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एकादशी सूची

भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त भी एकादशी, जन्माष्टमी, रामनवमी, गौर पौर्णिमा, नरसिंह जयंती, व्यास पूजा या और अन्य वैष्णव तिथि को उपवास करते है, व्रत रखते है। इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य होता है ? वस्तुतः भक्तोंकी कोई भी भौतिक कामना नही होती । भक्त अपने आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह व्रत करते है ।

व्रत का पालन करना यह मूल सिद्धांत न होकर, भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा बढाना यह कारण है । उपवास करनेसे मन शुद्ध होता है, मन को वश में करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा बढाना यह कारण है । मन को वश में करके भगवान श्रीकृष्ण की सेवा उत्तम प्रकारसे करने के लिए उपवास सहायक होता है। भगवान श्रीकृष्ण को एकादशी का व्रत सर्वाधिक प्रिय है अतः प्रत्येक वैष्णव जन को एकादशी करनी ही चाहिए।


साल 2021 मे आने वाली सभी एकादाशियों की सूची


जनवरी 2021: एकादशी व्रत


09 जनवरी: सफला एकादशी
24 जनवरी: पौष पुत्रदा एकादशी


फरवरी 2021: एकादशी व्रत


07 फरवरी: षट्तिला एकादशी
23 फरवरी: जया एकादशी


मार्च 2021: एकादशी व्रत


09 मार्च: विजया एकादशी
25 मार्च: आमलकी एकादशी


अप्रैल 2021: एकादशी व्रत


07 अप्रैल: पापमोचिनी एकादशी
23 अप्रैल: कामदा एकादशी


मई 2021: एकादशी व्रत


07 मई: बरूथिनी एकादशी
22 मई: मोहिनी एकादशी


जून 2021: एकादशी व्रत


06 जून: अपरा एकादशी
21 जून: निर्जला एकादशी


जुलाई 2021: एकादशी व्रत


06 जुलाई: योगिनी एकादशी
20 जुलाई: देवशयनी एकादशी


अगस्त 2021: एकादशी व्रत


04 अगस्त: कामिका एकादशी
18 अगस्त: श्रावण पुत्रदा एकादशी


सितंबर 2021: एकादशी व्रत


03 सितंबर: अजा एकादशी
17 सितंबर: परिवर्तिनी एकादशी


अक्टूबर 2021: एकादशी व्रत


02 अक्टूबर: इन्दिरा एकादशी
16 अक्टूबर: पापांकुशा एकादशी


नवंबर 2021: एकादशी व्रत


01 नवंबर: रमा एकादशी
14 नवंबर: देवुत्थान एकादशी
30 नवंबर: उत्पन्ना एकादशी


दिसंबर 2021: एकादशी व्रत


14 दिसंबर: मोक्षदा एकादशी
30 दिसंबर: सफला एकादशी

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इन्दिरा एकादशी

इन्दिरा एकादशी


इन्दिरा एकादशी : शनिवार 02 अक्टूबर
पारण समय : अगली सुबह सूर्योदय से 09:29 के मध्य


आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी इन्दिरा एकादशी कहलाती है। जब कभी श्राद्ध, श्रद्धा से न करके दबाव से किया जाता है या अयोग्य व्यक्ति के द्वारा श्राद्ध होता है तो श्राद्ध के बावजूद भी मुक्ति नहीं होती है। इस व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पापों का नाश होता है। ऐसे में इंदिरा एकादशी का व्रत रखने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है। यह भटकते हुए पितरों की गति सुधारने वाला व्रत है।

इस दिन भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम जी की उपासना की जाती है। व्रती को शालिग्राम जी को तुलसी पत्र यानि तुलसी का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए। शास्त्रों और वैष्णवों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि एकादशी भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है। एकादशी का व्रत करने से विष्णु शीघ्र ही प्रसन्न होते है।


एकादशी व्रत की विधि

यह व्रत दशमी अर्थात एकादशी से एक रात पहले आरम्भ हो जाता है। दशमी की रात को भोजन नहीं किया जाता है। फिर एकादशी के पूरा दिन अन्न नहीं खाना चाहिए। व्रत को निराहार या फलाहार लेकर करें। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर व्यक्ति को पूर्णरुप से स्वच्छ हो जाना चाहिए। सूर्यदेव को अर्घ्य दें। उसके बाद भगवान विष्णु के विग्रह के समक्ष घी का दीप प्रज्जवलित करें। ईश्वर का ध्यान लगाकर भजन, चालीसा और आरती कर पूजा करें।
एकादशी के व्रत का पारण

एकादशी के अगले दिन सुबह किया जाता है। लेकिन व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि में पारण न किया जाए तो व्रत का फल व्रती को प्राप्त नहीं होता है।
         
एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को वैष्णव धर्म का पालन करना चाहिए। इस दिन व्रती को नामजप अवश्य करना चाहिए। गाय को हरा चारा खिलाएँ। भगवान विष्णु के समक्ष गीता का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। काँसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए। व्रती को अधिकांश समय भजन और प्रभु स्मरण में बिताना चाहिए। सार्वजनिक स्थान पर पीपल का पौधा लगाएँ। इस दिन विशेषतौर पर चावल नहीं खाने चाहिए। रात्रि में जागरण करना चाहिए। उपवास करने वाले व्यक्ति को प्याज, बैंगन, पान-सुपारी, लहसुन व मांस-मदिरा आदि नहीं खाने चाहिए।


                        
इन्दिरा एकादशी की कथा

         
महिष्मतीपुरी के एक राजा थे इन्द्रसेन। धर्मपूर्वक प्रजा के उद्धार के लिए कार्य करते थे साथ ही हरि भक्त भी थे। एक दिन देवर्षि नारद उनके दरबार में आए। राजा ने बहुत प्रसन्न हो उनकी सेवा की और आने का कारण पूछा। देवर्षि ने बताया कि मैं यम से मिलने यमलोक गया, वहाँ मैंने तुम्हारे पिता को देखा। उन्होंने बताया कि व्रतभंग होने के दोष से वो यमलोक की यातनाएं झेलने को मजबूर है। इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भेजा है कि तुम उनके लिए इन्दिरा एकादशी का व्रत करो। ताकि वो स्वर्गलोक को प्राप्त कर सकें। राजा ने पूछा- कृपा करके इन्दिरा एकादशी के संदर्भ में बताएँ। देवर्षि ने बताया कि आश्विन मास की यह एकादशी पितरों को सद्गति देने वाली है। एकादशी के दिन इस मंत्र का उच्चारण करें-

अद्य स्थित्वा निराहारः  सर्वभोगविवर्जितः।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥

         
व्रत में अपना पूरा दिन नियम-संयम के साथ बिताएँ। व्रती को इस दिन आलस्य त्याग कर भजन करना चाहिए। पितरों का भोजन निकाल कर गाय को खिलाएँ। फिर भाई-बन्धु, नाती और पु्त्र आदि को खिलाकर स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करना। इस विधि से व्रत करने से आपके पिता की सद्गति होगी। राजा ने इसी प्रकार इन्दिरा एकादशी का व्रत किया। व्रत के फल से राजा के पिता को हमेशा के लिए बैकुण्ठ धाम का वास मिला और राजा भी मृत्योपरांत स्वर्गलोक गए।

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परिवर्तिनी एकादशी

परिवर्तिनी एकादशी : शुक्रवार 17 सितंबर
पारण समय : अगली सुबह से 07:03 के मध्य

“परिवर्तिनी एकादशी”

भाद्रपद शुक्ल एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जानते हैं। यह पद्मा / जयंती एकादशी भी कहलाती है। यह पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं है। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन भगवान् विष्णु के वामन रूप की पूजा जाती है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

परिवर्तनी एकादशी व्रत कथा

त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था । वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों और याचनाओं से प्रतिदिन भगवान का पूजन किया करता था। नित्य विधि पूर्वक यज्ञ आयोजन करता और ब्राह्मणों को भोजन कराता था। वह जितना धार्मिक था उतना ही शूरवीर भी। एकबार उसने इंद्रलोक पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान विष्णु के पास गए। देवगुरु बृहस्पति सहित इंद्र देवता प्रभु के निकट जाकर हाथ जोड़कर वेद मंत्रों द्वारा भगवान की स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु ने उनकी विनय सुनी और संकट टालने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने वामन रूप धारण करके अपना पांचवां अवतार लिया और राजा बलि से सब कुछ दान स्वरूप ले लिया।

भगवान वामन का रूप धारण करके राजा बलि द्वारा आयोजित किए गए यज्ञ में पहुँचे और दान में तीन पग भूमि माँगी । इस पर राजा ने वामन का उपहास करते हुए कहा कि इतने छोटे से हो, तीन पग भूमि में वामन का उपहास करते हुए कहा कि इतने छोटे से हो, तीन पग भूमि में क्या पाओगे। लेकिन वामन अपनी बात से अडिग रहे। इस पर राजा ने तीन पग भूमि देना स्वीकार किया और दो पग में धरती और आकाश माप लिए । इस पर वामन ने तीसरे पग के लिए पूछा कि राजन अब तीसरा प कहाँ रखूँ, इस पर राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। क्योंकि वह पहचान गए थे कि वामन कोई और नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं।

तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और वामन भगवान् ने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे वह भक्त पाताल चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर वामन भगवान् ने कहा कि हे बलि ! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूँगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर वामन भगवान् की मूर्ति स्थापित हुई।

इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार मास के निंद्रा काल में करवट बदलते है, इसलिये निद्रामग्न भगवान के करवट परिवर्तन के कारण ही अनेक शास्त्रों में इस एकादशी को परिवर्तिनी एवं पार्शव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

विधि / फल

इस व्रत को करने के लिए पहले दिन हाथ में जल का पात्र भरकर व्रत का सच्चे मन से संकल्प करना होता है। प्रातः सूर्य निकलने से पूर्व उठकर स्नानादि क्रिया से निवृत होकर भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करने का विधान है। धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प मिष्ठान एवं फलों से विष्णु भगवान का पूजन करने के पश्चात अपना अधिक समय हरिनाम संकीर्तन एवं प्रभु भक्ति में बिताना चाहिए । कमलनयन भगवान का कमल पुष्पों से पूजन करें, एक समय फलाहार करें और रात्रि को भगवान का जागरण करें। मंदिर में जाकर दीपदान करने से भगवान अति प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों पर अत्यधिक कृपा करते हैं।

भगवान को एकादशी अति प्रिय है परन्तु एकादशी तिथि को किए गए व्रत एवं हरिनाम संकीर्तन से प्रभु बहुत जल्दी और अधिक प्रसन्न होकर अपने भक्तों पर कृपा करते हैं। इस मास में भगवान वामन जी का अवतार हुआ था इसी कारण व्रत में भगवान विष्णु के बौने रूप की पूजा करने से भक्त को तीनों लोकों की पूजा करने के समान फल मिलता है। यह एकादशी भक्त को वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फलदायिनी होती है। मनुष्य के सभी पापों का नाश करने वाली इस एकादशी व्रत के प्रभाव से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा अंत में उसे परमपद की प्राप्ति होती है। विधिपूर्वक व्रत करने वालों का चंद्रमा के समान यश संसार में फैलता है।

जय श्री हरि

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अजा एकादशी


अजा एकादशी : शुक्रवार 03 सितंबर
पारण समय : अगली सुबह सूर्योदय से 06:39 के मध्य



“अजा एकादशी”


भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी अजा नाम से प्रसिद्घ है तथा इसे अन्नदा एकादशी भी कहा जाता है। इस एकादशी के व्रत से जीव के जहाँ जन्म-जन्मांतरों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, वहीं उनके संताप मिटने से भाग्य भी उदय हो जाता है। जिस कामना से कोई यह व्रत करता है उसकी वह सभी मनोकामनाएं तत्काल ही पूरी हो जाती हैं। इस व्रत में भगवान विष्णु जी के उपेन्द्र रुप की विधिवत पूजा की जाती है।

प्रत्येक एकादशी का व्रत करने से पूर्व जैसे संकल्प करने का विधान है वैसे ही इस एकादशी को भी पहले हाथ में जल लेकर सच्चे मन एवं भावना से संकल्प करना चाहिए तथा सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर भगवान विष्णु जी का धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प एवं फलों सहित पूजन करना चाहिए। एक समय फलाहार करना चाहिए। तुलसी का रोपण, सिंचन और पूजन करने से प्रभु अति प्रसन्न हो जाते हैं और हरिनाम संकीर्तन करने से अपार कृपा का फल मिलता है। भगवान सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापक हैं तथा बिना मांगे ही अपने भक्त की सारी स्थिति को जानकर उसके सभी कष्टों और चिंताओं को मिटा देते हैं। जो भक्त केवल भगवान की भक्ति ही सच्चे भाव से करते हैं उन पर भगवान वैसे ही कृपा करते हैं जैसे अपने मित्र सुदामा पर उन्होंने बिना कुछ कहे ही सब कुछ दे डाला, इसलिए भगवान से उनकी सेवा मांगने वाले भक्त सदा सुखी एवं प्रसन्न रहते हैं।


कथा


सतयुग में सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा हरीशचन्द्र हुए जो बड़े सत्यवादी थे। एक बार उन्होंने अपने वचन की खातिर अपना सम्पूर्ण राज्य राजऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया तथा दक्षिणा देने के लिए अपनी पत्नी एवं पुत्र को ही नहीं स्वयं तक को दास के रुप में एक चण्डाल को बेच डाला। अनेक कष्ट सहते हुए भी वह सत्य से विचलित नहीं हुए तब एक दिन उन्हें ऋषि गौतम मिले जिन्होंने उन्हें अजा एकादशी की महिमा सुनाते हुए यह व्रत करने के लिए कहा। राजा हरीशचन्द्र ने अपनी सामर्थ्यानुसार इस व्रत को किया जिसके प्रभाव से उन्हें न केवल उनका खोया हुआ राज्य प्राप्त हुआ बल्कि परिवार सहित सभी प्रकार के सुख भोगते हुए अंत में वह प्रभु के परमधाम को प्राप्त हुए। अजा एकादशी व्रत के प्रभाव से ही उनके सभी पाप नष्ट हो गए तथा उन्हें अपना खोया हुआ राज्य एवं परिवार भी प्राप्त हुआ था।

भगवान को एकादशी परम प्रिय है तथा इसका व्रत करने वाले भक्त संसार के सभी सुखों को भोगते हुए अंत में प्रभु के परम धाम को प्राप्त करते हैं। एकादशी में रात्रि जागरण की अत्यधिक महत्ता है। इस दिन किए गए दान का भी कई गुणा अधिक पुण्यफल प्राप्त होता है। जिस कामना से कोई एकादशी व्रत करता है उसकी सभी कामनाएं बड़ी जल्दी पूरी हो जाती हैं।

एकादशी व्रत में अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए। बहुत से भक्त तो यह व्रत केवल जल ग्रहण करके करते हैं तथापि इस व्रत में केवल एक समय फलाहार करने का विधान है। व्रत का पारण अगले दिन यानि द्वादशी तिथि को विधिवत पूजन करने के पश्चात करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन तथा अपनी सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। रात्रि में जागरण करने से प्रभु की अपार कृपा सदा भक्तों पर बनी रहती है।

राधे राधे

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श्रावण पुत्रदा एकादशी

श्रावण पुत्रदा एकादशी : बुधवार 18 अगस्त
पारण समय : अगली सुबह सूर्योदय से 09:33 के मध्य

कथा

युधिष्ठिर ने पूछा : मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है ? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! प्राचीन काल की बात है । द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था । माहिष्मतीपुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था । अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा: ‘प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ है । मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है । ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है । पुत्रवत् प्रजा का पालन किया है । धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया है । दुष्टों को, चाहे वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है । शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया है और किसीको द्वेष का पात्र नहीं समझा है । फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ? आप लोग इसका विचार करें ।’

राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया । राजा का कल्याण चाहनेवाले वे सभी लोग इधर उधर घूमकर ॠषिसेवित आश्रमों की तलाश करने लगे । इतने में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हुए ।

लोमशजी धर्म के त्तत्त्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं । उनका शरीर लोम से भरा हुआ है । वे ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं । एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक एक लोम विशीर्ण होता है, टूटकर गिरता है, इसीलिए उनका नाम लोमश हुआ है । वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं ।

उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ । लोगों को अपने निकट आया देख लोमशजी ने पूछा : ‘तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो? अपने आगमन का कारण बताओ । तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करुँगा ।’

प्रजाजनों ने कहा : ब्रह्मन् ! इस समय महीजित नामवाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है । हम लोग उन्हींकी प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है । उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दु:ख से दु:खित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये है । द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है । महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो ।

उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए ध्यानमग्न हो गये । तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तान्त जानकर उन्होंने कहा : ‘प्रजावृन्द ! सुनो । राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसनेवाला धनहीन वैश्य था । वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था । एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा । पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया । इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची । वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी, अत: बावली में जाकर जल पीने लगी । वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हाँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीने लगा । उसी पापकर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं । किसी जन्म के पुण्य से इन्हें निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है ।’

प्रजाजनों ने कहा : मुने ! पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरुप पुण्य से पाप नष्ट होते हैं, अत: ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय ।

लोमशजी बोले : प्रजाजनो ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पुत्रदा’ के नाम से विख्यात है । वह मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली है । तुम लोग उसीका व्रत करो ।

यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ के व्रत का अनुष्ठान किया । उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया । तत्पश्चात् रानी ने गर्भधारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया ।

इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है ।

ये एकादशी पुत्र प्राप्ति के लिए की जाती है. इस व्रत के नियमों का सही तरीके से पालन किया जाए, तो व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है. साल में दो बार पुत्रदा एकादशी आती है, एक पौष माह में और दूसरी श्रावण माह में।

श्रावण मास की अंतिम एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं. जो लोग दांपत्य जीवन में संतान सुख से वंचित हैं. उन्हें इस एकादशी का व्रत व पूजन जरूरकरनाचाहिए. वैसे तो सारी एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है. वहीं सावन माह भगवान शिव का मास कहा जाता है. ऐसे में सावन पुत्रदा एकादशी का महत्व विशिष्ट हो जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है. इसके साथ ही श्रीकृष्ण भगवान के बाल स्वरुप की पूजा करते हुए संतान की कामना की जाती है. इसे पुत्र देने वाली एकादशी भी कहते हैं. इसी लिए जो लोग दांपत्य जीवन में संतान सुख से वंचित हैं, उन लोगों के लिए सावन पुत्रदा एकादशी बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. धार्मिक मान्यता है कि इस एकादशी व्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है.

धार्मिक मान्यता है कि सावन पुत्रदा एकादशी व्रत रखकर भगवान विष्णु की विधि-पूर्वक पूजा करें और नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें. इससे संतान की प्राप्ति होगी.

ऊं देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।।


व्रत के दिन – 18 अगस्त


इस दिन, प्रातः काल स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए । इसके बाद एक छोटी चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान् विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर रखें। साथ ही भगवान श्री कृष्ण के बाल – गोपाल स्वरूप को रखना चाहिए।
फिर गंगाजल, तुलसी दल, तिल, पीले फूल व पंचामृत से विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए ।

इस दिन किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना चाहिए और दान करना चाहिए।

जो भी व्यक्ति एकादशी का व्रत करता है उसको अपने सभी प्रकार के कष्टों से शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

व्रत खोलने की विधि :

द्वादशी को सेवापूजा की जगह पर बैठकर भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकना चाहिए । ‘मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हुए’ – यह भावना करके सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत खोलना चाहिए ।

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत की आप सभी को शुभकामनाएं ।

जय जय श्री राधे

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कामिका एकादशी



कामिका एकादशी : बुधवार 04 अगस्त
पारण समय : अगली सूर्योदय से 9:33 के मध्य

जानें कब है सावन का पहला एकादशी व्रत ?

हिंदू शास्त्रों में एकादशी का बहुत महत्त्व है. हर महीने दो एकादशी पड़ती है. सावन माह की पहली एकादशी 4 अगस्त को मनाई जाएगी. सावन महीने के कृष्ण पक्ष को कामिका एकादशी मानाया जाता है. शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि कामिका एकादशी के दिन व्रत रखने से पापों का नाश होता है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. ऐसा कहा जाता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों का नाश तो होता ही है साथ ही व्यक्ति के जीवन में खुशहाली भी आती है.

कामिका एकादशी व्रत के दिन करें ये उपाय

  • कामिका एकादशी के दिन पूरे दिन निर्जाला या फलाहारी व्रत रखें और भगवान विष्णु का स्मरण करें.
  • एकादशी तिथि शुरू होने के पहले से चावल खाना बंद कर दें और व्रत का पारण करने के बाद ही चावल ग्रहण करें.
  • व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा करें. उसके बाद व्रत कथा का पाठ करें या सुनें.
  • सावन मास में मांस-मदिरा का सेवन न करें. केवल सात्विक भोजन ही ग्रहण करें.
  • व्रत की रात में जागरण करते हुए भगवान विष्णु का स्मरण करें.
  • व्रत के बाद गरीब व जरूतमंद लोगों को भोजन कराएं तथा यथा शक्ति दान दें. उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें.

(एकादशी के दिन इस कथा को पढ़ने या सुनने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता है)

कुंतीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन, आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी तथा चातुर्मास्य माहात्म्य मैंने भली प्रकार से सुना। अब कृपा करके श्रावण कृष्ण एकादशी का क्या नाम है, सो बताइए।

श्रीकृष्ण भगवान कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! इस एकादशी की कथा एक समय स्वयं ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद से कही थी, वही मैं तुमसे कहता हूँ। नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा था कि हे पितामह! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की मेरी इच्छा है, उसका क्या नाम है? क्या विधि है और उसका माहात्म्य क्या है, सो कृपा करके कहिए।

नारदजी के ये वचन सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद! लोकों के हित के लिए तुमने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। श्रावण मास की कृष्ण एकादशी का नाम कामिका है। उसके सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इस दिन शंख, चक्र, गदाधारी विष्णु भगवान का पूजन होता है, जिनके नाम श्रीधर, हरि, विष्णु, माधव, मधुसूदन हैं। उनकी पूजा करने से जो फल मिलता है सो सुनो।

जो फल गंगा, काशी, नैमिषारण्य और पुष्कर स्नान से मिलता है, वह विष्णु भगवान के पूजन से मिलता है। जो फल सूर्य व चंद्र ग्रहण पर कुरुक्षेत्र और काशी में स्नान करने से, समुद्र, वन सहित पृथ्वी दान करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोदावरी और गंडकी नदी में स्नान से भी प्राप्त नहीं होता वह भगवान विष्णु के पूजन से मिलता है।

जो मनुष्य श्रावण में भगवान का पूजन करते हैं, उनसे देवता, गंधर्व और सूर्य आदि सब पूजित हो जाते हैं। अत: पापों से डरने वाले मनुष्यों को कामिका एकादशी का व्रत और विष्णु भगवान का पूजन अवश्यमेव करना चाहिए। पापरूपी कीचड़ में फँसे हुए और संसाररूपी समुद्र में डूबे मनुष्यों के लिए इस एकादशी का व्रत और भगवान विष्णु का पूजन अत्यंत आवश्यक है। इससे बढ़कर पापों के नाशों का कोई उपाय नहीं है।

हे नारद! स्वयं भगवान ने यही कहा है कि कामिका व्रत से जीव कुयोनि को प्राप्त नहीं होता। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन भक्तिपूर्वक तुलसी दल भगवान विष्णु को अर्पण करते हैं, वे इस संसार के समस्त पापों से दूर रहते हैं। विष्णु भगवान रत्न, मोती, मणि तथा आभूषण आदि से इतने प्रसन्न नहीं होते जितने तुलसी दल से।

तुलसी दल पूजन का फल चार भार चाँदी और एक भार स्वर्ण के दान के बराबर होता है। हे नारद! मैं स्वयं भगवान की अतिप्रिय तुलसी को सदैव नमस्कार करता हूँ। तुलसी के पौधे को सींचने से मनुष्य की सब यातनाएँ नष्ट हो जाती हैं। दर्शन मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं और स्पर्श से मनुष्य पवित्र हो जाता है।

कामिका एकादशी की रात्रि को दीपदान तथा जागरण के फल का माहात्म्य चित्रगुप्त भी नहीं कह सकते। जो इस एकादशी की रात्रि को भगवान के मंदिर में दीपक जलाते हैं उनके पितर स्वर्गलोक में अमृतपान करते हैं तथा जो घी या तेल का दीपक जलाते हैं, वे सौ करोड़ दीपकों से प्रकाशित होकर सूर्य लोक को जाते हैं।

ब्रह्माजी कहते हैं कि हे नारद! ब्रह्महत्या तथा भ्रूण हत्या आदि पापों को नष्ट करने वाली इस कामिका एकादशी का व्रत मनुष्य को यत्न के साथ करना चाहिए। कामिका एकादशी के व्रत का माहात्म्य श्रद्धा से सुनने और पढ़ने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता है।

जय जय श्री राधे

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देवशयनी एकादशी

देवशयनी एकादशी : मंगलवार 20 जुलाई
पारण समय : अगली सुबह सुयोर्दय से 09:31 के मध्य

देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाएंगे। अगले चार महीने तक शुभ कार्य वर्जित हो जाएंगे। इसे चातुर्मास कहते हैं। भगवान विष्णु देवउठनी एकादशी के दिन निद्रा से जागते हैं।


क्या है महत्व

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसे हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं। आषाढ़ के महीने में दो एकादशी आती है। एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। भगवान विष्णु ही प्रकृति के पालनहार हैं और उनकी कृपा से ही सृष्टि चल रही है। इसलिए जब श्रीहरि चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं तो उस दौरान कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। इसी समय से चातुर्मास की शुरुआत भी हो जाती है। इस समय कोई मांगलिक या भौतिक कार्य तो नहीं होता, लेकिन तपस्या होती है। इसलिए इसे चातुर्मास भी कहा जाता है। इसे बहुत ही शुभ महीना माना जाता है।

देवशयनी एकादशी के बाद चार महीने तक सूर्य, चंद्रमा और प्रकृति का तेजस तत्व कम हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि देवशयन हो गया है। शुभ शक्तियों के कमजोर होने पर किए गए कार्यों के परिणाम भी शुभ नहीं होते। चातुर्मास के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।

देवशयनी एकादशी से साधुओं का भ्रमण भी बंद हो जाता है। वह एक जगह पर रुक कर प्रभु की साधना करते हैं। चातुर्मास के दौरान सभी धाम ब्रज में आ जाते हैं। इसलिए इस दौरान ब्रज की यात्रा बहुत शुभकारी होती है। अगर कोई व्यक्ति ब्रज की यात्रा करना चाहे तो इस दौरान कर सकता है।

जब भगवान विष्णु जागते हैं, तो उसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी कहा जाता है. इसके साथ ही शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं।


पूजन से लाभ

देवशयनी एकादशी व्रत करने और इस दिन भगवान श्रीहरि की विधिवत पूजन से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है। सारी परेशानियां खत्म हो जाती हैं। मन शुद्ध होता है, सभी विकार दूर हो जाते हैं। दुर्घटनाओं के योग टल जाते हैं। देवशयनी एकादशी के बाद शरीर और मन तक नवीन हो जाता है।


व्रत कथा संक्षेप

एक राजा के राज्य में बरसात नहीं हो रही थी। सारे लोग बहुत परेशान थे और अपनी परेशानी लेकर राजा के पास पहुंचे। हर तरफ अकाल था। ऐसी दशा में राजा ने भगवान विष्णु की पूजा की। देवशयनी एकादशी का व्रत रखा। इसके फलस्वरूप भगवान विष्णु और राजा इंद्र ने बरसात की और राजा के साथ-साथ सभी लोगों के कष्ट दूर हो गए।

इस हरिशयन मंत्र से सुलाएं भगवान विष्णु को

सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्दे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।

यानी, हे प्रभु आपके जगने से पूरी सृष्टि जग जाती है और आपके सोने से पूरी सृष्टि, चर और अचर सो जाते हैं. आपकी कृपा से ही यह सृष्टि सोती है और जागती है. आपकी करुणा से हमारे ऊपर कृपा बनाए रखें।


पूजन विधि

इस दिन भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजन की जाती है ताकि चार महीने तक भगवान विष्णु की कृपा बनी रहे.

– मूर्ति या चित्र रखें

– दीप जलाएं

– पीली वस्तुओं का भोग लगाएं.

– पीला वस्त्र अर्पित करें.

– भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें. अगर कोई मंत्र याद नहीं है तो सिर्फ हरि के नाम का जाप करें. हरि का नाम अपने आप में एक मंत्र है.

– जप तुलसी या चंदन की माला से जप करें.

– आरती करें.

– विशेष हरिशयन मंत्र का उच्चारण करें…


देवशयनी एकादशी संकल्प मंत्र

सत्यस्थ: सत्यसंकल्प: सत्यवित् सत्यदस्तथा।
धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जित:।।
कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च।
श्रीपतिर्नृपति: श्रीमान् सर्वस्यपतिरूर्जित:।।


देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का मंत्र –

सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।


देवशयनी एकादशी विष्णु क्षमा मंत्र

भक्तस्तुतो भक्तपर: कीर्तिद: कीर्तिवर्धन:।
कीर्तिर्दीप्ति: क्षमाकान्तिर्भक्तश्चैव दया परा।।

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योगिनी एकादशी

योगिनी एकादशी : मंगलवार 06 जुलाई
पारण समय : अगली सुबह सूर्योदय से 09:29 के मध्य


योगिनी एकादशी का महत्त्व

मान्यता है की इस व्रत के प्रभाव से श्वेत कुष्ठ समाप्त हो जाता है।
हर माह में दो एकादशी व्रत होते हैं। प्रत्येक एकादशी व्रत का अपना महत्व होता है।

आषाढ़ मास में दो एकादशी व्रत है, पहला योगिनी एकादशी व्रत और दूसरा देवशयनी एकादशी व्रत। योगिनी एकादशी व्रत इस वर्ष जुलाई माह में 6 तारीख को है।

योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पीले पुष्प, पीले फल, बेसन के लड्डू या गुड़ तथा चना का भोग, अक्षत्, धूप, दीप, पीले वस्त्र आदि से पूजा की जाती है। पूरे दिन व्रत रखा जाता है और भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। योगिनी एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है और उसके सभी पाप मिट जाते हैं।

पारण का समय
एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सुबह में किया जाता है। योगिनी एकादशी व्रत का पारण 07 जुलाई दिन बुधवार को सुबह सूर्योदय से सुबह 09 बजकर 29 मिनट के मध्य कर लेना चाहिए।


पूजा विधि

योगिनी एकादशी के दिन प्रात: स्नान आदि से निवृत हो जाएं और स्वच्छ वस्त्र हो सके तो पीले रंग का धारण कर लें। इसके बाद हाथ में जल लेकर एकादशी व्रत और विष्णु पूजा का संकल्प लें। इसके बाद एक चौकी पर पीले रंग का आसन डालकर विष्णु जी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर दें। फिर उनका जल से अभिषेक करें। उनको पुष्प, फल, चंदन, तुलसी दल, अक्षत्, पीले वस्त्र, धूप, दीप, पंचामृत आदि अर्पित करें। फिर विष्णु चालीसा और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और योगिनी एकादशी व्रत की कथा का श्रवण करें।

योगिनी एकादशी कथा-

स्वर्गधाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह शिव भक्त था और प्रतिदिन शिव की पूजा किया करता था। हेम नाम का एक माली पूजन के लिए उसके यहां फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य-विनोद तथा रमण करने लगा।

इधर राजा उसकी दोपहर तक राह देखता रहा। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के न आने का कारण पता करो, क्योंकि वह अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया। सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी अतिकामी है, अपनी स्त्री के साथ हास्य-विनोद और रमण कर रहा होगा।

यह सुनकर कुबेर ने क्रोधित होकर उसे बुलाया। हेम माली राजा के भय से कांपता हुआ उपस्थित हुआ। राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा- ‘अरे पापी! नीच! कामी! तूने मेरे परम पूजनीय ईश्वरों के ईश्वर श्री शिवजी महाराज का अनादर किया है, इस‍लिए मैं तुझे शाप देता हूं कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होगा।’

कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गया। भूतल पर आते ही उसके शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया। उसकी स्त्री भी उसी समय अंतर्ध्यान हो गई। मृत्युलोक में आकर माली ने महान दु:ख भोगे, भयानक जंगल में जाकर बिना अन्न और जल के भटकता रहा।

रात्रि को निद्रा भी नहीं आती थी, परंतु शिवजी की पूजा के प्रभाव से उसको पिछले जन्म की स्मृति का ज्ञान अवश्य रहा। घूमते-घूमते एक दिन वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुंच गया, जो ब्रह्मा से भी अधिक वृद्ध थे और जिनका आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान लगता था। हेम माली वहां जाकर उनके पैरों में पड़ गया।

उसे देखकर मार्कण्डेय ऋषि बोले तुमने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके प्रभाव से यह हालत हो गई। हेम माली ने सारा वृत्तांत कह ‍सुनाया। यह सुनकर ऋषि बोले- निश्चित ही तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए तेरे उद्धार के लिए मैं एक व्रत बताता हूं। यदि तू आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सब पाप नष्ट हो जाएंगे।

यह सुनकर हेम माली ने अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने उसे स्नेह के साथ उठाया। हेम माली ने मुनि के कथनानुसार विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से अपने पुराने स्वरूप में आकर वह अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। इसके व्रत से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अंत में स्वर्ग प्राप्त होता है। भगवान कृष्ण ने कहा- हे राजन! यह योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है।

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पापांकुशा एकादशी


पापांकुशा एकादशी : शनिवार 16 अक्टूबर
पारण समय : अगली सुबह उर्योदय से 09:28 के मध्य


आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी पर मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो मनुष्य कठिन तपस्याओं के द्वारा फल प्राप्त करते हैं, वही फल इस एकादशी पर शेषनाग पर शयन करने वाले श्रीविष्णु को नमस्कार करने से ही मिल जाते हैं और मनुष्य को यमलोक के दु:ख नहीं भोगने पड़ते हैं। यह एकादशी उपवासक (व्रत करने वाले) के मातृपक्ष के दस और पितृपक्ष के दस पितरों को विष्णु लोक लेकर जाती है।

पापाकुंशा एकादशी हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है। इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है वह स्वर्ग का भागी बनता है। इस एकादशी के दिन दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु भक्तों के लिए एकादशी के दिन व्रत करना प्रभु भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम बनता है।


“व्रत विधि”

इस व्रत का पालन दशमी तिथि के दिन से ही करना चाहिए। दशमी तिथि पर सात धान्य अर्थात गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल नहीं खानी चाहिए, क्योंकि इन सातों धान्यों की पूजा एकादशी के दिन की जाती है। जहां तक संभव हो दशमी तिथि और एकादशी तिथि दोनों ही दिनों में कम से कम बोलना चाहिए। दशमी तिथि को भोजन में तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

एकादशी तिथि पर सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प अपनी शक्ति के अनुसार ही लेना चाहिए यानी एक समय फलाहार का या फिर बिना भोजन का। संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है और उसके ऊपर श्रीविष्णुजी की मूर्ति रखी जाती है। इसके साथ भगवान विष्णु का स्मरण एवं उनकी कथा का श्रवण किया जाता है। इस व्रत को करने वाले को विष्णु के सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। इस व्रत का समापन एकादशी तिथि में नहीं होता है, बल्कि द्वादशी तिथि की प्रात: में ब्राह्माणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद ही यह व्रत समाप्त होता है।


“कथा”

प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था। वह बड़ा क्रूर था। उसका सारा जीवन पाप कर्मों में बीता। जब उसका अंत समय आया तो वह मृत्यु के भय से कांपता हुआ महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचकर याचना करने लगा- हे ऋषिवर, मैंने जीवन भर पाप कर्म ही किए हैं। कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरे सारे पाप मिट जाएं और मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। उसके निवेदन पर महर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करके को कहा। महर्षि अंगिरा के कहे अनुसार उस बहेलिए ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया और किए गए सारे पापों से छुटकारा पा लिया।


“महत्व”

पापांकुशा एकादशी व्रत में यथासंभव दान व दक्षिणा देनी चाहिए। पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत करने से समस्त पापों से छुटकारा प्राप्त होता है। शास्त्रों में एकादशी के दिन की महत्ता को पूर्ण रुप से प्रतिपादित किया गया है। इस दिन उपवास रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। जो लोग पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक समय भोजन करके एकादशी व्रत करने की बात कही गई है।

एकादशी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है। यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है। इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है।