Posted on Leave a comment

श्रीराधाकवचम्

श्री राधिकायै नम:

।।अथ श्रीराधाकवचम्।।

महेश्वर उवाच:-

श्रीजगन्मङ्गलस्यास्य कवचस्य प्रजापति:।।1।।

ऋषिश्चन्दोऽस्य गायत्री देवी रासेश्वरी स्वयम्।
श्रीकृष्णभक्‍तिसम्प्राप्तौ विनियोग: प्रकीर्तित:।।2।।

शिष्याय कृष्णभक्‍ताय ब्रह्मणाय प्रकाश्येत्।
शठाय परशिष्याय दत्त्वा मृत्युमवाप्नुयात्।।3।।

राज्यं देयं शिरो देयं न देयं कवचं प्रिये।
कण्ठे धृतमिदं भक्त्या कृष्णेन परमात्मना।।4।।

मया दृष्टं च गोलोके ब्रह्मणा विष्णुना पुरा।
ॐ राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च।।5।।

कृष्णेनोपासितो मन्त्र: कल्पवृक्ष: शिरोऽवतु।
ॐ ह्रीं श्रीं राधिकाङेन्तं वह्निजायान्तमेव च।।6।।

कपालं नेत्रयुग्मं च श्रोत्रयुग्मं सदावतु।
ॐ रां ह्रीं श्रीं राधिकेति ङेन्तं वह्नि जायान्तमेव च।।7।।

मस्तकं केशसङ्घांश्च मन्त्रराज: सदावतु।
ॐ रां राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च।।8।।

सर्वसिद्धिप्रद: पातु कपोलं नासिकां मुखम्।
क्लीं श्रीं कृष्णप्रियाङेन्तं कण्ठं पातु नमोऽन्तकम्।।9।।

ॐ रां रासेश्वरीङेन्तं स्कन्धं पातु नमोऽन्तकम्।
ॐ रां रासविलासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु।।10।।

वृन्दावनविलासिन्यै स्वाहा वक्ष: सदावतु।
तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा पातु नितम्बकम्।।11।।

कृष्णप्राणाधिकाङेन्तं स्वाहान्तं प्रणवादिकम्।
पादयुग्मं च सर्वाङ्गं सन्ततं पातु सर्वत:।।12।।

राधा रक्षतु प्राच्यां च वह्नौ कृष्णप्रियावतु।
तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा पातु नितम्बकम्।।13।।

पश्चिमे निर्गुणा पातु वायव्ये कृष्णपूजिता।
उत्तरे सन्ततं पातु मूलप्रकृतिरीश्वरी।।14।।

सर्वेश्वरी सदैशान्यां पातु मां सर्वपूजिता।
जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे तथा।।15।।

महाविष्णोश्च जननी सर्वत: पातु सन्ततं।
कवचं कथितं दुर्गे श्रीजगन्मङ्गलं परम्।।16।।

यस्मै कस्मै न दातव्य गुढाद् गुढतरं परम्।
तव स्नेहान्मयाख्यातं प्रवक्‍तं न कस्यचित्।।17।।

गुरुमभ्यर्च्य विधिवद् वस्त्रालङ्कारचन्दनै:।
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ धृत्वा विष्णोसमो भवेत्।।18।।

शतलक्षजपेनैव सिद्धं च कवचं भवेत्।
यदि स्यात् सिद्धकवचो न दग्धो वह्निना भवेत्।।19।।

एतस्मात् कवचाद् दुर्गे राजा दुर्योधन: पुरा।
विशारदो जलस्तम्भे वह्निस्तम्भे च निश्चितम्।।20।।

मया सनत्कुमाराय पुरा दत्तं च पुष्करे।
सूर्यपर्वणि मेरौ च स सान्दीपनये ददौ।।21।।

बलाय तेन दत्तं च ददौ दुर्योधनाय स:।
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्‍तो भवेन्नर:।।22।।

नित्यं पठति भक्त्येदं तन्मन्त्रोपासकश्च य:।
विष्णुतुल्यो भवेन्नित्यं राजसूयफलं लभेत्।।23।।

स्नानेन सर्वतीर्थानां सर्वदानेन यत्फलम्।
सर्वव्रतोपवासे च पृथिव्याश्च प्रदक्षिणे।।24।।

सर्वयज्ञेषु दीक्षायां नित्यं च सत्यरक्षणे।
नित्यं श्रीकृष्णसेवायां कृष्णनैवेद्यभक्षणे।।25।।

पाठे चतुर्णां वेदानां यत्फलं च लभेन्नर:।
यत्फलं लभते नूनं पठनात् कवचस्य च।।26।।

राजद्वारे श्मशाने च सिंहव्याघ्रान्विते वने।
दावाग्नौ सङ्कटे चैव दस्युचौरान्विते भये।।27।।

कारागारे विपद्ग्रस्ते घोरे च दृढबन्धने।
व्याधियुक्‍तो भवेन्मुक्‍तो धारणात् कवचस्य च।।28।।

इत्येतत्कथितं दुर्गे तवैवेदं महेश्वरि।
त्वमेव सर्वरूपा मां माया पृच्छसि मायया।।29।।

श्रीनारायण उवाच।

इत्युक्त्वा राधिकाख्यानं स्मारं च माधवम्।
पुलकाङ्कितसर्वाङ्ग: साश्रुनेत्रो बभुव स:।।30।।

न कृष्णसदृशो देवो न गङ्गासदृशी सरित्।
न पुष्करसमं तीर्थं नाश्रामो ब्राह्मणात् पर।।31।।

परमाणुपरं सूक्ष्मं महाविष्णो: परो महान्।
नभ परं च विस्तीर्णं यथा नास्त्येव नारद।।32।।

तथा न वैष्णवाद् ज्ञानी यिगीन्द्र: शङ्करात् पर:।
कामक्रोधलोभमोहा जितास्तेनैव नारद।।33।।

स्वप्ने जागरणे शश्वत् कृष्णध्यानरत: शिव:।
यथा कृष्णस्तथा शम्भुर्न भेदो माधवेशयो:।।34।।

यथा शम्भुर्वैष्णवेषु यथा देवेषु माधव:।
तथेदं कवचं वत्स कवचेषु प्रशस्तकम्।।35।।

।।इति श्रीब्रह्मवैवर्ते श्रीराधिकाकवचं सम्पूर्णम्।।

जय जय श्री राधे

Posted on Leave a comment

श्री राधा चालीसा

॥ श्री राधा चालीसा ॥

वैसे तो परम करुणामयी श्री राधारानी का श्री नाम ही इस संसार के भाव से न केवल पार लगाने वाला है बल्कि परम आनंद प्रदान कर नित्य लीला मे प्रवेश भी देने वाला है। किंतु किशोरी जी के भक्तो का तो जीवन आधार ही उनका नाम, रूप, लीला और धाम का स्मरण करना स्तुति करना।



पहले भी हमने श्री राधा कृपा कटाक्ष और श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष जैसे स्तुतियों को पोस्ट किया है अतः इसी श्रृंखला मे श्री किशोरी जी की कृपा से “श्री राधा चालीसा“ का पाठ करेंगे।

सुर-मुनि-देवता भी जिस ब्रज धाम के रज रूप मे निवास करने को भी लालायित रहते है, वहाँ मानव तन लेकर वास तो केवल श्री किशोरी जी के श्री चरणो की कृपा से ही मिल सकती है। श्री राधा चालीसा का पाठ करने से श्री प्रिय-प्रियतम के निज धाम वृंदावन मे वास करने का फल प्राप्त होता है और उनके चरणो के छावँ मे प्राणी मात्र स्वयं को इस भयावह संसार से दूर रख सकता है


।।दोहा।।

श्री राधे वुषभानुजा , भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी , प्रानावौ बारम्बार ।।
जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिय सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये सुन्दर सुखद ललाम ।।

SHRIRADHE VRISHABHANUJA, BHAKTANI PRANAADHAR |
VRINDAVIPIN VIHARINNI, PRANNAVOM BARAMBAR ||
JAISO TAISO RAVAROU, KRISHNA-PRIYA SUKHADHAM |
CHARAN SHARAN NIJ DIJIYE, SUNDAR SUKHAD LALAM ||


।।चौपाई।।

जय वृषभानु कुँवरी श्री श्यामा,
कीरति नंदिनी शोभा धामा ।।
नित्य बिहारिनी श्याम आधारा,
अमित मोद मंगल दातारा ।।1।।

JAI VRISHABHAN KUNVARI SHRI SHYAMA ,
KIRATI NANDINI SHOBHA DHAMA ||
NITYA VIHARINI SHYAM ADHARA ,
AMIT BODH MANGAL DATARA ||1||


।।चौपाई।।

रास विलासिनी रस विस्तारिणी,
सहचरी सुभग यूथ मन भावनी ।।
नित्य किशोरी राधा गोरी ,
श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ।।
करुणा सागर हिय उमंगिनी,
ललितादिक सखियन की संगिनी ।।2।।

RAAS VILASINI RAS VISTARINI ,
SAHACHARI SUBHAG YUTH MAN BHAVNI ||
NITYA KISHORI RADHA GORI |
SHYAM PRANNADHAN ATI JIYA BHORI ||
KARUNA SAGARI HIYA UMANGINI ,
LALITADIK SAKHIYAN KI SANGANI ||2||


।।चौपाई।।

दिनकर कन्या कुल विहारिनी,
कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनी ।।
नित्य श्याम तुमररौ गुण गावै,
राधा राधा कही हरशावै ।।3।।

DINKAR KANYA KUUL VIHARINI ,
KRISHNA PRANA PRIY HIY HULSAVANI ||
NITYA SHYAM TUMHARO GUN GAVEN ,
SHRI RADHA RADHA KAHI HARSHAVAHIN ||3||


।।चौपाई।।

मुरली में नित नाम उचारें,
तुम कारण लीला वपु धारें ।।
प्रेम स्वरूपिणी अति सुकुमारी,
श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ।।4।।

MURALI MEIN NIT NAAM UCHAREIN ,
TUM KARANN LILA VAPU DHAREIN ||
PREMA SVAROOPINI ATI SUKUMARI ,
SHYAM PRIYA VRASHABHANU DULARI ||4||


।।चौपाई।।

नवल किशोरी अति छवि धामा,
द्दुति लधु लगै कोटि रति कामा ।।
गोरांगी शशि निंदक वंदना,
सुभग चपल अनियारे नयना ।।5।।

NAVALA KISHORI ATI CHABI DHAMA ,
DHYUTI LAGHU LAAG KOTI RATI KAAMA ||
GOURANGI SHASHI NINDAK VADANA ,
SUBHAG CHAPAL ANIYARE NAINA ||5||


।।चौपाई।।

जावक युत पद पंकज चरना,
नुपुर ध्वनि प्रीतम मन हरना ।।
संतत सहचरी सेवा करहिं,
महा मोद मंगल मन भरहीं ।।6।।

JAVAK YUTH PAD PANKAJ CHARANA ,
NOOPUR DHVANI PRITAM MAN HARNA ||
SANTATA SAHACHARI SEVA KARHIN ,
MAHA MOD MANGAL MAN BHARAHIN ||6||


।।चौपाई।।

रसिकन जीवन प्राण अधारा,
राधा नाम सकल सुख सारा ।।
अगम अगोचर नित्य स्वरूपा,
ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ।।7।।

RASIKAN JEEVAN PRANA ADHARA ,
RADHA NAAM SAKAL SUKH SAARA ||
AGAM AGOCHAR NITYA SVAROOPA ,
DHYAN DHARAT NISHIDIN BRAJABHOOPA ||7||


।।चौपाई।।

उपजेउ जासु अंश गुण खानी,
कोटिन उमा राम ब्रह्मिनी ।।
नित्य धाम गोलोक विहारिन ,
जन रक्षक दुःख दोष नसावनि ।।8।।

UPJEOO JASU ANSH GUN KHANI ,
KOTIN UMA RAMA BRAHMANI ||
NITYA DHAM GOLOK BIHARINI ,
JAN RAKSHAK DUKH DOSH NASAVANI ||8||


।।चौपाई।।

शिव अज मुनि सनकादिक नारद,
पार न पाँई शेष अरू शारद ।।
राधा शुभ गुण रूप उजारी,
निरखि प्रसन होत बनवारी ।।9।।

SHIV AJ MUNI SANAKADIK NAARAD ,
PAAR NA PAAYN SESH ARU SHARAD ||
RADHA SHUBH GUN ROOPA UJARI ,
NIRAKHI PRASANNA HOT BANVARI ||9||


।।चौपाई।।

ब्रज जीवन धन राधा रानी,
महिमा अमित न जाय बखानी ।।
प्रीतम संग दे ई गलबाँही ,
बिहरत नित वृन्दावन माँहि ।।10।।

BRAJ JEEVAN DHAN RADHA RANI ,
MAHIMA AMIT NA JAY BAKHANI ||
PREETAM SANG DIYE GAL BAAHIN,
BIHARATA NIT VRINDAVAN MAAHIN ||10||


।।चौपाई।।

राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा,
एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ।।
श्री राधा मोहन मन हरनी,
जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ।।11।।

RADHA KRISHNA KRISHNA HAI RADHA ,
EK ROOP DOUU-PREETI AGAADHA ||
SHRI RADHA MOHAN MAN HARNI ,
JAN SUKH PRADA PRAFULLIT BADANI ||11||


।।चौपाई।।

कोटिक रूप धरे नंद नंदा,
दर्श करन हित गोकुल चंदा ।।
रास केलि करी तुहे रिझावें,
मान करो जब अति दुःख पावें ।।12।।

KOTIK ROOP DHARE NAND NANDA ,
DARASH KARAN HITH GOKUL CHANDA ||
RAAS KELI KAR TUMHEN RIJHAVEN ,
MAAN KARO JAB ATI DUKH PAAVEN ||12||


।।चौपाई।।

प्रफुलित होत दर्श जब पावें,
विविध भांति नित विनय सुनावे ।।
वृन्दारण्य विहारिनी श्यामा,
नाम लेत पूरण सब कामा ।।13।।

PRAFFULLIT HOTH DARASH JAB PAAVEN ,
VIVIDH BHANTI NIT VINAY SUNAVEN||
VRINDARANNYA VIHARINNI SHYAM ,
NAAM LETH PURAN SAB KAMA ||13||


।।चौपाई।।

कोटिन यज्ञ तपस्या करहु,
विविध नेम व्रतहिय में धरहु ।।
तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें,
जब लगी राधा नाम न गावें ।।14।।

KOTIN YAGYA TAPASYA KARUHU ,
VIVIDH NEM VRAT HIY MEN DHARHU||
TAUU NA SHYAM BHAKTAHI APNAVEN ,
JAB LAGI NAAM RADHA NA GAAVEN ||14||


।।चौपाई।।

व्रिन्दाविपिन स्वामिनी राधा,
लीला वपु तब अमित अगाधा ।।
स्वयं कृष्ण पावै नहीं पारा,
और तुम्हैं को जानन हारा ।।15।।

VRINDA VIPIN SVAMINI RADHA ,
LEELA VAPU TUVA AMIT AGADHA ||
SVAYAM KRISHNA PAVAHIN NAHIN PAARA ,
AUR TUMHEN KO JANANI HAARA ||15||


।।चौपाई।।

श्री राधा रस प्रीति अभेदा,
सादर गान करत नित वेदा ।।
राधा त्यागी कृष्ण को भाजिहैं,
ते सपनेहूं जग जलधि न तरिहैं ।।16।।

SHRIRADHA RAS PREETI ABHEDA ,
SAADAR GAAN KARAT NIT VEDA||
RADHA TYAGI KRISHNA JO BHAJIHAI ,
TE SAPNEHUN JAG JALADHI NA TARIHAI||16||


।।चौपाई।।

कीरति कुँवारी लाडली राधा,
सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ।।
नाम अमंगल मूल नसावन,
त्रिविध ताप हर हरी मनभावना ।।17।।

KIRATI KUMARI LAADALI RADHA ,
SUMIRAT SAKAL MITAHIN BHAV BADA ||
NAAM AMANGAL MOOL NASAVAN ,
VIVIDH TAAP HAR HARI MAN BHAVAN ||17||


।।चौपाई।।

राधा नाम लेइ जो कोई ,
सहजहि दामोदर बस होई ।।
राधा नाम परम सुखदाई,
भजतहीं कृपा करहिं यदुराई ।।
यशुमति नंदन पीछे फिरेहै,
जी कोऊ राधा नाम सुमिरिहै ।।18।।

RADHA NAAM LEI JO KOI,
SAHAJ HI DAMODAR BAS HOI ।।
RADHA NAAM PARAM SUKHDAYI ,
BHAJATAHIN KRIPA KAREN YADURAI ||
YADUPATI NANDAN PEECHE PHIRIHAIN ,
JO KOUU RADHA NAAM SUMIRIHAIN||18||


।।चौपाई।।

रास विहारिनी श्यामा प्यारी,
करहु कृपा बरसाने वारी ।।
वृन्दावन है शरण तिहारी,
जय जय जय वृषभानु दुलारी ।।19।।

RAAS VIHARINI SHYAMA PYARI ,
KARUHU KRIPA BARSANE VAARI ||
VRINDAVAN HAI SHARAN TUMHARI ,
JAI JAI JAI VRSHABHANU DULARI ||19||


।।दोहा।।

श्री राधा सर्वेश्वरी ,
रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहूँ निरंतर बास मै,
श्री वृन्दावन धाम ।।

SHRI RADHA SARVESHWARI ,
RASIKESHVAR GHANSHYAM|
KARUHUN NIRANTAR VAAS MAI ,
SRI VRINDAVAN DHAM ||


इस पाठ को नित्य समय निकाल कर जरुर रोज पढ़ा करे 

Posted on Leave a comment

श्री राधा कृपा कटाक्ष

॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥

श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र का गायन वृन्दावन के विभिन्न मन्दिरों में नित्य किया जाता है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक नित्यनिकुंजेश्वरि श्रीराधा और उनके प्राणवल्लभ नित्यनिकुंजेश्वर ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की सुर-मुनि दुर्लभ कृपाप्रसाद अनायास ही प्राप्त कर लेता है।
श्री राधा कृपा कटाक्ष को नित्य पढ़ने और सुनने से श्री राधे के चरणों मे शरण मिलती है और उनके चरणो मे मन लगता है।

“राधा साध्यम साधनं यस्य राधा, मंत्रो राधा मन्त्र दात्री च राधाl
सर्वं राधा जीवनम् यस्य राधा, राधा राधा वाचि किम तस्य शेषम ll”


“भावार्थ”: “राधा” साध्य है उनको पाने का साधन भी राधा नाम ही है। मन्त्र भी राधा है और मन्त्र देने वाली गुरु भी स्वयं राधा जी ही है सब कुछ राधा नाम में ही समाया हुआ है और सबका जीवन प्राण भी राधा ही है राधा नाम के अतिरिक्त ब्रम्हांड में शेष बचता क्या है?

तो आइये श्री राधा नाम की महिमा की धारा जिसे स्वयं महादेव ने बहाया हो और जो सदा समाधि के दौरान राधा नाम को रटते रहते रहते है उनके कृपा से इस नाम की धारा मे हम भी बहते रहे….


(श्लोक – 1)
मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।
व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१)

munīndra-vṛnda-vandite triloka-śoka-hāriṇi
prasanna-vaktra-paṇkaje nikuñja-bhū-vilāsini
vrajendra-bhānu-nandini vrajendra-sūnu-saṅgate
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||1||

भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१)

O goddess worshiped by the kings of sages, O goddess who remove the sufferings of the three worlds, O goddess whose face is a blossoming lotus, O goddess who enjoy pastimes in the forest, O daughter of Vrishhabhanu, O companion of Vraja’s prince, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 2)
अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते, प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (२)

aśoka-vṛkṣa-vallarī-vitāna-maṇḍapa-sthite
pravāla-vāla-pallava prabhā ’ruṇāṅghri-komale
varābhaya-sphurat-kare prabhūta-sampadālaye
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||2||

भावार्थ : आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (२)

O goddess staying in a vine-cottage by an ashoka tree, O goddess whose delicate feet are as splendid as red blossoms, O goddess whose hand grants fearlessness, O abode of transcendental opulence’s, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 3)
अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां, सुविभ्रम ससम्भ्रम दृगन्तबाणपातनैः।
निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (३)

anaṅga-raṅga-maṅgala-prasaṅga-bhaṅgura-bhruvāṁ
sa-vibhramaṁ sa-sambhramaṁ dṛganta-bāṇa-pātanaiḥ
nirantaraṁ vaśī-kṛta-pratīti-nanda-nandane
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||3||

भावार्थ : रास क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में आप अपनी बाँकी भृकुटी से आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहज कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा करती रहती हैं। आप श्री नन्दकिशोर को निरंतर अपने बस में किये रहती हैं, हे जगज्जननी वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (३)

O goddess who, playfully shooting the arrows of Your glances from the curved bows of Your auspicious, amorous eyebrows, have completely subdued Nanda’s son [Krishna], when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 4)
तड़ित्सुवणचम्पक प्रदीप्तगौरविगहे, मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्ङले।
विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशावलोचने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (४)

taḍit-suvarṇa-campaka-pradīpta-gaura-vigrahe
mukha-prabhā-parāsta-koṭi-śāradendu-maṇḍale
vicitra-citra-sañcarac-cakora-śāva-locane
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||4||

भावार्थ : आप बिजली के सदृश, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी आभा वाली हैं, आप दीपक के समान गोरे अंगों वाली हैं, आप अपने मुखारविंद की चाँदनी से शरद पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा को लजाने वाली हैं। आपके नेत्र पल-पल में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर शिशु के समान हैं, हे वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (४)

O goddess whose form is as splendid as champaka flowers, gold, and lightning, O goddess whose face eclipses millions of autumn moons, O goddess whose eyes are wonderful, restless young chakora birds, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 5)
मदोन्मदातियौवने प्रमोद मानमणि्ते, प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपणि्डते।
अनन्यधन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (५)

madonmadāti-yauvane pramoda-māna-maṇḍite
priyānurāga-rañjite kalā-vilāsa-paṇḍite
ananya-dhanya-kuñja-rājya-kāma keli-kovide
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||5||

भावार्थ : आप अपने चिर-यौवन के आनन्द के मग्न रहने वाली है, आनंद से पूरित मन ही आपका सर्वोत्तम आभूषण है, आप अपने प्रियतम के अनुराग में रंगी हुई विलासपूर्ण कला पारंगत हैं। आप अपने अनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंज-राज के प्रेम क्रीड़ा की विधा में भी प्रवीण हैं, हे निकुँजेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (५)

O young girl intoxicated with passion, O goddess decorated with cheerful jealous anger, O goddess who passionately love Your beloved Krishna, O goddess learned in playful arts, O goddess expert at enjoying amorous pastimes in the kingdom of the peerlessly opulent forest groves of Vrindavana, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 6)
अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते, प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुमि्भकुम्भसुस्तनी।
प्रशस्तमंदहास्यचूणपूणसौख्यसागरे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (६)

aśeṣa-hāva-bhāva-dhīra-hīra-hāra-bhūṣite
prabhūta-śāta-kumbha-kumbha-kumbhi kumbha-sustani
praśasta-manda-hāsya-cūrṇa-pūrṇa-saukhya-sāgare
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||6|

भावार्थ : आप संपूर्ण हाव-भाव रूपी श्रृंगारों से परिपूर्ण हैं, आप धीरज रूपी हीरों के हारों से विभूषित हैं, आप शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान अंगो वाली है, आपके पयोंधर स्वर्ण कलशों के समान मनोहर हैं। आपकी मंद-मंद मधुर मुस्कान सागर के समान आनन्द प्रदान करने वाली है, हे कृष्णप्रिया माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (६)

O goddess decorated with a pearl necklace of bold amorous hints, O goddess as fair as gold, O goddess whose breasts are great golden waterpots, O ocean of happiness filled with the scented powders of gentle smiles, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 7)
मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोलते, लतागलास्यलोलनील लोचनावलोकने।
ललल्लुलमि्लन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (७)

mṛṇāla-vāla-vallarī taraṅga-raṅga-dor-late
latāgra-lāsya-lola-nīla-locanāvalokane
lalal-lulan-milan-manojña mugdha-mohanāśrite
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||7||

भावार्थ : जल की लहरों से कम्पित हुए नूतन कमल-नाल के समान आपकी सुकोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन के झोंकों से नाचते हुए लता के अग्र-भाग के समान अवलोकन करने वाले हैं। सभी के मन को ललचाने वाले, लुभाने वाले मोहन भी आप पर मुग्ध होकर आपके मिलन के लिये आतुर रहते हैं ऎसे मनमोहन को आप आश्रय देने वाली हैं, हे वृषभानुनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (७)

O goddess whose arms are lotus stalks dancing on the waves, O goddess whose dark eyes are dancing vines, O playful, beautiful, charming goddess, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 8)
सुवर्ण्मालिकांचिते त्रिरेखकम्बुकण्ठगे, त्रिसुत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिअति।
सलोलनीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (८)

suvarṇa-mālikāñcita-trirekha-kambu-kaṇṭhage
tri-sūtra-maṅgalī-guṇa-tri-ratna-dīpti-dīdhiti
salola-nīla-kuntala prasūna-guccha-gumphite
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||8||

भावार्थ : आप स्वर्ण की मालाओं से विभूषित है, आप तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुन्दर कण्ठ वाली हैं, आपने अपने कण्ठ में प्रकृति के तीनों गुणों का मंगलसूत्र धारण किया हुआ है, इन तीनों रत्नों से युक्त मंगलसूत्र समस्त संसार को प्रकाशमान कर रहा है। आपके काले घुंघराले केश दिव्य पुष्पों के गुच्छों से अलंकृत हैं, हे कीरतिनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (८)

O goddess who wear a golden necklace on the three-lined conchshell of Your neck, O goddess splendid with three jasmine garlands and three jewelled necklaces, O goddess whose moving locks of dark hair are decorated with bunches of flowers, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 9)
नितम्बबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण, प्रशस्तरत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले।
करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (९)

nitamba-bimba-lambamāna-puṣpa-mekhalā-guṇe
praśasta-ratna-kiṅkiṇī-kalāpa-madhya mañjule
karīndra-śuṇḍa-daṇḍikā-varoha-saubhagoruke
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||9||

भावार्थ : आपका उर भाग में फूलों की मालाओं से शोभायमान हैं, आपका मध्य भाग रत्नों से जड़ित स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित है। आपकी जंघायें हाथी की सूंड़ के समान अत्यन्त सुन्दर हैं, हे ब्रजनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (९)

O goddess who wear a sash of flowers on Your curved hips, O goddess charming with a sash of tinkling jewelled bells, O goddess whose beautiful thighs punish the regal elephant’s trunk, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 10)
अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत्, समाजराजहंसवंश निक्वणातिग।
विलोलहेमवल्लरी विडमि्बचारूचं कमे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१०)

aneka-mantra-nāda-mañju-nūpurā-rava-skhalat
samāja-rāja-haṁsa-vaṁśa-nikvaṇāti-gaurave
vilola-hema-vallarī-viḍambi-cāru-caṅkrame
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||10||

भावार्थ : आपके चरणों में स्वर्ण मण्डित नूपुर की सुमधुर ध्वनि अनेकों वेद मंत्रो के समान गुंजायमान करने वाले हैं, जैसे मनोहर राजहसों की ध्वनि गूँजायमान हो रही है। आपके अंगों की छवि चलते हुए ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे स्वर्णलता लहरा रही है, हे जगदीश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१०)

O goddess whose anklets’ tinkling is more beautiful than the sounds of many mantras and the cooing of many regal swans, O goddess whose graceful motions mock the moving golden vines, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 11)
अनन्तकोटिविष्णुलोक नमपदमजाचिते, हिमादिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे।
अपारसिदिवृदिदिग्ध -सत्पदांगुलीनखे, कदा करिष्यसीह मां कृपा -कटाक्ष भाजनम्॥ (११)

ananta-koṭi-viṣṇu-loka-namra-padmajārcite
himādrijā-pulomajā-viriñcajā-vara-prade
apāra-siddhi-ṛddhi-digdha-sat-padāṅgulī-nakhe
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||11||

भावार्थ : अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं, श्रीपार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी चरण वन्दना कर वरदान पाया है। आपके चरण-कमलों की एक उंगली के नख का ध्यान करने मात्र से अपार सिद्धि की प्राप्ति होती है, हे करूणामयी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (११)

O goddess worshiped by Brahma, O goddess to whom countless millions of Vaishnavas bow down, O goddess who give blessings to Parvati, shaci, and Sarasvati, O goddess whose toenails are anointed with limitless opulence’s and mystic perfections, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 12)
मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी, त्रिवेदभारतीयश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी, ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते॥ (१२)

makheśvari kriyeśvari svadheśvari sureśvari
triveda-bhāratīśvari pramāṇa-śāsaneśvari
rameśvari kṣameśvari pramoda kānaneśvari
vrajeśvari vrajādhipe śrī rādhike namo ’stu te ||12||

भावार्थ : आप सभी प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप सब देवताओं की स्वामिनी हैं, आप तीनों वेदों की स्वामिनी है, आप संपूर्ण जगत पर शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं, आप क्षमा देवी की स्वामिनी हैं, आप आमोद-प्रमोद की स्वामिनी हैं, हे ब्रजेश्वरी! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमन है। (१२)

O queen of Vedic sacrifices, O queen of pious activities, O queen of the material world, O queen of the demigods, O queen of Vedic scholarship, O queen of knowledge, O queen of the goddesses of fortune, O queen of patience, O queen of Vrindavana, the forest of happiness, O queen of Vraja, O empress of Vraja, O Sri Radhika, obeisance’s to You!


(श्लोक – 13)
इतीदमतभुतस्तवं निशम्य भानुननि्दनी, करोतु संततं जनं कृपाकटाक्ष भाजनम्।
भवेत्तादैव संचित-त्रिरूपकमनाशनं, लभेत्तादब्रजेन्द्रसूनु मण्डलप्रवेशनम्॥ (१३)

itī mam adbhutaṁ-stavaṁ niśamya bhānu-nandinī
karotu santataṁ janaṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam
bhavet tadaiva-sañcita-tri-rūpa-karma-nāśanaṁ
bhavet tadā-vrajendra-sūnu-maṇḍala-praveśanam ||13||

भावार्थ : हे वृषभानु नंदिनी! मेरी इस निर्मल स्तुति को सुनकर सदैव के लिए मुझ दास को अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करने की कृपा करो। केवल आपकी दया से ही मेरे प्रारब्ध कर्मों, संचित कर्मों और क्रियामाण कर्मों का नाश हो सकेगा, आपकी कृपा से ही भगवान श्रीकृष्ण के नित्य दिव्यधाम की लीलाओं में सदा के लिए प्रवेश हो जाएगा। (१३)

Upon hearing this most astonishing prayer of mine being recited by a devotee, may Sri Vrishhabhanu-nandini constantly make him the object of Her most merciful sidelong glance. At that time all his karmic reactions – whether mature, fructifying, or lying in seed – will be completely destroyed, and then he will gain entrance into the assembly of Nandanandana’s eternal loving associates.

॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥


इस पाठ को नित्य समय निकाल कर जरुर रोज पढ़ा करे 

Posted on Leave a comment

श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष

श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्तोत्र स्वयं भगवान शंकराचार्य द्वारा रचित है इसमे कुल 9 श्लोक है। ये श्लोक संस्कृत मे लिखे गए एवम् इनका गायन अति मधुर और मन को शांति देने वाला है।

वैसे तो श्री कृष्ण योगेश्वर है परंतु इनका माधुर्य रूप किसी भी जप, तप, यज्ञ या पूजा पद्धति के वश मे नही अतः ये सर्व स्वतंत्र है। केवल निश्वर्थ प्रेम भावना से ही इनके चरणों की प्रीति प्राप्त की जा सकती है।

ऐसे मे भगवान शंकराचार्य ने इस स्त्रोत की रचना कर जन साधारण के लिए श्री कृष्ण के भक्ति मार्ग सुगम और सरल बना दिया। यदि कोई भक्त किसी पूजा पद्धति से ना भी जुड़े केवल इस स्त्रोत का नित्य पढ़ करे तो जल्दी ही श्री कृष्ण उसे अपनी प्रेम-भक्ति दान देते है और उस भवसागर से पार लगाते है।

एक बार यदि इस स्त्रोत के शब्द हमारे कंठ को अपना घर बना लिए तो उस भक्त को श्री कृष्ण की कृपा सहज ही प्राप्त होती है तो आइये रोज इस स्त्रोत पाठ आज से ही शुरू करे

सर्वप्रथम भगवान शंकराचार्य ने श्री कृष्ण की स्तुति इन श्लोको से की है –

मूकं करोति वाचालं पंगु लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्।।

अर्थात्-जिनकी कृपा से गूंगे बहुत बोलने लगते हैं; पंगु पहाड़ को लांघ जाते हैं, उन परमानंद स्वरूप माधव की में वन्दना करता हूँ।

भगवान स्वयं नारदजी से कहत –

नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।

अर्थात्-भगवान तो केवल वहीं विराजते हैं, जहां उनके भक्त उनका गुणगान करते हैं। ‘कलौ केशव कीर्तनात्’-कलिकाल मे भगवान केशव का कीर्तन ही भवसागर से पर होने का एकमात्र साधन है।


॥ श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥

(श्लोक – 1)
व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं, स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्।
सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं, अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्॥१॥

Bhaje vrajaika mandanam, samastha papa khandanam,
Swabhaktha chitha ranjanam, sadaiva nanda nandanam,
Supincha gucha masthakam, sunada venu hasthakam,
Ananga raga sagaram, Namami Krishna sagaram., 1

भावार्थ–व्रजभूमि के एकमात्र आभूषण, समस्त पापों को नष्ट करने वाले तथा अपने भक्तों के चित्त को आनन्द देने वाले नन्दनन्दन को सदैव भजता हूँ, जिनके मस्तक पर मोरमुकुट है, हाथों में सुरीली बांसुरी है तथा जो प्रेम-तरंगों के सागर हैं, उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।

I pray Him, who is the ornament to the land of Vraja, Who cuts off entire sins, Who pleases the mind of his devotees, And who is the godly son of Nanda Gopa. Salutations to the sea like Lord Krishna, Who decorates his head with peacock feathers,Who has the sweet sounding flute in his hand, And who is the music of the ocean of love.


(श्लोक – 2)
मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं, विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्।
करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं, महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्ण वारणम्॥२॥

Manoja garva mochanam vishala lola lochanam,
Vidhootha gopa sochanam namami padma lochanam,
Kararavindha bhoodaram smithavaloka sundraram,
Mahendra mana daranam, Namami Krishna varanam., 2

भावार्थ–कामदेव का मान मर्दन करने वाले, बड़े-बड़े सुन्दर चंचल नेत्रों वाले तथा व्रजगोपों का शोक हरने वाले कमलनयन भगवान को मेरा नमस्कार है, जिन्होंने अपने करकमलों पर गिरिराज को धारण किया था तथा जिनकी मुसकान और चितवन अति मनोहर है, देवराज इन्द्र का मान-मर्दन करने वाले, गजराज के सदृश मत्त श्रीकृष्ण भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।

Salutations to Him who has lotus like eyes, Who wins over the pride of the god of love,Who has broad and ever shifting eyes, And who consoled the gopas of the worry over the emissary. Salutations to the elephant like Lord Krishna,Who lifted the mountain by his lotus soft hands, Who has a pretty gaze and smile,And who killed the pride of the great Indra.


(श्लोक – 3)
कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं, व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्।
यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया, युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्॥३॥

Kadhambha soonu kundalam sucharu ganda mandalam,
Vrajanganaika vallabham namami Krishna durlabham.
Yasodhata samodhaya sagopaya sananandaya,
Yutham sukhaika dayakam namami gopa nayakam., 3

भावार्थ–जिनके कानों में कदम्बपुष्पों के कुंडल हैं, जिनके अत्यन्त सुन्दर कपोल हैं तथा व्रजबालाओं के जो एकमात्र प्राणाधार हैं, उन दुर्लभ भगवान कृष्ण को नमस्कार करता हूँ; जो गोपगण और नन्दजी के सहित अति प्रसन्न यशोदाजी से युक्त हैं और एकमात्र आनन्ददायक हैं, उन गोपनायक गोपाल को नमस्कार करता हूँ।

Salutations to the Lord Krishna, Who is not easy to get, Who wears the ear rings of Kadambha flowers, Who has very pretty smooth cheeks, And who is the lord of the women of Vrija. Salutations to the chief of Gopas,
Who grants supreme bliss, To Yasodha, gopas and Nanda, And who is the giver of pleasures.


(श्लोक – 4)
सदैव पादपंकजं मदीय मानसे निजं, दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम्।
समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं, समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम्॥४॥

Sadhaiva pada pankajam madheeya manase nijam,
Dadanamuthamalakam , namami Nanda balakam,
Samastha dosha soshanam, samastha loka poshanam,
Samastha gopa manasam, Namami nanda lalasam., 4

भावार्थ–जिन्होंने मेरे मनरूपी सरोवर में अपने चरणकमलों को स्थापित कर रखा है, उन अति सुन्दर अलकों वाले नन्दकुमार को नमस्कार करता हूँ तथा समस्त दोषों को दूर करने वाले, समस्त लोकों का पालन करने वाले और समस्त व्रजगोपों के हृदय तथा नन्दजी की वात्सल्य लालसा के आधार श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।

Salutations to the Nanda lad, Whose lotus like feet is drowned,
Ever truly in my mind, And who has curls of hair falling on his face. Salutations to Him who enthralls Nanda, Who diminishes bad effects of all sins, Who takes care of the entire world., And who is in the mind of every cow herd.


(श्लोक – 5)
भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं, यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम्।
दृगन्तकान्तभंगिनं सदा सदालिसंगिनं, दिने-दिने नवं-नवं नमामि नन्दसम्भवम्॥५॥

Bhoovo bharavatharakam bhavabdi karma dharakam,
Yasomathee kisorakam, namami chitha chorakam.
Drugantha kantha banginam, sada sadala sanginam,
Dine dine navam navam namami nanda sambhavam., 5

भावार्थ–भूमि का भार उतारने वाले, भवसागर से तारने वाले कर्णधार श्रीयशोदाकिशोर चित्तचोर को मेरा नमस्कार है। कमनीय कटाक्ष चलाने की कला में प्रवीण सर्वदा दिव्य सखियोंसे सेवित, नित्य नए-नए प्रतीत होने वाले नन्दलाल को मेरा नमस्कार है।

I bow to him who is the stealer of hearts,Who incarnated to reduce the weight of the world,Who helps us cross the miserable ocean of life,And who is young baby of mother Yasoda.I bow to the son of King Nanda,Who has a pair of pretty shining eyes,Who is followed by bees wherever he goes,And who is new and newer to his devotees,Today and everyday.


(श्लोक – 6)
गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं, सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनं।
नवीन गोपनागरं नवीनकेलि-लम्पटं, नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम्।।६।।

Gunakaram sukhakaram krupakaram krupaparam,
Suradwihannikarthanam, namami gopa nandanam.
Naveenagopa naagaram naveena keli lampatam,
Namami megha sundram thathith prabhalasathpatam., 6

भावार्थ–गुणों की खान और आनन्द के निधान कृपा करने वाले तथा कृपा पर कृपा करने के लिए तत्पर देवताओं के शत्रु दैत्यों का नाश करने वाले गोपनन्दन को मेरा नमस्कार है। नवीन-गोप सखा नटवर नवीन खेल खेलने के लिए लालायित, घनश्याम अंग वाले, बिजली सदृश सुन्दर पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है।

I salute the kid of all gopas, who is the treasure house, Of good qualities, pleasure and mercy, Who is above the needs of mercy, And who removed all the problems of devas. I salute the handsome one who is the colour of the cloud, Who wears yellow coloured silk resembling lightning, Who appears as a new Gopa every time he is seen,And who is interested in new antics every time.


(श्लोक – 7)
समस्त गोप मोहनं, हृदम्बुजैक मोदनं, नमामिकुंजमध्यगं प्रसन्न भानुशोभनम्।
निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं, रसालवेणुगायकं नमामिकुंजनायकम्।।७।।

Samastha gopa nandanam, hrudambujaika modhanam,
Namami kunja madhyagam, prasanna bhanu shobhanam.
Nikamakamadhayakam drugantha charu sayakam,
Rasalavenu gayakam, namami kunja nayakam., 7

भावार्थ–समस्त गोपों को आनन्दित करने वाले, हृदयकमल को प्रफुल्लित करने वाले, निकुंज के बीच में विराजमान, प्रसन्नमन सूर्य के समान प्रकाशमान श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। सम्पूर्ण अभिलिषित कामनाओं को पूर्ण करने वाले, वाणों के समान चोट करने वाली चितवन वाले, मधुर मुरली में गीत गाने वाले, निकुंजनायक को मेरा नमस्कार है।

I salute Krishna, the lad amidst the vrija land, Who is pleased and shines like the good sun, Who is the son of all gopas, And who is the pleasure of all their hearts. I salute Krishna, who is the leader of lads of vrija, Who plays soulful music using his flute, Who grants pleasures even though he does not want them, And whose glances are like defenseless arrows.


(श्लोक – 8)
विदग्ध गोपिकामनो मनोज्ञतल्पशायिनं, नमामि कुंजकानने प्रवृद्धवह्निपायिनम्।
किशोरकान्ति रंजितं दृगंजनं सुशोभितं, गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम्।।८।।

Vidagdha gopikaa mano manogna thalpasayinam,
Namami kunja kanane pravrudha vahni payinam.
Kisorakanthi ranchitham, druganjanam sushobitham,
Gajendra moksa karinam,Namami sri viharinam., 8

भावार्थ–चतुरगोपिकाओं की मनोज्ञ तल्प पर शयन करने वाले, कुंजवन में बढ़ी हुई विरह अग्नि को पान करने वाले, किशोरावस्था की कान्ति से सुशोभित अंग वाले, अंजन लगे सुन्दर नेत्रों वाले, गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त करने वाले, श्रीजी के साथ विहार करने वाले श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।

I salute Him who swallowed the fire, In the gardens and forests of Vraja land, Who was sleeping in the dreams of the very able gopis. I salute Him who is with the goddess of wealth, Who was the cause of salvation of Gajendra, Who is surrounded by divine glow of youth, And who shines in all directions.


(श्लोक – 9)
स्तोत्र पाठ का फल

दा तदा यथा तथा तथैव कृष्ण सत्य कथा, मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्।
प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान्, भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान॥(९)

Yadha thadha yadha thadha thadiva krushna sathkadha,
Maya sadaiva geeyathaam thadha krupa vidheeyathaam.
Pramanikashtakadwayam japathyadheethya ya pumaan,
Bhaveth sa nanda nandane bhave bhave subhakthiman., 9

प्रभो! मेरे ऊपर ऐसी कृपा हो कि जहां-कहीं जैसी भी परिस्थिति में रहूँ, सदा आपकी सत्कथाओं का गान के। जो पुरुष इन दोनों-राधा कृपा कटाक्ष व श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष अष्टकों का पाठ या जप करेगा, वह जन्म-जन्म में नन्दनन्दन श्याम सुंदर की भक्ति से युक्त होगा और उसको साक्षात् श्रीकृष्ण मिलते हैं।

Where I live, wherever I exist,Let me be immersed in your stories, For always without break, So that I am blessed with your grace. l his births.

8 मिनट की ये वीडियो आप नित्य सुने ताकि आपका मन संसारिक चिंतन से हट कर श्री कृष्ण के चरण कमलो मे लगे…,

॥ श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥


इस पाठ को नित्य समय निकाल कर जरुर रोज पढ़ा करे 

Posted on Leave a comment

गोपीगीत

Gopi Geet – गोपीगीत

भगवान कृष्ण ने अधिष्ठात्री देवी श्री राधा रानी और वृन्दावन की गोपियों के साथ रास रचाया, भगवान् ने रास में जितनी गोपियां थी उतनी ही संख्या में अपने प्रति रूप प्रकट किये। रास में सभी गोपियों को ये अनुभव हो रहा था की भगवान सिर्फ मेरे साथ है। गोपियों को ये अनुभव उनके अभिमान में परिवर्तित हो गया। गोपियों के ये लगने लगा कि भगवान् कृष्ण मात्र हम से प्रेम करते है।
भगवान् कृष्ण गोपियों के अभिमान को देख कर स्वयं को गोपियों के मध्य से अन्तर्ध्यान कर लेते है , और किशोरी जी के साथ रास-स्थल से आगे चले जाते है, कुछ समय पश्चात् किशोरी जू को भी अभिमान हो जाता है , तब ठाकुर जी राधा रानी को छोड़ कर लुप्त हो जाते है।

गोपियां और किशोरी जी भगवान के विरह में व्याकुल हो तड़पने लगती है।

हम लोग भौतिक जगत की वस्तु के लिए तड़पने लगते है कहीं हमारी कोई प्रिय वस्तु खो जाए तो घण्टो तक तडपते है लेकिन यहां तो जीव और शिव अर्थात भगत और भगवान् का मिलन और विरह हो रहा है, जिसने जन्मो जन्मो तक केवल गोबिंद मिलन की आस में ही जीवन बिताये हो उसे किसी और भौतिक वस्तु की चाह नही होती और गोपिया तो स्वयं गोबिंद मिलन की प्यास में गोपी रूप में प्रगट भई है फिर उनके विरह का क्या वर्णन हो सकता है? जब कृष्ण विरह की वेदना अनंतगुना हृदय में लावा की नाइ (भांति)प्रचंड वेग से प्रवाहित होने लगे और ज्वारभाटा के रूप में प्रस्फुरित होकर एक विस्फोट के रूप में बहने लगे तो वह भाव गोपीगीत बन जाता है.. इसीलिए स्वयं गोपियन ने इस गोपीगीत को गाया है है और अपनी वेदना का अविरल प्रवाह किया है,गोपिया कहती है,


श्लोक – 1
Shlok – 1

जयति तेsधिकं जन्मना ब्रज:
श्रयत इन्द्रिरा शश्व दत्र हि!
द्यति द्दश्यतां दिक्षु तावका
स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते!!
jayati te ‘dhikaṁ janmanā vrajaḥ
śrayata indirā śaśvad atra hi
dayita dṛśyatāṁ dikṣu tāvakās
tvayi dhṛtāsavas tvāṁ vicinvate

O beloved, Your birth in the land of Vraja has made it exceedingly glorious, and thus Indirā, the goddess of fortune, always resides here. It is only for Your sake that we, Your devoted servants, maintain our lives. We have been searching everywhere for You, so please show Yourself to us.

” हे प्रिय ! यह जो बृज है यह ऐसे ही बृज नही बन गया है,आपके जनम लेने के कारण इस स्थान का महत्व इतना अधिक है,अर्थात गोबिंद यह बृज क्षेत्र जहाँ अनेकानेक जीव मुक्ति प्राप्त कर रहे है यह सब आपकी कृपा और यहां आपके जन्म लेने के कारण ही है, आप बैकुंठ, गोलोक, क्षीरसागर और अन्यान्य लोको में बिलकुल भी सुलभ नही हो अर्थात आपका दर्शन व् मिलन सम्भव नही है, यह तो आपकी अनुकंपा है की

आप केवल बृज में ही इतने सहज रूप से मिल जाते है,

जिनके चरण श्री लक्ष्मी जी अपने आँचल में वक्षस्थल के पास छिपा कर रखती है वही कमल चरण यहां ब्रजभूमि की ऱज़ में डोलते फिरते है,यह सब आपके यहा जन्म लेने के कारण और हम जैसे अधमीयो पर उपकार करने के लिए ही तो हुआ है, यहां श्री लक्ष्मी जी भी सेवा हेतु नित प्रतिदिन आने लगी है,जो श्री लक्ष्मी जी क्षीर सागर में नित आपके कमलाचरण पलोटति रहती है और किसी अन्य को इनके दर्शन का अधिकार भी नही देती इस बृज में आपकी सेवा के लिए घूमती रहती है यह आपके यहा जन्म लेने के कारण हुआ है,

आपने ही इस बृज को बैकुंठ गोलोक स्वर्ग और,
अन्य उच्च लोकों से भी उच्च बना दिया है.

लोकन कौ लोक मैंने एक ब्रज लोक देख्यौ,
ब्रजहूँ कौ तत्व श्री वृन्दावन धाम है,
वृन्दावन धाम हूँ कौ तत्व साधू-संतजन,
साधून कौ तत्व गोपी-ग्वालिनी कौ नाम है,
ग्वालिनी कौ तत्व प्यारो कृष्ण घनश्याम जहाँ,
यहाँ कृष्ण हूँ कौ तत्व श्री राधारानी जू को नाम है.

दयित दृश्यतां दिक्षु तावका
स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते
आपकी कृपा से बहुत से राक्षस योनि के जीव जैसे अघासुर,बकासुर,कालिया नाग और पूतना जैसे राक्षस भव से पार हो गए है, जो गति बड़े बड़े महात्माओं को नही मिलती वह इस ब्रज क्षेत्र में सभी को प्राप्त हो रही है,आप यहां जो लीलाये कर रहे है वह युगों युगों तक जीवमात्र को आनंद देने वाली है,

हम गोपिया जो अपना सर्वश्व लूटा कर, घर बार छोड़ कर ही नही अपितु अपने पति बच्चो सभी को भूलकर यहां वन में भटक रही है, केवल और केवल हे मनमोहन आपके दर्शनों के लिए ही,

हमने युगों युगों तक आपको पाने के लिए अनेकानेक तप किये,कष्ट सहन किये है विरहवेदना में अपने हृदय को तप्त किया है और आज हम आपको पाकर भी नही पा रही है, इस अर्धरात्रि में गहन वन में आपको ढूंढती हुयी यहां वहां भटक रही है, आपको हम पर करुणा नही होती क्या? आपने अपनी करुणा से अनेक अधमीयो को भी उच्च गतियां प्रदान की है फिर हमारे लिए इतने निष्ठुर क्यों बन गए हो,हमने केवल और केवल तुमसे स्नेह किया और कोई भाव किसी के प्रति कभी अपने हृदय में नही लाया यहां तक की अपने गृहस्थ जीवन को भी भूल गयी है,इतना सब त्याग कर हम आज यहाँ आपके निकट है फिर भी आप हम से छिप रहे है न जाने कहां अंतर्ध्यान हो गए है,

जैसे एक बछड़ा अपनी माता से बिछुड़ जाने पर तड़प उठता है और वन वन माँ माआ करता हुआ भटकने लगता है अश्रुधारा उसके नेत्रों से अविरल बहने लगती है और कभी वह मूर्छित हो जाता है ऐसी ही दशा हमारी हो रही है, हमे अपने तन की कोई सुध नही है न ही भूख प्यास की परवाह है हमे केवल और केवल आपसे मिलना है, हे माधव ! आप कहाँ हो? हम आपको पाने के लिए भटक रही है,
रे निरमोही, छबि दरसाय जा।कान चातकी स्याम बिरह घन, मुरली मधुर सुनाय जा।ललितकिसोरी नैन चकोरन, दुति मुखचंद दिखाय जा॥भयौ चहत यह प्रान बटोही, रुसे पथिक मनाय जा॥


श्लोक – 2
Shlok – 2

शरदुदाशये साधुजातस
त्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा!
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका
वरद निघ्नतो नेह किं वधः!!
śarad-udāśaye sādhu-jāta-sat-
sarasijodara-śrī-muṣā dṛśā
surata-nātha te ‘śulka-dāsikā
vara-da nighnato neha kiṁ vadhaḥ

O Lord of love, in beauty Your glance excels the whorl of the finest, most perfectly formed lotus within the autumn pond. O bestower of benedictions, You are killing the maidservants who have given themselves to You freely, without any price. Isn’t this murder?

हे हृदयेश्वर हमारे प्राणधन ! हमारे हृदय में केवल आप ही निवास करते है,आप हमारे हृदय के स्वामी है, आप ही ने अपने नेत्र कटाक्षो से हमारा वध किया है,आपके नेत्र इतने नुकीले और घायल करने वाले है की हमारा हृदय इसकी पैनी धार से विदीर्ण अर्थात चिर गया है एक तो आपके विरह की वेदना ऊपर से इन नेत्रो द्वारा हृदय के विदीर्ण होने की पीड़ा हम तो मर ही जाएंगी केशव,केवल अश्त्रों शस्त्रो से मारना ही मारना नही होता है नेत्रो का मारण भी मृत्यु की पीड़ा देता है,

यह जो आपके नेत्र है जैसे शरद ऋतू के चंदमा की मनोहारी चांदनी की शोभा जैसे किसी सूंदर सरोवर पर दृश्यमान होकर उर सरोवर को अति आलोकिक बना देती है अर्थात बहुत दिव्य बना देती है ऐसेही यह आपके नेत्रो की सोभा की चांदनी से हमारा वक्ष स्थल विदीर्ण हो गया है, हम आपके बिना तड़प रही है कहि हमारे प्राणपखेरु उड़ नही जाए,हम आपके नेत्रो को जोकि अपनी सुंदरता से किसी को भी घायल कर देते है उन नेत्रों के दर्शन चाहती है,

हम सब आपके चरणों की दासी है और कोई शुल्क भी नही लेती अर्थात हम बिन मोल बिकानी है आपकी सेवा के लिए, हमे कोई उपहार या पारितोषिक नही चाहिए हम तो केवल आपके दर्शनों की प्यासी है, हम आपके नेत्रो की सुंदरता का आनंद लेना चाहती है हमे और कुछ भी प्रलोभन नही है,

प्यारे दरसन दीज्यो आय, तुम बिन रह्यो न जाय॥
जल बिन कमल, चंद बिन रजनी।
ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी॥
आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन,
बिरह कलेजो खाय॥
दिवस न भूख, नींद नहिं रैना,
मुख सूं कथत न आवै बैना॥
कहा कहूं कछु कहत न आवै,
मिलकर तपत बुझाय॥
क्यूं तरसावो अंतरजामी,
आय मिलो किरपाकर स्वामी॥
मीरां दासी जनम जनम की,
पड़ी तुम्हारे पाय॥


श्लोक – 3
Shlok – 3

विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसा
द्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात्!
वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया
दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः!!
viṣa-jalāpyayād vyāla-rākṣasād
varṣa-mārutād vaidyutānalāt
vṛṣa-mayātmajād viśvato bhayād
ṛṣabha te vayaṁ rakṣitā muhuḥ

O greatest of personalities, You have repeatedly saved us from all kinds of danger —from poisoned water, from the terrible man-eater Agha, from the great rains, from the wind demon, from the fiery thunderbolt of Indra, from the bull demon and from the son of Maya Dānava.

गोपियाँ कहती है, हे चैतन्य स्वरुप माधव आप अपने नेत्रों के कृपा कटाक्ष से जड़ जीवों को भी सजीव करने वाले है फिर हम गोपियाँ जो जड़मति हो गयी है तुम्हारे विरह में हम पत्थर हो गयी है तुम अपने इन कमलनयनों से क्यों नही अपनी करुणा का अमृत वर्षण कर रहे क्यों नही अपने रूप का दर्शन हमे प्रदान कर रहे हो,

मेरे साँवरिया….
“जल्व़ा-ऐ-हुस्न दिखा जाओ, तो कोई बात बने,
मेरी नज़रों में समा जाओ, तो कोई बात बने,
आपकी सूरत नज़र आती है. धुँधली धुँधली,
पर्दा नज़रों से हटा जाओ, तो कोई बात बने.”

आपने अनेकानेक बार हम सब का रक्षण किया है, जब कालिया नाग के विष से सारी यमुना का जल विषाक्त हो गया तब आपने ही अपनी कृपा से हम सब ब्रिजवासिन की रक्षा की है, जब अघासुर अजगर बनकर सकल गोकुल वासियों को निगलना चाहता था तब भी आपने ही हमारी रक्षा की है, अनेक राक्षशों व्योमासुर,बकासुर इत्यादि से बचाया है और यही नही जब इंद्र कुपित हो गया और सकल बृजमंडल को डूबना चाहता था, भारी वर्षण,आंधी का प्रचंड वेग और विद्युत् की असहनीय गडगडाहट से हम सब को बचाया हे! गिरिधर यह सब आपकी कृपा का ही फल था हम सब आपके ऋणी है आपने कोई भी अवसर हमारी रक्षा का नही छोड़ा सदैव हम सब की रक्षा के लिए तत्पर रहे हो

हे मधुसूदन ! हम जीव आज इस घोर कलियुग में अनेकानेक वासनाओ के शिकार है, मोह,लोभ दम्भ,पापाचार, स्वार्थ,विषय, काम लोलुपता से ग्रसित अनंत दुर्गुणों से पीड़ित है,यही नही इन सब से ग्रसित न जाने कितने कुकृत्य में संलिप्त है, हे माधव! भाव सागर में डूबता हुए हम सब के तारणहार आप कहा छुप गए हो? ना केवल उस युग में आपने गोकुलवासियों की रक्षा की है आज भी हमे आपकी करुणादृष्टि और वरद हस्त का आशीर्वाद चाहिए आप का संग चाहिए, हे प्रभो ! हमारी रक्षा कीजिये


श्लोक – 4
Shlok – 4

न खलु गोपिकानन्दनो भवा
नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्!
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये
सख उदेयिवान्सात्वतां कुले!!
na khalu gopīkā-nandano bhavān
akhila-dehinām antarātma-dṛk
vikhanasārthito viśva-guptaye
sakha udeyivān sātvatāṁ kule

You are not actually the son of the gopī Yaśodā, O friend, but rather the indwelling witness in the hearts of all embodied souls. Because Lord Brahmā prayed for You to come and protect the universe, You have now appeared in the Sātvata dynasty.

हे परम सखा! यहां परम सखा कहने का अर्थ मित्र भी है और सखा का अर्थ सुख प्रदान करने वाला भी है अतः गोपियाँ कहती है, हे कृष्ण आप केवल यशोदा के पुत्र बन कर आये हो और केवल उन्ही को आनंद देने वाले हो ऐसा नही है, आप नन्द बाबा के घर जन्मे तो केवल उन्ही के सुख और आनंद के लिए नही बल्कि आप सभी बृजवासियों को सुख प्रदान करने के लिए आये है ऐसा भी नही है सच तो यह है की आप सकल ब्रह्मांड के जीवमात्र के कल्याण और सुख के लिए यह अवतरित हुए है, आप सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले हो,आप सभी जीवमात्र के अंतर्यामी है, उनके मन हृदय में निवास करने वाले है, आपने यह जन्म ब्रह्मा जी के कहने पर और जीवमात्र के कल्याण के लिए इस यदुकुल और बृज में जन्म लिया है, सबका अधिकार आप पर समान रूप से है आप किसी वर्ग विशेष के लिए नही है अर्थात आपको सभी से प्रेम का अधिकार है और सभी को आपसे प्रेम करने का समान अधिकार है


श्लोक – 5
Shlok – 5

विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते
चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्!
करसरोरुहं कान्त कामदं
शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्!!
viracitābhayaṁ vṛṣṇi-dhūrya te
caraṇam īyuṣāṁ saṁsṛter bhayāt
kara-saroruhaṁ kānta kāma-daṁ
śirasi dhehi naḥ śrī-kara-graham

O best of the Vṛṣṇis, Your lotuslike hand, which holds the hand of the goddess of fortune, grants fearlessness to those who approach Your feet out of fear of material existence. O lover, please place that wish-fulfilling lotus hand on our heads.

हे यदुवंशी! आप अपने प्रेमियों की सकल अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले हो अर्थात जो आपकी शरण आ जाता है वह आपकी छत्रछाया पा लेता है फिर उसकी रक्षा और पालन आपका उत्तरदायित्व हो जाता है, जो व्यक्ति संसार के संताप का सताया हुआ है और आपकी शरण ले लेता है आप उसकी रक्षा करते है, अनेकानेक उद्धiरण है जहां आपने अपनी इस प्रवृति को सिद्ध किया है, फिर चाहे उदाहरणस्वरूप भक्त प्रह्लाद को लेलो या ध्रुव या गजेंद्र गज या कुब्जा शबरी और अहिल्या का दृष्टान्त ले लीजिये, ऐसा कोण सा जिव है जिस पर आपने उपकार नही किया जो भी जीव किसी भी भाव से आपकी शरण आया हो आपने अपनी शरणागति प्रदान कर अपने अभय दान से उन भक्तो का मान बढ़ाया है, बिभीषन जैसे रावण के भाई को आपने शरणागति दी है,आप इतने करुणामयी है की अपनी किरपा से कुपात्र को भी कृपापात्र बना देते हो,

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी।
मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना।।

अर्थात हे प्रभु आप शरणागतवत्सल है और कोई भी पात्र या कुपात्र आपकी शरण हो जाता है तो वह आपका उत्तरदायित्व बन जाता है अर्थात आप उसके सब कुछ बन जाते है, जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हैं । हे हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा-अभिलाषाओ को पूर्ण करने वाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकड़ा है, हमारे सिर पर रख दो।। आपने इतना कुछ किया इतने अधमियों को भी अपनी किरपा से भाव पार किया है फिर हमारी बारी इतनी देर क्यों लगा रहे हो, हम आपकी शरण है और आपके कर कमलो की छत्रछाया की अभिलाषी है, किरपा कर के अपने यह सुकोमल हस्त हमारे सर पर रख दीजिये, हम आपकी शरणागति चाहती है,


श्लोक – 6
Shlok – 6

व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां
निजजनस्मयध्वंसनस्मित!
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो
जलरुहाननं चारु दर्शय!!
vraja-janārti-han vīra yoṣitāṁ
nija-jana-smaya-dhvaṁsana-smita
bhaja sakhe bhavat-kińkarīḥ sma no
jalaruhānanaṁ cāru darśaya

O You who destroy the suffering of Vraja’s people, O hero of all women, Your smile shatters the false pride of Your devotees. Please, dear friend, accept us as Your maidservants and show us Your beautiful lotus face.

हे वीर शिरोमणि श्यामसुंदर ! तुम सभी व्रजवासियों का दुःख दूर करने वाले हो । आपका मुखचन्द्र इतना सोभायमान है जिसके दर्शन भर से ही सभी संताप दूर हो जाते है, पहले नेत्रो से वार किया, फिर करुणiहस्त की मांग है और अब मुखकमल की अर्थात गोपिया इतनी तृषित है की किसी भी प्रकार से प्रभु को पाना चाहती है वह एक झलक पाने को अति आतुर हो रही है मर रही है तड़प रही है अतिविह्वल हो रही है, विह्वल का अर्थ है प्रेम की तड़प में अत्यधिक रुदन अवस्था में, आपका मुख इतना सूंदर है की यदि एकपल के लिए आप हमे अपना दर्शन करवा दो तो हम अति सुख पाएंगी,

श्री हरिवंश किशोर लाडिले विनती कबहुँ विचारोगे
दीन दुखी भुज गहन कृपानिधि कोमल बाहं पसारोगे
निज मुख सत्य करौगे नातो सूल हिये का टारोगे
सब विधि पामर नीच निबल अति पोच पतित प्रतिपiरोगे
उमगत सहज कृपा कौ सागर लै लै नाम पुकारोगे
भोरी बिलपत द्वार दुखी तन करुणा कौर निहारऔगे

तुम्हारी मंद मंद मुस्कान की एक एक झलक ही तुम्हारे प्रेमी जनों के सारे मान-मद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त हैं। आपकी मधुर मुस्कान से कोण सा ऐसा जीव है जो मोहित नही होता, सागरमंथन से निकले अमृत के बटवारे हेतु आपने जब मोहिनी रूप लिया तो आपकी मुस्कान से सभी राक्षसगण ही मोहित हो गए तो आपके इस रूप और इसकी मुस्कान हमारा हृदय चिर देती है इसमें हमारा क्या दोष है? हम तो आपकी मुस्कान की आपके अधरों से झरने वाले अमृत की एक एक बूँद के लिए तड़प रही है, जैसा की हमने आपको पहले भी कहा है की आप हमसे दूर न जाओ, हम आपकी वह दासी है जिसे कोई सांसारिक सम्पदा की लालसा नही है, हम तो बिन मोल की आपकी दासी है जो केवल और केवल आपकी मुस्कान मात्र का दर्शन चाहती है

मेरी पलकों को तेरे दीदार का
मेरे मोहन इंतज़ार रहता है
दिल के हर कोने में मेरे बस तुम्हारा ही प्यार रहता है
गुजर रहे है मेरे रात और दिन बस तुम्हारी याद में
हमें तो मनमोहन बस तुम्हारा ही प्यार याद रहता है

आपके मुख को निहारने के लिए आपकी सेवा में खड़ी है, हे हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत, प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर न्योछावर हैं । जैसे भीलनी वर्षो तक आपकी प्रतीक्षा में तड़पती रही और बिन मोल सेवा भाव में लगी रही और आपने उन्हें अपने प्रेम से उन्हें तृप्त किया, उसी विरह पीड़ा को हम भी सहन कर रही है, जैसे अहिल्या वर्षो तक अपने उद्धार के लिए जड़वत पत्थर बनकर आपको पाने का इन्तजार करती रही हम सब भी आपके विरह में पत्थर हो गयी है, हमारा भी कल्याण करो, हम अबलाओं को अपना वह परमसुन्दर सांवला मुखकमल दिखलाओ।।

तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥
तेरे नैन गजब कजरारे, मटके हैं कारे कारे
तेरी तिरछी से चितवनीया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥

तेरे केश बड़े घुंघराले, ज्यों बादल कारे कारे
तेरी कुंडल की झलकनिया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥

तेरी चाल अजब मतवाली, ज्यों लगाती प्यारी प्यारी
तेरी मधुर मधुर पैजनिया पे
बलिहार जाऊ रे , बलिहार सांवरे ॥ तेरी मंद..॥


श्लोक – 7
Shlok – 7

प्रणतदेहिनांपापकर्शनं
तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम्!
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं
कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्!!
praṇata-dehināṁ pāpa-karṣaṇaṁ
tṛṇa-carānugaṁ śrī-niketanam
phaṇi-phaṇārpitaṁ te padāmbujaṁ
kṛṇu kuceṣu naḥ kṛndhi hṛc-chayam

Your lotus feet destroy the past sins of all embodied souls who surrender to them. Those feet follow after the cows in the pastures and are the eternal abode of the goddess of fortune. Since You once put those feet on the hoods of the great serpent Kāliya, please place them upon our breasts and tear away the lust in our hearts.

इस श्लोक में गोपी प्रभु के चरणों की बात करती है,कहती है हे नंदलाल! आपके यह चरण जिनके दर्शन मात्र से जिनकी ऱज़ मात्र से पापियों का उद्धार हो जाता है, हम उन चरणों के दर्शन चाहती है, तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं।जैसे अहिल्या को जैसे ही आपके चरणों की ऱज़ उड़कर लगी जोकि वर्षो से शिला बनी आपकी किरपा चाहती थी पल में सजीव हो गयी, उसका पाप ताप सब मिट गया, आपके कमलाचरण अद्भुत है, वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्यकी खान है और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती रहती हैं । जो लक्ष्मी जी इन चरणों पर किसी भी बाह्य जीव की दृष्टि भी इन पर नही पड़ने देती है तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो अर्थात जो लीलाये आप बृज में कर रहे है ,यह असाधारण है, और हमारे लिए उन्हें सांप के फणों तक पर रखने में भी तुमने संकोच नहीं किया ।

आपने हम सब गोकुलवासियों के हित के लिए यमुना के विषाक्त जल में कूदकर कालिया नाग के मस्तक पर फण पर इन कोमल चरणों से नृत्य किया, आपने हम सब पर इतनी किरपा की है अर्थात कभी भी और कोई भी अवसर पर अपनी करुणा की कमी नही रहने दी है. तो फिर आप अब कहाँ छुप गए हो? हमारा ह्रदय तुम्हारी विरह व्यथा की आग से जल रहा है तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमें सता रही है। तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की ज्वाला शांत कर दो, हम सब आपसे विनती कर रही है की हमारा ये हृदय विरहाग्नि से तप्त हो रहा है, वेदना इतनी गंभीर हो गयी है की हमारी छाती फटने को तैयार है अब यह अग्नि हम सब को भस्म करने को आतुर है हम आपसे विनती कर रही है की आप अपने चंदन जैसे चरणों को हमारे वक्षस्थल पर रख कर हमारी वेदना शीतल कर दीजिये,


श्लोक – 8
Shlok – 8

मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया
बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण!
विधिकरीरिमा वीर मुह्यती
रधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः!!
madhurayā girā valgu-vākyayā
budha-manojshayā puṣkarekṣaṇa
vidhi-karīr imā vīra muhyatīr
adhara-sīdhunāpyāyayasva naḥ

O lotus-eyed one, Your sweet voice and charming words, which attract the minds of the intelligent, are bewildering us more and more. Our dear hero, please revive Your maidservants with the nectar of Your lips.

हे कमल नयन! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है । तुम्हारा एक एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढकर मधुर है । बड़े बड़े विद्वान उसमे रम जाते हैं। जैसे ही आपकी मधुर वाणी का श्रवण होता है तो कोई भी आप पर मोहित हो जाता है, जैसे वामनावतार में आपकी मधुर वाणी और वेश देखकर राजा बलि मोहित हो गया और बिना कुछ सोचे आपको वचन दे दिया, उसपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं । आपकी वाणी इतनी मोहिनी है की किसी को भी अपने वश में कर लेती है तो फिर हमारा क्या दोष जो हम आपकी वाणी को सुनकर आप पर मोहित हो गयी है? तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं ।

हे दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवन-दान दो, छका दो।अर्थात आपका अधरामृत जिसे की वंशी नित्य प्रति पान करती है और मधुर मधुर स्वर उत्तपन करती है जिसकी स्वरनाद से त्रिलोकी मोहित हो जाती है हम सब उस अधरामृत को पाने के लिए मरी जा रही है, हम आपसे विनती कर रही है आप हमारे जीवन की रक्षा कीजिये,


श्लोक – 9
Shlok – 9

तव कथामृतं तप्तजीवनं
कविभिरीडितं कल्मषापहम्!
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः!!
tava kathāmṛtaṁ tapta-jīvanaṁ
kavibhir īḍitaṁ kalmaṣāpaham
śravaṇa-mańgalaṁ śrīmad ātataṁ
bhuvi gṛṇanti ye bhūri-dā janāḥ

The nectar of Your words and the descriptions of Your activities are the life and soul of those suffering in this material world. These narrations, transmitted by learned sages, eradicate one’s sinful reactions and bestow good fortune upon whoever hears them. These narrations are broadcast all over the world and are filled with spiritual power. Certainly those who spread the message of Godhead are most munificent.

हे प्रभो ! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत स्वरूप है ।जैसे आपका स्वरूप आपका मुख मुस्कान वाणी कमलहस्त चरण सुख देने वाले है उसी तरह आपकी लीलाओं का चिंतन दर्शन व् श्रवण मंगल कारक है अर्थात विरह से सताए हुये लोगों के लिए तो वह सर्वस्व जीवन ही है। कथा के माध्यम से भी शब्दरूप माधव आपके दर्शन हो जाते है,ऐसे समय जब आप हमारे समक्ष उपस्थित नही है किन्तु कथाओ के माध्यम से उपस्थित हो जाते है तो यह सब भी हमारे विरह को शांत करता है, बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं – भक्तकवियों ने उसका गान किया है,

वह सारे पाप – ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मंगल – परम कल्याण का दान भी करती है । वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है । जो भी जीव आपकी कथा अमृत का दान करते है अर्थात उन कथाओं का श्रवण गायन और पठान करते है वः धन्य है क्योंकि वः आपके शब्दरूप से दर्शन करवाने में समर्थ है,जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में भू-लोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं।।

नारद संहिता में स्वयम भगवान् ने यह कहा है,

“नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न वा।
मद्भक्ता: यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।”

हे नारद ! न तो मैं वैकुंठ में रहता हूँ और न योगियों के हृदय में, मैं तो वहाँ निवास करता हूँ, जहाँ मेरे भक्त-जन कीर्तन करते हैं, अर्थात् भजनों के द्वारा ईश्वर को सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। यहां भगवान् का कहने का तातपर्य यही है की में भजन,नाम सुमिरन और कथा के माध्यम से अति सुलभ हूँ और जहां यह सब होता है में वही रहता हु अन्यत्र कहि जाता ही नही अतः मुझे कथा में पाया जा सकता है,

जैसे संतजन भगवान् की महिमा का गुणगान करते है वैसे ही भगवान् भी उन्ही के आश्रय में सुगम रूप से मिल जाते है,श्रीमद तुलसी रामायण में जब श्री राम वन में विचरण करते हुए बाल्मीकि आश्रम में होते है तो वः पूछते है हे मुनिवर मुझे अब कहाँ रहना चाहिए? तब इन्ही भूरिदजन अर्थात संत ने वह स्थान या वह सूत्र बताये जहां प्रभु निवास करते है,


श्लोक – 10
Shlok – 10

प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं
विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम्!
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः
कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि!!
prahasitaṁ priya-prema-vīkṣaṇaṁ
viharaṇaṁ ca te dhyāna-mańgalam
rahasi saṁvido yā hṛdi spṛśaḥ
kuhaka no manaḥ kṣobhayanti hi

Your smiles, Your sweet, loving glances, the intimate pastimes and confidential talks we enjoyed with You — all these are auspicious to meditate upon, and they touch our hearts. But at the same time, O deceiver, they very much agitate our minds.

हे हमारे प्यारे ! एक दिन वह था, तुम्हारी प्रेम हँसी और चितवन तथा तुम्हारी विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं का ध्यान करके हम आनन्द में मग्न हो जाया करतीं थी। हे हमारे कपटी मित्र ! उन सब का ध्यान करना भी मंगलदायक है, उसके बाद तुमने एकान्त में हृदयस्पर्शी ठिठोलियाँ की और प्रेम की बातें की, अब वह सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर रही हैं।


श्लोक – 11
Shlok – 11

चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून्
नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्!
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः
कलिलतां मनः कान्त गच्छति!!
calasi yad vrajāc cārayan paśūn
nalina-sundaraṁ nātha te padam
śila-tṛṇāńkuraiḥ sīdatīti naḥ
kalilatāṁ manaḥ kānta gacchati

Dear master, dear lover, when You leave the cowherd village to herd the cows, our minds are disturbed with the thought that Your feet, more beautiful than a lotus, will be pricked by the spiked husks of grain and the rough grass and plants.

हे हमारे प्यारे स्वामी ! हे प्रियतम ! तुम्हारे चरण, कमल से भी सुकोमल और सुन्दर हैं । जब तुम गौओं को चराने के लिये व्रज से निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके, कुश एंव कांटे चुभ जाने से कष्ट पाते होंगे; हमारा मन बेचैन होजाता है । हमें बड़ा दुःख होता है।


श्लोक – 12
Shlok – 12

दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै
र्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्!
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहु
र्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि!!
dina-parikṣaye nīla-kuntalair
vanaruhānanaṁ bibhrad āvṛtam
ghana-rajasvalaṁ darśayan muhur
manasi naḥ smaraṁ vīra yacchasi

At the end of the day You repeatedly show us Your lotus face, covered with dark blue locks ofhair and thickly powdered with dust. Thus, O hero, You arouse lusty desires in our minds.

हे हमारे वीर प्रियतम ! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं, कि तुम्हारे मुखकमल पर नीली-नीली अलकें लटक रहीं है और गौओं के खुर से उड़-उड़कर घनी धूल पड़ी हुई है। तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखाकर हमारे हृदय को प्रेम-पूरित करके मिलन की कामना उत्पन्न करते हो।


श्लोक – 13
Shlok – 13

प्रणतकामदं पद्मजार्चितं
धरणिमण्डनं ध्येयमापदि!
चरणपङ्कजं शंतमं च ते
रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन्!!
praṇata-kāma-daṁ padmajārcitaṁ
dharaṇi-maṇḍanaṁ dhyeyam āpadi
caraṇa-pańkajaṁ śantamaṁ ca te
ramaṇa naḥ staneṣv arpayādhi-han

Your lotus feet, which are worshiped by Lord Brahmā, fulfill the desires of all who bow down to them. They are the ornament of the earth, they give the highest satisfaction, and in times of danger they are the appropriate object of meditation. O lover, O destroyer of anxiety, please put those lotus feet upon our breasts.

भावार्थ:- हे प्रियतम ! तुम ही हमारे सारे दुखों को मिटाने वाले हो, तुम्हारे चरणकमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली हैं, इन चरणों के ध्यान करने मात्र से सभी ब्याधायें शान्त हो जाती हैं। हे प्यारे ! तुम अपने उन परम-कल्याण स्वरूप चरणकमल हमारे वक्ष:स्थल पर रखकर हमारे हृदय की व्यथा को शान्त कर दो।


श्लोक – 14
Shlok – 14

सुरतवर्धनं शोकनाशनं
स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्!
इतररागविस्मारणं नृणां
वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्!!
surata-vardhanaṁ śoka-nāśanaṁ
svarita-veṇunā suṣṭhu cumbitam
itara-rāga-vismāraṇaṁ nṛṇāṁ
vitara vīra nas te ‘dharāmṛtam

O hero, kindly distribute to us the nectar of Your lips, which enhances conjugal pleasure and vanquishes grief. That nectar is thoroughly relished by Your vibrating flute and makes people forget any other attachment.

हे वीर शिरोमणि ! आपका अधरामृत तुम्हारे स्मरण को बढ़ाने वाला है, सभी शोक-सन्ताप को नष्ट करने वाला है, यह बाँसुरी तुम्हारे होठों से चुम्बित होकर तुम्हारा गुणगान करने लगती है। जिन्होने इस अधरामृत को एक बार भी पी लिया तो उन लोगों को अन्य किसी से आसक्तियों का स्मरण नहीं रहता है, तुम अपना वही अधरामृत हम सभी को वितरित कर दो।


श्लोक – 15
Shlok – 15

अटति यद्भवानह्नि काननं
त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्!
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते
जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्!!
aṭati yad bhavān ahni kānanaṁ
truṭi yugāyate tvām apaśyatām
kuṭila-kuntalaṁ śrī-mukhaṁ ca te
jaḍa udīkṣatāṁ pakṣma-kṛd dṛśām

When You go off to the forest during the day, a tiny fraction of a second becomes like a millennium for us because we cannot see You. And even when we can eagerly look upon Your beautiful face, so lovely with its adornment of curly locks, our pleasure is hindered by our eyelids, which were fashioned by the foolish creator.

हे हमारे प्यारे ! दिन के समय तुम वन में विहार करने चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिये एक क्षण भी एक युग के समान हो जाता है, और तुम संध्या के समय लौटते हो तथा घुंघराली अलकावली से युक्त तुम्हारे सुन्दर मुखारविन्द को हम देखती हैं, उस समय हमारी पलकों का गिरना हमारे लिये अत्यन्त कष्टकारी होता है, तब ऎसा महसूस होता है कि इन पलकों को बनाने वाला विधाता मूर्ख है।


श्लोक – 16
Shlok – 16

पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवा
नतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः!
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः
कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि!!
pati-sutānvaya-bhrātṛ-bāndhavān
ativilańghya te ‘nty acyutāgatāḥ
gati-vidas tavodgīta-mohitāḥ
kitava yoṣitaḥ kas tyajen niśi

Dear Acyuta, You know very well why we have come here. Who but a cheater like You would abandon young women who come to see Him in the middle of the night, enchanted by the loud song of His flute? Just to see You, we have completely rejected our husbands, children, ancestors, brothers and other relatives.

हे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर ! हम अपने पति, पुत्र, सभी भाई-बन्धु और कुल परिवार को त्यागकर उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं। हम तुम्हारी हर चाल को जानती हैं, हर संकेत को समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आयी हैं। हे कपटी ! इसप्रकार रात्रि को आयी हुई युवतियों को तुम्हारे अलावा और कौन छोड़ सकता है।


श्लोक – 17
Shlok – 17

रहसि संविदं हृच्छयोदयं
प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्!
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते
मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः!!
rahasi saṁvidaṁ hṛc-chayodayaṁ
prahasitānanaṁ prema-vīkṣaṇam
bṛhad-uraḥ śriyo vīkṣya dhāma te
muhur ati-spṛhā muhyate manaḥ

Our minds are repeatedly bewildered as we think of the intimate conversations we had with You in secret, feel the rise of lust in our hearts and remember Your smiling face, Your loving glances and Your broad chest, the resting place of the goddess of fortune. Thus we experience the most severe hankering for You.

हे प्यारे ! एकांत में तुम मिलन की इच्छा और प्रेम-भाव जगाने वाली बातें किया करते थे । ठिठोली करके हमें छेड़ते थे । तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखकर मुस्कुरा देते थे और हम तुम्हारा वह विशाल वक्ष:स्थल देखती थीं जिस पर लक्ष्मी जी नित्य निरंतर निवास करती हैं । हे प्रिये ! तबसे अब तक निरंतर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यंत आसक्त होता जा रहा है।


श्लोक – 18
Shlok – 18

व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते
वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्!
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां
स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्!!
vraja-vanaukasāṁ vyaktir ańga te
vṛjina-hantry alaṁ viśva-mańgalam
tyaja manāk ca nas tvat-spṛhātmanāṁ
sva-jana-hṛd-rujāṁ yan niṣūdanam

O beloved, Your all-auspicious appearance vanquishes the distress of those living in Vraja’s forests. Our minds long for Your association. Please give to us just a bit of that medicine, which counteracts the disease in Your devotees’ hearts.

हे प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है । हमारा ह्रदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है । कुछ थोड़ी सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निज जनो के ह्रदय रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।


श्लोक – 19
Shlok – 19

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु!
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः!!
yat te sujāta-caraṇāmburuhaṁ staneṣu
bhītāḥ śanaiḥ priya dadhīmahi karkaśeṣu
tenāṭavīm aṭasi tad vyathate na kiṁ svit
kūrpādibhir bhramati dhīr bhavad-āyuṣāṁ naḥ

O dearly beloved! Your lotus feet are so soft that we place them gently on our breasts, fearing that Your feet will be hurt. Our life rests only in You. Our minds, therefore, are filled with anxiety that Your tender feet might be wounded by pebbles as You roam about on the forest path.

हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे चरण, कमल से भी कोमल हैं । उन्हें हम अपने कठोर हृदय पर भी डरते डरते रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय । उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे-छिपे भटक रहे हो । क्या कंकड़, पत्थर, काँटे आदि की चोट लगने से उनमे पीड़ा नहीं होती ? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही चक्कर आ रहा है । हम अचेत होती जा रही हैं । हे प्यारे श्यामसुन्दर ! हे प्राणनाथ ! हमारा जीवन तुम्हारे लिए है, हम तुम्हारे लिए जी रही हैं, हम सिर्फ तुम्हारी हैं


इस पाठ को नित्य समय निकाल कर जरुर रोज पढ़ा करे 

Posted on Leave a comment

श्रीप्रिया जी की 101 नामावली

श्री कृष्ण की अति प्रिय “श्रीप्रिया” जी की 101 नामावली

इस ‘प्रिया नामावली’ ग्रन्थ में नित्य-विहारिणी सर्वराध्य स्वामिनी के विहार परक नामों का ही रसात्मक तात्पर्य निहित है। इस नामावली के में श्री ध्रुवदास जी का यह भी मन्तव्य अनुमानित होता है कि नित्य-विहार के उपासक रसिक जन श्री प्रिया जी के इन्हीं नामों का गान-स्मरण करे

  1. श्री राधे
    नित्य विहारमय वृन्दावन-निभृत-निकुञ्ज की सर्वोपरि स्वामिनी, श्री कृष्ण की भी आराध्या।
  2. नित्य किशोरी
    वाल, पौगण्ड एवं कौमार अवस्थाओं से अतीत, नित्य किशोरावस्था सम्पन्न, सौन्दर्य-माधुर्य की एकमात्र निधि।
  3. वृन्दावन विहारिनी
    नित्य धाम श्री वृन्दावन में ही विहार करने वाली, नित्य एकरस प्रियतम-संयोगिनी।
  4. वनराज रानी
    नित्य धाम वृन्दावन की एकमात्र परम स्वतन्त्र अधिकारिणी स्वामिनी।
  5. निकुंजेश्वरी
    श्री वृन्दावन के निभृत निकुञ्ज में, जहाँ प्रिया-प्रियतम की कैशोर-लीला सम्पन्न होती है, उस निकुञ्ज धाम की सर्वोपरि एवं स्वतन्त्र साम्राज्ञी।
  6. रूप रंगीली
    रूप एवं रङ्ग (आनन्द) में रँगी हुई।
  7. छबीली
    छवि अथवा शोभा से युक्त।
  8. रसीली
    रसयुक्त अथवा रस-प्रदात्री।
  9. रस नागरी
    रस एवं रसिकता की मर्मज्ञ, रस-विलास-चतुरा।
  10. लाडिली
    प्रियतम एवं समस्त परिवार की लाड़-भाजन एवं अत्यन्त दुलारी।
  11. प्यारी
    प्रियतम की प्रेम-पात्र, प्रेमास्पदा।
  12. सुकुँवारी
    कोमल अंगों वाली।
  13. रसिकनी
    रासादि रस-क्रीड़ाओं में आनन्द लेने वाली, रसमर्मज्ञा।
  14. मोहिनी
    जिनकी रूप-छटा प्रियतम को मोहित करती रहती है।
  15. लाल मुखजोहिनी
    प्रियतम के मनोहर मुख-चन्द की चकोरि ।
  16. मोहन-मन-मोहिनी
    अन्य सबके मन को मोहित करने वाले प्रियतम श्री कृष्ण का भी विमोहन करने वाली।
  17. रति-विलास-विनोदिनी
    अपने प्रियतम के साथ दाम्पत्य -केलि में आनंदानुभव करने वाली।
  18. लाल-लाड़-लड़ावनी
    प्रियतम श्री लालजी को उनके मनोनुकूल सुखों का दान करके, तत्सुख रीति से उन्हें प्रसन्न रखने वाली।
  19. रंग-केलि बढ़ावनी
    निकुञ्ज भवन में प्रियतम के सुख के लिए कोक-केलि का विस्तार करने वाली।
  20. सुरत-चंदन-चर्चिनी
    एकान्तिक विहार काल में प्रियतम के प्रस्वेट पङ्किल चन्दन से लिप्त अङ्गों वाली।
  21. कोटि-कोटि दामिनी-दमकनी
    कोटि-कोटि असंख्य विद्युल्लताओं की चमक-दमक को भी जाज्ज्वल्यता प्रदान करने वाली अथवा कोटि-कोटि विद्युल्लता जैसी छबिमयी।
  22. लाल पर लटकनी
    प्रियतम की लाड़-भाजन होने के कारण लड़कान पूर्वक अपने ललित तनु को प्रियतम की देहयष्टि से विलम्बित करने वाली।
  23. नवल नासा-चटकनी
    प्रियतम श्री लाल को, रसलीन दशा से सचेत करने लिये उनकी नासिका के समीप अपनी कराड् गुलियों से मीठी सी चुटकी चटका देने वाली।
  24. रहसि पुंजे
    ऐकान्तिक आनन्द की निधि।
  25. वृंदावन प्रकाशिनि
    श्री वृन्दावन के गोप्य रसमय स्वरूप को अपनी रसमयी लीलाओं के द्वारा प्रकाशित करने वाली अथवा श्री वृन्दावन मात्र में अपने स्वरूप को प्रकाशित रखने वाली।
  26. रंग-विहार-विलासिनी
    श्री वृन्दावन के प्रेमानन्दमय विलास मे विलसने एवं प्रियतम को विलसाने वाली।
  27. सखी-सुख-निवासिनी
    जिनके स्वरूप में अपनी दासियों, सखियों किंवा सहचरियों का सम्पूर्ण सुख निहित है।
  28. सौंदर्य रासिनी
    अखिल एवं अनन्त सौन्दर्य-माधुर्य तथा लावण्य-राशि को सर्वदा धारण करने वाली।
  29. दुलहिनि
    नित्य नव-वधू।
  30. मृदु हासिनी
    जिसके मुखमण्डल पर निरन्तर मन्द मधुर एवं मृदु मुस्कान स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है।
  31. प्रीतम-नैन-निवासिनी
    सदा-सर्वदा प्रियतम के नेत्रों में बसी रहने वाली।
  32. नित्यानन्द-दर्शिनी
    जिसके स्वरूप में सदा नव-नव आनन्द का दर्शन होता रहता हो अथवा जो नित्य नये आनन्द का दर्शन कराती रहती है।
  33. उरजनि पिय-परसिनी
    जो अपने उरोजों के द्वारा प्रियतम के सुभग अङ्गों को स्पर्श दान करने में सहज उदार हो ।
  34. अधर-सुधारस बरसनी
    जो प्रेम विवश भाव से प्रियतम को सुखदान करने के लिये अपने अधरामृत रस का सदैव वर्षण करती है।
  35. प्राननिं रस-सरसिनी
    निरन्तर प्रियतम के प्राणों को रस से सिक्त रखने वाली।
  36. रंग-विहारिनि
    आनन्द रूपी विहार में रमण करने वाली अथवा विहार में रसरङ्ग की वृद्धि करने वाली।
  37. नेह-निहारनि
    जिनकी सहज दृष्टि में सदा प्रेम-स्नेह की ही वृष्टि होती है।
  38. पिय-हित-सिंगार-सिंगारिनी
    जो अपने प्रियतम के लिए वस्त्राभूषण आदि शृङ्गारों से अपने श्री अङ्गों को सुसज्जित करती हो, स्व-सुख के लिए नहीं, अपितु तत्सुखिता ही जिसके शृङ्गार का मूल हो ।
  39. प्यार सौं प्यारे कौं लै उर धारिनि
    जो अपने प्रियतम को हृदय पर धारण कर रस-दान करने में कुशल है ।
  40. मोहन-मैंने-विथा-निरवारनि
    सदैव अकाम रहने वाले मोहन श्याम के प्रेम-सकाम होने पर उनके हृदय की अनिवार्य प्रेम-व्यथा को अपने उदार रस-दान द्वारा निर्वारित करने में सदा सक्षम एवं समर्थ।
  41. जानि प्रवीन उदार सँभारनी
    जो परम निपुण प्रेमास्पद है, उदार शिरोमणि हैं। जो अपने जनो की सदा सर्वदा स्नेहपूर्वक ध्यान में रखने में समर्थ हैं।
  42. अनुराग सिंध
    प्रेम की अगाध समुद्ररूपा।
  43. स्यामा
    षोडश वर्षीया नव नव रूप, गुण, सौन्दर्य, लावण्य-निधि, रसनिथि नागरी ।
  44. भामा
    प्रियतम-प्रेम की प्रकाशिका।
  45. बामा
    प्रतिकूलता का रस-विधा में भी रसास्वादन करने कराने वाली प्रिया।
  46. भाँवती
    प्रियतम की अतिशय प्रिय लगने वाली।
  47. जुरवतिन-जूथ-तिलका
    परम सुन्दरी एवं नवयौवना सखियों के विशाल समूह की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी प्रिया।
  48. वृंदावन-चंद चंद्रिका
    वृन्दावन – विलासी श्री कृष्ण चंद्रमा रूपी की ज्यौत्ना रूपी प्रिया।
  49. हास-परिहास-रसिका
    हास्य विनोद की क्रीड़ा में आनन्द अनुभव करने वाली।
  50. नवरंगिनी
    सदैव नये-नये प्रकार के आनन्द विलास को प्रकट करने वाली।
  51. अलकावलि-छवि-फंदिनी
    जिसकी चुँघराले केश-राशि सौंदर्य छवि के पाश किंवा फंदे की भाँति है, जो सदैव लाल के मन का फँसाती है।
  52. मोहनी मुसिकिनि मंदिनी
    मन्द-मन्द मधुर मुसकान के द्वारा प्रियतम के मन को भी मोहित करने वाली।
  53. सहज आनन्द-कंदिनी
    सहज रूप से आनन्द की सार स्वरूपिणी।
  54. नेह कुरंगिनी
    बहेलिये के कर्ण-मधर नाट पर मोहित होकर अपने सर्वस्व देने वाली हरिणी की भाँति जो प्रियतम के प्रेम पर मोहित होकर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे, ऐसी रिझर्वार प्रिया।
  55. नैन विसाला
    जिसके कर्णायत नेत्र सुन्टर एवं सुदीर्घ हैं।
  56. महामधुर रस-कंदिनी
    उज्ज्वल शृङ्गार मूलक नित्य विहारमय दम्पति विलास रस की आधार स्वरूपा।
  57. चंचल चिंत-आकर्षिनी
    व्रज के बहु नायकत्त्व रस में लिप्त व्रज रस रसिक श्री कृष्ण को कान्त भाव से विरत करके, अपने रूप, प्रेम, आकर्षण के द्वारा नित्य-विहारमय ऐकान्तिक राधा-कान्त भाव में स्थिर कर देने वाली।
  58. मदन-मान-खंडिनी
    अपने निष्काम एवं उज्ज्वल प्रेम के द्वारा नेम-प्रधान काम के कामना-मूलक अभिमान का तिरस्कार एवं मान मर्दन कर देने वाली सहज सर्वोपरि प्रेम-मूर्ति ।
  59. प्रेम-रंग-रंगिनी
    कामादि भावों से विवर्जित विशुद्ध तत्सुखमय प्रेम के आनन्द में निरन्तर रँगी हुई।
  60. बंक-कटाक्षिनी
    जिनके नेत्रों की सहज चितवन भी रसदायक, पैनी एवं बाँकी है।
  61. सकल विद्या-विचक्षनी
    दाम्पत्य प्रेम की विलास कलाओं किंवा कोक-विद्या की समस्त कलाओं में सहज निपुणा।
  62. कुँवर अंक-विराजनी
    रसिक-किशोर प्रियतम की क्रोड़ में विराजमान होनेवाली, उनके प्रेम-सम्मान की एकमात्र अधिकारिणी।
  63. प्यार-पट-निवाजिनी
    प्रेम के पदाधिकार का आद्यन्त नि्वाह करने वाली।
  64. सुरत-समर-दल-साजिनी
    निकुञ्ज विहारवसर पर प्रियतम के साथ दाम्पत्य क्रीड़ा में हाव-भाव रूपी सैन्य को सुसज्जित रखने वाली।
  65. मृगनैनी
    हरिणी जैसे सुन्दर एवं विशाल डहडहे नेत्रों की शोभा से संपन्न।
  66. पिकबैंनी
    कोयल जैसी कर्ण-मधुर वाणी एवं स्वर से युक्त।
  67. सलज्ज अंचला
    जो पदे-पदे लज्जा से युक्त होकर दुकूल अञ्चल से मुख को ढँक लेती है।
  68. सहज चंचला
    नारी स्वभाव सुलभ चाञ्चल्य जिसके अङ्ग-अङ्ग में अधिकाधिक रूप से विराजमान् है।
  69. कोक कलानी-कुशला
    दम्पति विलास की केलि-कलाओं में जो सहज निपुण हैं।
  70. हाव-भाव चपला
    अन्तर स्थित प्रेम को प्रकट करने वाले इङ्गितो अर्थात हाव-भावों की व्यंजना में कुशल एवं उनके प्रदर्शन में सहज चञ्चला।
  71. चतुर्य चतुरा
    मूर्तिमान् चातुरी को भी अपनी चातुरी से पनि करने वाली।
  72. माधुर्य मधुर
    मूर्तिमान् माधुर्य को अपने प्रेम, रूप, लावण्य आदि विलज्जित कर देने वाली सहज माधुर्य-मूर्ति श्री राधा।
  73. बिनु भूषन भूषिता
    जिसका प्रत्येक अङ्ग सहज सौन्दर्य, माधुर्यमय है जो सौन्दर्य के लिए अलङ्कार किंवा आभूषणों की अपेक्षा न रखती हो अपितु जिसके सौन्दर्य से आभूषणादि भी सौन्दर्य-मण्डित हो जाते, ऐसी सहज शृङ्गारमयी नवल किशोरी।
  74. अवधि सौन्दर्यता
    सौन्दर्य की चरमसीमा, जिसके सौन्दर्य के समकक्ष कोई हो ही नहीं, तब अधिक कैसे होगा। अर्थात् असमोध्द्र रूप लावण्यमयी।
  75. प्राण-वल्लभा
    प्रियतम के प्राणों को उनके अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय अर्थात् जिस पर प्रियतम के प्राण न्यौछावर हों।
  76. रसिक-रवनी
    रसिक प्रियतम को भी अपने रूप मे रमा लेने वाली किंवा रसिक प्रियतम के प्रेम एवं रूप मे सदैव एक रस रमने वाली।
  77. कामिनी
    जिसके हृदय में प्रेम सुखार्थ प्रेम-कामनाओं का विस्तार होता रहता है।
  78. भामिनी
    प्रियतम के मन पर सहज रूप से अधिकार रखने वाली।
  79. हंस कल-गामिनी
    राजहंस पक्षी की भाँति मद-मन्थर गति से गतिशील प्रिया।
  80. घनश्याम अभिमान
    सघन जल-परित मेघों की भाँति परम सुन्दर श्याम वर्ण श्रीकृष्ण को भी अपने परम रमणीय रूप में रमा लन वाली, दामिनी द्युति-विनिन्दक गौरांगी, परम सुन्दरी।
  81. चंद-विपनी
    श्री वन्दाविपिन के स्वरूप प्रभाव को अपने ने सौन्दर्य एवं महामधुर विलास से प्रकाशित करने वाले चन्द्रमा रूपा शीतल प्रभा पुंज।
  82. मदन-दवनी
    अपने परमोज्ज्वल प्रेम प्रभाव से समस्त काम प्रवृत्तियों का सर्वथा दमन एवं विनाश कर देने वाली।
  83. रसिक-रवनी
    रसिक शिरोमणि प्रीतम श्री लाल जी को रमण सुख प्रदान करने वाली किवा रसिक प्रियतम के साथ रमण करने वाली।
  84. केलि-कमनी
    निकुञ्ज गीत दाम्पत्य क्रीड़ा को कमनीय स्वरूप प्रदान करने वाली रस-विदग्धा नागरी।
  85. चित्तहरनी
    अपने सहज सौन्दर्य एवं लावण्य से प्रियतम श्याम के चञ्चल चित्त को चुराने वाली।
  86. ललन-उर पर चरनधरनी
    तीव्र प्रेमताप से संतप्त प्रियतम के हृदय देश पर अपने शीतल सुभग चरण कमलों को स्थापित करके उन्हें शान्ति प्रदान करने वाली।
  87. छवि कंज-वदनी
    जिनकी श्री मुखछवि कमल के समान शोभा सम्पन्न है।
  88. रसिक नंदिनी
    आनन्द स्वरूप रसिक प्रीतम को भी अपने रसानन्द से आन्दोलित करने वाली अथवा रसिक प्रियतम से मिलकर आन्दानुभूति करने वाली।
  89. रूप-मंजरी
    नित्य विकास को प्राप्त होने वाली, रूप-कलिका-पुञ्ज।
  90. सौभाग्य-रसभरी
    प्रियतम का नित्य साहचर्य सुख-विलास प्राप्त, रसवती नित्य किशोरी प्रिया।
  91. सर्वांग सुन्दरी
    जो नख-शिख पर्यन्त समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गों में रूप, सान्दय, माधुर्य, सुकुमारता, लावण्या, हाव-भाव भङ्गिमा आदि की सौन्दर्य सीमा हैं।
  92. गौरांगी
    तप्त कञ्चनवत गौर वर्ण के सौन्दर्य-लावण्य से परिपूरित सुकुमार अंगों वाली गौरवर्णा मुग्धा प्रिया।
  93. रतिरस रंगी
    प्रियतम समागम से उद्भूत रति-रस से रँगी हुई अथवा दाम्पत्य-रति के रस से प्रियतम को रँग देने वाली।
  94. विचित्र कोक कला अंगी
    शास्त्र वर्णित कोक-कलाओं से भी विलक्षण अथवा अनुपम कोक अंगों में प्रवीण किंवा विचित्र कोक-कलाएँ भी जिनकी एक अंश कला के प्रतिमान् हो।
  95. छवि-चंद-वदनी
    शोभा रूपी चन्द्रमा के समान सुभग सीतल।
  96. रसिक लाल बंदिनी
    जिनकी अनुपम रसिकता के समक्ष शेखर श्री लाल जी भी नतमस्तक नक होकर चरण वन्दना करते हैं, ऐसी रसिक मौलि , नवल किशोरी, रस-विदग्धा प्रिया।
  97. रसिक रस-रंगनी
    रसिक प्रीतम के रस में रँगी हुई अथवा रसिक-प्रियतम को अपने रस में रंग देने वाली।
  98. सखिनु सभामंडिनी
    नित्य विहार जय श्री वृन्दावन की नित्य-किशोरी सखियों की सभा में सर्वोपरि सुन्दर होने से सबको भूषण-स्वरूपा।
  99. आनंद-नंदिनी
    आनन्द की मूल स्वरूपा अर्थात् आनन्द रूप प्रियतम को भी आह्लादित करने वाली।
  100. चतुर अरु भोरी
    चातुर्य की अवधि होकर भी हृदय की सरलता के कारण भोलेपन की भी जो प्रतिमूर्ति है।
  101. सकल सुख-रासि-सदने
    आश्रित जनों को, सखियों को एवं प्रेमास्पद प्रियतम को भी वांछित समस्त सुखों का दान करने में सदा-सर्वदा समर्थ एवं उदारता की परमावधि।

उपसंहार
दोहा- प्रेम-सिंधु के रतन ये, अद्भुत कुँवरि के नाम।
जाकी रसना रटै ‘ध्रुव’, सो पावै विश्राम ॥१॥

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि कुँवरि किशोरी श्री राधा के ये नाम प्रेम रूपा श्री समुद्र के अद्भुत रत्न हैं। जिस भाग्यशाली भक्त की जिह्वा इन नामो का गान करेगी, वह निश्चित ही परम-शांति को प्राप्त करेगा॥१॥

ललित नाम नामावली, जाके उर झलकंत ।
ताके हिय में बसत रहैं, स्यामा-स्यामल कंत ॥२॥

ललित नामों की यह नामावली जिसके हृदय में झलकेगी, वही उस नाम क साथ उसके हृदय में प्रिया श्यामा एवं उनके कान्त प्रियतम श्याम सुन्नर सदैव निवास करेंगे॥२॥

|| • जय जय श्री राधे • ||