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श्याम सखियाँ-32



कहा कहूँ कुछ कहत न आवे

(अंतिम भाग)

‘उधो जू! तुम चाहे कुछ कहो, तुम्हारे ये उपदेश हमारी समझ से परे हैं।’ ललिता जू ने कहा- ‘जो उनके मुख नहीं होता तो वे हमारे घर का माखन बरबस चुरा चुराकर कैसे खाते ? पाँव नहीं है तो गायों के संग कौन वन वन भागा फिरता था ? आँखें नहीं तो जिन आँखों में काजल आँजा करती थी मैया, वे क्या थी? बिना हाथ गोबर्धन उठाया वह हाथ किसके थे ? बिना मुख के कैसे बाँसुरी बजायी ? आह, सामने बीता है और तुम उस झुठलाना चाहते हो ? उनकी लीलायें, उनका स्वर, उनका रूप सब कुछ हमारे रोम-रोम में बस गया है; वह सब झूठ था ? हमारा भ्रम था ? नहीं उधोजू! वह नंद यशोदा के पुत्र और हमारे व्रज के नाथ हैं। तुम कैसे भी बनाकर कहो यह बात कभी हमारे गले नहीं उतरेगी।

“अरी सखी! यामें ऊधो जू कहा करें बिचारे, इन्हें तो उन चतुर सिरोमणि ने सिखाकर भेजा है। ये तो शुक की भाँति सीखा हुआ ही बोल रहे हैं।’—एक सखी ने कहा।

‘तुम कहते हो ‘गुण-ही-गुण में बरतते हैं, वे गुण रहित है।’ श्रुति बोली- ‘ तो कहो श्याम सखा ! गुण आये ही कहाँ से ? भला बिना बीज के कहीं वृक्ष उपजा है? क्या उन्हीं के गुणों की परछाहीं माया की आरसी में दिखायी नहीं देती ? जल और लहरों की भाँति जगत क्या उनसे कुछ भिन्न है ? जिन वेदों की बात समझाने आये हो वे क्या उनके श्यामरूप नहीं ? कर्म के मध्य कभी किसी ने पाया? जिसने भी पाया प्रेम से ही पाया है। सूर्य, चन्द्र, धरा, गगन, जल और अग्नी; इन सबकी शक्ति — इनका प्रेरक वहीं नहीं है? जगत के सारे गुण नश्वर हैं और तुम्हारे अच्युत वासुदेव इनसे भिन्न है ? अरे ओ ज्ञानगंगा में नहावनिहारे महाराज ! प्रकट सूर्य को छोड़कर तुम परछाहीं की पूजा करते हो, जैसे हथेली पर धरे आँवले में तुम्हें ब्रह्म ही दिखायी देता है? हमें तो उस मदनमोहन रूप के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं सुहाता।’

श्रुति के कहते-कहते ही हमारी आँखों के सामने श्यामसुंदर का वह भुवनमोहन रूप छा गया। कहाँ उद्भव और कैसे उनके उपदेश; कुछ भी स्मरण नहीं रहा। सखियाँ व्याकुल हो एक स्वर से रुदन करती हुई पुकार उठीं- ‘हा नाथ ! हा रमानाथ ! यदुनाथ! हमारे स्वामी ! ओ नंदनंदन ! तुम्हारे बिना – यह देखो तुम्हारी गायें कैसी भटकती फिर रही है ? क्यों नहीं इन्हें सम्हालते ? हम दुःख सागर में डूबकर बिलख रही है; क्यों नहीं अपने अजानुभुज बढ़ाकर-हमें अवलम्ब देकर सुखी करते ?’ कोई कह रही थी—’अहा श्यामसुन्दर ! तुम तो किसी को दुःखी नहीं देख सकते थे, फिर दर्शन देकर क्षणभर में ही छिप जाना हमारी प्यास बुझ भी न पायी कि अंतर्धान हो जाना, यह छल विद्या तुम्हें किसने सिखायी ? हम तो तुम्हारे प्रेम, रूप और गुणों के आधीन हैं। कहो तो, बिना जल के मत्स्य कैसे जी पायेगी ?”

कोई कहती थी— ‘अहो, कान्ह जू! अपनी बंसी की मधुमय तान सुनाकर, दर्शन देकर हमें जीवन प्रदान करो तुम्हारे हम सी बहुत होंगी किंतु श्याम जू! हमारे तो एक तुम ही अवलम्ब हो बहुत होने से ही क्या यों प्रीत तोड़ दोगे? इस प्रकार दूर दूर रहकर हृदय के घावोंपर नमक मत लगाओ।’

कोई कहती..
‘यदि हम मर गयी तो सोचो कितना बड़ा कलंक तुम्हारे माथे लगेगा ? इसका भी तुम्हें डर नहीं है? अबला-वध के भय से तो बड़े-बड़े बलवान भी काँप जाते हैं।’

कोई कहने लगी- ‘अहो श्याम ! ऐसे ही मारना था तो गोबर्धन उठाकर हमारी रक्षा क्यों की ? नाग से, दावाग्नि से क्यों बचाया हमें? अब उस विरहाग्नि में हँस-हँसकर जला रहे हो । प्रियवर! हमारा चित हमारे हाथ में नहीं है, इसी से इतनी निष्ठुरता क्या तुम्हें बरतनी चाहिये ? “

कोई कहती- ‘अरे ये सदा के निष्ठुर हैं, इन्हें कोई पाप नहीं लगता। ये स्वयं ही पाप-पुण्य के सिरजनहार है, फिर डर काहे का! जानती नहीं, दूध पिलाने आयी उस बेचारी पूतना के प्राण ही ले लिये जब छः दिन के शिशु थे तब ही इनके ऐसे लक्षण थे; अब तो कहने ही क्या ?’

किसीने कहा-‘अरी सखी! अब की ही क्या कहती हो, यह तो इनका पुराना स्वभाव है। इन्होंने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के लिये जाते समय पथ में मिली ताड़का को मार डाला था। जब ये मर्यादा पुरुषोत्तम रघुवंशी कुल प्रदीप थे। तुम इन्हें नारी वध का डर
क्या दिखाती हो, यह तो पहले भी नारी वधकर चुके हैं।’
कोई बोली- ‘अरी बहिन! उस समय तो ये पूरी तरह स्त्रीजित स्त्रैण पुरुष थे। सीता के कहने में आकर शरणागत-रक्षण करनेवालों में श्रेष्ठ इन धर्मधुरीन शस्त्रधारी ने छलपूर्वक सूपर्णखा के अंग-भंग कर लोकलाज की भी परवाह नहीं की। उसका अपराध क्या था कहो तो; वह इनके त्रिलोक विमोहन रूप पर आसक्त हो गई, यही न? ऐसे की क्या बात करनी ?”

एक ने कहा- ‘अरी बहिनों लोक-लाज गयी चूल्हे में, लोभ हू के पोत (जहाज) है ये। इनके गुण क्या सुनाऊँ तुम्हें; बलि राजा के समीप भूमि माँगने गये ये हमारे वनमाली। उसने अपना वचन निभाया, पर इन्होंने छलपूर्वक उसका सर्वस्व हथिया कर बाँध दिया। यही नहीं उसके सि रपर अपना पाँव रख दिया, कहो तो कैसा न्याय किया?’

दूसरी बोली – ‘इन्हें क्या कहे? ऐसे चरित्र हैं इनके कि कहा नहीं जाता। परशुराम होकर परशु (कुल्हाड़ा) कंधे पर धरकर निकले और भूमि क्षत्रियहीन कर दी । अपराध एक का और दण्ड इतनों को – रक्त के पाँच कुंड भर दिये, उसी से अपने पितरों का तर्पण किया। इतना ही नहीं सखी! उस समय अपनी माता – जननी को भी मारने में नहीं हिचकिचाये। इनकी निष्ठुरता की सीमा नहीं है।’

किसी ने कहा- ‘अरी हिरण्यकश्यप से इनका भला क्या झगड़ा था ? प्रह्लाद ने पिता के सामने बोलकर ढिठाई की, पिता ने उसको दंड देकर शिक्षा देनी चाही, इसमें भला क्या बुरा किया था। बीच में ही नरसिंह वपुधार के कूद पड़े और नखों से उसे फाड़ डाला, भला किस अपराध में।’

कोई बोली – ‘अरे शिशुपाल का ही क्या दोष था ? बिचारा विवाह करने भीष्मक के यहाँ गया वर वेश धारण कर-बरात लेकर ये बीच में ही छल करके उसकी दुलहिन को इस प्रकार हर लाये जैसे भूखे के मुख से कोई ग्रास छीन ले। ये तो सदा के स्वार्थी है।’

उसी समय कहीं से एक भ्रमर उड़ता हुआ आया और गुंजन करता हुआ श्रीकिशोरी जू के चरणों को कमल समझकर बैठने का उपक्रम करने लगा। श्री जू भावाविष्ट-सी बोली- ‘नहीं, मेरे पाँव न छुओ। तुम चोर हो, कपटी हो, श्यामसुंदर भी तुम्हारे ही समान कपटी हैं। क्या तुम उन्हीं के दूत बनकर आये हो ? क्या तुमने और तुम्हारे स्वामी, दोनों ने ही लज्जा बेच खायी है ? यहाँ गोपीनाथ कहलाते थे, यह नाम उन्हें रुचों नहीं; अतः अब कुबरी दासी के दास कहलाकर, उसकी झूठन खाकर यदुकुल को पावन किया। रे मधुप ! तू कान्ह कुँअर के क्या गुणगान करता है रे, उनके गुण हम भली प्रकार जानती है, तेरी चतुराई यहाँ नहीं चलेगी! अरे, तू भी उनसा ही है, भोली-भाली कलियों को मोहकर उनका रस ले उड़ जाता है, ऐसे ही तेरे नागर नंदकिशोर हैं। हमें तेरी बात नहीं सुननी, तू जा यहाँ से। तेरे स्वामी त्रिभंगी ठहरे, यहाँ भला उनकी जोड़ी की नारी कहाँ से मिलती ? मथुरा में बड़े भाग से त्रिवक्रा मिली, अब अच्छी जोड़ी जमी! रूप, गुण और शील, सब प्रकार से वह उनके अनुरूप है।’

“मधुकर! श्यामसुन्दर गुरु; और तू उनका शिष्य ! यह जोड़ी भी सब प्रकार से अनुरूप है, तुझे ज्ञान का पाठ पढ़ा-ज्ञान गठरी सिर पर देकर यहाँ भेज दिया, किंतु यहाँ व्रज में कोई तुम्हारा ग्राहक नहीं है, अतः पुनः रावरे पधारो। क्या कहते हो कि – तुम और तुम्हारे स्वामी साधु पुरुष हैं? तो तुम्हारे वहाँ के सिद्ध पुरुष कैसे होते होंगे भला? गुण को मिटाकर औगुण को ग्रहण करनेवाले उन मथुरावासियों से निर्गुण होकर ही मोहन क्यों नहीं व्यवहार करते ?”

‘अहो मधुप ! जगत में जितने भी काले देखे, सबके सब कपटी और कपट की खान पाये हमने एक श्याम जू के स्पर्श से आजतक तन-मन जल रहे हैं। ऊपर से मानो यह पीड़ा थोड़ी थी कि तुम सा काला भुजंग और भेज दिया। तुम दोनों कितने एक समान हो, यह तो आरसी में मुख देखते ही तुम्हें ज्ञात हो जायेगा । अरे ओ आलिंद ! यह कैसा न्याय है कि हम प्रेमियों के लिये ज्ञान, मुद्रा, वैराग्य और योग की भेंट भेजी, ऐसा करते हुए उनका हृदय तनिक भी काँपा नहीं ?’ – कहते हुए श्रीकिशोरीजी के साथ समवेत स्वर में सभी सखियाँ बिलखकर रो उठी-‘हा नाथ! केशव! कृष्ण! मुरारी! तुम तो करुणामय हो, यह कैसी करुणा है तुम्हारी ?’

उनकी व्याकुलता देखकर मुझ से रहा न गया— ‘ऊधो जू! तुम्हारे वे यदुनाथ, वासुदेव और देवकीनन्दन यहाँ व्रज में क्या इनके प्राण लेने ही पधारे थे? क्यों नहीं वहीं मथुरामें बने रहें ? यहाँ नंदनंदन, यशोदानंदन, गोपाल, गोविंद व्रजवल्लभ, गोपीनाथ होने क्यों आये ? जब अन्त में उन्हें मथुरा ही प्यारी थी तो क्यों हमसे नेह बढ़ाया। अरे! तुम उनके कितने गुण गाओगे, जो जन्म लेते ही छल-विद्या में पारंगत हो गया। उसने हमारे जले पर नौन लगाने भेजा तुम्हें योग लेकर ?’

‘अहा स्याम जू, तुमने भली करी ! इन प्रेममूर्तियों को देनेके लिये भला पास था ही क्या? ऊधो, तुम भी बज्र का हृदय लेकर ही आये…. आह ! ‘

इन प्रेम स्वरूपाओं के अगाध नेह की, प्रयत्न करने पर भी मुझे थाह न मिली। जितना गहरा उतरता था, उतना ही इनके हृदय का प्रेम सागर अगाध जान पड़ता था। नित्य ही मैं भिन्न-भिन्न प्रकार से ज्ञान-योग समझाने का प्रयत्न करता, किंतु इनके प्रेम की विरह की तीव्र धारा में मेरा ज्ञान और मैं दोनों ही बह जाते।

आज श्री जू और चम्पा के उद्गारों ने मुझे सर्वथा निरस्त कर दिया। अहो, इनके दर्शन पाकर मैं धन्य हुआ। आजतक ज्ञान कर्म की निरस भूमिका बाँधता रहा, इन प्रेममयी के सम्मुख जिन्होंने धर्म और मर्यादा की मेंड़ लाँघ दी। इस प्रकार जो टूटकर प्रभु को चाहें, तो उनके सम्मुख जोग, ज्ञान और कर्म हीरे के सामने काँच के समान ही तो होंगे। ये गोपिकायें धन्य हैं इतने समय तक मैं ज्ञानमद की व्याधि से पीड़ित मरता रहा ।

विधाता! यदि मैं इनके मार्ग की धूरि बन सकूँ, तो इनके पदस्पर्श का सौभाग्य पा धन्य हो जाऊँ । यदि विधाता मुझे इस व्रज में लता, गुल्म अथवा दुर्वा ही बना दें, तो आते-जाते इनकी परछाँही और पवन के संयोग से इनकी चरण धूलि मुझ पर पड़ जाय; इनकी कृपा से तनिक-सा प्रेम मैं भी पा सकूँ तो मेरा कल्याण हो जाय; किंतु यह भी तो मेरे वश की बात नहीं है। यदि श्यामसुंदर प्रसन्न हो जाय तो उनसे यही वर माँग लूँगा। प्रभु की महती कृपा है कि संदेश के मिस मुझे यहाँ प्रेम-पाठ पढ़ने पठाया अन्यथा मुझ मूढ़ के भाग्य में प्रेमानंद कहाँ ?

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-31



ऐसी फाँस गड़ी हिय माँहि, ना निकसे ना चैन पड़े

‘री पद्मा, कछु सुनी तैने ! चम्पा आयी है। वसुधा ने कहा

‘सच: कब आयी! तूने देखा?’ पद्मा ने उत्सुकता से कहा; फिर उसाँस भरकर बोली- ‘अब क्या देखने को आयी अभागी…. चल मैं भी मिल लूँ उससे ।’

पाटला के घर पहुँच एक दूसरे को देखते ही दोनों लिपट गयी; मुख से वाणी नहीं फूटी, कंठ रुद्ध और आँखें छलछला उठी। ‘भाभी! मैं लिवा ले जाऊँ चम्पा को ?’– पद्मा ने पूछा

‘वह तो आयी ही तेरे लिये है। किंतु बलि जाऊँ, तनिक दोनों बैठकर मुख जुठार लो।’– पाटला ने मनुहार की । ‘अच्छा भाभी ला दे! जो कुछ हो सो खाय लें।’

खा पीकर दोनों सखियाँ यमुना तट पर जा बैठीं। ‘अब कैसे आयी चम्पा! व्रज में अब बचा ही क्या है देखने को ?’ पद्मा ने पूंछा।

‘जीजी! सब सुन लिया है, किंतु मेरे लिये तो यह व्रजरज ही निधि है ! आप सबके और लीला स्थलियों के दर्शन कुछ कम है ?”

‘किंतु व्रज का महोत्सव – नित्य महोत्सवमय ब्रज दावानल दग्ध विपिन
हो गया है बहिन!’ – पद्मा रोती हुई चम्पा की गोदमें गिर पड़ी। ‘धैर्य धारण करो जीजी ! सुना है, उनके कोई सखा संदेश लेकर आये हैं।’

‘आये हैं बहिन ! पर आज तक मथुरा से कुछ अच्छा आया है कि अब आयेगा? वह संदेश सुनेगी-मर्म चीर कर अंगार भरे जैसा है वह! अहा श्याम जू; ऐसे कठोर निकले तुम! तुमसे तो किसी की तनिक-सी भी व्यथा सही नहीं जाती थी, आज…. आज आँखों से ओट होते ही निर्दयता की पराकाष्ठा पर उतर आये ? किशोरी जू के कोमल हृदय का भी विचार नहीं किया! एक बार तो सोचा होता….. ।’– पद्मा के आँसुओं का बाँध टूट गया।

‘जीजी! ऐसा क्या संदेश है; मुझसे कहो तो! अन्ततः वह हमारे प्रिय की कही बात है।’

‘सुन नहीं सकेगी चम्पा!’

‘तुम कहो तो !”

‘तब चल ! ऊधो जू के समीप ही चलें। हमें तो यही ज्ञात नहीं होता कि वे समझाना क्या चाहते हैं। यमुना पुलिन पर नंदा ने अपनी ओढ़नी बिछा दी थी, उसी पर उद्धव बैठे थे। कुछ सखियाँ उनके सामने मंडलाकार बैठी बतिया रही थीं। इन्हें देख एक साथ बोल उठी-‘ अरे चम्पा! कब आई बहिन ? आओ, तनिक तुम भी सुनकर हृदय जुड़ा लो। श्याम जू का यह अनोखा संदेश हमारे गले तो उतरा नही! सम्भव है, तुम कुछ समझ पाओ।’

चम्पा ने आगे जा उद्धव को प्रणाम किया- ‘हमारे धन्यभाग, भले पधारे महाराज! श्यामसुन्दर ने हमें स्मरण किया, इसी से हम धन्य हो गयीं। यहाँ इस व्रज में उनके स्मरण करने योग्य है ही क्या ! पर माता-पिता, स्नेही सखा आदि का सम्बन्ध योगी यति भी नहीं तोड़ पाते। अब वे बहुत बड़े व्यक्ति हो गये हैं, बड़े-बड़े लोग उन्हें घेरे रहते होंगे। उन्हें समय ही कहाँ रहता होगा व्रज को, यहाँ के लोगों को स्मरण करने का ! फिर भी उन्होंने कृपा की, आपने कष्ट किया यहाँ तक आकर उनका संदेश लाने का; हम क्या कहकर कैसे आभार व्यक्त करें। हम गंवार ठहरी! कोई उचित शिष्टाचार न कर सकें – उचित शब्द न व्यवहृत कर सकें तो हमें क्षमा करने की कृपा करें और अब उनका संदेश जो भी हो- जैसा भी हो सुनाने की कृपा करें।’

चम्पा की बात सुन उद्धव के जी में जी आया। वे बेचारे किंकर्तव्य विमूढ़ से हो गये थे; जब से आये, सबने उन्हें विक्षिप्त अथवा अर्ध- विक्षिप्त मान लिया था। कैसे अपनी बात कहें- उन्हें समझायें, समझ ही नहीं पा रहे थे। कैसे जाकर श्रीकृष्ण को मुख दिखायेंगे कि उन पुरुषोत्तम का सखा-साक्षात बृहस्पति का शिष्य उद्धव गाँव की गँवार ग्वालिनों को नहीं समझा सका।

अब चम्पा की कुछ युक्तिसंगत बातें सुन उनका हृदय उत्साहित हुआ— ‘देवियों ! पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने जो संदेश दिया है वह सब शास्त्रों का सार है। उन्होंने कहलाया है- तुम सब जो मेरे विरह में व्याकुल हो- दुःखी रहती हो, सो अज्ञान ही इसका कारण है। मैं तो अजन्मा-नित्य-चेतन हूँ। सर्वत्र सदा उपस्थित रहता हूँ। सबके अंतःकरण में साक्षी रूप से रहता हूँ। तुम एकाग्रचित्त से मेरा ध्यान कर इस रहस्य को पा जाओगी तो दुःख-सुखादि द्वन्द तुम्हारे समीप नहीं फटक पायेंगे- तुम सदा मुझे अपने समीप ही पाओगी।’

उद्धव के चुप होने पर सब चम्पा की ओर देखने लगीं। ‘और कुछ ?’– चम्पा ने पूछा।

‘मैं ही सर्वत्र समरस- निराकार चेतन तत्व हूँ।’ उद्धव ने कुछ डरते सहमते हुए कहा–‘मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं है। मैं ही साकार-निराकार रूप हूँ। कुछ क्रियायें और साधन भी बताये।’

‘सो सब रहने दें! अभी-अभी तो आप आये हैं, अभी तो ठहरेंगे यहाँ । हम अनपढ़ ठहरीं; एक दिन में आपका यह सारा शास्त्र ज्ञान हमारी मूढ़ बुद्धि में कैसे उतर जायेगा! किंतु एक बात जो इस संदेश में छिपी है; सम्भवतः आप भी नहीं समझ पाये! बात भी सच है; परम सखा होते हुए भी अन्ततः संदेश उनकी प्रेयसियों के लिये है, अतः गुप्त तो होगा ही!’

मेरी बहिनो! श्यामसुन्दर ने कहलाया है – सखियों! मैं तुमसे दूर रहकर भी मन से दूर नहीं हूँ। जैसे ईश्वर सर्वत्र सब समय उपस्थित रहता है, वैसे ही मेरा मन सदा सब समय तुम्हारा स्मरण करता रहता है, मैं एक क्षण को भी तुम्हें भूल नहीं पाता। जैसे योगी लोग ध्यान एकाग्र करके ईश्वर का अनुसंधान पा जाते हैं; वैसे ही यदि तुम मेरी अवस्था का अनुसन्धान करोगी, तो मेरे मन की अवस्था का अनुमान पा लोगी। मैं तुमसे तनिक भी दूर नहीं हूँ। मैंने व्रज छोड़कर एक पद भी बाहर की भूमिमें नहीं रखा है। संदेश में छिपा अर्थ यही है सखियों!’- चम्पा की बात सुन उद्धव आश्चर्य में और सखियाँ आनदं से कुछ क्षण स्तब्ध रह गयी और फिर वे सब एकाएक ही उच्च स्वरसे रो उठी।

श्रीकिशोरीजी ने चरणों में पड़ी चम्पा को उठाकर गले से लगा लिया ‘अब तू कहीं न जाना चम्पा!’ सुनकर चम्पा को लगा श्यामसुन्दर ने उसके लिये संदेश नहीं, पुरस्कार भेजा है। उसने कसकर किशोरीजी के चरणों को वक्ष से दबा लिया और नेत्र जल से पखारने लगी।

सखियाँ रुदन करते हुए प्रलाप करने लगी। उनकी आँखों के सामने श्यामसुन्दर की एक एक भङ्गी- एक एक चेष्टा साकार हो उठी। वे उन्हें साक्षात् सम्मुख पाकर कहने लगी- ‘मोहन! तुम परम स्वतन्त्र हो, तुम पर किसी का वश नहीं चलता; क्योंकि तुम व्रजराज के लाडले लाल हो। किंतु_ हम क्या करें, तुम्हारे अतिरिक्त हम कुछ नहीं जानतीं- हमें कुछ नहीं सुहाता । तुम्हारा यह अपरूप रूप, यह विशाल वक्षःस्थल, गजशावक की सी चाल, मीठी हँसी और कमलपत्राक्ष तुम्हारे इन कोमल-कजरारे नेत्रों की यह बाँकी चितवन देखकर हम सब कुछ भूल गय हैं। हमें अपने घर, सगे-सम्बन्धी और तन का भी ध्यान नहीं रहता। हमारी दृष्टि जिधर भी उठती है तुम्हारी ही छवि दिखायी देती है। सम्पूर्ण भूवनमण्डल में हमें तुम्हारे अतिरिक्त कोई दिखायी नहीं देता।’

‘तुम हमारे हो मनमोहन ! तुम…. हमारे…. हो ! हम…. तुम्हारी… चरण… किंकरियाँ… तुम्हारे… लिये,…. तुम्हारे…. दर्शन… स्पर्श… को…. तरस…. रही…. हैं, करो…. प्राणधन ! इस….. प्रकार…. की…. ठिठौली…. मत…. क्षण…. भर…. भी…. यदि…. हम…. तुम्हें…. नहीं….. देख…. पाती…. है…. तो…. हमारे…. प्राण…. ही…. निकलने…. लगते…. हैं । • हम…. तुम्हारी…. हैं, हम…. तुम्हारी…. हैं, तुम… कैसे…. जा…. सकते…. हो…. S… S… 5… ।’ हमें…. त्यागकर…..

सबकी सब सखियाँ आतपदग्ध कुमुदिनियों-सी मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़ी। उद्धव आश्चर्याभिभूत हो उन प्रेम प्रतिमाओं को देखते रहे । उनके भरे दृगों से टप…. टप टप…. आँसू चू पड़े।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-30



को आराधे ईस

‘क्या?”

‘क्या कहते हो उद्धव! यह संदेश श्यामसुंदर ने हमारे लिये भेजा है?’

‘सखी! सम्भवतः ये कहीं अन्य स्थान पर जाते-जाते इधर व्रज में पथ भूलकर आ गये लगते हैं। अन्यथा यहाँ कौन योग-वोग की बात जानता समझता है भला?’ – इन्दुलेखा जीजी ने कहा ।

‘अरी बहिन! न हो कि पहले बहुत से साधु-बाबा जमना किनारे आ आकर बसते थे न ! उन्हींके लिये यह संदेश होगा। उद्धव बेचारे बौराय गये, शीघ्रता में संदेश ले दौड़ पड़े। किसको क्या कहना, यह न समझ पाये!’ ‘किन्तु अब इस संदेशका क्या होगा बहिन! बाबा लोग तो अब टिकते

नहीं; आते तो हैं, पर कोई एकाध दिन में ही मथुरा की ओर मुँह उठाये चल पड़ते हैं। यह संदेश किसे जाकर सुनायें उद्धव ?’ चित्रा की बात सुन रमा बोली-‘सम्भव हो कि महर्षि शाण्डिल्य के आश्रम में इधर कोई योगी आये हों! हमारे श्याम जू तो सभी विद्याओं में पारंगत है; जब उद्धव व्रज जा ही रहे हैं, तो उन योगीराज के लिये भी कोई संदेश पठाय दिया। ए प्रिया! इन्हें तनिक महर्षि के आश्रम का पथ दिखा दे, जाकर कह आयें।’

‘किन्तु सखी! हमारे लिये श्यामसुंदर ने जो संदेशा पठाया है, सो तो सुन लो! कहीं ऐसा न हो कि जैसे इस दौड़ा-दौड़ी में उद्धव साधु बाबा को सुनाना वह हमें सुना गये, और हमें सुनाने वाला संदेश उन जटाधारियों को सुना आयें।’ चन्द्रा जीजी की बात सुन सबकी सब हँस पड़ी-‘उधो जू! फिर तो उनकी जो गत बनैगी सो बनैगी, पर जोगीसर बेचारे मुँह फाड़े तुम्हारे शून्याकाश को घूरते-घूरते कहीं चिमटा उठाये तुम्हीं को ध्यान धराने- आसन लगवाने में न पिल पड़ें। अतः । जो संदेश काऊ बाबा जोगी को, ऋषि-मुनि को दियौ होय सो हमें सुनाय दो और अपनी यह योग की गठरी मुठरी उठाय के उनको थमा आओ।’

‘अरी भाग्यवानो! पहले या की सुन तो लो। आधे तो पहले से बौराये लगते हैं और तुम सब मिली के याही और बौराय दोगी।’– विशाखा जीजी की बात सुन सब चुप होकर उद्धव के समीप सिमट आयीं सुनने को आतुर होकर सब उनका मुख निहारने लगीं। उद्धव जैसे मानो कुछ समझ न पा रहे हों, कभी इधर-उधर और कभी हम लोगों की ओर देखें।

‘कहा बात है ऊधो जू! तुम निसंक व्हे के श्यामसुंदर को संदेशों कहो; सकुचाने की काऊ बात नाय।’– ललिता जू बोली।

‘मैं यह संदेश किसी ऋषि-मुनि के लिये नहीं, तुम्ही सबके लिये लाया हूँ। यह समस्त चराचर जगत निराकार चेतन तत्व से व्याप्त है। जो दृश्य, गति अथवा परिवर्तन और वैचित्र्य दिखायी देता है, सो सब सत्व, रज और तम; इन त्रिगुणों में क्षोभ के कारण। इन्हीं त्रिगुणों से उत्पन्न पंचभूतों से प्राणियों की देह उत्पन्न हुई है। जीव अपने स्वरूप को न समझ पाने के कारण ही मेरा-तेरा करके सुख-दुःख अनुभव करता है। कुछ समय मेरुदंड सीधा रखकर आसन लगाकर अभ्यास किया जाय तो मन एकाग्र होने पर हृदय गुहा में स्थित चैतन्य अथवा अपना स्वरूप प्रकाशित हो उठता है। ज्ञान हो जाने के पश्चात् केवल एक निराकार ईश्वर तत्व ही बचता है, भिन्नता का आभास समाप्त हो जाता है। यह जो हाथ-पैर, बोल चाल व्यवहार हमें जान पड़ते हैं या दिखायी पड़ते हैं सो मात्र अज्ञान के कारण ! इसलिये हे गोपीकाओं! परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र का आदेश है कि मन को एकाग्र करके अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ, और….।’

“अरी बहिनों! यह उधो महाराज तो सचमुच ही बौराय गये हैं। यह अपने श्यामसुंदर को कहा कहे है, परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ‘ बाबा रे बाबा! कहो तो ऐसी सूखो-रूखो और कठोर संदेश भला श्यामसुंदर को हो सके भला? यह परब्रह्म श्रीकृष्ण निश्चय ही कोऊ और है।’

‘उधो जू! हम तुम्हारे हाथ जोड़ें—पाँव पड़ें। हमारी परीक्षा मत लो, हमारा धैर्य मत परखो! हम दुखियारिन पै दया करके कान्ह जू को प्राण-संजीवन संदेशो सुनाय के हम पर कृपा करो।’ ‘वही तो हे व्रजदेवियो! कब से तुम्हें सुना रहा हूँ कि ज्ञान प्राप्त कर लेना ही मानव-जन्म की चरम सफलता है; पर तुम सब सुनना ही नहीं चाहती; मेरी बात समझ ही नहीं पा रही हो। मुझे यही संदेश- उपदेश लेकर श्रीकृष्णा ने तुम्हारे समीप समझाने को भेजा है, जिससे तुम्हारा मोह दूर हो जाय और शाँति पाओ।’

उद्धव की बात सुनकर लगा जैसे चारों दिशायें सूनी हो गयीं। हमारी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। किसी के मुख से कोई बात न निकली। जिस संदेश के सुनने के लिये हमारे प्राण कानों में आ बसे थे वह…. जैसे खेलते कूदते शशकों के झुंड को किसी ने दावाग्नि में झोंक दिया क्या कहें…. किसे कहें ? श्यामसुन्दर को ?…. उद्धव को ?

सब पाहन की मूर्ति सी निष्प्राण चित्रलिखी-सी हो रहीं। थोड़े समय पश्चात चन्द्रावली जीजी का स्वर सुनायी दिया- ‘आह, भली करी श्याम जू तुमने नीको संदेश पठायो मरे को मारने में कहा पाप और कहा पुण्य ? किंतु उधो! तिहारे बौरेपन में हूँ कछु कसर नाय, जो ऐसे संदेश सुनायबे कूं एक साँस इहाँ दौरे आये। आये सो तो भले आये भैया! हमारे प्रिय के संदेशवाहक हो। संदेसो भले हमारे काम को होय के ना होय! उनके सखा हो, उनसे मिलके आ रहे हो; ये वस्त्र, ये आभूषण, यह तुम्हारा उनका सा वर्ण! सब देखकर हमें सुख मिला है। तुम हमारे सम्माननीय हो; कुछ दिन या गंवार गाँव में हम गरीब गुजरियों को पहुनायी का अवसर प्रदान करो। हम गंवार योग-साधन कहा जाने ! इस योग की गठरी को कसकर पुनि बाँध लेओ; कहीं अन्यत्र कोई ग्राहक मिले तो खोलकर दिखाइयो- आभार मानेगा- कछु मोल मिलेगो । यहाँ व्रज में तो याकी कानी कौड़ी की कीमत कोऊ नाय धरेगो।’

‘जीजी!’ इला बोली- ‘इनसे एक बात तो पूछौ कि इनको निराकार कैसोक होय है? सो कहा पहरे ? कहा खाय? कैसे विहरे ? कहा वह हूँ हमारे श्यामसुंदर सो मनमोहन है? कहा बाकी बानी हू वैसी मीठी है ? कहा वाने हू इनको विपत्ति सो बचाइबे को कछु भागमभाग करी ? बिना हाथ-पाँव – आँख नाक के कैसोक दिखतो होयगो; जा पै ये इतना रीझे पड़े कि और कुछ सूझे ई नाय!’

‘अरी देवियों! यह सब करने को उन्हें हाथ-पैर रूप की कोई आवश्यकता नहीं है। वह निराकार रूप में ही परम समर्थ है। – उद्धव ने पुनः एक बार समझान का प्रयत्न किया। “सुनो; सुनो सखियों! यह कैसी बात है भला! तुमने कभी सुनी ? अरे हम क्या तुम्हारी भाँति विक्षिप्त थी कि निराकार पर मोहित होती ? वह भूवनमोहन मुख- उसकी माधुरी ने हमारी मति गति हर ली उद्धव! तुम न जाने किस सड़े बूसे निराकार को देख आये हो कि प्रशंसा में जीभ ही नहीं थकती। एकबार देखा होता तुमने हमारे व्रजवल्लभ को, सुनी होती एकबार उस बंसरी की वह त्रिभूवनमोहिनी तान देखी होती तुमने वह छटा! जो हमारे लिये उन्होंने सात दिन तक गिरिराज को उठाये खड़े रहे। क्या-क्या कहें! सबेरे शाम वह गायों का दुहना, सिर पर नोवना लपेटे उनका वह गोपाल रूप, बछड़ों गायों के गलों में बाँहे डालकर उन्हें दुलारना, बातें करना। उनकी वह हँसी! सच कहती हूँ उद्धव; उनकी वह मुस्कान – वह हँसी, उसने हमें कहीं की न रखा। हम कब अपना और पराया भूलकर उनका चिन्तन करने लगी; हमें स्वयं स्मरण नहीं है। अब तुम न जाने किस निर्गुण की बात करते हो । भला गुण के बिना कौन किसको अच्छा लगा है? तुम्हीं कहो! तुम्हारा वह कंस, उसमें तो कोई गुण नहीं थे! कितना अच्छा लगा तुम्हें कौन-कौन रीझ पड़े उस पर ? फिर तुम्हारे कृष्णचन्द्र ने निर्गुण निराकर होकर, बिना हाथ-पैरों के ही उसे मार डाला? जैसा बिना हाथ पैर का तुम्हारा ईश्वर! वैसी ही बिना हाथ-पैर की तुम्हारी बातें हमारी तो यही समझमें नहीं आता कि किस बात के लिये तुम उसकी इतनी प्रशंसा कर रहे हो! और हमें क्या समझाना चाहते हो?”

‘क्या सचमुच ही श्यामसुन्दर ने तुम्हें यह सब हमें समझाने को भेजा ?’- चित्रा ने पूछा।
‘हाँ ।’– उद्धव ने सिर हिला दिया; बेचारे बोलते भी क्या !

‘धन्य हो मोहन!’ ललिता जू निश्वास छोड़कर बोली-‘हमें भेजने को तुम्हें दण्ड, कमण्डल, सींगी, सैली और मुद्रा ही जुटी! जटा और भस्म के उपदेश करके हमारे गौरस दान का बदला भलीभाँति चुका दिया तुमने! हम तो वह सब भी कर लेतीं, पर हमारे मन तो हमारे समीप छोड़ जाते कि तुम्हारी इन बातों का पालन कर पातीं। कृपण विधाता का दिया एक ही तो मन था, वह भी तुम्हारे संग गया। अब कहो तुम्हारे इस निराकार ईश्वर की आराधना कौन और कैसे करे ? हमारी आँखों से, साँसों से, मन से क्षण भर भी तो तुम टलते नहीं, तब उस निराकार की बात कैसे सोचें। तुम बुरा न मानना कि हमने तुम्हारी बात को महत्व नहीं दिया, किंतु उपाय क्या करें? इससे तो यही ठीक होता कि पहले इस निराकार को मन में ढूँस लेने के पश्चात ही हम तुम्हारे दर्शन पातीं। पर तब हम क्या जानती थी कि एक दिन ऐसा भी आयेगा कि तुम अपनी रूपमाधुरी के स्थानपर कोई निराकार भेजोगे, जिसे चारों दिशाओं में आँखे फाड़कर देखने पर भी हम देख नहीं पातीं! हमारे साथ बोलने, खेलने और खाने, विविध लीलायें करने के स्थान पर मेरुदंड सीधा करवा कर नासाग्र को देखने का व्यायाम करने को कहोगे। व्यायाम भी हम कर लें, पर तुमसे मन हटे तो ! जिधर दृष्टि जाती है, तुम्हीं दिखायी देते हो। तुम्हें हम कैसे भूलें; ब्रजभूमि पर अब भी तुम्हारे पदचिन्ह अंकित हैं। कोई स्थान ऐसा नहीं, जहाँ तुमने कोई लीला न की हो। हम कहाँ जायं? जिधर दृष्टि उठती हैं, तुम्हारी लीला स्मृतियों की रेलमपेल मच जाती है। हम तुम्हारी किंकरिया हैं, हम पर कृपा करो। यह ईस हमारे बस का नहीं, हम क्या करै !”

“अरी ललिते! क्यों दुःख करती है बहिन! चन्द्रा जीजी बोलीं ‘जो पीड़ा को; प्रतिपल उफनती पीड़ा को ही हमारा भाग्य बनाकर भाग छूटा है, उसे कैसी दया माया? पहले से मन नहीं भरा था कि यह एक प्रहार और कर दिया। क्यों दुःखी होती हो! जब कार्य हमारे बिना आराम से चल रहा है, तो हमारा भी चल जायेगा। ऐसे कुटिल को याद करने का काम क्या है ? अरे स्वयं ही बैठ गये होते न समाधि लगाय के या फिर अपने मामा को ही लगवाय दी होती। अरे ऊधो जू! आप तो योग के पूरे पंडित जान पड़ते हैं, यह योग स्याम जू ने आपको सिखाया या वे मथुरा जाकर इस योगपर रीझ पड़े ! और क्या-क्या सीखे वे वहाँ जाकर, और कितने तीर तीखे कर रहे हैं यहाँ व्रज पर चलाने को वे ?”

“अरे हाँ, यह तो पूछना भूल ही गयी कि हम तो गाँव की भोली-भाली गंवार गूजारियाँ है ऊधो! बिना जाने सोचे-समझें रीझ पड़ी उन पर ! किंतु तुम्हारे मथुरा की नारियाँ नागरिकायें चतुर हैं- समझदार हैं; उनपर भी श्यामसुन्दर का मोहन मंत्र चला कि नहीं? वे क्यों आने लगी उनकी चिकनी चुपड़ी बातों में ?”

रंगदेवी की बात सुन श्यामा जू बोली- ‘मेरी भोली सखियों! श्यामसुंदर, एक ही चतुर शिरोमणी हैं, किसी को लुभाने को उनकी एक चेष्टा ही बहुत है; फिर जो कोई उनका रूप देख ले, हँसी देख ले, बात सुन ले, उनकी चाल उनकी वह अनियारे दृगों की लाल डोरों से सज्जित दृष्टि देख ले; तो फिर त्रिभुवन में कौन है जो आपा न भूल जाय! बेचारी मथुरावासिनियाँ भी हमारी ही भाँति जाल में फँसी मीन-सी छटपटाती होंगी।’

‘कौन जाने बहिन ! वे ठहरी चतुरा, हमारे नंदनंदन को ही उन्होंने अपने प्रेमपाश में समेट लिया होगा! लाख छूटने का उपाय करने पर भी छूट न पाते होंगे, तो निराश होकर हमसे पीछा छुड़ाने को यह जोग की गठरिया ऊधो जू के माथे धरकर पठाय दी कि अब आशा छोड़कर सब की सब भस्म, जटा, वलकल धारण कर अलख जगाओ उधो जू! तुम्हारी वा मथुरा में सब कारे-ही-कारे बसें का? एक तुम्हारो वो आयो श्रीकृष्णचन्द्र, कारन को सरताज ! हमने वापर सर्वस्व न्यौछावर कर दीनो; खा-पीकर, कोटिक उधम मचा – बलवान बनके, नंदनंदन तें वासुदेव देवकीनंदन बनकर हमारो सब समेट कर चलतो भयो। एक वो अक्रूर आयो; जाने कौन ने वाको नाँव अक्रूर धर्यो! मीठौ-मीठौ बोलकर हँस हँसकर हमारी आँखें हूँ निकार ले गयो ! और एक तुम पधारे; वाई कारे के परम सखा !! स्वयं हू कारे – उपदेश की खेप भरि कै, हमारी हितु बनि कै, अपनो बणज फैलाय कहे- प्रेम त्यागि के बैरागन है जाओ।’

वाह महाराज !’ इलाने कोहनियों तक हाथ जोड़े – ‘हम बाज आयीं! अपना व्यापार समेटो । धन्य धन्य आप सब मथुरावासी और धन्य आपकी वा काजर की कोठरी मथुरा ! जामें ते जो निकस्यो सोई कारो।’

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-29



वे दिन अब दुःख देत

‘तुम्हीं धीरज त्याग दोगे तो कैसे चलेगा भैया ! सुना है कि तुम स्वेच्छा से बालक-रूप बने रहते हो, अथाह ज्ञानी हो। तुम धैर्य धारण करो और इन सबको सम्हालो ।’-
कदम्ब तले आँसू ढरकाते तड़फड़ा रहे मधुमंगल का सिर गोद में लेकर केशों को सहलाते हुए मैंने कहा । आयी थी अपनी पीर भुलाने; किंतु यहाँ सबको अर्धमृत पड़े देख, पीड़ा का सागर ही मानो हृदय में उमड़ आया।
‘रूपा ! बहिन, मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ?
आह, श्यामसुन्द रने यह क्या
किया।’– मधुमंगल ने सिर धुनते हुए कहा ।
सुनकर हृदय में एक हूक उठी- ‘आह, सब कुछ बदल गया है। सखा भी मुझे रूप से रूपा कहने लगे हैं।’ महा प्रयत्न से तनिक हँसकर कहा- ‘रूप नहीं कहेगा अब !’

‘एक दिन तूने पूछा था न, कि रूपा से रूप कैसे हो गयी? उस दिन तो मैंने हँसकर तुझे अँगूठा बता दिया था। ले आज बताती हूँ, किन्तु मैं बलिहारी
जाऊँ! तनिक जल पी ले मेरे वीर ।’

‘नहीं बहिन! अब तो श्यामसुन्दर पिलायेगा तभी पीऊँगा। आह, कन्हैया भैया ! ‘

‘भैया…..!’ – कहकर मैंने उसका सिर धीरे से भूमि पर रखा और पत्र पुटक में कालिन्दी का जल लेने चली।

‘नेत्र खोलो भैया ! यह जल पी लो तनिक विचारो तो ! श्यामसुन्दर आये और उन्होंने तुम्हारी यह दशा देखी, तो कितने दुखी होंगे? हम सबको स्वस्थ रहना है भैया! अपने श्यामसुन्दर के लिये हमें स्वयं को, व्रज को, गैयाओं को वैसा ही बनाये रखना है, जैसा वे छोड़कर गये थे। तुम तो उनके अंतरंग सखा हो, उनके सभी रहस्यों के जानकार हो! लो उठो।’– मैंने उसे उठाकर पत्र पुटक अधरों से लगाया।

नेत्र जल के साथ यमुना-जल की एक घूँट गले से नीचे उतरी ही थी, कि जाने क्या हुआ ! वह बिलबिलाकर पुकार उठा— ‘कन्नू रे ! भैया कन्हैया रे ! हमहिं छाँडि तू कितकूं गयो रे ?’ वह ढाढ़ मारकर भूमिपर जा गिरा।

हाय मैं क्या करूँ ! दृष्टि उठाकर चारों ओर देखा-सूनी सूखी धरणी, सूना गगन, झूल से वृक्ष, बिसूरते पशु-पक्षी। यह…. यह…. व्रज को क्या हो गया ? यह वैकुण्ठ से भी सुहावनी व्रज – वसुन्धरा दावानल दग्ध अग्निमुख से गिरे ग्रास-सी श्रीहीन कैसे हो गयी ? ऐसा दारुण शाप किसने दिया इसे ? किसने छीन लिया इसका सुख सौभाग्य ? हाँ, दैव तेरी निष्ठुरता को धिक्कार है ! ‘भैया मनसुखा! तू तो महाज्ञानी है, उनके स्वरूप को भली प्रकार जानता है। वही स्मरण कर धैर्य धारण करो।” ‘
क्या कहती हो बहिन! एकबार श्यामसुन्दर का मुख देख ले, तो योगीश्वर शिव भी ज्ञान भूल जाय ! मेरी क्या गिनती है, तू और कोई बात कर।’

‘हाँ भैया! तूने पूछा था एक बार कि तू रूपा से रूप कैसे हो गयी? वही बताती हूँ सुन ! मेरी मैया कहती हैं- मैं श्यामसुन्दर से छः दिन उम्र में बड़ी हूँ। वह सब तो मुझे स्मरण नहीं किन्तु कान्ह बछड़े चराने लगे अपने सखाओं के संग ।’

मेरी मैया उसाँस भर नयनोंमे जल भर लाती भरे गले से कभी-कभी कहती–‘रूपा लाली भई; जो छोरा होय के आती तो आज कान्ह कुँवर के संग बछरा लै के जावतो।’

सांझ को पुनः उन्हें लौटते देख बाबा-मैया वही चर्चा ले बैठते । एक दिन मैंने कहा-बाबा! मैं भी कन्हाई के साथ बछड़े चराने जाऊँगी।’ सुनकर बाबा ने मुझे अंक में भर लिया उनके नयन झरने लगे ‘तू छोरा बनकर आती तो हमारी सारी आशायें पूरी हो जाती।’ ‘नहीं बाबा! मैं तुम्हारी लाली नहीं, लाला हूँ। सब के सब छोरा मेरे जैसे ही तो हैं। बाबा तुमको मेरी सौगन्ध, मै कल बछड़े चराने जाऊँगा मेरा नाम रूप है, रूपा नहीं। मैंया! मैं भी कछनी पटुका पहनूँगी’ कहकर मैंने घाघरी उतारकर फेंक दी। मैया ने मनाने समझाने की बहुत प्रयत्न किया पर मैंने रो-रोकर घर भर दिया। तब बाबा ने मुझे कछनी बांधकर पटुका कंधे पर धर दिया। मेरी प्रसन्नता की सीमा न रही, मुझे लगा मुझे देखकर बाबा मैया भी प्रसन्न हुए हैं। न जाने क्या बात थी मैया देख देखकर हँसती भी और रोती भी जाती थी। मेरी सखियाँ और पास-पड़ोस के सब मुझे देखने आये सब हँस रहे थे।

मेरा मन अकुला रहा था – ‘कब सांझ हो, कब कन्हाई आये और उसे बताऊँ– मैं रूप हूँ रूप ! तेरा सखा; मैं रूपा नहीं हूँ। कब सबेरा हो और मैं बछड़े लेकर उसके साथ वन में जाऊँ। उस समय यही सब मन में था किसी की हँसी-ठिठौली मेरा स्पर्श नहीं कर सकी।

मैया मुझे लेकर नंदभवन गयी, सब बात सुनकर यशोदा मैया हँसकर बोली- ‘ठीक तो कहती है लाली! जब तुझे लाला होगा तो यह पुनः रूपा हो जायेगी।’

मेरी मैया बोली- ‘तुम ही कहो व्रजरानी! कल सयानी होने पर छोरौँ के संग रहने वाली से कौन विवाह करेगा ?’ यशोदा मैयाने उत्तर दिया- ‘चार दिन की बात है बावरी ! यह स्वयं ही अपनी सखियोंके लिये अकुला उठेगी।’

दूसरे दिन जैसे ही प्रभात हुआ मानो मेरा दूसरा जन्म हुआ। मेरा नाम, रूप, कार्य और संग-साथ, सब परिवर्तित हो गये। मैया ने मुझे जगाकर कहा – ‘सुन कन्हाई का शृंगनाद गूँज रहा है।’

शीघ्रता से हाथ-पैर मुँह धुलवाया, पटुका और छींका कंधे पर रखा, हाथ में लकुट और भृंग लेकर बछड़ों को आगे करके मैं खिरक से निकला। मैया बाबा नेत्रों में जल लिये मेरे पीछे द्वार पर खड़े थे। ज्यों-ज्यों कन्हाई बछड़े लेकर बढ़ रहा था त्यों-त्यों अन्य गोपबालक अपने बछड़े लेकर उस झुंड में मिलते जाते। बालक जैसे वर्षों से बिछुड़े हो ऐसे दौड़कर उसे अंकमाल देते और आगे चल पड़ते। जब मेरे द्वार से वे कुछ ही पद दूर रह गये, तो मैंने द्वार से हटकर लकुट उठाया। संकेत पाते ही ‘हंबा’ रव करते बछड़े पथपर भागे। मैं भी श्याम के सम्मुख जाकर खड़ा हो गया अंकमाल देने को; हाथ उठे नहीं !

‘अरे रूपा! तू ?’ — वंशी में सुर फूंकते होंठ मुस्कराकर पूछ उठे।

‘रूपा नहीं, मैं आज से रूप हूँ कन्हाई! तू अपने साथ मुझे भी बछड़े चराने ले चल।’– मैंने अनुरोध किया। मैया ने कहा जब मेरे भैया हो जायेगा तब मैं पुनः रूपा हो जाऊँगी।’

‘अच्छा चल!’- कन्हाईने स्वीकृति दे दी। यह पीछे ज्ञात हुआ कि वह ‘ना’ कहना जानता ही नहीं अपने जनों को सुख देना ही जानता है वह, उसने इधर-उधर खड़े सखाओं की ओर देखकर कहा-‘भैयाओं! देखो, यह अपना नवीन सखा रूप है।’

बस, उस दिन से मैं रूप हो गयी। कितने खेल हमने साथ-साथ खेले, कितने असुर श्याम ने मारे इसके हम सब साक्षी हैं भैया। नित्य ही दिन को वन में मंगल महोत्सव होता और प्रातः सांय व्रज में। सखियाँ मुझे बावरी कहती हँसती किंतु साथ-साथ मेरा सौभाग्य भी मानती। मुझे घेर सबकी सब श्यामसुन्दर की बातें पूछतीं। कोई-कोई ठिठौली भी करती — ‘क्यों रूप! तुझे लज्जा नहीं लगती ?”

‘लज्जा! क्यों भला ? जिस सुख के लिये तुम तरसती हो वह मुझे नित्य सहज सुलभ है। लज्जा निगोड़ी का भला क्या मूल्य है इसके सामने ? यदि
जन्म जन्म में बार-बार यही करना पड़ा तो मैं सहर्ष लज्जा त्यागकर
श्यामसुन्दर का हाथ थाम लूँगा।’ एक दिन पद्मा ने एकान्त में कहा- ‘सुन रूपा!’

मैं चिढ़ गयी–‘देख मैं रूपा नहीं, रूप हूँ। यदि तुझे रूपा से ही कोई काम हो तो वह जहाँ हो, वहाँ चली जा और उसे ढूंढ-ढांढ़ ले।’

‘सुन! हम सब व्रत कर रही है। तू भी करेगी ?’– उसने कहा।

‘कौन-सा व्रत ?”

‘भगवती कात्यायनी का।’

‘क्या होगा इससे ?’

‘मनोकामना पूरी होती है।’

‘कौन-कौन करेंगी ?”

‘यहाँ की सब सखियाँ और वृषभानपुर की सखियों के साथ श्रीकिशोरीजी भी करेंगी। ‘ ‘क्या माँगोगी कात्यायनी से ?”

‘वह सब वहीं ज्ञात होगा।’

‘क्या कहती है, तेरे मनकी कामना तुझे ही ज्ञात नहीं ? ‘ ‘सो तो है! सबकी एक ही तो अभिलाषा है।’ कहते-कहते पद्मा की वाणी भावपूर्ण हो उठी।

‘क्या है भला सुनूँ तो।’

पद्मा के नयन नीचे झुक गये, लाज से हँसकर औढ़नी से उसने नाक मुख ढक लिये फिर एकदम बोली- ‘बोल करेगी ? करना हो तो प्रातः आऊँ बुलाने! यदि न करना हो तो बात मन में रखना; किसी छोरे से कुछ कह मत देना।’

‘क्या करना होगा इसमें ?” ‘सूर्योदय से प्रथम ही यमुना में स्नान करके कात्यायनी की पूजा करनी है

एक मास तक।’

‘बस ? किंतु मैं कैसे कर सकूँगा, मैं तो उस समय गायें लेकर सबके साथ वन में जाता हूँ।’

‘कल विवाह होगा तो पति के साथ जाना पड़ेगा और घर गृहस्थी सम्भालनी होगी। सखाओं के साथ हुडदंगे नहीं मार पायेगी तब।’ – पद्मा चिढ़कर बोली ।

‘क्यों जाना पड़ेगा पति के संग कहीं लड़के भी ससुराल जाते हैं, बावरी कहीं की। मैं तो छोरा हूँ छोरा तू जा मुझे नहीं करना कोई व्रत ब्रत।’ मैंने पद्मा को अंगूठा दिखा दिया।

बहुत दिन हो गये उस बात को! एक दिन अपने सब भांडिर वट की छाया में बैठे थे कि आनन्द ने कहा- ‘आजकल ये सब छोरियाँ प्रभात से पहले गीत गाती हुई कहाँ जाती है ? लौटती भी गीत गाती हुई हैं। मैंने मैयासे पूछा तो उसने बताया- कोई व्रत करती हैं। कैसा व्रत है, क्यों करती हैं, यह कुछ भी ज्ञात नहीं!’

‘मुझे ज्ञात है।’ मैंने कहा- ‘अपनी मनोकामना सफल करनेके लिये

माता कात्यायनी की पूजा करती है यमुना स्नान करके। एक महिने का व्रत है।

पद्मा मुझे भी कह रही थी करने को, किंतु मैंने स्वीकार नहीं किया। इत्ती इत्ती-सी छोरियों की भला क्या अभिलाषा होगी, जो प्रभात की ठंड झेलें। फिर कोई बड़ी बूढ़ी भी साथ नहीं जातीं, कोई डूब गयी यमुनामें तो हो जायेगा व्रत ! — भद्रने कहा।

“‘सीख देने से कुछ भी लाभ न होगा, उलटे हमें चिढ़ायेंगी। क्यों श्रीदाम तेरी बहिन भी करती है यह व्रत ?’- अर्जुनने पूछा।

‘हाँ भैया! यह अच्छा तो मुझे भी नहीं लगता। इतनी ठंड में क्यों जल में उतरें क्यों नहीं अपने मनकी चाह बाबा मैया से कहतीं, वे उनकी इच्छा पूरी नहीं करेंगे क्या ?’— श्रीदाम ने कहा ।

‘भैया कन्हाई! ऐसा करें कि हम सब प्रातः उनसे पहले यमुना तट पर
चलें और देखें – सुनें ये क्या माँगती है कात्यायनी से। वही वस्तु उन्हें देकर इस कठिन व्रतसे मुक्ति दे दे।’

जब सभी सखाओं को यही बात रुचि, तब श्यामसुंदर ने कहा ‘अच्छा भैयाओं तुम्हारी ही बात रहे।’

प्रातः यमुनातट पर ज्ञात हुआ कि उनका व्रत आज ही पूर्ण होता, किंतु नग्न स्नान से व्रत खंडित हो गया। श्यामसुंदर को दया उपजी, वह उनके तट पर रखे वस्त्र लेकर कदम्बपर चढ़ गया। वरुणदेव को प्रणाम कर क्षमा याचना करवायी और वस्त्र लौटा दिये। बात भी ठीक थी अन्यथा एक मास का परिश्रम व्यर्थ हो जाता।

हमारे दिन बड़े आनन्द से बीत रहे थे भैया! किंतु मेरी मैया चिंतित थी । एक दिन सांझ को वह मेरा हाथ पकड़कर यशोदा मैया के समीप ले गयी ‘तुम्ही समझाओ इस बावरी को ब्रजरानी! देखो, इसकी देह कैसी सुदृढ़ हो गयी है, कोमलता नाममात्र भी नहीं बची। छोरों के और ढ़ोरों के संग दौड़-दौड़कर मल्लयुद्ध, लाठी, दण्ड बैठक, तैरना, वृक्ष पर चढ़ना और जाने क्या-क्या सीख गयी है।’

मैया की आँखों से जल झरने लगा-‘रानी जू! बेटी के एक भी लक्षण नहीं सीखी यह चूल्हा, चाकी, दधी मंथन और सीना-पिरौना कुछ भी नहीं। जानती। कौन इसका हाथ थामेगा? और थामेगा तो क्या इसकी पूजा करेगा। अथवा स्वयं घर काम करेगा और इसे गैया चराने भेजेगा? सगे-सम्बन्धि मुझे क्या कहेंगे ? इसके बाबा तो कहते हैं- रूपा ससुराल नहीं जायेगी। यदि नहीं जायेगी तो फिर क्या करेगी। जिससे विवाह होगा वह क्या चौका बासन करेगा और इसे बन-बन गायोंके पीछे दौड़ने भेजेगा ? मैं क्या करूँ, कुछ सूझता नहीं। इसकी देह तो देखो अब क्या खुले शरीर रहने के दिन हैं इसके ?”

यशोदा मैया ने मुझे अच्छी तरह देखकर एक बार दांतों तले उंगली दबाई फिर बोली- ‘लाली! अब तू बड़ी हो गयी। गाय चराना छोड़कर घर का काम-काज सीख बेटी ! देख तेरी उम्र की सखियाँ कितना कुछ सीख गयी हैं।’ ‘मैं रूपा नहीं हूँ।’ मैं चीखकर बोली- ‘मुझे नहीं करना ब्याह-व्याह….।’

हाथ झड़काकर मैं भागने को हुई तो यशोदा मैया ने हाथ थाम लिया। फिर से वे मुझे समझाने लगीं- ‘सुन लाली! यहाँ मेरे पास बैठ पुरुष और नारी के शरीर की बनावट एक जैसी नहीं होती।’ किंतु मुझे तो कुछ सुनना ही नहीं था। उनकी बात सुनने मानने का अर्थ था, कन्हाई से दूर रहना यह मुझे किसी प्रकार स्वीकार न था। अंतमें मैयाने एक उपाय किया, मेरे उत्तरीय को वक्ष पर फैलाकर कटि में बाँध दिया और बोली- ‘देख लाली! यदि तुझे गायें चराने जाना है, तो पटुका ऐसे बाँधना पड़ेगा; अन्यथा मैं किसी प्रकार तुझे वनमें नहीं जाने दूँगी और सुन ले, यह भी कुछ ही दिन की बात है, फिर तो तुझे घर रहना ही है !’

बाद की बात बाद में देखी जायेगी! यहीं सोचकर मैंने मैया की बात स्वीकार कर ली। जितने दिन श्यामसुंदर के साथ बीतें सो ही भले। किंतु मेरा मन बाद की बात स्मरण कर उदास हो जाता था। एक दिन कन्हाईने पूछा- ‘क्या हुआ रूप! तू उदास क्यों रहता है।

मुझसे कुछ अपराध बन पड़ा है क्या ?’ मेरे नेत्र उसकी बात सुनकर भर आये। क्या कहूँ, कहने योग्य है ही क्या ?

‘मुझसे न कहेगा ?’– उसने मेरा चिबुक ऊपर उठाते हुए पुनः पूछा । ‘कन्हाई!’– मैं उसके वक्ष से सिर टेककर फूट पड़ी; हृदय की पीड़ा
आँसू बनकर झरने लगी।

‘मुझसे कह रूप! क्या दुःख है तुझको ?’ – श्याम ने अपने पीताम्बर से मेरे आँसू पोंछे। ‘मुझसे कह रूप!’- उसने पुनः आग्रह किया।

‘मुझे विधाता ने छोरी क्यों बनाया ?’ – हिचकियोंके मध्य इतनी बात कह पायी मैं और रुदन फिर उमड़ पड़ा।

‘किंतु इससे तेरा क्या बिगड़ता है रे? विधाता ने ऐसा क्यों किया यह तो मुझे ज्ञात नहीं! पर इस बात को जानने से तेरा दुःख मिटता हो तो मैं प्रयत्न करूँ जानने का कि उसने तुझे छोरा क्यों नहीं बनाया ? महर्षि शाण्डिल्य अवश्य इसका उत्तर जानते होंगे।’

‘यह बात नहीं है कन्हाई ! मुझसे तेरा साथ छोड़ा नहीं जाता।’– मैंने कहा। ‘तो कौन तुझसे छुड़वा रहा है बावरे ?’ उसने हँस कर मुझे गले लगा लिया।

‘मैया!’— मैंने कहा। ‘मैया! कौन मेरी मैया ? ‘

‘हाँ!’

‘क्यों, क्या कहा ?”

‘कह रही थी- नारी और पुरुष के शरीर की रचना एक सी नहीं होती ! नारी खुले शरीर नहीं रह सकती। जब मैं नहीं मानी तो उसने मेरा पटुका इस प्रकार बाँध दिया और चेतावनी दी कि यह भी कुछ ही दिनों की बात है, बादमें तुझे घर बैठकर बहु-बेटी की भाँति चौका-चूल्हा करना पड़ेगा। कल ससुराल जाकर क्या हम सबके मुँह पर कालिख लगवायेगी ? कन्हाई ! जो होना हो, सो हो ! यदि तुझसे दूर रहना पड़ा; तो मैं यमुना की शरण लूँगा।’

मेरी बात सुनकर श्यामसुन्दर कुछ सोचता रहा फिर बोला- ‘देख रूप! जब तक मैं गाय चराने आता हूँ, तुझे कोई मेरे साथ आने से रोक नहीं सकेगा। मैं घर रहने लगू; तब की बात न्यारी है !’

‘कन्नू ! सच कह रहा है तू! मैया को मना लेगा न?’– मैंने उसके कंठ में बाहें डाल दीं। तू!

‘यह सर्वथा सच है रूप! कि यहाँ व्रज में कोई तुझे मुझसे दूर न कर सकेगा।’ ‘भैया मधुमंगल! मैं तो उसकी बात सुनकर फूली फूली फिरती रही,

मुझे कहाँ ज्ञात था कि वह हमें त्यागकर मथुरा चला जायेगा! मैं आनन्द में डूब उतरा रही थी कि तीसरे ही दिन क्रूर अक्रूर हमारी आँखों का प्रकाश छीन ले गया। भैया! मेरे कारण ही वह मथुरा गया और और लौटकर नहीं आता। कोई जाकर उससे कह दो-तेरा रूप अब रूप नहीं, रूपा है। वह घरमें घाघरी फरिया पहनकर बैठी है, अब गाय चराने नहीं जायेगी।’ ‘भैया! वह किसीका दुःख नहीं देख सकता इसी से चला गया। सारे व्रज को दुःखी करने वाली मैं हूँ भैया; मैं हूँ ! कोई मुझे शाप दो, मैं सबकी हत्यारी हूँ। सबकी ह…. त्या… री…. ।’

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-28



कहा करूँ कित जाऊँ सखी री

एक पर्णकूटी, यमुनातट से हटकर वृक्ष समूह से आवृत-सी। उसमें बाँस की खपच्चियों से बना केवल एक ही वातायन छोटा-सा ।

यह अपराह्न से ही वातायन से सिर टिकाकर खड़ी हो जाती। संध्यापूर्व से ही प्रतिचि गोरज मंडित हो जाती और धीरे-धीरे वह प्राणहारी वंशी रव मन प्राण देह को झनझना देता है- उसके प्राण नेत्रों में आ समाते। गौरजघन-पटल पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता, तब उसमें स्थिर विद्युत सी आभुषणों की चमक काँधने लगती। कुछ क्षण ही कुछ ही क्षण, पर वे कुछ क्षण कैसे कठिन; प्रतिक्षा के अंत का उत्साह, उत्सुकता, आवेग तीव्र अभिप्सा बनकर, प्राणघातक हो रोम-रोम में व्याप्त हो जाती। वातायन की ताड़ियों से टिका सिर, फटे-फटे नेत्र, दोनों हाथों से वातायन की छड़ियों को दृढ़ता पूर्वक थामें वह थरथर काँपती देह को सम्हालने का यत्न करती…. । आह! कितना कठिन है यह देह को सम्हालना….. और तब…. तब जैसे प्राची की कोख से अंशुमाली उदित हुए हों… वह घनश्याम वपु अपनी मंद-मधुर-मादक गति से आगे बढ़ता दृष्टिगोचर होता – देह त्यागकर सम्मुख दौड़ जाने को आतुर प्राणों को जैसे दर्शनौषधि पाकर अवलम्ब मिलता अवलम्ब पाती वह काँपती कमनीय देह दर्शन संजीवनी पाकर।

कभी सखाओं से विनोद करते, कभी इधर मुड़कर फिरकी-सी लेकर एक हाथमें मुरली लिये, दुसरा ऊपर उठाये घूम जाते; कभी कालिन्दी की लहरों-सी उमड़कर हुँकार करती समीप आती गायों की पीठ पर थपकी देते, उनके मुख पर अपना गाल रख हाथों से दुलारते। कभी वे रतनारे दीर्घ दुग अट्टालिकाओं पर शोभित कुमुदिनियों को धन्य करते आगे बढ़ रहे थे। कभी वे प्रवाल अधर वंशी में विविध मूर्च्छनायुक्त स्वर फूँक प्रतिक्षा संतप्त हृदयों को शीतल लेप से जीवन प्रदान करते नंदभवन के द्वार की ओर बढ़ रहे थे।

झरझर झरता नयन निर्झर उसका वक्षावरण आर्द्र करता रहता। धीरे धीरे वह नील ज्योति भवन द्वारमें प्रविष्ट हो जाती और वह अवश-सी भूमिपर झर पड़ती। यह उसकी नित्यचर्या थी। कबसे? यह तो स्वयं उसे भी ज्ञात नहीं! उसे तो लगता है मानो वह युगों से ऐसे ही प्रतिक्षा करती आ रही है। ज्येष्ठकी प्यासी धराकी भाँति प्रतिक्षा ही मानो उसकी नियति है और नित्य ही आषाढ़के प्रथम मेघ-सी कुछ बूंदे प्राप्त होती हैं; जिन्हें पाकर उसकी तृषा द्विगुणित हो दावानलका स्वरूप ले लेती है।

कई सखियाँ जल भरने यमुनाकी ओर जा रही थीं। ‘भला इस एकान्त कुटीमें कौन रहता होगा ?’– एक सखीने पूछा। ‘कोई साधु बाबा होंगे उन्हीं को तो एकान्त रुचता है। संसारी तो सदा
समूह के ही आकांक्षी होते हैं। दूसरी ने कहा। ‘मैं देखकर आती हूँ।’ श्रियाने कहा- ‘यदि साधु हुए तो तुम्हें भी बुला लूँगी, प्रणाम करके आ जायेंगे। उनके भजन-ध्यान में विन करना अच्छा नहीं होता।’

वह कुटीकी ओर बढ़ी धकेलनेपर द्वार खुल गया, प्रथम कक्षमें कोई नहीं था। वह अन्दर कक्षकी ओर बढ़ी; भीतर झाँकते हुए वह चौंककर दौड़ पड़ी, उसकी प्रिय सखी बेहाल पड़ी थी।

‘इला ! इला!! ए इला, नेत्र खोल बहिन! इधर मेरी ओर देख मैं श्रिया हूँ! मैं श्रिया हूँ बहिन!!’ एकाएक स्मरण आया- उसे वापस जाने में विलम्ब होते देख कहीं अन्य बहिनें भी न आ जाँय वह वैसे ही उठकर बाहर चली आयी।

‘क्या हुआ, कोई है कुटियामें ? ” ‘नहीं, कोई नहीं।’

गहन निशा में आकर श्रियाने उसे अंक में भर लिया जलपूर्ण पत्र-पूटक उसके सूखे अधरोंसे लगाते हुए भरे कंठसे बोली- ‘जल पी इला!’

उसकी अपनी नयन-वर्षा थमती ही न थी; कितने दिनों बाद मिली यह प्रिय सखी! कितना और कहाँ-कहाँ न ढूँढ़ा इसे मैंने ? कितनी बार प्रिया जू ने पूछा, श्यामसुन्दरने पूछा ! पर कहाँ बताऊँ ? काकी तो जैसे बावरी है ! पूछनेपर कहती है- ‘अटरिया पै सो रही है लाली! साँझको कन्हाईके आयबेको समय होय, तभी उठके आवै।’

बहुत बहुत प्रयत्नों के पश्चात इला के नेत्र खुले; बाल सखी को पहचान गले में बाँहें डाल वह रो पड़ी।

‘कहा भयो इला? मुख तें कछु बोल बहिन, इन आँसुन के जिह्वा नाय!’

‘सखी मोकू विष लाय दे कहूँ ते!’- इला हिचकियोंके मध्य बोली। * क्यों ? किसलिये; मरने को ?’ – श्रियाने पूछा ।

‘मरकर क्या मिलेगा सुनूँ जरा! उठकर बैठ और अपनी बात कह श्रियाने सहारा देते हुए कहा। ‘हाँ बहिन ! मरनेपर तो यह सुख भी छिन जायेगा।’

इलाने उसाँस लेते हुए कहा- ‘यदि उनकी चरन रज मिल जाय!’ ‘चरन रजकी का कही; चल मैं तुझे ले चलूँ उनके समीप !’ ‘ना बहिन! यह मुख उन्हें दिखाने योग्य नहीं है, मुझे ऐसे ही रहने दे | यदि ला सके, तो उनकी चरन रज और चरण धोवन ला दे!’

‘फिर मरनेकी बात कही तू ने ?’ ‘ऐस ही निकल पड़ी मुँहसे। मैं अनन्तकालतक उस वातयन के सम्मुख अवस्थित रहकर जीवित रह सकती हूँ बहिन! तू जा अब ।’

श्रिया बहुत प्रयत्न करके भी इला को मना न सकी, प्रभात से पूर्व वह घर चली गयी। रोती-निश्वासें छोड़ती इला स्वयं को ही न समझ सकी! तो सखी को क्या समझाती कि उसे क्या हुआ है। कभी-कभार गुनगुनाने लगती – ‘मोहे डस गयो री किशन कालो नाग…।’ कभी रोते-रोते हँसने लग जाती और कभी हँसते-हँसते स्थिर हो जाती पत्थर की तरह। रात्रि ऐसे ही व्यतीत होती और प्रातः पूर्व ही दौड़कर वह वातायन से लगकर खड़ी हो जाती। उन नवघन सुन्दर के दर्शन का पारितोषिक पाकर नयन मत्त हो जाते; दिन इस नशे की खुमारी में बीत जाता। वह कभी उनकी चाल का अनुकरण करती, कभी मुस्कान-माधुरी के स्मरण में तन्मय हो जाती, कभी उनसे बात करती और कभी स्वयं प्रेष्ठ बनकर इलाको मनाने लगती। भ्रम टूटनेपर विरह-व्याकुल हो – मूर्च्छित हो धरापर गिर पड़ती। साँझ पुनः नयनोत्सवका आनन्द संदेश देती।

आज उसके व्याकुल प्राणोंको औषध नहीं मिली। उसके आकुल नेत्र गौओं-ग्वालबालों के बीच अपनी निधि खोज रहे थे। किंतु अपनी पारसमणि कहीं न पाकर वातायनकी देहरीपर मस्तक टेककर वह फफक पड़ी। कितना समय बीता ऐसे ही कैसे कहा जाय ?

किसी ने कंधे पर हाथ रखा तो वह पलट कर उससे लिपट गयी ‘मैं क्या करूँ श्रिया, मैं क्या करूँ ?’ रुदन का वेग अदम्य हो उठा। स्नेह सान्त्वनापूर्ण कर सिर पीठपर घूमता रहा। अधीर मनका वेग जब कुछ धीमा हुआ तो रुँधे कंठ से बोली-‘समझाती हूँ मन को! कि नित्य दर्शन पा ही ले ऐसा कौन-सा सुकून बल है तेरे पास ? किंतु यह हतभागा हठी मन मानता ही नहीं; इसे तो दर्शन चाहिये-ही-चाहिये। कह तो बहिन! मैं क्या करूँ ? यह अभागा मन न मानता है, न शाँत होता है। यमुनामें डूबने गयी; किंतु आशा मरने नहीं देती। मरनेपर तो यह इतना सा सुख भी न मिल पायेगा। एक समय था जब मैं बड़ी होनेको मरी जाती थी। आज…. आज…. लगता है कोई लौटा दे मेरा वह हीरक जटित बालपन। पर बहिन! उसे लेकर भी मैं क्या करूँगी! इस जले कपालमें सुख लिखा ही कहा है? जहाँपर चर-अचर, छोटे-बड़े, अपने पराये, सभी उन्हें सुख देने, उनपर न्यौछावर होनेके आतुर रहते – क्षण-क्षण प्रयत्नशील रहते, वहीं मैं निरन्तर उन्हें चिढ़ाती। कभी इस जली जीभने दो मीठे बोल नहीं कहे। सदा व्यंग-तिरछा बोलकर दुःखी करती रही। एकबार भी सेवाकी बात मनमें नहीं आई। सदा ही यह चाहिये- वह चाहिये, करो- वह करो, ऐसा क्यों किया ऐसा क्यों नहीं किया करके उन्हें इधर-उधर दौड़ाती डाँटती रही। यही नहीं! बिना थके बिना चोट लगे झूठा प्रपंच करके उनकी पीठपर लद जाती कि मुझे उठाकर ले चलो। उन्होंने सदा मेरी रुचि रखी बहिन!’

‘वे इतने सीधे और भोले कि जैसे मैं नचाती, वैसे ही नाचते! जो कहती, सो ही करते सम्पूर्ण व्रज जिनके चरणों में बिछा पड़ता था, उन्हें मैं थका थका देती। तुम सब मुझे समझाती, पर मैं उनपर एकाधिकार जताते न थकती। और जब वह सब समझमें आया, तो मानो ग्लानिका पहाड़ टूट पड़ा… मैं क्या करूँ सखी! मैं क्या करूँ! न जीया जाता है, न मर ही पाती हूँ।’ “श्रिया! कुछ तो बोल बहिन; कुछ तो कह, मेरे संतप्त देह-मनको तेरे

स्पर्शसे बड़ी शीतलता मिली। कुछ उपाय बता श्रिया कि प्राणौषधि पा सकूँ। उनकी कुछ बात कर बहिन, उनकी चर्चा कर आज नयन अभागे ही रहे! तू श्रवणोंको धन्य कर दे बहिन….!’

‘इला!’- कच्चे गले की वह सुपरिचित वाँछित वाणी के कानों में प्रवेश करते ही इला चौंककर सखी से अलग हो गयी; उसकी मूँदी आँखें खुल गयीं और सम्मुख श्यामसुन्दरको खड़े देख वह लाजके मारे दोनों हाथोंसे मुँह अंत:कक्षमें दौड़ गयी। द्वार भेड़, वह दीवारसे लगकर थर-थर काँपती हुई नीचे बैठ गयी। आह्लाद, ग्लानि और लाजने मिलकर उसे अधमरी कर दिया।

‘इला!’–उन्होंने एक हाथसे बंद द्वारको ठेलते हुए पुकारा। द्वार खुल गया, क्योंकि उसमें श्रृंखला थी ही नहीं! वे भीतर आ उसके सम्मुख बैठ गये।

‘इला!’ एक हाथ उसके कंधेपर रख, दूसरेसे मुँहपर लगे हाथ अलग करते हुए उन्होंने कहा – ‘बोलेगी नहीं मुझसे? अभी तो श्रिया समझकर कितना कुछ बोल रही थी ?”

इलाकी लज्जा की सीमा न थी। उसने किसी ओर थाह न पाकर उनकी गोद में मुँह छिपा लिया। उन्होंने हँसकर अंक में भरते हुए कहा-‘अच्छा ही हुआ कि मुझे श्रिया समझ कर तू ने हृदय की बात कह तो दी; अन्यथा भला मैं भोला-भाला समझता ही कैसे? मैं तो सदा तुझे प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करता; तेरा रूठना, लड़ना-झगड़ना, सब मुझे अच्छा लगता। कोई अपनों से ही तो लड़ता है— रूठता है। तुझे रूठे से मनाना मुझे बहुत भाता था। अभी भी तो यही समझ रहा था कि तू रूठ गयी है, मैं मनाऊँ भी तो कैसे! तू मिल ही नहीं रही थी। काकी से, काका से, श्रिया से, प्रियाजू से; सबसे पूछकर हार थका; कोई ठीक-ठीक बताता ही नहीं था। मन न जाने कितनी आशंकाओंसे भर गया था कि कहीं सचमुच ही तो नहीं रूठ गयी तू? तुझे क्रोध बहुत आता है; मेरी किसी बात पर चिढ़कर यमुना में तो नहीं जा पड़ी ?

‘तू लड़ती है, मैं तुझसे ब्याह नहीं करूँगा।’ यह कहने पर तू सन्यासिनी बनने की धमकी देती थी! सो मुझे भय हुआ कहीं सचमुच तो सन्यासिनी नहीं हो गयी ।

किसीसे कुछ कह भी नहीं पाता, अपनी ही समझ के अनुसार खोजने का प्रयत्न करता। आज प्रातः गोचारण को जाते समय श्रिया ने बताया कि तू यहाँ है। तूझे पाकर ऐसा लगा मानो प्राण ही पा गया हूँ। अब मुझे छोड़कर कहीं ना जाना….।’

दोनों हृदयों में कहीं ठौर न पाकर लज्जा प्राण लेकर भाग छूटी। इला ने निश्चिन्त हो अपने प्राणाधार के वक्ष पर सिर टेक नेत्र मूँद लिये। ‘मैं…… तु. म्हा… री ‘ आनन्दातिरेक में स्वर खो गये।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-27



कलधौत के धाम बनाय घने महाराजन के महाराज भये

‘देवी सूर्यनंदिनी! इतनी उतावली होकर कहाँ जा रही हो?
क्या कहा, मथुरा ?
अहा, सौभाग्यशालिनी हो श्रीयमुने! क्या श्यामसुन्दरसे मिलने जा रही हो ?
क्या कहा ! इसी कार्यसे जा रही हो?
अच्छा देवी! तुम्हारे चरणों में एक छोटी-सी प्रार्थना है, स्वीकार करोगी? अपने श्यामसुन्दर से मिलो, तो कृपा कर हमारा संदेश उन तक पहुँचा देना।’

क्या कहती हो—’मैं अपनी बात कहूँगी कि तुम्हारा संदेश दूँगी ?
वे राजराजेश्वर हैं। उनके पास इतना समय कहाँ कि मेरे पास बैठकर तुम सबका दुःख-सुख सुने। मैं ही कहाँ अधिक समय कहीं रुक पाती हूँ। चलते-चलते ही जो कुछ कहना है, कह देना होगा।’

‘आह! क्या सुन रही हूँ कि श्यामसुन्दरके पास हमारी बात सुननेका समय नहीं! ठीक है, भाग्य ही पलट गया तो उन्हें अथवा तुम्हें दोष दूँ। अभागा मन भी यह सब भाग्य-विधान समझ पाता, तो दुःख ही काहे का था। यह जो नहीं मानता; कहना ही पड़ेगा।’

‘श्री यमुने! तुम्हारी ही बात सत्य लगती है। तुम तो उनके दर्शनके लिये नित्य ही मथुरा जाती हो। यदि वे मिले होते, तो तुम फूली न समाती- तुम इतनी क्षीण कलेवरा न होतीं सुनो बहिन! यदि उनसे तुम्हारी भेंट हो और तुम्हारी बात सुनने तक वे ठहरे रहें, तब मेरा संदेश तुम्हें स्मरण रहे तो कहना-इलाने…. नहीं…. नहीं! कहना एक गोपकुमारीने कहलाया है…. किंतु क्या कहूँ? क्या यह कहलाऊँ कि शीघ्र आ जाओ, तुम्हारे बिना हम मर रहीं हैं।’ ‘सो क्या वे नहीं जानते ?’

‘यदि उनके समीप कोई हुआ तो ‘गोपकुमारी’ सुनकर न जाने क्या समझ ले ! न….. बाबा…. न! ऐसी बात ठीक नहीं।’

‘तो फिर क्या कहलाऊँ ?’

‘यमुनाजी! तुम कृपामयी हो। दयाकर अपनी ओर से ही कह देना—’सारा व्रज तुम्हारे विरहमें जीवन्मृत है। सब जड़-चेतन तुम्हारे दर्शनकी आशामें तड़प रहे हैं। परन्तु… परन्तु सुनकर कहीं वे दुःखी हुए तो ? उनके कमलदृग अश्रुपूर्ण हुए अथवा मूर्छित हो गये तो ? नहीं…… नहीं! हम अनन्तकालतक विरह-ज्वाला में जलती रहें, पर वे सुखी रहें। तुम उनसे कुछ न कहना, तुम्हारे पाँव पडू देवी कालिन्दी ! उन्हें कुछ न कहना। कभी तुमसे भेंट हो जाय तो उनकी कुशलवार्ता अवश्य हमें सुना देना। उनसे कुछ न कहना!’

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-26



कलि में मीरा नाम धराय

अब यह कौन पड़ी है यहाँ! मैं तो स्वयं अपना ताप ठंडा करने आयी थी। सुना है सखियों से कि यहीं गिरिराज जू की पूजा हुई थी और यह निकुञ्ज ! यहीं सखियों ने सखाओं ने मिलकर श्यामसुन्दर और किशोरी जू का विवाह रचाया था। लीला स्थलियोंके दर्शनकर इस रजसे स्नानकर स्वयंको कृतार्थ कर लूँ। यहाँ वासका सौभाग्य भी मिला तो कब-जब मनमीत चले गये छोड़ कर रे मन; अपना क्या है! जिन्होंने पाकर खोया है वे धनी हैं, किंतु तू ! तूने खोया क्या और पाया क्या? नहीं मैंने तो पाया ही पाया है मैं इस व्रजकी नहीं; अतः उनके दर्शनका धन भी अयाचित ही पा गयी—पा उनकी असीम-अमित महिमाका ज्ञान। उसी भाँति भिक्षुककी झोलीमें अकस्मात ही आ गिरी किसी स्वर्णमुद्राकी भाँति ! पा गयी उनके पावन चरणोंका नेह। सब कुछ उनकी कृपा ही कृपा है।

मैयाने बहुत बार हठ किया, ऊँच-नीच समझाया। यहीं इसी व्रजमें विवाह कर देने की बात भी कही; किंतु मेरी ‘न’ के आगे हार गयी। मैया स्वर्ग सिधारी तो भैया-भाभीसे आज्ञा ले जीजीके पास आ गयी। आकर जो कुछ देखा, सब कुछ जैसे उजड़ गया है। फिर भी यह वृंदावन है। यहाँके कण कणमें उनकी उपस्थितिकी छाप है, लौट जानेको मन न हुआ। ऊधोके आने की सुनी-सुना उनका संदेशा! पहले तो आश्चर्य विमूढ़ हो गयी—’श्यामसुंदरने यह ज्ञान पुटलिया इन प्रेममूर्तियोंके लिये पठाई है ? श्रीकिशोरीजी को प्रणामकर चरणरज ली तो अचानक लगा, मेरी तरह कहीं उद्धव भी तो गुमान भरे नहीं। हैं! श्यामसुंदरने हमें संदेश और इन्हें औषधि दी हौ…. कदाचित् ।’

बात सच निकली! श्रीकिशोरीजीकी कृपा मिली- सेवा मिली। मैंने तो सब पाया ही पाया है…. किंतु यह कौन है ? यहाँ लताओंके जालमें धूलसे देह लपेटे पाहनपर कैसी अचेत पड़ी है। आह, श्यामसुंदर कैसी निष्ठुरता ! नंदगाँवकी बेटी नहीं जान पड़ती। बहु है, पर किसकी! मैं ही कहाँ सबको पहचानती हूँ।

‘उठ बहिन! तनिक जल पी ले।’ मैंने उसे अंकमें ले खुले रूखे केशपाश बाँधे, वस्त्र सम्हाले और सूखे होठोंसे जलपूर्ण पत्र-पुटक लगाया। नन्हें पंछी शावकके खुले चंचुपुट-से होठ जलसिक्त हुए, तो उसकी बड़ी बड़ी पलकें भी सूर्योदयके साथ उघड़ती कमल पंखुरी-सी उघड़ने लगीं। अनचिन्हीं दृष्टियाँ मिली! दोनोंमें एक ही प्रश्न एक ही साथ साकार हुआ तुम कौन हो ?

इसके साथ ही दोनोंके ही नेत्रोंने एक संदेश और दिया दोनोंको; कि ऐसा लगा! जो जल मुखके भीतर जा रहा है वह कंठसे नीचे उतरनेके ये एक ही रोगकी रोगिणी है। मेरी बात मान उसने दोनेंसे मुख लगाया। बदले नेत्रों की राह दुगने वेगसे बाहर झर रहा है। जल पी वह पुनः निढाल हो पड़ी। मैं भी मूढकी भाँति उसका मुख देखती रही। क्या पूछू, क्या कहकर उसे धीरज बंधाऊँ ? किंतु उसके नेत्र थे कि निर्झर, जैसे भीतर के अथाह सरोवरको रीता करनेकी आतुरतासे बरसते ही जा रहे थे। इस मुक रुदनने मुझे थोड़ा चौंकाया! दो दिनसे देख रही थी सखियाँ सखा, पशु पंछी और बड़े-बूढ़े भी यदा-कदा मुखसे निकलनेवाला आह- कराहको रोक नहीं पाते, पर यह जैसे पाहनकी मूरतकी आँखोंसे जलप्रपात झर रहा हो । कैसी सुन्दर मूरत…. ।

‘धीरज धर बहिन!’ मैंने भरे गलेसे कहा-‘श्यामसुंदरने कहलाया है कि वे आवेंगे। इस प्रकार आँसू ढरेंगे तो किन आँखोंसे उन्हें देख पाओगी ? मैं बलि जाऊँ, तनिक धीरज धरो।’ अपने हाथोंसे उसके आँसू पोंछते हुए मैंने उसे सम्हालना चाहा, पर वह तो फूट-फूटकर रो पड़ी।

अब तो मेरे लिये भी स्वयंको रोक पाना कठिन हो गया; हाय यह स्वर्ण वल्लरी कैसी मुर्झा गयी है। जाने कहाँ-कहाँ किस-किस उपवनमें दावानल प्रज्वलित हो उठा है और कहाँ-कहाँ हिमदाहकी वर्षा हुई।

‘बहिन तो कू मेरी सौंह! अपने मनकी कह, जासों दाह बाहर निकसे। यों तो प्राण बचेंगे नहीं!’

न जाने मेरी प्रत्येक बातका विपरीत प्रभाव उसपर क्यों हो रहा था कि ज्यों-ज्यों मैं धीरज बँधाती अधिकाधिक रुदनका वेग बढ़ता जाता। मैं हार गयी ‘आह कैसे इसे समझाऊँ!’ अपनी चुनरी भिगोकर मैंने उसका मुख पोंछ दिया पुनः जल पिलाया और सौंह धरायी। उसे हृदयसे लगाकर पीठपर सिरपर हाथ फेरते हुए कहा-‘कुछ कहेगी नहीं बहिन ?’

‘का कहूँ? दुर्भाग्यके अतिरिक्त मो पै कछु नाय!’- वह पुनः बिलख पड़ी

‘कहा नाम है तेरो ? कौन की बहु है ? ‘ ‘माधवी; अविचल जू मेरे ससुर है।

‘सुन्दरकी बहु है ? “

उसने ‘हाँ’ मे सिर हिला दिया।

अहा, कैसी रूप-सी बहु पा गया है सुन्दर! मैंने उसका मन दूसरी ओर फेरनेको बात आरम्भ की – ‘कब व्याह हुआ तेरा ? मैं पिछली बार आयी तो कुंआरा था वह, सगाई सम्भव है हो गयी थी।’

‘मेरा ब्याह ही तो सब अनर्थोंका मूल है बहिन!’- वह फिर रोने लगी। अरी वह तो सबका है; कोई एकाध मुझ-सी बच पावे है। मैंने तो मैयासे कह दीनी-‘कोऊ जोतसी पै दिखायलो मेरी हथेली, यामें ब्याहकी रेखा खींची ही नाय विधाताने।’ ‘तुम्हारा ब्याह नहीं हुआ, सचमुच ?’- उसने भरी भरी आँखों से मुझे देखा।

‘ऊँ…. हूँ…..ऽ।’ मैंने हँसकर जोरसे सिर हिला दिया- ‘इसीसे तो हँस पा रही हूँ! नहीं तो तेरी ही भाँति रो-रोकर मरती नाय ? कभी आरसीमें मुख देखा है ? विधाताने दोनों हाथों से रूप दिया है तुझे! श्यामसुन्दर देखकर कितना सुख पाते होंगे। इस प्रकार रो कलपकर इसे बिगाड़ लेगी तो क्या उत्तर देगी उन्हें लौटने पर ? और सखी! यह बिछोहका वज्र केवल तुझ पर ही तो नहीं गिरा, सम्पूर्ण व्रज झुलस गया है। तनिक किशोरी जू की ओर देख, बाबा मैयाको देख और उनके प्यारे सखाओं को इन गैयनको देख…. ।’ मेरा गला भर आया— ‘जिनकी एक हुँकार पर भोजन और शय्या त्याग उठ दौड़ते थे वे….।’

‘इन सबसे मेरे दुर्भाग्यकी कोई समता नहीं। वे सभी सौभाग्यशाली है। उसके नेत्र पुनः झरने लगे।

‘तनिक इन आँसुओंकी बरखाको रोक! तेरा अकेलीका दुर्भाग्य ऐसा प्रबल कैसे हो गया री! कि सबके भाग्यको पछाड़कर एक वही आगे बढ़ गया? जो सबने पाया सो तैंने भी; और जो सबने खोया सो तेरे भी हिस्से में आया नयी बात क्या हुई भला ?”

‘उन्होंने, सबने कुछ पाया है बहिन! जिसे खोनेकी अनुभूति हो रही है। यदि यों कहूँ कि उसे खोकर वे और अधिक धनी, धन्य और गरिमामय हो उठी हैं, किंतु मैं….’– वह सिसक उठी।

मैं चकराई— ‘यह कैसे सखी! मैं समझी नहीं ? तोकू मेरी साँह तनिक धैर्य धर।’

‘क्या कहूँ, कहाँसे कहूँ? कोई आदि-अंत दिखायी नहीं पड़ता!’ ‘तू ब्याहसे ही आरम्भ कर या फिर जबसे तेरे कथित दुर्भाग्यने आक्रमण किया हो।’ ‘अच्छा बहिन!’ वह थोड़ा सम्हलकर पाहनसे टेक लगाकर बैठ गयी ‘मेरे दुर्भाग्य दीनतापर घृणा तो नहीं करोगी मुझसे ?”

‘अरी बावरी तू ! कह तो, कौन जाने मेरा दुर्भाग्य कहीं तुझसे बड़ा हो तो ? आज तो व्रजमें दुर्भाग्यकी होड़ लगी है कि किसका किससे बढ़कर है। इतनेपर भी सुन ले कि यहाँका कण-कण मेरा आदरणीय है, पूज्य है! घृणाकी क्या बात करती है तू?”

मेरी बात सुनकर चुप हो रही वह कुछ कहनेको होती तो रुलाई उमड़

पड़ती उसे; ज्यों-त्यों रोकती तो शब्द न मिलते, होठ फड़फड़ा कर रह जाते। ‘बोलेगी नहीं ? इतनी अपदार्थ हूँ मैं?’

हँसनेकी चेष्टामें एक करुण रेखामें खिंच कर रह गये उसके अधर और आँखों में भरे जलकी दो बूंदे गालोंपर ढल गयीं।

‘अब मारूँगी मैं तुझे!’– मैंने स्नेह रोष दिखाया।

‘सच बहिन! तो मैं जी जाऊँ।’ उसने विह्वल हो मेरी गोदमें सिर धर दिया- ‘कोई तो मुझे कुछ कहे- धिक्कारे…. ।’ “कैसे करेगा ? तेरी बानी फूटे तब तो ! ले मेरा वचन रहा; मैं वह सब
करूँगी जिससे तेरा दुर्भाग्य घटे। अब बोल तू !’ ‘मुझे किशोरीजीके समीप पहुँचना है। जानती है! सबसे कठिन कार्य है चन्द्रवली जू की सम्हार करना ? श्रीकिशोरीजीने ही कहा मुझे-चम्पा ! तू चन्द्रा जीजीकी ओर ध्यान दें; वे ऊपरसे अपनेको बड़ी कठोर बनाये रखती है, सबकी सार सम्हालमें लगी रहती है, किंतु स्वयं; उनके मनकी मैं ही जानती हूँ! तू मुझपर बड़ा उपकार करेगी यदि दिनमें एक बार भी उन्हें थोड़ा खिला-पिला सके।’

मैं तो धन्य हो गयी, श्री जूने मुझे किसी कार्यके योग्य तो समझा, पर यह सरल कार्य नहीं है यह मैं उसी समय समझ गयी। चन्द्रावली जू की आज्ञा सबपर चलती है; यहाँतक की किशोरीजी भी उनकी बात मान लेती हैं, उन पर किसीका शासन चलेगा? चिरौरी विनती भी कितनी? जो केवल दो टूक बात करना ही जानती हों! जिनकी आँखोंके आँसू दिखायी न पड़ें, उन्हें धीरज किस प्रकार दिया जाय बहिन? इसलिये तू अपनी बात कह! कि दोनों मिलकर उस दुर्भाग्यको रंचमात्र भी पीछे ठेल सकें तो कुछ साहस आये।’

“तू यहाँ की नाय ?’

‘ऐसा मेरा भाग्य कहाँ! मैं तो तेरे पतिके सखा जयन्तकी साली हूँ। दो वर्ष पश्चात पुनः यहाँ आ पायी हूँ। मेरा कंठ रुद्ध हो गया- ‘एक बार केवल एक ही बार सौन्दर्य – पारावारको देख पायी-अधा भी न पायी थी कि.. जाने दे मेरी बात !’ मैंने स्वयं ही हँसकर अपने आँसू पोंछ लिये–’मेरी बात करने को बहुत समय है। अब मैं यहीं रहूँगी, किशोरीजीकी आज्ञा हो गयी। फिर वहाँ है क्या अपना! मैया रही नहीं, बाबा पहले ही सिधार गये थे, उनकी तो स्मृति भी नहीं मुझे! अब तू बोल सखी, तेरा निहोरा करूँ!

‘मेरा विवाह हुए भी उतना ही समय हुआ जितना तुम्हें यहाँ लौटनेमें लगा।’– माधवीने गहरी उसाँस छोड़ी-ब्याहके थोड़े ही समय पश्चात गौनेकी शीघ्रता मचाई इन्होंने कहा कि मेरी सासके लड़की नहीं है; बहुका लाड़-दुलार करके मनकी साध पूरी करनी चाहें।’ जब गौनेकी बात चल रही थी तभी एक दिन मेरी मैयाने मुझे एकान्तमें बिठाकर भली-भाँति समझाया कि- ‘तेरी ससुरालमें व्रजराजका छौरा, जिसका नाम कन्हाई है। इतना सुन्दर है कि जो एक बार हू किसीकी दृष्टि पड़ जाये तो वह बावरो है जाय! और आगे-पीछे कछु सूझे नाय वाको! मैयाने मुझे नारी धर्मकी महिमा समझायी, उससे डिगनेपर होनेवाले सर्वनाशसे भी परिचित कराया और फिर अंतमें कहा कि मुझे किसी भी प्रकार उस कन्हाईको न तो अपना मुख दिखाना है, न स्वयं उसका मुख देखना है। यही नहीं! उसने बताया कि उसके स्वरमें – बंसीमें ऐसी माधुरी है कि लोग उसे सुनकर बिना देखे भी वशमें हो जाते हैं, अतः मैं सावधान रहूँ। उसका एक ही नाम नहीं है। एकमात्र लड़ता और वह भी बुढ़ौतीका पूत जो ठहरा- उसे कृष्ण, कन्हाई, कन्नू, श्यामसुन्दर, नीलमणि, मदनमोहन, गोविन्द, गोपाल, मोहन, बंसीवारो, साँवरो-ऐसे अनेकों नाम है। वह उठते-बैठते, चलते-फिरते रात-दिन मुझे यही सीख देने लगी कि न उस साँवरे कुँवरको देखूँ, न सुनूँ, न स्वयं उसके सामने पड़ें और न बोलूँ।’

‘आह! कैसी प्राणघाती शिक्षा’- मेरे मुँहसे निकल गया। यही शिक्षा मेरे दुर्भाग्यकी सुत्रधार बनी।’- कुछ रुककर वह पुनः

कहने लगी- ‘एक दिन वह भी आया कि सबसे मिल कर विदा होना पड़ा। प्रियजनोंसे बिछुड़नेका दुःख तो था ही बहिन! उस व्रजराज पुत्रका भय, ढ़का हुआ रथ, जिसे स्वामी स्वयं चला रहे थे।”

उसने अपनी सूजी-भारी पर कोमल बड़ी-बड़ी पलकें उठाकर मेरी ओर देखा। तनिक व्यंगसे मुस्करायी और कहने लगी- ‘जब प्रथमबार मैंने अपने पतिको देखा तो बहुत आश्वस्त हुई, अबतक मैंने वैसा सुरूप पुरुष नहीं देखा था। वहाँ हमारे पूरे व्रजमें उनके रूपकी चर्चा थी; सभी हमारी जोड़ीकी मुक्त कंठसे प्रशंसा करते थे। मैं बहुत प्रसन्न थी अपने भाग्य पर! पीहर में इकलौती पुत्री और ससुरालमें इकलौती बहु; भरा पूरा घर, हजारों गैया! और क्या चाहिये गोपकी बेटी को ?’

रथने जब वृंदावनकी सीमामें प्रवेश किया तो उनकी आज्ञासे मैंने रथका परदा गिरा दिया। थोड़ी ही देरमें कहींसे दौड़ता-सा स्वर आया ‘सुन्दर भैया! लिवा लाया बहुको ?’

‘हाँ कन्नू!’

‘मो कू दिखाय दे।’

‘मैं कहा दिखाऊँ भैया! तू ही रथपर चढ़ आ, और देख ले तो सों भला कहा लाज-घूंघट?’– उनकी बात सुन मैं अच्छी तरह मैयाकी बात स्मरण कर घूंघट खींच हाथ-पैर तक ढाँप ढूँप कर बैठ गयी।

उसी समय रथकी झरप खुली- ‘ए बहु! तनिक अपना मुख दिखा तो?”

बाल सुलभ भोला-मीठा स्वर सुन हँसी आने को हुई, पर मैयाकी शिक्षा याद कर मैं और सिमट गयी। उसने हाथसे मेरा घूंघट हटाना चाहा, किंतु मैं कसकर पकड़े रही।

‘सुन्दर भैया! बहुने तो बहुत गाढ़ौ घूंघट कस राख्यो है, दिखावै नाय!’ ‘अरे यह तो अपनो कन्हाई है, इससे क्या घूंघट रखना! वैसे भी यह मुझसे छोटा ही है; क्यों कन्नू ?’- पतिने बाहरसे ही सस्नेह कहा; पर मैं कृतनिश्चय थी। इतनी शीघ्र मैयाकी शिक्षाको बहा देना अच्छा न लगा।

उन्होंने बहुत प्रयत्न किया, अन्तमें थककर बोले-‘अब तू क्या दिखायेगी अपना मुँह, तू ही मेरा मुँह देखनेको तरसेगी।’

‘वह स्वर बालकका न था; इतना गम्भीर भारी स्वर सन अन्तर्मनमें भयभीत हुई, परन्तु अपनी प्रथम विजयसे मैं प्रसन्न थी। वह ठहर गयी।
माधवीकी बात सुन एक गहरी साँस मेरी छातीसे निकल पड़ी। ‘इसके पश्चात् ?’ – मैंने पूछा। इसके पश्चात मैंने उन्हें नहीं देखा, न स्वर सुना। ऐसे अवसर मैं जान बूझकर टाल जाती, अथवा वे स्वयं टाल जाते। जैसे, जब नंदभवनमें मुझे मैयाके पाँव लगने ले जाया गया; पैर छू कर मैयाके दिये वस्त्राभूषण गोदमें लिये मैं बैठी थी कि वे आये। मैयाने उल्लास पूर्वक पुकारा – ‘नीलमणि ! देख तो बेटा, सुन्दरकी बहु आयी है। तू इसका मुख नहीं देखेगा? कैसी पूनमके चन्द्रमा सी सुन्दर है। आ, मैं दिखाऊँ!’

‘नहीं मैया! फिर कभी देख लूँगा, अभी सखाओंका एक काम करना है मुझको।’–कहकर चले गये।

व्रजरानी मैयाको बहुत आश्चर्य हुआ, उनका नीलमणि तो नये जन्में बालक और नयी आयी बहुको देखनेको सदा उत्सुक रहता है। आज देहरी तक आकर कैसे लौट गया !

फिर मेरी सास उनका निहोरा करने लगीं कि- ‘कन्हाईका ब्याह अब हो ही जाना चाहिये।’

‘उसके भाइयों के सखाओंके कितने-कितने ब्याह हो गये हैं। फिर वह स्वयं भी कम उत्सुक नहीं है अपने ब्याहके लिये। जब भी किसीका ब्याह होता है, पूछता है मैयासे कि मेरा ब्याह कब होगा? बरसानेसे भी संदेश आते ही रहते हैं। जीवनका कौन भरोसा बूढे लोगों के मनकी मनमें ही न रह जाय।’ आदि-आदि।

प्रातः सायं वन जाते-आते समय मैं अपने घरके भीतरी कक्षमें चली जाती थी कि न कुछ दिखे—न सुनायी दे । सासको आश्चर्य होता जब स्त्री-पुरुष – बड़े-बूढ़े सभी घरसे बाहर निकल उनका दर्शन लाभ लेना चाहते, तब मैं घरके भीतर क्यों चली जाती हूँ। वह दूसरोंसे कभी-कभी कहती—’बहु बड़ी लजवंती है। माधवी फिर व्यङ्गसे हँस दी।’

पानी भरने नहानेका समय भी मैंने ऐसा रख लिया था कि श्यामसुन्दरका सामना होनेकी सम्भावना ही न रहे। इतने पर भी घरके लोगोंको व्यसन था उनकी चर्चा करने का पतिके पास तो जैसे अपने सखाकी बातको छोड़ अन्य कोई बात ही न थी, अतः न चाहते हुए भी बहुत सी बातें कानमें पड़ ही जाती। जिनका सार यही था कि- ‘उन-सा सुन्दर त्रिभुवनमें नहीं है। मनुष्यकी कौन कहे; पशु, पंखेरु, धरा, गगन, नदी, वृक्ष और पाहनाका भी उससे प्रेम हैं। उसे चाहे बिना रहा नहीं जा सकता! साथ ही वह बहुत भोला सीधा है। गोपियाँ खूब चिढ़ाती है, झूठे उलाहने लेकर मैयाके पास जाती है।’ पति कहते – ‘यह सब कन्नूको देखनेके लिये- उससे बात करनेके बहाने मात्र हैं। जब सब उसे खिजाती है, तो वह उनके घड़े फोड़ देता है। सखाओंके साथ घरमें घुसकर दूध-दही-माखन; जो मिले उसे पी और बिखेर आता है। सबको अच्छा लगता है, इसीलिये ऐसा करता है वह ! अन्यथा उसके घर में क्या कमी है। ‘

‘बहू! तुम्हारे आनेके पश्चात कन्हाई घर नहीं आता!’ सास कहती ‘नहीं तो दूसरे-तीसरे दिन कुछ-न-कुछ उधम कर ही जाता था। अब तो कहती भी हूँ तो कोई बहाना बनाकर चला जाता है। मुझे तो लगता है तुझसे लजाता है वह। लेकिन कन्हाई और लाज! न कोई उससे लजाता है, न वही किसीसे लजाता है; तुम दोनोंकी अनोखी बात देखी मैंने तो !’

‘मैं सब सुनकर भी मौन रहती; अपनी मैयाकी शिक्षाको गाढ़े हाथों थाम रखा था। कभी पीहर जाती तो मैया दो चार महिनोंतक बिदा ही नहीं करती; उसके लाड़का अंत ही नहीं रहता। तब बीच-बीचमें वह व्रजराजकुमारके बारेमें पूछती कि मैंने कभी देखा तो नहीं अथवा स्वयं अपना मुख दिखाया तो नहीं?’

मैं हँस कर मनाकर देती और उसे बताती कि- ‘एक मुझे छोड़कर पूरा का पूरा सारा व्रज उसके पीछे बावरा है। तो मैया डर जाती और पुनः पुनः मुझे समझाती।’

‘उन दिनों मैं यहीं थी जब इन्द्रयागके स्थानपर गोवरधन पूजा हुई। मुझे तो ये सब बावरे लगे कि एक बालकके कहनेपर सबने पीढ़ियों से चले आ रहे इन्द्रयागको बंदकर दिया और पहाड़ पूजने बैठ गये। किंतु मुझे क्या! मैंने तो अपनी सावधानी रखी; पूजनके समय – परिक्रमाके समय कहीं दृष्टि न पड़ जाय श्यामसुंदर पर!’

और फिर बज्र बनकर टूटा इन्द्रका कोप व्रज पर कोई बिना देखे सोच भी नहीं सकता! अंजलीमें न समाये इतने बड़े-बड़े उपल और रस्सी जैसी मोटी धाराओंकी वृष्टि; लगा-प्रलयकाल उपस्थित हो गया। किसीको किसीका ध्यान नहीं था; सब एक स्वरसे कन्हाई, कन्नू, गोविन्द, नीलमणि पुकारते हुए भाग रहे थे। तभी एकाएक देखा; सुना तो बहुत था कि श्यामसुन्दरने छः दिनकी आयुमें पूतना राक्षसीको मार डाला। मेरी सास तो कहती थी कि कन्हाई भला क्या मारेगा, वह तो इतना सा था! राक्षसीको तो उसके पाप ही खा गये। एक वर्षकी आयुमें तृणावर्तको मारा, तीन वर्षका था तो बकासुरको मारा, कालीय नागको दहसे बाहर कर दिया। इसपर तो मुझे भी आश्चर्य हुआ कि वह सौं फणोंवाला नाग ! भला उसे पाँच वर्षका बालक कैसे वशमें कर सका? दाऊने धेनुकासुर और उसका साथियों को मार डाला, श्यामसुन्दरने दावानलसे दो-दो बार गायो और व्रजवासियों की रक्षा की, एक ब्योम नामका राक्षस बालक बनकर सखाओं में आ मिला; उसे पकड़ एक ही मुष्ठी प्रहारसे चित कर दिया, आदि आदि। पर आँखोंसे तो उसी दिन देखा जब सब व्रजवासी और पशु जैसे जलमें तिनके बहते हैं वैसे ही भागे जा रहे थे गोबर्धनकी ओर मैं भी उनमें साथ थी न वस्त्रोंका न तनका ध्यान ऊपरसे मूसलाधार वृष्टिकी मार वायुके थपेड़ोंमें पाँव अपने आप उठ रहे थे। अकस्मात देखा कि गिरिराज गोबर्धन ऊपर आकाशमें उठ रहा है; कैसा आश्चर्य ! परन्तु उस समय आश्चर्य करनेका अवकाश किसे था, प्राण बचानेको ठौर मिले बस। सबके सब ढ़ोर-ढंगरों के साथ गिरिराजके नीचे जा घुसे, तब जी में जी आया। उस समय जो देखा….’ माधवीकी वाणी गद्गद हुई…. और मूर्च्छित हो वह मेरी क्रौडीमें लुढ़क गयी। मैंने पुनः उपचार करके सचेत किया उसे, पीठपर हाथ फेरते हुए पूछा कि- ‘फिर क्या देखा ?’

‘मैंने कहा न, उस समय वस्त्रोंका ध्यान किसे था! घूंघट था ही नहीं, होता तो यहाँ तक आ ही नहीं पातीं। दृष्टि घूमती हुई छत्रसे तने गिरिराजका आधार ढूंढने लगी, जो आधार मिला उसने मैयाकी सारी शिक्षा, इतने दिनों की सावधानी और निश्चयके बाँधको ढहा दिया। एक दृष्टिमें यही दिखा कि सात वर्षका एक बालक बायाँ हाथ ऊँचाकर कनिष्ठिकाकी कोरका अवलम्ब दिये खड़ा है गोबर्धन को।’

“कैसे? कैसे विश्वास हो बहिन कि यह साढ़े सात कोसका पहाड़ किसीकी उँगलीकी पोरपर टिका है? फिर जो यह सौन्दर्य महासिंधु नेत्रों में समाया तो हृदय उसी पथसे पानी हो बह चला। आह! कितना कितना समय व्यर्थ गया मेरा— कैसा महानाशी निश्चय था मेरा और जननीकी वह सत्यानाशी शिक्षा….! किंतु वह भी क्या करे, बिना देखे सुने कैसे कोई जान सकता है। मैं… मैं…. कैसी…. मूढ़, कितनी चिरौरीकी थी इन्होंने मेरा मुख देखनेको, अथवा कि अपना यह मुख दिखाकर नेत्रोंको सार्थक करनेकी घरके लोग कितनी बातें कहते थे पर मैंने स्वयंको अंधी बहरी बना दिया। कालिय जैसा प्राणघाती प्रयत्न किया मैंने यह सब तो अब सोचती हूँ उस समय तो सोचने योग्य बुद्धि बची ही कहाँ थी— वर्षोंके भूखेको जैसे चौंसठ व्यञ्जन मिलें वैसे ही बस प्राण नेत्रों में आ समाये थे। एक और आश्चर्य देखा मैंने! व्रजमें कभी किसीने श्यामसुंदरको चतुर्भुज नहीं देखा। मैंने देखा-दो हाथोंसे वे बंशी बजा रहे थे एक हाथ सुबलके काँधेपर धरा था और एक हाथ उठाये गोबर्धन थाम रखा था। वे सात दिन…. वे सात दिन मेरे जीवन के सबसे धन्यतम दिन थे। मुझे तो वे सात क्षण भी नहीं लगे, पर सब कहते थे बादमें कि वृष्टि सात दिन-रात हुई। वह रूप सुधा – वह मुरलीकी माधुरी, बस और कहीं कुछ न बचा….।

फिर वही कच्चे गलेकी अमृतवाणी गूँजीवृष्टि रुक गयी है, सब बाहर निकलकर और अपने-अपने घर लौटें |

उस समय…., उस समय जाने कैसे बुद्धि लौटी और स्मरण आयी वह बात–’अब तू ही मेरा मुख देखनेको तरसेगी।’ तो प्राण हाहाकार कर उठे ‘अब जो यह रूप देखनेको न मिले तो प्राण कैसे बचेंगे! बचें या न बचें पर इस आशंकासे जो आकुलता उपजी उसे फैलनेसे रोकनेकी शक्ति किसमें थी? किसी ओर त्राण न पाकर मैंने अंतमें उन्हीं चरणोंकी शरण ग्रहण की ‘मैं अग्य हूँ, मूढ़ हूँ, दया करा…. दया करो। इन सबके साथ मैं भी पालनीय रक्षणीय हूँ, मुझे दर्शन-श्रवणसे वंचित मत करो…. मत करो…. मत… करो।’

जैसा गम्भीर स्वर उस दिन रथपर सुना था, वही स्वर सुनायी दिया – ‘उस दिन बिना सोचे समझे तूने अपराध किया था। अब जो पश्चाताप किया है इससे कुछ समय दर्शन श्रवण ही सुलभ हो सकेगा, लीलामें सम्मलित नहीं हो सकेगी। कलिमें पुनः जन्म लेकर इस किये गये अपराधका प्रायश्चित करेगी, तभी लीलामें सम्मलित हो पायेगी।’

सुनकर मैं वही मूर्च्छित हो गयी। कौन वहाँसे मुझे उठा लाया, कल गोबर्धनको स्थापित किया उन्होंने मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं चेतना होनेपर भी जैसे हाथ पैर शरीर सब सुन्न हो गये, अपनी व्यथा स्मरणकर रोनेके अतिरिक्त रह ही क्या गया था ? केवल प्रातः सायं बंसी बजती तो जैसे तनमें प्राण उतरते, मैं दौड़कर अटारीपर चढ़ जाती, झरोखेसे प्यासे नयन जा लगते और पुष्पाञ्जलि छूटती, किंतु केवल एक बार – केवल एक बार उन्होंने ऊपरकी ओर देखा! वह दृष्टि ही मेरा सम्पूर्ण मूलधन है बहिन !

सासको चिंता लगी बहुको क्या माँदगा लगी ? मैयाके यहाँसे बुलावा आया, मैंने ‘ना’ कर दी। मनमें कहा- ‘अब लौं नसानी अब न नसैहौं।’ धीरे-धीरे मैं घरके काम काजमें सासका साथ देने लगी, किंतु खाने-पीने, पहनने ओढ़ने, काम काज, वार-त्योहार किसीमें पहले सा उत्साह नहीं रहा। अवश्य ही पति गौचारण करके लौटते और विश्राम करने लेटते तो मैं पद-संवाहनके बहाने जाकर बैठती- कोई चर्चा चला देती। उन्हें तो अपने सखाकी चर्चाका बहाना भर चाहिये- ‘आज क्या क्या किया, कहाँ गये, किस पेड़ चढ़े, कन्नूने किसको छकाया, किससे खेलमें हारा, कैसे रूठा, कैसे माना, छाकमें क्या रुचा उसे, कैसे थकनेपर सबने लेटनेको विवश किया, किसकी गोदमें सिर था, किसकी गोदमें पाँव, कौन व्यजन कर रहा था, कौन गा रहा था और कौन ताल दे रहा था, कैसे उसके पदादलायत नेत्र अध मूंदे हुए, कैसे वह सुन्दर उदर- वक्ष ऊपर-नीचे होता है, कैसे हस्तकमल है और कैसे पदतल, कैसी ऊँगलियाँ, कैसा हास्य और कैसी मुस्कान, कैसे वह नासिकाग्रपर दृष्टि जमाकर किसी मुनीका अभिनय करता है….।’ असंख्य लीलायें और अनन्त है उनका वर्णन कभी-कभी सम्पूर्ण रात्रि कैसे व्यतीत हो गयी ज्ञात ही नहीं होता। वे वैसे ही लीलाओंका वर्णन करते रहते और मैं मरुस्थलकी प्यासी धरतीकी भाँति श्रवण करती रहती। अब…. अब…. तो वह सुख भी छिन गया है, उन्हें स्वयं अपना ही

ध्यान नहीं रहता मुझे क्या सुनायेंगे । ‘मैं उस दिन वही गिरिराजके नीचे ही प्राण त्यागकर पायी होती तो आजकी यह दारुण व्यथा मेरा भाग न बनती, पर बचे दिनोंके दर्शनोंका लोभ न झेल सकी। अब तुम्हीं कहो बहिन! व्रजमें मुझ-सी अभागिनी अन्य कौन है ? किस सुखके लिये देह रखूँ? जिसे उन्होंने त्याग दिया, उसे कौन स्वीकार करेगा ? किससे कहूँ अपनी व्यथा ? सुनकर कौन न धिक्-धिक् कर उठेगा ? न करे धिक्-धिक्, दया-उपेक्षा ही तो मेरा भाग बनते हैं। न जाने कलि आनेमें कितने युग बाकी है ? कहाँ जन्म मिलेगा, कैसे पुनः अपना स्थान पा सकूंगी? कुछ भी नहीं जानती कि क्या करूँ, किससे पूछूं?’

सचमुच मैं अपने ही दुर्भाग्यको सर्वोपरि मानती आ रही। पर इसके दुर्भाग्यकी तो कहीं समता ही नहीं है जैसे क्या कहकर धीरज बंधाऊँ इसे ? कुछ न कहनेसे तो यह ग्लानिके मारे मर ही जायेगी- ‘सुन बहिन! यह देह, यह मन उनके हुए, वे जैसे चाहें इनकी व्यस्था करें। जैसे रखें। तुम कौन हो इन्हें त्यागने और रखने वाली ? अपनी ओरसे कुछ भी थामें मत रहो, सब छोड़ दो उनपर जैसे रखें, रहो। उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता मानो। वे अभी नहीं मिलना चाहते तो प्रतिक्षा करो। हम सबको प्रतिक्षा ही तो करनी है उनकी, उनकी कृपा की सबके पास अपने-अपने अनुभव है बहिन! वह उनकी सम्पदा है, इस सम्पदाके आश्रय वे ये प्रतिक्षाके कुछ दिन व्यतीत कर पायेंगी।’

‘किंतु मैं किसके आश्रय ? आशाका झीना-सा तार भी तो हाथमें नहीं, जिसे थाम युगोंका अन्तराल पारकर जाऊँ।’– उसके रुदनका बाँध फिर कूल तोड़कर बहने लगा।

‘सुन माधवी! तूने जो सुना, जो देखा वही तेरा पाथेय है। ये लीलास्थल देख! यहाँकी धूलि ले। श्रीकिशोरीजी हम सबकी आश्रय है। उनकी चरण शरण सब विपदाओंसे पार कर देती है। तू उन्हीं चरणोंका आश्रय ले। सखियोंकी बातें सुन और अपना धन बढ़ा। मुझे भी अपने जैसी ही मान बहिन! अन्तर इतना ही है कि जो कुछ तूने जानबूझकर किया, वह मैं अनजानेमें कर बैठी। मैंने तुझे वचन दिया है कि मैं तेरी सहायता करूँगी। ले; कलिमें या कहीं भी जहाँ तू जायेगी, मैं तेरे संग चलूँगी; बनेगी सो सेवा करूँगी और सदा साथ बनी रहूँगी। बस, अब व्याकुल न हो।’

‘यह…. यह…. क्या… कह रही हो चम्पा बहिन! मुझ अभागिनीके लिये इतना त्याग ?’– माधवीने अपना सिर मेरे पदोंपर रख दिया।

मैंने उसे बाँहों में भर लिया-‘सब अपनी-अपनी कमायी खाते हैं बहिन ! कोई किसीके लिये भला क्या कर पाता है ? केवल उनकी करुणा ही सबको आश्वस्त करती है। अब उठ जा बहिन! चल तुझे किशोरीजी के समीप ले चलूँ। अपने को उनके चरणोंमें समर्पितकर देना बस आगेकी सारी व्यवस्था वे संभाल लेंगी। मेरे पास क्या है जो समर्पित करूँ? वे स्वयं ही इस
अभागिनी को अपना लें तो….।’

‘तू उठ जा।’– मैंने आश्रय दे उसे उठाया, साथ-साथ ही माधवी बार-बार संकोचसे मरी जा रही थी— ‘मैं इस योग्य कहाँ हूँ कि

श्यामसुन्दर भी जिनकी चरणरजकी स्पृहा करें, उनके सम्मुख जाकर खड़ी होऊँ।’ ‘तू एकबार मेरा कहना मान ले।’- कहते हुए मैं उसे श्रीकिशोरीजी के समीप लाई।

श्रीकिशोरीजीने उसे प्रणाम करते देख पूछा-‘यह कौन सखी है चम्पा ! कभी देखा नहीं यहाँ ?’

मैं…. मैं…. आपकी दासी हूँ श्री जू ! – रुदनसे टूटते स्वर में माधवी बोली- ‘मैं…. महा…. अधम हूँ।’

‘ऐसा मत कह सखी! हम सभीका आश्रय उनका स्मरण है। प्रतिक्षाके अतिरिक्त उपाय ही क्या है? सब साथ रहकर कालकी प्रतिक्षा करें। हमारी तो श्यामसुंदरके अतिरिक्त अन्य गति नहीं! विस्मरण ही विपत्ति है, हम सब

एक ही है। ‘

“आप कृपा करके मुझे अपना लें।’ माधवीने चरण पकड़े। “तू तो मेरी ही है बावरी! अपनी वस्तुका क्या अपनाना!’- कहकर उसके सिरपर हाथ रखती हुई श्रीकिशोरीजी बोली—’फिर चम्पा भी तो तेरे साथ है। बड़े भाग्यसे ही ऐसा साथ मिलता है; ले…. उठ!’ माधवीकी आँखें चम्पाकी ओर देख मुस्करा उठीं। ‘अपनेजनोंको वे कभी निराश्रय नहीं छोड़ते-कहते हुए मैंने किशोरीजी संकेतसे उसकी बाँह थाम ली।

जय जय श्री राधे श्याम

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श्याम सखियाँ-25



अब नहीं जात सह्यो

‘बहिन राधा ! तनिक धैर्य धरो, यह थोड़ा-सा दूध पी लो । यों कैसे चलेगा; अपनी ओर न सही, अपनी इन बहिनों और सखियोंकी ओर देखो, जिनकी एकमात्र तुम्हीं अवलम्ब हो । ‘

‘जीजी!’–कहते हुए किशोरीजी चन्द्रावली से लिपट गयीं।

‘जानती हूँ बहिन! किंतु धैर्य धारण कर मुख नहीं जुठारोगी, तो इन सबके मुख में जल भी न जा पायेगा। वह निर्दयी व्रज का आनन्द ले गया, पर तुम्हारे साथ तो व्रज का जीवन बँधा है बहिन! तनिक धैर्य धारण करो।’

‘जीजी पहले तुम पियो ! इन सखियों को दो।’

‘नहीं राधा ! पहले तुम्हें ही लेना होगा! यह देखो सब तुम्हारा मुख देख रही हैं। तुम्हारे पश्चात इन्हें मनाना सहज होगा, अन्यथा तुमसे पूर्व इनके होठों से आगे कोई खाद्य पदार्थ नहीं पहुँचेगा।’

‘तो पहले तुम जीजी।’ “अच्छा बहिन; यही सही! वज्र हृदया चन्द्रा ही आरम्भ करेगी। व्रजमें वही तो एक बची है खाने-पहनने को – चन्द्रवली ने कटोरा मुख से लगाकर दो घूँट भर लिये, बरसने को आतुर आँसुओं को मुख फेरकर पोंछ दिया।

भूमिपर पड़ी भानुनन्दिनी को हाथ का सहारा देकर दुग्ध पात्र मुख से लगाया। झरझर झरते आँसु भी दुग्ध के साथ पेट में पहुँचने लगे। मुख प्रक्षालन के पश्चात उन्होंने कहा – ‘तनिक धैर्य को समीप आने दो बहिन! इसके अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं है। श्यामसुन्दर आयेगे तो केवल तुम्हारे ही लिये ! तुम्हारे बिना व्रज ही नहीं- श्यामसुन्दर भी न रहेंगे। अतः तुम धैर्य धर कर विश्राम करो, मैं घर तक हो आऊँ।’

‘तुम क्या कुछ भी नहीं लोगी जीजी? मुझे धैर्य की शिक्षा देकर स्वयं भूखी ही रहोगी! आपको मेरी शपथ जीजी!’- किशोरीजी ने वाष्परुद्ध कंठ से आग्रह किया।

श्रीराधा की बात सुन चन्द्रावली जी हँस पड़ी-‘मैं क्या तुम सी बावरी हूँ; मैं क्यों इसके विरह में सूखूँ! जब उसे हमारी चिंता नहीं, तो मुझे क्या पड़ी
है! मैं तो तुम्हीं लोगोंको देख-देखकर मरी जाती हूँ, अन्यथा स्वयं तो खूब
खाती-पीती हूँ।’

‘सो सब मुझे ज्ञात है जीजी! मेरे सुखके लिये ही सही, तुम यह दूध पी लो ।’

‘अच्छा बहिन।’

चन्द्रावली जू ने कटोरा उठाकर मुख फेर लिया; एक ही साँस में खाली कर मुख फेरे हुए ही चल दीं।

‘जीजी! जीजी! धैर्य धरो जीजी!’

चन्द्रावली जू एक कदम्ब वृक्ष को बाँहों में बाँधे फूटफूटकर रो रही थीं।

अपनी मनः पीड़ा से व्यथित होकर मैं यहाँ चली आयी थी कि तनिक शांति मिलेगी, किंतु स्वप्नमें भी आशा नहीं थी कि चन्द्रा जीजी को यों अकेले पाऊँगी। उनकी आँखों में कभी आँसू आये भी है तो श्रीकिशोरीजी के दुःख से । अपने लिये तो सदा यही कहती है- ‘मुझे क्या पड़ी है कि यों उसके लिये अधमरी होऊँ ।’

आज अकेले में, ‘श्यामसुन्दर ! मेरे सखा ! मेरे प्राण! कहाँ हो लौट आओ। तुम्हारे बिना ये विहारस्थल दुःखस्थल बन गये। क्षण-क्षण हृदय में उठती हूक अवश कर देती है। प्राण रोके नहीं रुकते, सबको धैर्य बँधाते बँधाते तुम्हारी चन्द्रा धैर्य खो बैठती है। यह कैसी आग लगा गये तुम वज में? क्यों बचाया तुमने दावानल से? क्यों बचाया इन्द्र के कोप से ? कालीय से ? तुम्हारे मुख चंद्र के दर्शन करते-करते हम सुखपूर्वक मृत्यु के मुख में समा जाते। आज…. आज …. तुम्हारे चले जाने से सभी विपत्तियाँ एक साथ टूट पड़ी हैं। मैं क्या करूँ? जिस ओर दृष्टि जाती है, वही दिखायी देती है। तुम्हारे सखाओं की, बाबा मैयाकी, गौओं-बछड़ों, तुम्हारी ये सखियाँ — ये चरण किंकरियाँ, जिन्होंने तुम्हारे मर्यादाओंके कठिन पाश तोड़कर छिन्न-भिन्नकर दिये, ये वृक्ष लतायें, यह व्रजधरा, यह यमुना और ये पशु-पक्षी, किस किसकी बात करूँ मनमोहन ! यह आकाश, ये धरा के रजकण और यमुना की लहरें किस प्रकार विरह व्याकुल हैं; तनिक आकर देख तो लो! मैं किस किसको धैर्य बंधाऊँ! यदि यही करना था, तो इस चन्द्रा के हृदय को तो स्वस्थ रखते। श्यामसुन्दर ! सबसे अधिक तो मैं अपने इस हृदय से ही हार गयी हूँ। हृदय की व्याकुलता को दबाकर हँसना और हँसते ही रहना…. कैसा कठिन है। यदि तुम आ जाओ तो मुझे इस दारुण कर्मसे छुट्टी मिले। तुम आ जाओ प्राणधन! तुम आ जाओ! आ…. आ…. आ…. आ. जा. ओ !’ कहते-कहते अचेत होकर चन्द्रावली जू गिर पड़ी।

हाय, यह तो कभी नहीं सोचा था कि कभी जीजी को ऐसे देखूँगी। मैं दौड़कर समीप गयी उसका मस्तक क्रोडी में रखकर आँचल से व्यजन करने लगी। पत्रपुटक में यमुना जल लाकर उनके सूखे होठों का सिंचन किया।

‘कौन श्यामसुन्दर ? अब कहीं न जाना मेरे सर्वस्व तुम आ गये तो व्रज के प्राण आये। मैं बहुत लड़ती थी- बहुत खिजाती थी न तुम्हें ! अब न लहूँगी- सदा प्रेमपूर्ण रहूँगी। अनुकूल बन जाऊँगी, तुम कहीं न जाना। चलो चलकर तनिक राधा को देखो; उसकी दशा देखी नहीं जाती। उत्फुल्ल कमलिनी को मानो हिमदाह लगा हो !

जीजी ने मेरा हाथ पकड़कर कहा-‘मेरे पिछले सभी कटु-वाक्यों को क्षमाकर यही वरदान दो कि अब कभी व्रज को अनाथ करके न जाओगे। तुम्हारे बिना यह सम्पूर्ण ब्रज जीवन्मृत हो गया है। मुझ अपराधिनी को तुम भले अनन्तकाल तक विरह आग से तपाते रहो, किंतु और सबको दर्शन सुख प्रदान करो। इन्हें अपना लो, ये सब तुम्हारे हैं। स्मरण करो इनके लिये तुमने कौन-कौनसे कष्ट नहीं उठाये ? तुम्हारे अतिरिक्त इनकी कोई गति नहीं!’

मैं क्या करूँ–क्या कहूँ; समझ नहीं पायी। जीजी मुझे श्यामसुन्दर समझकर प्रलाप करती जा रही थी। उन्हें चेत आ जाय तो अच्छा हो सोच मैं प्रयत्न करती रही। किंतु अकस्मात मनने कहा- ‘जितने समय तक इन्हें श्यामसुन्दरका भ्रम है ये सुखी हैं । कम-से-कम इतने समय तो प्राण शीतलता लाभ करेंगे। पर यह कब तक चलेगा!’

जीजी कह रही थीं—’बोलो श्यामसुन्दर ! एक बार तो कह दो ‘तथास्तु’ । क्या चन्द्रा से ऐसे रूठ गये प्राणधन !’ जीजी मेरे पदों पर सिर रखने को उद्यत हुई, तो मैं सह न सकी। बोले बिना कोई उपाय न रहा- ‘जीजी, जीजी! यह तो अभागिनी इन्दु है। नेत्र खोलो जीजी!’

‘कौन हो तुम ?’ – वे एकदम उठ बैठीं।

‘जीजी!’- मेरे मुख से और कुछ न निकल सका। ‘श्यामसुन्दर कहाँ गये इन्दु ! अभी तो वे यही थे।’

मैं क्या कहूँ, मौन अश्रुपात के अतिरिक्त हम अभागिनों के पास रह ही क्या गया है

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-24



प्रीत किये दुख होत

यह मैं कहाँ आ गयी? आह! पद स्वतः इस ओर चल पड़ते हैं। अभागे मन! तू समझता क्यों नहीं है कि अब यहाँ कुछ नहीं है, कुछ भी

नहीं सम्भवतः वह स्वप्न था, एक मधुर स्वप्न! प्रातः हुई और टूट गया वहीं, अब उसके लिये विक्षिप्त होनेसे क्या होगा? स्वप्नके सहारे जीनेमें कौन-सी बुद्धिमानी है ? किंतु …. किंतु…. क्या वह सचमुच स्वप्न था? स्वप्न यदि असत्य ही हो, तो फिर मथुरामें कंसका वध और सबकी वहाँ उपस्थिति सत्य क्यों है ? नहीं वह सब सत्य ही था, स्वप्न नहीं! श्यामसुन्दर भली करी तुमने !

इसी दिनके लिये तुमने कालीय, दावानल, अरीष्ट और केशीसे बचाया था? इसीलिये हमारे साथ हेल-मेल बढ़ाया, प्रीतकी फाँसी डाल इस व्रजको तड़पनेका दंड किसलिये श्याम ?

वह साँकरी खोर, वह यमुनातट, यह रासस्थली रुदनकर रही है। रो रही है शत- सहस्त्रश: गोपकुमारिकायें, और जलविहीन मत्स्यकी भाँति तड़प रही हैं। श्रीकिर्तिकिशोरी, नन्दराय और यशोदारानीकी व्यथा कही जाने योग्य नहीं है !

तुम जो एक गोवत्सका रंभाना सुन उठ भागते थे; आज ऐसे निष्ठुर कैसे हो उठे कि एकबारगी ही उसे भुला बैठे तुम ?

हम स्मरण न आयें, और कुछ भी व्रजमें कदाचित तुम्हारे स्मरण योग्य न हो! किंतु बाबा मैया और भानुनन्दिनीको कैसे भुला सके मोहन !

आह! हम सब भी तुम्हें भुला सकते तो जी जाते! किंतु भुलाया ही तो नहीं जाता, क्यों ? यही तो ज्ञात नहीं! कहाँ सीखें, किससे सीखें ? प्रेम तो तुमने सिखाया केशव! स्मरण तुम्हारी लीलाओंने सिखाया, किंतु भूलना कैसे सीखें ? हम क्या तुम्हें स्मरण करती हैं माधव ? नहीं लगता है तुम स्वयं ही स्मरण हो। तुम्हारा स्मरण करना नहीं पड़ता, अनायास होता है। सब भूलकर तुम्हें पाया हमने और अब तुम्ही त्याग गये ? तुम इतने अच्छे न होते, सुन्दर न होते तो सम्भवतः व्रजकी यह दशा न होती; किन्तु अब इस प्रलापसे क्या ?

तुम यहाँ कहाँ हो कि इन बातोंका उत्तर दोगे ।

आह! कभी सोचा न था कि यह सुन्दरताको भी रूप देनेवाला रूप, चारु चितवन, मीठी वाणी, निर्मल-हास्य, भिन्न-भिन्न कौतुक, वंशी ध्वनि और नृत्य-गान भूतकालकी बातें हो जायेंगी। व्रजके कण-कणमें हमारे रोम रोममें हृदयकी गहराईयोंमें बस कर, तुम जा कैसे सके मोहन ?

तुम्हारी एक-एक बात एक-एक क्रिया हमें घंटों स्मरणमें डूबाये रखती है। तुम यहाँ थे तो हम फिर भी थोड़ा बहुत घरका कार्य और परिजनोंकी सुश्रुषा कर लेती थी अब तो उससे भी गयी।

‘बहिन विशाखा! क्या कर रही हो यहाँ ? तुम्हारा सारा तन धूलि धुसरित हो गया है।’

‘तुम कैसे चली आई ललिता ?’

‘जैसे तुम आयीं बहिन ! वहाँ उधर यमुना तटपर उनके सखा बिखरे पड़े हैं। हाय! मैं किस किसको प्रबोध दूँ। जहाँ-जहाँ उनके चरण पड़े हैं; वह भूमि, वह रज ही हमारे लिये तीर्थ, सम्बल और औषधि है। उनका स्मरण ही जीवन है बहिन! तुम्हें स्मरण है वह शरद रात्रि ! जब यमुना पुलिनपर बंसी बज उठी थी और हम सब मन्त्रकीलित सी उस ओर बह चली थी !’

‘अहा! शिलातलपर उत्फुल्ल मल्लिकाके सुमनास्तरणपर विराजित उनकी वह अपार अनन्त शोभा…. ।’ गद्गद कंठसे विशाखा बोली यद्यपि उनका रूप सभी उपमा उदाहरणोंसे परे है; फिर भी लगता था शरद पूर्णचन्द्रकी धवल ज्योत्सनासे स्नात हो उनका भव्य रूप और अधिक अपरूप हो उठा हो। जैसे सार (असली लोहा- फौलाद) के खड्गकी धार पुनः सानपर चढ़ा दी गयी हो। नहीं बहिन !… नहीं ! कोई उपमा उनका स्पर्श भी नहीं कर पाती, समताकी तो बात ही कहाँ है। हाँ, तो कह बहिन! उसी रात्रिकी चर्चाकर। तनिक प्राण उस सुधाका पानकर शीतल हो लें।’

‘हमारे पहुँचनेके कुछ क्षणों पश्चात ही वंशीके छिद्रोंपर थिरकती उँगलियाँ थम गयीं और वेणुमें प्राण फूँकनेवाले अधर संकुचन त्यागकर मुस्करा उठे थे, अर्धनीमिलित कमलपत्र सी पलकोंने उठकर अपनी मञ्जुषाके अमूल्य रत्नोंको उद्भासितकर दिया था। विशाखा! लोग मद्य पीकर मद-विह्वल होते हैं, किंतु हम व्रजवासी उनके दर्शनसे ही छक जाते हैं। दर्शनकी क्या कहें सखी! हमें तो उनका स्मरण भी उसी अवस्थामें पहुँचा देता है। ‘ उस समय कैसे निष्ठुर होकर बोले थे वे-‘वन शोभा देख चुकीं अब लौट जाओ। कुल-कामिनियों को निशीथमें घरसे बाहर घूमना शोभा नहीं देता। यदि तुम वंशीनाद सुनने आयी हो अथवा मुझे देखने को, तब भी अब अतिकाल हो चुका, तुम अपने गृहोंको लौट जाओ। वहाँ तुम्हारी प्रतिक्षा हो रही होगी। धर्मकी रक्षा ही जीवनका सत्य है और मैं भी धर्म पालनसे ही प्रसन्न होता हूँ।’

‘विशाखा! वे शब्द बाण खाकर हम वहीं उसी समय क्यों न मृत्यु को प्राप्त हुई। यदि ऐसा हो जाता तो आजका यह दारुण शोक; कैसे हमारे प्राणोंको संतप्त करनेका अवसर पाता!’

‘आगे कह बहिन।’

उनके उन कठिन शब्दोंने कर्णोंमें प्रवेश करते ही हमें मूलोत्पादित लतिकाओं-सी अर्धमृता बना दिया; मुख सूख गये, सिर झुक गये और नयन पनारे बन गये। किसीको कुछ समझ नहीं पड़ रहा था कि क्या कहें, क्या करें? किसी प्रकार साहसकर मैं बोली- ‘ऐसी अनीति मत करो मोहन! गृह परिजनसे नाता तोड़ हमारे प्राण तुम्हारे चरणोंसे बँध गये हैं। अब एक पद भी हम उधर चलनेमें समर्थ नहीं है।’

किंतु उनपर तनिक भी प्रभाव न पड़ा, वे पूर्ववत धर्मोपदेश करते रहे। ऐसेमें चन्द्रावली जीजी ही सदा सहायिका हुई हैं बहिन! इस समय भी वहीं बोली—’ठहरो श्यामसुन्दर! बहुत सुन लिया धर्मतत्व। मुझे संदेह है कि धर्मके विषयमें तुम स्वयं भी कुछ जानते हो ? जो तुम्हें न पहचानता हो, उसे सुनाना यह सब! सब धर्मोंके अधिष्ठाता क्या तुम्हीं नहीं हो ? जगतके आधार और प्राणियोंके प्राणोंद्गम क्या तुमसे भिन्न कहीं है! प्राणीमात्रका सबसे श्रेष्ठ धर्म अपने आपसे, अपने उद्गमसे जुड़ना, उसे जानना, प्राप्त करना है और वह तुम हो श्यामसुन्दर ! वह तुम हो! तुमसे प्रेम करना- तुम्हें प्राप्तकर लेना। ही धर्मका परमप्राय है; फिर तुम हमें कौनसे धर्मका उपदेश सुना रहे हो ? और यह भी बता दो कि तुम्हारे बताये इस थोथे धर्मके पालनका फल क्या होगा? हम यहाँ धर्मोपदेश सुनने नहीं आयीं! जैसे आदि पुरुष अपने भक्तों का पोषण करते हैं वैसे ही तुम भी हमारा सत्कार करो। निष्ठुर ! लोक-परलोकका त्याग करके शरणमें आयी हम अबलाओंको ऐसी (विपरीत) बातें कहना कहाँतक उचित है ?’

किंतु फिर भी इतना कुछ सुनकर भी श्यामसुंदर वैसे ही शिलापर बैठे

मुस्कराते रहे । मल्लिकाके सुमन झरकर उनकी अलकों में उलझ रहे थे । हमारी धूमिल आशा अब श्रीकिशोरीजीके चरणोंसे जा लगी। सबके झुके मुखोंकी अश्रुरुध्द धुंधलाई दृष्टिके सम्मुख अंधकार अधिपत्य जमाने लगा था। अन्तरको मानो गर्म लोहेसे दागा जा रहा हो; तभी श्रीकिशोरीजीका स्वर सुनाई पड़ा – ‘हम तुम्हारी दासी है श्यामसुंदर! हमारा…. उपहास…. तुम्हारे…. योग्य…. कार्य…. नहीं …. ।’

भरे कंठसे वे रुक-रुककर बड़ी कठिनाईसे बोल रही थी ‘हमारा धर्म… ज्ञान रीति-लोक परलोक; …. सब….

कुछ… तुम्ही हो। तुम्ही बताओ! तुम्हारे…. ये…. अरुण… अमल… पदाम्बुज छोडकर हम कहाँ जायं? तुम्ही…. बताओ! तुमसे बड़ा धर्म… कौन…. सा….. है ?…. तुम्हारी…. लीलाओं से… तुम्हारे रूपसे… तुम्हारी….. हँसी…. और…. मीठी वाणीसे तुम्हारे…. बल… और…. गौरवसे…. तुम्हारे…. स्नेहिल स्वभावसे वशमें हुई. हम…. अबलायें…. अब…. कहाँ जायें ? क्या… तुम… मात्र…. व्रजराजकुमार ही हो ?’

‘और बहिन वह चितचोर शिलातलसे उठ खड़ा हुआ, हँसता हुआ हमारे सम्मुख आया- अच्छा सखियों! तुम्हारी ही बात रहे। उसने कहा- चलो। इस सुन्दर रात्रिका नाच, गा और खेलकर सदुपयोगकर लिया जाये।’

‘अपने पीताम्बरसे उसने हम सबके मुख पोंछे। जैसे हमारे मृत-तनमें जीवन जाग उठा हो, उस प्रसन्नताका वर्णन कैसे करूँ! कानोंके पथसे, जैसे जलते हुए हृदयपर सुधा धारा उडेली गयी हो। गजराजके साथ करिनियोंके झुंड-सी हम यमुनातटपर आयी और श्यामसुन्दरने ‘मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूँ सखियों ?’ कहकर किसीके पुष्पवलय, किसीकी वेणी, किसीके नुपुर, हार, भुजबंद, करधनी और सीमन्तादि आभूषण बनाकर वह पहनाने लगे। साथ-ही-साथ हास-परिहास भी चला हमारे आनन्द कलरवसे वह पुलिन मुखरित हो उठा; तुम्हें वह सब स्मरण है न बहिन!’ ‘ललिता! यह सब तो हमारे एकान्त हृदयका अमूल्यवित्त है। इसका

विस्मरण ही हमारा अन्त है बहिन! अहा, उस समय हृदय आवेगसे कैसा अवश हो गया था कि छोटे-से-छोटा कार्य करनेमें भी हम असमर्थ हो गयी थीं। सिरसे ओढ़नी भी सरकती, तो ओढ़ानेके लिये उन्हें पुकारती और वे शीलधाम सबके मनोरथ पूर्ण करते हमारे बीच घूमते फिर रहे थे। हाय! एकबार भी हमें स्मरण नहीं हुआ कि वे सुमन सुकुमार श्रान्त हो रहे हैं! हम अपने मान सम्मानमें डूबी सौभाग्यपर इठला रही थीं कि अकस्मात वे न जाने कहाँ खो गये…. ।’ – विशाखा अचेत हो भूमिपर लुढ़क गयी।

‘आह! यह पाषाण हृदया ललिता ही रह गयी है सब सहने को बहिन विशाखा! कैसे समझाऊँ तुम्हें वे दिन दूरि गये। उस दिन कुछ क्षणोंमें ही उन्हें न देख पानेसे हम अर्ध- विक्षिप्त हो गयी थी, आज अनिश्चितकालके लिये उन्हें खोकर भी हम जी रही हैं। धिक्कार है प्राणोंकी इस परुषता को !’ ‘बहिन! चैतन्य लाभ करो तनिक देखो तो! तुम उस छोटी-सी हानिको

लेकर ही क्षुब्ध मथित हो रही हो, जब वर्तमानमें आओगी तो धैर्यका कहीं कूल किनारा ही न पा सकोगी। बहिन विशाखा! सुनो मेरी बात न सुनोगी ? महारासका वह आनन्द महासिन्धु; उसमें अवगाहन न करोगी? आँखें खोलो तो बहिन।’ आह श्यामसुन्दर ! भली करी तुमने।’ कहकर विशाखाने उठनेका प्रयत्न किया तो ललिताने बाँहें बढ़ाकर सहायता दी।

‘आगे कह बहिन।’

‘क्या करोगी सुनकर ? “

‘सो नहीं जानती ललिता! किंतु इस चर्चाके अतिरिक्त हमारे लिये अन्य

उपाय ही क्या है ?”

श्रीकिशोरी जू के समीप कौन है ?’ ‘सुदेवी और चन्द्रावली बहिन हैं। वे अचेत हैं, उनकी अवस्था देखी

नहीं जाती। श्यामसुन्दर ! जिन आँखोंकी तनिक-सी उदासी तुम सह नहीं पाते थे, आज वे ही नेत्र तुम्हारे ही कारण निर्झर बन गये हैं। तुम तो इतने कठोर कभी ना था। यदि कोई अपराध बन पड़ा हो तो अनन्त काल तक दर्शन ना दीजिए। हम विरहाग्निमें जलती रहकर भी सुखी रहेंगी, किंतु तुम राधा बहिनको कष्ट न दो, हमसे सहा नहीं जाता। नया स्थान देखनेके लोभने तुम्हें इतना निष्ठुर बना दिया कि उन्हें, जो तुम्हारे ही अवलम्बपर जी रही हैं, नितान्त भुला बैठे ? ‘उस दिन, हाँ उस दिन जो किशोरीजी हम सखियोंके सामने भी तुमसे कुछ कहते सकुचा जाती थीं, वह संकोच और शीलकी प्रतिमूर्ति श्रीराधा गुरुजनोंके सम्मुख ही कातर हो ऊँचे स्वरसे ‘गोविन्द ! दामोदर! माधव!’ कहकर पुकार उठी थीं। वस्त्रों का ध्यान भूल अजस्त्र अनुवर्षण करते नेत्र तुम्हारे मुखपर टिकाये लज्जा त्यागकर उन्होंने तुम्हारे पीतपटका छोर थाम लिया था। यह देख बड़े-बूढ़ोंके नेत्र भी बरस पड़े थे और महाबली रामने व्यथासे मुख फेर लिया। क्या तुम तनिक भी न समझ सके कि किशोरीजीसे यह नितान्त असम्भव कार्य किस प्रकार सम्भव हो सका ?”

‘आह निर्मम ! कोमलता पूर्वक धीरेसे अपना वस्त्र छुड़ाते हुए तुमने एक वाक्य- केवल एक छोटा सा वाक्य कहा था ‘अहम् आयास्मे।’ और तुम रथपर जा चढ़े थे। जब रथ चल पड़ा तो मैंने दौड़कर घोड़ोंकी वल्गा थाम ली थी, कई बहिनें घोड़ोंके आगे पथमें सो गयी थी। मैंने वल्गा थामे ही कातर याचनाकी थी— श्याम जू! वे स्वर्णवल्लरी छिन्न यूथिका सी भूमिपर पड़ी हैं, उन श्रीराधाको मैं कैसे धैर्य बंधाऊँगी? तब तुमने अपने आँसू भरे विवश नेत्रोंसे मेरी ओर देखकर कंठसे गुंजामाल उतारकर दी थी। वहीं गुंजामाल, जब उनके तड़फते हुए प्राण देहपिंजरसे मुक्त होना चाहते हैं, तो हम उनके गलेमें पहना देती है और तुम्हारे ‘अहम् आयास्मे ।’ का मधुर मंत्र उनके कानोंमें सुनाती हैं, जिससे उनका प्राणपंछी कुछ समयके लिये पुनः अर्गलाबद्ध हो शाँति पा जाता है।’

‘तुम्हारे उन भरे-भरे नेत्रोंको देखकर समझा था-राजा कंसकी आज्ञासे विवश होकर जा रहे हैं। जैसे ही अवकाश मिला, तुरन्त लौट आयेंगे। मथुरा ही कितनी दूर ? श्यामसुन्दर! सब लौट आये, पर तुम न आये। कंस मर गया है किंतु तुम्हें अवकाश न मिला निर्दयी! आज तुम्हारे उसी एक वाक्यपर भानुललीके प्राण अटके हैं। ओ निष्ठुर! जिनके एक दिन दर्शन न पाकर तुम व्याकुल हो उठते थे; आकर देख लो विरहमें उनकी कैसी अवस्था हो गयी। है। गुरुजनोंसे भी वे अपने दुःखकी लज्जास्पद स्थिति छिपा नहीं पातीं। श्यामसुंदर, मैं तुम्हारे पाय परूँ ! एक बार चलकर उन्हें देख लो, उनके नेत्रोंकी प्यास बुझा दो।’

‘हाय, कितने दिन हम उन्हें भुलावे में रख सकेंगी, चलो…. चलो मोहन ! उनकी जीवन हानिसे बढ़कर व्रजकी तुम्हारी और क्या हानि होगी ? चलो माधव!’

‘ललिता ! उठ बहिन, किशोरीजीके समीप चलें। जो प्रेमके अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार वशमें नहीं होता; वह आयेगा भी तो श्रीकिशोरीजीके ही कारण ! उस प्रेमसिन्धुके मिस हम भी दर्शन पा लेंगी; इस अरण्य रोदनसे क्या होगा!’

जय जय श्री राधे श्याम

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श्याम सखियाँ-23



अकथ कथा

‘इला कहाँ है काकी! दो दिनसे नहीं देखा उसे, रुग्ण है क्या ?’ ‘ऊपर अटारी में सोयी है बेटी! जाने कहाँ भयो है, न पहले सी खावे खेले, न बतरावै। तू ही जाकर पूछ लाली। मुझे तो कुछ बताती ही नहीं।’ मैंने लेटे-लेटे ही मैया और श्रियाकी बात सुनी। श्रिया मेरी एक मात्र बाल सखी है। यों तो मैया-बाबाकी एकलौती संतान होनेके कारण अकेली ही खेलने-खानेकी आदी रही हूँ, किंतु श्रियाको मेरा और मुझे उसका साथ
प्रिय लगता है। यदि एक-दो दिन भी हम आपसमें न मिले, तो उसे जाने
कितनी असुविधा होने लगती है कि साँझ-सबेरा कुछ नहीं देखती, भाग आती है घरसे मेरे पास। सीढ़ियाँ चढ़कर वह मेरे पास आयी और पलंगपर ही बैठ गयी। मेरी पीठपर हाथ धरकर बोली- ‘क्या हुआ तुझे ? ज्वर है क्या ?’

हाथ और ललाट छूकर बोली- ‘नहीं ज्वर तो नहीं है, फिर क्या बात है? लेटी क्यों है भला तू? यमुनातट, टेढ़ा-तमाल, वंशीवट सभी स्थान देख लियो! कितने दिनसे नहीं मिली तू? अरे जानती है; कल जल भरनेको कलशी लेकर माधवी जलमें उतरी तो पता नहीं कहाँसे आकर श्यामसुन्दरने भीतर ही भीतर उसका पाँव खींच लिया। वह ‘अरी मैया’ कहती डूबकी खा गयी। हम सब घबरायीं, यों कैसे डूब गयी माधवी ? तभी श्यामसुन्दर उसे उठाये हुए बाहर निकले, उसकी कलशी लहरोंपर नृत्य करती दूर-दूर होती चली गयी ए. इला! तू बोलती क्यों नहीं ?’

उसकी बकर बकरसे ऊबकर मैंने पीठ फेर ली, पर माधवीके सौभाग्यने हृदयसे गहरी कराह उठा दी, लाख दबानेपर भी हलका-सा स्वर मुख बाहर निकल ही पड़ा।

‘क्या है कहीं पीड़ा है ?’ – श्रियाने पूछा। मैंने ‘नहीं’ में सिर हिला दिया।

‘तब क्यों सोई है ? उठ चल, टेढ़ा तमाल चले।’

मैं चुप रही।

‘ए इला! बोलती क्यों नहीं? मुझे नहीं बतायेगी मनकी बात?’ मैं चुप थी, कैसे क्या कहूँ। कैसे किन शब्दोंमें समझाऊँ कि- ‘मेरा बचपन मुझसे बरबस छीन लिया गया है। उसकी ठौर जिस दस्युने बलात् अधिकृत कर ली है, उससे मैं भयभीत हूँ कौन मानेगा कि सदाकी निर्द्वन्द निर्भय निरपेक्ष इला इस आंधी तूफान जैसे दस्युसे भयभीत हो । गयी है। आह मेरा सोने जड़ा वह बचपन जाने किस दिशामें ठेल दिया गया। उसीके साथ मेरा सर्वस्व चला गया…. सब कुछ लूट गया मेरा। पुनः गहरी निश्वास छूट गयी।

‘ए इला! कुछ तो बोल देख न कैसी हो गयी है त ? सोने जैसा तेरा रंग कैसा काला काला हो गया री ?”

एकाएक उसके मनमें मान जागा बोली-‘ पर क्यों कुछ कहेगी मुझसे मैं लगती क्या हूँ तेरी ? यह तो मैं ही बावरी हूँ कि भीतरकी एक-एक पर्त खोलकर दिखा देती हूँ तुझे। यदि परायी न समझती तो क्या स्वयं नहीं दौड़ी आती मेरे पास अपना हृदय-रहस्य सुनाने ? चलो आज ज्ञात हो गया है कि मैं तेरी कितनी अपनी हूँ।’ वह व्यथित हो जाने को उठने लगी।

मैंने हाथ बढ़ाकर उसका हाथ थाम लिया, किंतु कहनेको कुछ नहीं सुझा, केवल आँखें झरने लगी। यह देख श्रिया मुझसे लिपट गयी- ‘जाने भी नहीं देगी और कुछ कहेगी भी नहीं? मैं पाहन हूँ क्या कि यों तुझे रोती देखती बैठी रहूँ? उसने भरे कंठसे कहा और अपनी ओढ़नीके आँचलसे मेरे आँसु पोंछते हुए बोली–‘पहले कुछ खा ले, अन्यथा निश्चित जान ले कि मैं भी अन्न-जल त्याग दूंगी।’

वह मेरा हाथ छुड़ाकर नीचे गयी और भोजन सामग्री लाकर मेरे सम्मुख रख दी- ‘चल उठ थोड़ा खा ले नहीं तो….!’ वाक्य अधूरा छोड़ उसने कौर मेरे मुखमें दिया— ‘तेरे संग खानेकी साध लिये आयी थी, अभीतक मैंने भी कुछ नहीं खाया है। जो तू न खाये तो क्या मेरे गले उतरेगा कुछ ?’

आँसुओंकी बरसातके मध्य जैसे-तैसे उसका मन रखने को मैंने कौर निगल लिया और उसे खानेका संकेत किया।

‘कैसे खाऊँ ? तेरे आँसू तो मेरी भूखको भगाये देत है। अरी तू तनिक धैर्य धरे तो मेरा भी खानेका मन बने न !’

ज्यों-त्यों थोड़ा बहुत दोनोंने खाया, हाथ-मुँह धो बर्तन यथास्थान रखकर उसने कहा- ‘चल मेरे साथ।’ मैंने केवल दृष्टि उठाकर उसकी ओर देखा और चुपचाप साथ चल दी।

यमुना तटपर इस समय कोई नहीं था, घाटकी कुछ सीढ़ियाँ उतरकर उसने मुझे बैठा दिया और एक सीढ़ी नीचे उतरकर वह स्वयं भी अपने दोनों हाथ मेरी गोदमें धरकर बैठ गयी। मेरे हाथ पकड़ उसने मेरी ओर देखा, उस दृष्टिका सामना न कर पाकर मैंने पलकें झुका लीं।

भगवान् आदित्य देवी प्रतीचीकी ओर देख मुस्करा दिये और वे महाभागा अपना लज्जारुण मुख झुकाकर भवन द्वारमें नीराजन थाल उठाये ठिठकी रही।

गयी थी। चारों ओरकी वृक्षावलियोंपर पक्षी चहचहा रहे थे। कालिन्दी धीमी मन्थर गतिसे बह रही थी शीतल समीर प्रवहमान था, सौन्दर्य सुषमाका अपार वैभव चारों ओर पसरा हुआ था; किंतु यह सब मेरे लिये तनिक भी सुखप्रद नहीं थे। जी करता था उठ जाऊँ यहाँसे यमुना जल और गगन- दोनों ही की ओर दृष्टि जाते ही प्राण हाहाकार कर उठते थे। भीतर ऐसी टीस उठती कि

कहते नहीं बनता। पलकें झुकाये मैं बैठी रही। ‘न बोलनकी सौगन्ध खा रखी है?’– उसने पूछा।

मैंने आँसू भरी आँखोंसे उसकी ओर देखते हुए ‘नहीं’ में सिर हिला दिया। ‘तब मैं सुनने योग्य नहीं ?’– उसने भरे कंठसे कहा। उसकी पलकोंपर ओसकण-सी बूंदे तैर उठीं।

मैंने असंयत हो उसे बाँहों में भर लिया, किसी प्रकार मुखसे निकला-‘क्या कहूँ ?’

‘मेरी इलाको हुआ क्या है ?’

‘तुझे मैं ‘इला’ दिखायी देती हूँ!’- मेरे नेत्र टपकने लगे।

‘ऐसा क्यों कहती है सखी ? ‘इला’ नहीं तो फिर तू कौन है भला?”

‘तेरी ‘इला’ की हत्यारी हूँ मैं? मैंने ही ‘इला’ को मारा है।’ ‘क्या कहती है ? भला ऐसी बातमें क्या तुक है। तू कौन है कह तो ?’ ‘कौन हूँ यह तो नहीं जानती। पर ‘इला’ मर गयी बहिन! तू मुझसे घृणा

कर – धिक्कार मुझे!’ ‘अहा, सचमुच तुझे मारनेको जी करता है। क्या हुआ, कैसे हुआ; कुछ कहेगी भी कि यों ही बिना सिर-पैरकी बातें करती जायेगी ?” ‘तेरी ‘इला’ क्या मेरे ही

जैसी थी ?’ ‘चेहरा मोहरा तो वही लगता है, पर यह चुप्पी गम्भीरता उसकी नहीं लगती। वह तो महा-चुलबुली और हँसने-हँसानेवाली थी। तू तो दुबली पतली हो गयी है, पहले कैसी मोटी, सदा वस्त्राभूषणोंसे लदी-सजी रहती थी। एक तू ही तो श्यामसुन्दरसे धींगा-मस्ती कर सकती थी। ऐसी कैसे हो गयी री तू ? बस यही बता दे मुझे।

‘ठीक कहती है तू ! इला खूब गहना-कपड़ोंसे सज-धजकर रहती थी। जब वह चलती तो आभूषणोंकी झँकार दूरसे ही बता देती कि इला आ रही है। एक क्षण भी शाँत बैठना उसके स्वभावमें नहीं था। कभी श्यामसुन्दर अकेले खड़े दिख जाते तो वह चुपके चुपके पीछेसे जाकर अचानक उनकी पीठ-से-पीठ सटा दोनों बाहोंके नीचेसे हाथ डाल उनके कंधे पकड़ लेती।’

वे पूछते–’कौन है ? छोड़!’ पर वह किसी प्रकार नहीं मानतीं, तब वे कमर झुकाकर उसे अपने सामने उलट देते।

‘तो तू है इल्ली !…. बंदरिया!’– वे कहते। और वह – ‘क्या कहा ? मैं बंदरिया हूँ!…. इल्ली हूँ? मुझे मारा क्यों गिराया क्यों ? मेरी कन्नी उँगलीको चोट आ गयी है। ऐसे झूठे दोष लगती हुई वह जोर-जोरसे रोने लगती और कभी दोनों हाथोंकी मुट्ठियाँ बाँध दनादन

उनकी छातीमें मारने लगती।

थकनेपर उसके हाथ थाम वे हँसकर कहते- ‘चुक गया सारा वैर कि अभी कुछ बाकी है ?’ वह खिसियाकर उन्हींकी छातीमें मुँह छिपा लेती।

कभी आम, जामुन, अमरूदके किसी वृक्षके पास उन्हें ले जाकर कहती- ‘मुझे फल तोड़ दो अथवा मुझे कंधेपर चढ़ाओ, वह फल तोडूंगी।’

कभी वे उछल-उछलकर फल तोड़ रहे होते तो उनकी शोभा देख • ताली बजाती हुई कहती – ‘श्याम जू! तुम्हारी मालायें भी उछल रही है। ये क्या तोड़ रही है ? “

तोड़े हुए फलोंकी उपेक्षा करके वह जिद्द करती- ‘तुम्हारे ये हार कंकण उछल-उछलकर क्या तोड़ रहे थे, बताओ! नहीं तो मैं खूब जोरसे

रोऊँगी। मैं मैयासे जाकर कहूँगी कि तुमने मुझे मारा है।’ ‘क्या तोड़ रहा था ! तेरा सिर; झगड़ालू कहीं की।’

‘मेरा सिर कहाँसे तोड़ रहे थे बताओ? तुमने मुझे झगड़ालू कहा!’—वह रोनेका उपक्रम करती हुई कहती।

तंग आकर श्यामसुन्दर उसका सिर एक हाथसे अपने वक्षसे सटाकर दूसरेसे अपनी मालाओंका दूसरा सिरा उसके गलेमें पहना देते–‘ऐसे और कैसे, निखट्ट कहीं की।’ वे हँस देते—’बहुत खोटी है तू!’

अपनी बाँहोंमें उन्हें बाँध उन्हींकी छातीसे नाक मुख घिसते हुए कहती-‘ और तुम ? तुम कौन अच्छे हो चोर कहीं के!’ उसकी बातपर दोनों ही खिलखिलाकर हँस पड़ते।

कभी उनके कंधेपर चढ़कर वह जैसे ही डाली पकड़कर फल तोड़नेकी होती, वे नीचेसे हट जाते वह पेड़पर लटकती हुई चिल्लाती-‘मैं गिर जाऊँगी, मैं गिर रही हूँ; अरी मेरी मैया दौड़ो! श्याम जू मुझे गिरा रहे हैं।’

ऐसेमें श्यामसुन्दर खिलखिलाकर हँसते- ‘चिल्ला क्यों रही है री? फल तोड़ न, देख वह रहा बाँयी ओर; थोड़ा हाथ बढ़ा- अहा कैसा पका पका मीठा-मीठा आम है।’

वे चटखारे लेकर कहते- ‘अकेली ही मत खा जाना ऊपर लटके

लटके! नीचे लाकर थोड़ा मुझे भी चखाना। अरे रे, छोड़ मत! गिरेगी तो हाथ पाँव टूट जायेंगे, लंगड़ी होनेपर कौन ब्याह करेगा तुझसे ?” किंतु जैसे ही उसके हाथसे डाली छूटती; नीचे गिरनेसे पूर्व ही वे उसे

बाँहोंमें झेल लेते—’ लगी तो नहीं? डर गयी चुहिया कहीं की !’

वह गिरनेके डरसे दोनों हाथ गलेमें डाल उनसे चिपट जाती। जब वे

उसे ‘चुहिया’ कहते, वह अपने दाँत उनके कंधेमें गड़ानेकी चेष्ट करती। ‘देख! कंधेपर काटा, तो दंश देखकर मेरी मैया तो कुछ कहे कि न कहे, पर तेरी मैया तेरे कान ऐंठें बिना न रहेगी; यह समझ लेना। वे कहते ।

तो वह बड़े भोलेपनसे पूछती-‘फिर कहाँ काँटू ?’ ‘क्यों दाँतोंमें खुजाल चल रही है कि काटना आवश्यक है ?”

‘और नहीं तो क्या ! फल तो तुमने खाने ही नहीं दिया; बताओ कहाँ काँटू कि कोई देख न पाये ?’

कुछ देर सोचकर श्यामसुन्दर कहते–’ और तो जहाँ भी तू काटेगी कोई न कोई देख ही लेगा। फिर तो तेरी खैर नहीं, कहीं कोई तेरे दाँत ही नहीं तोड़ दे ! एक स्थान है जहाँ कोई देख नहीं पायेगा! जानती है वह कौन-सा अंग है ?’

‘ऊँ…. हूँ । ‘ – इलाने ‘नहीं’ मैं सिर हिलाया। ‘इधर देख यह । – कहते हुए उन्होंने अपनी नवपल्लव-सी अत्यन्त

सुकुमार लाल-लाल जिह्वा तनिक मुखसे बाहर दिखायी। इलाने दाहिने हाथकी तर्जनी और अंगुष्ठसे उसे छुआ जाने क्यों रोमाँच हो

आया। ‘नहीं’ उसने भारी कंठसे कहा- ‘भोजन कैसे करोगे तुम; और पीड़ा होगी न!’ ‘पीड़ा तो तू जहाँ कहीं काटेगी, होगी ही। तब तू वचन दे कि कभी झगड़ेगी नहीं मुझसे।’

”नहीं ऐसा वचन मैं नहीं दूँगी। तुम जब-जब खिजाओगे अवश्य लहूँगी।’ ‘तब मुझे भी कुछ उधार नहीं रखना।’ वे आम्र-तरु मूलमें बैठ गये। ‘अब ले।’– उन्होंने पुनः जीभ दिखायी।

‘ऊँ, हूँ।’ – इलाने सकुचाते हुए कहा।

‘फिर लड़ेगी तो नहीं ? “

‘लहूँगी! लहूँगी! लहूँगी! और सौ बार लडूंगी तुम चिढ़ाओ तो मैं चुप

बैठी रहूँगी क्या’

‘तो फिर इस लड़ाईको भी उधार मत रख ! ‘

इलाने धीरेसे अपना मुख बढ़ाया और नवकिसलय सी जिह्वाका अग्रभाग दाँतोंके बीच बिना दबाये ले लिया। उसकी देहमें जाने कैसी झनझनाहट-सी हुई और वह मूर्च्छित हो उन्हींकी गोदमें गिर गयी। इसी प्रकार खेलते-खाते

झगड़ते उसे कभी तनिक-सा भी संकोच नहीं होता। तेरे अतिरिक्त अन्य किसीसे उसकी घनिष्ठता भी नहीं थी। यों सभी

सखियोंसे उसकी बनती थी। कभी तुम सबके साथ बरसाने जाती-वहाँकी सखियाँ अथवा श्रीकिशोरीजी कोई सेवा बतातीं तो उसे बड़ी प्रसन्नता होती । पूर्ण मनोयोगसे वह उस सेवाको करती।

एकबार वह ऐसे ही बरसाने गयी थी, बसन्तके दिन थे, फागुनका महिना। गिरिराज कुञ्जोंकी शोभा देखती हुई वह राधा-निकुञ्जमें चली गयी, वहाँ रूपा बैठी मंजुषासे वस्त्र निकाल रही थी। उसे देखकर एकदम बोल उठी—’इला, भली आयी बहिन! तनिक इन वस्त्रोंको समेट दे तो। समेटकर इन्हें उस मोटे वस्त्रमें लपेट देना। रजककन्या आती होगी, उसे धोनेके लिये देना है?’ एक हाथमें मंजूषासे निकाले वस्त्र लिये, दूसरेसे उन वस्त्रोंको पलटते हुए एक पीताम्बर रखकर उसकी ओर बढ़ाते हुए रूपाने कहा- ”यह देख! श्यामसुन्दरका उत्तरीय और यह……..।’

में आते ही उसे कुछ अद्भुत अनुभव हुआ-मन प्राणोंको विभोरकर देनेवाली गंध; जाने कैसी आतुरता, आह्लाद और मीठी पीड़ाका मिश्रण-सा भाव हृदयको मथने लगा था। वह पीताम्बर हाथमें लेते ही उसकी विचित्र दशा हो । गयी। आँसू आँखोंमें समाते ही न हों जैसे, देह रोमांचित अवश हो गयी। उस उत्तरीयको कसकर हृदयसे लगाये कराह उठी वह वस्त्र समेटे या नहीं कब घर आयी- कैसे आयी उसे कुछ भी स्मरण नहीं रहा।

इस घटनाके पश्चात एक विचित्र बात और हुई। जब-जब वह अकेली होती और इधर यमुना पुलिन, कुंज, वन अथवा सूने घाटोंकी और जाती, उसे एक लम्बी सी तन्वी किशोरी नेत्रों में गहरी पीड़ा उदासी लिये, आभरण रहित अंग, केवल एक सादी-सी मुक्तामाल, हाथों में एक-एक वलय, घूंघर रहित नुपूर, सादा-सा धानी रंगका परिधान धारण किये गहन गम्भीर भावमें डूबी कभी घाटकी सीढ़ियाँ चढ़ती हुई, कभी किसी सीढ़ीपर बैठी और कभी धीमें पदोंसे विचरण करती दिखायी देती।

इलाको आश्चर्य होता- ‘यह कौन है ? अकेली क्यों रहती है ? इसे क्या दुःख है?’ उसका परिचय पानेकी उत्सुकतासे वह उसकी ओर बढ़ती किंतु समीप जाते ही वह पलटकर उसकी ओर देखती और इला धीरे-धीरे छोटी होते-होते उसमें समा जाती।

एक दिन अपराह्नमें इला इसी घाटपर चली आयी उसे इन दिनों एकान्त सुहाने लगा था। वह किशोरी लाल रंगकी बहुमूल्य पोशाक पहने वहाँ उस स्थानपर बैठी अपलक यमुनाके गहरे जलकी ओर देख रही थी। पाँव दबाकर चलते हुए, इला उसके पाँवोंके पास निचली सीढ़ीपर बैठ गयी और धीरेसे अपना दहिना हाथ उसके सुकोमल पाँवपर रखा। किशोरी चौंकी नहीं, उसने केवल दृष्टि घूमाकर उसकी ओर देखा।

‘तुम कौन हो बहिन! इतनी एकाकी क्यों रहती हो ? कौन-सा कठिन दुःख तुम्हें सता रहा है ? यदि मुझे कुपात्र न समझा हो तो बतानेकी कृपा करो।’

वह किशोरी पुनः एक बार उसकी ओर शाँत दृष्टिसे देखकर मुस्करायी। मैं इला हूँ।’– उसने कहा । इला चकित हो उसकी ओर देखने लगी और कुछ समझ पाये इससे पूर्वकी धीरे-धीरे उसमें समा गयी।

‘श्यामसुन्दरसे भी नहीं मिलती अब ?’- सब कुछ सुनकर श्रियाने पूछा। मैंने ‘नहीं’ मैं सिर हिला दिया। ‘यह क्या किया तूने, हम सबमें एक तू ही तो सबसे मोटी, गदबदी, नटखट और तीखी-लड़ाकू थी। इतनेपर भी श्यामसुन्दरसे तेरी जाने कैसे पटती थी। तेरा अधिकार और हिम्मत देख हम सब चकित थी। लड़की होनेपर भी तू हमारे साथ कम ही रहती या तो अकेली खेलती या फिर श्यामसुन्दरके साथ।’

‘जब कभी मैं तेरे साथ होती, संकोचके मारे सिर झुकाये खड़ी ही रह जाती। तुझसे छीन वे फल या मिठाई मुझे देते और तू दौड़कर मुझसे छीन लेती। वे तुझसे रूठकर चल देते, तब तू अपने हाथकी वस्तु मुँहमें डाल उन्हें मनाने के बदले दौड़कर उनकी पीठपर लटक जाती और कानसे मुख लगाकर जाने क्या कहती कि वे खिलखिला पड़ते।’

उन्हें जाते देख मैं व्याकुल हो जाती तेरी हिम्मत देख आश्चर्यमें डूब जाती और उन्हें प्रसन्न देख प्राण सरस जाते इनकी दी हुई वस्तु तू खा गयी,

यह पीड़ा भूलकर मैं प्रसन्न हो जाती कि तू उन्हें लौटा लाई है। तू उनकी पीठपर लदी हुई पाँव उछालती हुई कभी गले और कभी

कानमें मुख लगा फुर्र करती-वे रोमाँचित हो हँसते हुए अपने गलेमें पड़े तेरे दोनों हाथ अपने हाथोंसे पकड़े गिरने से बचाते हुए कहते

‘उतर नीचे, नहीं तो अभी गिरा दूँगा।’ ‘उँ हूँ! श्रियाके पास ले चलो।’

‘अब श्रियाको चढ़ाओ।’ मेरे पास उतरकर तू कहती।

तेरी बात सुन मैं संकोचमें गड़ जाती, मेरी दृष्टि उनके लाल-लाल चरणोंपर जाती और संकेतसे तुझे दिखाकर कहती- ‘देख चरण थककर लाल हो गयी है।’

..तू धप्पसे नीचे बैठकर कहती-‘आओ कान्ह जू! अब मैं तुमको उठाकर ले चलती हूँ।’ ‘नहीं मुझे कहीं नहीं जाना, मैं यहीं खेलूँगा।’ वे वहीं बैठ जाते।

‘देखो न तुम्हारे चरणतल कैसे अरुण हो गये हैं।’ तू उनका हाथ खींचती- ‘आओ मेरी पीठपर चढ़ो।’

‘नहीं इला! मुझे कुछ नहीं हुआ, तू कहे तो अभी तुम दोनोंको उठाकर घरतक पहुँचा सकता हूँ।’

‘श्रिया! तू समझा न इस हठीली को।’ ‘तुम्हारे चरण ही अरुण नहीं हुए, भालपर भी श्रमबिंदु झलक आये हैं। मैं कहती।

‘आ इला! अपने दोनों इनके पद संवाहन करें।”

तू एकदमसे झपटकर उनका एक पद अपनी गोदमें धर लेती। ‘अहा, केवल अरुण ही नहीं, उष्ण भी हो गये हैं। कहती हुई कभी उनके चरणोंको कपोलोंसे, होठों, आँखों और हृदयसे लगा लेती। मैं मुग्ध-सी तेरे इस मुक्त व्यवहारको देखती रहती।

श्रियाकी बातें सुनते हुए इलाके नेत्र मानो निर्झर बन गये, उसने श्रियाकी हथेलियाँ अपने हृदयसे लगा लीं।

“अहा तेरे हाथ कितने शीतल है बहिन! उन चरणोंकी शीतलता, स्पर्शकी राह तेरे हाथों में उत्तर आयी है ?”

‘चल बहिन उसी स्थानपर चलें।’ श्रियाने इलाका हाथ पकड़ उठाना चाहा।

‘क्या करूँगी बहिन! वहाँ जाकर अब न मेरा वह हीरक जटित बचपन रहा- न हृदयमें वह उल्लास भीतर शीतल-कठिन दाह सुलग उठा है जाने यह कैसा रोग है बहिन! उनके दर्शन-स्पर्शको प्राण तरसते है, पर पद उस और उठते नहीं। मेरी सारी हिम्मत जाने कहाँ चुक गयी है। एक बार जैसे-तैसे साहस किया भी, तो देखा-तमालसे पीठ टिकाये हाथमें वंशी लिये कान्ह जू खड़े किसीकी प्रतिक्षा कर रहे हैं। सम्भवतः वे तेरी प्रतिक्षा कर रहे थे अन्यथा मैं तो सदा उनसे झगड़ती रही। मारती काटती सदा अपनी ही बातपर अड़नेवाली हठीली और वे….!!’– इलाकी वाणी रुद्ध हो गयी।

वह स्थिर दृष्टि से यमुनाकी ओर देखते हुए गद्गद कंठसे कहने लगी ‘वे सदा मेरी ही रुचि रखते। वनसे गुंजा, गेरू, पंख, पुष्प और रंग-बिरंगे पाहन लाते – इला देख ! तेरे लिये क्या लाया हूँ।’

‘व्रजमें ऐसा कौन है बहिन! जो उनके हाथसे एक रज कणिका पाकर भी अपनेको धन्य न समझे। किंतु मैं अधम; अपनी इच्छित वस्तु न पाकर मुँह फुलाकर चल देती। वे दौड़कर सम्मुख आकर कहते—’यो रूठ मत इला ! कह न, तुझे क्या चाहिये, मैं कल अवश्य ले आऊँगा। यह सब मुझे अच्छा लगा इसलिये ले आया।’

‘मैंने तो शुक-पिच्छ माँगा था, तुम हंस-पिच्छ क्यों ले आये?’-मैं रो पड़ती’रो मत, तू मत रो! कलकी कौन बात, मैं अभी ला देता हूँ शुक-पिच्छ ।’ वे मुझे गोदमें भर लेते। व्याकुल होकर कहते- ‘मैं भूल गया री! मैया कहती है मैं बड़ा भोला हूँ, इसीसे याद नहीं रहता। तू यही ठहर जाना नहीं तुझे मेरी सौगन्ध ! मै अभी शुक पिच्छ लेकर आता हूँ।’

वे शुक- पिच्छ ढूंढ़ने चले गये और मैं उनकी लायी वस्तुओंसे खेलने लगी। बार-बार लगता — इतनी देर हो गयी, कहाँ गये श्याम जू ?’ ‘ए इला! देख मिल गया शुक-पिच्छ ।’– उन्होंने दूरसे ही पुकारा |

मैं दौड़कर उनसे लिपट गयी, आँखोंमें आँसू भर आये। उन्होंने पूछा

‘क्या हुआ तुझे ? देख वह शुक- पिच्छ…. ।’ ‘इतनी दूर क्यों गये इसे ढूंढ़ने! क्यों गये तुम ?’

‘दूर कहाँ गया! उस पलाशके नीचे तो मिला मुझे। ले, अच्छा है न?” ‘मुझे यहीं नहीं; तुम्हीं चाहिये !’

‘अब यह ‘तुम्हीं’ क्या है? कलतक ढूंढ़ लाऊँ तो चलेगा? किसीसे पूछना पड़ेगा कि ‘तुम्ही’ क्या चीज है।’ चिढ़कर दोनों हाथों की मुट्ठी बाँध उनके वक्षपर रखते हुए बोली- ‘तुम,

तुम, तुम कान्ह जू चाहिये!’ ‘अरे बावरी! मैं तो तेरो ही हूँ।’ वे हँस पड़े।

‘नहीं! मैं तुम्हारी हूँ।’

‘नहीं! मैं तेरो हूँ।’

बहुधा इस विवादका निर्णय मेरी मैया अनन्दा या बाबा सुवीर करते। दोनों एक ही निर्णय देते–’तुम दोनों एक-दूसरेके हो।’

मैं बाबा मैयासे भी झगड़ती। कहा—’यदि ऐसा होता, तो हम साथ रहते न! जैसे तुम रहते हो।’

‘वह तो ब्याह होनेपर रहोगे बेटी!’– बाबा समझाते। ‘तो आज-अभी कर दो हमारा ब्याह ।’–मैं बाबाका हाथ खींचकर

आग्रह करती।

‘अभी कैसे हो सकता है भला! ब्याहके लिये बहुत बड़ा आयोजन करना पड़ता है। कान्ह जू व्रजराज कुँवर है, व्रजराजकी इच्छा होनेपर ही ब्याह हो पायेगा। शाण्डिल्य ऋषि मुहूर्त बतायेंगे-बहुत बड़ी देर लगती है इन सब कार्यों में यह सब होगा, तबतक तुम दोनों भी बड़े हो जाओगे।’

‘आह! यह बड़ा होना भी कैसा दुःखदायी है। कभी मैं बड़ी होनेके लिये उतावली हो उठी थी। नित्य बाबा मैयासे, श्याम जू से पूछती-आज मैं

बड़ी हो गयी न ?’

‘तुझे बड़ा होना अच्छा लगता है ?’- वे पूछते । ‘हाँ, फिर हमारा ब्याह होगा न, इसीसे।’

‘तू तो झगड़ती है, मैं तुझसे ब्याह नहीं करूँगा।’ ‘मैं तो करूँगी! और तुमसे ही ब्याह करूंगी।’

‘मैं नहीं करूंगा।’

‘तुम चिढ़ाते हो, इसीसे तो झगड़ती हूँ। नहीं खिजाओगे तो नहीं लहूँगी। और बड़े होनेपर थोड़े ही कोई लड़ता है भला!’

‘अहा, कहाँ गये वे दिन वे रातें, क्या सोचते होंगे वे ?” ‘चल उठ न इला!’- श्रियाने हाथ थामकर उठा दिया।

‘वहाँ कोई है श्रिया !”

श्यामसुंदर है ! तेरी प्रतिक्षा कर रहे हैं। चल पगली! खड़ी क्यों रह गयी? वे तेरी बाट देखते हैं बहिन!’

‘मैं तो महा अपदार्थ हूँ, कैसे अपना मुँह दिखाऊँ उन्हें! तू जा, मैं यहाँ बैठती हूँ।’

श्रियाने मुझे बैठने नहीं दिया, हाथ पकड़कर खींच ले चली। हृदयकी अवस्था क्या कहूँ! दर्शन स्पर्शको प्राण व्याकुल थे; पर लज्जा संकोच, बचपनका दुस्साहस पाँव आगे बढ़ने नहीं देते थे। मैंने दूरसे ही देखा सन्ध्याके अरुण प्रकाशमें उनकी कैसी शोभा है- शीतल सान्ध्य समीरसे पीतपट फहरा रहा है, अलकें बार-बार मुख कमलपर घिर आती हैं। गौ-रज मण्डित अलकें-पलकें, फेंटमें बंसी, हाथमें लकुट, सर्वाङ्ग धातुचित्रित, पुष्पाभरण-सज्जित, कुण्डलोंकी आभासे दमकते कपोल, अन्वेषण तत्पर दीर्घदृग! वह सिंह ठवन, विशाल वक्ष, बाहु….. बैरिन चेतना साथ छोड़ गयी।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-22



जात न पूछे कोय

यह कौन है; ऐसे वटवृक्षकी जटाओंमें लटकी हुई ? गोपी! नहीं, यह तो कोई शबर कन्या है। कहीं फाँसी तो नहीं लगा ली ? ‘कौन हो सखी! ऐसे क्यों लटकी पड़ी हो ?’

मेरी बात सुन वह कृष्ण-वर्णा शबर कन्या चौंककर खड़ी हो गयी। कुछ समय एकान्त पानेके उद्देश्य से इस सघन वटकी ओर चली आयी थी। इसकी जटाओंने भूमिमें पैर गाड़ गाड़कर अनेक स्तम्भ निर्मित कर लिये हैं। और ऊपर सघन वट-पत्रों का वितान-सा तन गया है। मूल वृक्षके नीचे तो अंधेरा रहता है। वही एक पाहन मानो राजसिंहासनकी भाँति रखा है। कभी कभी मैं वहाँकी भूमि स्वच्छ करके इस पाहनपर आ बैठती हूँ।
सर्वप्रथम यहीं श्यामसुंदरसे वार्तालाप हुआ था मेरा ।
एक दिन ऐसे ही बैठी मनोरथोंके महल बुन रही थी- ‘कभी श्यामसुंदर अपने मुखसे मेरा नाम पुकारेंगे? कभी अपना कोई काम करनेको कहेंगे? कभी उनका स्पर्श प्राप्त होगा? कभी वे हँसकर कोई बात ….. ?

उसी समय किसीने मेरी आँखें बंद कर ली, मैं कुछ झुंझलाई भी और लजाई भी कि मेरे इस एकान्त स्थलका ज्ञान किसी और को हो गया। मैंने ग्लानी भरे स्वरमें कहा–’छोड़ सखी! तुम जो भी हो, तुम जीती और मैं हारी।’

हाथ हटते ही मैंने पीछे मुड़कर देखा- ‘श्यामसुंदर! मुखपर हँसी और आँखोंमें कौतुक लिये खड़े थे।’

‘अरी विद्या! इस अंधेरेमें बैठी-बैठी क्या नींद ले रही है? घरमें स्थान नहीं है क्या ?”

मैं क्या कहती ? बस देखती रह गयी।’
मुझे बैठनेको भी नहीं कहेगी ?
एक ओर हट! मैं भी बैठूंगा; थक गया। हूँ चलते-चलते। गैया भाग गयी थी, उन्हें घेरकर अर्जुनके संग कर दीं। मैं विश्राम करने यहाँ आया तो देखा आप विराजी हैं। वे मुझे धकेल समीप ही बैठ गये। कैसी मधुर देह गंध…., निहारनि, बतरावनि….. ।

‘ए विद्या! बोलेगी नहीं ?’– उन्होंने मेरे सिरपर हाथ रखकर जोरसे हिला दिया।
अकस्मात मुझे ध्यान आया, ये थक गये हैं। मैं उठकर उनके चरणोंमें बैठ गयी और उन्हें गोदमें धर धीरे-धीरे संवाहन करने लगी।
अहा! ‘कैसे सुन्दर कोमल चरण बिन पनही या कठोर भूमि पर गैयनके पीछे दौरें।’- मेरी आँखोंसे कुछ बुँदे उनके चरणोंपर झर पड़ी।

‘क्या हुआ री ?’ उन्होंने हँसकर मेरा मुख ऊपर उठा दिया—’तेरे आसनपर मैंने अधिकार जमा लिया इससे रो रही है? अरी मैं तो जो तेरा सो मेरा समझकर बैठ गया था। क्या तू मेरी नहीं है? और मैं तो इधरसे निकलता हूँ तो कभी-कभी यहाँ आ बैठता हूँ मुझे कहाँ ज्ञात था कि यह तेरा स्थान है….।’

‘श्यामसुन्दर !’ मेरे रुद्ध कंठसे वाणी फूटी-‘व्रजके ही क्या, संसारके सारे स्थान तुम्हारे ही हैं; आज अपने मुखसे मुझको अपना कहकर धन्य कर दिया। अब अन्यथा कुछ न कहना मेरे लिये इतना बहुत है। मुझे अपनी सेवा का अवसर दो।’

‘कर तो रही है सेवा।’ उन्होंने हँसकर कहा। कुछ समय बाद बोले ‘अब रहने दे विद्या! सखा ढूँढ़ रहे होंगे मैं चलूँ?’ प्राणोंमें हूक-सी उठी; बस

वे हंसकर पुनः बैठ गये-‘अच्छा तेरा नाम ही विद्या है कि कुछ विद्या जानती भी है ?’

‘तुम कहो, मैं तो कुछ नहीं जानती पर…….. ।’ ‘मुझे प्यास लगी है, कहीं पानी…. !’

‘पानी…. ?’– मैं उठ खड़ी हुई। मुझे ज्ञात है कि यमुना यहाँसे बड़ी दूर है किंतु श्यामसुंदरको प्यास लगी है। मैंने शीघ्रतासे ढ़ाकके दो पत्ते तोड़ पत्र पूटक बनाया चल पड़ी। मेरी व्याकुल दृष्टि जलका अनुसन्धान कर रही थी; दूर पश्चिममें दो बगुलोंको भूमिपर उतरते देखा। अनुमानने कहा- ‘बिना जलके तो बकुल भूमिपर क्या लेने उतरेंगे ?’ मैंने शीघ्रतासे पद बढ़ाये। वहाँ जाकर देखा कुछ नहीं केवल हाथ दो हाथ स्थानपर बड़े-बड़े हरित तृण सिर उठाये खड़े हैं और उनके बीच एक बकुल भूमिमें चाँच गड़ाये कुछ खानेकी चेष्टाकर रहा है। मुझे निराशा हुई फिर कौतुहलवश समीप चली गयी कि यहाँ खानेकी क्या वस्तु हो सकती है? दोनों बकुल मुझे देख फुदककर दूर जा बैठे! सोचा-कीड़े-मकोड़े खा रहे होंगे चलूँ! श्यामको तृषा सता रही है…. किंतु ये हरित तृण इतने ही स्थान पर….!

तृणोंपर पद पड़ते ही भूमि गीली लगी। मैंने केन्द्रमें बैठ उँगलीसे खुरवा भूमिको कुछ तृण उखाड़े जल था, मेरे हृदयमें आशा लहराय शीघ्रता अपेक्षित थी; कान्ह जू तृषित हैं कहीं उठकर चल न दें…।

शुष्क काष्ठसे खोदकर गड्डा बनाया, वह धीरे धीरे जलसे भर गया। मैंने हाथसे एक बार उसे उलीच दिया। अबकि बार वह अपेक्षाकृत स्वच्छ था मैंने हर्ष से अपनी ओढ़नीका पल्ला जल पर बिछा दिया। जब जलसे भर गया तो अंजलीसे पत्र पुटकको भर दिया और यथा शीघ्र वटकुंजकी ओर चली। किंतु वहाँ पहुँचकर देखा पाहनका आसन तो खाली है। मेरे पगभारी हो गये धीरे-धीरे चलकर जलपात्र मैंने आसनपर रख दिया और वहीं माथा टिकाकर गिर पड़ी—’हा विधाता! आज ही तूने सौभाग्य द्वार खोला और आज ही उसमें आग भी लगा दी?’ मेरी आँखोंसे झरझर अश्रु वह चले, हृदयकी ऐंठन सही नहीं जाती थी।

‘मुझे देर हो गयी, तुम प्यासे हो, मैं जल तक न पिला सकी! व्यर्थ है मेरा विद्या- ब्रह्मविद्या होना व्यर्थ है। देवर्षि! तुम्हारा आशिर्वाद, मेरी तपस्या, यह जन्म सब व्यर्थ हो गया…. सब व्यर्थ हो गया।

निराशाके अंधकारमें चेतना डूबने लगी। जब आँख खुली वह कमलमुख सम्मुख था, वे दीर्घ स्नेह भरे दृग मेरे मुखपर टिके थे, वे अपने पीताम्बरके गीले छोरसे मेरा मुख पोंछ रहे थे।
‘कैसी बावरी है री तू! मैं तो इस पेड़के पीछे छिप गया था कि तू मुझे पुकारेगी-ढूंढेगी, किंतु तू तो आते ही ऐसे गिर पड़ी जैसे पाँव कट गये हों
बावरी!’–
उन्होंने हँसकर मेरा मुख अपने वक्षसे लगा लिया।
अब इस सुखकी तुलना मैं किससे करूँ। एकाएक स्मरण आया ये तृषित है; मैं उठ पड़ी– ‘तुमने जल पी लिया ?’
“अहा, तू तो मरी पड़ी थी!’ वे खुलकर हँस पड़े-‘जल कौन कैसे पीता ?’

“मैं तो स्वस्थ हूँ, तुम जल पी लो। मैंने पत्र पुटक हाथ बढ़ाकर

उठाना चाहा किंतु उन्होंने उसे उठा लिया। ‘नहीं, पहले तू पी। देख तेरे होठ सूख गये हैं, जाने कहाँ से लायी है, सो पहले तू पी ले।’
उन्होंने जलपात्र मेरे मुखसे लगाना चाहा। मैंने हाथसे बाधा दी, आँखें भर आयी। ‘मेरा लाया जल भी उन्हें स्वीकार नहीं।’ रुद्ध कंठसे अस्पष्ट स्वर निकले-‘पहले तुम लो… मुझपर
दया करो…. दया करो…!’ मैंने उनके चरणोंपर सिर रख दिया, नेत्र जल
उन्हें धोनेका उपक्रम करने लगा।

‘अच्छा ले, रो मत! अपने ही हाथसे पिला दे मुझे उठ पागल कहीं की, परिहास भी नहीं समझती!’- उन्होंने मुझे उठाकर दोना थमा दिया। मैंने उतावलीसे लेकर उनके मुखसे लगा दिया। कुछ जल छलक पड़ा और बचा हुआ वे पी गये।

और लाऊँ ?’- मेरी आँखोंमें आँसू और होठों में प्रसन्नता समा नहीं पा रही थी।

‘चल मैं भी चलूँ, देखूँ कहाँसे लायी तू? यहाँ तो आस-पास कहीं जल नहीं है।’- हम दोनों साथ उस स्थानपर गये। जल देख प्रसन्नता से उन्होंने मुझे बाहों में भर लिया।

‘तू पहले जानती थी इस स्थान को ?’ उन्होंने पूछा । ‘नहीं।’ मैंने सिर हिला दिया।
निथरे हुए जलका दोना भर उन्होंने मुझे पिलाया और फिर अंजलीसे मुझपर जल उछाला। हम दोनोंने मिलकर गड्ढे को चौड़ा और थोड़ा गहरा किया और चारों ओर पत्थर जमा मिट्टीका बाँध बनाया और एक बार फिर प्रसन्नतासे भरकर एक दूसरेपर जल उछाला।

‘अरी मैया री! बहुत विलम्ब हुआ, आज अवश्य मैयासे मार लगवायेंगे , सखा!’–कहकर वे एक ओर भाग छूटे। मैं वहीं खड़ी मुग्ध देखती रही। जिससे उन्होंने जल पिया था उस द्रोणको वहीं पेड़पर पतोंमें छिपाकर रख दिया। उसके पश्चात जब भी हम इकट्ठे होते उस गड्ढेको गहरा-चौड़ा करते। होते-होते वह इतना हो गया कि दो मनुष्य उतरकर नहा सकें। छातीतक उसको गहरा दो किया, बाँध बनाया-सीढ़ियाँ बनायी। कितने पशु-पक्षी उसमें नहाते-पानी पीते। हमारी प्रसन्नताकी सीमा नहीं थी। जहाँतक हो सकता मैं ही परिश्रम करती, उन्हें सिर्फ निर्देश देनेको कहती कितना सुकोमल गात है उनका
एकबार श्यामसुंदर मेरे हाथ देखकर चौंक पड़े-‘अरी तेरे हाथ कैसे हो गये?’
उन्होंने मेरी हथेलीपर अपनी हथेली रख दी। आनन्दसे मेरी आँखें हुँद गयीं। परिश्रम कष्ट जैसा तो पहले भी अनुभव नहीं होता था। वे सम्मुख हों तो इन बेचारोंको अवकाश ही कहाँ रहता है? कभी हाथोंकी ओर ध्यान जाता भी था तो धन्यताकी ही अनुभूति होती थी। उनका स्पर्श लग रहा था मानो हाथपर कोई शीतल लेप लगा है, जिसमेंसे आनंदकी लहरें प्रसूत होकर सम्पूर्ण शरीरमें फैल रही है। कब देह रोमाञ्चित हुई-कब आँखोंसे आँसू निकल पड़े ज्ञात ही न हुआ।

‘विद्या!’ उन्होंने पुकारा। मैंने आँखें खोल उनकी ओर निहारा। ‘देख तेर आँसू इस पानीमें मिल गये। इसका नाम तेरे नामपर “ब्रह्म-कुंड’ रहेगा।’
‘नहीं, ‘श्याम कुंड’ रहने दो।’– मैंने कहा।

अच्छा ऐसा करें; न तेरा, न मेरा नाम! इसका नाम तेरे आँसुओंके नामपर ‘प्रेम-कुंड’ रहे। इसमें स्नान करनेवालों को….।’ ‘तुम्हारे प्रेमकी प्राप्ति हो।’– मैंने बीचमें ही कहा

‘ऐसा ही सही।’— वे हँसे ।

‘तो सबसे पहले मैं ही न स्नान कर लूँ?” ‘मैं भी चलूँ तेरे सँग ?’

अहा, मैं तो कृतार्थ हो गयी। शब्द नहीं मिल पाये। सिर हिलाकर स्वीकृति एवं नेत्रों से प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने पीताम्बरकी कछनी बाँध ली और मैंने ओढ़नीसे तन ढाँपा फिर दोनों हाथ पकड़कर जलमें उत्तर पड़े। एक दूसरेपर जल उछालने और नहाने नहलाने में कितना समय लगा ज्ञात ही न हुआ। दोनोंने हाथ पकड़कर कितनी डूबकिया लगायी, कैसे कहूँ! आनंद सागर जैसे उमड़ा पड़ रहा था, सम्हाले सम्हलता न था। बड़ी देर बाद बाहर निकलकर हमने अपने वस्त्र पहने। उन्होंने अपना पीताम्बर और मैंने ओढ़नी ढाककी डालियोंपर सूखने फैला दिये।

इतने सोभाग्यकी तो मैंने आशा भी ना की थी। केवल तुम्हारी प्रसन्नता तुम्हारा सुख चाहिए, मुझे और कुछ चाहिये यह ज्ञात ही न हो।’

इसके लिये तो किशोरीजीकी सेवा करनी होगी।’ ‘यहाँ नंदगाँवों रहकर वह कैसे उपलब्ध होगी ?”

कैसे ? कैसी व्यवस्था मुझे ब्याह नहीं करना में शक्ति होकर एकदम बोल पड़ी। ‘कैसी अहाविद्या है री तू ?’ ने हँस पड़े ‘व्याहकी बात में नहीं कर रहा।

हाय, वह अनुमोदन ही आज शूल हो गया। साँझको भर गयी हुआ मथुरासे अक्रूर आये हैं कान्ह जू को लिखाने और वे प्रातःकाल होते ही विदा हो गये यह व्यवस्था की उन्होंने कि सब अव्यवस्थित हो उठे। कौन सखी नंदगाँवकी है और कौन बरसाने की, यह भेद ही जैसे मिट गया।

लीलास्थलॉपर कहीं भी सखियाँ बैठी पड़ी मिल जाती। श्रीकिशोरीजू भी कभी-कभी मिल जाती, फिर सबकी आश्रय वहीं तो थी। नंदगाँवकी सखियाँ बरसाने गये बिना रह से मात एकबार दिनमें उनके दर्शन न हो जाय तो प्राणोंको देहरों रोकना कठिन हो जाता जैसे यह तो इस हतभागी ब्रह्मविद्याको अब ही ज्ञात हुआ कि विरहमें ही प्रेमकी पूर्णता है। “अपना देह, गृह, गैया सब इसलिये सम्हालना है कि इन्हें अस्त-व्यस्त हीन-दशामें देख वे दुःखी न हों। यह भाव तो श्रीकिशोरी जू की चरणरज सिर चढ़ाकर ही प्राप्त हुआ। कृपामय! तुम्हारी कृपाकी सीमा नहीं है।

पर यह कौन है ?’ – मेरे प्रश्न करते ही वह उठकर खड़ी हो गयी और भागनेको उद्यत हुई तो मैंने बाँह थाम ली। ‘कौन जाने उनकी उन कजरारी अंखियोंने कहाँ-कहाँ किस-किसको घायल किया हैं। ‘ मैंने मनमें कहा।

‘कौन हो, यहाँ ऐसे कैसे पड़ी थी? क्या नाम है ?’ मैंने पूछा । उसने सिर हिलाकर बताया, किंतु आँखोंमें भरे आँसू न ‘कुछ नहीं।’– चाहते भी छलक पड़े

‘मुझसे न कहेगी सखी!’

‘कहा कहूँ ?’ उसका कंठ इतना ही कहते रुद्ध हो गया और दो

धारायें कपोलोंसे उतर वक्षावरण भिगोने लगीं।

‘यहाँ तो कू व्रजराज कुँअर मिले हते ?”

उसने ‘हाँ’ में सिर हिलाया।

‘आ, यहाँ आकर बैठ सखी! हम दोनों एक ही रोगकी रोगिणी है, एक दूजेसे बात कर मन को ठंडो करें। उनकी चर्चा तें सुख मिले सखी! तेरो नाम कहा है? – कहते हुए मैं उसी पाहनपर बैठ गयी और अपने समीप ही उसे बिठाने लगी।

‘ऐसी अनीति न करें स्वामिनी!’– वह मेरे पैरोंपर गिर पड़ी। मैंने उसे उठाकर अपनेसे लगा लिया। पीठपर हाथ फेरते हुए पूछा- ‘अपनो नाम नहीं बतायेगी ?’

‘कंका है मेरो नाम।’

‘कब, कैसे मिले श्यामसुन्दर, कहा कही ?’

उसने एक बार अपने जलपूर्ण नेत्र उठाकर भोली और शंका भरी दृष्टिसे मेरी ओर देखा। मैंने मुस्कराकर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा तो वह पलकें झुकाकर कुछ कहने को उद्यत हुई, किंतु होठ थोड़े हिलकर रह गये। ‘कंका, बोलेगी नहीं ? कह देनेसे मनका ताप हलका हो जाता है सखी!

हम सब यही तो करती है। इसी मिस उनकी चर्चा होती है। ‘ताप हलका हो, यही तो मैं नहीं चाहती। इस तपनमें बहुत सुख है स्वामिनी। पर आप कहती है कि चर्चा होगी; उसका लोभ भी कम नहीं है।” उसने कहा।
एक क्षणके लिये मैं उसकी बात सुन चकित रह गयी। वह ताप सुखदायी है यह सब जानती है, पर वह मिटे यही तो हमारी कामना रही है। यह तो मिटानेकी कौन कहे! घटानेकी बात भी नहीं सोचना चाहती।

‘पुनः उनके दर्शन हों और यह अदर्शनका ताप मिटे, नहीं चाहती तुम ?’

मैंने पूछा।

‘ऐसा कौन न चाहेगा ? किंतु जबतक वह सम्भव नहीं है, यह ताप उनका स्मरण ही तो मेरा धन है। फिर मेरा ऐसा भाग्य कहाँ ………l’ उसका गला पुनः रूँध गया।

‘वे कहाँ कैसे मिले तुझे? क्या बात की ?’ मैं एक दिन इन जटाओंको बाँधकर झूला झूल रही थी कि उन्होंने

पीछेसे आकर झूलेके साथ ही मेरा हाथ पकड़ लिया जिससे एकदम भाग न सकूँ। मैं चौंककर खड़ी हो गयी। उन्होंने कहा- ‘मुझे भी अपने साथ झुलावेगी ?’

इतनी देरमें तो मैं अपने आपको ही भूल गयी थी! वह रूप, स्पर्श और फिर वह मधुर स्वर व मुस्कान और… और…. वह चित….वनि…. ! कंका पुनः मौन हो गयी।

‘ए कंका! फिर क्या हुआ? क्या कहा तुने ?”

हाँ, उसने चौंककर मेरी ओर देखा। मेरे मुखसे बोल नहीं फूटा तो वे स्वयं ही झूलेपर बैठ गये और हाथ थामकर मुझे भी अपने समीप बिठा लिया। हम दोनों झूलने लगे। उनकी अंग सु. वा..स… – कंकाने साँस खींची।

‘फिर ?’– मैंने शीघ्रतासे पूछा कि वह कहीं फिर स्मृतिके समुद्रमें

डूबकि न लगा जाय।

“तेरो नाम कहा है री ?”

‘कंका!’

‘कंस तो नाय ?’– वे खुलकर हँस पड़े।
‘ले खायेगी ?’– उन्होंने फेंटसे आम्रफल निकालकर मुझे मुझे स्मरण आया- कुछ मधुर फल फूल और अंकुर मैंने संग्रह किये हैं। मैं वह लानेके लिये उठी तो उन्होंने बाँह थाम ली- ‘कहाँ जाती है?’

मैंने वृक्षकी खोडरकी ओर संकेत किया। दोना लाकर उनके हाथ में धमाया तो बोले- ‘यह क्या है? क्या करूँ इसका?’ मैंने एक फल उठाकर उनके मुखमें दिया तो खाते हुए बोले- ‘अहा यह तो बहुत स्वादिष्ट है।’ सब खाकर बोले-‘ले मैं तो सब खा गया, अब तू क्या खायेगी ?

‘मैं और ले आऊँगी। तुम्हें रुचे ये? मैं नित्य ही ला दिया करूँगी।’ ‘सच! बहुत अच्छे हैं। और ला देगी तो मैं दादाके-सखाओंके लिये भी ले जाऊँगा। कल ला देगी ?”

‘कल क्यों, अभी ला दूंगी।’– मैं चलने लगी तो उन्होंने फिर रोक दिया। ‘आज नहीं! अभी तो बहुत आतप है, कल लाना चल अभी तो अपने खेलें।’

मेरा हाथ पकड़कर वे उस ओर ले गये। वहाँ भूमिपर लकीरें खींचकर हमने चौकोर घर बनाये। पत्थरके टुकड़ेको फेंक एक पैरपर चलते उस टुकड़ेको ठोकरसे खिसकाते हुए खेलने लगे। पहले तो मुझे कुछ संकोच लगा किंतु जब अच्छी तरह खेलने लगी तो वे हार गये।

कंकाने मेरी ओर देखकर लज्जासे सिर झुका लिया। मैं थोड़ा-सा हँस दी। ‘जिसने त्रिविक्रम बनकर दो पदमें ही त्रिलोककी नाप लिया था, वह अपनी ठोकरसे नन्हे पाषाण खंडको नहीं खिसका पाया।’ मनमें कहा।

‘फिर?” उपरसे पूछा।

‘फिर नित्य ही मैं मूल-फल- अंकूर लाती और यहाँ प्रतिक्षा करती। वे आते अपने साथ कोई फल, कभी कोई मोदक अथवा मिष्ठान लिये आते मुझे देते। मेरी लायी हुई वस्तुओंमें से कुछ खाते-सराहते और फिर हम खेलते। वे अधिकाँश हारते ही थे। धीरे-धीरे मेरे मनमें यह बात समा गयी कि कुअंर जू को खेलना आता ही नहीं और वे मेरे बिना रह नहीं सकते। मैं छिप जाती तो वे ढूंढते ढूढ़ते आकुल हो उठते।’

एक दिन मैं छिपी ही रही और उनकी आकूलताका आनंद लेती रही। वे उदास होकर चले गये और उसके दूसरे दिन वे आये ही नहीं। मैं फल मूल संग्रहकर रही थी कि मुख्य पथकी ओर पशु-पक्षियोंका सम्मलित आर्तनाद सुना, साथ ही रथकी थरथराहट भी दौड़कर उस ओर गयी देखा सारे पशु पक्षी वनके छोरपर एकत्रित हो क्रन्दनकर रहे हैं। एक रथ पथपर बढ़ रहा है। उसमें कुअंर जू अपने दादाके संग बिराजे हैं, रथ मथुराकी ओर जा रहा है।

‘मेरे हाथसे दोना छूटकर गिर पड़ा….। तबसे नित्य यहाँ आकर पथ जोहती हूँ। क्या वे अबतक नहीं आये! मुझ पापिनीने उन्हें सताया था…. इसीसे…. वे सबको छोड़कर चले गये। मेरे कारण…. सबको ….. दुःख…. पहुँचा…. स्वामिनी ! आप मुझे धिक्कारो-ताड़ना दो सबके दुःखका कारण मैं हूँ… मैं… हूँ।’-कंका बिलखकर रोने लगी। मैंने उसे गले लगा लिया-‘रो मत बहिन! हम सब ऐसा ही सोचती है कि हमारे अपराधके कारण वे चले गये, किंतु अपनों का अपराध देखना उन्हें कभी

आया ही नहीं। वे आयेंगे, निज जनों से दूर कैसे रह पायेंगे ? तू धीरज धर ।’ उसने फल-मूल अंकुरका दोना लाकर मुझे थमा दिया- ‘यह ले जायँ आप, मैं नित्य पहुँचा दूँगी। वे आयें तो उन्हें देकर कहें-कंका अपराधिनी है, उसे अपने ही हाथसे दंड देवें, किंतु यह स्वीकार करें।’

‘अच्छा बहिन! कह दूँगी, उन्हें साथ लेकर यहाँ आऊँगी। वे तो भूल ही चुके होंगे, आवें तो वे ही स्वयं तुझसे माँग-माँगकर खायेंगे। तू चिन्ता न कर, उनके आने भरकी देर है, सम्पूर्ण व्रजमें जीवन दौड़ जावेगा।’- कहते हुए मैं वह दोना लेकर चल पड़ी।

मैं तो नित्य ही यहाँ आती थी, अपराह्न ढलनेपर ही जाती, वे मेरे साथ बने रहते। कभी इसे देखा नहीं यहाँ और इसका कहना है— नित्य आती थी। उनकी लीला कौन जाने! देश और काल दोनों सापेक्ष है और उनके इंगितपर संचालित होते हैं।

‘कैसी ब्रह्मविद्या है री तू ?’ एक दिन उन्होंने कहा था—’कुछ भी समझमें नहीं आता तुझे, छोटा-सा विनोद भी नहीं समझती, रोने बैठ जाती है।’ ‘हाँ प्रभु ! आप निखिल ब्रह्माण्ड नायकको जब ऊखलमें बंधे रोते देखा, माखन चुरा-चुराकर खाते देखा, गोबरकी बिन्दियोंसे मुख भरे देखा, गोष्ठमें चुल्लू भर छाछके लिये नाचते देखा तो लगा, श्रुतियाँ नेति-नेति कह क्या

इनका ही बखान करती है? यही वेदके प्रतिपाद्य विषय है ? महाकाल और मायाको भयभीत और भ्रू संकेतसे नियमित करनेवाले क्या यही है ? ‘ ‘बस, बस।’ उन्होंने मेरे मुखपर हाथ रख दिया- ‘यह ब्रज है सखी! और मैं नंदकुमार अखिल ब्रह्माण्ड नायक बेचारा कहीं जाकर दुबक गया होगा।
इसी प्रकार यह दासी भी केवल पूर्ण गोपकी कन्या विद्या है। ब्रह्मविद्या ब्रजमें क्या करेगी श्यामसुन्दर ! बारम्बार उसका नाम लेकर क्यों उकसाते हो ?’

‘मैं केवल स्मरण करवा रहा हूँ जिसके लिये तूने तप किया था, वह उद्देश्य पूरा हुआ कि नहीं ?”

‘मैं धन्य हुई। मैं ही क्या श्यामसुन्दर ! यह मुक्ति, श्रुतियाँ और न जाने कितने ऋषि, कितने प्रेमैक प्राण तुम्हें पाकर कृतार्थ हुए हैं। तुम्हारी अनुकम्पाकी इति नहीं है। कभी किसीने सोचा था कि ब्रह्म यों गोप कुमार बना गायोंके संग डोलेगा ?

‘जाने दे विद्या! यह चर्चा इस रसधाममें अप्रिय लगती है। यह स्तुति किसी अन्य समय लिये उठा रख।’

‘ठीक है, किंतु मुझे फिर कभी ब्रह्मविद्याकी याद न दिलाना अन्यथा…. ।’- मैं हँस पड़ी।

‘तो तू मुझसे बदला ले रही थी, ठहर तो बंदरिया कहीं की!’ श्याम जू मुझे पकड़ने दौड़े तो मैं हँसती हुई घरकी ओर दौड़ गयी थी।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ- 21



महधन ब्रजरस पावन

‘तुझसे यह सब किसने कहा बहिन ?’

‘क्यों? कई बहिनोंके मुखसे अनेक बार सुना कि ऋचा भूत भविष्य बता सकती है।’

‘तो तुम्हारा ही विगत जानने की उत्सुकता हो आई।’– मैंने हँसकर कहा

‘क्या कुछ अनुचित कहा ?’

‘नहीं इला! परन्तु विगत जानकर क्या करोगी? इतना सुन्दर सुरभित – सुघड़ वर्तमान हमारे सामने है, उसे छोड़ भूत-भविष्य की चिंता में क्यों पड़ें!’

‘वर्तमान को छोड़ने अथवा उपेक्षित करने के आशय से नहीं, यह उत्सुकतावश पूछा था मैंने, यदि उचित न समझो तो रहने दो।’ ‘

नहीं बहिन! इसमें अनुचित कुछ नहीं है। किन्तु कहाँसे आरम्भ करूँ, यही सोच रही हूँ !’-

कहकर ऋचा कुछ क्षणके लिये चुप हो गयी। ‘जिसे तुम हम विद्याके नामसे जानती हैं बहिन! वे भगवती ब्रह्मविद्या है।’ ऋचाने मेरी ओर देखा। उसका नाम पहले ब्रह्मविद्या था ? “
मैंने सरलतासे पूछा- ‘मैं तो तेरा विगत पूछ रही हूँ बहिन!’

‘अपना विगत ही कह रही हूँ इला! ये विद्या ही वेदोक्त ब्रह्मविद्या हैं । जिन्हें प्राप्त करनेको पता नहीं कितने लोग-कितने जन्म जप-तप-सतसंगमें व्यतीत कर देते हैं, किंतु उनमें से किसी विरलेको ही ब्रह्मविद्याका ज्ञान होता है। वही भगवती ब्रह्मविद्या व्रजमें गोपकुमारी विद्या बनकर आई हैं।’

‘क्यों ? कैसे ?’ – मैंने आश्चर्य पूर्वक कहा।

‘एक दिन! नहीं; दिन कहना उचित न होगा बहिन! एक बार जब हम सब ब्रह्मलोकमें थीं………।’

‘बाधा देनेके लिये क्षमा करना बहिन! हम सब तुम्हारा अभिप्राय अपने अतिरिक्त और किन-किनसे हैं?’– मैंने ऋचाकी बात काटकर पूछा।
हम सब; प्रज्ञा, मेधा, क्रिया, सन्ध्या, उषा और मैं! हमारे यूथकी सभी बहिनें वेद की ऋचायें हैं बहिन। देवी ब्रह्मविद्या हमारी स्वामिनी है और हम सब उनकी अनुचरियाँ उन्होंने तपस्या करनेकी अभिलाषा व्यक्त की। यह अनहोनी-सी बात थी कि उन्हें कोई कामना हो, अभिलाषा हो! उससे भी बढ़कर यह कि उस अभिलाषाकी पूर्ति के लिये उन्हें किसी प्रकारका कोई कष्ट उठानेकी आवश्यकता हो! फिर ऐसा है ही क्या ब्रह्माण्डमें, जो उनका काम्य बननेका सौभाग्य प्राप्त करे ?”

किन्तु हममें से किसीने कोई प्रश्न नहीं किया, चुपचाप उनके अनुगमन में चल पड़ी। जब तपस्वियों का तप पराकाष्ठापर पहुँच परिपक्व होता है वहींसे—उस स्तरसे देवीकी तपस्या आरम्भ हुई।

कितने वर्ष ? यह न पूछना बहिन ! वह गिनती सम्भव नहीं है। अवश्य ही मुझे कलकी-सी बात लगती थी, जिसकी आयुका परिमाण अंतहीन-सा हो, उसे तो जैसे समय शीघ्रगामी लगता है, घटनायें पल-घटिकाओं पहलेकी लगती है। जैसे पर्वतपर खड़े व्यक्तिको पेड़-पौधे और प्राणों उनके और अपने स्वयंके परिमाणसे भी छोटे लगते हैं, वैसे ही समय तीव्र गति से भागता सा लगता!’

‘बहिनों, तुम सब क्यों श्रमित होती हो! तुम सब ब्रह्मलोक चली जाओ। मैं अनन्तकालतक यहाँ इसी प्रकार कालक्षेप करती रहूँगी।’ ‘आजीवन ? ‘

‘हाँ; कभी भी, कहीं भी जीवनकी इति हो, मैं उस समयतक लक्ष्य प्राप्तिका यत्न करती रहूँगी।’

सहस्रों वर्ष पश्चात उस दिन देवीके मुखसे यह बात सुनकर लगा हृदयमें तप्त शलाका प्रवेशकर गयी हो तुम्हीं कहो बहिन! हम उनसे अभिन उनकी अंश स्वरूपायें उन्हें छोड़ कहाँ जाये ?
हमारी गति ही कहाँ है उनके अतिरिक्त ?

हमारे मौन अश्रुपातने सारी कथा कह दी। रहो: जैसी तुम्हारी इच्छा बहिनों’ कहकर वे मौन हो गयीं।

पुनः सहस्रों वर्ष बीत गये साक्षात् ब्रह्मविद्याको वर देने का साहस करे ऐसा देवता हो कौन है ?

उनका तप अविराम चलता रहा है और हम अनुचरियाँ मौन सेवामें लगी रहीं। सेवा भी क्या बहिन! वे नेत्र मूँदे ध्यानमें आसनबद्ध अवस्थामें बैठी रहतीं। भोजन-पानीको आवश्यकता किसीको न थी। स्वामिनीकी प्रसन्नता, उनके संकल्प-से ही हमारा पोषण होता। आर्द्र वस्त्रसे उनकी देह पोंछ देतीं, उन्हें वर्षा आतपसे बचानेका यत्न करतीं। आसपास मार्जनी फेर देतीं सिद्धियाँ विनम्र सेवामें उपस्थित होतीं, किंतु उनका प्रयोग वर्जित था! देवीका प्रथम संकल्प ही यह था कि सिद्धियाँ ब्रह्मलोकमें ही रहें। तपस्याकालमें उनकी सेवा स्वीकार करना विघ्न स्वरूप था।

युगों पश्चात् जब देवीने हमें ब्रह्मलोक जानेकी बात कही, तो लगा लम्बी आयुसे बढ़कर दूसरा दुर्भाग्य नहीं है। कहाँ तो हम इस आशामें थी कि ध्यानसे जागकर देवी हमें अपने सफल मनोरथ होनेकी सूचना देंगी और कहाँ यह कठिन बात सुनी। स्वामिनीके स्वरकी निराशाने हमें व्यथित कर दिया।

उसी दिन हाँ, उसी दिन अपराह्नमें देवर्षि नारद पधारे।
दीर्घकाल पश्चात महत्तम अतिथिको पाकर हम सब सम्भ्रम उठ खड़ी हुई हृदयमें आशाका सागर हिलोरे लेने लगा- अब अवश्य ही लक्ष्य प्राप्तिका कोई सूत्र प्राप्त होगा। हमारे कर उनके सत्कारमें लग गये।

देवीने उठकर प्रणिपात किया।
अर्घ्य पाद्य स्वीकार करनेके अनन्तर आसनासीन होकर देवर्षिने परिचयकी जिज्ञासा व्यक्त की। ‘ये भगवती ब्रह्मविद्या हैं भगवन्! और हम सब इनकी विनम्र किंकरियाँ।’ ‘भगवती ब्रह्मविद्या !!– देवर्षि जेसे चौंककर बोल पड़ें।

देवीके श्रीअंगोंसे छिटकते स्निग्ध-दिव्य प्रकाशको निरख अभिभूतसे बोले—’मेरा शिरसा वन्दन स्वीकार करें देवी।’ उन्होंने करबद्ध हो जर सिर रख दिया उनके पदोंके समीप ।

‘अतिथि भगवत्स्वरूप होते हैं भगवन् ।’–देवीने हाथ जोड़ विनम्र निवेदन किया।

‘यदि अपात्र न समझा गया होऊँ, तो देवीका महत् काम्य जान सकता हूँ ? ‘

‘आप तो विश्वेशके मनकी संज्ञा पाते हैं भगवन्! आपसे अलक्ष्य क्या है ? यदि मेरे ही मुखसे जानना चाहते हैं तो – अखिल ब्रह्माण्डनायकने धरापर अवतीर्ण होनेका संकल्प लिया है।’

उन्होंने सिर नीचा किये हाथ जोड़े हुए संकुचित धीमें स्वरमें कहा-‘उनका सानिध्य सेवा बिना प्रेमके मिले भी तो वह…. वह….
‘ उनका स्वर डूबने लगा, सम्हलकर बोलीं- ‘और प्रेम भक्ति-तप साध्य नहीं प्रभु ! उनकी अनुकम्पा ही साध्य है- आशा है। प्रयत्न प्रतिक्षा ही तो बसमें है। वे करुणावरुणालय आनंदघन कृपा करें…. आगेके शब्द वाष्परुद्ध कंठ और आँसुओंमें विलीन हो गये हैं।

देवर्षिने पुनः भूमिपर सिर धरकर उस स्निग्ध, कोमल, ज्योतिर्मय और ज्ञानघनवपुको नमनकर कुछ क्षण भूले रहे अपनेको और फिर मंत्र कीलितसे उठकर चल दिये।

इसके पश्चात् कितना समय व्यतीत हुआ ज्ञात नहीं। देवीका तप और लगन बढ़ते रहे। उनके ध्यानावस्थित अर्धनिमिलित नेत्रोंसे बूंदें झरती रहतीं, देह रोमांच-कंटकित रहता। कभी वे अत्यधिक शीतधिक्यसे प्रकंपित होती और कभी आतपतप्त-सी स्वेद धाराओंसे स्नात हो उठतीं । विभिन्न ऋतुयें मानो उनकी देहमें प्रतिफलित दिखायी देंती कि एक दिन प्रातः ही देवीके मुखसे भावविगलित स्वर निसृत हुआ—

‘श्रीकृष्ण…. गोविन्द….. दा. मो. द. र. मा. ध व श्याम सु. न्द र…. ।’ उन दीर्घ दृगों में जैसे आँसुओंकी बाढ़ आ गयी।

हम सब दौड़कर समीप आ गयीं। क्रियाने अश्रु मार्जनके लिये जैसे ही उनका स्पर्श किया, एक हलकासा धक्का लगा उसे और उसकी अवस्था भी देवी सदृश हो गयी। उसे और देवीको सम्हालने के प्रयत्न स्वरूप स्पर्श से सबकी दशा एक-सी हो गयी। सभी प्रकम्पित कंटकित देह – वाष्परुद्ध कंठ-अश्रुमाल पिरोते नेत्र- उठते-गिरते गद्गद स्वरमें गाने लगीं– ‘गोविंद…. दामोदर…. माधव… केशव कृष्ण कृष्ण… कृष्ण… कृष्ण कृष्ण…।’

किसीको भी बाह्य चेतना न थी। ऋचाके नेत्र झरने लगे, देह प्रबल प्रभंजनसे कंपित वृक्ष-सी डोलने लगी और उत्थित रोमकूपोंसे स्वेदधारा बहकर वस्त्र आर्द्र करने लगीं। जिह्वा लटपटे स्वरमें ‘गोविन्द…. दामोदर माधव….’ की आवृत्ति करने लगीं। कुछ देर बाद सम्हलकर उसने अपनी पलकें झुका लिये। कितना समय इस आनन्द सागरमें डूबते-उतराते बीता, जाननेका उपाय नहीं था।

‘देवीने ही प्रकृतिस्थ हो हमें बताया कि वे सफल मनोरथ हुई हैं। और क्या कहूँ बहिन!’—ऋचा ने थके स्वरमें पूछा।

‘अखिल ब्रह्माण्डनायक! श्यामसुन्दर ! देवी वृषभानुजा और हम सब कृतकाम्य होंगी? उनका प्रेम, यह कात्यायनी व्रत और…. ‘

‘इला!’ ऋचा गम्भीर होकर दूर क्षितिजकी ओर देखने लगी- ‘देवी वृषभानुजा उनकी अभिन्न स्वरूपा हैं। श्यामसुन्दरकी दया कृपा करुणा प्रेमकी घनीभूत स्वरूप ही श्रीकिशोरी जू है। हम सब कृतकाम्य है इनका सानिध्य, सेवा और दर्शन पाकर इससे बढ़कर ब्रह्माण्डमें कुछ भी स्पृहा योग्य नहीं है किन्तु.

‘किन्तु क्या बहिन ?”

प्रेमका चरम विकास परिपाक ‘विरह’ में ही होता है। ‘यह सम्भव नहीं बहिन! अन्यथा व्रज महा श्मशानमें परिवर्तित हो जायेगा। कृपाकर ऐसी भविष्यवाणी न करना।’

‘नहीं करूँगी बहिन! बसना उजड़ना भविष्यवाणीपर नही, किसीकी इच्छापर निर्भर है। पहले कौन क्या था, आगे क्या होगा इसका विचार छोड़ सम्मुखके रस-सागरमें अवगाहन ही महत्वपूर्ण है। अतः यही करो बहिन! यही करो। आजकी इस रसहीन चर्चाको भूल जाओ।’

आह! कितना समय व्यर्थ गया…. श्रीराधे करुणामयी! ऐसा अवसर न आये…. न… आये…. ।

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-20



अनाम अनुभूति

कौन है यह ? कहाँसे इस पथपर कहाँ जानेके लिये कब आयी थी और अब दिग्भ्रमित सी रह-रहकर चारों ओर दृष्टि पसारकर किसे खोज रही है? कभी अधीर हो इस दिशा और कभी उस दिशाकी ओर दौड़ पड़ती है। कभी आत्महारा-सी बैठती अथवा गिर पड़ती है।

सम्भवतः वह स्वयं नहीं जानती कि क्या कर रही है। उसे तो केवल
इतना स्मरण है कि — ‘ क्षण मात्रमें उसके जीवनमें प्रलय घटित हो गया, कैसे भला ?
उसके स्मृति पटलपर केवल दो आकर्ण-चुम्बित कारे-कजरारे दीर्घ दृग हैं। उसके आगे-आगे चलनेवाले किशोरने मुड़कर उसकी ओर देखा; और बस थम गयी सृष्टि
आह! क्या था उस दृष्टिमें कि क्षण मात्रमें उसके सुखी संसारमें प्रलय उपस्थित हो गया ?”

आशा, अभिलाषा, हँसी-खुशीको निर्दयता पूर्वक मिटाकर हृदयमें उतार दी गहरी पीड़ा भरी कसक, जो न जीने देती है और न मरनेका ही अवकाश प्रदान करती है। उस दृष्टिके आघात; हाँ आघात ही तो कहना होगा। यद्यपि इस आघातकी अनुभूति इतनी सरस स्निग्ध, कि सम्भवतः सृष्टिको सम्पूर्ण कोमल अनुभूतियाँ इसकी समतामें हार जाय !

हाँ, तो उस दृष्टिके आघातसे घायल वह भरभराकर बैठ पड़ी; बैठी अथवा गिरी कहा नहीं जा सकता, किंतु इस क्रियाके मध्य ही एक मधु मुस्कानने उसके सद्यः लगे गहरे घावपर क्षारका गाढ़ा लेप कर दिया। हृदय आर्तनाद कर उठा, पर दृढ़तासे भींचे अधरोंके पीछे ही वह घुट गया,
‘आह’ का हल्का-सा स्वर भी उन कपाटोंका अतिक्रमण नहीं कर सका।

उस सहायक विहीन प्रदेशमें पीड़ासे छटपटाते हृदयपर हाथ धर वह घुटनों में सिर दे सिसक पड़ी।
किसे कहें?
वहाँ था ही कौन ?
कोई होता भी तो क्या कह पाती ? और सान्त्वना ? नहीं;
मरणकी विभिषिका उससे कही अधिक सरल सह्य होगी।

यों भी सिरपर तना नील वितान-सा गगन, हरितिमा संकुल वसुधा और समीप ही प्रवाहित सरिताकी नीलधारा ही उसकी इस लज्जाजनक स्थितिके मानो साक्षी है। उस एक ही क्षणमें मानो उसका अस्तित्व लोप हो गया। अविराम चलती साँस और हृदयकी धड़कन भी जैसे थम गयीं। मन-बुद्धि किस ओर भाग छूटे जाननेका कोई उपाय नहीं रहा। उस अनाम पीड़ासे अवश हो वह धरणीपर लोट गयी।

कितने समयतक वह ऐसी अर्ध चेतनावस्थामें पड़ी आँसू बहाती रही, कौन बताये ?
धीरेसे उसने सिर उठाया,
अनायास बहे आँसुओंसे पुनीत हुए। रजकणोंने उसके मुखपर विचित्र – सी अल्पनाका चित्रण कर दिया था।

अहा हा इतने पर भी इस भलि धसरित, असता जदय, वाह-दग्ध और
मलीन अवस्थामें भी यदि कोई उसे देखता तो निश्चित ही सुन्दरी कहता।

वस्त्रों के धानी रंगमें उसका अपना वर्ण भी घुल गया था। वे काले विशाल नेत्र अवश्य ही किसी मृगवधूका सरस उपहार रहे होंगे, जो निरंतर मुक्तादानसे धराको धन्य कर रहे थे। उसके नखशिख वर्णनके समय कवि अवश्य ही उपमा ढूँढ़ने में कठिनायी अनुभव करेंगे।

यौवनकी देहरीपर धरनेको उठा हुआ आयुका चरण, स्वभावके भोलेपन, कैशौर्यकी चंचलता और देहकी स्निग्ध-कोमलतासे सहमकर जैसे ठिठक गया हो। अपने महार्घ सौंदर्यसे अनभिज्ञ उसने बड़ी-बड़ी सुकोमल अश्रुसिक्त पलकें उठाकर देखा तो लगा- सम्पूर्ण सृष्टि अग्निमुखव्यक्तग्रास हो ।

किसी ओर त्राण न पाकर असंयत हो उसने मस्तक पुनः वसुधाके वक्षपर धर दिया। देखकर लगता है बड़ी तेजस्विनी रही होगी वह ऐसी आत्महारा दीनता उसके स्वभावके सर्वथा प्रतिकूल ही रही होगी। तभी तो स्वयंको संयत न कर पानेपर भी हृदयसे उठनेवाली असह्य पीड़ा भरी आहों कराहोंको अधरों तक पहुँचनेसे पूर्व ही वह बरबस भीतर ठेल देती है।

किंतु इन नेत्रों का क्या करे वह…. ?
ये घर-भेदी तो पलकोंकी आन मानते नहीं। इनसे बरसती ये मोटी-मोटी बूँदे, जो धारा बनकर वक्षावरण भिगोती जा रही है। कैसे रोके इन्हें! कैसे…. ?

तब जैसे अपनेसे ही छिपाने के प्रयासमें अश्रुजलसे भीगे रजकणोंपर सिर धर दिया।
किंतु यों शांत पड़ा रहना भी कितनों भाग्यशालियोंके भालपर अंकित होता है? उसकी भी भाग्यलिपि इस सौभाग्यसे वंचित ही लगती थी। अतः लड़खड़ाती सी उठी और पथ-पार्श्वमें आ खड़ी हुई। सूने पथपर खोयी दृष्टिसे दूरतक कुछ समय जाने क्या खोजती रही, फिर निराशा थकी दृष्टि लौटकर पथपर अपने ही पदोंके समीप ठहर गयी। पथ वीथिने सम्भवतः उसका उपकार करनेके लिये ही उस निर्मम अहेरीके चरणचिन्ह अपने वक्षपर अंकितकर लिये थे। उन चिन्होंको कृपणके धनकी भाँति बाँहोंमें भर लेना चाहती हो अथवा धराका आभार प्रकटकर रही हो-बाहें फैलाकर वह लोट गयी, उस पदरज पर।

भगीरथ प्रयत्नसे बाँधे गये धैर्यके बाँधको आवेग भरे आँसुओंके पनारोंने ध्वस्त कर दिया। घायल हृदयकी कथा कहती-मरते पशुकै आर्तनाद-सी गहरी घुटी घुटी कराह मुखसे फूट पड़ी। रुदनके वेगसे सुकोमल देह झटके
खाने लगी।

किंतु कब तक?

कैसे ज्ञात हो ? जाननेका कोई उपाय जो नहीं।

कब अंशुमाली देवी प्रतीचिके रागारुण मुखपर झुक गये, कब नवीन प्रणयीसे मयंक सलज्ज निशाका कर थाम तारक खचित व्योम पथपर बढ़ चले। और कितनी बार इनके रागकी आवृत्ति हुई, कौन कहे ?

नेत्रों में आशा, हृदयमें अवसादका भार लिये वह कितनी बार पथके इधर-उधर दौड़ पड़ी ?
कितनी बार चरणाकिंत रजसे स्वयंको स्नात किया उसमें लुंठित हुई ?
कितनी बार जड़-सी पथ जोहते बैठी रही?
कितनी बार आकुल हो पुकार उठनेको तत्पर हुई!
‘किंतु क्या कहकर ?’–
यह विवशता कितनी बार नेत्रोंसे झर पड़ी? नयन कटारसे घायल वह कितनी तड़फड़ायी और उस मधु-मुस्कानपर मुग्धसे निमिलित नयन कितने समयतक समाधिमें लीन-सी बैठी रही, कौन बताये ?

आह! इस विवशताका, इस हलाहल दुःख भरे सुखका, इस कठिन अवस्थाका कोई तो नाम होगा?

लज्जाके झीने वस्त्रको निर्दयता पूर्वक फाड़कर चिथड़ेकर देनेवाली, अहंकारको चूर्णकर हवामें उड़ा देनेवाली इस कोमल कठिन अनुभूतिकी कोई तो संज्ञा होगी, जिसने इस कोमलांगी किशोरीको उन्मादिनी बना दिया है।

हृदयका दावानल उसके निर्बल प्रयत्नोंसे बुझनेके स्थानपर और भभक भभक उठता है; क्या करे वह…. ? अकस्मात् धक-धक जलते हुए हृदय प्राँगणमें जैसे चंदनपंककी वर्षा हुई; सम्भवतः भाग्यके अधिदेव उसकी दशापर सदय हुए; गहन-काननके अंतरालको भेद मृदु-मंद्र आरोह-अवरोह युक्त सुहाना वंशीरव प्रकृतिको नवजीवन प्रदान करता प्रसारित होने लगा।
बुद्धिने जाने किधरसे आकर सहायिका स्वांग-सा भरते हुए धीरेसे सूचना दी- उस जीवरक्षौषधिका भी दक्षिण कर वंशी विभुषित था।

वह चमत्कृत-सी उठकर दौड़ पड़ी, उस प्राण-संजीवन स्वरकी दिशामें! दूर; कितनी कैसे कहा जाय ?

वे सुकोमल पदतल जो हरित दुर्वा अथवा नवकिसलयोंके स्पर्शसे भी पीड़ाका अनुभव करते होंगे कितनी बार कंटक-बिद्ध हुए, कितनी बार ठोकर खाकर गिरी, कितने क्षत पथ-रोड़ोंने दिये; उसे स्वयं स्मरण नहीं है। उसकी वह झीनी ओढ़नी किस झाड़ीमें फंसकर अपना कुछ भाग उसे ही समर्पित कर आयी- वह नहीं जानती।

प्राणोंकी समस्त चेतना कणमें आ समायी है और आशाका प्रबल प्रभञ्जन उसे उड़ाये-दौड़ाये लिये जा रहा है। एक सघन वृक्षतक आकर चरण स्वतः ही ठहर गये। ध्वनी इसी वृक्षके दूसरी ओरसे आ रही थी, किंतु यह क्या…. !

गन्तव्य जब दो ही पद दूर रह गया – पद भारी होकर मानो धरासे चिपक गये जैसे! जाने कहाँ दुबककर बैठी बैरिन लज्जा और संकोचने उसे अपने बाहुपाशमें जकड़ लिया। प्राण व्याकुल हो हाहाकार कर उठे और वह मूर्च्छित हो धरापर जा गिरी।

ऐसे अवसरोंपर मूर्छा अचूक औषधि सिद्ध होती है। किंतु पीड़ा ही जिसका स्वत्व बनी हो, वहाँ अचेतावस्था कितने समय टिक पायेगी ?

आँखें खुली तो कुछ क्षण लगे यह समझने में कि क्या हुआ है ? वंशीध्वनि विरमित हो चुकी थी, अतः उसे केवल इतना स्मरण आया- ‘कुछ था ! जिसके लिये वह व्याकुल हो दौड़ रही थी। ‘

‘क्या था वह ?’ – स्वयंसे प्रश्न किया उसने

उत्तरमें—’वे रसवर्षी पद्मदलायत दीर्घ दृग, नवपल्लवसे करतल पदतल, मधुमुस्कान और उसके अपने हृदयमें सुलगता धीमा दाह…. ।

‘ धीरे-धीरे स्मृति पटलपर चलचित्र सा घूम गया सब लज्जाके अंकपाशसे मुक्त हुई तो उठकर चल पड़ी।

किधर ? ज्ञात नहीं!

चार छ: पद बढ़नेपर वह फिर ठिठक गयी दो सघन वृक्षों बीच भूमितलसे उभरी शिलापर वह खड़ा था। हृदय धक्से रह गया। प्राणोंने पूछा-

‘क्या सचमुच ?’

बुद्धिने मुस्कराकर उत्तर दिया- ‘हाँ!

वही प्राण-प्रलयंकर है

‘ ‘क्या मेरा ?’ उसने चकित हो प्रश्न किया और स्वयं भी उत्तर दिया

‘हाँ! मेरा…. मेरा…. मेरा! और मैं उनकी…. उनकी…. भवोभव उनकी….।’

दृष्टि उठाकर देखा—’वही मंद समीरसे झूमता मयूरपिच्छ, फहराता पीतपट, सिंह शावक-सी कटि, शोभाकी सीमा स्पृहाका लक्ष्य स्थल वक्ष वृषभ स्कन्ध, कम्बु कंठ, सुघड़ सुढार प्रवाल अधरपल्लव….!

हृदयगति सीमा लाँघने लगी- देह शिथिल होने लगी तभी दृष्टि उन दोधारी कटार से नेत्रों पर जा टिकी-

‘आ…. ह…. ! वधिक भी क्या इतना सुन्दर मधुर रसमय होता है ?
प्राणों में विप्लव मचाकर, भगवान् पद्मसम्भव के समस्त परिश्रमपर पानी फेर- उनकी विपणविधिको ही जलाकर रखकर देनेवाला हलाहल कालकूट भी कभी इतना मधुर इतना प्राणोपम प्रिय होता है ?’

हृदय उछलकर बाहर आ कूदनेको मानो आतुर हो उठा प्राण पिघलकर अस्तित्व खोने लगे। मन! हाँ, यह जन्मका बैरी मन! यह कहाँ देहकी दुरवस्था देखता है; यह तो बस ठेलना ही जानता है। किंतु दुरंत लज्जा इससे अधिक बलशालिनी सिद्ध हुई। उसने उठनेको तत्पर पदोंको बाँध लिया।

बुद्धिने तुरंत निर्णय दिया-

‘यह तो विग्रह है; देख ध्यानसे!

भगवान् भूमितिलक देवी प्रतीचिका निराजन-अर्चन स्वीकार करने उनके भवन द्वारपर उपस्थित थे। उनका बिम्ब विग्रहके ठीक पीछे प्रकाश वलय सा शोभित था। सान्ध्य-मंद प्रकाशमें विस्फारित नेत्रोंसे उसने देखा- हाँ सचमुच यह तो नीलमणि निर्मित प्रतिमा ही है।’

अहा, कैसी तत्सम सजीव-सी निर्माताके कौशलपर वह न्यौछावर हो…. हो गयी। लज्जा अबतक प्रताड़ित हो कहीं दूर जा बैठी थी वह दौड़कर उन चरणोंसे लिपट गयी। उसके भूलुंठित सघन जानुचुम्बित कृष्णकेशपाश; लगता था मानो कालिन्दीकी नील धारायें उमड़कर विग्रहके चरण प्रक्षालन कर रही हों।

‘तुम…. तुम… कौन हो?
”कैसे कैसे.. पाऊँ… तुम्हें ?
यह….. यह…. क्या…. किया…. तुमने ?’– उमड़ते रुदनकी बाढ़से वापरुद्ध कंठ हृदयके उद्गारोंको घुटे-घुटे स्वरमें अटक-अटककर वाणी प्रदान करनेकी चेष्टा कर रहा था।

‘मैंने… क्या…. बि…. गा… डा. था.. तु. म्हा…रा… …. तु…म…बि…न… कैसे…. जी… ऊँ ,,,अ ब ?
अ. ब… कै….से…. कि…सी…को… अ… प… ना. य… ह… क..लं. कि….त… मु…ख… दि. खा. ऊँ !
तु म्हे दे. खे… बि. ना. म…रा…. भी…. न….हीं…. जा… ता…. ।
म र. ना. तो…. हो….गा…. ही…., अ… न्य… था…. !
ए… क… बा… र… आ….ह…. ए… क… बा….र….. के… व. ल… ए… क… बा. र… दे….ख… लूँ.. जी….. भ… र… क. र. तो… म. र. ना. स. ह. ज… हो..गा…!
जी….वि….त… र. ह. ना. तो उ,,,. स.,,, से. ,,,,भी.,,, अ,,,,. धि क….. दुष्क…र… है।’
वह बेहाल हो हिचिकियोंके मध्य कहती जा रही थी।

तुम…. ! …तु….म… क्यों आ ग. ये मे रे सु. खी …स….र…. ल… जी व न… में… ?

मैं क्या करूँ !
क्या करूँ मैं? क… हाँ… जा..ऊँ. मैं ? क. हाँ. से. पा…ऊँ…..
तु….म्हें…. ?
क्या… क…ह…. क…र.., कै. से. पु. का. रूँ.. तु… म्हें…. ?

कृ. पा. प र व स क र दे… व….ह…. स्व… र… कै…से… पा…. ऊँ ? तु….म…. कै… से…. जा. नो…गे. कि… मैं. कि. स. कि…स…..
वि. प. त्ति में फं. स. ग. यी हूँ….. ।

मैं… क्या…. क… रूँ ? तु म्हा…री… ए. क….. चि..त. व. न. ने. वि. प. त्ति के कै से. भ. यं. क. र….. आ.व….र्त… मे…. फं…सा… दि… या… है. मुझे…. ।

तुम…. क्या…. जा…नो. कि. मे रे. प्रा. णों….की…. डो….री….. तु म्हा रे च र णों में उ ल झ ग यी है।
मैं…. क्या… क… रूँ… हा…. नाथ! हा प्रिय !-

अकस्मात उसके रूंधे कंठका करुण स्वर कंठ गहरमें ही घुट गया। विग्रहको सहलाते कंपितकर ठहर गये और पाटल पंखुरीसे थरथराते अधर खुले के खुले रह गये।

उसे लगा— ‘विग्रह सचेतन है…।’ भावोंके आवेगसे अनुभव खो गया था किंतु धीरे-धीरे जब आवेग घटा अथवा बाहर निकला तो बुद्धिकी सूचना रंग
लायी-
‘विग्रह सचेतन है। इसके अंगोंमें प्रस्तर अथवा रत्न प्रतिमार्क नहीं है। और…. और…. उसके…. अपने…. सिरपर किसीका स्नेह-हस्त संचरित है….। हृदय आनंद, आश्चर्य और लज्जासे धड़कना भूल गया क्या करे…. वह…. ?
अब…. अपना…. यह…. लज्जारुण…. मुख… लेकर… कहाँ…..
किस…. विवरमें… जा… समाये ?

निस्पन्द-सी वह उन चरणोंमें पड़ी रही, उठकर भागनेकी भी क्षमता देहमें नहीं रही। दो सबल बाहुओंने उसे उठाकर खड़ा कर दिया, पर कम्पित देहका भार पद सम्हाल नहीं पा रहे थे, अतः वही बाहु सम्बल दिये थीं।

बंद नेत्रों से प्रवाहित वारिधारा जैसे विरमित होना नहीं चाहती हो । एक बार पुनः जैसे देह धर्म सहित समय ठहर गया….। ललाटपर अधर स्पर्शके साथ ही सुगन्धित श्वासवायुका अनुभव हुआ और पलक पंखुरियाँ उघड़ गयी सम्मुख सौन्दर्य पारावार लहरा रहा था…. । वे दृग कमल….! क्या है उनमें ?

आनन्द, अपनत्व, प्रेम और वह सब जिसे भाषाकी अल्प-क्षमता अभिव्यक्ति नहीं दे पाती उस अनन्त स्नेह सागरकी थाह न पाकर उसके अवश नेत्र पुनः मुँद गये तो सुदृढ़ भुजाओंके आवेण्ठनने वक्षको दबा लिया। मुख उनकी ग्रीवासे जा लगा-

‘ओह! यह देह गंध…. ?’

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-19



दिन दुलहा दिन दुलहिन राधा नंदकिशोर

सखियों! सबके विवाह हो गये, किंतु जिनका विवाह देखनेको नयन तृषित हैं, उनका न जाने क्यों विधाताको स्मरण ही नहीं होता।’

गोपकुमारियाँ सिरपर घड़े और हाथमें वस्त्र लिये जमुनाकी ओर जा रही थी। चलते-चलते चित्राने यह बात कही तो उत्तरमें इला बोली-

‘अरी बहिन! बड़े भाई के कुमारे रहते, छोटे भाईका विवाह कैसे हो! इसी संकोचके मारे नंदबाबा अपने लालाका विवाह नहीं कर रहे,,,

‘अहो, इला जीजी तो बहुत शास्त्र जानती है। किंतु दोनों सगे भाई तो नहीं कि नंदकुमारको परिवेत्ता होनेका दोष लगे!’- नंदाने हँसकर कहा।

‘सगे न सही। किंतु बाबा महा संकोची हैं। वे तबतक श्यामसुंदरका विवाह नहीं करेंगे जबतक दाऊ दादाका विवाह न हो जाय अथवा उन्हें उनके पिता वसुदेवजी मथुरा न बुला लें। पहले कंसने उनके ढेर सारे बालक मार दिये हैं, अब दाऊजी यहाँसे बड़े बलवान बनके जायेंगे और कंसको मारकर, माता पिताको सुख देंगे। अभी तो वे कंससे छिपकर यहाँ रह रहे हैं।’ इलाने गम्भीरता से कहा।

‘तबतक क्या श्रीकिशोरी जू कुमारी ही रहेंगी!’– नंदाने आश्चर्य व्यक्त किया।

‘और नहीं तो क्या ?’ विद्या हँस पड़ी-

‘सगाई तो हो चुकी अब विलम्बके भयसे सगाई तोड़े वृषभानुराय; यह सम्भव नहीं लगता! अतः जबतक श्याम कुमारे तबतक श्री जू कुमारी!”

यह तो महा-अनरथ – अनहोनी होगी अहिरोंकी बेटी तो घुटनोंके बल चलनेके साथ ही सुसरालका मुँह देख लेती है। सच है बहिन! पर अब क्या हो, कठिनाई ही ऐसी आन पड़ी है।

अच्छा जीजी! क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बड़े जब उनका अवकाश हो, तब उनका विवाह करें। हम अपने ढंगसे उनका विवाह रचकर नेत्रोंकी प्यास बुझा लें। क्षमाने इन्दुलेखाजीसे कहा; तो अनेक कंठोंने समर्थन किया हर्षपूर्वक ‘विवाहका खेल कैसे खेला जा सकता है मेरी बहिन!’ – इन्दुलेखा जीजीने स्नेहसे क्षमाकी ठोड़ी छूकर कहा।

‘क्यों नहीं जीजी! जब कभी-न-कभी उनका विवाह निश्चित है, तो फिर खेलमें विवाह निषेध कैसे क्यों ? ‘ क्षमाने युक्ति प्रस्तुत की। ‘अच्छा बहिन! मैं तेरी बात बरसानेकी बहिनों को बताऊँगी।

जीजी हँसकर बोलीं।

‘बरसानेकी बहिनों से भी समर्थन प्राप्त हुआ और वह धन्य क्षण आया। दुःख यही है कि तुम ननिहाल थी कला! यह उत्सव देख न सकीं।’ उत्तरमें कलाके नयन झर झर बरस उठे—’मेरा दुर्भाग्य ही मुझे यहाँसे दूर ले

गया था बहिन! नयन अभागे ही रहे, वह सौभाग्य तुम्हारी कृपासे कर्ण प्राप्त करें।”

‘सुन सखी! जब सब बहिनें और श्यामसुंदरके सखा भी सहमत हो
गये, तो हमने अक्षय तृतीयाकी गोधूलि बेला विवाह के लिये निश्चित की।

श्रीराधा-कृष्णका शृंगार हुआ
गिरिराजकी तलहटीमें मालती-कुंजमें लग्न मंडप बना। गणपति पूजनके पश्चात दोनों मंडपमें बिराजित हुए। उस छविका वर्णन कैसे करूँ सखी! दोनों ही एक-दूसरे की शोभा देखना चाहते थे, अतः ललचाकर दोनों हीके नयन तिरछे हो जाते; किंतु लज्जा और संकोचके मारे दृष्टि ठहर नहीं पाती थी। दोनोंके माथे पे मोर और मोतीकी लड़ियाँ शोभित थीं। किशोरीजीका मुख घड़ीमें आरक्त हो उठता, सदाके मुखर कान्ह जू भी उस दिन सकुचायेसे बैठे थे।’

‘मधुमंगलने दोनों ओर का पौरोहित्य निभाया सदाके मसखरे मधुमंगलको धीर गम्भीर स्वरमें पाठ और शाखोच्चार करते देख विश्वास नहीं हो पा रहा था कि यह यही चिढ़ने-चिढ़ानेवाला मधुमंगल है।’☺️

‘कन्यादानके समय एक आश्चर्य भयो! न जाने कहाँ ते एक बूढ़ा ब्राह्मण यह सौभाग्य मुझे आ पहुँचो, अपनी काँपती वाणीमें हाथ जोड़कर बोला- प्रदान हो! उसे देखते ही राधा-कृष्णने खड़े होकर प्रणाम किया और सिर हिलाकर उसकी प्रार्थना स्वीकार की।

‘उस बेचारे की दशा देखतीं तुम! रोमोत्थानसे काँपती देह सिथिल वाणीसे निकलता मन्त्र पाठ और नयनों से झरता प्रवाह जब पान सुपारी, श्रीफल, पुष्प और दक्षिणाके साथ उसने किशोरीजीका कर श्यामसुंदरके हाथमें दिया तो तीनों ही की देह हल्की सिहरन से थरथरा उठी। सखियाँ मंगलगान और सखा विनोद करना भूल गये।

मधुमंगलकी वाणी वाष्परुद्ध हो कंठमें ही गोते खाने लगी। मानो सबके सब चित्रलिखे से रह गये।’

‘अब भांवरकी शोभा कैसे कहूँ…. !’-कहते-कहते क्षमाको रोमांच हुआ और वाणी तथा देह एक साथ कंटकित हो विराम पा गयी।

क्षमाके चुप होते ही कलाकी आकुल-व्याकुल दृष्टि ऊपर उठी गद्गद स्वर फूटा-
‘भांवर…. भांवर कैसे हुई बहिन ?’
वह उतावलीसे बोली
‘मेरे तृषित कर्णौको तृति प्रदान करो बहिन!’

कुछ क्षण पश्चात संयत होकर क्षमा बोली- ‘बहिन! उस शोभाका वर्णन करनेको मेरे पास तो क्या; वागीश्वरीके समीप भी शब्दोंका अभाव ही होगा! भांवरके पश्चात हम उन्हें निकुंज भवनमें ले गयी।’

‘उस बूढ़े ब्राह्मणका क्या हुआ- कौन था वह ?’– कलाने पूछा।

‘विवाहके पश्चात प्रणामकरके दम्पतिने उसे दक्षिणाकी पृच्छा की। न
जाने कैसा ब्राह्मण था वह, बहुत देर तक आँसू बहाते हुए हाथ जोड़कर न जाने क्या-क्या कहता रहा, एक भी शब्द हमारी समझमें नहीं आया। सम्भवतः वह कोई अनुपम वरदान चाहता था। क्योंकि अंतमें जब वह प्रणामके लिये भूमिष्ठ हुआ तो श्यामसुंदरने उसे उठाकर ‘तथास्तु’ कहा।’

‘निकुञ्ज भवनमें दोनों को सिंहासनपर विराजमान करके दो सखियाँ चँवर डुलाने लगी। ललिता जीजीने चरण धोकर हाथों का प्रक्षालन करा आचमन कराया। वर वधु किसी कारण इधर-उधर देखते तो लगता मानो नयन श्रवणोंसे कोई गुप्त बात करने त्वरापूर्वक उनके समीप जा लौट आये हैं। आचमनके अनन्तर षट्स भोजनका थाल सम्मुख धरा। विशाखा जू श्यामसुन्दरको और ललिता जू श्री किशोरी जू को मनुहार देना सिखा रही थीं। ‘

‘प्रथम, श्यामसुन्दरने मिठाईका छोटा-सा ग्रास श्रीकिशोरीजीके मुख में दिया; मानो कोई नाग अपनी विष ज्वाला न्यून करने हेतु चन्द्रमासे अमृत याचना करते हुए अर्घ्य अर्पित कर रहा हो। इसी प्रकार श्रीकिशोरी जू ने भी मिठाईका छोटा-सा ग्रास श्यामसुंदरके मुखमें दिया ऐसा लगा मानो नाल सहित कमलने ऊपर उठकर उषाकालीन सूर्यकी अभ्यर्थना की हो।’

कलाके अधखुले नयन मुक्ता-वर्षणकर रहे थे। खुले काँपते अधरपुटोंसे धवल दन्तपंक्तिकी हल्की-सी झलक मिल जाती प्रत्येक रोम उत्थित हो, मानो अपनी स्वामिनीकी अंतरकथा कहनेको आतुर हो उठा। क्षमा समझ गयी कला राधा-कृष्णकी ब्याह लीला देखने में निमग्न है।

‘सुन कला! ध्यान फिर कर लेना अभी श्रवण सार्थक कर ले बहिन।’—
क्षमाने उसके कंधे हिलाये। उसके नयन उघड़े, तो भीतर भरा जल ऐसे झर पड़ा जैसे दो सुक्तियोंने मुक्ता वर्षण किया हो ।

‘आगे?’–
उस दृष्टिने प्रश्न किया और क्षमा कहने लगी-

‘भोजनके पश्चात् इलाने हस्त-प्रक्षालन कराया ताम्बूल अर्पण किया। यह लो आ गयी इला भी, अब तुम्ही आगे की बात सुनाओ बहिन!’

क्या कहुँ बहिन! सबकी सेवा निश्चित हो गयी थी, पर सखियोंने कृपाकरके मुझे अवसर दिया। अपनी दशा क्या कहुँ ! हाथोंका कम्प, नेत्रों के अश्रु और कंठके स्वर; सब मिलकर मुझे स्थिर अस्थिर करनेको मानो कटिबद्ध थे। किंतु सेवाका सौभाग्य भी तो कोई छोटा न था! श्यामसुंदरने अपने हाथसे ताम्बूल श्रीजूके मुखमें दिया और उन्होंने श्यामसुन्दरके मुखमें क्या कहुँ सखी! लाजके भारसे श्रीजूकी पलकें उठ नहीं पा रही थी, पर मन निरन्तर दर्शनको आतुर था! वे कोमल अनियारे झुके-झुके नयनकंज बार-बार तिरछे होकर मुड़ जाते। श्याम जू की जिह्वा भी आज सकुचायी-सी थी ।

चन्द्रावली जू और ललिता जू ने दोनोंसे कहा- ‘नेक समीप है के बिराजो स्याम जू! नहीं तो सदा आँतरो रहेगो बीच में।’ सुनकर सब सखियां हँस पड़ी थी। श्यामसुन्दर कुछ कहनेको हुए, पर कसमसा कर चुप हो गये।

‘क्या बात है, आज बोल नहीं फूट रहा मुखसे; जसुदा जू ने बोलना नहीं सिखाया

बोलना तो आता है सखी! पर तुम मुझे गँवार कहोगी, इसी भयसे चुप हो रहा।’

‘अच्छा स्याम जू! क्या कहना चाहते थे भला?”☺️

‘जाने दो सखी; कुछ नहीं! तुम्हारी बकर-बकर सुनकर मौन हो जाना ही शुभ है।’ –

श्यामसुन्दरकी बात सुनकर सब हँस पड़ी। इसके पश्चात् आरती हुई ढ़ोल-मृदंग-वीणा-पखावजके साथ सखियोंके स्वर गूँज उठे–

‘आरति मुरलीधर मोहन की प्राणप्रिया संग सोहन की।’

उस समयकी शोभा कैसे कहूँ…. देखते ही बनती थी। शंख जलके छोटे पड़े तो चेत हुआ तथा इसके पश्चात गाना बजाना और नृत्य हुए।☺️

इन्दुलेखा जीजीके नृत्यके पश्चात चन्द्रावलीजूने कहा-
‘मोहन!अब तुम दोनोंके गाने नाचनेकी बारी है।’

युगल जोड़ीने तिरछे नयनोंसे एक दूसरे की ओर देखा। किशोरीजीने लजाकर पलके झुका लीं पर श्यामसुंदर हँसकर बोले-
‘मैं क्या छोरी हूँ सखी ? यह सब काम तो तुम्हीं को शोभा देते हैं; मुझे तो गाना-नाचना आता नहीं।’☺️

“अहा…. हा, भली कही!’-
चन्द्रावलीज़ बोली

‘हमने तो कभी देखा सुना ही नहीं न! अरे तुम तो हमसे भी सुन्दर नृत्य-गायन करते हो। तुम्हारी ये बातें यहाँ नहीं चलेंगी।’- कहकर उन्होंने उनके हाथ पकड़कर सिंहासन से उतार दिया,

इसी प्रकार ललिताजीने श्री जू को सहारा दिया। बीचमें राधा श्यामको अवस्थित करके हम सब चन्द्राकर स्थित हुई।☺️

‘वैकुण्ठ हूँ ते प्यारो मेरो यह वृंदावनधाम।’–

श्यामसुंदरके आलाप लेते ही, वाद्य मुखर हो उठे; अन्य सब हाथोंसे ताल देने लगीं। दोनोंकी सम्मलित स्वर – माधुरी और नृत्य देखकर हमारे नेत्र धन्य हुए; हम कृतकृत्य हुईं ।

‘सखी! अनेकों बार हमने अलग-अलग इनका नृत्य गान सुना है, किंतु यह माधुर्य, नेत्र चालन, हस्त मुद्रायें, निर्दोष पद-चालन और अंग विलास, स्वर ताल और भाव-वेष्ठित यह युगल…. ।’

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-18



तुव अधीन सदा हौं तो हे श्रीराधे प्राणाधार

‘किशोरीजी ! आज स्वर्ण कलशी छोड़कर यह माटीकी मटकिया क्यों ?”

‘सखी! मिट्टीकी गागरके जलसे कुल देवी प्रसन्न होंगी।’— श्रीकिशोरीजीने मुस्करा कर अपने सहज मधुर स्वरमें कहा।

हम सब घाटपर जल भरने आयीं थी सम्मुख पुष्पित कदम्बके नीचे श्यामसुंदर अपने सखाओंके साथ हँस खेल रहे थे, कोई एकाध यमुना मैं नहा रहे थे। जो सखियाँ गगरी धो रहीं थीं, छोरे जलमें डुबकी लगा उनकी गगरी पकड़ लेते; वे खीजकर डाँटती तो हँसते हुए दूर भाग जाते।

श्रीकिशोरीजी कई सखियोंके साथ तमालके नीचे विराजमान थी, इधर-उधर ललिता-विशाखा और सम्मुख अन्य सखियाँ सब जल भरनेमें जान-बूझकर विलम्ब कर रही थी, श्याम दर्शनका ऐसा सुयोग भला कब-कब मिलता है ?

मैं किशोरीजीके चरणकमल अपनी गोदमें धरकर संवाहन करने लगी।

‘यह क्या करती है विभा!’- उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया।

“श्री जू! हमारे ऐसे भाग्य कहाँ कि आपकी कुछ सेवाकर सकें।’

मेरे नेत्र भर आये। जो आनंद श्यामसुंदरके स्पर्श-दर्शनमें है, वहीं आनंद किशोरीजीके स्पर्श-दर्शनमें भी है; यह सत्य हम सब सखियाँ जानती हैं। बरसानेकी सखियाँ हमसे अधिक सौभाग्य शालिनी हैं; उन्हें किशोरीजीकी सेवा सहज प्राप्य है।

‘विभा यह क्या कहती है बहिन! तुम्हारे भाग्यकी तो कहीं समता नहीं। श्यामसुंदरके समीप निवास, जन्मसे ही उनके दर्शन और साथ खेलनेका महाभाग्य लेकर आयी हो तुम सब।’– गद्गद कंठसे यह कहते हुए किशोरीजीने मेरा चिबुक ऊपर उठा दिया।

दोनों ओर के नयनघट छलक पड़े, मैंने उनके जानुपर सिर टिकाते हुए कहा-‘अब तो यह बात नहीं!’

‘हाँ सखी! सो तो हमने नारी जन्म पाया है। कदम्ब तले उन सखाओंके भाग्य देख और जितना सम्भव है लोचन लाभ ले।’

गहरी साँस ले किशोरीजीने कहा—
‘न जाने दिनमणि क्यों धीरे-धीरे चलते हे,कब आयेगा शरद् !’

‘देख, देख सखी!’

मैंने सिर घुमाकर देखा – श्यामसुंदरने पटका- आभुषण उतारकर कदम्ब मूलमें रख दिये और कछनी काछकर सखाओंके साथ जलमें उतर पड़े।

अबतक तमालकी छायामें बैठी-बतराती सखियाँ भी उठीं और अपनी-अपनी गगरियाँ लेकर पानी भरने लगीं। श्रीकिशोरीजी सीढ़ीपर बैठकर कलसी मांजने लगीं उनको स्मरण ही न रहा कि यह स्वर्ण कलशी नहीं, माटीकी गागर है।
उन्हें ही क्या वहाँ किसी को किसी का ध्यान न रहा। कोई भरी गागर उलट रही थी तो कोई गागर जलमें डूबाये आपा भूल बैठी थी,
किसीकी कलशी लहरोंपर झोंके खा रही थी,
कोई गागरके धोनेके प्रयासमें उसे और अधिक मिट्टीसे लथेड़ रही थी। किसीको ज्ञात नहीं था कि उसके हाथ क्या कर रहे थे,
सबके प्राण नयनोंमें आ समाये थे।
देख रही थीं हम सब अग-जग भूल श्यामसुंदरकी जल क्रीड़ा |
वे संतरण करते हुए कभी हमारे समीप आ जाते और कभी दूर चले जाते कभी मित्रों के साथ मुखमें जल भर उसकी धार छोड़नेकी होड़ करते और कभी एक दूसरेको पकड़ने दौड़ते। कभी डूबकी मारकर दूसरेका पाँव पकड़कर खींच लेते। उनके कमलनयन आनन्दसे उद्भासित थे और मुखसे आह्लाद-उल्लास झर रहा था। घुंघराली अलकें कंधों, कपोलों और ललाटपर गीली होकर चिपक गय थीं। उनके हाथ-पैरोंके तलवे ऊपर उठते तो लगता चार रक्त कमल यमुनाकी लहरोंपर नृत्य कर रहे हैं।

एकाएक हमारी भाव-समाधि टूटी, श्यामसुंदर तटके समीप आकर जल उछालने लगे, हमारे वस्त्र भीग गये।

‘यह क्या करते हो कन्हाई! देखो हम सब भीग गयी- पाटलाने कहा।

‘अच्छा ही तो हुआ। जलमें उतरकर न नहायी, सो मैंने नहला दिया। –

सखाओंके साथ वे जोरसे हँस पड़े। यही नहीं! उन्होंने मुखमें जल भरकर धार छोड़ी जो सीधी किशोरीजीकी कलसीमें पड़ी।

इससे चंद्रावलीजी चिढ़कर बोली- ‘बड़े घरके ढोटा कहावौ श्यामसुंदर जू! तुम्हारी ऐसी करनी? कुलदेवीकी पूजाके लिये हम जल भरने आयीं थी और तुमने कलशी जूठी कर दी? देवी-देवताओंका भी डर नहीं तुम्हें ? इन लक्षणोंसे कोई तुम्हारे गाँवमें बसा भी रहेगा ?”

‘मेरा गाँव बसे कि उजडे, इसमें तेरा क्या आता-जाता है ? तेरा बरसानातो बसा रहेगा न, फिर चिंतामें क्यों सूख रही है ? ‘

श्यामसुंदरके मुखकी दूसरी धार चन्द्रावलीजीके मुखपर पड़ी। अब तो सखाओंको खेल मिल गया। सब जल उछालने और मुखसे पानीकी धार छोड़ने लगे। सखियाँ चिढ़कर भला-बुरा कहने लगीं।

चंद्रावलीजीने चुनरीसे मुखको पोंछते हुए नयन तिरछे और होठ बिचका कर कहा- ‘इस बुद्धिपर बलिहार। राधा, उठो बहिन! इन ढीठ लंगूरोंका क्या है ? ये छोटे-बड़ेका अन्तर क्या समझें गँवार कहींके; कहीं तुमपर जूठा पानी डाल देंगे।’ उन्होंने किशोरीजीका हाथ पकड़कर उठा दिया।

श्यामने पुनः मुखसे जल छोड़ा और किशोरीजी नहा गयीं। उनका शरीर पनसफलकी भाँति कंटकित हो काँपने लगा और अध-मूँदे नयन श्याम मुखकमलके भृंग हो गये।

‘हम लंगरोंका क्या है सखी! हम गँवार ही तो ठहरे।’ उन्होंने घड़ा फोड़नेको कंकड़ उठाया।

‘श्याम जू! तुम तो बड़े अच्छे हो, सदा हमारी सहायता करते हो; बड़ी बड़ी विपत्तियों से व्रजको बचाया है। घड़े फोड़नेकी अनीति मत करो मोहन! मैया हमें डाँटेगी।’—मैंने कहा।

‘अच्छा सखी! चलो, मैं तुम्हारे घड़े उठवा दूँ। अब तुम सब जाओ यहाँसे, हम नहा रहे हैं; फिर कुछ हो गया तो बकने लगोगी।’

हमने शीघ्रता पूर्वक घड़े भरे और उन्होंने उठवा दिये। किशोरीजीको आगे करके चले हम, पर मन-प्राण पीछे रह गये। उसी समय सन्न करता एक कंकड़ आया और चंद्रावलीजीका घड़ा फट्टसे हो गया। वे जलसे नहा गयीं। नयनोंमें हँसी और मुखमें क्रोध भरकर उन्होंने पुनः सबको लंगर-गँवारकी गाली दी।

श्यामसुंदरने दोनों हाथोंके अँगूठे दिखाकर मुँह चिढ़ा दिया। सखा सब ठठाकर हँस पड़े।

‘मैया हो मैया!’

‘कौन है ? क्या है री ?’ मैया बोली।

‘देख मैया! तेरे लालाने हमपर जूठा पानी डाल दिया। बरसानेसे हम देवीकी पूजाके लिये जल भरने आयी थीं। कन्हाईने राधाकी कलशीमें जूठा
पानी डाल दिया। मैंने बरजा, तो मुझपर कुल्ला कर दिया, मुझे बंदरिया और धींगड़ी भी कहा ! जल भरकर चलने लगी तो कंकड़ मारकर मेरा घड़ा फोड़ दिया, देखो मेरे वस्त्र !’

‘तू बरसानेकी है लाली?’ मैयाका नेह उमड़ा !

‘हाँ मैया!’

‘अहा हा, सारे वस्त्र भीग गये संध्याको आयेगा तो नीलमणिको मार लगाऊंगी, बहुत उधमी हो गया है। नंदगांवकी गोपियोंसे अचगरी करता करता तुम तक जा पहुँचा ! आने दो उसको, एक बार तो ऊखलसे ही बाँधा था; अबकि खम्भेसे ही बाँध दूंगी।’

‘नहीं मैया!’ चंद्रावलीजी उतावली होकर बोली-

‘बाँधने जैसा तो कुछ नहीं किया है। वस्त्र सूख जायेंगे और मिट्टीके घड़ेकी तो कोई बिसात ही नहीं, परन्तु उन्हे समझा देना।
वे देवी-देवताओंका भी डर नहीं मानते।’

‘आ बेटी! तुझे सूखे वस्त्र पहना दूँ।’

‘नहीं मैया! मैं घर जा रही हूँ।’

‘अरी लाली! तुझे मेरी सौगन्ध, नेक रुक जा। अहा कैसी सोनेकी मूरत सी लड़की है। इस कन्हाईके मारे मैं तो बोलने योग्य भी नहीं रही, कीर्तिदा सुनेगी तो क्या कहेगी!”

मैयाने चंद्रावलीजीको नये वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत किया, सिरके केशोंमें कंधी करके चोटी गूँथी और भोजनका आग्रह करने लगी।
तभी बाहर से श्यामसुंदर भागे आये –

‘मैया मुझे भूख लगी है, शीघ्र कुछ खाने को दो।’

‘क्यों रे उधमी! तू नंदगाँवमें उधम करता करता बरसाने तक जा पहुँचा ? तेरी सास सुनेगी तो क्या कहेगी रे?”

‘बरसानेमें?
कब गया बरसाने ?
किसने कहा तुझसे?
यह कौन बैठी है ?
किसकी बहु है ? “

‘अरे तूने आज इसके वस्त्र फाड़ दिये। देवीकी पूजाके लिये कीर्तिकुमारी जल लेने आयी, तूने उसका घड़ा जूठा कर दिया। उसे बंदरिया और धींगड़ी कहा। कन्हाई! तेरे उधम और इन उलहनोंके मारे मैं तो धाप गयी हूँ बाबा।’

‘तुझसे कहा किसने ?’ –
श्यामने झुककर चंद्रावलीजीका मुख और खड़े होकर बोले-

‘अहा, बन ठनकर यहाँ कैसी शील-संकोचकीअवतार होकर बैठी है; इसीने कही है मैयासे ऐसी झूठी बातें।’

‘री मैया! मैं क्या फाइँगा इसके वस्त्र, घाट-बाटमें बंदरिया-सी उछलती फिरती है, कहीं गिर-गिरा गयी होगी। बरसानेका घाट छोड़कर हम नहा रहे थे, उस घाटपर जल भरने आयीं। एक प्रहर भर तमालकी छाँहमें बैठी बतियावती रहीं। जब हम नहाने लगे तो सब उठकर घाटपर आ गयीं।

अरी मैया! तू तो निपट भोली है, इनकी बातेंमें आकर नित्य ही मुझे डाँटती है, पर सुन मेरी बात! ये सब घाटपर बैठी बैठी मिट्टीकी गागरको माँज रही थीं। घड़ेको भरे और ढ़ारें, बार-बार यही करती रहीं। न पानी भरें, न टलें वहाँ से इनकी करतूत देखकर सखाओंको हँसी आ गयी, तो जलके एक-दो छींटे पड़ गये होंगे इनपर अब तो लगी चीखने-चिल्लाने! मैं बीच बचाव करने लगा तो यह लजवंती मुझसे कहने लगी- ढीठ, गंवार, लंगर, लबार! यह क्या जाने बड़े-छोटोंका रहन-सहन; किशोरी जू चलो यहाँसे।’

‘देखे देख मैया! तेरी दृष्टि बचाकर अभी भी मुझे चिढ़ा रही है।’

‘सुनो कन्हाई! झूठकी सीमा हो गयी। हम विश्राम करनेको तमाल तले
बैठी थीं। हमारे घाटपर आते ही तुम जलमें कूद पड़े। मैंने छींटे उछालनेसे बरजा तो तुमने मुँहमें जल भरकर धार छोड़ी सो सीधा राधाकी मटकीमें पड़ी, फिर तो तुम और तुम्हारे सखाओंने सब गागरें झूठी कर दीं। यही नहीं, हमारे ऊपर भी तुमने झूठा जल डाला। बड़े घरके लड़के हो तुम ! हमको धींगड़ी और बंदरिया कहकर गाली दी। न जाने क्या देखकर बाबाने राधा-सी रूप-गुण आगरी की सगाई तुम्हारे साथ कर दी, जिसमें न रूप, न रंग, न गुण! मैं जाकर कीर्ति मैयाको सब बात बताकर सगाई छुड़ाकर रहूँगी।’ कहकर चंद्रावलीजी क्रोधसे उठ खड़ी हुई जानेके लिये ।

‘अरी लाली! तुझे मेरी सौगन्ध; तनिक रुक जा बेटी! मैं जानती हूँ यह महा-उधमी है। अब तू जो कहे, सो ही दण्ड इसको दूँ!’

‘मैया! इन्होंने देवीका अपराध किया है सो बरसाने चलकर हमारी कुलदेवीकी पूजा करके क्षमा प्रार्थना करें और मुझे भी धींगड़ी कहा है इससे मैं सगाई छुड़ा दूँगी। यदि तेरे लाला मुझसे क्षमा माँगकर कहें कि फिर कभी हमें गाली नहीं देंगे तो मैं भी क्षमा कर दूंगी।’

श्यामका मुख सगाई छूटनेकी बात सुनकर जरा-सा हो गया।

‘नीलमणि दारी के ! अब माँग इससे क्षमा!’ -मैया बोली।

हाथ जोड़, मुख नीचा किये मैयाके नीलमणि धीरे-धीरे आगे बढ़े, चंद्रावली जीजीके समीप जा नीचे झुकते हुए धीमे स्वर में बोले—’छिमा कर दओ।’

‘अच्छा कर दिया। चंद्रावलीजीने कहा।

‘बेटी! इसको अपने साथ ही बरसाने ले जाकर देवीकी पूजा और क्षमायाचना करवा दे,,,,क्या कहूँ, मुझ अभागिनीका यही एक अवलम्ब है। तुम सबसे हाथ जोड़कर विनय करती हूँ कि इसके सब अपराध क्षमा करके चिरंजीव होनेका आशिर्वाद दो।’

‘कन्हाई! जा बेटा इसके साथ जाकर देवीकी पूजाकर आ, फिर कभी
देवापराध मत करना, समझा!

‘बेटी चंद्रा! तू कीर्तिदासे कुछ मत कहना, तेरा निहोरा करूँ मेरी लाली !’

‘अच्छा मैया! कुछ न कहूँगी।’

‘अरी इला! इधर सुन तो। मैं समीप जाकर खड़ी हुई तो चंद्रावली जीजीने कहा—’बहिन! तनिक जाकर किशोरीजी और सखियोंसे कहना एक नयी सखी देवीकी पूजा करने आयी है। अतः सारी पूजन सामग्री लेकर
गिरिराज जू के समीप निकुंज मंदिरमें पहुंच जाय!’
फिर कानमें बोली- ‘श्यामसुंदरके लिये लहँगा-फरिया भी लेती आना।’

मैंने हँसकर श्यामसुंदरकी ओर देखा और चल पड़ी बरसानेकी और

‘राका! सुन बहिन!”

‘क्या कहती है जीजी! आज स्याम जू तुम्हारे साथ बंधे हुएसे कैसे चले जा रहे हैं?’

‘सो सब बादमें सुन लेना, अभी तो तुम जाकर सब सखियोंको समाचार दे दो कि सब गिरिराज निकुजमें पहुँच जायँ।’

‘क्यों सखी! सबका वहाँ क्या काम है? पूजा तो मैं करूँगा और तू करवायेगी। इन सबको वहाँ बुलाकर क्या करोगी?’ – श्याम सुंदरने पृछ लिया

तुम तो गंवार-के-गंवार ही रहे कान्ह जू! पूजा कई प्रकारकी होती है- पंचोपचार षोडशोपचार, राजोपचार और महाराजोपचार । तुम जो धूपदीप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्पसे पूजा करते हो वह तो साधारण पूजा है। हमारे यहाँ तो सदा महाराजोपचार पूजा होती है; ऐसी तो तुमने कब कहाँ देखी होगी? अपना भाग्य आज खुल गया समझो!’

‘अच्छा सखी! मेरा भाग्य खुलनेसे क्या होगा ?”

‘भाग्य खुलनेसे सब इच्छायें पूरी हो जाती हैं।’

‘सच सखी! तब तो तू मुझसे सम्राटोपचार पूजा करा ले; तेरे पाँव
पडू सखी।’

‘तुम्हारा ऐसा कौन-सा कार्य अटका पड़ा है श्यामसुंदर! जिसके लिये इतनी चिरौरी कर रहे हो ?”

‘सखी! मेरा ब्याह नहीं हो रहा। भद्रका, विशालका, अर्जुनका; मेरे
बहुतसे सखाओंके एक नहीं, कई-कई विवाह हो चुके! किंतु मेरा तो अबतक
एक भी विवाह नहीं हुआ। मैया कहती है-गोपियाँ तुझे चोर, लबार कहती है, इसीसे कोई बेटी नहीं देता।’

‘तो ऐसा करना, जब पूजा परिक्रमा करके प्रणाम करो, उस समय अपनी अभिलाषा देवीसे निवेदन कर देना। उस समय कोई वहाँ न होगा। जिस छोरीसे विवाह करना हो उसका नाम भी निवेदन कर देना।

‘यदि ऐसा हो जाय सखी! तो तेरा उपकार सदा स्मरण रखूँगा।’

‘अहा! ऐसे ही तो सयाने हो न, चार दिनमें सब भूलकर मुँह चिढ़ाने लगोगे।’— चंद्रावली हँसकर बोलीं।

‘नहीं सखी! जो तू कहे सो ही करूँ।”

‘सच ?’

‘सच सखी।’

‘तो सुनो श्यामसुंदर! तुम मुझसे ब्याह कर लो।’
श्यामसुंदर एक बार दुविधामें पड़ ठिठके रह गये, फिर हँसकर बोले

‘मेरी सगायो तो श्रीकिशोरीजीसे हुई है। किंतु सखी! भद्र दादाके तो सात विवाह हो गये हैं; अब दो-चार यदि मेरे भी हो जायँ तो क्या बुरा है ?’

‘श्यामसुंदर हमारे यहाँका नियम है कि देवीकी पूजा कोई पुरुष नहीं कर सकता।’ -निकुंज-मंदिरमें जाकर चन्द्रावली जू ने कहा।

‘तो सखी! यह बात तुझे पहले ज्ञात नहीं थी ? क्यों मुझे इतनी दूर कयो
दौड़ाया ?’– श्याम जू ने निराश खेदयुक्त स्वरमें कहा।

“यह बात नहीं श्याम….!’

‘तो दूसरी क्या बात थी सखी! क्या पहले मैं तुझे नारी दिखा था और यहाँ आकर पुरुष दिखने लगा हूँ?’- श्याम खीजकर बोले।

‘एक उपाय है।’
चन्द्रावली जू सोचते हुए बोली- ‘यदि तुम घाघरा फरिया पहन लो तो नारी वेष हो जायेगा, फिर कुछ दोष न रहेगा।’

श्याम खिसियाते हुए बोले ।

‘मैं लुगायी बनूँगा ? नहीं, यह मुझसे नहीं होगा!’-

‘देखो श्यामसुंदर! देवीका कोप उतरेगा तो तुम्हारा जन्मभर ब्याह नहीं होगा। कौन देखनेवाला है यहाँ, तुम जानो ,,कि देवीके वरदान से जिससे चाहो विवाह कर सकोगे। अब तुम्हें जो सोच-विचार करना हो शीघ्र कर लो। मुझे देर हो रही है, मैया डाँटेगी मुझको।’

श्यामसुंदर कुछ क्षण विचार करते रहे फिर बोले- ‘अच्छा सखी! जैसा यहाँका नियम हो वैसा कर, पूजामें कोई दोष नहीं रहना चाहिये।’

श्यामसुंदरको लहँगा चोली और फरिया पहनाकर चन्द्रावली जू उन्हें दूसरे कक्षमें ले गयी। वहाँ सब सखियाँ पूजाकी तैयार कर रही थी। इन दोनोंको देखकर सब समीप आ गयी—’अरी सखी! यह साँवरी सखी तो बड़ी सलोनी है, किस गोपकी बेटी है यह? क्या नाम है? कोई पाहुनी है क्या ?’

इस प्रकारके अनेक प्रश्न सुनकर चन्द्रावली जी हँसकर बोली-
‘हाँ सखी! यह पाहुनी है, नाम साँवरी सखी है। आज देवीका पूजन यही करेगी, तुम सब सावधानीसे सहायता करो। इसके पश्चात् साँवरी सखीकी बाँह पकड़कर कहा–
‘चल तुझे श्रीकिशोरी जू के समीप ले चलूँ। देख, तू गाँव की गंवार है। राजा-महाराजाओंसे भला तुझे कब काम पड़ा होगा?
वहाँ जानेपर भली-भाँति पृथ्वीपर सिर रखकर, फिर चरण छूकर प्रणाम करना। समझी ?
लट्ठकी भाँति खड़ी मत रह जाना!
वे हमारी राजकुमारी है।

श्यामसुंदरने सिर हिलाकर स्वीकृति दी और सकुचाते हुए श्रीकिशोरीजी समीप पहुँचे।

वेशकी लज्जा और दर्शनके आनन्दसे उनके पाँव डगमगा रहे थे। श्रीकिशोरी जू माला गूँथ रही थी, साँवरी सखीने प्रणाम किया तो राधा जू से मधुर स्वरमें पूछा-

‘यह कौन है जीजी ?’

‘पाहुनी है! नाम साँवरी सखी है।’- चंद्रावली जू ने हँसकर कहा।

जब साँवरी सखीने प्रणामकर सिर उठाया तो दोनोंकी दृष्टि दौड़कर आलिङ्गनबद्ध होकर अपना आया खो बैठी।

‘यह देवीका पूजन करने आयी है बहिन!’- चंद्रावली जूने सचेत करते हुए कहा-

‘पूजाके पश्चात दोनों भली प्रकार देख लेना एक दूसरी को।’

सब उठकर मंदिरमें गयी। देवी गिरिजाको सबने प्रणाम किया और पूजा आरम्भ कर दी। सखियाँ सामग्री ला लाकर रख रही थी। ललिता और
विशाखा उनमें से क्रमश: प्रथम प्रयुक्त होनेवाली वस्तुको किशोरीजीके समीप सरका देती और किशोरीजी निर्देश देते हुए साँवरी सखीको दे रही थी। चन्द्रावलीजी विधि बता रही थी और बहुत सी सखियाँ मंगल गा रही थी।

एक प्रहर भर पूजा चली, नैवेद्यके पश्चात परिक्रमा और कुसुमाञ्जली अर्पण कर साँवरी सखीने प्रणाम करते हुए नयन मूँद हाथ जोड़े।

‘देवीका ध्यान करके अपनी अभिलाषा निवेदन करो।’— चंद्रावलीजीने कहा-
‘जो तुम मन, वचन और कर्मसे एकाग्र होकर प्रार्थना करोगी तो देवी तुरंत इच्छा पूरी करेंगी।’

‘अच्छा सखी! अब देवीके सम्मुख नृत्य प्रदर्शित करो।’

श्यामसुंदरने विवशतापूर्ण दृष्टिसे चन्द्रावलीजीकी ओर देखा ।

‘हाँ सखी! यह भी पूजाका ही अंग है, तुम चिंता छोड़ो; वाद्य हम बजा देंगी।’ विवश साँवरी सखी उठ खड़ी हुई।

किशोरीजी एक उच्चासनपर विराजित हुई और अन्य सखियाँ उनके दायें बायें बैठ गयी ललिता और विशाखा देवी पर चँवर डुला रही थी। आठ-दस सखियाँ वाद्य लिये संकेतकी प्रतिक्षा कर रही थी। साँवरी सखीने पाँव दुमकाकर ताल और गुनगुनाकर राग बताया, वाद्य मुखर हो उठे।

जय जय जय हर प्रिया गौरी।
जय षडवदन गजानन माता जगजननी अति भोरी ॥
महिमा अमित अनन्त तिहारी मोरी मति गति कोरी।
आयी सरन जानि जगदम्बा, पुरौ अभिलाषा मोरी ॥

नृत्य-गायनके बीच किसीको तन-मनकी सुध नहीं रही। साँवरी सखी जैसे ही पुनः देवीको प्रणाम कर उठी, श्रीकिशोरीजीने लड़खड़ाते पदोंसे उठकर उसे हृदयसे लगा लिया और मुखसे बरबस निकल पड़ा— ‘श्यामसुंदर…. !”

यही दशा साँवरी सखीकी हुई। उसके मुखसे भी धीमा उच्छ्वास मुखरित हुआ— ‘राधे…. !’

दोनोंके मन एक-दूसरेमें गंगा-यमुनाकी भांति मिलकर अपनी पहचान खो बैठे। सखियाँ चित्र लिखी-सी देखती रहीं।

‘अच्छा सखी! तुम सब राधा बहिनके साथ बैठो, मैं इस पाहुनीको विदा
करके आती हूँ ?’

‘जीजी!’
श्रीकिशोरीजी अनुनय भरे स्वरमें बोली-‘भला इतनी शीघ्रता क्या है विदा करने की ? कल विदा कर देना,
अभी कुछ बात भी नहीं हुई ! ऐसा अवसर फिर न जाने कब आये। मैंने तो इतने बरसोंमें आज ही दर्शन किये हैं, आज इसे यही रहने दो न ?”

‘बहिन! इसे विलम्ब हो रहा है, देवीकी पूजा करनेको ही आज इसकी मैयाने भेजा है। देवीकी कृपा रही तो ऐसे अवसर अब आते ही रहेंगे। अपनी मैयाके यह एक ही लाली है, वह बाट तकती होगी। आज जाने दो; अबकी बार उसे जताकर लाऊँगी। यह फिर आ जायेगी।’

‘जीजी! इसका नृत्य, इसका गायन मेरे अंतरमें समा गया है, न जाने क्यों बिछड़ने की बातसे ही हृदय टूटा पड़ता है।

अच्छा बहिन! जा ही रही हो तो अपने श्रीमुखसे कुछ मधुर बात तो कहो, जिससे प्रान जुड़ायें।’

‘क्या कहूँ सखी।’ श्यामसुंदर अपना सखीवेश भूलकर बोल पड़े –
‘जो दशा तुम्हारी है, वहीं दशा मेरी भी है। तुम्हारे चरणोंको छोड़कर पथपर पद बढ़ते ही नहीं पर….’
वाक्य अधूरा छोड़कर उनका गला रूँध गया।

शतशत सखियोंके साथ ही श्रीकिशोरीजीके चकित दृग ऊपर उठे और आनंद विह्वल कंठसे अस्पष्ट वाणी फूटी-

‘श्यामसुंदर….!’

‘श्री राधे….!’

वैसी ही गद्गद वाणी कान्ह जू के कंठसे निकली।
दो क्षण पश्चात् चंद्रावली जू सचेत होकर हँस पड़ी-

‘श्याम जू! इतना भी ढाँढ़स नहीं रहा ?’ उनकी बात सुन सब सखियाँ हँस दी।

श्री जू के नयन नीचे हो गये और श्यामसुंदर सकुचाकर चंद्रावलीजीका मुख देखने लगे।

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-17



प्रीत बड़ी बेपीर सखी

अहो, कैसा सुंदर सुहाना है यह व्रज ! ग्रीष्म ऋतु जैसे इसका स्पर्श करते सकुचा रही हो और बसन्त ढीठ होकर बैठ गया है। चारों ओर फूल-फल नव-पल्लव, झरने और वन गिरीकी छटा तथा इस यमुनाकी शोभा तो न्यागी ही है । जीजीकी बात मानकर जो मैं यहाँ न आती तो ऐसे सुन्दर दृश्य ऐसे सुरूप और स्नेहीजन पूरे जन्ममें भी देखनेको न मिलते। जीजीकी सासकी देवर, देवरानी, ननदें और पास-पड़ोसके सभी तो मुझे स्नेह-स्नात करते है हैं । जीजीके साथ जल भरने आयी तो वनस्थलीका यह अपार वैभव देखकर मैं चकित रह गयी। उसी दिनसे अवसर मिलते ही यहाँ आकर बैठ जाती हूँ, प्रकृतिका रूप निरख मन भरता नही – नयन थकते नहीं ।

कल साँझको ही जीजीने पूछा- ‘इतनी देर कहाँ रही चंपा ?’
जब मैंने उसे बताया कि यमुनातटकी सुरम्यता मुझे खींच ले जाती है, तो वह हँस पड़ी

‘जीजी! तुझे वह स्थान अच्छा नहीं लगता ?’

‘सुवर्ण पाकर मनुष्यको पीतलका लोभ नहीं रहता बहिन !’ – जीजी जैसे कहीं दूर देखती हुई बोली।

‘सच जीजी! उस स्थानसे सुन्दर स्थान कहीं है यहाँ ? मुझे दिखा दो न!’ – मैंने निहोरा करते हुए कहा ।

‘चंपा! इस व्रजमें तू जिधर भी दृष्टि उठाकर देखेगी, तुझे प्रकृतिका असीम वैभव दिखायी देगा, पर…!’- जीजी कुछ कहती कहती रुक गया।
‘पर क्या जीजी !’– मैंने पूछा।
साथ ही विचार आया, जीजी कहेंगी-पर

चंपा! पराये स्थानमें तुझे अकेली जाना और इतनी देर ठहरना उचित नहीं!”

किंतु मेरी आशाके विपरीत जीजी मेरी पीठ और सिर सहलाती हुई बोली-

‘पर बहिन! यह सब कुछ ऐसे ही है, जैसे महासागरके सम्मुख डाबर ! सौन्दर्यके महासागरको देख लेनेके पश्चात और कुछ आँखोंमें समाता ही नहीं!’

‘सौन्दर्यको महासागर! कहाँ है जीजी! तेरे पाँव पहुँ; मुझे दिखा दे जीजी।’ जीजी हँस पड़ी-

‘बिना देखे यह दशा है, तो देखकर तू बावरी हो जायेगी। मैया अवश्य मुझे उलहना देगी।’

‘मुझे बता न जीजी!’
मैंने हाथ जोड़ दिये और पैर पड़ने झुकी,
तो .जीजीने हाथ पकड़ मुझे खींच कर छातीसे लगा लिया। उनकी आँखें आंसुओंसे गीली हो गयीं।

‘इतने निहोरेकी आवश्यकता नहीं मेरी बहिन!’ उसने भरे गलेसे कहा—

‘वे आप ही किसी दिन दिख जायेंगे तुम्हें! तू प्रकृतिके रूपकी पुजारिन है, पर उनको देखकर तन-मनकी सुध नहीं रहती। वे हमारे व्रजराज कुमार हैं। तू तो सूर्यास्तके पश्चात लौटती है, अन्यथा साँझको गैया चराकर इसी मार्गसे लौटते हैं। जिस शोभापर तू लट्ट हो रही है, वह व्रजके लोगों को उनकी रूपमाधुरीके सम्मुख नगण्य लगती है।’

जीजीकी बात सुन मेरी सारी हाँस हवा हो गयी। मैंने हँसकर कहा
‘वाह जीजी! वाह ! प्रकृतिके रूपकी मनुष्यके रूपसे क्या बराबरी ? मुझे नहीं देखना तुम्हारा व्रजराज कुमार यों तो हमारे व्रजसे तुम्हारे यहाँके सभी नर नारी सुन्दर हैं, अतः वे भी होंगे!’

मेरी उपेक्षा देख जीजी हँस दी- ‘देखनेपर सारी उपेक्षा भूल जायेगी और तेरी ससुराल भी इसी व्रजको बनाना होगा, अन्यथा प्राण बचेंगे नहीं।’
मैंने और जोरसे हँसकर कहा- ‘जीजी! रहने दो बहुत बखान हुआ ! मैं कोई मिट्टीकी डली नहीं कि तुम्हारे ब्रजराज कुमारके रूपका छींटा लगते ही गल जाऊँ। इसी कारण तो मैया कहती है कि मेरी पाटला भोरी है।’
‘अच्छा मैं भोली और तू चतुरा सही!’- जीजी हँसकर गृहकार्यमें लग गयी।

‘हूँ… हः ! ब्रजराजकुमार !! अरे किसी नारीके रूपकी चर्चाकी होती तो फिर भी कोई बात थी! भला पुरुष भी ऐसे सुन्दर होते हैं? लोहेसे बनाया गया
हो ऐसा तन और डाढ़ी-मूंछसे भालू बना मुख, वाणी जैसे घन गरजे हों।’

मुझे फिर बरबस हँसी आ गयी। लगते हैं। पुरुष तो बस बालक हों, तब तक ही सुहावने फिर मानुस नहीं, बनमानुष हो जाते हैं। और सुन्दर हों तो हों, मुझे क्या? यहाँ यह यमुनाकी धारा स्थिर है, तटके वृक्ष झुक आये हैं जलपर वृक्ष, विरुध, क्षुप और लताओंने मिलकर यहाँ कुंज-सा बना दिया है। इनका प्रतिबिम्ब जलमें कितना सुन्दर दिखायी देता है, जहाँ तक दृष्टि जाती है, हरियालीका साम्राज्य छाया है। रह-रहकर मयूर, कोकिला और पपीहा बोल उठते हैं। यमुनाकें कल-कल संगीतके साथ सुगंधित समीर जैसे ताल दे रहा है, झूमते वृक्ष मानो गुणी श्रोता हैं । जीजी कहती हैं- सूर्यास्तसे पूर्व ही तू घर लौट आ, किंतु डूबते सूरजकी वह शोभा मानो यमुनाके स्थिर जलपर स्वर्णकी चद्दर बिछ जाती है। जैसे प्रतीची चिर-प्रतिक्षित पाहुनेको पा रंगोत्सव मना रही हो और चराचर उसकी प्रसन्नतामें योग दे रहे हों।’

अहा, कैसा सुन्दर शांत स्थल है। जी चाहता है सचमुच इस व्रजमें ही बस जाऊँ और जीवनभर यह शोभा निहारती रहूँ ।

‘अरे! यह किसने मेरी आँख मूँद लीं? अवश्य ही जीजी होंगी, मुझे अपने व्रजराज कुमारके दर्शन कराने-लिवाने आयी होंगी। अपनी भावतल्लीनता में व्याघात पड़नेसे झुंझलाहट हुई किंतु उसे दबाकर मैंने कहा-
‘छोड़ो जीजी! जो देख रही हूँ वही देखने दो। मुझे नहीं देखना तुम्हारा ब्रजराज कुमार।’

मैंने झटका देकर आंखोंसे हाथ हटा दिये। किंतु हाथों को स्पर्श करते ही जीमें खटका हुआ–
‘इन हाथोंमें स्वर्ण कंकण है पतली चूड़ियां नहीं शायद जीजीका छोटा देवर मंगल होगा।’
किंतु मुख फेरते ही जी धक्से रह गया… यह…. यह…. तो मंगल नहीं है…. आगे कुछ सोचने की शक्ति नहीं रही।

मन-बुद्धि पंगु हो गये कि मर गये कौन जाने, मुझे निराधार छोड़कर न जाने कहाँ भाग छूटे अभागे ! इन दोनों के अभाव में इन्द्रियां भी मेरे वशमें रहीं। आंखोंने उस मुखपर दृष्टि ऐसे चिपका दी मानों अब तक इसी मुख को ढूंढ़ती रही थी। हाथ-पाँव की क्या गति हुई सो भगवान् ही जाने। और तो और दर्जी की कैंची-सी चलनेवाली मेरी जिह्वा भी न जाने कहाँ लोप हो गयी।

‘कौन है री तू?’—
ऐसा सुधा स्यन्दि स्वर! मुझे देखकर उन नेत्रोंमें श्रीआश्चर्य उतर आया था।

‘बोलती क्यों नहीं! इस व्रज की तो तू है नहीं, पाहुनी है क्या ?
अरे ऐसे क्या देख रही है मुझे ?’- वह खिलखिला पड़ा।

जिसका रूप देखकर, स्वर सुनकर ही देह स्तम्भित हो गयी उसकी हँसीने कैसा गजब ढ़ाया सो कैसे कहूँ! आजतक मेरी वाचलता प्रसिद्ध थी, इस एक ही क्षणमें मैं मूक कैसे बन गयी ?

उसने मेरे समीप बैठकर, पैर पानीमें लटका दिये। एक हाथसे मेरा स्कन्ध स्पर्श करके बोल उठा-
‘अरे तू कहीं मंगलकी भाभीकी बहिन तो नहीं ?”
न जाने कैसे मेरा मस्तक ‘हाँ’ में हिल गया। हृदय मन, प्राण सबके सब खिंचकर जैसे नेत्रों और कानों में समा गये थे।

‘इतना भारी सिर हिलाया, पर दो अँगुलकी जीभ तुझसे न हिली! क्या नाम है ? ”
बोलने के सारे प्रयत्न मेरे व्यर्थ हो गये? विवशता कैसी होती है, यह प्रथम बार ज्ञात हुआ मुझे।

‘बोलेगी नहीं ?’–
उसने मेरी ठोडी उठाकर कहा। अरी मैया! यह क्या हुआ, मेरा पूरा शरीर थरथर कर काँप उठा और प्रत्येक रोम साहीके रोम-सा उठ खड़ा हुआ।

‘तुझे मेरी सौगन्ध ! मुझसे रूठ गयी है क्या ? मेरा यहाँ आना बुरा लगा तुझे ?

” सौगन्ध सुनकर दो बूंद पानी आंखोंसे ढुलक पड़ा। हाय, कैसे बोलूँ! और जीभ सूखकर काठ हो गये हैं।

‘अरे काँपती और रोती क्यों है? ले मैं जा रहा हूँ। तू रो मत ! मैं तेरे पास नहीं आऊँगा। तू सुन्दर है, उजली है! मैं काला हूँ, मेरी छायासे कहीं तू’ भी काली हो जायेगी। देख न ! मेरे स्पर्शसे यमुना जल भी काला हो गया है। – वह उठकर चल पड़ा।

प्राण हाहाकार कर उठे। नयन भादोंके बादलसे झरने लगे किंतु वाणीकी अधीश्वरी मुझपर सदय न हुईं। धीरे धीरे संज्ञाने भी मेरा साथ छोड़ दिया।

जब चेतना लौटी और मन कुछ समझने योग्य हुआ तो जान पड़ा कि हृदयमें एक अनबुझी-सी अग्नि जल रही है जिससे न तो जल कर राख हुआ
जा सकता है, और न वह बुझती ही लगती है। हृदयका, मन, प्राण और इन्द्रियोंका सारा रस वह अग्नि धीरे-धीरे खींचकर अपने तापसे सुखा रही है।
मैंने यमुना तटपर दृष्टि फेरी, सबका सब रूखा और सूना-सूना अहा! थोड़ी ही देर पहले ये सब कितने सुंदर सुहावने थे! अचानक ऐसा क्या हो गया कि धरा-गगन सभी उदास हो गये। इनको हुआ सो हुआ मुझे क्या हो गया? हृदयमें यह शीतल दाह कैसा ? सम्भवतः बैठे-बैठे मुझे निद्रा आ गयी और इस बीच प्रकृति को पाला मार गया मुझपर भी उसी का प्रभाव हुआ लगता है। हाथों पैरोंमें जैसे प्राण ही नहीं रहे।
अरे, यह घुघरू किसका है? मे नूपुरका तो है नहीं, यह तो किसी पुरुषके नूपुर का है।
पुरुष…. पुरुष…. और मैं ढाढ़ मारकर उस स्थानपर जा पड़ी जहाँ वह…. वह…. मनमथ बैठा था। मेरे हाथ अपने आप वहाँकी धूलिसे स्वयंका स्नात करने लगे। आंखोंके आँसू टूटनेका नाम नहीं लेते।

अन्तमें जैसे-तैसे उठ बैठी। आह यह मुझको क्या हो गया? यह कौन था यह जो बिन बुलाये पाहुने-सा आकर बरियायी मेरे हृदयमें आँखों में घुस पड़ा ? यह है कौन ? क्या नाम है ? कहाँ रहता है? कुछ भी तो नहीं जानती मैं! मैंने उसका क्या बिगाड़ा था; क्यों आकर उसने मेरा संसार उजाड़ दिया। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ? यह दारुण दाह कैसे मिटे? मैं पुनः पछाड़ खाकर भूमिपर जा गिरी।

जब सचेत हुई तो घरमें शय्यापर लेटी थी। जीजी विपुला जीजीसे कह रही थी-
‘मुझे तो लगता है चम्पाको कोई भूत-बूत नहीं लगा ! जो रोग व्रजमें अबाल वृद्ध सबको है, वही रोग चम्पाको भी लग गया है।’

‘क्या कहती हो बहिन!’- विपुला आश्चर्य पूर्वक बोली।

‘मेरा मन तो यही कहता है सखी! इसने कहीं-न-कहीं श्यामसुन्दरको देख लिया है। अभी ज्ञात हो जायेगा, मंगल लला गये हैं बुलाने!!-कहते हुए जीजी हँस दीं।
‘श्यामसुंदर! अहा कैसा मीठा नाम है। सचमुच श्यामसुन्दर ही तो थे। काले रंगमें इतना माधुर्य ! प्राण अपने आप ही आवृत्ति करने लगे

श्यामसुंदर…. श्यामसुंदर… श्यामसुन्दर !’

‘भौजी! कन्नू तो कह रहा है—यमुनातटका भूत मेरे बसका नहीं है। महर्षिशाण्डिल्य अथवा भगवती पौर्णमासीको बुला लाओ।’
मंगलका स्वर सुनायी पड़ा।

‘यह कन्नू कौन है ? क्या मुझे सचमुच भूत लगा है? भूत भी क्या इतना सुंदर होता है ? कौन जाने, इस सुन्दर भूमिका सब कुछ सुन्दर है, तो भूत भी सुन्दर होते होंगे।

‘अरे लाला! हौं तो पै बलिहार! तनिक बाबासे जायके कहो न श्यामसुन्दर तो आते नहीं! महर्षि शाण्डिल्यको बुला दें।’- जीजीने अपने देवरसे कहा।

‘मैं कन्नू, पूर्णमासी, शाण्डिल्य, श्यामसुन्दर इन नामों में उलझी रही।’

‘अरी बहिन!’ विपुला बोली-
‘तेरी साससे कह जाकर भगवती पूर्णमासीको ले आयें, वही निदान करेंगी। महर्षिको बुलाकर भला छोरीका रोग कैसे बतायेगी ?”

‘क्या हुआ बेटी ?’– वात्सल्य स्निग्ध स्वर कानों में पड़ा, तो मैंने नेत्र उघाड़े। श्वेत वस्त्रों में लिपटी गौर देहयष्टि, कटि तक लटकते श्वेत केश, नेत्रोंसे झरता वात्सल्य सौम्यता, पवित्रता और सात्विकताने सम्मलित होकर जैसे नारी- देह धारण किया हो। वे समीप आयी, तो मैं उठ बैठी।

‘ना….ना, सोयी रहो बेटी!’-
उन्होंने मेरे प्रणाम करनेपर सिरपर हाथ धर आशिर्वाद दिया और शय्याके समीप रखी चौकीपर बैठ गयीं।

‘न जाने इसे क्या हुआ है माता!’- जीजीकी सास कहने लगीं ‘लल्लीको जमुना पुलिन और कुंजनको देखिबो भावैं ! नित्य सूर्यास्त होनेपर ही घर लौटती है। किंतु आज जब विलम्ब हुआ तो लल्ला गया ढूँढ़ने ! यह जमुनातटपर अचेत पड़ी थी; वहाँसे उठाकर लाया है। रह-रहकर बड़बड़ा रही है; कभी कहे
‘जमुनामें आग लगी हे’, कभी कहे
‘मैं जल रही हूँ’ ।
किसीको पहचानती नहीं! ऐसी बातें करती है जिनका कोई अर्थ नहीं। बहुकी बहिन है भगवती! आयी नहीं जनाय, गयी जगत जानेगा। फिर बेटीकी जात; समधिन क्या कहेगी!’

भगवतीने मेरी नाड़ी देखी, ललाटपर हाथ रखा फिर बोली
‘तुम सब बाहर बैठो।’

‘अब कहो बेटी ?’– उन्होंने मीठे स्वरमें पूछा।

‘माता! लज्जा और भय जैसा कुछ भी नहीं मेरे पास।’ कहकर मैंने
अपनी आपबीती सब कह सुनायी। अंतमें कहा–
‘क्या यहाँके भूत भी इतने सुंदर होते हैं ? यदि वह मनुष्य होता! तो मेरी इन्द्रियाँ कैसे जकड़ जातीं? मेरे रोम क्यों उत्थित होते ? उसके स्पर्श से कम्प क्यों होता ? उसके जाने के पश्चात सब सूना-सुना लग रहा है। मुझे उसका नाम-धाम कुछ भी तो ज्ञात नहीं! यदि आप एकबार पुनः उसे दिखा दें….!’ कठिन संयम रखनेपर भी आँखें बरस पड़ीं।

‘बड़ी भाग्यशालिनी है वत्से! ऐसा भूत बड़े भाग्यसे लगा करता है।’

भगवतीकी बात सुनकर मैं चिढ़ गयी, भूल गयी कि व्रजमें उनका सम्मान और श्रद्धा काशीकी माता अन्नपूर्णासे तनिक भी न्यून नहीं।
‘क्या कहती हैं माता! मैं तो सम्पूर्णतः लूट गयी और आप कहती हैं
भाग्यशालिनी हूँ।’

‘हाँ बेटी!’ वे बाष्परुद्ध कंठसे बोली- ‘बड़ी भाग्यशालिनी है तू ! उसे देखना चाहेगी ?”

‘हाँ, माँ! मैं कल पुनः उस स्थानपर जाकर उसकी प्रतीक्षा करूंगी। क्या
नाम है उसका ?’

‘जो नाम तुम्हें अच्छा लगे वही नाम वह मान लेगा।’

‘उसके सम्मुख मेरी वाणी क्यों रुद्ध हो जाती है माता! मैं उससे बात करना चाहती हूँ।’

‘प्रथम बार देखा है न! इसीसे ऐसा हुआ। क्या बहुत पीड़ा है हृदयमें ? ‘

‘उसकी चर्चा चिन्तन मुझे अच्छा लगता है, इसी कारण यह पीर भी भली लगती है। कैसा आश्चर्य माता! जिसे एक बार देखनेसे संसार बदल गया उसके संग-साथसे न जाने क्या होगा। पहले जो कुछ मुझे अच्छा लगता था, वह अब निस्सार जान पड़ता है। ऐसे भूत तो मैंने कभी सुने भी नहीं! आपने कभी देखा है उसे ?”

‘अच्छा बेटी, अब चलूँ मैं! सुनो बहू ! चिन्ता न करना। जो कुछ हो, होने देना।’– घरके सभी लोगोंने भगवती को प्रणाम किया और वे उन्हें आशिर्वाद देकर चली गयी । जीजा उन्हें पहुँचाने गये ।

जीजीने पूछा कि भगवतीने क्या कहा सो मैंने उन्हें सब कह सुनाया।

‘तू भगवती पर चिढ़ी?’ – जीजीने चिन्ता भरे स्वरमें पूछा।

‘और नहीं तो क्या करती! अब वे कहें कि भूत लगना बड़े भाग्यकी बात है; तो तुम्ही कहो जीजी! भूत-प्रेत लगना कहीं सौभाग्यकी बात हो सकती है ? ‘

‘मैंने सुना है चम्पा! कि भूतकी छाया नहीं पड़ती, उसके पाँव धरतीका स्पर्श नहीं करते। तूने उसकी छाया देखी अथवा उसे भूमिका स्पर्श करते देखा ?”

“भूत चूत तो तुम्हीं सबलोग कह रहे हो! मैंने तो उसे मनुष्य ही जाना माना था। अब अवश्य सोच रही हूँ कि मनुष्य ऐसा कैसे हो सकता है। किंतु भूत भी कैसे हो सकता है? क्यों जीजी! भला भूतके लिये भी किसीके प्राण इतने व्याकुल हो सकते हैं ?”

‘मैं क्या जानूँ बहिन ! मुझे इतना समय कहाँ है कि निश्चिन्त होकर पेड़-पौधे निरखूँ और कोई प्रेत आकर मुझसे बतियावै ।। मुझे लगा जीजी ताना दे रही है! बात भी सच है; न मैं जमना तट जाती, न यह रोग लगता। मेरे कारण बेचारे पूरे घरके लोग चिन्तामें पड़ गये हैं।
किंतु अहा ! कैसा सुन्दर रूप कि चराचर जिसके सम्मुख तुच्छ लगे! नयन भर देख पाऊँ इसके पूर्व ही वह उठकर चल पड़ा। हाय! यह दयीमारी जीभ ना खुली।

समझ नहीं पाती; प्रथम बार देखनेसे ही वह इतना अपना कैसे लगने लगा? प्राण देहकी कारा तजकर उसके समीप भाग जाना चाहते हैं। वाणीकी मिठास कैसे कही जाय! आजतक किसी प्राणी अथवा वाद्यकी ध्वनी ऐसी नहीं सुनी। अबकी बार मिलेगा तो पकड़ कर जीजीके पास ले आऊँगी।

उसे दिखाकर कहूँगी–
‘देख तेरे व्रजराजकुमार उसके पाँवकी धूलकी भी समता रखते हैं कि नहीं?’ उसे अपना सखा बना लूँगी। साथ-साथ खेलना, खाना, गाना और प्रकृति दर्शन करना; किंतु नहीं उसे देखने के पश्चात अन्य कुछ देखना कहाँ अच्छा लगता है ? कहीं पुनः जिल्ह्वा और हाथ पैर जड़ हो गये तो ? पर भगवती कह रही थी ऐसा प्रथम दर्शनके कारण हुआ, अब न होगा।

वह मुझसे रूठ गया है जो पुनः न आया तो ? हे भगवान! और कुछ हो,
पर यह न हो! जगत सूना हुआ और अब तुम भी त्याग दो; तो भाग्यहीना चम्पा क्या करेगी, कैसे जीयेगी ? किसके आश्रय ?

हृदयमें जो मरोड़ उठी तो लगा बिछौनेपर अंगारे बिछे हों जैसे! मैं उठ खड़ी हुई, घर के सबलोग सोये पड़े हैं। मुझे स्मरण नहीं कब द्वारको अर्गला शृङ्खला मुक्त किया और कब मैं उस पथपर चल पड़ी कि ठीक उसी स्थानपर पहुँचकर मुझे ध्यान आया—’ओह, यह मैंने क्या किया? रात ढल गयी है, कुछ ही समयमें जागकर सब मुझे ढूँढेंगे। जीजीका मनःसंताप बढ़ जायेगा। किंतु मैं भी क्या करूँ; घरमें मुझसे ठहरा नहीं जाता, जी घुटता है!’

मैं उस स्थानपर आँधे मुँह गिर पड़ी- ‘तुम कौन हो ? कहाँ हो ? आकर मुझे धैर्य बँधाओ। मुझसे क्या अपराध बन पड़ा ? क्यों मेरी ऐसी दशा बनायी ? जीजीकी प्रसन्नता के लिये आयी और यहाँ आकर उनके दुःखका कारण बनी। अब मेरा क्या होगा? मैं तो किसी कामकी न रही। तुम चाहे जो होओ! मैं तुम्हारे हाथ जोहूँ- पाँव पहुँ; मुझे स्वस्थ कर दो।’ अंतर चीखता रहा और आँखें बरसती रही! न जाने कब भोर हो गया।

हठात् कहींसे बंसीकी धुन सुनायी दी; जैसे कर्ण-कुहरोंमें अमृत सिंचनकर दिया गया हो। मैं भूल गयी उस मन्मथको, जिसके बिना क्षण-क्षण भारी था। उसे देखकर जो दशा हुई, वही वंशी रव सुनकर हो गयी। प्राण आनंदसे अचेत होकर कानोंमें जा बसे।

न जाने वह ध्वनि कब विरमित हुई; मुझे ध्यान आया तो मन ग्लानिसे छटपटाने लगा—
‘हाय ! ये अभागे प्राण क्या-क्या चाहते हैं? आह! विधाता तूने दो आँख – दो कान देकर क्यों जन्म दिया? ऐसा मन ही क्यों दिया, जो कभी रूपपर और कभी रागपर न्यौछावर हो जाय! कलका रोग मिटा नहीं और यह नया और आ लगा। नारी तन पाकर भला ऐसी मनःस्थिति ! धिक् ! इससे तो मृत्यु भली।’

‘चंपा घरमें नहीं है।’—
मैंने उठते ही कहा, तो वे चौंक पड़े।

‘कहाँ गयी ?” ‘जमुनातट गयी होगी, कहीं जलमें न कूद पड़े कल भगवतीने कुछ कहा तुमसे ?’– मैंने चितिंत होकर पूछा।
‘चिंता जैसी कोई बात नहीं, यही कहा सबसे।’
‘मैं जाऊँ एकबार और भगवती पौर्णमासीके पास? न जाने क्या हुआ छोरी को! मैयाको क्या मुँह दिखाऊँगी मैं!’

मैया कुछ ‘भूत-वूत’ की बात कह रही थी।
‘तुम समझते क्यों नहीं! भूत कहाँसे आयेंगे ब्रजमें? अबतक तो
कभी देखा-सुना नहीं किसीको भूत लगते! कोई रोग हो गया है; बेटीकी जात हैं, किसीसे कह भी नहीं सकते। माता पौर्णमासीके स्पर्शसे ही सब रोग-दोष भाग जाते हैं, किंतु हमारा भाग्य! कि उन्होंने भी कुछ नहीं किया। ‘— मैंने कहा ।

‘सुना है कन्हाईके स्पर्शसे भी भूत या कोई रोग नहीं ठहरते!’

‘मंगल लला गये थे; कन्हाई बोले- यमुनातटको भूत मेरे बस को नाय न हो तुम महर्षि शाण्डिल्यके समीप हो आओ।’

‘अच्छा।’

जयन्तकी बात सुनकर महर्षि मुस्कराये-
‘बेटा! चिंता जैसी बात नहीं। न तो चम्पाको कोई भूत लगा है, और न कोई रोग! उसने कोई अचिन्त्य, अतर्क्य, अनिर्वचनीय और अपरूप वस्तु देख ली है; इससे चित्त भ्रमित हो गया है।’

‘ऐसी क्या वस्तु हो सकती है महाराज! हमारे व्रज में? वह तो भगवतीको बता रही थी कि कोई छौराने उसकी आँखें मूँद ली थीं। कहीं हमारा कन्हैया तो नहीं महाराज! उसकी बहिन चिंतासे सूख रही है महाराज! कि कहीं यमुनामें न कूद जाय!’

‘यमुनामें कूदै कि गिरीसे कुदै, उसका रक्षक उसे सम्हाल लेगा। हम-तुम कुछ नहीं कर सकते। फिर भी जीवन हानी नहीं होगी, यह दायित्व मेरा रहा।’

‘महाराज! वह क्या ऐसी ही बनी रहेगी?’–जयन्त जैसे किसी ओर नहीं पा रहा था ।

‘ऐसा भाग्य किसका है कि ऐसा ही बना रहे!’ महर्षि जैसे अपने आपसे कह रहे हों –
‘कौन कह सकता है कि यह अवस्था जीवन भर बनी रहेगी! किंतु वे करुणा-वरुणालय हैं। उनके अतिरिक्त और कौन है, जो जीवको यों सहज अपना लें। फिर अपनाकर त्यागना तो उन्हें आता ही नहीं यह तो,,,,
उनका स्वभाव ही नहीं।’
फिर सचेत होकर बोले- ‘तुम बहुसे कह देना चंपा जो करे-जैसे रहे, रहने दो धीरे-धीरे स्वस्थ हो जायेगी।’
जयन्तने आकर पाटलासे कहा—’महर्षिकी बातसे जान पड़ा कि उसे न रोग है, न भूत लगा है। केवल किसी महाशक्तिकी कृपासे ऐसा हुआ है और
वही उसे संभालेगी। धीरे-धीरे ठीक हो जायेगी, चिंता जैसी बात नहीं।’

वे तो कहकर चले गये किंतु अब मुझे सचमुच ही चिंता लगी-
‘मैया री! अब क्या होगा ? मैं तो समझ रही थी इसने कहीं श्यामसुंदरको देख लिया है। दो-एक दिन ऐसे ही तड़फड़ाय लेगी, तब एक दिन सन्ध्याको वनसे लौटते हुए दिखाकर कहूँगी–देख यही है न यमुना तटवाला भूत ? अब यह महाशक्ति कौन है ? महर्षिकी बात असत्य तो नहीं हो सकती! कुछ भी हो चिंतासे क्या बनेगा ? महर्षिने भी कहा है चिंता की कोई बात नहीं।

‘आह, विधाता! तूने मुझे जन्म लेते ही मृत्यु क्यों नहीं दी ? अब मैं कहाँ जाऊँ?
क्या कहकर किसको पुकारूँ ?
हाय, किस कुघड़ीमें इस व्रजमें पैर रखा मैंने!’-
चंपा बिलख-बिलखकर रोती और अचेत हो जाती है, कभी मौन होकर मूर्ति-सी स्थिर हो जाय।

नित्य सूर्योदयसे पूर्व ही यमुना तटपर जाकर बैठ जाती है। साँझको मैं ही समझाकर घर ला पाता हूँ अथवा उसका अचेत तन उठा लाता हूँ। उसकी बहिनका जी सूख जाता है- ‘मैया मुझे क्या कहेंगी?’

मेरी मैया भी चिंता करती है- ‘कैसी फूल सी हँसती-खेलती छोरी दिनमें मुरझा कर आधी रह गयी समधिन देखेगी तो क्या कहेंगी?’

बात भी सच है— चंपाका चंपा-सा रंग साँवला हो गया है। लम्बे-लम्बे काले केश उलझकर लटें बन गये और आँखें, होंठ, रोनेके कारण सूजे ही रहते हैं ? केश, मुख और शरीर मिट्टीसे स्नात बने हैं। दो दिनमें ऐसी दशा हो गयी है कि पहचानी नहीं जाती। यह तो हमारा घर गाँवके छोरपर है; फिर भी कोई-कोई तो पूछ ही लेते है—’जयन्त! तेरी साली आयी थी न, वापस चली गयी क्या! दिखायी नहीं देती।’

मैं क्या कहूँ –
‘नहीं भैया! बड़ी शर्मिली है, घरपर ही रहती है। किंतु यह बात कितने दिन चलेगी? पूरे घरका खान-पान आधा हो गया है। हमारा कन्हैया ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसे वह सुलझा न सके !

वही कन्हैया मेरी बात सुनकर रूखा-सा बोला- ‘यह रोग मेरे बसका नहीं है।

दादा! देखकर क्या करूँगा। महर्षिने कहा है तो ठीक हो ही जायेगी।’
अब तो महर्षिकी बातका ही आसरा है। यदि इस बीच चंपाको इसके गाँवसे कोई लिवाने आ गया तो क्या उत्तर देंगे हम ? ऐसी अवस्थामें कैसे भेजेंगे और न भेजें तो कहेंगे क्या? हा भगवन्! यह क्या हो गया ?

‘अहा यह तो गगनमें खड़ा है। तुम तुम….. उस दिन रूठ गये थे मुझसे ? मेरी जीभ सूख गयी थी, इससे बोला नहीं गया।
आज….! आज…. आज आओ; जो पूछोगे वही कहूँगी मेरा नाम चंपा है, तुम्हारा क्या नाम है भला?”

“अरे तुम तो कदम्बके भीतर घुस पड़े; क्यों? मुझसे छिपनेके लिये किंतु मैंने तो तुम्हें देख लिया न! अब निकल भी आओ आओ हम दोनों मिलकर खेलें।’

‘यह क्या! तुम जलमें उतर पड़े। अरे, तुम जल, थल, गगन, वृक्ष, पशु, पाहन सबमें ? ये पत्थर पत्थर न रहे, ये पशु, यह यमुना सब तुम्हारे रूप हो गये। यह कहाँ गये तुम? यह सब क्या मेरा भ्रम था ? किससे तुम्हारा ठौर ठिकाना पूछूं ? किससे माँगू तुझे ?’

यह….., यह…… किसका प्रतिबिम्ब है? डालपर बैठकर पाँव पानीपर लटकाये है। अहा! यह वही तो है, वही है…..
मेरे प्राणोंकी औषध ! रे मन थोड़ा धीरज धर! उन्हें ज्ञात न हो, इस तरह उनके चरणोंमें जा पहुँगी। मुझे कुछ नहीं चाहिये; केवल तुम्हारे दर्शनकी भिक्षा चाहिये। कहीं वृक्षसे कूदकर चल दिये तो ? इससे अच्छा तो यह है कि इन्हें देखते हुए यमुनामें समा जाऊँ ।

‘यमुना महरानी; एक ही विनय है तुमसे! मेरे मृत तनका एक बार अपने लहरोंके हाथों से उनके चरणोंका स्पर्श करा देना। वे देख लें अपने कमल नेत्रोंसे एक बार बस! सच ही है, चंपाके पास श्याम अलि भला क्यों आयेगा? विधाता! अगले जन्ममें मुझे पाटल अथवा कमल बनाना; जिससे उनका स्पर्श मिले! अहा, अब विलम्ब क्यों! इन लहरनमें सारी ज्वाला शांत…. हो…. जा….य….गी।’

‘भाभी! अरी ओ भाभी!
देख यह कौन है ? तेरी बहिन तो नहीं ? “

‘हाँ लाला! कहाँ थी यह ? तुम्हारे दादा तो ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गये।’

‘भाभी यह तो यमुनामें बह रही थी। मैं पाँव लटकाकर कदम्बपर बैठा था कि यह आ लगी पाँवोंके पास। यमुनामें उतरकर निकाल लाया हूँ।’

चंपाको शय्यापर सुला कर श्यामसुंदर बोले-
‘इसे घर भेज दे भाभी ! किसी दिन मर गयी तो तेरे माथे आयेगी।’

‘लालाजी, मैं बलिहारी जाऊँ! न जाने क्या रोग लगा है इसे; ऐसी ही भेजकर मैयाको क्या मुँख दिखाऊँगी! कोई उपाय करो, मैं तुम्हारे पाँव पहूँ।’

‘अच्छा भाभी! मुझे जयन्त दादाने इसका रोग बताया था। तू पद्मासे कहना भोर होते ही मुझसे औषध लाकर इसे पिला दे। कल इसे यमुना तट मत जाने देना। और हाँ! तू अपनी मैयासे कहकर इसका विवाह शीघ्र करवा दे अथवा इस बावरीसे विवाह कौन करेगा?’

‘अपने मंगल ललासे विवाह कर दें इसका ?”

‘कल इसीसे पूछ लेना।’ कहकर श्यामसुन्दर चले गये।

मैंने देखा चंपा अचेत पड़ी है। इन सात ही दिनमें वह भरी पूरी देह अस्थि-पिंजर रह गयी है। श्यामसुंदरने कहा है तो अवश्य कल ठीक हो जायेगी। चलूँ सासजीकी आज्ञा लेकर पद्मासे औषधके लिये कह आऊँ। भोर
होते ही देनेको कहा है।

‘चंपा….! ए चंपा ! नेत्र उघाड़ बहिन; यह औषध पी ले।’पद्माने चंपाको बिठाकर प्याली मुखसे लगायी।

‘आह, कौन हितैषी है तू? हियामें बड़ी ठंडक पड़ी।’

‘नयन उघाड़ बावरी ! मैं पद्मा हूँ। श्यामसुंदरने औषध भेजी है।’

‘श्यामसुंदर ! हाँ वह श्याम और सुन्दर भी था, किंतु जाने कहाँ खो गया। वह! तूने उसे देखा है कहीं ?”

‘देख बहिन! ऐसी ही बातें करती है। मैंने रोते हुए कहा—
‘न खाना, न पीना, न नींद और न विश्राम ! ऐसे शरीर कितने दिन टिकेगा ?”

‘ए भाभी, तू रो मत ! बाहर जा मैं इसकी मांदनी मिटा दूँगी।’पद्मा बोली।

मैं उठकर बाहर चली गयी, किंतु दो घड़ी भी नहीं बीती और देखा पद्मा चंपाका हाथ पकड़ अपने घरकी ओर जा रही है। यह देख हम सास-बहूके मुख आश्चर्यसे खुले रह गये।

‘कन्हाईने औषध तो बहुत अच्छी दी।’- सासजी बोली।

‘हाँ! चंपा उदास तो है, पर दीखती भली चंगी है। मैंने कहा। भगवान भोलेनाथ,,,, कन्हाईको हजार वर्षकी उम्र दें। हम दोनोंने हाथ जोड़कर सिर झुकाया

चंपाको अपने घर लाकर मैंने उसकी सारी कथा सुनी। मेरी गोदमें मुख छिपाकर रोते हुए उसने सब कह सुनाया। कैसी भोली छोरी है।

‘जो मैं तुझे तेरा भूत दिखा दूँ तो ?’ मैंने पूछा।
‘बहिन! मैं तेरी दासी बनकर रहूंगी।’ चंपा ने मेरे पाँव पकड़ लिये।

‘सच!”

‘सच बहिन! तूने उसको देखा है? बातकी उससे? नहीं! उसे देखनेके
पश्चात कुछ और देखना अच्छा नहीं लगता।
उसकी वाणी सुननेके पश्चात् और कुछ सुननेको जी नहीं चाहता और वह स्पर्श….
‘ चंपाकी वाणी रुक गयी, देह वल्लरी काँप उठी, रोमावली उत्थित हुई और नयन मानो अनवरत मुक्तावर्षण करती सीप हों।

मैंने उसे हृदयसे लगा लिया-
‘सो सब मैं जानती हूँ चंपा! मैं भी ही भांति अक्खड़ थी। जो तूने कहा; वही मैंने भी कहा था और परिणाम भी तेरे समान ही पाया। मेरी बात मानकर कुछ खा पी ले बहिन ! सन्ध्या समय उसे दिखा दूँगी तुझे!’

मेरी मनुहार मानकर चंपाने मुँह झूठा कर लिया। उसकी आँखें सूखनेका नाम नहीं लेतीं। दृष्टि सूनी सूनी और रह रहकर भान भूल जाना….
हाय, कैसी सोनेकी मूर्ति सी सुन्दर काया थी। सात दिनमें जैसे जल बलकर कोयला हो गयी।

सन्ध्याको वंशीनाद सुनते ही चम्पा फूट पड़ी–
‘बहिन! मैं बड़ी पापिनी हूँ! एक की ही बात नहीं है, जैसे उसका साँवला रूप देखकर मैं बावरी हुई थी, वैसे ही एक दिन किसीके वंशीनादने भी मुझे मोह लिया था। तुम मुझे कहींसे विष ला दो, यह मुख अब कहीं दिखाने योग्य नहीं रहा।’

‘आज कोई उत्सव है बहिन ?’– चम्पाने पूछा।

‘नहीं तो, क्यों पूछ रही है ? “

‘ पथके दोनों ओर सब स्त्री-पुरुष सजधज कर ऐसे खड़े हैं मानो किसीका स्वागत करनेके लिये आये हैं। स्त्रियाँ आरतीका थाल लिये हैं और ब्राह्मण,,,
दूब, कुश पुष्प, और जल लिये हैं। वधुएँ लाजा और पुष्प लिये अटारियोंपर खड़ी हैं।’

‘चंपा! यह तो हमारा नित्योत्सव है बहिन! ये सब जिसकी प्रतिक्षामें खड़े हैं, उसपर तो हमें भी पुष्प वर्षा करनी है। सम्मुख झरोखोंमें देख; एक भी खाली नहीं। तेरे मेरे जैसी रोगीणियाँ यहीसे दर्शनोषधि पाती है।’

बंशी पुनः बज उठी। चंपाने असंयत हो मेरी बाँह थाम ली और कार दृष्टिसे मेरी ओर देखने लगी। मैंने प्यार से उसका मस्तक अपने कंधेसे टिका लिया तथा नेत्र भंगिमा द्वारा उसे आश्वासन दिया। उसने निश्चिन्त होकर जैसे नेत्र मूँद लिये। ध्वनि धीरे-धीरे समीप आयी, हृदय जैसे वक्ष फाड़कर पथपर कूद पड़ना चाहता है। नित्यकी बात और है !

आज….. आज श्यामसुन्दरने मुझे चम्पाका भार सौंपा है।
‘पद्मा! उसका खान, पान, निद्रा, लोक-लाज यहाँतक कि देहका भान भी छूट गया है। अहर्निश मेरा ही ध्यान और चेतना लौटते ही मेरी चरणधूलिमें लोटकर धूलिस्नात हो जाती है। ऐसे प्राण कितने दिन टिकेंगे उस पिंजरेमें? सारी वाचालता न जाने कहाँ जा छिपी है, उसके मनकी तपन शांत करने के लिये वंशी बजायी, तो उसकी भी विपरीत प्रतिक्रिया हुई ! चंपाने मुझे और वंशीवादकको भिन्न समझकर अपना दुःख बढ़ा लिया है।’-कहते कहते श्यामसुंदरके वे आकर्णदीर्घ दृग भर आये थे। अपनेजनोंका दुःख वे कहाँ सह पाते हैं।

‘मुझे क्या करना है ?’– मैंने पूछा था।

मंगलके घरसे अपने यहाँ लिवा लाना। समझा-बुझाकर कुछ खिला पिला देना। आज सात दिनोंसे वह निराहार है। उसकी चिंताके मारे मुझे कुछ भी सुहाता नहीं।

अपने भरे-भरे नयन उठाकर मेरी ओर देखा और रूंधे स्वरमें बोले
‘संध्याको मुझे दिखा देना। मंगल कहता था- हमारे घरमें एक समय ही चुल्हा जलता है, कोई खाता है कोई नहीं! भाभी अधमरी-सी हो गयी हैं। सब एक दूसरेको दिखानेके लिये मुँह झूठा करते हैं।’

‘तो घरवालों की चिंतासे उसे दर्शन दिये जाते हैं? इसमें पद्माका भला क्या काम है? उसी यमुनातटपर दर्शन दे दो न!’- मैने कहा।

‘तू समझती क्यों नहीं पद्मा! यमुनातटपर वह मुझे भूत ही समझेगी और बात बातमें व्रजराज कुमारकी निंदा करेगी। जितनी पीड़ा उसने भोगी
है वही क्या पर्याप्त नहीं।’

‘श्यामसुंदर!’-
मेरी आंखें भर आयीं।
ऐसा करुणामय और कौन है ? फिर भी मैं हृदय कड़ा करके बोली- ‘श्याम जू! यह पाहुनी है।

‘हाँ पद्मा! यह भूमि चिन्मय है; इसमें प्रवेशाधिकार सहज नहीं मिलता इतना ही पर्याप्त है।’

‘श्याम जू! तुम कृपण कबसे हो गये ? किशोरी जू से आज्ञा माँग लूँ ? यहीं किसीसे, मंगलसे विवाह हो जाय इसका!’

उसे पूछ लेना, विवाह के लिये माने तो।’

मैंने देखा उन भुवनमंगलकी आँखोंसे कुछ बूँदे झर पड़ीं- पद्मा! तूने मुझे कृपण कब देखा ? कृपाका सम्बल और प्रेमका बल- पाथेय साथ हो, तो सभी भूमि यह व्रज बन जायेगी! और चराचर उसका रू…. प….!’ आगेके शब्द गलेमें फंस गये।

“मुझे क्षमा करो श्यामसुंदर! चंपा जितना बल मुझमें नहीं है।’

‘तुझमें बल न होता, तो इतना भार कैसे सौंपता तुझे मैं? सन्ध्याको अपनेको सम्हालकर उसका समाधान कर देना।’

‘यह मुझसे कैसे बनेगा श्यामसुन्दर ! वंशीनाद सुनते ही तन-मन अवश हो जाते हैं।’

‘मेरा कार्य।’

‘चम्पा! देख बहिन! नयन उघाड़ यह देख…. ।’

पर कौन सुने ! चम्पा पत्थर बनी, मेरे कंधेसे सिर टिकाये बैठी है।
अब मैं….. क्या करूँ कैसे चेत कराऊँ?

‘ए चम्पा! देख, तेरा वह यमुनातटवाला भूत।’

मैंने उसे पूरी-की-पूरी झंझोड़ दिया- ‘देख ! देख तेरा भूत !’

‘ऐं क्या?’– चम्पाके नेत्र उघड़े तो मैंने उसका मस्तक झरोखेसे लगा दिया। जैसे ही उसकी दृष्टि श्यामसुन्दरपर पड़ी, देह थर-थर काँप उठी। आश्रयके लिये उसने मेरी ओर हाथ बढ़ाया। मैंने उन हाथों में लाजा, पुष्प और दुर्वाङ्कुर थमा दिये।

इनकी वर्षा कर, नयन लाभ ले बहिन!’- मेरे साथ ही उसकी अंजली,,,
भी छूटी। उधरसे प्रक्षिप्त हुए वनकेतकीके पुष्प हम दोनोंके अंकमें आ गिरे। ऊपर उठे उन दृगोंकी वह चितवन – वह मुस्कान…. ; चम्पा आनन्द विह्वल हो मेरी गोदमें लुढ़क पड़ी ।

‘कुछ समझी बहिन ?”

‘यही व्रजराज कुमार है जीजी ?’

‘इनके लिये क्या कहा था तू ने ?’

उत्तरमें चंपा धीरेसे हँस दी- ‘तुम्हीं कहो जीजी ! सृष्टिमें इनका सौन्दर्य संभव है ? ‘

‘नहीं! और कहीं सम्भव नहीं है। विश्वास नहीं न ?’

‘तुम सच ही कहती हो जीजी।’- उसके नेत्र नीचे हो गये ।
‘जीजीने भी कुछ ऐसी ही बात कही थी- सौन्दर्य महासागर को देखकर
डाबर देखना नहीं सुहाता किंतु उस समय अपनी समझके अहंकार अंधी थी। आजसे तुम मेरी गुरु हुई जीजी !’- चंपाने झुककर मेरे पैरोंपर मस्तक रख दिया।

‘यह क्या बावरी ?”

‘हाँ, जीजी ! तुमने मुझे नया जन्म दिया है। निर्धनको धनी और मुझ अंधीको प्रकाश दिया है। कितनी मूढ़ थी मैं !”

‘तू नही जानती चम्पा ! श्यामसुन्दरने ही मुझे तेरे पास भेजा था।’

चम्पा सुनकर अवाक हो गयी। ‘एक बात पूछूं?’– मैंने कहा; उत्तरमें चम्पाने नेत्र उठाये ।

‘तू इस व्रजमें रहना चाहेगी ? ‘

‘चाहने-से क्या होगा जीजी! ऐसा भाग्य कहाँ है मेरा ?”

‘तेरा विवाह यहाँ हो जाय यदि ?’ ‘विवाह ?’
वह चौंक पड़ी – ‘नहीं जीजी ! मुझसे दुहरा जीवन न जीया जायेगा।’

“कहीं तो होगा ही।’

‘नहीं होगा ! मैं मैयाको मना लूँगी। अब इससे अधिक और क्या पाना रह गया ?’

‘किसके आश्रय कटेगा जीवन ?”

आश्रयकी क्या अटक है जीजी! सब कुछ मेरा ही तो है।’ फिर कुछ सकुचाकर बोली-
‘कभी आवश्यकता जान पड़ी तो तुम तो हो ही!’

‘चम्पा; मेरी बहिन! तू हम सबसे वीर निकली।’- मैंने उसके सिरपर हाथ रखा।

‘मेरा अभाग्य ही इस वीरत्वको न्यौत लाया है जीजी ! तुम्हारी समता
करूँ, ऐसा भाग्य कहाँ है मेरे पास ?’

‘अच्छा बहिन! जितने दिन यहाँ रहना है, मेरे पास ही रह
‘यह तो तुमने मेरे मनकी कही जीजी! मेरे कितने दिन व्यर्थ गये यहाँ।’

‘जीजी! दादा लिवाने आये हैं; जीजीने परसों विदा करनेको कहा है।’
रातको खिरकमें गाय दुहते समय मैंने पद्मा जीजीसे कहा।

‘यदि ऐसा है तो फिर कल तू नहा-धोकर सब स्थान घूम-फिरकर देख ले और अपनी सब सखियोंसे मिल भी ले।’ – पद्माने कहा।

दूसरे दिन दोपहर ढलनेतक मैं सबसे मिलती रही फिर नहाने यमूनाटत चली। वस्त्र धोकर सूखनेको फैला दिये तब सहज ही उस स्थानकी ओर पाँव उठने लगे जहाँ प्रथम श्यामसुन्दरके दर्शन हुए थे।

पद्मा जीजी कह रही थी कि तू तो यमुनामें गिर पड़ी थी, श्यामसुंदर ही निकालकर घर लाये थे।

अहा! जैसे सुन्दर, वैसे ही उदार और सुशील! मैंने
उसी स्थानपर बैठकर पाँव पानीमें लटका दिये।

‘जो आज पुनः आकर पूछें कि तेरो नाम कहा है री? तो बानी फूटेगी ?

यदि ये मेरे सखा होते! हम साथ-साथ खेलते-खाते-पीते। जाने क्यों विधाताको रंग-में-भंग करना सुहाता है! नारी तन तो सदासे पराधीन रहा है, जीवनमें अब कहाँ फिर दर्शन होने हैं!’- हृदयसे एक गहरी निश्वास निकल पड़ी।

‘हैं! यह बंसी कहाँ बजी ?’–
हृदयमें जैसे एक गड्डा सा हो गया हो। ‘ध्वनीमें आमन्त्रण है; क्या मुझे बुला रहे हैं ?’

‘अरे नहीं! उनके सहस्रशः सखा है, गायें हैं, वनपशु और पक्षी हैं; वंशी उन्हींमें-से किसीको पुकारती होगी; मुझे वे क्यों पुकारेंगे! इतने दिनोंमें एकबार भी पूछा नहीं आकर कि-चम्पा! कैसी है तू?
पद्मा जीजीको वैद्य बनाकर,,,,,
भेज दिया और बस….. ठीक भी तो है।’

मैंने मनको समझाया – ‘वे बुलायें भी तो वहाँ जाकर खड़ा हुआ जा सकेगा मुझसे ?’

‘कहीं समीप ही, अकेले हैं।’–मनने कहा।

‘तुझे कौन आकर समाचार दे गया ?’ मैंने झिड़का-

‘वे अकेले तब भी मुझसे बात करते नहीं बनेगा!’

‘बात नहीं! एकबार देख भी लें।’–मनने अनुनय की

‘वह तो संध्याको होगा न! वनसे लौटते हुए………

तभी करुण स्वर आरोह-से अवरोहपर उतरा ! स्वर मूर्छनाने मुझे व्याकुल कर दिया –

‘आह, दयीमारे! तू जो न कराये सो थोरी! आह दबाकर, मैं लड़खड़ाते पदोंसे चली।’

तमाल तरुका आश्रय ले खड़े श्यामसुंदर तिरछी ग्रीवा, तिरछे नयन मत्स्य, तिरछे कुण्डल, तिरछी कटि और तिरछे चरण लहराता मयूर पिच्छ और फहराता पीतपट, संकुचित अधरपुट और वंशीके छिद्रोंपर नृत्यरता चंपक कलिकाओं-सी उँगलियाँ! बीच-बीचमें वे ठहर जाते, तब अर्धनिमिलित दृगोंके सुकोमल पलक-पटल उघड़ जाते । वन पुष्पों, वन-धातुओं और स्वर्णाभरणोंसे भूषित तनमें सौंदर्यकी मानों लहरें उठ रही हों।

मेरी इन दो छोटी-छोटी आँखों में यह महासागर कैसे समाये! किंतु आँखोंने क्षमतानुसार जितना बटोरा; हृदयने झपटकर क्रूर दस्युकी भाँति उसे छीनकर अपनी अंतरगर्भ मंजुषामें सहेज लिया। कुछ क्षण! हाँ, कुछ ही क्षण तो नयनोका संग्रह और हृदयका दस्यु-कर्म चलता रहा! अकस्मात वेणुके पाँव दबानेवाली सेविकायें थमी; तो मानो सारी सृष्टि साँस रोककर थम गयी।

दृष्टि मेरी ओर उठी तो पलकें झुक गयीं। चरणकमल निकट आये तो कमल, चंदन, अगर, केसर और तुलसी मिश्रित देहगंध चारों ओर घूम घूमकर मुझे लपेटने लगी ।

‘चंपा।’

‘मैं तो भूत हूँ चंपा; व्रजराज कुमार नहीं! वह तो सुहाता नहीं न तुझे? ऊपर देख, मैं वही यमुना-पुलिन वाला भूत हूँ?
क्या नाम रखा तू ने मेरा?
क्या कहा तू ने भगवती पौर्णमासीसे? मधुमंगल कहता था तू ने मेरा नाम ‘मन्मथ’ रखा है।
क्या वह सच कहता था ?”
उसने हंसकर दो उंगलियों से मेरा चिबुक ऊपर उठाया-
‘तू मुझे सखा बनाना चाहती है न! भला सखा से इतना अलगाव कैसे निभेगा री ?”
नेत्र उठाकर मैंने उस लहराते महासागरकी ओर देखा तथा दृष्टि नीची करके धीरे से कहा-

‘मैं जा रही हूँ।’

‘कब?’ उसने चौंककर पूछा।

‘कल।’

‘चंपा!’-
रूंघा कंठ-स्वर सुनकर मैंने चौंककर सिर उठाया ओर देखा….कि कमलदृग भरे-भरे से थे।

‘यह क्या ?’– मेरे व्याकुल कंठसे निकला।

‘क्या कहूँ चंपा! तुम्हें कुछ चाहिये तो नहीं ?’
‘नहीं! मुझे तो कुछ नहीं चाहिये।’-

लगा, इतनी सी बातपर दुःख क्यों? मुझे तो सब कुछ मिल गया है।

‘मुझ-सा निष्ठर कोई न होगा सखी!’

‘माँगू?’- कोई ओर पथ न पाकर मैंने कहा।

‘हाँ चंपा! कह तो।’ वह हर्षपूर्वक बोले।

‘तुमने मुझे अभी सखी कहा है; यह भूलना मत !’

‘चंपा!’- उन्होंने सिरपर हाथ रखा, तो कृतार्थ हो गयी।

‘मेरी प्रसन्नता के लिये कुछ स्वीकार करेगी ?’

मैंने सिर हिला दिया और जड़ाऊ मुक्ताहार मेरे गलेमें आ पड़ा।

‘यह क्या श्यामसुन्दर ?’

‘यह देख!’– उन्होंने नीचेके लटकनका ढक्कन खोलकर दिखाया।

यह तो उनका चित्र था ! मैंने फिर प्रसन्नतासे सिर हिलाया।

‘यह चित्रा ने बनाया है।’ उन्होंने कहा- ‘मुझे भूल तो न जायेगी ?’

‘सम्भव लगता है तुमको ?’

‘तुझे विदा करनेको मन नहीं करता!’

‘कुछ उपाय है रुकने का ?” फिर तनिक रुक कहा-

यह बात क्या ब्रजराज कुमारकी है?

‘नहीं तेरे मन्मथ की; आ बैठ मैं तेरा श्रृंगार करूँ!’
हाथ पकड़कर उन्होंने मुझे अपने समीप बिठा दिया। उंगलियोंसे सुलझाकर केशोंकी चोटी बनायी। अपने गलेको पुष्पहार उतार कर केशोंमें गूंथा।
दूसरा हार उतारकर मुझे पहनाया, वह कुछ लम्बा लगा, तो तोड़कर हाथके गजरे और कानोंके लिये कर्णफूल बनाकर पहनाये।

‘अब यह सेवा मुझे मिले!’ मैंने कहा ।

‘अच्छा।’

स्वीकृति पाकर मैंने फूल चुने और उनका शृंगार किया। दोनोंने साथ खड़े होकर यमुना जलमें अपनी परछाहीं देखी।

‘वस्त्र सूख गये हैं, अब जाऊँ ? संध्या समीप है।’

‘पुनः कब लौटेगी?’

‘कैसे कहूँ !’
मैंने झुककर चरण रज ली ।

‘चंपा!’– उन्होंने उठाकर अंकमें भर लिया। उन जलज नयनोंसे कई
बूँदें झरकर मेरा अभिषेक कर उठीं। उनकी यह भक्त-परवशता।

‘यह क्या श्यामसुन्दर ! मेरा धीरज कैसे बचेगा फिर?”

‘तू ने कुछ पाया है चंपा ! मैं तो खो रहा हूँ।’

‘हाँ, मैंने पाया है अतुलनीय धन! किंतु काँटा-कंकड़ जो भी हूँ, इन चरणोंमें अर्पित हूँ; फिर खोनेकी बात क्यों प्रभु !”

‘चंपा….. चंपा….!’–
उनके व्याकुल स्वरने मेरा धीरज चुका दिया। मैं बरबस दौड़ पड़ी।

पद्मा जीजीकी कंचुकी मेरे आँसुओंसे गीली हो गयी-
‘चंपा! धीरज धर
मेरी बहिन! उसने मुख पोंछकर अंकमाल दी—

‘तू हम सबसे विलक्षण निकली।’

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-16



कहा कहूँ सखी…! उन नयनन की बात

मेरो पालित मृगशावक बंसी-रव सुनते ही उस ओर भाग छूटा।
मैं आश्चर्य चकित हो देखने लगी यह आज कौन आ गया हमारे वनमें ? अलगोजा बंसी, तो हमारी भीलपल्लीके अनेक युवा एवं वृद्ध बजाते हैं; किंतु यह अनोखी मिठास, मुझसे अधिक सोचा न गया, पाँव अपने आप उस और उठने लगे।

बरियायी खींची-सी जाकर एक वृक्ष तले खड़ी हो गयी। आँखें अपने आप अमृत बरसानेवाले स्रोतपर जा टिकीं। ग्वाल-छोकरों और पशुओंसे घिरा वह घनस्याम स्वरूप और कानों में उतरती वह रसधार- दोनों सरितायें नयन तथा श्रवण पथसे चलकर हृदय सरोवरको भरने लगी।

जब वह ध्वनि विरमित हुई, तब भी कुछ समय तक मानो कानों में गूँजती रही सचेत हुई तो देखा – गौओं और वनपशुओंसे घिरी खड़ी हूँ। वह पीतपटवारा मेरी ओर निहार कर मुस्करा दिया। लगा जैसे हृदयसे कुछ खिसक (सरक) गया हो। मैं पग-पगपर ठोकर खाती, गिरती पड़ती और छौनेको दुलारती हुई मृगशावक के साथ सूना- हृदय और सूने नेत्र लेकर वापस आयी।

यह मुझे क्या हो गया ?
मैया-बाबा वनमें मधु संचयके लिये भोर ही को चले जाते हैं। घरका सारा काम मैं ही करती हूँ । झाड़-बुहारीसे लेकर बकरी दुहना, सूखी लकड़ी और कंडोंका संग्रह। मक्का अथवा बाजरीकी राबडी बनाना फिर खा-पीकर बकरियोंको चराने निकल जाती। वहाँ वनमें अपनी सखियोंके संग वन-धातु गेरु, खड़िया और रंग-बिरंगे पत्थर, पक्षियोंके पंख आदि इकट्ठे करके खेलती, हँसती और कभी-कभी झगड़ती भी थी। कैसा चिंता विरहित जीवन था ।
मेरे दोनों भाई मुझसे बड़े हैं, उनका विवाह हो गया है, उन्होंने अपनी अपनी झोपड़ी न्यारी बना ली है। मैं मैया-बाबाकी बढ़ौतीकी संतान हूँ। उनका सारा लाड़-दुलार मुझपर ही बरसता रहता है। मैं भी बस चलते उनका कहा नहीं टालती। किंतु आज मुझे उन साँवरे कुंवरको देखकर जाने क्या हो गया; काम काज, खाने-पीने और खेल कूद का सारा उत्साह समाप्त हो गया।

जैसे-तैसे काम निपटाकर बकरियाँ लेकर वनमें आयी तो भूरी, जीवी, दीतू, मुंगली, सब दौड़ी आयी खेलने को। मुझे अनमनी देख कहने लगीं-

‘कहा भयो ? कछु मांदगी लग गयी तोकू ?’

‘हाँ सखी! मेरो जी ठीक नहीं। तुम सब खेलो, मैं उस वृक्ष तले तनिक सो जाऊँ।’–कहकर उन सबसे पीछा छुड़ाया।

किंतु सोनेपर भी चैन न मिला, रह-रहकर शरीर काँप उठता और हृदयमें खड्डा-सा पड़ जाता । साँवरे कुँवरकी वे कारी-कारी मोटी अँखियनकी वे कारी भंवर पुतरियाँ उनकी वे अधखुली पलकें और वह चराचरको खींच लेनेवाली चितवन, रह-रहकर हियमें शूल सी चुभ रही थी। किंतु उस पीड़ामें कितना सुख है, इन आँसुओंसे कितनी शांति मिलती है सो कहा नहीं जाता

तभी….
तभी वह बंसुरी पुनः बज उठी,
न जाने कहाँसे शरीर में इतनी शक्ति आ गयी कि अपना धूलिभरा मुख लेकर दौड़ पड़ी ,,,
उधर मृगछौना तो मुझसे पहले ही वहाँ पहुँच, उनकी जाँघपर मुख धरकर खड़ा था। एक दृष्टिमें जो दिखा सो दिखा, फिर तो दृश्य जगतमें वही वह भर गया।

जब मुझे चेत आया,
अपनी झोपड़ीमें कथरीपर पड़ी थी। बाबा मैया, दोनों दादा और भाभियोंने मुझे घेर रोना आरम्भ कर दिया था। मैया अपने भीगे आंचलसे मेरा मुख पोंछ रही थी और भाभीके हाथका व्यजन हिल रहा था।
चेत होते ही मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी; यह देख सबके मुख प्रसन्नतासे खिल उठे। मुझे उठते देख बाबाने दोनों हाथ जोड़ सिरसे लगाये-

‘जय भोले नाथ!’

मेरे बाबा महादेव बाबाके पक्के भगत हैं। भोर होते ही नहाकर एक लुटिया पानी महादेव बाबाकी पींडीपर चढ़ानेके पश्चात ही मुख जूठा करते हैं। उनके काँपते कंठकी ध्वनिसे ही मुझे ज्ञात हुआ कि वे मेरे कारण कितने चिंतित हैं।

सुगना! तुझे क्या हुआ मेरी लाली ?’ मैयाने ममता भरे स्वरमें पूछा।

‘मैं क्या कहती सखी! कहा- कुछ भी तो नहीं मैया! मुझे सम्भवतः नींद आ गयी थी। कहकर हँसते हुए मैंने मैयाकी गोदमें सिर रख दिया।

वे सब आश्वस्त हुए। किंतु बहिन! हृदयमें वे अनियारी आँखें जैसे तिरछी होकर अड़ गयी हैं। रह-रहकर कलेजेमें कसक उठती है, में कराहकर रह जाती हूँ।’

‘यह कैसी मांदगी लग गयी मिट्टी मुझे ? कोई औषध बता न! इससे तो न जीया जाता है, न मरा ही जाता है।’- सुगना मेरी गोदमें सिर रखकर अचेत हो गयी।

क्या कहकर उसे धीरज बँधाऊ! यहाँ तो ‘आपे बामन माँगता औरन को कहा भीख दे’ वाली बात है।

मैंने उसे छातीसे लगाकर भरे गलेसे आँसू बहाते हुए कहा–

‘सुगना! धीरज धर मेरी बहिन! जो तेरी दशा है, वहीं मेरी भी है। किंतु हम क्या करें ? हमारी पीड़ाकी औखद कहीं नहीं है। कहाँ हम दीन हीन भील कन्यायें और कहाँ वे व्रजराज कुंवर ! कहाँ चन्द्रमा और कहाँ कांचका टुकड़ा। हमें उनके दर्शन हो जाते हैं, उनकी चरणधूलि मिल जाती है यही बड़ा सौभाग्य है।’

मेरी बात सुन सुगना आँखें फाड़-फाड़कर मेरी ओर देखती रही। फिर अटकते स्वर निकले– ‘व्र…. ज… रा…. ज…. कुँ….अ….र…?’

‘हाँ बहिन! मैं उनके भवनमें फल लेकर गयी थी। उनकी मैयाने मूल्य देना चाहा, किंतु मैं प्रणाम करके चली आयी। आज उन्होंने कहलाया है मेरे लालाको तेरे फल बहुत रुचे, अतः नित्य दे जाऊँ। इसी कारण पाँच-सात दिनतक मैं आ नहीं पायी तेरे समीप।’

‘सखी! मुझसे तो मेरा मृगशावक ही भाग्यवान है। वह तो बंसी ध्वनि सुनते ही निर्द्वन्द दौड़ता हुआ जाकर उनके अंग-से-अंग लगाकर खड़ा हो जाता है। मेरे दुर्भाग्यका कहीं अन्त नहीं! बाबा मैया मुझे देख-देखकर चिंतामें घुले जाते हैं सो अलग।’

‘सुन सुगना ! आज तू मेरे साथ फल लेकर राजाके भवनमें चली चल।’ – मैंने कहा।

ना सखी! यदि कहीं भवनमें कुँवर जू दृष्टि पड़ गये तो क्या करूँगी! उन्हें देखकर मुझे ध्यान नहीं रहता, कहीं अचेत होकर गिर गयी अथवा पाहन-सी स्थिर होकर उन्हें देखने लगी; तो लोग क्या कहेंगे?
मेरा तो कुछ नहीं पर वे राजकुंवर हैं न, उनका मान छोटा हो जाय यह तो ठीक नहीं रहने दे बहिन! जो मेरे भाग्यमें होगा भुगतूंगी
कभी-कभी समय निकालकर मिल लेना, तेरी बातें सुन बड़ी ठंडक मिली।’

‘अच्छा बहिन, आऊँगी।’- कहकर मिट्टी चली गयी।

‘कालू! तू कितना भाग्यवान है रे, कि उनके समीप जाकर जी भरकर रूप देखे और बंसुरिया सुने। जब जी चाहे उनका स्पर्श भी कर ले।’—
मैं अपने मृगशावकके गलेमें बांहें डालकर बातें कर रही थी। और है ही कौन ? जिससे हृदयकी बात कहकर जी हलका करूँ! मेरे नेत्रोंसे झरती बूँदे कालूका अभिषेक करने लगीं, तो उसने मुख फेरकर अपनी बड़ी-बड़ी आँखोंसे मेरी ओर देखा, मानो कहा-

‘थोड़ा धैर्य धर बहिन!’

‘कैसे धीरज धरूं मेरे वीर!’

मैंने भरे गलेसे कहा-

‘मानुष जन्म पाकर मैंने क्या पाया? मुझसे तो तू पशु भला है! मैं क्या करूँ कालू ! कैसे यह मनकी पीर मिटे ? मिट्टी मुझे उनके भवनमें चलनेको कहती थी, किंतु यह कैसे बने। मेरे पैर तो उन्हें देखते ही ढीले पड़ने लगते हैं, दृष्टि धुंधला जाती है, तन-मनकी सुधि नहीं रहती! ऐसेमें वहाँ जाकर क्या होना ? वह राजाका महल है, वहाँ तो बहुत लोग होंगे। मेरे मुखसे कुछ निकल गया, तो सब हँसेंगे नहीं ? मुझे हँसे तो कोई बात नही ! किंतु कालू उन्हें कोई हँसा, तो कैसे सहा जायेगा मुझसे ? ना भैया ना! मैं यही भली।’

‘अच्छा कालू! तू तो अनेक बार उनके पास हो आया है। बता तो मेरे वीर! उनकी देह-गन्ध कैसी है, उनका स्वभाव कैसा है और कैसी है उनकी बोलनि चलनि ? क्या उन्हें ज्ञात है कि अभागिनी सुगनाको ऐसा रोग लगा है। जिसकी औषधि या तो वे स्वयं हैं अथवा फिर मृत्यु ही इसे शांत कर सकेगी ? हाँ रे कालू ! बिना ही काजल काली उन अँखियोंकी वह अनोखी चितवन, उन आँखोंकी वे टेढ़ी बरौनियाँ, वे तीखे लाल कोए तूने देखे हैं ? कैसी नुकीली हैं वे आँखें! एकबार हृदयमें कटारी-सी उतर जाँय तो जैसे निकलना जानती ही नहीं; भीतर ही भीतर कसकती रहती है। राते डोरोंसे सजी उन काली भंवर आँखोंको देखा है तू ने ? पर नहीं; तू ने देखी होतीं तो क्या ऐसे निश्चिन्त होकर पागुर कर पाता ? खान-पान और नींद भूल बिसर न जाती भला?
फिर तो उनके संग-ही-संग डोलता केवल । किंतु तुझे कहाँ कोई
बाधा है भैया! दुर्भागिनी तो यह सगुना ही है।

क्या कहता है रे! वे मेरी पर पहचानते हैं? क्या मेरे कारण ही वह तुझे यहाँ भेजते हैं; तू नहीं आना चाहता?

‘यह सब क्या कह रहा है कालू! भला यह तो कह; उन्हें मेरे बारेमें बताया। किसने?
क्या,,,,,, तूने कहा ?
बावरे! यह सब क्या कहनेकी बातें हैं? महाबुद्ध है रे कालू! वे न जाने क्या सोचते होंगे मनमें। वे बहुत बड़े हैं, बहुत बड़े और मैं ?….
मैं एक भीलनी ! तूने उचित नहीं किया रे कालू! अब अपना यह लज्जा भरा मुख लेकर यमुनामें डूब मरना होगा। तूने यह क्या किया पगले, यह क्या किया…. !’

‘अरे कालू ! तू यहाँ बैठा है रे; मैं तो तुझे ढूँढ़ता-ढूँढ़ता थक गया।’

‘अरे यह कौन है!
कच्चे गलेकी ऐसी मीठी वाणी किसकी है?
होगी किसी की मुझे क्या ! कालूसे न जाने इसका क्या काम पड़ गया है कि ढूँढ़ता ढूँढ़ता थक गया बिचारा !’

‘कालू! उठ।’

कालू तो सचमुच उठ खड़ा हुआ मैंने खीजकर मुख फेरा उस ढीठको देखने के लिये, जिसने हमारा एकान्त भंग किया।
मेरी गाली मुखमें ही रह गयी सामने ही कालूके गलेका घूंघरू थामें, दूसरे हाथसे उसका मुख सहलाते वे ही पीतवसन सांवरे कुँअर खड़े मुस्करा रहे थे।
मैं बैठी-की-बैठी ही रह गयी; आँखें निपट निर्लज्ज होकर उस मोहिनी चितवनमें जा समायी।

‘ऐसे क्या देख रही है री ! यह मृगछौना तेरा है ? बहुत प्यारा लगता है मुझे।’

वह सुधास्यन्दि स्वर कानों में उतरा तो नेत्र सहज ही झुक गये।
अहा! चरण कितने सुन्दर ! तुरन्त खिले दो कमल हों जैसे न जाने क्यों नयन झर उठे मेरे।

‘अरी रोती क्यों है ? क्या दुःख है तुझे ?’–

वे वहीं भूमिपर बैठ गये मेरे समीप कालूने उनके कंधेपर मुख धरकर नेत्र मूँद लिये ।

“क्या हुआ तुझ ? भूख लगी है, फल खायेगी! ले मेरे पास है, खा ले। बहुत मीठा है।’ उन्होंने फलको दांतोंसे काटकर खाते हुए कहा।

‘अरी तू रह-रहकर काँपती क्यों है? भय लग रहा है तुझे ?
किसीने तुझे मारा है?
क्या बात है कह तो! ले, यह फल ले।’ उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर फल थमा दिया।
अरी यों पाहनकी मूरत जैसी क्यों हो गयी!
मुझसे रूठ गयी है क्या ?
मैं तेरा मृगछौना छिनूँगा नहीं!
आज इससे तनिक छोटा मृगछौना विशाल दादा लाया है कहीं से! उसकी मैया भी संग-संग लगी आयी है। कालूको उससे मिलाने ले जा रहा हूँ; यह वापस लौटकर तेरे पास आ जायेगा, समझी ?’

मैं क्या कहती!

‘अरी बोलती क्यों नहीं! रोती-ही-रोती है। चल और कुछ नहीं तो गाली ही दे दे; पर बोल तो!’

मेरे अवश अंग लुढ़क पड़े, उनके सम्मुख धरतीपर औंधी गिर पड़ी।

गलेसे रूंधा स्वर निकला –

‘सांवरे…. कुँअर…. ।’

वे हँस पड़े–’मैं सांवरा हूँ तो तू क्या उजली है सखी ?’

दोनों हाथोंसे कंधे पकड़ उठाते हुए बोले-

‘क्या दुःख है तुझे बोल !
किसीने मारा है; किसीने गाली दी है ? किसीने कुछ छीन लिया है?
मैं तेरा दुःख मिटा दूँगा।’
मेरा मुख ऊपर उठाते हुए उन्होंने कहा।

‘कुँअर जू!’ मैं अटकते हुए बोली- ‘मुझे और किसीने दुःख नहीं दिया।’

‘तो क्या कालूने दिया है ?’ वे हँसे–’इसने सींग मारा तुझे ?’

मैंने ‘नहीं’ में सिर हिला दिया।

‘तो क्या मैंने दुःख दिया तुझे ?’

मेरा सिर झुक गया।

‘हाँ’ कैसे कहूँ! और ‘ना’ भी कैसे…. ?

‘ऐं!’

वे जैसे चौंक पड़े– ‘मैंने दुःख दिया तुझे! बोल क्या बात है ?’

‘मुझे मेरे भाग्यने दुख दिया है।’- कहकर मैंने निश्वास छोड़ी।

‘क्या बात है कह; तुझे मेरी सौगन्ध! उधर सखा मेरी राह तक रहे होंगे, तू
फट-फट कह दे ! कोई ढूँढ़ता हुआ इधर आ निकला, तो सारी बात रह जायेगी।’

‘सौगन्ध क्यों धरायी कुँअर जू! तुम्हारी अखियोंने दुःख दिया है मुझे ये देखनेमें बहुत सुन्दर हैं, किंतु कटार से भी अधिक तीखी धार है इनमें! न जाने किस पथसे हियामें उतरकर, आरी-सी चलाती रहती हैं। न देखनेसे चैन है और न बिना देखे चैन मिले!’–
एक ही साँसमें सब बोल गयी मैं।

अब न जाने क्या होगा!
यह भय हृदयको मथने लगा।
सौगन्ध न दी होती, तो मरनेपर भी कुछ न कहती!

“क्या नाम है तेरा ?”

“सुगना।”

मैंने डरते-डरते आँखें उठायी।

‘ये नेत्र तुझे केवल रुलाते ही हैं! यदि ये न रहें…..

‘स्वामी,,,,,,!’

मैं आर्तनाद करती उनके चरणोंपर गिर पड़ी-ऐसा दण्ड मुझे न दो स्वामी! मुझे रोनेमें जो सुख मिलता है, वह अबतक हँसीमें कभी नहीं पाया!”

‘तब तू क्या चाहती है सुगना ? ‘

‘मैं क्या चाहूँ! मैं समझी नहीं ?”

‘अच्छा, देख कर बता!’–वे हँस पड़े।

‘बड़े-बड़े महल, हाथीपर बैठे अग्निके समान तेजस्वी पुरुष, चमकते पत्थरों से जड़े आभूषण, रंग-बिरंगे अनेक ज्योतिष्मान पत्थर, उड़ते-फिरते घर, दास दासी, गायें-भैंसे, खेत-खलिहान, कुएँ-तालाब… इतना बड़ा तालाब कि दृष्टि जहाँ तक जाय जल-ही-जल, लहरें पहाड़-सी। दो, चार, पाँच और छः सिरवाले आदमी! सोना, चांदीके बरतन, गहने और अथाह सम्पत्ति जाने क्या-क्या दिखता रहा सपनेमें, जब चेत आया तो वैसे ही कुअँर जू के
सम्मुख बैठी हूँ।’

‘कैसा लगा तुझे यह सब ?’– उन्होंने पूछा।

मैं हँस पड़ी-

‘सपना बड़ा सुंदर था कुअंर जू! ऐसा सपना मैंने कभी नहीं देखा।

‘यह सपना नहीं बावरी ! सच है। इसमें से तुझे जो चाहिये, जो रुचे सो कह, मिल जायेगा।

‘सच ?’

“हाँ, हाँ सच! कह तो, क्या चाहिये ? ‘

‘किंतु क्या करूँगी इनको लेकर मैं? बेचारे सब-के-सब पागल कुत्तेकी भाँति दौड़ते-फिरते हैं, कहीं चैन नहीं-सुख नहीं। जिसे सुख समझकर हाथ पसारे, वही दुःखसे लिपट करके हाथ आता है। कोई उनको चाहता नहीं, ऐसे ही हाय-हाय करते दौड़ते-भागते और हांफते हुए एक दिन हाथ पसारके मर जायँ! जो उनका था सो दूसरेका हो गया। जब मरना ही है तो इतना प्रपंच क्यों ?
किंतु कुँवर जू! तुम मुझे कुछ देनेको कह रहे थे न?”

‘हाँ, सुगना! वही तो पूछ रहा हूँ कबसे।’

‘तो कुँवर जू! मुझे ऐसा सपना कभी न दीखे। इसमें से तो कुछ नहीं चाहिये। किंतु,,,,,

‘वही कह सुगना!’– वे उत्साह पूर्वक बोले ।

‘कुँवर जू!’ – मेरे काँपते हाथ उनके चरणोंकी ओर बढ़े, चरणोंको भुजाओंसे बाँधकर, उनपर सिर धरते हुए मैंने कहा-

‘मेरा मन तुममें ही रमा करे, क्षण भर भी इधर-उधर न हो। तुम्हारे दर्शन हों कि न हों, तुम मिलो कि न मिलो! पर मैं तुमसे मिली रहूँ। तुम्हारी ये कमलपत्र सी अंखियाँ सदा ऐसे ही हियमें गड़ी कसकती रहें। यह घाव कभी पुरै नहीं, आँखें कभी सूखें नहीं।’

जैसे बिजली चमकी हो ऐसे ही कुँवर जू ने मुझे हृदयसे लगा लिया;
उस आनन्दको सम्हाल सके ऐसा कौन है संसार में?
मैं अचेत हो गयी।
चेत आया तब वे गीले पीतपटसे मेरा मुख पोंछ रहे थे।

‘सुगना!’–

उनकी वे सुन्दर आँखें भरी भरी लगीं, उन्होंने काँपते कंठ स्वरसे पुकरा ।

मैं एकदम उठ बैठी—

‘क्या हुआ?’

उन्होंने मेरा मुख अपने हाथों में ले लिया-

‘सुगना! तुने मुझे अपना दास बना लिया।’

‘यह क्या कहते हैं स्वामी!
तुम…. तुम…. कौन हो यह तुम्हारी कृपा से ही मैं जान पायी हूँ। कहाँ तुम, और कहाँ मैं मूर्ख भीलनी दासी
मैं तुम्हारी जन्म-जन्मकी; ऐसी अनीति मत करो मोहन!’

‘एकबार और कह सुगना।’

‘मोहन!’-
मेरे नेत्र झुक गये।

‘बावरी! मैं जात-पात, ऊँच-नीच, बुद्धिमान और मूर्ख नहीं देखता। मुझे तो प्रेमका नाता ही भाता है। इस रज्जूसे तूने जकड़कर बाँध लिया है मुझे !

इसीसे तू मेरी है और मैं तेरा,
हम न्यारे नहीं!’

मैं क्या कहती ?

एक अज्ञ भीलनी क्षणभरके सानिध्यसे क्या-से-क्या हो गयी। जो ज्ञान ऋषि-मुनि हजारों वर्ष तपस्या करके पाते हैं, वह बिना कुछ प्रीत बड़ी बेपीर
किये सुगना पा गयी। पर इसका भी क्या करेगी सुगना ?

इसका इस कंकड़से अधिक मूल्य नहीं मेरे पास! मेरा धन तो तुम हो मेरे प्राण गरीबनी बनाकर मत छोड़ जाना! ! मुझे

उनके सखा हैं, बाबा मैया और घर-गाँव है, वे उनके समीप गये कि नहीं, मैं नहीं जानती!
मुझे तो यही ज्ञात है कि वे दिन-रात मेरे ही साथ लगे रहते हैं।

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श्याम सखियाँ-15



जात की कहा बात करे सखी! स्याम ही प्रेम पियारो

उस दिन मैयाने झड़बेरीकी डाली काट लाने भेजा था। मैंने कहा भी था- ‘डाली यहाँ काटकर लाऊँ; इससे तो छौनेको ही क्यों न चरा लाऊँ?” किंतु मैयाने मुझे डाँटकर भेज दिया। छोटी कुल्हाड़ी कंधेपर धर में झोपड़ीसे बाहर आ गयी। डाली छौनेके समीप रखकर, उसके गलेकी डोरी खोल दी। किंतु खुलते ही अभागा सीधे आँगनसे होकर बाहर भागा।

मैयाके डरसे मैं भी पीछे दौड़ी! सच भी हैं, कोई कुत्ता-सियार मुँह में दबा ले तो ? अभी तो महीने भरका भी नहीं हुआ ! किंतु छोटा है तो क्या हुआ, भागता कितना तेज है मरा अरे यह तो गायों के समूह में जा घुसा। कहाँ किसीने सींग या लात चला दी तो, और कहीं कुचल गया…. आगे सोचा न गया, मैं भी दौड़कर समूहमें जा घुसी। वह नटखट उधर ‘बॅ… वे’ करता गायोंके पैरोंके बीचसे भागा जा रहा था और पीछे-पीछे मैं भी। गावें बहुत बड़ी-बड़ी सुन्दर और सीधी थी, अन्यथा ऐसी अनजान भागम-भागमें पशु भड़क उठते हैं। छौनेपर मुझे क्रोध आ रहा था, कितना दौड़ाया मुझे ! कुछ हो गया इसे तो मैया मारेगी–डांटेगी सो अलग। पा जाऊँ, तो दो-चार चपत तो लगा ही दूँ मरे को ।

एकाएक ठिठककर रुक जाना पड़ा मुझे! गायोंके बीचसे निकलकर छौना सीधे वटके नीचे गोप- बालकोंकी ओर दौड़ा। एक पीत वस्त्रधारी साँवरे किशोरको घेर कर सब छोकरे बैठे थे। छौनेके गले में बँधे घुंघरुओं की ध्वनि सुन, सबने पलटकर देखा छौना सीधा फुदकता हुआ उस साँवरे कुमारके सम्मुख जा खड़ा हुआ।

उन्होंने बाहें पसार कर, ‘अरे कैसा सुन्दर ,,,अजा शावक !-कहकर उठा लिया।
वे एक हाथसे उसे वक्षसे दबाये थे, दूसरेसे उसे सहलाते हुए मुख, नेत्र और पीठपर चुम्बन अंकित करते जा रहे थे। मैं दूर खड़ी उस सांवले सलोने रूपको देखते हुए छौनेके महा-भाग्यकी मानो साक्षी दे रही थी। न समयका ध्यान था न शरीरका! तभी उन्होंने मीठे स्वरमें पूछा

‘किसका है रे तू?”
उस स्वरकी माधुरीने कानोंमे प्रवेश करते ही तनमें झनझनाहट-कम्प उत्पन्न कर दिया। साथ ही देखा ‘किसका’ कहते हुए उनके कोमल रतनारे नेत्रोंकी पलकें ऊपर उठी।

क्या कहूँ! दृष्टि मिलते ही सारी सृष्टि लोप हो गयी । यहाँतक कि वे गोपकुमार, छौना और उनका वह शोभाधाम शरीर-मुख कुछ भी स्मरण न रहा- रह गये। मात्र रक्तिम डोरोंसे सज्जित नयन कंज धीरे-धीरे वे नयन समीप आये-

‘तेरा है यह छौना?’
पुनः वही मीठा स्वर कानोंकी राह भीतर उतर कर किसी रीते सरोवरको भरने लगा। उन्होंने छौना मेरे हाथों में थमाया। कब मैं लौटी घर कुछ भी स्मरण नहीं । मैयाने ही झंझोड़कर जगाया-
‘अरी बैठी-बैठी ही सो रही है? अभी तो सूरज उगा ही है। छोड़ इस छौनेको, पत्ते खाने दे। यह छोरी क्या करेगी अपने घर जाकर! नित उठ मार खायेगी। अरी उठ तो; टोकरी लेकर कंडे और लकड़ी बीन ला।’

समीप आकर फिर पूछा–
‘तेरा जी तो ठीक है, कोई मांदगी तो नहीं लगी ?”
उसने माथा हाथ और पेट छूकर देखा और ‘नहीं’ में माथा हिला दिया—
‘भूख लगी हो तो उठ, आधी रोटी पड़ी है खाकर जा। मैं और तेरे बाबा शहद लेने जायेंगे।’

‘कहा कहूँ स्वामिनी जू !
वा समय ते मोकू जाने कहा भयो!
न कछु काम सूझे, ना काहू की बात सुहावे बकरीके छौनेको जाने कहा बान पड़ गयी है; नित उठ भाज जाय वाहि ठौर। मैं जातकी भीलनी, कैसे वाकी सेवा पाऊँ ! एक दिन मैंने उपाय खोज निकाला! वनसे फल-फूल तोड़ लायी, तमालके एक छोटे पेड़का फूलोंसे शृंगार किया, फलोंका भोग लगाया और चरणोंमें सिर रखा। यही मेरे जीवनका पूजा-पाठ नित्यकर्म बन गया।’

एक दिन ऐसे ही भोग धरकर बैठी देख रही थी कि ‘क्यों री पेड़ को फल खिला रही है ?’– सुन चौंककर मैं खड़ी हो गयी।

‘कोई देवता है यह पेड़ ! पूजा कर रही है क्या ?
एक फल मुझे भी दे न, बड़ी भूख लगी है मुझे।’

मैंने सारे उनके सम्मुख रख दिये।

‘अरी फिर तेरे देवताको क्या भोग लगायेगी ?’

मैं क्या कहती पत्थरकी मूरत सी खड़ी रही।

“अच्छा चल तू भी खा; मैं अकेला तो नहीं खाऊँगा!’
कहकर उन्होंने एक फल चखा और मुँह बिगाड़कर बोले-
‘खट्टो है।’
दूसरा उठाया और दाँतसे काटकर और बुरा मुँह बनाया
‘राम….राम, जे तो कड़वो है।
तीसरा
‘खारा’ लगा।

हृदय भीतर ही भीतर रो उठा-

‘हाय! आज चिर अभिलषित आशा फलवती होनेको आयी, तो दुर्भाग्यने उसपर अंगारे औंधा दिये।’

आँखोंमें भरे आँसू एक साथ झर पड़े। मैं डलिया लेकर और फल लेने चली, तो मेरा हाथ थामकर बिठा दिया।

‘कहाँ जा रही है? बैठ।’

कहकर उन्होंने एक और फल उठाकर चखा, उत्फुल्ल होकर बोले-

‘अहा जे तो मीठो है।’

अभी आधा फल भी न खा पाये होंगे कि एकदम खड़े होकर बोल उठे-

‘मेरे सखा पुकार रहे हैं, मैं जाऊँ ?’

और हाथमें फल लिये उत्तरकी प्रतिक्षा किये बिना एक ओर को भाग चले।

बड़ी देरतक मैं पाहनकी तरह बैठी रही। फिर डलियामें जो फल उनके चखे हुए थे उन्हें खाने लगी; वे सबके सब अत्यन्त स्वादिष्ट और मीठे थे।

‘कृपासिन्धु हैं वे, स्वामिनि जू ! घरमें बाबा मैया मेरी दशा देखकर चिंतित रहने लगे। उन्होंने दवा दारू, झाड़-फूँक, टोटके-टमने सब कर देखे। किसी दादी-बूढ़ीने मैयासे कहा-छोरी सयानी है गयी, अब याको ब्याह कर दो और कछु मांदगी नाय।’

अब बाबा छोरा ढूँढ़ने में लगे हैं। मेरे प्राण सूखे जाते हैं।

‘कौन जाने कहाँ, और कितनी दूर, किस खूँटेसे जा बाँधेंगे। फिर मुझे ये दर्शन कहाँ मिलेंगे ?
स्वामिनी जू! आप मुझपर कृपा करें!’-

कहती हुई वह भील कन्या मेरे पैरो पर गिर पड़ी और नेत्रों की वर्षासे उन्हें भिगोने लगी ।

मैं क्या कहती ?
अपनी हृदय-व्याधिसे व्यथित हो यहाँ आयी। तो यहाँ इस तमाल तरुके नीचे इस भील-कन्याको धूरि स्नान करते देखा तो पूछ बैठी। उत्तरमें इसने जो कुछ कहा वह सुनकर मैं सन्न रह गयी। क्या कहकर इसे धीरज दूँ! यह तो व्रजकी प्रत्येक कुमारीकी कथा है। हाथ पकड़ उसे उठाकर बोली-

‘तेरी क्या सहायता करूँ सखी! हम दोनों एक ही रोगकी रोगिणी है।’

‘मुझे अपने घरकी दासी बना लो।’ उसने कहा- ‘मुझे आश्रयके अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं चाहिये। खानेके लिये फल वनसे ले आऊँगी, पहननेको अपनी उतरन दे देना बस! मैं बाबासे कह दूँगी मुझे ब्याह-व्याह नहीं करना!’

‘ नाम क्या है तेरा ?”

‘मिट्टी।’

मैं उसे लेकर अपने घर मैयाके समीप आयी- ‘मैया! इसे अपने घर चाकर रख लें ? “

‘क्यों री ! ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गयी चाकर की ? – मैयाने आश्चर्य से पूछा ।

‘मैं नहीं मैया! यही रहनेको कह रही है। मैंने अपना बचाव किया
‘कहती है वनसे जलावनकी लकड़ी ला दूँगी, अपने खानेके लिये फल भी ले आऊँगी, खिरक बुहार दूंगी और जो भी कार्य होगा सो कर दूँगी, मुझे केवल पहननेके लिये अपनी उतार दे देना।’

‘ऐसी क्या बात है बेटी ! रहो तुम्हारा मन हो तब तक भोजन-वस्त्र जहाँ
हमको जुटते हैं, वहाँ तुम्हारे लिये भी नारायण देंगे।’ मैया बोली।

‘बड़े मीठे फल है मैया! कहाँ ते आये ?’–
श्यामसुंदरने मैयासे पूछा।

‘यह तो मिट्टी लाई है लाला!’

‘मिट्टी! मिट्टी कौन ? मैंने तो यह नाम आज तक नहीं सुना !’

‘अरे लाला ! यह तो भील कन्या है। अपने सुमुख गोपके घरमें चाकरी करती है। उसकी छोरी प्रज्ञाके साथ फल लेकर आयी थी।’

‘उसके साथ बकरीका छौना था क्या मैया ?’–
श्याम कुछ क्षण सोचकर बोले।

‘ना लाला! मैंने तो नहीं देखा। छौनेवाली कोई और होगी!”

‘अच्छा मैया! फल मीठे हैं, उससे कहना नित्य लाया करे। उसे कुछ
दिया कि नहीं ?

मैंने तो बहुत निहोरा किया, किंतु वह कहने लगी-
‘आपके लाला जीम लें, तो मैं अपना श्रम सार्थक मानूंगी ! उसकी आँखें भर आयी थी, इससे मैं अधिक आग्रह नहीं कर सकी।’

‘अच्छा मैया! मूल्य न ले तो न सही, किंतु फल मुझे नित्य चाहिये।’

‘कल आयेगी तो कह दूँगी।’

‘क्यों मैया! उसे अपने ही यहाँ क्यों न रख लें।’

‘दारी के! औरों की चाकर, हम कैसे रख लें ? “

‘तू वा को पूछ लीजो।’

‘नाय लाला! मोते ऐसे काम ना होय!’

‘रहने दे, मैं ही पूछ लूँगा।’

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-14



नातो नेह को मानियत

“जे कहा कर रही है री ?”

छोटी-सी घाघरी पहने, ऊपरसे खुले शरीर-बिखरे केश लिये पाँचेक वर्षकी बालिका वर्षासे गीली हुई मिट्टीमें पाँव डालकर घरौंदा बनाने का प्रयत्न कर रही थी। उसकी छोटी-सी छींटकी औढ़नी थोड़ी दूर घासपर पड़ी थी। गौरवर्ण तन स्थान-स्थानसे धूलि धूसरित हो गया था। गोल मुख, बड़ी आँखें और मोटे होठ उसके भील कन्या होनेकी घोषणा कर रहे थे।

बालिका जैसे ही पाँवपर मिट्टी थापकर संतुष्ट होकर धीरेसे पाँव खाँचती, घरौंदा किसी सुरापीके अवश तन-सा ही ढह पड़ता। वह एक बार झुंझलाती, मिट्टीको पीटती-बिखेरती और पुनः जुट पड़ती। सम्भवतः उसे जिद्द चढ़ आयी थी कि बिना किसीकी सहायताके स्वयं अपना घरौंदा बनायेगी वह ऐसा करके अपने साथी-संगियोंको दिखाना चाहती थी कि वे जो उसे चिढ़ाते थे, अब देख लें कि वह उनसे छोटी होते हुए भी समर्थ है। किंतु घरौंदा भी शायद उसीकी भाँति जिद्दी था कि दूसरेका हाथ लगे बिना बनेगा ही नहीं!

उपर्युक्त वाक्य सुनकर समझी, उसका ही कोई साथी उसे चिढ़ाने आया है। तुनककर बोली-

‘तेरो सिर! कहा काज है तो कू मो सौं ? जो मेरो मन होय सो करूँ; तो कू कहा ?”

‘मैं बना दूँ तेरा घरौंदा ?’

‘भागेगो कि मारूँ?’–

उसने हाथमें मिट्टी उठायी उसपर फेंकने को। हाथके साथ नेत्र ऊपर उठे और वह जैसे स्थिर हो गयी। सम्मुख पीत वस्त्र और रत्नभूषणोंसे सजा सांवला सलोना उसीकी वयका अपरिचित बालक मुस्कराता खड़ा था।☺️

‘क्यों री! ऐसे क्या देख रही है?’– दाँत मोती की लड़ियोंसे चमक उठे।तो उसने हँसकर कहा,,,

‘मार रही थी मुझे!
मैंने क्या बिगाड़ा है री तेरा ?
ला, मैं बना दूँ। – वह समीप आकर बैठ गया।☺️

उसके तनकी गंध – अहा कैसी मन भावनी! मिट्टी फेंकनेको उठा हाथ नीचे हो गया, किंतु आंखें यथावत अपलक उसे निहार रही थीं।

‘नाम क्या है तेरा ?’ – बालक जमकर बैठ गया था। उसने एक पाँव मिट्टीमें डालकर हाथोंसे थपथापाते हुए पूछा-

‘बोलेगी नाय मो सों?
अभी तो खूब बोल रही थी।
क्या नाम है तेरा ?’☺️

‘उजरी।’–
उसने धीरेसे कहा।

फिर पूछा- ‘तेरो ? ‘

‘मेरो ? मेरो नाम कन्हाई!’
कहकर वह खुलकर हँस पड़ा।

‘तेरा नाम मुझे अच्छे लगा, जैसा नाम है वैसी है ही तू उजरी! मैं तो काला हूँ, इसीसे नाम भी कृष्ण मिला। मैया बाबा और सखाओंने बिगाड़कर लाड़से कन्हाई कर दिया। तुझे कैसा लगा मेरा नाम ?’
बालिकाने मुस्कराकर डबडबाई आँखोंसे बालककी ओर देखा, फिर नेत्र नीचेकर लिये

‘बता न ?’

बालकने अपने धूलि भरे हाथसे उसका चिबुक उठाकर निहोरा किया।

‘कन्हाई!’–

बालिकाने लजाकर कहा और फिर दोनों हँस पड़े।

‘देख! कैसा बना है? –
कन्हाईने पैर धीरे से बाहर खींच लिया और बोला।

घरौंदा देखकर उजरी प्रसन्नतासे ताली बजाकर हँसने लगी। कन्हाईने घरौँदेके चारों ओर मेड़ बनायी उसके एक ओर दरवाजा बनाया और बोला ,,,

‘चल उपवनमें लगानेको फूल-पत्ते बीन लायें।’

कन्हाई भी हाथ, पैर और मुखपर मिट्टी लगा चुका था। पटुका और कछनी भी गीली मिट्टीका स्वाद ले चुके थे। ☺️पटुका अवश्य कार्यमें बाधक जान दूर रख दिया गया था, उसे उठाकर गलेमें डाल उजरीका हाथ पकड़ बोला-

‘चल।’

वह भी अपनी डेढ़-दो हाथकी ओढ़नी लेकर पैरोंमें पीतलके पैंजने छनकाती चली। उन पैंजनियोंके संग श्यामके स्वर्ण-नुपूरोंकी छम-छम बड़ी अटपटी! मानों वीणाके साथ भोंपू बज रहा हो, ऐसी लग रही थी।

‘तेरा घर कहा है री ?’– कन्हाईने हाथके पुष्प भूमिपर बिछे पटुके पर धरते हुए पूछा।

उधर, भीलपल्लीमें।’-

उजरीका ध्यान पुष्प पत्र चयनमें कम और अपने नवीन सहचरकी ओर अधिक था।

“कितने बहिन-भाई हैं तेरे ?”” ‘एक भी नहीं! तू बनेगा मेरा भाई ?’

हो ,,,,,,, । तू लड़ेगी तो नहीं मुझसे ?
मैया कहती है मैं बड़ा भोला हूँ;☺️
अरे, यह तू क्या कर रही है, फूल-पत्ते सब सूत-सूतकर डाल रही है। एक भी कामका नहीं रहा। देख ऐसे तोड़ना चाहिये!’
दोनों फूल-पत्ते लेकर लौटे, श्यामने बहुत सुन्दर उपवन बनाया। मेडके
साथ-साथ कुछ बड़ी टहनियाँ रोपकर छाया वाले वृक्ष बनाये। द्वारपर लाठी लिये पहरेदार भी खड़ा किया। छोटेसे सरोवरमें समीपके डाबरसे लाकर पानी भर दिया। यह सब देख उजरी प्रसन्नताके सागरमें मानो डूब रही थी। इतनी कारीगरी की तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। किंतु सखाओंको दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेकी बात वह सम्भवतः भूल गयी थी। बस वह एकटक अपने कन्हाईको देखे जा रही थी।

‘आ! अब मैं तुझे सजा दूँ।’- और बचे हुए पुष्प-पत्र लेकर वह उसके सम्मुख आ बैठा। उजरीके भूरे उलझे बिखरे केशोंमें पुष्पों को लगाया; माला गजरे बनाकर उसे पहनाया।

‘अब तू मुझे सजा!’– उसने कहा उजरीने आज्ञा मानकर अपने छोटे छोटे अनाड़ी हाथों से उसका अधपटा-सा शृङ्गार किया और दोनों हाथ पकड़कर उठ खड़े हुए उस डाबरमें अपना प्रतिबिम्ब देखने।

‘चल उजरी, अब खेलें।’

“कैसे ?”

‘तू छिप जा, मैं तुझे ढूँढू और मेरे छिपने पर तू मुझे ढूँढ़ना !’☺️

‘अच्छा! किंतु तू ही मुझे ढूँढ़ना। मुझसे यह न होगा, तू कहीं खो जाय तो!
‘– उजरीने व्याकुल स्वरमें कहा।

‘अच्छा आ तू ही छिप जा! मैं अपनी आँखें मूँद कर खड़ा हूँ। –
कन्हाईने छोटी-छोटी हथेलियोंसे अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ढाँप लीं।

उजरी अनमने मनसे छिपने चली। वह समीपकी एक झाड़ीमें ही बैठ गयी। कुछ समय बाद श्यामसुंदरने आँखें खोली और ढूँढ़ने चले। सामनेकी कुंजोंमें झाँकते हुए वे आगे बढ़े। उजरी अपने स्थानसे उन्हें देख रही थी। उसे दूर जाते देख वह व्याकुल हो उठी।

कितना सुन्दर भाई मिला है उसे! यदि वह साथ चलना चाहे तो, घर ले जाकर बाबा मैयाको दिखायेगी। इतनी देरमें वह ऐसी हिल-मिल गयी थी, मानो जन्मसे ही उसके साथ खेलती रही हो ।

अचानक चौंक पड़ी वह
‘कहाँ गया कन्हाई?’ अपने स्थान से निकल वह आकुल पुकार उठी-
‘कन्हाई रे कन्हाई’
कभी इस कुंज और कभी उस झाड़ीमें उसका रूँधा कंठ-स्वर गूँजता –

‘कन्हाई रे कन्हाई।’

तभी किसीने पीछेसे उसकी आँखें मूँद ली। झँझलाकर उसने हाथ हटा दिये, घूमकर देखते ही वह उससे लिपट गयी। नन्ही शुक्तियां मुक्ता वर्षण करने लगीं।

‘क्या हुआ उजरी?
मैं तो तुझे ढूँढ़ रहा था।
तू क्यों रो रही है ?’

‘मैं तो पास ही उस झाड़ीमें थी तू क्यों दूर ढूँढ़ने गया मुझे ?’ – वह हिल्कियोंके मध्य बोली।

‘तू मुझे क्यों ढूंढ़ रही थी ?’- मैं तो तेरी पीठ पीछे ही खड़ा था। तू पुकार रही थी और मैं संग-संग चलता मुस्करा रहा था।
‘हाँ ऊजरी, सच!’

तूने ऐसा क्यों किया ?

‘मैं तुझे अच्छा लगता हूँ कि नहीं, यह देखनेके लिये।’

‘कन्हाई!’– उजरीके होंठ मुस्करा दिये, जल भरी आँखें श्यामके मुखपर टिकाकर वह बोली।

‘उजरी!’–
श्याम भी उसी प्रकार पुकार उठे और दूसरे ही क्षण दोनों एक दूसरेकी भुजाओंमें आबद्ध हो हँस पड़े।

‘अब मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूँगी! कहीं फिर खो जाय तो ?’☺️

‘मैं तुझे छोड़ कहीं जाऊँगा ही नहीं!’

‘सच ?’

‘सच!’☺️

सच ही तो है, एक बार आँखों में समाकर यह निकलता ही कहाँ है।

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-13



बांसुरी बैरिन भयी

‘सखी! यह घर-घाला बंसुरिया फिर बज उठी।’– व्यथित स्वरमें माधवी बोल उठी। उसकी बात पूरी होते न होते तो सबके गात शिथिल हो चले।

आह! आधी घड़ी पश्चात वंशीने विराम किया तो प्रत्येकके कंठसे ‘आह’ निकल गयी। स्वेद-स्नात तन और अश्रु स्नात मुखके मार्जन की शक्ति भी न रह गयी थी। अब भी नेत्रों के सम्मुख श्याम तमालकी शाखा से पीठ टिकाये वंशीमें स्वर भरते वनमाली अवस्थित थे। वह त्रिभंगललित छवि बाँयी ओर को झुकी ग्रीवा, झुकी पलकों तले अधखुले नयनोंकी वह मुग्ध दृष्टि, संकुचित अधरोष्ठ, वंशीके छिद्रोंपर नृत्य करती उंगलियाँ, फहराता पीतपट, कपोलोंपर अलकोंके साथ झुक आये कुण्डलोंकी छवि और स्तब्ध चराचर।

श्यामसुंदरकी यह मनोहर शोभा देखो सखी! त्रिभुवनमें कौन है जिसका धीरज न छूट जाय!’- कुछ प्रकृतिस्थ होने पर सुमति बोली अब भी सबके
अंगोंमें हल्का कंपन है, मन रह-रहकर अंतर्मुख हो उस तमाल-तरुकी ओर दौड़ पड़ना चाहता है। उसे बहिर्मुख करनेमें हमें कितना परिश्रम पड़ रहा है. यह हमीं जानती हैं। कुछ-न-कुछ चर्चा करना आवश्यक था मनको सम्हाले रहनेके लिये; पर चर्चा भी श्यामसुंदरके अतिरिक्त दूसरी आती- सुहाती हो नहीं हमें।

‘हमसे तो ये वनपशु और गायें ही सौभाग्यशाली हैं बहिनों! कि नयन भर श्यामसुंदरके दर्शन तो पा लेते हैं।’- माधवीकी बात सुन पुनः कई जोड़ी आँखें मुक्ता वर्षणकर उठीं।

‘अरी वनपशुओंकी क्या बात करती हो! हमसे तो ये नदी, निर्झर, तरु, पादप भूमि, गिरी, कानन, पक्षी और कीड़े-मकोड़े सब श्रेष्ठ हैं। — भरे कण्ठ से पद्माने कहा–’सच हैं बहिन ! श्रीकृष्ण जब धरापर पाँव धरते हैं तो उस स्पर्शसे हुआ रोमांच ही दुर्वाके रूपमें प्रकट है। जब कान्हाकी बंसी बजती है, तो तरु-खोहरोंसे रसधार बह निकलती है, यमुना स्थिर हो जाती है। क्या कहूं! पत्थर भी कठोरता त्याग कर रस टपकाने लगते हैं। इनका दर्शन-स्पर्श पा चर अचर और अचर चर हो जाते हैं।’

‘देखो, देखो बहिन!’ हाथ उठाकर उषा सजल नयन भावभरे स्वर में उतावली हो बोल पड़ी— ‘गायोंके-मृगोंके मुखमें लिये तृण ज्यों-के-त्यों दबे हैं। ये सब कानोंसे स्वर और नयनोंसे रूप माधुरी पान करनेमें तनकी सुधि भूल बैठे हैं।’

‘बहिन! औरोंकी बात जाने दो, हम अपनी ही बात लें। यह बैरिन बंसुरिया जब जब भी बजती है, हमें हाल बेहाल कर देती है। इसके बजनेका कुछ निश्चित समय भी तो नहीं जब श्यामकी इच्छा हुई इसे मुखसे लगा लेते हैं।

कल मैं खिरकमें गाय दुह रही थी कि यह सौत बज उठी।
गैयाके चारो थनोंसे दूध झरने लगा और मेरे घुटनोंमें थमी दोहनी छूट कर भूमिमें लुढ़क गयी। मैं स्वयं कब तक चित्रलिखी-सी बैठी रही ज्ञान ही नहीं।’

‘मैं मैयाकी आज्ञासे दादाके लिये छाककी तैयारी कर रही थी कि यह बैरिन बज उठी।
क्या कहूँ सखी! लड्डुओंमें नमक और साग-सब्जीमें मीठा मिला दिया।

छाक भेजकर मैं भोजन करने बैठी-ग्रास कंठमें ही अटक गया भयसे।

साँझको दादा आयेंगे और मैयासे कहेंगे तो मैया क्या कहेंगी?

पर साँझको गैया दुहते समय दादाने कहा- ‘हेमा! आज लड्डु और लौकीका साग किसने बनाया था ?”

‘मेरे तो बहिन! प्रान सूख गये।’ धीरेसे बोली- ‘मैंने।’

उन्होंने होकर मेरी पीठपर हाथ फेरा-‘बड़े अच्छे बनाये थे बहिन! श्यामसुंदरने रुच रुच कर माँग माँगकर खाये बड़ी प्रशंसा की। मेरी बहिन पाकशास्त्रमें निपुण हो गयी है, इस सत्यसे मैं तो नितान्त अनभिज्ञ ही था तू ऐसे ही स्वादिष्ट पदार्थ बना बना कर रखा कर मेरे छींकेमें, जो कन्हाईको अच्छे लगे।’

मैं क्या कहती ?

‘क्या कहूँ सखी! कभी तो ऐसा लगता है मानो वंशी हमारा नाम लेकर पुकार रही हो। ऐसेमें धैर्य रखना महा कठिन हो जाता है।’

‘सच कहती है तू!’ एक साथ कई सखियाँ बोल उठीं।

‘बहिन! बड़े-बड़े लोग श्यामसुंदरको अंतर्यामी कहते हैं, क्या वे हमारे अंतरकी बात भी जानते होंगे? यदि वे हमारी पीड़ा पहचानते हैं, तो क्यों इस दयीमारी वंशीसे हृदय जलाते हैं।’

‘यह क्या कहती हो बहिन! बंसी जलाती ही नहीं, शीतल लेप भी लगाती है। दिनभरके अदर्शनके तापसे झुलसते हमारे हृदयोंको वंशीसे निसृत सुधा धारा ही तो संध्याको शीतलता प्रदान करती है।’

‘इस वेणुने क्या तपस्याकी होगी सखियों! जिससे उसे श्यामसुंदर के कोमल अधर पल्लवोंकी शय्या मिली। वे इसे अपनेसे तनिक भी दूर नहीं होने देते। कभी फेंटमें, कभी करमें, कभी अधरपर धरे ही रहें। बड़ी बड़भागिनी है यह बंसी; कहाँ हम अभागिनें दर्शनको भी तरसती रहती हैं,,,,

और कहाँ यह वेणु आठों पहर संग लगी रहे।’ ‘क्यों सखी! किसी दिन श्यामकी बंसी हम चुरा ले तो ?”

सुनकर सब सखियाँ खिल उठी-‘बंसी! यह कार्य कैसे हो ?’

बरसानेकी सखियोंसे बात करने की ठहरी

‘एक दिन की बात कहूँ सखियों!’ पाटला बोली-
‘मैं पानी भरकर आ रही थी, पथमें दाहिने पदतलमें काँटा लगा। न चला जाय, न रुका ही जाय,
बड़ी असमंजसमें पड़ी! तभी सम्मुखसे श्यामसुंदर आते दिखायी दिये,

समीप आकर पूछा- ‘पथमें क्यों खड़ी है सखी ?”

‘पांवमें काँटा गड़ गया है।’– मैंने कहा।

‘कौनसे पाँव में ?”

‘दक्षिण पद में।’

‘तुम घड़े उतरवा दो, तो मैं बैठकर निकाल दूँ।’

‘नहीं सखी! मेरी बाट देख रहे होंगे सखा,,,,
अब तेरे घड़े उतरवाऊँ, तू काँटा निकाले और मैं फिरसे घड़े उठवाऊँ, इतना समय नहीं है मेरे पास !

ऐसा कर, तू मेरे कंधेका सहारा लेकर पाँव उठा दे, काँटा मैं निकाल दूँगा।’

और कोई उपाय नहीं था बहिन!
मैंने ऐसा ही किया।

उन्होंने काँटा निकाल कर उस स्थानपर अपना थूक लगाकर मसल दिया; फिर बोले ‘अब दुखेगा नहीं, जा!’ और मेरी ओर देखकर हँस पड़े।

सबसे छोटी नंदा बोली-
‘मैं जमुनामें नहाकर लौट रही थी। सिरपर पानीका भरा घड़ा और हाथमें गीले वस्त्र लिये आ रही थीं। न जाने कब कंचुकी गिर पड़ी। पीछेसे पुकार सुनकर मैंने ठिठक कर मुख फेरा, तो हाथमें वस्त्र लिये श्याम खड़े थे।

मैं लज्जित हो गयी।

‘अरी इत्ता-सा लीरा भी नहीं सम्हाला जाता तुझसे ?’- समीप आकर उन्होंने कहा।

मैंने मौन हाथ बढ़ा दिया, तो अपना हाथ दूर हटाते हुए बोले,,,
‘मुँहमें जीभ नहीं है ? तू बोलेगी नहीं, तो मैं भी नहीं दूँगा; अपनी धौरी गैयाके गलेमें बाँध दूँगा।’

मुझे हँसी आ गयी- ‘इससे धौरीकी क्या शोभा बढ़ेगी ? अपने ही गलेमें बाँध लो न !’

‘अरी सखी! तू जितनी छोटी है, उतनी ही खोटी है! कहाँ तो बोल ही नहीं रही थी और बोल फूटा, तो मानो तलवारकी धार फेर दी।’- कहते हुए वस्त्र मेरे कंधेपर फेंक, दोनों गालोपर चिकोटी भर हँसते हुए चल दिये

सब सखियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ी बात तो सच ही कही कान्ह ने।

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-12



नंद गोप सुतं देवि पतिंमे कुरू ते नमः

बड़भागी कदम्ब, स्मरण है न तुझे वह दिन ! क्या कहा ? सुननेका आकांक्षी है ?
अच्छा तो सुन मेरे भैया ! मुझे भी इस समय कोई काम नहीं है। श्यामसुंदरके मंगल चरित्र कहने-सुननेसे किसको तृप्ति हो पाती है ?

‘सखियों! भगवती पौर्णमासीसे ‘मार्गशीर्ष महात्म्य’ सुनकर लालसा जग उठी है ‘मार्गशिर्ष स्नान करने की।’- श्रीकिशोरीजीने सब सखियों से कहा—

‘यह कुछ कठिन नहीं है! सबेरे ब्राह्ममुहुर्तमें उठकर यमुनामें स्नान करना और कात्यायनीका पूजन। एक समय भोजन और आचार विचारकी पवित्रता, बस! जो तुम सबका अनुमोदन हो तो मेरी यह चाह पूरी हो सकेगी, अन्यथा मैया मुझे अकेली सूर्योदयसे पूर्व यमुना स्नानको नहीं जाने देगी।’

हम सब यमुना किनारे सघन तमालके नीचे अपने-अपने रीते घड़े लिये बैठीं थी। तमाल-मूलसे लगे पत्थरपर एक सखीने अपनी औढ़नी बिछा दी थी, उसी पर भानुकिशोरी विराजमान थीं। समीप ही उनकी कलशी पड़ी है और दोनों ओर ललिता-विशाखा बैठी हैं, सम्मुख श्रीचन्द्रावली है। सखियोंमें किसीकी कलशी पार्श्वमें और किसीकी सम्मुख अथवा गोदमें धरी है। श्रीभानुनंदिनीकी बात सुन सब उत्सुक हो उठीं।

एक सखी बोली- ‘आपकी इच्छा ही हम सबकी इच्छा है किशोरी जू ! किंतु केवल सुननेके लिये पूछ रही हूँ कि ‘मार्गशिर्ष-स्नान’ से क्या होता है?’

‘मनोरथ पूर्ण होता है।’

‘हम सब यह व्रत करेंगी।

‘अच्छा सखियों सूर्योदयसे घड़ी-दो-घड़ी पूर्व ही पूजन सामग्री लेकर घाटपर आ जाना। कल एकादशी है, कलसे ही व्रत आरंभ होगा। तुम सबने स्वीकार कर मुझपर बड़ी कृपा की।’- किशोरीजीने कहा।

‘यह क्या कहती हैं आप? कृपा तो आपने की है हमपर। हम तो मूढ़ अज्ञ है। किसी ओर पथको न पाकर अंधेरेमें भटक रही थीं; आपने उस अन्धकारमें आशा किरण सुझाई है।’ – कई सखियाँ एक साथ बोलीं।

सूर्यादयसे पूर्व ही उठकर हमने एक दूसरीको पुकारकर साथ ले लिया। आगे नंदिश्वरपुरके घाटपर इकट्ठी हो गयी, सब ऊँचे स्वरसे श्याम गुणावलीका गान करते हुए वस्त्र उतार यमुनामें स्नान करने लगीं। जल शीतल था, कंपकपी छूटी, रोम उत्थित हुए, पर हमें अपने उत्साह और श्रीकृष्ण गुणगानमें लीन पाकर पीड़ा अवसर न पाकर कहीं जा छिपी आज प्रथम बार खुलकर मुक्तकण्ठसे मन भावतो गानेका अवसर मिला है। धीरे-धीरे गुनगुनायें या मन-ही-मन रोयें, इसके अतिरिक्त तो और कोई उपाय था नहीं! नहा-धोकर वस्त्र पहननेके पश्चात श्रीभानुललीने तटपर सैकत की मूर्ति बनायी। कुंकुम, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्यसे पूजा की, मन-ही-मन अभिलाषा उच्चरित की और सब प्रणतिमें झुक गयी, नयन मन भर आये सबके ।

उठकर आरतीका समारंभ किया, साथ ही एक दूसरेसे पूछने लगीं- ‘री तूने कहा मांग्यो ?’

कोई सकुचाकर मुँह नीचा कर लेती
कोई हँसकर मुँह फेर लेती,
कोई भाव भरे नयनोंसे पूछनेवालीकी ओर देखकर मौन रह जाती
तो कोई ढिठाई हँसकर पूछनेवालीके गाल मीडकर कहती-
‘सखी! जो तूने मांग्यो सोई मैंने मांग्यो ! तू अपनेसे पूछ कि तूने कहा मांग्यो ? मुझसे पूछ के क्या करैगी।’

इस समय तो कोई कुछ नहीं कह सकी, किंतु आरती करते हुए सभी एक स्वरमें गा उठीं

आद्याशक्ति महाशक्ति कात्यायनी देवी दयाकरि देहु दान।
नंदगोप सुवन पति होय हमारे, विनय सुनहुधरि कान ॥

आरती-परिक्रमाके पश्चात प्रसाद वितरण हुआ और हम पुनः देवी कात्यायनी और व्रजभूषणके गुण गाती गृहोंको लौट चलीं। यही नित्यक्रम बन गया हृदयमें आनंद सागर उमड़ा पड़ता, नित्य ही लगता आज देवी प्रसन्न होकर कहेंगी- ‘वरं ब्रूहि ।’ कुछ-न-कुछ त्रुटि रह गयी आज, कल अवश्य प्रसन्न होंगी। हमारा विश्वास और प्रतिक्षा अटल थी।

आज…. आज…. पूर्णिमा है; हमारे व्रतका अंतिम दिन आज तो अवश्य ही देवी प्रकट हो जायेंगी। हम सब गातीं और उत्साहसे उछलती यमुना तटपर पहुंची। वस्त्र उतारकर लगी जलमें गोते लगाने। कहीं एक दूसरी पर जल उछाल रही थीं तो कहीं दो-दो तीन-तीन मिलकर डूबकियाँ लगा रही
थीं।
तभी अचानक तटपर कई कण्ठोंके हँसनेका शब्द हुआ।
‘ये छोरे कहाँसे आ गये?’ – हम सोच भी न पायी थीं कि वंशीनादने बरबस दृष्टि खीच ली।

क्यों महाभाग्यवान कदम्ब ! वह दिन याद है न तुझको ?
मुरलीधरकी वह अपार शोभा; उसका वर्णनकर सके ऐसी जीभ- ऐसी भाषा किसके पास है?
हम सबके वस्त्र डालपर धरे, करमें मुरली लिये, तुम्हारी डालपर बैठे मुस्करा रहे थे। पीछे पूर्व दिशामें उदित होते भगवान् भुवन भास्करका अरुण बिम्ब उनका आभा मंडल प्रतीत होता था। वह मुस्कान वह छवि हृदयसे निकलती नहीं भैया!

पाँच से सात बरसकी-वयकी बालिकायें हम सब और श्यामसुंदर भी हमारे समवयस उनके सखा हमारे भाई-भतीजे नित्य हम उनको चिढ़ाती और वे हमें कोई न कोई अवसर तो नित्य मिल ही जाता है।
आज…. आज हम गले तक ठंडे पानीमें डूबी भला उनका क्या प्रतिकारकर सकती है?
सारी चंचलता सारी हाँस हवा हो गयी।

श्यामके सखा उठाकर हँस रहे थे और हमें कुछ समझमें नहीं आ रहा था कि क्या करें ?

तनकी लाज तो तारुण्यका भूषण है श्यामसखा ! वह हमें क्यों सताती, कलतक तो हमारी मैया हमें घाटपर नग्न स्नान कराती थीं और हम भी जब जल भरने जातीं तो वस्त्र उतारकर नहा लेतीं। श्याम और इनके सखाओंको भी हम देखतीं वे कछनी पटुका तटपर रख धम्-धम् करके जलमें कूद पड़ते। लज्जा तो वयस्कोंको ही समीप फटकती हैं।

ग्लानि इस बातकी थी कि श्यामसुंदरकी इस अचगरीका क्या उत्तर दें उन्होंने वंशी तो हमें सचेत करनेको बजायी थी, ज्यों ही हमने उन्हें देखा, त्यों ही उन्होंने बंसी फेंटमें खोंस ली।

हम सब एक दूसरेका मुँह देखने लगी कि अब क्या करें! कभी नीची दृष्टिसे श्रीकृष्णको देखती और कभी जलको निहारने लगतीं। हम शीतसे काँप रही थीं, दांत परस्पर संघर्षकर रहे थे, ऐसेमें श्यामने यह कैसी करी !
इस दयीमारे अभागे मनको क्या कहूँ। इतने पर भी क्रोध नहीं आ पा रहा था। मनमें आता था, हम अनंतकाल तक ऐसे ही खड़ी, उस शोभाको निहारती रहें, पर मन चीती कब हुई है। अंतमें चंद्रावली जीजी बोली

‘श्यामसुंदर! तुम्हारे उधमकी सीमा हो गयी, हमारे वस्त्र काहेको लेकर वृक्षपर चढ़ बैठे हो ? दो हमारे वस्त्र !’

‘आकर ले जाओ।’– श्यामसुंदर हँसकर बोले।

‘हम भला वृक्षपर चढ़ेंगी? जहाँ हमने रखे थे, वहीं रख दो; अन्यथा हम तुम्हारे बाबाको कह देंगी।’

‘जा सखी! जाकर कह दे अभी; मैंने तुझे कब मना किया ?”

‘देखो श्यामसुंदर! हमको ऐसे विनोद नहीं सुहाते; हमारे वस्त्र दे दो और अपने गैल लगो।’

‘विनोद मैं भी नहीं कर रहा सखी। तुम ठंडसे काँप रही हो, ऐसेमें क्या विनोद करूँगा भला ? आओ अपने-अपने वस्त्र ले लो।’

‘श्यामसुंदर! तुम व्रजराजकुमार हो, ऐसा उपहास तुम्हें शोभा नहीं देता। हमारे वस्त्र लौटा दो!’- विशाखा जीजी बोली।

‘मैं कह चुका हूँ सखी! उपहास विनोद कुछ नहीं कर रहा! तुम चाहो तो एक साथ आकर ले जाओ, चाहे एक-एक आकर ले जाओ। मैं ऊपरसे वस्त्र डाल दूँगा।’

‘ऐसा हठ क्यों करते हो मोहन! हम शीतमें ठिठुर रही हैं। तुम तो धर्मका मर्म जानते हो। धर्मकी रक्षा और दुष्ट दलन लिये ही तुम अवतरे हो। यह कौन-सा धर्म है कि हम अबलाओंको सता रहे हो।’– ललिता जू बोली।

‘सखी! यदि तुम मुझे धर्मका रक्षक मानती हो; तो फिर मेरा कहा मानो और बाहर निकल आओ। तुमने जिस उद्देश्यसे व्रत किया है वह इस नग्न स्नानसे नष्ट हो जायेगा।’

यह तो बुरा हुआ! अबतक तो हम श्यामसे हारनेकी शंकासे उत्तर प्रति उत्तर कर रही थी और हठ पूर्वक जलमें खड़ी थीं। अब तो ये कह रहे हैं कि व्रत ही नष्ट हो रहा है। एक क्षणमें ही हम दीन हो गयीं, आंखोंमें जलभर आया। अब तो स्वामिनी जू ही कुछ करें तो हो। सबने आशापूर्ण नेत्रोंसे उनकी ओर देखा ।

‘श्यामसुंदर! हम क्या कहें; हम तुम्हारी दासी हैं। तुम्हारे अतिरिक्त हमारी गति नहीं, तुम जो कहा सो सिर धारें!’- नमित मुख, भरित कण्ठ श्रीभानुकुमारी बोलीं।

‘श्री जू! नग्न स्नानसे वरुणदेवका अपमान हुआ है; तुम सबने महिने भर तक यह अपराध किया है। यदि तुम अपनेको मेरी दासी मानती हो तो बाहर आकर दोनों हाथ जोड़ वरुणदेवको प्रणाम करो, जिससे अपराधका मार्जन हो जाय।’

कदम्ब ! कितने सदय हैं नंदसुअन, हम अबतक इनके इस कार्यको उधम ही समझ रही थीं। अब समझमें आया, वे तो हमारे खंडित होते व्रतकी रक्षा करने आये हैं। हम सब अपराध बोधसे दब गयीं। मुख नीचे किये बाहर आयीं, श्यामकी दयाको स्मरणकर मन गद्गद हुआ जा रहा था।

‘हाँ, अब प्रणाम करो और मन ही मन अपने अपराधकी भी क्षमा मांगो।’

एक साथ सहस्र सहस्र हाथ जुड़ गये मस्तक झुक गये और आ हृदय पुकार उठे – ‘हे देव! हमारे अपराध क्षमा करो।”

कदम्ब तुम तो देख रहे थे – आरम्भमें उनके सब सखा भी यही समझे थे कि हम इन छोरियोंको छकाने-चिढ़ाने आये हैं। पर वरुणके अपराधकी बात सुन वे भी हँसना भूल आपसमें कहने लगे – ‘कन्हाई कितना सदय है, इनका व्रत बचा लिया।

जैसे ही हमने प्रणाम किया, सबके वस्त्र अपने-अपने कंधोंपर आ गिरे।

‘अब घर जाओ, खड़ी क्यों हो ?’– हमें वस्त्र पहने खड़ी देख, वृक्ष कूदते हुए बोले ।

क्या कहें पैर उठते नहीं, हृदय भर आया है, हम जहाँ-की-तहाँ खड़ी रहीं।

‘अरी जाओ न ! घर नहीं जाना ? जाकर बाबासे कह दो मैंने तुम्हारे वस्त्र चुरा लिये।’— वे हँसते हुए हमारे सम्मुख आकर खड़े हो गये।

हमारे मस्तक झुक गये, नेत्रोंसे निकली बूंदे धराको सिक्त करने लगीं।
“तुम्हारा मनोरथ जानता हूँ मैं!’– उनका गम्भीर स्वर सुन चकित हो हम उन्हें निहारने लगीं।

आजतक कभी कोई बात उन्होंने गम्भीरता कही हो स्मरण नहीं आती। आजका स्वर अभितपर्व था। धीर गम्भीर, पर धीमे स्वरमें वे कहते गये-
‘आगामी शरद रात्रियों में हम साथ ही वन-विहार करेंगे। साथ ही नाचेंगे, गायेंगे और खेलेंगे; अब
घर जाओ।’ वे सखाओंकी ओर लौट पड़े।

हमारे मनको हाल कहा पूछो!
अंधेको जैसे आँखें मिलीं, घाममें तपते को वट छाया सुलभ हुई हो जाते हुए श्यामसुंदरको देखती रहीं,
जब वे आंखोंसे ओट हुए तो किसी सखीने गीत आरम्भ कर दिया। उन्हींके गीत गाती, उन्हींके वचनोंको-रूपको स्मरण करती लौटीं हम सब
कदम्ब, तुम तो उनकी बातके साक्षी हो न! कब आयेगा शरद ?
कब होगी वह धन्य घड़ी ?
मैंने सघन घुंघुरुओंवाले नूपुर मँगवाये हैं। कैसा होगा वह समारोह ?
शत-शत तारिकाओंके मध्य मानो उडूपति हाल तो बसन्त है;
बहुत दूर है शरद ! भगवान् भुवनदीप; कृपा करके शीघ्रता करो न !
वह…. वह…. आनंद कैसे सम्हाला जायेगा मुझसे,
जिसकी कल्पना ही विह्वल कर देती है।

उनके कर…. में कर दिये… नृत्य के….. लिये… प्र. स्तु त हो ऊं..गी. मैं…. ।

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-11



राधे करुणामयी कहातीं हैं

गिरिराज जू!
तुम तो व्रजके जाग्रत-देवता हो, श्यामसुंदरके अतिशय प्यारे हो। उस दिन इन्द्रके कोपसे तुमने ही तो व्रजकी रक्षाकी थी।
अहा! कन्हाईके नखमणिपर विराजित तुम्हारी शोभा अवर्णनीय थी। अमरावतीका अधिपति अपना-सा मुँह लेकर रह गया, तुम्हारे आगे एक न चली उसकी! जिस दिन तुम्हारी पूजा हुई श्यामसुंदर कह रहे थे-

‘ये हमारा मनोरथ पूर्ण करनेवाले साक्षात जाग्रत देवता हैं, इनसे जो भी माँगोगे मिलेगा!’

गिरिराज तुमने डूबते व्रजकी रक्षा की गायोंको चारा-पानी और हमको निवास दिया है। आज मैं तुम्हारी शरण आयी हूँ; मेरे मनकी अभिलाषा भी पूरी करो प्रभु !

घर बाहर सभी कहने लगे हैं-

‘माधवी अब बड़ी हो गयी, इसका विवाह आवश्यक है।’

सुन-सुनकर कलेजेमें शूल सी चुभ जाती है। अपना दुःख किससे कहूँ ? बाबा जब आसपासके खेड़े और व्रजके छोरोंकी चर्चा मैयासे करते हैं तो मेरी आँखोंके आगे अंधेरा-सा छा जाता है, हाथका काम बिगड़ जाता है और मैयाकी डाँट खानी पड़ती है। कुछ समझमें नहीं आता।

गिरिराज महाराज! तुम अंतर्यामी हो, सबके मनकी जानते हो,
वे व्रज युवराज हैं और मैं साधारण गोप कन्या !
हमारे महाराज श्रीवृषभानुरायकी ललीसे सगाई हुई है उनकी;
सो वे कहाँ और मेँ कहाँ?
किंतु क्या करूँ महराज! मैंने तो ऐसी बात कभी स्वप्नमें भी नहीं सोची, मैं अपना रूप स्वरूप भी जानती हूँ। किसी भी तरह उनके योग्य उनकी चरणरजके योग्य भी अपनेको नहीं पाती; पर यह मन हत्यारा मानता नहीं! अपनी ही बात तो नहीं, इस व्रजमें न जाने कितने प्राणी तरस रहे हैं।

कल इसी समय मनकी विकलतासे घबराकर यहाँ चली आयी, तो देखा एक भील किशोरी, अहा! उसके प्रेमका क्या वर्णन करूँ महाराज! दुर्वापर हाथ फेर-फेर कर हृदयसे लगा रही थी। मेरी समझमें नहीं आया तो धीरे-धीरे चलकर उसके समीप पहुँची पूछा-

‘क्यों सखी! क्या कर रही हो ?”

वह चौंक कर खड़ी हो गयी उसे भागनेकी तैयारी करते देख हाथ पकड़कर पुनः पूछा, तो उसके नेत्रोंसे दो धारायें बहकर वक्षस्थल भिगोने लगीं। बहुत धीरज दिलानेपर अटक-अटककर बोली-

‘आपके…. वा…. सांवरे… कुंवर…. वा… की चरन रज !’

हिलकियोंके मध्य ये टूटे शब्द उसकी सारी मनोव्यथा स्पष्ट कर गये। एक ही रोगके दो रोगी मिले, तो जात-पाँत और ऊँच-नीच अपने प्राण लेकर भाग छूटे।

‘तू धन्य है सखी!’ कहकर मैं उससे लिपट गयी। दोनों खूब रो धोकर अपने-अपने घर गयीं।

गिरिराज जू! ऐसी कृपा करो कि मैं छोरी ही बनी रहूँ, मैया बाबाके मनमें मेरे बड़े होनेका ज्ञान कभी न आये। श्यामसुंदरकी बात तो बहुत दूर है, पर श्रीकिशोरीजी तो हमारी राजकुमारी हैं; उनकी चरण सेवा मुझे प्राप्त हो जाय! ब्याह-व्याह मुझे नहीं करना। किशोरीजीकी सेवाके बीच मुझे श्यामसुंदरके भी दर्शन मिलेंगे, मेरा जीवन-जन्म सफल हो जायेगा; अन्यथा सिसक-सिसककर मरना पड़ेगा। सखियोंसे सुना है वे केवल मनका उजलापन देखते हैं, तनका नहीं; किंतु मेरे तो विधाता ही दक्षिण हो गया है। तन तो काला दिया ही, मन पोतनेको भी उसे तनिक-सी खड़िया नहीं मिली।
हृदयमें थोड़ा भी प्रेम होता! मैं धन्य धन्य हो गयी होती क्या करूँ महराज! तुम्हीं दयाकर थोड़ा सा प्रेमदान दे दो और इस समय तो जैसे भी हो इन तृषित दृगोंको तरसते तपते हृदयको उनके दर्शन करा दो श्यामसुंदर कहाँ है, किस ओर गये हैं बताओ गिरिराज जू! कहाँ है कान्ह जू? हियकी पीर सही नहीं जाती।

हैं! कहाँ बजी यह बंसी ?

आह रे अभागे ! दौड़ा मारा तू ने मुझको
अब कहाँ जाऊँ किससे पूछूं कि श्यामसुंदर कहाँ हैं!
अब चला नहीं जाता, हाय रे मन!
तुझे क्या करूँ? यदि मेरे हाथमें होता तो तुझे जलाकर राख कर देती और उस राखको भी इतने गहरे गाड़ देती कि धरापर आनेमें शताब्दियाँ लग जातीं; तबतक मैं अपनी गैल लगती। किंतु जल तो यह अब भी रहा है, हाँ जल रहा है और मुझे भी जला रहा है।

यह शिला सुचिक्कन है, बैठ लूँ थोड़ी देर; नहीं लेट ही जाऊँ। अहा, तुम इतनी ठंडी कैसे हो शैलसुते! क्या श्यामसुंदरने यहाँ बैठकर विश्राम किया था? कि उनके उत्ताप हर-स्पर्शने तुम्हारा दाह हर लिया ?
हे प्रभु! इस विचारने तो अग्निमें जैसे ईंधन डाल दिया—’मैं क्या करूँ! कहाँसे सुलभ हों मुझे श्याम ? मैं…. क्या…. करूँ….!’

‘माधवी!. ऐ माधवी! आँखें खोल।’

‘यह… यह… कौन… पुकार…. रहा…. है… मुझे ? यह मीठा स्वर किसका है? होगा कोई मुझे क्या!’

‘नेत्र उघाड़ माधवी।’

ओह! दो क्षण भी एकान्त नहीं जुटता, यहाँ वनमें व्याघात बनकर उपस्थित हो गया कोई!
पर इतना सुहावना कण्ठ स्वर- क्या काम है मुझसे ?
थक गयी हूँ, पड़ी रहने दो!’

‘मेरा एक काम कर देगी ?”

‘सबके कार्य करनेको एक माधवी ही तो रह गयी है; किंतु माधवीसे कोई नहीं पूछता ?’

‘क्या काम है तेरा; कह, मैं कर दूँगा।’

‘अपना कार्य तो होता नहीं, सो यहाँ वनमें माधवीको ढूंढ़ने चले आये और मेरा काम कर देंगे ! किंतु रहने दो, मेरा काम किसीसे होने जैसा नहीं है, तुम अपनी कहो! मुझसे उठा नहीं जाता…. तुम कार्य बताओ?”

‘ले मैं उठा देता हूँ।’

यह स्पर्श…. ! देहमें सिंहरन-सी दौड़ गयी, नेत्र अपने आप उघड़ गये। मैं लाज भूल गयी; दोनों पदोंमें भुजाओंके वेष्ठन दे, चरणोंपर सिर रख दिया! अश्रु प्रवाह उनका प्रक्षालन करने लगे।

‘माधवी!

‘- स्नेह भरे स्वरमें धीरेसे पुकारा उन्होंने मेरे भूलुण्ठित केश-पाश बाँध दिये अपने करकमलोंसे, और पुनः स्निग्ध स्वर कानों में पड़ा –

‘क्या हुआ माधवी ? ‘

मैं क्या कहूँ? वैसे ही पड़ी रोती रही।

‘मेरा काम नहीं करेगी ?’

उन्होंने मेरा मुख अंजलीमें भरकर ऊपर उठाया-
‘बड़ी आस लेकर आया था तेरे पास!’

मैं बैठ गयी, प्रश्नयुक्त दृष्टि उठायी।

‘तू मो ढिग रहनो चाहे ?’

मेरे नेत्र पुनः झरने लगे, सिर झुक गया। जो पिपासा दावानलका रूप ले बैठी है, उसे नेत्र अभिव्यक्ति देने लगे।

तू नंदभवनमें रहना चाहेगी कि वृषभानुपरके अन्तःपुरमें ?”- वे हँस पड़े

‘श्याम जू!’

मैंने कठिनाईसे कहा-‘परिक्षा मत लो, मैं इस योग्य नहीं!’

‘निर्णय मुझपर ही छोड़ा तो सुन-तू वहाँ श्रीकिशोरीजीकी सेवामें मेरी संदेश वाहिका बनकर रह ।’

‘कौन रहने देगा वहाँ मुझे ?’

‘यह मुद्रिका ले।’

उन्होंने अपनी अनामिकाकी मुद्रिका मुझे पहनाते हुए
कहा— ‘संदेश लेती जा ! इसे देखकर वे सब समझ जायेगी।’

‘बाबा ब्याहकी बात कर रहे हैं।’– मैं पुनः फूट पड़ी।

‘उनके समीप जाकर सब संकट कट जाते हैं।’

‘श्यामसुंदर!”

घनश्याम बड़ो कि श्यामघन सखी री

‘तेरा और मेरा दोनोंका कार्य बन गया सखी।’

‘संदेश ?”

‘गिरिराज निकुञ्जमें मोर नाचते हैं।’

‘मैं कृत-कृत्य हुई मोहन।’

‘नहीं माधवी! कृत-कृत्य तो तू वहाँ जाकर होगी। वहाँ जाकर मुझे भूल जायेगी और उनसे कहेगी- श्री जू! मुझे तो अपने ही चरणोंकी सेवामें नियुक्त कर लें?”

वे हँस कर उठ खड़े हुए।

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-10



सुनकर कौन पतियावै

‘क्यों री हेमा! तू ऐसी मरीमरी-सी क्यों हो रही है ? ” उत्तरमें हेमाकी आंखें मुक्ता-वर्षण करने लगीं। हम सबने चकित हो उसे घेर लिया।

‘यह क्या बहिन! हमें न कहोगी मनकी बात ?”

‘क्या कहूँ बहिनों! मैं महाअधम हूँ; किसी प्रकार इस तनसे मुक्ति पाऊँ तो शांति मिले!’– हेमाने रोते हुए कहा।

“ऐसी क्या बात हो गयी ?”

‘कहते लज्जा लगती है बहिनों! एक दिन गायें दुही जा चुकी तो मैं बछड़े बाँधने खिरकमें गयी नीलाका बछड़ा गौराङ्ग बैठा था, सबसे पहले मेरी दृष्टि उसी पर पड़ी। मनमें था, रज्जूका एक संकेत दूँगी तो वह उठ खड़ा होगा। किंतु सम्मुख होते ही स्मरण न रहा कि मैं क्यों आयी हूँ-मुझे क्या करना है,,,☺️
मैं तो उसके समीप उसे गोदमें लेकर बैठ गयी।
वह भी अपना मुख – सिर मेरे अंकसे टिकाकर अधखुली आंखोंसे मुझे देखने लगा।”

‘सखी! कहते लज्जा लगती है, पर बिना कहे तुम मेरी अधमताका परिचय कैसे पाओगी?
कैसे ज्ञात होगा तुम्हें कि हेमाकी इस स्वर्णलता-सी देहमें कज्जलसे भी अधिक काला मन है।
क्या कहूँ; गौराङ्गके स्पर्श मात्रसं मुझे रोमोत्थान हो आया, हृदय आनंदसे उद्वेलित होने लगा और उसके उन अधखुले नेत्रों की दृष्टिने तो मेरी सारी चेतना हर ली। कितना समय व्यतीत हुआ मुझे मालूम नहीं! न जाने कब वह उठकर अन्यत्र चला गया पर मैं वैस ही संज्ञाशून्य सी बैठी रही।’

‘मैयाने आकर डाँटा तो बाहरी ज्ञान हुआ। सम्पूर्ण रात्रि वह स्पर्श मुझे रह-रहकर रोमांचित करता रहा।
प्रातः मंगल भैया आये, तुम जानती हो मेरे भाई नहीं हैं। मंगल ही हमारे बछड़े चराने ले जाता है।
मैयाने छींका सजाकर दिया कि उसे थमा आऊँ।
मैं खिड़कमें जाकर जैसे ही उसे छींका देने लगी, तो उसने हँसकर मेरी ओर देखा और बोला- इसमें क्या-क्या पकवान रखे हैं सखी ?”☺️

‘उसकी दृष्टि, उसकी हँसी और स्वरने मेरी वही स्थिति कर दी जो गौराङ्गके स्पर्शसे हुई थी। मुझे स्मरण ही नहीं रहा कि सदा ‘हेमा’ अथवा बहिन कहने वाला मंगल आज मुझे ‘सखी’ क्यों और कैसे कह रहा है?
बहिनों! मैं महा अधम हूँ तुम सब मुझसे घृणा करो, मुझे धिक्कारो।’- कहती हुई हेमा रोती हुई हमारे चरणों में गिर पड़ी।

‘सुन हेमा! तू धैर्य धारण कर हमारी बात सुन! यह कोई तेरी अकेलीकी ही व्यथा नहीं; यह सब थोड़े-बहुत अंतरके साथ हम सबपर गुजरी है।

महिनेभर-से जड़, चेतन और मनुष्य, सबकी मति गति पलट गयी है।

तु क्या नहीं देखती ? पहले सब के सब बछड़े और बालक श्यामसुंदरके साथ वनसे लौटकर नंदभवन ही जाते, वहाँसे गोप जाकर अपने-अपने बछड़े लेकर आते; गोपियाँ रात होनेपर बालकोंको बहला-फुसला कर ही ला पातीं। कोई श्यामसुंदरका साथ छोड़ना नहीं चाहता था। अब तो सब बालक अपने अपने बछड़े लेकर सीधे घर चले जाते हैं। कोई भी तो श्यामके साथ नंदभवन नहीं जाता। पहले प्रातः होते ही बालक नंदभवनमें इकट्ठे हो जाते थे और उनके साथ ही बाहर निकलते। और अब अपने घरके सामने आनेपर बछड़े लेकर पथपर ही समूहमें मिल जाते हैं। पथमें भी हम प्रातः सायं देखती हैं सब अपने आपमें मगन नाचते-गाते चलते हैं, कोई कृष्ण-बलदाऊसे विशेष प्रीति नहीं दिखाते।

पहले तो बिछुड़ते तो जेसे प्राणोंको कोई शरीरसे अलग कर रहा हो, ऐसे व्याकुल होते!’

‘सच कहती है वसुधा!’ विद्या बोली-

‘पहले तो बछड़े भी फिर-फिर कर कान्ह जू को निहारते, दौड़ दौड़कर सूंधते; अब तो वैसा कुछ भी नहीं है।’

‘हाँ बहिन! अब तो कोई श्यामसुंदरकी बात भी नहीं करता! सब बड़े बूढ़े गोप-गोपी अपने-अपने छोरे बछड़ोंकी बात करते हैं और पहले तो व्रजमें श्यामको छोड़ और कोई चर्चा थी ही नहीं!’

‘यह क्या बात हुई, कुछ समझमें नहीं आता !’

‘कुछ रहस्य तो है।’

‘अरी बहनो! ये ऋषि-मुनी श्यामसुंदरको नारायणके समान बताते हैं, इसीसे सबके मन-प्राण उनमें लगे रहते थे। किंतु महिने भरसे ये क्या हुआ है। समझ में नहीं आता!’

“किससे पूछे ?”

‘श्रीकीर्तिकिशोरीके पास अवश्य इसका कुछ उत्तर होगा।’

” अरे देखो विशाखा जीजी आ रही है।’

हम सब उठकर यथायोग्य उनसे मिलीं।

उनके बैठ जानेपर प्रज्ञाने
कहा- ‘यह सब क्या हो रहा है जीजी!’

हँसकर जीजी बोली- ‘क्या हो रहा है री?’
और उनकी दृष्टिमें एक रहस्य-सा काँध गया।

‘ये ग्वाल बाल, गोप-गोपियाँ और बछड़ोंने सारे व्रजकी गति मति उलट दी है। बरसानेका क्या हाल है ?”

‘हाल क्या होगा! जो यहाँ है, वही वहाँ भी होगा।’- जीजी हँसकर बोली।

‘यह क्या, कैसे हो गया ?’- एक साथ कई बोल पड़ीं।

‘क्या हुआ यह तो मुझे ज्ञात नहीं! किंतु श्रीकिशोरीजीने कहलवाया है कि कोई सखी अपनी इच्छासे किसी गोप बालक और बछड़ोंके साथ, जो
वनमें जाते हैं—न बोले, न स्पर्श करे ! यहाँ तक कि समीप भी न जाय, चाहे वह अपना सगा भाई ही हो! और तो और, दृष्टि विनिमय तक न करें।”

सखियाँ चकित होकर विशाखा जू का मुख देखने लगीं।

‘अरी बहिनों! तुम जानती नहीं, इन दिनों तुम्हारे भाई, भाई नहीं; बछड़े,
बछड़े नहीं; और क्या कहूँ ! प्रथम दिन तो छिंका-लकुट-आभूषण और श्रृंग भी वही नहीं थे, जो पहले रहे थे। ये सब उपकरण तुम्हारी माताओं को नवीन जुटाने पड़े होंगे।

‘आप ठीक कहती हैं।’ कई एक साथ बोलीं-

‘महिनाभर पहले मेरे भैयाका लकुट छींका और आभूषण नये बनवाये थे। किंतु यह सब कैसे क्या हुआ?’

‘सब ठीक है, तुम अधिक सोच विचार मत करो। जैसा किशोरीजीने कहलाया है, उसीके अनुरूप चलो।’

‘ऐसा कब तक चलेगा ?”

‘कौन जाने !”☺️

‘यह तो उचित नहीं, सभीकी प्रीतिके केन्द्र श्यामसुंदर हैं। उनको छोड़कर सब के सब बलात दूसरी ओर खिंचे चले जा रहे हैं।’

‘सखी! क्या उचित है और क्या अनुचित, इसकी चिंता छोड़कर अपनेको इस उपाय द्वारा बचाओ।’–कहकर विशाखा जू उठ खड़ी हुईं, हम सबसे मिलकर उन्होंने प्रस्थान किया।

हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण

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श्याम सखियाँ-9



नातो नेह को मानियत

“जे कहा कर रही है री ?”

छोटी-सी घाघरी पहने, ऊपरसे खुले शरीर-बिखरे केश लिये पाँचेक वर्षकी बालिका वर्षासे गीली हुई मिट्टीमें पाँव डालकर घरौंदा बनाने का प्रयत्न कर रही थी। उसकी छोटी-सी छींटकी औढ़नी थोड़ी दूर घासपर पड़ी थी। गौरवर्ण तन स्थान-स्थानसे धूलि धूसरित हो गया था। गोल मुख, बड़ी आँखें और मोटे होठ उसके भील कन्या होनेकी घोषणा कर रहे थे।

बालिका जैसे ही पाँवपर मिट्टी थापकर संतुष्ट होकर धीरेसे पाँव खाँचती, घरौंदा किसी सुरापीके अवश तन-सा ही ढह पड़ता। वह एक बार झुंझलाती, मिट्टीको पीटती-बिखेरती और पुनः जुट पड़ती। सम्भवतः उसे जिद्द चढ़ आयी थी कि बिना किसीकी सहायताके स्वयं अपना घरौंदा बनायेगी वह ऐसा करके अपने साथी-संगियोंको दिखाना चाहती थी कि वे जो उसे चिढ़ाते थे, अब देख लें कि वह उनसे छोटी होते हुए भी समर्थ है। किंतु घरौंदा भी शायद उसीकी भाँति जिद्दी था कि दूसरेका हाथ लगे बिना बनेगा ही नहीं!

उपर्युक्त वाक्य सुनकर समझी, उसका ही कोई साथी उसे चिढ़ाने आया है। तुनककर बोली-

‘तेरो सिर! कहा काज है तो कू मो सौं ? जो मेरो मन होय सो करूँ; तो कू कहा ?”

‘मैं बना दूँ तेरा घरौंदा ?’

‘भागेगो कि मारूँ?’–

उसने हाथमें मिट्टी उठायी उसपर फेंकने को। हाथके साथ नेत्र ऊपर उठे और वह जैसे स्थिर हो गयी। सम्मुख पीत वस्त्र और रत्नभूषणोंसे सजा सांवला सलोना उसीकी वयका अपरिचित बालक मुस्कराता खड़ा था।

‘क्यों री! ऐसे क्या देख रही है?’– दाँत मोती की लड़ियोंसे चमक उठे।तो उसने हँसकर कहा,,,

‘मार रही थी मुझे!
मैंने क्या बिगाड़ा है री तेरा ?
ला, मैं बना दूँ। – वह समीप आकर बैठ गया।

उसके तनकी गंध – अहा कैसी मन भावनी! मिट्टी फेंकनेको उठा हाथ नीचे हो गया, किंतु आंखें यथावत अपलक उसे निहार रही थीं।

‘नाम क्या है तेरा ?’ – बालक जमकर बैठ गया था। उसने एक पाँव मिट्टीमें डालकर हाथोंसे थपथापाते हुए पूछा-

‘बोलेगी नाय मो सों?
अभी तो खूब बोल रही थी।
क्या नाम है तेरा ?’

‘उजरी।’–
उसने धीरेसे कहा।

फिर पूछा- ‘तेरो ? ‘

‘मेरो ? मेरो नाम कन्हाई!’
कहकर वह खुलकर हँस पड़ा।

‘तेरा नाम मुझे अच्छे लगा, जैसा नाम है वैसी है ही तू उजरी! मैं तो काला हूँ, इसीसे नाम भी कृष्ण मिला। मैया बाबा और सखाओंने बिगाड़कर लाड़से कन्हाई कर दिया। तुझे कैसा लगा मेरा नाम ?’
बालिकाने मुस्कराकर डबडबाई आँखोंसे बालककी ओर देखा, फिर नेत्र नीचेकर लिये

‘बता न ?’

बालकने अपने धूलि भरे हाथसे उसका चिबुक उठाकर निहोरा किया।

‘कन्हाई!’–

बालिकाने लजाकर कहा और फिर दोनों हँस पड़े।

‘देख! कैसा बना है? –
कन्हाईने पैर धीरे से बाहर खींच लिया और बोला।

घरौंदा देखकर उजरी प्रसन्नतासे ताली बजाकर हँसने लगी। कन्हाईने घरौँदेके चारों ओर मेड़ बनायी उसके एक ओर दरवाजा बनाया और बोला ,,,

‘चल उपवनमें लगानेको फूल-पत्ते बीन लायें।’

कन्हाई भी हाथ, पैर और मुखपर मिट्टी लगा चुका था। पटुका और कछनी भी गीली मिट्टीका स्वाद ले चुके थे। पटुका अवश्य कार्यमें बाधक जान दूर रख दिया गया था, उसे उठाकर गलेमें डाल उजरीका हाथ पकड़ बोला-

‘चल।’

वह भी अपनी डेढ़-दो हाथकी ओढ़नी लेकर पैरोंमें पीतलके पैंजने छनकाती चली। उन पैंजनियोंके संग श्यामके स्वर्ण-नुपूरोंकी छम-छम बड़ी अटपटी! मानों वीणाके साथ भोंपू बज रहा हो, ऐसी लग रही थी।

‘तेरा घर कहा है री ?’– कन्हाईने हाथके पुष्प भूमिपर बिछे पटुके पर धरते हुए पूछा।

उधर, भीलपल्लीमें।’-

उजरीका ध्यान पुष्प पत्र चयनमें कम और अपने नवीन सहचरकी ओर अधिक था।

“कितने बहिन-भाई हैं तेरे ?”” ‘एक भी नहीं! तू बनेगा मेरा भाई ?’

हो ,,,,,,, । तू लड़ेगी तो नहीं मुझसे ?
मैया कहती है मैं बड़ा भोला हूँ;
अरे, यह तू क्या कर रही है, फूल-पत्ते सब सूत-सूतकर डाल रही है। एक भी कामका नहीं रहा। देख ऐसे तोड़ना चाहिये!’
दोनों फूल-पत्ते लेकर लौटे, श्यामने बहुत सुन्दर उपवन बनाया। मेडके
साथ-साथ कुछ बड़ी टहनियाँ रोपकर छाया वाले वृक्ष बनाये। द्वारपर लाठी लिये पहरेदार भी खड़ा किया। छोटेसे सरोवरमें समीपके डाबरसे लाकर पानी भर दिया। यह सब देख उजरी प्रसन्नताके सागरमें मानो डूब रही थी। इतनी कारीगरी की तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। किंतु सखाओंको दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेकी बात वह सम्भवतः भूल गयी थी। बस वह एकटक अपने कन्हाईको देखे जा रही थी।

‘आ! अब मैं तुझे सजा दूँ।’- और बचे हुए पुष्प-पत्र लेकर वह उसके सम्मुख आ बैठा। उजरीके भूरे उलझे बिखरे केशोंमें पुष्पों को लगाया; माला गजरे बनाकर उसे पहनाया।

‘अब तू मुझे सजा!’– उसने कहा उजरीने आज्ञा मानकर अपने छोटे छोटे अनाड़ी हाथों से उसका अधपटा-सा शृङ्गार किया और दोनों हाथ पकड़कर उठ खड़े हुए उस डाबरमें अपना प्रतिबिम्ब देखने।

‘चल उजरी, अब खेलें।’

“कैसे ?”

‘तू छिप जा, मैं तुझे ढूँढू और मेरे छिपने पर तू मुझे ढूँढ़ना !’

‘अच्छा! किंतु तू ही मुझे ढूँढ़ना। मुझसे यह न होगा, तू कहीं खो जाय तो!
‘– उजरीने व्याकुल स्वरमें कहा।

‘अच्छा आ तू ही छिप जा! मैं अपनी आँखें मूँद कर खड़ा हूँ। –
कन्हाईने छोटी-छोटी हथेलियोंसे अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ढाँप लीं।

उजरी अनमने मनसे छिपने चली। वह समीपकी एक झाड़ीमें ही बैठ गयी। कुछ समय बाद श्यामसुंदरने आँखें खोली और ढूँढ़ने चले। सामनेकी कुंजोंमें झाँकते हुए वे आगे बढ़े। उजरी अपने स्थानसे उन्हें देख रही थी। उसे दूर जाते देख वह व्याकुल हो उठी।

कितना सुन्दर भाई मिला है उसे! यदि वह साथ चलना चाहे तो, घर ले जाकर बाबा मैयाको दिखायेगी। इतनी देरमें वह ऐसी हिल-मिल गयी थी, मानो जन्मसे ही उसके साथ खेलती रही हो ।

अचानक चौंक पड़ी वह
‘कहाँ गया कन्हाई?’ अपने स्थान से निकल वह आकुल पुकार उठी-
‘कन्हाई रे कन्हाई’
कभी इस कुंज और कभी उस झाड़ीमें उसका रूँधा कंठ-स्वर गूँजता –

‘कन्हाई रे कन्हाई।’

तभी किसीने पीछेसे उसकी आँखें मूँद ली। झँझलाकर उसने हाथ हटा दिये, घूमकर देखते ही वह उससे लिपट गयी। नन्ही शुक्तियां मुक्ता वर्षण करने लगीं।

‘क्या हुआ उजरी?
मैं तो तुझे ढूँढ़ रहा था।
तू क्यों रो रही है ?’

‘मैं तो पास ही उस झाड़ीमें थी तू क्यों दूर ढूँढ़ने गया मुझे ?’ – वह हिल्कियोंके मध्य बोली।

‘तू मुझे क्यों ढूंढ़ रही थी ?’- मैं तो तेरी पीठ पीछे ही खड़ा था। तू पुकार रही थी और मैं संग-संग चलता मुस्करा रहा था।
‘हाँ ऊजरी, सच!’

तूने ऐसा क्यों किया ?

‘मैं तुझे अच्छा लगता हूँ कि नहीं, यह देखनेके लिये।’

‘कन्हाई!’– उजरीके होंठ मुस्करा दिये, जल भरी आँखें श्यामके मुखपर टिकाकर वह बोली।

‘उजरी!’–
श्याम भी उसी प्रकार पुकार उठे और दूसरे ही क्षण दोनों एक दूसरेकी भुजाओंमें आबद्ध हो हँस पड़े।

‘अब मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूँगी! कहीं फिर खो जाय तो ?’

‘मैं तुझे छोड़ कहीं जाऊँगा ही नहीं!’

‘सच ?’

‘सच!’

सच ही तो है, एक बार आँखों में समाकर यह निकलता ही कहाँ है।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-8


नातो नेह को मानियत

“जे कहा कर रही है री ?”

छोटी-सी घाघरी पहने, ऊपरसे खुले शरीर-बिखरे केश लिये पाँचेक वर्षकी बालिका वर्षासे गीली हुई मिट्टीमें पाँव डालकर घरौंदा बनाने का प्रयत्न कर रही थी। उसकी छोटी-सी छींटकी औढ़नी थोड़ी दूर घासपर पड़ी थी। गौरवर्ण तन स्थान-स्थानसे धूलि धूसरित हो गया था। गोल मुख, बड़ी आँखें और मोटे होठ उसके भील कन्या होनेकी घोषणा कर रहे थे।

बालिका जैसे ही पाँवपर मिट्टी थापकर संतुष्ट होकर धीरेसे पाँव खाँचती, घरौंदा किसी सुरापीके अवश तन-सा ही ढह पड़ता। वह एक बार झुंझलाती, मिट्टीको पीटती-बिखेरती और पुनः जुट पड़ती। सम्भवतः उसे जिद्द चढ़ आयी थी कि बिना किसीकी सहायताके स्वयं अपना घरौंदा बनायेगी वह ऐसा करके अपने साथी-संगियोंको दिखाना चाहती थी कि वे जो उसे चिढ़ाते थे, अब देख लें कि वह उनसे छोटी होते हुए भी समर्थ है। किंतु घरौंदा भी शायद उसीकी भाँति जिद्दी था कि दूसरेका हाथ लगे बिना बनेगा ही नहीं!

उपर्युक्त वाक्य सुनकर समझी, उसका ही कोई साथी उसे चिढ़ाने आया है। तुनककर बोली-

‘तेरो सिर! कहा काज है तो कू मो सौं ? जो मेरो मन होय सो करूँ; तो कू कहा ?”

‘मैं बना दूँ तेरा घरौंदा ?’

‘भागेगो कि मारूँ?’–

उसने हाथमें मिट्टी उठायी उसपर फेंकने को। हाथके साथ नेत्र ऊपर उठे और वह जैसे स्थिर हो गयी। सम्मुख पीत वस्त्र और रत्नभूषणोंसे सजा सांवला सलोना उसीकी वयका अपरिचित बालक मुस्कराता खड़ा था

‘क्यों री! ऐसे क्या देख रही है?’– दाँत मोती की लड़ियोंसे चमक उठे।तो उसने हँसकर कहा,,,

‘मार रही थी मुझे!
मैंने क्या बिगाड़ा है री तेरा ?
ला, मैं बना दूँ। – वह समीप आकर बैठ गया।

उसके तनकी गंध – अहा कैसी मन भावनी! मिट्टी फेंकनेको उठा हाथ नीचे हो गया, किंतु आंखें यथावत अपलक उसे निहार रही थीं।

‘नाम क्या है तेरा ?’ – बालक जमकर बैठ गया था। उसने एक पाँव मिट्टीमें डालकर हाथोंसे थपथापाते हुए पूछा-

‘बोलेगी नाय मो सों?
अभी तो खूब बोल रही थी।
क्या नाम है तेरा ?’

‘उजरी।’–
उसने धीरेसे कहा।

फिर पूछा- ‘तेरो ? ‘

‘मेरो ? मेरो नाम कन्हाई!’
कहकर वह खुलकर हँस पड़ा।

‘तेरा नाम मुझे अच्छे लगा, जैसा नाम है वैसी है ही तू उजरी! मैं तो काला हूँ, इसीसे नाम भी कृष्ण मिला। मैया बाबा और सखाओंने बिगाड़कर लाड़से कन्हाई कर दिया। तुझे कैसा लगा मेरा नाम ?’
बालिकाने मुस्कराकर डबडबाई आँखोंसे बालककी ओर देखा, फिर नेत्र नीचेकर लिये

‘बता न ?’

बालकने अपने धूलि भरे हाथसे उसका चिबुक उठाकर निहोरा किया।

‘कन्हाई!’–

बालिकाने लजाकर कहा और फिर दोनों हँस पड़े।

‘देख! कैसा बना है? –
कन्हाईने पैर धीरे से बाहर खींच लिया और बोला।

घरौंदा देखकर उजरी प्रसन्नतासे ताली बजाकर हँसने लगी। कन्हाईने घरौँदेके चारों ओर मेड़ बनायी उसके एक ओर दरवाजा बनाया और बोला ,,,

‘चल उपवनमें लगानेको फूल-पत्ते बीन लायें।’

कन्हाई भी हाथ, पैर और मुखपर मिट्टी लगा चुका था। पटुका और कछनी भी गीली मिट्टीका स्वाद ले चुके थे। पटुका अवश्य कार्यमें बाधक जान दूर रख दिया गया था, उसे उठाकर गलेमें डाल उजरीका हाथ पकड़ बोला-

‘चल।’

वह भी अपनी डेढ़-दो हाथकी ओढ़नी लेकर पैरोंमें पीतलके पैंजने छनकाती चली। उन पैंजनियोंके संग श्यामके स्वर्ण-नुपूरोंकी छम-छम बड़ी अटपटी! मानों वीणाके साथ भोंपू बज रहा हो, ऐसी लग रही थी।

‘तेरा घर कहा है री ?’– कन्हाईने हाथके पुष्प भूमिपर बिछे पटुके पर धरते हुए पूछा।

उधर, भीलपल्लीमें।’-

उजरीका ध्यान पुष्प पत्र चयनमें कम और अपने नवीन सहचरकी ओर अधिक था।

“कितने बहिन-भाई हैं तेरे ?”” ‘एक भी नहीं! तू बनेगा मेरा भाई ?’

हो ,,,,,,, । तू लड़ेगी तो नहीं मुझसे ?
मैया कहती है मैं बड़ा भोला हूँ;
अरे, यह तू क्या कर रही है, फूल-पत्ते सब सूत-सूतकर डाल रही है। एक भी कामका नहीं रहा। देख ऐसे तोड़ना चाहिये!’
दोनों फूल-पत्ते लेकर लौटे, श्यामने बहुत सुन्दर उपवन बनाया। मेडके
साथ-साथ कुछ बड़ी टहनियाँ रोपकर छाया वाले वृक्ष बनाये। द्वारपर लाठी लिये पहरेदार भी खड़ा किया। छोटेसे सरोवरमें समीपके डाबरसे लाकर पानी भर दिया। यह सब देख उजरी प्रसन्नताके सागरमें मानो डूब रही थी। इतनी कारीगरी की तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। किंतु सखाओंको दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेकी बात वह सम्भवतः भूल गयी थी। बस वह एकटक अपने कन्हाईको देखे जा रही थी।

‘आ! अब मैं तुझे सजा दूँ।’- और बचे हुए पुष्प-पत्र लेकर वह उसके सम्मुख आ बैठा। उजरीके भूरे उलझे बिखरे केशोंमें पुष्पों को लगाया; माला गजरे बनाकर उसे पहनाया।

‘अब तू मुझे सजा!’– उसने कहा उजरीने आज्ञा मानकर अपने छोटे छोटे अनाड़ी हाथों से उसका अधपटा-सा शृङ्गार किया और दोनों हाथ पकड़कर उठ खड़े हुए उस डाबरमें अपना प्रतिबिम्ब देखने।

‘चल उजरी, अब खेलें।’

“कैसे ?”

‘तू छिप जा, मैं तुझे ढूँढू और मेरे छिपने पर तू मुझे ढूँढ़ना !’

‘अच्छा! किंतु तू ही मुझे ढूँढ़ना। मुझसे यह न होगा, तू कहीं खो जाय तो!
‘– उजरीने व्याकुल स्वरमें कहा।

‘अच्छा आ तू ही छिप जा! मैं अपनी आँखें मूँद कर खड़ा हूँ। –
कन्हाईने छोटी-छोटी हथेलियोंसे अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ढाँप लीं।

उजरी अनमने मनसे छिपने चली। वह समीपकी एक झाड़ीमें ही बैठ गयी। कुछ समय बाद श्यामसुंदरने आँखें खोली और ढूँढ़ने चले। सामनेकी कुंजोंमें झाँकते हुए वे आगे बढ़े। उजरी अपने स्थानसे उन्हें देख रही थी। उसे दूर जाते देख वह व्याकुल हो उठी।

कितना सुन्दर भाई मिला है उसे! यदि वह साथ चलना चाहे तो, घर ले जाकर बाबा मैयाको दिखायेगी। इतनी देरमें वह ऐसी हिल-मिल गयी थी, मानो जन्मसे ही उसके साथ खेलती रही हो ।

अचानक चौंक पड़ी वह
‘कहाँ गया कन्हाई?’ अपने स्थान से निकल वह आकुल पुकार उठी-
‘कन्हाई रे कन्हाई’
कभी इस कुंज और कभी उस झाड़ीमें उसका रूँधा कंठ-स्वर गूँजता –

‘कन्हाई रे कन्हाई।’

तभी किसीने पीछेसे उसकी आँखें मूँद ली। झँझलाकर उसने हाथ हटा दिये, घूमकर देखते ही वह उससे लिपट गयी। नन्ही शुक्तियां मुक्ता वर्षण करने लगीं।

‘क्या हुआ उजरी?
मैं तो तुझे ढूँढ़ रहा था।
तू क्यों रो रही है ?’

‘मैं तो पास ही उस झाड़ीमें थी तू क्यों दूर ढूँढ़ने गया मुझे ?’ – वह हिल्कियोंके मध्य बोली।

‘तू मुझे क्यों ढूंढ़ रही थी ?’- मैं तो तेरी पीठ पीछे ही खड़ा था। तू पुकार रही थी और मैं संग-संग चलता मुस्करा रहा था।
‘हाँ ऊजरी, सच!’

तूने ऐसा क्यों किया ?

‘मैं तुझे अच्छा लगता हूँ कि नहीं, यह देखनेके लिये।’

‘कन्हाई!’– उजरीके होंठ मुस्करा दिये, जल भरी आँखें श्यामके मुखपर टिकाकर वह बोली।

‘उजरी!’–
श्याम भी उसी प्रकार पुकार उठे और दूसरे ही क्षण दोनों एक दूसरेकी भुजाओंमें आबद्ध हो हँस पड़े।

‘अब मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूँगी! कहीं फिर खो जाय तो ?’

‘मैं तुझे छोड़ कहीं जाऊँगा ही नहीं!’

‘सच ?’

‘सच!’

सच ही तो है, एक बार आँखों में समाकर यह निकलता ही कहाँ है।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-7


प्रेम न हाट बिकाय

सखियाँ अपने अपने अनुभव सुनाती हैं कि कैसे उनको श्यामसुंदर हाट बाट और घाटपर मिले। हँसी, ठिठौली और बात की घड़े फोड़े, माला तोड़ी, चुनरी फाड़ी। सुनकर हृदयमें मरोड-सी उठती है- ‘बड़भागिनी हैं ये सब!’

पानी भरने, दही बेचने और नहाते समय सबके साथ ही तो रहती हूँ। श्यामने घड़ा फोड़ना और माला तोड़ना तो दूर, कभी आँख उठाकर देखा भी नहीं मुझे!

क्योंकर देखें? सब कहते हैं श्यामसुंदर प्रेम परवश हैं और प्रेम कहाँ है इस सुखे मरुस्थलमें ?

घर बाहर सब कहते हैं- ‘सुचरिता रूप गुण आगरी है।’

सुनकर हृदय जल उठता है, यह रूप गुण किस कामके, जो कान्ह जू को न भाये !
प्रेम… प्रेम…. प्रेम….; कहाँ मिलेगा यह प्रेम! किससे पूछूं, कैसे मिलेगा? सखियोंसे पूछँ?
नहीं, वे हँसेगी!
उपहास चाहे न करें, सहानुभूति जतायेंगी गरीबनी जानकर, सहा जायेगा वह ?
नहीं, नही….।

किंतु प्रेमके बिना काम जो नहीं चलता मेरा!
श्यामसुंदरसे ही पूछें?
बाप रे! जीभ हिलती भी है उनके सम्मुख! जीभकी कौन बात है,
पलकें भी अभागी ऊपर नहीं उठ पाती।

सखियाँ कहती हैं –
‘विधाता मूर्ख है, उसने पलकें बनाकर हमारा कितना बड़ा अपकार किया है। एक बार दृष्टि उठते ही, फिर हटनेका नाम नहीं लेती, पर पलकें बीचमें कभी-कभी बाधा उपस्थित कर ही देती है। नयन-लाभ बस इतना ही है संसारमें, कि कृष्णचन्द्रका मुखावलोकन किया जाय!’

किंतु कहा! नंदगाँवकी कन्या होनेपर भी यहीं नहीं नंदभवनके समीप आवास पाकर भी उनके दरशन कर सकी मैं?
एक बार, हाँ एक बार देखे थे मैंने उनके नीलकमलकी पंखुड़ीसे दीर्घ आकर्ण चुम्बित, गहरी झील और सौंदर्य रसके आकर नयन-द्वय फिर कुछ स्मरण नहीं रहा !

सखियोंसे बातें करते हैं तो वह मीठी ध्वनि कर्ण-पथसे उतरकर हृदयमें आवास बना लेती है। मेरी कभी हिम्मत न हुई देखने बोलने की और न उन्होंने कभी आवश्यक समझी। बातोंसे ही जान पायी हूँ कि ये बहुत भोले हैं। सखियाँ उनसे काम करवाती हैं, खिजाती हैं और नंदभवनमें जाकर उन्हींकी शिकायत भी करती हैं। फिर भी वे दूसरे दिन बुलानेपर या मिलनेपर सब भूलकर पुनः घड़े उठवाने लगते हैं अथवा दूसरा काम बतानेपर वही करने लगते हैं।

कार्य भी क्या कम हैं-
किसीकी बछिया छूट गयी है,
किसीकी पड़िया खो गयी है,
किसीकी टूटी मुक्तामाल पिरोनी है, किसीको कांटा चुभ गया है,
किसीकी आँखमें धूल पड़ गयी है, किसीकी गैया उनके बिना दूध नहीं देती,
और किसीके हाथ गोबर अथवा आटेसे सने हैं और केशपाश बाँधना है।
ऐसे सैकड़ों नहीं, हजारों काम है। किसीको कार्य करवाने के लिये निहोरा करना पड़ता है और किसीका बिना कहे ही कर देते हैं।
एक मैं ही अभागिन हूँ इस व्रजमें जिसके पास कहनेको कुछ भी नहीं !

अच्छा श्यामसुंदर तो मनुष्योंसे ही नहीं पशु, पक्षी, वृक्षों और पत्थरोंसे भी प्रेम करते हैं। इनसे पूछूं कि प्रेम कहाँ-कैसे मिलता है ?

चलूँ वह कपोत बैठा है–
‘कपोत! कृपाकर मेरी व्यथा सुनो, मेरा हृदय प्रेम शून्य है। तुम…. ‘
अरे यह तो उड़ गया।
इस शशकसे पूछँ–
‘प्यारे शशक! तुम उनके प्रिय मित्र हो। बोलो तो तुम्हें यह प्रेम कैसे प्राप्त हुआ ?
हाँ!’ यह भी मेरी ओर देखकर भाग चला है।
अच्छा इस मृगीसे पूछूं, कदाचित यह बता दे-‘मृगवधु! बताओ तो,
कैसे तुम्हें यह अतुलनीय प्रेम प्राप्त हुआ ? श्याम गलबहियाँ डालकर तुमसे बातें करते हैं, वंशीमें पुकार कर तुम्हें बुलाते हैं, बोलो तो भला क्या बातें करते हैं वे तुमसे ? तुम्हारी इन बड़ी-बड़ी भोली आँखोंपर ही तो नहीं रीझ गये वे ? क्या कभी तुमने उनकी आँखें भी देखी हैं? जिनकी कहीं समता….
‘ ओह ! तुम भी चल दीं ?

सब अपने सौभाग्यपर गर्वित हैं, मुझ सा दीन-हीन कौन हैं! अब किससे पूछूं ? घरसे बहुत दूर आ गयी, पाँव थक गये, पर प्रेमका अता-पता न पाया। धूप चढ़ आयी है, गला सूख रहा है, चलूँ! इस तमाल के नीचे तनिक विश्राम कर लूँ।

अहा ये वृक्ष धन्य हैं; ये तो परोपकारके लिये ही जीवन धारण करते हैं। इससे पूछूं प्रेमका पता –
‘महाभाग तमाल! तुम्हारे सौभाग्यकी तुलना किससे हो सकती है? तुमने कान्ह जू का वर्ण पाया है, साथ ही अतुलनीय दयामय स्वभाव भी। मैं दरिद्रा भाग्यहीना तुम्हारी शरण आयी हूँ कृपाकर मेरा संताप मिटाओ- मेरा अभीष्ट प्रदानकर जीवनदान दो। तुम्हारी यह झुकी डाल जिसका आश्रय ले मैं खड़ी हूँ– प्रायः नित्य ही व्रजके जीवनाधार इसपर बैठकर – इसका आश्रय ले तुम्हें वंशी सुनाया करते हैं। उस समय श्याम सखा! देवता भी तुम्हारे भाग्यकी सराहना करते नहीं थकते। मुझ अभागिनको बताओ कि तुमने यह सौभाग्य कैसे पाया? यह अमोघ प्रेम कहाँसे, कैसे पाया जा सकता है? मेरे आराध्यके प्रिय ! मुझे बताओ…. मुझे बताओ तमाल! आह कुछ तो कहो कि मेरा सौभाग्य सूर्य कैसे-कब उदित होगा?
कब प्रिय दर्शन प्राप्त होगा?
कब उनके मधुमय अधरोंसे मेरा नाम निकलेगा?
कब वे समीप आकर मुझसे कुछ कहेंगे ?
कब-कब यह दुरन्त लज्जा पलकों और जीह्नाको अधिकार मुक्त करके मुझे दर्शन-भाषणका अवसर देगी ?
मेरे प्राण प्यासे हैं तमाल! मार्ग दर्शन कर आप्यायित – अनुगृहित करो। हाय, तुम तो बोलते ही नहीं! ठीक है भाई! भाग्यहीनका साथ कौन दे ?
घीमें घी सभी औंधाते है, रेतमें कौन घी डाले ?
बुरा न मानना भाई?
दुःखी व्यक्तिको बोलनेका ध्यान नहीं रहता, कुछ उलटा-सीधा कह दिया हो तो क्षमा करना।’

अब बोला नहीं जा रहा, आँखोंके आगे अंधेरी चादर फैलती जा रही है। कोई नहीं है जो मेरी सहायता करे।
किंत… किंतु…. यमराज तो कृपा कर ही सकते हैं। सूर्यनंदन! तुम तो भागवताचार्य हो, कृपामय हो, कृपा करके मेरे व्यर्थ बीतते हुए जीवनको समेट लो। मैं इस तमालकी डाल भुजाओंका वेष्ठन दे अवस्थित हूँ।
तुम मेरी चेतना हर लो, जिससे ग्लानिपूर्ण यह असह्य हृदयदाह समाप्त हो। तनको यहीं ऐसे ही रहने देना; कदाचित कभी श्यामसुंदर इधर आ जाय और कृपा-कौतुहलवश ही इसे देखें स्पर्श कर लें- धन्य हो जायेगा यह पिंड पधारो…. पधारो…. संयमनीपति ।।

‘शुचि…. शुचि…. क्या हुआ शुचि!
तू यहाँ कैसे ?’

‘यह… यह…. कौन… पुकार… रहा…. है…. सम्भवत यमपुरीसे बुलावा आ रहा है। मैं प्रस्तुत हूँ भगवन्! मेरे प्राणोंका अर्घ्य स्वीकार करो देव !!

‘यह क्या बड़बड़ा रही है! इतनी दूर कैसे आ गयी ? आंखें खोल सुचि।’

‘देख तो, कहाँ है तू! ले जल पी।’

गलेमें जल पहुँचा तो सूखे गलेमें ठंडक पहुँची; नेत्र अपने आप उघड़ गये। ‘इधर देख शुचि ! इतनी दूर कैसे आ गयी ?”

जैसे ही दृष्टि घूमाकर उस दृष्टिमें समायी, मैं चौंककर काँप गयी। प्रत्येक रोम लहराकर उठ खड़ा हुआ। नयनोंके स्नेह वर्षण और वाणीकी मधुरिमाने पुनः चेतना हर ली।

जब आँख खुली तो मैं लता-जाल वेष्ठित कुञ्जमें शिलापर लेटी थी। बायीं ओर पत्र-पुटकमें जल और पुष्प रखे थे। पदोंकी और वह त्रिभुवन – सुन्दर बैठे तलवोंपर हाथ फेर रहे थे। मैं मन-ही-मन संकुचित हो उठी; पैर समेटकर उठना चाहती थी, किंतु सदाकी बैरिन जड़ताने हिलनेकी भी अनुमति नहीं दी !

मुझे जागी देख वे शिलातलसे उठ खड़े हुए, स्नेह भरित कण्ठसे पूछा
“अब कैसा जी है शुचि, उठाऊँ ?’

उन्होंने उठकर बैठनेमें सहायता की। ‘ले जल पी।’

पत्र-पुटक उन्होंने अधरोंसे लगा दिया, यन्त्र चलिए की भांति मैं पी गयी। जल पीनेसे चेतना कुछ गहरायी आई, फिर भी समझ नहीं पा रही थी कि यह सब स्वप्न है या सत्य ! वे समीप बैठ गये, चिबुक उठाते हुए बोले-
‘बोलती क्यों नहीं। मुझसे कोई अपराध हुआ- मुझसे कष्ट है ? तेरा घर इतना समीप है, किंतु तुझे कभी मैंने नंदभवनमें नहीं देखा! घाट अथवा पथमें भी कभी बोलती नहीं। मैयाको दूसरी गोपियोंको भांति उलहना देने भी नहीं जाती, अवश्य ही तू मुझसे रुष्ट है। शुचि इधर देख; क्या मेरी ओर देखना भी तुझे स्वीकार नहीं ?”

मेरा अंतर हाहाकार कर उठा, शरीरसे पसीनेका निर्झर बह चला।
प्रत्येक अंग मानो शताधिक्यसे थर थर काँपने लगा, नेत्रों की वर्षा चाहनेपर भी विरमित नहीं हो पा रही थी। हृदय चरणोंमें लोट जाना चाहता था, पुकारकर कहना चाहता था—
‘नहीं श्याम जू, नहीं! विधाताकी सृष्टिमें तुमसे रुष्ट हो सके, ऐसा प्राणी ढूँढ़नेपर भी न मिलेगा!’
नेत्र तृषितकी भाँति रूपमाधुरी पान करनेको आतुर थे, पर दुर्भेध प्राचीरकी भाँति मेरा दुर्भाग्य अड़ा था। न कुछ कह सकी, न कुछ कर सकी।

समीपसे उठकर वे पुनः पैरोंके समीप जा बैठे। लगभग हाथ जोड़े हुए बोले-

‘मेरे अपराध क्षमा कर दे शुचि !’

उन्होंने अपना कपोल मेरे पैरपर रख दिया-
‘मैं जैसो-तैसो तेरो हूँ।’
मुझे लगा हृदय और मस्तिष्कमें एक साथ अनेकों विस्फोट हो गये।
आँखों के सामने काले-पीले रंग की चिंगारियाँ उड़ने लगीं। सम्भवतः मैं पुनः अचेत होकर गिरने जा रही थी, हृदयका समस्त आवेग करुण चित्कारके रूपमें फूट पड़ा— ‘श्यामसुंदर ,,,,,,!’ सम्बल भी उन्हींकी बाँहोंका मिला।

अंकमें लिये हुए ही उन्होंने पीताम्बरसे मुख पोंछ दिया। पवन डुलाया और पुनः चिबुकपर तर्जनी रखकर बोले-

‘तेरे इस एक शब्दने एक सम्बोधन मेरे सारे भ्रम मिटा दिये। मैं अबतक समझता रहा था- शुचि मुझसे रुष्ट हैं। मैं चोर हूँ, काला हूँ, उधमी हूँ, इसीसे तू मुझसे उपेक्षा बरतती है।’

वे हँस दिये –
‘ इसी कारण तो मेरे सारे उधम, तुझपर दृष्टि पड़ते ही शांत हो जाते थे। तुझे कुछ कहते—छेड़ते मुझे संकोच हो आता था। और तो क्या कहूँ, श्रीराधाके सम्मुख भी मैं कभी इतना संकुचित नहीं हुआ। उनके अंतरकी बात मैं जानता हूँ, किंतु तेरा हृदय द्वार तो अर्गला और श्रृंखलासे ही नहीं; अभेध दीवारसे रुद्ध रहता है। मैं भोला छोरा भला कैसे समझ पाता! इसीसे तुझे अनदेखा कर इधर-उधर सरक जाता।’

कुछ क्षण ठहर कर बोले–
‘मेरी ओर देखेगी नहीं शुचि? लोग कहते हैं मैं बहुत सुन्दर हूँ। एकबार देख न! मैं भी देखें तेरी काली पुतलियोंमें मेरा काला

प्रतिबिम्ब कैसा दिखायी देता है। मैं काला हूँ, क्या इसीसे तू नहीं देखती ?”

मैं बरबस मुस्करा दी। इस भोलेपनकी भी कोई सीमा है भला? अंजलीमें भरकर उन्होंने मेरा मुख ऊपर उठा दिया-
‘शुचि !’

न जाने क्या था उस स्वरमें, कि लगाके भारी भारकी अवहेलना कर पलकें धीरेसे ऊपर उठ गयी। वह कमलमुख समीप था— बहुत समीप चिरकालका तृषित-पथिक मानो सरोवरके निर्मल जलपर झुक गया। मुझे ज्ञात नहीं, कितने समयतक नयन भ्रमर रूपसुधा पान करते रहे। ध्यान टूटा- वे एक हाथ से मेरा मस्तक हिलाते हुए हँसकर कह रहे थे—

‘बोलेगी नहीं!’

यह हीरक कणों सी दन्त पंक्ति, उनकी आभासे उज्ज्वलता लिये विद्रुम अधर, मस्तक हिलनेसे गतिमान हुए दौड़-दौड़कर कपोलोंको चूमते मुख मकर- कुण्डल, बार-बार झुक झुक आती कुण्डलायित घनकृष्ण केश राशि, मुखमण्डलकी वह अमित छवि और सम्पूर्ण शरीरकी अपार शोभा, सबसे ऊपर वह दिव्य देह-गन्ध !

उनके सखा कहते हैं—
‘कन्हैयाकी देह-गन्ध इसे कहीं छिपने नहीं देती!’

अपनी सीमित इन्द्रिय-शक्तिसे मैं क्या-क्या देखँ क्या अनुभव करूँ।। विधाताकी कृपणता आज बेतरह खटक गयी। असमर्थताके बोझसे कसमसा उठी मैं

‘क्या देख रही है, योँ? लोग झूठ कहते हैं न, कि मैं सुन्दर हूँ! सम्भवतः मुझे चिढ़ाने को कहते होंगे। सुन्दर तो तू है, मैं तो काला हूँ।’

मुझे मन-ही-मन हँसी आ गयी–
‘अहा, कितनी बातें बनानी आतीं हैं इन्हें ? मेरे जितने ही तो है; कुल सात वर्ष, मुझे तो बात ही नहीं आती। भीतर कुछ उपजता भी है तो शब्द नहीं मिलते और ये ? मैया रे!”

‘बोलती क्यों नहीं, फिर हाथ जोहूँ?’

कि मैं व्याकुल हो उठी, जीभको मुखमें घुमा-फिरा कर देखना चाहा वह मुखमें है भी कि पलायन कर गयी, किंतु कुछ भी न हो सका। सम्भवतः मेरी व्याकुल-दृष्टि उन्होंने चिन्ह ली, अतः वैसा कुछ नहीं किया। पर खोजते हुए बोले–

‘अगर तू नहीं बोली, तो मैं तेरी नाक खींच लूँगा।’
मुझे अनायास हँसी आ गयी।

उन्होंने प्रसन्नताके आवेग में मुझे अंकमें दबा लिया। मैं आनन्द-मूर्छामें डूबने लगी तभी वे मुख झुकाकर अपने अधरोंसे मेरा ललाट स्पर्श करते हुए। बोले–
‘कितना मधुर स्वर है तेरा ! बोल न; मेरे श्रवण आकुल हैं सुनने को।’

वह स्पर्श, वह श्वासकी मोहिनी गंध; मैं अवश हो चली; नयन पुट मुंद गये और अवश-मंद-अधीर स्वर फूटा-

‘श्या…. म… सु. न्द र…!’

‘बोल शुचि ! और बोल…. और बोल…. ।’

श्यामसुन्दर…. श्यामसुन्दर !! श्यामसुन्दर !!!-
मन और प्राणोंके साथ-साथ जिह्वा आवृत्ति करती गयी।
कितना समय बीता, जाननेका न अवसर था, न इच्छा और न साधन ही।

‘शुचि’।

‘हूं,,,,’

‘आँखें खोल! देख तेरे केशपाश खुल गये हैं। तू उठकर बैठ, तो मैं बाँध दूँ इन्हें ।’

‘अब चलें, अबेर हो रही है। सखा ढूंढ़ते होंगे मुझे! तेरी मैया भी चिन्तित होगी।’–

उन्होंने ढीली चोटी कर, उसमें पुष्प गुम्फन करके मुझे दिखानेको आगे लटकाते हुए कहा।
मैंने आश्चर्यसे उनकी ओर देखा; यह सब कहाँ सीखा उन्होंने !

‘उठ, चलें।’
उन्होंने हाथ पकड़ कर उठा दिया-
‘अब तो चुप नहीं रहेगी ?
कैसे, क्यों आयी थी यहाँ इतनी दूर?”

मैं मन ही मन उत्तर खोजने लगी।

‘फिर गूंगी हो गयी ?’– खीज पड़े ।

मैं अचकचाकर उनका मुख देखने लगी। वे हँस पड़े-

‘इसीसे लोग कहते हैं- शुचिके मोढ़े मा जिह्वा नाय!’

तमाल वृक्षको देख, चलते-चलते रुककर मैंने प्रणाम किया।

‘यहाँ कोई देवता है ?’

मैंने ‘हाँ’ मैं मस्तक हिला दिया।

‘कौन देवता ?’

मैं पुनः उत्तर ढूंढ़ने में लग गयी।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-6


घनश्याम बड़ो कि श्यामघन सखी री

‘यहाँ क्यों खड़ी है माधवी ?”

‘कुछ कहना है!’

“किससे ?”

‘श्यामघन से।’

‘अहा हा, बलिहारी तेरी बुद्धि की! श्यामघनसे बात करनी है इसलिये बरसानेसे यहाँ तक दौड़ी आयी है। वहीं बात नहीं हो सकती थी ?”

‘तुम समझते नहीं कान्ह जू!
मैंने बात तो वहीं प्रारम्भ कर दी थी; किंतु घन तो तुम्हारे दर्शनको आतुर दौड़ते आ रहे थे। इसी कारण मुझे भी इनके संग दौड़ना पड़ा।’

‘यही सही! तू मुझे बता दे अपनी बात, मैं कह दूँगा स्यामधन से तू कहा तक दौड़ती रहेगी इनके संग-संग ?’

बड़ी गुप्त बात है श्यामसुंदर!
किंतू में शीघ्रतामें समझ नहीं सकी कि संदेशा घनश्यामके लिये है कि स्यामघन के लिये। हमारी स्वामिनी दोनों ही को देखकर व्याकुल हो जाती है।’

“ऐसा कैसे हो सकता है सखी दोनोंमें से एक आश्रय और दूसरा आश्रयण होगा न।’

‘यही तो मुझे समझमें नहीं आता श्याम जू!’

‘सुन सखी! स्यामघन तो गरजना और बरसना ही जानता है। किंतु घनश्याम मोहना और मोहित होना भी जानता है।’

‘नहीं श्यामसुंदर!
दोनों ही काले हैं, दोनों सुहावने,
दोनों प्राण-संजीवन, दोनों चंचल,
दोनों गगन विहारी और
दोनों तड़िताम्बरधारी हैं।
रही मोहनेकी बात, सो सुनो! क्या चातक और मोर मोहित नहीं होते ? क्या धरा पर मोहित होकर ही नहीं बरसता घन ?’

‘किंतु सखी! घन क्या सब प्राणियोंको मोह लेता है ?”

‘क्यों नहीं! जैसे ही घन गगनमें छाये कि सब प्राणी आनन्दमग्र हो जाते हैं।’

‘तो सखी! जब इन्द्रने जल बरसाया; गगन काले काले बादलोंसे भर गया तब क्यों नहीं आनंद मनाया तुम लोगों ने; क्यों इधर-उधर भाग खड़े हुए
सबके सब ?”

‘वह तो इन्द्रका कोप ही घनका रूप धारण करके आया था।
श्यामघन ऐसा निर्दय नहीं है।’

‘अच्छा सखी! और जो चातकपर पानीके बदले पत्थर बरसाता है, सो
कौन है ? “

‘तो कान्ह जू,
घनस्याम भी कुछ कम नहीं हम गोपियोंको दर्शन बिना तरसा मारता है। मेरा मन तो तब भरे जब कोई एक दूसरेके अधीन हो जाय उसकी श्रेष्ठता स्वीकार कर ले। ‘

‘यह कैसे ज्ञात होगा कि एकने दूसरे की आधीनता मान ली है।’

‘जो श्यामघन अभी गगनमें आकर धीमे धीमे गरजते हुए बरसने लगे तो मैं समझ जाऊँगी कि ये घनश्यामसे प्रेम करते हैं।’

‘अच्छी बात है सखी।’

कहकर श्याम जू ने फेंटसे बंसी निकाली तमाल मूलसे लगी चट्टानपर बैठकर उससे पीठ टिका ली।
बंसी अधरोंसे लगायी,
नयन अर्धनिमिलित हुए,
ग्रिवा बायीं ओर तनिक झुक गयी और कुण्डलोंने दौड़कर कपोलोंका चुम्बन किया,
सुकोमल उंगलियाँ बंसीके छिद्रोंपर नृत्य करने लगी और मधुमय-स्वर लहरोंसे चर अचर और अचर चर होकर अपनपा खो बैठे।
मैंने धीरेसे आगे बढ़कर उनके चरणयुगल अपनी क्रौडीमें ले लिये।
न जाने कब मैं उस स्वर-माधुरीमें बह गयी। जब चेतना लौटी उनका वाम कर मेरे मस्तकपर धीरे-धीरे घूम रहा था।

‘माधवी।’–

मधुमय स्वर सुनकर आँखे खुली तो देखा गगनसे झरे दिव्य पुष्पों से धरा रंग-बिरंगी हो गयी है। हल्की फुहार अभी विरमित नहीं हुई है। घन मृदुमन्द-स्वरमें मृदंग बजा रहे हैं, धरा और गगन-सम्पूर्ण सृष्टि मानो महोत्सव मग्न हो।
घूमकर दृष्टि पुनः उस विश्वविमोहन मुखपर जा टिकी हृदयमें बिजली सी चमकी, मुख से गहरी कराह निकली और मैं व्याकुल होकर चरणोंसे लिपट गयी नयन निर्झर बनकर पद पखारने लगे।

‘क्या हुआ माधवी ?’
उन्होंने उठाकर मेरे आँसू पोंछे—

‘तू तो परीक्षा ले रही थी कि स्यामघन और घनश्याममें कौन श्रेष्ठ है।
रोती क्यों है? मेरी विजय तुझे अच्छी नहीं लगी?’

‘तुम तो सदा विजयी हो प्राणधन! घन तो सदासे तुम्हारा दास है।
मैं क्या
परीक्षा लूँगी भला! इसी बहाने तुम कुछ समय सम्मुख ठहरे रहे; अदर्शनसे
आकुल दग्ध मन थोड़ी शीतलता पा जाय, इसीलिये सारी गोपियाँ तुम्हें
खिजाती, चिढ़ाती और बातोंमें अटकानेका प्रयत्न करती हैं।’

श्याम हँस पड़े, मेरी पीठपर थाप देते हुए बोले-
‘बहुत चतुर हो री तुम सब ! मैं भोला छोरा कुछ समझ नहीं पाता, इसीसे तुम्हारी बातों में आकर जैसे तुम नचाती हो, नाचता जाता हूँ चलो अच्छा हुआ! अब तो तेरी इच्छा पूरी हो गयी न, अब संदेशा कह।’

मैं चौंक पड़ी, कितना विलम्ब हुआ। हाँ, प्रतीक्षा करती सखियोंके प्राण कंठमें आ सामाये होंगे और स्वामिनी जू की व्याकुलता स्मरण करके तो मन पश्चातापसे झुलस उठा। मुख नीचा हो गया, दुःख भरे स्वरमें बोल फूटे

‘मैं महास्वार्थी हूँ कान्ह जू! और इस कार्यके योग्य नहीं! अपने आनन्दमें उन
सबकी पीड़ा भुला बैठी; गिरिराज निकुञ्जमें तुम्हारी प्रतीक्षा हो रही है। ‘अभी ?’
‘सूर्यपूजाके पश्चात।’

“तुझे कुछ चाहिये ?’ वे मेरे केशपाश बाँधते बोले- ‘मुझे तेरे केश बड़े अच्छे लगते हैं सखी।’

‘यह मेरा सौभाग्य ! यों व्रजमें ऐसा क्या है जो तुमपर न्यौछावर नहीं!

अब तुम चलो कान्ह जू! बहुत विलम्ब हुआ।’

‘अच्छा सखी! तो जाऊँ मैं?’

मैंने ‘हाँ’ में मस्तक हिला दिया और देखती रही वह मनोहर चाल,
फहराता पीतपट,
लहराते केश और ललित गतिसे उठते-पड़ते चरणयुगल । नयन ओट होते ही मैं लोट गयी उस चरण रज पर।

श्यामसुंदर!
तुम पूछते हो जाऊँ ?
त्रिलोकीमें किसकी जीभ लोहेकी है, जो तुम्हें जानेकी अनुमति देते हुए लड़खड़ा न जाय।
मेरे प्राण! तुम नयन भूषण हो, तुम्हारे जाते ही जगतमें अँधेरा हो जाता है। मेरी ही बात नहीं, यह चराचर साक्षी है। इन वृक्षोंसे, इन पत्थरोंसे और इस धरित्रीसे पूछो इन मृग वधुओं, जलचरों और इन केहरी शावकोंसे पूछो।
श्याम जू!
तुम्हारे बिना सबके प्राण छटपटाने लगते हैं। यह देखो सबके आकुल-व्याकुल नयन तुम्हें खोज रहे हैं।
धरा और गगन सबके रोम-रोमसे एक ही पुकार सुनायी देती है-
‘श्यामसुंदर कहाँ हो…. श्याम सुंदर आह!’

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-5


राज रोग लग्यो हिय माँही

‘अरी बहिनों! इतने दिनोंतक तो हम यही समझती रहीं कि यह श्याम रोग हमें ही लगा है, पर कल ज्ञात हुआ कि यह तो किसी-किसी ब्रजवधुको भी लग गया है।’— पद्मा बोली ।

‘क्या हुआ सखी ?’ – सब सुननेको उत्सुक हो उठी।

‘होगा क्या! क्या तुमने कल नहीं सुना कि विमल दादाकी बहु बौराय गयी है ? ‘

हाँ सुना था; पर इसमें इस राजरोगकी कल्पना-गंध कहाँ है ?

‘अरी बहिन! हम तो फिर भी अच्छी है कि कहीं आमने-सामने होने पर एकाध बात तो कर लेती हैं। एक-दूसरीसे कहकर मनकी तपन बाँट लेती हैं। किंतु इन बहुओंकी दशा तो हमसे भी गयी बीती है! किससे कहें, कौन सुनें और श्यामसुंदरसे बात करना तो असम्भव-सा ही है। कोई हिम्मत करे भी तो कलंकित हो।’

“कलंककी भली कही बहिन! इसमें किसीका बस चलता है भला! हम कुल बोरिन सही, पर पशु-पक्षियोंको देखो, इन यमुनाको देखो, इन पत्थर-तरुओंको देखो, और-तो-और; इन कलंकी कहनेवाले बूढ़े बुढ़ियाओंको देखो! इन सबमें कोई है, जो श्यामसुंदरके बिना जीवन-धारणकी कल्पनाकर सके ? सृष्टिमें कोई नहीं जो श्रीकृष्णसे नेह लगाये बिना उनसे मन लगाये बिना रह सके!’

‘फिर केवल बहुएँ ही सृष्टिसे बाहर है क्या ?’

‘ऐसा कहते हैं सखी! कि स्त्रीको पतिके अतिरिक्त अन्य पुरुषसे प्रेम नहीं करना चाहिये। यह महापाप है, सतीत्वके लिये कलंक है, नारी जातिमें वह अस्पृश्या-सी मानी जाती है।’

‘बहिन! श्यामसुंदर क्या अन्य पुरुष हैं? बड़े-बड़े महात्मा, जो शाण्डिल्य ऋषि और भगवती पौर्णमासीके आश्रममें आते हैं; कृष्णकी चर्चा श्रीनारायणके समान करते हैं, उन्हें अंतर्यामी और सबकी आत्मा कहते-सुनते हैं। फिर यह क्या अपने वशकी बात है! उनका रूप ही नयन-मनको बरबस खींच लेता है, तो इसमें किसीका क्या दोष ?’

विमल दादाकी बहुकी क्या बात है ?

विमल दादाकी बहु परसों अपने देवर सूरजसे कह रही थी-लाला! अपने सखाकी कोई बात कहो न; तुमको लड्डू दूँगी।
सुनकर मैं समझ गयी। कि व्याधि यहाँ भी लगी है।
सखी! तनका ताप सहना सरल है, मनका ताप महादुर्धर्ष होता है।
कल सूरजकी भाभी क्षमा विकल होकर जमुनामें जा पड़ी।

तू यह सब कैसे जानती है?— माधवीने पूछा।

‘मेरा घर उसके समीप ही तो है, आज मैं उससे मिलकर आ रही हूँ।

आँखोंसे आँसुओंके प्रवाह बहाते, सहमती, सकुचाती और हिचकियोंके मध्य उसने मुझे बताया- बहिन ! प्रथम बार पनघटपर देखा था मैंने श्यामसुंदरको, उस दिनसे जाने क्या हुआ कि बार-बार उनको देखनेको जी चाहता; किसी काममें मन न लगे! प्रातः सांय देखनेसे मन न भरता था, अदर्शनकी ज्वाला भभक भभक उठती थी। सारे गृहकार्य उल्टे-सीधे होते, सासजी उलाहने देतीं।
मैंने तुम्हारे दादासे पूछा- यह मुझे क्या रोग लग गया ?’

सुनकर वे हँस दिये—’कन्नू है ही ऐसा!
उसे देखनेके पश्चात् और कोई दृष्टि-पथमें आता ही नहीं; यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं। मैं स्वयं भी घर आना नहीं चाहता, काम-काज करते हुए भी मनमें-आँखोंमें श्याम ही समाया रहता है। इसमें दुखी होने जैसा कुछ नहीं है।’

‘मैं क्या कहती बहिन? मेरी अकुलाहट बढ़ गयी। कल ज घाटपर गयी तो आँसुओंने बाँध तोड़ दिये।

आह! कैसे लेख लिखे विधाताने मेरे भाग्यमें कि ‘पर पुरुष सों प्रीती भई’ और वह भी अलभ्य; फिर समान उम्रका भी नहीं! कितने छोटे हैं मुझसे कान्ह कुँवर; सुना है अभी आठवाँ वर्ष भी पूरा नहीं हुआ। कैसी अनहोनी बात है-छी….छी ! घाट पर बैठे-बैठे जमुना जल पर दृष्टि गयी, तो अंतर्ज्याला और अधिक भभक उठी; न जाने क्या हुआ कि मैं जलमें कूद पड़ी। जब चेत आया तो तटपर एक चट्टानकी ओटमें पड़ी थी और समीप कन्हाई बैठे थे। मुझे नेत्रोंपर विश्वास नहीं हुआ, हाथ उनके चरणोंपर रखा, तो स्पर्शने सारे भ्रम तोड़ दिये।

‘अब जी कैसा है ?
‘ वह सुधा स्यन्दी स्वर कानोमें पड़ा।
‘क्या हुआ! यमुनामें कैसे जा गिरी ?’– उन्होंने पुनः पूछा।

मैं क्या उत्तर देती ? एक हाथ माथेके नीचे लगाकर उन्होंने मुझे चट्टानके आधार बिठा दिया।

‘क्या हुआ! कैसे हुआ यह ?’– उन्होंने फिर पूछा, तो मेरे नयन झर उठे । अपने करोंसे आँसू पोंछ कर व्याकुल स्वरमें बोलें- ‘तुझे क्या दुःख है ?

मुझसे कह न !’

‘यमराजके अतिरिक्त मेरा दुख और कोई नहीं मिटा सकता।’ – मैंने भरे कण्ठसे कहा। उन्होंने अपनी हथेली मेरे होठोंसे लगा दी। नयन भर आये उनके;

ऐसा भी कोई कहता है! तू कह तो ?”

‘कान्ह जू! मुझे बचाकर तुमने अच्छा नहीं किया। मेरा दुख महा लज्जाका विषय है, तुम सुनकर धिक्-धिक् कर उठोगे, फिर मुझसे भी कहते कैसे बनेगा ?’

“तू कह तो!”

‘कान्ह जू! मे. रो… म. न. तु म्हा रे च… र.,,, न… न…..में…. ल… गो… र…. हे…. ।’–
बड़ी कठिनाईसे मैं इतना ही कह सकी और रुलाई फूट पड़ी।

उन्होंने मुझे भुजाओं में भर हृदयसे लगा लिया-
‘मुझसे प्रेम करना पाप नहीं! मैं सबका प्रिय हूँ, सबका अपना हूँ। मैं सबका हूँ, ओर सब मेरे हैं; मुझसे किया गया प्रेम ही सार्थक होता है। यह पाप और पुण्यका विषय नहीं,

तू ग्लानि छोड़ सखी! विमलसे पूछ लेना; वह भी तो मुझसे प्रेम करता है। मैं सबका हूँ; अबसे तू मुझे सदा अपने निकट पायेगी।’

‘बहिन! उसी घड़ीसे मुझे लगा, हृदयका खाली स्थान भर गया है। मुझे श्यामसुंदर अपने सन्निकट ही लगने लगे, उन्हें पानेकी व्याकुलता जाती रही। न मालूम यह सब कैसे हुआ ?’

‘वह तो सखी! मैं जानती हूँ।’ मैंने हँसकर कहा-

‘काकी चिंता कर रही थी कि बहुको जाने क्या हो गया है! कभी हँसती है, कभी रोती है; और कभी बड़बड़ाने लगती है।’

संध्याको सूरज आया तो देखते ही भागा और हाथ पकड़कर श्यामसुंदरको ले आया। उसे कहते सुना – ‘कन्नू! देख मेरी भाभीको क्या हो गया है ?’

‘क्या हुआ, देखूँ भला!’—उस समय मैं भी सबके साथ लगी तुम्हारे घर चली आयी थी।

श्यामसुंदरने कुछ क्षण हाथ-पाँव और मुख देखा, फिर कहा- ‘काकी इसकी औषधि बरसानेमें है। कोई है लावन हारों, कि मैं ला दूँ ?’
‘अरे लाल! साँझ हो गयी है, पर औषधि आ जाती, तो रात शांतिसे कटती।’

‘अच्छा काकी! मैं जाता हूँ!’ उन्होंने कहा-‘अरी पद्मा! तू मेरे संग चल।’

‘ मैया डाँटेगी, – मेने कहा,,

तो डाँट खा लेना चल मेरे साथ, मैया केवल तेरे ही है? मेरे बाबा मैया नहीं है क्या?— श्यामने खीज कर कहा।

‘चली जा लाली! तेरी मैयाको मैं मना लूंगी।’– काकीने कहा।

बरसाने जाकर श्यामसुंदरने मुझसे कहा- ‘विशाखाको बुला ला विशाखा जीजी आई, तो उनसे कहा-‘सखी ! श्रीकिशोरीजीका चरणामृत ला दो।’

‘क्यों, क्या करना है ?’

‘तू ला दे सखी! उपचार करना है।’ उन्होंने कहा।

“किसका ? अपना या और किसी का ?”

‘तू पद्मासे पूछ ले!’– उन्होंने कहा।

मुझसे सब बात सुनकर विशाखा जीजी चरणामृत ले आर्यों मुझसे बोली ‘पात्र तू ले जा पद्मा! ये धैर्य न रख पायेंगे और उपचार धरा रह जायेगा।’

‘अच्छा।’–कहकर हम चल पड़े। पथमें उन्होंने मुझसे कहा- ‘मुझे बड़ी प्यास लगी है पद्मा! थोड़ा पात्रमेंसे दे दे।’

‘यमुनामें जल है, पी लो।”

‘इसमें तेरा क्या जाता है भला? थोड़ा सा दे दे।’

‘यह औषध है श्यामसुंदर! तुम स्वस्थ होनेपर भी क्यों लोभ करते हो ?’

‘तेरी तो नहीं !’

‘मेरी नहीं, तो तुम्हारी भी नहीं! बरसानेतक क्यों दौड़ लगवायी ? अपना ही चरणामृत दे देते।’

वे हँस पड़े–’करेलेकी बेलको नीमपर चढ़ा देता, क्यों ?’

मैं भी हँस दी- ‘सो तो बिना चढ़ाये घर घरमें नीमपर चढ़ी बैठी है।’

‘तू तो नहीं न ?” श्याम ने पूछा

‘ना बाबा ना, ऐसा रोग कौन पाले! औरोंकी दशा देखकर ही मुझे हँसी आती है।’

‘मैया री! पाँव थक गये मेरे तो, चला नहीं जाता। थोड़ा विश्राम कर लें।’

“अंधेरा घिरने लगा है। बाबा मैया चिंता करते होंगे ?”

‘तुम क्या छोरी हो कि प्रातः सांय देखना पड़े!’

‘मेरी मैया खीज रही होगी, छोरीका जन्म ही बुरा ! संसार भरके रोग लगें, कलंक लगे और घर-बाहर सभी स्थानपर बंदिनी ?’

‘तू क्यों मर रही है! तुझे तो कोई रोग नहीं लगा ?’- श्यामसुंदरने पत्थरपर बैठते हुए कहा।

‘अपना तो दूरसे ही प्रणाम है इन रोगोंको।’

‘बड़ी भाग्यशालिनी है तू! अरे हाँ, तेरा वाग्दान हो गया और मुझे मुँह भी मीठा नहीं कराया। कैसी मूंजड़ी है री तू?”

‘क्या ?’– मैं चींख पड़ी।

‘तू नहीं जानती ? झूठी कहीं की!’

‘नहीं, मुझे तो कुछ भी ज्ञात नहीं किसी और की बात होगी।’

‘नहीं पद्मा! मैंने बाबा ओर सखाओंके मुखसे भी सुना है कि तेरा वाग्दान अभिनंदन बाबाके बेटे अर्जुनसे हो गया है।

‘ कहा कहूँ! ऐसा लगा, जैसे किसीने कलेजा ऐंठ दिया हो। मुखसे एक कराह निकली, फिर कुछ चेत न रहा।

जब चेत आया तो मेरा मस्तक श्यामसुंदरके अंकमें था, दुःख और आनन्द की जैसे बाढ़ आ-आकर मुझे लपेटती रही ।

‘यह क्या हुआ पद्मा! तू तो कहती थी मुझे कोई रोग नहीं! यह बैठे-बैठ अचेत होनेका रोग कबसे लगा तुझे ?’– उन्होंने पीठपर हाथ फेरते हुए पूछा ।

‘श्यामसुंदर!’
केवल इतना ही निकला मुँहसे।

‘क्या हुआ, रोती क्यों है ? कहीं दुःखता है ?’– उन्होंने आँसू पोंछते हुए
पूछा

क्या कहती मैं! पीड़ासे हाथ-पाँव ठंडे होकर ऐंठने लगे।

‘मुँहसे बोल पद्मा! क्या हुआ तुझे, कहाँ दुःखता है ? ऐसेमें तुझे लेकर घर कैसे जाऊँगा ?’

‘मैं तुमसे झूठ बोली मनमोहन ! व्रजमें कोई किशोरी बालिका ऐसी नहीं, जो तुम्हारे प्रेमरोगसे ग्रसित न हो; भले वह बेटी हो कि बहू! अभी तो क्षमाकी ही बात तुम्हारे सम्मुख आयी है, पर शत-शत हृदय आकुल व्याकुल तड़फ रहे हैं। तन तजैं कि मर्यादा; और तीसरा पथ नहीं उनके सम्मुख ! नित्य ही कोई व्याकुल हृदय यमुनाकी शरण लेगी। प्रातः होनेसे पूर्व ही तुम सुनोगे कि पद्मा यमुनामें डूब मरी।
बड़ी कठिनाईसे अपनेको सम्हाल कर सब कुछ कह दिया। सोचा जब मरना ही है तो फिर मनकी बात कह ही दूँ !

जो दुरन्त लज्जा सदा हमारे होठोंपर अर्गला बन चढ़ी रहती थी, मृत्युको सम्मुख पा कुछ समयके लिये भाग खड़ी हुई।
मैंने उठ कर उनके दोनों चरण हृदयसे दबा लिये। कितनी शीतलता है उन चरणोंमें; अंतरकी सारी ज्वाला शांत हो गयी। जैसे वह आनन्द शब्दोंमें नहीं समाता सखी! मेरे आँसुओंसे उन चरणोंका अभिषेक होता रहा, वे चुप बैठे रहे।

थोड़ी देर बाद बोले—’चल पद्मा! चलें; कोई ढूंढते आता होगा।

‘ मैंने धीरे से पाँव नीचे रख दिये,

भरे गलेसे बोली- ‘बस इतनी ही साध थी श्याम जू ! सो पूरी हो गयी। अब मुझे सिरपर हाथ रखकर विदा दो और आशिर्वाद भी कि अगले जन्ममें तुम्हारी दासी बननेका भाग्य पाऊँ !’

‘बिदा कैसी सखी! तू झूठ बोली, तो मैं भी झूठ बोला !’

मैने चौंक कर आश्चर्यसे उनकी ओर देखा ‘क्या हुआ, पकड़ी गई ना ?”

‘तुमने भी किसीसे प्रेम किया है कान्ह जू ?’

‘तुझे क्या लगता है ?’

‘तुम्हें क्या पड़ी है ? सब ही तो तुम्हारे पीछे लगे डोलें!

‘ वे हँस पड़े और बोले- ‘मैं तो प्रेम किये बिना रह ही नहीं सकता। जगतके लोग तो उन्हींसे प्रेम करते हैं, जो उनसे प्रेम करते हैं। पर मैं तो सबसे प्रेम करता हूँ; भले वे करें या न करें!”

‘सबसे प्रेम करते हो !”

‘ ‘हाँ, पद्मा।

‘मुझे तो लगता है तुम एक किशोरीजीसे ही प्रेम करते हो !!

‘सखी! किशोरी जू और मैं दो नहीं हैं।’

‘मुझसे करते हो ?’ – कहते-कहते मैं लज्जासे लाल हो गयी।

‘अरी बावरी !’ उन्होंने मुझे हृदयसे लगा लिया – ‘अभी तक तुझे विश्वास न हुआ ?”

‘सुनो श्यामसुंदर ! जहाँ प्रेम किया जाता है, वह कृत्रिम होता है। प्रेम तो हो जाता है। हम बहुत चेष्टा करती हैं इस फंदेसे छूटने की; किंतु यह तो कसता ही जाता है। हमें ज्ञात ही नहीं कि हम इस जालमें कब जा पड़ी!’

‘अरी चुहिया! तू तो मेरी भी गुरु निकली। अब तो फंदा कस गया है, जो होनी होय सो होय, यही न! तू यह औषधि क्षमाके तनपर छींट देना और बाकी पिला देना। कहना- बरसानेकी कुलदेवीका चरणामृत है, पुजारीजीने दिया है। मैं जा रहा ।’

‘जैसे श्यामसुंदरने कहा, मैंने वैसे ही किया। इसीसे तुम्हें चेत आया है।

क्षमा!’– मैंने उससे कहा।

‘सखियों! कैसी हूँ मैं ! तुम सबको क्षमाकी व्यथा कहते-कहते अपनी भी कह गयी।’

मेरी बात सुन सब बहिनें हँस पड़ी- ‘तुम कोई अकेली तो नहीं पद्मा ! अवश्य ही तुम हम सबसे अधिक सौभाग्यशालिनी हो कि इतना समय श्यामसुंदरके सामीप्यका मिला तुम्हें; उनसे वार्तालाप कर सकीं। अपनी ही नहीं, हम सबकी व्यथा भी उन्हें सुना सकीं।’

‘उनका उत्तर सुनकर मनको बड़ी शांति मिली बहिन!’

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-4

कौन बुझावे इन प्राननकी प्यास

‘सखियों! मुझे जल पिला दो! तृषासे कंठ सूखा जा रहा है।’

चार-पाँच सखियाँ घाटपर जल भरने आयी थीं, घड़े धोकर रख दिये और सब मिलकर बातें करने लगीं। बातें भी क्या ! व्रजमें कृष्ण चर्चाक अतिरिक्त और चर्चा ही क्या होगी ? तभी श्यामसुन्दरने आकर जल पिलानेका अनुरोध किया। सुनकर देखकर सबके प्राण हरे हो गये।

‘यमुनामें अथाह जल है कान्ह जू! पीलो न।’- एक सखी बोली।

‘जल तो है सखी! किंतु मेरे पास पात्र जो नहीं! हाथसे लेकर जल पीऊँगा तो सारा जल झूठा हो जायेगा, इसीसे तुम्हारा निहोरा करता हूँ। अपने घड़ेसे जल पिला दोगी तो यश मानूँगा।’

‘यशसे क्या बननेवाला है श्यामसुंदर ! कामके बदले काम कर दो, तो कोई बात बने !’

‘अच्छा सखी! बता कौन-सा कार्य कर दूँ तुम्हारा ? मेरा मुख प्याससे सूख रहा है।’

‘तुम हमारे घड़े उठवा दो और जब तक हम घर न जाय, तब तक तुम यहीं हमारे पास रहो।’ ‘यह क्या कहती हो! मैं तुम्हारे समीप बैठा रहूँगा तो मेरी गायें कौन फेरेगा? वे इधर-उधर भाग गयीं तो साँझको मैया मारेगी मुझे।’

‘तो फिर तुम जल अपने आप पी लो हम जाकर तुम्हारी मैयासे कह देंगी कि कन्हैयाने जमना झूठी कर दी है। अब वह जल नारायणकी सेवा पूजाके योग्य नहीं रहा।’

‘अच्छी बात है सखियों! जो तुम कहोगी वही करूँगा; लाओ जल
पिलाओ।’

‘नंदा! तेरा घड़ा छोटा है, इससे अच्छी धार बँधेगी।’- सुमतिने नंदासे घड़ा लेकर श्यामकी अंजलीमें जल ढालना आरम्भ किया और अन्य सखियाँ अपनी छूटी हुई चर्चाका सुत्र पुनः थामने लगीं।

‘क्या कह रही थी वसुधा! तू?’ – इन्दूलेखा जीजीने पूछा।

‘कल मेरे बाबाके पास कोई साधु-महात्मा आये थे। वे बाबासे कहने लगे- यहाँ नंदग्राममें परात्पर-ब्रह्मने अवतार लिया है, मैं दर्शनके लिये आया हूँ। वे किसके घरमें अवतीर्ण हुए हैं, कृपा करके मुझे दर्शन करा दो।’ वसुधाकी बात सुन सखियाँ मुस्कराने लगीं।

‘अच्छा! फिर तेरे बाबाने क्या उत्तर दिया ?’

बाबा बेचारे समझे ही नहीं बोले- ‘क्या कहते हैं महाराज; कैसा परात्पर ब्रह्म ! हम तो नहीं जानते वह कौन है कैसा है ? “

साधु घिघियाके बोले – ‘अरे भैया ! भगवान् नारायणने अवतार लिया है। मुझे भुलाओ मत, दर्शन करा दो।’

बाबा तो बेचारे अचकचाकर अपने चारों ओर देखने लगे और हाथ जोड़ कर बोले- ‘नहीं महाराज! हमको नहीं मालूम। यदि नारायणदेव पधारे होते,

तो हम सब उनकी पूजा करनेको दौड़ पड़ते!” ‘साक्षात नहीं भैया ! बालक रूप धारण किया है उन्होंने।’- साधु बोले ।

अब बालक तो महाराज! व्रजकी गली-गलीमें दौड़ते फिरें, न जाने कौनसे नारायणदेव हैं। उनका कुछ अता-पता और चिन्ह बतायें तो कहूँ।’

‘सुन भैया! नीलकमल-सा साँवला रंग है, कमलसे कोमल और विशाल नेत्र हैं, घुंघराले केश हैं, छातीमें श्रीवत्सको चिन्ह है, बड़ी मनमोहिनी छवि है देखनेसे तृप्ति न हो ऐसा मनमोहन रूप होगा।’

‘ऐसा तो हमारा कन्हैया है महाराज!’ बाबा बोले- ‘पर वह तो महाऊधमी है; नंदरायके बुढ़ापेका पूत है। पर मनुष्यकी कौन कहे, पशु-पक्षी भी उसे घेरे रहते हैं।’

‘बस बस भैया! मैं उनके ही दर्शन चाहता हूँ! कहाँ होंगे इस समय वे आनंद घन?’

‘जमुना किनारे चले जाओ महाराज; वहीं कहीं गायें चराता होगा!’

‘अच्छा वसुधा! क्या नाम बताया साधु बाबाने ?’

‘परात्पर ब्रह्म।’

‘यह क्या होता है सखी? – एकने पूछा। ‘इनसे ही पूछ लो न!’- सुमतिने जल पिलाते हुए कहा। एकाएक श्यामसुंदरको हँसी आ गयी, मुखमें भरा सारा जल फुहारके

रूपमें घड़ेके भीतर और समीप खड़ी सखियोंपर पड़ा। नंदा खीजकर बोली- ‘यह क्या किया तुमने ? मैयाने नारायणकी पूजाके लिये जल मँगाया था, तुमने घड़ा जूठाकर दिया। मैया मारेगी मुझे!’

कन्हाई खड़े हो गये—’मैं क्या करूँ सखी! तुम्हारे परात्पर पुरुषकी व्याख्या पची नहीं, सो उछलकर बाहर आ गयी।’ सब खिलखिलाकर हँस पड़ीं। ‘लो सखियों! तुम्हारे घड़े उठवा दूँ। मेरी गैया भाग गयी होंगी तो सब सखा पंचायती मार लगायेंगे और नंदा घड़ा झूठा करनेके अपराध में

साँझको मैयासे पिटवायेगी, सो अलग। मुँह क्या देख रही है मेरा ! घर जाकर दूसरा घड़ा भरकर ले जा! नारायण बेचारे झूठे घड़ेके पानीसे नहाकर खिसिया जायेंगे।’ ‘श्याम ! तुमने तो हम सबको जूठा कर दिया । देखो न, तुम्हारे छोटेसे मुखसे कितना सारा पानी निकला कि हम सबकी सब भीग गयीं।’

किंतु उनकी बात सुननेसे पूर्व ही श्यामसुंदर वंशीवटकी ओर भाग छूटे पटकेके छोर और घुँघराली अलकें वायुके वेगसे लहरा रही हैं। बंसी फेंटमें खोस ली है और दाहिने हाथमें लकुट लिये दौड़े जा रहे हैं। सखियां खड़ी अपलक निहार रही हैं।

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-3


गोरस बेचन हौं गयी

‘सखियों! कल चलोगी गोरस बेचने ?’– ललिता जीजीने पूछा।

हम सब जल भरने आयी थी। उधरसे बरसानेकी सखियाँ भी आ गयीं, श्रीकिशोरी जू साथ थी। परस्पर मिलना अभिवादन हुआ और सब घड़े माजने-धोनेमें लग गयीं।

‘गोरस बेचने ?’– नंदीश्वरपुरकी बालायें चौंककर देखने लगी उनकी ओर ‘हाँ गोरस, आश्चर्य क्यों हो रहा है?’ श्यामा जू बोली- ‘हम सब जा रही हैं कल दोपहर को ।’

‘किंतु गोरस लेगा कौन? और हम विनिमयमें क्या लेंगी ? फिर मैया बाबा जाने देंगे ?’– मैंने पूछा !

‘अन्य बातें रहने दो, बाबा मैयाको मना लेना। कैसे ? सो तुम अपनी

बुद्धिका प्रयोग उपयोग करना।’- विशाखा जीजीने कहा।

‘क्यों री ऐसी छोटी दहेड़ीका क्या करेगी ?’ मैयाने रात दही जमाते समय पूछा, जब मैं एक छोटी मटुकियामें दूध जमाने लगी। ‘मैया मैं कल दही बेचने जाऊँगी।’

‘क्या कहा री! कहाँ जायेगी?’ मैयाने चौंक कर पूछा।

‘दही बेचने बरसाने और नंदगाँवकी सभी बहिनें जा रही हैं। और-तो और श्रीवृषभानुनंदिनी भी जा रही हैं।’

‘किसने कहा तुझसे ?’

‘सभी सखियाँ कह रही थी। श्रीकिशोरीजी भी वहीं थीं।’

‘कुछ समझमें नहीं आती इन बड़े लोगों की बातें! नंदमहरके युवराज गायें चरायें और वृषभानुपरके राजाकी बेटी गोरस बेचे। क्या कमी पड़ गयी जाने कीर्तिदा जू को ! सुमन सुकुमार लली कहाँ भटकेगी ?’ – मैया अपनी
धुनमें बड़बड़ करती रही। इससे मेरा पिंड छूटा।

नंदगाँवसे सब सखियाँ बरसाने गयीं और वहाँसे सब मिलकर वनकी ओर चलीं। दोनों ओर श्वेत-श्याम पर्वत और बीचमें सांकरी खोर। सखियाँ हँसती बोलती जा रही थी। दोनों ओर के वृक्षोंपर कपि लदे थे। एकाएक आगेवाली सखियाँ ठिठक कर रुक गयीं। सबने नेत्र उठाकर देखा दोनों पैर फैलाये, कटिपर कर टिकाये खौरके मुहानेपर श्यामसुंदर खड़े हैं।

सखियोंने मुस्करा कर एक दूसरेकी ओर देखा चंद्रावली जीजी आगे बढ़ आयी- ‘पथ काहेको रोके खड़े हो ? हमें निकलने दो।’ ‘कहाँ जा रही हो?’– श्यामसुंदर बोले ।

‘गोरस बेचने।’

‘किधर …. कहाँ ?’

‘तुम्हें इससे क्या? हमें जाने दो।’

‘मेरा कर दे के चली जाओ, जहाँ जाना हो।’

‘कैसा कर ? “

‘मेरी भूमिमें होकर निकलनेका कर।’ ‘अहाहा! ऐसा अनोखा कर न कभी देखा, न सुना। भूमि तुम्हारी है।

कि राजा की ?”

‘इस भूमिका तो मैं ही राजा हूँ।’ ‘आरसीमें मुँह देखा है कभी? बड़े राजा बने हैं।’- चंद्रावली जीजीकी

बात सुन कर सखियाँ हँस पड़ी; पर श्यामका उत्तर सुन सकपका कर चुप

हो गयी।

उन्होंने कहा—’सो तो सखी! अब भी देख रहा हूँ, तेरा मुख क्या किसी आरसीसे कम है?’,,,,

‘पथ छोड़ो।’ चंद्रावली जीजीने स्वर और नेत्र कड़े किये – ‘बहुत बातें
बनानी आ गयी हैं।’

‘बातें बनाना मुझको भी अच्छा नहीं लगता सखी! तुम मेरा कर दो और

अपना पथ पकड़ो।’

‘हम नहीं देंगी।’

“मैं तो लूँगा। राजीसे नहीं दोगी तो बरजोरीसे लूँगा।’

‘बरजोरी ?’

‘हाँ सखी! बरजोरी।’

‘लाज नहीं आती कहते! छोरियोंसे बरजोरी करते ?”

‘जब तुमने लाज उतारके खूँटीपर टाँग दी तो मैं कितनी देर उसे थामे रहूँगा ? हाँ सखी, मुझसे – एक छोरासे लपालप जीभ चलाते तुम्हें लाज नहीं लगती और मुझे लाजकी शिक्षा देती हो! लज्जा नारीका भूषण है कि पुरुषका ?’ ‘अब हटो भी! हम राजा कंससे जाकर कह देंगी।’

‘कंस क्या तेरा सगा लगता है चंद्रा ! ऐसी कृपण हो तुम कि चुल्लू भर गौरसके कारण कंस तक दौड़ी जाओगी? जा! इसी घड़ी जाकर कह दे।’

श्यामने झपट कर दहेड़ी छीन ली, फिर तो वनकी झाड़ियोंसे चीटियोंकी भांति उनके सब सखा ‘हा-हा’ ‘हू-ह’ करते निकले। श्याम दहेड़ियाँ छीन छीनकर उन्हें थमाते जाते कितने हार टूटे, चुनरियाँ फटीं, कोई गिनती नहीं! हम सबने मिलकर श्रीकिशोरी जू को घेर लिया।

‘अरे कन्नू! तेरी मटुकिया तो रही गयी रे।’ मधुमंगलने कहा, तो कान्ह फिर दौड़ पड़े।

‘देखो कृष्ण ! इस दहेड़ीको हाथ लगाया तो अच्छा न होगा।’ ‘क्या करेगी री तू?’ कह कर श्यामने किसीको धक्का दिया, किसीको

झटका और उछलकर दहेड़ी पकड़ ली। श्रीराधा जू ने तो जैसे स्वयं ही सौंप दी। अँगूठा दिखाते हुए श्यामसुंदर पर्वतपर चढ़ गये। फिर तो उस महाभोजको देखने में हम ऐसी लीन हुई कि अपने टूटे हारों और फटे गीले वस्त्रोंकी भी सुध भूल गयीं ।

सांकरी खोरमें गोरसकी कीच मच गयी। दहेड़ियोंके टूटे टुकड़ोंमें कपि और पक्षी भोग लगाने लगे। श्यामसुंदर सखाओंके साथ हमें अँगूठा दिखाते, मुँह चिढ़ाते, एक दूसरे पर फेंकते हुए खाते और खिलाते रहे।

“अरी अब क्यों खड़ी हो यहाँ ? साँझ हो जायेगी लौटते-लौटते।’—
भद्रने कहा।

‘अरी ये क्या हुआ री ?’ मैयाने मेरी फटी चुनरी देखकर पूछा।

‘क्या कहूँ मैया! हम सब जा रहीं थी, कि वनमें से एक बड़ा मोटा-सा भल्लूक निकल आया। उसको देखकर हम सब भागीं, तो दहेड़ियाँ फूट गयीं और गिरने पड़नेसे वस्त्र भी फट गये। हमारा चिल्लाना सुनकर श्यामसुंदर दौड़े आये। उसको भगाकर, हम सबको आश्वस्त करके पथ बताया, तब जाकर हम लौट पायीं।’

सुनकर मैयाने आसीसोंकी झड़ी लगा दी ।

जय जय श्री राधे

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श्याम सखियाँ-2

श्याम सखियाँ-2

( ब्रह्म बिकानो प्रेमकी हाट )



‘ऐ इला! सुन तो।’— धीमे स्वरमें श्यामसुंदरने कहा।

उनकी बात सुन मैं समीप गयी, तो उन्होंने एकान्तमें चलने का संकेत किया। वहाँ चलकर कुछ क्षण सोचते रहे, फिर बोले- ‘मेरा एक काम है, करेगी ?’ मैंने उत्सुकतासे उनकी ओर देखा।

‘अरी मुखमें जिह्वा है उसका क्या अचार डालेगी?’– उन्होंने खोजकर कहा मैं हँस पड़ी- ‘तुम खाओगे वह अचार?”

‘मार खायेगी बंदरिया कहीं की!’वे खीजकर मुझे मुठ्ठी बांध मारने बढ़े, किंतु मैं शांत खड़ी रही तो उन्होंने भी हाथ नीचे कर लिया और समीप आकर बोले–‘करेगी ?’ व्यग्रता छिपानेके लिये वे मेरी चुनरीका छोर अपनी ऊंगलीमें लपेटने और खोलने लगे।

‘करेगी! करेगी! क्या करेगी; दण्ड-बैठक कि मल्लयुद्ध ?’ अब मेरे खीजनेकी बारी थी—‘न कुछ कहना, न सुनना! बस ‘करेगी’। मेरे मुखमें जिह्वा न सही, तुम्हारे तो है! फिर बोल क्यों नहीं फूट रहा ? घरमें सारा काम

काज यों ही पड़ा है। मैया मारेगी, मैं चलूँ!’ मैंने चलनेका उपक्रम किया। ‘मैं तेरे हाथ जोड़ सखी! नेक रुक जा। सचमुच श्यामने सम्मुख आकर हाथ जोड़ दिये।

मैं अवाक् रह गयी- ‘क्या काम है, कहो ?’

‘इला!’ उन्होंने बरसनेको आतुर नयन उठाकर मेरी ओर देखा- ‘आज प्रातः से अबतक ‘ श्रीजी’ के दर्शन नहीं हुए।’

कुछ रुक-रुक कर उन्होंने पूछा- ‘तू बरसाने जायेगी ?” ‘हो आऊँगी, तुम संदेश कहो।।

‘मेरी ओरसे करबद्ध विनती करना मेरे सभी अपराध क्षमा करके श्रीकिशोरीजी इस अकिंचनको दर्शन दें।’

अपने सौभाग्यपर मैं फूली न समायी, किंतु ऊपरसे पूछा- ‘सुनो

श्यामसुंदर! मुझे घरमें बहुत कार्य करना पड़ा है, मैया खीज रही होगी। इसपर भी मैं तुम्हारा कार्य करूँगी, किंतु तुम मुझे क्या दोगे?’

‘मैं तुझको क्या दूँगा?’ श्यामने विवशतासे इधर-उधर देखा— ‘क्या दूँ सखी! तुझे देने योग्य तो मेरे पास कुछ भी नहीं है।’

‘यह क्या कहते हो ? व्रजमें आनेवाले सारे ऋषि-मुनी ‘त्रिभुवन पति, परात्पर पुरुष, लक्ष्मीपति’ जाने क्या-क्या कहकर तुम्हारी चर्चा

करते हैं, सो ?”

‘सो तो कहे सखी; पर वह सब तू लेगी ?” ‘ना बाबा! मैं क्या करूँगी उसका ?”

‘फिर ?”

‘बिना कुछ लिये तो मैं काम करूँगी नहीं; यह निश्चय समझना!’ ‘अच्छा सखी! ऐसा कर, मेरे पास जो है उसमें तुझे रुचे सो माँग ले।’

‘तुम्हारे पास क्या है भला?’ मैंने तुनक कर कहा-‘एक कछनी, एक पिछौरी और लकुट-मुरली मैं क्या करूँगी इनका ?’

‘मैं तेरे पाँव पड़ इला!’ सचमुच श्यामने आगे बढ़कर मेरे पाँव छू लिये। ‘कन्हाई तेरो ऋणी रहेगा। कहते-कहते उनका गला भर आया और मेरा

हृदय उछल कर बाहर आ गिरने को हुआ।

किसी प्रकार अपनेको सम्हाल कर कहा- ‘मैं जा रही हूँ।’ ‘मैं सूर्यकुण्डपर जा रहा हूँ।’ उन्होंने पटकेसे नेत्र पोंछे और चल दिये। घर जाकर मैंने ‘पवित्रा’ की बछियाको खोलते हुए उसके कानमें कहा—’बरसानेकी ओर भाग जाना।

‘अरी इला! यह बछिया कैसे छूट गयी ?’ – मैया चिल्लाई। ‘मैंने दूसरी ठौर बाँधनेको खोली, तो भाग गयी; मैं अभी पकड़ लाती 1’ कहते हुए मैं बछियाके पीछे दौड़ी।

बरसानेके घाटपर विशाखा जीजी घड़े धो रही थी। समीप जाकर पूछा ‘ स्वामिनी जू कहाँ है जीजी ?’

‘क्या बात है, आ रही हैं।’

‘संदेश लाई हूँ!’ मैंने धीरेसे कहा; फिर जोरसे बोली- ‘बछिया दौड़ा-दौड़ा कर थका मारा जीजी! दयीमारी अब कैसी शांत खड़ी है तुम्हारे समीप।’

स्वामिनी जू सखियोसे घिरी पधारीं; मैंने समीप जा चरणोंपर सिर रखा। उन्होंने दोनों हाथसे उठाकर हृदयसे लगा लिया। उस महाभाव वपुका स्पर्श पा मेरी चेतना लुप्त हो गयी ललिता जीजीने चरणामृत के छींटे चेत कराया।

मैं बछियाके गलेमें रज्जू बाँधती हुई सूर्यकुण्डकी ओर संकेत करके बोली- ‘सखिय! सूर्यकुण्डपर श्याम मेघ घुमड़ रहे हैं, शीघ्र चलो; अन्यथा वर्षा होने लगेगी।’

अहा! स्वामिनी जू ने समीप आ अपनी मुक्तामाल मेरे कण्ठमें पहनाकर कपोलोंपर चुम्बन अंकित कर दिया। मैंने देखा मुक्ताके प्रत्येक दानेमें श्यामसुन्दरकी छवि अंकित है। सचमुच श्याम क्या देते मुझको ?

जय जय श्री राधेश्याम

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श्याम सखियाँ-1

श्याम सखियाँ-1

( उरहनो देन मिस गयी श्याम दरसको )



‘श्याम सलिले यमुने! यह श्याम रंग तुमने कहाँसे पाया ? कदाचित श्यामसुन्दरका चिंतन करते-करते तुम भी श्यामा हो गयी हो। ये लोल लहरिया तुम्हारे हृदयके उल्लासको प्रकट करती है; अवश्य ही नटनागर यही कहीं समीप ही हैं, कि तुम हर्ष-विह्वल हो उठी हो! कहाँ है; भला बताओगी मुझे ?”

‘क्या कहूँ बहिन! घरमें जी लगता ही नहीं; साँस जैसे घुट रही थी। जैसे-तैसे काम निपटा कर पानी भरनेके मिस चली आयी हूँ। सुबहसे श्यामके दर्शन नहीं हुए। समझाती हूँ मन को कि अभागे! तूने ऐसे कौनसे पुण्य कमाये हैं कि नित्य दर्शन पा ही ले! पर समझता कहाँ है दयीमारा! यदि दर्शन हो भी जाय तो कहेगा ‘एक बार और’ ‘एक बार और’। आह! इसकी यह एक बार कभी पूरी न होगी; और न यह मुझे चैन लेने देगा हतभागा। सौभाग्यशालिनी तो तुम हो श्रीयमुने! कि श्यामसुंदर तुम्हारे बिना रह ही नहीं सकते। यहाँ-वहाँ, कहीं-न-कहीं तुम्हारे समीप ही क्रीड़ा करते रहते हैं।’

‘बहुत विलम्ब हो गया, मैया डाँटेगी; पर तुम्ही बताओ श्रीयमुने! घड़ा तो भरा रखा है, इसे उठवाये कौन ? श्यामसुंदर होते तो उठवा देते, उठवा देते या फिर फोड़ ही देते; अरे कुछ तो करते! यह अभागा तो ज्यों-का-त्यों भरा रखा है। यहीं-कहीं तुम्हारे तटपर होंगे! कहो न उनसे कि मैं जल भर आयी हूँ, जरा घड़ा उठवा दें। इतनी कृपा कर दो न देवी तपनतनये! परोपकारके लिये ही तो तुमने यह पयमय वपु धारण किया है, मुझे भी कृपा कर अनुगृहीत करो।’

हाँ, सखियो! मेरी मैया मुझे साथ लेकर उलाहना देने नंदभवन गयी। थी। जाते ही उसने पुकारा-‘नन्दरानी! अपने पूतकी करतूत देखो और देखो मेरी लालीको हाल।’

‘कहा भयो बहिन!’ कहती नन्दरानी बाहर आयीं- ‘कहा है गयो ?” तुनक कर मैया बोली—‘लाली जल भरने गयी थी। कन्हाईसे घड़ा उठवानेको कहा, तो घड़े-का-घड़ा फोड़ दिया; मुक्तामाल तोड़कर इसकी चुनरी भी फाड़ दी सो अलग! क्या कहें नन्दरानी! लगता है गोकुल छोड़कर कहीं अन्यत्र जाकर बसना पड़ेगा। तुम्हारे तो बुढ़ापेका पूत है, सो लाड़ दुलारकी सीमा नहीं; माथे लेयके कंधेपर बिठायें, पर इस नित्यके उधमसे हम तो अघा गयी है बाबा!’

‘नेक रुको बहिन!’ व्रजरानी हाथ जोड़कर बोली- ‘कन्हाई तो तुम्ही सबका है। तुम सबके आशिर्वादसे ही इसका जन्म हुआ है। अपना समझकर तुम जो कहो, सो दंड देऊँ। बाहर खेलने गया है, तुम लालीको यहीं छोड़ जाओ, वह आयेगा तो इसके सामने ही उससे पूछूंगी।’

‘तुम तो भोली हो नंदगेहिनी! तुम्हारा लाला भी कभी अपराध सिर आने देता है भला! तुम डाल-डाल, तो वह पात-पात फिरेगा।’ मैया बोली। ‘लालीको यहीं छोड़ जाओ, नीलमणि आता ही होगा। नंदरानीने कहा। मेरी मैया मुझे वहीं बिठाकर चली गयी।

ब्रजेश्वरीने मुझे नवीन वस्त्र धारण कराये, पकवान खिलाये और गोद में बिठाकर दुलारती हुई बोली- ‘क्या करूँ बेटी! नीलमणि बड़ा चंचल है; तुझे कहीं चोट तो नहीं लगी? आयेगा तो आज अवश्य मारूँगी उसे!’

मैंने भयभीत होकर सिर हिला दिया कि कहीं चोट नहीं आयी। मनमें आया कहीं सचमुच मैया मार न बैठे अथवा पुनः बांध न दें! अपनी मैयाकी ना समझी पर खीज आयी; क्यों दौड़ी आयी यहाँ!

तभी बाहर बालकों का कोलाहल सुनायी दिया मैं सिकुड़ सिमट कर बैठ गयी।

‘कन्हाई-रे-कन्हाई!’– मैयाने पुकारा। ‘हाँ मैया!’- श्यामसुंदर दौड़ते हुए आये। ‘क्या है मैया! यह कौन बैठी है, किसकी दुलहिन है ?’– उन्होंने एक साथ अनेकों प्रश्न पूछ डाले।

मैं तो लाजमें डूबने लगी। मैयाने उसका हाथ पकड़कर कहा- ‘आज तूने इसका घड़ा क्यों फोड़ दिया रे! मुक्तामाल तोड़करके चुनरी भी फाड़ दी और अब पूछता हैं कि यह कौन है? दारीके! तेरे उधम और गोपियोंके उलहनोंके मारे अघा गयी मैं तो!” ‘नहीं तो मैया! मैं तो जानता तक नहीं कि यह कौन है! तू यह क्या कह रही हैं, मैंने तो इसे कभी देखा ही नहीं!’- श्यामसुंदर चकित स्वरमें बोले ।

कभी नहीं देखा ?’– कहते हुए मैयाने अपने हाथसे मेरा मुख ऊपर उठा दिया। ‘अरी मैया! यह तो इला है। ताली बजाते हुए वे मैयाके गलेसे
लटक गये।

‘तू इसका नाम बदल दे।’

‘क्यों रे?’– मैयाने चकित होकर पूछा।

‘इला का क्या अर्थ है मैया ? वह पिलपिली सी इल्ली न? ना मैया, तू

इसका नाम बदल दे।’

‘अरे मेरे भोले महादेव! इला का अर्थ इल्ली नहीं, पृथ्वी होता

है; पृथ्वी।’

‘ऐं! पृथ्वी होता है मैया ?’ कहकर श्यामसुंदर बड़े भोले आश्चर्य से

कभी मुझे और कभी पृथ्वीको देखने लगे। मुझे हँसी आ गयी, तो मैयाको भी बात याद आयी; पुनः पूछा- ‘तूने

इसका घड़ा क्यों फोड़ा ?”

श्यामसुंदर हँस पड़े – ‘मैया, तू क्या जाने यह तो बावरी है बावरी ! घाटपर बैठी बैठी अकेली जमुनाजीसे बातें कर रही थी। मैं उधर गया पानी पीने को, तो देखा-सुना समीप जाकर पूछा तो बावरीकी तरह देखे जाय। मैंने हाथ पकड़कर उठाया और घड़ा उठाकर इसके माथेपर रख दिया। तो देख मैया! इसने ऐसे कमर और देह फरफरायी कि घड़ा बेचारा क्या करता, पट्से गिरा और फूट गया।’

सखियों! श्यामसुंदरने कमर और देह इस तरह हिलाई कि मैया और मैंने ही नहीं प्राङ्गणमें खड़ी सभी गोपियों और दासियोंने भी मुख पल्लूसे ढक लिये। किंतु श्यामसुंदर गम्भीर बने रहे- ‘सुन मैया! मैंने इससे कहा- क्यों री, यह क्या किया तूने! घड़ा फोड़ दिया, अब मेरे माथे आयेगी क्या बातें कर रही थी तू यहाँ बैठी बैठी? मेरी बात सुनकर मैया! इसने ऐसी दौड़ लगाई की
भिड़ गयी; मैं गिरते-गिरते बचा, पर मेरी वनमाला तो टूटकर इसके साथ ही चली गयी थोड़ी दूर जाकर सम्भवतः ठोकर खाकर गिर पड़ी होगी। वहीं इसकी माला टूटी होगी और चुनरी भी फट गयी होगी।’

‘मैया! मैं तुझसे सच कहता हूँ, तू इसकी मैयासे कहकर इसका ब्याह करा दे जल्दीसे। यदि किसीको मालूम हो जायगा कि यह पगली है, तो इसका विवाह न हो पायेगा।’

सखियों! मेरे लिये वहाँ बैठे रहना कठिन हो गया, हँसीसे पेट फटा जा रहा था। मैं उठते ही घरकी ओर दौड़ पड़ी, तुमने देखी उनकी चतुराई।