श्री राधा चरितामृतम् (16-30)

श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 16

( प्रिया प्रियतम का प्रथम मिलन)


लो प्यारे मेरा सब कुछ ले लो तन ले लो मन ले लोबुद्धि ले लो मेरा अहंकार भी ले लो

यही है श्रीराधाभावमाधव माधव रटते माधवबन जाना

बड़ा मुश्किल हैबड़ा कठिन काम हैराधा का माधव होना राधा सब कुछ छोड़ सकतीं हैंपर राधात्व कैसे छोड़ दें

पर राधा को भी तो माधव बननें की बैचैनी हैवो तड़फ़ उठती हैं और उस प्रेम की पीर में वो भी जब पुकार उठेंराधा राधा

तब राधा भाव पूर्ण होता है

श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी भादौं के अँधेरे पक्ष में होता है समस्त जगत के अंधकार को पीकर श्रीकृष्ण चन्द्र उदित होते हैंऔर श्रीराधा राधा का जन्म होता है भादौं अष्टमी में पर उजियाली रात में यानि अपनें पूरे गोरे रँग को इसी में लगानें के लिये कि इस कारे को मैं गोरा करके रहूँगी

पर हो जाता है सब कुछ उल्टा पुल्टा ये प्रेम हैउफ़

आज प्रथम मिलन होगा यमुना के कूल में इन दोनों सनातन प्रेमियों काप्रतीक्षा है सबको इस मिलन की आस्तित्व स्वयं प्रतीक्षारत हैये कहते हुए महर्षि शाण्डिल्य आज मदमाते हो रहे थे

नन्दगाँवबस चुका है अद्भुत प्रिया हैं श्रीराधा कि अपनें प्रियतम को अपनें पास बुलाकर ही मानीं

बरसानें की भूमि ही तो है ये नन्दगाँव बृषभान ही अधिपति हैं इसके यानि बृषभानुजा ही इस नन्दगाँव की स्वामिनी हैं

श्रीधाम वृन्दावन दिव्यातिदिव्य है ये और खिल उठा है

क्यों की अब पिय प्यारीका मिलन यहीं तो होगा

प्रकृति स्वयं को सजानें में व्यस्त है लाडिली लाल को अच्छा लगे

सेवा में तो सब लगे हैं जी

आज ऐसे ही यमुना के पुलिन में घूमते हुये थोडा दूर चले गए कृष्ण मुग्ध हो गए वहाँ वन की शोभा देखकर

वन नें भी स्वागत किया कृष्ण काहवा मन्द सुगन्ध वह चली

पक्षियों नें कलरव करके गान सुनाना शुरू कर दिया

अपलक देख रही हैं हिरणियाँ

फूलों में भौरों नें गुँजार कियाअरे वज्रनाभ जो जो कमल खिले नही थे वो भी इन को देखकर खिल गए धूप तेज़ हो इसके लिये बादलों नें छत्र लगा दिया हल्की बूँदें पड़नें लगीं

मुस्कुराते हुये आकाश की देखा नन्दनन्दन नें देवता धन्य हो गए

आनन्दस्वरूप स्वयं ही अपनें ही आनन्द को अभिव्यक्त करना चाह रहे थे

तो क्या करें ? अपनी फेंट से बाँस की बाँसुरी निकाली

अपनें कोमल गुलाबी पतले अधर में बाँसुरी को रखा

और मार दी फूँक

ओह प्रकृति मानों स्तब्ध हो गयी पक्षी जो अब तक कलरव कर रहे थे उन्होंने तो मानों एकाएक मौन व्रत ही धारण कर लिया

बज रही थी बांसुरीजड़ भी कंपित हो उठे थे फिर चेतन की कौन कहे

पर ये क्या शताधिक मोर पता नही कहाँ से आगये थे

और सब नाचनें लगे अपनें अपनें पंखों को फैलाकर घूमते अपनें पंखों को हिलातेफिर नाचते

मुरली मनोहर नें बाँसुरी भी तो आज पहली बार ही बजाई थी

वज्रनाभ स्थान होता है हर स्थान पर हर कार्य नही होते

बाँसुरी वृन्दावन में ही बज सकती है मथुरा में कुरुक्षेत्र में द्वारिका में

पर मोर रुक गए नाचते नाचते श्याम सुन्दर भी रुक गए

पर वो सब मोर एक साथ किसी स्थान पर चल दिए थे

कृष्ण रुके मोरों नें मुड़कर कृष्ण को इशारा किया आओ हमारे पीछे पीछे आग्रह था उन प्रेमी पक्षियों का कैसे टाल देते और ये मोर भी तो इस वृन्दावन के थे चल दिए पीछे

कृष्ण आनन्द विभोर हो रहे हैं कहीं से सुगन्ध आरही थीऔर जहाँ से ये सुगन्ध आरही थी मोर उसी ओर ही तो जा रहे थे

सरोवर है बड़ा सुन्दर सरोवर है उस सरोवर के चार घाट हैं सीढ़ियां मणि माणिक्य से बने हैं सरोवर का जल अंत्यंत निर्मल है मोर वहीँ ले गए थे कृष्ण को

सरोवर के जल में कोई गौर वर्णी सुन्दरता की मानों देवी बैठी थीं ऐसा कृष्ण को लगा वो और तेज़ चाल से चलते हुये पास में पहुँचे मोर रुक गए बाँसुरी फेंट में रख दी कृष्ण नें

गए कृष्ण पास और पास पीछे से जाकर धीरे से हाथ रखा कृष्ण नें

एकाएक कृष्ण के कर का स्पर्श पाते हीवो तो चौंकी

मुड़ीं पर जैसे ही अपनें सामनें देखा नन्दनन्दन को

और नन्दनन्दन नें देखा श्रीराधा को त्राटक लग गयी दोनों की

नेत्र मिले मिलते ही रहे मानों इन दोनों के नयन भी कह रहे हों और पीनें दो इस रूप सुधा को कितनें समय बाद मिले हैं प्यासे थे आज प्यास मिटे

मोर नाच उठे पक्षियों नें गाना शुरू कर दिया लताओं से फूल झरनें लगे सरोवर के कमल सब प्रसन्नता से खिल उठे उसमें से पराग उड़ते हुए इन दोनों युगलवर के ऊपर पड़नें लगे

कौन हो तुम ? हे गोरी कौन हो तुम ?

इस प्रश्न नें श्रीराधा को अपना भान कराया नही तो ये भूल गयीं थीं हाँ सब कुछ भूल गयीं थीं

बताओ ना सुन्दरी कौन हो तुम ? ओह कितनी सुन्दर हो

क्या नाम है तुम्हारा ? कृष्ण बाबरे से पूछते जा रहे थे

किसकी बेटी हो ? कभी मैने तुम्हे देखा नही आज पहली बार देख रहा हूँ पर एक बात बताऊँ मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि हम तुम्हे पहले से जानते हैं

कुछ नही बोलीं

तुम बोलती क्यों नही हो ? कुछ तो बोलो

शरमा गयीं श्रीराधा रानी प्रेम भर गया लवालव हृदय में

तुम बोल नही सकतीं ?

इतना कहते हुए अधरों को छू लिया कृष्ण नें

उस स्पर्श से श्रीराधा का शरीर कंपित होनें लगा कुछ देर के लिये सरोवर में बैठ गयीं आँखें बन्द करके

राधानाम है मेरा  मैं यहीं बरसानें के बृषभान जी की बेटी हूँ

मुझे नही देखा होगा तुमनें क्यों कि मैं कहीं जाती आती नही हूँ

पर तुम कौन हो ?

अपनें बारे में तो कुछ बताओ ? श्रीराधा रानी नें कृष्ण का परिचय जानना चाहा

मैं ? मुझे कौन नही जानता ? बड़ी ठसक से बोले कृष्ण

और वैसे मेरा नाम तो तुमनें सुना ही होगा

अच्छा सब जानते हैं तुम्हारे बारे में ? तुम इतनें बड़े हो

अब थोडा मुस्कुराईं थीं श्रीराधा रानी

हाँ हम बहुत बड़े आदमी हैपूरा बृजमण्डल हमें जानता है

अच्छा अच्छा अब अपना नाम तो बता दो ?

नहीश्रीराधा नें तुरन्त मना कर दिया

उस समय कृष्ण का मुख देखनें जैसा था

फिर श्रीराधा नें कुछ देर बाद कहा

अच्छा अच्छा कृष्ण हाँ हाँ तो तुम्ही हो जो गोकुल में घर घर माखन की चोरी करते फिरते थे और अब यहाँ आगये

अरे तुम्हारा क्या चुरा लिया हमनें प्यारी बोलो जो हमें सीधे चोर कह रही हो

हाँ चुरानें की कोशिश भी मत करनाश्रीराधा रानी नें मुँह फेर लिया

चोरी तो तुमनें की है हमारी

लो चोरों के सरदार तो तुम हो और हमें चोर कह रहे हो

क्यों कहें चोरी भी करो और हम शिकायत भी करें

मेरा नाम है कृष्ण ये नाम तो तुमनें सुना ही होगा

ये बरसानें में कैसा न्याय है

पर हमने क्या चुराया तुम्हारा ? श्रीराधा रानी बोल रही थीं

हमारा हृदय देखो देखो हमारा हृदय हमारे पास ही नही है तुमनें चुरा लिया है इसे ये अच्छी बात नही है

मैं जाती हूँ अब सन्ध्या हो रही है श्रीजी चलीं

लम्बी साँस ली कृष्ण नें और जोर से बोले

राधे अब कब मिलोगी ?

हम चोर से नही मिलते

तो हमारा हृदय तो दे जाओ कृष्ण भी चिल्लाये

तुम कहाँ रहते हो ? श्रीराधा नें जाते जाते पूछा

नन्दगाँवकृष्ण नें श्रीराधा को बता दिया

श्रीराधा चली गयीं कृष्ण बहुत देर तक देखते रहे उस पथ को जहाँ से श्रीराधा गयीं

आल्हाद से भरे कृष्ण जब मुड़े तो और आनन्दित हो गए

सारे के सारे मोर नाच उठे थेसब पंख फैलाये नाच रहे थे

पर ये क्या कृष्ण भी उन मोरों के साथ नाचनें लगे

एक मोर का पंख गिरा नाचते हुएमानों उसनें कृष्ण को अपनी तरफ से ये भेंट दी थी

हे मोर मेरी आत्मा , मेरे प्रेम से तुमनें मुझे आज मिलाया है हम तुम्हारे ऋणी हो गएआज के बाद मैं इस मोर पंख को ही धारण करूँगाइतना कहते हुये उस पंख को अपनें मुकुट में खोंस लिया था

हे वज्रनाभ ये ब्रह्म की प्रेम लीला है और मैने तुम्हे कहा ही है लीला का कोई उद्देश्य नही होता लीला का एक मात्र उद्देश्य होता है अपनें हृदय के आल्हाद को प्रकट करना बस

महर्षि शाण्डिल्य का आनन्दऔर वज्रनाभ का आनन्द आज शब्दातीत है

तेरो रसिक बिहारी मग जोवत खड्यो,

अपनें दोऊ कर जोर तेरे पायन पड्यो


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 17

( “प्रेम” – अपनें आपको पानें की तड़फ़ )


यह है प्रेम की पराकाष्ठा

प्रेम ? यानि अपनें आपसे मिलनें की बैचैनी

यानि अपनें आपसे मिलनें की एक तड़फ़ पर इस प्रेम में मात्र अपना प्रिय ही दिखाई देता है अपना मान , अपमान

प्रेमी इन सबसे परे हो जाता है महर्षि शाण्डिल्य वज्रनाभ को श्रीराधाचरित्रसुनाते हुये भाव रस में निमग्न हो रहे थे

मानापमान से दूर होना हे वज्रनाभ कोई छोटी स्थिति नही है

पर प्रेम की महिमा निराली है वहाँ अगर अपमान से मिलता हो प्रियतम तो अपमान ही हमारे लिए अमृत है और ये बात भी ध्यान देंनें की बात है कि अगर मान अपमान का ध्यान है तो वह प्रेम ही नही है चातक पक्षी माँगता है पानी पर बादल बदले में ओले बरसाता है पर इसके बाद भी चातक का प्रेम और बढ़ता है बढ़ता ही जाता है बादल के प्रति

हे वज्रनाभ प्रेम उसे नही कहते जो क्षण में बढ़े और क्षण में घटे

प्रेम तो निरन्तर बढ़नें का नाम है

जैसे अग्नि में सुवर्ण को तपाया जाए तो उसकी कीमत, उसकी स्वच्छता निर्मलता और बढ़ती है ऐसे ही प्रेमी जितना अपमानित होता है वो और निखरता है निखरता ही जाता है

नेत्रों में भाव के अश्रु भरकर हँसे महर्षि शाण्डिल्यपर प्रेम करना तो एक मात्र श्रीकृष्ण को ही आता है

देखो ऐसा प्रेमी कहाँ मिलेगा ?

तुम्हे क्या हो गया कन्हैया ? दो दिन हो गए तुम गुमसुम से रहते हो किसी से अच्छी तरह बातें भी नही करते

बताओ हमें तो बताओ हम तुम्हारे सखा हैं ?

वृन्दावन की भूमि में कृष्ण सखाओं नें कृष्ण से आज पूछा था

क्यों की दो दिन हो गएन ये पहले की तरह बोलते हैं पहले की तरह हँसते हैं कभी फूलों को देखते हैं कभी मोरों को कभी बहती हुयी यमुना में त्राटक करते हैं

पता नही पर मेरा मन नही लग रहा ये श्रीधाम की दिव्य शोभा भी मुझे चुभनें लगी है गूँजा की माला तोड दी थी ये कहते हुए या टूट गयी थी

हमारी ओर देखो

मधुमंगल सखा नें कृष्ण के चिबुक को पकड़ कर ऊपर उठाया

अब बताओ क्या बात है ?

राधानही आई दो दिन हो गए हैं उदास से कृष्ण बोले

अब कौन राधा ? तोक सखा नें पूछा

बरसानें की राधा ? मनसुख हँसता हुआ बोला

हाँ पर तुम लोग मेरा मजाक उड़ाओगे इसलिये मैने तुम लोगों को नही बताया बड़ी मासूमियत से बोले थे कृष्ण

हमारे सखा कृष्ण का कौन मजाक उड़ा सकता है

अच्छा ये तो बता मिले कहाँ थे तुम दोनों ?

हँसते हुए मनसुख नें ही पूछा

तू फिर हँस रहा है इसलिये मैं तुझे नही बताता रोनी सी सूरत बना ली थी कृष्ण नें

अच्छा अच्छा मुझे बता कहाँ मिले थे तुम दोनों ?

तोक नें सब सखाओं को हटा कर कृष्ण को बड़े प्रेम से पूछा था

बरसानें कृष्ण नें अपनी बात बताई

अब तू बरसानें कब गया कन्हैया ?

परसों

सब सखा ऐसे पूछ रहे थे जैसे मनोचिकित्सक हों ये सब

हूँ

सखा हैं कृष्ण , तो सबको चिन्ता होनी स्वाभाविक ही है

अरे इतना क्यों सोचते होपास में ही तो है बरसानाचलो

मनसुख नें तुरन्त समाधान किया

कृष्ण प्रसन्न हुये सिर उठाकर मनसुख को देखा

क्या तुम इन सबसे पूछते हो हम से पूछो तुरन्त समाधान है अरे ब्राह्मण हैं सबका समाधान करनें के लिये ही तो पैदा हुए हैं मनसुख सहजता में बोलता है ये कुछ भी बोले सुननें वालों को हँसी आही जाती है

तो पोथी पत्रा धर लिए हो पण्डित मनसुख लाल कि अभी मुहूर्त ठीक है ? देख लो कहीं इस नन्द के सपूत के चक्कर में हम पिट जाएँ तोक नें ये बात मनसुख को छेड़नें के उद्देश्य से कही

नाटक करनें में माहिर है मनसुख आँखें बन्दकर उँगलियों में कुछ गिना हाँ शुक़्र उच्च हैइसलिये प्रेम के लिये ये समय ठीक है चलो कृष्ण उतावले हैं बरसानें जानें के लिए

रुको रुको फिर रोक दिया मनसुख नें

नाक के साँस की स्थिति देखि दाहिना स्वर चल रहा है या बाँया चल रहा था बाँयातो लेट कर लोट कर मनसुख नें दाहिना स्वर चला ही दिया ( ज्योतिष में स्वर विज्ञान भी है कोई भी कार्य करनें से पहले नाक से साँस किस तरफ से निकल रही है देख लो अगर दाहिना चल रहा है तो उस समय काम पर निकलो तो कहते हैं सफलता मिलेगी अगर बायाँ चल रहा है तो रुक जाओ )

चलो अब ठीक है कृष्ण तो इस समय प्रेम रस में डूबे हैं जैसा कह रहे हैं सखा वैसा ही मान रहे हैंसखाओं की बातों में ध्यान भी नही है कृष्ण का उनका समूचा ध्यान तोबृषभान नन्दिनीकी ओर ही है

चल दिए बरसानें की ओर सब सखा मिलकर

आज किसी नें कुछ नही खाया है क्यों की जब कृष्ण ही नही खायेगा तब सखाओं के खानें का तो कोई मतलब ही नही है

और कृष्ण को भूख कहाँ

जेठ का महीना अभी अभी लगा ही है पर सूर्य का ताप अपनी चरम पर है बरसानें में बृषभान जी के महल के पीछे छुपे हैं

श्रीराधारानी कब निकलेंगी महल में से कोई भी जाता है आता है तो सब धीरे से बोल उठते हैंश्रीराधा निकलींये सुनते ही टकटकी लगाकर कृष्ण देखनें लग जाते हैं अपने हृदय के धड़कन को भी रोक लेते हैंपर नही फिर उदास ही जाते हैं

पसीनें से नहा रहे हैं कृष्ण गर्मी आज ज्यादा ही है

तभी पायल की आवाज आई कृष्ण नें सुनी वही सुगन्ध अब पहचानते हैं कृष्ण क्यों नही पहचानेंगें अपनें आपको नही पहचानेंगें ?

आगे बढ़ें तो सामनें से दौड़ी हुयीं श्रीराधा अपनें महल की ओर जा रही थीं कृष्ण नें देखा वो तो जड़वत् खड़े रह गए

कितना अद्भुत सौन्दर्य अलौकिक सौन्दर्यवे ठिठक गए

पर श्रीराधा रानी चली गयीं अपनें महल के भीतर

कृष्ण दौड़े पाँव में कुछ पहनें नही थे श्रीराधा नें

इसलिये जमीन पर श्रीराधा के चरण चिन्ह बन गए

श्रीकृष्ण नें देखा ओह फिर आकाश की ओर देखा सूर्य की गर्मी बढ़ती ही जा रही थी नेत्रों से जल बरस पड़े बैठ गए वहीँ श्रीराधा के चरण चिन्ह के पास

निकाली अपनी पीताम्बरी और चरण चिन्ह के ऊपर पीताम्बरी से छाँया करनें लगे

नेत्रों से अश्रु बह रहे हैं

रोम रोम से श्रीराधे श्रीराधे नाम प्रकट हो रहा है

सखा सब आये सबनें श्रीकृष्ण को सम्भाला चलो अब

हे कृष्ण चलो इस तरह से मत बैठो यहाँ देखो कितनी गर्मी हैं सूर्य का ताप कितना है सब सखा बोलनें लगे थे

नेत्रों से अश्रु निरन्तर बहते ही जा रहे थे कृष्ण के

हाँ मैं भी तो यही कह रहा हूँ सूर्य का ताप कितना है मेरी प्यारी के इन कोमल चरण चिन्हों को कितना ताप लग रहा होगा ना

तुम जाओ मैं यहीं हूँ गर्मी लग रही है मेरीश्रीराधा के पद चिन्होंकोये कहते हुए कृष्ण अपनी पीताम्बरी को फैलाये हुये ही बैठे रहे

हे वज्रनाभ ये प्रेम की रीत है इसे केवल ये श्याम सुन्दर ही जानते हैं ये बड़ी विलक्षण है इसे बुद्धि से कौन समझ पाया है आज तक ये तो हृदय में खिला फूल है

प्रीत की रीत रंगीलो ही जानें

यद्यपि अखिल लोक चूड़ामणि, दीन अपन को मानें


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 18

( प्रेम की अगन हो)


चित्त के दो पाट चिर जाते हैं एक राधा और एक माधव

पर ये प्रेम कि आग दोनों और ही लगी हैऔर आग बढ़ती जा रही है

प्रेम कि इस दिव्य झाँकी का दर्शन तो करो

प्रिय सामनें हैं और उनके आगे श्रीराधारानी नाच रही हैंप्रियतम की ओर देखनामुस्कुराना प्रेम से उन्हें निहारना

पर ये क्या एकाएक रूठ जानाबात ही करना

फिर प्रियतम का मनानामनानें पर भी मानना

क्यों ? अजी प्रेम कि अपनी ठसक होती है

हे वज्रनाभ ये चरित्र जो मैं तुम्हे सुना रहा हूँ इसके सब अधिकारी नही हैं जिनकी बहिर्मुखता है जिनका हृदय पवित्र नही है वो इस दिव्य प्रेम के अधिकारी कहाँ ? क्यों कि उनको ये सब समझ में ही नही आएगी की ये क्या है

जो मात्र नैतिकता के थोथे मापदण्ड में बंधे हैं पुरुष की सत्ता को ही जो सर्वोच्च मानकर चलते हैं सामाजिक तथाकथित धारणा में बंध कर ही सोचते हैं वो इस अनन्त प्रेम के नीले आकाश में उड़नें का प्रयास भी करेंये वो पन्थ है जिसे बड़े बड़े ज्ञानी भी नही समझ पातेतो सामाजिक धारणा में बंधे लोगों सेजिनके लिये उदर भरना अपनी महत्वाकांक्षा ही सर्वोच्च है वो बेचारे क्या समझेंगें ?

चलो तथाकथित प्रेम को लोग समझ भी लें पर ये तो और ऊंचा प्रेम हैंसंसार के लोगों का प्रेम ये है कि प्रेम हम कर रहे हैं क्यों की हमें सुख मिलेपर ये प्रेम तो अपनें सुख में नही जीता प्रियतम सुखी हैतो हम सुखी है प्रियतम दुःखी है तो हम भी दुःखी हैं

यानिइनसे हमें सुख मिले ये संसार का प्रेम है

पर हमसे इन्हें सुख मिलेइसी भावना में सदैव भावित रहना ये दिव्य प्रेम है हम इसी दिव्य प्रेम की चर्चा कर रहे हैं

अद्भुत रहस्य खोल दिया था प्रेम का , महर्षि शाण्डिल्य नें आज

आग दोनों तरफ लगी है हे वज्रनाभ कृष्ण श्रीराधा के लिये तड़फ़ रहे हैं तो श्रीराधा कृष्ण के लिये उन्मादिनी हो चली हैं

हे ललिते मैं देख रही हूँ अग्नि कुण्ड है मेरे सामनें वो धड़क रहा है धीरे धीरे मैं उसमें जा रही हूँ पर मैं जलती नही जलूँ कैसे सखी ऊपर से श्याम सुन्दर बादल बनकर बरस रहे हैं

कृष्ण विरह से तप्त हो उठीं हैं श्रीराधा और ललिता सखी का हाथ पकड़ कर रो रहीं हैं

कल आये थे वेअपनें सखाओं के साथ छुप कर देख रहे थे मुझे पर मैं लजा गयी मैं रुकी नही मैं महल के भीतर आगयी पर वे मेरे पद चिन्हों को अपनी पीताम्बरी से छाँया करके बैठे रहे उनका वो कोमल शरीर सूर्य के ताप से झुलस गया होगा ना ?

मैं कैसे मिलूं उनसेकुछ समझ नही आरहामेरी बुद्धि काम नही दे रहीमैं महल में आयी तो ये चित्रा सखी का बनाया हुआ कृष्ण का चित्र मेरे सामनें आगया इन चित्र को देखकर तो मैं और विरहाग्नि में जलनें लगी हूँ इस चित्र को हटा दे सखी

रँगदेवी सखी उस चित्र को हटानें लगीं तो उठकर दौड़ीं फिर श्रीराधा नही यही तो मेरे जीवनाराध्य हैं उस चित्र को लेकर अपनें हृदय से लगा लिया फिर

तुम सब जाओ अब जाओ मैं कुछ देर एकान्त में बैठूँगी

सखियाँ चली गयीं

मन नही लगा श्रीराधा का महल में बारबार कृष्ण की वही छबि याद आरही है मेरे पदचिन्हों को अपनी पीताम्बरी से छाँया कर रहे थे और उनका मुखमण्डल पसीनें से नहा गया था

उफ़

फिर एकाएक मन में आयालोक लज्जा की परवाह है तुझे राधे

देख उन श्याम सुन्दर को तेरे लिए वो बरसानें में ?

तुरन्त उठीं श्रीराधा औरमैं भी जाऊँगी आज नन्दनन्दन से मिलनें क्यों जाऊँ ? वो मेरे लिये आसकते हैं तो

झरोखे से उतरीं श्रीराधा रानी द्वार से जातीं तो सब सखियाँ देख लेतीं और नन्दगाँव कोई दूर तो नही था बरसानें से

अरी बृजरानी यशोदा

देख कोई लाली बड़ी देर से खड़ी है तेरे द्वार परद्वार तो खोल दे

श्रीराधारानी चली गयीं थीं नन्दगाँव पर नन्द महल के द्वार पर जाकर खड़ी हो गयीं द्वार खटखटाया भी नहीं वो तो एक ग्वालिन जा रही थी उसनें देख लिया तो आवाज लगा दी बृजरानी को

भीतर से बृजरानी यशोदा नें अपनें लाल कन्हैया से कहा देख कोई खड़ा है द्वार पर जा खोल दे

ठीक है मैया कृष्ण गए और द्वार जैसे ही खोला

राधे

आनन्द से भर गए कुछ बोल भी नही पाये बस अपलक देखते ही रहे उस दिव्य रूप सुधा का अपनें नेत्रों से पान करते ही रहे

अरे तू भी ना लाला कौन है ? बता तो दे ?

बहुत बार बोलती रहीं बृजरानी यशोदा पर कृष्ण को कहाँ होश उनका सर्वस्व आज उनके ही पास आगया था

अरे कौन है ? ये कहते हुये बृजरानी जैसे ही द्वार पर आईँ

सुन्दरता की साक्षात् देवी नही नही जगत के सौन्दर्य नें ही मानों आकार लिया हो ऐसा अद्भुत सौन्दर्य ऐसा लोकोत्तर सौन्दर्य  देखनें की बात तो दूर गयी सुना भी नही था कि ऐसा भी रूप होता है मूर्छित हो गयीं बृजरानी यशोदा तो

पर होश नही है कृष्ण को वो तो आगे बढ़ीं श्रीराधा रानी और बोलीं आपकी मैया को क्या हुआ ?

कन्हैया नें देखा मुड़कर तो महल के भीतर बृजरानी मूर्छित पड़ी हैं

जल का छींटा दिया तब जाकर होश आया था यशोदा मैया को

अरे बाबरे देख कितनी सुन्दर लाली है भीतर तो बुला

बेचारी कितनी देर से खड़ी है बाहर

कन्हैया को बोलीं उनकी मैया

आओ ना बड़े प्रेम से बुलाया कृष्ण नें अपनें महल में

धीरे धीरे नंदमहल में प्रवेश किया श्रीराधा रानी नें बड़े संकोच के साथ

किसकी बेटी हो ? कहाँ रहती हो ?

अपनी गोद में बिठा लिया था बृजरानी नें

और उन गोरे कपोल को चूमती हुयी पूछ रही थीं

बरसानें की हूँ कीर्ति रानी मेरी मैया हैं

मिश्री की मधुरता भी इनकी वाणी के आगे तुच्छ प्रतीत हो रही थी

राधानाम है मेरा बृषभान जी की बेटी हूँ

ओह कीर्तिरानी की राधा तुम हो ?

आनन्द से उछल पडीं बृजरानी

मैया मैं भी बैठूंगा तेरी गोद में कृष्ण मचलनें लगे

अच्छा अच्छा आजा तू इधर बैठ एक तरफ श्रीराधा रानी और दूसरी और अपनें लाला को बैठाकर माखन खिलानें लगीं

सुगन्धित तैल उन काले काले श्रीजी के केशों में लगाकर उन्हें संवार दियासुन्दर लहंगा पहना दिया ऊपर से चूनरी ओढ़ा दी पायल पहना दी बृजरानी नें

सुन्दर सा मोतियों का हार पहना दिया

कृष्ण बड़े खुश हैं बारबार देख रहे हैं अपलक श्रीराधा रानी को

मैं जाऊँ अब बरसानें ? मेरी मैया मेरी बाट देख रही होंगी

श्रीराधा रानी के मुख से इतना सुनते ही बृजरानी नें राई नॉन उताराश्रीराधारानी का

अब जाऊँ ? संकोच से धसी जा रही हैं ये बृषभान की लली

जा जा छोड़ के कन्हैया को बोलीं यशोदा

बड़े खुश होते हुये कन्हैया चले श्रीजी का हाथ भी पकड़ लिया कृष्ण नें बृजरानी देखती रहीं और मुग्ध होती रहीं मेरी बहु है ये कितनी प्यारी जोड़ी है हे विधाता मैं अचरा पसार के मांगती हूँ ये जोड़ी ऐसे ही बनी रहे

अकेली आगयीं राधे ?

कृष्ण नें पूछा

हूँ इससे ज्यादा कुछ बोलती ही नही हैं

अब कब मिलोगी ?

पता नहीं

तुम्हारा महल आगया है अब तो बता दो कहाँ मिलोगी ?

पता नहीं इतना बोलकर भागी, क्यों की महल आगया था

पर बातें बनानें वाले तो होते ही हैं बरसानें के हर नर नारी नें देख लिया था सजी धजी श्रीराधा कृष्ण के साथ आरही है

कीर्तिरानी नें देखा कुछ रोष भी किया कहाँ गयीं थीं ?

चलते चलते नन्दगाँव चली गयी थीकृष्ण दूर खड़े होकर देख रहे हैं कीर्तिरानी नें अपनी लली को सजी धजी देखा ये सब हार पायल लहंगा किसनें पहनाया ?

यशोदा मैया नें श्रीराधा रानी धीरे से बोलीं

बरसानें की महिलाएं सब देख रहीं थींऔर बातें भी बनानें लगी थीं

कीर्तिरानी अपनी लली को लेकर चलीं गयीं महल के भीतर

कृष्ण लौट आये थे अपनें नन्दगाँव

कृष्ण अपनें आपसे ही तो मिल रहे हैं महर्षि शाण्डिल्य नें कहा

हे गुरुदेव अपनें आपसे मिलना क्या होता है ?

जैसे कोई आईने में अपनें आपको देखकर मोहित होजाता है

महर्षि का कितना सटीक उत्तर था वज्रनाभ आनन्दित हुए


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 19

( “बरसानें की देवी सांचोली”- एक अद्भुत कहानी )


फूट जाएँ वे आँखें जो प्रियतम को छोड़, किसी और को निहारें फूट जाएँ वे कान जो प्रिय की बातों के सिवा कुछ और सुनें

जल ही जाए वे जीभ जो अपनें प्रेमास्पद के सिवा किसी और का नाम भी पुकारे अरे जिन आँखों नें प्रियको निहार लिया अब क्या चाहिये ? और फिर भी , किसी और को निहारने की सुननें की अन्य को पुकारने की कामना है तो सम्भालो अपनी इन्द्रियों को ये सब व्यभिचारी होगयी हैंइन्हें दण्ड मिलना ही चाहिये

हे अनिरुद्ध सुत वज्रनाभ गोपियों नें कात्यायनी की पूजा अर्चना की पर श्रीराधा रानी नें वह भी नही किया

पार्वती देवि की पूजा करनें बृज गोपियाँ गयीं पर श्रीराधा रानी नें किसी देवि देवता को नही मनाया क्यों मनाये ?

उनका देवता कृष्ण ही था उनकी देवी कृष्ण ही थी उनका भगवान, कृष्ण था उनका ईश्वर उनका इष्ट उनका सर्वस्व कृष्ण कृष्ण बस कृष्ण श्रीराधा रानी के लिए कृष्ण के सिवा और कुछ नही

महर्षि शाण्डिल्य आज प्रेम मेंअनन्यताकी विलक्षण चर्चा कर रहे थे

इसअनन्यताके सिद्धान्त को हर व्यक्ति नही समझ सकता क्यों की ये आरोपित नही होता ये प्रेम की उच्चावस्था में सहज घटित होता है सिर्फ तू और कुछ नही

या, तू ही तू सर्वत्र, तू ही तू

इस ढ़ाई आखरमें अनन्त रहस्य भरे हैं चन्द्र मिट जाए सूर्य प्रलय में खतम हो जाए अनन्त काल तक इस प्रेम पर चर्चा करते रहें फिर भी ये प्रेमरहस्य ही बना रहेगा

हँसे ये कहते हुए महर्षि शाण्डिल्य

बृषभान जी की कुल देवी हैं ये सांचोली

कई बार ले जाना चाहाकीर्तिरानी नेंऔर बृषभान जी नें अपनी लाडिली श्रीराधा को पर नही ये क्यों जानें लगीं किसी देवी को पूजनें ?  इनके नयनों में इनके अंग अंग और अन्तःकरण में वही साँवरा समाया है फिर क्यों जाएँ देवी देवताओं के पास ?

कामना के लिये ? तो कामना पूरी होगी इनकी कृष्ण से ही उसे देखनें से ही हृदय शीतल होगा इनका

दूसरे ही दिन कृष्ण आगये बरसाने , नन्दगाँव सेपर ये दोनों प्रेमी अब मिलें कहाँ ?

सांचोली देवी के मन्दिर मेंश्रीराधा रानी के मुख से निकल गया

सांचोली देवी ? कृष्ण नें मुस्कुराते हुये पूछा

हाँ हमारी कुल देवी वो कब काम आएँगी श्रीराधा नें प्रेमपूर्ण होकर कहा था

अच्छा कहाँ हैं ये तुम्हारी देवी ?

हमारे महल से दूर एक पर्वत पड़ता है उसी के पीछे

श्रीराधारानी नें स्थान का पता भी बता दिया था

कोई आता जाता तो नही है ?

प्रेमियों को सदियों से एकान्त ही प्रिय रहा जैसे मनीषियों को ऋषियों को अरे ये प्रेमी भी कोई ऋषि मुनि या मनीषियों से कम तो नही हैं

जितनी एकाग्रता ऋषियों में योगियों में पाई जाती है उससे भी ज्यादा अपनें प्रियतम के प्रति एकाग्रता प्रेमियों में पाई जाती है क्या इस बात को कोई इंकार कर सकता है ?

पूरक कुम्भक रेचक योगी क्या सिद्ध करेगा प्रेमी का सहज सिद्ध होता है ये प्राणायाम जब प्रेम की उच्च अवस्था में पहुँचता है प्रेमी तब साँस की गति, क्या किसी प्राणायाम सिद्ध योगियों की तरह नही होती ? त्राटक, सिद्ध योगी क्या करेगा प्रेमी का सहज सिद्ध होता है त्राटक प्रेमी की हर इन्द्रियाँ प्रियतम में ही त्राटक करती हैं क्या इस बात में सच्चाई नही है ?

चलो आज ही चलते हैं कम से कम तुम्हारी देवी के दर्शन तो कर लें कृष्ण नें मुस्कुराते हुये श्रीराधा रानी से कहा

पर अभी ?

अजी चलो ना हाथ पकड़े कृष्ण नें श्रीराधा के और दौड़ पड़े पर्वत की ओर फिर उतर गए नीचे

ओह दोनों की साँसे फूल गयीं थींहँसते हुये मन्दिर के द्वार पर ही बैठ गए दोनों साँसों की गति जब सामान्य हुयी तब उठे और मन्दिर के भीतर चले गए

पर यहाँ देवी कहाँ हैं ? कृष्ण नें उस मन्दिर को देखा पर वहाँ कोई विग्रह नही था

ये शिला ही सांचोली देवी हैं इन्हीं शिला को हमारे पूर्वज देवी मानकर पूजते आरहे हैं

तुम नही आईँ कभी इस मन्दिर में ? श्रीकृष्ण नें पूछा

मेरे लिए तो तुम्ही देवी हो और देवता भी तुम हो मेरे ईश्वर तुम हो मेरे सर्वस्व तुम हो इतना कहते हुये कृष्ण को छू रही थीं श्रीराधा ।अपनी बाहों में भर लिया था कृष्ण नें अपनी प्राण बल्लभा श्रीराधारानी को

अब तो नित्य का नियम ही बन गया इन दोनों सनातन प्रेमियों का सांचोली देवी के मन्दिर में आना और प्रेमालाप में मग्न हो जाना

पर उस दिन क्या पता थाअमावस्या थी ।और पूर्णिमा अमावस्या को इन विशेष काल में तो बृषभान जी और कीर्तिरानी अपनी कुलदेवी की पूजा करनें आते ही थे

राधे मैं तुम्हे देखता हूँ तो ऐसा लगता है देखता रहूँ युगों तक अनन्त काल तक

तुम अघा जाओगे प्यारे

नही राधे तुम्हारे रूप की यही तो विशेषता है जितना देखूँ लगता है और देखूँ और देखूँ नया नया सौन्दर्य प्रकट होता है मैं अपनें आपको भूल जाता हूँ

फिर उठकर बैठ गए कृष्ण और श्रीराधा रानी के लटों से खेलते हुए बोले कभी कभी मुझे लगता है मैं राधा हूँ और तुम कृष्ण श्रीराधा हँसी मुझे भी लगता है मैं कृष्ण बन गयी और तुम मेरी राधा

कीर्तिरानी

चलो मन्दिर आगयापर पद पक्षालन करके ही मन्दिर में जायेंगें बृषभान जी और कीर्तिरानी मन्दिर में आज आपहुँचे थे पूजा अर्चना के लिये ।बगल में ही सरोवर था उसमें पद पक्षालन करनें चले गए

श्रीराधारानी नें देख लिया

मेरे बाबा आगए  श्रीराधारानी घबडा के उठीं अपनें केशों को सम्भाला अब क्या करें ?

तुम अच्छी लगती हो ऐसे घबड़ाई हुयी फिर चूम लिया कृष्ण नें

तुम बाबरे हो गए हो क्या ? मेरे बाबा और मैया आगये हैं

आनें दो जब प्रेम है तो हैकृष्ण मुस्कुराये जा रहे हैं

मैं जा रही हूँ पर तुम क्या करोगे ?

मैं आँखें बन्द कर लूंगाऔर हृदय में बैठी अपनी राधा से बातें करता रहूंगाकृष्ण श्रीराधा को देखकर सहज ही बोलते जा रहे थे

मैं गयी श्रीराधारानी बाहर निकलीं पर

अरे राधा तू यहाँ ?

कीर्तिरानी नें चौंक कर पूछा

अचम्भित तो बृषभान जी भी हुये थे बेटी राधा ललिता बिशाखा रँगदेवी सुदेवी ये सब कहाँ है अकेली तुम ?

बाबा मैं आज देवी के दर्शन करनें चली आईश्रीराधारानी नें घबडा कर कहा

आज तक तो तुम आई नहीं आज ही क्यों ?

कीर्तिरानी नें इधर उधर देखते हुए पूछा था

नही वो देवी को हार मुकुट और वस्त्र देवी के विग्रह को कई दिनों से किसी नें स्नान भी नही कराया था तो मैं ?

बेटी राधा क्या बात है स्वास्थ ठीक तो है ना तुम्हारा ?

बेटी  विग्रह कहाँ है हमारी कुल देवी का वो तो एक शिला के रूप में ही हैं

चलो अब हम भी दर्शन करते हैं तुम नें क्या धारण कराया है देवि को हाथ पकड़ कर कीर्तिरानी मन्दिर के भीतर ले चलीं

श्रीराधारानी घबडा रही थीं कृष्ण भीतर ही हैं अब क्या होगा ? वो दीख जायेंगें तो ?

मैं मैं मैं महल जा रही हूँ श्रीराधारानी मन्दिर में जाना ही नही चाहतीं क्यों की

चलो अबहमारे साथ ही महल चलना कीर्तिरानी नें हाथ पकड़ा और मन्दिर में ले चलीं

पर ये क्या ?

जैसे ही मन्दिर में पहुँचे ये सब

दिव्य प्रकाश झलमला रहा थाऔर एक सुन्दर सी मूर्ति खड़ी थी बृषभान जी चौंके कीर्तिरानी स्तब्ध हो गयीं पर इनसे भी ज्यादा चकित और आनन्दित श्रीराधा रानी थींकि मूर्ति जो सांचोली देवी की खड़ी थी वो कोई देवी नही थीं उनका प्यारा कृष्ण ही देवी के रूप में वहाँ खड़ा हो गया था

उछल पडीं श्रीराधा रानी आनन्द से बाबा देखो ये हैं देवी, हमारीदेवी सांचोलीसच्ची देवी यही हैं मैया

बाकी सब देवी देवता झूठे हैं पर सच्ची देवी तो यही हैं

करो दर्शन श्रीराधा रानी आनन्दित होते हुए साष्टांग प्रणाम कर रही थीं पर ये क्या सांचोली देवी के गले से माला गिरी और सीधे श्रीराधारानी के गले में

अजी देखो ना ये मूर्ति रातों रात कैसे प्रकट हुयी ?

हाँ वही तो कीर्तिरानी यहाँ तो सदियों से शिला के रूप में हमारी देवि थीं मूर्ति के रूप में तो नही थीं बृषभान जी क्या कहें कीर्तिरानी की बुद्धि जबाब दे गयी थी

बाबा मैया प्रेम में बहुत ताकत हैपत्थर भी आकार ले लेते हैं

हाँ कीर्तिरानी बारबार उस मूर्ति की ओर देखे क्यों की मूर्ति मुस्कुराती थी

साँवली मूर्ति कितनी सुन्दर थी ना मूर्ति श्रीराधा रानी रास्ते भर उसी मूर्ति की चर्चा करते हुए आईँ

पर पूरे बरसानें में ये रहस्य ही रहा कि ये मूर्ति प्रकट कैसे हुयी

मैने प्रकट की है मूर्ति है ना प्यारे एक दिन ये कहते हुए श्रीराधा नें कृष्ण को अपनें हृदय से लगा लिया था

हे वज्रनाभ श्रीराधारानी नें केवल उसी सांचोली देवीकी ही पूजा की क्यों की वो सांचोली कोई देवी नही थी श्रीराधा का परमदेवता कृष्ण ही था

रसिक रसिलो छैल छबीलो गुण गर्बिलो श्रीकृष्ण


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 20

( “अधरामृत” – शक्तिप्रेममें ही है )


हे यदुवीर वज्रनाभ शक्ति है तभी शक्तिमान है अगर शक्ति ही नही है तो शक्तिमान कैसा ?

ब्रह्म तारता है या मारता है वो सब शक्ति के कारण ही है इस बात को सभी सिद्धान्त वाले स्वीकार करते हैं क्यों करें सत्य यही तो है हे यादवों में श्रेष्ठ वज्रनाभ कृष्ण श्रीराधा के बिना कुछ नही हैं जो भी तुम देखते हो सुनते हो कृष्ण के बारे में कि वो योगेश्वर, वो निर्मोही , वो एक दार्शनिक गीता जैसे गम्भीर विषय के गायक वो एक अद्भुत योद्धा वो एक मदविनाशकये जितनें रूप हैं कृष्ण के ये सब श्रीराधा के प्रेम की ही तो देन है श्रीराधा नें ही संवारा है सजाया है कृष्ण को

त्याग तो महान है श्रीराधा काकृष्ण के लिये सब कुछ त्यागा

वैसे प्रेम का अर्थ ही यही होता है किवे सुखी रहें

हे वज्रनाभ श्रीराधा के प्रेम की धूप छाँव ही कृष्ण को और निखारती चली जाती है कृष्ण में इतनी अविचल शक्ति इतना उद्वेग रहित भाव कर्म करनें के बाद भी कर्म से बंधे नहीं

ये सब बिना किसी अल्हादिनी शक्ति के सम्भव नही है कृष्ण को ये सब बनानें में श्रीराधा का ही हाथ है श्रीराधा ही पीछे खड़ी दिखाई देंगीं तुम्हे चाहे वो वृन्दावन में चाहे मथुरा में चाहे द्वारिका या कुरुक्षेत्र में जो भी कृष्ण में ये सब विलक्षण पौरुष दिखाई देता है इन सबके पीछे श्रीराधा ही हैं पर श्रीराधा दिखाई नही देतीं दिखाई देती हैं रूक्मणी यही तो श्रीराधा का त्याग है और यही तो प्रेम की महिमा हैप्रेम छुपा रहे प्रेम अव्यक्त रहे

कृष्ण में रँग है कृष्ण का रँग अपना है पर उस रँग में गन्ध नही है और जो भी गन्ध महसूस होता है बस बस वही सुगन्ध श्रीराधा है

श्रीराधा सजाती है कृष्ण तुम्हे अभी आगे बहुत जाना है

श्रीराधा संवारती है कृष्ण तुम्हे अभी बहुत कुछ करना है

श्रीराधा सम्भालती हैकृष्ण तुम्हे अभी बहुत दावनल पान करना है

क्या दावानल कहाँ लगी है दावानल ?

बड़े भोले हो प्रिय झुलस जाओगे

फिर राधा सम्भालते हुए अपनें अधरामृत का पान कराती हैं

महर्षि शाण्डिल्य सावधान करते हैं नैतिकता के छूछे मापदण्ड से हर वस्तुविषय को देखनें वाले इस दिव्य प्रेमप्रसंगसे दूर रहें

वृन्दावन जल रहा है धूं धूं कर जल रहा है चारों ओर आग ही आग है नर नारी भाग रहे हैं गौएँ इधर उधर भाग रही हैं और कुछ धरती पर पड़ गयीं हैं उन्हें बचानें वाला कौन ?

पक्षियों के घोंसले जल गएउनमें उनके बच्चे थेवे सब जल गएनर नारी फंस गए हैं उस दवानल में किधर जाएँ

श्रीराधा घबड़ाई हुयी नींद से उठींस्वेद से नहा गयी थीं उनके श्रीधाम की ये दशा

सपना था येपर आल्हादिनी शक्ति का सपना भी सत्य होगा ही

ओह शीघ्रातिशीघ्र अपनें बिस्तर को त्यागकर उठीं

बेटी उठ गयी ? अब नहा ले कीर्तिरानी नें अपनी लाडिली को जब देखा तो स्नान के लिये कह दिया

हाँ मैया गयीं स्नान करनें पर श्रीराधा ऐसे कैसे स्नान करेगी सखियाँ खड़ी हैं उबटन लेकर बिठा दिया उन्हें सखियों नें और अंग अंग में उबटन लगानें लगीं

अब तो नहानें दोश्रीराधारानी नें सखियों से कहा

उबटन लग चुका है श्रीराधारानी को जल्दी है उन्हें आज श्रीधाम वृन्दावन को बचाना है वहाँ दावानल लगनें वाला है पर ये बात कहें कैसे ?

अब इतनी जल्दी भी क्या है मिल लेना उस साँवरे से पूरा दिन पड़ा है हँसते हुए सखियाँ बोलीं और फिर बिठा दिया

उबटन को सूखनें तो दो लाडिली जू

सूख गया पर अब फिर उसे रगड़ कर निकालेंगीं ये सखियाँ

अत्यन्त कोमल शरीर है श्रीजी का बहुत धीरे धीरे करना पड़ता है देखो इनको कष्ट हो चलिये उबटन भी हो गया अब स्नान की बारी

स्नान में भी समय तो लगता ही है लगा समय

फिर वस्त्र उनका श्रृंगार

अरे कहाँ चलीं स्वामिनी  सखियाँ जोर से पुकारनें लगीं

आकर बताउंगी अभी समय नही है

अकेली मत जाओ नाहम भी आती हैं सखियों नें फिर पुकारा

नही मैं शीघ्र ही आजाऊंगी कोई मत आओ मेरे साथ

श्रीराधा तो देखते ही देखते यमुना के किनारे चली गयीं थीं

और अपनी नौका लेकर पतवार चलाते हुये कुछ ही देर में नंदगांव पहुँच गयीं

नन्दभवन की ओर चलीं पर आज ये दौड़ रही थीं चल नही रही थीं

देखनें वाले ये तो भानु दुलारी है ना ? हाँ ये राधा ही तो है

द्वार खटखटाते हुए नन्दभवन में

राधा आओ आओ बेटी

बृजरानी यशोदा नें द्वार खोला था

नही मैया अभी नही आऊँगी कन्हैया कहाँ हैं ?

वो वो तो वृन्दावन गया है गौचारण करनें बृजरानी नें इतना कहा और भीतर आने के लिये आग्रह करनें लगीं पर

नही मैया मैं फिर आऊँगी श्रीराधारानी जल्दी जल्दी नन्दभवन से उतरीं और फिर अपनी नौका में

नौका को वृन्दावन की ओर मोड़ दिया था

हे वज्रनाभ आल्हादिनी शक्ति के संकल्प के विपरीत ब्रह्म नही जा सकते तो ये प्रकृति कैसे जा सकती हैं वायु भी अनुकूल चल पड़े थे ताकि इन कोमलांगी को तनिक भी श्रम करना पड़े

पूतना मर गयी शकटासुर को मार दिया गया ग्वालों के द्वारा तृणावर्त, अघासुर, कागासुर ओह मेरे बड़े बड़े वीरों को इन ग्वालों नें इन अहीर के बालकों में मार दिया और मैं

मैं कंस मैं वो वीर कंस जिसनें परसुराम जी की पर्वत मालाओं को उठा दिया था मैं वो वीर कंस जिसनें बाणासुर को झुकनें पर मजबूर कर दिया था उसे आज एक ग्वाला कृष्ण चुनौती दे रहा है शर्म की बात है ये मेरे लिये

चिल्ला उठा था कंस उस दिन

तुम लोग चुप क्यों हो ? क्या अब कोई उपाय नही बचा तुम लोगों के पास अपनें राक्षसों को देखकर चीख रहा था कंस

अब एक ही उपाय है वृन्दावन में दावानल लगा दी जाए

दावानल ? कंस को ये बात कुछ जँची

क्या फिर कहना ? कंस उस राक्षस से फिर पूछनें लगा

महाराज कंस मैं ये कह रहा हूँ वृन्दावन में गौ चारण करनें समस्त ग्वाले आते हैं नित्य आपका शत्रु कृष्ण उन सबका मुखिया बन आगे आगे चलता है बस उसी समय अगर चारों ओर से आग लगा दी जाए तो सब मर जायेंगें

अरे वाह तू तो बहुत बुद्धिमान है ले अपनें गले का हार उतारकर दे दिया उस राक्षस को कंस नें

अब जाओ और जब कृष्ण गौ चरानें वृन्दावन में आये आग लगा दोउन ग्वालों को घेरकर आग लगा देनाकृष्ण बचनें पाये

हा हा हा हा हा हा क्रूर हँसी हँस रहा था कंस

पहुँच गयीं थीं श्रीराधा रानी वृन्दावन नौका को किनारे से लगा कर वहीँ बैठ गयीं

इधर उधर दृष्टि दौड़ाई चलो कंस नें अभी आग लगाई नही है राहत की साँस ली थीं उन कृपा की राशि किशोरी जू नें

तभी कृष्ण नें नौका को देख लिया अपनी प्राणबल्लभा की नौका उचक कर देखा कृष्ण नें तो उनके आनन्द का और पारावार रहा कि उस नौका पर श्रीजीबैठीं हैं

वो दौड़े नौका के पास आये

राधे राधे आवाज दी

आँखें खोलीं श्रीराधा रानी नेंमैं तुम्हे ही पुकार रही थी प्यारे आओ ना इधरनौका में ही बुलाया श्रीराधा रानी नें

पर तुम इतनी घबड़ाई हुयी क्यों हो ? नौका में चढ़ते हुए बोले कृष्ण

प्रिय आज बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता श्रीराधा अभी भी घबड़ाई हुयी थीं

पर हो क्या जाता ?

ये हमारा वृन्दावन ये हमारी गौएँ ये हमारे ग्वाल बाल सब जल जाते और तुमसे भी कुछ होता

क्या कह रही हो राधे मैं कुछ समझा नहीं

दावानल पान करनें की शक्ति तुममें नही हैश्रीजी नें कहा

हाथ जोड़ लिए कृष्ण नें हे स्वामिनी मेरी शक्ति तो तुम हो ना

इसलिये ही तो आई हूँ , दौड़ी दौड़ी बरसानें से ताकि इस जगत में भी लगे या लगनें वाले दावानल का तुम पान कर सको

कैसे ?  कैसे मेरी आल्हादिनी

श्रीराधा नें इधर देखा उधर खींचा अपनी ओर अपनें प्राण कृष्ण को और अपनें अधर कृष्ण के अधरों में रख दिए

पान करनें लगे कृष्ण श्रीराधा के अधरामृत का

कृष्ण प्रगाढ़ आलिंगन में अपनी श्रीजी को बाहों में भरते हुए उनके अधरों को पी रहे थेबड़ी गुणवती हैं श्रीराधा अपनें प्रियतम को रमा रही हैंअपना अमृत प्रदान कर रही हैं ताकि इस जगत में फैलनें वाले दावानल का पान कर जीवों को ये शान्ति प्रदान कर सकें

श्रीजी के मुख पर लटें लहरानें लगीं थीं साँस बड़ी तेज़ गति से चल पड़ी थी माधव नें चूमा प्रगाढ़ चूमा अधरों को

पर एकाएक हट गयी श्रीराधा देखो माधव देखो आग लग गयी है वृन्दावन में वो देखो

जाओ प्यारे अब पान कर लिया ना अब इसी के सहारे इस दावानल का भी पान करो मैं तुम्हे शक्ति प्रदान करनें आयी थी जाओ जाओ इस वृन्दावन को बचानें का अभिप्राय ही ये होगा कि तुम समस्त जगत को भी बचा रहे हो

कृष्ण को आल्हादिनी के द्वारा वो अमृत मिल गया था जो इस धरा का अमृत नही था वो अधरामृत था यानि अलौकिक अमृत

श्रीराधा रानी खड़ी हो गयीं कृष्ण उस कंस के द्वारा लगाये गए दावानल का पान करनें लगे थे श्रीराधा रानी मुस्कुराते हुये देखती रहींकृष्ण नें उस अग्नि का पूरी तरह से पान किया पर ये शक्ति तो ब्रह्म को, आल्हादिनी ही दे रही थीं है ना ?

हे वज्रनाभ जो इस प्रेमप्रसंग को गायेगा पढ़ेगा सुनेगा उसका मंगल ही मंगल होगा वो इस जगत के दुखमय दावानल की अग्नि से कभी नही झुलसेगा

महर्षि शाण्डिल्य यही बोले थे

स्तंराधिका चरण रेणु मनुस्मरामि


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 21

( “कंस जब सखी बना ” – एक अनसुना प्रसंग )


हे वज्रनाभ श्रीराधारानी पराशक्ति हैं इनसे बड़ी कोई शक्ति नही

ऐसा मैं ही नही कह रहा वेदों की ऋचाओं नें श्रीराधारानी कोपराशक्तिकहकर उनके नाम का स्मरण किया है

आज महर्षि शाण्डिल्य गदगद् थे

हे वज्रनाभ वैसे तो श्रीराधारानी के अनन्त नाम हैं जैसे कृष्ण के अनन्त नाम हैं वैसे ही श्रीराधारानी के भी क्यों हों ये शक्ति हैं ये पराशक्ति हैं ये अल्हादिनी शक्ति हैं यही हैं जिन्हें ईश्वरीनाम से , वेद भगवान भी स्तवन करते हैं

हे वज्रनाभ मुख्य नाम अट्ठाईस हैं श्रीराधारानी केये सब नामों का सार हैं इन नामों का जो प्रातः और रात्रि सोते समय स्मरण करता है उन्हें इन बृषभानु दुलारी की कृपा अवश्य प्राप्त होती हैं

ऐसी बात नही हैं ये श्रीराधारानी निष्काम भक्तों को तो प्रेम प्रदान करती ही हैं पर कामना रखकर भी जो इनके नामों का एक बार भी स्मरण कर लेता है उसकी हर कामना पूरी करती हैं इसे निश्चय जानों

इतना कहकर महर्षि शाण्डिल्य नें नेत्र बन्दकर श्रीराधारानी के अट्ठाईस नामों का स्मरण किया

श्रीराधा, रासेश्वरी, रम्या, कृष्णमन्त्राधिदेवता , सर्वाद्या, सर्ववन्द्या, वृन्दावनविहारिणी, वृन्दाराध्या, रमा, आल्हादिनी, सत्या, प्रेमा, श्री , कृष्ण बल्लभा , बृषभानु सुता, गोपी, मूलप्रकृति , ईश्वरी, कृष्णप्रिया, राधिका , आरम्या, परमेश्वरी, परात्परता, पूर्णा, पूर्णचन्द्रानना, भक्तिप्रदा, भवव्याधिविनाशिनी, और हरिप्रिया

हे वज्रनाभ इन नामों का जो प्रातः और रात्रि में स्मरण करता है उसकी हर मनोकामना पूरी होती ही हैइन नामों का स्मरण करनें से मनुष्य प्रेमाभक्ति को प्राप्त कर श्रीराधा माधव के दर्शन का अधिकारी हो जाता है

आज श्रीराधाभाव से भावित हो महर्षि शाण्डिल्य अब आगे की कथा सुनानें लगे थे

नारायण नारायण नारायण

आज पता नही क्यों देवर्षि नारद जी कंस के यहाँ जा पहुँचे

उदास था कंस क्यों की अभी अभी उस तक ये सूचना पहुँची थी कि दावानल को पी गया वो ग्वाला कन्हैया

क्या कैसे पी गया ? अग्नि को पी गया ?

तुम मुझे पागल समझते हो चिल्लाया था कंस

हमें कुछ नही पता राजन्  हमनें चारों ओर से आग लगा दी थी और वन नें आग पकड़ भी ली थी चारों और आग ही आग ये देखकर हम सन्तुष्ट भी हुए थे पर पता नही क्या हुआ कुछ ही देर में अग्नि इस तरह शान्त हो गयी जैसे उसे किसी नें पी लिया हो वो अग्नि कंस के राक्षस कंस को बता भी नही पा रहे थे कि उन्होंने वृन्दावन में क्या देखा

नारायण नारायण नारायण

आगये उसी समय देवर्षि नारद जी

हम बताते हैं अब जाओ तुम लोग पहले यहाँ से

कंस फिर बोलाएकान्तऔर सब लोग वहाँ से चले गए

देवर्षि बताइये ना क्या हुआ ? और अब आगे क्या होगा ?

कंस गिड़गिड़ानें लगा देवर्षि के चरणों में गिर कर

मैने तुमसे पहले ही कहा था कृष्ण की शक्ति राधा हैं और याद रहे जब तक बरसानें में राधा हैं तब तक कृष्ण का कोई कुछ नही बिगाड़ पायेगा

हूँ सोचनें लगा कंस सोचना पड़ा कंस को क्यों की वो इस घटना को भूलता नही है कैसे पालनें में सो रही श्रीराधा नें मात्र अपनें छोटे चरण क्या पटके वो सीधे बरसानें से गिरा था मथुरा पर ये बात किसी को पता नही है

क्या सोच रहे हो कंस सोचो मत कुछ करो

मैं तो तुम्हारा हितैषी हूँ इसलिये हित की बातें कहनें चला आता हूँ

नारायण नारायण नारायणचल दिए देवर्षि नारद जी

मैं बरसानें जाऊँगा और मार दूँगा उस राधा को

चीखा कंस

पर सावधान कंस बरसानें की गलियों से सावधान हँसते हुए आकाश मार्ग से चल दिए थे देवर्षि

प्रेम सरोवर हैदिव्य सरोवर है बरसाने में इसका नाम है प्रेम सरोवरहर रँग के कमल खिले हैं इस सरोवर मेंकिनारे पर कदम्ब के घनें वृक्ष हैं उन वृक्षों में मोर आकर बैठ जाते हैं और विचित्र बात ये कि वे सारे मोर बारी बारी से अपना नृत्य दिखाते हैं कोयली मधुर स्वर देती है

वातावरण सुगन्धित हैक्यों की वन में नाना जाति के पुष्प खिले हैं

सरोवर के किनारे ही एक दिव्य सिंहासन हैउस सिंहासन में विराजमान हैं आज श्री बृषभानु नन्दिनी राधारानी

नीला रँग इन्हें बड़ा प्रिय हैक्यों कि इनके प्यारे का रँग नीला है ना और एक विचित्र बात ये है कि इनके प्राणधन को पीला रँग प्रिय है क्यों की तपे हुए सुवर्ण के समान रँग है श्रीराधा रानी का

तो नीली साड़ी पहनी हुयी हैं मस्तक में चन्द्रिका की शोभा है माथे में श्याम बिन्दु है

सखियाँ नवीन नवीन फूलों का हार बनाकर ला रही हैं और वो सबश्री जीको पहनाती हैं वीणा बजानें में लगीं हैं ललिता सखी” “विशाखा सखीमृदंग लेकर बैठ गयीं हैं

चित्रा सखीमंजीरा बजा रही हैं और इन्दुलेखा सखीइत्र और गुलाब जल का बीच बीच में छिड़काव करती जाती हैं

चम्पकलता सखीश्रीराधारानी के पीछे खड़ी हैं और चँवर ढुरा रही हैं

तुंगविद्या सखीगायन कर रही हैं ये बहुत सुन्दर गाती हैं

रँगदेवी सखीऔरसुदेवी सखीये दोनों जुड़वाँ हैं और देखनें में बिल्कुल श्रीराधा रानी जैसी ही लगती हैं ये दोनों उन्मुक्त भाव से नृत्य कर रही हैं इन्दुलेखा पुष्पों की वर्षा कर देती हैं कभी कभी

इतना आनन्द प्रवाहित हो रहा है इस बरसानें के प्रेम सरोवर मेंसब झूम रहे हैंश्रीराधिका जू की ओर ही सबकी दृष्टि है पर

एकाएक ललिता सखी नें वीणा बजाना बन्द कर दिया विशाखा सखी नें भी मृदंग में थाप देना बन्द किया तुंगविद्या का गायन रुकना स्वाभाविक था

क्या हुआ ? गायन, वादन सब क्यों रोक दिये ?

ये प्रश्न रँगदेवी नें पूछा थाऔर श्रीराधा रानी नें भी यही प्रश्न नजरों से किया

प्यारी वो देखो ललिता सखी नें दिखाया

कुञ्ज के रन्ध्र से कोई कुरूप सा पुरुष देख रहा था

ये कौन है ? श्रीराधा रानी हँसी

मथुरा नरेश कंस ललिता सखी नें मुस्कुराते हुये कहा

ये फिर आगया ? हे ललिते ये कंस एक बार पहले भी आचुका है जब मेरा जन्म ही हुआ था तब ये मेरे पद प्रहार को सह सका और अपनी मथुरा में जाकर गिरा था इतना कहकर कुछ सोचनें लगीं श्रीराधा रानी पर ये तो मेरे प्यारे को बड़ा ही कष्ट देता है ना ?

हाँ ये कंस बड़ा दुष्ट है आपतो सब जानती हैं सुदेवी सखी नें आगे आकर कहा

पर तुम लोग क्या देख रही हो ये निकुञ्ज है हमारा यहाँ किसी पुरुष का प्रवेश वर्जित है हाँ इस निकुञ्ज में तो एक ही पुरुष रह सकता है कुछ शरमा गयीं ये कहते हुए

तो आपकी क्या आज्ञा है स्वामिनी ? सखियों नें आज्ञा माँगी

इस मथुरा नरेश को भी सखी बना दो

आल्हादिनी की आज्ञा कुञ्ज में गूँजी

बस फिर क्या था कंस नें जब देखा अपनें आपको ओह

वो सखी बन चुका था ये क्या घबड़ाया कंस

सखियों ने ताली बजाकर हँसना शुरू कर दिया

अब ले आओ मथुरा नरेश कोहँसते हुये श्रीराधा रानी बोलीं

दो सखियाँ गयीं पकड़ कर ले आईँ श्रीराधा रानी के सामनें खड़ा किया गया कंस को वो क्या कहे ? वो तो कुछ सोच ही नही पा रहा था कि ये मेरे साथ क्या हो गया ? अब ये मथुरा भी नही जा सकता था

पर इस कंससखीको सखी के वस्त्र तो पहनाओकंस को देखते हुये हँसती ही जा रहीं थीं श्रीराधा रानी

सबनें पकड़ा और लंहगा फरिया सब पहना दिया हट्टा कट्टा कंस काला कुरूप कंस ऐसा कंस जब सखी बना

अब नाचके नही दिखाओगी कंस सखी सब हँसते हुए नचानें लगीं कंस को बेचारा कंस करे क्या नाचना ही पड़ा उसे तो

तू कौन है री ?  कहाँ से आयी है तू ?

बरसानें में जब कंस घूँघट डालकर चलता था तब महिलायें पूछती ही थीं बड़ी पहलवान है ये तो कहाँ से आयी है ये ?

अरी बता तो दे कहाँ से आयी है ? कंस क्या उत्तर दे कुछ नही बोलता था वो बेचारा

पर अब तो बरसानें में सब छेड़नें लगे बारबार पूछनें लगे

तब गौशाला में जाकर रहनें लगा कंस और गोबर फेंक कर वहीँ कुछ खा लेता था और वहीँ सो जाता था

देवर्षि बताइये ना हमारे महाराज कंस कहाँ गए ?

1 महीना बीत चुका था मथुरा में खलबली मच गयी महाराज कंस कहाँ गए राक्षस परेशान रहनें लगे थे

तब परम कौतुकी देवर्षि नारद जी पहुँचें मथुरा बस नारद जी को देखते ही राक्षस तो चरणों में गिर पड़े आपका ही सब किया धरा है अब आप ही बताइये की हमारे कंस महाराज कहाँ हैं ?

देवर्षि नारद जी नें आँखें बन्द कीं फिर जोर जोर से हँसे

इतना हँसे की उनका मुख मण्डल लाल हो गया था

आप हँस रहें हैं ? हमारे प्राण निकले जा रहे हैं प्रजा को कौन संभालेगा देवर्षि ? चाणूर मुष्टिक सब नें कहा

अच्छा अच्छा मैं लेकर आता हूँ देवर्षि जानें लगे तो दो कंस के ये राक्षस भी चल पड़े

नही तुम नही जाओगे मैं ही लेकर आऊंगा तुम लोग बस अपनें महाराज के आनें की प्रतीक्षा करो इतना कहते हुए देवर्षि हँसते हुए चल पड़े थे

जय हो बरसानें के अधिपति बृषभान जी की

बृषभान जी की गौशाला में ही पहुँच गए थे देवर्षि नारद

ओह देवर्षि

उठकर स्वागत किया चरण वन्दन किया देवर्षि का बृषभान जी नें

कैसे पधारे प्रभु हाथ जोड़कर पूछा

वो आज कल आपकी गौशाला में कोई नई सेविका आयी है

ये कहते हुए इधर उधर देखनें लगे थे देवर्षि

नही हमारे यहाँ कौन आएगा ?

बृषभान जी के संज्ञान में अभी तक ये बात आयी ही नही थी

एक आई है काली है कुरूप है और मोटी है ये कहते हुये फिर इधर उधर देखनें लगे देवर्षि

हाँ हाँ एक है पर पता नही वो आयी कहाँ से है ?

पहले उसे बुलाइये तो मैं बता दूँगा वो कहाँ से आयी है

देवर्षि हँसते हुये बोले

देखिये वो रही आपकी मोटी ताज़ी सखीबृषभान जी नें दिखाया कंस गोबर की परात उठाकर फेंकनें के लिये जा रहा था

देवर्षि नें कंस को जैसे ही देखा अब तो हँसी और रुके

सखी

इधर इधर जोर से चिल्लाये नारद

कंस को अब कुछ उम्मीद जागीवो खुश हुआ देवर्षि को देखते ही

नही तो कंस नें समझ लिया था कि इसी गोबर को फेंकते हुए अब जीवन बिताना पड़ेगा

ये पुरुष है बृषभान जी  देवर्षि नें समझाया

क्या ये पुरुष है ? चौंक गए पर इसे सखी किसनें बनाया ?

आपकी लाडिली श्रीराधा नें हँसी को रोकते हुए बोले

बुलाओ श्रीराधा को बृषभान जी को कुछ रोष हुआ

कुछ ही देर में अपनी अष्ट सखियों के साथ श्रीराधा रानी वहाँ उपस्थित थीं बाबा

ये क्या है ? ये कौन है ?

ललिता सखी हँसीं ये मोटी सखी है सब सखियाँ हँसी

तुम सब हँस रही हो ? ये पुरुष हैं और तुमनें इसे नारी बना दिया

पर ये हमारे निकुञ्ज में प्रवेश करके हमारी लीलाओं को देख रहा था

बड़े मासूमियत से श्रीराधा रानी नें कहा

पर ये है कौन ? तुम्हे पता है ? बृषभान जी नें फिर पूछा

हाँ पता हैये मथुरा नरेश कंस है

श्रीराधा रानी नें ही उत्तर दिया

क्या चौंक गए बृषभान जी

क्या ये सच है देवर्षि नारद जी  बृषभान जी नें देवर्षि से पूछा

हाँ ये सच है देवर्षि नें सहजता में कहा

अब जब बृषभान जी नें कंस को देखा तब उनके भी भीतर से हँसी फूट रही थी पर हँसे नही

चलो इनको वापस पुरुष बना दो श्रीराधा को आज्ञा दी बृषभान जी नें

ठीक है बाबा मैं बना तो दूंगी पर एक शर्त है ये कंस अब इस बरसानें में कभी आएगा नही इस बरसानें की सीमा का अतिक्रमण नही करेगा बोलो ?

बड़ी ठसक से बोलीं थीं बृषभान दुलारी

तुरन्त चरणों में गिर गया कंस हे राधिके मैं कभी आपके बरसानें में नही आऊंगा मैं आपसे सच कहता हूँ चरणों में अपनें मस्तक को रख दिया था कंस नें

कृपालु की राशि श्रीजीनें तुरन्त अपनी सखी ललिता को आज्ञा दी और कंस वापस पुरुष देह में आगया

देवर्षि मुस्कुराये और श्रीराधा रानी के चरणों में प्रणाम करते हुये कंस को लेकर मथुरा चले गए थे

हे वज्रनाभ ये श्रीराधा हैं बाहर से देखनें में लगता है कृष्ण लीला कर रहे हैं हाँ लीला तो कृष्ण ही करते हैं पर उस लीला में जो शक्ति काम कर रही होती है वो ये आल्हादिनी श्रीराधा ही होती हैं ये कृपा की राशि हैं।

सहज स्वभाव पर्यो नवल किशोरी जू को,

मृदुता दयालुता कृपालुता की राशि हैं


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 22

( “वो अलबेला केवट” – प्रेम की झाँकी )


मात्र आस्तिक हो या श्रीहरि का स्मरण भी करते हो ?

स्मरण मात्र करते हो या स्मरण करते हुए भीतर कहीं भीगते भी हो ?

नेत्र सजल होते हैं कभी ? या मात्र संसार के रिश्तेदारी को ही निभानें में समय बर्बाद कर रहे हो ?

स्मरण करो उस प्यारे से साँवरे का पर मन से करो

तुम्हारे भीतर सांसारिक प्यार के जितनें रूप हैं ना ईर्श्या, मोह, खीज, उत्कण्ठा , प्रतीक्षा , मिलना, और एकदम उसी में लय होजाना

अरे इन्हीं को कभी गम्भीरता से समझ लिए होते क्या कभी इन की गहराई में भी गए ? अपनें भीतर श्रीराधाभाव को पा लेते तुम, अगर इन सब को भी समझ लेते तो

पर तुम जो भी करते हो आधा अधूरा ही तो करते होचाहतुम्हारी भले ही संसारी पुरुष या स्त्री की होपर उसएकमें भी तुम पूरी तरह डूबे कहाँ ? अगर डूब जाते तो अपनें ही भीतर विराजे श्रीराधा माधवको पा लेते पर

जब किसी के लिये तुम्हारा हृदय धड़का तब तुममें कुछ कौतुहल जागा ही नही ये स्त्री छूटी या ये पुरुष छूटा तो फिर दूसरे पुरूष की तलाश में निकल गए या दूसरी स्त्री को खोजनें लगेपर तड़फ़ स्त्री या पुरुष की नही थीतड़फ़ थी प्रेम की एक प्रेम लीला जो तुम्हारे अन्तःस्थल में चल ही रही हैआत्मा तड़फ़ रही है परमात्मा से मिलनें परमात्मा तड़फ़ता है आत्मा से रमण करने के लिएइस मूल बात को नही समझे तुमऔर अभी भी कहाँ समझ रहे हो

काश उस प्रेम लीला में अपनें आपको झोंक दिया होताउस प्रेम लीला में जो निरन्तर चल रही है सनातनअनादि काल से क्या अभी भी हिम्मत है उस प्रेमलीला में अपनें अहं को विसर्जन करनें की ?पर दिक्कत ये रहेगी कि तुम नही रहोगे फिरतुम मिट जाओगे यही डर है ना तुम्हे ?

पर मंजिल तो यही है कब तक डरे रहोगे

महर्षि शाण्डिल्य वज्रनाभ के माध्यम से हमें ही समझा रहे हैं

श्रीदामा देख ना तेरी बहन राधा जिद्द कर रही है कि मैं भी दधि बेचनें सखियों के साथ जाऊँगीअब इसे समझा क्या ये बृषभान राजनन्दिनीको शोभा देगा मै समझा समझा कर थक गयी श्रीदामा अब अपनी बहन को तू ही समझा

कीर्तिरानी अपनें बड़े पुत्र श्रीदामा से राधारानी की शिकायत कर रही थीं

दधि बेचने जाना गोप कन्या के लिये कोई अनुचित कार्य तो है नही

श्रीदामा इतना बोल कर चल दिए नन्दगाँव की ओर

देखा श्रीदामा भैया भी मान गएमैया मेरा मन नही लगता यहाँ बैठे बैठे सखियों के साथ जाऊँगी क्या हुआ तो ?

जिद्द ही कर बैठीं थीं आज ये कीर्तिकिशोरी मानीं ही नहीं

अरे क्या हुआ ? हमारी लाड़ली कैसे आज मुँह फुला कर बैठी है ?

बृषभान जी भी आगये थे यमुना से और रूठी अपनी लाड़ली राधा को गोद में लेकर बड़े प्यार से पूछ रहे थे

मुझे सखियों के साथ दधि बेचनें जाना है बाबा

ओह बस इतनी बात ? बृषभान जी प्रसन्न मुद्रा में बोले

पर लोग क्या कहेंगें ? की बरसानें के अधिपति अब अपनी बेटी को दही बेचनें भेज रहे हैं कीर्तिरानी नें कहा

गोप कन्या है राधा भी अब गोप कन्या दही बेचे तो इसमें गलत क्या ?

और वैसे भी इसकी सखियाँ तो जाती ही हैं मन लग जाएगा अपनी राधा का जानें दो समाज के लोग और प्रसन्न होंगें कि देखो कितनी सरलता और सहजता है महल के लोगों में सामान्य लोग और विशेष लोग ये भेद हमारे बरसानें में कभी रहा नहीमैं सदैव इसका विरोधी रहा हूँ

बृषभान जी बड़ी दृढ़ता से बोल रहे थे

तो बाबा मैं जाऊंगीं ना कल से दही बेचनें ?

राधा रानी नें फिर पूछा

हाँ तुम जाओगी जाना राधा

बस ख़ुशी से उछल पड़ी थीं श्रीराधा रानी

कोरी ( नयी ) मटकी मंगवाई थी आज कीर्तिरानी नें मटकी में दही भर दिया था मटकी छोटी थी ताकि उठानें में कोमलांगी श्रीराधा को कोई कष्ट हो जैसे माखन चुराना कृष्ण की बाल चपलता थी नही तो जिसके यहाँ नौ लाख गौ हों वह भला क्यों चुरानें लगे माखन

ऐसे ही जिनके बरसानें में ऋद्धि सिद्धि वास कर रही हों वो दही बेचनें जायेगी ?पर जा रही हैं आज ये और कारण ?

कारण वही है अपनें साँवरे से मिलना उसे देखना बस

सखियाँ भी आज सब प्रसन्न हैं लाडिली आज हमारे साथ दही बेचनें चलेंगी पहले तो किसी को विश्वास हुआ पर ललिता नें समझाया पगली राजकिशोरी जैसा व्यवहार कभी हमारी श्रीजी नें तुम्हारे साथ किया है क्या ?

ना जी हम तो उनके साथ जब भी रहती हैं लगता है हमारी ही सखी हैं कभी कभी गलवैयाँ भी डाल लेती हैं वो तो ये कहते हुए सखी के भाव विभोर हो गयी थी

अच्छा चल अबश्रीजीके महल की ओर

सब सखियाँ सिर में दही की मटकी लेकर चल पडीं महल

आहा कितनी प्यारी लग रही हैं आज हमारी भानु दुलारी

छोटी सी कोमल इतनी मानों छुई मुई गौर वर्णी और बिजुली की सी आभानीले रँग का लहंगा पहनी हुयीं हैं

नजर लग जाए मेरी लाडिली को सखियों मेरी राधा का ख्याल रखना इसे कुछ होना नही चाहियेकीर्तिरानी ने सब सखियों को समझाया

कुछ नही होगाहम पलकों में रखेंगी इन्हेंआप चिन्ता करो कीर्ति मैया  ललिता सखी नें समझाया और चल पडीं श्रीराधा रानी को आगे करके सब सखियाँ दही बेचनें

अब बताओ कहाँ जायेगें दही बेचनें ? ललिता सखी नें पूछा पूछना तो आवश्यक था क्यों की दही बेचना ही उद्देश्य नही था

हे वज्रनाभ इतना स्मरण रखना यहाँ जो श्रीराधा रानी कह रही हैं वो बड़ी गूढ़ बात हैमहर्षि शाण्डिल्य नें सावधान किया

श्रीराधारानी कहती हैं हे सखी वहीँ चलो जहाँ हमारे कृष्ण हों क्यों की इससे दोनों काज संध जाएंगे दही का बेचना भी हो जाएगा और कृष्ण भी मिल जायेंगें

वज्रनाभ सुनकर आनन्दित हुए आहा हे गुरुदेव कितनी गूढ़ और रहस्य की बात यहाँ श्रीराधारानी नें कही है

संसार के मनुष्यों को ये बात समझनी चाहिये ऐसा कार्य करें जिससे हमारा स्वार्थ और परमार्थ दोनों संध जाए

हाँ वज्रनाभ

महर्षि शाण्डिल्य अपनें श्रोता की समझ से प्रसन्न हुये और कहनें लगे

तो फिर नन्द गांव ही चलेंक्यों की आपका साँवरा तो वहीँ है

सखियों नें हँसते हुए कहा और सब सखियाँ नौका में बैठकर नन्दगाँव गयींकोई दही लो कोई दही लो” “कोई तो लो दही नन्दगाँव की गलियों में आवाज लगाती हुयी सखियाँ चल रही हैं आगे आगे मीठी बोली में श्रीराधा रानी भी बोलती जा रही हैं पर

सखियों लगता है नन्दलाल यहाँ नही हैं श्रीराधारानी उदास हो गयीं तो कहाँ गए होंगें नन्दलाल ? ललिता सखी ने अपनें आँचल से हवा करते हुए पूछा

एकाएक उठीं श्रीराधारानी वृन्दावन चलो

पर अब साँझ होनें वाली हैललिता नें सावधान किया

चलो ना कुछ नही होता आजायेंगीं जल्दी उन्हेंएक बार देखकर आजायेंगीं चलो

श्रीराधा रानी की बात कौन टालता नौका में वापस बैठ गयीं सब और चल पड़ीं वृन्दावन की ओर

बस बस , यहीं नौका को लगा दो और देखती हैं कि कन्हैया इधर उधर ही होंगेंशीघ्र ही श्रीराधा रानी उतरीं, उनके पीछे सखियाँ वृन्दावन में उतरीं और वन में खोजनें के लिये चल पडींउधर होंगेललिता देख तो उधर से धूल उड़ रही है शायद उधर होंगें देख वहाँ मोर नाच रहे हैं मेरे श्याम उधर ही होंगे

सखियाँ इधर उधर दौड़ रही हैं श्रीराधा रानी भी पर नही, नही मिले श्याम उदासी घनी हो गयी मन में दुःख हो रहा है ओह प्यारे को आज मैं देख नही पाईआज का दिन कितना खराब गया

तभी ललिता चिल्लाई लाडिली यमुना में जल बढ़ गया है और हमारी नौका बह गयी

सखियों के सामनें ही नौका बह गयी ओह

आज तो दिन ही खराब था इंदुलेखा नें कहा

हाँ सही कह रही होजिस दिन श्याम दीखें वो दिन तो सच में ही खराब ही है श्रीराधा रानी के नेत्र सजल हो उठे

अरे लाडिली ये तो सही बात है पर अब जाएँगी कैसे बरसानें ?

और अगर ये बात बृषभान बाबा को पता चल गयी कि आप और हम यहाँ फंस गए हैं तो वो कल से आपको कहीं भी जानें आनें नही देंगें

ये बात सुनते हीश्रीराधा रानी और दुःखी हो गयींकि कल से हम नही पाएंगीं और कल भी श्याम सुन्दर को नही देख पाएंगीं

ललिते कुछ कर कोई नौका कहीं से आरही हो या जा रही हो उसे मोल हम ज्यादा देंगीं, पर हमें ले जाए जल्दी नही तो कल हम नही पाएंगी श्रीराधा रानी ललिता सखी से कहनें लगीं

देख रही हूँ शाम भी ढलनें वाली है मुझे ही डाँट पड़ेगी कीर्ति मैया की सब सखियाँ यमुना में कोई नौका वाला मिले यही देखनें लगी थीं

तभी

ये जग नैया हमार, नैया में हम हैं और हम में किनार

बड़े प्यार से गाता हुआमस्ती में झूमता हुआएक सुन्दर सा किशोर सिर में गमछा बाँधे हाथ में पतवार चलाते हुए नौका को लेकर चला आरहा था

केवट केवट सुन सारी सखियाँ चिल्ला पडीं

पर ये किसी की सुन ही नही रहा बस अपनी ही मस्ती में नौका चलाये जा रहा है

करें बिन पैसा पार, नैया में हम हैं और हम में किनार

गानें में ही इतना मस्त है कि उसे किसी की आवाज ही सुनाई नही दे रही

केवट केवट  इस आवाज को सुना उसनें

क्यों की ये आवाज श्रीराधा रानी नें लगाई थी

हाँ क्या हमें कह रही हो ? जोर से चिल्लाया

हाँ तुम्ही से कह रही हैं पहले इधर तो आओ

ये बात भी श्रीराधा रानी नें कही थीलो आगये

चार पतवार जोर से क्या मारी नौका आगयी

हाँ अब कहो पतवार को लेकर खड़ा हो गया त्रिभंगी झाँकी है इसकी साँवरा है

अच्छा सुन केवट हमें बरसानें जाना है हमें पहुँचा दे

ललिता सखी नें कहा पर ये बड़ा विचित्र केवट है देख ही नही रहा ललिता सखी को ये तो अपलक श्रीराधा रानी को ही देख रहा है

मल्लाह के सुन तो इधर देख इधर

ललिता सखी नें थोडा डाँटा

देखो हमारे पास समय नही है रात होंने वाली है इसलिये हमें जाना है हम तो इनके लिये आये थे ये कहते हुए फिर श्रीराधा रानी को देखनें लगा

हे केवट महाराज हमें पार लगा दोललिता नें थोड़ी चतुराई से काम निकालना चाहा

हाँ ऐसे बोलोगी तो हम सोच भी सकते हैं केवट थोडा भाव खा रहा है

अब बातें बनाओ हम को बैठा लो और पार ले चलो

ललिता नें प्रार्थना की मुद्रा ही अपनाई

हूँ केवट उछलता हुआ नौका से नीचे उतरा

बैठो  श्रीराधा रानी को देखते हुए सखियों से बोला

सब सखियाँ जैसे ही चढ़नें लगीं नौका में

रुको रुको जोर से चिल्लाया केवट

अब क्या हुआ ? हमनें क्या अपराध कर दिया ?

देखो मेरी नाव कितनी सुन्दर और साफ़ है और तुम लोगों के पैर

कितनें गन्दे हैं पहले धो लो फिर बैठो

ठीक है हम यमुना में पैर धोकर ही बैठेगीं

सब सखियाँ धोनें लगीं अपनें अपनें पैर

ऐसे नही होगा तुम्हारे धोनें से नही होगा मल मल के मैं ही धोऊंगा केवट की जिद्द है

ये क्या बात हुयी ? सखियाँ बोलीं

बस मेरी बात माननी पड़ेगी नही तो हम गए केवट नाव में बैठनें लगा

अच्छा अच्छा रुको लो धोलो हमारे पैर

सखियों नें कहा

कठौता ले आया केवट और ऊपर से जल डालते हुए सखियों के पैर धो दिए अब बैठ जाओ

चलो स्वामिनी जू सखियों नें श्रीराधा रानी से कहा

ना इनके पाँव भी तो धोऊंगा मैं केवट नें श्रीजी को देखा

श्रीजी कुछ चौंकी

बैठ गया केवटऔर श्रीजी के चरणों को मल मल के धोंने लगा

अब मैं बैठूँ नौका में मधुर वाणी में फिर श्रीजी बोलीं

आहा कितनी मीठी बोलती हैं ये पर आप स्वयं बैठेंगी तो मिट्टी फिर लग जायेगी और मेरी नाव फिर गन्दी हो जायेगी

तो ? मुस्कुराती हुयीं श्रीराधा रानी नें पूछा

मैं आपको गोद में उठाकर ले जाता हूँ केवट मुस्कुराया

नही , आपको ये कैसे छू सकता है श्रीजी ? सखियों नें मना किया

छूनें दे श्रीराधा रानी आज ये क्या कह रही थीं

देखा तुम्हारी स्वामिनी तुमसे समझदार हैं ये कहते हुए श्रीराधा रानी को केवट नें अपनी गोद में उठा लिया और नौका में बिठा दिया

अब तो चलाओ नौका सखियों नें फिर विनती की

श्रीराधा रानी को देखते हुये नौका चलानें लगा था वो अलबेला केवट

देखो श्रीजी इसके मन में कपट भरा है देखो कैसे आपकी ओर ही देखे जा रहा हैआप मत देखो इस की ओर

ललिता सखी नें श्रीराधा रानी से कहा

अब हमारी नौका नही चलेगी केवट नें यमुना की बीच धार में रोक दिया नाव को

अरे अब क्या हुआ ? सखियाँ परेशान हो गयीं थीं केवट से

हमें भूख लगी है तुम्हारी मटकियों में क्या है ? और देखो जब हमें भूख लगती है ना तब हमसे कोई काम नही होता

पतवार छोड़ दिया ये कहते हुए

दे दो सारा दही इसे सखी इसी के भाग्य में था हमारा ये माखन श्रीराधा रानी नें सबको कहा

हाँ लाओ

और सारा दही माखन देखते ही देखते खा गया वो केवट तो

डकार ली आहा सखी अब हमें नींद आरही है क्यों की हम जब कुछ खा लेते हैं ना तब हम से कुछ काम नही होता

अरे तू पागल है क्या सखियाँ चिल्लाईं

पर देखते ही देखते वो केवट तो गिरा श्रीराधा रानी के चरणों में

पर जैसे ही गिरा तो उसकी फेंट दीख गयी श्रीराधारानी को

अरे इसकी फेंट में क्या है ?

ललिता उठीं और फेंट में सेअरे ये तो बाँसुरी है

पर ये तो हमारे कृष्ण की बाँसुरी है ललिता सखी नें कहा

तब मुस्कुराते हुए श्रीराधा के चरणों को चूमते हुए कृष्ण उठ खड़े हुए

ओह तो तुम हो केवट महाराज सखियों नें बाँसुरी से ही पिटाई करनी शुरू कर दी पागल हो क्या बाँसुरी टूट जायेगी कन्हैया चिल्लाये और सामनें देखा तोश्रीजी खड़ी मुस्कुरा रही थीं

आगे बढ़े और अपनें बाहों का हार अपनी आल्हादिनी के गले में डाल दिया सारी सखियाँ आनन्दित हो उठीं थीं

बरसाना कब आगया किसी को पता भी चला था

हे वज्रनाभ ये है अद्भुत प्रेम की लीला ये अनादि काल से ब्रह्म और आल्हादिनी में चल ही रही है और चलती रहेगी

ये प्रेम लीला है यही है जो सत्य है बाकी सब झूठ है

प्रेम सत्य है प्रेम ही सत्य है महर्षि बार बार बोल रहे थे


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 23

( “बलिहार प्यारी जू” )


रे प्रेम सुन चुके हैं तेरी अकथ कहानी

श्रीराधाश्यामसुन्दर के इस प्रेमरस वर्षा की छींट भी हम पर पड़ जाए तो हम धन्य हो गए वो धन्यता सब पर भारी है ये प्रेम की यात्रा कहीं रूकती , थकती दिखाई नही देती इसमें तो और और की माँग ही उठती रहती है क्यों की प्रेम अतृप्ति का ही नाम है याद रखो वज्रनाभ प्रेम एक प्यास जगाती है या ये प्यास किससे बुझेगी उस ओर दिखाती है क्यों की हम प्यासे हैं बस किसके प्यासे हैं यही हमें समझ नही आता फिर दौड़ पड़ते हैं पैसे के लिये कि शायद धन से ये प्यास बुझे पर नही फिर दौड़ते हैं स्त्री और पुरुष के देह के पीछे कि शायद इससे प्यास बुझे पर नही ऐसे दौड़ते रुकते फिर दौड़ते हाँफते इस जिन्दगी को पूरा कर देते हैं पर प्यास का पता ही नही चल पाता कि वो प्यास किससे बुझेगी किससे बुझती

हे वज्रनाभ ये अनन्त जन्मों की प्यास जब तक अपनें सच्चे प्रियतमजो तुममे ही हैतुम्हारी और टुकुर टुकुर देख रहा है कि शायद अब मुझे पुकारेगा पर नही वो खड़ा है साँवरा तुम्हारे ही दरवाजे परपर तुम उसकी ओर देखते ही नही

काश तुम उस सच्चे प्रियतम की ओर एक बार देख लेते

मैं सच कहता हूँ तुम्हे फिर कहीं जानें की जरूरत ही नही पड़ती

फिर तो उस दिव्य प्रेम सरोवर में तुम भी किलोल करते

भुक्ति की छोडो मुक्ति तुमसे आकर कहती मुझे स्वीकार करो तो तुम्हे मुक्ति भी प्रिय नही लगती क्यों की ऐसे प्रेम सरोवर की क्रीड़ा को छोड़कर कहाँ उन ज्ञानियों के शुष्क मुक्ति की ओर तुम देखोगे

तब प्यास बुझेगी ? वज्रनाभ नें प्रश्न किया

हँसे महर्षि शाण्डिल्य प्यास और बढ़ेगी पर इस प्यास पर करोड़ों तृप्ति न्यौछावर करनें का तुम्हारा मन करेगा

उफ़ ये प्रेम है ही ऐसा

मैने तुझे कहा था ना बरसानें की किसी भी सखी की मटकी मत फोड़ना पर तुझे तो मेरी बात माननी ही नही है ना

मनसुख को डाँटते हुये कृष्ण बोल रहे थे

अब मुझे क्या पता थी कि वो सच में ही मथुरा जाकर कंस के किसी सैनिक को पकड़ लाएगी मैने सोचा था कि बस ऐसे ही धमकी दे रही है मनसुख रोनी सी सूरत बनाकर बोल रहा था

मैने तुझे बार बार कहा है पर तू

और साधारण सखी नही है ये ललिता सखी है बरसानें की मुख्य सखी है तेनें उसकी ही मटकी फोड़ दी अब भुगत

सब सखा कदम्ब के वृक्ष में चढ़े हुए हैं कृष्ण भी चढ़े हुए हैं

मनसुख नें आज सुबह ही ललिता सखी की मटकी फोड़ दी

ललिता सखी नें लाख मना किया पर मनसुख माना नही और फोड़ दी उसकी मटकी ललिता सखी नें मनसुख को कहा भी था देख मैं कोई तेरे नन्दगाँव की गूजरी नही हूँ जो तू मटकी फोड़ देगा और मैं कुछ नही कहूँगी पर माना नही मनसुख फोड़ दी मटकी

ललिता सखी नें धमकी भी दी थी देख मनसुख के मान जा

मैं सीधे मथुरा जाऊँगी और वहाँ तेरी शिकायत करूंगी और वहीँ से किसी सैनिक को पकड़ लाऊँगी

पर मनसुख माना नही और ललिता सखी की मटकी फोड़ दी

अब देख तू इस ललिता सखी नें तुम सबको मथुरा के कारागार में बन्द नही कराया तो

इतना कहते हुये पैरों को पटकती हुयी क्रोध में चली गयी थी और जाते जाते ये भी बोल गयी ललिता सखी बस दो घड़ी में सैनिक आरहा है तेरे सब सखाओं को और तेरा वो कन्हैया बुला लियो सब को नही पिटवाया और तुझे तो कारागार में सीधे मथुरा के कारागार में

हे कन्हैया मुझे बचा ले भाई मुझे नही जाना कारागार में

चुप चुप खुद भी फंसेगा और हम सब को फ़ंसायेगा

धीरे से थप्पड़ मारा कन्हैया नें मनसुख को कन्हैया नें मारा तो सब मारनें लगे

रुको रुको देखनें दो कहीं सच में ही तो नही ले आएगी सैनिक , ये ललिता सखी

वैसे बात की पक्की है ललिता श्रीदामा बोल उठा

आज तक उसनें झूठ नही बोला है ये बात तो पूरा बरसाना जानता है वो जो कहती है करती हैहाँ

अब तू डरानें दे रहा है हम सबको कन्हैया नें श्रीदामा की ओर देखते हुए कहा

नही , मैं तो सच्ची बात बता रहा हूँ

सच्ची बात रख अपनी अंटी में बताएगा सच्ची बात

हम भी कम नही है किसी सेहै ना कन्हैया ? मनसुख डरते हुये बोला

तू चुप बैठ, नही तो पिट जाएगा फिर एक चपत लगा दी थी कन्हाई नें मनसुख को कन्हैया की देखा देखि फिर सब पीटनें लगे मनसुख को अब सब चुप हो जाओ कन्हैया चिल्लाये

लो ले आई ललिता कंस के सैनिक को कन्हैया के माथे पर चिन्ता की लकीरें स्पष्ट दिखाई देंनें लगीं थीं

अब क्या करेंगें ? कन्हैया नें सबकी राय जाननी चाही

करेंगें क्या वो सैनिक एक है हम पचासों हैं पीट देंगें

श्रीदामा बोला

नही श्रीदामा कंस राजा को इस तरह चुनौती देना उचित नही होगा

सबनें कन्हैया की बात पर हाँमी भरी

अब तू तो कुछ बोल भोजन भट्ट मनसुख ? कन्हैया मनसुख को बोले तेरा ही सब किया हैअब मुँह खोल

मैं तो भोजन के लिये ही मुँह खोलता हूँ मनसुख सुस्त सा बोला

तू अब कारागार में जायेगा वहाँ तेरी अच्छे से पूजा होगी

सब ग्वाल बाल मनसुख को डाँटनें और डरानें लगे थे

चुप चुप कन्हैया नें सबको फिर चुप किया सब लोग कदम्ब के वृक्ष से देख रहे हैं ललिता सखी एक सैनिक को ले आई है

और कदम्ब वृक्ष के पास आकर बोलीये सब यहीं हैं यही हैं जिन्होंने मेरी मटकी फोड़ीजैसे ही ललिता नें सैनिक को बताया बस फटाफट कूदे कदम्ब पेड़ से ग्वाल बाल और सब भाग लिए

बस रह गए अकेले कन्हैया

चलो आओ नीचे

तेज़ आवाज में सैनिक नें लाठी दिखाते हुए कहा

कन्हैया करते क्या पेड़ से नीचे उतर आये

चंचल नेत्रों से इधर उधर देखा कन्हैया नें और जैसे ही भागनें लगे सैनिक नें फुर्ती दिखाई और पकड़ लिया

पर ये क्या ? जैसे ही सैनिक नें कन्हैया को पकड़ा

कन्हैया को कुछ हुआ ये पकड़ तो ?

चौंक गए कन्हैया सिर अभी तक नीचे था पर ऊपर उठाकर अब बड़े ध्यान से देखनें लगे

फिर अपनें हाथ को देखाउस सैनिक के हाथ को देखा गोरे हाथ और कोमल हाथ इस हाथ के स्पर्श को मैं जानता हूँफिर ऊपर सिर करके सैनिक को देखनें लगेइतना गोरा सैनिक

मुस्कुराये अब कन्हैया सैनिक पगड़ी बाँधे हुए था आगे बढ़कर पगड़ी को जैसे ही हटाया वो काले घनें बादलों की तरह केश बिखर गए

अच्छा तो आप हैं ? नकली मूँछों को हटा दिया

नजरें झुका लीं लाडिली नें शरमा गयीं

पर आप हमें कारागार में कैद कर ही दो स्वामिनी कंस के कारागर में नही अपनें इस हृदय के कारागार में

इतना कहते हुये आगे बढ़कर अपनी प्राणप्यारी श्रीराधारानी को अपनें बाहों में भर लिया था कन्हैया नें

और धीरे कानों में कहाबन गए आपके कैदी कर लो कैद

वो लजीली मुस्कान पेकन्हैया नें अपनें आपको न्यौछावर कर दिया

क्या कहोगे वज्रनाभ

क्या इस रस के आगे ज्ञान, योग, कर्मकाण्ड और मुक्ति भी फीकी नही है ?

ये प्रेम का सागर है जो इसमें डूब गया वही धन्य है

फिर कहूँ ये आत्मा और परमात्मा की प्रेम लीला है जो अनादि है अनन्त काल से चल रही है और अनन्तकाल तक चलेगी कोई ओर छोर नही है इसका

महर्षि शाण्डिल्य इससे ज्यादा क्या कहते ? क्यों की प्रेम में कहा नही जा सकता यही तो दिक्कत है अनुभव करो

पुतरिन पलंग बिछाये, पलक की कर दे बन्द किवार


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 24

( “श्रीराधा कुण्ड” – महिमा प्रेम की )


इस वाणी में क्या सामर्थ्य जो जगदाराध्य प्रेम की महिमा को गा सके

हे प्रेम धन्य है तेरी महिमा धन्य है तेरा अद्भुत रहस्य जितना जाननें की कोशिश करो तेरा रहस्य उतना ही गहराता जाता है

और जो प्रेम की रहस्य को जाननें में लग जाता है वह स्वयं एक रहस्य बन जाता है

धन्य है तेरी अतुलनीय शक्ति तू सबसे शक्तिशाली है ब्रह्म भी तेरे आगे नतमस्तक है तू ब्रह्म को भी नचानें की ताकत रखता है फिर कौन गा सकता है तेरे अकथनीय चरित्र को ?

ये कहते हुये आज मौन हो गए महर्षि शाण्डिल्य उनसे आगे कुछ बोला नही गया नेत्रों से झर झर आँसू बहते ही रहे

उनकी ऐसी भाव दशा देखकरउसी समय कृष्ण सखा श्रीउद्धव जी का प्राकट्य हुआ वज्रनाभ नें देखा सुन्दर सा रूप बिल्कुल कृष्ण चन्द्र जैसे पीताम्बरी धारण किये हुए मन्द मन्द मुस्कुराते हुये साष्टांग प्रणाम किया चरणों में वज्रनाभ नें उद्धव जी के

पर महर्षि शाण्डिल्य की आज ऐसी स्थिति नही थी कि बाह्य जगत का कुछ ध्यान भी रख पाते वो एक प्रकार की प्रेम समाधि में बह गए थे उनके सामनें बस श्रीराधा माधवही हैं उन्हें सर्वत्र वही लीला करते हुए दिखाई दे रहे हैं

उनको रोमांच हो रहा हैउनके देह से स्वेद निकल रहे हैं वो मूर्छित भी नही हैं पर बाह्य जगत उनके लिये आज शून्य हो गया है

साष्टांग प्रणाम किया उद्धव जी नें महर्षि शाण्डिल्य को

फिर वज्रनाभ की ओर देखते हुए बोले बहुत भाग्यशाली हो वज्रनाभ तुम तुंम्हारे भाग्य को देखकर तो अन्य जितनें भी यदुवंशी थे वे सब बेचारे लगते हैं कृष्ण उनके सामनें द्वारिका में रहे आते जाते रहे फिर भी वो लोग कृष्ण को पहचान सके

पर तुम ? धन्य हो तुम आल्हादिनी श्रीजी के पावन चरित्र को सुन रहे हो और वो भी श्रीधाम वृन्दावन की भूमि में बैठ कर और वो चरित्र भी महर्षि शाण्डिल्य जैसे प्रेमी महात्मा के मुखारविन्द से

उद्धव जी नें ये सब कहते हुये बारबार पीठ थपथपाई वज्रनाभ की

हे उद्धव जी मैने सुना तो था कि आपको श्रीकृष्ण चन्द्र जू नें बद्रीनाथ के लिए भेज दिया फिर आप यहाँ वृन्दावन कैसे ?

हे वत्स वज्रनाभ तुमनें ठीक सुना जब व्याध नें श्रीकृष्ण के चरणों में बाण मारा था उससे पूर्व मुझे ही ज्ञान देकर कहा था कि अब तुम बद्रीनाथ जाओ जाओ बद्रीनाथ क्यों की मैं अब परमधाम जानें वाला हूँ

मैं उस समय बहुत रोया था मैने रोते हुए कहा था मैं भी आपके साथ जाऊँगा अभी देह त्यागता हूँ मैं मैं देह त्यागनें के लिये तैयार हुआ ।पर मेरे नाथनें मुझे रोक दिया नही मेरी आज्ञा का पालन तुम्हे करना ही होगा इस तरह शोक ग्रस्त होना तुम्हे शोभा नही देता तुम मेरे ही हो तुम मेरे ही पास हो

मैने अपनें आपको सम्भाला फिर मेरे कन्धे में हाथ रखते हुये सजल नेत्र से मेरे श्री कृष्ण बोले थे उद्धव तुम बद्रीनाथ जाओ पर

पर क्या ? क्या नाथ ?

बद्रीनाथ जाते हुये मेरे श्रीधाम वृन्दावन होते हुए जाना

रो गए थे उस समय द्वारकेश मेरे इस मर्त्य भूमि को छोड़ते ही वृन्दावन वाले मेरे परिकर भी छोड़ देंगें इस भूमि को पर

उस भूमि में मेरी श्रीराधा रानी की सुगन्ध तो है उनका प्रेम तो हैउस प्रेम की सुवास हर जगह है वृन्दावन के कण कण में है वहाँ जाना उद्धव वहाँ जाकर बैठना यमुना के किनारे बैठना गिरिराज पर्वत की तलहटी में बैठना बरसानें की उस साँकरी गलीमें बैठना

रो गए थे ये कहते कहते उद्धव जी

फिर कुछ देर बाद अपनें को सम्भालते हुए बोले थे

उद्धव

मुझे व्याकुल हो मेरे प्राणनाथ नें सम्बोधन किया।

मैने उनके चरण पकड़ लिए नाथ आज्ञा

गिरिराज गोवर्धन में एक कुण्ड है उस कुण्ड में अवश्य जाना वहाँ बैठना आचमन करना उस कुण्ड का

क्या नाम है उस कुण्ड का ? किस दिशा में है वह कुण्ड ?

वज्रनाभ मैने उस पवित्र कुण्ड का नाम जानना चाहा जिसे याद करके मेरे नाथ बिलख रहे थे

राधा कुण्ड

सबसे पावन कुण्ड है वो उद्धव गोवर्धन पर्वत के निकट है

एक हजार वर्ष गंगा में नहानें का जो फल है एक हजार वर्ष हिमालय में वास करनें का जो फल है एक हजार वर्ष तक दान तप करनें का जो फल है वो फल मात्र एक बार राधा कुण्ड के आचमन से प्राप्त हो जाता है हे उद्धव एक बार उस कुण्ड के जल का जो छींटा अपने मस्तक में डालकर मेरी प्राणप्रिया श्रीराधाका नाम लेता है उसके पुण्य की कोई सीमा नही होती वो जो चाहे प्राप्त कर सकता है और जिसे कुछ नही चाहिये उसे तो पराभक्तिही मिलती है

आहा कितनें प्रेम से हे वज्रनाभ राधा कुण्डकी महिमा का गान किया था मेरे नाथ नें ।मैं सुनता रहासुनता रहा वज्रनाभ और वो बोलते रहे ।फिर उसके बाद मुझे उन्होंने विदा किया था

मैं वहाँ से चला जब द्वारिका में पूरा यदुवंश नष्ट हो गया तब चला जब मेरे प्राण धन अपनी लीला समेट करनिकुञ्ज में जा चुके थे तब मैं चलाऔर पता है वज्रनाभ जब मैं चला था द्वारिका से तब ऐसा लग रहा था जैसे कोई चक्रवर्ती सम्राट लुट गया हो कंगाल हो गया है आज

मैं बद्रीनाथ जा रहा था पर उससे पहले मैं इस प्रेम भूमि को प्रणाम करना चाहता था जो मेरे नाथ की आज्ञा भी थी

मैं आया इस भूमि में हर जगह गया गिरिराज गोर्वधन में बरसाने धाम में गोकुल नन्दगाँव में

और अब श्रीराधा कुण्डमें राधा कुण्ड में आते ही मुझे रोमांच होनें लगा मैं देहातीत हो गया

मुझे कुछ सुध रही मैनें राधा कुण्ड में स्नान किया और जैसे ही स्नान किया मुझे कोई , कई सुंदरियों नें खींच लिया मैं घबड़ाया मुझे ये क्या हो रहा था ये कौन हैं

पर कुछ ही क्षण के बाद मैने देखा एक दिव्य सिंहासन है उस सिंहासन के चारों और अष्ट सखियाँ थीं वो सेवा में लगी हुयी थीं और उस दिव्य सिंहासन में

श्रीयुगल सरकार श्रीराधारानी बायीं ओर और दाहिनी ओर श्रीश्याम सुन्दर विराजमान हैं

मैं गदगद् भाव से नाचनें लगा गानें लगा

जय राधे जय राधे राधे , जय राधे जय श्रीराधे

 जय कृष्ण जय श्रीकृष्ण

आगे क्या हुआ उद्धव जी वज्रनाभ नें पूछा

उद्धव जी बोल नही पाये कि आगे क्या हुआ ?

अच्छा मुझे दर्शन तो करा दीजिये उस दिव्य राधा कुण्ड के ?

वज्रनाभ नें विनती की

उद्धव जी चले आगे आगे और उनके पीछे चले वज्रनाभ

एक दिव्य कुण्ड में लाकर मुझे इशारे में कहा ये है वो कुण्ड

इतना कहकर उद्धव जी अंतर्ध्यान हो गए थे

मैं वहाँ बैठा रहा कब तक बैठा रहा मुझे भी पता नही

मैं उसी कुण्ड के जल का पान करता था स्नान करता था और उन्हीं युगल नाम का गायन करता था

मुझे युगलवर के दर्शन होते थेमेरे आनन्द का ठिकाना नही था

एक दिन मैं बैठा हुआ था कि पीछे से एक प्रेम की ऊर्जा नें मुझे छूआ मैं उस स्पर्श से और आनन्दित हुआ पीछे मुड़कर देखा तो मेरे सामनें महर्षि शाण्डिल्य थे

मैं उनको देखते ही नाच उठा महर्षि राधा कुण्ड मैं इतना ही बोल पाया क्यों की भावातिरेक के कारण मेरे शब्द नही निकल रहे थे

इस कुण्ड की महिमा स्वयं कृष्ण नही गा पाते तो तुम और हम क्या हैं ?

महर्षि नें मुझे बताया

ये दिव्य क्यों होगा स्वयं श्रीराधिका नें अपनें कँगन से पृथ्वी को खोदकर इसे प्रकट किया है

आचमन किया महर्षि नें भी राधा कुण्ड में

मुझे इस चरित्र को सुनना है हे महर्षि कृपा करें कैसे श्रीराधा रानी नें इस कुण्ड को बनाया ?

कृपा करो महर्षि  साष्टांग चरणों में गिर गए थे वज्रनाभ

महर्षि शाण्डिल्य फिर श्रीराधा चरित्रका स्मरण कर भाव समाधि में जा रहे थे पर अपनें आपको उन्होंने रोका और आगे की कथा सुनानें लगे थे

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 25

( कृष्ण को भी पावन किया श्रीराधा नें )


प्रेम से पवित्र और क्या है ? पापी से पापी को भी पावन बना दे प्रेम

अरे अच्छे अच्छे पतितों को भी पावन बनानें की हिम्मत रखता हैप्रेम

फिर हँसे महर्षि शाण्डिल्य

पतित पावनको भी पावन बना देती है ये प्रेम

और क्या पतितपावन कृष्ण हैं पर उस कृष्ण को भी पावन बनानें की शक्ति श्रीराधारानी में ही है

जैसे गंगा भी पापियों के पाप धोते गन्दी होजाये तो ?

हो ही जाती है और वज्रनाभ ये प्रश्न गंगा नें किया भी था जब भागीरथ तप कर रहे थे और बारम्बार विनती कर रहे थे कि गंगा आप उतरो इस धरा धाम में तब गंगा नें इसका समाधान चाहा था भागीरथ से कि मैं तो जाऊँगी पर पृथ्वी में नाना प्रकार के पापी मेरे ऊपर नहायेंगे और अपना पाप छोड़ कर जायेंगें तब मेरा क्या होगा ? मैं तो पापों का ढ़ेर लिए धीरे धीरे सिकुड़ जाऊँगी ना

इसके उत्तर में भागीरथ नें कहा था गंगा आप उतरो पृथ्वी में पापी नहायेंगें तो पाप छोड़ जायेंगें पर आपमें जब कोई प्रेमी महात्मा नहायेंगें तो वो तुम्हारे में छोड़े गए पापों को नंष्ट करते हुये अपनी भजन की ऊर्जा तुम्हे प्रदान करके चले जायेंगें

हे वज्रनाभ ईश्वर भी अपनी ईश्वरता से थक जाता होगा ना

पतितों को पावन करते करते तब अपनें में से ही वो आल्हादिनी के माध्यम से अपनें को पावन बनाता है

ये बात फिर स्पष्टतः समझते चलोकि आल्हादिनी कहो या प्रेम कहो या राधा कहो ये सब ब्रह्म के ही तो रूप हैंया इस तरह से समझो कि ब्रह्म के ही हृदय का प्रेम आकार लेकर प्रकट होता है श्रीराधा के रूप में तब वह ब्रह्म भी पावन, आल्हादपूर्ण , और विश्राम को उपलब्ध होता है

नही नही बुद्धि लगाओ ये मत सोचो कि मैं कृष्ण रूपी ब्रह्म को छोटा बता रहा हूँ और राधाको ही बड़ा बता रहा हूँ ये सब उसी ब्रह्म का ही विलास है आल्हाद है रास है लास्य है

दोनों एक ही हैं वज्रनाभ इस बात को समझो

बस लीला है ये सब लीला है

अब तुम ये मत पूछना की लीला क्यों है ? लीला किस लिए है ?

इसका उत्तर मैं कई बार दे चुका हूँ लीला का कोई उद्देश्य नही होता बस अपनें आनन्द को प्रकट करनायही है लीला का उद्देश्य

श्रीराधा कुण्ड में बैठे हैं कुण्ड की शीतल और प्रेमपूर्ण हवा में प्रसन्न हैं दोनों ही श्रीराधाचरित्रके वक्ता और श्रोता

हे वज्रनाभ मुझे पता है परम भागवत श्रीउद्धव जी आये थे और उन्होंने तुम्हे इस दिव्य श्रीराधा कुण्ड के बारे में बताया था

उद्धव जी बद्रीनाथ गए तो पर उनका वहाँ मन नही लगावापस यहीं आगये और इस श्रीराधा कुण्ड के निकट ही वो वास करते हैं

ये राधा कुण्ड दिव्य है श्रीराधा रानी नें इसको प्रकट किया है

इतना कहकर महर्षि इस कुण्ड की कथा का गान करनें लगे कि कैसे इस श्रीराधा कुण्ड का प्राकट्य हुआ

वो भयानक राक्षस थाअरिष्टउसका नाम थाउसके जैसा शक्तिशाली कोई नही थावो अरिष्ट अपना रूप कैसा भी बना लेता था

एक बार मथुरा में आया कंस के पास हे वज्रनाभ कंस को राक्षसों से मित्रता रखनें की एक सनक थी उसके बड़े से बड़े राक्षस मित्र थेअरिष्टकंस का नाम सुनकर ही मथुरा में आया था

कंस नें खूब स्वागत किया उसकाऔर बातों ही बातों में कृष्ण को मार दो मैं उससे दुःखी हूँअपना दुखड़ा भी सुना दिया

मित्र कौन कृष्ण ? कहाँ रहता है ? उसका वर्णन करके सुनाओ मेरे रहते तुम दुःखी हो ?

नन्दगाँवकह दियासाँवरा रँग हैकृष्ण नाम है और ग्वाला है मोर मुकुट पहनाता है उस गांव के मुखिया का बेटा है

इतना काफी था उस असुर अरिष्ट के लिये ये परिचय

पर तुम किस रूप में जाओगे वहाँ ? कंस नें पूछा

तुमनें कहा ना वो ग्वाला है तो मुझे देखो

बस इतना कहते ही वो अरिष्ट तो बृषभ बन गया

बैल बहुत बड़ा और शक्तिशाली बैल

उसे देखते ही कंस भी एक बार के लिये तो डर गया वो जब अपनें नथूनें से साँस फेंक रहा था तब ऐसा लगता था कि आँधी चल रही है कंस उसे देख कर खुश हुआ

जाओ मित्र जाओ मेरे उस काल कृष्ण को मारकर ही आना

बस वो अरिष्ट बैल के रूप में भागा नन्द गाँव की ओर

गौ चारण करके लौट रहे हैं श्याम सुन्दरसन्ध्या की वेला है

कोई कृष्ण से ठिठोली कर रहा है कोई हँसा रहा है

आगये हैं कृष्ण अपनें महल में गायों को बांध दिया है गौशाळा में

मैया भूख लगी है कुछ दे थकना स्वाभाविक है सुबह के गए अब आये हैं बालक ही तो हैं

मैया नें लाकर माखन मलाई और रोटी रख दी है

पर खानें के लिए अब पहले की तरह नही मैया की गोद में ही अपना सिर रखकर लेट गए कृष्णआँखें मूंद ली हैं

मेरा लाला कितना थक जाता है नामैया पैर दवा रही हैं कृष्ण को अच्छा लग रहा है तभी

कन्हैया

दूर से एक आवाज आयी पुकारनें वाले नें भयाक्रांत होकर पुकारा था

कृष्ण नें सुनी और तुरन्त उठकर बैठ गए

लेट जा इन ग्वालों को भी चैन नही है जब देखो कन्हैया कन्हैया सुबह से शाम तक साथ में ही तो रहते हैं ये सब तेरे सखा

तू लेट जा थक गया है

पर फिर आवाज आयी

कन्हैया सांड आगया है हमारे नन्द गांव में

जोर से मनसुख चिल्लाया था कृष्ण फुर्ती से उठे और भागे बाहर

अरे रोटी तो खा ले ये भी ना

मैया परेशान हो उठीं थीं बाहर गयीं देखनें तो

एक बड़ा भीषण विशाल देह का बैल जिसनें नन्दगाँव के परिखा को तोड़ दिया था बड़े बड़े भवनों को अपनें सींग से उखाड़ फेंक रहा था

गाय तो उसे देखते ही भाग रही थी बालकों को बूढों को जो सामनें आये उन्हें बस मार ही रहा था

कृष्ण से देखा नही गयावो उछलते हुए एक पेड़ पर चढ़ गए

और वहाँ से उसअरिष्टको देखनें लगे

अरिष्ट नें भी देख लिया था यही है यही है कृष्ण

वो दौड़ा उसके दौड़नें से आँधी सी उड़नें लगीकोई देख नही पा रहा था कि अब क्या होगा कन्हैया बच सब चिल्लाये

उस अरिष्ट नें ये सोचा था कि मैं पेड़ को ही उठाकर फेंक दूँगा तो कृष्ण मर जाएगा

उसनें उसनें सींग से पेड़ को उखाड़ दिया और दूर फेंक दिया

पर ये क्या कृष्ण तो उसके ऊपर ही चढ़ गए थे पर कैसे ये वो असुर भी नही समझ पाया था उसके दोनों सींगों को जोर से पकड़ लिया था

अरिष्ट इतना तो समझ गया कि ये कोई साधारण नही है

वो दौड़ा पर कृष्ण नें उसकी सींगें छोड़ी नहीं हाँ बस थोडी ही देर में उस बैल के सीगों को उखाड़ कर और धरती में गिरा दियाऔर उसके ऊपर चढ़ गए कृष्ण

रक्त से लथपथ हो गया था वो वो धरती में गिर तो गया था पर अभी भी वो उठनें की कोशिश में था कृष्ण नें एक हाथ मारावो कृष्ण का हाथ उसके पेट में घुस गया और जब जोर से निकाला तब रक्त के फुब्बारे से फूट पड़े थे

मार दिया बैल कोअरे बैल को मार दिया

पर बैल तो धर्म रूप होता है ऐसे बैल को नही मारना चाहिए था

हजार तरह की बातें उठनें लगीं उसी समय नन्दगाँव में

कृष्ण चुपचाप अपनें महल में आगये थे

कन्हैया सब कह रहे हैं तूनें गलत किया

मनसुख बोला

नही तू भगा देता उस बैल को पर मार ही देना ये तो ठीक नही था

मधुमंगल नें भी अपनी बात कह डाली

बैल कुछ भी हो हमारे शास्त्रों में धर्म रूप कहा जाता है

इसलिये सब कह रहे हैंतुझे ब्रह्महत्या लगी है

क्या कृष्ण चौंके कौन कह रहा है ये सब ?

पूरे नन्दगाँव का समाज ही कह रहा है सब सखाओं नें कहा

कृष्ण शान्त रहे कुछ नही बोले

जब दूसरे दिन गौचारण करके महल में आये तब कई लोग बैठे थे बाहरये सब नन्दगाँव के पञ्च थे

देखो जी आप बृजपति हैं हम मानते हैं पर हमारा भी तो धर्म है ऐसे धर्म पर हम कैसे प्रहार होनें दें बैल हमारा पूज्य है उसे तुम्हारे पुत्र नें मार दिया ।गलत किया ऐसा नही करना चाहिये था अरे बैल, गाय ये तो हमारे धर्म के प्राण हैं

सब पञ्च बोल रहे थे

इसका समाधान ? कृष्ण आगे आये

तू मत बोल कन्हैया भीतर बड़े लोग हैं ये लोग तेरे बाबा हैं ना बात कर लेंगेंमैया यशोदा ने भीतर खींचना चाहा कृष्ण को

नही मैनें गलती की है तो अब मैं भी सुनूँ कि इसका प्रायश्चित्त क्या है ?

तीर्थ स्नानक्यों की ये ब्रह्म हत्या है इसलिये समस्त तीर्थों की नदियों में स्नान पंचों नें अपना निर्णय सुना दिया

और अगर सारे तीर्थ यहीं बुला लूँ तो ?

कृष्ण सहज बोले थे

हाँ ठीक है पर कैसे बुलाओगे यहाँ हँसे पञ्च

एक कुण्ड मेंकृष्ण नें उत्तर दिया

पर वो कुण्ड नया होना चाहिएऔर हम सबके सामनें वो प्रकट हो उसमें जल हमारे सामनें आये तब हम मानेंगें कि ये तीर्थ तुमनें प्रकट किया है

हाँ ठीक है

चलो चलो मेरे साथ कृष्ण नें तुरन्त कहा

पर अभी ? पञ्च घबड़ाये हाँ अभी ? क्यों ?

नही चलो। सब चल दिए गोवर्धन पर्वत के पास गए कृष्ण और एक स्थान पर

आँखें बन्दकरके बैठ गए

गंगा, सरस्वती नर्मदा कावेरी बारि बारि से नाम लेनें लगे नदियों का तीर्थों का

और देखते ही देखते जल आगया धार फूट पड़ी

सारे ग्वाल बाल नाच उठेकृष्ण कुण्डकृष्ण इस कुण्ड का नाम कृष्ण कुण्ड हैनाहा तू अब इसमें

कृष्ण नें स्नान किया

अब तो मेरा लाला पवित्र हो गया ?

बृजरानी यशोदा नें गुस्से से देखा पंचो को

हाँ अब तो पवित्र हो गया आपका लाला ब्रह्म हत्या से मुक्त हो गया तुम्हारा लाला

मैया नें चूम लिया था कृष्ण कोअपनें लाडले कन्हैया को

ललिता हमारे कृष्ण का कुण्ड बन गया कृष्ण कुण्ड

ओये विशाखा कृष्ण कुण्ड बन गया

हाँ तो मैं क्या करूँ ? बन जाए अच्छी बात है ललिता नें मनसुख की बात पर ज्यादा ध्यान नही दिया

पर तुम्हारी राधा रानी का कुण्ड कहाँ है ?

मधुमंगल को बोलना जरूरी है

सुन हमारी श्रीराधा रानी को ब्रह्म हत्या लगती ही नही है तो कुण्ड क्यों चाहिये जो ये पाप करे वो कुण्ड बनाये

और देख देख

ललिता सखी ने ग्वाल बालों को दिखाया

एक ब्राह्मण पण्डित जी कृष्णकुण्ड के पास से होकर गए गोवर्धन पर्वत में और वहाँ के झरनें में जाकर स्नान किया

पूछ अब मनसुख कि उन पण्डित जी से कि तेरेकृष्ण कुण्डमें क्यों नही स्नान किया ?

मनसुख नें तो नही पूछापर ललिता ही पूछ बैठी

अरे पण्डित जी नहा लेते इसी कुण्ड में क्यों नही नहाये ?

ब्रह्महत्या लगी है इस कुण्ड में कृष्ण का पाप इसी कुण्ड में है हम क्यों नहानें लगे पंडित जी के जबाब से मनसुख चुप हो गया

पर श्रीराधा रानी को आकर जब ये बात बताई ललिता नें तब सजल नयन हो गए थे श्रीराधारानी के

नही ललिते कृष्ण कुण्ड को पवित्र बनाना होगा समाज के लोग उसमें स्नान करें ऐसा करना होगा क्यों की मेरे प्रियतम का कुण्ड है वो श्रीराधा रानी का हृदय प्रेम से भर गया

पर कैसे ? ललिता नें पूछा

चलो मेरे साथ श्रीराधा रानी गयींऔर कृष्ण कुण्ड के पास में ही जाकर अपनें कँगन से खोदनें लगीं पृथ्वी

आहा देखते ही देखते जल का स्रोत फूट पड़ा

नन्दगाँव के लोग और बरसाने के लोगों में ये बात आग की तरह फ़ैल गयी सब दौड़े गिरिराज गोवर्धन की ओर

ये कुण्ड श्रीराधारानी नें प्रकट किया है

और इस कुण्ड के जल में विश्व् की समस्त औषधियां हैं देवों के समस्त पुण्य हैं ऋषियों के तप हैं प्रेमियों का प्रेम है भक्तों की भक्ति हैसब कुछ है इसमें

ये बात कोई और नही कह रहा थास्वयं भूतभावन भगवान शंकर प्रकट हुए थे आकाश में और समस्त बृजवासियों के सामनें ये बात कह रहे थेइस कुण्ड का नाम आज से राधा कुण्डहोगा

कृष्ण कुण्ड में इसका जल जाएगा जिसके कारण कृष्ण कुण्ड का जल पवित्र हो जाएगा

भगवान शंकर की दिव्य वाणी गूँज रही थी

इस कुण्ड के जल में स्नान करके जो श्रीराधा कृपा कटाक्षका पाठ करेगा और युगल मन्त्रका जाप करेगा उसकी समस्त कामनाएं पूरी होंगी और अंत में उसे निकुंजेश्वरी श्रीराधा रानी अपनी प्रेमाभक्ति प्रदान करेंगीं इतना कहकर भगवान शंकर नें श्रीराधा रानी को प्रणाम किया और अन्तर्ध्यान हो गए

देखा कृष्ण को भी पावन कर दिया हमारी श्रीराधा रानी नें

ललिता सखी आँखें मटका के ग्वालों को बोल रही थी

पतितों को पावन करनें वाले कृष्णपरपतितपावनको भी पावन करनें वाली हमारी श्रीराधा रानी

सब एक स्वर में बोल उठे थेबोलो श्रीराधा कुण्ड की जय

डगर बुहारत साँवरो, जय जय राधा कुण्ड


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 26

( “कृष्ण श्रीराधा और अयान” – एक प्रेम कथा )


प्रेमी के बराबर त्याग किसका ? प्रेमी के बराबर तप किसका ?

प्रेमी हर समय पंचाग्नि तापता है प्रेमी हर दिन काँटों में चलता है

प्रेमी की हर पल परीक्षा होती है प्रेमी अपनें ही सिर को काटकर गेंद बनाकर उससे खेलता है

प्रेमी के बराबर कौन सहता है ,

प्रेमी के बराबर पल पल कौन मरता और जीता है

फिर भी प्रेमी हँसता है ठहाके लगाकर हँसता है क्यों की ये सब वो अपनें लिये नही अपनें प्रियतम के लिए ही करता है

उसकी हर क्रिया का एक ही उद्देश्य तो है कि मेरे प्रियतम तुम खुश रहो मेरामैंतो मिथ्या है सत्य तोतूहै प्यारे

उफ़  ये प्रेम पन्थ अति ही कठिन

हे वज्रनाभ श्रीराधा रानी जैसा त्याग किसका है ?

श्रीराधा नें अपनें आपको फूँक दिया है मिटा दिया है अपनें साँवरे में सब कुछ जलाकर ये उस प्रकाश में अपनें प्यारे को देखती है और नाचती है

सुनो एक श्रीराधा रानी के त्याग की कहानी

महर्षि शाण्डिल्य सुनानें लगे थे उस कथा को जो प्रेम के इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी

मधुमंगल , मनसुख, तोक, श्रीदामा, सुबल, ऐसे अनेक सखा थे कृष्ण के जो निरन्तर साथ ही रहते थे सबके साथ प्रेम था कृष्ण का सब कृष्ण को प्राणों से भी ज्यादा मानते थे

पर एक सखा और था हे वज्रनाभ उस सखा का नाम था अयान गोपशान्त था ये सखा बस कृष्ण के चरणों को ही देखता रहता था जब जब अकेले में कृष्ण को पाता उनके चरणों को अपनी गोद में रखकर चरण दवाता चरण चिन्हों को देखता उसे उस समय रोमांच हो जाता था आहा कृष्ण के ये चरण उसकी समाधि लग जाती थी

ऊँगली से एक एक चरण चिन्ह को छूताये चक्र, ये शंख, ये कमल, ये वज्रये गदाये त्रिकोण

अच्छे घर का था येअयानसमृद्ध थे इसके माता पिता भी

पूरे बृज मण्डल में आदर था अयानके पिता का

पर ये कृष्ण को ही अपना सर्वस्व मानता था

एक दिन अकेले में कृष्ण के चरणों को दवाते हुए रो गया अयान लेटे हुये थे कृष्ण कदम्ब वृक्ष के नीचे उठ गए जब अयान के आँसू कृष्ण चरणों में गिरे तब

आँसू भले ही शीतल थे कोई दुःख या विषाद के आँसू नही थे आँसू थे तो अहोभाव के पर कृष्ण उठे

इतना भाव इतना प्रेम करते हो तुम मुझ से अयान

बड़े प्रेम से कृष्ण नें अयान को पूछा

आज कुछ माँगनें का मन कर रहा है सखे

अयान निःश्वार्थ प्रेमी था वो क्यों माँगनें लगा पर आज

हाँ हाँ माँगो ये कृष्ण अपनें सखा को , जो माँगोगे आज देगा

वचन दे रहे हो अब मन्द मुस्कुराया अयान

विश्वास नही है कृष्ण नें गले से लगाते हुए कहा

विश्वास तो अपनें से भी ज्यादा है तुम पर

तो माँगो क्या माँगते होमैं वचन देता हूँ कृष्ण भी देंनें पर उतारू थे

चरणों में गिर गयाअयानऔर भावातिरेक में बोला

जो आपको प्राणों से प्रिय हो वो दे दो

क्या स्तब्ध रह गए कृष्ण अयान के मुख से ये सुनकर

कृष्ण के तन मन में चित्त और आत्मा में बस एक ही नाम छाया हुआ हैश्रीराधा कृष्ण को प्राणों से प्रिय और कौन हुआ श्रीराधा के सिवाय ?

ये क्या माँग लिया अयान गम्भीर हो गए कृष्ण

देखो गम्भीर होनें से नही होगा अपनें सखा को वचन दिया है तुमनें जो मांगूंगा दोगे अब देना पड़ेगा अयान भी जिद्द पकड़ कर बैठ गयामेरी प्राणों से प्रिय तो मेरी राधा है

मन ही मन में बोलनें लगे थे कृष्ण

क्या मैं राधा को दे दूँ ? टप् टप् आँसू बह चले कृष्ण के

पर वचन का क्या ? इस सखा को मैने वचन दे दिया और सखा से मैं झूठ कैसे कहूँ सत्य यही है कि मेरे प्राणों से भी प्रिय तो मेरी श्रीराधा रानी हैं ओह

अच्छा अच्छा मत दो मुझे मैं तो ऐसे ही कह रहा था आँसू पोंछ दिए अयान नें कृष्ण के

नित्य सायंकाल मिलनें आते थे नन्दगाँव और बरसाने की सीमा में एक कुण्ड था वहीँ बैठ जाते थे ये दोनों प्रेमी और हँसते बतियाते मिलते

आज भी आये कुण्ड में दोनों बैठे चरणों को कुण्ड के जल में डुबोकर बैठे

पर आज कृष्ण गम्भीर हैं कुछ बोल नही रहे

प्यारे क्या हुआ ? तुम बोलते क्यों नही हो ? कृष्ण के कपोलों को छूते हुये श्रीराधा रानी नें कहा

तुरन्त चरण पकड़ लिए कृष्ण नें श्रीराधा रानी के

ये क्या कर रहे हो उठो श्रीराधा नें उठाना चाहा

नही आज ये कृष्ण तुमसे कुछ माँगना चाहता हैमना मत करना

कृष्ण नें श्रीराधा रानी की ओर देखते हुए कहा

क्या बस इतनी बात माँगों क्या चाहिए मेरे प्राणधन को श्रीराधा रानी नें ये कहते हुये फिर उठाना चाहा अपनें चरणों से

नही वचन दो पहले वचन दो मेरी प्यारी राधे पहले वचन दो कृष्ण नें वचन माँगा

क्या कर रहे हो आज ये क्या लीला है ये तुम्हारी अरे प्राण माँग लो राधा हँसते हँसते दे देगीउफ़ करेगी बोलो

नेत्रों से अश्रु प्रवाह चल पड़े बह चले आँसू कृष्ण के

पर रो क्यों रहे हो माँगों प्यारे क्या चाहिये ?

अयान गोप से विवाह कर लो

कृष्ण के मुँह से निकल गया

क्या ? शरीर में कम्पन शुरू हो गया श्रीराधा रानी के

हाँ मैने वचन दिया है हे राधे मैने वचन दे दिया है अयान को कि हिलकियाँ फूट पडीं कृष्ण की

हँसी श्रीराधा मैं तुम्हारी हूँ सिर्फ तुम्हारी जिसे चाहे दे दो पर तुम रो क्यों रहे हो कृष्ण चौंके श्रीराधा रानी के मुख मण्डल की ओर देखा राधे

हाँ मैं तुम्हारी हूँ सिर्फ तुम्हारी अधिकार है तुम्हारा मुझ पर पूर्ण अधिकार है प्यारे इस विवाह से अगर मेरा कृष्ण खुश होता है तो ये राधा हँसते हँसते मान जायेगी हाँ बस तुम खुश रहो तुम प्रसन्न रहो

ये कहते हुए राधा नें आँसू पोंछ दिए कृष्ण केइन आँसुओं पर सिर्फ राधा का अधिकार है तुम्हारा नही तुम मुस्कुराओ बस

इतना कहकर उठी राधा और चल दी बरसानें की ओर

अयान गोप के माता पिता आये हैं उनके कुछ रिश्तेदार भी साथ है पता नही क्यों आये है ?

कीर्तिरानी नें बृषभान जी को सूचना दी

बृषभान जी आये सब का सम्मान किया

पर आप लोगों के आनें का कारण ?

बृषभान जी नें व्यवहार आदि सम्पन्न होनें के बाद पूछा

बृषभान जी हमारे आने का कारण ये है कि ये हमारा पुत्र है अयान इसका विवाह हम आपकी पुत्री राधा से कराना चाहते हैं बस ।अयान के पिता नें कहा

बृषभान जी क्या कहते क्यों की अयान के पिता और उसका खानदान भी सभ्य और उच्च ही था

पर हाँ ये बात अवश्य कही बृषभान जी नें की हमारी बृजपति नन्द के साथ ये बात हुयी थी कि हमारी राधा और उनके पुत्र कृष्ण के साथ विवाह होगा

पर आप एक बार पूछ तो लें राधा क्या कहती है

अयान के पिता नें बृषभान जी को कहा तो बृषभान जी खुश होकर बोले हाँ हाँ कन्या को उसका अधिकार मिलना चाहिये कि वो किसे चुनें

क्यों की बृषभान जी को ये पक्का विश्वास था कि राधा मना करेगी ही क्यों की ये बात तो बृज में हर जगह फैली हुयी हैराधा कृष्ण का प्रेम

पर ये क्या

कीर्तिरानी बृषभान जी राधा की सखियाँ बरसानें के लोग ये सब सुनकर स्तब्ध से रह गए थे किराधा नें अयान गोप से विवाह करनें के लिये हाँकह दिया ?

अब कोई उपाय नही रहा गया था

तो हम पक्का समझें बृषभान जी अयान के पिता नें पूछा

बेटी के पिता को हाँ कहना ही पड़ाबरसाना उदास हो गया था

इस विवाह कि तैयारी स्वयं श्रीकृष्ण नें खड़े होकर करवाई थी

बरातियों का स्वागत भी स्वयं कृष्ण ही कर रहे थे

श्रीराधा आयीं थीं दुल्हन के रूप में सज धज के

बारबार अपना मुख प्रक्षालन करते रहे थे कृष्ण ताकि उनके आँसुओं को कोई देख ले

राधा को दुल्हन के रूप में देखकर हिलकियाँ बंध गयीं थी एक बार तो कृष्ण कि

फेरे शुरू हुए एक दो तीन पर ये क्या चौथे फेरे में श्रीराधा रानी गिर ही गयीं , मूर्छित हो गयीं उस समय भीड़ को हटाते हुए कृष्ण ही भागे और राधा को अपनी गोद में ले लिया था

सात फेरे पूरे नही हुए अब हो भी नही सकते थे क्यों कि राधा मूर्छित हो गयीं थीं

सुहाग कि सेज में राधा रानी मूर्छित पड़ी हैं अभी तक होश नही आया है श्रीराधा को

अयान आया अपनें कक्ष में दीपक जला हुआ है उस दीपक के प्रकाश में श्रीराधा रानी का गौर वर्ण चमक रहा है

अयान आगे बढ़ा लाल जोड़े में मूर्छित पड़ी हैं श्रीराधारानी

अयान नें देखा थोड़ी देर देखता ही रहा फिर उसका ध्यान गया श्री राधा के चरणों में

पर वो चौंक गया पास गया चरणों के पास

चरण में चिन्ह बने हुए थे राधा रानी के

ओह ये चिन्ह तो मेरे कृष्ण के चरण में भी हैं ?

चक्र, शंख, गदा, पदम्, कमल, त्रिकोण ध्वजा यव

ये सब बड़े ध्यान से देखता रहा अयान

ओह तो इसका मतलब ? वो कुछ समझ नही पा रहा था

फिर उसे याद आया मैने ही माँगा था हे कृष्ण तुम्हे जो प्राणों से प्रिय हो वो मुझे दे दो

तो ये मेरे कृष्ण की प्राण हैं ?और अपनें प्राण मुझे कृष्ण नें दे दिए ओह  सिर फटनें लगा अयान का

वो बैठ गया वहीं उसके नेत्रों से पश्चाताप के अश्रु बहनें लगे थे

तो इसका मतलब ? ये श्रीराधा और मेरा कृष्ण दोनों एक हैं ?

और ये चरण मेरे इष्ट के चरण और ये चरण एक ही तो हैं

पाप हो गया तुझसे अयान पाप  ये तुम्हारी इष्ट हैं ये कृष्ण कि ही अनादि बल्लभा हैं ये कृष्ण प्रिया हैं

चरणों में प्रणाम करकेउसी रात्रि को अयान नें घर छोड़ दिया क्यों कि उसे प्रवल वैराग्य चढ़ गया था

वो कहाँ गया पता नही खोजनें कि कोशिश कि पर अयान नही मिला

कृष्ण नें ही पञ्च बुलवाये और बरसानें में पंचों के सामनें निर्णय हुआ की बृषभान अपनी पुत्री राधा को अपनें घर ले जाएँ

क्यों की अयान अब नही आएगा

और श्रीराधा रानी अपनें बरसानें में आगयीं थीं

मुझे क्षमा कर दो राधे मुझे क्षमा कर दो

फिर उसी स्थान में नन्दगाँव और बरसानें के बीच में पड़नें वाले कुण्ड में आज दोनों मिले हैं

रो रहे हैं कृष्ण मेरे कारण तुम्हे इतना कष्ट हुआ ना ?

नही कुछ कष्ट नही हुआ तुम्हारी ख़ुशी के लिए तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ

और रही बात विवाह कि तो ऐसे विवाह का क्या महत्व मैं तुम्हारी ही हूँ और तुम मेरे हो हँसी श्रीराधा रानी

हम दोनों एक ही हैं हमें कोई अलग नही कर सकता ये बात तुम भी जानते हो है ना ? श्रीराधा रानी नें मुस्कुराते हुए पूछा

हाँ हाँ हाँ कृष्ण नें रोते हुये श्रीराधा रानी को अपनें गले से लगा लिया था इस जगत में तुम्हारे जैसा प्रेम किसका हो सकता है राधे बारबार कृष्ण यही कह रहे थे

हे वज्रनाभ इस दिव्य प्रेम लीला को तुम क्या कहोगे ?

ये है प्रेम पर सामान्य लोग नही समझ पायेंगें इसे

प्रेम कि परिभाषा ही यही है जो श्रीराधा रानी नें इस जगत को दी अपनें प्रियतम के सुख में सुखी रहना

जय जय श्रीराधे जय जय श्री राधे जय जय श्रीराधे


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 27

( श्रीराधाकृष्ण के दिव्य विवाह की पूर्व भूमिका )


विवाह नही हुआ श्रीराधा कृष्ण का ?

जब इतना ही प्रेम था तो विवाह क्यों नही ?

बड़ी विनम्रता से पूछा था ये प्रश्न वज्रनाभ नें महर्षि शाण्डिल्य से

हँसे महर्षि फिर वज्रनाभ की ओर देखकर बोले

विवाह के लिए कुछ तो दूरी चाहिये ना ? यहाँ तो दोनों एक ही हैं

विवाह के लिये दूसरा व्यक्ति चाहिये ना पर यहाँ दूसरा है ही नही

यहाँ तो एक ही तत्व है बस प्रेम तत्व और वही प्रेमतत्व दो रूपों में रूपायित होकर हम सबको दिखाई दे रहा है पर वस्तुतः दो हैं कहाँ ? एक ही है प्रेम बस

इतना कहकर वज्रनाभ की ओर फिर देखा महर्षि नें पर वज्रनाभ सन्तुष्ट नही दीखे इस उत्तर से

नही नही तुम बुद्धि से प्रश्न कर रहे होऔर बुद्धि से ही समझना चाहते हो पर यहाँ तुम जैसा उत्तर चाहते हो वैसा मैं दे नही सकता क्यों की प्रेम पर दिया गया उत्तर बुद्धि को सन्तुष्ट नही कर सकती क्यों की ये प्रेम एक अलग ही तत्व है इसे हृदय से समझा जा सकता हैइसे तुम सामाजिक मान्यताओं के आधार पर नही समझ सकते कि विवाह क्यों नही किया ? अरे वज्रनाभ विवाह एक सामाजिक व्यवस्था है पर प्रेम सामाजिक व्यवस्था नही है ये अलौकिक है ये तत्व है जहाँ विवाह की व्यवस्था नही है वहाँ पर भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है प्रेम मात्र मनुष्यों में ही नही है सम्पूर्ण प्रकृति में प्रेम व्याप्त है देखो  ये जगत, प्रेम से ही ओतप्रोत है देखो बादलों को देखकर मोर नाच उठते हैं ये प्रेम ही तो है पपीहा स्वाति बून्द के लिये ही प्यासा रहता है ये उसका प्रेम है मछली जल के बिना अपनें प्राण त्याग देती है ये प्रेम ही तो है महर्षि नें बताया इसलिये विवाह संस्था है एक जिसे हम तुमनें बनाया है एक सामाजिक संस्था समाज को व्यवस्थित रखनें के लिये बनायी गयी संस्था पर प्रेम , प्रेम तो प्राण है आत्मा है मर जाएगा बिना प्रेम के ये समस्त

मैं समझ गया महर्षि वज्रनाभ के मुख मण्डल में सन्तुष्टि के भाव थे

मैं गलत था मैं अभी तक ये सोचता था कि महारानी रुक्मणि के साथ अन्याय हुआ

पर ऐसा क्यों सोचते थे तुम ?

महर्षि नें बीच में ही टोक दिया वज्रनाभ को

सौ वर्षों से भी ज्यादा साथ में रहे कृष्ण रुक्मणि के कृष्ण का अंग संग नित्य प्राप्त होता रहा उन लक्ष्मीस्वरूपा रुक्मणि को फिर अन्याय कैसा ? सदैव महारानी बनकर द्वारिका में कृष्ण के साथ रहीं कैसा अन्याय रुक्मणि के साथ ?

अगर इसी दृष्टि से सोचना है तो अन्याय श्रीराधारानी के साथ किया कृष्ण नें पर कोई शिकायत की श्रीराधा नें ?

इस जगत को निःश्वार्थ प्रेम क्या होता है ये बतानें के लिये ही श्रीराधा रानी का प्राकट्य हुआ है तुम इस बात को समझो

कृष्ण सुखी रहेंबस यही कामना रही श्रीराधा की

कृष्ण प्रसन्न हैं द्वारिका में बस इसी बात से सन्तुष्ट हैं श्रीराधा रानी

तुम समझ नही पा रहे वज्रनाभ श्रीराधा तत्व क्या है ?

सबकुछ त्यागा श्रीराधा रानी नें श्री राधा रानी की होड़ कौन कर सकता है महर्षि के नेत्र बरस पड़े थे ये सब कहते हुए

तुमनें पूछा ना कि विवाह क्यों नही किया ?

श्रीराधा रानी स्वयं नही चाहती थीं कि विवाह के बन्धन में बांध कर मैं कृष्ण को उनके कर्तव्य से हटाऊँ ? कंसादि को मारनायादवों को स्थापित करना पाण्डवों को उनका राज्य दिलाना

और किसनें कहाँ तुमसे विवाह नही हुआ श्रीराधा कृष्ण का हुआ पर ये विवाह स्वयं आस्तित्व के द्वारा रचा गया विवाह था आस्तित्व नें स्वयं रचना की थी उस विवाह मण्डप की विधाता स्वयं खड़े थे विवाह करवानें के लिए प्रकृति स्वयं चँदोवा तान कर उस मण्डप को सजानें में लगी थी आकाश से उतरे थे भगवान शंकर जो डमरू बजाकर नाचते हुए आये थे

नारद जी के साथ तुम्बुरु उनके गायक उन्होंने आकर उस विवाह के महफ़िल को सजाया था सखियाँ अष्ट सखियां जिनके आगे लक्ष्मी उमा ब्रह्माणी भी लजाती थीं ऐसी सखियाँ थीं श्रीराधा रानी की फिर श्रीराधा रानी कैसी होंगी विचार करो

आकाश जगमगा गया था सितारे उतर आये थे धरती पर

ओह उस विवाह के बारे में मैं सोचता हूँ तो मैं आज भी आनन्द सिन्धु में डूब जाता हूँ वज्रनाभ ओह क्या विवाह था वो

पर ये विवाह भी कृष्ण की इच्छा से ही हुआ था श्रीराधा की ऐसी कोई इच्छा नही थी पर जब कृष्ण की इच्छा देखी तो कृष्ण के कपोल में हाथ रखते हुए श्रीराधा नें कहा तुम्हारी इच्छा है प्यारे ? तो ठीक है मेरी इच्छा तुमसे अलग रही कहाँ हैं

हे गुरुदेव मुझे उस दिव्य विवाह का वर्णन करके सुनाइये हे गुरुदेव मुझे उस आस्तित्व के द्वारा रची गयी श्रीराधा कृष्ण के विवाह को सुनना है मैं अधिकारी तो नही हूँ उस दिव्य विवाह को देखनें का सुननें का पर आप जैसे प्रेमी महात्मा चाहें तो मुझ जैसे अनधिकारी को भी अधिकारी बना सकते हैं

वज्रनाभ नें प्रार्थना की तब महर्षि शाण्डिल्य श्रीराधा माधव के चरणों का ध्यान करनें लगे

मेरे पास में आये थे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण चन्द्र जू

क्यों की ये सौभाग्य मुझे ही प्राप्त था कि मैं उनका पुरोहित हूँ

हे महर्षि

मेरे पास आकर उन्होंने प्रणाम किया सायंकाल की वेला थी मैं ध्यानस्थ था वो बैठे रहे तब तक जब तक मैं ध्यान में रहा पर जब मैने अपनी आँखें खोलीं तब श्याम सुन्दर, नीलमणी के समान जिनकी अंग कांति थी मोर मुकुटी बंशीधर पीताम्बरी धारण किये हुए मेरे सामनें बैठे थे

मुझे रोमांच हुआ उनके दर्शन करते ही मैं मर्यादा ही भूल गया था मैं सब कुछ भूल गया मैं उनके वंश का पुरोहित हूँ ये भी भूल गया मैनें प्रणाम करना चाहा पर स्वयं कृष्ण चन्द्र नें ही मुझे प्रणाम करके मुझे सम्भाला

हे महर्षि

हाथ जोड़कर मेरे सामनें बोलनें जा रहे थे कृष्ण

मेरी प्राण बल्लभा मेरी सर्वस्व जिसके बिना ये कृष्ण अधूरा है उन श्रीराधा रानी के साथ विवाह करना चाहता है ये कृष्ण

ये शब्द नन्दनन्दन के मुख से मैने सुना मेरे आनंद का कोई ठिकाना नही रहावो बोले जा रहे थे

कृष्ण में कहाँ प्रेम है जो भी प्रेम दिखाई देता है वो सब मेरी आल्हादिनी श्रीराधा रानी के द्वारा ही प्रदत्त है हे महर्षि

वो प्रेम स्वरूपा श्रीराधा कृपा करती हैं तब वही कृपा मुझ में प्रतिफलित होता है मैं क्या हूँ ?

वे वरदायिनी , विनोदिनी मुझे उदारता से अपनाती हैं तभी तो वे चारु चरण मुझे मिल पाते हैं नही तो मैं कठोर हृदय का और वे कहाँ कोमल हृदय, अत्यन्त कोमल हृदय की स्वामिनी

मैं कहाँ पाप पुण्य के हिसाब द्वारा स्वर्ग नरक में जीवों को भेजनें वाला पर वे तो सहज कृपा करके पापियों को भी अपनी गोद में स्थान देंनें वाली क्यों की समस्त जीवों के ऊपर उनकी ममता बरसती ही रहती हैं मैं तो कठोर हृदय का हूँ

पर मुझ जैसे को भी अपनें हृदय से लगाकर मेरी कठोरता मिटा दी है उन्होंने मुझे प्रेम करना सिखाया उन्होंने कृष्ण तो कंगाल था महर्षि  पर आज ये जो भी है वो सब श्रीराधा रानी के कारण ही है नेत्र बरस रहे थे उस समय कृष्ण के

मुझे तनिक भी अवसर नही दिया था बोलनें का और मुझे कुछ बोलना भी नही था मेरे कानों में अमृत जा रहा था उस अमृत में भी प्रेमामृत मै तो धन्यातिधन्य हो रहा था

कुछ देर रुके कृष्ण अपनें नेत्रों को पीताम्बरी से पोंछा फिर बोले महर्षि आपकी कुटिया में आनें का कारण है

और कारण ये है कि मेरी प्राण बल्लभा तो नही चाहतीं कि विवाह जैसी कोई व्यवहारिक बात हमारे प्रेम में हो

तुम निभा पाओगे प्यारे

बस, जब जब मैं उनको कहता हूँ तब बड़े प्रेम से श्रीराधा मेरे कपोलों को छूते हुए यही कहतीं हैं

मैं फिर भी नही मानता तो कहती हैं विवाह के लिये दो चाहिये पर यहाँ दूसरा कहाँ हैं ? वो फिर इधर उधर देखनें लग जाती हैं हम दोनों का विवाह राधे मैं जब फिर कहता हूँ तब कहती हैं हमदोनही हैहमएकहैं ये तुम भी जानते हो।

पर हे महर्षि मैने जब आज जिद्द की तब मुझे अपनें हृदय से लगाते हुये उन्होंने कहा तुम्हारी इच्छा है तो मेरी भी इच्छा है ये राधा कभी अपनें प्राणधन के इच्छा के विपरीत जा सकती है क्या ?

मैं तुम्हारे लिये ही हूँ तुम जिसमें प्रसन्न हो वही करो मुझे उसी में अच्छा लगेगा

अब मैं जो कह रहा हूँ उसे सुनिये महर्षि

मैने देखा श्याम सुन्दर के मुख कमल में

हमारा विवाह आप करवाइये

क्यों की आप ही हैं हमारे कुल पुरोहित

मेरे नेत्र सजल हो गए थे वज्रनाभ मुझे रोमांच होनें लगा था पर मैने अपनें आपको सम्भाला

हे श्याम सुन्दर ऐसा सौभाग्य मेरे ललाट में नही लिखा विधाता नें

क्या मतलब ? कृष्ण नें मेरी ओर देखा

हाँ ये सौभाग्य मुझ से छीन लिया है

भाग्य लिखनें वाले ब्रह्मा जी नें

मैने कहा था उनसे हे विधाता इन दोनों सनातन प्रेमी युगलों का विवाह मैं कराऊंगा पर वो मानें नही बोले इस सौभाग्य को मैं कैसे छोड़ सकता हूँ महर्षि

इसलिये आप दोनों का विवाह तो विधाता ब्रह्मा के द्वारा ही सम्पन्न होगा

मुस्कुराये ऊपर देखकर श्याम सुन्दर

तभी आकाश में प्रकट होगये थे ब्रह्मा जीउन्होंने प्रणाम किया और वेदमन्त्रों द्वारा श्याम सुन्दर की स्तुति भी की

मुझे प्रणाम करके श्याम सुन्दर अब जानें लगे थे

तब मैने भी वज्रनाभ उनके चरणों में एक निवेदन किया

हे श्याम सुन्दर इस विवाह का दर्शन मुझे भी कराना

उन्होंने मुस्कुरा कर हाँ कहा और चले गए

इतना ही बोल पाये महर्षि शाण्डिल्यफिर विवाह के उस दृश्य में जो उनके हृदय पटल पर अंकित थे उस में खो गए

आहा

दुल्हन प्यारी राधिका दूल्हा श्याम सुजान


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 28

( भाण्डीरवट में )


आज महर्षि शाण्डिल्य अति मत्त लग रहे हैं वज्रनाभ का हाथ पकड़ कर वो वृन्दावन केभाण्डीर वटमें ले गएऔर वहाँ जाकर बैठ जाते हैं उनके नयन रसीले हैं आज वो मन्द मन्द अपनें में ही मुस्कुरा रहे हैंवो कुछ कहते हैंसमझना बड़ा कठिन है पर वज्रनाभ समझनें की कोशिश करते हैंआश्चर्य जितनी कोशिश उनकी होती है बात और रहस्यमयी होती जा रही है वज्रनाभ नें अब छोड़ दिया है और सहजता में सुन रहे हैं , महर्षि को हाँ सहजता में ही प्रेमरहस्य प्रकट होता है वज्रनाभ चकित से बस अनुभव करते जाते हैंऔर ऐसे अनुभव करते हैं जैसे गूँगा गुड़ के स्वाद को अनुभव करता है हाँ ये प्रेम है ये प्रेम का ब्याह महामहोत्सव है ही ऐसा

हे वज्रनाभ कृष्ण इस ब्याह महोत्सव के नायक नही है नायक नायिका जो भी हैं वो सिर्फ हरिप्रिया श्रीराधारानी ही हैं

कृष्ण श्रीराधारानी को कहीं ले जाते नही हैं वो ले जा सकते भी नही हैं ले जाती हैं तो स्वयं श्रीराधा रानी हाँ कृष्ण उनके पीछे पीछे चलते हैंआगे आगे श्रीराधा चलती हैं मार्गदर्शक बनकर ।महर्षि शाण्डिल्य कुछ अटपटे ढंग से पर प्रेम में भींगें, आज इस चरित्र को सुना रहे हैं

कितनी विचित्र बात है ना श्याम सुन्दर को अपनी श्यामता से ही डर लगता हैवो डर जाते हैं पता है वज्रनाभ वो क्यों डरते हैं ? वो इसलिये डरते हैं कि उन्हें स्वयं के खोनें का डर है मैं कहाँ हूँ घना बादल छा गया है वृन्दावन मेंअन्धकार चारों ओर फैल गया हैघुप्प अन्धकार

और फिर वृन्दावन की भूमि तमाल वृक्षों से पटी पड़ी है उसनें और भी अन्धकार की सृष्टि कर दी है

कृष्ण डर जाते हैं श्यामता का ऐसा विस्तार ? श्याम सुन्दर का भयभीत होना स्वाभाविक है मैं अपनें को कहाँ खोजूँ ?

क्यों की मैं भी तो इसी रँग का हूँ मैं तो खो रहा हूँ इस अंधकार में

मुस्कुराते हैं महर्षि शाण्डिल्य तभी, तभी श्रीहरिप्रिया श्रीराधा रानी प्रकट हो जाती हैं मानों बादलों में बिजली गौर वर्णी मानों बिजली चमकी और उस बिजली के प्रकाश में श्याम सुन्दर नें अपनें को पा लिया खुश हो गए श्याम सुन्दर दौड़ेचलो अबकह देती हैं श्रीराधा रानी और आगे आगे चल देती हैंबैचैनी श्याम सुन्दर की है बादल की बैचैनी चंचला बिजली से एक होनें की है अपनें में समा लेनें की है पर इसके लिये अभी कुछ प्रतीक्षा करनी पड़ेगी हाँ प्रेम ऐसे ही तो नही मिलता कुछ तो तडफ़ो कुछ तो बैचेन हो कुछ तो बेकली पैदा करो प्रेम का साकार रूप श्रीहरिप्रिया इस बात को समझती हैं

हँसते हैं महर्षि शाण्डिल्य ये श्रीराधा स्वयं प्रेम हैं ये प्रेम की शिक्षिका हैं श्याम सुन्दर की ये नही समझेंगीं ?

महर्षि आज प्रेम सूत्रमें बातें करते करते भाव सिन्धु में डूब गए

हे महर्षि शाण्डिल्य मैं एक संसार के मोह माया में लिप्त जीव हूँ

जो आप बता रहे हैं उसे जीवन मुक्त महापुरुष भी नही समझ पाते तो मैं क्या हूँ आप नें मुझे पूर्व में कहा था कि निःस्वार्थ की साधनाकिये बिना ये दिव्य प्रेम समझ से परे है पर मेरा मानना ये है कि आप जैसे महापुरुष अगर चाहें तो मुझ कैसे स्वार्थ से भरे जीव में भी प्रेम के अंकुर दे सकते हैंजिस अंकुर के फूटनें से ये प्रेम पल्लवित और पुष्पित होता जाएगा प्रेम के फूल खिलेंगें और मुझे विश्वास है उस फूल का सुगन्ध लेनें स्वयं श्रीराधा माधव मेरे हृदय बाग़ में अवश्य पधारेंगें मुझ में योग्यता नही है उस प्रेम को सुननें की पर योग्यता आप दे सकते हैं आप देंगें

इतना कहते हुए वज्रनाभ नें महर्षि के चरणों में प्रणाम किया साष्टांग प्रणाम किया उनके पद रज को अपनें माथे में और सम्पूर्ण शरीर में लगाया और फिर युगल मन्त्र का जाप एवम् ध्यान करते हुए बैठ गए इस प्रतीक्षा में कि प्रेम समाधि से कभी तो उठेंगे महर्षि शाण्डिल्य

उठे नयन खोले और वज्रनाभ को देखा

तुम प्रेमी हो वज्रनाभ परमभागवत उद्धव के बाद अगर कोई तुम्हारे यदुवंश में प्रेमी हुआ है तो वह तुम ही हो

आनन्दित हो उठे थे महर्षि शाण्डिल्य वज्रनाभ की स्थिति देखकर फिर आगे की कथा सुनानें लगे वही कथा जो सूत्र के रूप में पहले सुना चुके हैं

आज बिलम्ब हो गया है श्यामसुन्दर को खेलते खेलते वृन्दावन में वृन्दावन में भी भाण्डीर वटइनका प्रिय स्थल है जब भी अवसर मिलता ये यहीं आजाते

पर आज एकाएक वर्षा हो गयी काले काले बादल छा गए वृन्दावन में गौएँ कहाँ चली गयीं पता नही श्याम सुन्दर इधर उधर देखते हैं

अरे गाय कहाँ गयीं ? तुम लोग देखो ना

गाय कहाँ गयीं श्याम सुन्दर को गाय की चिन्ता हैसखा खोजनें के लिये निकल गए चिल्लाते हुए जा रहे हैंगाय का नाम पुकारते हुए जा रहे हैं गौरी , धौरी , गंगा, इत्यादि

श्याम सुन्दर अब अकेले रह गए हैं वहाँ घना अन्धकार छा गया है

तभी बृजपति नन्द वहाँ आपहुँचेउन्होनें देख लिया था नन्दगाँव से ही कि वर्षा भीषण होनें वाली हैकहीं मेरा कृष्ण फंस जाए

चाहे बड़े हो गए हों कृष्ण पर माता पिता को देखकर बालक बालक ही बना रहता है अपनें पिता नन्द बाबा को देखकर कृष्ण नें जोर से पुकारा बाबा बाबा नन्द बाबा को भी कृष्ण दिखाई नही दे रहेक्यों कि कृष्ण भी काला और अंधकार भी

तू कहाँ है ? कृष्ण तू कहाँ है ?

अब कृष्ण रोंनें लगे रोनें की आवाज के साथ साथ नन्द बाबा बढ़ते चले गए बढ़ते चले गए कृष्ण टकराये थे अपनें बाबा से ओह मेरा लाला नन्द राय नें अपनी गोद में उठा लिया अपना सिर बाबा के कन्धे में रख लिया था कृष्ण नें

पुत्र कृष्ण गौएँ कहाँ गयीं ? और तुम्हारे सखा ?

बाबा पता नही गाय किधर गयीं उनको ही खोजनें सारे सखा चले गए हैं मैं यहाँ अकेला कृष्ण नें कन्धे में सिर रखे रखे ही बताया

बाबा चलो ना घरमुझे घर जाना है कृष्ण जिद्द करनें लगे थे नन्द राय संकट में फंस गए कैसे जाएँ घर गौए हैं उनको छोड़ कर कैसे जाएँ और ग्वाल बाल वो भी तो बालक ही हैं उन्हें भी कैसे छोड़ा जा सकता है

नन्द कृष्ण को लेकर घर लौट नही सकते थे और साथ में कहाँ तक ले जायेंगें और ऊपर से बिजली भी चमक रही थी

पर ये क्या कुछ आँखों में चौंधा सा पड़ा प्रकाश का चौंधा पहले तो नन्द राय को लगा आकाश की बिजली चमक रही है पर नही

सामनें बृषभान नन्दिनी हरिप्रिया श्रीराधा रानी खड़ी थीं

ये नित्य तो आती थींअपनें प्राण धन से मिलनेँ वृन्दावन तो आज कैसे आतीं ?

नन्दराय नें पहले पहचाना नही सामनें एक गौर वर्णी अत्यन्त आभा से भरी हुयी सौन्दर्य की साक्षात देवि

कौन है लाली तू ? नन्द बाबा नें पूछा

मैं बृषभान जी की बेटी राधा

मानों वीणा बज उठी हो ऐसी मधुर आवाज

तू इधर कैसे बेटी ? अंधकार हो गया है नन्द बाबा को राधा की भी तो चिन्ता लगी

मैं घर ही जा ही रही थीश्रीराधा रानी नें कहा

फिर कुछ सोचकर बृजपति नेंअपनें लाला से कहा

श्याम सुन्दर तू राधा लाली के साथ चला जाएगा घर ?

हाँ खुश होते हुएझट् से कूद पड़े नन्द बाबा की गोद से कृष्ण

लाली लगता है हमारी गायें कहीं भटक गयीं हैं और उनके साथ ग्वाल बाल भी हैं मैं उन्हें देखनें जाता हूँ तू मेरे लाला को ले जा

और सुन इसका हाथ पकड़ कर ले चलना ये बड़ा हो तो गया है पर अभी भी अन्धकार से डरता है

मैं घर तक पहुँचा दूंगी

बृषभान नन्दिनी नें सिर झुकाये ही उत्तर दिया

नन्द बाबा अब निश्चिन्त हो गायों को खोजनें आगे बढ़ गए थे

मेरा हाथ तो पकड़ो बाबा नें कहा था मेरा हाथ पकड़ना

कृष्ण नें मुस्कुराते हुए श्रीराधा रानी को कहा

क्यों इतनी लीला करते होतुम्हे डर लगता है ?

हाँ हमें बहुत डर लगता है इस अन्धकार से डर लगता है क्यों की इस अंधकार का रँग भी काला और मेरा भी कहीं मैं इसमें ही खो जाऊँ अपनें आपको खोनें का डर लगता है कृष्ण ने कहा

लो पकड़ लिया हाथश्रीराधा रानी नें कृष्ण का हाथ पकड़ लियाअब डर नही लग रहा ?नही अब क्यों डर लगनें लगा अब तुम जो हो ना मैं खो भी गया तो तुम मुझे खोज लोगी क्यों की तुम बिजली हो और तुम क्या हो ?

मैं बादल बादल में बिजली चमकती है ना तभी बादल की शोभा होती हैअगर बिजली नही तो बादल की क्या शोभा ?

तभी बिजली चमकी डर गए कृष्ण और श्रीराधारानी के हृदय से लिपट गए अब शोभा पा रहा है बादल जब बिजली से उसका अभिसार हो अब अभिसार होगा कृष्ण मुस्कुराये

और तभी भाण्डीर वट में एक दिव्य ब्याह मण्डप तैयार होनें लगा रुमझुम करती हुयी अष्ट सखियाँ प्रकट हो गयीं उन अष्ट सखियों की भी अष्ट सखियाँ थीं

तैयारियाँ शुरू प्रकृति स्वयं इस दिव्य ब्याह की तैयारियों में जुट गयी थी

शहनाइयाँ बजनें लगीं

श्रीराधा दुल्हन , दूल्हा लाल


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 29

( दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री )


विचित्र हैं कृष्ण चन्द्र बढ़ते बढ़ते जाते हैं फिर पूर्ण होते हैंफिर घटते घटते इतनें घट जाते हैं कि लगता है शून्य ही हो गए

पर फिर बढ़ना शुरू करते हैंये विचित्रता, येअमृतकलामात्र श्रीकृष्ण चन्द्र में ही दिखाई देती है जैसे चन्द्रमा बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा को पूर्ण हो जाता है पर फिर घटता है और घटता ही चला जाता है अमावस्या को शून्य ही हो जाता है

महर्षि शाण्डिल्य समझाते हैंकृष्ण चन्द्र बढ़ते जाते हैं आगे आगे और आगे मथुरा, फिर द्वारिका सुवर्ण का साम्राज्य खड़ा कर देते हैं पर फिर घटते हैं सब कुछ त्यागते हैं त्यागते चलते हैंअपनें आपको शून्य में ले आते हैं अर्जुन के सारथि बनते हैं राजसूय यज्ञ में जूठे पत्तल तक उठाते हैंशिशुपाल की गाली खाते हैं वो भी भरी सभा में गांधारी का श्राप भी सहर्ष स्वीकार करते हैंपर फिर उठते हैं हाँ ऐसा लगता है कि अमावस्या को देखते हुए कि चन्द्रमा अब गया अब नही उठ पायेगा पर वो फिर धीरे धीरे उठता है उगता है ऐसे विचित्र हैं कृष्ण चन्द्र

और ऐसे को अपनें पल्लू से बाँध कर चलती हैं श्रीराधा रानी ये किसी के बन्धन में नही बंधनें वाले बस श्रीराधा ही इन्हें बांधती हैं और बांध सकती हैं

हर स्थान पर ये श्यामसुन्दर भ्रमर हैं भौरें के समान हैं जो हर कली में बैठता हैपर यहीं वृन्दावन में हीये मीन बन जाते हैं मछली की तरह एक निष्ठ हो जाते हैं ये मात्र यहाँ ही अपनी श्री राधा रानी के ही होते हैं

श्रीराधा इन्हें आँखें दिखाती हैं तो ये परब्रह्म थरथर काँप उठता है

श्याम सुन्दर के चरणों को कौन नही चाहता ब्रह्मा , इंद्र रूद्र समस्त देव किन्नर गन्धर्व पर और सब मिल जाए उन्हें पर इनके चरण बड़े दुरूह हैं उनके लिये और देखो यहाँ इनप्रेम विथिनमें श्रीराधा रानी के चरणों को अपनी गोद में रखकर ये दवाते हैं

प्रेम की महिमा इससे ज्यादा और क्या होगी ?

महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को कहा और अब उस दिव्य ब्याह का वर्णन करनें बैठ गए

ऋतुएँ बदल गयीं अभी तक वर्षा ऋतु थी पर एकाएक वृन्दावन में ऋतु नें बरसात से छलाँग लगाई बसन्त पर

वज्रनाभ नें सन्देह प्रकट किया ये कैसे सम्भव है ?

क्यों ? मैने कहा ना वज्रनाभ कि इस ब्याह का आयोजन स्वयं आस्तित्व नें किया है और प्रकृति इसी की तो है जो ब्रह्म और आल्हादिनी चाहेगी बस प्रकृति वही प्रकट करेगीअरे नही वज्रनाभ ब्रह्म और आल्हादिनी की बात छोडो सखियाँ भी जो संकल्प कर लें प्रकृति को वही प्रकट करना पड़ता है

बसन्त छा गया है वृन्दावन में

हजारों नौकाएं प्रकट हो गयीं यमुना में उन नौकाओं का आकार हँस जैसा था प्रत्येक नौका में अष्ट सखियाँ बैठी थीं वो बड़ी सुन्दरी थीं सबनें पीले रँग के लंहगा पहनें हुए थे पीली ही चूनर ओढ़ी थी उनकी चोटी ऐसी लग रही थी जैसे नागिन हो उनके मुख मण्डल में प्रसन्नता और उत्साह था उनके देह से कमल की गन्ध प्रकट हो रही थी

वो उतरीं और एक आश्चर्य साँवरी जो सखियाँ थीं उन सबनें श्याम सुन्दर को पकड़ा और ले गयीं नौका में और जो गौर वर्णी थीं उन्होनें श्यामा जू को पकड़ा वो राधा रानी के पक्ष की थीं ले गयीं उस दिव्य नाव में

हे वज्रनाभ मुझ मेंसखी भावका अभाव था इसलियेश्रीजीके श्रृंगार को देखनें का मैं अधिकारी नही हुआ

हाँ पर मैने श्याम सुन्दर के श्रृंगार को देखा दर्शन किया मैने उस समय समस्त देव और देवियाँ आकाश में लालायित हो देखनें का प्रयास कर रहीं थीं पर नही पर मैनें दर्शन किये उस दिव्य श्याम कांति के आहा

वो सांवरी सखियाँ श्याम सुन्दर को एक नाव में ले गयीं रँग बिरंगे पर्दे लगे थे उन नावों में फूलों की पच्चीकारी थी उनमें

सखियों नें एक सुवर्ण के पाटे में बिठाया श्याम सुन्दर को

शरीर में जो वस्त्र धारण किये थे श्याम नें उसे हटाया आहा मैने दर्शन किये इन्हीं नेत्रों से दर्शन किये वज्रनाभ

वो दिव्य श्याम आभा श्याम छटा छिटक रही थी उनके देह से

उनका देह ऐसा था जैसे , जैसे कुछ सोचते हुए महर्षि उपमा खोज रहे थे पर कोई उपमा उन्हें मिल ही नही रहा था

जैसेमाखन में हल्का नीला रँग मिला दो तो कैसा लगेगा

आकाश का रँग हल्का नीला रँग छोडो वज्रनाभ श्याम सुन्दर के अंग का रँग क्या है कैसा है इसकी इस जगत में कोई उपमा ही नही है फिर आगे कहनें लगे

उबटन लगाया सखियों नें उनके देह पर

पर वे चंचल नेत्र इधर उधर ही देख रहे थे

क्या देख रहे हो लाल ?

सखियों नें उबटन उनके कपोल में लगाते हुए छेड़ा

सखी मेरी प्यारी कहाँ हैं ?

मिल लेना मिल लेना अभी तो समय लगेगा सखियाँ हँसनें लगी

सखी मेरा मन अब इन सबमें नही लग रहा जल्दी करो ना मुझे अपनी प्राण बल्लभा को देखना है मेरा मन अधीर हो रहा है मेरा मन अब मेरे वश में नही है कहाँ गयीं मेरी स्वामिनी बोलो सखी

श्याम सुन्दर की ऐसे स्थिति देख सखियों नें नौका का पर्दा तनिक उठाया आज आप दोनों का ब्याह है वो देखो आपकी प्यारी सज रही हैं

क्या उनको भी उबटन लग रहा है ?

कितने मासूम बन रहे थे श्याम सुन्दर

हाँ हाँ बस कुछ देर के लिए और ठहर जाओ प्यारे फिर आपकी प्यारी आपकी ही होंगी

पाटे में बैठ गए श्याम सुन्दर फिर उबटन मल रही हैं सखियाँ अब केशर का जल जो हल्का गुनगुना था उसमें गुलाब जल और केशर दोनों की सुगन्ध आरही थी उससे स्नान कराया गया लाल जू को सुन्दर कोमल रेशमी वस्त्र से उनके सांवले देह को पोंछा सखियों नें पीली धोती पहनाई पीले आधे बाँह की बगलबन्दी सुन्दर रेशमी पीताम्बरी केश जो घुँघराले थे उसमें सुगन्धित तैल लगा दिया और उन्हें थोडा और बिखेर दिया वज्रनाभ मैं क्या बताऊँ वो घुँघराले बाल जब उनके मुख मण्डल में आरहे थे तब ऐसा लग रहा था कि भौंरों का समूह कमल पर मंडरा रहा है

रोरी का तिलक माथे में लगा दिया था श्याम सुन्दर के

छोटे छोटे मोतियों को अक्षत के रूप में उन तिलक पर सजा दिया था

तभी एक सखी सुन्दर और छोटा सा सेहरा लेकर आई उसे सिर में बाँध दिया एक सखी नें बीरी ( पान ) श्याम सुन्दर को खिलाया वैसे ही इनके अधर लाल थे और लाल हो गए

इतना सजानें के बाद सखियाँ दूर हट गयीं क्यों की ज्यादा ही पास से रूप सौन्दर्य का सही सही पता नही चलता इसलिये कुछ दूरी भी जरूरी है सखियाँ दूर जाकर देखनें लगीं हे वज्रनाभ उस रूप सुधा को देखकर कोई सखी मूर्छित ही हो गयी कोई अपनें आपे से बाहर चली गयी कोई सखी भावातिरेक में अपनें आँखों का काजल निकाल कर श्याम सुन्दर को डिठौना लगानें लगी ताकि नजर लगे

अच्छे लग रहे हो लाल जू

पर हमारी लाली तुमसे भी अच्छी लग रही हैंएक सखी नें कहा

अब तो दिखादो हमारी प्रिया को हाथ जोड़ उठे श्याम सुन्दर

चलो नौका से उतारा सखियों नेंचारों और कमल के पराग उड़नें लगे थेयमुना की बालुका उड़ रही थी पर उस बालुका के रूप में कपूर को ही मानों पीस कर प्रकृति नें फैला रखा था यमुना में

फूलों के पाँवड़े बिछाये थे उनमें ही अपनें चरणों को रखते हुए श्याम सुन्दर आगे बढ़े

उधरगौर वर्णी श्रीराधिका रानी नील वसन धारण की हुयी माथे पर चन्द्रिका गले में मोतियों का हार मुख मण्डल ऐसा लग रहा है जैसे सोनें को तपाया गया हो और दिव्य आभा उसमें से निकल रही हो उनके चरणों में नुपुर हैं जब वो दुल्हन के रूप में धीरे धीरे चलरही थीं तब उसकी ध्वनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फ़ैल रही हैआकाश से देवों नें और देवियों नें पुष्प बरसानें शुरू कर दिए हैंपर उन सब पुण्यजीवी देवताओं को मात्र आभा ही दीख रही है हे वज्रनाभ उन्हें दर्शन नही हो रहेक्यों की ये दर्शन और ऐसे महामहोत्सव पुण्य से प्राप्त नही होते ये तो तब होते हैं जब आल्हादिनी की कृपा हम पर हो

तभी श्याम सुन्दर दौड़े और उधर से श्रीराधिका जू दौड़ीं

और ऐसे मिले दोनों जैसे बादल और विद्युत का मिलन हो

सखियों नें गायन और नृत्य शुरू कर दिया था

और कुछ सखियाँ जयजयकार कर रही थीं

सुन्दर मण्डप तैयार है फूलों का मण्डप है

कुञ्ज लताओं के बीच वह मण्डप सजा है

एक सखी गयी और दो रतन चौकी ले आई

इन दोनों दूल्हा दुल्हन को बैठाना जो है

पर तभी

आज आप दोनों का ब्याह होगाआज ही मुर्हूत है

सहसा आकाश में आलोक हुआ था और हँस में बैठकर विधाता ब्रह्मा उतरे थे वृन्दावन की भूमि में

सखियाँ हँसी अच्छा हमें तो पता ही नही था पर आप चार मुख वाले कौन हैं ?

हे हरिप्रिया की सखियों मेरा प्रणाम स्वीकार करो मैं ब्रह्मा हूँ आदि सृष्टा ब्रह्मा

पर यहाँ तुम्हारा क्या काम है ? सखियों नें पूछा

मैं ही इस ब्याह का पुरोहित हूँ इस सौभाग्य से मुझे वंचित करो

मैने हजारों कल्पों से इस समय की प्रतीक्षा की है और मुझे श्याम सुन्दर नें वरभी दिया था कि मैं ही इस ब्याह को सम्पन्न कराऊंगा

पर इनकेवरदेंनें से क्या होता है ? सखियों नें फिर ठिठोली की

ये तो हमारी लाली के पल्लू से बंधे हैं इसलिये आप हमारी लाली से ही प्रार्थना कीजिये सखियों नें ब्रह्मा जी को कहा

विधाता ब्रह्मा जी नें हाथ जोड़कर श्रीराधा रानी की स्तुति करनी प्रारम्भ कर दी थी

दूल्हा दुलहनि नख सिख सोभा, श्री हरिप्रिया निरखि मन मोहा


श्रीराधाचरितामृतम् -भाग 30

( अनादि दम्पति का ब्याह महोत्सव )


वर्षा ऋतु से सीधे बसन्त ऋतु पर वर्षा ऋतु में ही दोनों बाल रूप से चले थे अपनें घर क्यों कि अवतार काल की भी तो अपनी मर्यादा है ना ? बरसानें में जाकर देखा कीर्तिरानी और बृषभान जी बैचेन हो प्रतीक्षा ही कर रहे थे कि मेरी लाली क्यों नही आयीवर्षा भीषण होनें वाली हैकहाँ गयी

बाबा बाबा दौड़ी भानु दुलारी कृष्ण देख रहे हैं

अरे कहाँ रह गयी थीं तू ? और ये ?

ये कन्हैया बाबा बृजपति मिले वृन्दावन में उनको गाय खोजनी थी तो हम दोनों को भेज दिया श्रीराधा नें कहा

बृषभान जी हँसते हुए बोलेबृजपति वृद्ध हो गए हैं उन्हें समझाना पड़ेगा देखो दोनों बालकों को अकेले रात्रि में ही भेज दिया

लाला चलो आप भी कुछ खा लो कीर्तिरानी नें बड़े प्रेम से कृष्ण को महल भीतर चलनें के लिये कहा

नही अब मैं चलूँ क्यों की बादल जिस तरह से छाये हैं लगता है वर्षा जोरों से होगी और मैं जितनी जल्दी नन्दगाँव पहुँचूँ उतना ही अच्छा रहेगा मेरी मैया भी उदास होगी कन्हैया नें कहा और जानें लगे

ले श्रीदामा भी आगया श्रीदामा तुम कन्हैया को नन्दगाँव पहुँचा दो और सुनो वर्षा अगर तेज़ हो तो तुम भी रात्रि वहीँ विश्राम कर लेना ठीक है ?

श्रीदामा नन्दगाँव चले कन्हैया को लेकर

हे वज्रनाभ एक रूप से श्रीराधा कृष्ण अपनें अपनें घर में आगये और दूसरे रूप से भाण्डीर वट में ब्याह की तैयारियाँ चल रही हैं इन अनादि दम्पति के ब्याह की तैयारी

हे गुरुदेव दो रूप कैसे धारण किये इन युगलवर नें

ये कैसे सम्भव है ?

वज्रनाभ के इस प्रश्न को ज्यादा महत्व नही दिया महर्षि शाण्डिल्य नें बस इतना ही कहा वज्रनाभ दो रूप क्या दसों रूप भी बनाकर सामान्य योगी लोग भ्रमण करते रहते हैं जब एक साधारण योगी भी दस रूप एक साथ बना सकता है तो ये ? ये तो समस्त योग के परम फल हैं ये तो योगियों के ईश्वर के भी ईश्वर हैं ये अगर दो रूप बना रहे हैं तो क्या आश्चर्य

छोडो इन व्यर्थ के प्रश्नों को

अब सुनो वज्रनाभ उस दिव्य ब्याह का वर्णन

बसन्त ऋतु बिल्कुल पागल है वह कभी रुकता है ठहरता है किसी को ठहरनें देता है मिलन की तीव्रता को और बढ़ानें वाला है ये बसन्त प्रेमी से मिलनें की बेकली पैदा करता है बसन्त भौरें मडरानें लगते हैं फूलों में जैसे उनकी बिलख ही डाल डाल और पात पात में मंडरा रही होरस की चाहअर्धचेतन प्राणियों को भी जगा देती है वे भौरें रस लेनें के लिये मतवाले हो उठते हैं और जब रस ले लेते हैं तब चकरानें लगते हैं पागल है ये बसन्त हाँ स्वयं भी पागल है और सबको पागल बना देता है ऐसे बसन्त में श्रीहरि और उनकी हरिप्रिया ब्याह करनें जा रहे हैं उफ़ ऋतु भी क्या चुना है

श्रीराधा की अष्ट सखियाँ हैं और उन अष्ट सखियों की भी अष्ट सखियाँ हैं मुस्कुराते हैं महर्षि

विचित्र बात है कृष्ण के साथ ये सोलह का अंक जुड़ा हुआ है और बहुत गहरा जुड़ा है गोपियां कितनी ? सोलह हजार पत्नियाँ कितनी सोलह हजार कृष्ण में कलाएं कितनी ? सोलह कलाएं अच्छा श्रृंगार में श्रृंगार कितनें ? सोलह

कर्मकाण्ड में पूजा करनें के उपचार कितनेंसोलह

और आश्चर्य वज्रनाभ यह हमारे शरीर का पूरा पिण्ड पांच ज्ञानेन्द्रियां और पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन पूरे हुए सोलह

पर कृष्ण बड़े विलक्षण हैं वे सब को एक कर देते हैं सोलह को एक ही करके मानते हैं सारे अनुमानों को गड़बड़ कर देते हैं सारे अनुमानों से मुक्त हो वे केवल एक पुकार बन जाते हैं अंतिम में ब्रह्म बस एक कृष्ण बस एक पर वो भी तड़फ़ उठता है पुकारनें लगता है और वह पुकारता है अपनें आपको वोअपनाकौन ? वह अपना अपनी श्रीराधा ही हैं

सब सोलहों को जो पूर्ण हैपर उन सबको एक करते हुए वो अपनें में ही रमनें के लिये बैचेन हो उठता है जो अपना ही है अपनें में ही है इतनी भी दूरी नही है उसी से फिर मिलनें के लिये मण्डप रचता है सेज सजाता है अपनें से ही प्रकट करता है फिर उसी से एक हो जाता है अपनें में समेट लेता है बोलते बोलते महर्षि स्वयं खो रहे हैं

तभी एक दिव्य रथ आकर रुकता है

वज्रनाभ देखते हैं ओह ये तो हस्तिनापुर नरेश परीक्षित हैं

महर्षि, परीक्षित को देखकर आनन्दित होते हैंवज्रनाभ उठकर उनका स्वागत करते हैं

महर्षि के चरणों में सम्राट परीक्षित जब प्रणाम करते हैं तब आनन्दित हो महर्षि कहते हैं हे परम भागवत परीक्षित बहुत सुन्दर समय में आपका आना हुआ है आज श्याम सुन्दर और उनकी आल्हादिनी श्रीराधा रानी का ब्याह महामहोत्सव है

इतना सुनते ही आनन्दित हो नाच उठते हैं परीक्षित उनके रोम रोम से प्रेम के परमाणु निकलनें लगते हैं

राधा राधा राधा रासेश्वरी

राधा राधा राधा कृष्ण प्राणेश्वरी

पर ये क्या श्रीराधा चरित्रकी दिव्य कथा में आज परम प्रेमी भक्त श्रीउद्धव जी महाराज का भी प्राकट्य होता है साष्टांग प्रणाम करते हुए वे महर्षि को आग्रह करते हैं कि हमें उस दिव्य कथा का पान कराइये वो कथा जोअनादि दम्पति के ब्याह की कथा हैपरीक्षित उद्धव जी को प्रणाम करते हैं वज्रनाभ दोनों को प्रणाम करते हैंआहा कितना सुन्दर वातावरण कितना प्रेम रस पूर्ण वातावरण का निर्माण श्रीधाम वृन्दावन की भूमि में हो रहा हैमहर्षि और अधिक उत्साह से आगे की कथा सुनानें लगते हैं

आदि सृष्टा ब्रह्मा जी नें हाथ जोड़कर आल्हादिनी श्रीराधा रानी की स्तुति की श्रीराधारानी के सहस्र पवित्र नामों का अपनें चार मुख से उच्चारण करते हुए उनके चरणों में नमस्कार किया

मैं सृष्टा ब्रह्मा

आप दोनों के ब्याह का विधान करने आया हूँ कृपा करें

मुस्कुराईं श्रीराधा रानी

और अपनें प्राणधन श्यामसुन्दर की ओर देखा

मैं आपसे नाराज था विधाता क्यों की आपनें मेरे ग्वालवालों का अपहरण किया था पर आज मेरे हृदय की बात आपनें कही है तो मैं आपसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ मेरी प्राण बल्लभा श्रीराधा रानी का कोई पूरा नाम भी नही मात्र राभी कहे तो मैं उसके पीछे दौड़ पड़ता हूँ और जब वह धाकह देता है तब तो मैं उसका ही होकर रह जाता हूँ फिर आपनें हमारे ब्याह करानें की बात जो कही है इससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ

ठीक है आप ही ब्याह कराइये

इतना सुनते ही ब्रह्मा जी आनन्द से भर गए

अच्छा कन्यादान कौन करेगा ?

बड़ी विनम्रता से ब्रह्मा जी नें श्याम सुन्दर से ही पूछा था

पर इस रस में ब्रह्मा का ज्यादा विघ्न देना सखियों को अच्छा नही लगा ललिता सखी बोल पडीं पण्डित जी मन्त्र पढ़ो तुम तो बस इधर उधर करनें की सोचना भी मत तुम्हे मन्त्र पढ़ा रहे हैं यही बहुत है कन्या दान किसे करना है क्या करना है इस सब के लिये हम हैं

ब्रह्मा जी नें सखियों को हाथ जोडा और चुप हो गए

जिस के संकल्प से सम्पूर्ण सृष्टि बन जाती है वो ब्रह्मा स्वयं ब्याह करानें के लिये बैठ गए हैं

पर रँग देवि सुदेवी सखियों नें आकर श्रीजीका हाथ पकड़ा और बोलीं आप चलिये पहले आपको देवी की पूजा करनी है

ये क्या कह रही हो इनसे बड़ी देवी और कौन हैं ?

ब्रह्मा जी नें बीच में बोलनें की कोशिश की पर सखियों नें उन्हें चुप कर दिया आप बोलो ज्यादा

पर मैं वैदिक रीती का पक्षधर हूँ

ब्रह्मा जी नें श्याम सुन्दर से कहा

धरो अपनें पास अपनी वैदिक रीती

हम तोप्रेम रीतीको भी महत्व देंगी

इतना कहकर श्रीजीका हाथ पकड़ , बड़े प्रेम से सखियों नें उठाया

दूर कुञ्ज में ले गयीं वहाँ एक देवी का विग्रह था

दुल्हन को पहले देवि पूजनी ही चाहिये

पर ये कौन सी देवि हैं ?

ललिता सखी नें कहायेनेह की देविहैं यानि ये प्रेम की देवि

श्री जीनें उन प्रेम की देवि को बड़े प्रेम से पूजा बिधि पूरी की फिर धीरे धीरे श्रीजी को लेकर आईँ उसी ब्याह मण्डप में

रतन चौकी में दोनों विराजें हैं पाग पहनें हुए हैं श्याम सुन्दर मोर पंख उस पाग में शोभा पा रहा है चन्द्रिका श्रीजी के माथे में सुशोभित है काजल सखियाँ लगा देती हैं ताकि किसी की नजर लगे इस दोनों दूल्हा दुल्हन को

ये दोनों इतनें सुन्दर लग रहे हैं कि इनकी शोभा देखकर ब्रह्मा भी वेद विधि और वेद मन्त्रों को भूल जाते हैं तब सखियाँ ही ब्रह्मा को वेद मन्त्र याद दिलाती हैंया स्वयं पढ़नें लग जाती हैं

अग्नि देव स्वयं प्रकट हो गए हैं वेदी में

आहा देखो सखी ये दोनों कितनें सुन्दर लग रहे हैं सच में कहूँ तो इनको देखना ही इन नयनों की धन्यता है सखियां दूल्हा दुल्हन को देख देख कर मुग्ध हो जाती हैं

गठ जोरकरोब्रह्मा जी के कहनें से पहले ही सखियाँ तैयार थीं

गठ जोरकिया ललिता सखी नें फिर लाल जू की ओर देखकर सजल नयन बोलींहमारी लाली को कभी छोड़ना नही

भाँवरि पड़नें लगी मन्त्र पढ़ रहे हैं ब्रह्मा जी गीत गा रही हैं सखियाँ

देखो देखो भाँवरि लेते हुए दोनों कितनें दिव्य लग रहे हैंसखियों इस छबि को अपनें हिय में बसाओ यही हमारे जीवन धन हैं यही हमारे सर्वश्व हैं

पर एक सखी से रहा नही गया वो चँवर ले उठी और भाँवरि देते हुए लाडिली लाल“” के पीछे पीछे चँवर ढुराते हुए चलनें लगी

इस छबि को ब्रह्मा देखते हैं तो बिधि भूल जाते हैं इक टक बस इन दोनों को देखते ही रह जाते हैं सखियों को ही कहना पड़ता हैअब ये करो विधाता अब वो करो

ललिता सखी आगे आयींअब कन्यादान

मैं करूंगी कन्यादान

पर चरण प्रक्षालन का अधिकार मुझे भी मिलना चाहिये ब्रह्मा मचल कर बोले थे ललिता सखी से

श्याम सुन्दर के हाथ काँप रहे हैं काँप तो लाली के भी रहे हैं

ललिता सखी नें अपनी लाली का हाथ लाल जू श्यामसुन्दर के हाथों में जब दियाललिता सखी रो गयीहमारी लाली बहुत भोरी हैं इनका ध्यान रखना लाल

सिन्दुर दान के समय तो श्याम सुन्दर की दशा देखनें जैसी थीसखियों नें सम्भाला था उन्हें वो बार बार अपनी देह दशा भूल रहे थे सखियाँ तो सब सिद्धा हैं कोई साधारण तो हैं नहीं वो सब अपनें आपको सम्भाले हुए हैं सेवा में ही इनका ध्यान रहता है सेवा में मिलनें वालेआनन्दको भी ये ठुकराते हुए चलती हैं यही तो विशेषता है इन सखियों की तभी तो ये श्रीजीकी सहचरी हैं

हे वज्रनाभ उद्धव परीक्षित एक गम्भीर बात जो इस ब्याह में घटित हुआ वो सुनो महर्षि बोले

ब्रह्मा जी मूर्छित हो गए जब वो चरण धोनें लगे थे उस समय वो पुरोहित के रूप में नही थे और जैसे ही चरण धोनें लगे तभी आनन्द की अतिरेकता के कारण वे मूर्छित हो गए

तब ललिता सखी नें एक रहस्य की बात ब्रह्मा के कान में कही थी

हे ब्रह्मा जी ये नेह की वीथी है ये प्रेम का मार्ग है इसमें अपनें आपको सम्भालना पड़ता है तनिक चूक से सब कुछ बिगड़नें का डर रहता है हे ब्रह्मा जी आप अपना सुख देख रहे हैं आपको चरण धोते हुए आनन्द आरहा है तो आप उसी आनन्द में डूब रहे हैं पर जानते हो इस प्रेम मार्ग में स्वयं के आनन्द में डूबनाये भी उचित नही माना जाता क्यों की ये भी स्वार्थ है हमनें अपनें आनन्द को महत्व दिया पर हमें अपनें आनन्द को नही, अपनें प्रिया प्रियतम के आनन्द को महत्व देना है

ओह ऐसी प्रेम रहस्य की बात जब ब्रह्मा जी नें सुनी तो उनकी बुद्धि चकरा गयीवो उठे उन्होंने युगल सरकार के चरणों में प्रणाम किया फिर सखियों को भी हाथ जोड़ा

मुझे इस रस महोत्सव में सम्मिलित करनें के लिये आप सब सखियों का बहुत बहुत धन्यवाद हे युगलवर इस रस को पानें का मैं कहाँ अधिकारी ? मैं बुद्धिजीवी पर ये रस बुद्धि से परे है इसके द्वार तो हृदय से ही खुलते हैं

दक्षिणा माँगो पण्डित जी

सखियों नें हँसते हुए कहा

क्या ब्याह सम्पन्न हो गया ?

ब्रह्मा जी नें सखियों से पूछा

ब्याह अभी कैसे सम्पन्न होगा ?

पर आपकी वैदिक विधि सम्पन्न होगयी

हमारीनेह विधितो चलती रहेगी

ब्रह्मा जी नें अपनें चारों मस्तक धरती में रखकर प्रणाम किया

आप दोनों के चरणों में अविचल भक्ति होयही मेरी दक्षिणा है

मुस्कुरा कर श्रीराधा माधव नें ब्रह्मा जी को देखा और दिया

ब्रह्मा जी तो चले गए

पर सखियों कीनेह विधिअब शुरू हो गयी थी

तैसिये रूप माधुरी अंग अंग, तैसिये दुहुँन के नैंन विशाल

चारों ओर आनन्द छा रहा था आनन्द की धारा में बह रहे थे सब महर्षि , वज्रनाभ , परीक्षित और उद्धव जी

तैसिये चतुर सखी चहुँ ओरैं, गावत राग सुहाग रसाल

राधा दुल्हन दूल्हा लाल