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“सखी सम्प्रदाय” क्या होता है ?

अक्सर हम वृंदावन में स्त्रियों की तरह सोलह-श्रृंगार किये हुये पुरुषों को देखते हैं, जो कि बहुत मस्त भाव से श्रीकृष्ण को रिझाते हुये उनके आगे नृत्य करते हैं। जो लोग उनके इस भाव को नहीं जानते हैं उनके मन में उन्हें देख कई तरह के विचार आते हैं। ये कौन हैं, क्या रूप बना रखा है, स्त्रीवेश में क्यों घुमते हैं, इत्यादि।

ये लोग सखी सम्प्रदाय के होते हैं, जिसे सखीभाव सम्प्रदाय भी कहा जाता है। सखी सम्प्रदाय, निम्बार्क मत की एक शाखा है जिसकी स्थापना स्वामी हरिदास (जन्म सं० १४४१ वि०) ने की थी। इसे हरिदासी सम्प्रदाय भी कहते हैं। इसमें भक्त अपने आपको श्रीकृष्ण की सखी मानकर उसकी उपासना तथा सेवा करते हैं और प्रायः स्त्रियों के भेष में रहकर उन्हीं के आचारों, व्यवहारों आदि का पालन करते हैं। सखी सम्प्रदाय के ये साधु अधिकतर ब्रजभूमि में ही निवास करते हैं।

स्वामी हरिदास जी के द्वारा निकुंजोपासना के रूप में श्यामा-कुंजबिहारी की उपासना-सेवा की पद्धति विकसित हुई, यह बड़ी विलक्षण है। निकुंजोपासना में जो सखी-भाव है, वह गोपी-भाव नहीं है। निकुंज-उपासक प्रभु से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि उसके समस्त कार्य अपने आराध्य को सुख प्रदान करने हेतु होते हैं। श्री निकुंजविहारी की प्रसन्नता और संतुष्टि उसके लिए सर्वोपरि होती है।

यह सम्प्रदाय “जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझे सो ही भेष धरूंगी” के आधार पर अपना समस्त जीवन “राधा-कृष्ण सरकार” को न्यौछावर कर देती है। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को “सोलह सिंगार” नख से लेकर चोटी तक अलंकृत करते हैं। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को सखी के रूप में मानते हैं, यहाँ तक कि रजस्वला के प्रतीक के रूप में स्वयं को तीन दिवस तक अशुद्ध मानते हैं।

ऐसे ही कोई भी व्यक्ति सखी नहीं बन जाता, इसके लिए भी एक विशेष प्रक्रिया है जो की आसान नहीं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति पहले साधु ही बनता है, और साधु बनने के लिए गुरु ही माला-झोरी देकर तथा तिलक लगाकर मन्त्र देता है। तथा इस साधु जीवन में जिसके भी मन में सखी भाव उपजा उसे ही गुरु साड़ी और श्रृंगार देकर सखी की दीक्षा देते हैं। निर्मोही अखाड़े से जुड़े सखी सम्प्रदाय के साधु अथवा सखियाँ कान्हा जी के सामने नाच कर तथा गाकर मोहिनी सूरत बना उन्हें रिझाते हैं।

सामान्यतया सभी सम्प्रदायों की पहचान पहले उनके तिलक से होती है, उसके बाद उनके वस्त्रों से। गुरु रामानंदी सम्प्रदाय के साधु अपने माथे पर लाल तिलक लगाते हैं और कृष्णानन्दी सम्प्रदाय के साधु सफेद तिलक, जो की राधा नाम की बिंदिया होती है, लगाते हैं और साथ ही तुलसी की माला भी धारण करते हैं।

सखी सम्प्रदाय से जुडी एक और बात बहुत दिलचस्प है की इस सम्प्रदाय में कोई स्त्री नहीं, केवल पुरुष साधु ही स्त्री का रूप धारण करके कान्हा को रिझाती हैं। सखी सम्प्रदाय की भक्ति कोई मनोरंजन नहीं बल्कि इसमें प्रेम की गंभीरता झलकती है, और पुरुषों का यह निर्मल प्रेम इस सम्प्रदाय को दर्शनीय बनाता है।
“जय जय श्री राधे”