अक्षय तृतीया, जिसे ‘आखा तीज’ भी कहा जाता है, सनातन धर्म में एक ‘अबूझ मुहूर्त’ है।
यानी इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती। 20 अप्रैल 2026 को आने वाली यह तिथि इस बार विशेष संयोग लेकर आ रही है।
आइए, इस पावन पर्व के हर पहलू को गहराई से समझते हैं।
1. वृंदावन धाम में ‘चंदन यात्रा’ का दिव्य उत्सव

वृंदावन के लिए अक्षय तृतीया केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक उत्सव है। यहाँ से मंदिरों में चंदन यात्रा शुरू होती है जो अगले 21 दिनों तक चलती है।
- शीतलता की सेवा: ब्रज के रसिक भक्त अपने आराध्य को भीषण गर्मी से बचाने के लिए पूरे शरीर पर चंदन का लेप लगाते हैं।
- श्री बांके बिहारी के चरण दर्शन: साल में केवल एक बार होने वाले ठाकुर जी के ‘चरण दर्शन’ के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं।
माना जाता है कि इन चरणों के दर्शन मात्र से जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जाते हैं। - इतर सेवा : इसी दिन से आपको सेवा में चन्दन इतर, परफ्यूम आदि का प्रयोग करना चाहिये
- भोग सेवा : आज से ठंडाई शरबत और शीतलता प्रदान करने वाले भोग श्री जी को लगाने चाहिये
2. श्री राधावल्लभ मंदिर की अनूठी परंपरा

राधावल्लभ संप्रदाय में अक्षय तृतीया का स्वरूप अत्यंत सुकोमल और रसमय होता है।
- श्रृंगार: ठाकुर श्री राधावल्लभ लाल को मलयगिरि चंदन से सर्वांग सुशोभित किया जाता है। भारी पोशाकों की जगह झीने मलमल के वस्त्र और मोगरे के फूलों के आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं।
- विशेष भोग: इस दिन सत्तू (जौ और चने का आटा) का विशेष भोग लगता है। सत्तू को शीतलता का प्रतीक माना जाता है।
साथ ही आम का पना, खरबूजा और ककड़ी जैसे शीतल फल अर्पित किए जाते हैं। - समाज गायन: मंदिर के प्रांगण में रसिक संत ‘हित चौरासी’ के पदों का गायन करते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
3. पौराणिक कथाओं का अक्षय भंडार
यह दिन इतिहास की कई निर्णायक घटनाओं का साक्षी है:
- अक्षय पात्र का वरदान: भगवान सूर्य ने पांडवों को वह पात्र दिया जिसने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा।
यह हमें सिखाता है कि धर्म के मार्ग पर चलने वालों की झोली कभी खाली नहीं रहती। - गंगा अवतरण और भगीरथ तप: इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से उतरकर शिव की जटाओं के मार्ग से धरती पर आईं, जिससे कोटि-कोटि जीवों का उद्धार हुआ।
- युग परिवर्तन: सतयुग का अंत और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से माना जाता है।
- वेदव्यास और गणेश का संकल्प: महाभारत जैसे महाग्रंथ की पहली पंक्ति इसी दिन लिखी गई थी।
4. सुदामा की मैत्री और परशुराम का शौर्य
- अक्षय मैत्री: जब निर्धन सुदामा द्वारकाधीश कृष्ण से मिले, तो कृष्ण ने उनके दो मुट्ठी चावल के बदले उन्हें तीनों लोकों का ऐश्वर्य ‘अक्षय’ कर दिया।
- शक्ति का प्राकट्य: भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का प्राकट्य इसी दिन हुआ, जो शस्त्र और शास्त्र दोनों के समन्वय का प्रतीक हैं।
5. जगन्नाथ पुरी और नव-निर्माण
ओडिशा के पुरी में इसी दिन से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के रथों (नंदीघोष, तालध्वज और देवदलन) का निर्माण शुरू होता है।
हज़ारों कारीगर पवित्र लकड़ी से विशाल रथों को आकार देना शुरू करते हैं, जो आने वाली रथ यात्रा की तैयारी है।
अक्षय तृतीया पर क्या करें? (विशेष सुझाव)
- दान का महत्व: इस दिन जल से भरे घड़े (कलश), पंखा, सत्तू, छाता और खरबूजे का दान अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- स्वर्ण निवेश: मान्यता है कि इस दिन खरीदा गया सोना या संपत्ति कभी कम नहीं होती, बल्कि उसमें निरंतर वृद्धि होती है।
- भक्ति: यदि संभव हो, तो इस दिन वृंदावन की पावन रज में प्रणाम करें या घर पर ही ठाकुर जी को चंदन अर्पित करें।
अक्षय तृतीया हमें संदेश देती है कि हमारे अच्छे कर्म, हमारी भक्ति और हमारा दान कभी नष्ट नहीं होता। यह दिन नई शुरुआत और अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को ‘अक्षय’ करने का है।
बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय! श्री राधावल्लभ लाल की जय!
