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खिचड़ी उत्सव स्पेशल

सभी को राधे राधे ! श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश

इस उत्सव के बारे में काफी लोगो को बहुत कम जानकारी है तो इस ब्लॉग में हम आपके सब प्रश्नों को रखेगे !

वैसे तो राधावल्लभ जी मंदिर में ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन कोई उत्चसव नहीं होता हो ! इसमें से एक उत्सव है खिचड़ी उत्सव जो राधावल्लभ  सम्प्रदाय में बहुत प्राचीन काल से मनाया जाता है

ये उत्सव इस साल पौष शुक्ला दौज ( 4 जनवरी 2022 से 3 फरवरी 2022 ) एक महीने तक चलेगा !

मंदिर में सुबह 5 बजे से ही ये उत्सव रोज प्रारंभ हो जाता है और समाज गायन होता है ( मतलब की इनके पदों को राधावल्लभ जी को सुनाया जाता है ) आप खिचड़ी उत्सव के  पदों को अगर ध्यान से पढेगे तो अपने आप समझ जायेगे ! इसके बाद मंगला आरती होती है ! और राधावल्लभ जी जो भेष धारण करते है उनको बांटा भी जाता है वो धन्य है जिनको उनके वस्त्र परशादी में मिलते है !

एकादशी के दिन श्रीराधावल्लभलाल ‘ श्रीबिहारीजी बनते हैं


आप घर पर कैसे उत्सव मनाये ?

आप घर पर भी खूब अच्छे से उत्सव मना सकते है ! इस ब्लॉग में दिए दिए  सभी पदों को आप जैसा आपको समय मिले रोज अपने ठाकुर जी को सुनाये और उनको नए नए भेष में सजाये और भोग में खिचड़ी या अन्य गर्म चीज बना कर भोग लगाये !
और आपको रोज इसी राधे कृष्णा वर्ल्ड एप के हित स्पेशल में खिचड़ी उत्सव स्पेशल दर्शन में जाकर रोज दर्शन कर सकते है !


आप हमारे साथ भी आपके ठाकुरों की छवियो को शेयर कर सकते है जो की एप के खिचड़ी उत्सव स्पेशल में जाकर कर सकते है !

( If Anyone Want To Donate For This Seva : You May Click On Sant Seva Icon For Donation )


राधावल्लभ जी के खिचड़ी उत्सव के सभी पदों का हिंदी अनुवाद सहित वाख्या है
सभी हिंदी अनुवाद से समझ पायेगे की पदों का मतलब क्या है


खिचड़ी उत्सव के पद


प्रथम श्री सेवक पद सिर नाऊँ
करहु कृपा श्री दामोदर मोपै. श्री हरिवंश चरण रति पाऊँ ||
गुण गम्भीर व्यास नन्दन जू के तुव परसाद सुयश रस गाऊँ ||
नागरीदास के तुम ही सहायक, रसिक अनन्य नृपति मन भाऊँ ।।1।।

सर्वप्रथम मैं भी सेवक जी के चरणों मे नमस्कार करता हूँ। हे श्री दामोदरजी (सेवकजी का नाम) आप मेरे ऊपर कृपा करिये जिसके फलस्वरूप श्रीहस्विंश चरणाविन्द में मेरी प्रीति हो, प्रेम हो ।

व्यासनन्दन भीडित हस्तिंश प्रभु के सबसे दुर्ज्ञेय, अद्भुत रसमय गुण, ईसता, दीनता, उदारता इत्यादि करके गम्भीर है। आपका कृपा प्रसाद पाकर उनके रस का सुयश मान करूँ। हित नागरीदास जी कहते है कि मुझे केवल आपका ही भरोसा है आप ही मेरे सहायक होतेंगे रसिक अनन्य नृपति-श्रीहित हरिवंश सम्पूर्ण प्रभु के मन को भाने वाला बन जाऊँ ।


जयति जगदीश जस जगमगत जगत गुरु, जगत वंदित सु हरिवंश बानी|
मधुर, कोमल, सुपद, प्रीति-आनंद-रस, प्रेम विस्तरत हरिवंश बानी ॥
रसिक रस मत श्रुति सुनत पीवंत रस, रसन गावन्त हरिवंश बानी ।
कहत हरिवंश हरिवंश हरिवंश हित जपत हरिवंश हरिवंश बानी ।।2।।

श्री सवेक जी महाराज जयति कहकर वाणी और नाम को नमस्कार करते हैं, क्योंकि नाम और वाणी अभेद है “वानी श्री हस्विंश की, के हरिवंश ही नाम “

भी हरिवंश नाम के अर्थ अक्षर हरि ही का ऐश्वर्य यह सब लीला अवतार और उनके लोक, प्राणी मात्र, पशु पंछी, चराचर सब, सर्व-व्यापक तत्व ‘श्रीहित का भजन करते हैं, सब वेद पुराणादिक हरि से जीव तक, इसके आधीन है, परन्तु इस रहस्य को कोई जान नहीं सका। तव भीहरिवंश हित सम्पूर्ण प्रभु, आचार्य रूप में प्रगटे और श्रीहित का वाणी रूपी भजन देकर सबको अलभ्य लाभ दिया इसलिए तुम हे हरिवंश प्रभु, “जगत के ‘ईश हो और गुरू हो यह वाणी जो केवल रस ही भवित करती है जगत चंदनीय है, इसमें आणित जन भी आ गए।

श्री हरिवंश वाणी, एक रस, विशुद्ध नेह गई, मिलन रूपा, रास विलास, नित्य विहार का निरूपण करने वाली है, जो केवल रस ही भक्ति करती है. इसमें भिन्न-भिन्न और रसों की मिलौली नहीं है ‘अब या में मिलौनी मिलै न कछु जो खेलत यस सदा बन में इसलिए पद-पद प्रति केवल इसी वाणी को माधुर्यता और कोमलता की यथार्थ पढ़ती है, इसलिए यह वाणी प्रीतिरूप आनन्द रस पदती को प्राप्त है, और प्रेम का विस्तार करने वाली है।

‘रसिक – प्रिया-प्रीतम और परिकर, जो इस रस में मस्त है वे श्रवण करके इस वाणी द्वारा भवित रस का पान करते हैं “श्याम श्याम प्रगट-प्रगट अक्षर निकट प्रगट रस भवत अति मधुर वाणी और आगे सेवक जी महाराज कहते हैं “नाम वाली निकट श्याम श्यामा प्रगट रहत निशिदिन परम प्रीति जानी।”

और फिर स्वाद पाकर इसी वाणी को गाने लगते हैं प्रशंसा सूचक कहते हैं “हरिवंश, हरिवंश हरिवंश हित ऐसे प्रशंसा करते एक हरिवंश नाम को ही अथवा वाणी को ही जपते हैं।”


जयति वृषभानुजा कुँवरि यथे।
सच्चिदानन्द घन रसिक सिरमौर वर, सकल वाँछित सदा रहत साथे |
निगम आगम सुमति रहे बहु भाषि जहाँ , कहि नहीं सकत गुण गण अगाथे ।
जै श्री हित रूपलाल पर करहु करुणा प्रिये, देहु वृन्दाविपिन मित अबाथे ।।3।

तृषभानु कुँवरी वृष शब्द का एक अर्थ काम है सो यहाँ निकुंज रस के अन्तर्गत का अर्थ ‘प्रेम’ “हित, महापुरुषों ने किया है। प्रेम रूपी भानु यानी ‘श्रीहित मूर्तिवंत श्रीहित “कुंवरी राधे की जै हो ।

पीछे पदों में बता आये है कि यहां निकुंज रस में और रसों की मिलौनी नहीं है समाई नहीं है।

ब्रज वृन्दावन जहाँ दास्यरस, वात्सल्य रस, सख्य रस इत्यादि भिन्न-भिन्न रसों की मिलौनी है और जहाँ इन रसों में सक की लहरें है, उसे तो निगम आगम ने गाया ही है, उनकी गम्य यही तक है, परन्तु यह तो ‘श्रीहित’ का नित्य वृन्दावन है, यहां और की तो कौन कहे- हरि की भी गम्य नहीं, दुर्ज्ञेय है। यदि यहाँ व्रज की श्री वृषभानु जी की कुँवरी ऐसा अर्थ करें तो निगम आगम सुमति रहे बहु भाषि जहां, कहीं नही सकत गुण-गण अगाशे यह कहते नहीं बनता। क्योंकि निगम-आगम ने तो ब्रज वृन्दावन गाया। सेवक वाणी प्रमाण है ” निगम आगम अगोवर राधे, सहज माधुरी रूप निधि तहां श्रीजी की वाणी “अलक्ष राधास्त्र्यं निखलनिगमैरप्यतितरां इत्यादि राधासुध्धानिधि

नागरीदास जी ने सर्वप्रथम पद मे ही कहा है “गुण गम्भीर व्यासनन्दन जू के व्यासनन्दन कौ ? ‘श्रीहित ही तो हैं जो व्यास मिश्र जी के यहाँ प्रगटे “कृपा रूप जो वपु धरयों और श्री राधा कौन ? जो राह य श्रीहित ही तो हैं तहां नागरीदास को अष्टक “रसिक हरिवंश सरवंश श्रीराधिका, राधिका सरवंश, हरिवंश वंशी “पूरा अष्टक देख लेनो इति ।

इसलिये है ‘श्रीहित की मूर्तिवंत कुंवरी श्रीराधे तुम्हारी जय हो तुम सच्चिदानन्द घन स्वरूप हो और रसिकों की सिरमौर हो, जो आपके चरण कमलों की रति प्राप्त करने की वांछ करते हैं। आपके अपार गुण के गणों को वेद पुराण और बहुत भांति के ‘सुमति कहिये विद्वान और वेद आदि पर भाष्य लिखने वाले भाषी, वर्णन नहीं कर सकते।

श्रीहित रूपलाल जी महाराज कहते हैं ऐसी जो श्रीहित राधे है वह मुझ पर करुणा करके मुझे वृन्दावन में बाधा रहित बास प्रदान करें- अर्थात् मुझे अपना सहवारी स्वरूप प्रदान करके ‘नित्य वृन्दावन की कुंजो में स्थान दें।


श्री व्यानन्दन दीनबन्धु सुनि पुकार मेरी मूढ़ मन्द मति लबार भ्रमी जन्म बार-बार, कष्टातुर होरु नाथ शरण गही तरी ।
भजन-भाव बनत नाहिं मनुज देह वृथा जाय, करौ कृपा बेगि प्रभु बहुत भई देरी ।
त्रिगुण जनित सृष्टि मांझ दरसत महिं दिवा साँझ, हृदय तिमिरछाय रह्यो झुक सघन अंधेरी ।
कृपा दृष्टि वृष्टि करी राजत फूलवारी हरी, आतुर पर श्रवौ बूंद शुष्क होत जेरी|
ललित हित किशोरी नाम राखत प्रभु तुमसों काम, याम जात युगन तुल्य करौ नाथ चेरी ।।4।।

हे दीनबन्धु श्रीहरिवंश प्रभु, आप मेरी वन्दना सुनें। मैं मूद मन्द मति, लबार-बक करती रहने वाली, बार बार जन्म लेकर हर जन्म में भटकती रही हूँ। अर्थात् कहीं विश्राम नहीं मिला, और अब कष्टों से आतुर हे नाथ, आप की शरण में आई हूँ। मुझ से भजन-भाव बनता नहीं, यह मनुष्य देह वृशा ही बीत रही है । बहुत काल बीत चुका है, हे प्रभु अब आप मेरे ऊपर शीघ्र कृपा करें। इस त्रिभुणत्मक सृष्टि अर्थात् संसार में चारों ओर त्रिगुणात्मक विषयों की सघन अंधेरी सी मंडराती रहती है और मेरे हृदय में अन्धकार छाया हुआ है जिसके कारण मुझे सुबह-शाम का बोध नहीं होता यानी ओपेड़वन में पता ही नहीं पड़ता कब सुबह हो गई और कब शाम ढल गई।

आप मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि की वर्षा करें, मुझ आतुर पर कृपा की बूँदें भवित होने पर मेरी हृदय रूपी फुलवाड़ी जो सूख रही है फिर से हरी हो जाएगी। मैं हित ललित किशोरी नाम वाली, हे प्रभु केवल आप ही से संबन्ध रखती हूँ, मेरा प्रत्येक प्रहर युगों के समान व्यतीत हो रहा हे नाथ मुझे अपनी दासी बना लें।


जय जय जय राधिके पद सन्तत आराधिके, साधिके शुक, सनक, शेष नारदादि सेवी ।
वृन्दावन विपुल धाम रानी नव नृपति श्याम, अखिल लोकपालदादि ललितादिक नेवी ।
लीला करि विविध भाय बरसत रस अमित चाय, कमल प्राय गुण पराग लालन अलि खेवी।
युग वर पद कंज आस वांछत हित कृष्णदास कुल उदार स्वामिनि मम सुन्दर गुरु देवी ।।5।।

श्रीहित कृष्णदास जी महाराज अपने ही निज स्वरूप हितानन्द में डूबकर कहते हैं, ‘हे श्रीराधे- आपकी जय हो, जय हो, जय हो। वे श्री राधा कैसी है ? जिनके पद कमलों की मै निरन्तर आराधना करता हूँ, और परम भागवत शुक्र, सनक, शेष नारदादि के लिए भी सेव्य रूपा है, क्योंकि उनकी भी वहां गति नहीं है रानी नव नृपति श्याम नवल वृन्दावन नाथ की पद्महिषी, सव धामों के धाम सर्वोच्च धाम नित्य वृन्दावन में ललित आदि सखियों सहित विराजती है और वह वृन्दावन सम्पूर्ण लोकों के लोकपालों द्वारा वंदनीय है। उसी वृन्दावन में रास-विलास की लीला करती हुई, श्रीराधा विविध भावों को दरशाती हुई अनन्त चाव भरे चीजों से रस की वर्षा करती है। प्रियाजी अनन्त चोज भरे हाव-भाव दरशाने के गुणों में निपुण हैं, ऐसे हाव-भाव जब दरशाती है तब श्री मुस्ख कमल से जो मकरन्द निस्झरित होता है उसे लाल जी भंवर की वृत्ति लेकर पान करते हैं।

श्रीहित गोस्वामी कृष्णदास जी महाराज कहते हैं कि श्री राधा के युगल चरण कमलों में मेरी लालसा सदा लगी रहे, भीहित कुल की गुरु-देवी मेरी उदार स्वामिनान से मेरी यही आकांक्षा है।


राधिका सम नागरी प्रवीन को नबीन सखी, रूप गुण सुहाग भाग आगरी न नारी ।
वरून लोक, नाग भूमि, देवलोक की कुमारि, प्यारी जू के रोम ऊपर डारौ सब वारि ।
आनन्दकंद नन्दनन्दन जाके रस रंग रच्यौ, अंग भरि सुधंग नच्यौ मानत हँसि हारि ।
जाके बल गर्व भरे रसिक व्यास से न डरे, कर्म-धर्म-लोक- वेद छौंडि मुक्ति चारि ॥6॥

निकुंज बिलासिनी श्रीराधा के समान हे सखी, कोई भी अन्य नारी नहीं है, क्योंकि यह नागरी है-तहां श्रीजी की वाणी ‘नागरता की रासि किशोरी और ऐसी नागरी है कि चतुरों के समूह के मुकुटमणि सांवरों जो प्रीतम, उनको वितै के, नेक मुख की मोरन मात्र में निवेश कर देती है। और फिर प्रवीन है-गान में कठिन ताल सुर विकटताने सहज में लेती है, नृत्य की विविध गतियों को लेने में, लालजी भी इनसे हारे है। नवीन है-इनका नेह, रंग रस सदा नवीन ही बना रहता है। रूप की सहज माधुरी लाल जी के मन को हरण कर लेती है, तहां श्रीजी की वाणी “रोमालीमिहिरात्मजा सुललिते बन्धूकबन्धु प्रभा” राधासुधानिधि | कोक कलान इत्यादि के विशेष गुणों में निपुन है। इसलिए, हे सखी जो यह श्री हित राधे हैं, इनके भाग की क्या कहिये जिनका सुहाग, सकल लोक चूडामणि रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर भी सदा इनको जपते हैं इन ही का भजन करते रहते हैं। तहां श्रीजी की वाणी “ज्योतिश्यांनपरः सदा जपति या प्रेमापूर्णो हरि” राधासुध निधि |

श्रीजी के इन गुणों का अनन्त विस्तार है। तहां श्रीजी की वाणी ‘वृषभानुनन्दिनी मधुर कला पद संख्या ८१ इत्यादि ऐसे बहुत कही है। वाणी जी में रत्ति भर सोना दिखा के सुमेरु का ध्यान करने के से संकेत है। प्रियाजी की रूप माधुरी, गुणों का वर्णन करने में आज तक कोई पार नहीं पा सका और न ही कभी कोई पा सकेगा जितनों कहो, सो थोड़ा सारांश में इतनो समझ लेनो- अनिर्वचनीय है।

वरून लोक, नागलोक, भूलोक, देलोक की कुमारियों के रूप गुण इत्यादि प्यारी जू के एक रोम पर न्यौजवर है। तहां श्रीजी की वाणी देक्लोक, भूलोक, रसातल सुनि कवि कुल मति डरियो, सहज माथ चुरी अंग अंग की कहि कासों पटतरिये ” देलोक के कवि शुक्रचार्य जी, श्लोक के व्यास जी, रसातल के शेषनाम जी, इन सब कवियों को अपने-अपने लोकों की कुमारियों के रूप गुण का ज्ञान है, परन्तु इनकी भी मति भयभीत है कि इनकी बराबरी किससे करें। इसलिये इनकी उपमा यह स्वयं ही है, इनकी उपमा नहीं

आनंद कंद आनन्द के मूल, नंद-नन्दन, आनन्द को भी आनन्दित करने वाले, इनके रस रंग में डूबे है। महा हर्ष में अंग में भर कर सुगंध नृत्य करते हैं, परन्तु जब प्रियाजी नृत्य की गतिविधियों लेती है- तो हँसते-हँसते अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं। इस हार के ऐसे प्यार भरे दोज है कि कहते नहीं बनता, व्यास जी को पढ़ “पिय को नाचन सिखावत प्यारी ” मान-भुमान लकुट लीए ठाढ़ी डस्पत कुंजबिहारी व्यास स्वामिनी की ठवि निरखत, हँसि-हँसि दे दे करतारी सुहृदयों के हृदयगम्य है।

श्री ‘व्यास जी महाराज कहते हैं, ऐसी स्वामिनी का कृपा रूपी बल प्राप्त करने का मुझे गर्व है और इसी बल के प्रताप से कर्म, धर्म, लोक, वेद यह चारों प्रकार की मुक्तियों को त्यागते मुझे डर नहीं लगा।

नित्य वृन्दावन निकुंज विलासिनी, श्रीहित राधा की कृपा प्राप्त कर व्यास जी मुक्तियों को त्याग दें तो कोई आश्चर्य बात नहीं है। निकुंज की बात तो दूर रही यहाँ तो भूतल पर प्रकट वृन्दावन में सोहनी लगाने वाली की ऐसी स्थिति है कि विहारिनिदास जी बोल उठे “वृन्दावन की हरी चली मुक्ति दुवराड, बिहारिनिदास अवरज कहा. श्यामा महल कमाए। औरों की क्या कहिये ? राधे-राधे !! इति ।


प्यारी जे के चरणारविनद शीतल सुखदाई।
कोटि चन्द मन्द करत नख-विधु जुन्हाई ॥
ताप-शाप-रोग-दोष दारुण दुख हारी लाल इष्ट दुष्ट दवन कुंज भजन चारी ।
श्याम हृदय भूषण जित दूषण हित संगी।
वृन्दावन धूर धूसर यस रसिक रंगी।
शरणागत अभय विरद पतित पावन बानै ।
व्यास से अति अधम आतुर को-को न समानै ।।7।।

श्रीहित राधा प्यारी के चरणकमल शीतल और सुख देने वाले हैं। कैसे है यह चरणारविन्द और इनकी शतलता ? ऐसे अद्भुत चरण है कि जब रसिक शिरोमणि श्रीश्यामसुन्दर इनको अपने अपने वक्षस्थल पर रते है तो इन चरणों की शीतलता प्रेम-काम के ताप को शान्त कर देती है। तहाँ श्रीजी की वाणी –

“वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दम् प्रेमामृतकमकरन्दरसौघपूर्णम् ।
हृदयर्पितं मधुपतेः स्मरताप मुझे निर्वापयत्परमशीतलमाभयामि ||

अतः लालजी को सुख देने वाले हैं। इन चरणारविन्द की शोभा कैसी है ? नखचन्द्र से छिटकने वाली छटा कोटि-कोटि चन्द्रमा की चाँदनी को मन्द करती है, ऐसी है।

ताप, शाप, रोग-दोष दारुन दुखहारी- (भुमिका) इनकी कोक-कलान को देखकर कोटि-कोटि कामदेव लज्जित हो जायें है। क्योंकि वह देखें कि क्रियायें तो सब हमारी है, परन्तु हम इनमें है नहीं। रतिपति ने विचार कियौ- ठीक है, लज्जित तो हम है ही शाप देते हैं- ‘काम-रोग से ग्रसित रहोगे। लालजी से कहा, “तुम्हारी बड़ी कृपा है नहीं तो मिलन में स्वाद कहाँ से आता, परन्तु यह तो बताओ इस रोग का उपचार क्या? “

उत्तर मिला

“रोग हरन निज चरन सरोरुह नैननि धरि कर पंकज चारु ।”

प्रियाजी के चरणारविन्द का आश्रय लेना रोग नास हो जायेगा। लालजी ने सोची इससे तो नित्य हर समय काम पड़ता है। “काम सौ स्याम ही काम पस्यो इस काम के बिना तो विलसन का सारा मजा ही किरकिरा हो जायेगा, ‘शाप स्वीकार कर लिया, चुप्पी साध ली।

प्रियाजी मानवती हुई और तो और लालजी पर दोष मड़ने लभी सखी ने प्रम भरी डाँट लगाई

साँची झूठ बात सुनत तू, करत नहीं निरजोष ।
कवन भवन तें सुन्दर देख्यौ, जाहि लगावत दोषा

श्यामसुन्दर को कौन से भवन में देख लिया जो ‘दोष’ लगा रही हो। लालजी को विरह व्याप गया। दारुन दुःख लालजी को हो गया। क्या करें ?

तेरे विरह भय दारुन दुःख, के ले जाल बखान्यौ ।
तेरे चरन सरन हो सुन्दरी, ‘व्यास’ सखी गढी आन्यौ ।

हो गया उपचार | इति (भूमिका)

कहने का अर्थ है कि प्रेम के चोज, रसास्वादन के हेतु की गई प्रिया-प्रीतम की निज नई हितमई केली का कोई चारापार नहीं है, उसको समझना, अथाह अगाध समुद्र की तह से मोती चुनने के समान है। शब्दकोष में शबद नहीं है जो प्रिया- प्रियतम की केली का यथार्थ वर्णन कर सकें। जो कुछ इन टूटेफुटे शब्दों का सहारा लेकर कहा जाता है वह संकेत मात्र है, उस भाव स्थिति को उर में जाने का, जिसे रसिकजन हित की विलसन कहते हैं।

प्रियाजी की मन्द-मन्द मुस्कान, कटाक्ष भरी चितवन से लेकर ‘अबोलनों तक केवल प्रेम ही का स्वाद लेने को है, ‘काम’ जब-जब, जो जो गजब लालजी पर ढाता है, यह शब्द “ताप, शाप, रोग, दोष, दुष्ट दवा इत्यादि उसी गजब की पराकाष्ठा को सूचित करने का तुच्छ प्रयास करते हैं।

‘कौन-कौन दुख बरनौ प्रिय को, जो दुख करनी कस्यौ । ‘व्यास’ स्वामिनी करुणा करि, हरि को सब ताप हस्यौ ।। “

लोकवत् शब्दार्थ की यहाँ समाई नहीं जहाँ कुंज भवन है, प्रियाजी के चरणारविनंद की बात चली है, वहाँ निकुंज रस है, और सब अर्थ उस रस के अन्तर्गत ही होगा और यदि नहीं तो ऊपर कहे गये शब्दों का अर्थ लोक दृष्टि से तो स्पष्ट है ही, व्याख्या की आवश्यकता नहीं ।

कुंज भवन में विचरण करने वाले यह चरण “गोविन्द जीवन धनम्” तालजी के इष्ट है। इनके हृदय के भूषण है. श्रीहित के सभी है। वहाँ श्रीजी की वाणी “पद अम्बुज जावक जुत भूषण प्रियतम उर अवनी । यह श्रीवरण, रास में रंगे, वृन्दावन की घर में ‘धूसरित हो रहे हैं कैसी है यह वृन्दावन की ‘पूर ? तहाँ श्रीजी की वाणी “घुसरित हो रहे विविध निर्मित घर, नव कपूर पराग न थोरी महापुरुषों ने ठौर-ठौर कहा है ‘क्युखत् है बल्कि ‘नव कपूखद् है। यदि शब्दार्थ की सांकल में बधा रहना है, जो कहिये इस घरको जिसमें प्यारी जू के चरणारविन्द ‘धूसरित हो रहे हैं, कैसी मानेंगे ? नेक संभालियेगा अपने भाव को, शब्द कोष में छूर रेत को, मिट्टी को कहते हैं ‘कपूखत् रेत के लिए कोई शब्द नहीं है।

व्यास जी महाराज कहते हैं कैसी ही पतित क्यों न हो, उसके लिए इन चरणारविन्द की शारण पावन बाना है, जो अभय का दान देने वाले हैं। व्यास जी कहते हैं इन चरणों की शरण ग्रहण करके मेरे जैसे अ म आतुर को को अर्थत्, कौन-कौन, ‘न समाने यानि नहीं तर भए अर्थात् सब तर गए ।

नोट- पद की व्याख्या प्रचलित पाट के आधार पर की गई है। पाठान्तर भेद बहुत है वासुदेव गोस्वमी जी द्वारा रचित, प्रभुदयाल जी मित्तल द्वारा “भक्त कवि व्यास जी के नाम से प्रकाशित व्यास वाणी में यह पद इस प्रकार है

श्रीराधा प्यारी के चरणारविन्द शीतल सुखदाई । कोटि चन्द मन्द करत नख विद्यु जुम्हाई ||
ताप साप रोग सोग दारुण दुख हारी। कालकूट-दुष्ट-दवन, कुंज भवन चारी ॥
स्थाम हृदय भूषण जुत, द्वेषन जित संगी।
श्रीवृन्दावन धूलि धूसर, यस रसिक रंगी ||
सरनामत अभय विरद पतित पावन बाने ।
व्यास से अति अथम आतुर को, कौन समानौ।।


व्यासनन्दन, व्यासनन्दन, व्यासनन्दन गाईये
जिनको हित नाम लेत दम्पति रति पाईये ||
रास मध्य ललितादिक प्रार्थना जु कीनी
कर तें सुकुंवारि प्यारी वंशी तब दीनी ।।
सोई कलि प्रगट रूप वंशी वपु धारयौ
कुंज भवन रास रवन त्रिभुवन विस्तारयौ |
गोकुल रावल सु ठॉम निकट बाद राजै ।
विदित प्रेम राशि जनम रसिकन हित काजै ॥
तिनकों पिय नाम सहित मंत्र दियौ (श्री) राधे ।
सत चित आनन्द रूप निगम अगम साधे ||
(श्री) वृन्दावन धाम तरणिजा सुतीर वासी
श्रीराधा पति रति अनन्य करत नित खवासी ॥
अद्भुत हरि युक्त वंश भनत नाम श्यामा ।
जै श्री रूपलाल हित चित दै पायौ विश्रामा ॥ 8॥

श्रीहितहरिवंश के नाम अथवा वाणी का नाम यानि सुमिरन सदा करना चाहिये। कैसे ? जाम घटी बिसरे नहीं” ऐसे इन श्रीहिस्वंश का नाम जपने से दम्पति प्रिया-प्रियतम में रति होती है। सेवक जी कहते है। “हरिवंश सु नाम सदा तिनके, सुख-सम्पति, दम्पति जु जिनकै ।

श्रीहरिवंशचन्द्र, सम्पूर्ण प्रभु के प्राकट्य की भूमिका खोजते हैं। यस के मध्य में किसी समय | ललितादिक सस्तियों ने प्रार्थना करी हे प्यारी जू अब आगे तो कलयुग में ऐसा समय आने वाला है जब | वेद-विधि को जानने वाले बहुत ही कम रह जाएँगे, भक्ति के मर्म को समझने वाले नहीं होंगे, आप कृपा कीजिए जिससे जीवों को प्रेम लक्षणा भक्ति मिले तब प्रियाजी ने अपने हाथों से वंशी लेकर सखियों को प्रदान कर दी रस की मूल तो वंशी ही है “बाजत रस मूल मुर्तिका आनन्दिनी वही ‘वंशी कलियुग में श्रीहरिवंश आचार्य रूप में व्यास मिश्रजी के यहां अवतारित हुए अथवा वही कलि रूपी वंशी हरिवंश आचार्य रूप में तय मिश्रजी के यहाँ मुकलित हुई। और कुंज भवन के रास रंग को त्रिभुवन में विस्तार कियौ । गोकुल और रावल गातों के निकट “बाद ग्राम है। (बड़ों के मुख से सुना है कि बाद का प्राचीन नाम याच ग्राम था और जब हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य हुआ तो घर-घर पंच शब्द सुनाई देने लगे- “घर-घर पंच शब्द बाजिये सेवक वाणी 11)

यह तो विदित ही है कि प्रेमराशी, श्रीहित हरिवंश, सम्पूर्ण प्रभु का जन्म (अवतार) रसिकों के हित के लिए ही हुआ था। श्रीहित हरिवंश प्रभु को स्वयं श्रीराधा ने अपने प्रियतम के नाम से संयुक्त मन्त्र प्रदान किया। इससे यह समझना चाहिए कि महाप्रभु श्रीहित हरिवंश जी द्वारा स्थापित श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय है जिसकी प्रवर्तक आचार्य मनत्रदाता गुरु स्वयं श्रीराधा है। तहाँ हरिलाल व्यासजी का कथन:

यथैवेष्टं सम्प्रदायकै कर्ताऽऽचार्यो यथा मंत्रदः सद्गुरुश्च ।
मंत्री राधा यस्य सर्वात्मजैव वंदे राधा-पाद-पद्म प्रधानम् ||

पर भीहित राधा कैसी है! सतूचित आनन्द रूप है और वेदों द्वारा आलक्षित हैं। श्रीहितहस्विंश महाप्रभु जी ने यमुना के तीर श्रीधाम वृन्दावन में निवास कियौ श्रीहित राधा और उनके पति श्रीहित लालजी, जो दोऊ मन मिलि एक भए. राधावल्लभलाल, में अनन्य प्रेम रखकर उनकी सेवा में नियुक्त रहते थे।

“हर में वंश जुड़कर यह अद्भुत नाम सम्पूर्ण प्रभु हरिवंश बना है, तहाँ सेवक वाणी -नाम अरद्ध हरै अघ पुंज, जगत्र करे हरि नाम बड़ाई सो हरि वंश समेत सम्पूर्ण प्रेमी अनन्यानि को सुखदाई।” इस सम्पूर्ण नाम का प्रियाजी प्रेम से उच्चारण करती है। “प्रज्ञा हरिवंश प्रतीति प्रमानत प्रीतम श्री हरिवंश प्रियम् । माथा (श्री) हरिवंश गीत गुन गोचर, मुफ्ति मुनत हस्विंश मियं ॥” श्रीरूपलाल जी महाराज कहते हैं कि इन श्रीहित हरिवंश प्रभु के चरणों में वित्त लगाने से मुझको विश्राम मिला है।



प्रथमहिं भावुक भाव विचारै |
बनी तनु-मन नवकिशोर सहचरि वपु हितत गुरु कृपा निहारै ||
भूषन वसन प्रसाद स्वामिनी पुलकि-पुलकि अंग धारै।
भूषन वसन प्रसाद स्वामिनी पुलकि-पुलकि अंग धारै ।
जे श्री रूपलाल हित ललित त्रिभंगी रंग रस विस्तारै ||9||

सर्वप्रथम भजन के आरम्भ में, भजनी को भाव से, अपने सखी स्वरूप का विचार करना चाहिये । श्रीहित गुरु की कृपा का मनन करते हुए तन मन से नवकिशोर सहवरी रूप अपने आपको देखना चाहिये, अपने स्वामिनी द्वारा दिये गए भूषणों और वस्त्रों को रोमांचित होकर धारण करना चाहिये (मानसी में)।

तहाँ श्रीजी की वाणी (श्रीराधासुधानिधि)

“दूकूलं विभ्राणामथ कुचतरे कंधुकपट प्रसादम् स्वामिन्याः स्वकरतलदत्तं प्रणयतः स्थितां नित्यं पायें विविध परिचयैक चतु किशोरीमात्मानम् किमिठ सुकुमारी मुकलये 1॥”

महात्मा भीरतनदासी इस स्तोत्र की टीका कहते है:-(भाषा रूपान्तर) “अब इस श्लोक के भाव में भीहित प्रभुजी, अपना जो सुन्दर सखी स्वरूप, यद्यपि महल में नित्य श्रीहित अली और वंशी रूप है, तहाँ दोहा :
हित स्वरूप विवि हिय में वंशी विवि फरमाहि ।
सखी स्वरूप सखीन में, यो हित निकट रहांहि ॥

फिर भी स्वामिनी जू की दासी भाव की उत्कंठा करते हैं। मेरी श्रीस्वामिनी जु मेरे पर अति कृपा करके अपनी प्रसादी सारी (साड़ी) और कंचुकी अपने कर कमल से जो दी उसको पहर कर “स्थितां नित्य पार्श्वे” नित पास बैठी रहूँ अथवा खड़ी रहूं। वहां क्या करूं? “विविध परिचयैक चतुरा” नाना प्रकार की समयानुर सेवा में चतुर जैसी “किशोरीमात्मानं” किशोरी अवस्था बुवाई परै ” किमहि सुकुमारी नु कलये जैसी सुकुमार सखी स्वरूप अपने में कब देखूं। इति ।

श्रीरूपलाल जी महाराज हिते हैं कि इस सहवरी भाव में स्थित होने से श्रीश्यामा श्याम की कृपा से रंग-रस हृदय में प्रकाशित होने लगता है।


सखी, लखी कुंजधाम अभिराम ।
मनिनु प्रकाश हुलास युगल वर, राजत श्यामा श्याम || हास विलास मोद मद होत न पूरण काम ।
जै श्रीरूपलाल हित अली दंपति रस सेवत आठौ याम ||10||

हे सखी, देख तो सही जो प्रिया प्रियतम का निज धाम उसमें जो कुंज है, कितनी सुन्दर है।
“स्याम सुभग तन विपिन घन थाम विचित्र बनाई सेवकवाणी ||

मनियों के प्रकाश में श्रीश्यामा-श्याम उल्लासपूर्वक सुशोभित है, हास विलास, विनोद मोद विहार में होता रहता है, विहार में चाव बढ़त ही रहता है, कभी घटता नहीं, इसलिए कभी भ्क्षी पूरण काम, तृप्त नहीं होते ।

कामकेलि सतु पाइ दाइ-छल प्रिय ही रिझावत ।
थाइ धरत उर अंक भाइ मन कोक लजावत ॥
चाय चवम्गुन चतुर राइ रसरति संग्रामहि ।
छाड़ सुजस जम प्रकट गाड़ मुन जीवत श्यामहि ।

-सेवक वाणी

श्रीरूपलाल जी महाराज अपने ही हित स्वरूप को नमस्कार करके कहते हैं कि सखी युगल सरकार के लीला रस का सेवन आठों प्रहर करती है –

चोर चित्त ललितादि कोर स्न्यनि निजु निरखतिं ।
थोर प्रीति अन्तर न भोर दंपति छवि परखतिं ॥

-सेवक वाणी

तहाँ श्रीजी की वाणी:
अनुपम सुख भर भरित क्विस असु आनन्द-वारि कण्ठ दम रोकत ।


लाड़िली लालहि भावत है सखि, आनन्दमय हिम की ऋतु आई।
ऐसे रहे लपटाय दोऊ जन चाहत अंग में अंग समाई || हार उतार धरे सब भूषन स्वादी महारज की निधि पाई।
महासुख को ध्रुव सार विहार है, श्रीहरिवंशजू केलि लड़ाई ||11||

हे सखी, प्रिया- प्रियतम के मन भावती आनन्द प्रदान करने वाली सदी की ऋतु आई है। ऐसे गाढ़ आलिंगन में दोनों आबद्ध है, फिर भी यह इच्छ बनी हुई है कि एक दूसरे के अंगों में समा जायें। विहार के सूख का अतिशय करके भोग करने के हेतु दोनों ने अपनी माला एवं भूषण इत्यादि उतार दिये हैं, रसरूपी “निधि का स्वाद पाकर दोनों मत्त है। ध्रुवदासजी महाराज कहते हैं- परम सुस्त जो कोई वस्तु है, उसका सार केवल ‘हित’ का यह विचार है, जिसे श्रीहस्विंश महाप्रभु जी ने अपनी वाणी में गायौ है।


प्रात समै नव कुंज द्वार है ललिताजू ललित बजाई बीना पौढ़े सुनत श्याम श्रीश्यामा, दम्पति चतुर
प्रवीन प्रवीना ॥
अति अनुराग सुहास परस्पर कोक कला गुण निपुण नवीना |
श्रीबिहारिदास बलि बलि पंदसि यह मुदित प्राण न्यौछावर कीना ||12||

वृन्दावन की नवीन कुंज में जहाँ प्रिया प्रियतम ने सिज्जा पर सारी रात व्यतीत करी, तहाँ भोर होने पर, कुंज द्वार पर ललिता जी ने बहुत ही सरस, वीणा पर अलाप छेड़ी अलसाये दोनों सिज्जा पर सोये सोये ही मधुराको रहे हैं। ललिताजी वाणी तो बजाई कि अब उठिये सखियाँ दर्शन को खड़ी हैं, परन्तु वीणा के मधुर सुरों को सुनकर इनकी तो चाह और बढ़ी, दोनों कोक कलाओं में प्रवीन, चतुराई से पौढ़े ही है। एक दूसरे से परस्पर सुहाग है, अति अनुराग है, और कोक-कला के नतीन गुणों से दोनों निपुण है।

श्रीविहारिनदास जी यह इस छवि का अनुभव करते हुए अति प्रसन्न होकर वन्दना को हुए

बलिहार- बलिहार करते प्राण न्यौछावर करते हैं।


जगाय री भई बेर बड़ी ।
अलबेली खेली पिय के संग अलकलड़े के लाड़ लड़ी ।।
तरलि किरन रन्धन है आई, लगी निवाई जानि सुकर वर तहाँ हहौ ही है रही अड़ी।
श्रीविहारिनिदासि रति को कवि वरनै जो छवि मो मन मांझ गड़ी ||13||

सखी के बोल-सखी के प्रति बहुत देर हो गई है, अरी (प्रेम का सम्बोधन है), अब तो जगा सारी रात, अपने अलक लड़े प्रीतम के संग लाडिली जी ने विहार कियौ है (अभी भी पूर्ण ज भए क्या ?) देखो सूर्य की किरणें कुंज लताओं के झरोखों में से छिटक रही है, यह जानकर कि किरणें प्रिया-प्रियतम पर पड़ेगी तो उन्हें गरमी लगने लगेगी, मैं ही लताओं के छिद्रों पर अड़ी खड़ी रही।

श्रीविहारिनि दास जी कहते हैं कि प्रेम की सुरतांत छति का यह दृश्य जो मेरे मन में गड़ा है, इसे कौन कवि वर्णन कर सकता है ? अर्थात् अनिर्वचनीय है।


जागो मोहन प्यारी राधा ।
ठाड़ी सखी दरस के कारण, दीजै कुंवरि जु होइ न बाधा |
हँसत-हँसत दोऊ उठे हैं युगल वर मरगजे बामे फबि रहे दुहुँ तन ।
चारत तन मन लेत बलैयाँ देखि देखि फूलत मन है ही मन ||
रंग भरे आनंद जम्हावत अंस अंस धरि बाहु रहे कसि।
जय श्री कमलनैन हित या छवि ऊपर वारों कोटिक भानु मधुर शशि ||14||

सखियाँ कहती है प्यारेलाल जी, प्रियाजी, अब जानिये आपके दर्शन को सखियों द्वार पर खड़ी है, प्यारी जू यदि आपको किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं पड़ती हो तो, इन्हें (सुस्तांत) छवि का दर्शन देकर कृतार्थ करें बाधा का शब्द सुनते ही दोनों हंस दिये बड़ी चतुर है यह सखियाँ, हमारे रात्रि के विहार का सारा हाल, हमारी छवि का दर्शन देखकर ही जान लेंगी, हम दुरायो चाहें पर सम्भलने का समय ही नहीं दे रही है- द्वार पर खड़ी उतावली हो रही हैं, ऊपर से व्यंग और कस रही है- यदि बाधा नहीं पड़ती हो तो !! दर्शन दीजिये। क्या करते ? उठ बैठे-सस्चियों के मनोरथ पूर्ण करने को दोनों के श्री अंग में सुशोभित हैं। (सुरतांत छवि की शोभा तो मरगजी बागों से ही है जो समस्त विहार के सार को सूचित कर दें।) रतनदास जी लिखते हैं: “सुरतांत के समय अष्टयाम का जो विलास है, इसके सब सुखों का निचोर है। इस समय प्रिया- प्रियतम जू का हृदय और समस्त अंग सर्व सुख करके पूरन महा आनन्दित रसमय होता है ऐसे अद्भुत दर्शन पाकर सखियाँ तन-मन से बलिहार है, मन ही मन फूली नहीं समात है। प्रेम-रंग में सने, आनन्द में प्रिया-प्रीतम जमाई लेते हैं, दोनों के बाहु एक दूसरे में कसे हैं, जैसे कह रहे हों-सखियों हम तो तो रात भर गहरी नींद सो रहे थे-तुम तो यो ही हर बात का बतंगड़ बनाप देती हो। श्रीकमतलजैन जी महाराज अपने श्रीहित वरूप को नमस्कार करते हुए कहते हैं इस अद्भुत छवि पर कोटि-कोटि भानु की उज्ज्वलता और कोटि-कोटि चन्द्रमा की मधुर शीतलता न्यौछवर है “चंदन मयंक जगमगत अतिसे रवि-ससि ही को तेज छियावे ।”


अवहि निसि बीती नाहिंन वाम।
तुम मुख इन्दु किरण छवि व्यापी, कहत प्रिया सों श्याम।।
अंग-अंग अरसान वाम छबि मानि लेढु अभिराम
रहसि माधुरी रूप हित चित्त में होत न पूरन काम ||15||

यह सम्पूर्ण पद अभिवचनीय हितानन्द की लहरों से ऐसा गर्शित है कि इसपद की उपमा को कोई और पद ही दिखाई नही देता । और यदि किसी महात्मा में इस भाव को इतनी ही सुन्दरता से व्यक्त कियौ है तो उन्हें मेरी दण्डवत् स्वीकार हो । भीरूपलाल जी महाराज की कृपा मनाऊँ, जो मुझे बुद्धि प्रकाश दें तो पद के भाव को तनिक खोल सहूँ। जै जै श्रीहरिवंश

वह चैन’ जब थोड़ा-सा अपने स्थान से सरका, तो विपरीत रति के वैम ने प्रियाजी को तनिक झकझोरा-डड़ बैठी। लालजी ने देखा पहले से ही अमित है अब फिर विहार में रत हायेंगी तो और भमित हो जायेंगी, लगे बतराने-प्यारी प्रिया, अभी से क्यों उठ बैठी है- अभी तो रात्रि बीती नहीं है, यह जो ऊपाकालीन प्रकाश आप देख रही है यह तो आपके चन्द्रमुखी मुखारविन्द की कान्ति की किरणें है जिनसे सारा कुंज मन्द-मन्द प्रकाशित हो रहा है और आपके अंग-अंग की अरसान से जो छवि की तरंने उठ रही है, देखिये ना वह कितनी सुन्दर है। प्रियाजी तो भोरी है ही आगे क्या हुआ ? यह तो रहसि माधुरी “एकान्त में माध् पुरी की तरंगे है जो वित्त में उठती रहती है तो प्रिया प्रीतम कभी तृप्त नही होते श्रीरूपलाल जी महाराज कहते है। इति। जै श्रीराधे ।


आजु देख ब्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि
अंस-अंस बाहु दै किशोर जोर रूप राशि,
मनौ तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि पिकनि अपने सुर सो मेलि
मदन मुदित अंग-अंग बीच-बीच सुरत रंग, पल-पल हरिवंश पिवत जैन चषक झेलि ॥16॥

यह श्रीहित चतुरासी जी का पद है। अनेक टीकारों हो चुकी है। प्रेमदासजी महाराज, श्रीलोकनाथ जी महाराज, महात्मा श्रीस्तनदास जी, सुखलाल जी महाराज इत्यादि की प्राचीन टीकाएँ बड़ी भावपूर्ण है। इसके अतिरिक्त आधुनिक टीकाएँ भी है।

प्राचीन टीकाओं से ऊपर उठकर कुछ कहने की मेरी क्षमता नहीं है। इसलिए इस पद का अर्थ प्राचीन टीकाओं के आधार पर ही कर रहा हूँ।

आजु देखी व्रज सुन्दरी मोहन बनी केली: प्रिया- प्रियतम नित नवीन बने रहे हैं और इनके विहार का आदि-अन्त नहीं। इसलिए यहाँ एकरस सदा ‘आज’ भी है। ब्रज-यानि समूह सो सखियों के समूह में जो महासुन्दर प्रियाजी है उनकी और मोहनलाल की केलि बनी है बनी है, यानि जैसी होनी चाहिये वेसी ही, जिसने तुम दोनों को मोहित कर रखा है।

अंस अंबा दें किशोर जोर रूप राशी, मनी तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि:

दोनों के बाहु परस्पर एक दूसरे के भौर – श्याम अंसों पर विराजे है और तुम दोनों किशोर हो , केलि की चाह सदा बनी रहती है । तुम दोनों रूप की राशि हो सो मानों सरस रूप रसमय कनक की बेलि लपट रही है । प्रिया प्रियतम के महा कोमल अंग हैं , जो विहार के समय बेलि और वृक्ष की तरह लपटे रहते हैं ।

नव निकुंज भ्रमर गुंज मंजु घोष प्रेम पुंज , गान करत मोर विकानि अपने सुर सो मेलि :

इन दोनों की जो लपटान है सोई नव निकुंज है । इस नव निकुंज में इन दोनों के अमर रूपी मन मधुर गंजार करते हैं सो प्रेम कौ पुंज है । विलास ही में रास की रचना हो रही है , मनोहर मोर जो श्रीमोहन और कलित कोकिला जो कंतरी जू की परस्पर की रस भरी गोलन है वही गान है जिसे सुर से मिलाकर कर रहे हैं । यह दोनों एक दूसरे को पोषने में तदाकार है , प्रेम के मिले सुर से गा रहे है ।

मदन मुछित अंग – अंग बीच बीच सुरत रंग पल पल श्रीहरिवंश पीवत नैने चाषक झेलि :

तुम्हारे अंग – अंग प्रेममय मदन के आनन्द से भरे है और बीच – बीच में प्रेम के वोज , चुम्बन परिरंभन आदि हो रहे है । श्रीहित सखी जी कहती है तुम्हारा यह प्रेममयी रसासब मैं पल – पल जैन रूपी पात्रों से पान करके जीती है इति ।।


आजु सखी, अद्भुत भाँति निहारि।
प्रेम सुदृढ़ की ग्रंथि जु परि गई, गौर स्याम भुज चारि॥
अबहीं प्रातः पलक लागी है मुख पर श्रमकन वारि।
नागरीदास निकट रस पीवहु अपने वचन विचारि॥17॥

हित नागरीदासजी अपने सखी स्वरूप में स्थित निकटवर्ती सखी से कहते है ।

‘ हे सखी , प्रिया प्रियतम विहार से अमित , अलसाय कर , अभी – अभी नेक सोए है । तुम जगा मत देना ) ।


अबही नेंकु सोए है अलसाय ।
काम केलि अनुराग रंग भरे जागे रैन विहाय ।।
बार – बार सपनेहूँ सूचत रंग के भाय ।
यह सुख निरखि सखीजन प्रमुदित नागरीदास बलि जाय।।18 ।।


परस्पर अनुराग के रंग में भरे प्रेम विहार करते सारी रात बीत गई प्रेम के भर में स्वप्न में भी बार – बार उसी प्रेम के भावों को प्रकट कर रह है

सिज्जा महल में सुख को देखकर सखियाँ आनन्दित हो रही है , नागरीदास जी स्वयं संबोधन करके कहते हैं , ‘ बलिहार जाऊँ । इति ।


सिटपिटात किरनन के लागे ।
उठि न सकत लोचन चकचौधत , ऐचि ऐचि ओढ़त बसन जागे ।
हिय सौ हिय मुख सौ मुख मिलवत रस लम्पट सुरत रस पागे ।
नागरीदास निरखि नैनन सुख मति कोऊ बोलौ जिन आगे ।।19 ।।

सिज्जा महल में , ऊषाकालीन , कुंज के सन्ध्रों में से सुनहरी किरणें सुबह होने का संदेश देती छिटको लगी प्रिया प्रियतम पर पड़ी तो नेक बेवैन से होने लगे । कोमल नेत्र अचानक किरणों का स्पर्श पाकर टि या गए । आनसवलित , जैसे तैजे नेक जागे , और अपने अपने वसन धीरे धीरे खींचातानी करते ओळने लगे , ” देखि संभार पीतपट ऊपर कहाँ चुनरी राती । ” इसी खींचातानी में प्रेम का भर हो आया हिय से हिय , मुख से मुख मिल गए . अधयमृत का आदान – प्रदान होने लगा । दोनों रस – लम्पट सुरत रस में पगे हैं ।

हित नागरीदास जी कहते हैं , हे सखियो अपने नैनों के पुट से इसको झेलो , चुप रहो , और सामने मत जाना , क्योंकि तुम्हे आया देखकर संकुचा जाएंगे तो विहार का सुख जाता रहेगा । तहाँ ध्रुवदास जी का मार्मिक दोहा – “

नाइक तहां न नाइका , रस करवावत केलि । सखी उभै संगम सरस , पियत नैन पुट झेलि ॥


भोर भये सहचरि अब आई ।
यह सुख देखत करत बधाई ।।
कोऊ बीना सारंगी बजावै ।
कोऊ इक राग विभासहिं गावै ।।
एक चरण हित सों सहरावै ।
एक बचन परिहास सुनावें ।
उठि बैठे दोऊलाल रंगीले ।
विधुरी अलक सबै अंग ढीले ।
घूमत अरुण नैन अनियारे ।
भूषण बसन न जात संभारे ।।
हार बार मिलि के उरुझानि । निशि के चिन्ह निरखि मुसिकाने ।।
निरखि निरखि निसि के चिह्न रोमांचित है जाहिं ।
मानौ अंकुर मैन के फिर उपजे तन माहिं।।
20 ।।

प्रातः हुई और सखियाँ सुरतांत छवि का दर्शन करने सेवा में आ पहुँची । दर्शन का सुख पाकर और एक दूसरे को बधाई देती है ।

कोई वीणा तो कोई सारंगी बजा रही है तो कोई राग विभास ही गा रही है । आनुसंगिक अर्थ है कि गाना बजाना एक ही राग में सुर से सुर मिलकर हो रहा है । एक चरण पलोटत है तो हास परिहास कर रही है । सखियों के मनोरथ पूर्ण करने हेतु दोनों उठ बैठे है । प्रियाजी की अलकें बिथुरी है और सभी अंग अंग में अरसान छाई है । प्रेम के भर में मैन अरुण है और गोलाक धूम रहें है । ” अरुण जैन धूमत आलस जुत कुसुम गलित लट पाँती । “

भूषण तसन सब अस्त व्यस्त हो रहे है । प्रियाजी का अंजन लाल जी पर और लालजी की पीक प्यारी के कपोलों पर लगी है । कपोलों की शोभा ऐसी बढ़ी मानों पीक कपोल कमल पर झोरी । ” ऐसी सुन्दर छवि भला कैसे वर्णन की जा सकती है । विहार के समय दोनों के हार और बाल जो परस्पर उलझ गए थे सुरझा रहे है । जैसे – जैसे सुरझाते हैं , और उलझते जाते है । ‘ नख सिखलों दोऊ उरझि रहे , नेकहूँ सुरझत नाहि । ज्यों – ज्यौ रूचि बाढ़ अधिक , त्यौ – त्यौ अधिक उरझाहिं ” ध्रुवदासजी ।

प्रेम बिहार में , श्री अंगों पर रात्रि में लगे चिह्नों को देखकर मुस्करा रहे हैं । ” फूले अधर पयोधर लोचन , उर नख भुज अभिरामिनी । गंडनि पीक मषि न दुरावति , ‘ व्यास ‘ लाज नहीं कामिनी । “

रात्रि के चिन्हों को देख – देखकर फिर दोनों को रोमांच हो रहा है , मानों प्रेम के अंकुर फिर से तन में अंकुरित हो उठे हैं । चाचा श्रीवृन्दावन दास जी अपने एक पद में कहते हैं

सकुचत सुरतांत चिन्ह देवि देखि समुझि – समुझि सुखहि लियें मनहि दिये हितु बढ़ायौ । लसत मरगजे सुवीर , भवन भई शोभा भीर , दुहुन को सुहाग भाग छकि छकि दुलरायो । ” सुहृदयों के हृदयगम्य है ।


राधा प्यारी मेरे नैने सलोल ।
तै निज भजन कनक तन जौवन , लियौ मनोहर मोल ।।
अधर निरंग अलिक लट छूट , रंजित पीक कपोल ।
तू रस मगन भई नहिं जानत , ऊपर पीत निचोल ।।
कुच युग पर नख रेख प्रगट मानौ , शंकर शिर शशि टोल ।
जय श्रीहित हरिवंश कहति कछु भामिनी अति आलस सों बोल ।।21 ।।

यह भी श्रीहित चतुरासी जी का पद है । प्राचीन टीकाओं के आधार पर अर्थ प्रस्तुत है ।

मूल : – राधाप्यारी तेरे नैन सलोल ।
राधाप्यारी तेरे नैन अतिशय करके ललिता सों भरे चंचल है ।
अपार गुण है इन नैनों के । ऐसे रंग भरे कटाक्ष चलते है कि लाल जी के प्राण अपने वश में करते हैं , अति बाँके है , किसी के बस नहीं , अति रिझावर है , नेक चोज की बात देखि , तुरन्त रीझ जाते है ।

मूल : – तै निज भवन कनक तन जीवन लियों मनोहर मोल :
भजन शब्द के दो अर्थ है । एक तो सेवा दूसरा अंगीकार करना । तै निज भजन – भक्ति रति विपरीत सों , कनक तन- जिस श्री अंग में ओटे हुए कनक की सी आभा है , जीवन करके प्यारे को मोल लीयो है । कहने का अभिप्राय यह है कि प्यारो आप पर न्यौछावर हो गयो है ।

मूल : – अधर निरंग अलिक लट छूटी रंजित पीक कपोल :
तुम्हारे अधरों में रस रंग का भर रहा , जो प्रीतम को महा विलास में परमान्द दियौ , जिससे बेनी के बन्ध ढीले हो गए है और चिकुर चन्द्रिका से लटें छूटकर भालस्थली पर राजे है , कपोलों पर पीक लगी है । ।

मूल : – तू रस मगन भई नहीं जानति ऊपर पीत निचोल :
तू रस में ऐसी मगन भई कि तुम्हे पता नहीं पड़ा कि प्रीतम का पीताम्बर तुम्हारे ऊपर कब आ गया । श्रीअंगों की अद्भुत शोभा बढ़ी है ।

मूल : – कुच युग पर नख – रेख प्रगट मानों , शंकर शिर शाशि टोल :
दोनों कुतों पर विहार में प्रीतम के नखों की रेखा सी बन गई है । सो ऐसा प्रतीत होता है , शंकरजी के सिर पर जैसे अर्ध चन्द्रमा विराजे है , वैसे नव रूपी चन्द्रमा के समूह की अबली बन गई है ।
कुच नखरेख धनुष की आकृति मनो शिव शिर शाशि राजै ।
सुनत ‘ सूर ‘ प्रिय वचन सखी मुख , नागरी हँसि मन लाजै ।।

मूल : – जै श्रीहित हरिवंश कहत कछु भामिनी अति आलस सों बोल :
जब प्रियाजी ने ऐसे रंग भरे वचन सुने तब अन्तर में तो अति आनन्दित हुई पर ऊपर से सकुच के आलसवंत भइ बोली ” हित सखे तुम तो ऐसी बातें बनाती ही कि आशचर्य को भी आश्चर्य होता है । इसी प्रकार आनन्द की अलसान में प्रियाजी कुछ कहती रही . ” हित सखी जू कहती है । इति ।


मंगल समय खिचरी जेंवत है श्रीराधावल्लभ कुंजमहल में ।
रति रसमसे गसे गुण तन मन नाहिन संभारत प्रेम गहल में ||
चुटकी देत सखी संभरावत हंसत हंसावत चहल पहल में ।
जै श्रीकुंजलाल हित यह विधि सेवत समै समै सब रहत टहल में ||22||

श्रीवृन्दावन कुंज महल में प्रिया प्रियातम खिचरी आरोग रहे हैं ।
प्रेम रस में भीजे , दोनों के तन मन परस्पर एक दूसरे से जुड़े है , प्रेम की उन्मत्तता के कारण अपने को संभाल नहीं पा रहे हैं ।

प्रेम की गहर में से यह निकलें तो सखियों के मनोरथ पूर्ण हों अत : सखी चुटकी बजाकर सावधान करती है , चहल पहल है हास परिहास कर रही है ।

श्रीकुंजलाल जी महाराज कहते है कि इसी प्रकार सखियाँ हर समय , समय के अनुसार सेवा में रहती है ।


खिचरी जेवत है पिय प्यारी ।
सीत समै रुचि जानि सुगंधन मेलि सखीनु सँवारी || पहले प्रियह जिवावह जेंवत रसिक नरेस महा री
जै श्रीकुंजलाल पिय की बातन की घातन जानन हारी ||23||

प्रिया प्रियतम खिचड़ी आरोग रहे है । शीत समय जानकर सखियों ने सुगन्धित पदार्थ डालकर खिचड़ी को संवार दिया है । रसिक नरेश पहिले प्रियाजी को जिमाते हें फिर स्वयं पाते है । श्रीकुंजलाल जी महाराज कहते हैं । कि प्रीतम बातों में जो खुशामद कर रहे हैं , इन घातों को , प्रियाजी खूब जानती है ।


खिचड़ी राधाबल्लभ जू कौ प्यारौ ।
किसमिस दाख चिरौजी पिस्ता अद्रक सौ रुचिकारी ||
दही कचरिया वर सैधाने बरा पापर बहु तरकारी ।
जायफल जावित्री मिरचा घृत सों सीच संवारी ||24||

अर्थ स्पष्ट है ।


खिचरी जेंवत जुगल किशोर ।
निसि अनुरागे दम्पति उठे उनीदे भोर |
अंग अंग की छवि अवलोकत ग्रास लेत मुख सुखहि निहोर ।
जै श्रीरूपलाल हित ललित त्रिभंगी बिबि मुखचन्द्र चकोर ।।25।।

श्री श्यामा श्याम खिचड़ी आरोग रहे है । सम्पूर्ण रात्रि विहार करने के बाद , अति अनुराग का भर लिए दोनों उनीदे उठे है ।

एक दूसरे के अंग की छवि देख – देखकर सुख का अनुभव करते , बड़े – बड़े निहोरे से खिचड़ी का ग्रास मुख में लेते उजाते हैं ।

श्रीरूपलाल जी महाराज कहते है कि प्रिया – प्रीतम एक दूसरे के मुख को चन्द्र और चकोर की भाँति निहारते रहते हैं ।


अधिक हेत सों पावें पिय प्यारी ।
थार सैंजोये धरें कर आवति , सीत समै रुचिकारकी ।।
बहुत मेवा मिलबारी अचारी , बासौधी लीये सब ठाड़ी ।
यह सेवा हित नित्त कृपा प्रिय सों राधालाल संवारी ।।26।।

प्रिया प्रीतम बड़े प्रेम से खिचरी पा रहे हैं । खिचड़ी के थार संजोकर हाथों में लिए सखियाँ लिए आ रही है , सदी में रुचिकारी है । बहुत प्रकार का मेवा , मिलबरी , अचार बासौधी ( एक प्रकार की बड़ी ) लिए सखियाँ खड़ी है । श्रीराधालाल जी ने यह सेवा श्रीप्रिया प्रीतम की कृपा से संवारी नोट – बड़ों से सुना है कि श्रीराधालाल जी महाराज बड़े अनुराग आ पाए । जब दूसरे सहयोगी बनाने बैठे तो कहते हैं मनो – मन लकड़ी फुक गई परन्तु खिचड़ी सिद्ध नहीं हुई । आखिर उन्हें जैसे तैसे बुलाया गया उन्होंने आकर खिचड़ी को संवारा तो भोग लगा ।


रूप रसासव माते दोऊ श्रीराधाबल्लभ जेंवत खिचरी ।
अरस परस मुसिकात जात बतरात बात बात बोलत बिच बिचरी ।।
खाटे सरस सँधाने नव – नव पापर कचरी लेत रुचि – रुचि री ।
नेह निहोर जिवाँवत हित सखी कोमल मधुर ग्रास घृत निचुरी ।।
फरगुल सुरंग रजाई कनक अंगीठी अगरसत सचरी ।।27।।

रूप रसासब में दोनो मत्त , प्रिया प्रीतम खिचरी पा रहे हैं ।
दानों मुस्कराते जाते है और पाते समय परस्पर बीच – बीच में बतबताते जाते हैं । कई प्रकार के खाटे और सरस आचार , पापर , कचरी बड़े प्रेम से आरोग रहे हैं ।

श्रीहित सखी जू घृत से निवुड़ि खिचरी के कोमल मधुर ग्रास बड़े नेह और निहोरा कर करके प्रियालाल को जिमा रही है ।
श्रीयुगल ने सुरंग ( लाल ) रजाई , फरगुल ओढ़ रखी है और पास में सोने की अंगीठी ‘ अगरसत ‘ डाली हुई रखी है ।
नोट : – अगर मगर एक विशेष प्रकार के वृक्षों को कहते है जिसकी छाल का इत्र भी बनता है जो बहुत कीमती होता है ।


चलौ चलौ सखी देखें दोऊ जैवै ।
भरे थार खिचरी घृत निचुरी के आगे , हँसि हँसि सुकुमार प्यारे कैसे दोऊ जैवें ।।
प्रिया के मुख पीये देत पिय के मुख प्यारी ।
बीच – बीच अधर पान प्रानन सो हेरै ||28||

अर्थ स्पष्ट है ।


प्यारे जैवत है सुकुंवार ।
सरस सुगंध उठत उछगारें भरि खिचरी के थार ।।
पापर कचरी तलप कटाक्षन भृकुटी मुरन को अचार ।
जुरे परस्पर नैन दुहुन के प्रेम रूप को अहार ।।
पहिलै प्रियहिं जिवाँवत जैवत रहत है वदन निहार ।
ऐसी विधि सों जेंवत प्यारे हित सुख की ज्यौनार ।।29।।

दोनों सुकुमार लाड़िली लाल खिचरी आरोग रहे है ।
अब आरोगने की रीति कहते हैं । सिज्जा महल में खिचरी के भरे थाल रखे है , पापर , कचरी भृकुटि मुरन कौ आचार ( सेम का आचार है ) सरस सुगन्ध की उगारें उठ रही है ।

सिज्जा पर परस्पर दोनों के मैने जुड़े है , कटाक्ष चल रहे हैं , लालजी प्रियाजी की प्रेम रूप माधुरी का आहार करते जाते है और संग – संग प्रिया जी को जिमाते हैं और स्वयं जैमते जाते हैं हैं । ऐसी विधि से यह हित रूपी सुख की ज्यौनार परस्पर हो रही है ।


भोर मिलि जैबै दोऊ बनी – बनरा खिचरी ।
झमक सेज तें उठे उनींदे ब्रजजीवन घृत सों निवुरी ।।
मंगल रूप समै मंगल में रूचि सौ खिचरी पावै ।
ओढ़े फरगुल रंग सहानी छवि जीव जिबावै ।
झुकि – झुकि परत नैन अलसोहें हित सजनी फैनी अरु बासौदी ब्रजजीवन मन भावै ।
अदरक कूचा बन्यौ चटपटौ कर पल्लव दोऊ चाटें ।
वे उनके वे उनके मुख सों हँसि – हँसि सों लावै ।।
नथ उठाय बेला पय पीवैं कौतुक रंग मचावै ।
ब्रजजीवन हित कहाँ लगि बरनौ कुंज महल के ठाठै ||30||

प्रिया प्रीतम प्रातः दोनों मिलकर घृत से निचुरी खिचरी आरोग रहे हैं ; बनी बनरा- कहा , सो श्रृंगार सहित विराजे है- ऐसे जानिए । बड़ी छवि सों सिज्जा पर से उनीदें उठे हैं । बड़ी रूचि सों , ये दोनों मंगल रूप , सबेरे के मंगलमय समय में , खिचड़ी आरोग रहे है । सहानी रंग की फर्मुल ओढ़ रखी है , सुन्दर छवि को देखकर सखियां बलिहार है । युगल एक झुकने लगते है तब हित सजनी सम्हार करती है । माखन , मिश्री मगढ़ के लड्डू , पाक , मुरब्बा पाते है ।

अदरक कूचा चटपटा बना है जिसे पल्लू की ओट में दोनों चाट रहे हैं । दोनों हँसते जाते है और एक दूसरे को पवाते जाते है । प्रियाजी नथ उठाकर बेला में से दूध पी रही है । ( बेला एक विशेष प्रकार का चपटा गोल पात्र होता है जिसके किनारे थोड़े ऊपर की ओर उठे हुए होते हैं । और ऊपर से किनारे भीतर की ओर मुड़े रहते हैं । यह ब्रज का बहुत मांगलिक पात्र माना जाता है । घर में पुत्र जन्म होने पर बेला बजाते हैं , शादी व्याह में इसका प्रयोग तरह – तरह के मांगलिक कार्यों में होता है ।

ब्रजजीवन जी महाराज कहते हैं कुंज महल के इस ठाठ का कहाँ तक वर्णन करूँ ।

खिचरी युगल रुचि सों खात ।
पौष शुक्ला दोज तें लै मास एक प्रभात ||
दही कचरी वर संधाने बरा पापर घीय ।
ढिग अंगीठी धरी मीठी लगत प्यारी पीय जल पिवाय धुवाह हाथ अगौछ बीरी देत ||
सखीजन बाँटति तहाँ हित ब्रजलाल जूठन लेत ||31||

अर्थ स्पष्ट है ।


अचवन बीरी दै मंगल आरती सजि बाढ़यौ सखिन मन मोद ।
जै श्रीकुंजलाल हित असीसत एसै ही करौ विनोद ।।
जै श्रीकिशोरलाल हित रूप अलि बाँटत देति लेति सब सखी सहचरि कृष्णदास आसपास निरखत हित को विलास , दौरि – दौरि आवें सखी जूठन कौ लेवै । चलौ चलौ सखी देखै दौऊ जै चुके , जै चुके , जै चुके ||32||

अर्थ स्पष्ट है । 


निरखि आरती मंगल भोर |
मंगल स्यामा स्यामा किशोर ।।
मंगल श्रीवृन्दावन धाम ।
मंगल कुंज महल अभिराम ।।
मंगल घंटा नाद मु होत ।
मंगल थार मणिनु की जोति ।।
मंगल दुंदुभी धुनि छबि छाई ।
मंगल सहचरी दरसन आई ।
मंगल वीणा मृदंग बजावै ।
मंगल ताल झाँझ झरलावै ।।
मंगल सखी यूथ कर जोरै ।
मंगल चंवर लिये चहुँ ओरै ।।
मंगल पुष्पावलि बरसाई ।
मंगल जोति सकल बन छाई ।।
जै श्रीरूपलाल हित हृदय प्रकाश ।
मंगल अद्भुत युगल विलास ||33 ||


यहि विधि मंगल आरती करी ।
निज मंदिर आगै चिक परी ।।
ललितादिक भीतर अनुसरी ।
जै श्रीकमलनेंन हित सेवा भई ।
श्रीराधे , किशोरी राधे , लड़ैती राधे ।
श्यामा प्यारी जय राधे || 34 ||

अर्थ स्पष्ट है ।


इति खिचरी उत्सव श्रृंखला की जै जै श्रीहरिवंश

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श्रीराधाकवचम्

श्री राधिकायै नम:

।।अथ श्रीराधाकवचम्।।

महेश्वर उवाच:-

श्रीजगन्मङ्गलस्यास्य कवचस्य प्रजापति:।।1।।

ऋषिश्चन्दोऽस्य गायत्री देवी रासेश्वरी स्वयम्।
श्रीकृष्णभक्‍तिसम्प्राप्तौ विनियोग: प्रकीर्तित:।।2।।

शिष्याय कृष्णभक्‍ताय ब्रह्मणाय प्रकाश्येत्।
शठाय परशिष्याय दत्त्वा मृत्युमवाप्नुयात्।।3।।

राज्यं देयं शिरो देयं न देयं कवचं प्रिये।
कण्ठे धृतमिदं भक्त्या कृष्णेन परमात्मना।।4।।

मया दृष्टं च गोलोके ब्रह्मणा विष्णुना पुरा।
ॐ राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च।।5।।

कृष्णेनोपासितो मन्त्र: कल्पवृक्ष: शिरोऽवतु।
ॐ ह्रीं श्रीं राधिकाङेन्तं वह्निजायान्तमेव च।।6।।

कपालं नेत्रयुग्मं च श्रोत्रयुग्मं सदावतु।
ॐ रां ह्रीं श्रीं राधिकेति ङेन्तं वह्नि जायान्तमेव च।।7।।

मस्तकं केशसङ्घांश्च मन्त्रराज: सदावतु।
ॐ रां राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च।।8।।

सर्वसिद्धिप्रद: पातु कपोलं नासिकां मुखम्।
क्लीं श्रीं कृष्णप्रियाङेन्तं कण्ठं पातु नमोऽन्तकम्।।9।।

ॐ रां रासेश्वरीङेन्तं स्कन्धं पातु नमोऽन्तकम्।
ॐ रां रासविलासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु।।10।।

वृन्दावनविलासिन्यै स्वाहा वक्ष: सदावतु।
तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा पातु नितम्बकम्।।11।।

कृष्णप्राणाधिकाङेन्तं स्वाहान्तं प्रणवादिकम्।
पादयुग्मं च सर्वाङ्गं सन्ततं पातु सर्वत:।।12।।

राधा रक्षतु प्राच्यां च वह्नौ कृष्णप्रियावतु।
तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा पातु नितम्बकम्।।13।।

पश्चिमे निर्गुणा पातु वायव्ये कृष्णपूजिता।
उत्तरे सन्ततं पातु मूलप्रकृतिरीश्वरी।।14।।

सर्वेश्वरी सदैशान्यां पातु मां सर्वपूजिता।
जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे तथा।।15।।

महाविष्णोश्च जननी सर्वत: पातु सन्ततं।
कवचं कथितं दुर्गे श्रीजगन्मङ्गलं परम्।।16।।

यस्मै कस्मै न दातव्य गुढाद् गुढतरं परम्।
तव स्नेहान्मयाख्यातं प्रवक्‍तं न कस्यचित्।।17।।

गुरुमभ्यर्च्य विधिवद् वस्त्रालङ्कारचन्दनै:।
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ धृत्वा विष्णोसमो भवेत्।।18।।

शतलक्षजपेनैव सिद्धं च कवचं भवेत्।
यदि स्यात् सिद्धकवचो न दग्धो वह्निना भवेत्।।19।।

एतस्मात् कवचाद् दुर्गे राजा दुर्योधन: पुरा।
विशारदो जलस्तम्भे वह्निस्तम्भे च निश्चितम्।।20।।

मया सनत्कुमाराय पुरा दत्तं च पुष्करे।
सूर्यपर्वणि मेरौ च स सान्दीपनये ददौ।।21।।

बलाय तेन दत्तं च ददौ दुर्योधनाय स:।
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्‍तो भवेन्नर:।।22।।

नित्यं पठति भक्त्येदं तन्मन्त्रोपासकश्च य:।
विष्णुतुल्यो भवेन्नित्यं राजसूयफलं लभेत्।।23।।

स्नानेन सर्वतीर्थानां सर्वदानेन यत्फलम्।
सर्वव्रतोपवासे च पृथिव्याश्च प्रदक्षिणे।।24।।

सर्वयज्ञेषु दीक्षायां नित्यं च सत्यरक्षणे।
नित्यं श्रीकृष्णसेवायां कृष्णनैवेद्यभक्षणे।।25।।

पाठे चतुर्णां वेदानां यत्फलं च लभेन्नर:।
यत्फलं लभते नूनं पठनात् कवचस्य च।।26।।

राजद्वारे श्मशाने च सिंहव्याघ्रान्विते वने।
दावाग्नौ सङ्कटे चैव दस्युचौरान्विते भये।।27।।

कारागारे विपद्ग्रस्ते घोरे च दृढबन्धने।
व्याधियुक्‍तो भवेन्मुक्‍तो धारणात् कवचस्य च।।28।।

इत्येतत्कथितं दुर्गे तवैवेदं महेश्वरि।
त्वमेव सर्वरूपा मां माया पृच्छसि मायया।।29।।

श्रीनारायण उवाच।

इत्युक्त्वा राधिकाख्यानं स्मारं च माधवम्।
पुलकाङ्कितसर्वाङ्ग: साश्रुनेत्रो बभुव स:।।30।।

न कृष्णसदृशो देवो न गङ्गासदृशी सरित्।
न पुष्करसमं तीर्थं नाश्रामो ब्राह्मणात् पर।।31।।

परमाणुपरं सूक्ष्मं महाविष्णो: परो महान्।
नभ परं च विस्तीर्णं यथा नास्त्येव नारद।।32।।

तथा न वैष्णवाद् ज्ञानी यिगीन्द्र: शङ्करात् पर:।
कामक्रोधलोभमोहा जितास्तेनैव नारद।।33।।

स्वप्ने जागरणे शश्वत् कृष्णध्यानरत: शिव:।
यथा कृष्णस्तथा शम्भुर्न भेदो माधवेशयो:।।34।।

यथा शम्भुर्वैष्णवेषु यथा देवेषु माधव:।
तथेदं कवचं वत्स कवचेषु प्रशस्तकम्।।35।।

।।इति श्रीब्रह्मवैवर्ते श्रीराधिकाकवचं सम्पूर्णम्।।

जय जय श्री राधे

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श्री राधा चालीसा

॥ श्री राधा चालीसा ॥

वैसे तो परम करुणामयी श्री राधारानी का श्री नाम ही इस संसार के भाव से न केवल पार लगाने वाला है बल्कि परम आनंद प्रदान कर नित्य लीला मे प्रवेश भी देने वाला है। किंतु किशोरी जी के भक्तो का तो जीवन आधार ही उनका नाम, रूप, लीला और धाम का स्मरण करना स्तुति करना।



पहले भी हमने श्री राधा कृपा कटाक्ष और श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष जैसे स्तुतियों को पोस्ट किया है अतः इसी श्रृंखला मे श्री किशोरी जी की कृपा से “श्री राधा चालीसा“ का पाठ करेंगे।

सुर-मुनि-देवता भी जिस ब्रज धाम के रज रूप मे निवास करने को भी लालायित रहते है, वहाँ मानव तन लेकर वास तो केवल श्री किशोरी जी के श्री चरणो की कृपा से ही मिल सकती है। श्री राधा चालीसा का पाठ करने से श्री प्रिय-प्रियतम के निज धाम वृंदावन मे वास करने का फल प्राप्त होता है और उनके चरणो के छावँ मे प्राणी मात्र स्वयं को इस भयावह संसार से दूर रख सकता है


।।दोहा।।

श्री राधे वुषभानुजा , भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी , प्रानावौ बारम्बार ।।
जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिय सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये सुन्दर सुखद ललाम ।।

SHRIRADHE VRISHABHANUJA, BHAKTANI PRANAADHAR |
VRINDAVIPIN VIHARINNI, PRANNAVOM BARAMBAR ||
JAISO TAISO RAVAROU, KRISHNA-PRIYA SUKHADHAM |
CHARAN SHARAN NIJ DIJIYE, SUNDAR SUKHAD LALAM ||


।।चौपाई।।

जय वृषभानु कुँवरी श्री श्यामा,
कीरति नंदिनी शोभा धामा ।।
नित्य बिहारिनी श्याम आधारा,
अमित मोद मंगल दातारा ।।1।।

JAI VRISHABHAN KUNVARI SHRI SHYAMA ,
KIRATI NANDINI SHOBHA DHAMA ||
NITYA VIHARINI SHYAM ADHARA ,
AMIT BODH MANGAL DATARA ||1||


।।चौपाई।।

रास विलासिनी रस विस्तारिणी,
सहचरी सुभग यूथ मन भावनी ।।
नित्य किशोरी राधा गोरी ,
श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ।।
करुणा सागर हिय उमंगिनी,
ललितादिक सखियन की संगिनी ।।2।।

RAAS VILASINI RAS VISTARINI ,
SAHACHARI SUBHAG YUTH MAN BHAVNI ||
NITYA KISHORI RADHA GORI |
SHYAM PRANNADHAN ATI JIYA BHORI ||
KARUNA SAGARI HIYA UMANGINI ,
LALITADIK SAKHIYAN KI SANGANI ||2||


।।चौपाई।।

दिनकर कन्या कुल विहारिनी,
कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनी ।।
नित्य श्याम तुमररौ गुण गावै,
राधा राधा कही हरशावै ।।3।।

DINKAR KANYA KUUL VIHARINI ,
KRISHNA PRANA PRIY HIY HULSAVANI ||
NITYA SHYAM TUMHARO GUN GAVEN ,
SHRI RADHA RADHA KAHI HARSHAVAHIN ||3||


।।चौपाई।।

मुरली में नित नाम उचारें,
तुम कारण लीला वपु धारें ।।
प्रेम स्वरूपिणी अति सुकुमारी,
श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ।।4।।

MURALI MEIN NIT NAAM UCHAREIN ,
TUM KARANN LILA VAPU DHAREIN ||
PREMA SVAROOPINI ATI SUKUMARI ,
SHYAM PRIYA VRASHABHANU DULARI ||4||


।।चौपाई।।

नवल किशोरी अति छवि धामा,
द्दुति लधु लगै कोटि रति कामा ।।
गोरांगी शशि निंदक वंदना,
सुभग चपल अनियारे नयना ।।5।।

NAVALA KISHORI ATI CHABI DHAMA ,
DHYUTI LAGHU LAAG KOTI RATI KAAMA ||
GOURANGI SHASHI NINDAK VADANA ,
SUBHAG CHAPAL ANIYARE NAINA ||5||


।।चौपाई।।

जावक युत पद पंकज चरना,
नुपुर ध्वनि प्रीतम मन हरना ।।
संतत सहचरी सेवा करहिं,
महा मोद मंगल मन भरहीं ।।6।।

JAVAK YUTH PAD PANKAJ CHARANA ,
NOOPUR DHVANI PRITAM MAN HARNA ||
SANTATA SAHACHARI SEVA KARHIN ,
MAHA MOD MANGAL MAN BHARAHIN ||6||


।।चौपाई।।

रसिकन जीवन प्राण अधारा,
राधा नाम सकल सुख सारा ।।
अगम अगोचर नित्य स्वरूपा,
ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ।।7।।

RASIKAN JEEVAN PRANA ADHARA ,
RADHA NAAM SAKAL SUKH SAARA ||
AGAM AGOCHAR NITYA SVAROOPA ,
DHYAN DHARAT NISHIDIN BRAJABHOOPA ||7||


।।चौपाई।।

उपजेउ जासु अंश गुण खानी,
कोटिन उमा राम ब्रह्मिनी ।।
नित्य धाम गोलोक विहारिन ,
जन रक्षक दुःख दोष नसावनि ।।8।।

UPJEOO JASU ANSH GUN KHANI ,
KOTIN UMA RAMA BRAHMANI ||
NITYA DHAM GOLOK BIHARINI ,
JAN RAKSHAK DUKH DOSH NASAVANI ||8||


।।चौपाई।।

शिव अज मुनि सनकादिक नारद,
पार न पाँई शेष अरू शारद ।।
राधा शुभ गुण रूप उजारी,
निरखि प्रसन होत बनवारी ।।9।।

SHIV AJ MUNI SANAKADIK NAARAD ,
PAAR NA PAAYN SESH ARU SHARAD ||
RADHA SHUBH GUN ROOPA UJARI ,
NIRAKHI PRASANNA HOT BANVARI ||9||


।।चौपाई।।

ब्रज जीवन धन राधा रानी,
महिमा अमित न जाय बखानी ।।
प्रीतम संग दे ई गलबाँही ,
बिहरत नित वृन्दावन माँहि ।।10।।

BRAJ JEEVAN DHAN RADHA RANI ,
MAHIMA AMIT NA JAY BAKHANI ||
PREETAM SANG DIYE GAL BAAHIN,
BIHARATA NIT VRINDAVAN MAAHIN ||10||


।।चौपाई।।

राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा,
एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ।।
श्री राधा मोहन मन हरनी,
जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ।।11।।

RADHA KRISHNA KRISHNA HAI RADHA ,
EK ROOP DOUU-PREETI AGAADHA ||
SHRI RADHA MOHAN MAN HARNI ,
JAN SUKH PRADA PRAFULLIT BADANI ||11||


।।चौपाई।।

कोटिक रूप धरे नंद नंदा,
दर्श करन हित गोकुल चंदा ।।
रास केलि करी तुहे रिझावें,
मान करो जब अति दुःख पावें ।।12।।

KOTIK ROOP DHARE NAND NANDA ,
DARASH KARAN HITH GOKUL CHANDA ||
RAAS KELI KAR TUMHEN RIJHAVEN ,
MAAN KARO JAB ATI DUKH PAAVEN ||12||


।।चौपाई।।

प्रफुलित होत दर्श जब पावें,
विविध भांति नित विनय सुनावे ।।
वृन्दारण्य विहारिनी श्यामा,
नाम लेत पूरण सब कामा ।।13।।

PRAFFULLIT HOTH DARASH JAB PAAVEN ,
VIVIDH BHANTI NIT VINAY SUNAVEN||
VRINDARANNYA VIHARINNI SHYAM ,
NAAM LETH PURAN SAB KAMA ||13||


।।चौपाई।।

कोटिन यज्ञ तपस्या करहु,
विविध नेम व्रतहिय में धरहु ।।
तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें,
जब लगी राधा नाम न गावें ।।14।।

KOTIN YAGYA TAPASYA KARUHU ,
VIVIDH NEM VRAT HIY MEN DHARHU||
TAUU NA SHYAM BHAKTAHI APNAVEN ,
JAB LAGI NAAM RADHA NA GAAVEN ||14||


।।चौपाई।।

व्रिन्दाविपिन स्वामिनी राधा,
लीला वपु तब अमित अगाधा ।।
स्वयं कृष्ण पावै नहीं पारा,
और तुम्हैं को जानन हारा ।।15।।

VRINDA VIPIN SVAMINI RADHA ,
LEELA VAPU TUVA AMIT AGADHA ||
SVAYAM KRISHNA PAVAHIN NAHIN PAARA ,
AUR TUMHEN KO JANANI HAARA ||15||


।।चौपाई।।

श्री राधा रस प्रीति अभेदा,
सादर गान करत नित वेदा ।।
राधा त्यागी कृष्ण को भाजिहैं,
ते सपनेहूं जग जलधि न तरिहैं ।।16।।

SHRIRADHA RAS PREETI ABHEDA ,
SAADAR GAAN KARAT NIT VEDA||
RADHA TYAGI KRISHNA JO BHAJIHAI ,
TE SAPNEHUN JAG JALADHI NA TARIHAI||16||


।।चौपाई।।

कीरति कुँवारी लाडली राधा,
सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ।।
नाम अमंगल मूल नसावन,
त्रिविध ताप हर हरी मनभावना ।।17।।

KIRATI KUMARI LAADALI RADHA ,
SUMIRAT SAKAL MITAHIN BHAV BADA ||
NAAM AMANGAL MOOL NASAVAN ,
VIVIDH TAAP HAR HARI MAN BHAVAN ||17||


।।चौपाई।।

राधा नाम लेइ जो कोई ,
सहजहि दामोदर बस होई ।।
राधा नाम परम सुखदाई,
भजतहीं कृपा करहिं यदुराई ।।
यशुमति नंदन पीछे फिरेहै,
जी कोऊ राधा नाम सुमिरिहै ।।18।।

RADHA NAAM LEI JO KOI,
SAHAJ HI DAMODAR BAS HOI ।।
RADHA NAAM PARAM SUKHDAYI ,
BHAJATAHIN KRIPA KAREN YADURAI ||
YADUPATI NANDAN PEECHE PHIRIHAIN ,
JO KOUU RADHA NAAM SUMIRIHAIN||18||


।।चौपाई।।

रास विहारिनी श्यामा प्यारी,
करहु कृपा बरसाने वारी ।।
वृन्दावन है शरण तिहारी,
जय जय जय वृषभानु दुलारी ।।19।।

RAAS VIHARINI SHYAMA PYARI ,
KARUHU KRIPA BARSANE VAARI ||
VRINDAVAN HAI SHARAN TUMHARI ,
JAI JAI JAI VRSHABHANU DULARI ||19||


।।दोहा।।

श्री राधा सर्वेश्वरी ,
रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहूँ निरंतर बास मै,
श्री वृन्दावन धाम ।।

SHRI RADHA SARVESHWARI ,
RASIKESHVAR GHANSHYAM|
KARUHUN NIRANTAR VAAS MAI ,
SRI VRINDAVAN DHAM ||


इस पाठ को नित्य समय निकाल कर जरुर रोज पढ़ा करे 

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श्री राधा कृपा कटाक्ष

॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥

श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र का गायन वृन्दावन के विभिन्न मन्दिरों में नित्य किया जाता है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक नित्यनिकुंजेश्वरि श्रीराधा और उनके प्राणवल्लभ नित्यनिकुंजेश्वर ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की सुर-मुनि दुर्लभ कृपाप्रसाद अनायास ही प्राप्त कर लेता है।
श्री राधा कृपा कटाक्ष को नित्य पढ़ने और सुनने से श्री राधे के चरणों मे शरण मिलती है और उनके चरणो मे मन लगता है।

“राधा साध्यम साधनं यस्य राधा, मंत्रो राधा मन्त्र दात्री च राधाl
सर्वं राधा जीवनम् यस्य राधा, राधा राधा वाचि किम तस्य शेषम ll”


“भावार्थ”: “राधा” साध्य है उनको पाने का साधन भी राधा नाम ही है। मन्त्र भी राधा है और मन्त्र देने वाली गुरु भी स्वयं राधा जी ही है सब कुछ राधा नाम में ही समाया हुआ है और सबका जीवन प्राण भी राधा ही है राधा नाम के अतिरिक्त ब्रम्हांड में शेष बचता क्या है?

तो आइये श्री राधा नाम की महिमा की धारा जिसे स्वयं महादेव ने बहाया हो और जो सदा समाधि के दौरान राधा नाम को रटते रहते रहते है उनके कृपा से इस नाम की धारा मे हम भी बहते रहे….


(श्लोक – 1)
मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।
व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१)

munīndra-vṛnda-vandite triloka-śoka-hāriṇi
prasanna-vaktra-paṇkaje nikuñja-bhū-vilāsini
vrajendra-bhānu-nandini vrajendra-sūnu-saṅgate
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||1||

भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१)

O goddess worshiped by the kings of sages, O goddess who remove the sufferings of the three worlds, O goddess whose face is a blossoming lotus, O goddess who enjoy pastimes in the forest, O daughter of Vrishhabhanu, O companion of Vraja’s prince, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 2)
अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते, प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (२)

aśoka-vṛkṣa-vallarī-vitāna-maṇḍapa-sthite
pravāla-vāla-pallava prabhā ’ruṇāṅghri-komale
varābhaya-sphurat-kare prabhūta-sampadālaye
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||2||

भावार्थ : आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (२)

O goddess staying in a vine-cottage by an ashoka tree, O goddess whose delicate feet are as splendid as red blossoms, O goddess whose hand grants fearlessness, O abode of transcendental opulence’s, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 3)
अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां, सुविभ्रम ससम्भ्रम दृगन्तबाणपातनैः।
निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (३)

anaṅga-raṅga-maṅgala-prasaṅga-bhaṅgura-bhruvāṁ
sa-vibhramaṁ sa-sambhramaṁ dṛganta-bāṇa-pātanaiḥ
nirantaraṁ vaśī-kṛta-pratīti-nanda-nandane
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||3||

भावार्थ : रास क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में आप अपनी बाँकी भृकुटी से आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहज कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा करती रहती हैं। आप श्री नन्दकिशोर को निरंतर अपने बस में किये रहती हैं, हे जगज्जननी वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (३)

O goddess who, playfully shooting the arrows of Your glances from the curved bows of Your auspicious, amorous eyebrows, have completely subdued Nanda’s son [Krishna], when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 4)
तड़ित्सुवणचम्पक प्रदीप्तगौरविगहे, मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्ङले।
विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशावलोचने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (४)

taḍit-suvarṇa-campaka-pradīpta-gaura-vigrahe
mukha-prabhā-parāsta-koṭi-śāradendu-maṇḍale
vicitra-citra-sañcarac-cakora-śāva-locane
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||4||

भावार्थ : आप बिजली के सदृश, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी आभा वाली हैं, आप दीपक के समान गोरे अंगों वाली हैं, आप अपने मुखारविंद की चाँदनी से शरद पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा को लजाने वाली हैं। आपके नेत्र पल-पल में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर शिशु के समान हैं, हे वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (४)

O goddess whose form is as splendid as champaka flowers, gold, and lightning, O goddess whose face eclipses millions of autumn moons, O goddess whose eyes are wonderful, restless young chakora birds, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 5)
मदोन्मदातियौवने प्रमोद मानमणि्ते, प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपणि्डते।
अनन्यधन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (५)

madonmadāti-yauvane pramoda-māna-maṇḍite
priyānurāga-rañjite kalā-vilāsa-paṇḍite
ananya-dhanya-kuñja-rājya-kāma keli-kovide
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||5||

भावार्थ : आप अपने चिर-यौवन के आनन्द के मग्न रहने वाली है, आनंद से पूरित मन ही आपका सर्वोत्तम आभूषण है, आप अपने प्रियतम के अनुराग में रंगी हुई विलासपूर्ण कला पारंगत हैं। आप अपने अनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंज-राज के प्रेम क्रीड़ा की विधा में भी प्रवीण हैं, हे निकुँजेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (५)

O young girl intoxicated with passion, O goddess decorated with cheerful jealous anger, O goddess who passionately love Your beloved Krishna, O goddess learned in playful arts, O goddess expert at enjoying amorous pastimes in the kingdom of the peerlessly opulent forest groves of Vrindavana, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 6)
अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते, प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुमि्भकुम्भसुस्तनी।
प्रशस्तमंदहास्यचूणपूणसौख्यसागरे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (६)

aśeṣa-hāva-bhāva-dhīra-hīra-hāra-bhūṣite
prabhūta-śāta-kumbha-kumbha-kumbhi kumbha-sustani
praśasta-manda-hāsya-cūrṇa-pūrṇa-saukhya-sāgare
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||6|

भावार्थ : आप संपूर्ण हाव-भाव रूपी श्रृंगारों से परिपूर्ण हैं, आप धीरज रूपी हीरों के हारों से विभूषित हैं, आप शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान अंगो वाली है, आपके पयोंधर स्वर्ण कलशों के समान मनोहर हैं। आपकी मंद-मंद मधुर मुस्कान सागर के समान आनन्द प्रदान करने वाली है, हे कृष्णप्रिया माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (६)

O goddess decorated with a pearl necklace of bold amorous hints, O goddess as fair as gold, O goddess whose breasts are great golden waterpots, O ocean of happiness filled with the scented powders of gentle smiles, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 7)
मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोलते, लतागलास्यलोलनील लोचनावलोकने।
ललल्लुलमि्लन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (७)

mṛṇāla-vāla-vallarī taraṅga-raṅga-dor-late
latāgra-lāsya-lola-nīla-locanāvalokane
lalal-lulan-milan-manojña mugdha-mohanāśrite
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||7||

भावार्थ : जल की लहरों से कम्पित हुए नूतन कमल-नाल के समान आपकी सुकोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन के झोंकों से नाचते हुए लता के अग्र-भाग के समान अवलोकन करने वाले हैं। सभी के मन को ललचाने वाले, लुभाने वाले मोहन भी आप पर मुग्ध होकर आपके मिलन के लिये आतुर रहते हैं ऎसे मनमोहन को आप आश्रय देने वाली हैं, हे वृषभानुनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (७)

O goddess whose arms are lotus stalks dancing on the waves, O goddess whose dark eyes are dancing vines, O playful, beautiful, charming goddess, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 8)
सुवर्ण्मालिकांचिते त्रिरेखकम्बुकण्ठगे, त्रिसुत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिअति।
सलोलनीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (८)

suvarṇa-mālikāñcita-trirekha-kambu-kaṇṭhage
tri-sūtra-maṅgalī-guṇa-tri-ratna-dīpti-dīdhiti
salola-nīla-kuntala prasūna-guccha-gumphite
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||8||

भावार्थ : आप स्वर्ण की मालाओं से विभूषित है, आप तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुन्दर कण्ठ वाली हैं, आपने अपने कण्ठ में प्रकृति के तीनों गुणों का मंगलसूत्र धारण किया हुआ है, इन तीनों रत्नों से युक्त मंगलसूत्र समस्त संसार को प्रकाशमान कर रहा है। आपके काले घुंघराले केश दिव्य पुष्पों के गुच्छों से अलंकृत हैं, हे कीरतिनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (८)

O goddess who wear a golden necklace on the three-lined conchshell of Your neck, O goddess splendid with three jasmine garlands and three jewelled necklaces, O goddess whose moving locks of dark hair are decorated with bunches of flowers, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 9)
नितम्बबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण, प्रशस्तरत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले।
करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (९)

nitamba-bimba-lambamāna-puṣpa-mekhalā-guṇe
praśasta-ratna-kiṅkiṇī-kalāpa-madhya mañjule
karīndra-śuṇḍa-daṇḍikā-varoha-saubhagoruke
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||9||

भावार्थ : आपका उर भाग में फूलों की मालाओं से शोभायमान हैं, आपका मध्य भाग रत्नों से जड़ित स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित है। आपकी जंघायें हाथी की सूंड़ के समान अत्यन्त सुन्दर हैं, हे ब्रजनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (९)

O goddess who wear a sash of flowers on Your curved hips, O goddess charming with a sash of tinkling jewelled bells, O goddess whose beautiful thighs punish the regal elephant’s trunk, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 10)
अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत्, समाजराजहंसवंश निक्वणातिग।
विलोलहेमवल्लरी विडमि्बचारूचं कमे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१०)

aneka-mantra-nāda-mañju-nūpurā-rava-skhalat
samāja-rāja-haṁsa-vaṁśa-nikvaṇāti-gaurave
vilola-hema-vallarī-viḍambi-cāru-caṅkrame
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||10||

भावार्थ : आपके चरणों में स्वर्ण मण्डित नूपुर की सुमधुर ध्वनि अनेकों वेद मंत्रो के समान गुंजायमान करने वाले हैं, जैसे मनोहर राजहसों की ध्वनि गूँजायमान हो रही है। आपके अंगों की छवि चलते हुए ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे स्वर्णलता लहरा रही है, हे जगदीश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१०)

O goddess whose anklets’ tinkling is more beautiful than the sounds of many mantras and the cooing of many regal swans, O goddess whose graceful motions mock the moving golden vines, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 11)
अनन्तकोटिविष्णुलोक नमपदमजाचिते, हिमादिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे।
अपारसिदिवृदिदिग्ध -सत्पदांगुलीनखे, कदा करिष्यसीह मां कृपा -कटाक्ष भाजनम्॥ (११)

ananta-koṭi-viṣṇu-loka-namra-padmajārcite
himādrijā-pulomajā-viriñcajā-vara-prade
apāra-siddhi-ṛddhi-digdha-sat-padāṅgulī-nakhe
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||11||

भावार्थ : अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं, श्रीपार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी चरण वन्दना कर वरदान पाया है। आपके चरण-कमलों की एक उंगली के नख का ध्यान करने मात्र से अपार सिद्धि की प्राप्ति होती है, हे करूणामयी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (११)

O goddess worshiped by Brahma, O goddess to whom countless millions of Vaishnavas bow down, O goddess who give blessings to Parvati, shaci, and Sarasvati, O goddess whose toenails are anointed with limitless opulence’s and mystic perfections, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 12)
मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी, त्रिवेदभारतीयश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी, ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते॥ (१२)

makheśvari kriyeśvari svadheśvari sureśvari
triveda-bhāratīśvari pramāṇa-śāsaneśvari
rameśvari kṣameśvari pramoda kānaneśvari
vrajeśvari vrajādhipe śrī rādhike namo ’stu te ||12||

भावार्थ : आप सभी प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप सब देवताओं की स्वामिनी हैं, आप तीनों वेदों की स्वामिनी है, आप संपूर्ण जगत पर शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं, आप क्षमा देवी की स्वामिनी हैं, आप आमोद-प्रमोद की स्वामिनी हैं, हे ब्रजेश्वरी! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमन है। (१२)

O queen of Vedic sacrifices, O queen of pious activities, O queen of the material world, O queen of the demigods, O queen of Vedic scholarship, O queen of knowledge, O queen of the goddesses of fortune, O queen of patience, O queen of Vrindavana, the forest of happiness, O queen of Vraja, O empress of Vraja, O Sri Radhika, obeisance’s to You!


(श्लोक – 13)
इतीदमतभुतस्तवं निशम्य भानुननि्दनी, करोतु संततं जनं कृपाकटाक्ष भाजनम्।
भवेत्तादैव संचित-त्रिरूपकमनाशनं, लभेत्तादब्रजेन्द्रसूनु मण्डलप्रवेशनम्॥ (१३)

itī mam adbhutaṁ-stavaṁ niśamya bhānu-nandinī
karotu santataṁ janaṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam
bhavet tadaiva-sañcita-tri-rūpa-karma-nāśanaṁ
bhavet tadā-vrajendra-sūnu-maṇḍala-praveśanam ||13||

भावार्थ : हे वृषभानु नंदिनी! मेरी इस निर्मल स्तुति को सुनकर सदैव के लिए मुझ दास को अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करने की कृपा करो। केवल आपकी दया से ही मेरे प्रारब्ध कर्मों, संचित कर्मों और क्रियामाण कर्मों का नाश हो सकेगा, आपकी कृपा से ही भगवान श्रीकृष्ण के नित्य दिव्यधाम की लीलाओं में सदा के लिए प्रवेश हो जाएगा। (१३)

Upon hearing this most astonishing prayer of mine being recited by a devotee, may Sri Vrishhabhanu-nandini constantly make him the object of Her most merciful sidelong glance. At that time all his karmic reactions – whether mature, fructifying, or lying in seed – will be completely destroyed, and then he will gain entrance into the assembly of Nandanandana’s eternal loving associates.

॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥


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श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष

श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्तोत्र स्वयं भगवान शंकराचार्य द्वारा रचित है इसमे कुल 9 श्लोक है। ये श्लोक संस्कृत मे लिखे गए एवम् इनका गायन अति मधुर और मन को शांति देने वाला है।

वैसे तो श्री कृष्ण योगेश्वर है परंतु इनका माधुर्य रूप किसी भी जप, तप, यज्ञ या पूजा पद्धति के वश मे नही अतः ये सर्व स्वतंत्र है। केवल निश्वर्थ प्रेम भावना से ही इनके चरणों की प्रीति प्राप्त की जा सकती है।

ऐसे मे भगवान शंकराचार्य ने इस स्त्रोत की रचना कर जन साधारण के लिए श्री कृष्ण के भक्ति मार्ग सुगम और सरल बना दिया। यदि कोई भक्त किसी पूजा पद्धति से ना भी जुड़े केवल इस स्त्रोत का नित्य पढ़ करे तो जल्दी ही श्री कृष्ण उसे अपनी प्रेम-भक्ति दान देते है और उस भवसागर से पार लगाते है।

एक बार यदि इस स्त्रोत के शब्द हमारे कंठ को अपना घर बना लिए तो उस भक्त को श्री कृष्ण की कृपा सहज ही प्राप्त होती है तो आइये रोज इस स्त्रोत पाठ आज से ही शुरू करे

सर्वप्रथम भगवान शंकराचार्य ने श्री कृष्ण की स्तुति इन श्लोको से की है –

मूकं करोति वाचालं पंगु लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्।।

अर्थात्-जिनकी कृपा से गूंगे बहुत बोलने लगते हैं; पंगु पहाड़ को लांघ जाते हैं, उन परमानंद स्वरूप माधव की में वन्दना करता हूँ।

भगवान स्वयं नारदजी से कहत –

नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।

अर्थात्-भगवान तो केवल वहीं विराजते हैं, जहां उनके भक्त उनका गुणगान करते हैं। ‘कलौ केशव कीर्तनात्’-कलिकाल मे भगवान केशव का कीर्तन ही भवसागर से पर होने का एकमात्र साधन है।


॥ श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥

(श्लोक – 1)
व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं, स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्।
सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं, अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्॥१॥

Bhaje vrajaika mandanam, samastha papa khandanam,
Swabhaktha chitha ranjanam, sadaiva nanda nandanam,
Supincha gucha masthakam, sunada venu hasthakam,
Ananga raga sagaram, Namami Krishna sagaram., 1

भावार्थ–व्रजभूमि के एकमात्र आभूषण, समस्त पापों को नष्ट करने वाले तथा अपने भक्तों के चित्त को आनन्द देने वाले नन्दनन्दन को सदैव भजता हूँ, जिनके मस्तक पर मोरमुकुट है, हाथों में सुरीली बांसुरी है तथा जो प्रेम-तरंगों के सागर हैं, उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।

I pray Him, who is the ornament to the land of Vraja, Who cuts off entire sins, Who pleases the mind of his devotees, And who is the godly son of Nanda Gopa. Salutations to the sea like Lord Krishna, Who decorates his head with peacock feathers,Who has the sweet sounding flute in his hand, And who is the music of the ocean of love.


(श्लोक – 2)
मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं, विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्।
करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं, महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्ण वारणम्॥२॥

Manoja garva mochanam vishala lola lochanam,
Vidhootha gopa sochanam namami padma lochanam,
Kararavindha bhoodaram smithavaloka sundraram,
Mahendra mana daranam, Namami Krishna varanam., 2

भावार्थ–कामदेव का मान मर्दन करने वाले, बड़े-बड़े सुन्दर चंचल नेत्रों वाले तथा व्रजगोपों का शोक हरने वाले कमलनयन भगवान को मेरा नमस्कार है, जिन्होंने अपने करकमलों पर गिरिराज को धारण किया था तथा जिनकी मुसकान और चितवन अति मनोहर है, देवराज इन्द्र का मान-मर्दन करने वाले, गजराज के सदृश मत्त श्रीकृष्ण भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।

Salutations to Him who has lotus like eyes, Who wins over the pride of the god of love,Who has broad and ever shifting eyes, And who consoled the gopas of the worry over the emissary. Salutations to the elephant like Lord Krishna,Who lifted the mountain by his lotus soft hands, Who has a pretty gaze and smile,And who killed the pride of the great Indra.


(श्लोक – 3)
कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं, व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्।
यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया, युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्॥३॥

Kadhambha soonu kundalam sucharu ganda mandalam,
Vrajanganaika vallabham namami Krishna durlabham.
Yasodhata samodhaya sagopaya sananandaya,
Yutham sukhaika dayakam namami gopa nayakam., 3

भावार्थ–जिनके कानों में कदम्बपुष्पों के कुंडल हैं, जिनके अत्यन्त सुन्दर कपोल हैं तथा व्रजबालाओं के जो एकमात्र प्राणाधार हैं, उन दुर्लभ भगवान कृष्ण को नमस्कार करता हूँ; जो गोपगण और नन्दजी के सहित अति प्रसन्न यशोदाजी से युक्त हैं और एकमात्र आनन्ददायक हैं, उन गोपनायक गोपाल को नमस्कार करता हूँ।

Salutations to the Lord Krishna, Who is not easy to get, Who wears the ear rings of Kadambha flowers, Who has very pretty smooth cheeks, And who is the lord of the women of Vrija. Salutations to the chief of Gopas,
Who grants supreme bliss, To Yasodha, gopas and Nanda, And who is the giver of pleasures.


(श्लोक – 4)
सदैव पादपंकजं मदीय मानसे निजं, दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम्।
समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं, समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम्॥४॥

Sadhaiva pada pankajam madheeya manase nijam,
Dadanamuthamalakam , namami Nanda balakam,
Samastha dosha soshanam, samastha loka poshanam,
Samastha gopa manasam, Namami nanda lalasam., 4

भावार्थ–जिन्होंने मेरे मनरूपी सरोवर में अपने चरणकमलों को स्थापित कर रखा है, उन अति सुन्दर अलकों वाले नन्दकुमार को नमस्कार करता हूँ तथा समस्त दोषों को दूर करने वाले, समस्त लोकों का पालन करने वाले और समस्त व्रजगोपों के हृदय तथा नन्दजी की वात्सल्य लालसा के आधार श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।

Salutations to the Nanda lad, Whose lotus like feet is drowned,
Ever truly in my mind, And who has curls of hair falling on his face. Salutations to Him who enthralls Nanda, Who diminishes bad effects of all sins, Who takes care of the entire world., And who is in the mind of every cow herd.


(श्लोक – 5)
भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं, यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम्।
दृगन्तकान्तभंगिनं सदा सदालिसंगिनं, दिने-दिने नवं-नवं नमामि नन्दसम्भवम्॥५॥

Bhoovo bharavatharakam bhavabdi karma dharakam,
Yasomathee kisorakam, namami chitha chorakam.
Drugantha kantha banginam, sada sadala sanginam,
Dine dine navam navam namami nanda sambhavam., 5

भावार्थ–भूमि का भार उतारने वाले, भवसागर से तारने वाले कर्णधार श्रीयशोदाकिशोर चित्तचोर को मेरा नमस्कार है। कमनीय कटाक्ष चलाने की कला में प्रवीण सर्वदा दिव्य सखियोंसे सेवित, नित्य नए-नए प्रतीत होने वाले नन्दलाल को मेरा नमस्कार है।

I bow to him who is the stealer of hearts,Who incarnated to reduce the weight of the world,Who helps us cross the miserable ocean of life,And who is young baby of mother Yasoda.I bow to the son of King Nanda,Who has a pair of pretty shining eyes,Who is followed by bees wherever he goes,And who is new and newer to his devotees,Today and everyday.


(श्लोक – 6)
गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं, सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनं।
नवीन गोपनागरं नवीनकेलि-लम्पटं, नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम्।।६।।

Gunakaram sukhakaram krupakaram krupaparam,
Suradwihannikarthanam, namami gopa nandanam.
Naveenagopa naagaram naveena keli lampatam,
Namami megha sundram thathith prabhalasathpatam., 6

भावार्थ–गुणों की खान और आनन्द के निधान कृपा करने वाले तथा कृपा पर कृपा करने के लिए तत्पर देवताओं के शत्रु दैत्यों का नाश करने वाले गोपनन्दन को मेरा नमस्कार है। नवीन-गोप सखा नटवर नवीन खेल खेलने के लिए लालायित, घनश्याम अंग वाले, बिजली सदृश सुन्दर पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है।

I salute the kid of all gopas, who is the treasure house, Of good qualities, pleasure and mercy, Who is above the needs of mercy, And who removed all the problems of devas. I salute the handsome one who is the colour of the cloud, Who wears yellow coloured silk resembling lightning, Who appears as a new Gopa every time he is seen,And who is interested in new antics every time.


(श्लोक – 7)
समस्त गोप मोहनं, हृदम्बुजैक मोदनं, नमामिकुंजमध्यगं प्रसन्न भानुशोभनम्।
निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं, रसालवेणुगायकं नमामिकुंजनायकम्।।७।।

Samastha gopa nandanam, hrudambujaika modhanam,
Namami kunja madhyagam, prasanna bhanu shobhanam.
Nikamakamadhayakam drugantha charu sayakam,
Rasalavenu gayakam, namami kunja nayakam., 7

भावार्थ–समस्त गोपों को आनन्दित करने वाले, हृदयकमल को प्रफुल्लित करने वाले, निकुंज के बीच में विराजमान, प्रसन्नमन सूर्य के समान प्रकाशमान श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। सम्पूर्ण अभिलिषित कामनाओं को पूर्ण करने वाले, वाणों के समान चोट करने वाली चितवन वाले, मधुर मुरली में गीत गाने वाले, निकुंजनायक को मेरा नमस्कार है।

I salute Krishna, the lad amidst the vrija land, Who is pleased and shines like the good sun, Who is the son of all gopas, And who is the pleasure of all their hearts. I salute Krishna, who is the leader of lads of vrija, Who plays soulful music using his flute, Who grants pleasures even though he does not want them, And whose glances are like defenseless arrows.


(श्लोक – 8)
विदग्ध गोपिकामनो मनोज्ञतल्पशायिनं, नमामि कुंजकानने प्रवृद्धवह्निपायिनम्।
किशोरकान्ति रंजितं दृगंजनं सुशोभितं, गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम्।।८।।

Vidagdha gopikaa mano manogna thalpasayinam,
Namami kunja kanane pravrudha vahni payinam.
Kisorakanthi ranchitham, druganjanam sushobitham,
Gajendra moksa karinam,Namami sri viharinam., 8

भावार्थ–चतुरगोपिकाओं की मनोज्ञ तल्प पर शयन करने वाले, कुंजवन में बढ़ी हुई विरह अग्नि को पान करने वाले, किशोरावस्था की कान्ति से सुशोभित अंग वाले, अंजन लगे सुन्दर नेत्रों वाले, गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त करने वाले, श्रीजी के साथ विहार करने वाले श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।

I salute Him who swallowed the fire, In the gardens and forests of Vraja land, Who was sleeping in the dreams of the very able gopis. I salute Him who is with the goddess of wealth, Who was the cause of salvation of Gajendra, Who is surrounded by divine glow of youth, And who shines in all directions.


(श्लोक – 9)
स्तोत्र पाठ का फल

दा तदा यथा तथा तथैव कृष्ण सत्य कथा, मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्।
प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान्, भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान॥(९)

Yadha thadha yadha thadha thadiva krushna sathkadha,
Maya sadaiva geeyathaam thadha krupa vidheeyathaam.
Pramanikashtakadwayam japathyadheethya ya pumaan,
Bhaveth sa nanda nandane bhave bhave subhakthiman., 9

प्रभो! मेरे ऊपर ऐसी कृपा हो कि जहां-कहीं जैसी भी परिस्थिति में रहूँ, सदा आपकी सत्कथाओं का गान के। जो पुरुष इन दोनों-राधा कृपा कटाक्ष व श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष अष्टकों का पाठ या जप करेगा, वह जन्म-जन्म में नन्दनन्दन श्याम सुंदर की भक्ति से युक्त होगा और उसको साक्षात् श्रीकृष्ण मिलते हैं।

Where I live, wherever I exist,Let me be immersed in your stories, For always without break, So that I am blessed with your grace. l his births.

8 मिनट की ये वीडियो आप नित्य सुने ताकि आपका मन संसारिक चिंतन से हट कर श्री कृष्ण के चरण कमलो मे लगे…,

॥ श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥


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गोपीगीत

Gopi Geet – गोपीगीत

भगवान कृष्ण ने अधिष्ठात्री देवी श्री राधा रानी और वृन्दावन की गोपियों के साथ रास रचाया, भगवान् ने रास में जितनी गोपियां थी उतनी ही संख्या में अपने प्रति रूप प्रकट किये। रास में सभी गोपियों को ये अनुभव हो रहा था की भगवान सिर्फ मेरे साथ है। गोपियों को ये अनुभव उनके अभिमान में परिवर्तित हो गया। गोपियों के ये लगने लगा कि भगवान् कृष्ण मात्र हम से प्रेम करते है।
भगवान् कृष्ण गोपियों के अभिमान को देख कर स्वयं को गोपियों के मध्य से अन्तर्ध्यान कर लेते है , और किशोरी जी के साथ रास-स्थल से आगे चले जाते है, कुछ समय पश्चात् किशोरी जू को भी अभिमान हो जाता है , तब ठाकुर जी राधा रानी को छोड़ कर लुप्त हो जाते है।

गोपियां और किशोरी जी भगवान के विरह में व्याकुल हो तड़पने लगती है।

हम लोग भौतिक जगत की वस्तु के लिए तड़पने लगते है कहीं हमारी कोई प्रिय वस्तु खो जाए तो घण्टो तक तडपते है लेकिन यहां तो जीव और शिव अर्थात भगत और भगवान् का मिलन और विरह हो रहा है, जिसने जन्मो जन्मो तक केवल गोबिंद मिलन की आस में ही जीवन बिताये हो उसे किसी और भौतिक वस्तु की चाह नही होती और गोपिया तो स्वयं गोबिंद मिलन की प्यास में गोपी रूप में प्रगट भई है फिर उनके विरह का क्या वर्णन हो सकता है? जब कृष्ण विरह की वेदना अनंतगुना हृदय में लावा की नाइ (भांति)प्रचंड वेग से प्रवाहित होने लगे और ज्वारभाटा के रूप में प्रस्फुरित होकर एक विस्फोट के रूप में बहने लगे तो वह भाव गोपीगीत बन जाता है.. इसीलिए स्वयं गोपियन ने इस गोपीगीत को गाया है है और अपनी वेदना का अविरल प्रवाह किया है,गोपिया कहती है,


श्लोक – 1
Shlok – 1

जयति तेsधिकं जन्मना ब्रज:
श्रयत इन्द्रिरा शश्व दत्र हि!
द्यति द्दश्यतां दिक्षु तावका
स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते!!
jayati te ‘dhikaṁ janmanā vrajaḥ
śrayata indirā śaśvad atra hi
dayita dṛśyatāṁ dikṣu tāvakās
tvayi dhṛtāsavas tvāṁ vicinvate

O beloved, Your birth in the land of Vraja has made it exceedingly glorious, and thus Indirā, the goddess of fortune, always resides here. It is only for Your sake that we, Your devoted servants, maintain our lives. We have been searching everywhere for You, so please show Yourself to us.

” हे प्रिय ! यह जो बृज है यह ऐसे ही बृज नही बन गया है,आपके जनम लेने के कारण इस स्थान का महत्व इतना अधिक है,अर्थात गोबिंद यह बृज क्षेत्र जहाँ अनेकानेक जीव मुक्ति प्राप्त कर रहे है यह सब आपकी कृपा और यहां आपके जन्म लेने के कारण ही है, आप बैकुंठ, गोलोक, क्षीरसागर और अन्यान्य लोको में बिलकुल भी सुलभ नही हो अर्थात आपका दर्शन व् मिलन सम्भव नही है, यह तो आपकी अनुकंपा है की

आप केवल बृज में ही इतने सहज रूप से मिल जाते है,

जिनके चरण श्री लक्ष्मी जी अपने आँचल में वक्षस्थल के पास छिपा कर रखती है वही कमल चरण यहां ब्रजभूमि की ऱज़ में डोलते फिरते है,यह सब आपके यहा जन्म लेने के कारण और हम जैसे अधमीयो पर उपकार करने के लिए ही तो हुआ है, यहां श्री लक्ष्मी जी भी सेवा हेतु नित प्रतिदिन आने लगी है,जो श्री लक्ष्मी जी क्षीर सागर में नित आपके कमलाचरण पलोटति रहती है और किसी अन्य को इनके दर्शन का अधिकार भी नही देती इस बृज में आपकी सेवा के लिए घूमती रहती है यह आपके यहा जन्म लेने के कारण हुआ है,

आपने ही इस बृज को बैकुंठ गोलोक स्वर्ग और,
अन्य उच्च लोकों से भी उच्च बना दिया है.

लोकन कौ लोक मैंने एक ब्रज लोक देख्यौ,
ब्रजहूँ कौ तत्व श्री वृन्दावन धाम है,
वृन्दावन धाम हूँ कौ तत्व साधू-संतजन,
साधून कौ तत्व गोपी-ग्वालिनी कौ नाम है,
ग्वालिनी कौ तत्व प्यारो कृष्ण घनश्याम जहाँ,
यहाँ कृष्ण हूँ कौ तत्व श्री राधारानी जू को नाम है.

दयित दृश्यतां दिक्षु तावका
स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते
आपकी कृपा से बहुत से राक्षस योनि के जीव जैसे अघासुर,बकासुर,कालिया नाग और पूतना जैसे राक्षस भव से पार हो गए है, जो गति बड़े बड़े महात्माओं को नही मिलती वह इस ब्रज क्षेत्र में सभी को प्राप्त हो रही है,आप यहां जो लीलाये कर रहे है वह युगों युगों तक जीवमात्र को आनंद देने वाली है,

हम गोपिया जो अपना सर्वश्व लूटा कर, घर बार छोड़ कर ही नही अपितु अपने पति बच्चो सभी को भूलकर यहां वन में भटक रही है, केवल और केवल हे मनमोहन आपके दर्शनों के लिए ही,

हमने युगों युगों तक आपको पाने के लिए अनेकानेक तप किये,कष्ट सहन किये है विरहवेदना में अपने हृदय को तप्त किया है और आज हम आपको पाकर भी नही पा रही है, इस अर्धरात्रि में गहन वन में आपको ढूंढती हुयी यहां वहां भटक रही है, आपको हम पर करुणा नही होती क्या? आपने अपनी करुणा से अनेक अधमीयो को भी उच्च गतियां प्रदान की है फिर हमारे लिए इतने निष्ठुर क्यों बन गए हो,हमने केवल और केवल तुमसे स्नेह किया और कोई भाव किसी के प्रति कभी अपने हृदय में नही लाया यहां तक की अपने गृहस्थ जीवन को भी भूल गयी है,इतना सब त्याग कर हम आज यहाँ आपके निकट है फिर भी आप हम से छिप रहे है न जाने कहां अंतर्ध्यान हो गए है,

जैसे एक बछड़ा अपनी माता से बिछुड़ जाने पर तड़प उठता है और वन वन माँ माआ करता हुआ भटकने लगता है अश्रुधारा उसके नेत्रों से अविरल बहने लगती है और कभी वह मूर्छित हो जाता है ऐसी ही दशा हमारी हो रही है, हमे अपने तन की कोई सुध नही है न ही भूख प्यास की परवाह है हमे केवल और केवल आपसे मिलना है, हे माधव ! आप कहाँ हो? हम आपको पाने के लिए भटक रही है,
रे निरमोही, छबि दरसाय जा।कान चातकी स्याम बिरह घन, मुरली मधुर सुनाय जा।ललितकिसोरी नैन चकोरन, दुति मुखचंद दिखाय जा॥भयौ चहत यह प्रान बटोही, रुसे पथिक मनाय जा॥


श्लोक – 2
Shlok – 2

शरदुदाशये साधुजातस
त्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा!
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका
वरद निघ्नतो नेह किं वधः!!
śarad-udāśaye sādhu-jāta-sat-
sarasijodara-śrī-muṣā dṛśā
surata-nātha te ‘śulka-dāsikā
vara-da nighnato neha kiṁ vadhaḥ

O Lord of love, in beauty Your glance excels the whorl of the finest, most perfectly formed lotus within the autumn pond. O bestower of benedictions, You are killing the maidservants who have given themselves to You freely, without any price. Isn’t this murder?

हे हृदयेश्वर हमारे प्राणधन ! हमारे हृदय में केवल आप ही निवास करते है,आप हमारे हृदय के स्वामी है, आप ही ने अपने नेत्र कटाक्षो से हमारा वध किया है,आपके नेत्र इतने नुकीले और घायल करने वाले है की हमारा हृदय इसकी पैनी धार से विदीर्ण अर्थात चिर गया है एक तो आपके विरह की वेदना ऊपर से इन नेत्रो द्वारा हृदय के विदीर्ण होने की पीड़ा हम तो मर ही जाएंगी केशव,केवल अश्त्रों शस्त्रो से मारना ही मारना नही होता है नेत्रो का मारण भी मृत्यु की पीड़ा देता है,

यह जो आपके नेत्र है जैसे शरद ऋतू के चंदमा की मनोहारी चांदनी की शोभा जैसे किसी सूंदर सरोवर पर दृश्यमान होकर उर सरोवर को अति आलोकिक बना देती है अर्थात बहुत दिव्य बना देती है ऐसेही यह आपके नेत्रो की सोभा की चांदनी से हमारा वक्ष स्थल विदीर्ण हो गया है, हम आपके बिना तड़प रही है कहि हमारे प्राणपखेरु उड़ नही जाए,हम आपके नेत्रो को जोकि अपनी सुंदरता से किसी को भी घायल कर देते है उन नेत्रों के दर्शन चाहती है,

हम सब आपके चरणों की दासी है और कोई शुल्क भी नही लेती अर्थात हम बिन मोल बिकानी है आपकी सेवा के लिए, हमे कोई उपहार या पारितोषिक नही चाहिए हम तो केवल आपके दर्शनों की प्यासी है, हम आपके नेत्रो की सुंदरता का आनंद लेना चाहती है हमे और कुछ भी प्रलोभन नही है,

प्यारे दरसन दीज्यो आय, तुम बिन रह्यो न जाय॥
जल बिन कमल, चंद बिन रजनी।
ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी॥
आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन,
बिरह कलेजो खाय॥
दिवस न भूख, नींद नहिं रैना,
मुख सूं कथत न आवै बैना॥
कहा कहूं कछु कहत न आवै,
मिलकर तपत बुझाय॥
क्यूं तरसावो अंतरजामी,
आय मिलो किरपाकर स्वामी॥
मीरां दासी जनम जनम की,
पड़ी तुम्हारे पाय॥


श्लोक – 3
Shlok – 3

विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसा
द्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात्!
वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया
दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः!!
viṣa-jalāpyayād vyāla-rākṣasād
varṣa-mārutād vaidyutānalāt
vṛṣa-mayātmajād viśvato bhayād
ṛṣabha te vayaṁ rakṣitā muhuḥ

O greatest of personalities, You have repeatedly saved us from all kinds of danger —from poisoned water, from the terrible man-eater Agha, from the great rains, from the wind demon, from the fiery thunderbolt of Indra, from the bull demon and from the son of Maya Dānava.

गोपियाँ कहती है, हे चैतन्य स्वरुप माधव आप अपने नेत्रों के कृपा कटाक्ष से जड़ जीवों को भी सजीव करने वाले है फिर हम गोपियाँ जो जड़मति हो गयी है तुम्हारे विरह में हम पत्थर हो गयी है तुम अपने इन कमलनयनों से क्यों नही अपनी करुणा का अमृत वर्षण कर रहे क्यों नही अपने रूप का दर्शन हमे प्रदान कर रहे हो,

मेरे साँवरिया….
“जल्व़ा-ऐ-हुस्न दिखा जाओ, तो कोई बात बने,
मेरी नज़रों में समा जाओ, तो कोई बात बने,
आपकी सूरत नज़र आती है. धुँधली धुँधली,
पर्दा नज़रों से हटा जाओ, तो कोई बात बने.”

आपने अनेकानेक बार हम सब का रक्षण किया है, जब कालिया नाग के विष से सारी यमुना का जल विषाक्त हो गया तब आपने ही अपनी कृपा से हम सब ब्रिजवासिन की रक्षा की है, जब अघासुर अजगर बनकर सकल गोकुल वासियों को निगलना चाहता था तब भी आपने ही हमारी रक्षा की है, अनेक राक्षशों व्योमासुर,बकासुर इत्यादि से बचाया है और यही नही जब इंद्र कुपित हो गया और सकल बृजमंडल को डूबना चाहता था, भारी वर्षण,आंधी का प्रचंड वेग और विद्युत् की असहनीय गडगडाहट से हम सब को बचाया हे! गिरिधर यह सब आपकी कृपा का ही फल था हम सब आपके ऋणी है आपने कोई भी अवसर हमारी रक्षा का नही छोड़ा सदैव हम सब की रक्षा के लिए तत्पर रहे हो

हे मधुसूदन ! हम जीव आज इस घोर कलियुग में अनेकानेक वासनाओ के शिकार है, मोह,लोभ दम्भ,पापाचार, स्वार्थ,विषय, काम लोलुपता से ग्रसित अनंत दुर्गुणों से पीड़ित है,यही नही इन सब से ग्रसित न जाने कितने कुकृत्य में संलिप्त है, हे माधव! भाव सागर में डूबता हुए हम सब के तारणहार आप कहा छुप गए हो? ना केवल उस युग में आपने गोकुलवासियों की रक्षा की है आज भी हमे आपकी करुणादृष्टि और वरद हस्त का आशीर्वाद चाहिए आप का संग चाहिए, हे प्रभो ! हमारी रक्षा कीजिये


श्लोक – 4
Shlok – 4

न खलु गोपिकानन्दनो भवा
नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्!
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये
सख उदेयिवान्सात्वतां कुले!!
na khalu gopīkā-nandano bhavān
akhila-dehinām antarātma-dṛk
vikhanasārthito viśva-guptaye
sakha udeyivān sātvatāṁ kule

You are not actually the son of the gopī Yaśodā, O friend, but rather the indwelling witness in the hearts of all embodied souls. Because Lord Brahmā prayed for You to come and protect the universe, You have now appeared in the Sātvata dynasty.

हे परम सखा! यहां परम सखा कहने का अर्थ मित्र भी है और सखा का अर्थ सुख प्रदान करने वाला भी है अतः गोपियाँ कहती है, हे कृष्ण आप केवल यशोदा के पुत्र बन कर आये हो और केवल उन्ही को आनंद देने वाले हो ऐसा नही है, आप नन्द बाबा के घर जन्मे तो केवल उन्ही के सुख और आनंद के लिए नही बल्कि आप सभी बृजवासियों को सुख प्रदान करने के लिए आये है ऐसा भी नही है सच तो यह है की आप सकल ब्रह्मांड के जीवमात्र के कल्याण और सुख के लिए यह अवतरित हुए है, आप सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले हो,आप सभी जीवमात्र के अंतर्यामी है, उनके मन हृदय में निवास करने वाले है, आपने यह जन्म ब्रह्मा जी के कहने पर और जीवमात्र के कल्याण के लिए इस यदुकुल और बृज में जन्म लिया है, सबका अधिकार आप पर समान रूप से है आप किसी वर्ग विशेष के लिए नही है अर्थात आपको सभी से प्रेम का अधिकार है और सभी को आपसे प्रेम करने का समान अधिकार है


श्लोक – 5
Shlok – 5

विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते
चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्!
करसरोरुहं कान्त कामदं
शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्!!
viracitābhayaṁ vṛṣṇi-dhūrya te
caraṇam īyuṣāṁ saṁsṛter bhayāt
kara-saroruhaṁ kānta kāma-daṁ
śirasi dhehi naḥ śrī-kara-graham

O best of the Vṛṣṇis, Your lotuslike hand, which holds the hand of the goddess of fortune, grants fearlessness to those who approach Your feet out of fear of material existence. O lover, please place that wish-fulfilling lotus hand on our heads.

हे यदुवंशी! आप अपने प्रेमियों की सकल अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले हो अर्थात जो आपकी शरण आ जाता है वह आपकी छत्रछाया पा लेता है फिर उसकी रक्षा और पालन आपका उत्तरदायित्व हो जाता है, जो व्यक्ति संसार के संताप का सताया हुआ है और आपकी शरण ले लेता है आप उसकी रक्षा करते है, अनेकानेक उद्धiरण है जहां आपने अपनी इस प्रवृति को सिद्ध किया है, फिर चाहे उदाहरणस्वरूप भक्त प्रह्लाद को लेलो या ध्रुव या गजेंद्र गज या कुब्जा शबरी और अहिल्या का दृष्टान्त ले लीजिये, ऐसा कोण सा जिव है जिस पर आपने उपकार नही किया जो भी जीव किसी भी भाव से आपकी शरण आया हो आपने अपनी शरणागति प्रदान कर अपने अभय दान से उन भक्तो का मान बढ़ाया है, बिभीषन जैसे रावण के भाई को आपने शरणागति दी है,आप इतने करुणामयी है की अपनी किरपा से कुपात्र को भी कृपापात्र बना देते हो,

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी।
मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना।।

अर्थात हे प्रभु आप शरणागतवत्सल है और कोई भी पात्र या कुपात्र आपकी शरण हो जाता है तो वह आपका उत्तरदायित्व बन जाता है अर्थात आप उसके सब कुछ बन जाते है, जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हैं । हे हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा-अभिलाषाओ को पूर्ण करने वाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकड़ा है, हमारे सिर पर रख दो।। आपने इतना कुछ किया इतने अधमियों को भी अपनी किरपा से भाव पार किया है फिर हमारी बारी इतनी देर क्यों लगा रहे हो, हम आपकी शरण है और आपके कर कमलो की छत्रछाया की अभिलाषी है, किरपा कर के अपने यह सुकोमल हस्त हमारे सर पर रख दीजिये, हम आपकी शरणागति चाहती है,


श्लोक – 6
Shlok – 6

व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां
निजजनस्मयध्वंसनस्मित!
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो
जलरुहाननं चारु दर्शय!!
vraja-janārti-han vīra yoṣitāṁ
nija-jana-smaya-dhvaṁsana-smita
bhaja sakhe bhavat-kińkarīḥ sma no
jalaruhānanaṁ cāru darśaya

O You who destroy the suffering of Vraja’s people, O hero of all women, Your smile shatters the false pride of Your devotees. Please, dear friend, accept us as Your maidservants and show us Your beautiful lotus face.

हे वीर शिरोमणि श्यामसुंदर ! तुम सभी व्रजवासियों का दुःख दूर करने वाले हो । आपका मुखचन्द्र इतना सोभायमान है जिसके दर्शन भर से ही सभी संताप दूर हो जाते है, पहले नेत्रो से वार किया, फिर करुणiहस्त की मांग है और अब मुखकमल की अर्थात गोपिया इतनी तृषित है की किसी भी प्रकार से प्रभु को पाना चाहती है वह एक झलक पाने को अति आतुर हो रही है मर रही है तड़प रही है अतिविह्वल हो रही है, विह्वल का अर्थ है प्रेम की तड़प में अत्यधिक रुदन अवस्था में, आपका मुख इतना सूंदर है की यदि एकपल के लिए आप हमे अपना दर्शन करवा दो तो हम अति सुख पाएंगी,

श्री हरिवंश किशोर लाडिले विनती कबहुँ विचारोगे
दीन दुखी भुज गहन कृपानिधि कोमल बाहं पसारोगे
निज मुख सत्य करौगे नातो सूल हिये का टारोगे
सब विधि पामर नीच निबल अति पोच पतित प्रतिपiरोगे
उमगत सहज कृपा कौ सागर लै लै नाम पुकारोगे
भोरी बिलपत द्वार दुखी तन करुणा कौर निहारऔगे

तुम्हारी मंद मंद मुस्कान की एक एक झलक ही तुम्हारे प्रेमी जनों के सारे मान-मद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त हैं। आपकी मधुर मुस्कान से कोण सा ऐसा जीव है जो मोहित नही होता, सागरमंथन से निकले अमृत के बटवारे हेतु आपने जब मोहिनी रूप लिया तो आपकी मुस्कान से सभी राक्षसगण ही मोहित हो गए तो आपके इस रूप और इसकी मुस्कान हमारा हृदय चिर देती है इसमें हमारा क्या दोष है? हम तो आपकी मुस्कान की आपके अधरों से झरने वाले अमृत की एक एक बूँद के लिए तड़प रही है, जैसा की हमने आपको पहले भी कहा है की आप हमसे दूर न जाओ, हम आपकी वह दासी है जिसे कोई सांसारिक सम्पदा की लालसा नही है, हम तो बिन मोल की आपकी दासी है जो केवल और केवल आपकी मुस्कान मात्र का दर्शन चाहती है

मेरी पलकों को तेरे दीदार का
मेरे मोहन इंतज़ार रहता है
दिल के हर कोने में मेरे बस तुम्हारा ही प्यार रहता है
गुजर रहे है मेरे रात और दिन बस तुम्हारी याद में
हमें तो मनमोहन बस तुम्हारा ही प्यार याद रहता है

आपके मुख को निहारने के लिए आपकी सेवा में खड़ी है, हे हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत, प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर न्योछावर हैं । जैसे भीलनी वर्षो तक आपकी प्रतीक्षा में तड़पती रही और बिन मोल सेवा भाव में लगी रही और आपने उन्हें अपने प्रेम से उन्हें तृप्त किया, उसी विरह पीड़ा को हम भी सहन कर रही है, जैसे अहिल्या वर्षो तक अपने उद्धार के लिए जड़वत पत्थर बनकर आपको पाने का इन्तजार करती रही हम सब भी आपके विरह में पत्थर हो गयी है, हमारा भी कल्याण करो, हम अबलाओं को अपना वह परमसुन्दर सांवला मुखकमल दिखलाओ।।

तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥
तेरे नैन गजब कजरारे, मटके हैं कारे कारे
तेरी तिरछी से चितवनीया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥

तेरे केश बड़े घुंघराले, ज्यों बादल कारे कारे
तेरी कुंडल की झलकनिया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥

तेरी चाल अजब मतवाली, ज्यों लगाती प्यारी प्यारी
तेरी मधुर मधुर पैजनिया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥


श्लोक – 7
Shlok – 7

प्रणतदेहिनांपापकर्शनं
तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम्!
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं
कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्!!
praṇata-dehināṁ pāpa-karṣaṇaṁ
tṛṇa-carānugaṁ śrī-niketanam
phaṇi-phaṇārpitaṁ te padāmbujaṁ
kṛṇu kuceṣu naḥ kṛndhi hṛc-chayam

Your lotus feet destroy the past sins of all embodied souls who surrender to them. Those feet follow after the cows in the pastures and are the eternal abode of the goddess of fortune. Since You once put those feet on the hoods of the great serpent Kāliya, please place them upon our breasts and tear away the lust in our hearts.

इस श्लोक में गोपी प्रभु के चरणों की बात करती है,कहती है हे नंदलाल! आपके यह चरण जिनके दर्शन मात्र से जिनकी ऱज़ मात्र से पापियों का उद्धार हो जाता है, हम उन चरणों के दर्शन चाहती है, तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं।जैसे अहिल्या को जैसे ही आपके चरणों की ऱज़ उड़कर लगी जोकि वर्षो से शिला बनी आपकी किरपा चाहती थी पल में सजीव हो गयी, उसका पाप ताप सब मिट गया, आपके कमलाचरण अद्भुत है, वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्यकी खान है और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती रहती हैं । जो लक्ष्मी जी इन चरणों पर किसी भी बाह्य जीव की दृष्टि भी इन पर नही पड़ने देती है तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो अर्थात जो लीलाये आप बृज में कर रहे है ,यह असाधारण है, और हमारे लिए उन्हें सांप के फणों तक पर रखने में भी तुमने संकोच नहीं किया ।

आपने हम सब गोकुलवासियों के हित के लिए यमुना के विषाक्त जल में कूदकर कालिया नाग के मस्तक पर फण पर इन कोमल चरणों से नृत्य किया, आपने हम सब पर इतनी किरपा की है अर्थात कभी भी और कोई भी अवसर पर अपनी करुणा की कमी नही रहने दी है. तो फिर आप अब कहाँ छुप गए हो? हमारा ह्रदय तुम्हारी विरह व्यथा की आग से जल रहा है तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमें सता रही है। तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की ज्वाला शांत कर दो, हम सब आपसे विनती कर रही है की हमारा ये हृदय विरहाग्नि से तप्त हो रहा है, वेदना इतनी गंभीर हो गयी है की हमारी छाती फटने को तैयार है अब यह अग्नि हम सब को भस्म करने को आतुर है हम आपसे विनती कर रही है की आप अपने चंदन जैसे चरणों को हमारे वक्षस्थल पर रख कर हमारी वेदना शीतल कर दीजिये,


श्लोक – 8
Shlok – 8

मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया
बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण!
विधिकरीरिमा वीर मुह्यती
रधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः!!
madhurayā girā valgu-vākyayā
budha-manojshayā puṣkarekṣaṇa
vidhi-karīr imā vīra muhyatīr
adhara-sīdhunāpyāyayasva naḥ

O lotus-eyed one, Your sweet voice and charming words, which attract the minds of the intelligent, are bewildering us more and more. Our dear hero, please revive Your maidservants with the nectar of Your lips.

हे कमल नयन! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है । तुम्हारा एक एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढकर मधुर है । बड़े बड़े विद्वान उसमे रम जाते हैं। जैसे ही आपकी मधुर वाणी का श्रवण होता है तो कोई भी आप पर मोहित हो जाता है, जैसे वामनावतार में आपकी मधुर वाणी और वेश देखकर राजा बलि मोहित हो गया और बिना कुछ सोचे आपको वचन दे दिया, उसपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं । आपकी वाणी इतनी मोहिनी है की किसी को भी अपने वश में कर लेती है तो फिर हमारा क्या दोष जो हम आपकी वाणी को सुनकर आप पर मोहित हो गयी है? तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं ।

हे दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवन-दान दो, छका दो।अर्थात आपका अधरामृत जिसे की वंशी नित्य प्रति पान करती है और मधुर मधुर स्वर उत्तपन करती है जिसकी स्वरनाद से त्रिलोकी मोहित हो जाती है हम सब उस अधरामृत को पाने के लिए मरी जा रही है, हम आपसे विनती कर रही है आप हमारे जीवन की रक्षा कीजिये,


श्लोक – 9
Shlok – 9

तव कथामृतं तप्तजीवनं
कविभिरीडितं कल्मषापहम्!
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः!!
tava kathāmṛtaṁ tapta-jīvanaṁ
kavibhir īḍitaṁ kalmaṣāpaham
śravaṇa-mańgalaṁ śrīmad ātataṁ
bhuvi gṛṇanti ye bhūri-dā janāḥ

The nectar of Your words and the descriptions of Your activities are the life and soul of those suffering in this material world. These narrations, transmitted by learned sages, eradicate one’s sinful reactions and bestow good fortune upon whoever hears them. These narrations are broadcast all over the world and are filled with spiritual power. Certainly those who spread the message of Godhead are most munificent.

हे प्रभो ! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत स्वरूप है ।जैसे आपका स्वरूप आपका मुख मुस्कान वाणी कमलहस्त चरण सुख देने वाले है उसी तरह आपकी लीलाओं का चिंतन दर्शन व् श्रवण मंगल कारक है अर्थात विरह से सताए हुये लोगों के लिए तो वह सर्वस्व जीवन ही है। कथा के माध्यम से भी शब्दरूप माधव आपके दर्शन हो जाते है,ऐसे समय जब आप हमारे समक्ष उपस्थित नही है किन्तु कथाओ के माध्यम से उपस्थित हो जाते है तो यह सब भी हमारे विरह को शांत करता है, बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं – भक्तकवियों ने उसका गान किया है,

वह सारे पाप – ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मंगल – परम कल्याण का दान भी करती है । वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है । जो भी जीव आपकी कथा अमृत का दान करते है अर्थात उन कथाओं का श्रवण गायन और पठान करते है वः धन्य है क्योंकि वः आपके शब्दरूप से दर्शन करवाने में समर्थ है,जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में भू-लोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं।।

नारद संहिता में स्वयम भगवान् ने यह कहा है,

“नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न वा।
मद्भक्ता: यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।”

हे नारद ! न तो मैं वैकुंठ में रहता हूँ और न योगियों के हृदय में, मैं तो वहाँ निवास करता हूँ, जहाँ मेरे भक्त-जन कीर्तन करते हैं, अर्थात् भजनों के द्वारा ईश्वर को सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। यहां भगवान् का कहने का तातपर्य यही है की में भजन,नाम सुमिरन और कथा के माध्यम से अति सुलभ हूँ और जहां यह सब होता है में वही रहता हु अन्यत्र कहि जाता ही नही अतः मुझे कथा में पाया जा सकता है,

जैसे संतजन भगवान् की महिमा का गुणगान करते है वैसे ही भगवान् भी उन्ही के आश्रय में सुगम रूप से मिल जाते है,श्रीमद तुलसी रामायण में जब श्री राम वन में विचरण करते हुए बाल्मीकि आश्रम में होते है तो वः पूछते है हे मुनिवर मुझे अब कहाँ रहना चाहिए? तब इन्ही भूरिदजन अर्थात संत ने वह स्थान या वह सूत्र बताये जहां प्रभु निवास करते है,


श्लोक – 10
Shlok – 10

प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं
विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम्!
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः
कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि!!
prahasitaṁ priya-prema-vīkṣaṇaṁ
viharaṇaṁ ca te dhyāna-mańgalam
rahasi saṁvido yā hṛdi spṛśaḥ
kuhaka no manaḥ kṣobhayanti hi

Your smiles, Your sweet, loving glances, the intimate pastimes and confidential talks we enjoyed with You — all these are auspicious to meditate upon, and they touch our hearts. But at the same time, O deceiver, they very much agitate our minds.

हे हमारे प्यारे ! एक दिन वह था, तुम्हारी प्रेम हँसी और चितवन तथा तुम्हारी विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं का ध्यान करके हम आनन्द में मग्न हो जाया करतीं थी। हे हमारे कपटी मित्र ! उन सब का ध्यान करना भी मंगलदायक है, उसके बाद तुमने एकान्त में हृदयस्पर्शी ठिठोलियाँ की और प्रेम की बातें की, अब वह सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर रही हैं।


श्लोक – 11
Shlok – 11

चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून्
नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्!
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः
कलिलतां मनः कान्त गच्छति!!
calasi yad vrajāc cārayan paśūn
nalina-sundaraṁ nātha te padam
śila-tṛṇāńkuraiḥ sīdatīti naḥ
kalilatāṁ manaḥ kānta gacchati

Dear master, dear lover, when You leave the cowherd village to herd the cows, our minds are disturbed with the thought that Your feet, more beautiful than a lotus, will be pricked by the spiked husks of grain and the rough grass and plants.

हे हमारे प्यारे स्वामी ! हे प्रियतम ! तुम्हारे चरण, कमल से भी सुकोमल और सुन्दर हैं । जब तुम गौओं को चराने के लिये व्रज से निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके, कुश एंव कांटे चुभ जाने से कष्ट पाते होंगे; हमारा मन बेचैन होजाता है । हमें बड़ा दुःख होता है।


श्लोक – 12
Shlok – 12

दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै
र्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्!
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहु
र्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि!!
dina-parikṣaye nīla-kuntalair
vanaruhānanaṁ bibhrad āvṛtam
ghana-rajasvalaṁ darśayan muhur
manasi naḥ smaraṁ vīra yacchasi

At the end of the day You repeatedly show us Your lotus face, covered with dark blue locks ofhair and thickly powdered with dust. Thus, O hero, You arouse lusty desires in our minds.

हे हमारे वीर प्रियतम ! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं, कि तुम्हारे मुखकमल पर नीली-नीली अलकें लटक रहीं है और गौओं के खुर से उड़-उड़कर घनी धूल पड़ी हुई है। तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखाकर हमारे हृदय को प्रेम-पूरित करके मिलन की कामना उत्पन्न करते हो।


श्लोक – 13
Shlok – 13

प्रणतकामदं पद्मजार्चितं
धरणिमण्डनं ध्येयमापदि!
चरणपङ्कजं शंतमं च ते
रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन्!!
praṇata-kāma-daṁ padmajārcitaṁ
dharaṇi-maṇḍanaṁ dhyeyam āpadi
caraṇa-pańkajaṁ śantamaṁ ca te
ramaṇa naḥ staneṣv arpayādhi-han

Your lotus feet, which are worshiped by Lord Brahmā, fulfill the desires of all who bow down to them. They are the ornament of the earth, they give the highest satisfaction, and in times of danger they are the appropriate object of meditation. O lover, O destroyer of anxiety, please put those lotus feet upon our breasts.

भावार्थ:- हे प्रियतम ! तुम ही हमारे सारे दुखों को मिटाने वाले हो, तुम्हारे चरणकमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली हैं, इन चरणों के ध्यान करने मात्र से सभी ब्याधायें शान्त हो जाती हैं। हे प्यारे ! तुम अपने उन परम-कल्याण स्वरूप चरणकमल हमारे वक्ष:स्थल पर रखकर हमारे हृदय की व्यथा को शान्त कर दो।


श्लोक – 14
Shlok – 14

सुरतवर्धनं शोकनाशनं
स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्!
इतररागविस्मारणं नृणां
वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्!!
surata-vardhanaṁ śoka-nāśanaṁ
svarita-veṇunā suṣṭhu cumbitam
itara-rāga-vismāraṇaṁ nṛṇāṁ
vitara vīra nas te ‘dharāmṛtam

O hero, kindly distribute to us the nectar of Your lips, which enhances conjugal pleasure and vanquishes grief. That nectar is thoroughly relished by Your vibrating flute and makes people forget any other attachment.

हे वीर शिरोमणि ! आपका अधरामृत तुम्हारे स्मरण को बढ़ाने वाला है, सभी शोक-सन्ताप को नष्ट करने वाला है, यह बाँसुरी तुम्हारे होठों से चुम्बित होकर तुम्हारा गुणगान करने लगती है। जिन्होने इस अधरामृत को एक बार भी पी लिया तो उन लोगों को अन्य किसी से आसक्तियों का स्मरण नहीं रहता है, तुम अपना वही अधरामृत हम सभी को वितरित कर दो।


श्लोक – 15
Shlok – 15

अटति यद्भवानह्नि काननं
त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्!
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते
जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्!!
aṭati yad bhavān ahni kānanaṁ
truṭi yugāyate tvām apaśyatām
kuṭila-kuntalaṁ śrī-mukhaṁ ca te
jaḍa udīkṣatāṁ pakṣma-kṛd dṛśām

When You go off to the forest during the day, a tiny fraction of a second becomes like a millennium for us because we cannot see You. And even when we can eagerly look upon Your beautiful face, so lovely with its adornment of curly locks, our pleasure is hindered by our eyelids, which were fashioned by the foolish creator.

हे हमारे प्यारे ! दिन के समय तुम वन में विहार करने चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिये एक क्षण भी एक युग के समान हो जाता है, और तुम संध्या के समय लौटते हो तथा घुंघराली अलकावली से युक्त तुम्हारे सुन्दर मुखारविन्द को हम देखती हैं, उस समय हमारी पलकों का गिरना हमारे लिये अत्यन्त कष्टकारी होता है, तब ऎसा महसूस होता है कि इन पलकों को बनाने वाला विधाता मूर्ख है।


श्लोक – 16
Shlok – 16

पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवा
नतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः!
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः
कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि!!
pati-sutānvaya-bhrātṛ-bāndhavān
ativilańghya te ‘nty acyutāgatāḥ
gati-vidas tavodgīta-mohitāḥ
kitava yoṣitaḥ kas tyajen niśi

Dear Acyuta, You know very well why we have come here. Who but a cheater like You would abandon young women who come to see Him in the middle of the night, enchanted by the loud song of His flute? Just to see You, we have completely rejected our husbands, children, ancestors, brothers and other relatives.

हे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर ! हम अपने पति, पुत्र, सभी भाई-बन्धु और कुल परिवार को त्यागकर उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं। हम तुम्हारी हर चाल को जानती हैं, हर संकेत को समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आयी हैं। हे कपटी ! इसप्रकार रात्रि को आयी हुई युवतियों को तुम्हारे अलावा और कौन छोड़ सकता है।


श्लोक – 17
Shlok – 17

रहसि संविदं हृच्छयोदयं
प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्!
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते
मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः!!
rahasi saṁvidaṁ hṛc-chayodayaṁ
prahasitānanaṁ prema-vīkṣaṇam
bṛhad-uraḥ śriyo vīkṣya dhāma te
muhur ati-spṛhā muhyate manaḥ

Our minds are repeatedly bewildered as we think of the intimate conversations we had with You in secret, feel the rise of lust in our hearts and remember Your smiling face, Your loving glances and Your broad chest, the resting place of the goddess of fortune. Thus we experience the most severe hankering for You.

हे प्यारे ! एकांत में तुम मिलन की इच्छा और प्रेम-भाव जगाने वाली बातें किया करते थे । ठिठोली करके हमें छेड़ते थे । तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखकर मुस्कुरा देते थे और हम तुम्हारा वह विशाल वक्ष:स्थल देखती थीं जिस पर लक्ष्मी जी नित्य निरंतर निवास करती हैं । हे प्रिये ! तबसे अब तक निरंतर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यंत आसक्त होता जा रहा है।


श्लोक – 18
Shlok – 18

व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते
वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्!
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां
स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्!!
vraja-vanaukasāṁ vyaktir ańga te
vṛjina-hantry alaṁ viśva-mańgalam
tyaja manāk ca nas tvat-spṛhātmanāṁ
sva-jana-hṛd-rujāṁ yan niṣūdanam

O beloved, Your all-auspicious appearance vanquishes the distress of those living in Vraja’s forests. Our minds long for Your association. Please give to us just a bit of that medicine, which counteracts the disease in Your devotees’ hearts.

हे प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है । हमारा ह्रदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है । कुछ थोड़ी सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निज जनो के ह्रदय रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।


श्लोक – 19
Shlok – 19

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु!
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः!!
yat te sujāta-caraṇāmburuhaṁ staneṣu
bhītāḥ śanaiḥ priya dadhīmahi karkaśeṣu
tenāṭavīm aṭasi tad vyathate na kiṁ svit
kūrpādibhir bhramati dhīr bhavad-āyuṣāṁ naḥ

O dearly beloved! Your lotus feet are so soft that we place them gently on our breasts, fearing that Your feet will be hurt. Our life rests only in You. Our minds, therefore, are filled with anxiety that Your tender feet might be wounded by pebbles as You roam about on the forest path.

हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे चरण, कमल से भी कोमल हैं । उन्हें हम अपने कठोर हृदय पर भी डरते डरते रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय । उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे-छिपे भटक रहे हो । क्या कंकड़, पत्थर, काँटे आदि की चोट लगने से उनमे पीड़ा नहीं होती ? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही चक्कर आ रहा है । हम अचेत होती जा रही हैं । हे प्यारे श्यामसुन्दर ! हे प्राणनाथ ! हमारा जीवन तुम्हारे लिए है, हम तुम्हारे लिए जी रही हैं, हम सिर्फ तुम्हारी हैं


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श्रीप्रिया जी की 101 नामावली

श्री कृष्ण की अति प्रिय “श्रीप्रिया” जी की 101 नामावली

इस ‘प्रिया नामावली’ ग्रन्थ में नित्य-विहारिणी सर्वराध्य स्वामिनी के विहार परक नामों का ही रसात्मक तात्पर्य निहित है। इस नामावली के में श्री ध्रुवदास जी का यह भी मन्तव्य अनुमानित होता है कि नित्य-विहार के उपासक रसिक जन श्री प्रिया जी के इन्हीं नामों का गान-स्मरण करे

  1. श्री राधे
    नित्य विहारमय वृन्दावन-निभृत-निकुञ्ज की सर्वोपरि स्वामिनी, श्री कृष्ण की भी आराध्या।
  2. नित्य किशोरी
    वाल, पौगण्ड एवं कौमार अवस्थाओं से अतीत, नित्य किशोरावस्था सम्पन्न, सौन्दर्य-माधुर्य की एकमात्र निधि।
  3. वृन्दावन विहारिनी
    नित्य धाम श्री वृन्दावन में ही विहार करने वाली, नित्य एकरस प्रियतम-संयोगिनी।
  4. वनराज रानी
    नित्य धाम वृन्दावन की एकमात्र परम स्वतन्त्र अधिकारिणी स्वामिनी।
  5. निकुंजेश्वरी
    श्री वृन्दावन के निभृत निकुञ्ज में, जहाँ प्रिया-प्रियतम की कैशोर-लीला सम्पन्न होती है, उस निकुञ्ज धाम की सर्वोपरि एवं स्वतन्त्र साम्राज्ञी।
  6. रूप रंगीली
    रूप एवं रङ्ग (आनन्द) में रँगी हुई।
  7. छबीली
    छवि अथवा शोभा से युक्त।
  8. रसीली
    रसयुक्त अथवा रस-प्रदात्री।
  9. रस नागरी
    रस एवं रसिकता की मर्मज्ञ, रस-विलास-चतुरा।
  10. लाडिली
    प्रियतम एवं समस्त परिवार की लाड़-भाजन एवं अत्यन्त दुलारी।
  11. प्यारी
    प्रियतम की प्रेम-पात्र, प्रेमास्पदा।
  12. सुकुँवारी
    कोमल अंगों वाली।
  13. रसिकनी
    रासादि रस-क्रीड़ाओं में आनन्द लेने वाली, रसमर्मज्ञा।
  14. मोहिनी
    जिनकी रूप-छटा प्रियतम को मोहित करती रहती है।
  15. लाल मुखजोहिनी
    प्रियतम के मनोहर मुख-चन्द की चकोरि ।
  16. मोहन-मन-मोहिनी
    अन्य सबके मन को मोहित करने वाले प्रियतम श्री कृष्ण का भी विमोहन करने वाली।
  17. रति-विलास-विनोदिनी
    अपने प्रियतम के साथ दाम्पत्य -केलि में आनंदानुभव करने वाली।
  18. लाल-लाड़-लड़ावनी
    प्रियतम श्री लालजी को उनके मनोनुकूल सुखों का दान करके, तत्सुख रीति से उन्हें प्रसन्न रखने वाली।
  19. रंग-केलि बढ़ावनी
    निकुञ्ज भवन में प्रियतम के सुख के लिए कोक-केलि का विस्तार करने वाली।
  20. सुरत-चंदन-चर्चिनी
    एकान्तिक विहार काल में प्रियतम के प्रस्वेट पङ्किल चन्दन से लिप्त अङ्गों वाली।
  21. कोटि-कोटि दामिनी-दमकनी
    कोटि-कोटि असंख्य विद्युल्लताओं की चमक-दमक को भी जाज्ज्वल्यता प्रदान करने वाली अथवा कोटि-कोटि विद्युल्लता जैसी छबिमयी।
  22. लाल पर लटकनी
    प्रियतम की लाड़-भाजन होने के कारण लड़कान पूर्वक अपने ललित तनु को प्रियतम की देहयष्टि से विलम्बित करने वाली।
  23. नवल नासा-चटकनी
    प्रियतम श्री लाल को, रसलीन दशा से सचेत करने लिये उनकी नासिका के समीप अपनी कराड् गुलियों से मीठी सी चुटकी चटका देने वाली।
  24. रहसि पुंजे
    ऐकान्तिक आनन्द की निधि।
  25. वृंदावन प्रकाशिनि
    श्री वृन्दावन के गोप्य रसमय स्वरूप को अपनी रसमयी लीलाओं के द्वारा प्रकाशित करने वाली अथवा श्री वृन्दावन मात्र में अपने स्वरूप को प्रकाशित रखने वाली।
  26. रंग-विहार-विलासिनी
    श्री वृन्दावन के प्रेमानन्दमय विलास मे विलसने एवं प्रियतम को विलसाने वाली।
  27. सखी-सुख-निवासिनी
    जिनके स्वरूप में अपनी दासियों, सखियों किंवा सहचरियों का सम्पूर्ण सुख निहित है।
  28. सौंदर्य रासिनी
    अखिल एवं अनन्त सौन्दर्य-माधुर्य तथा लावण्य-राशि को सर्वदा धारण करने वाली।
  29. दुलहिनि
    नित्य नव-वधू।
  30. मृदु हासिनी
    जिसके मुखमण्डल पर निरन्तर मन्द मधुर एवं मृदु मुस्कान स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है।
  31. प्रीतम-नैन-निवासिनी
    सदा-सर्वदा प्रियतम के नेत्रों में बसी रहने वाली।
  32. नित्यानन्द-दर्शिनी
    जिसके स्वरूप में सदा नव-नव आनन्द का दर्शन होता रहता हो अथवा जो नित्य नये आनन्द का दर्शन कराती रहती है।
  33. उरजनि पिय-परसिनी
    जो अपने उरोजों के द्वारा प्रियतम के सुभग अङ्गों को स्पर्श दान करने में सहज उदार हो ।
  34. अधर-सुधारस बरसनी
    जो प्रेम विवश भाव से प्रियतम को सुखदान करने के लिये अपने अधरामृत रस का सदैव वर्षण करती है।
  35. प्राननिं रस-सरसिनी
    निरन्तर प्रियतम के प्राणों को रस से सिक्त रखने वाली।
  36. रंग-विहारिनि
    आनन्द रूपी विहार में रमण करने वाली अथवा विहार में रसरङ्ग की वृद्धि करने वाली।
  37. नेह-निहारनि
    जिनकी सहज दृष्टि में सदा प्रेम-स्नेह की ही वृष्टि होती है।
  38. पिय-हित-सिंगार-सिंगारिनी
    जो अपने प्रियतम के लिए वस्त्राभूषण आदि शृङ्गारों से अपने श्री अङ्गों को सुसज्जित करती हो, स्व-सुख के लिए नहीं, अपितु तत्सुखिता ही जिसके शृङ्गार का मूल हो ।
  39. प्यार सौं प्यारे कौं लै उर धारिनि
    जो अपने प्रियतम को हृदय पर धारण कर रस-दान करने में कुशल है ।
  40. मोहन-मैंने-विथा-निरवारनि
    सदैव अकाम रहने वाले मोहन श्याम के प्रेम-सकाम होने पर उनके हृदय की अनिवार्य प्रेम-व्यथा को अपने उदार रस-दान द्वारा निर्वारित करने में सदा सक्षम एवं समर्थ।
  41. जानि प्रवीन उदार सँभारनी
    जो परम निपुण प्रेमास्पद है, उदार शिरोमणि हैं। जो अपने जनो की सदा सर्वदा स्नेहपूर्वक ध्यान में रखने में समर्थ हैं।
  42. अनुराग सिंध
    प्रेम की अगाध समुद्ररूपा।
  43. स्यामा
    षोडश वर्षीया नव नव रूप, गुण, सौन्दर्य, लावण्य-निधि, रसनिथि नागरी ।
  44. भामा
    प्रियतम-प्रेम की प्रकाशिका।
  45. बामा
    प्रतिकूलता का रस-विधा में भी रसास्वादन करने कराने वाली प्रिया।
  46. भाँवती
    प्रियतम की अतिशय प्रिय लगने वाली।
  47. जुरवतिन-जूथ-तिलका
    परम सुन्दरी एवं नवयौवना सखियों के विशाल समूह की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी प्रिया।
  48. वृंदावन-चंद चंद्रिका
    वृन्दावन – विलासी श्री कृष्ण चंद्रमा रूपी की ज्यौत्ना रूपी प्रिया।
  49. हास-परिहास-रसिका
    हास्य विनोद की क्रीड़ा में आनन्द अनुभव करने वाली।
  50. नवरंगिनी
    सदैव नये-नये प्रकार के आनन्द विलास को प्रकट करने वाली।
  51. अलकावलि-छवि-फंदिनी
    जिसकी चुँघराले केश-राशि सौंदर्य छवि के पाश किंवा फंदे की भाँति है, जो सदैव लाल के मन का फँसाती है।
  52. मोहनी मुसिकिनि मंदिनी
    मन्द-मन्द मधुर मुसकान के द्वारा प्रियतम के मन को भी मोहित करने वाली।
  53. सहज आनन्द-कंदिनी
    सहज रूप से आनन्द की सार स्वरूपिणी।
  54. नेह कुरंगिनी
    बहेलिये के कर्ण-मधर नाट पर मोहित होकर अपने सर्वस्व देने वाली हरिणी की भाँति जो प्रियतम के प्रेम पर मोहित होकर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे, ऐसी रिझर्वार प्रिया।
  55. नैन विसाला
    जिसके कर्णायत नेत्र सुन्टर एवं सुदीर्घ हैं।
  56. महामधुर रस-कंदिनी
    उज्ज्वल शृङ्गार मूलक नित्य विहारमय दम्पति विलास रस की आधार स्वरूपा।
  57. चंचल चिंत-आकर्षिनी
    व्रज के बहु नायकत्त्व रस में लिप्त व्रज रस रसिक श्री कृष्ण को कान्त भाव से विरत करके, अपने रूप, प्रेम, आकर्षण के द्वारा नित्य-विहारमय ऐकान्तिक राधा-कान्त भाव में स्थिर कर देने वाली।
  58. मदन-मान-खंडिनी
    अपने निष्काम एवं उज्ज्वल प्रेम के द्वारा नेम-प्रधान काम के कामना-मूलक अभिमान का तिरस्कार एवं मान मर्दन कर देने वाली सहज सर्वोपरि प्रेम-मूर्ति ।
  59. प्रेम-रंग-रंगिनी
    कामादि भावों से विवर्जित विशुद्ध तत्सुखमय प्रेम के आनन्द में निरन्तर रँगी हुई।
  60. बंक-कटाक्षिनी
    जिनके नेत्रों की सहज चितवन भी रसदायक, पैनी एवं बाँकी है।
  61. सकल विद्या-विचक्षनी
    दाम्पत्य प्रेम की विलास कलाओं किंवा कोक-विद्या की समस्त कलाओं में सहज निपुणा।
  62. कुँवर अंक-विराजनी
    रसिक-किशोर प्रियतम की क्रोड़ में विराजमान होनेवाली, उनके प्रेम-सम्मान की एकमात्र अधिकारिणी।
  63. प्यार-पट-निवाजिनी
    प्रेम के पदाधिकार का आद्यन्त नि्वाह करने वाली।
  64. सुरत-समर-दल-साजिनी
    निकुञ्ज विहारवसर पर प्रियतम के साथ दाम्पत्य क्रीड़ा में हाव-भाव रूपी सैन्य को सुसज्जित रखने वाली।
  65. मृगनैनी
    हरिणी जैसे सुन्दर एवं विशाल डहडहे नेत्रों की शोभा से संपन्न।
  66. पिकबैंनी
    कोयल जैसी कर्ण-मधुर वाणी एवं स्वर से युक्त।
  67. सलज्ज अंचला
    जो पदे-पदे लज्जा से युक्त होकर दुकूल अञ्चल से मुख को ढँक लेती है।
  68. सहज चंचला
    नारी स्वभाव सुलभ चाञ्चल्य जिसके अङ्ग-अङ्ग में अधिकाधिक रूप से विराजमान् है।
  69. कोक कलानी-कुशला
    दम्पति विलास की केलि-कलाओं में जो सहज निपुण हैं।
  70. हाव-भाव चपला
    अन्तर स्थित प्रेम को प्रकट करने वाले इङ्गितो अर्थात हाव-भावों की व्यंजना में कुशल एवं उनके प्रदर्शन में सहज चञ्चला।
  71. चतुर्य चतुरा
    मूर्तिमान् चातुरी को भी अपनी चातुरी से पनि करने वाली।
  72. माधुर्य मधुर
    मूर्तिमान् माधुर्य को अपने प्रेम, रूप, लावण्य आदि विलज्जित कर देने वाली सहज माधुर्य-मूर्ति श्री राधा।
  73. बिनु भूषन भूषिता
    जिसका प्रत्येक अङ्ग सहज सौन्दर्य, माधुर्यमय है जो सौन्दर्य के लिए अलङ्कार किंवा आभूषणों की अपेक्षा न रखती हो अपितु जिसके सौन्दर्य से आभूषणादि भी सौन्दर्य-मण्डित हो जाते, ऐसी सहज शृङ्गारमयी नवल किशोरी।
  74. अवधि सौन्दर्यता
    सौन्दर्य की चरमसीमा, जिसके सौन्दर्य के समकक्ष कोई हो ही नहीं, तब अधिक कैसे होगा। अर्थात् असमोध्द्र रूप लावण्यमयी।
  75. प्राण-वल्लभा
    प्रियतम के प्राणों को उनके अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय अर्थात् जिस पर प्रियतम के प्राण न्यौछावर हों।
  76. रसिक-रवनी
    रसिक प्रियतम को भी अपने रूप मे रमा लेने वाली किंवा रसिक प्रियतम के प्रेम एवं रूप मे सदैव एक रस रमने वाली।
  77. कामिनी
    जिसके हृदय में प्रेम सुखार्थ प्रेम-कामनाओं का विस्तार होता रहता है।
  78. भामिनी
    प्रियतम के मन पर सहज रूप से अधिकार रखने वाली।
  79. हंस कल-गामिनी
    राजहंस पक्षी की भाँति मद-मन्थर गति से गतिशील प्रिया।
  80. घनश्याम अभिमान
    सघन जल-परित मेघों की भाँति परम सुन्दर श्याम वर्ण श्रीकृष्ण को भी अपने परम रमणीय रूप में रमा लन वाली, दामिनी द्युति-विनिन्दक गौरांगी, परम सुन्दरी।
  81. चंद-विपनी
    श्री वन्दाविपिन के स्वरूप प्रभाव को अपने ने सौन्दर्य एवं महामधुर विलास से प्रकाशित करने वाले चन्द्रमा रूपा शीतल प्रभा पुंज।
  82. मदन-दवनी
    अपने परमोज्ज्वल प्रेम प्रभाव से समस्त काम प्रवृत्तियों का सर्वथा दमन एवं विनाश कर देने वाली।
  83. रसिक-रवनी
    रसिक शिरोमणि प्रीतम श्री लाल जी को रमण सुख प्रदान करने वाली किवा रसिक प्रियतम के साथ रमण करने वाली।
  84. केलि-कमनी
    निकुञ्ज गीत दाम्पत्य क्रीड़ा को कमनीय स्वरूप प्रदान करने वाली रस-विदग्धा नागरी।
  85. चित्तहरनी
    अपने सहज सौन्दर्य एवं लावण्य से प्रियतम श्याम के चञ्चल चित्त को चुराने वाली।
  86. ललन-उर पर चरनधरनी
    तीव्र प्रेमताप से संतप्त प्रियतम के हृदय देश पर अपने शीतल सुभग चरण कमलों को स्थापित करके उन्हें शान्ति प्रदान करने वाली।
  87. छवि कंज-वदनी
    जिनकी श्री मुखछवि कमल के समान शोभा सम्पन्न है।
  88. रसिक नंदिनी
    आनन्द स्वरूप रसिक प्रीतम को भी अपने रसानन्द से आन्दोलित करने वाली अथवा रसिक प्रियतम से मिलकर आन्दानुभूति करने वाली।
  89. रूप-मंजरी
    नित्य विकास को प्राप्त होने वाली, रूप-कलिका-पुञ्ज।
  90. सौभाग्य-रसभरी
    प्रियतम का नित्य साहचर्य सुख-विलास प्राप्त, रसवती नित्य किशोरी प्रिया।
  91. सर्वांग सुन्दरी
    जो नख-शिख पर्यन्त समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गों में रूप, सान्दय, माधुर्य, सुकुमारता, लावण्या, हाव-भाव भङ्गिमा आदि की सौन्दर्य सीमा हैं।
  92. गौरांगी
    तप्त कञ्चनवत गौर वर्ण के सौन्दर्य-लावण्य से परिपूरित सुकुमार अंगों वाली गौरवर्णा मुग्धा प्रिया।
  93. रतिरस रंगी
    प्रियतम समागम से उद्भूत रति-रस से रँगी हुई अथवा दाम्पत्य-रति के रस से प्रियतम को रँग देने वाली।
  94. विचित्र कोक कला अंगी
    शास्त्र वर्णित कोक-कलाओं से भी विलक्षण अथवा अनुपम कोक अंगों में प्रवीण किंवा विचित्र कोक-कलाएँ भी जिनकी एक अंश कला के प्रतिमान् हो।
  95. छवि-चंद-वदनी
    शोभा रूपी चन्द्रमा के समान सुभग सीतल।
  96. रसिक लाल बंदिनी
    जिनकी अनुपम रसिकता के समक्ष शेखर श्री लाल जी भी नतमस्तक नक होकर चरण वन्दना करते हैं, ऐसी रसिक मौलि , नवल किशोरी, रस-विदग्धा प्रिया।
  97. रसिक रस-रंगनी
    रसिक प्रीतम के रस में रँगी हुई अथवा रसिक-प्रियतम को अपने रस में रंग देने वाली।
  98. सखिनु सभामंडिनी
    नित्य विहार जय श्री वृन्दावन की नित्य-किशोरी सखियों की सभा में सर्वोपरि सुन्दर होने से सबको भूषण-स्वरूपा।
  99. आनंद-नंदिनी
    आनन्द की मूल स्वरूपा अर्थात् आनन्द रूप प्रियतम को भी आह्लादित करने वाली।
  100. चतुर अरु भोरी
    चातुर्य की अवधि होकर भी हृदय की सरलता के कारण भोलेपन की भी जो प्रतिमूर्ति है।
  101. सकल सुख-रासि-सदने
    आश्रित जनों को, सखियों को एवं प्रेमास्पद प्रियतम को भी वांछित समस्त सुखों का दान करने में सदा-सर्वदा समर्थ एवं उदारता की परमावधि।

उपसंहार
दोहा- प्रेम-सिंधु के रतन ये, अद्भुत कुँवरि के नाम।
जाकी रसना रटै ‘ध्रुव’, सो पावै विश्राम ॥१॥

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि कुँवरि किशोरी श्री राधा के ये नाम प्रेम रूपा श्री समुद्र के अद्भुत रत्न हैं। जिस भाग्यशाली भक्त की जिह्वा इन नामो का गान करेगी, वह निश्चित ही परम-शांति को प्राप्त करेगा॥१॥

ललित नाम नामावली, जाके उर झलकंत ।
ताके हिय में बसत रहैं, स्यामा-स्यामल कंत ॥२॥

ललित नामों की यह नामावली जिसके हृदय में झलकेगी, वही उस नाम क साथ उसके हृदय में प्रिया श्यामा एवं उनके कान्त प्रियतम श्याम सुन्नर सदैव निवास करेंगे॥२॥

|| • जय जय श्री राधे • ||

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श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद

श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद

परमाचार्य श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने अपने लाडले ठाकुर श्री हित राधावल्लभ लाल की रसोई पाक में प्रयुक्त होने वाली लकड़ी बीनने जैसी सेवा जिसे हम सामान्य बुद्धि के लोग अति लघु सेवा कार्य मानते हैं



निज कर-कमलों से कर जहाँ एक ओर प्रगट सेवा के महत्त्व को दर्शाया, वहीं दूसरी ओर सेवा कुंज की सघन निकुञ्जों में स्वेष्ट की सेवा-भावना में संलग्न रह मानसी-सेवा के महत्त्व को प्रगट किया, महत्त्व क्या प्रगट किया वह तो उनका नित्य चिन्तनीय विषय है, उसके बिना तो वह रह ही नहीं सकते । वास्तव में सेवक वही है, जो सेवा के बिना रह न पाये । यदि जिसे हम प्रियतम कहते हैं, उसका सतत् स्मरण न बना रहे तो हम कैसे प्रेमी ?

श्री हिताचार्य जी बात तो क्या कहें । उनके ग्रन्थों में युगल के रसमय लीला-विलास के बहुत भाँति से वर्णन मिलते हैं । नित्य सिद्ध बपुधारी होते हुए भी उन्होंने श्री राधा-सुधा निधि जी में एक साधक की भाँति अनेकानेक रसमयी अभिलाषाओं का चित्रन किया है । सम्प्रदायों के अन्यान्य अनेकों रसिक महानुभावों ने इस रसखेत वृन्दाविपिन में सतत् कीड़ा-पारायण हित दम्पति की अष्ट प्रहरीय सेवा परिचर्या का वर्णन अपनी वाणियों में किया है ।

समय-समय श्री राधावल्लभ लाल की अष्याम सेवा सम्बन्धी प्रकाशन होते रहे हैं । वृन्दावन रसोपासना में श्रीहित मूर्ति युगल-किशोर की अष्टयाम (आठ प्रहर) सेवा का विशेष महत्व है। श्रीहित राधावल्लभ सम्प्रदाय के अनेक आचार्य एवं रसिक सन्तों ने विविध अष्टयाम ग्रन्थ लिखे हैं।
परवर्ती काल में उन्हीं ‘अष्टयाम’ ग्रन्थों से समय समय की सेवा-भावना के पदों का संकलन करके कई अष्टयाम (सेवा भावना पदावली) के लघुकाय ग्रन्थ प्रकाशित होते रहे हैं। प्रस्तुत संग्रहीत अष्टयाम भी उसी परम्परा का एक क्रम है। इस संस्करण में शयन के पदों का विपुल संग्रह किया गया है। साथ ही श्रीराधावल्लभ जी का व्याहुला एवं रसिक नामावलि भी संग्रहीत कर दी गई है जो रसिक भक्तों के लिए अधिक उपयोगी है। सायंकालीन सन्ध्या आरती के पश्चात् गेय पदावली के साथ श्रीसेवक-वाणी का पंचम प्रकरण-‘श्रीहित इष्टाराधन’ विशेष रूप से इस संस्करण में संग्रहीत है, क्योंकि सन्ध्या आरती के पश्चात इस प्रकरण का गान प्रतिदिन ठा. श्रीहित ललित लाड़िली लाल जी महाराज विराजमान श्रीहिताश्रम के समक्ष किये जाने की एक सुष्ठु परम्परा स्थापित हो गयी है

संछिप्त मे पढ़े – (अष्ट्याम सेवा का अर्थ है दिन के आठ पहर की जाने वाली सेवा जिसमे मंगला, श्रृंगार सेवा, धूप सेवा, राजभोग सेवा, एवम् दोपहर को उत्थापन सेवा इसके पश्चात औलाइ, संध्या की आरती, संध्या धूप आरती और फिर ठाकुर जी को शयन कराया जाता है। इन्ही सब सेवाओ भावना को रसिक संतो ने अपने पदों मे सिंचित किया है और इन्ही सब पदों को ‘अष्ट्याम पद’ नामक न संकलन मे एकत्रित किया गया है।)

श्री राधावल्लभ लाल जी के यहाँ महाप्रभु द्वारा तय किये गए अष्ट्याम पद की रीति का आज भी नित्य प्रति पालन किया जा रहा है और बड़े भाव से सखियों द्वारा को इन अद्भुद पदों का गायन कर लाल जी को रिझाया जाता है अतः हित जू के लाडले श्री प्रिय-लाल से विनती है कि इन पदों के द्वारा हामारी मानसी सेवा भी स्वीकार करे ।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~1
मंगला के पूर्व पद

प्रथम श्री सेवक पद शिर नाऊँ।
करौ कृपा श्रीदामोदर मोपै , श्रीहरिवंश चरण रति पाऊँ।।
गुण गंभीर व्यासनन्दन जूके, तुव प्रसाद सुयश रस गाऊँ।
नागरीदास के तुमही सहायक, रसिक अनन्य नृपति मन भाऊ।।

व्याख्या :: सर्व प्रथम में श्री सेवक जी को सर नवा कर नमन करता हूँ।श्री दामोदर दास जी “सेवक जी” ने मुझ पर कृपा कि और में श्री हित हरिवंश जी के चरण कमलों का प्रेमी बन अनुराग का पान करू।। श्री व्यासनन्दन “श्रीहित जी” के गम्भीर गुणों का प्रसाद पाकर उनकी यश कीर्ति को रसमय होकर गाउ।श्री नागरीदास जी कहते है- आप ही मेरे सहायता करने वाले हो की मै श्री हित रसिक शिरोमणि अनन्य के मन को पसन्द आऊ।

प्रात समय नवकुंज द्वार पै, ललिताजू ललित बजाई बीना।
पौढ़े सुनत श्याम श्रीश्यामा, दम्पति चतुर प्रवीन प्रवीना।।
अति अनुराग सुहाग परस्पर, को कला गुण निपुण नवीना।
श्रीविहारनिदास बलि-बलि वन्दसि, यह मुदित प्राण न्यौछावर कीना।।

व्याख्या :: सुबह प्रातः के समय निकुन्ज द्वार पर श्री ललिता जी अनुराग के साथ वीणा वादन कर रही है।शैया पर लेटे हुए ही श्री श्यामाश्याम सुन रहे है वे श्री युगल ,श्रीवृन्दावन रस लीला में बड़े ही पारंगत प्रवीण से प्रवीण है।श्री युगल में प्रेम सौभाग्य एक-दूसरे के लिए अति-विशेष है, सभी प्रकार की कलाओं में निपुण गुण रखने वाले सदा श्री नवल किशोर किशोरी ही है।श्री बिहारिनि दास जी कहते है–मैं बलैयां लेते हुए उनकी वंदना करते हुए आनंदित हो अपने प्राण न्यौछावर करता हूँ।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~2
मंगला के पूर्व पद

अब ही नेक सोय है अरसाय।
काम केलि अनुराग रस भरे जगे रैन बिहाय।।
बार बार सपनेहु सूचत सुख रंग रंग के भाय।
यह सुख निरखत अलिजन प्रमुदित नागरीदास बलिजाय।।

व्याख्या :: अभी-अभी तो श्रीयुग्ल थोड़ा सा सोय है, आलस्य में है।प्रेम खेल के अनुराग रस का थोड़ा-थोड़ा पान कर ये भरपूर हो जगते हुए रात्रि बिताय है। अब श्रीश्यामाश्याम रात्रि लीला के प्रगट सुख के प्रत्येक रँग को स्वप्न में पसन्द कर रहे है।श्री नागरी दास जी कहते है–श्री नवल किशोर किशोरी के इस सुख को देखकर ललितादिक सभी सखियाँ अति-आनन्द में है और में उन पर बलिहारी हूँ।।

भोर भये सहचरी सब आई। यह सुख देखत करत बढ़ाई।।
कोउ बीना सारंगी बजावै। कोउ इक राग विभासहि गावै।।
एक चरण हित सो सहरावै। एक वचन परिहास सुनावै।।
उठि बैठे दोउ लाल रंगीले। विथुरी अलक सबै रंग ढ़ीले।।

व्याख्या :: जब प्रातः हो गयी तो सभी निज सखिया श्री राधावल्लभ लाल के निज महल में आ गयी, उनके रात्रि के सुख को देख कर प्रसन्न हो रही है।कोई एक सखी वीणा बजा रही है तो कोई एक राग विभासः में गान कर रही है। एक सखी प्रेम से विहल हो श्री युगल के चरणों को अति-कोमलता से सहला रही है ,एक सखी रुचि पूर्ण विनोद वर्णन कर रही है। दोनों श्री लाडिली लाल उठ कर बैठ गए है, उनके घुघराले बाल ललाट पर अस्तव्यस्त हो रहै है, उनके रँग रूप श्रंगार ढीला हो चला है।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~3
मंगला के पूर्व पद

घूमत अरुण नयन अनियारे। भूषन वसन न जात समहारे।।
कहुँ अंजन कहुँ पीक रही फबी। कैसे के कहि जात है सो छबि।।
हार बार मिलि कै अरुझाने। निशि के चिन्ह निरखि मुस्कयाने।।

व्याख्या :: श्रीयुगल जोड़ी के लाल कमल समान इधर-उधर फिरते हुए नेत्र अत्यधिक कटीले प्रतीत हो रहे है, वे अपने आभूषण व् वस्त्रो को सम्भाल भी नही पा रहे है।। कही उनके कपोल पर काजल और कही पर पान की पीक अत्यंत मनोरम लग रही है, इस सुन्दर से भी सुन्दर छबि का क्या वर्णन किया जाय, जिव्ह्या में इतनी शक्ति नही है।। श्री श्यामाश्याम के गले में सुन्दर हार बालों में उलझे हुए है।, श्री प्रियाप्रीतम रात्रि के सुख चिन्हों को देख-देख कर ,आपस में मुस्करा रहे है।।

निरखि निरखि निशि के चिन्हन, रोमांचित ह्वै जाहि।
मानो अंकुर मैन के, फिर उपजै तन माही।।

व्याख्या :: रात्रि सुख लीला की निशानियों को देख -देख कर ,श्री राधावल्लभ लाल अत्यधिक रोमांचित हुए जा रहै है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो कामनाओं के नव अंकुर ,दुबारा से शरीर में पैदा हो रहै हो।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~4
मंगला के पूर्व पद

जागो मोहन प्यारी राधा।
ठाड़ी सखी दरस के कारन, दीजे कुंवरि जु होय न बाधा।।
सुनत बचन हँसत उठे है युगलवर, मरगजे बागे फवि रहे दुहुँ तन।
वारत तन मन लेत बलैयां, निरख निरख फूलत मन ही मन।।
रंग भरे आनन्द जम्हावत, अंस अंस धरि बाहु रहे गसि।
जय श्रीकमलनयन हित या छबि ऊपर, वारौ कोटिक भानु मधुर शशि।।

व्याख्या :: हे प्यारे श्रीराधामोहन ! आप जागिये।आपकी सभी सखियाँ दर्शनों के लिये खड़ी हुई है, हे कुँवरि श्रीराधा ! इस दर्शन की बाधा को दूर कीजिए।।इतना सुनते ही श्रीश्यामाश्याम हसंते-हसंते उठ कर बैठ गये, श्रीयुगल श्रीअंगो पर सुशोभित वस्त्रो में शयन के कारण सलवटे पड़ी हुई है।सखियाँ अपने तन मन को न्यौछावर करते हुए ,उनके इस रूप की बलैयां ले रही है और उनको जितना देख -देख कर प्रफुल्लित हो रही है उतना ही उनका मन अन्दर ही अन्दर प्रसन्नता से फूल रहा है।।रात्रि के प्रेम-रंग में भरे हुए श्रीयुगल आनन्द पूर्वक जम्हाई ले रहे है और परस्पर अंसो पर बाहु रखकर गाढ़ आलिंगन में बंधे हुए है। श्रीहित कमलनयन जी महाराज कहते है– श्री राधावल्लभ लाल की इस छवि के ऊपर मै करोड़ो उदित होते हुए सूर्य एवं चन्द्रमाओ को न्यौछावर करता हूँ।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~5
मंगला आरती के पद

रोचक झल्लरी झनकार विविध कल बाजे बाजत।
सुन धाई अलि यूथ प्रेम भरि आरति साजत।।
करत मंगल आरती सखी हाथ कंचन थार।
मरगजे अम्बर बने तन टूटे छूटे उर हार।।

व्याख्या ::श्री जी की निज सखियों ने जब रुचिकर झांझ की मधुर झनकार के साथ बहुत प्रकार के बाजे बजाये। यह सुनकर रसिक सखियाँ दल में दौड़ कर आ गयी व् प्रेम से भरी हुई आरती सजाने लगी।।सखियो के हाथ में सोने की थालियों है और वे मंगल आरती करने लगी। इधर रात्रि के चिन्हों से भरे श्री राधावल्लभलाल सलवटे लिये पटाम्बर व् टूटे छूटे हार माला तन पर सुशोभित करे है।।

चौर चारु फहरात दुहुँ दिशि सुमुखी ढारति।
कर कपूर वर्तिका नेह आरती उतारति।।
इक गहकी गुण गावती एक बहु नृत्य दिखावति।
एक वारने लेत एक कुसुमनि वरषावति।।

व्याख्या :: श्री जी के दोनों दिशाओं में सुन्दर मुख वाली ,कामदेव को लजाने वाली सखियाँ चंवर को सुन्दर मनोहर तरीके से नचा नचाकर घुमा रही है।।एक सखी चाह या लालसा पूर्ण होने पर गुण गा रही है,एक सखी नृत्य दिखा रही है, एक निछावर हो बलेंया ले रही है, एक फूल की वर्षा कर रही है।।

अति शोभित गहवर बन जहँ तहँ कुँजे कमनी।
फूल बन्यो चहुँ ओर परम् शोभित जिहि अवनी।।
श्रीराधा हरि चरण कमल परसन हित सरसती।
अरुण उदय के भये कोटि विधि शोभा दरसती।।

व्याख्या :: अति शोभायमान गहवर वन है ,जहाँ-तहाँ सभी जगह कमनीय कुँजे है।जहां पर भी धरती पर नजर करे वहां चारो ओर परम् शोभायमान फूल ही फूल है।।श्रीराधामोहन के चरण कमलों को छू कर अपना हित प्राप्त करना है।प्रातः उदय के साथ ही श्री लाड़िलीलाल की करोड़ो प्रकार की शोभा दृष्टि होती है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~6
मंगला के उपरान्त पद

नन्द के लाल हरयो मन मोर।
हौं अपने मोतिन लर पोवत कांकर डारि गयौ सखि भोर।।
बंक बिलोकनि चाल छबीली रसिक शिरोमणि नन्दकिशोर।
कहि कैसे मन रहत श्रवन सुनि सरस् मधुर मुरली की घोर।।
इन्दु गोविन्द बदन के कारण चितवन कौ भये नैन चकोर।
जय श्रीहित हरिवंश रसिकरस युवती तू लै मिली सखी प्राण अकोर।।

व्याख्या :: श्री नन्द के लाला ने मेरा मन हर लिया है।मैं तो अपनी मोतियों की लड़ी को पिरो रही थी , ऐरी सखी सुबह भोर में कंकड़ डाल गया वो।।तिरक्षि चलने की चाल देखने में अत्यन्त मनोहारी छैल-छबीली है क्योंकि वह तो रसिको में भी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ श्री नन्द जी का लाल है। अब यह बताओ मन कैसे रह सकता है उसके बिना जब कानो में रसपूर्ण मधु का स्वाद घोलती मुरली सुनाई दे।। चन्द्रमा से भी अद्वतीय गोपपुत्र मनहर तन के कारण उसे देखने में नेत्र चकोर की भांति ताकते हुए अपलक चेतना रहित हो गये है।श्री हित हरिवंश महाप्रभु कहते है — रसिकरस स्त्री श्रीप्रिया जी उनकी समता पर मिलाप करती हुई जब मिलती है तब वह प्राणों से आलिंगन करते है और सखी यह रस पान करके ही तृप्त होती है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~7
स्नान श्रृंगार सेवा के पद

स्नान कुंज में दोऊ आये। रतन जटित जहँ हौज सुहाये।।
जल सुगन्ध तिनमें अति सोहै। खिले कमल जिनमे मन मोहै।
तिन पर भृमर करत गुंजार। फूली झूल रही द्रुम डार।।

व्याख्या :: श्रीयुगल वर स्नान कुंज के अन्दर पधारे है ,जहाँ पर रत्नों से जड़ा हुआ सुन्दर स्नान कुण्ड शोभायमान है।। जिसके सुरभित जल की सुगन्ध अत्यधिक शोभा बढ़ा रही है, उसमे जो कमल खिले है वह मन को मोह रहे है।उन कमलो पर भौरे गुंजार कर रहे है व् रोमांचित हो व्रक्ष की डाले प्रफुल्लता उल्लास में झूल रही है।।

दोउ कुंज सुख पुंज है, तिनकौ एक ही घाट।
स्नान करत जहाँ जुगल वर, तहाँ अलिनुको ठाट।।

व्याख्या ::श्रीयुगल की दोनों कुंज घनी लता छाई है ,यह सुख का समूह है और श्री युगल का एक ही स्नान का घाट है। जिस स्थान पर श्री युगलवर स्नान करते है वहां पर सखियों के ठाठ -बाठ देखने लायक है।।

मज्जन करि बैठी चौकी पर हित कर सिंगार बनावत।
कारी सारी हरी कंचुकी अतरोटा पियरो पहिरावत।।

व्याख्या :: स्नान के बाद श्री प्रिया जी रत्न जड़ित फूलो से सजी चौकी पर विराजमान होती है, सखियाँ परम् हित के साथ उनका श्रंगार करती है।काले रंग की साड़ी, हरे रंग की अंगिया चोली, व् पल्ला तनसुख पीले रंग का पहनाती है।।

लाल लाल चीरा उपरेना पटुका झगा जु सुथन भावत।
बहु भूषन पहिराय तिलक दै हित ब्रजलाल सुभोग लगावत।।

व्याख्या :: श्री लाल जी को लाल पगड़ी ,दुपट्टा ,कमरबंध , झगला व् मनभावन पायजामा धारण कराया।बहुत प्रकार के आभूषण पहना कर उनका तिलक किया , श्री हित ब्रजलाल जी कहते फिर सुन्दर स्वादिष्ट भोग उनके समक्ष प्रस्तुत किया।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~8
स्नान श्रृंगार सेवा के पद

कर सिंगार राजत रंग भीने रीझ लाडिली लाल जिमावत।
कौर-कौर प्रति छबि अवलोकत बलि-बलि जूठन आपुन पावत।।
ललितादिक लीने कर चौरन निरखि-निरखि नैननि जु सिरावत।
जै श्रीहित हरिलाल निकट अलिरूपहि पानदान लै पान खवावत।।

व्याख्या: स्नान के बाद वस्त्र,आभूषण धारण होने के उपरांत, सभी सखियों ने मिल कर श्री युगल का श्रंगार कर उन्हें चन्द्रप्रभा वाली शैय्या पर विराजमान कराया ,रंग में आनन्द मग्न श्री लाडिलीलाल को रीझते हुए प्रसन्नता से भोग प्रस्तुत किया।एक एक कौर (गस्से) सुन्दर छवि का दर्शन करते हुए श्रीलाल जी बलिहारी होते श्री लाडिली को खिला रहे है और फिर स्वयं उनका प्रसादी भोग लगा रहे है।। श्री ललिताजी आदि सभी सखियों ने अपने हाथों को प्रसादी के लिये खोल रक्खे है और वे श्री युगल को देख-देख कर अपने नेत्रो को शीतल कर रही है। गो. श्रीहित हरिलाल जी कहते है-सखी स्वरूप में श्री राधावल्लभ लाल के निकट पान का डिब्बा लेकर उन्हें पान खिला रहे है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~9
धूप आरती के पद

आज नीकी बनी श्रीराधिका नागरी।
ब्रज युवति यूथ में रूप अरु चतुरई- शील श्रंगार गुण सवन ते आगरी।।
कमल दक्षिण भुजा बाम भुज अंश सखि- गावति सरस् मिलि मधुर स्वर रागरी।
सकल विद्या विदित रहसि श्रीहरिवंश हित- मिलत नव कुंज वर श्याम बड़भागी।।

व्याख्या :: आज श्री राधिका जी सभी नारियों में उत्तम बनी हुई है।अरी सखी सभी ब्रज नारियों में रूप , सुशीलता व् श्रंगार की चतुरता आदि गुणों में सबसे आगे ,सर्वोत्तम है।। उनके दाहिने हस्त में कमल व् बाय भुजा के पास अंग सखि मिलकर रसपूर्ण मधुर स्वर में राग-रागनी गा रही है। श्री हित हरिवंश जी कह रहे है- श्री प्रिया जी सर्व-समस्त विधाओं से अवगत है और उन्हें नव कुञ्ज में अतियुवा श्री श्याम जी बड़ा भाग्य मानते हुए मिल गये है।।

आज नागरी किशोर भाँबती विचित्र जोर- कहा कहौ अंग-अंग परम् माधुरी।
करत केलि कण्ठ मेलि बाहु दण्ड- गण्ड-गण्ड परस सरस् रास लास मण्डली जुरी।।
श्यामसुन्दरी विहार बांसुरी मृदङ्ग तार-मधुर घोष नुपुरादि किंकिनी चुरी।
जय श्री देखत हरिवंश आलि निर्तनी सुगंध चालि- वारि फेर देत प्राण देहसौ दुरी।।

व्याख्या :: आज श्री नवलकिशोरकिशोरी जोड़ी विचित्र रूप से मन -भावन लग रही है,उनके श्री अंग-अंग की शोभा परम् माधुर्य का रूप विखेर रही है क्या वर्णन किया जाये।खेल -खेल में गल-बहियाँ दिये, कपोल से कपोल मिल रसपूर्ण ललित नृत्य रास मण्डली जुड़ गई है।।श्रीराधाश्याम सुन्दरी के विहार में मृदङ्ग एकतारा व् नुपर ,चूड़ी की झंकार मधुर स्वर फैला रही है। श्रीहित हरिवंश ओट में देखते हुए कहते है-सखियनि सहित में इनके नृत्य की सौरभ चाल पर चक्कर लगाते हुए तन से प्राण न्यौछावर कर दू।।

भाग 9A
श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
श्रंगार आरती

बनी श्रीराधा मोहन की जोरी।
इन्द्र नील मणि श्याम मनोहर,सातकुंभ तन गोरी।।
भाल विशाल तिलक हरि कामिनि, चिकुर चन्द्र बिच रोरी।
गज नायक प्रभु चाल गयंदनि, गति व्रषभान किशोरी।।
नील निचोल जुवति मोहन पट, पीत अरुण सिर खोरी।
(जय श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति सुरत रंग में बोरी।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~10
श्रंगार आरती

बेसर कौन की अति नीकी।
होड़ परी लालन अरु ललना चोंप बढ़ी अति जीकी।।
न्याव परयो ललिताजु के आगे कौन ललित कौन फीकी।
दामोदर हित बिलग न मानो झुकन झुकी है राधेजू की।।

व्याख्या:: दर्पण देखते समय श्रीश्यामाश्याम में यह होड़ लग गई है कि उन्हें धारण करायी गयी बेसर किसके अधिक फब रही है और इस बात पर बात होने लगी। कोई निर्णय न हो पाने पर दोनों ने इस सम्बन्ध में श्री ललिता जी की राय जाननी चाही।ललिता जी ने श्रीश्याम जी की ओर देखते हुए मुस्करा कर कहा कि आप इस बात का अपने मन में कोई विचार न करे तो मैं सत्य बात कहूँ कि श्रीराधे जू की बेसर अधिक शोभायमान हो रही है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~11
युगल ध्यान

श्रीप्रिया बदन छबि चन्द्र मनो, प्रीतम नैन चकोर।
प्रेम सुधारस माधुरी, पान करत निसि भोर।।1।।

व्याख्या :: श्रीप्रिया जी के मुख की शोभा मानो चन्द्रमा है और श्रीप्रियतम जी के नेत्र रूपी चकोर रात-दिन उस चन्द्रमा को प्रेमामृतमयी माधुरी का पान करते रहते है।।1।।

अंगन की छवि कहा कहो, मन में रहत विचार।
भूषन भये भूषननिको, अति स्वरूप सुकुमार।।2।।

व्याख्या ::मन में इच्छा होते हुए भी श्रीराधावल्लभ लाल के अंगों की छवि का वर्णन करने में असमर्थ हूँ।ये दोनों सुकुमार इतने रूपवान है कि इनके श्री अंग भूषणों के भूषण बन गये है।।2।।

रंग मांग मोतिन सहित, शीश फूल सुख मूल।
मोर चन्द्रिका मोहिनी, देखत भूली भूल।।3।।

व्याख्या :: श्रीप्रिया जी की सिंदूर भरी मांग मोतियों के साथ अति – शोभायमान हो रही है और उसमें भी सुख का मूल , मस्तक पर सीसफूल शोभा की शोभा हो रहा है।श्रीप्रियतम के मस्तक पर मोहिनी मोरचन्द्रिका जो शोभा दे रही है उसको देख कर तो शरीर की समस्त सुध-बुध विस्मृत हो गयी है।।3।।

श्याम लाल बेंदी बनी, शोभा बनी अपार।
प्रगट विराजत शशिन पर, मनों अनुराग सिंगार।।4।।

श्रीप्रिया के मस्तक पर श्याम रंग की बेंदी और श्रीप्रियतम के मस्तक पर लाल रंग की बेंदी धारण है, जिससे इन श्री युगल की शोभा का कोई पार नही है। इन बेंदी को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो श्रीयुगल चन्द्रमाओ पर अनुराग और श्रंगार विराजमान स्वयं हो गये हो।(अनुराग का वर्ण लाल है और श्रंगार का श्याम)।।4।।

कुण्डल कल तांटक चल, रहे अधिक झलकाइ।
मनो छवि के शशि भानु जुग, छबि कमलनि मिलिआइ।।5।।

व्याख्या :: श्री राधावल्लभ लाल के कपोल जो शोभा के कमल है उन पर सुन्दर कुण्डल पीली आभा के सूर्य व् चंचल तांटक (कर्ण फूल) सफेद आभा के चन्द्रमा, ऐसे झलमला रहे है जैसे चन्द्र व् सूर्य दोनों शोभा के कमलो पर मिलने आ रहे हो।।5।।

नासा बेसर नथ बनी, सोहत चञ्चल नैन।
देखत भाँति सुहावनी, मोहै कोटिक मैन।।6।।

श्री प्रिया जी की नासिका में नथ व् श्री प्रियतम जी की नासिका में बेसर अत्यधिक शोभायमान है और तो और इनके ऊपर दोनों के चंचल नेत्र शोभा की भी शोभा ।जिसको देखकर करोड़ो कामदेव स्वयं मोहित हो जाये।।6।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~12
युगल ध्यान

सुन्दर चिबुक कपोल मृदु, अधर सुरंग सुदेश।
मुसकनि वरषत फूल सुख, कहि न सकत छबि लेश।।7।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभलाल की ठोड़ी सुन्दर है व् अधर सुन्दर लाल वर्ण के है। उनकी मुस्कान से सुख के फूल बरसते है जिसके कारण उनकी शोभा का लेशमात्र भी बखान नही हो पा रहा है।।7।।

अंगनि भूषनि झलकि रहे, अरु अञ्जन रंग पान।
नव सत सरवर ते मनों, निकसे कर स्नान।।8।।

श्रीप्रियाप्रियतम के अंगों में भूषण झलक रहे है और उनके नेत्र में अंजन व् अधरों में पान का रंग सुशोभित है।उनका दर्शन करके ऐसा मालूम होता है कि दोनों सोलह श्रंगार रूपी सरोवर में अभी -अभी स्नान करके निकले है।।8।।

कहि न सकत अंगन प्रभा, कुंज भवन रह्यौ छाइ।
मानो बागे रूपके, पहिरे दुहुन बनाइ।।9।।

व्याख्या:: श्रीप्रियाप्रियतम के अंगों की अनिवर्चनीय कान्ति से कुंज-भवन छाया हुआ है। इस कान्ति को देखकर ऐसा मालुम होता है कि दोनों ने सौन्दर्य के वस्त्र सुन्दर प्रकार से धारण कर रखे है।।9।।

रतनागंद पहुंची बनी , बलया बलय सुढार।
अंगुरिन मुंदरी फव रही, अरु मेहँदी रंग सार।।10।।

श्रीप्रिया जी की भुजाओं में रत्न जटित अंगद धारण हो रहे है एवं कलाइयों में पहुंची, चूड़ी और कड़े चढाव-उतार के साथ शोभायमान है। श्रीप्रिया जी की अंगुलियों में अंगूठियां सुशोभित है और वे अंगुलियां मेहंदी के इकसार रंग से रंजित है।।10।।

चन्द्रहार मुक्तावली, राजत दुलरी पोति।
पानि पदिक उर जग मगै, प्रतिविम्बित अंग जोति।।11।।

व्याख्या :: श्री प्रिया जी के वक्षस्थल पर चन्द्रहार, मोतियों की माला एवं पोत की बनी हुई दुलड़ी शोभायमान है तथा पान के आकार का पदक (लटकन) जगमगा रहा है जिसमें श्रीअंग की ज्योति का प्रतिविम्ब पड़ रहा है।।11।।

मनि मय किंकिन जाल छवि, कहौ जोइ सोइ थोर।
मनों रूप दीपावली, झलमलात चहुँ ओर।।12।।

श्रीप्रिया जी की कटि में धारण किंकिणी की छवि को मैं जितना भी कहूँ वह थोड़ा है। इसको देखकर ऐसा मालुम होता है मानो रूप के दीपकों की पंक्ति कटि के चारो ओर झलमला रही है।।12।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~13
युगल ध्यान

जेहर सुमिलि अनूप बनी, नूपुर अनवट चारु।
और छाँड़ि कै या छविहि, हिय कै नैन निहारु।।13।।

व्याख्या :: श्रीप्रिया जी के चरणों में जेहर (चरणों के आभूषण) बड़े सुन्दर ढंग से धारण की हुई है और उसके साथ सुन्दर नूपुर तथा अनवट (चरणों का आभूषण) धारण है। अन्य सब बातों का ध्यान छोड़कर इन चरणों की छवि को ह्रदय के नेत्रो से अर्थात ध्यान में देखना चाहिए।।13।।

विछुवनि की छवि कहा कहौ, उपजत रव रूचि दैन।
मनु शावक कल हंस के, बोलत अति मृदु बैन।।14।।

श्रीप्रिया जी के चरणों में धारण किए हुए बिछुओ की छवि को मैं कैसे वर्णन करू? उनमे से रुचिकारी शब्द निकलता रहता है जिसको सुनकर ऐसा मालूम होता है मानो कलहंस के बच्चे अत्यंत मृदु (कोमल) बोली बोल रहे हैं।।14।।

नख पल्लव सुठि सोहने, शोभा बढ़ी सुभाइ।
मानों छवि चन्द्रावली, कंज दलन लगि आइ।।15।।

व्याख्या::श्रीराधावल्लभलाल के चरणों के, नवीन कोपलों के समान लाल, सुन्दर नखों की शोभा सहज रूप से बढ़ी हुई है। उनको देखकर ऐसा मालूम होता है मानो छवि के चन्द्रमाओ की पंक्ति कमल के दलों में आकर लग गई है।।15।।

गौर वरन सांवल चरण, रचि मेंहदी के रंग।
तिन तरुवनि तर लुटत रहें, रति जुत कोटि अनंग।।16।।

श्रीयुगल के श्याम और गौर चरण मेहंदी के रंग से रँगे हुए है। इनके तलवो के नीचे रति सहित कोटि अंनग (कामदेव) लोटते रहते है।।16।।

अति सुकुमारी लाड़िली, पिय किशोर सुकुमार।
इक छत प्रेम छके रहै, अदभुत प्रेम विहार।।17।।

व्याख्या ::*लाड़िली श्री राधा अत्यन्त सुकुमारी है और उनके प्रियतम श्री श्यामसुन्दर भी किशोर अवस्था के सुकुमार है। ये दोनों अद्भुत प्रेमविहार में निमग्न रहकर अखण्ड प्रेम में छके रहते है।।17।।

अनुपम सांवल गौर छवि, सदा बसहु मम चित्त।
जैसे घन अरु दामिनी, एक संग रहै नित्त।।18।।

श्रीयुगल की अनुपम श्याम-गौर छवि मेरे ह्रदय में सदा उस प्रकार बसी रहे जैसे बादल और बिजली नित्य एक साथ आकाश में रहते है।।18।।

बरनै दोहा अष्टदस, युगल ध्यान रसखान।
जो चाहत विश्राम ध्रुव, यह छवि उर में आन।।19।।

व्याख्या :: श्री हित ध्रुवदास जी कहते है– मैंने श्रीयुगल का अत्यन्त रसपूर्ण ध्यान अठारह दोहो में वर्णन किया है। यदि परम् शान्ति प्राप्त करने की इच्छा है तो इस छवि को अपने ह्रदय में लाना चाहिए।।19।।

पलकनि के जैसे अधिक, पुतरिन सों अति प्यार।
ऐसे लाड़िली लाल के, छिन-छिन चरण संभार।।20।।

जैसे नेत्रो को पलको को पुतलियों से अत्यन्त प्यार होता है अर्थात जैसे पलक पुतलियों पर उनकी संभाल करते रहते है उसी प्रकार श्रीराधावल्लभलाल के चरणों को क्षण-क्षण में संभालना चाहिए अर्थात उनका स्मरण करना चाहिए।।20।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~14

दोउ जन भीजत अटके बातन।
सघन कुंज के द्वारे ठाड़े अंबर लपटे गातन।।
ललिता ललित रूप रस भीजी बूंद बचावत पातन।
जय श्री हित हरिवंश परस्पर प्रीतम मिलवत रतिरस घातन।।

व्याख्या :: श्रीहित वृन्दावन में वर्षा हो रही है और दोनों श्रीश्यामाश्याम सघन निकुन्ज के द्वार पर खड़े हुए बातों में अटके रहे है। वर्षा में भीग जाने के कारण उनके वस्त्र उनके श्रीअंगो से लिपटे हुए है। श्रीयुगल के कमनीय रूप-रस में भीगी हुई श्रीललिता जी कुंज के पत्तो को ठीक करके श्रीयुगल पर बूंदे न पड़ने देने के प्रयास में लगी हुई है।श्रीहित हरिवंश जी कहते है– अत्यन्त प्रिय श्री युगल प्रेम रस के घात-प्रतिघातों का आस्वादन कर रहे है और अपने भीगने का उन्हें रंचक भी ध्यान नही है।।

भोजन कुञ्ज में चलि आये।
जैसी ऋतु वैसी बैठक में, हित सौ लै बैठाये।।
भूषण वसन उतार उचित पुनि, औलाई पहिराये।
कुल्ला करि रुमाल पोंछि तब, निज दासी मन नैन सिराये।।

व्याख्या :: प्रिय सखियों के आग्रह पर श्रीराधावल्लभलाल भोजन कुञ्ज में पधारें है। जिस प्रकार की ऋतू -मौसम है उसी प्रकार का प्रेम से आसन बना कर उन्हें विराजित करती है।। आभूषण व् वस्त्र जो भी उचित लगे वह उतार कर पुनः औलाई धारण कराती है। मुख शुद्धि करा कर व् अंग वस्त्र से पोंछ कर ,तब फिर सखियाँ अपने मन के नेत्रो को शीतल कर रही है।।

मिली जेंवत लाडिलीलाल दोऊ षट विंजन चारु सवै सरसै।
मन की रस की रूचि जो उपजै सखी माधुरी कुञ्ज सबै परसै।।
हटके मन मोहन हारिरह्यौ भटु हाथ जिमावन कौ तरसै।
बीच ही कर कंपित छुटि परौ कबहुँ मुख ग्रास लियें परसै।।

व्याख्या:: श्रीलाडिलीलाल मिल कर भोजन कर रहे है, जहाँ छब्बीस प्रकार के सुन्दर मनोहर मुग्ध करने वाले रसपूर्ण व्यंजन है।श्रीयुगल के मन में रस पूर्ण जो रूचि कारक इच्छा होती है वही भोजन सामिग्री सखी माधुर्य के साथ कुञ्ज में परोस रही है।।संकोच व् मृदु स्वभाव के कारण श्री मोहन लाल मन रुकता है क्योंकि वह जैसे अपने हस्त कमल से भोजन खिलाने को तरस जाते है।बीच में उनका हाथ प्रेम में विह्ल हो कंपता हुआ छूट जाता है, कब मैं श्री प्रिया जी के मुख में ग्रास परोस सकूं।।

दृग सौ दृग जोर दोऊ मुस्काय भरे अनुराग सुधा बरसै।
मनों हार बिहार अहार करें तन में मनों प्राण परे करसै।।
सखी सौंज लिए चहुँ ओर खरी हरखे निरखे, दरसे , परसै।
सुख सिन्धु अपार कह्यौ न परै अवशेष सखी हरिवंश लसै।।

व्याख्या ::*नेत्रो से नेत्र मिलाकर श्रीयुगल मुस्करा रहे है उस समय प्रेम का अमृत बरष रहा है।मानो यह रसकेली क्रीड़ा आहार शरीर कर रहा और मानो प्राण शरीर से निकल कर एक-दूसरे के पास हो।। सखियाँ सभी सामिग्री लिए चारो ओर खड़ी है वे हर्षित है, ताकते हुए दर्शन कर रही है व् उन्हें परोस रही है। श्रीहित हरिवंश जी कहते है–यह सुख का समुद्र अपार है जो कहा नही जा सकता , शेष यही है कि सदा इसमें तैरते रहे।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~15

अली लै आई राजभोग के थार।
निखरी सखरी सामिग्री बहुबिधि रचि मधुर सलौनी विचार।।
दम्पति सन्मुख बैठी निज अलि, बीच धरयौ लै थार।
वे जैवति ये जिंवावती हित सों, कोऊ न मानत हार।।

व्याख्या :: सखियाँ सब राजभोग की थालियाँ सजा कर ले आयी है। पक्की व् कच्ची रसोई की बहुत प्रकार की सामिग्री की रचना मधुर कोमल विचार के साथ प्रस्तुत की है।।श्री युगल के पास उनकी निज सखियाँ बैठी है और मध्य में राजभोग की थालियाँ है।श्रीयुगल भोजन कर रहे है और यह सभी सखियाँ भोजन करा रही है और दोनों में से कोई भी प्रेम में कम नही है।।

प्रथम कौर प्यारी मुख दै पुनि, प्रीतम दै हँसि गारि।
मरम बिंधी बतियाँ बिच-बिच कहि, हँसत हँसावति नारि।।
कबहुँ कौर प्यारी निज अलि मुख, देत लेत अति प्यार।
सो प्रसाद लालन सब सहचरी, हँसि-हँसि देत उदार।।

व्याख्या :: श्री प्रीतम पहला ग्रास श्री प्रिया जी के मुख में देते है फिर हंसते हुए प्रसादी ग्रास लेते है। बीच-बीच में सखियाँ रहस्यपूर्ण उलझी हुई सी बातें करते हुए उन्हें हंसाती व् हंसती रहती है।। कभी श्री प्रिया जी अति प्यार से कौर (ग्रास) अपनी निजी सखियो को देती है व् स्वयम उनसे मुख में लेती है।वो प्रसाद हंस-हंस कर उदारता के साथ सब सखियाँ श्री लाडले को प्रदान करती है।।

ख्वाय प्याय अंचवन दै वीरी, प्रीतम लियो उगार।
बैठें आइ निज सिंहासन पै, निज दासी बलिहार।।

व्याख्या :: सखियो ने इस रस में डूबते श्री प्रीतम को खिलाने पिलाने के बाद आचमन करा कर पान की बड़ी प्रदान की और उन्हें उबारा।फिर सखियो ने आग्रह कर उन्हें अपने निज सिंहासन पर विराजमान कराया और इनकी इस लीला की सभी निज सखियाँ बलिहारी लेने लगी।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~16
राजभोग की आरती

नवल घन श्याम नवल वर राधिका,
नवल नव कुंज नवकेलि ठानी।
नवल कुसुमावली नवल सिज्या रची,
नवल कोकिल कीर भ्रंग गानी।।
नवल सहचरी व्रन्द नवल वीणा मृदङ्ग ,
नवल स्वर तान नव राग बानी।
(जै श्री) नवल गोपीनाथ हित नवल रसरीति सौ,
नवल हरिवंश अनुराग दानी।।

व्याख्या :: नवल श्रीघनश्याम और नवलाओ में श्रेष्ठ श्रीराधिका ने नवीन कुंज में नवीन प्रेम-केलि आरम्भ की है। नवल फूलों से नवीन सिज्या की रचना की गई है एवं नवीन कोकिल, कीर और भृमर गान कर रहे है। नवल सहचरियों का समूह नवल वीणा और मृदङ्ग बजा रहा है और नवीन स्वरों में नवीन तानें युक्त नवीन राग गा रहा है। नवल सहचरी भाव से भावित श्रीहित गोपीनाथ जी कहते है कि नवल श्रीहित हरिवंश जी नवीन रस रीति पूर्वक इस समय नवीन का दान कर रहे है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~17
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

श्रीराधा मेरे प्राणन हूँ ते प्यारी।
भूलि हू मान न कीजै सुन्दरि हौ तौ शरण तिहारी।।
नेक चितै हंसि बोलिये मोतें खोलिये घूंघट सारी।
जय श्रीकृष्णदास हित प्रीति रीति बस भर लई अंकन बारी।।1।।

व्याख्या:: (श्री श्यामसुन्दर जी प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी से कह रहे है कि) हे श्रीराधा, तुम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो। हे सुन्दरि! मैं तो सदैव तुम्हारी शरण में रहता हूँ अतः तुम्हे मुझसे भूलकर भी मान नही करना चाहिए। तुम अपने घूंघट को खोलो और मंद मुस्कान सहित मेरी ओर देखो। गोस्वामी श्रीकृष्णचन्द्र जी कहते है इतना कहने के बाद श्रीश्यामसुन्दर जी ने प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी को अपनी भुजाओं में भर लिया।।1।।

प्रीतम मेरे प्राणन हू तें प्यारौ।
निशिदिन उर लगाये रहौ हित सों नैक न करिहौ न्यारौ।।
देखत जाहि परम् सुख उपजत रूप रंग गुण गारौ।
जै श्रीकमलनयन हित सुनि प्रिय बैनन तन मन धन सब बारौ।।2।।

व्याख्या::*(इसके उत्तर में श्रीप्रिया जी ने प्रेम से गदगद स्वर में सखी से कहा कि) श्रीप्रियतम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मैं उनको सदैव ह्रदय से लगाये रहती हूँ और एक क्षण के लिए भी अलग नही करना चाहती। वे रूप-रंग एवं गुणों के समूह है और उनको देख कर मेरे ह्रदय में परम् सुख उतपन्न होता है। गोस्वामी श्रीहित कमलनयन जी महाराज कहते है कि श्रीप्रिया जी के मुख से ऐसे प्रेममय वचन सुनकर सखियों ने उन पर अपने तन, मन,धन को न्यौछावर कर दिया।।2।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~18
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

श्रीराधा मेरे प्राणन हूँ ते प्यारी।
भूलि हू मान न कीजै सुन्दरि हौ तौ शरण तिहारी।।
नेक चितै हंसि बोलिये मोतें खोलिये घूंघट सारी।
जय श्रीकृष्णदास हित प्रीति रीति बस भर लई अंकन बारी।।1।।

व्याख्य :: (श्री श्यामसुन्दर जी प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी से कह रहे है कि) हे श्रीराधा, तुम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो। हे सुन्दरि! मैं तो सदैव तुम्हारी शरण में रहता हूँ अतः तुम्हे मुझसे भूलकर भी मान नही करना चाहिए। तुम अपने घूंघट को खोलो और मंद मुस्कान सहित मेरी ओर देखो। गोस्वामी श्रीकृष्णचन्द्र जी कहते है इतना कहने के बाद श्रीश्यामसुन्दर जी ने प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी को अपनी भुजाओं में भर लिया।।1।।

प्रीतम मेरे प्राणन हू तें प्यारौ।
निशिदिन उर लगाये रहौ हित सों नैक न करिहौ न्यारौ।।
देखत जाहि परम् सुख उपजत रूप रंग गुण गारौ।
जै श्रीकमलनयन हित सुनि प्रिय बैनन तन मन धन सब बारौ।।2।।

व्याख्या ::(इसके उत्तर में श्रीप्रिया जी ने प्रेम से गदगद स्वर में सखी से कहा कि) श्रीप्रियतम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मैं उनको सदैव ह्रदय से लगाये रहती हूँ और एक क्षण के लिए भी अलग नही करना चाहती। वे रूप-रंग एवं गुणों के समूह है और उनको देख कर मेरे ह्रदय में परम् सुख उतपन्न होता है। गोस्वामी श्रीहित कमलनयन जी महाराज कहते है कि श्रीप्रिया जी के मुख से ऐसे प्रेममय वचन सुनकर सखियों ने उन पर अपने तन, मन,धन को न्यौछावर कर दिया।।2।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~19
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

प्रीतम तुम मेरे दृगन बसत हौ।
कहा भोर ह्वै पूछत हौ कै चतुराई करि जु हँसत हौ।।
लीजिये परखि सरूप अपनों पुतरिनमें प्यारे तुम ही लसत हौ।
वृन्दावन हितरूप बलि गई कुंज लड़ावत हिय हुलसत हौ।।3।।

व्याख्या :: (इसके बाद श्रीप्रिया जी ने अपने श्री प्रियतम को सीधा संबोधन करते हुए उनसे कहा कि) हे प्रियतम ! आप मेरे नेत्रो में निवास करते हो।( मुझको मानवती देखकर आप कभी-कभी अपने प्रति मेरी प्रीति पर सन्देह करके जो प्रश्न कर बैठते हो तो उससे मुझे ऐसा लगता है कि)या तो आप भोले बन कर ऐसा प्रश्न कर रहे हो या मन ही मन चतुराई पूर्वक हंस रहे हो। हे प्यारे! अपने प्रति अगर मेरी प्रीति देखनी है तो मेरे नेत्रो में अपने स्वरूप को पहिचान लीजिए क्योंकि मेरी पुतलियों में आप ही निवास कर रहे हो। आपका ह्रदय श्रीहित वृन्दावन में मेरा लाड़-दुलार करने में ही उल्लसित होता है, इस बात को देखकर मैं तुम्हारे ऊपर बलिहार होती रहती हूँ।।3।।

ऐसी करौ नव लाल रँगीलेजू चित्त न और कहूँ ललचाई।
जे सुख दुःख रहे लग देहसौ ते मिट जांहि और लोक बड़ाई।।
संगति साधु वृन्दावन कानन तव गुन गानन मांझ विहाई।
छवि कंज चरण तिहारे बसौ उर देहु यहै ध्रुव कौ ध्रुवताई।।4।।

व्याख्या :: (श्रीहित ध्रुवदास जी की विनती)हे नवलकिशोर! आप ऐसा कीजिए जिससे मेरा मन आपको छोड़कर अन्य किसी वस्तु की ओर आकृष्ट न हो। दूसरी बात मैं आप से यह मांगता हूं कि मेरे शरीर से जो सुख-दुःख लग रहे है वे मिट जाए तथा संसार की मान-प्रतिष्ठा के प्रति मेरे मन में कोई आकर्षण न रहे। तीसरी बात मैं यह चाहता हूँ की साधु स्वभाव रसिक जनों के साथ में मेरा श्रीहित वृन्दावन वास हो तथा मेरा समय आपके गुण गान में व्यतीत हो। मेरी अन्तिम याचना यह है कि आपके चरण कमल मेरे ह्रदय में सदैव निवास करते रहें। श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि मुझको आप यही ध्रुवता अर्थात स्थिरता प्रदान करें।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~20
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

शोभित आज रंगीली जोरी।
सुन्दर रसिक नवल मन मोहन अलबेली नव वयस किशोरी।।
वेशर उभय हंसन में डोलति सो छवि लेत प्राण चित चोरी।
हित ध्रुव मीन यह अखियाँ निरखत रूप प्रेमकी डोरी।।5।।

व्याख्या :: प्रेम रंग में रँगे रँगीले श्रीयुगल जोड़ी आज शोभा पर भी शोभा बनी हुई है।इस जोड़ी में परम् सुन्दर रसिक श्रीश्यामसुन्दर जी और नवीन अवस्था वाली अलबेली किशोरी श्री राधा जी है।।इस समय ये जोड़ी मन्द मुस्कान कर रही है जिसके कारण दोनों की नासिका में धारण की हुई बेसर चंचल बनी हुई है और यह छवि प्राण व् चित को चुरा रही है।श्रीहित ध्रुवदास जी कहते है– मेरे नेत्र जैसे मछली इस जोड़ी के छवि जाल में फंस के रह गए है और प्रेम स्वरूप श्रीराधावल्लभ लाल को परस्पर बांधने वाली रूप-प्रेम की डोरी को देख रहे है।।5।।

सहज स्वाभाव परयौ नवल किशोरी जू कौ, मृदुता दयालुता कृपालुता की राशि है।
नेक हू न रिस कहूँ भूलि हू न होत सखि, रहत प्रसन्न सदा हिए मुँख हासि है।
ऐसी है ललित प्यारी लाल जू की प्राणनप्यारी, धन्य धन्य धन्य तेई जिनके उपासि है।
हित ध्रुव और सुख देखियत जहँ लगि, सुनियत तँह लगि सबै दुःख पासि है।।6।।

व्याख्या :: नवल किशोरी श्रीराधा जी का सहज स्वभाव है कि वे कोमलता,दयालुता और कृपालुता की खदान है।हे सखि, उनको भूलकर भी कभी क्रोध नही आता।उनके मुख पर और ह्रदय में सदा मुस्कान छाई रहती है जिससे वे सदा प्रसन्न बनी रहती है।प्यारे श्रीश्यामसुन्दर की ऐसी प्राण प्यारी सुकुमारी श्रीराधा जिनकी आराध्या है वे भाग्यशाली अनेक बार धन्य है। श्रीहित ध्रुवदास जी कहते है- इन नित्यकिशोरी श्रीराधा के भजन-सुख को छोड़कर जो अन्य सुख देखे या सुने जाते है वे सब दुःख के जाल है।।6।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~21
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ।
बैठी रहौ कुंजन के कोने श्याम राधिका गाऊँ।।
जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढाऊँ।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत विमल विमल यश गाऊँ।।7।।

व्याख्या :: (श्री हित हरिराम व्यास जी की विनती) हे किशोरी जी! श्री राधा जी! में तो केवल आपके चरणों की रज धूल को ही प्राप्त करना चाहता हूँ।आप जब श्री निकुन्ज में विराजमान हो , वही कुंज के किसी कोने में बैठ कर में श्रीश्यामाश्याम का गान करू।।जिस चरण रज स्वयम श्री शिव जी व् श्री सनकादिक आदि ऋषि याचना करते है उस चरण रज को में अपने मस्तक पर धारण करना चाहता हूँ।हे स्वामिनी जी! ये व्यास आपकी निकुन्ज लीला के विमल रस को उसी उज्ज्वलता के साथ गाता रहे।।7।।

किशोरी मोहि अपनी करि लीजै।
और दिये कछु भावत नाही वृन्दावन रज दीजै।।
खग मृग पँक्षि जे या बन के चरण शरण रख लीजै।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत महल टहलनी कीजै।।8।।

व्याख्या :: हे किशोरी! श्री राधा जी! आप मुझे अपना बना लीजिये।मुझे आपने अपार दिया है परन्तु मुझे और कुछ लेना अच्छा नही लगता, मुझे तो आप श्रीहित वृन्दावन की रज प्रदान करें।। इस वन के जितने पशु-पक्षि है वे मुझे, आपकी कृपा से,अपने चरणों की शरण में रख लै। श्रीहित व्यासदास जी कहते है कि मुझे आप हे स्वामिनी! अपने महल की टहलनी बना लीजिए , जिससे मै आपकी छवि सदैव देखता रहूँ।।8।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~22
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

परम् धन राधा नाम अधार।
जाहि श्याम मुरली में गावत, सुमरत बारम्बार।।
वेद तंत्र अरु जन्त्र मन्त्र में, एहि कियौ निरधार।
सहचरि रूप धरयौ नँद नन्दन, तऊ न पायौ पार।।
श्रीशुक प्रगट कियौ नहि याते, जान सार कौ सार।
व्यासदास अब प्रगट बखानत, डार भार में भार।।9।।

व्याख्या :: मेरा परम् धन श्रीराधा नाम है जोकि मेरे प्राणों का आधार है।श्री श्यामसुन्दर अपनी मुरली में यही श्रीराधा नाम गाते है और बार-बार उनका सुमरन करते है।।वेद में, तंत्र ग्रन्थों में और जन्त्र- मन्त्र शास्त्र में यही श्रीराधा नाम का निर्धारण सर्व श्रेष्ठ मान कर किया गया है।श्री भगवान नँद- नन्दन ने अनेक अवतारों में अनेक रूप धारण किये किन्तु श्रीराधा नाम का पार नही पा सके।।श्रीमद्भागवत में श्रीशुकदेव जी ने इस नाम को अत्यन्त रहस्यमय समझ कर कही श्रीराधा नाम प्रगट रूप से उल्लेख नही किया।श्रीहित व्यासदास जी कहते है कि– मैने तो गोपनीयता के भार अपने सिर से उतारकर भाड़ में डाल दिया है और मैं अब श्रीराधा नाम की महिमा प्रगट रूप में वर्णन कर रहा हूँ।।9।।

ऐसो कब करिहौ मन मेरौ।
कर करुआ कामरि कांधे पै, कुंजन मांझ बसेरौ।।
ब्रजवासिन के टूक भूख में, घर घर छाछ महेरौ।
भूख लगै जब मांग खऊंगो, गनोँ न सांझ सबेरौ।।
रास विलास व्रत्त करपाऊँ, मेरे खूट न खेरौ।
व्यासदास होय वृन्दावन में, रसिक जनन को चेरौ।।10।।

व्याख्या :: हे श्रीवृन्दावनचंद्र ! मेरा ऐसा मन कब करंगे जब में हाथ में करूवा (मिट्टी का पात्र) और कन्धे पर कमरिया (छोटा कम्बल) रखकर श्रीहित वृन्दावन की कुन्जो में बस जाऊ।। जब मुझे भूख लगे तो में व्रजवासियों के घरों से रोटी का टुकड़ा, छाछ और महेरी (छाछ में बनाया हुआ बाजरे का दलिया) माँगकर भूख की शांति कर लूँ और सुबह-शाम की चिन्ता न करू अर्थात जब भी मधुकरी मिल जाय तभी अपनी उदर पूर्ति कर लूँ। मैं यह चाहता हूँ की आपका रास- विलास ही मेरे जीवन का एक मात्र आधार बन जाये, क्योंकि संसार में मेरा न कही घर है और न गांव अर्थात संसार की किसी वस्तु में मेरी आसक्ति शेष नही रह गई है। श्रीहित व्यासदास जी कहते है– अब तो मैं विदेही(देह की ममता शून्य) बनकर श्रीहित वृन्दावन में श्रीहरि-भक्तो का दास मात्र रह गया हूँ।।10।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~23
अथ संध्या भोग के पद

नमो-नमो जय श्रीहरिवंश।
रसिक अनन्य वेणुकुल मण्डन लीला मान सरोवर हंस।।
नमो (जयति) वृन्दावन सहज माधुरी रास विलास प्रसंश।
आगम निगम अगोचर राधे चरण सरोज व्यास अवतँश।।1।।

व्याख्या :: प्रारम्भ में मैं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी को अनेक बार नमस्कार करके उनका जय-जयकार करता हूँ वे अनन्त रसिक है, वेणुकुल मण्डन है अर्थात श्रीकृष्ण लीला का गान करने वाले सब महानुभावो के समूह के भूषण है और लीला रूपी मान सरोवर में क्रीड़ा करने वाले राजहंस है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र को नमस्कार करने के बाद मैं श्रीश्यामाश्याम के रास विलास में प्रशंसनीय बनी हुई श्रीहित वृन्दावन की सहज माधुरी को नमस्कार करता हूँ।श्रीहित व्यासदास जी कहते है– जिनके वास्तविक स्वरूप का परिचय न आगम ग्रन्थों में मिलता है, न वेदों में मिलता है और न पुराणों में मिलता है उन श्री राधा जी के चरण कमल मेरे कानों के भूषण है अर्थात मेरे कानों को इनका यश ही सबसे अधिक प्रिय है।।1।।

श्रीहरिवंश शरण जे आये।
श्रीव्रषभानु कुँवरि नँदनंदन निज कर अपनी चिठी चढाये।।
दियौ मुखराय कछु नहिं गोयौ किये मनोरथ मन के भाये।
श्रीव्यास सुवन चरणन रज परसत नागरीदास से रंक जिवावे।।2।।

व्याख्या :: जिन भाग्यशालियों ने श्रीहित हरिवंश जी की शरण ग्रहण की उनका नाम श्रीश्यामाश्याम जी ने अपने प्रेमियों की सूची में स्वयं अपने हाथ से लिख लिया। श्रीश्यामाश्याम जी ने उन शरणागत जीवो को अपने सहज सखी स्वरूप के दर्शन करा दिये, उनसे कुछ छिपाया नही तथा उनके मन- वांछित मनोरथ पूर्ण कर दिये।श्रीहित नागरीदास जी कहते है– श्रीव्यास नन्दन की चरणरज के स्पर्श से मेरे समान रंक(दीन-दुखी) भी जी उठे।।2।।

जिनके श्रीहरिवंश सहायक।
तेई सजन भजन अधिकारी वृन्दावन धन बसिवे लायक।।
अलक लड़े आनन्द भरे डोलै सिर पर व्यास सुबन सुखदायक।
कुँवरि कुँवर जाहि सुलभ नागरीदास रसिक शिरोमणि के गुण गायक।।3।।

व्याख्या :: जिन भाग्यशालियों के श्रीहरिवंशचन्द्र सहायक है वे ही श्रेष्ठ जीव भजन के अधिकारी है और सघन श्रीहित वृन्दावन में बसने योग्य है। वे कृपा पात्र जन आनन्द भरे चित्त से घूमते फिरते है क्योंकि उनके रक्षक सुखदायक श्रीव्यासनन्दन जी है। श्रीहित नागरीदास जी कहते है — व्यासनन्दन श्रीहित हरिवंशचन्द्र के गुणों का गान करने वाले जीवों को श्रीश्यामाश्याम सुलभ रहते है।।3।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~24
अथ संध्या भोग के पद

मेरे बल श्रीवृन्दावन रानी।
जाहि निरन्तर सेवत मोहन, वन विनोद सुख दानी।।
जिनकी चरण कृपा ते पाई, कुंज केलि रस सानी।
जय श्रीरूपलाल हित हाथ बिकानी, निधि पाई मनमानी।।4।।

व्याख्या :: श्रीहित वृन्दावन रानी मेरा एकमात्र बल है। श्रीहित वृन्दावन के लीला-विनोद का सुख देने वाले मदनमोहन श्रीश्यामसुन्दर उनका निरन्तर सेवन करते रहते है और उनके चरणों की कृपा से मैने रसमयी निकुन्ज क्रीड़ा पाई है। श्रीहित रूपलाल जी महाराज कहते है — मैं उनके हाथ बिक गया हूँ और मुझे मन वांछित निधि उनकी कृपा से मिल गई है।।4।।

रहौ कोउ काहू मनहि दिये।
मेरे प्राण नाथ श्रीश्यामा, शपथ करौ तृण छिये।।
जे अवतार कदम्ब भजत है, धरि दृढ़ व्रत जु हिये।
तेउ उमगि तजत मर्यादा ,वन विहार रस पिये।।
खोये रतन फिरत जे घर-घर, कौन काज ऐसे जिये।
जय श्रीहितहरिवंश अनत सचु नाही , बिनु या रजहि लिए।।5।।

व्याख्या :: कोई कही भी अपने मन को लगाये रहे, किन्तु मैं तो शपथ पूर्वक कहता हूँ की मेरे प्राणनाथ एकमात्र श्री श्यामा जी है। जो लोग दृढ़ता पूर्वक अनेक अवतारों का भजन करते है वे भी श्रीहित वृन्दावन के रसमयी प्रेमविहार रस का पान करके अपने मर्यादा-मार्ग का त्याग कर देते है। जो व्यक्ति हाथ में आये रत्न को खोकर घर-घर भीख मांगता फिरता है , उसके जीवन का कोई प्रयोजन नही होता। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी कहते है– श्रीहित वृन्दावन की रज प्राप्त किये बिना अर्थात श्रीहित वृन्दावन की शरण ग्रहण किये बिना कही अनत शान्ति नही मिलती।।5।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~25
अथ संध्या भोग के पद

हरि हम कब ह्वै है ब्रजवासी।
ठाकुर नन्द किशोर हमारे ठकुराइन राधा-सी।।
सखी सहेली नीकी मिलि हैं हरिवंशी-हरिदासी।
बंशीवट की शीतल छाया सुभग बहै जमुना-सी।।
जाकी वैभव करत लालसा कर मीड़त कमला सी।
इतनी आस व्यास की पुजबौ वृन्दा विपिन-विलासी।।6।।

व्याख्या :: (श्रीहित व्यासदास जी की ब्रज वास के लिये प्रार्थना।)
हे हरि ! हम कब व्रजवासी होंगे? अर्थात हमको ब्रज का वास कब मिलेगा? जहाँ हमारे स्वामी नन्दकिशोर श्रीश्यामसुन्दर जी और स्वामिनी कुँवर किशोरी श्री राधा जी होंगी।जहाँ श्रीहित हरिवंश जी व् श्री हरिदास जी जैसी भली सखी-सहेली मिलेंगी। जहाँ वंशीवट की शीतल छाया विराजमान रहती हो और सुन्दर स्वरूप में रसरानी श्रीयमुना जी बहती रहती हो। जिस ब्रज के प्रेमवैभव की लालसा करके श्री लक्ष्मी जी भी अपने हाथों को मलते हुए पछताती रहती है।श्रीहित व्यासदास जी कहते है– श्रीहित वृन्दावन में रास- विलास करने वाले हे श्रीश्यामाश्याम, मेरी इस आशा को पूर्ण करो।।6।।

अब मैं श्रीवृन्दावन धन पायौ।
राधेजू चरण शरण मन दीनों श्रीहरिवंश बतायौ।।
सोयौ हुतौ विषय मन्दिर में हित गुरु टेरि जगायौ।
अब तो व्यास बिहार विलोकत शुक नारद मुनि गायौ।।7।।

व्याख्या :: अब मैंने श्रीहित वृन्दावन रूपी धन प्राप्त किया है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु के उपदेश अनुसार मैंने श्री राधा जी के चरणों की शरण में अपना मन लगा दिया है।। मैं विषय- मन्दिर में सोया हुआ था, अर्थात विषय- वासना में फंसा हुआ था।मुझे श्रीहित गुरु (श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु) आवाज देकर जगा दिया है( श्रीहित नवलदास जी द्वारा श्रीहित चतुराशी जी का पद जब कानो में पड़ा तभी श्रीहित व्यास दास जी ,श्रीहित वृन्दावन ,श्रीहित जी महाराज के पास आये।)श्रीहित व्यासदास जी कहते है– अब तो मैं उस नित्य विहार के दर्शन करता हूँ, जिसका गान श्रीशुकदेव जी व् श्री नारद जी ने किया है।।7।।

प्यारी लागै श्रीवृन्दावन की धूरि।
राधेजू रानी मोहन राजा राज सदा भरपूरि।।
कनक कलश करुवा महमूदी खासा ब्रज कमरनि की चूर।
व्यासहि श्रीहरिवंश बताई अपनी जीवन मूरि।।8।।

व्याख्या :: मुझे श्रीहित वृन्दावन की धूल प्यारी लगती है।जहां श्री राधा जी रानी है, श्रीमोहन जी राजा है और उनका राज्य सदैव एक छत्र है।जहां मिटटी का करुवा सुवर्ण पात्र के समान है और ब्रज के कमरा (कम्बल) की चूर (टुकड़ा) ही महमूदी खासा (बादशाहों का खास वस्त्र, एक अत्यन्त मुलायम कपड़ा जिसको सर्वप्रथम महमूद नामक कारीगर ने बनाया था।)है।श्रीहित व्यासदास जी कहते है– श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु ने इस श्रीहित वृन्दावन की धूल को अपनी जीवन मूरि (जीवन प्रदान करने वाली जड़ी) बताया है।।8।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~26
अथ संध्या भोग के पद

आय बिराजे महल में, संध्या-समयौ जानि।
आलि ल्याई भोग सब, मेवा अरु पकवान।।
संध्या भोग अली लै आई।
पेड़ा खुरमा और जलेबी (लडुआ खजला और इमरती) मोदक मगद मलाई।।
कंचन थार धरे भरि आगे, पिस्ता अरु बादाम रलाई।
खात खवाबत लेत परस्पर हंसन दसन चमकन अधिकाई।।9।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभलाल संध्या समय जानकर महल में विराजमान हो गये और सखीगण अनेक प्रकार के मेवा व् पकवान उनके भोग के लिये लाई। सखीगण संध्या भोग ले आयी। इस भोग में उन्होंने श्रीयुगल को पेड़ा, खुरमा,जलेबी,लड्डू, खजला, इमरती, मगद के लड्डू और मलाई अर्पित की। सखियों ने इन सामिग्रीयों से सुवर्ण थाल भरकर श्रीयुगल के सामने रखें और जिन वस्तुओं में पिस्ता और बादाम मिल सकते थे उनमें वे मिला दिये। श्रीयुगल एक दूसरे को हंसते हुए खिला रहे है और उनके हंसने से उनकी दन्तावली की चमक प्रगट हो रही है।।9।।

अदभुत मीठे मधुर फल, ल्याई सखी बनाय।
खवावत प्यारे लालको, सु पहिले प्रियहि पवाय।।10।।

पाणि परस मुख देती बीरी पिय तिय तन नयनन में मुसिकाई।
ललितादिक सखी कमलनयन हित दिन मानत आपनो माई।।

व्याख्या :: इसके बाद सखियाँ अदभुत मीठे मधुर फल बनाकर ले आई और पहले श्री प्रिया जी को खिलाकर बाद में श्रीप्रियतम को खिला दिये।।10।।

भोग लगने के बाद, सखियों ने श्रीप्रिया जी को खिलाने के लिये श्री लाल जी के हाथ में पान लगाकर दिया और श्रीलाल जी ने श्रीप्रिया जी के अधरों का स्पर्श करते हुए उनके मुख में पान दिया तब श्रीप्रिया जी नेत्रो में मुस्काई। श्रीहित कमलनयन जी कहते है–श्रीप्रिया जी की मधुर मुस्कान देखकर श्री ललिता जी आदि सखियों ने अपने जीवन के उन क्षणों को धन्य माना।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~27
अथ संध्या भोग के पद

पाग बनी पटका बन्यौ, बन्यौ लाल को भेष।
श्रीराधावल्लभलाल की, सु दौरि आरती देख।।12।।

व्याख्या ::पगड़ी और पटका सहित श्रीराधावल्लभलाल का सुन्दर वेश बना है। उनकी संध्या आरती का दौड़कर दर्शन करना चाहिए।।।12।।

अथ श्री संध्या आरती

आरती कीजै श्याम सुन्दर की, नन्द के नन्दन राधिकावरकी।
भक्ति कर दीप प्रेम कर बाती, साधु संगति करि अनुदिनराती।।
आरति ब्रजयुवति यूथ मनभावै,श्यामलीला श्रीहरिवंश हितगावै।
आरति राधावल्लभलालकी कीजै, निरखि नयनछवि लाहौलीजै।।
सखि चहूँओर चँवर कर लीये, अनुरागन सों भीने हीये।
सनमुख वीणा मृदङ्ग बजावै, सहचरि नाना राग सुनावै।।
कंचनथार जटित मणि सोहै, मध्य बर्तिका त्रिभुवन मोहै।
घण्टा नाद कह्यौ नहि जाई, आनन्द मंगल की निधि माई।।
जयति-जयति यह जोरी सुखरासी, जय श्री रूपलाल हितचरण निवासी।
आरति राधावल्लभलालकी कीजै, निरखि नयनछवि लाहौलीजै।।

व्याख्या :: नन्दनन्दन राधिका पति श्रीश्यामसुन्दर की आरती करनी चाहिए।आरती में प्रेम की बत्ती डालकर भक्ति का दिपक रखना चाहिए और उसको प्रतिदिन साधु पुरुषों के संग के द्वारा जलाना चाहिए।इस प्रकार से तैयार की हुई आरती ब्रज युवतियों के समूह को प्रिय लगती है और इस प्रकार की आरती को देखकर श्रीहित हरिवंश श्रीश्यामाश्याम की लीला का गान करने लगते है।सखियाँ चारो ओर चंवर लिए खड़ी है और उनके ह्रदय प्रेम से भीगे हुए है। कई सखियाँ श्रीश्यामाश्याम के सामने बैठकर वीणा और मृदङ्ग बजा रही है और कई नाना प्रकार के राग सुना रही है।मणि-जटित सुवर्ण के थाल में आरती की बत्तियां त्रिभुवन को मोहित कर रही है। आरती के समय घण्टे का जो शब्द हो रहा है वह आनन्द मंगल की निधि है, उसका वर्णन नही किया जा सकता।श्रीहित रूपलाल जी महाराज कहते है–सुख की राशि श्रीयुगल की जय हो, मैं उनके चरणकमलो में निवास करता हूँ।श्रीराधावल्लभलाल की आरती चाहिए और उनकी छवि को देखकर नेत्रो को लाभान्वित करना चाहिए।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~28
अथ स्तुति के दोहा

चन्द्र मिटे दिनकर मिटै, मिटै त्रिगुण विस्तार।
दृढ़ व्रत श्रीहरिवंश कौ, मिटै न नित्य विहार।।1।।

जोरी युगल किशोरी की, और रची विधि बाद।
दृढ़ व्रत श्रीहरिवंश कौ, निबह्यौ आदि युगादि।।2।।

व्याख्या :: चाहे चंद्रसूर्य मिट जाये तथा त्रिगुण का विस्तार रूप यह सम्पूर्ण सृष्टि नष्ट हो जाये किन्तु सुदृढ़ व्रत वाले श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी का नित्य विहार अस्त नही होगा।(इसका कारण यह है कि श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ने श्रीश्यामाश्याम जी के जिस नित्य विहार का प्रचार संसार में किया वह सहज रूप से त्रिगुण से परे स्थित है और इसलिए चन्द्र-सूर्य अथवा त्रिगुण-जनित सम्पूर्ण सृष्टि के नष्ट होने से उस पर कोई प्रभाव नही पड़ता)।।1।।

नित्य विहार वाले युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम की जोड़ी की रचना श्री ब्रह्मा जी के द्वारा नही की गयी है अर्थात श्री ब्रह्मा जी की बनाई हुई जोड़ियों से वह सर्वथा भिन्न है।इसीलिए श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी का, नित्यविहार के भजन का, सुदृढ़ व्रत अनादि-अनन्त निर्वाह होता चला आया है।।2।।

निगम ब्रह्म परसत नही, जौ रस सबते दूरि।
कियौ प्रकट हरिवंशजू, रसिकन जीवन मूरि।।3।।

रूप बेलि प्यारी बनी, सु प्रीतम प्रेम तमाल।
दोऊ मन मिलि एकै, भये श्रीराधावल्लभलाल।।4।।

व्याख्या :: उपनिषदों में जिसके स्वरूप का वर्णन किया है वह ब्रह्म भी जिसका स्पर्श नही कर पाता वह रस तत्व सर्वथा अप्राप्य (प्राप्त न होने योग्य) बना हुआ था। श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ने पृथ्वी पर प्रकट होकर रसिक जनों के जीवन सर्वस्व उस तत्व को संसार में प्रकट किया।।3।।

(अब इस रस तत्व के प्रकट स्वरूप श्रीराधावल्लभलाल का परिचय देते हुए कहते है कि) प्यारी श्रीव्रषभान नन्दिनी रूप-सौन्दर्य की लता है और प्रियतम श्रीनँदनन्दन प्रेम के तमाल है।श्रीराधावल्लभलाल के रूप में इन दोनों के मन मिलकर एक हो रहे है।।4।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~29
अथ स्तुति के दोहा

निकसि कुंज ठाढ़े भये, भुजा परस्पर अंश।
श्रीराधावल्लभ मुखकमल, निरखि नयन हरिवंश।।5।।

व्याख्या :: (अब इन अदभुत श्रीराधावल्लभ लाल के दर्शन प्राप्त करने का उपाय बतलाते हुए कहते है कि) जो श्रीराधावल्लभ लाल परस्पर अंसो (कंधों) पर भुजा डाले हुए निकुन्ज मन्दिर के द्वार पर खड़े हुए है उनके मुख-कमल के दर्शन श्रीहितहरिवंशचन्द्र जी के नेत्रो से करने चाहिए अर्थात उनकी लिखी वाणी के प्रकाश में उन्हें देखना चाहिए।।5।।

रे मन श्रीहरिवंश भज, जो चाहत विश्राम।
जिहि रस बस ब्रजसुन्दरिन, छाँड़ि दिये सुखधाम।।6।।

व्याख्या :: हे मन! यदि तेरी इच्छा विश्राम प्राप्त करने की है तो हरि की वंशी के अवतार श्रीहितहरिवंश चन्द्र जी का भजन कर, जिस वंशी के रस के वश में होकर ब्रज की गोपिकाओं ने अपने ग्रहस्थ के सम्पूर्ण सुखों का त्याग कर दिया था।।6।।

निगम नीर मिलि एक भयो, भजन दुग्ध सम स्वेत।
श्रीहरिवंश हंस न्यारौ कियौ, प्रकट जगत के हेत।।7।।

व्याख्या :: श्री हित हरिवंश चन्द्र जी के अवतार ग्रहण करने के पूर्व भक्ति रूपी दूध में वैदिक कर्मकाण्ड रूपी पानी मिलकर उसी के समान सफेद बन गया था और उसको भक्ति रूपी दूध से अलग करना नितांत कठिन हो गया था। श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी रूपी हंस ने जगत के कल्याण के हेतु प्रकट होकर वैदिक कर्मकाण्ड रूपी पानी को भक्ति रूपी दूध से अलग कर दिया।।7।।

श्रीराधावल्लभ लाड़िली अति उदार सुकुमारि।
ध्रुव तो भूल्यौ ओर ते तुम जिन देहु बिसारि।।
तुम जिन देहु बिसारि ठौर मौको कहु नाही।
पिय रंग भरी कटाक्ष नेक चितवो मो माही।।
बढ़ें प्रीति की रीति बीच कछु होय न बाधा।
तुम हौ परम् प्रवीण, प्राण बल्लभ श्री राधा।।8।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभ लाल की लाड़िली अति उदार सुकुमारी श्री राधा जी! मैं तो आरम्भ से ही भुला हुआ हूँ किन्तु आप मुझे न बिसराना (भूल कर भी अलग),क्योंकि अगर आपने मुझे बिसरा दिया तो मुझे अन्यत्र कही भी ठहर ने की जगह नही है।आप अपने प्रियतम के रंग से भरी हुई अर्थात प्रेम विहार रस से पूर्ण चितवन से थोड़ा मेरी ओर देखिये।जिससे मेरे ह्रदय में प्रीति की रीति की व्रद्धि हो और उसमें कोई भी बाधा न पड़े।क्योंकि ,हे प्राण प्रिय श्रीराधा जी ,आप परम् प्रवीण हो।।8।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~30
अथ स्तुति के दोहा

बिसरिहौ न बिसारिहौ यही दान मोहि देहु।
श्रीहरिवंश के लाड़िले मोहि अपनी कर लेहु।।9।।

व्याख्या :: श्रीहित हरिवंश जी के लाड़िले हे श्रीराधावल्लभलाल ! आप मुझको यह वरदान दीजिए कि न तो कभी मेरे द्वारा आप भुलाये जायेंगे और न कभी आप मुझे भूलेंगे और इस प्रकार मुझे आप अपना बना लीजिये।।9।।

कैसौउ पापी क्यों न हो श्रीहरिवंश नाम जो लेय।
अलक लड़ेती रीझि कै महल खवासी देय।।10।।

व्याख्या :: कोई कैसा भी पापी क्यों न हो यदि वह श्री हित हरिवंश नाम लेता है तो उस पर रीझ कर लड़ेती श्री राधा जी उसे अपने महल की दासी बना लेती है।।10।।

महिमा तेरी कहा कहूँ श्रीहरिवंश दयाल।
तेरे द्वारे बटत हैं सहज लाड़िली लाल।।11।।

व्याख्या :: हे परम् दयालु श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ! आपकी महिमा का वर्णन कोई क्या कर सकता है? क्योंकि आपके द्वार से सहज लाडिली लाल श्रीराधावल्लभलाल का दान होता है अर्थात जो आपका नाम लेते है उनको आप श्रीराधावल्लभलाल के प्रेम का दान कर देते है।।11।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~31
अथ स्तुति के दोहा

सब अधमन कौ भूप हों नाहिन कछु समझन्त।
अधम उधारन व्यास सुत यह सुनिके हर्षन्त।।12।।

व्याख्या :: यदि कोई जीव व्यास सुत श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के सामने सच्चे ह्रदय से कहता है कि मैं सब अधमो का सिरताज हूँ और बुद्धिहीन हूँ तो अधमो का उद्धार करने वाले श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी इस बात को सुनकर प्रसन्न होते है।।12।।

बन्दौ श्रीहरिवंश के चरण कमल सुख धाम।
जिनकौ वन्दत नित्य ही छैल छबीलो श्याम।।13।।

मैं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के उस सहज सखी स्वरूप के सुखदाई चरण कमलों की वन्दना करता हूँ जिनका नित्य वंदन छैल छबीले श्रीश्यामसुन्दर करते है।(श्रीमदराधासुधानिधि में एवं वाणी ग्रन्थों में सर्वत्र श्रीराधा जी की कृपा प्राप्त करने के लिए श्रीश्यामसुन्दर को सखी जनों की चाटुकारिता (खुशामद)करते दिखाया गया है)।।13।।

श्रीहरिवंश स्वरूप कौ मन वच करौ प्रणाम।
सदा सदा तन पाइये श्री वृन्दावन धाम।।14।।

व्याख्या :: मैं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के स्वरूप को सनातन (नित्य) श्रीहितवृन्दावन धाम की प्राप्ति के लिए मन और वाणी से प्रणाम करता हूँ।।14।।

जोरी श्रीहरिवंश की श्रीहरिवंश स्वरूप।
सेवक वाणी कुंज में विहरत परम् अनूप।।15।।

श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी की जोड़ी श्रीश्यामाश्याम और स्वयं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी सेवकवाणी रूपी कुंज में परम् अनुपम बिहार करते रहते है।।15।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~32
अथ स्तुति के दोहा

करुणानिधि अरु कृपानिधि श्रीहरिवंश उदार।
वृन्दावन रस कहन कौ प्रगट धरयौ अवतार।।16।।

व्याख्या :: करुणानिधि, कृपानिधि और कृपा करने में परम् उदार श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ने श्रीहित वृन्दावन रस (नित्य विहार रस) के कथन के लिए पृथ्वी पर प्रकट रूप से अवतार धारण किया है।।16।।

हित की यहां उपासना हित के है हम दास।
हित विशेष राखत रहौ चित नित हितकी आस।।17।।

व्याख्या :: हमारे यहाँ हित की उपासना है, हित के हम दास है, प्राणिमात्र के प्रति अपने चित्त में विशेष हित रखते है तथा नित्य हित की ही आशा लगाये रहते है।।17।।

हरिवंशी हरि अधर चढ़ि गूँजत सदा अमन्द।
दृग चकोर प्यासे सदा पाय सुधा मकरन्द।।18।।

व्याख्या :: श्रीहरि की वंशी श्रीहरि के अधरों पर चढ़कर श्रीराधानाम का उच्च स्वर से सदा गुंजार करती रहती है। इस गुंजार में से जो नामामृत श्रवित हो रहा है उसके पराग का पान करके रसिकजनों के नेत्र सदैव प्यासे अर्थात अतृप्त बने रहते है(नाम और रूप का अभेद होने के कारण नाम-गुंजार में से रसिकजनों को श्रीराधा रूप की स्फूर्ति हो जाना स्वाभाविक है और उसके दर्शन से उनकी कभी तृप्ति नही होती)।।18।।

श्रीहरिवंशहि गाय मन भावै यश हरिवंश।
हरिवंश बिना न निकसिहौ पद निवास हरिवंश।।19।।

व्याख्या :: हे मेरे मन ! तू श्री हित हरिवंश चन्द्र जी का गानकर क्योंकि मुझे श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी का यश ही अच्छा लगता है।मैं अपने सुख से श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के नाम को छोड़कर अन्य कुछ कहना नही चाहता और श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के चरणकमलो में ही निवास करना चाहता हूँ अर्थात स्थित रहना चाहता हूँ।।19।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~33
स्तुति के पद

दीजै श्री वृन्दावन वास।
निरखूं श्रीराधबल्लभलाल लाल कौ,
लड़ेंती लाल कौ,
यह जोरी मेरे जीवन प्राण,
निरखूं श्रीराधबल्लभलाल कौ,
लड़ेंती लाल कौ।
मोर मुकुट पीताम्बर उर वैजन्ती माल निरखूं ०।।
यमुना पुलिन वंशीवट सेवाकुंज निज धाम।
मण्डल सेवा सुख धाम,मान सरोवर बादग्राम।।निरखूं०।।
बंशी वजावै प्यारो मोहना, लै लै राधा राधा नाम,लै लै प्यारी प्यारी नाम।।निरखूं०।।
देखो या व्रज की रचना नाचै नाचै युगल किशोर, नाचै नाचै नवलकिशोर ।।निरखूं०।।
चन्द्र सखी कौ प्यारौ।।
श्री राधाजू कौ प्यारौ।।
गोपिन को प्यारौ।।
बिरज रखवारौ।।
श्रीहरिवंश दुलारौ।।
दर्शन दीजो दीनानाथ, ऐ जी दर्शन दीजो हितलाल।।निरखूं०।।
यह जोरी मेरे जीवन प्राण।।निरखूं०।।
श्रीराधाबल्लभलाल कौ, लड़ेंती लाल कौ।।निरखूं०।।

व्याख्या :: स्पष्ट है।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~34
स्तुति के श्लोक

श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी कृत

-: श्रीमदराधासुधानिधि से उद्धरत :-

प्रीतिं कामपि नाममात्र जनित प्रोद्दामरोमोदगमां।
राधा माधवयो: सदैव भजतो: कौमार एवोज्वलाम।।
व्रन्दारण्य नव प्रसून निचया नानीय कुंजान्तरे।
गूढ़ शैशव खेलनैर्वत कदा कार्यो विवाहोत्सव:।।1(56)।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभलाल की प्रीत अवर्चनीय (कही नही जा सकती)है,केवल नाम लेने से ही रोम-रोम में उतपन्न अवाध (ना रूकने वाली) प्रेम होता है।श्रीराधामाधव युगल का भजन ध्यान हमेशा कुमार अवस्था के उज्ज्वल रूप में ही होता है।।श्रीहित वृन्दावन की रमणीय भूमि पर नवीन पुष्पो का चयन करके नाना प्रकार की कुन्जो की रचना बनी हुई है। इनके गुप्त बाल विनोदमय लीला खेल में कब मेरे द्वारा विवाह उत्सव रचा जायेगा।।1(56)।।

साभ्रूनर्तन चातुरी निरुपमा सा चारु नेत्रांचले।
लीला खेलन चातुरी वरतनो तादृग वचष्चातुरी।।
संकेतागम चातुरी नव नव क्रीड़ा कला चातुरी।
राधाया जयतातसुखीजन परीहाहोत्सवे चातुरी।।2(63)।।

व्याख्या :: कमनीय अंग वाली श्रीराधा जी की वह अनुपम भृकुटि नचाने की कुशलता, वह मनोहर नेत्र प्रान्त के लीला पूर्वक संचालक की निपुणता, वह वचन रचना की अनिवर्चनीय चातुरी, संकेत स्थान में आगमन की चातुरी, नवीन-नवीन क्रीड़ा कला की चातुरी और अपनी सखी जन के मध्य में हास-परिहास की चातुरी की जय हो।।2(63)।।

गौरांगे म्रदिमास्मिते मधुरिमा नेत्रांचले द्राघिमा।
वक्षओजे गरिमा तथैव तनिमा मध्ये गतौ मंदिमा।।
श्रोन्यां च प्रथिमा भ्रुवो: कुटिलमा विंबाधरे शोणिमा।
श्रीराधे हर्दिते रसेन जडिमा ध्यानेsस्तुमे गोचर:।।3(174)।।

व्याख्या :: हे श्रीराधा जी! आपके गौर अंगो की मृदुता, मंद हास की माधुरी, नेत्र प्रान्त की विशालता,उरोजों की गुरुता तथा कटि प्रदेश की कृशता, चाल की मंदता और नितंबो की स्थूलता, भृकुटि की वक्रता, अधरों की लालिमा(तथा आपके) ह्रदय में रस की (जो) स्तब्धता है (वह) मेरे ध्यान का विषय बने।।3(174)।।

जाग्रतस्वपन सुषुप्तिषु ।
स्फुरतुमें राधापदाब्जच्छटा।
वैकुण्ठे नरकेथवा मम गतिर्नान्यस्तु राधांविना।।
राधाकेलि कथा सुधांबुधि महा वीचीभिरांदोलितं।
कालिन्दी तट कुंजमन्दिर वरा लिंदे मनों विंदतु।।4(164)।।

व्याख्या :: जाग्रत,स्वपन और सुषुप्त तीनो अवस्थाओं में मेरे ह्रदय में श्रीराधा चरणकमल की छटा स्फुरित होती रहे, वैकुण्ठ लोक अथवा नरक में श्रीराधा जी के बिना मेरा अन्य कोई आश्रय न हो।(अपने प्रियतम के साथ) श्रीराधा जी की क्रीड़ा-कथा रूपी अमृत सागर की महान तरंगों में झकोरे खाता हुआ मेरा मन यमुना तट पर स्थित निकुन्ज मन्दिर के श्रेष्ठ आँगन में आनन्द पाता रहे।।4(164)।।

यदगोविंद कथा सुधारस ह्रदे चेतोमया जंरभितम।
यद्वा तद्गुण कीर्तनार्चन विभूषाधैर्दिन प्रापितम।।
यद्यतप्रीतिरकारि तत्प्रिय जनेष्वात्यन्तिकी तेनमे।
गोपेन्द्रात्मज जीवन प्रणयिनी श्रीराधिका तुष्यतु।।5(114)।।

व्याख्या :: श्रीगोविन्द के कथामृत रूप सरोवर में मैने जो अपने चित्त को डुबाया है अथवा गुणगान, पूजन, श्रंगार-सेवा आदि में जो काल व्यतीत किया है अथवा उनके प्रियजनों के प्रति अत्यन्त बढ़ी हुई जो प्रीति की है, उस सबके फल स्वरूप गोपराजकुमार श्रीश्यामसुन्दर की प्राण प्रिया श्रीराधा जी मुझ पर प्रसन्न हों।।5(114)।।

चन्द्रास्ये हरिणाक्षि देव सुनसे शोणाधरे सुस्मिते–चिल्लक्ष्मी
भुज वल्लिकम्बुरुचिर ग्रीवेगिरिन्द्रस्तानि।।
भन्जनमध्य व्रहन्नितम्ब कदली खण्डोंरूपादाम्बुज–प्रोनमीलन्नख
चन्द्रमण्डलि कदा राधेमया राध्यसे।।6(116)।।

व्याख्या :: हे चन्द्रमुखी, हे मृगनयनी, हे देवी (प्रकाशवती), हे सुन्दर नासिका वाली, लाल अधरों वाली, मन्द हंसने वाली, दिव्य शोभा युक्त भुजलता वाली, शुभ्र शंख जैसे कंठवाली, उन्नत कुच मण्डल वाली, कृश उदर वाली, स्थूल नितंब वाली, कदली खंभ के समान (सुढार) जंघा वाली, तथा जिनके नखचन्द्र मण्डलों में से प्रकाश की किरणें निकलती रहती है ऐसी श्री राधा जी, मैं कब आपकी आराधना करूँगा?।।6(116)।।

राधापाद सरोज भक्तिमचला मुदवीक्ष्य निष्कैतवां–प्रीतस्वं
भजतोपि निर्भर महाप्रेम्णाधिकम सर्वशः।।
आलिंगत्यथ चम्बुतिस्ववदना ताम्बूलमा स्येर्पये–तकण्ठेस्वां
वनमालि कामपि मम न्यस्येत्कथा मोहन:।।7(117)।।

व्याख्या :: श्री राधा जी के चरनकमलो में मेरी निष्कपट एवं निश्चल भक्ति।व् अपने निज भक्त से भी अधिक प्रीति करते हुए मुझ पर महा प्रेम प्रकट करते हुए सर्व आधारित होकर। मेरा आलिंगन तथा चुम्बन करंगे तथा अपना स्वाद लिया हुआ ताम्बूल मेरे मुख को प्रदान करंगे।मेरे कण्ठ में अपनी प्रसादी वनमाला श्री मोहन लाल जी कब मुझे प्रदान करंगे?।।7(117)।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~35
स्तुति के श्लोक

राधानाम सुधरसं रसयितुं जिव्ह्या तु मेविह्वला–
पादौ तत्पदकांकितासु चरतां व्रन्दाटवीवीथिषु:।।
तत्कर्मेव कर: करोतु ह्रदयं तस्या: पदंध्यायता–
त्तमदावोत्सवत: परं भवतुमें तत्प्राणनाथे रति:।।8(141)।।

व्याख्या :: अमृत रस से भरे हुए श्रीराधा नाम के रसास्वाद के निमित्त मेरी रसना व्याकुल बनी रहे। मेरे पग उनके चरणों से चिन्हित श्रीहित वृन्दावन की गलियों में विचरण करते रहे। (मेरे) हाथ उन्ही के (श्री राधा जी के) निमित्त कर्म करें, मेरा ह्रदय उन्ही का ध्यान करे और उनके (श्रीराधा जी के) भाव चाव के साथ – साथ उनके प्राणनाथ (श्रीश्यामसुन्दर जी) में मेरी प्रीति हो।।8(141)।।

व्रन्दारण्यनिकुंज सीमासुसदा स्वानँग रंगोत्सवै–
र्माद्यत्यदभुत माधवाधर सुधामाध्वीक संस्वादनै:।।
गोविन्दप्रिय वर्ग दुर्गम सखी व्रन्दैरनालक्षिता–
दास्यंदास्यति मेकदानु कृपया व्रन्दावनाधीश्वरी।।9(128)।।

व्याख्या :: सदा (नित्य) श्रीहित वृन्दावन की रमणीय निकुन्ज परिधि में विलास-रास के विभिन्न रंगों के उत्सवों में रहने वाली,श्रीश्यामसुन्दर के अदभुत अधरों के अमृत का पान कर स्वाद में आनन्द मत्त रहने वाली।श्रीगोविन्द जी के प्रिय परिकर समूह में दुर्गम -दुर्लभ श्रीहितवृन्दावन सखी गुणों में अलक्षित,श्रीहित वृन्दावन की एक-मात्र स्वामिनी (श्रीराधा जी) क्या कभी कृपा कर मुझे दासों के भी दास (कैंकर्य) बना अपनायेगी।।9(128)।।

श्रीगोपेन्द्र कुमार मोहन महा विद्यएस्फुरन्माधुरी–
सारस्फाररसांबुराशि सहज प्रस्यन्दि नेत्रांचले।।
करुण्यार्दकटाक्षभंगि मधुर स्मेरानना भोरुहे–
हाहास्वामिनी राधिके मयि कृपा दृष्टि मनाद्गीक्षिपि।।10(188)।।

व्याख्या :: श्री गोपो के स्वामी कुमार श्रीश्यामसुन्दर का भी मोहन करने की महाविद्या रसमाधुरी का झरना चलाने वाली,उस रस झरने की रसों की राशि केवल सहज नेत्रों के भावभंगिमा देखने में ही हो जाती है।हे करुणा समुद्र तिरक्षे नेत्रो की स्वामिनी! मधुर नेत्र भंगिमा के साथ परिचालन विशेष शोभा व् भावों में पूजनीय है,हा हा करता हूँ आपकी शरण में हूँ स्वामिनी श्री राधा जी मुझ पर भी तनिक कृपा दृष्टिपात कीजिये।।10(188)।।

धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतांकितदव्रथा वार्त्तया–
सैकान्तेश्वर भक्तियोगे पदवीत्वारोपिता मुर्ध्दनि।।
यो वृन्दावन सीम्नि कश्चनघनाश्चर्य: किशोरीमणि–
स्ततकैकर्यरसामृतादिहपरं चित्तेन मे रोचते।।11(77)।।

व्याख्या :: धर्म , अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार पुरषार्थो की जय हो अर्थात जो लोग इनमें विश्वास रखते है, वे रखे रहै, हम तो उनकी चर्चा को भी व्यर्थ मानते है।ईश्वर के प्रति एकान्त भक्ति योग को भी हम सिर माथे चढ़ाते है किन्तु उससे भी हमको क्या लेना-देना है? हमारे चित्त को तो श्रीहितवृन्दावन की सीमा में विराजमान किसी महान आश्चर्य रूपा नवकिशोरी के दास्य रस के अतिरिक्त और कुछ भी अच्छा नही लगता।।11(77)।।

प्रेम्ण: सन्मधुरोज्ज्वलस्य ह्रदयं श्रंगार लीलाकला–
वैचित्रीपरमावधिर्भगवत: पूज्यैव कापीशता।।
ईशानी च शची महा सुख तनु: शक्ति: स्वतन्त्रापरा–
श्रीव्रन्दावननाथपटमहिषी राधैव सेव्या मम।।12(78)।।

व्याख्या :: प्रेम की श्रेष्ठतम जो मधुर उज्ज्वल श्रंगार लीला कला की स्वामिनी श्री लाल जी के ह्रदय में रहती है,वह विचित्रता की परम (चरम) सीमा है पूजनीया कोई अवर्चनीय ईश्वरी है भगवान श्रीकृष्ण की।श्री पार्वती जी और श्री इन्द्राणी जी अतिशय सुख स्वरूप वाली विग्रह है परन्तु ये स्वतंत्र पराशक्ति है,श्री वृन्दावन स्वामी के साथ सिंहासन पर आरूढ़ होने वाली रानी वह श्रीराधा जी का ही में सेवक हूँ।।12(78)।।

यज्जाप: सक्रदेव गोकुलपते राकर्षकस्तत्क्षणा–
द्यत्र प्रेमवतां समस्त पुरुरुषार्थपुस्फुरे तुच्छता।।
यन्नामांकित मन्त्र जापन पर: प्रीत्या स्वयं माधव–
श्रीकृष्णोपि तदद्भूतंस्फुरतुमे राधेति वर्ण द्वयम।।13(94)।।

व्याख्या :: जिसका एक बार भी उच्चारण गोकुलपति श्रीकृष्ण का तत्काल आकर्षण कर लेता है, जिसके प्रेमियों को समस्त पुरुषार्थो के प्रति तुच्छ बुद्धि हो जाती है, श्रीकृष्ण जी भी स्वयम प्रीति पूर्वक जिस नाम से अंकित मंत्र का जप करते है, वे अदभुत दो अक्षर “रा-धा” मेरे ह्रदय में स्फुरित हो।।13(94)।।

कालिन्दी तट कुञ्ज मन्दिर गतो योगीन्द्र वद्यत्पद–
ज्योतिधर्यान पर: सदा जपतियां प्रेमाश्रुपूर्णो हरि:।।
केनाप्यदभुतमुल्लसदृति रसा नँदेन संमोहिता–
सा राधेति सदा ह्रदिस्फुरतुमे विद्यापरा द्वयक्षरा।।14(95)।।

व्याख्या :: श्री यमुना तट वर्ती निकुन्ज–भवन में विराजकर प्रेम-अश्रुओ से भीगे हुए श्रीहरि, श्री शिव आदि योगीश्वरो की तरह, जिनकी चरण–ज्योति के ध्यान में तत्पर होकर जिसका जाप करते रहते है, किसी अदभुत एवं अनिर्वचनीय उल्लास से परिपूर्ण विहार–रस के आनन्द से सम्मोहित अर्थात अत्यधिक आकर्षक बनी हुई वह रा–धा दो अक्षरों वाली वेदातीत (वेदों के परे की) विद्या मेरे ह्रदय में स्फुरित हो।।14(95)।।

देवनामथ भक्तमुक्त सुह्रदा मत्यंत दूरं च–
यत्प्रेमानन्द रसं महा सुख करं चोच्चारितं प्रेमत:।।
प्रेन्णाकर्णयते जप्तयथया मुदागायत्यथा लिषवयं–
जल्पत्यश्रुमुखो हरिस्तद मृतं राधेति में जीवनम।।15(96)।।

व्याख्या :: जो देवताओं के लिए, भक्ति–भाव युक्त पुरुषो के लिए और श्रीकृष्ण के स्वजनों के लिए बहुत ही दूर है अर्थात अप्राप्य है। जो प्रेमानँद रस स्वरूप है।प्रेमपूर्वक उच्चारण करने पर जो अत्यन्त सुख देने वाला है। आंसुओं से जिनका मुख भीगा हुआ है ऐसे श्रीश्यामसुन्दर प्रेम विवश होकर जिसे सुनते है, जपते है और सखियों के मध्य में हर्षित होकर जिसका कीर्तन करते है वह श्रीराधा जी नामरूपी अमृत मेरा जीवन है (प्राण है)।।15(96)।।

लक्ष्म्या यश्चन गोचरी भवति यन्नापु: सखया: प्रभो:–
संभाव्योपि विरंचि नारद शिव स्वायं भुवध्येर्नय:।।
यो वृन्दावन नागरी पशुपति स्त्री भावलभ्य: कथं–
राधामाधवयोर्ममास्तुसरहो दास्याधिकरोत्सव:।।16(239)।।

व्याख्या :: जो श्री लक्ष्मी जी को भी गम्य नही है तथा जिसे श्रीकृष्ण जी के सखा भी नही प्राप्त कर सके,जो श्री ब्रह्मा जी श्री नारद जी श्री शिव जी व् श्री सनकादिकों को भी सम्भव नही है। जो श्री वृन्दावन की नागरी गोपिकाओं को भाव द्वारा लक्षयित हुआ, वह श्रीराधाश्यामसुन्दर जी का एकान्त कैंकर्य का रूप पूर्ण मधुरता का अधिकार मुझे कब प्राप्त होगा।।16(239)।।

मालाग्रन्थन शिक्षया मृदु मृदु श्रीखण्ड निर्घर्षणा–
देशेनादभुत मोदकादि विधिभि: कुञ्जान्त सन्मार्जने:।।
व्रन्दारण्यरहस्थलीषु विवशा प्रेमोर्तिभारोदगमा–
त्प्राणेशं परिचारिकै: खलुकदादास्यामयाधीश्वरी।।17(242)।।

व्याख्या :: माला गूथने की शिक्षा से तथा मुलायम कोमल चन्दन घिसने की आज्ञा से,स्वादिष्ट अदभुत मोदक आदि की निर्माण कला से तथा कुन्जो के अन्दर सम्मार्जन द्वारा।श्रीहित वृन्दावन की रमणीय एकान्त स्थली में प्रेम में भारी विवश हो लीला प्रारम्भ होने पर,इन उपर्युक्त विविध सेवाओं से मुझ दास द्वारा मेरी स्वामिनी अपने प्रियतम के साथ प्रसन्न हो कब मुझे सेवा में लेंगी।।17(242)।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~36
स्तुति के श्लोक

उच्छिष्ठामृत भुक्तवैव् चरितं श्र्रणवन्स्तवैव स्मर–
न्पदांभोज रजस्तवैव विचरन्कुंजास्तवैवालयान।।
गायन्दिव्य गुणांस्तवैव रसदे पस्यन्स्तवैवाकृतिं–
श्रीराधे तनुवांङ्गमनोभिरमलै: सोहन्तवैवाश्रित:।।18(240)।।

व्याख्या :: हे स्वामिनी! आपके उच्छिष्ट अमृत का भोगी बनू तथा आपके चरित्र का श्रवण व् स्मरण करू,आपके चरण रज का ही स्तवन करू तथा कुञ्ज भवन में विचरण करू।आपके दिव्य गुणों का गान करू तथा रस प्रदान करने वाली आपकी मधुर छवि (आकृति) को ही देखू, श्री राधा जी! में तन, वचन एवं मन से केवल आपके ही आश्रित रहू।।18(240)।।

आशास्य दास्यम व्रषभानु जाया– स्तीरे समध्यास्य च भानुजाया:।।
कदानुवृन्दावनकुञ्ज वीथी– ष्वहन्नु राधेह्यतिथिर्भवेयम।।19(197)।।

व्याख्या :: श्री व्रषभान नन्दिनी आपके दास होने की कामना मन में रखकर तथा श्री यमुना जी के किनारे पर निवास करते हुए श्री राधाजी।क्या कभी श्रीहित वृन्दावन की कुञ्ज गलियों में घूम सकूंगा तथा मैं कभी अतिथि की तरह भी वहां श्री राधा जी आपके पास होंगा।।19(197)।।

यत्र यत्र ममजन्म कर्मभि–र्नारकेsथपरमे पदेsथवा।
राधिका रति निकुन्जमण्डली–तत्र तत्र ह्रदि मे विराजिताम।।20(267)।।

व्याख्या :: मेरे कर्मो के परिणाम स्वरूप नरक में अथवा स्वर्ग में या फिर जहां कही भी मेरा जन्म हो वहां श्री राधां जी की केलि निकुन्ज मण्डली (श्रीप्रियाप्रियतम, सहचरी और श्रीहित वृन्दावन) मेरे ह्रदय में विराजमान रहै।।20(267)।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~37
स्तुति के श्लोक

उच्छिष्ठामृत भुक्तवैव् चरितं श्र्रणवन्स्तवैव स्मर–
न्पदांभोज रजस्तवैव विचरन्कुंजास्तवैवालयान।।
गायन्दिव्य गुणांस्तवैव रसदे पस्यन्स्तवैवाकृतिं–
श्रीराधे तनुवांङ्गमनोभिरमलै: सोहन्तवैवाश्रित:।।18(240)।।

व्याख्या :: हे स्वामिनी! आपके उच्छिष्ट अमृत का भोगी बनू तथा आपके चरित्र का श्रवण व् स्मरण करू,आपके चरण रज का ही स्तवन करू तथा कुञ्ज भवन में विचरण करू।आपके दिव्य गुणों का गान करू तथा रस प्रदान करने वाली आपकी मधुर छवि (आकृति) को ही देखू, श्री राधा जी! में तन, वचन एवं मन से केवल आपके ही आश्रित रहू।।18(240)।।

आशास्य दास्यम व्रषभानु जाया– स्तीरे समध्यास्य च भानुजाया:।।
कदानुवृन्दावनकुञ्ज वीथी– ष्वहन्नु राधेह्यतिथिर्भवेयम।।19(197)।।

व्याख्या :: श्री व्रषभान नन्दिनी आपके दास होने की कामना मन में रखकर तथा श्री यमुना जी के किनारे पर निवास करते हुए श्री राधाजी।क्या कभी श्रीहित वृन्दावन की कुञ्ज गलियों में घूम सकूंगा तथा मैं कभी अतिथि की तरह भी वहां श्री राधा जी आपके पास होंगा।।19(197)।।

यत्र यत्र ममजन्म कर्मभि–र्नारकेsथपरमे पदेsथवा।
राधिका रति निकुन्जमण्डली–तत्र तत्र ह्रदि मे विराजिताम।।20(267)।।

व्याख्या :: मेरे कर्मो के परिणाम स्वरूप नरक में अथवा स्वर्ग में या फिर जहां कही भी मेरा जन्म हो वहां श्री राधां जी की केलि निकुन्ज मण्डली (श्रीप्रियाप्रियतम, सहचरी और श्रीहित वृन्दावन) मेरे ह्रदय में विराजमान रहै।।20(267)।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~38
शयन भोग के पद

पय पै धरयौ कनक कटोर।
सुगंध ऐला मिल्यौ मिश्री लेत देत निहोर।।
(बलि जाऊँ) कबहुँ ये लै कबहुँ वे लै करि कटाक्षन कोर।।
वदन-विधु मनों सुधा पीवत सखिनु नैन चकोर।।

व्याख्या :: दूध के पास में स्वर्ण कटोरे रखे है।जिसमे सुगन्ध , इलाइची व् मिश्री मिली हुई है तथा कृतज्ञता पूर्वक श्री श्यामाश्याम एक दूसरे को अनुग्रह कर ले दे रहे है।में बल – बल जाऊ कभी तो ज्यादा व् कभी तो कम लेन-देन का क्रम नयनों के कोर के साथ अलग-अलग भाव भंगिमा में चल रहा है।श्रीयुगल कला के निधि है और इनके मुखारबिन्द से मानो सखियाँ चकोर की भांति अमृत का पान कर रही है।।

हँस-हँस दूध पियत पिय प्यारी।
चंदन बारि कनक चरु औट्यौ बारी कोटि सुधारी।।
मिश्री लौंग चिरौंजी एला कपूर सुगंध सँवारी।
उज्ज्वल सरस् सचिक्कन सुन्दर स्वाद सुमिष्ठ महारी।।

व्याख्या :: पिय प्यारी श्रीश्यामाश्याम हंस-हंस कर दूध पी रहे हैं। यह दूध चन्दन की लकड़ी जलाकर सुवर्ण के पात्र में गर्म किया गया है और उसके ऊपर करोड़ो अमृत न्यौछावर किये जा सकते है।दूध में मिश्री, चिरोंजी, लौंग, इलाइची और कपूर की सुगन्ध मिली हुई है। यह दूध उज्ज्वल रस युक्त एवं सचिक्कन है और उसका स्वाद अत्यन्त मधुर है।।

नवल नवेली अलवेली सुकुमारी जू कौ, रूप पिय प्रानन को सहज अहाररी।
व्यंजन सुभायन के नेह घृत सौंज बने,रोचक रुचिर हैं अनूप अति चारुरी।।
नैनन की रसना तृपित न होत क्यों हू, नई नई रूचि ध्रुव बढ़त अपार री।
पनिपको पानी प्याय पान मुसिक्यान ख्वाय,राखे उर सेज स्वाय पायो सुख सरारी।।

व्याख्या :: नवेली, अलवेली,सुकुमारी श्रीराधा जी का रूप श्री नवल प्रियतम जी के प्राणों का सहज आहार है। सुन्दर भावों के व्यंजन,जो रूप घृत (घी) में बने हुए है, अत्यन्त रुचिकारी व् सुन्दरता में अनुपम है। इन व्यंजनों को चाखकर श्रीश्यामसुन्दर की नेत्र रूपी रसना (जीभ) किसी प्रकार भी तृप्त नही होती है और श्री प्रियतम जी के मन में नई-नई और अपार रूचि निरन्तर बढ़ती रहती है।श्री प्रिया जी ने अपने श्रीप्रियतम जी को लावण्य रूपी पानी पिलाकर और मुसकान रूपी पान खिलाकर अपनी ह्रदयरूपी शैय्या पर सुला लिया जिससे श्रीप्रियतम जी को सुख का सार प्राप्त हो गया।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~39
शयन आरती के पद

नागरी निकुन्ज ऐन किसलय दल रचित सेन, कोककला कुशल कुमरि अति उदाररी।
सुरत रंग अंग अंग हाव भाव भृकुटी भंग, माधुरी तरंग मथत कोटि मार री।।
मुखर नुपुरनि स्वाभाव किंकिणी विचित्र राव, विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री।
लाड़िली किशोर राज हंस हंसिनी समाज,सींचत हरिवंश नैन सुरस सार री।।

व्याख्या:: हे सखी! प्रवीण श्री राधा जी निकुन्ज निवास स्थल पर नवपल्लवो के दल से सेंन शय्या रचि गयी है और श्री प्रिया जी रति विद्या में कुशल निपुण व् अति ही उदार है।हे सखी! कामकेलि के रँग में उनके प्रत्येक अंग -अंग के हाव – भाव व् उनके नयनों की कोर से उठती लहर अपने आप में सम्पूर्ण मधुरता की तरंग है जिस पर करोड़ो कामदेव भी छीन है।।प्रधान रूप से उनके नूपुरों स्वभाव अनुसार व् कमर की कोधनी रुनझुन स्वर बड़े ही विचित्र है ठकुराइन के और धीरे -धीरे स्वर का वेग कम हो जाता है श्री स्वामी स्वामिनी हास-परिहास में रतिविहार में चले जाते है।श्रीलाडिली जी श्री किशोर जी यह श्रीयुगल हंस-हंसिनी अपने समाज के साथ ऐसे ही राज करे और यह सुन्दर रस का सार श्रीहित हरिवंश जी के नेत्रो से अंतर्धारा सींचते रहे , हे सखी।।

चांपत चरन मोहनलाल।
कुँवरि राधे पलंग पौढ़ी सुन्दरी नव बाल।।
कबहुँ कर गहि नैन लावत कबहुँ छुवावत भाल
।नन्ददास प्रभु छवि विलोकत प्रीति के प्रतिपाल।।1।।

व्याख्या :: शयन समय शय्या पर श्री मोहन लाल जी श्री प्रिया जी के चरणों को धीरे से दबा रहे है।श्री सुकुमारी राधा जी नव बाल सिज्जा पलंग पर लेटी हुई है।श्री मोहन लाल जी कभी नेत्रो से रूप की चकाचोंध को हाथ बाध् कर देख रहे है और कभी अपनी ललाट (मस्तक) को चरणों में छुवा रहे है।श्रीहित नन्ददास जी कहते है – मैं प्रभु की यह छवि देख कर कह सकता हूँ प्रीति के वे ही केवल रक्षक और पालक है।।

लड़ैती जू के नैनन नींद घुरी।
आलस वश जीवन वश मद वश पिय के अंश ढुरी।।
पिय कर परस्यौ सहज चिबुक वर बाँकी भौह मुरी।
बावरीसखी हित व्यास सुवन बल देखत लतन दुरी।।2।।

व्याख्या :: सखी समाज,श्रीहित वृन्दावन एवं श्रीश्यामसुन्दर की एक मात्र लाड़ भाजन श्रीप्रिया जी के नेत्रो में नीद छाई हुई है।आलस्य एवं यौवन मद के वशीभूत होकर वे अपने श्रीप्रियतम जी क्व अंस (कन्धा) पर झुक गई है। श्रीप्रियतम जी ने सहज रूप से उनकी (श्री प्रिया जी की) चिबुक का स्पर्श किया तो उनकी भृकुटि चढ़ गई।बाबरी सखी कहती है — मैं श्रीहितव्यास नन्दन जी के कृपा बल से यह अत्यन्त रमणीय दृश्य लता की ओट से देख रही हूँ

अति सुंदर भाव

आलस नैन आवत घूम।
लाल चुटकी दै जगावत खुले ताकत भूम।।
खसित भुज पिय अंश तें सम्हराय कर लै चूम।
वृन्दावन हित रूप घूंघट बदन कर रह्यौ झूम।।3।।

व्याख्या :: श्री प्रिया जी के नेत्र आलस्य से झुके आ रहे है।श्रीश्यामसुन्दर जी श्री प्रिया जी को चुटकी बजाकर सावधान करते है और श्री प्रिया जी नेत्र खोलकर भूमि की ओर देखने लगती है।श्री प्रियतम जी के अंस पर रखी हुई श्री प्रिया जी की भुजा निद्रा के कारण खिसक जाती है तो श्री प्रियतम जी भुजा को यथास्थान स्थापित करके श्री प्रिया जी के कर को चूम लेते है। चाचा हित वृन्दावनदास जी कहते है कि श्री प्रिया जी के मुखारबिन्द पर रूप का घूंघट झूम रहा है।(जिसके कारण मुखारबिन्द पर दृष्टि नही ठहर रही)

जदेखों चित्रसारी बनी।
वत छनी।मध्य सेज विराज पौढ़े रसिक दंपति मनी।।
अंग अंग अंनग भीने राधिका धन धनी।
पद कमल सेवत तहाँ हित रूप एकै जनी।।4।।

व्याख्या :: हे सखी, देखो श्रीश्यामाश्याम जी की चित्रसारी(शयन कुञ्ज) शोभायमान है।इस कुंज के छिद्रों में मणियों के दीपक झलक रहे है, अर्थात कुञ्ज के छिद्रों में इस प्रकार की मणियाँ रखी है जो दीपक की भांति प्रकाश कर रही है।श्रीश्यामाश्याम जी के श्रीअंगो में से प्रगट होने वाली सुगन्ध के उदगार एक -दूसरे में छनकर दोनों के निकट पहुंच रहे है।रसिक शिरोमणि श्रीयुगल ने शैया के मध्य में विराजकर शयन किया और श्रीश्यामाश्याम के अंग-अंग में अंनग का रंग छा रहा है। इस समय एक मात्र श्रीहित रूपा सखी (हित सखी) श्रीश्यामाश्याम के चरणों को चाँप (दबा) रही है।।4।।

रस भरे सुभग हिंडोले झूलत।
अति सुकुमार रूपनिधि दोऊ सो छबि देखि परस्पर फूलत।।
नवल तरुनता अंग-अंग भूषण लसत सुभग उरजन मणिमाल।
उभयसिन्धु मनों बढ़े रूपके विच- विच झलकत रंग रसाल।।
रुचिर नील पट्पीत पवन वस्त्र उड़त उठत मनों लहरि उरंग।
हित ध्रुव दिनहि मीन सखियन दृग तृषित फिरत रसमे नितसंग।।

व्याख्या :: श्रीयुगल रस से परिपूर्ण मनोहारी झूला पर झूल रहे है।दोनों परम् कोमलता व् रूप की खदान है,वह रस में लीन एक-दूसरे की छवि को देख कर पल्लवित हो रहे है।।नयी तरुनता में उनका प्रत्येक अंग आभूषणों से शोभायुक्त है और मनोहर मणियों की माला वक्ष स्थल पर शोभायमान है।रूप के यह दोनो-समुद्र मानो बढ़ कर ऐसे लग रहे है कि रूप की लहर पे लहर झलमला रही हो और रँग रसपूर्ण कौतुक में बदल रहा हो।।रुचिकारी नीले व् पीले वस्त्र पवन के कारण उठ कर उड़ रहे है कि मानो नागकेसर की लहर हो।श्रीहित ध्रुवदास जी कहते है कि सखियों के नेत्र तैरती मछली की भांति रस में नित संग होते हुए भी प्यासे घूम रहे है अर्थात इतने रस-समुद्र में भी तृप्त नही है।।

………..•>( सेवा विश्राम )<•………..

इस पद के बाद,सेवाग्रह बन्द करके प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।अभी तक बताई इस सेवा की पद्धति को “अष्टयाम सेवा पद्धति” कहा जाता है।हमारे बाबा जी व श्रीगुरु जी महाराज गो. श्रीहित भजनलाल जी, श्री हित जू महाराज व श्री कृपासिंधु स्वामिनी व लाल जी की अदभुत कृपा से हम यह श्री जी सेवा की अष्टयाम विधि व्याख्या व संकलित कर आप रसिको तक पहुंचा सके।

राधेकृष्णावर्ल्ड की ओर से श्रीहित वृन्दावन धाम से रसिक परिकर को…

।।”जै जै श्री हित हरिवंश”।।
।। जै जै श्री हित हरिवंश ।।

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श्री वृन्दावन सतलीला

“श्री वृन्दावन सतलीला”

श्री राधावल्लभो जयति, श्री हित हरिवंशचन्द्रो जयति



सर्वाद्य रसिक जन वन्दित चरणा, रसिक आचार्य शिरोमणि, वंशीवतार श्री श्री हित हरिवंश चंद्र महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय में वाणी साहित्य की प्रचुरता है। रसिक महानुभावों ने निज भाव भावना को सिद्ध कर जिस परम रस का आस्वादन किया, वाणी ग्रन्थ उसी रस का सहज सरल उद्गलन हैं।

इसी परंपरा में रसिक भूषण सन्त श्री ध्रुवदास जी की वाणी श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय का भाष्य ग्रन्थ है। इस वाणी का सर्वाधिक महत्व यह है कि यह स्वयं श्री रास रसेश्वरी, नित्य निकुञ्जेश्वरी प्रिया श्री राधा द्वारा प्रदत्त प्रीति प्रसाद है। अत: यह रस गिरा स्वतः सिद्ध एवं सर्वरसिक जन पोषिणी तो है ही, अनेकानेक रसिक महानुभाव इस वाणी के अनुशीलन द्वारा ही सैद्धान्तिक मर्म को हृदयङ्गम कर उपासना सिद्ध करते आ रहे हैं। अत: यदि कहा जाए कि हित रस तरु को श्री ध्रुवदास जी ने बयालीस लीला के वर्णन द्वारा सुफलित किया है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

इसी ग्रन्थ रुपी भाव मंजूषा में एक अति प्रिय और महामधुर भाव रत्न”श्री वृंदावन सतलीला” है, जिसका पठन एवं श्रवण मात्र सहज रुप से श्री वृंदावन अधिकारिणी का कृपा पात्र बना देता है, स्वयं श्री हित आचार्य महाप्रभु ने श्रीमद् सुधा निधि में कहा है कि :

“क्वासौ राधा निगम पदवी दूरगा कुत्र चासौ,
कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरैकान्तवासः।
क्वाहं तुच्छः परममधमः प्राण्यहो गयकर्मा,
इयत्ता नाम स्फुरति महिमा एष वृन्दावनस्य।।

श्री राधा माधव युगल के मधुरातिमधुर नित्य केलि रस का चिंतन तभी हो सकता है जब सर्वप्रथम सम्यक रूप से श्री वृन्दावन का स्वरूप हृदय में आए और यह स्वयं श्री वृन्दावन की कृपा से ही सम्भव है।

यह हित सौरभ सुवासित वाणी पुष्प रसिक समाज को आनन्दित करे यही श्रीहितमहाप्रभु के श्री चरण कमलों में प्रार्थना है। अभिलाषा है।


“श्री वृन्दावन सतलीला”

श्लोक – 1
प्रथम नाम हरिवंश हित, रट रसना दिन रैन।
प्रीति रीति तब पाइयै, अरु वृंदावन ऐन ॥1॥

श्रीहितध्रुवदास जी कहते हैं – हे जिह्वा ! तू सर्वप्रथम प्रेम मूल श्रीहित हरिवंश नाम ही सतत् रट, इसी परम मधुर नाम का ही गान कर। क्योंकि इस नाम की रटन के फलस्वरूप ही श्री हित युगल की अद्भुत प्रीति रीति और श्री वृंदावन रूपी विश्राम प्राप्त होगा।


श्लोक – 2
चरन सरन हरिवंश की, जब लगि आयौ नाहिं।
नव निकुंज निजु माधुरी, क्यौं परसै मन माहिं।।2।।

जब तक प्रकट प्रेम स्वरूप श्री हरिवंश के श्री चरणों की शरण न ली जाए, तब तक नित्य निकुंज की नित्य नवायमान रस माधुरी को मन स्पर्श भी कैसे कर सकता है अर्थात् नहीं कर सकता।


श्लोक – 3
वृंदावन सत करन कौं, कीन्हौं मन उत्साह।
नवल राधिका कृपा बिनु, कैसे होत निबाह ॥3॥

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि मेरे मन ने ” श्री वृंदावन सत”ग्रंथ रूपी श्री वृन्दावन का गुणगान करने का उत्साह तो किया है परन्तु नवल किशोरी श्री राधिका के कृपा कटाक्ष के बिना कैसे ये आशा पूर्ण हो सकती है।


श्लोक – 4
यह आसा धरि चित्त में, कहत जथा मति मोर।
वृन्दावन सुख रंग कौ, काहु न पायौ ओर ।।4।।

अत: उन्हीं श्री बनराज रानी की कृपा की आशा अपने चित्त में रखकर यथामति श्री वृंदावन की महिमा वर्णन करता हूँ, क्योंकि श्री वृंदावन की माधुरी अनन्त है जिसका आज तक किसी ने ओर छोर नहीं पाया है।


श्लोक – 5
दुर्लभ दुर्घट सबनि कैं, वृन्दावन निजु भौन।
नवल राधिका कृपा बिनु, कहिधौं पावे कौन ।।5।।

यह परम रसमय काव्य श्री वृंदावन जो श्री राधा माधव युगल का निज धाम है, सबसे दुर्लभ और अगम अगोचर है। नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधाकी कृपा बिना कोई कदापि इसे प्राप्त नहीं कर सकता।


श्लोक – 6
सबै अंग गुन हीन हौं, ताको जतन न कोई।
एक किशोरी कृपा तैं, जो कछु होइ सो होई ।।6।।

और मैं तो वैसे ही सब प्रकार से गुणहीन एवं सर्वथा असमर्थ हूँ, करूणा धाम श्री किशोरी जी की कृपा से ही जो होना है सो होगा।


श्लोक – 7
सोऊ कृपा अति सुगम नहिं, ताको कौन उपाय ।
चरन सरन हरिवंश की, सहजहिंबन्यौ बनाव ।।7।।

परन्तु उन श्री किशोरी जी की कृपा प्राप्त करने का भी कौन सा उपाय है, क्योंकि वह कृपा भी तो सहज सुलभ नहीं है। पर श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्री हरिवंश के श्री चरणों की शरण में जाने से यह दुर्लभ कृपा सहज सुलभ हो गई है।


श्लोक – 8
हरिवंश चरन उर धरनि धरि, मन वच कै विश्वास।
कुँवरि कृपा है है तबहि, अरु वृन्दावन वास ।।8।।

अत: यदि मनसा वाचा कर्मणा श्री हरिवंश के शरणागत होकर, अपनी हृदय भूमि पर भाव से उनके चरण युगल धारण करता हूँ। तभी नित्य किशोरी श्री राधा कृपा करेंगी और श्री वृन्दावन वास सुलभ होगा।


श्लोक – 9
प्रिया चरन बल जानि कै, बाढ़यौ हिये हुलास।
तेई उर में आनि हैं, श्री वृन्दा विपिन प्रकाश ।।9।।

प्रिया श्री राधा के श्री चरणों की कृपा एवं सामर्थ्य जानकर मेरे हृदय में हर्षोल्लास बढ़ रहा है कि इन्हीं की कृपा से मेरे हृदय में श्री वृन्दावन का रस रंग प्रकाशित होगा।


श्लोक – 10
कुवारी किसोरी लाडिली, करुनानिधि सुकुमारि।
वरनौं वृन्दा विपिन कौं, तिनके चरन संभारि ।।10।।

करुणाधाम, कृपालु किशोरी कुँवरि श्री राधा प्यारी के श्री चरणों का सप्रेम स्मरण करते हुए श्री वृन्दावन का वर्णन करता हूँ।


श्लोक – 11
हेममई अवनी सहज, रतन खचित बहु रंग।
चित्रित चित्र विचित्र गति, छबि की उठत तरंग।।11।।

श्री वृंदावन की भूमि सहज स्वरुप से ही स्वर्णमयी है जिसमें नाना रंगों के अद्भुत रत्न जड़े हैं। अद्भुत भांति से विलक्षण चित्र चित्रित हैं जिनमें सौंदर्य की तरंगे सतत उठती रहती है।


श्लोक – 12
वृंदावन झलकनि झमकि, फूले नैन निहारि।
रवि ससि दुतिधर जहाँ लगि, ते सब डारे वारि।।12।।

श्री वृन्दावन की यह अनिर्वचनीय कांति एवं शोभा भावपूर्ण नेत्रों से देखने पर अनुभव होता है कि सूर्य चन्द्रमा जैसे जितने भी ज्योति धारक हैं, सब वृन्दावन पर न्योछावर हैं।


श्लोक – 13
वृन्दावन दुतिपत्र की, उपमा कौं कछु नाहिं।
कोटि-कोटि बैकुण्ठ हूँ, तिहि सम कहेन जाहिं।।13।।

श्री वृंदावन के एक पत्ते की शोभा की समता कोटि-कोटि बैकुण्ठ भी नहीं कर सकते। अर्थात् श्री वन का सौंदर्य अनुपम, अतुल्य है।


श्लोक – 14
लता-लता सब कल्पतरु, पारिजात सब फूल।
सहज एक रस रहत हैं, झलकत यमुना कूल।।14।।

यहाँ की एक-एक लता कल्पवृक्ष है, एक-एक पुष्प पारिजात है जो श्री यमुना जी के किनारे सतत एक रस झिलमिलाते रहते हैं, अर्थात् इनकी शोभा कभी मंद नहीं होती।


श्लोक – 15
कुंज-कुंज अति प्रेम सौं, कोटि-कोटि रति मैन।
दिनहिं सँवारत रहत हैं, श्री वृंदावन ऐन ।15। ।

वृंदावन की एक-एक कुंज को कोटि-कोटि रति एवं कामदेव महा प्रेम में भरकर नित्य निरन्तर सजाते-संवारते रहते हैं।


श्लोक – 16
विपिन राज राजत दिनहि, बरषत आनन्द पुंज।
लुब्ध सुगन्ध पराग रस, मधुप करत मधु गुंज।।16।।

सर्वोत्कृष्ट श्री वृंदावन परमानन्द की वर्षा करता हुआ सर्वोपरि विराजमान है जहाँ दिव्य सुगंध एवं पुष्पों के पराग से आकर्षित भ्रमर मधुर-मधुर गुंजार करते रहते हैं।


श्लोक – 17
अरुन नील सित कमल कुल, रहे फूल बहुरंग।
वृन्दावन पहिरे मनौ, बहु विधि वसन सुरंग।।17।।

लाल नीले एवं श्वेत कमलों के समूह एवं नाना प्रकार के पुष्प ऐसे खिले हैं जिन्हें देखकर लगता है मानों श्री वृंदावन ने नाना प्रकार के सुन्दर रंगों के वस्त्र पहन रखे हों।


श्लोक – 18
हित सौं त्रिविध समीर बहै, जैसी रुचि जिहिं काल।
मधुर-मधुर कल कोकिला, कूजत मोर मराल।।18।।

जिस समय श्री प्रिया प्रियतम की जैसी रुचि होती है, वैसी ही शीतल मंद सुगंधित पवन श्री वृंदावन में बहती है। कहीं महा मधुर स्वर में कोयल कूजती है तो कहीं मोर मराल आदि मधुर स्वर करते हैं।


श्लोक – 19
मण्डित जमुना वारि यौं, राजति परम रसाल।
अति सुदेस सोभित मनौं, नील मनिन की माल।।19।।

नील कांति युक्त परम मधुर श्री यमुना जल श्री वृंदावन के चहुँ ओर ऐसे बहता हुआ सुशोभित होता है जैसे नील मणियों की माला।


श्लोक – 20
विपिन धाम आनन्द कौ, चतुरई चित्र ताहि।
मदन केलि सम्पति सदा, तिहि करि पूरन अहि ।।20 ।।

श्री वृंदावन सजाया संवारा है। श्री प्रिया लाल की रस केलि के अनुरुप एवं अनुकूल संपत्ति वहां सदा भरपूर है।


श्लोक – 21
देवी वृन्दाविपिन की, वृन्दा सखी सरूप।
जिहिंविधि रुचि है दुहुँनि की, तिहिं विधि करत अनूप।।21।।

श्री वृंदावन की अधिष्ठात्री वृंदा देवी सखी स्वरूप में होकर जैसी युगल की रुचि होती है वैसी ही वृंदावन कुंजों की रचना करती रहती है।


श्लोक – 22
छिन छिन बन की छवि नई, नवल युगल के हेत।
समुझि बात सब जीय की, सखि वृन्दा सुख देत।।22।।

युगल को प्रसन्न करने के हित प्रशिक्षण वृंदावन का नई-नई भाँति श्रृंगार करती है। उनके हृदय की रुचि भली-भाँति जान सेवा कर वृंदा सखी उन्हें सुख देती है।


श्लोक – 23
गावात वृन्दाविपिन गुन, नवल लाड़ली लाल।
सुखद लता फल फूल दुम, अद्भुत परम रसाल।।23।।

जहां के लता, वृक्ष, पुष्प फल आदि विलक्षण हैं, अद्भुत सुखदायक हैं, सरस हैं, ऐसे वृंदावन के गुणों का स्वयं नवल किशोर लाड़िली लाल भी गाना करते हैं।


श्लोक – 24
उपमा वृंदाविपिन की, कहि धौं दीजै काहि।
अति अभूत अद्भुत सरस, श्री मुख बरनत ताहि।।24।।

स्वयं श्री युगल किशोर जिसकी महिमा का गान कर सुखी होते हैं ऐसे अतुल्य, अनिर्वचनीय, रस स्वरुप श्री वृंदावन की समता किससे की जाए।


श्लोक – 25
आदि अन्त जाकौ नहीं, नित्य सुखद बन आहि ।
माया त्रिगुन प्रपंच की, पवन न परसत ताहि।।25।।

सदा सुख वर्षणकारी अनादि अनंत इस श्री वृंदावन को त्रिगुण का प्रपंच (माया) स्पर्श भी नहीं कर सकता।


श्लोक – 26
वृन्दाविपिन सुहावनौं, रहत एक रस नित्त।
प्रेम सुरंग रँगे तहाँ, एक प्रान द्वै मित्त।।26।।

यह मन भावन श्री वृंदावन अखंड आनंदमय है। जहां अनुराग रंग में रंगे एक प्राण दो मित्र प्रेम क्रीड़ा परायण रहते हैं।


श्लोक – 27
अति सुरूप सुकुवाँर तन, नव किसोर सुखरासी ।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मन्द मृदु हसि। ।27 ।।

जहां परम सुन्दर, अनन्त सुख, रुप, रस की निधि सुकुमार युगल अपनी मृदु मनोहर मुस्कान से सब सखियों को मोहित करते हैं।


श्लोक – 28
न्यारौ है सब लोक तें, वृन्दावन निज गेह।
खेलत लाड़िली लाल जहाँ, भींजे सरस सनेह।।28।।

श्री राधा माधव युगल का निज गृह स्वरुप यह श्री वृंदावन सब लोकों से न्यारा है, सर्वोपरि है, जहां युगल सहज प्रेम में मत्त सतत विहार करते हैं।


श्लोक – 29
गौर-स्याम तन मन रँगे, प्रेम स्वाद रस सार।
निकसत नहिं तिहिं ऐंन ते, अटके सरस बिहार।।29।।

सर्वरसों के सार स्वरुप प्रेम के आस्वादन में ही जिनके तन मन रंग रहे हैं, ऐसे गौर स्याम किसी अद्भुत प्रेम खेल को ही सदा खेलते हुए श्री वृंदावन से बाहर नहीं निकलते।


श्लोक – 30
बन है बाग सुहाग कौ, राख्यौ रस में पागि।
रूप-रंग के फूल दोउ, प्रीति लता रहे लागि।।30।।

परम सौभाग्य स्वरुप इस परम रसमय वृंदावन की माधुरी ने प्रीति लता पर लगे रुप और रंग के दो पुष्पों (श्री श्यामा-श्याम) को भी रस मत्त कर रखा है।


श्लोक – 31
मदन सुधा के रस भरे, फूलि रहे दिन रैन।
चहुँदिसि भ्रमत न तजत छिन, भृंग सखिन के नैंन।।31।।

यह रुप और रंग के मूर्त रुप दो पुष्प (श्री श्यामा-श्याम) प्रेम सुधा रस से भरे दिन रैन प्रफुल्लित ही रहते हैं एवं सखियों के नैन रुपी भ्रमर इन पर सदा मंडराते हुए रुप माधुरी का सतत पान करते हैं।


श्लोक – 32
कानन में रहे झलकि कैं, आनन विवि विधु काँति।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति।।32।।

श्री वृंदावन में हित युगल के मुख चन्द्र की कांति झिलमिलाती ही रहती है जिसे सहज स्नेह मूर्ति सखियां चकोर की भांति निरखि कर अपने मन प्राण शीतल करती है।


श्लोक – 33
ऐसे रस में दिन मगन, नहिं जानत निसि भोर।
वृंदावन में प्रेम की, नदी बहै चहुँ ओर।।33।।

इस प्रकार समस्त हित रसिक परिकर इस अद्भुत प्रेमानन्द में मग्न रहता हुआ काल की । सीमा से परे रहता है और ऐसा लगता है मानो श्री वृंदावन में चारों ओर प्रेम सुधा धारा ही प्रवाहित हो रही है।


श्लोक – 34
महिमा वृन्दा विपिन की, कैसे कै कहि जाय।
ऐसे रसिक किशोर दोऊ, जामें रहे लुभाय।।34।

परम रसिक शिरमौर श्री राधा माधव युगल भी जिसकी माधुरी के लोभी है , ऐसे विलक्षण वृंदावन की महिमा कहना कैसे संभव है ।


श्लोक – 35
विपिन अलौकिक लोक में, अति अभुत रसकंद।
नव किसोर इक वैस दुम, फूले रहत सुछंद ।।35।।

इस लोक में प्रकट होते हुए भी वृंदावन अलौकिक है, परमाद्भुत है, सरस है, जिसमें नवल किशोर दो ऐसे समवयस वृक्षों की भांति सुफलित है, जिनकी फलन सतत वर्द्धमान है।


श्लोक – 36
पत्र-फूल-फल-लता प्रति, रहत रसिक पिय चाहि।
नवल कुँवरि देख छटा जल, तिहिं करिसींचे आहि।।36।।

वृंदावन के पत्र-पुष्प, फल, लता आदि को रसिक सिरमौर प्रियतम निहारते ही रहते हैं क्योंकि इन्हें किशोरी राधिका ने अपने स्नेह जल पूरित दृष्टिपात से सींचा है।


श्लोक – 37
कुँवरि चरन अंकित धरनि, देखत जिहि-जिहिं ठौर।
प्रिया चरन रज जानि कै, लुठत रसिक सिरमौर।।37।।

जहाँ – जहाँ धरती पर प्रिया श्री राधा के श्री चरणों के चिन्ह प्रियतम देखते हैं , वहीं प्राण प्रिया की चरण धूलि जान भाव विह्वल होकर लोटने लगते हैं।


श्लोक – 38
वृंदावन प्यारौ अधिक, यातें प्रेम अपार।
जामें खेलति लाडिली, सर्वस्व प्रान अधार।।38।।

प्रियतम का श्री वृंदावन में अपार प्रेम है, यह प्रीतम को प्राणाधिक प्रिय है क्योंकि इसमें उनकी प्राणाधार, जीवन धन प्रिया श्री राधा सदा क्रीड़ा करती है ।


श्लोक – 39
सबै सखी सब सौंज लै, रँगी जुगल ध्रुव रंग।
समै – समै की जानि रुचि, लियै रहति हैं संग।।39।।

युगल के अविचल प्रेम रंग में रंगी सखियां समय-समय की रूचिनुसार सेवा की सब सामग्री लिये निरन्तर युगल के संग बनी, रहती है।


श्लोक – 40
श्री वृंदावन सतलीला वृंदावन वैभव जितौ, तितौ कह्यौ नहिं जात।
देखत सम्पति विपिन की, कमला हू ललचात।।40।।

श्री वृंदावन की संपत्ति, रस वैभव, जिसे देखकर लक्ष्मी भी ललचा जाती है, वाणी द्वारा उसे कहना असम्भव है।


श्लोक – 41
वृंदावन की लता सम, कोटि कल्पतरु नाहिं।
रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहि माहिं।।41।।

करोड़ों कल्पवृश्च वृंदावन की एक लता की प्रमता नहीं कर सकते। अरे, जहाँ की रज के तुल्य बैकुण्ठ भी नहीं हैं तो अन्य लोकों की चर्चा ही क्या करना?


श्लोक – 42
श्रीपति श्रीमुख कमल कह्मौ, नारद सौं समुझाई।
वृन्दावन रस सबनि तें, राख्यौ दूरि दुराइ।।42।।

रमाकांत भगवान नारायण ने श्री नारद जी से स्वयं कहा है कि मैंने श्री वृंदावन रस सबसे छिपाकर रखा है। यह रस परम रहस्य है।


श्लोक – 43
अंस – कला औतार जे, ते सेवत हैं ताहि।
ऐसे वृन्दाविपिन कौं , मन – वच कै अवगाहि।।43।।

प्रभु के जितने अंश कला अवतार हैं , सब श्री वृंदावन धाम का ही इष्ट भाव से सेवन भजन करते हैं। ऐसे अनन्त महिमावंत श्री वृंदावन का ही सर्वतोभावेन सेवन करना चाहिए।


श्लोक – 44
सिव – विधि – उद्धव सबनि कै, यह आसा रहै चित्त।
गुल्म लता है सिर धरै, वृंदावन रज नित्त।।44।।

शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि के मन में यही आशा रहती है कि हम श्री वृंदावन की कोई लता या वृक्ष होकर श्री वृंदावन रज को नित्य शिरोधार्य कर सकें


श्लोक – 45
चतुरानन देख्यौ कछुक, वृंदाविपिन प्रभाव।
दुम – दुम प्रति अरु लता प्रति, औरे बन्यौ बनाव।।45।।

ब्रह्मा जी ने किंचित श्री वृंदावन के अद्भुत प्रभाव का अनुभव किया और पाया कि यहां तो तरु लता की रचना किसी और ही भाँति की है।


श्लोक – 46
आप सहित सब चतुर्भुज , सब ठाँ रह्यौ निहारि।
प्रभुता अपनी भूलि गयौ , तन मन के रह्यौ हारि।।46।।

ब्रह्मा ने स्वयं सहित, सब ओर जब श्री वृंदावन को निहारा तो सबको ही चतुर्भुज रुप पाया। यहां का वैभव देखकर अपनी प्रभुता तो सर्वथा भूल ही गया, गति मति भी थकित हो गई।


श्लोक – 47
लोक चतुर्दश ठकुरई, सम्पति सकल समेत
सब तजि बसि वृन्दाविपिन, रसिकनि कौ रस खेत।।47।।

अत: यदि एक ओर चौदह भुवनों का वैभव, संपत्ति आदि प्राप्त होता हो तो भी उसे त्याग रसिकों के रस क्षेत्र श्री वृंदावन में ही बसना चाहिए।


श्लोक – 48
सकहि तौ वृंदापिपिन बसि, छिन-छिन आयु बिहात।
ऐसौ समै न पाइहै, भली बनी है बात।।48।।

प्रति क्षण आयु क्षीण हो रही है, अब तो सुंदर सुयोग बना है। अत: कर सको तो श्री वृंदावन वास करो, फिर ऐसा संयोग नहीं बनेगा।


श्लोक – 49
छाँड़ि स्वाद सुख देह के, और जगत की लाज।
मनहिं मारि तन हारि कै, वृंदावन में गाज।।49।।

अत: लोक लाज, देह के सुख स्वादादि का त्याग कर और तन मन से दीन हो वृंदावन में निर्भय होकर रह।


श्लोक – 50
वृन्दावन के बसत ही, अन्तर जो करै आनि।
तिहि सम सत्रु न और कोऊ, मन बच कै यह जानि।।50 ।।

दृढ़तापूर्वक यह जान लो, मान लो कि वृंदावन वास में जो आकर बाधा डाले उसके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है।


श्लोक – 51
वृंदावन के वास कौ, जिनकै नाहिं हुलास।
माता-मित्र-सुतादि-तिय, तजि ध्रुव तिनके पास।।51।।

श्री वृंदावन वास के लिए जिनके मन में उत्साह उल्लास नही है वे चाहे माता-पिता, पुत्र-पत्नी आदि परम स्नेही क्यों न हो, उनका सामीप्य त्याग दो


श्लोक – 52
और देस के बसत ही, अधिक भजन जो होय।
इहि सम नहिं पूजत तऊ, वृन्दावन रहै सोय।।52।।

अन्य देशों में निवास करते हुए चाहे विशाल भजन होता हो परन्तु वह वृंदावन में सोते रहने के समान भी नहीं है।


श्लोक – 53
वृन्दावन में जो कबहूँ, भजन कछू नहिं होय।
रज तौ उड़ि लागै तनहिं, पीवै जमुना तोय।।53।।

श्री वृंदावन में वास करते हुए यदि कुछ भी भजन नहीं होगा तो भी देव मुनि दुर्लभ श्री वृंदावन रज तो उड़कर देह को लगेगी पीने को परम पावन श्री यमुना जल तो मिलेगा ही।


श्लोक – 54
वृन्दाविपिन प्रभाव सुनि, अपनौ ही गुन देत।
जैसे बालक मलिन कौं, मात गोद भर लेत।।54।।

इस वृंदावन का अद्भुत प्रभाव सुनो। यह मलिन जीव को भी युगल प्रेम स्वरुप अपना गुण बिना विचारे प्रदान करता है। जैसे मैले-कुचैले बालक को भी वात्सल्यमयी माता स्नेहवश गोद में भर लेती है।


श्लोक – 55
और ठौर जो जतन करै, होत भजन तऊ नाहिं।
ह्याँ फिरै स्वारथ आपने, भजन गहे फिरै बाँहि।।55।।

श्री वृंदावन से अन्यत्र बहुत प्रयत्न करने पर भी भजन नहीं होता। पर यहां कोई निज स्वार्थ वश भी विचरण करे तो भजन स्वयं उसे पकड़े रहता है।


श्लोक – 56
और देस के बसत ही, घटत भजन की बात।
वृन्दावन में स्वारथौ, उलटि भजन है जात।।56।।

अन्यत्र कहीं बसते ही भजन का उत्साह उल्लास घट जाता है और वृन्दावन की महिमा देखो कि यहां स्वार्थ से की गई क्रिया भी भजन स्वरुप हो जाती है।


श्लोक – 57
यद्यपि सब औगुन भरयौ, तदपि करत तुव ईठ।
हितमय वृन्दाविपिन कौं, कैसे दीजै पीठ।।57।।

यद्यपि मैं सब अवगुणों का भण्डार हूँ, फिर भी हे हितस्वरुप वृंदावन! आपकी इच्छा करता हूँ। आपके स्वभाव को देखते हुए कैसे आपका त्याग कर दूँ।


श्लोक – 58
वृंदावन तें अनत ही, जेतिक द्यौस बिहात।
ते दिन लेखे जिनि लिखौ, वृथा अकारथ जात।।58।।

वृंदावन से अन्यत्र जितने भी दिन बीतें उन्हें गिनना ही नहीं चाहिए क्योंकि वह तो सर्वथा निष्फल ही है।


श्लोक – 59
भजन रसमई विपिन धर, समुझि बसै जो कोई।
प्रेम-बीज तिहिं खेत तें, तब ही अंकुर होई।।59।।

श्री वृंदावन की भूमि भजन रस युक्त है, ऐसा समझ कर जो यहाँ बसता है उसके हृदय में प्रेम बीज निश्चित रुप से अंकुरित होता है।


श्लोक – 60
यद्यपि धावत विषै कौं, भजन गहत बिच पानि।
ऐसे वृन्दाविपिन की, सरन गही ध्रुव आनि।।60।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने ऐसे वृंदावन की शरण ली है जहां चंचल मन यदि विषयों की ओर दौड़ता भी है तो भी भजन बीच में ही हाथ पकड़ सँभाल लेता है अर्थात् रक्षा करता है।


श्लोक – 61
बसिबौ वृन्दाविपिन कौ, जिहि तिहि विधि दृढ़ होई।
नहिं चूकै ऐसौ समौ, जतन कीजिए सोई।।61।।

अत: श्री वृंदावन वास जैसे-तैसे भी दृढ़ हो, निश्चित हो, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। यह अवसर खोना नहीं चाहिए।


श्लोक – 62
कहँ तू कहँ वृन्दाविपिन, आनि बन्यौ भल बान।
यहै बात जिय समुझि कै, आपनौ छोड़ सयान।।62।।

हे मन, कहाँ विषय वासित तू और कहाँ परम सच्चिदानन्दघन वृंदावन। हित कृपा से ऐसा सुन्दर सुयोग बना है। यह बात अच्छी तरह समझ कर अपनी चतुराई छोड़ दे और वृंदावन का सेवन कर।


श्लोक – 63
छिन भंगुर तन जात है, छाँड़हि विषै अलोल।
कौड़ी बदले लेहि तू, अद्भुत रतन अमोल।63।।

क्षण भंगुर यह देह काल के गाल में पड़ी है। अत: विषयों का लोभ त्याग और विषय सुख रुपी कौड़ी को छोड़, और श्री वृंदावन रस रुपी अनमोल रत्न प्राप्त कर।


श्लोक – 64
कोटि-कोटि हीरा रतन, अरु मनि विविध अनेक।
मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक।।64।।

करोड़ों रत्नादिक, विविध मणि रुप जड़ सम्पत्ति का झूठा लोभ त्याग एक श्री वृंदावन को ग्रहण कर।


श्लोक – 65
नहिं सो माता पिता नहिं, मित्र पुत्र कोउ नाहीं।
इनमें जो अन्तर करै, बसत वृन्दावन माँहि।।65।।

वह माता-पिता, मित्र-पुत्र स्वप्न में भी अपने नहीं हैं जो वृंदावन के वास में व्यवधान डालते हैं।


श्लोक – 66
नाते नाते जगत के, ते सब मिथ्या मान।
सत्य नित्य आनन्द मय, वृंदावन पहिचान।।66।।

जगत के जितने भी सम्बन्ध हैं, सबको मिथ्या मान और सच्चिदानन्दमय श्री वृंदावन को ही निज सर्वस्व स्वरुप पहिचान।


श्लोक – 67
बसिकै वृन्दाविपिन में, ऐसी मन में राख।
प्रान तजौं बन ना जौ, कहौ बात कोऊ लाख।।67।।

श्री वृंदावन में वास कर यह धारणा मन में दृढ़ कर लो कि चाहे कोई लाख प्रलोभन दे, मैं प्राण तो त्यागूंगा पर श्री वृंदावन को नहीं।


श्लोक – 68
चलत फिरत सुनियत यहै, (श्री) राधावल्लभ लाल।
ऐसे वृन्दाविपिन में, बसत रहौ सब काल।।68।।

जहां श्री राधावल्लभलाल का नामामृत सहज ही चलते-फिरते श्रवण पुटों में पड़ता रहता है। ऐसे मधुर वृंदावन में सदा वास करना चाहिए।


श्लोक – 69
बसिबौ वृंदाविपिन कौ, यह मन में धरि लेहु।
कीजै ऐसौ नेम दृढ़, या रज में परै देह।।69 ।।

वृंदावन वास की आशा मन में दृढ़ करके धारण कर लो। ऐसा सुदृढ़ व्रत लो कि श्री वृंदावन की रज में ही देह पात हो।


श्लोक – 70
खण्ड-खण्ड है जाइ तन, अंग-अंग सत टूक।
वृंदावन नहिं छाँड़िये, छाँड़िबौ है बड़ चूक ।।70।।

चाहे यह शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाए। एक-एक अंग के सौ-सौ टुकड़े हो जाएं। पर वृंदावन मत छोड़ना। क्योंकि वृंदावन का त्याग ही सबसे बड़ी भूल होगी।


श्लोक – 71
पटतर वृंदाविपिन की, कहिं धौं दीजै काहि।
जेहि बन की ध्रुव रैनु में, मरिबौउ मंगल आहि।।71।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं, वृंदावन की समता किससे की जाए जिसकी रज में मृत्यु भी मंगलमयी है


श्लोक – 72
वृंदावन के गुनन सुनि, हित सों रज में लोट।
जेहि सुख के पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोट।।72।।

श्री वृंदावन के गुण श्रवण कर, प्रेम भाव पूर्वक यहां की रज में लोटो। इस सुख की बराबरी अनंत मुक्ति सुख भी नहीं कर सकते।


श्लोक – 73
सुरपति-पसुपति-प्रजापति, रहे भूल तेहि ठौर।
वृंदावन वैभव कहौ, कौन जानिहै और।।73।।

स्वयं ब्रह्मा, शिव इन्द्रादिक भी जहां का वैभव देख बौरा जाते हैं उस वृंदावन की महिमा, वहां का रस विभु और कौन जान सकता है।


श्लोक – 74
यद्यपि राजत अवनि पर, सबते ऊँचौ आहि।
ताकी सम कहिये कहा, श्रीप्रीति बंदत ताहि।।74।।

धरा धाम पर विराजमान होते हुए भी श्री वृंदावन सर्वोपरि है, जिसकी वंदना स्वयं लक्ष्मी पति करते हैं, उसके समान और कौन हो सकता है।


श्लोक – 75
वृंदावन वृंदाविपिन, वृंदा कानन ऐन।,
छिन-छिन रसना रटौ कर, वृंदावन सुख दैन।।75।।

हे जिह्वे तू हर क्षण “वृंदावन, वृंदाविपिन, वृंदाकानन, सुखद श्री धाम, श्री वन” इन्हीं परम मधुर नामों को रट।


श्लोक – 76
वृंदावन आनन्द घन, तो तन नश्वर आहि।
पशु ज्यों खोवत विषै रस, काहि न चिंतत ताहि।।76।।

तेरा यह तन क्षण भंगुर है। पशु की भांति विषय भोग में इसे खो रहा है। आनन्द घन श्री वृन्दावन का चिंतन क्यों नहीं करता।


श्लोक – 77
वृन्दावन वृन्दा कहत, दुरित वृन्द दुरि जाहिं।
नेह बेलि रस भजन की, तब उपजै मन माहिं।।77।।

वृन्दावन। अरे आधा नाम वृन्दा कहते ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और निर्मल चित्त में रस भजन की प्रेम लता उत्पन्न हो जाती है।


श्लोक – 78
वृन्दावन श्रवनन सुनहि, वृन्दावन कौ गान।
मन वच कै अति हेत सौं, वृन्दावन उर आन।।78।।

अत: कानों से श्री वृन्दावन की महिमा सुन। जिह्वा से श्री वृन्दावन की महिमा का गान कर और प्रीति पूर्वक श्री वृन्दावन को हृदय में धारण कर।


श्लोक – 79
वृन्दावन कौ नाम रट, वृन्दावन कौं देखी ।
वृन्दावन से प्रीत कर, वृन्दावन उर लेखी।।79।।

श्री वृन्दावन का नाम रट, श्री वृन्दावन का दर्शन कर, इसी वन्दावन से स्नेह कर और हृदय में श्री वृन्दावन को ही बसा।


श्लोक – 80
वृन्दाविपिन प्रनाम करि, वृन्दावन सुख खान।
जो चाहत विश्राम ध्रुव, वृन्दावन पहचान।।80।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं सर्व सुखों की खान श्री वृन्दावन की शरण पकड़ इसी की वंदना कर। श्री वृन्दावन को पहचान तभी विश्राम पाएगा।


श्लोक – 81
तजि कै वृन्दाविपिन कौं, और तीर्थ जे जात।
छाँड़ि विमल चिंतामणी, कौड़ी कौं ललचात।।81।।

जो श्री वृन्दावन को छोड़ स्वार्थ सिद्धि के लिए अन्यान्य तीर्थों में भटकते हैं वह मृढ़ मानो निर्मल चिंतामणि को त्याग कौड़ी के लिए ललचाते हैं।


श्लोक – 82
पाइ रतन चीन्हौं नहीं, दीन्हों कर तें डार।
यह माया श्री कृष्ण की, मौह्यौ सब संसार।।82।।

मनुष्य देह जैसा रत्न पाकर भी तू इसे व्यर्थ खो रहा है, अपने ही हाथ से फेंक रहा है। अरे श्री कृष्ण की इसी माया ने तो सारे संसार को मोहित कर रखा है।


श्लोक – 83
प्रगट जगत में जगमगै, वृन्दाविपिन अनूप।
नैन अछत दीसत नहीं, यह माया कौ रूप।।83।।

संसार में प्रकट रुप से अनुपम वृन्दावन झिलमिला रहा है, सुशोभित हो रहा है। फिर भी जीव उस रस स्वरुप का अनुभव नहीं कर पाता यह भी माया का ही रुप है।


श्लोक – 84
वृन्दावन को जस अमल, जिहि पुरान में नाहिं।
ताकी बानी परौ जिनि, कबहूँ श्रवनन माहिं।।84।।

श्री वृन्दावन का त्रिभुवन पावन यश जिस पुराण में नहीं है, उसकी बात कभी मेरे कानों में न पड़े।


श्लोक – 85
वृन्दावन कौ जस सुनत, जिनकै नाहिं हुलास।
तिनके पर न कीजिये, तजि ध्रुव तिनकौ पास।।85।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं, श्री वृन्दावन की महिमा सुन कर के जिन्हें उत्साह नहीं होता, हृदय हर्षित नहीं होता, उनका स्पर्श भी नहीं करना चाहिए। उनका संग त्याग ही देना चाहिये।


श्लोक – 86
भुवन चतुर्दश आदि दै, द्वै है सबकौ नास।
इक छत वृन्दाविपिन घन, सुख कौ सहज निवास।।86।।

चौदह भुवन पर्यन्त सब नाशवान है परन्तु यह एक मात्र श्री वृन्दावन धाम सहज सुख धाम है, अविनाशी है।


श्लोक – 87
वृन्दावन इह विधि बसै, तजि कै सब अभिमान।
तृण ते नीचौ आप कौं, जानै सोई जान।।87।।

जो स्वयं को तिनके से भी नीचा मान, सब प्रकार के अहंकार का त्याग कर श्री वृन्दावन में बसता है वही परम लाभ प्राप्त कर पाता है।


श्लोक – 88
कोमल चित्त सब सौं मिलै, कबहूँ कठोर न होइ।
निस्प्रेही निर्वैरता, ताकौ शत्रु न कोइ।।88।।

जो सब प्रकार की इच्छा एवं राग द्वेष से रहित है उसका कहीं कोई शत्रु नहीं है। इसी भाव से वृन्दावन में वास करे, सबसे विनीत हो कर मिले। चित्त में कठोरता न लावे।


श्लोक – 89
दूजे – तीजे जो जुरै, साख-पत्र कछु आय।
ताही सों संतोष करि, रहै अधिक सुख पाय।।89।।

दूसरे तीसरे दिन अनुमति भाव से जो शाक पत्र प्राप्त हो जाए उसी में संतोष मान, निश्चित हो कर सुख से रहे।


श्लोक – 90
देह स्वाद छुटि जाहिं सब, कछु होइ छीन शरीर ।
प्रेम रंग उर में बढ़े, बिहरै जमुना तीर।।90।

देह के सुख स्वाद विस्मृत हो जाएँ, तन कुछ क्षीण हो जाए, परन्तु हृदय में प्रेम रंग प्रवृद्धमान हो, ऐसी अवस्था में यमुना तट पर विचरण करता रहे।


श्लोक – 91
जुगल रूप की झलक उर, नैननि रहै झलकाइ।
ऐसे सुख के रंग में, राखै मनहिं रँगाइ।।91।।

श्री श्यामा श्याम के दिव्यातिमधुर रूप की झलक नैनों में हो और इसी सुख के रंग में मन भी रंगा रहे।


श्लोक – 92
आवै छबि की झलक उर, झलकै नैनन वारि।
चिंतन स्यामल-गौर तन, सकहि न तनहिं संभारि।।92।।

हृदय में गौर स्याम बसते हों, नैनों से प्रेमाश्रु छलकते हों, परम प्रेमास्पद श्री राधावल्लभलाल का स्मरण करते-करते तन की भी सुधि ना रहे।


श्लोक – 93
जीरन पट अति दीन लट, हिये सरस अनुराग।
विवस सघन बन में फिरै, गावत युगल सुहाग।।93।।

चाहे तन पर फटे पुराने वस्त्र हो, देह क्षीण हो, सर्व विधि दीन हो परन्तु हृदय युगल प्रेम रस से सरोबार हो और इसी प्रेमाधिक्य वश वृन्दावन की करील कुंजों में युगल यश गान करता हुआ विचरण करे।


श्लोक – 94
रसमय देखत फिरै बन, नैनन बन रहै आई।
कहुँ-कहुँ आनँद रंग भरी, परै धरनि थहराइ।।94।।

रसिक उपासक श्री वृन्दावन को रस रुप देखते हुए विचरण करे, नैनों में बन की छवि बसी हो और कभी-कभी प्रेमावेशवश पृथ्वी पर गिरे पड़े ।


श्लोक – 95
ऐसी गति ह्वै है कबहुँ, मुख निसरत नहिं बैन।
देखि-देखि वृन्दाविपिन, भरि-भरि ढ़ारै नैन।।95।।

श्री वृन्दावन की शोभा देख-देख नैनों से प्रेमाश्रु प्रवाहित हो रहे हों, प्रेमाधिक्य के कारण मुख से स्वर न निकले। ऐसी अद्भुत दशा मेरी कब होगी?


श्लोक – 96
वृन्दावन तरु-तरु तरे, ढरै नैन सुख नीर।
चिंतत फिरै आबेस बस, स्यामल-गौर सरीर।।96।।


श्री वृन्दावन के वृक्षों की छाँह तले प्राण धन जीवन सर्वस्व गौर स्याम का चिंतन करता फिरे और नैनों से प्रेमाश्रु डरते हों।

श्लोक – 97
परम सच्चिदानंद घन, वृन्दाविपिन सुदेश ।
जामें कबहूँ होत नहिं, माया काल प्रवेस।।97।।

यह सुन्दरता की सीव वृन्दावन परम सच्चिदानन्दघन स्वरुप हैं। जिसमें कभी माया काल का प्रवेश नहीं होता


श्लोक – 98
सारद जो सत कोटि मिलि, कलपन करें विचार।
वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पावै पार।।98।।

यदि कोटि-कोटि सरस्वती कल्पों तक विचार करें तब भी श्री वृन्दावन की सुख संपत्ति का पार नहीं पा सकती।


श्लोक – 99
वृन्दावन आनन्द घन, सब तें उत्तम आहि।
मोते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि ।।99।।

यह श्री वृन्दावन परमानन्द स्वरुप, सर्वोपरि, सर्वोत्कृष्ट है और इधर मैं पतितों का सिरमौर कैसे इसे प्राप्त कर सकता हूँ।


श्लोक – 100
इत बौना आकाश फल, चाहत है मन माहिं।
ताको एक कृपा बिना, और जतन कछु नाहिं।।100।।

यह तो ऐसा ही है जैसे एक बौना व्यक्ति आकाश में लगे फल की आशा करे। अत: एक मात्र कुंवरि श्री राधा की कृपा के बिना और कोई भी उपाय नहीं है।

श्लोक – 101
कुँवरि किशोरी नाम सौं, उपज्यौ दृढ़ विस्वास।
करुणानिधि मृदु चित्त अति, तातें बढ़ी जिय आस।।101।।

परम उदार श्री राधा के नाम का सुदृढ़ विश्वास मेरे हृदय में उत्पन्न हुआ है और उनकी करुणा एवं हृदय की कोमलता का विचार करके हृदय में आशा बढ़ चली है।


श्लोक – 102
जिनको वृन्दाविपिन है, कृपा तिनहि की होइ।
वृन्दावन में तबहि तौ, रहन पाइ है सोइ।।102।।

श्री वृन्दावन जिनका धाम है उन्हीं की कृपा बल से कोई यहाँ वास कर सकता है अन्यथा नहीं।


श्लोक – 103
वृन्दावन सत रतन की, माला गुही बनाइ।
भाग भाग जाके लिखी, सोई पहिरै आइ।।103।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने श्री वृन्दावन यशरुपी सौ रत्नों की माला गूंथ कर बनाई है। जिसके मस्तक पर इसे धारण करने का सौभाग्य संयोग लिखा होगा सोई इसे धारण करेगा।


श्लोक – 104
वृन्दावन सुख रंग की, आशा जो चित्त होइ।
निसि दिन कंठ धरे रहै, छिन नहिं टारै सोइ।।104।।

अत: जिसे श्री वृन्दावन के सुख रंग की इच्छा हो वह इस माला को सदा धारण किये रहे (अर्थात् सदा इसका गान करता रहे) एक क्षण के लिए भी इस रस का चिंतन न छोड़े।


श्लोक – 105
वृन्दावन सत जो कहै, सुनि है नीकी भाँति।
निसिदिन तेहि उर जगमगै, वृन्दावन की काँति।।105।।

जो कोई इस वृन्दावन शत लीला को भाव से कहेगा अथवा सुनेगा उसके हृदय वृन्दावन का प्रकाश सदा झिलमिलाता रहेगा।


श्लोक – 106
वृन्दावन कौ चितवन, यहै दीप उर बार।
कोटि जन्म के तम अगहि, काटि करै उजियार।।106।।

हृदय में श्री वृन्दावन के चिंतन रुपी दीपक को प्रज्ज्वलित कर। यह कोटि जन्मों की अघ राशि रुप अंधकार का नाश कर प्रेम का प्रकाश करेगा।


श्लोक – 107
बसिकै वृन्दाविपिन में, इतनौ बड़ौ सयान।
जुगल चरण के भजन बिन, निमिष न दीजै जान।।107 ।।

श्री वृन्दावन में वास करके सबसे बड़ी चतुराई यही है कि श्री युगल के चरण कमलों के सुमिरन के बिना एक क्षण भी न जाने पाये।


श्लोक – 108
सहज विराजत एक रस, वृन्दावन निज धाम।
ललितादिक सखियन सहित, क्रीड़त स्यामास्याम।।108।।

श्रीराधावल्लभलाल का निज धाम श्री वृन्दावन अनादि काल से सहज शोभा सहित नित्य विद्यमान है जहाँ अपनी ललितादिक सखियों सहित युगल सदैव केलि परायण हैं।


श्लोक – 109
प्रेमसिंधु वृन्दाविपिन, जाकौ आदि न अन्त ।
जहाँ कलोलत रहत नित, युगल किशोर अनादि।।109 ।।

वृन्दावन दिव्यप्रेम का अगाध अबाध सिंधु है जहाँ अनादि काल से श्री राधावल्लभ युगल किशोर कल्लोल मान है।


श्लोक – 110
न्यारौ चौदह लोक तें, वृन्दावन निज भौन।
तहाँ न कबहूँ लगत है, महा प्रलय की पौन।।110।।

युगल का निज धाम यह श्री वृन्दावन चौदह लोकों से विलक्षण है जिसे महाप्रलय की पवन स्पर्श करने में भी असमर्थ है।


श्लोक – 111
महिमा वृन्दाविपिन की, कहि न सकत मम जीह।
जाके रसना द्वै सहस, तिनहूँ काढ़ी लीह।।111।।

मेरी जिह्वा तो श्री वृन्दावन की महिमा कहने में सर्वथा असमर्थ है। अरे दो सहस्र जिह्वाओं वाले शेष भी जिसे कहते कहते थकित हो जाते हैं, हार ही जाते हैं।


श्लोक – 112
एती मति मोपै कहा, सोभा निधि बनराज।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज।।112।।

शोभा की सींवा श्री वृन्दावन की बात कहने के लिए मुझमें मति कहाँ से आयी? फिर भी निर्लज्ज होकर, धृष्टतापूर्वक ही कुछ कहता हूँ।


श्लोक – 113
मति प्रमान चाहत कह्यौ, सोऊ कहत लजात।
सिन्धु अगम जिहिं पार नहिं, कैसे सीप समात।।113।।

यथामति जो कुछ भी कहा, कहते-कहते संकुचित और लज्जित हो रहा हूँ। जिसका कोई परिवार नहीं ऐसा सिंधु भला सीप में कैसे समा जाए।


श्लोक – 114
या मन के अवलंब हित, कीन्हौं आहि उपाय।
वृन्दावन रस कहन में, मति कबहूँ उरझाय।।114।।

मैंने तो अपने मन को कुछ आधार देने के लिए यह उपाय किया है जिससे श्री वृन्दावन रस का वर्णन करते हुए मन बुद्धि कभी इसमें लग जाएँ।


श्लोक – 115
सोलह सै ध्रुव छयासिया, पून्यौ अगहन मास।
यह प्रबन्ध पूरन भयौ, सुनत होत अघ नास।।115।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं संवत सौलह सौ छयासी की मार्गशीर्ष पूर्णिमा को यह “वृन्दावन सत” नामक ग्रंथ पूर्ण हुआ जिसके श्रवण मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है।


श्लोक – 116
दोहा वृन्दाविपिन के, इकसत षोड़श आहि।
जो चाहत रस रीति फल, छिन-छिन ध्रुव अवगाहि।।116।।

श्री वृन्दावन यश के यह एक सौ सोलह दोहे हैं। यदि आप रस रीति का फल चाहते हैं तो प्रतिक्षण इस वृन्दावन महिमा सुधा धारा में अवगाहन करते रहो।


।। इति श्री वृन्दावन सत लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।

“जा पर श्री हरिवंश कृपाला।
ता की बाँह गहे दोऊ लाला।।”

जय जय श्री वृंदावन
जय जय श्री राधे