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स्वामिनी राधिका



श्रीकिशोरी जु का एक एक मधुर मधुर नाम, जिसकी मधुरता में गुँथित उनका प्रेम, उनका माधुर्य, उनकी नवलता, उनकी कोमलता, उनकी प्रेममयता, उनकी उज्जवलता, उनकी स्निग्धता…..न बरणो जावै री… साँची कहूँ न बरणो जावै। जे तो लोभ होय री जाकी मधुरता के पान कौ , याकी कृपा सौं मधुर मधुर नामावली कौ पान करूँ री अपने श्रवण पुट सौं ।कोटि कोटि माधुर्यमई नाम धारण करने वाली मेरी स्वामिनी श्रीराधिके …..आह री ! कैसी शीतलता उतरे है री एक बार पुनः पुकार लेऊँ री मेरी स्वामिनी श्रीराधिके …..

साँची कहूँ री , जिव्हा स्थिर ही होई जावै री , कछु और कहते ही न बने री …कहूँ भी क्यों री …जेई की मधुर मधुर नामावली में डूबी रहूँ री …कभी डबड़बाते नेत्रों से रुन्धती हुई वाणी से पुकारूँ तो कभी लाड में भर भर पुकारूँ, कभी याचक बन स्वामिनी की एक कृपा कटाक्ष की याचना करूँ री …..हा किशोरी कौन भाँति तुमको रिझाऊँ, कौन सौं नाम से तुम्हें पुकारूँ । आपकी चरण रज का एक एक अणु अनन्त कोटि माधुर्य समेटे हुए है किशोरी जु …हा स्वामिनी …और कछु कहते ही न बने मेरी स्वामिनी श्रीराधिके मेरी स्वामिनी श्रीराधिके…..

सखी ! तू भी पुकारेगी न मेरे सँग स्वामिनी जु के ये मधुर मई नाम, अपने कर्णपुटों मे इस अमृत को भर ले , हृदय की गहराइयों से बस एक ही नाम पुकार बन बन उठे मेरी स्वामिनी श्रीराधिके ….

हे स्वामिनी ! हे बिहारिणी ! हे किशोरी ! हे प्रफुल्लै ! हे नववय ! हे निहारिणी ! हे नवयौवनी ! हे विस्मृते ! हे सुखगामिनी ! हे मनहरचातिकी ! हे बसंते ! हे नवक्रीडे ! हे मनोरमे ! हे नवसाजिनी ! हे रसकामिनी ! हे विपुले ! हे उत्सवे ! हे उन्मादिते ! हे सौभाग्य ! हे नवपोषिते ! हे स्वामिनी ! हे रसाम्रते ! हे निहारिणी ! हे निभृते ! हे मदनमदनी ! हे केलिकामिनी ! हे अभिरामिनी ! हे धवले ! हे कौमार्या ! हे स्फुरणे ! हे वनमालिके ! हे नवसाजिनी ! हे विपुले ! हे उन्मादिते !……..

जयजय श्रीश्यामाश्याम जी!!

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