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बिना प्रयास के प्रभु का चिन्तन (स्मरण) कैसे हो ?



प्र० महाराज जी, अभी प्रभु का स्मरण करने में प्रयास करना पड़ता है, ऐसी स्थिति कब और कैसे आयेगी जब बिना प्रयास के सहज स्वभाविक रूप से प्रभु का चिन्तन (स्मरण) होने लगेगा ?

समाधान – सच्चा भजन-चिन्तन स्वाभाविक रूप से तब होता है जब हम प्रभु से अपना सम्बन्ध जोड़ लेते हैं कि ‘हम प्रभु के हैं । जैसे हम अपने शरीर से तन्मयता किये हुए हैं कि ‘मैं पुरुष हूँ या मैं स्त्री हूँ तो क्या हमें कभी याद करना पड़ता है कि मैं पुरुष हूँ या स्त्री हूँ; ब्राह्मण हूँ या क्षत्रिय हूँ; अर्थात् नहीं याद करना पड़ता अपितु स्वाभाविक ये स्मरण बना रहता है; हम ये कभी भूलते नहीं हैं हर समय स्मृति में बना रहता है क्योंकि हमने शरीर या वर्ण (जाति) ये से सम्बन्ध बना लिया है। इसी तरह से प्रभु से सम्बन्ध बना लेने से उनका चिंतन (स्मरण) स्वाभाविक रूप से होने लगता है । भले ही कोई भजन-साधन नहीं बन पा रहा है, परन्तु यदि सम्बन्ध दृढ़ हो गया कि मैं प्रियालाल का हूँ, मैं वृन्दावन का हूँ, मैं गुरुदेव का हूँ, बस यही चीज तुम्हारा कल्याण कर देगी ।

जब मरणकाल सन्त्रिकट होता है उस समय समस्त इन्द्रियाँ शिथिल (निश्चेष्ट) हो जाती हैं लेकिन उस समय सम्बन्ध ही याद रहता है, जहाँ आपने सम्बन्ध जोड़ा है; स्त्री से जोड़ा तो स्त्री की याद आयेगी, पुत्र से जोड़ा तो उसकी याद आयेगी, अर्थात् जीवन में जो प्रधान सम्बन्ध रहा वही अंतिम में बिना चेष्टा के याद आता है; इसीलिये प्रभु से सम्बन्ध जोड़ लेने वाले भक्त को निश्चित भगवत्प्राप्ति होती है क्योंकि अंतिम में उसे प्रभु की ही याद आयेगी ।

प्रभु की अनन्य शरणागति और उनसे सम्बन्ध स्वीकृत कर लो तो भजन करना नहीं पड़ेगा, स्वाभाविक भजन होगा। सम्बन्ध जोड़ने से तात्पर्य प्रभु से अपनापन कर लेना । भले हमारी समस्त क्रियाएँ (चेष्टाएँ) भागवतिक हो रही हैं लेकिन यदि सम्बन्ध संसार से बना हुआ है तो वह सच्चा भजन नहीं माना जाएगा। इसके विपरीत भले ही क्रियाएँ सांसारिक हो रही हैं लेकिन अगर सम्बन्ध प्रभु से जोड़ लिया है तो बात बन जायेगी । श्रीब्रह्माजी ने श्रीमद्भागवत में कहा है –
तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम् । तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जनाः ॥

‘हे श्यामसुन्दर ! तभी तक राग-द्वेष आदि दोष चोरों की भाँति सर्वस्व अपहरण करते रहते हैं, तभी तक घर और उसके सम्बन्धी कैदी की तरह सम्बन्ध के बन्धनों में बाँधे रखते हैं और तभी तक मोह पैरों में बेड़ियों के समान रहता है जब तक जीव आपका – नहीं हो जाता ।’

इसीलिये बड़े-बड़े ऐसे सिद्ध भक्त भी गृहस्थाश्रम में हुए जिनके दर्शन करने के लिए बड़े-बड़े विरक्त महापुरूष जाते थे ।

श्रीअर्जुनजी ने सम्पूर्ण गीता का उपदेश सुनने के बाद कोई साधन नहीं किया, श्रीकृष्ण कहते जा रहे हैं और अर्जुन एकाग्रचित से सुन रहे हैं, उसका परिणाम क्या हुआ ? स्वयं अर्जुन कह रहे हैं

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । (गीता. १८/७३)

हमारे मोह का नाश हो गया, अब हमें अपने सम्बन्ध की स्मृति (याद) आ गयी कि ‘मैं कौन हूँ, किनका हूँ ‘ ये बात समझ आ गयी ।

जैसे कोई राजकुमार अपने राज्य से बिछुड़कर जंगली कोल भीलों के बीच पहुँच जाए और फिर वहीं उनके संग में रहने लगे तो कुछ ही दिनों में उसकी प्रकृति (स्वभाव), उसकी चेष्टाएँ उन्हीं लोगों की तरह हो जायेंगी; लेकिन जब कोई बिचौलिया (मध्यस्थ) मिले जो राजा से भी परिचित हो और कोल-भीलों से भी; वह उस राजकुमार को जाकर के समझाए कि देख तू इन कोल-भीलों के बीच बैठा है लेकिन तू तो अमुक राजा का लड़का है, चल हम तुझे तेरे पिता से मिलवाते हैं, फिर जब उसे पक्का विश्वास हो जायेगा और वह अपने परिवारवालों से मिलेगा, तब उसे अपने यथार्थ स्वरूप की स्फूर्ति होगी कि मैं राजकुमार होकर, कहाँ जंगली लोगों के बीच में भटक गया था ।

इसी तरह से हमारे माता-पिता हैं ‘प्रभु’ । प्रभु ने गीता जी में स्वयं कहा- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । (१५/७) ‘तू मेरा ही अंश है’ किन्तु हम प्रभु को भूलकर फँस गए हैं कोल-भीलों में अर्थात् नानात्व में । अब कोई सद्गुरु रूपी बिचौलिया (मध्यस्थ) आकर के हमें समझावे कि देख, तेरा स्वरूप क्या है – ईश्वर अंश जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥ (उत्तरकाण्ड-११७) और तेरा जो अंशी है वह कैसा है ? ‘जो आनंद सिंधु सुखरासी ।’ देख, अंश अंशी दोनों सुखरासी हैं न, इसलिए सुखरासी का बच्चा सुखरासी हुआ; कहाँ तू दुःखों में फँसा हुआ है, अर्थात् शरीर-संसार ये दुःखमय हैं, सुखरासी प्रभु हैं चल उनकी तरफ । फिर वह चल देता है ।

अतः हम सबको इसलिए फँसाए हुए हैं क्योंकि हम अपने ये स्वरूप को भूल गए हैं किन्तु जब सद्गुरु आकर के बताते हैं अरे तू तो सच्चिदानन्द का अंश है, तब उसको स्वरूप बोध होता है, ओहो ‘नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।’ बस सभी साधनाओं का फल इतना ही है कि हमें याद आ जाए कि हम प्रभु के हैं, भजन का भी यही फल है मोह का नाश होकर इष्ट के चरणों में अपनापन हो जाना ।

जो प्रश्न था कि बिना प्रयास के अखण्ड स्मरण कैसे हो तो उसका यही उत्तर है- ‘सतत चिंतन होता है अपनेपन से ।’ जब किसी से अपनापन हो जाता है फिर उसका चिंतन करना नहीं पड़ता है, वह श्वासों में बस जाता है, यादों में बस जाता है, हृदय में बस जाता है । हम निकालना भी चाहें, भूलना भी चाहें तो भी नहीं भूल सकते । ऐसी स्थिति हो जाती है कि हम कुछ कार्य करना चाहते हैं, व्यवहार करना चाहते हैं लेकिन बार-बार स्मृतिपटल पर वही याद आता है; यही है सच्चे प्यार का स्वरूप, यही है सच्चे अपनेपन का स्वरूप । प्रभु से सहज प्रेम हो जाना अर्थात् उन्हें अपना मान लेना, ये जन्म-जन्म की साधना पूर्ण हो गयी। अभी हम ईमानदारी से अपने हृदय को टटोलकर देखें कि क्या हम वास्तविक प्रभु को प्यार करते हैं, जिससे हम प्यार करते हैं यदि उसकी जरा-सी दूरी आने की बात आ जाय तो तुरंत एक विकलता होने लगती है कि मैं इनके बिना कैसे जी पाउँगा; अभी क्या प्रभु के लिये ऐसा प्यार आया, जिस दिन ऐसा प्यार प्रभु से हो जाएगा उस दिन अलग ही दशा हो जायेंगी, उनके बिना जीना मुश्किल हो जाएगा।

जो पै चॉप मिलन की होइ ।
तौ कत रह्यौ परै सुनि सजनी ! लाख करै जो कोइ ॥
जो पै बिरह परस्पर व्यापै तौ इह बात बनैं ।
डरु अरु लोक-लाज अपकीरति एकौ चित न गर्ने ॥
‘कुंभनदास’ जो मन मानै तौ कत जिय और सुहाइ ।
गिरिधर लाल रसिक बिनु देखें पल भर कलप विहाइ ||

जैसे जिन महापुरुषों को वृन्दावन धाम से प्यार हुआ वह कहते हैं कि हमारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँ फिर भी मैं वृन्दावन के बाहर जाना नहीं पसंद करूंगा –

खंड खंड है जाइ तन, अंग अंग सत टूक ।
वृंदावन नहिं छाँड़ियै, छाँड़िबौ है बड़ी चूक |
बसि कै वृंदाविपिन में, ऐसी मन में राख ।
प्रान तजौं बन ना तजौं कहौ बात कोउ लाख ॥

इसी तरह से जिन महापुरुषों को नाम से प्रेम हुआ उन्होंने यही कहा, नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं

खण्ड-खण्ड हइ देह जाय यदि प्राण ।
तबु आमि वदने ना छाड़ि हरिनाम ॥

ये है वास्तविक प्यार का स्वरूप |

1 thought on “बिना प्रयास के प्रभु का चिन्तन (स्मरण) कैसे हो ?

  1. Radha Vallabh Sree harivansh aap ne bahut acche se samjhaya hai Radhey Radhey very nice

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