शरद उत्सव की सभी रसिकों को श्रीहित वृन्दावन धाम से जय जय श्री हित हरिवंश
शरद उत्सव इस वर्ष श्री राधावल्लभ मंदिर में 26 अक्टूबर को है और दितीय शरद उत्सव 28 अक्टूबर को है !
आश्विन शुक्ला पूर्णिमा को सन्ध्या आरती पीछे समाज गायन प्रारम्भ होवै और आरती के बाद श्री जी शरद में विराजते है। श्री जी की पोशाक और चँदोवा-पिछवाई आदि सब सफेद होते है। भोग में दूध का अधौटा और चन्द्रकला प्रधान रूप से रहते है।आज से औलाई नही होती है तथा श्री जी को सांयकाल वस्त्र धारण कराये जाते है, पंखा बंद कर दिया जाता है।
समाज मे हित चौरासी जी का यह पद होवै है , जिसकी दो पदावली व्याख्या :
मोहन मदन त्रिभंगी।मोहन मुनि-मन रँगी।।1।।
मोहन मुनि सघन प्रगट परमानन्द गुन गम्भीर गुपाला।।2।।
व्याख्या : श्री श्यामसुंदर जी मदन को मोहित अर्थात मनमोहन स्वरूप जोकि वंशी वादन के समय त्रिभंगी हो रहा है उसमें दर्शन दे रहे है, श्री मनमोहन जी तो ऋषि – मुनियों के मन को भी रँगे हुए है अर्थात उनके मन मे भी प्रेम-रँग उतपन्न करने वाले है।।1।।
ऋषि -मुनियों के मन को मोहने वाले ,सघन कुंजो में प्रगट हो परमानन्द प्रदाता है,वह नृत्य-संगीत आदि अनेक गम्भीर गुणों के समुद्र है।।2।।
शरद उत्सव के पद
पद 1
आजु नीकी बनी (श्री) राधिका नागरी ।
ब्रज-जुवति-जूथ में रूप अरु चतुरई,
शील सिंगार गुन सबन तें आगरी ॥
कमल दक्षिण भुजा, वाम भुज अंस सखि,
गावति सरस मिलि मधुर स्वर राग री ।
सकल विद्या विदित रहसि हरिवंश हित,
मिलत नव-कुंज वर श्याम बड़ भाग री ॥
पद 2
राग कल्याण-
श्याम संग राधिका रास मंडल बनी।
बीच नंदलाल ब्रज बाल चंपक बरन,
ज्यौंव घन तडित बिच कनक मर्कत मनी॥
लेत गति मान तत्त थेई हस्तक भेद,
सा-रे-ग-म-प-ध-नि ये सप्त सुर नंदनी।
निर्त्तरस पहिर पट नील प्रगटित छबी,
वदन जनों जलद में मकर की चाँदनी॥
राग रागिनि तान मान संगीत मत,
थकित राकेश नभ शरद की जामिनी।
जै श्रीहित हरिवंश प्रभु हंस कटि केहरी,
दूरि कृत मदन मदमत्त गज गामिनी॥११॥
पद 3
श्रीरास-उत्सव
क्वार सुदी १५ सरद पूर्णमासी से प्रारम्भ
गो० श्रीहितहरिवंशचन्द्रमहाप्रभुजी कृत-राग गौरी (त्रिभँगी छंद चारी)
मोहन मदन त्रिभँगी। मोहन सुनि मन रंगी॥
मोहन मुनि सघन प्रगट परमानंद, गुण गंभीर गुपाला।
शीश किरीट श्रवण मणि कुंडल, उर मंडित बनमाला॥
पीताम्बर तन धातु विचित्रित, कल किंकिणि कटि चंगी।
नख मणि तरणि चरण सरसीरुह, मोहन मदन त्रिभँगी॥१॥
मोहन वेणु बजावै। इहि रव नारि बुलावै॥
आईं ब्रज नारि सुनत वंशी रव, गृहपति बंधु बिसारे।
दरसन मदन गुपाल मनोहर, मनसिज ताप निवारे॥
हरषित बदन बंक अवलोकन, सरस मधुर ध्वनि गावै।
मधुमय श्याम समान अधर धर, मोहन वेणु बजावै॥२॥
रास रच्यौ वन माँहीं। विमल कल्पतरु छाँहीं॥
विमल कल्पतरु तीर सुपेसल, शरद रैन वर चंदा।
शीतल-मंद-सुगंध पवन बहै, तहाँ खेलत नँदनंदा॥
अद्भुत ताल मृदंग मनोहर, किंकणि शब्द कराहीं।
जमुना पुलिन रसिक रस सागर, रास रच्यौ वन माहीं॥३॥
देखत मधुकर केली। मोहे खग मृग बेली॥
मोहे मृग धेनु सहित सुर सुन्दरि, प्रेम मगन पट छूटे।
उडगन चकित थकित शशि मण्डल, कोटि मदन मन लूटे॥
अधर पान परिरंभन अति रस, आनँद मगन सहेली।
जय श्रीहित हरिवंश रसिक सचु पावत, देखत मधुकर केली॥४॥१॥
पद 4
१२० — वर्षोत्सव तृतीय खण्ड
श्रीस्वामी हरिदासजी कृत-राग सारंग व केदारौ
सुनि धुनि मुरली बन बाजै ए हरि रास रच्यौ।
कुंज-कुंज द्रुम वेलि प्रफुल्लित मंडल कंचन मणिन खच्यौ॥
निर्त्तत जुगल किशोर जुवति जन श्रुति घुर राग केदारौ मच्यौ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी नीकें प्यारौ लाल नच्यौ॥६॥
(हाथ से लिखे सुधार: “मणिन” के ऊपर “मन मिले”, और “प्यारौ” से पहले “(आज)”)
पद 5
राग केदारौ-
पिय कौं नाँचन सिखबत प्यारी।
वृन्दावन में रास रच्यौ है,
सरद चन्द उजियारी॥
ताल मृदंग उपंग बजावत प्रफुलित है सखी सारी।
बीन वेणु ध्वनि नूपुर ठुमकत, खग-मृग दसा बिसारी॥
मान गुमान लकुट लियैं ठाढ़ी डरपत कुंज बिहारी।
व्यास स्वामिनी की छबि निरखत हँसि-हँसि दैंकरतारी॥४७॥





