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श्री जी को कौन सी वस्तु प्रिय है?

जब हम अपनी छोटी कुटिया में थे २४ घंटे में थोडा सा मिश्री का भोग लगाते थे, जिस दिन मनोकरी मांगने नहीं गए श्री जी को ज़रा सा मिश्री भोग लगा दिया और वही पा लिया , भावना भाव से कढ़ी, चावल, फुल्का सब भावना से कर दिया थोड़ी मिश्री रखदी भोग लगाया और पा लिया पानी पि लिया बस , मनोकरी मांगने गए तो रोटी मिली जो मिली वो श्री जी को सामने दिखा दिया, श्री जी को बाहरी भोग नहीं चाहिए वो तो है अपनी दिनचर्या चलानी है बस इसलिए, श्री जी को आप से प्यार है उनको आप चाहिए , आप अपने को समर्पित कर दीजिये, अब देह पोषण के लिए मुझे जल चाहिए , मुझे भोजन चाहिए वही भोजन और जल जो श्री जी ने ही हमको दिया है श्री जी को अर्पित कर देते है और पा लेते है I
श्री जी की प्रशंसता का विषय इतर , मिठाई, फल, भोग नहीं है अगर ऐसा हो तो इसी से प्रशंस हो जाये पर ऐसा कही नहीं पाया गया है श्री जी की प्रशंसता का हित है श्री जी के प्रति आत्मसमर्पण कर देना I
हे राधे शरीर से मन से वाणी से मैं आपके आश्रित हो गया , श्री जी का स्मरण करना खास बाते है प्रभु की प्रशंसता प्रभु के मिलने का उपाय सहज भाव से प्रभु का मनन चिंतन एवं उनके प्रति समर्पित हो जाना यही सबसे बड़ी प्रभु की प्रशंसता का विषय है
हाँ अगर अप सक्षम है तो आप करिए कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर नहीं है तो कोई आवश्यकता है ही नहीं जो स्वाभाविक आपके पास हो प्रिय प्रीतम को अर्पित करके ग्रहण करो, बाहरी प्रसाद से शरीर का पोषण होता है और भाव से स्वरुप पोषण होता भजन रुपी प्रसाद से स्वरुप पोषित होता है श्री जी को भोग नहीं चाहिए श्री जी को सिर्फ आप का भाव चाहिए

जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश

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