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राधारमण जी

श्री राधा रमण जी का मन्दिर श्री गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है | श्री राधा रमण जी उन वास्तविक विग्रहों में से एक हैं, जो अब भी वृन्दावन में ही स्थापित हैं ।
अन्य विग्रह जयपुर चले गये थे, पर श्री राधा रमणजी ने कभी वृन्दावन को नहीं छोड़ा। श्री राधारमण जी 1532 से ही वृंदावन मे विराजित है मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में श्री राधा रमण जी का प्राकट्य स्थल तथा गोपाल भट्ट गोस्वामीजी का समाधि मन्दिर है । (गोपाल भट्ट गोस्वामी जी ने ही राधारमण के विग्रह को प्रगट किया था)


राधारमण जी का प्राक्ट्य

एक बार श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी अपनी प्रचार यात्रा के समय जब गण्डकी नदी में स्नान कर रहे थे, उसी समय सूर्य को अर्घ देते हुए जब अंजुली में जल लिया तो एक अद्भुत शलिग्राम शिला श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी की अंजुली में आ गई|

जब दुबारा अर्घ देने को जल अंजुली मे भरा तो एक और शालिग्राम आ गए इस प्रकार एक-एक कर के बारह शालिग्राम की शिलायें उन्हे प्राप्त हुई | जिन्हे लेकर श्री गोस्वामी वृन्दावन धाम आ पहुंचे और यमुना तट पर केशीघाट के निकट भजन कुटी बनाकर श्रद्धा पूर्वक शिलाओं का पूजन- अर्चन करने लगे|

एक बार वृंदावन यात्रा करते हुए एक सेठ जी ने वृंदावनस्थ समस्त श्री विग्रहों के लिए अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र आभूषण आदि भेट किये| श्री गोपाल भट्ट जी को भी उसने वस्त्र आभूषण दिए|परन्तु श्री शालीग्राम जी को कैसे वे धारण कराते श्री गोस्वामी के हृदय में भाव प्रकट हुआ कि अगर मेरे आराध्य के भी अन्य श्रीविग्रहों की भांति हस्त-पद होते तो मैं भी इनको विविध प्रकार से सजाता एवं विभिन्न प्रकार की पोशाक धारण कराता, और इन्हें झूले पर झूलता |

यह विचार करते-करते श्री गोस्वामी जी को सारी रात नींद नहीं आई| प्रात: काल जब वह उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि श्री शालिग्राम जी त्रिभंग ललित द्विभुज मुरलीधर श्याम रूप में विराजमान हैं । यह 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ल पूर्णिमा का दिन था|

श्री गोस्वामी ने भावविभोर होकर वस्त्रालंकार विभूषित कर अपने आराध्य का अनूठा श्रृंगार किया| श्री रूप सनातन आदि गुरुजनों को बुलाया और राधारमणजी का प्राकटय महोत्सव श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया|राधारमण जी गोस्वामी जी के झोपड़ी के निकट एक पीपल के नीचे प्रकट हुए थे। यह वही स्थान है जहां लगभग 4,500 साल पहले रास के दौरान श्री राधारानी से कृष्ण अंतर्हित हो गए थे जो गोपाल भट्ट गोस्वामी के बुलावे पर फिर से इस विग्रह के रूप में प्रकट हुए थे। जब कृष्ण उस स्थान से गायब हो गए, तो श्री राधा ने उन्हें रमन नाम से पुकारा; वह राधा का रमन था, इस प्रकार गोस्वामी जी ने इनका नाम “राधारमण” रखा। यही श्री राधारमण जी का विग्रह आज भी श्री राधारमण मंदिर में गोस्वामी समाज द्वारा सेवित है और प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को पंचअमृत के अभिषेक के साथ प्राक्ट्य उत्सव मनाया जाता है| और इन्ही के साथ गोपाल भट्ट जी के द्वारा सेवित अन्य 11 शालिग्राम शिलाएं भी मन्दिर में स्थापित हैं ।


राधारमण जी का विग्रह

राधारमण जी का श्री विग्रह वैसे तो सिर्फ द्वादश अंगुल का है, पर इनके दर्शन इतने मनोहारी है कि जिसे देख कर कोटिक कामदेव भी मूर्छित हो जाए। नेपाल में काली-गंडकी नदी से गोपाल भट्ट जी को 12 शालिग्राम मिले जो गोस्वामी जी के प्रेम से वशिभूत होकर ललित त्रिभंग , बंशी धारी के रूप मे प्रगट हो गए।
लाल जी की पीठ शालिग्राम शिला जैसी ही दिखती है अर्थात पीछे से देखने पर शालिग्राम जी के ही दर्शन होते है। फूलो से भी कोमल चरण, वेणु वादन की मुद्रा मे हस्त कमल और श्री मुख पर अति मनोहारी मुस्कान लिए राधारमण जी भक्तो के हृदय मे रमण कर रहे है|

वृंदावन के प्राचीन विग्रहो में गोविंद, गोपीनाथ और मदनमोहन जैसे नाम थे, लेकिन बाद में जब श्री राधा के विग्रह को उन मंदिरों में स्थापित किया गया, तो उन्हें राधा-गोविंद, राधा-गोपीनाथ, राधा-मदनमोहन के रूप में जाना जाने लगा। लेकिन श्री राधारमण देव एक ही रूप में राधा और कृष्ण हैं, अतः उनके साथ राधारानी का कोई अलग विग्रह नहीं है, हालांकि राधा के पवित्र नाम की पूजा उनके वाम भाग मे की जाती है।

राधारमण जी के बारे मे एक दिलचस्प बात यह है की कृष्ण के अन्य विग्रहो के जैसे ये बांसुरी नही पकड़ते। इसका कारण गोस्वामियो द्वारा यह बताया गया है की यह विग्रह बहुत छोटा और हल्का है और ना ही किसी सतह पर टिका है अतः जब वह ऊंचाई पर अपने सिंहासन पर बैठा हो, तो वह गिर सकता है यदि उनके कोमल हाथों में बांसुरी रखते हैं या बांसुरी को हाथो के बीच से निकालते हैं। इसके अलावा भोजन ( भोग ) को खाने के दौरान हर बार बांसुरी को निकालना और बदलना पड़ेगा , जिसके परिणामस्वरूप उसके कोमल हाथों को खरोंच लग सकता है और वह गिर सकता है। इसलिए भाव मे उन्हें बंशी बजाते हुए देखते है इसलिए बंसी को विग्रह के पास विराजित किया जाता है ताकि वह हमेशा उनके साथ रहे।


श्री विग्रह के बारे मे

इनका विग्रह तीन विग्रहो का मिलाजुला रूप है जिसमे

❖ मुखारविन्द “गोविन्द देव जी” के समान|
❖ वक्षस्थल “श्री गोपीनाथ” के समान|
❖ चरणकमल “मदनमोहन जी” के समान हैं|

इनके दर्शन मे ही इन तीनो विग्रहो के दर्शन हो जाते है अतः इनके दर्शन मात्र से ही तीनो ठाकुरो के फल एक साथ प्राप्त होता है


मंदिर का इतिहास

श्री राधा रमण मंदिर एक ऐतिहासिक मंदिर है जो प्रारंभिक आधुनिक काल के समय का है। वृंदावन में सबसे पुराने मंदिरों में से एक होने के नाते, यह एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्व रखता है। मंदिर से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य है, जिसके अनुसार, मंदिर के रसोईघर में लगभग 500 वर्ष से लगातार आग जलती रही है जो मंदिर के निर्माण के समय जलाया गया था और इसी आग पर मंदिर मे ठाकुर जी को लगने वाली भोग सामग्री तैयार की जाती है।

श्री राधा रमण का मंदिर लगभग 500 साल पहले गोपाल भट्ट गोस्वामी (चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों में से एक) द्वारा बनाया गया था। गोपाल भट्ट गोस्वामी ने तीस साल की उम्र में वृंदावन का दौरा किया। आगमन पर, उन्होंने चैतन्य महाप्रभु का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त किया। हालांकि, आशीर्वाद कोपिन (चैतन्य का लंगोटी), पट्टा, (लकड़ी का आसन), दुपट्टा (कपड़े का लंबा टुकड़ा) के रूप में थे। इन सभी के बीच, लकड़ी की सीट अच्छी तरह से संरक्षित है, और इसलिए, मंदिर में देखा जा सकता है।


श्रीगोपालभट्ट जी

गोपाल भट्ट गोस्वामी का आविर्भाव सन् 1503, मे श्री रंगक्षेत्र में कावेरी नदी के निकट स्थित बेलगुंडी ग्राम में श्री वैंकटभट्ट जी के घर हुआ था।गोपाल भट्ट गोस्वामी गनमंजरी और अनंगा मंजरी का संयुक्त अवतार है। गनमंजरी राधारानी की नौकरानियों में से एक है, जो मुख्य रूप से विभिन्न प्रकार के सुगंधित पानी की सेवा करती है। अनंगा मंजरी राधारानी की छोटी बहन हैं, और गनमंजरी की तरह उनकी सहायक और अनुयायी भी हैं।

जब चैतन्य महाप्रभु दक्षिण यात्रा करते हुए श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन हेतु रंगक्षेत्र पधारे, तब वहाँ वैंकटभट्ट भी उपस्थित थे, और उन्हें अपने घर पर प्रसाद का निमंत्रण दिया। उस समय महाप्रभु ने चातुर्मास श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के ही घर में किया, तब गोपाल भट्ट की आयु 11 वर्ष की थी। गोपाल भट्ट गोस्वामी ने भी महाप्रभु की हर प्रकार से सेवा की और गोपाल से महाप्रभु का भी अत्यंत स्नेह हो गया। वहाँ से प्रस्थान करते समय महाप्रभु ने ही इन्हें अध्ययन करने को कहा और वृंदावन जाने की आज्ञा दी।

माता-पिता की मृत्यु के बाद वृंदावन आकर श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी, श्री रूप-सनातन जी के पास रहने लगे थे। श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्य लीला मे प्रवेश के समय रूप और सनातन गोस्वामी जी को स्वप्नदेश किया कि गोपाल भट्ट जो गौड़ीय वैष्णववाद के अगले गुरु के रूप में बैठेंगे। बाद मे गोपाल भट्ट ने अपने शिष्य दामोदर दास गोस्वामी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना, और उनके आशीर्वाद से, दामोदर दास गोस्वामी और उनके वंशज श्री राधारमण लाल की सेवा करेंगे, जो सभी पीढ़ियों के लिए विद्वानों और आध्यात्मिक शिक्षकों के रूप में भक्तों का मार्गदर्शन करेंगे।

पिछले 500 वर्षों से आज तक, श्री राधारमण मंदिर के गोस्वामी महाप्रभु के आदेश और गोपाल भट्ट गोस्वामी के निर्देशों का पालन करते रहे हैं, जो दुनिया में भक्ति का प्रचार करने और श्री राधारमण की पूजा करने के उद्देश्य से अपना जीवन समर्पित करते हैं। सन 1643 की श्रावण कृष्ण पंचमी को आप नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए|श्री राधा रमण जी के प्राकट्य स्थल के पार्श्व में इनकी पावन समाधि का दर्शन अब भी होता है|


मंदिर कि आरतियाँ

श्री राधारमण मंदिर मे अष्ट्याम यानी आठ पहर अलग-अलग भाव से आरती, श्रृंगार और दर्शन होते है जो इस प्रकार है :-

  1. मंगला आरती : 04:45AM
  2. धूप श्रृंगार आरती : 09:00AM
  3. श्रृंगार आरती : 10:15AM
  4. राजभोग आरती : 12:15AM
  5. धूप संध्या आरती : 05:15PM
  6. संध्या आरती : 06:46PM
  7. औलाइ संदर्शन : 9:00PM
  8. शयन आरती : 09:15PM

  • मंगला आरती की बेला में हमारे प्यारे श्रीराधारमण जू की जब आरती होती हैं एक तो उनके मुख-मण्डल पर अल्साय हुए दर्शन प्रतीत होते हैं सभी भक्तों को। मंगला आरती पर 3 बत्ती द्वारा आरती सेवा होती हैं।
  • धूप आरती सुबह 9 बजे की जाती हैं। जिसमें श्रीराधारमण जू सज-संवरकर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए अति लालायित रहते हैं। जितनी प्रतीक्षा भक्तों को रहती हैं उससे कहीं ज्यादा इन्हें। धूप आरती में 1 बत्ती द्वारा सेवा होती हैं।
  • श्रृंगार आरती दर्शन में श्रीराधारमण जू को पुष्पों की माला पहनाई जाती हैं। वोह पुष्प भी धन्य अति धन्य हैं जो श्रीठाकुर-ठकुरानी के अंगों का स्पर्श करते हैं। श्रृंगार आरती सेवा 5 बत्ती द्वारा होती हैं।
  • राजभोग में आरती सेवा गर्मीयों में पुष्पों द्वारा होती हैं। सर्दियों में आरती सेवा 5 बत्ती द्वारा की जाती हैं।
  • संध्या धूप आरती समय 1 बत्ती द्वारा सेवा की जाती हैं। परन्तु अगर कोई विशेष-विशेष उत्सव हो। जैसे प्राकटय् उत्सव-श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव इत्यादि तो 13 बत्ती द्वारा सेवा की जाती हैं।
  • किसी भी उत्सव के दिन संध्या समय मे एक और आरती होती है जिसे उत्सव आरती कहते है
  • संध्या आरती में 9 बत्ती द्वारा सेवा की जाती हैं संध्या समय जो परिवेश हैं प्राँगण का। विशेष ग्रीष्म ऋतु में श्रीठाकुर-ठकुरानी जी बाहर पधारते हैं। एक-एक अंग की छवि का दर्शन आहा ! जितना कहाँ जायें कम ही होगा। रसिक जनों द्वारा समाज गायन एवं भक्तवृन्द जनों द्वारा नृत्य। ह्रदय एवं आत्मा नाच उठती हैं।
  • औलाई दर्शन का आनन्द प्राप्त होता हैं। श्रीठाकुर जी गौ-चारण के पश्चात धुल-धुसरित वस्त्रों से घर पर पधारते हैं तब श्री यशोदा मैया श्रीठाकुर जी का अच्छी तरह से मार्जन कर हल्के वस्त्र धारण करवाती हैं। क्या सीमा होगी ऐसे आनन्द की। अगर एक बार इसका चिन्तन किया जायें तो जीव इसी में डूब जायें।
  • शयन आरती की सेवा 3 बत्ती द्वारा की जाती हैं। साथ में बांसुरी वादन की मधुरतम आवाज मदमस्त कर देती हैं। मन्दिर का परिवेश बिलकुल शान्त एवं आनन्दप्रदायक हो जाता हैं।

!! श्री राधारमण लाल की जय !!


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श्री राधावल्लभ जी

श्री राधावल्लभ जी अनोखे विग्रह में राधा और कृष्ण एक ही नजर आते हैं। इसमें आधे हिस्से में श्री राधा और आधे में श्री कृष्ण दिखाई देते हैं। माना जाता है कि जो भी सारे पाप कर्मों को त्याग कर निष्कपट होकर सच्चे मन के साथ मंदिर में प्रवेश करता है सिर्फ उस पर ही भगवान प्रसन्न होते हैं और उनके दुर्लभ दर्शन उनके लिये सुलभ हो जाते हैं। लेकिन जिनके हृद्य में प्रेम और भक्ति की भावना नहीं होती वे लाख यत्न करने पर भी दर्शन नहीं कर पाते। इसी कारण इनके दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं में भजन-कीर्तन, सेवा-पूजा करने का उत्साह रहता है


मंदिर का इतिहास

वृंदावन के सभी मंदिरों में से एक मात्र श्री राधा वल्लभ मंदिर में नित्य रात्रि को अति सुंदर मधुर समाज गान की परंपरा शुरू से ही चल रही है यहाँ प्रत्येक दिन उत्सव मनाया जाता है जिसमे व्यहूला सबसे अधिक प्रचलित है। सवा चार सौ वर्ष पहले निर्मित मूल मंदिर को मुगल बादशाह औरंगजेबके शासनकाल में क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। तब श्री राधा वल्लभ जी के श्रीविग्रहको सुरक्षा के लिए राजस्थान से भरतपुरजिले के कामां में ले जाकर वहां के मंदिर में स्थापित किया गया और पूरे 123 वर्ष वहां रहने के बाद उन्हें फिर से यहां लाया गया।

वृंदावन के क्षतिग्रस्त मंदिर के स्थान पर अन्य नए मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर के आचार्य श्रीहितमोहित मराल गोस्वामी के अनुसार मुगल बादशाह अकबर ने वृंदावन के सात प्राचीन मंदिरों को उनके महत्व के अनुरूप 180 बीघा जमीन आवंटित की थी जिसमें से 120 बीघा अकेले राधा वल्लभ मंदिर को मिली थी। यह मंदिर श्री राधा वल्लभ संप्रदायी वैष्णवों का मुख्य श्रद्धा केन्द्र है। यहां की भोग राग, सेवा-पूजा श्री हरिवंश गोस्वामी जी के वंशज करते हैं।

मन्दिर का निर्माण संवत 1585 में अकबर बादशाह के खजांची सुन्दरदास भटनागर ने करवाया था। मुगल मन्दिर लाल पत्थर का है और मन्दिर के ऊपर शिखर भी था, जिसे औरंगजेब ने तुड़वा दिया था।


राधावल्लभ जी का विग्रह

श्री राधावल्लभ लाल जी का विग्रह है और राधावल्लभ के साथ में श्रीजी नहीं हैं केवल वामअंग में मुकुट की सेवा होती है.

हरिवंश गोस्वामी श्री राधाजी के परम भक्त थे, और वंशी के अवतार थे. उनका मानना था कि राधा की उपासना और प्रसन्नता से ही कृष्ण भक्ति का आनंद प्राप्त होता है. अतः उन्हें राधाजी के दर्शन हुए एवं एकादशी के दिन राधाजी ने उन्हें पान दिया था, अतः उनके सम्प्रदाए में एकादशी को पान वर्जित नहीं है.

हित हरिवंश जी की इस प्रेममई उपासना को सखी भाव की उपासना माना गया है. और इसी भाव को श्री राधा वल्लभ लाल जी की प्रेम और लाड भरी सेवाओं में भी देखा जा सकता है. जिस प्रेम भाव तथा कोमलता से इनकी सेवा पूजा होती है वह देखते ही बनती है. श्री राधावल्लभ लाल जी आज भी अपनी बांकी अदाओं से अपने भक्तों के मन को चुरा रहे हैं |

राधावल्लभ लाल सौंदर्य का एक ऐसा महासागर है जहाँ दिव्य प्रेम की लहरें सदा बहती हैं और हमेशा बढ़ती रहती हैं। उनके दर्शन से भीतर कुछ हलचल होती है और दिल दिव्य प्रेम का अनुभव करने लगता है। श्री राधावल्लभ लाल की उपस्थिति और उनकी निकटता किसी के जीवन को आत्मनिर्भर बनाती है और किसी भी द्वंद्व से मुक्त करती है।

सिर से पैर तक उसके दिव्य रूप की ‘परिक्रमा’ (परिधि) करने से, जीव सहज रूप से दिव्य प्रेम से भर जाता है। जो दिव्य दंपत्ति के चरण कमलों की कामना करता है, उसे श्री वृंदावन धाम में शरण लेनी चाहिए, क्योंकि यह उनका अपना दिव्य निवास है।


श्री विग्रह के बारे मे

राधावल्लभ मंदिर में विराजमान इस अनूठे विग्रह में आधे भाग में कृष्ण और आधे में राधा रानी है। यहां पर कई सदियों से एक कहावत है ‘राधा वल्लभ दर्शन दुर्लभ’। यहाँ पर आठों पहर दर्शन की ही तैयारी चलती रहती है, सखी भाव मे यहाँ अष्टायम सेवा (8 पहर की जाने वाली सेवा) मे तल्लीन रहते है।

यहां हर किसी को दर्शन नहीं होते। केवल वही व्यक्ति इस मंदिर में दर्शन कर पाते हैं जिनके ह्रदय में प्रेम है, भावुकता है और भक्ति हैं। इसी लिए यहां आने वाले भक्तजन उन्हें रिझाने के लिए भजन-कीर्तन करते हैं। उन्हें पंखा झलते हैं और यथासंभव उनकी सेवा-पूजा कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। कहा जाता है जिस पर भी भगवान राधावल्लभ प्रसन्न हो जाएं उनकी उसे अपनी प्रेम-भक्ति का दान देकर अपने निज सखियों मे शामिल कर लेते है।


राधावल्लभ जी का प्राक्ट्य

हरिवंश महाप्रभु 31वर्ष तक देव वन में रहे.अपनी आयु के 32वें वर्ष में उन्होंने दैवीय प्रेरणा से वृंदावन के लिए प्रस्थान किया.मार्ग में उन्हें चिरथावलग्राम में रात्रि विश्राम करना पडा. वहां उन्होंने स्वपन में प्राप्त राधारानी के आदेशानुसार आत्मदेव जी की दो पुत्रियों के साथ विधिवत विवाह किया. बाद में उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों और कन्यादान में प्राप्त “श्री राधा वल्लभ लाल” के विग्रह को लेकर वृंदावन प्रस्थान किया.

आत्मदेव ब्राह्मण के पास यह श्री राधा वल्लभ जी का विग्रह कहा से आया इसपर संतो ने लिखा है – आत्मदेव ब्राह्मण के पूर्वजो ने कई पीढ़ियो से भगवान शंकर की उपासना करते आ रहे थे , आत्मदेव ब्राह्मण के किसी एक पूर्वज की उपासना से भगवान श्री शंकर प्रसन्न हो गए और प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा । उन पूर्वज ने कहा – हमे तो कुछ माँगना आता ही नही , आपको जो सबसे प्रिय लगता हो वही क्रिया कर के दीजिये । भगवान शिव ने कहा “तथास्तु “। भगवान शिव ने विचार किया कि हमको सबसे प्रिय तो श्री राधावल्लभ लाल जी है । कई कोटि कल्पो तक भगवान शिव ने माता पार्वती के सहित कैलाश पर इन राधावल्लभ जी के श्रीविग्रह की सेवा करते रहे । भगवान शिव ने सोचा कि राधावल्लभ जी तो हमारे प्राण सर्वस्व है , अपने प्राण कैसे दिए जाएं परंतु वचन दे चुके है सो देना ही पड़ेगा । भगवान शिव ने अपने नेत्र बंद किये और अपने हृदय से श्री राधावल्लभ जी का श्रीविग्रह प्रकट किया ।

उसी राधावल्लभ जी का आज वृन्दावन में दर्शन होता है । श्री हरिवंश महाप्रभु जी का विधिवत विवाह संपन्न हुआ और श्री राधा वल्लभ जी का विग्रह लेकर महाप्रभु जी अपने परिवार परिकर सहित वृन्दावन आये ।

हिताचार्य जब संवत् 1591में वृंदावन आए, उस समय वृंदावन निर्जन वन था. वह सर्वप्रथम यहां के कालिदेह ( जहाँ कालियनाग का मर्दन हुआ ) पर रहे. बाद में उनके शिष्य बने दस्यु सम्राट नरवाहन ने राधावल्लभलाल का मंदिर बनवाया, जहां पर हित जी ने राधावल्लभके विग्रह को संवत् 1591की कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को विधिवत् प्रतिष्ठित किया.

कार्तिक सुदी तेरस श्री “हित वृन्दावन धाम का प्राकट्य दिवस” है. सर्व प्रथम इसी दिन श्री हित हरिवंश महाप्रभु श्री राधा वल्लभ लाल को लेकर पधारे और मदन टेर [ ऊँची ठौर ] पर श्री राधा वल्लभ लाल को विराजमान कर लाड-लड़ाया.उन्होंने पंचकोसी वृन्दावन में रासमण्डल,सेवाकुंज,वंशीवट, धीर समीर, मानसरोवर,हिंडोल स्थल, श्रृंगार वट और वन विहार नामक लीला स्थलों को प्रकट किया |


श्री हरिवंश महाप्रभु

इनके पिता का नाम पं. व्यास मिश्र जी था और श्रीमती तारा रानी थी। इनका निवास सहारनपुर ज़िले के देववन्द गाव के कश्यप गौत्र के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे।
श्री हरिवंश जी का जन्म विक्रम संवत् 1559 में वैशाख शुक्ला एकादशी, सोमवार को प्रातः सूर्योदयकाल में हुआ था

उस दिन मोहिनी एकादशी है जिनका जन्म व्रज भूमि पर होता है ( केवल यही एक ऐसे आचार्य है जिनका जन्म व्रज धाम पर हुआ ) जो की ठाकुर जी के बंसी का प्राकट्य है !

सभी व्रज वासी ऐसे झूमे नाचे की अपने बच्चे के जन्म पर भी नहीं नाचे ! पुरे व्रज के लोग कितना आनंद लुटने में व्यस्त थे बच्चे बुठे सब बधाई गाने लगे ! बहुत ही अध्बुध दर्शय होता है ! वो फिर अपने गाव देववन्द आ जाते है ! और वहाँ भी बहुत बड़ा उत्सव करते है !

5 दिन हो जाते है, वहाँ नर्शिंग जी आ जाते है वो सबसे पहले हरिवश जी की 7 परिकर्मा करते है व्यास जी उनसे अनुरोध करते है की इनका नामकरण भी आप ही करे व्यास जी द्वारा जन्म कुंडली बना तो लेते है पर वो पूरी तरह कृष्ण जी की थी

फिर नरशी जी उनका नाम हरिवंश रखते है ( हरि के वंश है वो इसलिए उनका नाम रखा गया ) कोई हरिवंश जी के सामने राधा नाम लेता है तो वो किलकारी मारने लगता है !

हितहरिवंश महाप्रभु जी 16 वर्ष की आयु थी
अब व्यास जी को विवाह की चिंता हुई तो महाप्रभु जी का विवाह रुक्मणी जी से हुआ । उन्होंने उनकी भक्ति को आगे ही बढ़ाया । उनकी माता तरारानी और उनके पिता जी व्यास जी की इच्छा थी कि वो राधामाधव जी का दर्शन करें तो जीवन धन्य हो जाये तो उनको भी हरिवंशजी ने ठाकुर जी के प्रत्यक्ष दर्शन कराए !! फिर पहले माता का फिर पिता का शरीर पूरा हो जाता है ! श्री हरिवंशजी की माता तारारानी का निकुंजगमन संवत् 1589 में तथा पिता श्री व्यास मिश्र संवत् 1590 में हुआ !

माता पिता की मृत्यु के उपरांत श्री हरिवंशजी को श्री जी ने सपने में आकर आदेश दिया कि किसी प्रकार भगवान् की लीलास्थली में जाकर वहाँ की रसमयी भक्तिपद्धति में लीन होकर जीवन सफल करें | वो भजन करते करते पैदल निकल जाते है । रास्ते मे प्रेम बाँटते जाते है रास्ते मे एक शेर लेता होता है पर हरिवंशजी को सुध नही होती है उनका पैर उस के उप्पर पड़ गया था तो शेर खड़ा हो गया तब हरिवंशजी उनकी ठोड़ी ( Chin ) पकड़ कर बोलते है भाई हरि बोल हरि बोल । उतने में शेर में भी कृष्ण प्रेम का संचार हो जाता है। शेर के साथ हरिवंशजी खूब नाचे ।

चरथावल में आत्मदेव नामक ब्राह्मण के यहां ठाकुर श्रीराधाबल्लभजी विराजमान थे। आत्मदेव को श्री राधा जी ने स्वप्न में आज्ञा दी कि अपनी दोनों पुत्रियों ( कृष्णदासी एवं मनोहरी ) का विवाह श्रीहित हरिवंशजी से कर दो और दहेज में मुझे दे देना । यही सपना श्री जी का हरिवंश जी को भी आया । आत्मदेव ने श्री राधा जी की आज्ञा बताकर श्रीहित हरिवंशजी को ठाकुर श्री राम बल्लभ जी दे दिए और अपनी पुत्रियों का विवाह उनसे कर दिया। चथड़ावल गांव में ही उनकी शादी हुई ।


मंदिर की आरती

ठाकुर जी की जो सेवाएं मन्दिर में होती हैं उन्हें ” नित्य सेवा ” कहा जाता है, जिनमें “अष्ट सेवा” होती हैं. “अष्ट आयाम ” का अर्थ एक दिन के आठ प्रहर से है| ये आठ सेवाएं इस प्रकार से हैं :-

  1. मंगला आरती : 5:00 – 6:30 AM
  2. धूप श्रृंगार आरती : 8:00 – 8:30 AM
  3. श्रृंगार आरती : 8:30 – 9:30 AM
  4. राजभोग आरती : 12:30 – 1:30 PM
  5. उत्थापन औलाइ :- 5:00 – 5:30 PM
  6. धूप संध्या आरती :- 5:30 – 6:30 PM
  7. संध्या आरती :- 7:00 – 8:00 PM
  8. शयन आरती :- 9:00 – 9:30 PM

यहाँ पर सात आरती एवं पाँच भोग वाली सेवा पद्धति का प्रचलन है. यहाँ के भोग, सेवा-पूजा श्री हरिवंश गोस्वामी जी के वंशजों द्वारा सुचारू रूप से की जाती है. वृंदावन के मंदिरों में से एक मात्र श्री राधा वल्लभ मंदिर ही ऐसा है जिसमें नित्य रात्रि को अति सुंदर मधुर समाज गान की परंपरा शुरू से ही चल रही है. इसके अलावा इस मन्दिर में व्याहुला उत्सव एवं खिचड़ी महोत्सव विशेष है


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मदन मोहन जी

श्री वृंदावन धाम के प्राचीन मंदिरों मे से एक है श्री मदन मोहन मंदिर। वृन्दावन परिक्रमा मार्ग में मदन मोहन मंदिर स्थित है। ये मंदिर आज से 515 वर्ष पुराना है, पुरातनता मे यह गोविंग देव जी मंदिर के बाद आता है। मथुरा मंदिरों की नगरी वृन्दावन में एक से बढ़ कर एक मंदिर हैंं।

मथुरा-वृंदावन को कान्हा की नगरी कहा जाता है इसलिए यहां के हर मंदिर से भगवान कृष्‌ण की लीलाओं और अनंत कहानियां जुड़ी हुई हैं। आज मदन मोहन अपनी राधा रानी और ललिता सखी के संग विराजमान है। जिनकी छवि बहुत ही अद्भुत है जिसको देखने के लिए देश विदेश से लोग आते है और भक्ति की यमुना में गोते खाते है

इसलिए चटोरे मदन मोहन पड़ा नाम ! औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मूल मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए राजस्थान में स्थानांतरित कर दिया गया था और एक प्रतिकृति रखी गई थी |
मदन मोहन मंदिर को चटोरे मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर को चटोरे के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि मदन मोहन हर दिन नए नए व्यंजन खाने के लिए लालायित रहते थे और हर दिन सनातन गोस्वामी से कुछ नया बनाने के लिए कहते थे, इसी कारण उनका नाम चटोरे मदन मोहन पड़ गया।


मंदिर का निर्माण

यह मंदिर आज से 515 वर्ष पुराना है और इस मंदिर का एक अलग ही महत्व है। मदन मोहन मंदिर के सेवायत पुजारी अनादि मोहनदास ने मंदिर का इतिहास बताते हुए कहा कि इस मंदिर की नीव वह आज से 515 वर्ष पहले रखी गयी। बताया जाता है कि रामदास व्यापारी ने भगवान मदन मोहन का मंदिर बनवाया। व्यापारी द्वारा बनवाया गया मंदिर आज भी विश्व में अपनी ख्याति बिखेर रहा है। इस मंदिर के निर्माण से पहले मदनेश्वर महादेव मंदिर, सूर्य मंदिर ,सूर्य घाट, शीतला माता मंदिर और इसके साथ चार कुटिया भी उसी व्यापारी ने बनवाई थी।

यमुना की गहराई तक गहरी है मंदिर की नींव

मदन मोहन मंदिर की एक खास बात और है कि यह मंदिर यमुना से 70 फीट ऊंचा है और 70 फीट नीचे तक यमुना में इसकी नींव है । औरंगजेब के समय से ही यह मंदिर यहां बना हुआ है औरंगजेब ने इस मंदिर को कई बार तोड़ने का प्रयास किया लेकिन इस मंदिर को तोड़ नहीं पाया। वह हर बार पराजित होकर यहां से गया।


मदन मोहन जी का प्राक्ट्य


कहा जाता है कि मदन मोहन जी का जन्म यमुना जी से हुआ था। सुबह के समय मथुरा के श्री दामोदर चौबे की पत्नी यमुना में स्नान करने जाया करती थीं। एक दिन चौबे की पत्नी को मदन मोहन पानी में खेलते हुए मिले उन्होंने कई आवाजें लगाईं लेकिन उनकी आवाज सुनकर कोई नहीं आया तब चौबे की ने मदन मोहन को अपनी गोद में लिया और अपने घर ले आईं।

मदन मोहन ने चौबे की पत्नी से बचन लिया कि मैं तुम्हारे साथ जा तो रहा हूं लेकिन जिस दिन तुमने मुझे घर से निकलने के लिए कहा उसी दिन मैं घर से चला जाऊंगा। बड़े होकर मदन मोहन ने मथुरा के लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया। कभी किसी का माखन चुरा लेते थे तो कभी किसी का मिश्री चुरा लेते थे। मदन मोहन के इस कृत्य को देखकर मथुरा के लोग परेशान हो गए और मदन मोहन की शिकायत चौबे की पत्नी से कर दी।

(ये सब तो उनकी लीला थी असल मे उन्हे सनातन गोस्वामी जी के साथ जाना था जिससे आगे की लीला फलित होगी)

शिकायत के बाद वह बहुत तेज गुस्सा हुईं और मदन मोहन को डांटकर बोलींं कि तुम यहां से चले जाओ, इसके बाद वह सनातन गोस्वामी के साथ चले गए।

रास्ते में सनातन गोस्वामी ने मदन मोहन से वचन लिए कि जैसा मैं खिलाऊंगा वैसा खाओगे जैसा रखूंगा वैसा रहोगे तो मदन मोहन ने वचन देते हुए कहा कि आप जैसा खिलाओगे मैं वैसा खाऊंगा और जैसा रखोगे मैं वैसा रखूंगा। इतना कहकर सनातन गोस्वामी मदन मोहन को अपने साथ वृंदावन ले गए।

वृंदावन के टीले पर यह लोग रहने लगे और वृंदावन से वह आटा मांग कर लाते। उस आटे को यमुना जल में गूंथ कर उसकी बाटी बनाते और सनातन गोस्वामी पहले मदनमोहन को भोग लगाते उसके बाद खुद खाते। काफी लंबे समय तक ऐसा ही चलता रहा एक दिन मदन मोहन ने कहा कि मैं अरोनी बाटी नहीं खाऊंगा तो सनातन ने मदन मोहन से कहा कि मैंने आपसे वचन लिया था कि मैं जैसा आपको खिलाऊंगा वैसा आप खाएंगे और ध्यान रखूंगा वैसे रहेंगे।

अब मदन गोपाल तो ठहरे स्वभाव से ही चटोरे, एक दिन एक पंजाब के रहने वाले एक व्यापारी रामदास जोकि सेंधा नमक और फल का व्यापार करते थे वह दिल्ली से आगरा तक अपना व्यापार करते थे कुछ दिन बाद जब वह दिल्ली से चलकर आगरा के लिए जा रहे थे और उनके जहाज में फल और सेंधा नमक भरा हुआ था जैसे ही उनका जहाज वृंदावन पहुंचा तो उनका जहाज एक टीले पर अटक गया और कई घंटे बाद भी वह जहाज वहां से नहीं निकल पाया।

व्यापारी रामदास ने टीले पर एक बच्चे की आवाज सुनी तो व्यापारी जहाज से उतर कर बच्चे के पास गया बच्चे के पास सनातन गोस्वामी बैठे हुए थे और बच्चा यमुना में खेल रहा था। सनातन गोस्वामी से व्यापारी रामदास ने अपने साथ हुई घटना के बारे में बताया तो सनातन गोस्वामी ने कहा कि आपकी जो समस्या है उसका निदान यमुना के तीर में खेल रहा बच्चा कर सकता है आप उनके पास जाओ और उनसे जाकर बात करो।

व्यापारी रामदास मदन मोहन के पास गए और उनसे अपने साथ हुई घटना के बारे में बताया। मदन मोहन ने कहा कि तुम्हारे जहाज में क्या भरा हुआ है। उन्होंने बताया कि प्रभु मेरे जहाज में सेंधा नमक और फल भरे हुए हैं। मदन मोहन ने कहा तुम्हारा जहाज निकल तो जाएगा लेकिन उसके बदले मुझे क्या मिलेगा व्यापारी ने मदन मोहन से कहा कि मेरे जहाज में सेंधा नमक और फल भरा हुआ था जो कि पानी से खराब हो चुका है मैं आप को क्या दे सकता हूं।

व्यापारी से मदन मोहन से कहा कि आप अपने जहाज के पास जाइए जहाज आपका ठीक है और कोई सामान भी नुकसान नहीं हुआ है। व्यापारी अपने जहाज के पास गया तो उसने देखा कि जहाज में सेंधा नमक और फल की जगह हीरा जवाहरात पन्ना सोना-चांदी भरा हुआ था। यह देखकर व्यापारी रामदास लौट कर वापस उस बालक के पास गए और उनसे कहा प्रभु आप जैसा आदेश करें मैं वैसा करूंगा।

बताया जाता है कि बालक मदन मोहन ने ने अपना अभिषेक करने के लिए बोला, जैसे ही बालक का अभिषेक हुआ तो वह पत्थर में बदल गया।


सनातन गोस्वामी जी

सनातन गोस्वामी (1488-1558 ई.) चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य थे। उन्होंने ‘गौड़ीय वैष्णव भक्ति सम्प्रदाय’ के अनेकों ग्रन्थों की रचना की थी। अपने भाई रूप गोस्वामी सहित वृन्दावन के छ: प्रभावशाली गोस्वामियों में वे सबसे ज्येष्ठ थे।

सनातन गोस्वामी कर्णाट श्रेणीय पंचद्रविड़ भारद्वाज गोत्रीय यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। इनके पूर्वज कर्णाट राजवंश के थे और सर्वज्ञ के पुत्र रूपेश्वर बंगाल में आकर गंगातटस्थ बारीसाल में बस गए। इनके पौत्र मुकुंददेव बंगाल के नवाब के दरबार में राजकर्मचारी नियत हुए तथा गौड़ के पास रामकेलि ग्राम में रहने लगे। इनके पुत्र कुमारदेव तीन पुत्रों अमरदेव, संतोषदेव तथा वल्लभ को छोड़कर युवावस्था ही में परलोक सिधार गए जिससे मुकुंददेव ने तीनों पौत्रों का पालन कर उन्हें उचित शिक्षा दिलाई। इन्हीं तीनों को श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्रमश: सनातन, रूप तथा अनुपम नाम दिया।

सनातन का जन्म सं. 1523 के लगभग हुआ था तथा संस्कृत के साथ फारसी अरबी की भी अच्छी शिक्षा पाई थी। सन् 1483 ई. में पितामह की मृत्यु पर अठारह वर्ष की अवस्था में यह उन्हीं के पद पर नियत किए गए और बड़ी योग्यता से कार्य सँभाल लिया। हुसेन शाह के समय में यह प्रधान मंत्री हो गए तथा इन्हें दरबारे खास उपाधि मिली। राजकार्य करते हुए भी तीनों भाई परम भक्त, विरक्त तथा सत्संग प्रेमी थे।

श्री चैतन्य महाप्रभु का जब प्रकाश हुआ तब यह भी उनके दर्शन के लिए उतावले हुए, पर राजकार्य से छुट्टी नहीं मिली। इसलिए उन्हें पत्र लिखकर रामकेलि ग्राम में आने का आग्रह किया। श्री चैतन्य जब वृंदावन जाते समय रामकेलि ग्राम में आए तब इन तीनों भाइयों ने उनके दर्शन किए और सभी ने सांसारिक जंजाल से मुक्ति पाने का दृढ़ संकल्प किया।


एक प्रसंग

श्री सनातन गोस्वामी ने वृन्दावन आने के पश्चात सर्वप्रथम वृन्दावन देवी मंदिर की स्थापना की. इसके बाद वे महाप्रभु द्वारा दिये गये कार्य में लग गये. एक दिन मधुकरी के लिए श्री गोस्वामीजी मथुरा गये. श्री दामोदर चौबे के घर में श्री श्री मदन गोपाल की मूर्ति दिखी .उस मूर्ति को देखते ही उन्हें ऐसा लगा की उनके मन और प्राण चुरा लिए गये. अब उन्हें श्री मूर्ति की सेवा की इच्छा जाग्रत हुई. वे बार बार चौबे जी के घर जाते और मूर्ति को देखते. वह मूर्ति उन्हें बार बार अस्थिर कर देती. चौबे जी की पत्नी जितना ध्यान अपने पुत्र सदन का रखती थी उतना ही मदन का भी रखती थी. दोनों की बराबर सेवा करती थी. कहते हैं मदन गोपाल सदन के साथ उछल कूदा करते थे. श्री सनातन ने चौबे जी की पत्नी से कहा की तुम मदन गोपाल की सेवा बहुत मन से करती हो. वे तो ठीक है परन्तु वे भगवान् हैं, भगवान् की सेवा विशेष विधि विधान से होनी चाहिए. ये सुनकर ब्रजमाई ने कहा कि ठीक है मैं ध्यान रखूंगी|

अगली बार जब गोस्वामीजी उनके घर गये तो वह बोली, बाबा , मैंने आपके कहे अनुसार करने का प्रयास किया परन्तु मदन गोपाल को यह ठीक नही लगा. उन्होंने मुझे सपने में कहा की माँ तुम मुझमें और सदन में भेद करने लगी हो. सदन को तो अपने निकट रखती हो , मुझे इष्ट समझकर अपने से दूर कर देती हो. मुझे अच्छा नही लगता. अब तो गोस्वामी जी के आंसू रुकने का नाम नही ले रहे थे. उन्हें लगा की मैंने श्री मदन गोपाल को प्रेम वात्सल्य रस से कुछ समय दूर रखा


मंदिर की समय सारणी

मदन मोहन मंदिर में मंगला आरती केवल कार्तिक के महीने में होती है जो कि अक्टूबर और नवंबर के बीच में आता है ।

सुबह मंदिर खुलता है:- 6:00 AM – 11:00 AM
सांयकाल :5:00 PM – 9:30 PM


❑ रोज दर्शन करने के लिए व्हाट्सएप करे : 9460500125 ❑

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बांके बिहारी जी

आपने वृंदावन के बांके बिहारी जी की मान्यता के बारे में खूब सुना होगा। मथुरा के वृंदावन में बांके बिहारी जी का विशाल मंदिर है, जिसके प्रांगण मे हर दिन देश-विदेश से आए हुए भक्तों का तांता लगा रहता है।

यहाँ लाल जी के एक झलक के लिए उनके प्रेमी लालायित रहते है केवल वो ही नही बिहारी जी भी अपने भक्तों से मिलने के लिए हर दिन नये श्रृंगार का अपनी बांकी अदाओं से उनके मन मे अपनी प्रेम का संचार करते रहते है


मंदिर का इतिहास

श्री राधा वल्लभ मंदिर के पास स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1864 में हुआ था तथा यह राजस्थानी वास्तुकला का एक नमूना है। इस मंदिर के मेहराब का मुख तथा यहाँ स्थित स्तंभ इस तीन मंजिला इमारत को अनोखी आकृति प्रदान करते हैं।

कहा जाता है कि इस मन्दिर को स्वामी श्री हरिदास जी के अनुयायियों के द्वारा 1921 मे पुनर्निर्माण कराया गया था, मंदिर के निर्माण के प्रारंभ मे किसी का धन नही लगाया गया था। । यह नई संरचना एक वास्तुशिल्प चमत्कार है और अपनी भव्यता और भव्यता के साथ प्रभु की महिमा को श्रद्धांजलि देता है। कहा जाता है कि गोस्वामियों ने इस मंदिर के निर्माण में आर्थिक योगदान दिया था।

मंदिर वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति है, जिसे समकालीन राजस्थानी शैली में बनाया गया है। इस दिव्य संरचना की विशाल सुंदरता शिल्पकारों और बिल्डरों के कौशल के लिए बोलती है। यह उस कठिन परिश्रम और प्रयास को भी दर्शाता है जो इसके निर्माण में चला गया। परिसर के भीतर प्रचलित वातावरण इतना पवित्र है, कि मंदिर के धार्मिक और आध्यात्मिक उत्साह से मंत्रमुग्ध कर देता है।


बिहारी जी का श्री विग्रह

इस मंदिर में बांके बिहारी की काले रंग की प्रतिमा है। इस प्रतिमा में श्री श्यामा-श्याम का मिलाजुला रूप समाया हुआ है। यह वृंदावन के लोकप्रिय मंदिरों में से एक है। बनठन कर रहनेवाले व्यक्ति को हिन्दी में बांका कहा जाता है। अर्थात बांका जो भी होगा वह सजीला भी होगा या बनाव-श्रृंगार से सजीला बनता है।

जब सजीले सलोनेपन की बात आती है तो कृष्ण की छवि ही मन में उभरती है। कृष्ण जी का एक नाम बांकेबिहारी है । श्री कृष्ण हर मुद्रा में बांकेबिहारी नहीं कहे जाते बल्कि “होठों पर बांसुरी लगाए”, “कदम्ब के वृक्ष से कमर टिकाए” हुए,”एक पैर में दूसरे को फंसाए हुए” तीन कोण पर झुकी हुई मुद्रा में ही उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है.भगवान तीन जगह से टेढ़े है.होठ,कमर और पैर. इसलिए उन्हें त्रिभंगी भी कहा जाता है। यही त्रिभंगी रूप मे ही बांके बिहारी जी मंदिर मे विराजमान है जिनके वाम भाग मे राधा जी गादी पर विराजित होकर हमें अपने सेवा और दर्शन का सौभाग्य दे रहे है।


विग्रह के बारे मे

आनन्द का विषय है कि जब काला पहाड़ के उत्पात की आशंका से अनेकों विग्रह वृंदावन से स्थानान्तरित हुए, परन्तु श्रीबाँकेविहारी जी यहां से स्थानान्तरित नहीं हुए। आज भी उनकी यहां प्रेम सहित पूजा चल रही हैं। कालान्तर में स्वामी हरिदास जी के उपासना पद्धति में परिवर्तन लाकर एक नये सम्प्रदाय, निम्बार्क संप्रदाय से स्वतंत्र होकर सखीभाव संप्रदाय बना। इसी पद्धति अनुसार वृन्दावन के सभी मन्दिरों में सेवा एवं महोत्सव आदि मनाये जाते हैं।

  • श्रीबाँकेबिहारी जी केवल शरद पूर्णिमा के दिन श्री श्रीबाँकेबिहारी जी वंशीधारण करते हैं।
  • केवल श्रावन तीज के दिन ही ठाकुर जी झूले पर बैठते हैं
  • जन्माष्टमी के दिन ही केवल उनकी मंगला–आरती होती हैं। जिसके दर्शन सौभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं।
  • चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया के दिन ही होता है। इन चरण-कमलों का जो दर्शन करता है उसका तो बेड़ा ही पार लग जाता है।

इनके दर्शन की भी बड़ी निराली पद्धति है अन्य मंदिरों की भाँति इनके सामने सर झुकाया नही जाता बल्कि संतो का कहना है की इनके मोटे मोटे आँखों से अपनी आँखे मिला कर अपना सारा प्रेम उड़ेल देना चाहिए।

एक दिन प्रातःकाल स्वामी जी ने देखा कि उनके बिस्तर पर कोई रजाई ओढ़कर सो रहा हैं। यह देखकर स्वामी जी बोले– अरे मेरे बिस्तर पर कौन सो रहा हैं। वहाँ श्रीबिहारी जी स्वयं सो रहे थे। शब्द सुनते ही बिहारी जी निकल भागे। किन्तु वे अपने चुड़ा एवं वंशी, को विस्तर पर रखकर चले गये। स्वामी जी, वृद्ध अवस्था में दृष्टि जीर्ण होने के कारण उनकों कुछ नजर नहीं आय। इसके पश्चात श्री बाँकेबिहारीजी मन्दिर के पुजारी ने जब मन्दिर के कपाट खोले तो उन्हें लाल जी के पलने में चुड़ा एवं वंशी नजर नहीं आयी। किन्तु मन्दिर का दरवाजा बन्द था। आश्चर्यचकित होकर पुजारी जी निधिवन में स्वामी जी के पास आये एवं स्वामी जी को सभी बातें बतायी। स्वामी जी बोले कि प्रातःकाल कोई मेरे पंलग पर सोया हुआ था। वो जाते वक्त कुछ छोड़ गया हैं। तब पुजारी जी ने प्रत्यक्ष देखा कि पंलग पर श्रीबाँकेबिहारी जी की चुड़ा–वंशी विराजमान हैं।

यह कथा प्रमाण देता है कि श्रीबाँकेबिहारी जी रात को रास करने के लिए निधिवन जाते हैं। यही कारण है कि प्रातः श्रीबिहारी जी की मंगला–आरती नहीं होती हैं। रात्रि भर रास करके यहां बिहारी जी आते है। अतः प्रातः शयन में बाधा डालकर उनकी आरती करना अपराध हैं


बिहारी जी का प्राक्ट्य

स्वामी हरिदास से प्रसन्न होकर बांके बिहारी प्रकट हुए।
संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास जी भगवान श्री कृष्ण को अपना आराध्य मानते थे। उन्होंने अपना संगीत कन्हैया को ही समर्पित कर रखा था। वे अक्सर वृंदावन स्थित श्री कृष्ण की रास लीला स्थली निधिवन में बैठकर संगीत से अपने प्यारे कन्हैया लाल को रिझाया करते थे। जब भी स्वामी हरिदास श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन होते तो श्रीकृष्ण उन्हें दर्शन देते थे। एक दिन स्वामी हरिदास के शिष्य ने कहा कि बाकी लोग भी युगल सरकार (श्रीराधेकृष्ण की जोड़ी) के दर्शन करना चाहते हैं, उन्हें दुलार करना चाहते हैं। उनकी भावनाओं का ध्यान रखकर स्वामी हरिदास भजन गाने लगे।
जब श्री श्यामा-श्यामा ने उन्हें दर्शन दिए तो उन्होंने भक्तों की इच्छा उनसे जाहिर की। तब राधा कृष्ण ने उसी रूप में उनके पास ठहरने की बात कही। इस पर हरिदास ने कहा कि “प्यारे जू मैं तो संत हूं, तुम्हें तो कैसे भी रख लूंगा, लेकिन राधा रानी के लिए रोज नए आभूषण और वस्त्र कहां से लाउंगा।” भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और इसके बाद राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। स्वामी हरिदासजी के द्वारा निधिवन स्थित विशाखा कुण्ड से श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकटित हुए थे।कृष्ण राधा के इस रूप को स्वामी हरिदास ने बांके बिहारी नाम दिया। आज भी बांके बिहारी मंदिर मे भक्तो को नित्य अनुपम लीलाओ के दर्शन होते है, जो भी श्री वृंदावन धाम मे स्वच्छ मन से जाता है वह बिहारी जी के प्रेम वर्षा मे भीगे बिना रह नही सकता। श्री बाँकेबिहारी जी निधिवन में ही बहुत समय तक स्वामी जी द्वारा सेवित होते रहे थे। मन्दिर का निर्माण कार्य सम्पन्न हो जाने के पश्चात्, उनको वहाँ लाकर स्थापित कर दिया गया।

बिहारी जी के दर्शन की एक विशेष व्यवस्था गोस्वामियो द्वारा की गई है जिसे झांकी दर्शन कहते है। इसमे श्रीबिहारी जी मन्दिर के सामने के दरवाजे पर एक पर्दा लगा रहता है और वो पर्दा एक दो मिनट के अंतराल पर बन्द एवं खोला जाता हैं।

एक समय उनके दर्शन के लिए एक भक्त महानुभाव उपस्थित हुए। वे बहुत देर तक एक-टक से इन्हें निहारते रहे। रसिक बाँकेबिहारी जी उन पर रीझ गये और उनके साथ ही उनके गाँव में चले गये। बाद में बिहारी जी के गोस्वामियों को पता लगने पर उनका पीछा किया और बहुत अनुनय-विनय कर ठाकुरजी को लौटा-कर श्रीमन्दिर में पधराया। इसलिए बिहारी जी के झाँकी दर्शन की व्यवस्था की गई ताकि कोई उनसे नजर न लड़ा सके। बिहारी जी पर आस्था इतनी है कि दर्शनार्थ आये भक्तों में से एक जिन्हें आँखों से कुछ नहीं दिखता था,जिज्ञासा बस पूछा बाबा आप देखने में असमर्थ है, फिर भी बिहारी जी के दर्शन हेतु पधारे हैं। उन्होंने उत्तर दिया लाला मुझे नहीं दिखता है,पर बिहारी जी मुझे देख रहे हैं।


स्वामी श्री हरिदास जी

भक्त कवि, शास्त्रीय संगीतकार तथा कृष्णोपासक ‘सखी संप्रदाय’ के प्रवर्तक थे, जिसे ‘हरिदासी संप्रदाय’ भी कहते हैं। इन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है। इनकी छाप रसिक है। इनके जन्म स्थान और गुरु के विषय में कई मत प्रचलित हैं।

स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत 1536 में भाद्रपद महिने के शुक्ल पक्ष में अष्टमी के दिन वृन्दावन के निकट राजपुर नामक गाँव में हूआ था। इनके आराध्यदेव श्याम–सलोनी सूरत बाले श्रीबाँकेबिहारी जी थे। इनके पिता का नाम आशुधीर एवं माता का नाम श्रीमती चित्रा देवी था। इन्हें देखते ही आशुधीर देवजी जान गये थे कि ये सखी ललिताजी के अवतार हैं तथा राधाष्टमी के दिन भक्ति प्रदायनी श्री राधा जी के मंगल–महोत्सव का दर्शन लाभ हेतु ही यहाँ पधारे है।

हरिदासजी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली तथा यमुना समीप निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। युवा होने पर माता-पिता ने हरिदास का विवाह हरिमति नामक परम सौंदर्यमयी एवं सद्गुणी कन्या से कर दिया, किंतु हरिदास की आसक्ति तो अपने श्यामा-कुंजबिहारी के अतिरिक्त अन्य किसी में थी ही नहीं। उन्हें गृहस्थ जीवन से विमुख देखकर उनकी पतिव्रता पत्नी ने उनकी साधना में विघ्न उपस्थित न करने के उद्देश्य से योगाग्नि के माध्यम से अपना शरीर त्याग दिया और उनका तेज हरिदास के चरणों में लीन हो गया।

विक्रम सम्वत् 1560 में पच्चीस वर्ष की अवस्था में हरिदास वृन्दावन पहुँचे। वहाँ उन्होंने निधिवन को अपनी तपोस्थली बनाया। हरिदास जी निधिवन में सदा श्यामा-कुंजबिहारी के ध्यान तथा उनके भजन में तल्लीन रहते थे। स्वामीजी ने श्री प्रिया-प्रियतम की युगल छवि श्री बांकेबिहारीजी महाराज के रूप में प्रतिष्ठित की। हरिदासजी के ये ठाकुर आज असंख्य भक्तों के इष्टदेव हैं।

श्यामा-कुंजबिहारी के नित्य विहार का मुख्य आधार संगीत है। उनके रास-विलास से अनेक राग-रागनियां उत्पन्न होती हैं। ललिता संगीत की अधिष्ठात्री मानी गई हैं। ललितावतार स्वामी हरिदास संगीत के परम आचार्य थे। उनका संगीत उनके अपने आराध्य की उपासना को समर्पित था।

स्वामी हरिदास के शरीरान्त की तिथि मात्र संवत 1665 विक्रमी ठहरती है। उनकी रचनाएँ शैली में तुलसीदास की कविता से अधिक पूर्ववर्ती नहीं हैं, जिनका देहावसान संवत 1680 में हुआ था। अत: प्रत्येक दशा में निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे अकबर और जहाँगीर के शासनकाल में ईसवी की सोलहवीं शती के अन्त और सत्रहवीं शती के आरम्भ में विद्यमान रहे।


मंदिर कि आरतियाँ

श्री बांके बिहारी जी अति सुकुमार और विलासी ठाकुर माने गए अतः इस बात को ध्यान मे रखते हुए उनके भोग विलास मे कोई खलल ना पड़े, यहाँ केवल 4 आरतियाँ ही की जाती है,
वह इस प्रकार है :-

  • श्रृंगार आरती :- 07:45AM
  • राजभोग आरती :- 11:55PM
  • संध्या आरती :- 05:30PM
  • शयन आरती :- 09:30PM


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गोविंद देव जी

ठाकुर श्री गोविन्ददेवजी महाराज के वर्तमान मंदिर परिसर में विराजमान होते ही जैसे जयपुर का भाग्य उदय हो गया इसके पश्चात ही इनके अनुपम अलौकिक वरद हस्त के संरक्षण में18 नवम्बर सन 1727 को गंगापोल पर जयपुर की नींव का पत्थर लगाया गया। दीवान विद्याधर और नंदराम मिस्त्री द्वारा वास्तु और अंक ज्योतिष पर आधारित योजना के अनुसार सवाई जयसिंह द्वितीय ने इस शहर को बसाकर तैयार कर दिया।

मंदिर मे तो गोविंद देव जी देखने को ही विराजित है असल मे बसते तो ये जयपुर के लोगों की सांसों में हैं ! ठाकुर जी इन भक्तों के सर्वश है .. अपनी आस्था और विश्वास के इन स्रोत के लिये जयपुर वासियों का हृदय सहज ही पुकार उठता है :
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या दविणं त्वमेव, त्वमेव सर्व मम देव देव ।।

इन अहैतु के कृपा सरोवर से भक्ति की एक स्वर्गिक गंगा बह चली, वृन्दावन मानो जयपुर में जीवित हो उठा..!


मंदिर का इतिहास

गोविन्द देव जी मंदिर वृंदावन का निर्माण ई. 1590 (सं.1647) में हुआ। बादशाह अकबर के शासन काल क में उनके मशहूर सेनापती, आमेर टीला नामक स्थान पर वृन्दावन के विशाल एवं भव्य लाल पत्थर के मंदिर का निर्माण करवाया | श्री रूप गोस्वामीजी का गोलोकवास सन् १५६३ में हो चुका था और उनके उत्तराधिकारी के रूप में श्री हरिदासजी गोस्वामी भगवान गोविंद देव जी के एकल सेवाधिकारियों की कड़ी में उनके पश्चात दूसरे सेवाधिकारी बने ।

औरंगजेब के शासनकाल में जब यवनों का धार्मिक उन्माद अपनी चरम सीमा पर था, सन् 1669 में तत्कालीन सेवाधिकारी श्री शिवराम गोस्वामी इन श्रीविग्रहों को राधाकुंड और बरसाना होते हुए कामाँ और फिर गोविन्दगढ़ एवं खवा (जमवारामगढ़) ठहरकर, सन् 1707 में गोविन्दपुरा गाँव (रोपाडा) लेकर पधारे। इसके पश्चात ये आमेर घाटी में कनक वृन्दावन पहुँचे तथा फिर घाटी के ऊपर आमेर के जयनिवास में और अन्त में ये शिरोमणि श्रीविग्रह सिटी पैलेस के जयनिवास उद्यान में सूरज महल में प्रतिष्ठित हुए: और यह राजप्रासाद का सुरज महल वर्तमान के मंदिर श्री गोविंद देव जी महाराज में परिवर्तित हो गया है !


गोविंददेव जी का विग्रह


जैसी कि कथा सुनी है, गोविन्ददेवजी भगवान कृष्ण के पड़पोते श्री बज्रनाभ ने एक बार अपनी दादीजी से पूछा कि उन्होंने तो भगवान के स्वरूप के साक्षात दर्शन किये थे- कैसे थे वे? श्री बज्रनाभ शिल्प में स्वयं बहुत सिद्धहस्त थे, उनके प्रश्न के जवाब में जैसा जैसा वर्णन उनकी दादीजी ने किया उन्होंने वैसे ही श्रीविग्रह का निर्माण किया;परन्तु पहली प्रतिमा देखकर उनकी दादीजी बोली कि संपूर्ण तो नहीं लेकिन श्रीविग्रह के चरण भगवान के चरणारविंदों से मिलते हैं।श्री बज्रनाभ ने दूसरा श्रीविग्रह बनाया, इसबार उनकी दादीजी ने बताया कि इस श्रीविग्रह का वक्षस्थल भगवान को वक्षस्थल के सादृश्य है।श्री बजनाम ने फिर तीसरा श्रीविग्रह बनाया और इस श्रीविग्रह के मुखारविंद के दर्शन कर उनकी दादीजी ने घूँघट कर लिया तथा संकेत किया कि यही तो श्रीकृष्ण की ‘श्रीमुख-छवि है ! इसलिए इनके श्रीविग्रह को ‘बजकृत ‘ भी कहते हैं।

पहले श्रीविग्रह ठाकुर मदन मोहन के नाम से जाने गये, जो वर्तमान मे करौली मे विराजमान है।
दूसरे गोपिनाथजी के नाम से विख्यात हुए भगवान का यह स्वरुप पुरानी बस्ती में भव्य मंदिर में विराजित है। और तीसरे श्रीविग्रह जन-जन की साँसों में बसने वाले भगवान श्री गोविन्द देव जी इस भूमि को धन्य किया है

प्रभु की लीलाओं की नित्य सहचरी राधारानी भगवान् श्रीगोविन्ददेवजी के वाम भाग में विराजित हो कर सन् 1666 में मंदिर में प्रतिष्ठित हुई ।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार श्रीराधारानी का यह श्रीविग्रह वृंदावन मे ही था जो वहाँ सवीत और पूजित हो रहा था । यवनों के बढ़ते हुए भय से सुरक्षा हेतु वृहदभानु के स्वर्गवास के पश्चात उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र ने इस श्रीविग्रह को पुरी में चकवेध नामक स्थान पर प्रतिष्ठापित किया जहाँ ये ‘लक्ष्मी ठकुरानी’ के नाम से पूजित हुई। राजा प्रतापरुद्र के पश्चात उनके पुत्र राजा पुरूषोत्तम को जब यह मालूम हुआ कि गोविंद देव जी वृन्दावन में प्रगट हो चुके हैं तो उन्होंने को जो वास्तव में शक्ति स्वरूपा आद्याशक्ति श्रीराधारानी ही थीं, इस श्रीविग्रह वृन्दावन भेजा सन् 1666 (संवत 1690) में इनका विवाह समारोह रचाया गया था।

संवत 1764 की आसोज बुदी ग्यारस को (सन् १७२७) महाराजा जयसिंहजी द्वितिय ने ठाकुर जी की इत्र सेवा के लिये सखी विशाखा का श्रीविग्रह भेंट किया जो श्रीराम गोविंद देव जी महाराज के बाँयी ओर स्थापित किया गया। बाद मे सन् 1809 में पान (ताम्बूल) सेवा के लिये महाराजा सवाई प्रताप सिंह जी ने सखि ललिता का श्रीविग्रह ठाकुरजी को भेंट किया जिनको ठाकुर जी के दाहिनी ओर स्थापित किया गया।

भगवान शालिग्राम जी के विभिन्न श्रीविग्रह एक छोटे सिंहासन पर विराजित होकर श्रीराधा गोविंद देव जी के दाहिनी ओर मौजूद हैं ये काले कास्टी पत्थर के हैं और यह पूर्व सखियों के बीच भगवान श्रीकृष्ण का छोटा सा श्रीविग्रह है-यह ‘जुगल किशारी जू सिंहासन पर विराजित है


गोविंददेव जी का प्राक्ट्य

श्री गोविन्द देवजी, श्री गोपीनाथ जी और श्री मदन मोहन जी का विग्रह करीब पांच हजार साल प्राचीन माना गया है। श्री बज्रनाभ शासन की समाप्ति के बाद मथुरा और अन्य प्रांतों पर यक्ष जाति का शासन हो गया, यक्ष जाति के भय और उत्पाद को देखते हुए पुजारियों ने तीनों विग्रह को भूमि में छिपा दिया।

गुप्त शासक नृपति परम जो वैष्णव अनुयायी थे। इन्होंने भूमि में सुलाए गए स्थलों को खोजकर भगवान कृष्ण के विग्रहों को निकाल कर फिर से भव्य मंदिर बनाकर विराजित करवाया। इधर दसवीं शताब्दी में मुस्लिम शासक महमूद गजनवी के आक्रमण बढ़ गए थे तो फिर से इन विग्रहों को प्रथ्वी में छिपाकर उस जगह पर संकेत चिन्ह अंकित कर दिए गये।

कई वर्षो तक मुस्लिम शासन रहने के कारण पुजारी और भक्त इन विग्रह के बारे में भूल गए। सोलहवीं सदी में ठाकुरजी के परम भक्त चैतन्यू महाप्रभु ने अपने दो शिष्यों रुप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी को वृन्दावन भेजकर भगवान श्रीकृष्ण के लीला स्थलों को खोजने के लिये कहा। दोनों शिष्यों ने मिल के भगवान श्री कृष्ण के लीला स्थलों को खोजा।

इस दौरान भगवान श्रीगोविन्द देवजी ने रुप गोस्वामी को सपने में दर्शन दिए और उन्हें वृन्दावन के गोमा टीले पर उनके विग्रह को खोजने को कहा। सदियों से भूमि में छिपे भगवान के विग्रह को ढूंढकर श्री रुप गोस्वामी ने एक कुटी में विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की। उस समय के मुगल शासक अकबर के सेनापति और आम्बेर के राजा मानसिंह ने इस मूर्ति की पूजा-अर्चना की। सन 1590 में वृन्दावन में लाल पत्थरों का एक सप्तखण्डी भव्य मंदिर बनाकर भगवान के विग्रह को विराजित किया। मुगल साम्राज्य में इससे बड़ा और कोई देवालय नहीं बना था।


श्री रूप और सनातन गोस्वामी जी

सनातन गोस्वामी (1488-1558 ई.) चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य थे। उन्होंने ‘गौड़ीय वैष्णव भक्ति सम्प्रदाय’ के अनेकों ग्रन्थों की रचना की थी। अपने भाई रूप गोस्वामी सहित वृन्दावन के छ: प्रभावशाली गोस्वामियों में वे सबसे ज्येष्ठ थे।

.श्री रूप गोस्वामी (1496 – 1564), वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षण्गोस्वामी में से एक थे। वे कवि, गुरु और दार्शनिक थे। ये सनातन गोस्वामी के भाई थे।

इन दोनो भाइयो पर श्री राधारानी की अहेतु की कृपा थी जिसके कुछ प्रसंग इस प्रकार है


प्रथम प्रसंग

एक बार रूप गोस्वामी राधाकुंड के किनारे बैठकर ग्रन्थ लेखन में इतने खो गए कि उन्हें ध्यान ही न रहा कि सूरज ठीक सिर के ऊपर आ गए हैं।
झुलसाती गर्मी के दिन थे किन्तु रूप गोस्वामी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था वह निरंतर
लिखते ही जा रहे थे। दूर से आते हुए श्रील सनातन गोस्वामी ने देखा कि रूप भाव मग्न होकर लेखन कर रहे हैं…. एवं एक नवयुवती उनके पीछे खडी हो कर अपनी चुनरी से रूप गोस्वामी को छाया किये हुए है।

सनातन जैसे ही निकट पहुंचे तो देखा कि वह नवयुवती तपाये हुए सोने के रंग की एवं इतनी सुन्दर थी कि माता लक्ष्मी, पार्वती एवं सरस्वती की सुन्दरता को मिला दिया जाये तो इस नवयुवती की सुन्दरता के समक्ष तुच्छ जान पड़ते। वह नवयुवती सनातन की ओर देख कर मुस्कुराई और अन्तर्धान हो गई। सनातन ने रूप को डांटा और कहा तुम्हें तनिक भी ध्यान है कि तुम क्या कर रहे हो ?

हम लोग भगवान् के सेवक हैं और सेवक का काम है स्वामी की सेवा करना ना कि स्वामी से सेवा स्वीकार करना। अतः तुम इस प्रकार श्रीराधारानी से कैसे सेवा करवा सकते हो, आज ही तुम अपने लिए एक कुटिया बनाओ ताकि दुबारा श्रीराधारानी को तुम्हारी वजह से कष्ट ना उठाना पड़े।


द्वितीय प्रसंग

राधाकुण्ड सेवा के दौरान श्री रूप गोस्वामीजी ने कई ग्रंथों की रचना की, एक दिन उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में राधारानी के बालों की चोटी की महिमा में लिखा कि-राधारानी के बालों की चोटी काले नाग की तरह है जो उनके कमर पर ऐसे लहराती है जैसे कोई काला विषधर भुजंग लहरा रहा हो। रूप गोस्वामी के बड़े भाई श्री सनातन गोस्वामी ने जब यह पढ़ा तो उन्होंने श्री रूप गोस्वानी को इसके लिए डांट लगाईं और कहा तुम्हें कोई बढ़िया उपमा नहीं मिली ? राधारानी की चोटी को तुम विषधर भुजंग कहते हो, इसमें तुरन्त सुधार करो।

यह आदेश देकर श्री सनातन गोस्वानी स्नान हेतु यमुनाजी की ओर चल दिए, मार्ग में एक वन पड़ा और वन में श्री सनातन गोस्वामी ने देखा कि वन के एक कोने में कुछ नवयुवतियाँ एक पेड़ में झूला बनाकर झूल रही हैं। एक नवयुवती झूले में बैठी थी एवं बाकी युवतियाँ उसे घेरे हुए थी और उसे झूला झुला रही थीं। सनातन गोस्वामी ने देखा कि जो नवयुवती झूला झूल रही है उसकी पीठ पर एक काला नाग चढ़ रहा है जो किसी भी समय उस नवयुवती को डस सकता है। सनातन गोस्वामी दौड़ते हुए उन नवयुवतियों की ओर भागे और जोर से चिल्लाए- ओ लाली जरा देखो तो तुम्हारी पीठ पर एक बड़ा ही भयंकर काला नाग चढ़ा जा रहा है सावधान रहो। किन्तु युवतियों ने उनकी आवाज नहीं सुनी और झूलने में व्यस्त रहीं।

दौड़ते हुए सनातन उन नवयुवतियों के निकट पहुँचे और फिर से उन्हें सावधान किया, उनकी आवाज सुनकर झूले में बैठी हुए अति सुन्दर नवयुवती ने झूले में बैठे-बैठे ही मुड़कर सनातन गोस्वामी को देखा और मुस्कुरा कर अपनी समस्त सखियों के साथ अन्तर्धान हो गई।

सनातन उसी समय वापस मुड़े और रूप गोस्वामी के निकट जाकर बोले- “अपने लेखन में सुधार करने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुमने ठीक ही लिखा है राधारानी की चोटी सचमुच काले नाग जैसी ही है।”


मंदिर कि आरतियाँ

दैनिक सेवा अष्टयाम सेवा के नाम से जानी जाती है। दर्शनार्थियों के लिये दैनिक सात झाकियाँ खोली जाती हैं। प्रत्येक झांकी के अपने मधुर भजन कीर्तन होते हैं जो या तो हिन्दी में हैं या फिर बंगाली में। जब कीर्तन अपने पूरे समाँ में होते हैं तो ऐसा लगता है मानो स्वयं प्रभु भी आनंद से भक्तो के साथ झूम रहे है !

  1. मंगला आरती :- 04:30 AM
  2. धूप आरती :- 07:45 AM
  3. श्रृंगार आरती :- 09:45 AM
  4. राजभोग आरती :- 11:15AM
  5. ग्वाल आरती :- 05:30PM
  6. संध्या आरती :- 06:30PM
  7. शयन आरती :- 08:45PM


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