खिचड़ी उत्सव के पद – Khichdi Utsav Ke Pad

▐ खिचड़ी उत्सव श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय में बहुत प्राचीन काल से मनाया जाता है । यह उत्सव पौष शुक्ला दौज से उत्सव आरम्भ होकर एक महीने चलता है । प्रातः पाँच बजे नित्य समाज बैठता है ।

▐ जिसमे ये 34 पद रोज गाये जाते है । मंगला आरती के पश्चात् श्रीराधावल्ल्भलाल जी महाराज की छद्म वेष की झाँकियाँ होती हैं एकादशी के दिन श्रीराधावल्लभलाल ‘श्रीबिहारीजी’ बनते हैं, चौदस को शंकरजी तथा पड़वा को युगल दर्शन होते हैं।

▐ अन्त में माघ शुक्ल तीज को टोपा-दुशाला के दर्शन होते हैं और भिन्न-भिन्न प्रकार के मोहन-भोग कौ भोग लगै है और मोहन भोग के पद गवते हैं।

खिचड़ी उत्सव : 22 दिसंबर 2025 से 20 जनवरी 2026

प्रेमानंदोत्पुलकित गात्रो विद्युत्धारा धर सम कांति ।
‘राधाकृष्णौ मनसी दधानं वंदेऽहं श्री हितं हरिवंशम् ।।

तो आएये साथ में इन पदों का आनंद लेते है !

खिचड़ी उत्सव के पद


प्रथम श्री सेवक पद सिर नाऊँ।
करहु कृपा श्री दामोदर मोपै, श्री हरिवंश चरण रति पाऊँ ॥ गुण गम्भीर व्यास नन्दन जू के, तुव परसाद सुयश रस गाऊँ। नागरीदास के तुम ही सहायक, रसिक अनन्य नृपति मन भाऊँ ॥ 1 ॥

जयति जगदीश जस जगमगत जगत गुरु,
जगत वंदित सु श्रीहरिवंश बानी। मधुर, कोमल, सुपद, प्रीति-आनंद-रस, प्रेम विस्तरत हरिवंश बानी ॥ रसिक रस मत श्रुति सुनत पीवंत रस, रसन गावन्त हरिवंश बानी। कहत हरिवंश, हरिवंश, हरिवंश हित, जपत हरिवंश, हरिवंश बानी ॥ 2 ॥

जयति वृषभानुजा कुँवरि राधे।
सच्चिदानन्द घन रसिक सिरमौर वर, सकल वाँछित सदा रहत साधे ॥ निगम आगम सुमति रहे बहु भाषि जहाँ, कहि नहीं सकत गुण गण अगाधे। जै श्री हित रूपलाल पर करहु करुणा प्रिये, देहु वृन्दाविपिन नित अबाधे ॥ 3॥

श्री व्यासनन्दन दीनबन्धु सुनि पुकार मेरी।
मूढ़ मन्द मति लबार भ्रमी जन्म बार-बार, कष्टातुर होय नाथ शरण गही तेरी ॥ भजन-भाव बनत नाहिं मनुज देह वृथा जाय, करौ कृपा बेगि प्रभू बहुत भई देरी। त्रिगुण जनित सृष्टि मांझ दरसत महिं दिबा साँझ, हृदय तिमिर छाय रह्यौ झुकि सघन अंधेरी ॥ कृपा दृष्टि वृष्टि करी राजत फुलवारी हरी, आतुर पर श्रवौ बूंद शुष्क होत जेरी। ललित हित किशोरी नाम राखत प्रभु तुमसों काम, याम जात युगन तुल्य करौ नाथ चेरी ॥ 4 ॥

जय, जय, जय राधिके पद सन्तत आराधिके,
साधिके, शुक, सनक, शेष, नारदादि सेवी। वृन्दावन विपुल धाम रानी नव नृपति श्याम, अखिल लोकपालादि ललितादिक नेवी ॥ लीला करि विविध भाय बरसत रस अमित चाय, कमल प्राय गुण पराग लालन अलि खेवी। युग वर पद कंज आस वांछत हित कृष्णदास कुल उदार स्वामिनि मम सुन्दर गुरु-देवी ॥ 5 ॥

राधिका सम नागरी प्रवीन को नवीन सखी,
रूप गुण सुहाग भाग आगरी न नारि। वरुन लोक, नाग भूमि, देवलोक की कुमारि, प्यारी जू के रोम ऊपर डारौं सब वारि ॥ आनन्दकंद नन्दनन्दन जाके रस रंग रच्यौ, अंग भरि सुधंग नच्यौ मानत हँसि हारि। जाके बल गर्व भरे रसिक व्यास से न डरे, कर्म-धर्म-लोक-वेद छाँडि मुक्ति चारि ॥ 6 ॥

प्यारी जू के चरणारविन्द शीतल सुखदाई।
कोटि चन्द मन्द करत नख-विधु जुन्हाई ॥ ताप-शाप-रोग-दोष दारुण दुख हारी। लाल इष्ट दुष्ट दवन कुंज भवन चारी ।। श्याम हृदय भूषण जित दूषन हित संगी। वृन्दावन धूर-धूसर रास रसिक रंगी। शरणागत अभय विरद पतित पावन बानै। व्यास से अति अधम आतुर को-को न समानौ ॥ 7 ॥

श्रीराधा प्यारी के चरणारबिन्द शीतल सुखदाई।
कोटि चन्द मन्द करत नख विधु जुन्हाई ॥ ताप साप रोग सोक दारुण दुख हारी। कालकूट – दुष्ट – दवन, कुंज भवन चारी ॥ स्याम हृदय भूषण जुत, दूषन जित संगी। श्रीवृन्दावन धूलि-घूसर, रास रसिक रंगी ॥ सरनागत अभय विरद पतित पावन बानै। व्यास से अति अधम आतुर को, कौन समानै ॥ इति ॥

व्यासनन्दन, व्यासनन्दन, व्यासनन्दन गाईयै।
जिनकौ हित नाम लेत दम्पति रति पाईयै ॥ रास मध्य ललितादिक प्रार्थना जु कीनी। कर तें सुकुंवारि प्यारी वंशी तब दीनी ॥ सोई कलि प्रगट रूप वंशी वपु धारयौ। कुंज भवन रास रवन त्रिभुवन विस्तारयौ ।। गोकुल रावल सु ठाँम निकट बाद राजै। विदित प्रेम राशि जनम रसिकन हित काजै ॥ तिनकों पिय नाम सहित मंत्र दियौ (श्री) राधे। सत, चित, आनन्द रूप निगम-अगम साधे ।। (श्री) वृन्दावन धाम तरणिजा सुतीर वासी। श्रीराधा पति रति अनन्य करत नित खवासी ॥ अद्भुत हरि युक्त वंश भनत नाम श्यामा। जै श्री रूपलाल हित चित दै पायौ विश्रामा ॥ 8 ॥

प्रथमहिं भावुक भाव विचारै।
तन-मन नवकिशोर सहचरि वपु हित गुरु कृपा निहारै ॥ भूषन वसन प्रसाद स्वामिनी पुलकि-पुलकि अंग धारै। जै श्री रूपलाल हित ललित त्रिभंगी रंगी रस विस्तारै ॥ 9 ॥

सखी, लखि कुंजधाम अभिराम।
मनिनु प्रकाश हुलास युगल वर, राजत श्यामा-श्याम ।। हास विलास मोद मद, होत न पूरण काम। जै श्रीरूपलाल हित अलि दंपति रस सेवत आठौ याम ॥ 10 ॥

लाड़िली लालहि भावत है सखि,
आनन्दमय हिम की ऋतु आई। ऐसे रहे लपटाय दोऊ जन चाहत अंग में अंग समाई ।। हार उतार धरे सब भूषन स्वादी महा रस की निधि पाई। महासुख कौ ध्रुव सार विहार है, श्रीहरिवंशजू केलि लड़ाई ॥ 11 ॥

प्रात समैं नव कुंज द्वार है ललिताजू ललित बजाई बीना।
पौढ़े सुनत श्याम श्रीश्यामा, दम्पति चतुर प्रवीन प्रवीना ॥ अति अनुराग सुहाग परस्पर कोक कला गुण निपुण नवीना। श्रीबिहारिनदास बलि-बलि वंदसि यह मुदित प्राण न्यौछावर कीना ॥ 12 ॥

जगाय री भई बेर बड़ी।
अलबेली खेली पिय के संग अलक लड़े के लाड़ लड़ी ॥ तरनि-किरन रन्ध्रन है आईं, लगी निवाई जानि सुकर वर तब हौं ही है रही अड़ी। श्रीविहारिनदासि छवि को कवि बरनैं जो छवि मो मन मांझ गड़ी ॥ 13 ॥

जागौ मोहन प्यारी राधा।
ठाड़ी सखी दरस के कारण, दीजै कुंवरि जु होइ न बाधा ।। हँसत-हँसत दोऊ उठे हैं युगल वर मरगजे बागे फबि रहे दुहुँ तन। बारत तन मन लेत बलैयाँ देखि-देखि फूलत मन ही मन ॥ रंग भरे आनंद जम्हावत अंस अंस धरि बाहु रहे गसि। जयश्री कमलनैन हित या छवि ऊपर वारौं कोटिक भानु मधुर शशि ॥ 14 ॥

अबहि निसि बीती नाहिंन वाम।
तुव मुख इन्दु किरण छवि व्यापी, कहत प्रिया सों श्याम ॥ अंग-अंग अरसान वाम छबि मानि लेहु अभिराम। रहसि माधुरी रूप हित चित में होत न पूरन काम ॥ 15 ॥

आजु देख ब्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि।
अंस-अंस बाहु दै किशोर जोर रूप राशि, मनौ तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि ।। नव निकुंज भ्रमर गुंज मंजु घोष प्रेम पुंज, गान करत मोर पिकनि अपने सुर सों मेलि। मदन मुदित अंग-अंग बीच-बीच सुरत रंग, पल-पल हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि ॥ 16 ॥

आजु सखि, अद्भुत भाँति निहारि।
प्रेम सुदृढ़ की ग्रन्थि जु परि गई, गौर स्याम भुज चारि ॥ अबहीं प्रातः पलक लागी है मुख पर श्रमकन वारि। नागरीदास निकट रस पीवहु, अपने वचन विचारि ॥ १७ ॥प्रेम सुदृढ़ की ग्रन्थि जु परि गई, गौर स्याम भुज चारि ॥ अबहीं प्रातः पलक लागी है मुख पर श्रमकन वारि। नागरीदास निकट रस पीवहु, अपने वचन विचारि ॥ 17 ॥

अबहीं नेंकु सोए हैं अलसाय।
काम केलि अनुराग रंग भरे जागे रैन विहाय ॥ बार-बार सपनेहूँ सूचत सुरत रंग के भाय। यह सुख निरखि सखीजन प्रमुदित नागरीदास बलि जाय ॥ 18॥

सिटपिटात किरनन के लागे।
उठि न सकत लोचन चकचौंधत, ऐंचि ऐंचि ओढ़त बसन दोऊ जागे ।। हिय सौं हिय मुख सौं मुख मिलवत रस लम्पट सुरत रस पागे। नागरीदास निरखि नैंनन सुख मति कोऊ बोलौ जाओ जिन आगे ॥ 19 ॥

भोर भये सहचरि सब आईं।
यह सुख देखत करत बधाई ॥ कोऊ बीना सारंगी बजावैं। कोऊ इक राग विभासहिं गावैं ॥ एक चरण हित सों सहरावैं। एक बचन परिहास सुनावें । उठि बैठे दोऊलाल रंगीले । विथुरी अलक सबै अंग ढीले ॥ घूमत अरुण नैन अनियारे। भूषण बसन न जात संभारे ॥ कहुँ अंजन कहुँ पीक रही फबि। कैसे कही जात है सो छबि । हार बार मिलि कें उरुझाने। निशि के चिन्ह निरखि मुसिकाने ॥ निरखि-निरखि निसि के चिह्नन रोमांचित है जाहिं। मानौं अंकुर मैन के फिर उपजे तन माहिं ॥ 20 ॥

राधा प्यारी तेरे नैन सलोल ।
तैं निज भजन कनक तन यौवन, लियौ मनोहर मोल ।। अधर निरंग अलिक लट छूटी, रंजित पीक कपोल। तू रस मगन भई नहिं जानत, ऊपर पीत निचोल ॥ कुच युग पर नख रेख प्रगट मानौं, शंकर शिर शशि टोल । जय श्रीहित हरिवंश कहति कछु भामिनी अति आलस सों बोल ॥ 21 ॥

मंगल समय खिचरी जेंवत हैं श्रीराधावल्लभ कुंज महल में।
रति रसमसे गसे गुण तन मन नाहिन संभारत प्रेम गहल में ॥ चुटकी देत सखी संभरावत हंसत हंसावत चहल पहल में। जै श्रीकुंजलाल हित यह विधि सेवत समैं समैं सब रहत टहल में ॥ 22 ॥

खिचरी जेंवत है पिय प्यारी।
सीत समैं रुचि जानि सुगंधन मेलि सखीनु सँवारी ।। पहले प्रियहि जिवाँवत जेंवत रसिक नरेस महा री। जै श्रीकुंजलाल पिय की बातन की घातन जानन हारी ।। 23 ।।

खिचरी राधाबल्लभ जू कौं प्यारौ।
किसमिस, दाख, चिरौंजी, पिस्ता, अदरक सौं रुचिकारी। दही कचरिया वर सेंधाने बरा पापर बहु तरकारी। जायफल जावित्री मिरचा घृत सों सींच संवारी ॥ 24 ॥

खिचरी जेंवत जुगल किशोर ।
निसि आगे अनुरागे दम्पति उठे उनीदे भोर ॥ अंग-अंग की छबि अवलोकत ग्रास लेत मुख सुखहि निहोर। जै श्रीरूपलाल हित ललित त्रिभंगी बिबि मुखचन्द्र चकोर ॥ 25 ॥

अधिक हेत सों पावें पिय प्यारी।
थार सँजोय धरें कर आवत, सीत समैं रुचिकारी ।। बहु मेवा तिलबरी, अचारी, बासौंधी लीये सब ठाड़ी। यह सेवा हित नित्त कृपा प्रिय सों राधालाल संवारी ॥ 26 ॥

रूप रसासब माते दोऊ श्रीराधाबल्लभ जेंवत खिचरी ।
अरस परस मुसिकात जात बतरात बात बोलत बिच-बिचरी ॥ खाटे सरस सँधाने नव-नव पापर कचरी लेत रुचि रुचि री। नेह निहोर जिवाँवत हित सखी कोमल मधुर ग्रास घृत निचुरी ।। फरगुल सुरंग रजाई ओढ़े कनक अंगीठी अगरसत सचरी ॥ 27 ॥

अब श्री जी के पट खुल जाते है पर दर्शन होने में थोड़ी देर है

चलौ, चलौ, चलौ सखी देखें दोऊ जैवैं।
भरे थार खिचरी घृत निचुरी के आगें, हँसि-हँसि सुकुमार प्यारे कैसे दोऊ जैवें ॥ प्रिया के मुख पीय देत पिय के मुख प्यारी। बीच-बीच अधर पान प्रानन सों हेरौं ॥ 28 ॥

प्यारे दोऊ जैवत हैं सुकुंवार।
सरस सुगंध उठत उद्‌गारें भरि खिचरीके थार। पापर कचरी तलप कटाक्षन भृकुटी मुरन कौ अचार। जुरे परस्पर नैन दुहुन के, प्रेम रूप कौ अहार ॥ पहिलै प्रियहिं जिवाँवत जैवत रहत हैं वदन निहार। ऐसी विधि सों जेंवत प्यारे हित सुख की ज्यौनार ॥ 29 ॥

भोर मिलि जैबैं दोऊ बनी-बनरा खिचरी ।
झमकि सेज तें उठे उनींदे ब्रजजीवन घृत सों निचुरी ॥ मंगल रूप समैं मंगल में रुचि सौं खिचरी पावैं। ओढ़े फरगुल रंग सहानी छबि लखि-लखि बलि जावैं ॥ बाहु-बाहु कर कंठ लगावैं आनन्द जीव जिबावैं ॥ झुकि-झुकि परत नैन अलसोहें हित सजनी सम्हरावैं ॥ माखन मिश्री मगद मलाई पाक मुरब्बा पावैं। ताजी फैनी अरु बासौंदी ब्रजजीवन मन भावैं ॥ अदरक कूचा बन्यौ चटपटौ कर पल्लव दोऊ चाटैं। वे उनके वे उनके मुख सों हँसि-हँसि हित सों लावैं ॥ नथ उठाय बेला पय पीवैं कौतुक रंग मचावैं। ब्रजजीवन हित कहाँ लगि बरनौं कुंज महल के ठाठें ॥ 30 ॥

खिचरी युगल रुचि सों खात।
पौष शुक्ला दोज तें लैं मास एक प्रभात ॥ दही कचरी वर संधाने बरा पापर घीय। ढिंग अंगीठी धरी मीठी लगत प्यारी पीय ॥ जल पिवाय धुवाइ हाथ अगौंछ बीरी देत। सखीजन बाँटति तहाँ हित ब्रजलाल जूठन लेत ॥ 31 ॥

अचवन बीरी दें मंगल आरती सजि बाढ्‌यौ सखिन मन मोद।
जै श्रीकुंजलाल हित असीसत एसै ही करौ विनोद ॥ जै श्रीकिशोरीलाल हित रूप अलि बाँटत देति लेति सब सखी सहचरि । कृष्णदास आसपास निरखत हित कौ विलास, दौरि-दौरि आवें सखी जूठन कौं लेवें। चलौ चलौ चलौ सखी देखें दोऊ जैं चुके, जैं चुके, जैं चुके ॥ 32 ॥

मंगला आरती : निरखि आरती मंगल भोर।
मंगल स्यामा स्याम किशोर ॥ मंगल श्रीवृन्दावन धाम। मंगल कुंज महल अभिराम ॥ मंगल घंटा नाद सु होत। मंगल थार मणिनु की जोति ॥ मंगल दुंदुभी धुनि छबि छाई। मंगल सहचरी दरसन आई ॥ मंगल वीणा मृदंग बजावैं। मंगल ताल झाँझ झर लावैं ॥ मंगल सखी यूथ कर जोरैं। मंगल चंवर लिये चहुँ ओरैं ।॥ मंगल पुष्पावलि बरसाई। मंगल जोति सकल वन छाई ॥ जै श्रीरूपलाल हित हृदय प्रकाश। मंगल अद्भुत युगल विलास ॥ 33 ॥

यहि विधि मंगल आरती करी।
निज मंदिर आगैं चिक परी ॥ ललितादिक भीतर अनुसरी। जै श्रीकमलनेंन हित सेवा भई ॥ श्रीराधे, किशोरी राधे, लड़ैती राधे। श्यामा प्यारी जय राधे ॥ 35 ॥

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