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श्री राधा कृपा कटाक्ष – Shri Radha Kripa Kataksh

श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र का गायन वृन्दावन के विभिन्न मन्दिरों में नित्य किया जाता है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक नित्यनिकुंजेश्वरि श्रीराधा और उनके प्राणवल्लभ नित्यनिकुंजेश्वर ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की सुर-मुनि दुर्लभ कृपाप्रसाद अनायास ही प्राप्त कर लेता है।
श्री राधा कृपा कटाक्ष को नित्य पढ़ने और सुनने से श्री राधे के चरणों मे शरण मिलती है और उनके चरणो मे मन लगता है।

“राधा साध्यम साधनं यस्य राधा, मंत्रो राधा मन्त्र दात्री च राधाl
सर्वं राधा जीवनम् यस्य राधा, राधा राधा वाचि किम तस्य शेषम ll”


“भावार्थ”: “राधा” साध्य है उनको पाने का साधन भी राधा नाम ही है। मन्त्र भी राधा है और मन्त्र देने वाली गुरु भी स्वयं राधा जी ही है सब कुछ राधा नाम में ही समाया हुआ है और सबका जीवन प्राण भी राधा ही है राधा नाम के अतिरिक्त ब्रम्हांड में शेष बचता क्या है?

तो आइये श्री राधा नाम की महिमा की धारा जिसे स्वयं महादेव ने बहाया हो और जो सदा समाधि के दौरान राधा नाम को रटते रहते रहते है उनके कृपा से इस नाम की धारा मे हम भी बहते रहे….


(श्लोक – 1)
मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।
व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१)

munīndra-vṛnda-vandite triloka-śoka-hāriṇi
prasanna-vaktra-paṇkaje nikuñja-bhū-vilāsini
vrajendra-bhānu-nandini vrajendra-sūnu-saṅgate
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||1||

भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१)

O goddess worshiped by the kings of sages, O goddess who remove the sufferings of the three worlds, O goddess whose face is a blossoming lotus, O goddess who enjoy pastimes in the forest, O daughter of Vrishhabhanu, O companion of Vraja’s prince, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 2)
अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते, प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (२)

aśoka-vṛkṣa-vallarī-vitāna-maṇḍapa-sthite
pravāla-vāla-pallava prabhā ’ruṇāṅghri-komale
varābhaya-sphurat-kare prabhūta-sampadālaye
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||2||

भावार्थ : आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (२)

O goddess staying in a vine-cottage by an ashoka tree, O goddess whose delicate feet are as splendid as red blossoms, O goddess whose hand grants fearlessness, O abode of transcendental opulence’s, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 3)
अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां, सुविभ्रम ससम्भ्रम दृगन्तबाणपातनैः।
निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (३)

anaṅga-raṅga-maṅgala-prasaṅga-bhaṅgura-bhruvāṁ
sa-vibhramaṁ sa-sambhramaṁ dṛganta-bāṇa-pātanaiḥ
nirantaraṁ vaśī-kṛta-pratīti-nanda-nandane
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||3||

भावार्थ : रास क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में आप अपनी बाँकी भृकुटी से आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहज कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा करती रहती हैं। आप श्री नन्दकिशोर को निरंतर अपने बस में किये रहती हैं, हे जगज्जननी वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (३)

O goddess who, playfully shooting the arrows of Your glances from the curved bows of Your auspicious, amorous eyebrows, have completely subdued Nanda’s son [Krishna], when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 4)
तड़ित्सुवणचम्पक प्रदीप्तगौरविगहे, मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्ङले।
विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशावलोचने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (४)

taḍit-suvarṇa-campaka-pradīpta-gaura-vigrahe
mukha-prabhā-parāsta-koṭi-śāradendu-maṇḍale
vicitra-citra-sañcarac-cakora-śāva-locane
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||4||

भावार्थ : आप बिजली के सदृश, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी आभा वाली हैं, आप दीपक के समान गोरे अंगों वाली हैं, आप अपने मुखारविंद की चाँदनी से शरद पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा को लजाने वाली हैं। आपके नेत्र पल-पल में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर शिशु के समान हैं, हे वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (४)

O goddess whose form is as splendid as champaka flowers, gold, and lightning, O goddess whose face eclipses millions of autumn moons, O goddess whose eyes are wonderful, restless young chakora birds, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 5)
मदोन्मदातियौवने प्रमोद मानमणि्ते, प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपणि्डते।
अनन्यधन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (५)

madonmadāti-yauvane pramoda-māna-maṇḍite
priyānurāga-rañjite kalā-vilāsa-paṇḍite
ananya-dhanya-kuñja-rājya-kāma keli-kovide
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||5||

भावार्थ : आप अपने चिर-यौवन के आनन्द के मग्न रहने वाली है, आनंद से पूरित मन ही आपका सर्वोत्तम आभूषण है, आप अपने प्रियतम के अनुराग में रंगी हुई विलासपूर्ण कला पारंगत हैं। आप अपने अनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंज-राज के प्रेम क्रीड़ा की विधा में भी प्रवीण हैं, हे निकुँजेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (५)

O young girl intoxicated with passion, O goddess decorated with cheerful jealous anger, O goddess who passionately love Your beloved Krishna, O goddess learned in playful arts, O goddess expert at enjoying amorous pastimes in the kingdom of the peerlessly opulent forest groves of Vrindavana, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 6)
अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते, प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुमि्भकुम्भसुस्तनी।
प्रशस्तमंदहास्यचूणपूणसौख्यसागरे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (६)

aśeṣa-hāva-bhāva-dhīra-hīra-hāra-bhūṣite
prabhūta-śāta-kumbha-kumbha-kumbhi kumbha-sustani
praśasta-manda-hāsya-cūrṇa-pūrṇa-saukhya-sāgare
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||6|

भावार्थ : आप संपूर्ण हाव-भाव रूपी श्रृंगारों से परिपूर्ण हैं, आप धीरज रूपी हीरों के हारों से विभूषित हैं, आप शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान अंगो वाली है, आपके पयोंधर स्वर्ण कलशों के समान मनोहर हैं। आपकी मंद-मंद मधुर मुस्कान सागर के समान आनन्द प्रदान करने वाली है, हे कृष्णप्रिया माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (६)

O goddess decorated with a pearl necklace of bold amorous hints, O goddess as fair as gold, O goddess whose breasts are great golden waterpots, O ocean of happiness filled with the scented powders of gentle smiles, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 7)
मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोलते, लतागलास्यलोलनील लोचनावलोकने।
ललल्लुलमि्लन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (७)

mṛṇāla-vāla-vallarī taraṅga-raṅga-dor-late
latāgra-lāsya-lola-nīla-locanāvalokane
lalal-lulan-milan-manojña mugdha-mohanāśrite
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||7||

भावार्थ : जल की लहरों से कम्पित हुए नूतन कमल-नाल के समान आपकी सुकोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन के झोंकों से नाचते हुए लता के अग्र-भाग के समान अवलोकन करने वाले हैं। सभी के मन को ललचाने वाले, लुभाने वाले मोहन भी आप पर मुग्ध होकर आपके मिलन के लिये आतुर रहते हैं ऎसे मनमोहन को आप आश्रय देने वाली हैं, हे वृषभानुनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (७)

O goddess whose arms are lotus stalks dancing on the waves, O goddess whose dark eyes are dancing vines, O playful, beautiful, charming goddess, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 8)
सुवर्ण्मालिकांचिते त्रिरेखकम्बुकण्ठगे, त्रिसुत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिअति।
सलोलनीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (८)

suvarṇa-mālikāñcita-trirekha-kambu-kaṇṭhage
tri-sūtra-maṅgalī-guṇa-tri-ratna-dīpti-dīdhiti
salola-nīla-kuntala prasūna-guccha-gumphite
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||8||

भावार्थ : आप स्वर्ण की मालाओं से विभूषित है, आप तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुन्दर कण्ठ वाली हैं, आपने अपने कण्ठ में प्रकृति के तीनों गुणों का मंगलसूत्र धारण किया हुआ है, इन तीनों रत्नों से युक्त मंगलसूत्र समस्त संसार को प्रकाशमान कर रहा है। आपके काले घुंघराले केश दिव्य पुष्पों के गुच्छों से अलंकृत हैं, हे कीरतिनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (८)

O goddess who wear a golden necklace on the three-lined conchshell of Your neck, O goddess splendid with three jasmine garlands and three jewelled necklaces, O goddess whose moving locks of dark hair are decorated with bunches of flowers, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 9)
नितम्बबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण, प्रशस्तरत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले।
करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (९)

nitamba-bimba-lambamāna-puṣpa-mekhalā-guṇe
praśasta-ratna-kiṅkiṇī-kalāpa-madhya mañjule
karīndra-śuṇḍa-daṇḍikā-varoha-saubhagoruke
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||9||

भावार्थ : आपका उर भाग में फूलों की मालाओं से शोभायमान हैं, आपका मध्य भाग रत्नों से जड़ित स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित है। आपकी जंघायें हाथी की सूंड़ के समान अत्यन्त सुन्दर हैं, हे ब्रजनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (९)

O goddess who wear a sash of flowers on Your curved hips, O goddess charming with a sash of tinkling jewelled bells, O goddess whose beautiful thighs punish the regal elephant’s trunk, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 10)
अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत्, समाजराजहंसवंश निक्वणातिग।
विलोलहेमवल्लरी विडमि्बचारूचं कमे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१०)

aneka-mantra-nāda-mañju-nūpurā-rava-skhalat
samāja-rāja-haṁsa-vaṁśa-nikvaṇāti-gaurave
vilola-hema-vallarī-viḍambi-cāru-caṅkrame
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||10||

भावार्थ : आपके चरणों में स्वर्ण मण्डित नूपुर की सुमधुर ध्वनि अनेकों वेद मंत्रो के समान गुंजायमान करने वाले हैं, जैसे मनोहर राजहसों की ध्वनि गूँजायमान हो रही है। आपके अंगों की छवि चलते हुए ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे स्वर्णलता लहरा रही है, हे जगदीश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१०)

O goddess whose anklets’ tinkling is more beautiful than the sounds of many mantras and the cooing of many regal swans, O goddess whose graceful motions mock the moving golden vines, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 11)
अनन्तकोटिविष्णुलोक नमपदमजाचिते, हिमादिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे।
अपारसिदिवृदिदिग्ध -सत्पदांगुलीनखे, कदा करिष्यसीह मां कृपा -कटाक्ष भाजनम्॥ (११)

ananta-koṭi-viṣṇu-loka-namra-padmajārcite
himādrijā-pulomajā-viriñcajā-vara-prade
apāra-siddhi-ṛddhi-digdha-sat-padāṅgulī-nakhe
kadā kariṣyasīha māṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam ||11||

भावार्थ : अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं, श्रीपार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी चरण वन्दना कर वरदान पाया है। आपके चरण-कमलों की एक उंगली के नख का ध्यान करने मात्र से अपार सिद्धि की प्राप्ति होती है, हे करूणामयी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (११)

O goddess worshiped by Brahma, O goddess to whom countless millions of Vaishnavas bow down, O goddess who give blessings to Parvati, shaci, and Sarasvati, O goddess whose toenails are anointed with limitless opulence’s and mystic perfections, when will You cast Your merciful sidelong glance upon me?


(श्लोक – 12)
मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी, त्रिवेदभारतीयश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी, ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते॥ (१२)

makheśvari kriyeśvari svadheśvari sureśvari
triveda-bhāratīśvari pramāṇa-śāsaneśvari
rameśvari kṣameśvari pramoda kānaneśvari
vrajeśvari vrajādhipe śrī rādhike namo ’stu te ||12||

भावार्थ : आप सभी प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप सब देवताओं की स्वामिनी हैं, आप तीनों वेदों की स्वामिनी है, आप संपूर्ण जगत पर शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं, आप क्षमा देवी की स्वामिनी हैं, आप आमोद-प्रमोद की स्वामिनी हैं, हे ब्रजेश्वरी! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमन है। (१२)

O queen of Vedic sacrifices, O queen of pious activities, O queen of the material world, O queen of the demigods, O queen of Vedic scholarship, O queen of knowledge, O queen of the goddesses of fortune, O queen of patience, O queen of Vrindavana, the forest of happiness, O queen of Vraja, O empress of Vraja, O Sri Radhika, obeisance’s to You!


(श्लोक – 13)
इतीदमतभुतस्तवं निशम्य भानुननि्दनी, करोतु संततं जनं कृपाकटाक्ष भाजनम्।
भवेत्तादैव संचित-त्रिरूपकमनाशनं, लभेत्तादब्रजेन्द्रसूनु मण्डलप्रवेशनम्॥ (१३)

itī mam adbhutaṁ-stavaṁ niśamya bhānu-nandinī
karotu santataṁ janaṁ kṛpā-kaṭākṣa-bhājanam
bhavet tadaiva-sañcita-tri-rūpa-karma-nāśanaṁ
bhavet tadā-vrajendra-sūnu-maṇḍala-praveśanam ||13||

भावार्थ : हे वृषभानु नंदिनी! मेरी इस निर्मल स्तुति को सुनकर सदैव के लिए मुझ दास को अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करने की कृपा करो। केवल आपकी दया से ही मेरे प्रारब्ध कर्मों, संचित कर्मों और क्रियामाण कर्मों का नाश हो सकेगा, आपकी कृपा से ही भगवान श्रीकृष्ण के नित्य दिव्यधाम की लीलाओं में सदा के लिए प्रवेश हो जाएगा। (१३)

Upon hearing this most astonishing prayer of mine being recited by a devotee, may Sri Vrishhabhanu-nandini constantly make him the object of Her most merciful sidelong glance. At that time all his karmic reactions – whether mature, fructifying, or lying in seed – will be completely destroyed, and then he will gain entrance into the assembly of Nandanandana’s eternal loving associates.

॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥


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