कुसुम सरोवर – Kusum Sarovar

कुसुम सरोवर – Kusum Sarovar

श्री गिरिराज महाराज की सप्तकोसीय परिक्रमा में कुसुम वन क्षेत्र में स्थित कुसुम सरोवर, ब्रज के अति प्राचीन पांच प्रमुख सरोवरों में से एक है। कुसुम सरोवर के प्राचीन कच्चे कुंड को ओरछा (मध्य प्रदेश) के राजा बीर सिंह जू देव ने 1619 में पक्का कराया था। सन 1723 में भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल ने इसे कलात्मक स्वरूप प्रदान किया। महारजा सूरजमल के पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने 1768 में यहां अपने पिता और अपनी तीनों माताओं की याद में एक ऊंचे चबूतरे पर अत्यंत कलात्मक छतरियों का निर्माण कराया। जो कि स्थापत्यकला कला की एक बेजोड़ मिसाल है।

उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में 20 किलोमीटर दूर गोवर्धन कस्बे से लगभग 2 किलोमीटर दूर राधाकुंड परिक्रमा मार्ग पर स्थित है ऐतिहासिक कुसुम सरोवर। जो 450 × 450 फीट लंबा और 60 फीट गहरा है।
पौराणिक महत्व के अनुसार कुसुम सरोवर से जुड़ी कई पौराणिक उल्लेख मिलते हैं। इसमें सबसे अहम है श्रीराधा रानी और श्री कृष्ण जी मधुर लीला । ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण, राधा जी से छिप-छिप कर कुसुम सरोवर पर ही मिला करते थे। एक समय राधा रानी और सारी सखियां भगवान कृष्ण के लिए फूल चुनने कुसुम सरोवर गोवेर्धन ही जाया करतीं थीं। कुसुम सरोवर गोवर्धन के परिक्रमा मार्ग में स्थित एक रमणीक स्थल है जो अब सरकार के संरक्षण में है। यहां पर श्री कुसुमवन बिहारी जी का प्राचीन मंदिर भी है।

सरोवर की खासियत
इस सरोवर के चारों तरफ सैंकड़ों सीढ़ियां हैं। इस सरोवर के ईर्द-गिर्द ढेरों कदम्ब के पेड़ हैं और कहा जाता है कि कदम्ब का पेड़ भगवान कृष्ण को बेहद पसंद है और यही वजह है कि सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर से मथुरा-वृंदावन आने वाले श्रद्धालु कुसुम सरोवर जाना नहीं भूलते। इस सरोवर का पानी तैरने के लिहाज से बेहतर माना जाता है और यहां आने वाले पर्यटक बेहतरीन समय बिता सकते हैं। कुसुम सरोवर के आसपास कई आश्रम और मंदिर भी हैं। साथ ही यहां की शाम की आरती भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
मथुरा से टैक्सी, ऑटो रिक्शा या प्राइवेट कार के जरिए आसानी से कुसुम सरोवर पहुंचा जा सकता है।

कुसुम सरोवर ब्रज की एक अनूठी धरोहर है, मगर सरकार द्वारा समुचित रख रखाव नही किया जा रहा है।
कुसुम सरोवर का एक सुंदर प्रसंग

एक समय राधा रानी और सारी सखियाँ फूल चुनने कुसुम सरोवर गोवर्धन में पहुँची, राधा रानी और सारी सखियाँ फुल चुनने लगी और राधा रानी से बिछड़ गयी और राधा रानी की साड़ी कांटो में उलझ गई।

इधर कृष्ण को पता चला के राधा जी और सारी सखियाँ कुसुम सरोवर पे है। कृष्ण माली का भेष बना कर सरोवर पे पहुँच गये और राधा रानी की साड़ी काँटो से निकाली और बोले हम वन माली है इतने में सब सखियाँ आ गई।

माली रूप धारी कृष्ण बोले हमारी अनुपस्थिति मे तुम सब ने ये बन ऊजाड़ दिया इसी नोक झोक मे सारे पुष्प पृथ्वी पे गिर गये। राधा रानी को इतने मे माली बने कृष्ण की वंशी दिख गई और राधा रानी बोली ये वन माली नही वनविहारी है। राधा रानी बोली ये सारे पुष्प पृथ्वी पे गिर गये और इनपे मिट्टी लग गई कृष्ण बोले मे इन्हें यमुना जल में धो के लाता हूँ। राधा रानी बोली तब तक बहुत समय हो जायेगा हमे बरसाना भी जाना है। तब कृष्ण ने अपनी वंशी से एक सरोवर का निर्माण किया जिसे आज कुसुम सरोवर कहते हैं

“पुष्प धोये और राधा रानी की चोटी का फुलों से श्रृंगार किया। राधा रानी हाथ में दर्पण लेकर माली बने कृष्ण का दर्शन करने लगी। आज भी कुसुम सरोवर पर प्रिया-प्रियतम जी का पुष्पो से श्रृंगार करते है पर हम साधारण दृष्टी बाले उस लिला को देख नहीं पाते !

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