वृंदावन की कुंज गलियों में जब अबीर की खुशबू और ‘राधावल्लभ श्री हरिवंश’ की गूँज बढ़ने लगे, तो समझ लीजिए कि फाल्गुन की सबसे प्रिय आमलकी एकादशी आ गई है। इसे ‘रंगभरी एकादशी’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन से आराध्य अपनी प्रिया जी के साथ विधिवत होली खेलना प्रारंभ करते हैं।
आइए, इस विशेष ब्लॉग में जानते हैं आमलकी एकादशी का महत्व, कथा और श्री राधावल्लभ मंदिर की अद्भुत परंपराएँ।
आमलकी एकादशी 2026: महत्वपूर्ण तिथियाँ और समय
हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष (2026) यह पर्व निम्नलिखित समय पर मनाया जाएगा:
- व्रत की मुख्य तिथि: 27 फरवरी 2026 (शुक्रवार)
- पारण (व्रत खोलने) का समय: 28 फरवरी 2026, सुबह 06:45 से 09:05 के बीच
श्री राधावल्लभ मंदिर में उत्सव का स्वरूप
वृंदावन के श्री राधावल्लभ मंदिर में आमलकी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि ‘हित सेवा’ का महापर्व है। यहाँ की छटा इस दिन देखते ही बनती है:
- अबीर-गुलाल की वर्षा: इस दिन ‘ठाकुर जी’ (राधावल्लभ लाल) को विशेष रूप से गुलाल अर्पित किया जाता है। मंदिर के पट खुलते ही गोस्वामी जन भक्तों पर प्रसादी गुलाल की बौछार करते हैं। पूरा आंगन लाल-गुलाबी आभा में सराबोर हो जाता है।
- श्वेत श्रृंगार: ठाकुर जी को अत्यंत सुंदर श्वेत या हल्के गुलाबी वस्त्र धारण कराए जाते हैं, जिन पर चढ़ा हुआ रंग उनकी दिव्यता को और बढ़ा देता है।
- समाज गायन: मंदिर में रसिकों द्वारा विशेष ‘होली के पद’ गाए जाते हैं। “खेलत फाग लाड़िली लाल…” की मधुर ध्वनि भक्तों को साक्षात् निकुंज विलास का अनुभव कराती है।
आमलकी एकादशी की पौराणिक व्रत कथा
शास्त्रों के अनुसार, प्राचीन काल में ‘वैदिश’ नगर के राजा चैत्ररथ अपनी प्रजा सहित विष्णु भक्त थे। एक बार फाल्गुन एकादशी के दिन सभी लोग आंवले के वृक्ष के नीचे जागरण कर रहे थे।
तभी वहाँ एक शिकारी आया, जो स्वभाव से पापी था लेकिन भूख-प्यास से व्याकुल था। वह चुपचाप बैठकर भक्तों द्वारा की जा रही कथा सुनने लगा और पूरी रात जागता रहा। अनजाने में ही उससे आमलकी एकादशी का व्रत और जागरण पूर्ण हो गया।
इसके प्रभाव से अगले जन्म में वह राजा विजयरथ के रूप में पैदा हुआ। एक बार जब वह शत्रुओं से घिरा था, तब एकादशी के पुण्य प्रताप से उसके शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने शत्रुओं का संहार किया। इस प्रकार अनजाने में किया गया यह व्रत भी परम कल्याणकारी सिद्ध हुआ।
व्रत के नियम और पूजन विधि
- आंवले का महत्व: इस दिन आंवले के वृक्ष का पूजन किया जाता है। माना जाता है कि इस वृक्ष के कण-कण में श्री हरि और लक्ष्मी जी का वास है।
- पूजा विधि: सुबह स्नान के बाद श्री राधावल्लभ लाल का ध्यान कर संकल्प लें। यदि संभव हो तो आंवले के वृक्ष के नीचे दीप जलाएं या प्रभु को आंवले का फल अर्पित करें।
- आहार: इस दिन अन्न का त्याग कर फलाहार ग्रहण करें।
- दान: एकादशी के अगले दिन (पारण के समय) ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देकर व्रत पूर्ण करें।
निष्कर्ष
आमलकी एकादशी हमें संदेश देती है कि प्रभु की शरण में किया गया छोटा सा प्रयास भी जीवन बदल सकता है। इस एकादशी पर श्री राधावल्लभ लाल के चरणों में प्रार्थना करें कि हमारे जीवन का हर रंग उनके प्रेम के रंग में मिल जाए।
“जय जय श्री हरिवंश, जय श्री राधावल्लभ!”
