Basant Utsav

Basant Utsav Ke Pad – बसंत उत्सव के पद

खिचड़ी उत्सव के बाद अब बसंत उत्सव प्रारंभ हो जाता है इस साल बसंत उत्सव 23 जनवरी को है ! यह उत्सव माध महीने की शुक्ल पंचमी को होता है !

आज के दिन श्रृंगार में श्री जी बसंती पोशाक और बसंत का ही श्रृंगार धारण करती है और भोग में मालपुआ, केशर युक्त मिठाई जैसे की लड्डू, बालूसाही आदि पकवान का भोग लगता है !

आज से श्री जी मोज़े और दस्ताने और रजाई धारण नहीं करती है और आज से ही वृंदावन में होली प्रारंभ हो जाती है ! श्रृंगार और संध्या आरती के तुरंत बाद गुलाल उड़ाया जाता है ! बसंत के बाद सुबह और साम दोनों समय समाज में गाये जाते है !

इनमें से कोई भी पद कभी भी समाज में गाया जा सकता है ये सीरियल वाइज नहीं है !

आप पद के टाइटल पर क्लिक करने पर उसी पद पर पहुँच जायेगे !

मधुरितु वृन्दावन आनन्द न थोर।
राजत नागरी नव कुशल किशोर ॥
जूथिका युगल रूप मंजरी रसाल।
विथकित अलि मधु माधवी गुलाल ॥
चम्पक बकुल कुल विविध सरोज।
केतकी मेदिनी मद मुदित मनोज ॥
रोचक रुचिर बहै त्रिविध समीर।
मुकुलित नूत नदत पिक कीर ॥
पावन पुलिन घन मंजुल निकुंज।
किसलय शयन रचित सुख पुंज॥
मंजीर मुरज डफ मुरली मृदंग।
बाजत उपंग बीना वर मुखचंग ॥
मृगमद मलयज कुमकुम अबीर।
बन्दन अगरसत सुरंगित चीर॥
गावत सुन्दरि हरि सरस धमारि।
पुलकित खग मृग बहत न वारि ।।
जय श्रीहित हरिवंश हंस-हंसिनी समाज।
ऐसे ही करहु मिल जुग जुग राज ॥
राधे, देख वन की बात।
रितु बसंत अनन्त मुकुलित कुसुम अरु फल पात।।
बेनु धुनि नन्दलाल बोली सुनिव क्यों अरसात।
करत कतव विलम्ब भामिनि वृथा औसर जात ।।
लाल मरकत मणि छबीलौ तुम जु कंचन गात।
बनी (जै श्री) हित हरिबंश जोरी उभै गुन गन मात॥
– गोस्वामी श्रीहितहरिवंशचन्द्रजी महाप्रभु कृत

राधे बन विनोद बसंत।
अनिल त्रिविध सुगन्ध हाटक खचित सुधा लसंतम ॥
विविध बिकच प्रसून पल्लव नृत कोकिल कीर।
निरखि दम्पति मुदित निर्त्तत भवन बरहि अधीर ॥
मत्त अलिचय गुञ्ज मधु रव पुलक खग मृग वृन्द।
गान जुवति कदम्ब किंकिनि मुखर नूपुर मन्द।।
मलय सार सुगंध चंदन चरचि जुग वर अंग।
जैश्री दासि वनमाली कपिश पट कुतप अरुनिम रंग।।
-गोस्वामी श्रीवनचन्द्रजी महाराज कृत

देखहु स्याम विपिन जैसौ लागत।
उपजत सुख दुख तन मन भाजत॥
अरुन किंशुक छवि मनोहर भाँति।
मानहु बन्दन डारें खेलें तरु पाँति ॥
रसाल मंजरी चल सैनन बुलावत।
बल्लरिनु तजि भृंग विटकुल १० धावत॥
भ्रमत भ्रमर चय ११ बहु विधि गावत।
मनहुँ अपने सचु१२ लतन नचावत।।
कुञ्ज सिखर पिक बचन सुनावत।
मनु मनसिज नृप डिंडिमी बजावत।।
सौरभ पवन भुव मण्डल सुवासित।।
मनहु सयन उठि मदन उसासित १३॥
कमल कोर किहि विधि विकसात।
मनहु सोवत निसि आलस जम्हात ॥
तैसीय तुम्हारी छवि राधाजू सों छाजत।
मनु बिन रितु घन दामिनि में राजत।।
जै श्रीकृष्णदास हित नित रसना लड़ावत।
याही तें राधिका पति पद सुख पावत।।
– गोस्वामी श्रीकृष्णचन्द्रजी कृत

देखौ वृन्दावन कुसुमित बसंत ।
(जहाँ ) नदत कीर कोकिला लसंत ॥
(जहाँ) जाई जुही मल्ली रसाल।
(जहाँ) भ्रमत मुदित अति भृंग माल ॥
(जहाँ) कल कुल केकी नव मराल।
बन बिहरत दोऊ रसिक लाल ।।१।।
(जहाँ) ललितादिक सब सखी संग।
जहाँ-तहाँ बाढ़े अगनित अनंग ।।
(जहाँ) प्रीति प्रेम सुख सहज अंग।
(जहाँ) हँसत परस्पर भरत रंग॥२॥
डारत बंदन बहु रंग अबीर।
(जहाँ) साख अरगजा रँगे चीर॥
(जहाँ) खेल मच्यौ अति भई भीर।
(जहाँ) उमँगि चल्यौ आनन्द नीर ॥३॥
(जहाँ) कुंज सदन चले करत केलि।
बहु विधि बाढ़ी रति रंग बेलि॥
जै श्रीदामोदर हित सुख सिंधु झेलि।
नित-नित बिलसौ भुज कण्ठ मेलि॥४॥
– गोस्वामी श्रीदामोदरवरजी कृत

श्रीवृन्दावन पूजन बसंत। मनोरथ बैठे दम्पति लसंत।।
इत धुजा पताका फरहरैं। उत कदलि आदि ताहि अनुसरैं ।॥
इत कंचन मणि मुक्ता दुकूल। उत हेम खचित रवि तनया कूल ।।
इत नाना धुनि सुनि भई भीर। उत कोकिल पिक तहाँ नदत कीर॥
इत भाजन कुमकुम धरे पूरि। उत पराग जुत उड़त धूरि॥
इत पिचकारी भरत रंग। उत केसर बहु सुमन अंग।।
इत चंदन बंदन गुलाल। उत हरखत बनराज पाल॥
( जहाँ ) अष्टसखी वर सुखद गान। जैश्री कमलनैंन हित करत पान॥
-गोस्वामी श्रीकमलनैंनजी कृत

वन तन जगल अंग-अंग फूल।
फूल दूम गन रंग रंगन लतन फूलन झूल।
झूम जल में फूल बरसत हरखि जमुना कूल।
फूल पुञ्ज निकुञ्ज बैठे पहरि पीत दुकूल।।
कँचकी लहँगा कनक कृत फूल सारिनु तूल।।
फूल पाग झंगारु पटुका हेममय रस मूल।।
फूल फूलन रचित भूषन परस्पर अनुकूल।
फूल भ्रम कोऊ फूल फल गहि रहत प्रीतम भूल।
कर फूल सौं कर फूल टारत कटि मटक प्रतिकूल।
फूल हँसि हित कुञ्जलाल बिलास रस समतूल।
गोस्वामी श्रीकुञ्जलालजी कृत

कौतुक बन कौतुक अति मधुरितु नाना विधि दरसायौ।
अति कौतुक तामें मोहन सिर सखिनु बसंत बँधायौ ।॥
श्रीराधा सजि टोल आपुने कौतुक मन्त्र उपायौ।
मृगमद केसर अतर अरगजा भाजन विविध भरायौ ॥
बाजत हैं बाजे बहु भाँतिनु मदन उमाह बढ़ायौ।
झुरमट प्रेम मच्यौ बन कुञ्जन इत उत भीज भिजायौ ॥
होरी बोलत डोलत बीथिन अबीर गुलाल उड़ायौ।
आज रंग सुखसागर नागर कानन गहर बढ़ायौ।
शोभा भीर तीर रविजा के कौतुक खेल मचायौ।
छिरकत चीर शरीर सने रंग मानहुँ प्रेम रँगायौ ।
प्रथम फाग दिन मानि बोहनी सखिनु प्राण सौ पायौ ।
जै श्रीहित हरिलाल रूप रस अम्बुद राधा हरि बरसायौ।।
– गोस्वामी श्रीहित हरिलालजी कृत

दिन दूलह मेरौ लाल बिहारी, दुलहिनि नित्य किशोरी।
प्रेम रूप आसक्ति विलोकत विवि मुख चन्द्र चकोरी।
फबि रह्यौ मुकुट चन्द्रिका भूषन तनसुख बसन बिराजैं।
रतनारे अनियारे लोचन रतिपति कौ दल साजैं।॥
भृकुटी धनुष बान अति तीक्षन कुटिल कटाक्षन साधें।
मृदु मुसकान बिकान बानि अलि मनमथ कौ मन बाँधें ।
फैंटन भरे गुलाल ख्याल हित करन कनक पिचकारी।
केसर अतर अरगजा चोबा भरत परस्पर भारी॥
ताल मृदंग करन डफ गावत अलि बसन्त लै आईं।
पहिराई वनमाल लाल उर बालहिं देत बधाई।
पचरंग हरखि अबीर उड़ावत नाचत मधि पिय प्यारी।
जै श्रीरूपलाल हित चित रंग भीने निरखि निरखि बलिहारी।।
– गोस्वामी श्रीरूपलालजी कृत

रितु बसन्त बन फल सुमन चित प्रसन्न नव कुञ्ज।
हित दम्पति रति कुशल मति वितु सञ्चित सुखपुञ्ज ।
वितु सञ्चित सुख पुञ्ज गुञ्ज मधुकर सुनाद धुनि ॥
रुञ्ज मृदंग उपंग धुञ्ज डफ झंझ ताल सुनि ॥
मंजु जुवति रस गान लुञ्ज॰ इव खग तहाँ बिथकित॥
भुञ्जत रास विलास कुञ्ज नव सचि बसन्त ऋतु॥
– श्री (दामोदर) सेवकजी महाराज कृत

कुच गड्डुवा जोवन मौर कंचुकी वसन ढाँपि लै राख्यौ बसन्त।
ये गुन मन्दिर रूप बगीचा में बैठी हैं मुख लसन्त।।
कोटि काम लावण्य बिहारी जाहि देखत सब दुख नसन्त।
ऐसे रसिक श्रीहरिदास के स्वामी ताकौं भरन आईं मिलि हसन्त॥
– स्वामी श्रीहरिदासजी कृत

देखि सखी अति आज बन्यौरी वृन्दाविपिन समाज।
आनन्दित ब्रज लोग भोग सुख सदा श्याम कौ राज॥
राधारवन बसन्त नचायौ पंचम धुनि सुनि कान।
धरनि गिरत सुर किन्नर कन्या बिथकित गगन विमान ॥
पुलकित कोकिल कुंजन ऊपर गुंजत मधुकर पुंज।
बाजत महुवर बैन झांझ डफ ताल पखावज रुंज॥
केसर भरि भरि लै पिचकारी छिरकत श्यामहि धाइ।
छिरकि कुँवरि बूका भरि चोबा लई कंठ लपटाय।।
मुकुलित विविध विटपकुल वर्षत पावन पवन पराग।
तन-मन-धन न्यौछावर कीन्हौं निरखि व्यास बड़भाग।।
– श्रीव्यासजी कृत

बिहरत विपिन फिरत रंग ढरकी।
हरखि गुलाल उड़ाय लाड़िली सम्पति कुसुमाकर की।
कसूंभी सारी सौंधे भीजी ऊपर बन्दन भुरकी।
चोली नील ललित अंचल चल झलक उजागर उर की।
मृदुल सुहास तरल ढंग कुण्डल मुख अलकावलि रुरकी।
श्रीनागरीदासि केलि सुख सनि रहे मैन ललक नहीं मुरकी ॥
– श्रीनागरीदासजी कृत

राजैं वृन्दावन श्री नव निकुंज।
तहाँ मधुप करत अनुराग गुंज।
जहाँ गौर श्याम छवि नवल रासि ।
आई ऋतु बसन्त भयौ हिय हुलास ॥
जहाँ चन्दन बन्दन मथि सुवास।
जहाँ छिरकत हँसि हँसि करि विलास।।
राजैं नवल-नवल सखी यूथ संग।
कर एकन बीना डफ मृदंग।।॥
लियें एक गुलाल सुरंग रंग।
भये सुरंगित वसन सुदेस अंग।।
जहाँ निर्त्तत रसिक किशोर जोर।
छबि निरखि छके चहुँ ओर मोर।।
जहाँ वंशी रव सुनि श्रवन थोर।
जहाँ खग कुरंग बँधे प्रेम डोर ॥
जहाँ कुमकुम झलकत तन सुदेस।
जहाँ फबि रहे कुंचित रुचिर केश।
जहाँ हित ध्रुव निरखि अनूप वेश।
कछु कहि न सकत छबि छटा लेश ॥
श्रीध्रुवदासजी कृत

भाइ भरे रस चायन खेलत राधाकान्त बसन्त।
प्रथम पंचमी मनसिज उद्भव बन बैभव नहीं अन्त॥
सौरभ सार भरत रँग छींटन नौतन वसन लसन्त ॥
जै श्रीकिशोरीलाल हित रूप मिथुन रस विलसत मन हुलसन्त
गोस्वामी श्रीकिशोरीलालजी कृत

( इन पदों में अगर कोई त्रुटी देखे तो कृपया तुरंत सूचित करें )

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