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कलियुग के दोषों से कैसे बचे ?

प्र० : महाराजजी, कलिकृत विघ्नों का हम पर कोई प्रभाव न पड़े, ये कैसे हो, यानी कलयुग के दोषों से कैसे बचा जाए ?

समाधान : आगे मनुष्यों के लिए बड़ा अहितकारी समय आने वाला है क्योंकि धीरे धीरे महापुरुषजन लीला संवरण कर रहे हैं और जब संत नहीं रहेंगे तो दम्भ पाखण्ड का बोलबाला होगा, जीव छले जायेंगे लेकिन उस समय भी जो सच्चे सन्तों के सानिध्य में रहेंगे तो कलिकृत विघ्न आदि उस उपासक के ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकते। श्रीसेवकजू महाराज कहते हैं

कलि अभद्र वरनत सहस, कलि कामादिक द्वंद तब । सेवक शरण सदा रहै, सुविधि साँचे अनन्य सब ॥
(श्रीसेवकवाणी)

राधावल्लभ-भजत भजि भली भली सब होइ ।
जिते विनायक शुभ-अशुभ विन करैं नहिं कोई ॥
विघ्न करैं नहिं कोई डरैं कलि-काल कष्ट भय ॥
हरें सकल संताप हरषि हरिनाम जपत जय ।
(श्रीसेवकवाणी)

जब तक श्रीराधावल्लभ का भजन करने वालों का भजन अर्थात् उनका सान्निध्य, उनकी सेवा, उनका कृपा प्रसाद मिलता रहेगा तब तक कलियुग के जो अभद्र हैं वो सब डरते हैं, उस साधक को कहीं बाधा नहीं पहुँचा सकते हैं ।
चाहे जितनी आँधी आ जाए जो गाँव किसी पहाड़ की ओट में है तो वह सारा का सारा गाँव उस भयंकर आँधी-तूफान से बच जाता है; ऐसे ही एक भगवत्प्राप्त महापुरुष जहाँ होता है, वह बहुत बड़े वायुमंडल को विघ्नों से बचाता है। जो दीनता पूर्वक सदैव भजन परायण महापुरुष हैं वो महापुरुष इस संसार को नाना प्रकार की विपत्तियों से बचाने के लिए पहाड़ जैसे हैं। उन्हीं की छत्रछाया में हम जैसे लोग अधर्माचरण करते हुए भी आनंद से रह रहे हैं । आज के समय में अर्थ प्राप्ति, कामना पूर्ति, भोग-विलासिता यही हमारा उद्देश्य रह गया है। हमारा खूब यश हो जाए, हम खूब धनी मानी बन जाएँ और मनचाही भोग-सामाग्री हमें मिलती रहे बस यही हमारा जीवन का उद्देश्य बन गया है । जबकि भगवत-मार्ग के पथिक के लिए ये सब चीजें बाधक हैं

सुख सम्पति परिवार बड़ाई ।
सब परिहरि करिहऊँ सेवकाई ।
ये सब रामभक्ति के बाधक ।
कहहिं संत तव पद अवराधक ॥
(श्रीरामचरितमानस ४/७)

लेकिन यही सब चीजें हमारा लक्ष्य बन गयीं, अब दुर्दशा नहीं होगी तो और क्या होगा । धीरे-धीरे सच्चे संतों का अंतर्ध्यान होना हम लोगों के लिए अहित सूचक है; इसलिए शीघ्रातिशीघ्र ऐसी स्थिति बना लें कि इसी जन्म में भगवत्प्राप्ति हो जाए। अगर दूसरा जन्म भी हो तो कर्मबंधन के अधीन न हो, भगवद् अनुराग से युक्त हो।

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