्काल वहाँ से गये. रूप गोस्वामी को इसका कुछ भी पता नहीं.
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अकस्मात उनकी लीला-स्फूर्ति बन्द हो गयी.
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वे बहुत चेष्टा करते तो भी लीला-दर्शन बिना उनके प्राण छट-पट करने लगे.
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पर इसका कारण वे न समझ सके. सनातन गोस्वामी के पास जाकर उन्होंने अपनी व्यथा का वर्णन किया और इसका कारण जानना चाहा.  
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उन्होंने कहा, तुम से जाने या अनजाने कोई वैष्णव-अपराध हुआ हैं, जिसके कारण लीला-स्फूर्ति बन्द हो गयी हैं.
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जिनके प्रति अपराध हुआ है, उनसे क्षमा मांगने से ही इसका निराकरण हो सकता है.
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रूप गोस्वामी ने पूछा- जान-बूझकर तो मैंने कोई अपराध किया नहीं. यदि अनजाने किसी प्रति कोई अपराध हो गया हैं, तो उसका अनुसन्धान कैसे हो ?
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सनातन गोस्वामी ने परामर्श दिया, तुम वैष्णव-सेवा का आयोजन कर स्थानीय सब वैष्णवों को निमन्त्रण दो.
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यदि कोई वैष्णव निमन्त्रण स्वीकार न कर सका, तो जानना कि उसी के प्रति अपराध हुआ है
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रूप गोस्वामी ने ऐसा ही किया.  
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खंज कृष्णदास बाबा ने निमन्त्रण स्वीकार नहीं किया.
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जो व्यक्ति निमन्त्रण देने भेजा गया था, उससे उन्होंने रूप गोस्वामी के प्रति क्रोध व्यक्त करते हुए उस दिन की घटना का वर्णन किया.
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रूप गोस्वामी ने जाकर उनसे क्षमा माँगी और उस दिन की अपनी हंसी का कारण बताया.  
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तब बाबा संतुष्ट हुए और रूप गोस्वामी की लीला-स्फूर्ति फिर से होने लगी.
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साधकों के लिए इस घटना का विशेष महत्व है.

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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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बरसाने वारी का बरसाना


बरसाना सदा से ही राधारानी का प्रिय धाम रहा है
पहले यह वृषभानपुर था परंतु जब स्वामिनिजी प्रकट भायी तब से बरसाना कर दिया
क्यूँकि ” बरसाना का अर्थ है ” वर्षाना”
स्वामिनीजी बोली श्याम हमारे बरसाने में अगर कोई वर्ष में एक बार भी आ जाए तो उस पर कृपा हो जाए
क्यूँकि यह मेरे बरसानाहको

श्यामसुंदर बोले “स्वामिनीजी इस सारे जगत के तीर्थ मेरे चरणो से निकले है …गंगा मैया मेरे चरण से प्रकट भायी है ।यह सब तीर्थ मेरे अंशमात्र से प्रकट हुए है वृंदावन मेरा देह और ह्रदय है पाँच कोस में ( नारद पंचरात) परंतु आपका बरसाना मेरी ह्रदय की धड़कन है बिना धड़कन के ह्रदय किस काम का स्वामिनीजी ( कूद कर ताली मार हँसती हुई बोली) तो मेरा बरसाना सबसे बड़ा श्याम मुस्कुराकर बोले” हाँ,सबसे बड़ा, श्यामसुंदर बोले आपके इस बरसाने में हमें जगह मिलेगी स्वामिनिजी , स्वामिनी कुछ मुँह बिचकाकर बोली हाँ हाँ ज़रूर और अपनी चुनरी श्याम मुख पर देकर बोली परंतु आपको यहाँ ” सखी ” रूप में आना होगा बरसाना मेरी सखीयो का स्थान है और आप मेरी सबसे प्रिय सखी श्याम सुंदर बोले दोनो हाथ फैला कर बोले ” सखी” वो भी मैं अरी स्वामिनिजी ” मैं बालपन से ही सखीयो से डरता आया हूँ

जब छोटों था तो मैया से सखियाँ ख़ूब शिकायत लगाती थी पिटवाने के लिए जब बड़ों हुओ तो गोपियाँ नाम लगाती वस्त्र चुराए स्वामिनीजी अपने सिंघाँसन पर जा बैठी और हाथ में नीलकमल का फूल लिए बोली अच्छा श्याम सुंदर आप तो भोले थे श्यामसुंदर बोले ही जा रहे थे के ललिता विशाखा आदि आ गयी और सब स्वामिनिजी के निकट खड़ी हो गयी और स्वामिनिजी को पान भेंट किया श्यामसुंदर कुछ झेप से गए ललिताजी बोली क्या हुआ श्याम सुंदर स्वामिनिजी मुख में पान दिए पूरा मुख खोले बिना आधे मुख से अधररस टपकाए बोली ललिताजी कुछ बता रहे है श्यामसुंदर कहते है सखी तंग करती है ललिता बोली सखी तंग करती है हाय हाय ललिताजी मुस्कुराकर स्वामिनिजी की तरफ़ इशारा कर बोली सखियाँ आप को तंग करती है या आप सखीयो को स्वामिनीजी बोली बस श्याम आपको बरसाने में प्रवेश केवल सखी भेष में मिलेगा ठीक है श्यामसुंदर बोले आपकी आज्ञा है तो सखी भी बन जाएँगे

अब श्यामसुंदर नंदगाओं गए पूरी रात सोचने लगे मैंने कितनो रूप बनाए है कछुआ, नरसिंह, बारह परंतु सखी रूप तो बनायो ना
कैसे बनू सखी??? श्यामसुंदर रात्रि के समय अपने कक्ष में सोच रहे है
अब स्वामिनिजी ने कहा है तो सखी बनना ही पड़ेगा वैसे भी सब ” बरसाने वारी ही करती है”
है के नहि?? अब श्यामसुंदर अपना पीताम्बर अपनी सर पर चुनरी रूप में ले लिया मैया यशोदा का सिंदूर आदि शिंगार ले आए और आइने के सामने लग गए सखी बनने अब अपने केश को जूड़ा बनाना शुरू किया केश इतना मुलायम के बार बार जूड़ा खुल जाता थक गए जैसे तैसे जूड़ा बना लिया सुबह बरसाना भी जाना है सखी प्रवेश में अब बिंदी माथे पर लगाएँ तो गिर जाए बार बार क्यूँकि श्यामसुंदर का माथा इतना चिकना है  मैया दूध दही से जो नहलवाती है जैसे तैसे बिंदी भी लगा ली अब नैन में काजल लाग़ावे अब बरसाने के सखी तो काजल लम्बा सा लाग़ावे श्याम जब काजल लम्बा लगाए तो सारा काजल गालों पर गिर जावे बोले ” दारी के काजल तोको भी आज अपनो रंग दीखानो थे काला कहीं को यह बोल काजल भी लगाय लियो अब पीताम्बर को धोती सी बना लपेटने लगे अब ज्यूँ लपेटेते तभी गिर जातो कन्हैया खीजीया गया बोले दारी के पीताम्बर सारों दिन मोसे लिपटे रहेगो आज धोती बनाय रहू हूँ तो बाँध नाहे रहा यहाँ समय बीता जा रहा है प्रभात होने को है बरसाना जाना है सखी बन और सब के सब मेरे वैरी बने हुए है

कन्हैया ने जैसे तैसे पीताम्बर को धोती बना लपेट लियो अब जैसो चलने लगो गिरते गिरते बचो अब सोचने लगो ” यह बरसाने की नारियाँ ठीक कहवे है जे हम नंदगाओं के गवालान ते ज़्यादा मज़बूत है कैसो कैसो शिंगार करे और धोती पहन चल भी ले चलो श्यामसुंदर त्यार तो हो गए जैसे तैसे प्रभात हुई मैया से बोले मैया आजु हमें बरसाने जानो है मधुमंगल की लकड़ी जिस से गैया चरावे है वो खोय गयी वहाँ मैया बोले लाला इतनो सवेरा कन्हैया बोला मैया तू जाने है मधुमंगल मेरो मित्र है और ब्राह्मण तो आशीर्वाद ही देगा तेरे लाला को और तू ही तो कहवे ब्राह्मण की सेवा कर मैया ने हाँ भर दी अब चले कन्हैया ” सखी बनकर” छम छम छम छम चटकते मटकते बरसाने के और पहला शिंगार किया क्यूँ ना स्वामिनी को दिखाए मन ही मन बहुत ख़ुश है के आज स्वामिनी मेरा सखी शिंगार देख कितनी ख़ुश होगी नथ नाक से निकले तो प्रार्थना करे ” अभी मत निकल स्वामिनी को दिखा दूँ तब निकल जाना वहाँ जूड़ा खुला प्रार्थना करे अभी मत खुल स्वामिनी को दिखा दूँ

जैसे तैसे सम्भाल के पहुँच गए बरसाना सखी भेष में बरसाने की नारियाँ सब आश्चर्यचकित कौन सी सखी है यह ” कोई कहे कोई नयी ब्याय कर आयी है कोई कहे नहि नयी ऐसे ही किसी से मिलने आयी है कोई कह हो ना हो इतनी ज़ेवर लाद लियो तो वृषभानुबाबा के महल जा रही होंगी राधारानी के सखी होगी कोई श्यामसुंदर घबरा गए बोले राधा रे राधा तेरो बरसाना और यहाँ की नारियाँ डर लग रहो है जैसो भी पहुँच गए रंगीली गली वहीं तो खेलती है स्वामिनी अब सोचे कहीं ते आयना मिले जावे तो देख लूँ सब ठीक ठाक है ना

वहाँ ललिता विशाखा आदि की हँसी ठिठोलि सुनी और स्वामिनी को आता देख बोले ओह ” विधाता शंकर जी कृपा करना आप भी रास में सखी बन आए थे तो मैंने आपसे रास किया था अब आज मेरा शिंगार की लाज रखना स्वामिनीजी ने दूर से देखा ललिता जी देखो देखो कितनी सुंदर सखी बरसाने आयी है श्यामसुंदर ने घूँघट किया था ललिता जी बोली महारानी मुख तो देखा नहि आपने सुंदर कैसी अब स्वामिनी तो अपने श्याम को पहचानन्ति है बोली नहि ललिता जी देखो देखो कितना प्यार शिंगार किया है श्यामसुंदर रंगीली गली में घूँघट काड़े खड़े है और चारो तरफ़ सखियाँ और राधारानी स्वामिनीजी कूद कर ताली मारती बोली ललिता जी हमें इनके साथ खेलना है हम नहि जानतीं इन्हें देख हमें कुछ आनंद सा हो रहा है श्यामसुंदर राधारानी की बात सुनकर घूँघट खोलने वाले थे के डर गए के कहीं शिंगार धोखा ना दे जावे तभी राधारानी ने स्वयं कहा ” अरी गज़गामी आपकी चाल मधुर है हाथ चरण अति आनंद प्रदान कर रहे है मुझे मैं आपका घूँघट खोलना चाहती हूँ खोल सकती हूँ अंदर श्यामसुंदर में आनंद प्रगाढ़ हो गया राधारानी के वचन सुन बोले खोल लो खोल लो स्वामिनीजी ने अपने छोटे छोटे कोमल हाथो से घूँघट खोला ललिताजी विशाखा जी सब नैन लगा के देख रही है तभी श्यामसुंदर का मुख देखा तो क्या दिखा ” सारा काजल नीले नीले गालों पर फ़ेल गया जैसे नीले आसमान में काले काले बादल नथ नाक से निकल लटकने लगी जैसे किसी वृक्ष पर कोई फल केश मानो ऐसे लगे जैसे कोई तपस्वी के केश हो खुले खुले बिंदी माथे से सरक कर नासिका पर आ गयी
जैसे नासिका सामान पर्वत पर लाल लाल बिंदी सूरज की लालिमा

स्वामिनीजी ने ललिताजी को देखा और फिर विशाखा जी को अब सब जगह शांति हो गयी कन्हैया बोला ” मुँह लटकाए” मेरी प्राणप्यारी मेरा शिंगार अच्छा नहि लगा मैं पुरीं रात्रि नहि सोया सखी बनने के लिए अब जैसा मुझे आता वैसा बना लिया

कभी सखी बना नहि ना और बरसाने के तो बाबा रे बाबा कितनो मुश्किल है सखी बनना वो भी बरसाने की स्वामिनीजी जो ठाहका मार हँसीं के पूरी रंगीली गली में आनंद सो आय गयी बोली मेरे कन्हैया प्राणप्रिय तेरा शिंगार सबसे सुंदर है रे तेरा यह शिंगार सखी बनने का था पर तेरे रूप स्वरूप पर तो कितनी सखियाँ प्राण दे देती है आ मेरे प्यारे आज मैं तुझे सखी बनाती हूँ बरसाने की

स्वामिनिजी ने बीचों बीच रंगीली गली में एक सुंदर सोने की चोकी मंगवायी और कितने बहुमूल्य अपने आभूषण अपने गले से निकाल लिए

अब श्यामसुंदर को सखी बनाने लग गयी सुंदर सा जूड़ा बांधा उस पर कई तरह के माला डाली हर माला पर श्याम श्याम बोलती जा रही थीं

वहाँ सखियाँ गीत गाने लगी रंगीली गली में ” आज श्याम श्यामा सखी बने”

स्वामिनिजी ने बिंदी लगायी श्याम बोले नहीं लगेगी राधा मेरा माथा चिकना है ना

राधारानी बोली लगेगी इस चिकने माथे पर बरसाना रज नहि लगी अभी स्वामिनी ने रज उठा माथे पर लगायी बिंदी लग गई

अब नाथ पहनायी गिर गयी स्वामिनी बोली इतनी भारी नथ कालिया नाग को नाथ दिया पर नथ लगाने नहीं आया

श्याम मूह छिपाकर हसने लगे श्याम बोले वो कालिया नाग भी आपकी कृपा से नाथा था
तो नथ भी आप ही लगा दो कृपा कर के                    

राधे राधे

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कान्हा का नामकरण


भगवान श्रीकृष्ण की तमाम लीलाओं के बारे में हम सब जानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लीलाधर श्रीकृष्ण का नाम कान्हा और कन्हैया कैसे पड़ा। दरअसल इसके पीछे भी पौराणिक कहानी है। और आज पौराणिक कहानी में हम इसी कथा के बारे में बताने जा रहे हैं…

एक दिन वासुदेव प्रेरणा से कुल पुरोहित गर्गाचार्य गोकुल पधारे। नन्द यशोदा ने आदर सत्कार किया और वासुदेव देवकी का हाल लिया। जब उन्होंने गर्गाचार्य से जब आने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया, ‘पास के गांव में बालक ने जन्म लिया है। वही नामकरण के लिए जा हूं बस रास्ते में तुम्हारा घर पड़ता था इसलिए मिलने आ गया।’ यह सुन कर नन्द और यशोदा ने गुरु से विनती कि, ‘बाबा हमारे यहां भी दो बालकों ने जन्म लिया है उनका भी नामकरण कर दो।’

गर्गाचार्य ने मना करते हुए कहा, ‘तुम्हें हर काम जोर शोर से करने की आदत है। कंस को पता चला तो मेरा जीना दुषभर करेगा।’ लेकिन नन्द बाबा कहां मानने वाले थे कहने लगे, ‘भगवन गौशाला में चुपचाप नामकरण कर देना हम किसी को नहीं बताएंगे।’ यह सुनकर गुरु गर्गाचार्य तैयार हो गए।
दूसरी ओर जब रोहिणी ने सुना कुल पुरोहित गर्गाचार्य आए हैं तो गुणगान बखान करने लगी। तब यशोदा बोलीं ‘गर्ग इतने बड़े पुरोहित हैं तो ऐसा करो अपने बच्चे हम बदल लेते हैं तुम मेरे लाला को और मैं तुम्हारे पुत्र को लेकर जाऊंगी देखती हूं कैसे तुम्हारे कुल पुरोहित सच्चाई जानते हैं।’

इस तरह से शर्त के अनुसरा रोहिणी और यशोदा परीक्षा पर उतर आईं। और अपने-अपने बच्चे बदलकर नामकरण के लिए गौशाला में पहुंच गईं। यशोदा के हाथ में बच्चे को देख गर्गाचार्य कहने लगे ये रोहिणी का पुत्र है इसलिए एक नाम रौहणेय होगा। अपने गुणों से सबको आनंदित करेगा तो एक नाम राम होगा और बल में इसके समान कोई ना होगा तो एक नाम बल भी होगा मगर सबसे ज्यादा लिया जाने वाला नाम बलराम होगा। यह किसी में कोई भेद नहीं करेगा। सबको अपनी तरफ आकर्षित करेगा तो एक नाम संकर्षण भी होगा।

अब जैसे ही रोहिणी की गोद के बालक को देखा तो गर्गाचार्य मोहिनी सूरत में खो गए। और अपनी सारी सुधि भूल गए। इस तरह से खुली आंखों से ही गर्गाचार्य प्रेम समाधि में लीन हो गए। गर्गाचार्य ना तो बोलते थे ना ही हिलते थे। न जाने इसी तरह कितने पल निकल गए यह देख नन्द बाबा और यशोदा मैया घबरा गईं। और उन्हें हिलाकर पूछने लगे, ‘बाबा क्या हुआ ? आप तो बालक का नामकरण करने आए हैं, क्या यह भूल गए?’

यह सुन गर्गाचार्य को होश आया है और एकदम बोल पड़े नन्द तुम्हारा बालक कोई साधारण इंसान नहीं यह तो… यह कहते हुए जैसे ही उन्होंने अंगुली उठाई तभी कान्हा ने आंखें दिखाई। गर्गाचार्य कहने वाले थे कि यह तो साक्षात् भगवान हैं। तभी कान्हा ने आंखों ही आंखों में गर्गाचार्य को धमकाया और कहा ‘बाबा मेरा भेद नहीं खोलना। मैं जानता हूं बाबा कि यह दुनिया भगवान का क्या करती है, उसे पूज कर अलमारी में बंद कर देती है और मैं अलमारी में बंद होने नहीं आया हूं, मैं तो माखन मिश्री खाने आया हूं, मां की ममता में खुद को भिगोने आया हूं। इसलिए अगर आपने मेरा यह भेद सबके सामने खोल दिया तो मेरा क्या हाल होगा?’

दरअसल गर्गाचार्य नामकरण करने आए थे और किसी भी परिस्थिति में उन्हें नामकरण करना था इसलिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बातों को मानने से इनकार कर दिया और फिर से कहने ही वाले थे कि, ‘आपका बालक तो साक्षात्….’। तभी श्रीकृष्ण ने उन्हें फिर से समझाते हुए कहा कि ‘बाबा मान जाओ, नहीं तो मुंह खुला का खुला रह जाएगा और उंगली उठी की उठी रह जाएगी।’

यह सभी खेल आंखों ही आंखों में चल रहा था इसलिए पास में बैठे ना तो नन्द बाबा कुछ समझ पा कहे थे और ना ही यशोदा मैया कुछ समझ पा रही थीं। लेकिन बीच का रास्ता निकालते हुए गर्गाचार्य ने कहा, ‘आपके इस बेटे के अनेक नाम होंगे। जैसे-जैसे कर्म करता जाएगा वैसे-वैसे नए नाम होते जाएंगे। लेकिन क्योंकि इस बालक ने इस बार काला रंग पाया है, इसलिए इसका एक नाम कृष्ण होगा। यह बालक इससे पहले यह कई रंगों में आया है।’

मैया बोली बाबा यह कैसा नाम बताया है इसे बोलने में तो मेरी जीभ ने चक्कर खाया है। कोई आसान नाम बतला देना तब गर्गाचार्य कहने लगे, ‘मैया तुम इसे कन्हैया, कान्हा, किशन या किसना कह लेना।’ यह सुन मैया मुस्कुरा उठीं और तब से सारी उम्र इस बालक को कान्हा कहकर बुलाती रहीं।
पौराणिक मान्यता है कि तभी से भगवान श्रीकृष्ण को कान्हा, कन्हैया, किशन या किसना कहते हैं !

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“शरारती श्रीनाथजी”


जगतगुरु वल्लभाचार्य जी हमारे श्रीनाथ जी की सेवा करते थे। उन दोनों में पिता पुत्र का अद्भुत प्रेम था। एक बार की बात है जब वल्लभाचार्य जी एक दिन अपने लाला को सुला रहे थे तो उन्होंने लाला के लिए सुन्दर सा बिछोना बिछाया किन्तु लाला ने सोने से मना कर दिया। वल्लभाचार्य जी ने पूछा की लाला क्या हुआ सोता क्यों नहीं तो लाला बोले कि "जय जय, देखो ना ये बिछोना चुभता है नींद नहीं आती हमको इसपर।" तब गोसाई जी दूसरा बिछोना लगाते है अच्छे से किन्तु लाला कन्हैया उसपे भी सोने से मना कर देते हैं। ऐसा करके गोसाई जी ने कई बार अलग-अलग तरीके से बिछोना बिछाया फिर भी कन्हैया नहीं सोये। तब गोसाई जी ने डांट के बोला "क्यों रे लाला कैसे सोयेगा"? तब लाला ने गोसाई जी को हाथ पकड़ के अपने बिस्तर पर लिटाया और उनके पेट पर सो गए और बोले "जय जय, ऐसे सोयेंगे हम"। वल्लभाचार्य जी ने लाड़ लड़ा-लड़ा के लाला को इतना बिगाड़ रखा था कि लाला का जब जी करता किसी को भी पीट के आ जाता था। एक दिन की बात है लाला ब्रजवासी लडके का रूप धरके दूसरे बच्चों के साथ खेल रहे थे। तभी एक श्रीनाथ जी का जलघडिया वहाँ से निकल रहा था सब बच्चे बोले की भैया सब आगे से हट जाओ श्रीनाथ जी का जलघडिया आ रहा है। कोई छु ना देना अपरस में है ये। लाला कहा मानने वाले थे भीड़ गए जान बुझ के जलघडिये से। जलघडिये को गुस्सा आ गया की मुर्ख बालक अब दुबारा नहाना पड़ेगा और लाला के गाल पे खीच के चाँटा मार दिया, लाला अपनी गाल पे हाथ फेरते रह गए। और सोचने लगे की बेटा इसका बदला तो ये नन्द का लड़का बड़े अच्छे से लेगा, और चले गए। एक दिन क्या हुआ गर्मियों का समय था गोसाई जी ने उसी जलघडिये को बुलाया और कहा कि लाला को गर्मी न लगे इसलिए तुमको श्रीनाथ जी को पंखा झलना है। जलघडिये ने हाँ कर दी और गोसाई जी अपने कमरे में चले गए। जलघडिया सेवा तो ठीक करता था किन्तु ठाकुर जी में प्रेम नहीं था। जैसे ही वो श्रीनाथ जी के पास पंखा झलने बैठा तभी उसको नींद आ गई। और पंखा छुटके ठाकुर जी को लग गया। लाला को गुस्सा तो आया किन्तु सोचा शिशुपाल के 100 अपराध क्षमा किये थे इसका एक तो करना बनता है। ठाकुर जी चुपचाप खड़े हो गए। किन्तु जलघडिये की फिर से आँख लगी और पंखा फिर छुटके ठाकुर जी के मुख पे लगा। अबकी बार लाला को आया गुस्सा और अपने गाल पे लगे चाँटे को याद किया। फिर तो लाला ने भी जलघडिये को ऐसा खीचकर चाँटा मारा की सीधा मंदिर के प्रांगण से बाहर जा कर गिरा। चिल्लाने की आवाज सुनी तो गोसाई जी भागे-भागे आये और देखा तो जलघडिया अपनी गाल पे हाथ लगाए कोने में बैठा है। गोसाई जी ने पूछा तो उसने बताया की मैं तो पंखा झल रहा था तभी अचानक किसी ने थप्पड़ मारा मुझे। गोसाई जी सीधे ठाकुर जी के पास गए और पूछा "क्यों रे लाला, तूने मारा उसको"? तब लाला बोले "जय जय, मारता नहीं तो क्या करता मेरी सेवा करते-करते सोता है और दो बार पंखा मेरे मुँह पे मार दिया। मैंने भी ऐसा मारा है की अब कभी सेवा में नहीं सोएगा।" ऐसा नही है की ठाकुर जी केवल जगत गुरु या पीठाधीश्वरों के साथ ही ऐसी प्रेम लीला करते हैं। उनको तो सुन्दर कोमल ह्रदय वाले भक्त ही पसंद हैं। जब राजा राम जी मिथिला गए तो वहाँ की गोपिकाओं ने पुरुषो ने बच्चो ने सुमन वर्षा की थी, और जब कन्हैया मथुरा गए थे कंस को मारने तब भी मथुरा वासियों ने सुमन वर्षा की सुमन का अर्थ केवल पुष्प नहीं होता सुन्दर मन भी होता है उसी से ठाकुर इतने प्रसन्न हुए थे। इसलिए मेरे वन्दनीय भक्तों बाहरी आड़म्बरों को त्यागकर केवल सुन्दर हृदय से ठाकुर जी से प्रेम करो।

"जय जय श्री राधे"

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बिटिया राधा रानी



बरसाने में एक सेठ रहते थे, उनकी तीन-चार दुकाने थीं, अच्छी तरह चलती थीं। तीन बेटे, तीन बहुएं थी, सब आज्ञाकारी पर सेठ के मन मे एक इच्छा थी। उनके बेटी नही थी। संतो के दर्शन से चिन्ता कम हुई, संत बोले मन में अभाव हो, उस पर भगवान का भाव स्थापित कर लो.!
सुनो सेठ तुमको मिल्यो बरसाने का वास।
यदि मानो नाते राधे सुता, काहे रहत उदास॥
सेठ जी ने राधा रानी का एक चित्र मंगवाया और अपने कमरे मे लगा कर पुत्री भाव से रहते। रोज सुबह राधे-राधे कहते, भोग लगाते और दुकान से लौटकर राधे-राधे कहकर सोते।
तीन बहु बेटे हैं घर में, सुख सुविधा है पूरी।
संपति भरि भवन रहती, नहीं कोई मजबूरी॥
कृष्ण कृपा से जीवन पथ पे, आती न कोई बाधा।
मैं बहुत बड़भागी पिता हुँ, मेरी बेटी है राधा॥
एक दिन एक मनिहारी चूड़ी पहनाने सेठ के हाते मे दरवाजे के पास आ गयी, चूड़ी पहनने की गुहार लगाई। तीनो बहुऐं बारी-बारी से चूड़ी पहन कर चली गयी। फिर एक हाथ और बढ़ा तो मनिहारीन सोची कि कोई रिश्तेदार आया होगा उसने उसे भी चूड़ी पहनाया और चली गयी। सेठ के दुकान पर पहुच कर पैसे मांगे और कहा कि इस बार पैसे पहले से ज्यादा चाहिए। सेठजी बोले कि क्या चूड़ी मंहगी हो गयी है.? तो मनिहारीन बोली नहीं सेठजी, आज मैं चार लोगों को चूड़ी पहना कर आ रही हूँ। सेठ जी ने कहा कि तीन बहुओं के अलावा चौथा कौन है, झूठ मत बोल, यह ले तीन का पैसा, मैं घर पर पूछूँगा, तब एक का पैसा और दूँगा। अच्छा कहकर, मनिहारीन तीन का पैसा ले कर चली गयी।सेठजी ने घर पर पूछा कि चौथा कौन था जो चूड़ी पहना है.? बहुऐं बोली – कि हम तीन के अलावा तो कोई भी नहीं था। रात को सोने से पहले सुता राधारानी को स्मरण करके सो गये। नींद में राधा जी प्रगट हुईं। सेठजी बोले “बेटी बहुत उदास हो क्या बात है.?”
बृषभानु दुलारी बोली –
“तनया बनायो तात, नात ना निभायो,
चूड़ी पहनि लिनी मैं, जानि पितु गेह,
आप मनिहारीन को मोल ना चुकायो,
तीन बहु याद, किन्तु बेटी नही याद रही,
कहत श्रीराधिका को नीर भरि आयो है,
कैसी भई दूरी कहो, कौन मजबूरी हाय,
आज चार चूड़ी काज मोहि बिसरायो है।
सेठजी की नींद टूट गयी, पर नीर नहीं टूटी। रोते रहे सुबेरा हुआ। स्नान-ध्यान करके मनिहारीन के घर सुबह-सुबह पहुँच गये। मनिहारीन देखकर चकित हुई। सेठ जी आंखो में आंसू लिये बोले –
धन धन भाग तेरो मनिहारीन
तोरे से बड़भागी नहीं कोई,
संत महंत पुजारी,
धन-धन भाग तेरो मनिहारीन।
मनिहारीन बोली- क्या हुआ.?
सेठ आगे बोले –
“मैने मानी सुता (पुत्री), किन्तु निज नैनन नहीं निहारिन,
चूड़ी पहन गयी तव कर ते, श्रीबृषभानु दुलारी,
धन-धन भाग तेरो मनिहारीन,
बेटी की चूड़ी पहिराई लेहु जाहू तौ बलिहारी,
जन जोड़ि कर करियो चूक हमारी,
जुगल नयन जलते भरि मुख ते कहे न बोल,
मनिहारीन के पांय पड़ि लगे चुकावन मोल।”
मनिहारीन सोची –
जब तोहि मिलो अमोल धन,
अब काहे मांगत मोल,
ऐ मन मेरो प्रेम से, श्रीराधे राधे बोल।
श्रीराधे राधे बोल, श्रीराधे राधे बोल॥

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राधाकृष्ण का मधुर प्रेमालाप





अच्छा तुम बताओ…अगर मै कृष्ण ना होकर कोई वृक्ष होता तो???….तब तुम क्या करतीं???”“तब मै….लता बनकर तुम्हारे चारो और लिपटी रहती….” श्री राधे ने अपने गुस्से को ठंडा करते हुए कहा…“और अगर मै यमुना नदी होता तो???” कृष्णा ने राधे को मनाने वाली बच्चो की मुस्कान देकर कहा…“हम्म्म्म…..तब मै… लहर बनकर तुम्हारे साथ साथ बहती रहती…..श्यामसुंदर !!!”

श्री राधे ने उत्तर दिया… उनका गुलाबी रंग वापिस लौट आया था… वे ठुड्डी के नीचे अपना हाथ रखकर अगले प्रश्न की प्रतीक्षा करने लगीं…..“अच्छा!!!!!…..उम्म्म….अगर मै उसकी तरह गौ होता तो???….तो तुम क्या करती??हहहहाहा…..मै गौ….हहहा”……..कृष्ण निकट घास चरती एक गौ की तरफ इशारा करके बोले…“हाहाहाहा……तो मै घंटी बनकर आपके गले में झूमती रहती…प्राणनाथ…..परन्तु आपका पीछा नहीं छोडती….हहाहहाहा……प्राणनाथ….हहाहा….”

श्री राधे कान्हा जी के गाल खींचती हुई बोलीं…फिर अगले कुछ पलों तक वहां शान्ति छाई रही….केवल यमुना की लहरें और मोर की आवाज़ ही सुनाई देती थी…श्री राधे ने चुप्पी तोड़ते हुए कान्हा जी से पूंछा… “आप हमें कितना प्रेम करते हैं…कान्हा जी???….मेरा मतलब अगर …हमारे प्रेम को अमर करने के लिए कोई वचन देना हो…तो आप क्या वचन देंगे…???”कृष्णा ने राधे के कर-कमल चूमते हुए कहा… “मै तुम्हे इतना प्रेम करता हूँ राधे… की जो भी भक्त तुम्हे स्मरण करके ‘रा…’ शब्द बोलेगा… उसी पल मै उसे अपनी अविरल भक्ति प्रदान कर दूंगा….और पूरा ‘राधे’ बोलते ही मै स्वयं उसके पीछे पीछे चल दूंगा…..”

“और मै आज वचन देती हूँ कान्हा जी!!!….की मेरे भक्त को तो कुछ बोलने की भी ज़रुरत नहीं पड़ेगी… जहाँ भी जिस किसी के ह्रदय में तुम्हारे नाम सच्चा प्रेम होगा… मै स्वयं ज़बरन तुम्हे लेकर उसके पीछे पीछे चल दूँगी….” श्री राधे ने अपने नैनो में प्रेम के अश्रु भरकर कहा…

जय जय श्री राधे

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भगवान का पता

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता तो भगवान के पास भागा भागा आता और उन्हे अपनी अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता।
अंततः उन्होंने इस समस्या के निवारण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई। और बोले-” देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं, कोई न कोई मनुष्य हर समय मुझसे शिकायत ही करता रहता है। कभी भी संतुष्ट नहीं रहता, जबकि मैं उन्हें समय व कर्म अनुसार सब कुछ दे रहा हूं। फिर भी थोड़े से कष्ट आते ही वह मेरे पास भागा भागा आ जाता है। जिससे ना तो मैं कहीं शांतिपूर्वक रह सकता हूं, और न ही कुछ कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।
प्रभु के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने अपने विचार प्रकट किए। किसी ने कोई जगह बताई, किसी ने कोई जगह। भगवान ने कहा “यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं।
उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। तब इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं, बरुण देव बोले कि आप अंतरिक्ष में चले जाए।
भगवान ने कहा “एक न एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे वह मन ही मन सोचने लगे क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है ? जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूँ। अंत में सूर्य देव बोले “कि प्रभु आप ऐसा करें मनुष्य के ह्दय में हीं बैठ जाएं”। मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा पर वह यहां आपको तलाश नहीं कर सकेगा।
ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई उन्होंने ऐसा ही किया, और वह मनुष्य के ह्दय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मंदिरों आकाश जमीन पाताल में ढूंढ रहा है। पर वह नहीं मिल रहे हैं। परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर ह्दयरूपी मंदिर में विराजमान ईश्वर को नहीं देख पाता।
मोको कहां ढूंढे रे बंदे मै तो तेरे पास में ।
ना मैं मंदिर, ना मै मस्जिद, ना काबे कैलाश में।

फिर भी संत महात्माओं ने दया करके हमें भगवान का पता तो दे ही दिया है। अब जिम्मेदारी भी हमारी ही है, कि उसको पाने के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करेंगे, उसको कातर भाव पुकारेंगे, तो ही वह मिलेगा और जब भी जिसको मिला है, अपने अंदर ही मिला है।।
………..
श्रीराधे श्रीराधे श्रीराधे

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माखन चोरी लीला


कान्हा ने एक गोपी के यहाँ खिड़की से झाँक कर देखा। भोली भाली गोपी अति तन्मयता से दधि मथने में मग्न है। जब माखन ऊपर तैरने लगा तो उसने मथानी निकाल कर एक ओर रख दी और स्वयं मटकी लेने दूसरे कक्ष में गई। कान्हा और उनके सखाओ के लिये इतना ही अवसर बहुत है।

जब गोपी मटकी लेकर वापस लौटी तो किकर्तव्यविमूढ सी खड़ी रह गई-
“कहाँ गया माखन? मैं तो ऊपर तैरता हुआ छोड़ करपल भर के लिये मटकी लेने ही तो गई हूँ। इतनी ही देर में?”

भ्रमित सी हो गई गोपी- “कहीं मैने अन्यत्र तो नहीं रख दिया?” चकित सी गोपी घर मे स्थान स्थान पर माखन खोज रही है-
“मन तो पहले ही कान्हा ने हर लिया है, अब मेरी बुद्धी भी भ्रमित कर रहा है”
घर के अन्य बर्तनों में माखन ढूढँती-ढूँढती गोपी सोचती जा रही है – “वही नटखट अपने ग्वाल बालो के साथ आकर खा गया होगा” – और ठगी सी बेसुध सी हो रही है, कान्हा का माखन खाता हुआ लावण्यमय बालरूप स्मरण करके।

एक दूसरी गोपी यमुना स्नान के लिये घर से निकली। कान्हा ने ताक लिया, माखन मथ कर छीके पर रख कर आई है। गुस गये अपने ग्वाल बालों के साथ उस गोपी के घर में। घर भें उस गोपी के दो शिशु हैं, इतने सारे बालको को घर में घुसता देख कर डर गये और बुक्का फाड़ कर रोने लगे। कान्हा ने अति लाड़ प्यार से उन्हें चुप कराया और साथ ही ऊपर से नीचे तक दोनों को माखन से पोत दिया। अबोधसे दोनों शिशु चुप हो गये और अपने ऊपर लगा ही माखन खाने लगे।

कान्हा ने अपने साथियों के साथ अत्यधिक उत्पात मचाया,भाखन खाया,खूब खिराया,छीके मटकी फोड़े। जब देखाकि गोपी के लौटने का समय हो रहा है तो अपने सखाओ को चलने का संकेत किया। इसी समय दूर से आती गोपी दिखाई दे गई। कान्हा ने उसके दोनों शिशुओं को पुनः माखन से खूब पोता और उन दोनों को सबसे आगे करके सारे सखा उनके पीछे पीछे द्वार से बाहर निकलने लगे।

गोपी ने जब अपने दोनों शिशुओं को माखन से लथपथ द्वार से बाहर निकलते देखा तो हतप्रभ रह गई। जितनी देर में वह घर तक पहुँचती,सारे बालोंसहित गायब हो चुके थे। द्वार पर केवल गोपी के दोनो शिशु ही खड़े है। क्षण भर में गोपी की समझ में सारी बात आ गई।

गोपी ने उसी क्षण यशोदा जी के पास जाकर कान्हा की सारी करतूत कह सुनाई। मुख पर कृत्रिम रोष है, नयन कान्हा के लावण्य को निहारते नहीं थकते। यशोदा जी के समक्ष कान्हा पर दोषारोपण कर रही है, किन्तु अपनी ही सुधि भूली हुई है।

कान्हा कहाँ स्वीकार करने वाले हैं,तुरंत गोपी पर ही दोष लगाते हुये बोले-
“नही मैया, इस गोपी के दही माखन को तो मैं हाथ भी न लगाँऊ। कितना खराब दही रखती है यह अपने यहाँ। मैनें तो इसके दोनों शिशुओं का भला किया है। तुझे क्या ज्ञात है मैया ? इसके दही भाखन में चोटियों पड़ी थीं इसके दोनो शिशु उसे वैसा ही खा लेते।”

और फिर आँखो में आँसू भर बड़े ही भोलेपन से मैया से बोले-
” मैया मैं तो इसके दही माखन मे से चीटियाँ निकाल रहा था, उसे स्वच्छ करके इसके शिशुओ को खिला रहा था। अब तू ही बता मैया माखन खिलाने में कुछ माखन तो कपड़ों पर गिरेगा ही।”

नटखट कान्हा की चातुर्य भरी बातें सुन कर गोपी चकित सी विस्मित रह गई। मैया वात्सल्य के वशीभूत हो गई। मैयाने दौड़ कर लला को ह्रदय से लगा लिया-” मेरा यह नन्हा सा लला कितना भला सोचे है औरो का ?” मैया के ह्रदय से चिपके कान्हा कनखियों से गोपी की ओर देख देख कर मुस्करा रहे हैं।

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श्री किशोरी अली

श्री किशोरी अली : ब्रज के रसिक संत



यह कुछ ही साल पुरानी कथा है । एक सज्जन बरसाना के गहवर वन में घूम रहे थे । बहुत घबराए हुए अपनी मृत पत्नी को ‘किशोरी किशोरी’ बुलाते हुए जा रहे थे, इतने में राधा रानी अपनी सखीयाँ सहित आ गयी, वो यह नाम सुनकर आचम्भित हुई और ललिता सखी को पूछने लगी, यह कौन है जो मेरा नाम इतनी करुण क्रंदन युक्त ले रहा है।

सखी उनको समझाने लगी, हे राधा रानी, यह आपको नहीं बुला रहा है, ये अपनी पत्नी किशोरी की मृत्यु से बेचैन है। अकारण करुण श्री राधा प्यारी बोली, हे सखी! यह गहवर वन में ये मेरा ही नाम ले रहा है। उसको मेरे पास बुलाओ। राधा रानी ने उन पर कृपा दृष्टि डाल उनपर कृपा कर दी। यह दिव्य लीला उस सज्जन के साथ ही हुई। और इस लीला को देखते देखते वो मूर्छित हो गए । इसके बाद वो “किशोरी अली” नाम से राधा रानी के भक्त बन गए । राधा रानी की अपार कृपा और प्रेम पाकर वो दिव्य शरीर प्राप्त किये और दिव्य लीला में प्रवेश किए । वे गहवर वन में वास किए। किशोरी अली जी की समाधि श्रीकृष्ण कुण्ड [श्री राधा सरोवर]के पास लता- पत्तों के बीच स्थित है । यह भक्तों के लिए एक प्रेरणास्रोत है।


श्री किशोरी अलि जी का एक प्रसिद्ध पद जिन्हें ब्रज में सभी गाते हैं वह इस प्रकार है:

आधौ नाम तारिहै राधा |
'रा' के कहत रोग सब मिटिहैं, 'धा' के कहत मिटै सब बाधा ||
राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा |
अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा ||श्री अली किशोरी

श्री अली किशोरी

राधा नाम का अर्धांश अर्थात ‘रा’ का रूपध्यान युक्त उच्चारण करते समस्त मानस रोग मिट जाते हैं, ‘धा’ कहते ही जीव की समस्त बाधाएं मिट जाती हैं। वेदो और पुरानो में राधा नाम का ही महिमा मंडन है किन्तु वो भी ‘नेती नेती’ कहकर हार मान जाते है। रसिक संत अलि किशोरी जी कहते हैं राधा नाम का रूप ध्यान युक्त निरंतर रटन करने से जल्द ही भाव समाधि में प्रवेश मिल जाता है।

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संत की संगति


एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे।

एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था।
एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ,
आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.?
संत बोले – श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे।
किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ?
मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।
संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया….कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है।
किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा।
फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया…

3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है,
बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए।
किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा,
जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया,और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला,
अच्छा बच्चु .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो,
और मुझ पर जादू कर रहे हो।


कृष्ण उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे।
किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया।
बाबा,
आपका शिकार लाया हुँ… बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं।
संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर जी से कातर वाणी में बोले –
हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए…!!
भगवान बोले – इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया
भगवान तो भक्तों के,संतों के आधीन ही होतें हैं


जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं,
पर संत को रोज़ प्रणाम करता था संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए
यह होता है संत की संगति का परिणाम!!,

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पत्रावली



(एक सुंदर युगल लीला)



एक दिन श्रीकृष्ण ने एक सखी के मुख पर सुन्दर पत्रावली का निर्माण किया। प्राचीन काल में मुख पर श्रृंगार किया जाता था, पत्रावली निर्मित की जाती थी। जब गोपी के मुख पर पत्रावली बन गयी, तो उसे बड़ा गर्व हुआ कि श्रीकृष्ण मेरे सौन्दर्य के प्रति इतने आकृष्ट हैं कि उन्होंने मेरे मुख पर इतना सुन्दर चित्र बनाया। उसने सोचा कि इसे राधा को दिखाऊँ। श्रीराधा के पास जाकर बोली, “देखो, मेरे मुख पर कितनी सुन्दर पत्रावली बनी है।”

राधाजी ने देख कर कहा, हाँ, बड़ी सुन्दर हुई है।” और यह कह कर वे चुप हो गयीं। सखी ने सोचा था कि राधाजी उससे अवश्य पूछेंगी कि यह किसने बनायी। पर उन्हें कुछ न पूछते देख स्वयं बोल पड़ी –” जानती हो, इसे किसने बनाया है ?”

“नहीं तो ?”

“अच्छा, मैं ही बता देते हूँ। यह कृष्ण ने बनायी है।”

गोपी को विश्वास था कि यह सुनकर राधिका के अन्तःकरण में थोड़ी ईर्ष्या की भावना अवश्य जाग्रत होगी। पर राधा ने केवल यह कहा —

मा गर्वमुद्वह कपोलतले चकास्ति।
कान्तस्वहस्तरचिता मम मंजरीभिः।।

— सखी, इस बात का गर्व मत करो कि प्रियतम ने तुम्हारे मुख पर पत्रावली का निर्माण किया।”

—” क्यों ना करूँ ?” कृष्ण ने और किसी के मुख पर तो बनायी नहीं। मुझे सर्वश्रेष्ठ माना तभी तो इसे बनाया।”

इस पर राधा बोलीं, “नहीं, ऐसी बात नहीं। ऐसा श्रृंगार उन्होंने किसी और के मुख पर करने का भी प्रयास किया था” —

अन्यापि कापि सखि भाजनमीदृशानाम्।

” किसके ?”
“बस, इतना ही जान लो कि किसी के मुख पर करने की कोशिश की थी, पर वह हो नहीं पाया।”

वास्तव में श्री कृष्ण ने राधाजी के ही मुख पर श्रृंगार करने की चेष्टा की थी। जब वे रंग ले राधाजी के मुख पर पत्रावली बनाने चले, तो उनके दिव्य सौन्दर्य को देखकर इतने भावविह्वल हो गये कि उनके हाथ से तूलिका गिर पड़ी, रंग बिखर गया और अंततः पत्रावली नहीं बन पायी। अब वास्तव में भाग्यशाली कौन है ? — वह, जिसके मुख पर पत्रावली बनी अथवा वह, जिसके मुख पर नहीं बन पायी ? जहाँ नहीं बन पायी, वहाँ प्रेम इतना था कि मन, बुद्धि और प्राण सब प्रेम में एकाकार हो चुके थे। एकाकार कि उस दिव्य स्थिति में बाह्य क्रिया का लोप हो गया था। जहाँ पत्रावली बनी, वहाँ तो बुद्धि स्थित और जाग्रत थी।

जय जय श्री राधे श्याम

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प्यारे जु की प्यारी जु


यमुना पुलिन से कुछ ही दूरी पर एक विशाल,छायादार वृक्ष के नीचे श्री प्रिया प्रियतम परस्पर मुख सुधा नयनो से पीते हुए मौन बैठे है।
इसी समय श्री प्रिया जु की दृष्टि श्री प्रियतम के वक्ष पर सजे कंठहार मे जडित एक बडी सी मणी मे प्रतिबिम्बित स्वयं के ही मुख कमल पर पडती है।श्री प्रिया जु अत्यंत चकित सी होकर इस प्रतिबिम्ब को निहार रही है।यू ही आश्चर्यमयी उत्सुकता मे श्री प्रियतम से कहती है—-प्रियतम!यह तुम्हारे हार मे तुमने किस बडभागिनी का चित्र जडवाया है?(श्री प्रिया जु को लग रहा की यह किसी स्त्री का चित्र श्री प्रियतम ने अपने हार मे जडित कराया है)
प्रियतम!ऐसा प्रतीत होता है,यह तुम्हारी अत्यंत प्रिय है।इसी कारण से तुमने इसे अपनी मणी मे जडित कर अपने वक्ष पर धारण किया हुआ है।
श्री प्रियतम कुछ मुस्कुराकर बोले—-हाँ प्रिये!तुम सत्य कहती हो।यह मुझे प्राणो से भी अधिक प्रिय है।
श्री प्रिया बोली—-अहा!प्राणेश्वर यह सुंदरी निश्चित ही तुम्हे परम सुख प्रदान करती होगी।(अब तक श्री प्रिया जु के नयन भर आए)
श्री प्रियतम बोले—-हाँ प्रिये!यह रमणी मुझे परम सुख प्रदान करती है।यह तो प्रतिपल मेरे सुख के लिए बाँवरी रहती है।इसने अपना प्रेम मेरे रोम रोम मे इस प्रकार भर दिया है की मेरे रेम कूपो मे इसकी ही छबी दिखती है,देखो….मेरे नयनो मे देखो तो प्रिये!(कहकर प्रियतम अपने पितांबर से प्यारी जु के भर आए नयन पौछते है)श्री प्रिया जु श्यामसुंदर की दोनो पुतलियो मे स्वयं को ही देख नयन झुका लेती है।
प्रियतम पुनः प्रिया जु की चिबुक पकड इनका मुख किंचित उठाते हुए बोले—-इसका मुझमे इतना अधिक अनुराग है की स्वयं को तो यह विस्मृत ही कर चुकी है,कभी दर्पण मे स्वयं को देख यह पहचान नही पाती।और कभी कभी तो…..(प्रियतम के नयन छलक उठे)
श्री प्रिया—और कभी कभी क्या?
श्री प्रियतम—और कभी कभी तो मेरे प्रेम मे ऐसी बाँवरी हो जाती है की वृक्षो,मयूरो,दर्पण मे मुझे देख उन संग ही बतियाने लगती है।
श्री प्रिया—-आह! और तुम इस रमणी को तजकर मेरे समीप आए हो।मै,जो तुम्हे कोई सुख न दे सकती।
कुछ क्षण रूककर बोली—-प्रियतम श्यामसुंदर!मै नित्य ही तुमसे नई अभिलाषा करती हू न….किंतु अभी मेरे ह्रदय मे इस बडभागिनी के दर्शनो की अभिलाषा है।संभवतः इसकी रज अपने शीश पर धारण कर ही मै तुम्हारे सुख हेतू कुछ कर सकू।श्यामसुंदर!तुम मुझे इसके समीप ले चलो न।
श्री प्रियतम—-प्रिये!तुम क्यू…मै इसको यही बुलाय लेता हू।
श्री प्रिया— नही नही श्यामसुंदर!मै पहले ही तुम्हे कोई सुख न दे पाती हू,उस पर से तुम्हारी प्राणेश्वरी को यहा बुलाकर श्रमित करू….नही नही…मै ही चलूगी।तुम ले चलो न।
श्री प्रियतम श्री प्रिया जु को लेकर यमुना पुलिन की ओर बढे।
प्रिया जु को जल मे उनका प्रतिबिंब दिखाते हुए बोले….देखो प्रिया जु,यह है मेरी प्राण प्रिया।
श्री यमुना जु स्थिर होकर किसी दर्पण की भाँति प्रिया जु का प्रतिबिंब दिखाती है।
श्री प्रिया जु जल मे देख फिर श्री प्रियतम की ओर देखती है।प्रियतम मुस्कुराते हुए बोले—-हाँ,यही है मेरी प्राणप्रिया।कहते कहते प्रियतम के नयन बहने लगे—-आज मेरा परम सौभाग्य हुआ की मै किंचित अपनी प्राण प्रिया के गुणो का वर्णन कर सका….
यह सुनकर प्रिया जु पिताबंर की ओट मे मुख करके श्री प्रियतम के ह्रदय मे सिमट जाती है।

जय जय श्री श्यामा श्याम

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राधा बानी कृष्ण


जब श्री जू श्यामसुंदर को अपने आभूषण पहने देखती हैं तो अत्यंत प्रसन्न हो उठती हैं । उनके मन में ये विलक्षण आनंद है कि प्रियतम इन आभूषणों से सुख पा रहे हैं । उनके मन में श्यामसुन्दर जैसा श्रृंगार करने की लालसा हो जाती है।

श्री जू सबसे पहले श्यामसुन्दर की वैजयंती माला धारण करती हैं । फिर उनकी बांसुरी उठा लेती हैँ । मोर पिच्छ शीश पर धारण करती और मन्द मन्द मुस्कुराती हैं । जब प्यारी जू पीताम्बर ओढ़ती हैं और बांसुरी को देखती हैं तो स्वयम् को कृष्ण मान बैठती हैं । त्रिभंगी मुद्रा में खड़ी हो बांसुरी बजाना शुरू कर देती हैँ। आहा हर और उन्माद होने लगता ।

आज ये बांसुरी की ध्वनि तो अत्यधिक उन्माद दे रही सबको। कुछ क्षण बाद एकदम बाहर की और दौड़ पड़ती हैं । सखियाँ सहसा दौड़ते देख पीछे भागती हैं । श्री जू कहने लगती हैं राधा राधा राधा ….। राधा कहाँ है अब तक नहीं आई। मुझसे मिले बिना वो कितनी व्याकुल होंगी। हाय !राधा मैं तुमको ढूंढ नहीं पा रहा । तुम कहाँ हो राधा । प्रत्येक सखी से राधा का पता पूछने लगती ।

अत्यंत व्याकुल हो जाती हैं। सहसा श्यामसुन्दर उनके सामने आ जाते। उनसे भी राधा का पता पूछने लगती । श्यामसुन्दर अपनी प्यारी जू की इस भाव दशा से अत्यंत प्रसन्न होते हैँ । उनको स्पर्श कर कहते तुम ही तो हो मेरी राधा और उनका आलिंगन करते । श्यामसुन्दर के आलिंगन में भी वो राधा राधा ही पुकार रहीं । भीतर यही दशा की प्रियतम को राधा नाम अति प्रिय है । स्वयम् मोहन बन राधा राधा नाम सुना प्रियतम को आनन्दित कर रहीं ।

इस अद्भुत प्रेम की जय हो…जय हो… जय हो

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श्यामा जु की मान लीला


एक बार एक निकुंज में श्यामा-श्याम हमारे श्री युगल प्राण प्यारे प्रिया-प्रियतम एक दूसरे के सन्मुख बैठे हैँ। एक दूसरे को परस्पर तृषित नेत्रों से निहार रहे हैँ।

उनकी ये चितवन उनके हृदय की रस लालसा को और बढा देती है। जैसे एक दूसरे को अपने नेत्रों से ही पी जाने को आतुर हों । एक दूसरे को ऐसे निहार रहे कि उनकी पलकों ने हिलना बन्द कर दिया है।
वाणी की मूकता पर नैनों द्वारा हृदय के भाव एक दूसरे का स्पर्श कर रहे हैँ। बस, एक दूसरे में समा जाने को आतुर हो चले। फिर युगल गाढ़ आलिंगन में बँध जाते हैँ।
श्री स्वामीनीजी श्यामसुन्दर के आलिंगन में होते हुए भी उनमें सहसा तीव्र विरह उत्पन हो जाता है। नैन मूंदे हुए हैं, प्रियतम के आलिंगन में हैँ, परंतु अत्यधिक व्याकुल हैँ और पुनः पुनः श्यामसुन्दर को पुकारने लगती है।

श्यामसुन्दर कब आयेंगें ? मुझसे उनके बिना रहा नहीं जा रहा। हाय रे ! मेरी देह प्राण क्यों धारण की हुई है ? शायद मेरे प्रियतम को मुझसे कोई सुख नहीं है । तभी वो मेरा त्याग कर गए हैँ।

हाय रे ! मैं अभागिन, कोई सुख नहीं दे पाई उन्हें । इस प्रकार प्रियतम के सानिध्य में होते हुए भी प्रलाप कर रही हैँ। उनकी विरह वेदना इतनी तीव्र हो जाती है और फिर सहसा जोर से चीखती है :- श्यामसुन्दर…. और वह मूर्छित हो जाती है।
श्यामसुन्दर के आलिंगन में ही उनके विरह की मूर्छा हुइ। श्यामसुन्दर उन्हें देख व्याकुल हो उठते हैँ और श्री श्रीस्वामिनी जी की चेतना लौटाने को हर चेष्ठा करने लगते हैँ।
इस विरहणी की हृदय वेदना तो प्रियतम के प्रेम सुधा के वर्षण से ही समाप्त होगी , उन्हीं से चेतना लौटेगी।
फिर श्यामसुन्दर श्रीस्वामिनी जी का अधरामृत पान करने लगते हैँ। उनके रसमयी स्पर्श से श्रीस्वामिनी जी के अंगो में चेतना का संचार होने लगा।
प्रेम विरहणी की इस दशा प्रेम वृष्टि द्वारा ही बदल सकती है। श्रीस्वामिनी जी अपने नैन खोलती हैँ और कान्हा की ओर देखने लगती हैँ। अपने आपको उनके संग पाकर एक बार तो उनसे लिपट जाती हैँ और फिर उनसे रूठने का अभिनय करने लगती हैँ।
श्यामसुन्दर कितना विलम्ब किया आपने ? कितनी प्रतीक्षा करवाई ? क्या आपका हृदय इतना वियोग सहन कर सकता है ?
मैं आपसे रूठ गयी हूँ अब। मुझे आपके संग कोई बात ही नहीं करनी । आप अभी के अभी लौट जाइये।
श्रीस्वामिनी जी को मानवती देख श्यामसुन्दर बहुत अधीर हो जाते हैँ , श्यामा ! मैने कब विलम्ब किया। प्रिये : हम तो सदा ही संग हैँ , तुम्हारे हृदय से पूछो – क्या एक क्षण भी मेरा वियोग हुआ है ?
श्रीस्वामिनी जी का मान धारण करना प्रियतम जू में रस लालसा को और बढा देता है।

ना बोलूँ रे, पिया तोसे ना बोलूँ रे……..
काहे ऐसो नेहा लगाया,
सुधि बुधि खोई बाँवरी बनाया,
व्याकुल हुई इत उत डोलूँ रे

ना बोलूँ रे, पिया तोसे ना बोलूँ रे…….
बड़ो निष्ठुर कारो कन्हाई,
काहे मैं तोसे प्रीत लगाई,
कैसे पट हिय की खोलूँ रे

ना बोलूँ रे, पिया तोसे, ना बोलूँ रे…….
सावन आया छाई बदरिया,
तेरे बिन बीत चली उमरिया,
कैसे अकेली झूले झूलूँ रे,
ना बोलूँ रे पिया तोसे ना बोलूँ रे……

श्रीस्वामिनी जी प्रेम में ऐसी बाँवरी हो गयी हैँ कि उनको ये भी स्मृति न रही कि प्रियतम तो कबसे उनके संग ही हैँ।
श्यामसुन्दर एक बार तो बैठे बैठे अश्रु वर्षण करने लगते ।

कान्हा जी श्रीस्वामिनी जी के चरणों को छूकर कहते हैँ : अच्छा श्यामा ! तुम्हारे चरणों की सौगन्ध! अब विलम्ब न करूँगा , सदा तुम्हारे संग रहूंगा। श्रीस्वामिनी जी का कोमल हृदय प्रियतम के एक भी अश्रु को सहन नहीं कर सकता और पुनः युगल गाढ आलिंगन में बध जाते है। श्रीस्वामिनी जी का मान भी छुट जाता है ।

इस अद्भुत प्रेम की जय हो..!!

जय श्री राधे श्याम

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प्रियतम का सुख


एक दिन लीला मै लाडली जू शयन कर रही है अभी अभी महारानी करवट लै धीरे धीरे श्यामसुंदर के विचारों मै मग्न अपनी आखै बन्द किये मन्द मन्द मुसकुरा रही है..आज ललिता जू के मन मै श्यामसुंदर की प्रैरणा से चरण सेवा विचार आया, दासीगण ओर मन्जरीयो को विश्राम दै ललिता जू स्वयं किशोरी जू के चरण दबा रही है।

लीला कौतुक मै श्याम सुंदर वहाँ पधारै..श्यामसुंदर को वहाँ देख ललिता जू एक दम से परैशान हो श्यामसुंदर की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखती हैं। श्यामसुंदर हाथ जोड विनय की मुद्रा मै इशारे से ललिता जू को मौन रहने की प्रार्थना करते है तो ललिता जू इशारे मै ही पूछती है..

क्या चाहते हो..?

श्यामसुंदर ने इशारे मै ही उत्तर दिया..
थोडी देर चरण सेवा।

ललिता जू कोतुक मै थोडी आखे तरेर के इशारे मै कहती है..
नहीं मिलेगी….

श्यामसुंदर बिलकुल गिडगिडाने वाली स्थिति मै आ जाते है…

लीला मै ज्यादा सताती नहीं ललिता जू और इशारे से श्यामसुंदर को बुलाती है और इस तरह चरण सेवा सौपती है कि प्रिया जू को पता ना चलै कि कब ललिता जू हटी ओर श्यामसुंदर आये…..पर प्रिया जू तो प्राण वल्लभ प्रियतम के स्पर्श को हाथ लगते ही पहचान जाती है…..!

अब लीला शुरू होती है…प्रैम की, आनन्द की, प्रैम मै प्रैमी के सुख के लिये अपने पर कितने भी अपराध आये उसे भी प्रैमी के सुख के लिये स्वीकार करने की….

अहो श्यामसुंदर मेरे चरण दबा रहै है, क्या करूँ. .चरण दबाने से जो सुख श्यामसुंदर को मिल रहा है उसे मै कैसे मना कर सकती हूँ पर श्यामसुंदर मेरे चरण दबायै ये मेरे लिये बिलकुल असहनीय है…किशोरी जू इस समय बहुत असमंजस मै…प्रिया जू के नेत्रो से अविरल धारा बह निकलती है…

श्यामसुंदर को सुख मिल रहा है चरण सेवा से तो रोक भी नहीं सकती ओर श्यामसुंदर चरण दबा रहै है ये मन मै पीडा भी है उनकी सेवा मुझे करनी चाहिये है , देव वो मेरी सेवा कर रहै है।इसकी पीडा भी मन मै है….ये है प्रैम ओर प्रैम मै केवल प्रैमास्पद के सुख के लिये हर पीडा हर अपराध सहने का भाव…किशोरी भाव भी यहीं से शुरू होता है….प्रियतम के सुख के लिये भलै कोटि जन्म भंयकर नरक मै क्यौ ना बिताने पडे…हम तौ केवल एक प्राण वल्लभ का सुख चाहते है….!

“चापत चरण करत नित सेवा,
बिन दर्शन नहीं होत कलेवा”

जय रसिक रासेश्वरी लाड़ली जु…

..प्रिया प्रियतम सरकार की जय।

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“मैया, मोहे बहुरिया ला दे”


         
नन्हे कान्हा ने ब्याह करने की हठ पकड़ ली है। अब उन्हें संसार की अन्य कोई वस्तु नहीं चाहिये, उनकी तो बस अब बहुरिया(दुल्हन) की ही माँग है।
“मैया मोहि बहुरिया ला दे, तेरी सौं मेरी सुनि मैया, अबहिं ब्याहन जैहौं”
           
मैया यशोदा के मुख पर लावण्यमयी मुस्कराहट के साथ साथ झुंझलाहट का भाव भी है। नंदराय जी, रोहिणी जी, बलराम जी सब हँस हँस कर यशोदा जी से कह रहे हैं– “नंद रानी, तुम्हीं ने तो प्रस्ताव रखा है इसके समक्ष, अब लाओ इसके लिये इक नन्ही सी बहुरिया”। यशोदा जी अवाक ! किंकर्तव्यविमूढ़-सी बैठी हैं अपने प्राण-धन लाड़ले की बाल-हठ सुन कर।
         
कुछ क्षण पूर्व मैया को अपना लाडला लला सम्भालना दूभर हो रहा था, एक दूसरी हठ के कारण। जब से नन्हे कान्हा ने आकाश मंडल में चंद्रमा को उदित होते देखा, चंद्र-खिलौना लेने की हठ पकड़ ली। जमीन पर लोट लोट कर-
       
“चंद्र खिलौना लैहौं, मैं तो चंद्र खिलौना लैहौं”
        
सारा घर आसमान पर उठा रखा था। किसी के भी बहलाने से न मानें, हठ अधिक अधिक और अधिक बढ़ती ही जा रही थी-
       
“चंद्र खिलौना नहीं दोगी तो सुरभि गैया का पय पान न करिहौं, तेरी  गोद न ऐहौं, बेनी सिर न गुथैहौं, तेरौ और नंदबाबा का सुत न कहेहौं”
        
ऐसी-ऐसी प्रतिज्ञाऐं मैया यशोदा तो चकरा ही गईं, कैसे मनाऊँ अपने लाडले को ? सैकड़ों लालच दिये, किन्तु बाल हठ न छुटी। जब किसी भी प्रकार मैया का लाडला प्राण-धन न माना, तब अंततः मैया यशोदा ने एक उपाय किया। मैया ने लला के कान में हँस कर धीरे से फुसफुसाते हुये कहा- “मेरे लाडले, यदि तुम चंद्र खिलौना लेने की अपनी हठ छोड़ दोगे तो मैं तुम्हारा ब्याह करा दूँगी, यह बात अभी मैंने बस तुम्हें ही बताई है और किसी को नहीं, क्योंकि मैं केवल तुम्हारा ही ब्याह कराऊँगी बलराम का नहीं।”
          
मैया की बात सुन कर,अब नन्हे कान्हा को चंद्र खिलौने का स्मरण ही न रहा, अब तो उन्हें बस ब्याह करने की धुन लग गई है– “तेरी सौगंध मैया, अभी इसी समय ब्याहने चल दूँगा, चल मैया चल, मैं तो अभी बहुरिया लाऊँगौ” मैया हतप्रभ एक हठ छूटी तो दूसरी पकड़ ली।  क्या करे मैया, कहाँ से लाकर दे हठीले को इसी समय बहुरिया।
        
अतुल अप्रतिम सौंदर्ययुक्त दुर्लभ अविस्मरणीय दृश्य है, नन्हे कान्हा पूर्णत बाल हठ पकड़े हुये हैं-
“चल मैया ब्याहने चल” घर के सब छोटे बड़े स्नेही जन हँस-हँस कर दोहरे हुये जा रहे हैं, और मैया यशोदा की तो मति ही चकरा रही है कि कैसे मनाऊँ अपने इस लाडले प्राण धन को ?

“जय जय श्री राधे”

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महावर की सेवा


एक दिन प्रियतम कृष्ण श्री ललिता जी से विनम्र हो से कहा-
मेरी एक विनती है मैं आज प्रिया जी के चरणों में महावर लगाने की सेवा करना चाहता हूंl मुझे श्री चरणो मैं महावर लगाने का अवसर दिया जाए।

प्रियतम की बात सुनकर ललिता जी बोली – क्या आप महावर लगा पाऐंगे?
तो प्रियतम ने कहा – मुझे अवसर तो देकर देखो, मैं रंगदेवी से भी सुंदर उत्तम रीति से महावर लगा दूंगा ।

श्री ललिता जी ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया रंग देवी से कहा – कि आज श्री चरणो मैं महावर लगाने की सेवा प्रियतम करेंगे।
प्रिया जी के स्नान के बाद सुदेवी जी ने कलात्मक ढंग से प्रिया जी की वेणी गूँथ दी।
विशाखा जी ने प्रियाजी के कपोलों पर सुंदर पत्रावली की रचना कर दी। अब प्रिया जी के चरणों में महावर लगाना था।
रंगदेवी जी को ललिता जी ने कहा – आज महावर की सेवा प्रियतम करेगे। प्रियतम पास में ही महावर का पात्र लेकर खड़े थे और विनती करने लगे आज महावर की सेवा में करू ऐसी अभिलाषा हैl

प्रिया जू ने कहा – लगा पाएंगे? उस दिन वेणी तो गूँथ नहीं पाये आज महावर लगा पाएंगे? प्रियतम ने अनुरोध किया – अवसर तो दे के देखें।
प्रिया जू ने नयनों के संकेत से स्वीकृति दे दी और मन ही मन सोचने लगीं की प्रेम भाव में लगा नहीं पाएंगे,
स्वीकृति मिलते ही प्रियतम ने प्रिया जी चरण जैसे ही हाथ में लिए, श्री चरणो की अनुपम सुंदरता कोमलता देखकर श्याम सुंदर के हृदय में भावनाओं की लहर आने लगीं।

प्रियतम सोचने लगे, कितने सुकोमल हैं श्रीचरण, प्यारी जी कैसे भूमि पर चलती होंगी? कंकड़ की बात तो दूर, भय इस बात का है ककि धूल के मृदुल कण भी संभवतः श्री चरणों में चुभ जाते होंगे। तब श्याम सुंदर ने वृंदावन की धूलि कण से प्रार्थना‌ की कि जब प्रिया जी बिहार को निकलें तो अति सुकोमल मखमली धूलि बिछा दिया करो और कठिन कठोर कण को छुपा लिया करो।
प्रियतम भाव बिभोर सोचने लगे कि श्री चरण कितने सुंदर, सुधर, अरुणाभ, कितने गौर, कितने सुकोमल हैं, मुझे श्री चरणों को स्पर्श का अवसर मिला।

प्रियतम ने बहुत चाहा पर महावर नहीं लगा पाये, चाहकर भी असफल रहे।
ऐसी असफलता पर विश्व की सारी सफलता न्योछावर, अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक शिरोमणि जिनके बस में सब कुछ है।
हर कार्य करने में अति निपुण हैं उनकी ऐसी असफलताओं पर बलिहार जाऊं.

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चार हाथ वाले कृष्ण



एक बार भगवान के मन में आया कि आज गोपियों को अपना ऐश्वर्य दिखाना चाहिये ये सोचकर जब भगवान निकुंज में बैठे थे.

और गोपियाँ उनसे मिलने आ रही थी तब भगवान कृष्ण विष्णु के रूप चार भुजाएँ प्रकट करके बैठ गए,जिनके चारो हांथो में शंख, चक्र, गदा, पद्म, था

गोपियाँ भगवान को ढूँढती हुई एक निकुंज से दूसरे निकुंज में जा रही थी तभी उस निकुंज में आयी जहाँ भगवान बैठे हुए थे,दूर से गोपियों ने भगवान को देखा और बोली हम कब से ढूँढ रही है.

और कृष्ण यहाँ बैठे हुए है,जब धीरे धीरे पास आई तो और ध्यान से देखा तो कहने लगी अरे ! ये हमारे कृष्ण नहीं है इनकी सूरत तो कृष्ण की ही तरह है परन्तु इनकी तो चार भुजाएँ है ये तो वैकुंठ वासी विष्णु है.

सभी गोपियों ने दूर से ही प्रणाम किया और आगे बढ़ गई,और बोली चलो सखियों कृष्ण तो इस कुंज में भी नहीं है कही दूसरी जगह देखते है .

ये प्रेम है जहाँ साक्षात् भगवान विष्णु भी बैठे है तो ये जानकर के ये तो विष्णु है कृष्ण नहीं गोपियाँ पास भी नहीं गई,

भगवान कृष्ण ने सोचा गोपियों ने तो कुछ कहा ही नहीं,अब राधा रानी जी के पास जाना चाहिये,ये सोचकर भगवान कृष्णा वैसे ही विष्णु के रूप में उस निकुंज में जाने लगे जहाँ राधा रानी बैठी हुई थी,

दूर से ही भगवान ने देखा राधा रानी जी अकेले बैठी हुई है,तो सोचने लगे राधा को अपना ये ऐश्वर्य देखाता हूँ,और धीरे धीरे उस ओर जाने लगे,परन्तु ये क्या जैसे जैसे कृष्ण राधा रानी जी के पास जा रहे है

वैसे वैसे उनकी एक के करके चारो भुजाये गायब होने लगी और विष्णु के स्वरुप से कृष्ण रूप में आ गए,जबकी भगवान ने ऐशवर्य को जाने के लिए कहा ही नहीं वह तो स्वतः ही चला गया,

और जब राधा रानी जी के पास पहुँचे तो पूरी तरह कृष्ण रूप में आ गए.

अर्थात वृंदावन में यदि कृष्ण चाहे भी तो अपना ऐश्वर्य नहीं दिखा सकते,

क्योकि उनके ऐश्वर्य रूप को वहाँ कोई नहीं पूँछता,यहाँ तक की राधा रानी के सामने तो ठहरता ही नहीं,राधा रानी जी के सामने तो ऐश्वर्य बिना कृष्ण की अनुमति के ही चला जाता है.

!! जय जय श्री राधे !!

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ठकुरानी का अमृत वरदान




किशोरी जू अपनी सभी सखियों के यहाँ बारी-बारी खेलने जाती थी। तुंगविधा ने अपने गाँव मैं गुड्डे-गुड़िया का विवाह कराया। राधा रानी और ललिता जू अपने अपने गुड्डा और गुड़िया को लेकर डवारा गाँव, जो कि तुंगविधा जी का गाँव है, वहाँ पहुँची। कीरत मैया भी लाडली जू के संग गयी।
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किशोरी जू ने बारात के लिये मिट्टी के पकवान बनाये और फिर सब विवाह की रस्मे कराने लगी। इतने मैं वहाँ दुर्वासा ऋषि आ पहुँचे, इनके संग इनके दस हजार शिष्यों की मण्डली भी साथ चलती थी। छोटी-छोटी ब्रजगोपीयो को खेलता देख बाबा बोले: लाली, हमें बरसाने को मार्ग बताओगी।
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ललिता जू बोली बाबा जी बरसाने जायके काह करेगो, दुर्वाषा जी बोले हमें बृषभानू जी के यहां जानो है। हमारो पूरो शिष्य परिकर हमारे संग है, भूख लगी है बहुत जोर की..
ललिता जू घबरा गयी, सीधी कीरत मैया के पास पहुँची! मैया, ओ मैया..
एक बाबा जी आयो है, अपने दस हजार शिष्यन के संग.. और बरसाने को मार्ग पूछ रह्यो है, बाबा सौ मिलनो है.. सबकू भोजन करनो है। कीरत मैया समझ गयी की ये जरूर दुर्वासा ऋषि है, आज तो यह निश्चित श्राप दे देंगे, क्योंकि मैं यहाँ हूँ और बाबा भी बरसाने ते बाहर हैं..!!
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मैया बोली मोये दिखाय के ला कौन सो बाबा जी है। मैया नोवारी चोवारी पर पहुँची, जहाँ किशोरी जू सब सखियों के संग मिलके खेल रही थी। मैया ने देखा कि लाडली जू दुर्वासा ऋषि से बात कर रही हैं।

बाबा तुम्हे हमारे बाबा सौ मिलनो है का..!!
बेटी तू बृषभानू जी की पुत्री है क्या.. हाँ बाबा, मैं बृषभानू जू की बेटी राधा हूँ।
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दुर्वासा किशोरी जू के दर्शन कर जड़ हो गये लाडली जू ने हिलाया बाबा सो गयो का हमारे बाबा सौ का काम है आपकू..
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दुर्वाषा जी बोले बेटी मोये और मेरे शिष्यों को भूख लगी है, राजा बृषभानू ही हमें भोजन करा सकते हैं। अच्छो इतनी सी बात है, बाबा तू नहाय के आ प्रसाद तैयार मिलेगो, बाबा नहाने चले गये कीरत मैया ओट से निकली, अरी.. राधा तेने जे का व्यथा बोय दयी। लाली ई तो बडो क्रोधी बाबा जी है, नेक-नेक बात पे क्रोधित हे जाय और श्राप दे दे, अब तू इतने लोगन कू भोजन कैसे तैयार करेगी..!!
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किशोरी जू सब सखियों से बोली चलो री सब माटी इकट्टी करो ओर माटी गुलाय के मोये दो, सब सखियाँ मिट्टी गलाने लगी। किशोरी जू ने मिट्टी की पूडी, मिट्टी की सब्जी, मिट्टी की मिठाई तैयार कर दी। दुर्वासा आये मिट्टी की वस्तु देख बड़े ही क्रोधित हुऐ।
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अरी छोरी, तू हमसे मजाक कर रही है, ये क्या मिट्टी की सामग्री बनाई है..
प्रिया जू बोली बाबा जी कायकू हल्ला कर रह्यो है, काह खावेगो ईमरती.. ले मिट्टी की इमरती रख दी सामने दुर्वासा ने जैसे ही मुँह मे मिट्टी की इमरती डाली, दुनिया के स्वाद भूल गये और काह खावेगो रसगुल्ला ले आह हा उस मिट्टी के रसगुल्ला के स्वाद के आगे सब रस फीके बाबा और सभी शिष्यों ने ऐसा भोजन जीवन मैं पहली बार किया और आशीर्वाद दिया, किशोरी जू को कि जो बृषभानू नन्दनी के हाथ की रसोई पायेगा, वो त्रिलोक विजयी हो जायेगा..!!
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यशोदा मैया को जब यह बात पता चली तो यशोदा मैया ने ठाकुर जी के लिये किशोरी जू के हाथो से रसोई बनवाई तो महाराज ये ठाकुर तो बल भी हमारी किशोरी जू की कृपा का ही लिये फिरते हैं और नाम अपना करते हैं..!!

जय श्री राधे राधे

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शरारती ठाकुर


एक बार राधा रानी जी अपनी सखियों के साथ माखन लेकर मानसी गंगा के तट पर आईं। मानसी गंगा में बहुत पानी है। सोचने लगीं कैसे पार करेंगी मानसी गंगा को।

तभी कृष्ण नाविक का भेष बदलकर आ गए और बोले नाव से पार करा देता हूँ। गोपियो ने कहा, बहुत भला नाविक है सभी सखियाँ और राधा रानी नाव में बैठ गये। कृष्ण मन ही मन सोचने लगे आज आनन्द आएगा।

कृष्ण ने नाव चलना आरम्भ किया। थोड़ी देर बाद कृष्ण बोले मुझ भूख लग रही कुछ खिलाओ नहीं तो मैं नाव नहीं चला पाऊँगा, सब डूब जाओगी।

सखियों ने अपना सब माखन कृष्ण को दे दिया, कृष्ण सब खा गये। फिर नाव चलना शुरू किया, थोड़ी देर बाद बोले मैं थक गया हूँ, मेरे पैर दबाओ तभी नाव चला पाऊँगा।

सखियाँ पैर दबाने लगीं बहुत सेवा की, जब नाव बीच में पहुँची, तो कृष्ण ने नाव जोर से हिला दी। सब डर गयीं, कृष्ण बोले मेरी नाव पुरानी है बजन ज्यादा है, डूब जायेगी, अपनी मटकी मानसी गंगा में फेंक दो जल्दी-जल्दी, गोपियों ने अपनी मटकियाँ मानसी गंगा में डाल दीं।

कृष्ण फिर बोले अभी भी नाव हिल रही है, डूब जायेगी, अपने गहने भी फेंक दो,नहीं तो डूब जाओगी। सबने अपने बहुमूल्य गहने भी मानसी गंगा में फेंक दिए। फिर ठाकुर जी ने नाव चलायी।

ललिता जी को उनके वस्त्रों में मुरली दिख गयी, ललिता जी बोलीं अच्छा श्यामसुन्दर है ये नाविक ! अभी बताते हैं इस नाविक को। जैसे ही किनारा आया सभी सखियाँ उतार गयीं।

सब ने कहा, “ऐ नाविक ! अपनी उतराई तो लेते जाओ।” और सबने पकड़ कर श्याम सुंदर को मानसी गंगा में फेक दिया और बोलीं, “बहुत हमारे गहने, माखन मटकी, मानसी गंगा में डलवा कर खुश हो रहे थे। अब ये लो उसका प्रसाद।”

बोलो जय जय श्री राधे श्याम

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प्रेम की पताका गोपी




वो गोपियाँ, जो गौओं का दूध दुहते समय,धान कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकों को सुलाते समय, रोते हुए बालकों को लोरी गाते समय, घर के आँगन में झाड़ू देते समय……ये प्रेमपूर्ण चित्त से, नयनों में अश्रु भरकर गदगद् कण्ठ से श्रीकृष्ण का ही गान करती रहती हैं…….तात विदुर जी ! इनसे बड़ा भाग्यशाली और कौन होगा……इसलिये इस विश्व ब्रह्माण्ड में धन्य अगर कोई हैं तो यही गोपांगनाएं ही हैं ।

तात विदुर जी ! गोकुल की गोपियाँ अब निरन्तर श्रीकृष्ण चिन्तन में ही लगी रहती हैं……..सोते, जागते, खाते, खिलाते हर समय इनके चित्त में वही माखन चोर ही गढ़ गए हैं……….

” री ! चित में माखन चोर गढ़ें”

“मेरे घर चोरी की”……ये कहते हुए गोपी कितनी आनन्दित होती ।

“मुझ से झुठ बोला उसनें”……ये कहते हुए गदगद् हो जाती ।

“मेरी बैयाँ मरोरी”…….उफ़ ये कहते हुए तो आत्म मुग्ध ही हो जाती ।

“मेरी मटकी फोरी”……आहा ! आत्मश्लाघा से भर जाती ।

कन्हैया , कन्हैया बस कन्हैया……..तात इसी यमुना के किनारे सुबह शाम मिलती थीं गोपियाँ……..और चर्चा होती……..पर चर्चा का विषय एक ही होता ……नन्दनन्दन ।

तात ! अब क्या ये गोपियाँ श्रीकृष्ण से अलग हैं ? इनका अन्तःकरण विशुद्ध रूप से श्रीकृष्णमय हो चुका है ।

प्रेम के अनेक रूप हैं ……….सख्य भी प्रेम है ……..वात्सल्य भी प्रेम है …..श्रृंगार तो प्रेम है ही । ये सब प्रेम की धाराएं हैं ………..अद्भुत हैं ………एक मापदण्ड नही होता इन धाराओं का ……….ये किस तरह, किस ओर बहेंगीं आप कह नही सकते तात ।

ज्ञान का एक मापदण्ड है ………योग का एक मापदण्ड है ……पर प्रेम का एक मापदण्ड ? हो ही नही सकता ।

रोना प्रेम, हँसना प्रेम , मनुहार करना प्रेम , गाली देना भी प्रेम , स्वीकार करना प्रेम, अस्वीकार करना प्रेम …….सोना प्रेम, जागना प्रेम ।

उफ़ ! ज्ञान पर बोला जा सकता है …….योग पर और अच्छा बोला जा सकता है …..पर प्रेम पर ?

कैसे बोलें तात ! और फिर इन “बृज गूजरी” का प्रेम ये तो सर्वोत्तम है…….इस प्रेम के लिये तो ब्रह्मा तक तरसते हैं ……..भगवान शंकर इन्हीं का भेष बनाकर बृज में गोपी बन जाते हैं ।

इनकी तुलना किससे तात !

जय हो जय हो जय हो

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माखन नही मन का चोर




एक दिन गोपी ने कहा की आज तो कन्हैया को रंगे हाँथो पकड़ कर यशोदा के पास लेकर ही जावूँगी । कन्हैया जेसे ही माखन चुरा कर खाने लगे गोपी ने झट हाँथ पकड़ लिया। अब कन्हैया को यसोदा के पास ले जा रही है, और पीछे पीछे ग्वाल बाल चल रहे है, उस ग्वाल बालो के साथ गोपी का पति भी था। गोपी कुछ दुर गयी और देखा की कुछ बुजुर्ग खड़े है, तो गोपी ने घुंघट निकाल दिया। अब कृष्ण ने सोचा की गोपि से हाँथ छुड़ाने का ये मोका अच्छा है वर्ना आज तो मैया से मार पड़ेगी

कृष्ण गोपी को बोले- “प्रभा काकी मेरे इस हाँथ मे दर्द होने लगा है दूसरा हाँथ पकड़ लो। गोपी को दया आ गयी की छोटो सो लाला है हाथ दर्द कर रहा होगा , “गोपी बोली ठीक है दूसरा हाँथ पकड़ा लो । कृष्ण ने पीछे चल रहे गोपी के पति को हाँथ से गोल गोल इशारा किया की आजा लड्डू दूंगा। गोपी ने जेसे ही कृष्ण का दूसरा हाँथ पकड़ा तो कृष्ण ने उनके हाँथ में पति का हाँथ पकड़ा दिया ,और खुद भाग निकले। अब गोपी नन्द बाबा के घर के बाहर से ही जोर जोर से चिलाने लगी की:-

‘अरी ओओओओ…………

यसोदा मैया देख आज तेरे लाला को रंगे हाँथो पकड़ कर लायी हु , रोज रोज कहती है मेरा छोरा बड़ा सीधा है आज तोरे लाला को माखन चोरी करते हुए मेने रंगे हाँथो पकड़ है.! और मैया समझ गयी की ये सब घुंघट का काम है, मैया बोली:- ‘अरि सखी जरा घुंघट हटा कर पीछे तो देख माजा लाला है या तुमचा घरवाला’! गोपी घुंघट हटा के पीछे देखती है तो पति का हाँथ गोपी के हाँथ में.! “गोपी बोली तूम यहाँ केसे आ गये? अब वो तो सब भूल गया ,और कहा की कन्हैया ने कहा की लड्डू दूंगा….गोपी बोली ‘कन्हैया ने कहा लड्डू दूंगा और तुम आ गये ,मेरे पीछे पीछे आने की क्या जरूरत थी ,कन्हैया कहा है ? पति बोला, ‘कन्हैया तो कब का भाग चूका.’ गोपी बोली ,’कन्हैया को भगा दिया और तुम आ गये घर चलो तुम्हे में लड्डू देती हु.’ अब गोपी का पति तो घबराने लगा .. उतने में कन्हैया आख मलते मलते अन्दर से आये, और बोले ‘कोंन है मैया ,कोंन गोपी चिला रही है ‘?..

ओहोहोहोहो प्रभा काकी आप.!

गोपी बोली ‘प्रभा काकी के इथर आ तू रुक अब. कन्हैया आगे आगे और गोपी पीछे पीछे, कन्हैया ठेंगा दिखाते हुए बोले ‘ले पकड़ पकड़ पकड़ पकड़.! कन्हैया बोले ‘गोपी अब की पकड़वे की कोसिस की सो पति का हाँथ पकड़ा दिओ, आगे से पकड़वे की कोसिस की तो ससुर का हाँथ पकड़वा दुगा… मेरा नाम भी कन्हेया है, ,कन्हेया’.

ऐसे है हमारे ठाकुर जी माखन चोर
,ये माखन चोरी नही ये तो मनकी चोरि है , श्री कृष्ण तो गोपियाँ के मन चुराते है…

जय श्री राधे राधे जी

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तोहे राधा की कसम




वृन्दावन का एक भक्त ठाकुर जी को बहुत प्रेम करता था, भाव विभोर हो कर नित्य प्रतिदिन उनका श्रृंगार करता था

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आनंदमय हो कर कभी रोता तो कभी नाचता
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एक दिन श्रृंगार करते हुए जैसे ही मुकट लगाने लगा, तभी मुकट ठाकुर गिरा देते
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एक बार दो बार कितनी बार लगाया पर छलिया तो आज लीला करने में लगे थे
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अब भक्त को गुस्सा आ गया, वो ठाकुर से कहने लगा तोह को तेरे बाबा की कसम मुकट लगाई ले
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पर ठाकुर तो ठाकुर है, वो किसी की कसम माने ही नही
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जब नही लगाया तो भक्त बोला तो को तेरी मइया की कसम। ठाकुर जी माने नही। अब भक्त का गुस्सा और बढ़ गया
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उसने सबकी कसम दे दी। तोहे मेरी कसम.. तोरी गायिओ की कसम.. तोरे सखाँ की कसम.. तोरी गोपियों की कसम.. तोरे ग्वालों की कसम.. सबकी कसम दे दी,
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पर ठाकुर तो टस से मस ना हुए
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अब भक्त बहुत परेशान हो गया और दुखी भी। फिर खीज गया और गुस्से में बोला-
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ऐ गोपियन के रसिया.. ऐ छलिया, गोपियन के दीवाने, तो को तोरी राधा की कसम है, अब तो मुकुट लगाले
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बस फिर क्या था.. ठाकुर जी ने झट से मुकट धारण कर लिया।
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अब भक्त भी चिढ़ गया। अपनी कसम दी, गोप-गोपियों की, माँ, बाबा, ग्वालन की दी। किसी की नही सुनी लेकिन राधा की दी तो मान गये
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अगले दिन फिर जब भक्त श्रंगार करने लगा तो इस बार ठाकुर ने
बाँसुरी गिरा दी
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भक्त हल्के से मुस्कराया और बोला- इस बार तोह को अपनी नही मेरी राधा की कसम। तो भी ठाकुर ने झट से बांसुरी लगा ली
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अब भक्त आनंद में आकर कर झर-झर रोने लगा
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भक्त कहता है- मै समझ गया मेरे ठाकुर, तो को राधा भाव समान निश्चल निर्मल प्रेम ही पसंद है। समर्पण पसंद है

इसलिये राधा से प्रेम करते है

अपने भाव को राधा भाव समान निर्मल बना कर रखे अपने प्रेम को पूर्ण-समर्पण रखे सरलता में ही प्रभु है
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हे मेरी राधे जू, सारी रौनक देख ली ज़माने की मगर, जो सुकून तेरे चरणों में है, वो कहीं नहीं

तुम जप लो राधे राधे भक्ति करो सच्चे मन से
ये जीवन तो एक दिन जाना है लौट कर फिर नही आना है

जय श्री राधे राधे जी