सांझी उत्सव के पद – Sanjhi Utsav Ke Pad

गो. श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुजी कृत –(राग सारंग)

वन की लीला लालहि भावै।
पत्र–प्रसून बीच प्रतिविंबहि नख सिख प्रियहि जनावै।।
सकुचि न सकत प्रगट परिरंभन अलि लम्पट दुरि धावै।
संभृम देत कुलकि कल कामिनि रति रन कलह मचावै।।
उलटी सवै समझि नैनन में अञ्जन रेख बनावै।
जय श्री हित हरिवंश प्रीति रीति वस सजनी स्याम कहावै।।1।।

*व्याख्या ::* वन की लीला श्री श्याम को बहुत पसन्द है।फूल-पत्तियों के मध्य में नख (नाख़ून) से शिखा (चोटी) तक का प्रतिविम्ब श्री प्यारी श्यामा जू को बता रहै है।। संकोच के कारण प्रगट रूप से आलिंगन नही कर सकते ,यह सखी चतुराई से दूर हो जाते है।मधुरता से श्री श्यामा के बार-बार चक्कर करते हुए ,मन में रात्रि का कलह उतपन्न हो रहा है।उलटे श्री श्यामा जी सभी बात को नेत्रो से ही समझ गयी और नेत्रो की अंजन रेखा को बना कर ही श्री श्याम को संकेत दे दिया। श्री हित हरिवंश जी कहते है — जो प्रीति की रीति के आधीन है ,वही श्री सजनी श्यामा जू और श्री श्याम कहलाते है।।

श्री नागरिया जी कृत -राग गौरी

फूलन बीनन हों गई जहाँ जमुना कूल द्रुमन की भीर।
अरुझि गयौ अरूनी की डरिया तेहि छिन मेरौ अंचल चीर।।
तब कोऊ निकस अचानक आयौ मालती सघन लता निरवारि।
बिन ही कहै मेरो पट सुरझायौ इक टक मो दिसि रह्यो री निहारि।।
हों सकुचन झुकि दबी जात इत उत वह नैनन हा-हा खात।
मन उरझाय वसन सुरझायौ कहा कहौ और लाज की बात।।
नाम न जानों श्याम अंग हों पियारे रँग वाको हुतौ री दुकूल।
अब वही वन लै चल नागरि सखि फिर साँझी बीनन कौ फूल।।

*व्याख्या ::* श्री राधा जी साँझी बनाने हेतु फूल बीनने के लिए यमुना किनारे गयी जहाँ पर व्रक्ष बहुत है।वह बताती है उसी क्षण में मेरा आँचल का चीर लाल डालियो में उलझ गया।। तभी कोई अचानक से निकल कर आया और मालती की घनी लता से छुड़ाया। बिना कहे मेरे वस्त्र को सुलझाया और एक सी दृष्टि से देखते हुए मुझे निहार रहा था। में संकोच के कारण झुक कर दबी जा रही थी और वह नेत्रो से देखे जा रहा था। वस्त्र तो सुलझ गये पर मन उलझ गया और क्या कहूँ लाज की बात।। नाम का तो पता नही, अंग वर्ण श्याम था और पीले रँग के उसके वस्त्र थे। श्री नागरिया जी कहते है– श्री राधा जी सखी से कहती है ,अब उसी वन में साँझी के फूल बीनने ले चल।।

श्री हरिराम व्यास कृत

श्याम स्नेही गाईये तातें श्रीवृन्दावन रज पाइये हो।।ध्रुव।।
राधा जिनकी भांमती कुंजन-कुंजन केलि।
तरु तमाल ढिंग अरुझी मानों लसत कनक की बेलि।।
महा मोहिनी मन हरयो रसवस कीने लाल।
कुच कमलन कर मन मिल्यो लट बांध्यो मैंन मराल।।
नैन सैन दै तन बेधयो कल गान।
अंजन फंदन कुंवर कुरंगन चले दोउ भोंह कमान।।
नक वेसर बरछी लगी चित चंचल मन मीन।
अधर सुधा दै बेधियों चकित किये आधीन।।
अंग-अंग रस रँग में मगन भये हरि नाह।
व्यास स्वामिनी सुख दियौ पिय संग हिंधु प्रवाह।।

व्याख्या ::* श्री श्याम को स्नेह से गान करो ,उससे ही श्री वृन्दावन की रज प्राप्त होगी।।यह ध्रुव सत्य है।। श्रीकुञ्ज -कुञ्ज के खेल है और श्री राधा जी जिनकी जादूगरी है। वह तमाल के व्रक्ष के पास इस प्रकार उलझी है मानो श्री श्याम तमाल को सोने की बेल ने आलिङ्गित कर रक्खा हो। वह महा मोहिनी है और श्री लाल जी का मन हरण करते हुए उन्हें रस से वशीभूत कर रक्खा है। उनके कुच कमलो पर श्री लाल जी लट्टू है और वह उनकी घुंघराली लटाओं को बांध रहें है जैसे मदन हंस हो।। नेत्रो से नेत्र मिलाकर शरीर बेसुध हो गया है और कल-कल गान सुनाई दे रहा है। नाक में सुन्दर बेसर ,बरछी के समान चित्त को चलायमान बना रही है जैसे मन मछली की तरह व्याकुल हो इधर-उधर भाग रहा हो।अधरामित देकर तीर कमान से निकल लक्ष्य बेध चूका है और लाल जी को आश्चर्य में डाल कर आधीन ही कर लिया है। श्री हरि नाथ अंग-अंग से रस-रँग में डूब चुके है। श्री हरिराम व्यास जी कहते है– श्री लाडिली श्री प्रियतम के साथ सुख समुद्र के प्रवाह को प्रदान करती है।।

चाचा श्रीवृन्दवंदासजी कृत– राग सूहौ बिलावल

लली दसूठन री हेली सब हिय हरषही।
कीरति महल में री हेली अति सुख बरषही।।
जसुमति आई री हेली बधुन समाज लै।
मन्दिर लीनी री हेली बहु सनमान दै।।
सनमान देकेँ भवन लीनी गोद छवि सींवा लला।
अंग उपमा सबहि वारों वदन छबि पर ससि–कला।।
कीरतिहि भेटत सुख समेटत घरनि गोकुल भूप की।
चितवत जू विधना ओर इत लखि कुँवरि गरुवे रूप की।।1।।

*व्याख्या ::* हे सखी आज लाली कौ दसठोन है और सबके ह्रदय में अलग ही हर्ष है। हे सखी आज श्री कीरत रानी के महल में परम् सुख की वर्षा हो रही है।।हे सखी श्री यशोदा जी सप्तस्वर में गाते हुए अपने समाज को लेकर आयी है। हे सखी उन्हें बहुत सा सम्मान देते हुए मन्दिर में अन्दर पधराया गया है। सम्मान के साथ अन्दर पधराने के बाद गोद में जो लाला है वह देखो तो रूप की सीमा है। उसके अंग की उपमा में सब कुछ बलिहारी है और पूर्ण तन की सुंदरता पर चंद्रमा की सारी कलाएँ।।श्री कीरत जी ,गोकुल के राजा की घरवाली से भेंट का सुख समेट रही है। श्री यशोदा जी इधर कुँवरि श्री राधा प्यारी के गौर रूप की ओर देखते ही एकटक दृष्टि से विधाता के लिए विचार कर रही है।।1।।

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