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श्री प्रेम निधि जी

एक भक्त थे .प्रेम निधि उन का नाम था..सब में भगवान है ऐसा समझ कर प्रीति पूर्वक भगवान को भोग लगाए..और वो प्रसाद सभी को बाँटा करते
यमुनाजी से जल लाकर..भगवान को स्नान कराते….
यमुना जी के जल से भगवान को जल पान कराता थे..
एक सुबह सुबह बहुत जल्दी उठे प्रेम निधि…मन मैं आया कि सुबह सुबह जल पर किसी पापी की, नीगुरे आदमी की नज़र पड़ने से पहेले मैं भगवान के लिए जल भर ले आऊँ ऐसा सोचा…
अंधेरे अंधेरे में ही चले गये..लेकिन रास्ता दिखता नही था..इतने में एक लड़का मशाल लेकर आ गया..और आगे चलने लगा..प्रेम निधि ने सोचा की ये लङका भी उधर ही चल रहा है ? ये लड़का जाता है उधर ही यमुना जी है..तो इस के पिछे पिछे मशाल का फ़ायदा उठाओ..नही तो कही चला जाएगा…फिर लौटते समय देखा जाएगा..
लेकिन ऐसा नही हुआ..मशाल लेकर लड़का यमुना तक ले आया..प्रेम निधि ने यमुना जी से जल भरा..ज़्यु ही चलने लगे तो एकाएक वह लड़का फिर आ गया.. आगे आगे चलने लगा..अपनी कुटिया तक पहुँचा..तो सोचा की उस को पुछे की बेटा तू कहाँ से आया..
तो इतने में देखा की लड़का तो अंतर्धान हो गया! प्रेम निधि भगवान के प्रति प्रेम करते तो भगवान भी आवश्यकता पङनें पर उन के लिए कभी किसी रूप में कभी किसी रूप में उन का मार्ग दर्शन करने आ जाते…
लेकिन उस समय यवनों का राज्य था..हिंदू साधुओं को नीचे दिखाना और अपने मज़हब का प्रचार करना ऐसी मानसिकता वाले लोग बादशाह के पास जा कर उन्हों ने राजा को भड़काया…की प्रेम निधि के पास औरते भी बहोत आती है…बच्चे, लड़कियां , माइयां सब आते है..इस का चाल चलन ठीक नही है..
प्रेम निधि का प्रभाव बढ़ता हुआ देख कर मुल्ला मौलवियों ने , राजा के पिठ्ठुओ ने राजा को भड़काया.. राजा उन की बातों में आ कर आदेश दिया की प्रेम निधि को हाजिर करो..
उस समय प्रेम निधि भगवान को जल पिलाने के भाव
से कुछ पात्र भर रहे थे…
सिपाहियों ने कहा , ‘चलो बादशाह सलामत बुला रहे ..चलो ..जल्दी करो…’ प्रेम निधि ने कहा मुझे भगवान को जल पिला लेने दो परंतु सिपाही उन्हें जबरदस्ती पकड़ ले चले
तो भगवान को जल पिलाए बिना ही वो निकल गये..अब उन के मन में निरंतर यही खटका था की भगवान को भोग तो लगाया लेकिन जल तो नही पिलाया..ऐसा उन के मन में खटका था…
राजा के पास तो ले आए..राजा ने पुछा, ‘तुम क्यो सभी को आने देते हो?’
प्रेम निधि बोले, ‘सभी के रूप में मेरा परमात्मा है..किसी भी रूप में माई हो, भाई हो, बच्चे हो..जो भी सत्संग में आता है तो उन का पाप नाश हो जाता है..बुध्दी शुध्द होती है, मन पवित्र होता है..सब का भला होता है इसलिए मैं सब को आने देता हूँ सत्संग में..मैं कोई संन्यासी नही हूँ की स्रीयों को नही आने दूं…मेरा तो गृहस्थी जीवन है..भले ही मैं गृहस्थ हो भगवान के आश्रय में रहता हूं परंतु फिर भी गृहस्थ परंपरा में ही तो मैं जी रहा हूँ..’
बादशाह ने कहा की, ‘तुम्हारी बात तो सच्ची लगती है..लेकिन तुम काफिर हो..जब तक तुण सही हो तुम्हारायह परिचय नही मिलेगा तब तक तुम को जेल की कोठरी में बंद करने की इजाज़त देते है..’बंद कर दो इस को’
भक्त माल में कथा आगे कहेती है की प्रेम निधि तो जेल में बंद हो गये..लेकिन मन से जो आदमी गिरा है वो ही जेल में दुखी होता है..अंदर से जिस की समझ मरी है वो ज़रा ज़रा बात में दुखी होता है..जिस की समझ सही है वो दुख को तुरंत उखाड़ के फेंकने वाली बुध्दी जगा देता है..क्या हुआ? जो हुआ ठीक है..बीत
जाएगा..देखा जाएगा..ऐसा सोच कर वो दुख में दुखी नही होता…
प्रेम निधि को भगवान को जल पान कराना था..अब जेल में तो आ गया शरीर..लेकिन ठाकुर जी को जल पान कैसे कराए यहां जेल में बंद होने की चिंता बिल्कुल नहीं थी यहां तो भगवान को जल नहीं पिलाया यही दुख मन में था यही बेचैनी तड़पा रही थी?..
रात हुई… राजा को मोहमद पैगंबर साब स्वप्ने में दिखाई दिए.. बोले, ‘ बादशाह! अल्लाह को प्यास लगी है..’
‘मालिक हुकुम करो..अल्लाह कैसे पानी पियेंगे ?’
राजा ने पुछा. बोले, ‘जिस के हाथ से पानी पिए उस को तो तुम ने जेल में डाल रखा है..’
बादशाह सलामत की धड़कने बढ़ गयी…देखता है की अल्लाह ताला और मोहमाद साब बड़े नाराज़ दिखाई दे रहे…मैने जिस को जेल में बंद किया वो तो प्रेम निधि है. बस एकदम आंख खुल गई.जल्दी जल्दी प्रेम निधि को रिहा करवाया…
प्रेम निधि नहाए धोए..अब भगवान को जल पान कराते है.. राजा प्रेम निधि को देखता है…देखा की अल्लाह, मोहमद साब और प्रेम निधि के गुरु एक ही जगह पर विराज मान है!
फिर राजा को तो सत्संग का चसका लगा..ईश्वर, गुरु और मंत्र दिखते तीन है लेकिन यह तीनों एक ही सत्ता हैं..बादशाह सलामत हिंदुओं के प्रति जो नफ़रत की नज़रियाँ रखता था उस की नज़रिया बदल गयी…
प्रेम निधि महाराज का वो भक्त हो गया..सब की सूरत में परब्रम्ह परमात्मा है ..राजा साब प्रेम निधि महाराज को कुछ देते..ये ले लो..वो ले लो …तो बोले, हमें तो भगवान की रस मयी, आनंद मयी, ज्ञान मयी भक्ति चाहिए..और कुछ नही…
जो लोग संतों की निंदा करते वो उस भक्ति के रस को नही जानते..
“संत की निंदा ते बुरी सुनो जन कोई l
की इस में सब जन्म के सुकृत ही खोई ll”
जो भी सत्कर्म किया है अथवा सत्संग सुना है वो सारे पुण्य संत की निंदा करने से नष्ट होने लगते है..
संतो की जय भक्तों की जय…..
करुणानिधान प्रभु की जय…

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अपने पुत्र को विष देने वाली दो भक्तिमती नारियाँ

१. पहली कथा : एक राजा बड़ा भक्त था । उसके यहाँ बहुत से साधु-सन्त आते रहते थे । राजा उनकी प्रेम से सेवा करता था । एक बार एक महान संत अपने साथियों समेत पधारे । राजा का सत्संग के कारण संतो से बडा प्रेम हो गया । वे सन्त राजा के यहाँ से नित्य ही चलने के लिये तैयार होते, परंतु राजा एक-न-एक बात ( उत्सव आदि) कहकर प्रार्थना करके उन्हे रोक लेता और कहता क्रि प्रभो ! आज रुक जाइये, कल चले जाइयेगा । इस प्रकार उनको एक वर्ष और कुछ मास बीत गये । एक दिन उन सन्तो ने निश्चय कर लिया कि अब यहां रुके हुए बहुत समय बीत गया ,कल हम अवश्य ही चले जायेंगे । राजाके रोकनेपर किसी भी प्रकर से नही रुकेंगे । यह जानकर राजा की आशा टूट गयी, वह इस प्रकार व्याकुल हुआ कि उसका शरीर छूटने लगा । रानी ने राजा से पूछकर सब जान लिया कि राजा सन्त वियोग से जीवित न रहेगा । तब उसने संतो को रोकने के लिये एक विचित्र उपाय किया । रानी ने अपने ही पुत्र को विष दे दिया; क्योकि सन्त तो स्वतन्त्र है, इन्हे कैसे रोककर रखा जाय ?

इसका और कोई उपाय नही है ,यही एक उपाय है । प्रात: काल होने से पहले ही रानी रो उठी, अन्य दासियाँ भी रोने लगी, राजपुत्र के मरने की बात फैल गयी । राजमहल मे कोलाहल मच गया । संत तो दया के सागर है, दुसरो के दुख से द्रवित हो जाते है । सन्तो ने सुना तो शीघ्र ही राजभवन मे प्रवेश किया और जाकर बालक को देखा । उसका शरीर विष के प्रभाव से नीला पड़ गया था, जो इस बातका साक्षी था कि बालक को विष दिया गया है । महात्माजी सिद्ध थे , उन्होने रानी से पूछा कि सत्य कहो, तुमने यह क्या किया ? रानी ने कहा – आप निश्चय ही चले जाना चाहते थे और हमारे नेत्रों को आपके दर्शनों की अभिलाषा है । आपको रोकने के लिये ही यह उपाय किया गया है ।

राजा और रानीकी संतो के चरणों मे ऐसी अद्भुत भक्ति को देखकर वे महात्मा जोरसे रोने लगे । संतो में राजा रानी की ऐसी प्रीति है कि केवल संतो को रोकने के लिए अपने पुत्र को ही विष दे दिया । संत जी का कण्ठ गद्गद हो गया, उन्हें भक्ति की इस विलक्षण रीति से भारी सुख हुआ । इसके बाद महात्माजी ने भगवान के गुणों का वर्णन किया और हरिनाम के प्रताप से सहज ही बालक को जीवित कर दिया । उन्हे वह स्थान अत्यन्त प्रिय लगा । अपने साथियों को- जो जाना चाहते थे, उन्हें विदा कर दिया और जो प्रेमरस मे मग्न संतजन थे, वे उनके साथ ही रह गये । इस घटना के बाद महात्माजी ने राजा से कहा कि अब यदि हमे आप मारकर भी भगायेंगे तो भी हम यहांसे न जायंगे ।


२. दूसरी कथा : महाराष्ट्र के राजा महीपतिराव जी परम भक्त थे । उनकी कन्या कन्हाड़ के राजा रामराय के साथ ब्याही थी, लेकिन घरके सभी लोग महा अभक्त थे । भक्तिमय वातावरण मे पलने वाली उस राजपुत्री का मन घबडाने लगा । अन्त मे जब उसे कोई उपाय नही सूझा तो उसने अपनी एक दासी से कह दिया कि इस नगर मे जब कभी भगवान के प्यारे संत आये तो मुझे बताना ।

एक दिन दैवयोग से उस नगर मे संतो की ( संत श्री ज्ञानदेवजी की) जमात आयी । उनके आनेका समाचार दासी ने उस राजपुत्री को दिया । अब उस भक्ता से सन्त अदर्शन कैसे सहन होता । उसने अपने पुत्र को विष दे दिया । वह मर गया, अब वह राजकन्या तथा दूसरे घरके लोग रोने तथा विलाप करने लगे । तब उस भक्ता ने व्याकुल होकर उन लोगों से कहा कि अब इसके जीवित होने का एक ही उपाय है, यदि वह किया जाय तो पुत्र अवश्य जीवित हो सकता है । वह चाहती थी कि किसी तरह संत जान यहां पधारे और इन अभक्त लोगो को संतो का महात्म्या पता लगे । रोते-रोते परिवार के सब लोगो ने कहा – जो भी उपाय बताओगी, उसे हम करेंगे । तब उस बाई ने कहा कि संतो को बुला लाइये ।

उन अभक्त लोगों ने पूछा कि सन्त कैसे होते है ? इसपर भक्ता ने कहा कि यह मेरे पिता के घर जो दासी साथ आई है , यह मेरे पिता के घर मे सन्तो को देख चुकी है । यह सब जानती हैंकि संत कैसे होते है, कहाँ मिलेंगे आदि सब बातों को यह बताएगी । पूछनेपर दासी ने कहा कि आज इस नगर मे कुछ सन्त पधारे है और अमुक स्थानपर ठहरे है । वह दासी राजा को साथ लेकर चली और सन्तो से बोलना सिखा दिया । दासी ने राजा से कहा कि संतो को देखते ही पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करते हुए उनके चरणों को पकड लीजियेगा । राजा ने दासी के कथनानुसार ही कार्य

किया । शोकवश राजा की आँखो से आँसुओं की धारा बह रही थी, परंतु उस समय ऐसा लगा कि मानो ये सन्त प्रेमवश रो रहे है । सहज विश्वासी और कोमल हृदय उन सन्तो ने भी विश्वास किया कि ये लोग प्रेम से रुदन कर रहे है । राजाने प्रार्थना की कि प्रभो ! मेरे घर पधारकर उसे पवित्र कीजिये । राजा की विनती स्वीकारकर सन्तजन प्रसन्नतापूर्वक उसके साथ चले । दासी ने आगे ही आकर भक्ता रानी को साधुओं के शुभागमन की सूचना दे दी । वह रानी पौरी मे आकर खडी हो गयी । संतो को देखते ही वह उनके चरणों मे गिर पडी और प्रेमवश गद्गद हो गयी । आँखों मे आँसू भरकर धीरे से बोली – आप लोग मेरे पिता-माता को जानते ही होंगे, क्योंकि वे बड़े सन्तसेवी है । आपलोगों का दर्शन पाकर आज ऐसा मन मे आता है कि अपने प्राणों को आपके श्रीचरणों मे न्यौछावर कर दूँ । संतो ने पहचान लिया कि यह भक्त राजा महिपतिराव जी की पुत्री है।

उस भक्ता रानी की अति विशेष प्रीति देखकर सन्तजन अति प्रसन्न हो गये और बोले कि तुमने जो प्रतिज्ञा क्री है, वह पूरी होगी । राजमहल मे जाकर सन्तो ने मरे हुए बालक को देखकर जान लिया कि इसे निश्चय ही विष दिया गया है । उन्होंने भगवान का चरणामृत उसके मुख मे डाला । वह बालक तुरंत जीवित हो गया । इस विलक्षण चमत्कार को देखते ही राजा एवं उसके परिवार के सभी लोग जो भक्ति से विमुख थे, सभी ने सन्तो के चरण पकड़ लिये और प्रार्थना की कि हमलोग आपकी शरण मे है । संतो का सामर्थ्य क्या है यह उन सब को पता लग गया । बार बार चरणों मे गिरकर प्रार्थना की तब सन्तो ने उन सभी को दीक्षा देकर शिष्य बनाया । जो लोग पहले यह तक नही जानते थे कि संत कैसे होते है- कैसे दिखते है ,उन लोगों ने वैष्णव बनकर सन्तो की ऐसे विलक्षण सेवा करना आरम्भ कर दिया, जिसे देखकर लोग प्रेमविभोर हो जाते थे।

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श्री निवासाचार्य जी-वृन्दावन


(कालावधि-1518-1603)

श्रीनिवासाचार्य जी, गौरांग महाप्रभु के प्रेम की मूर्ति थे। बंगदेश के चाकन्दी ग्राम में इनका जन्म हुआ। अल्प आयु में ही इन्होंने ग्रंथों को कंठस्थ कर लिया। इनका पांडित्य सबके हृदय को आकर्षित कर लेता। श्री गोपाल भट्ट जी सदगुरुदेव हुए और जीव गोस्वामी जी ने इन्हें भक्ति शास्त्रों का अध्ययन कराया। गुरु आज्ञा से बंगाल क्षेत्र में प्रचुर गौड़ीय भक्ति का प्रचार किया। एक बार मानसी सेवा में होली लीला का आस्वादन कर रहे थे और ध्यान टूटने पर देखा कि सारे वस्त्र रंगे हुए हैं।

बंगदेश गंगातटवर्ती चाकंदी ग्रामवासी श्री गंगाधर भट्टाचार्य जी का चैतन्य महाप्रभु जी के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था। महाप्रभुजी के सन्यास ग्रहण के समय चैतन्य-चैतन्य पुकारते हुए विक्षप्त दशा को प्राप्त हो गए। तब से लोग इन्हें चैतन्य दास पुकारने लगे। पूर्णस्वस्थ होने पर एक दिन श्रीजगन्नाथ पुरी की ओर पत्नी के साथ प्रस्थान किया। पूरी पहुँचकर महाप्रभु जी का दर्शन किया। रात्रि में जगन्नाथ भगवान ने स्वपन दिया – तुम घर चले जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे एक सर्वांग सुंदर पुत्र होगा। जो प्रेम और पांडित्य से तुम्हारे कुल को धन्य करेगा। प्रातकाल महाप्रभु जी को प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त करके वापस ग्राम आ गए। कुछ समय पश्चात अचल जगन्नाथ और सचल जगन्नाथ की कृपया से सन 1518 को वैशाखी पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी प्रिया देवी के गर्भ से परम् रूपवान पुत्र का जन्म हुआ। इसी पुत्र का नाम हुआ श्रीनिवास। गौर नाम श्रवण करके अति प्रसन्न हो जाते थे। अपने मधुर स्वर से गौर-गौर का उच्चारण कर नृत्य करने लगते।
जब यह 5 वर्ष के हुए तो पिता जी ने चांकन्दी के महामहोपाध्याय धनंजय वाचस्पति को पढ़ाने लिखाने का भार सौपा। गुरमुख से जो श्रवण कर लेते तुरंत कंठ हो जाता। मेघा शक्ति के अति धनी थे। कुछ ही समय में व्याकरण, दर्शन आदि संपूर्ण शास्त्रों में निष्णात हो गए। संपूर्ण वैष्णव समाज में उनके पांडित्य की चर्चा होने लगी।
एक दिन पूरी में महाप्रभु जी ने कीर्तन करते हुए अचानक श्रीनिवास- श्रीनिवास उच्चारण किया। भक्तों ने कारण पूछा तो महाप्रभु जी बोले मेरे विशुद्ध प्रेम की मूर्ति श्री निवास का चाकंदी ग्राम में आविर्भाव होगा। इसलिए सभी गौर प्रेमी अब श्रीनिवास जी के पास आने जाने लगे।
कर्णानद के अनुसार वृंदावन के गोविंद देव ने गोस्वामी गणों से कहा था। मेरी शक्ति से मेरे प्रेम का ही श्रीनिवास के रूप में अविर्भाव हुआ है।

मोर शक्ति ते जन्म इहार करिला प्रकाश।
प्रेम रुपे जन्म हैल नाम श्रीनिवास॥

एक दिन अकस्मात पिताजी का निकुंज वास हो गया। ह्रदय में अत्यंत वेदना हुई क्योंकि गौर- लीला रसस्वादन के साथी थे। माँ विलाप कर रही थी। श्रीनिवास जी ने अब पुरी में महाप्रभु के दर्शन के लिए जाने का विचार किया। मां से आज्ञा ली, इच्छा ना होते हुए भी माँ ने आज्ञा प्रदान की। गौर प्रेम में अश्रु प्रवाहित करते हुए, बाह्य ज्ञान शून्य नीलाचल के पथ पर चले जा रहे हैं। मार्ग में अचानक किसी ने महाप्रभु जी के अंतर्ध्यान का समाचार सुनाया तो मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
महा प्रभु जी की कृपा हुई स्वपन में बोले – तुम नीलाचल चले जाओ। गदाधर आदि परिक्रमा वहाँ है। मुझे तुम्हारे द्वारा बहुत कार्य कराने हैं। श्रीनिवास जी प्रातः जी उठकर नीलाचल की ओर चल पड़े। कई दिनों के पश्चात पूरी पहुँचे। जगन्नाथ जी का दर्शन किया। जगन्नाथ जी की छद्ध रूप से प्रसाद का थाल दे गये, प्रसाद पाकर प्रभु की कृपा का अनुभव किया। फिर श्री गदाधर जी से मुलाकात की। श्री गदाधर जी ने इन्हें राय रामानंद जी और सार्वभौम जी के पास दर्शन कराने ले गए। गौर – विरह में निमग्न दोनों ने धैर्य धारण करके महाप्रभु जी की कुछ चर्चा की। इस प्रकार गौर- प्रेमियों के दर्शन एवं गौर -चर्चा मैं दिन बीतने लगा।
एक दिन गदाधर जी से भागवत पढ़ाने की प्रार्थना की तो गदाधर बोले – मेरी इच्छा बहुत थी तुम्हें भागवत पढ़ाने की लेकिन महाप्रभु जी के अश्रु जल से भागवत के कुछ अक्षर मिट गए हैं। इसलिए तुम वृंदावन जाकर जीव से भागवत अध्यन करो। कई दिनों की यात्रा के पश्चात भूखे-प्यासे श्रीनिवास जी मथुरा पहुंचे। यहां सूचना प्राप्त हुई के रूप, सनातन और रघुनाथ भट्ट जी का निकुंज प्रवेश हो गया। अत्यंत दुखी हुए और अर्ध वाह्य दशा में वृंदावन के गोविंद देव जी मंदिर में आकर गिर पड़े। जीव गोस्वामी जी दर्शन को पधारे तो देखा कि मंदिर में भीड़ है। वहाँ जाकर सभी को हटाया। अद्भुत दृश्य सामने था। श्रीनिवास जी के वपु में अष्ट सात्विक भाव, अश्रु, कम्प, पुलक रोमांच आदि प्रकट हो रहे थे। जीव गोस्वामी जी पहचान गए कि यह श्रीनिवास है। उनको उठा कर कुटिया में लाए। दो पहर बीतने पर वाह्य ज्ञान हुआ। जीव जी को प्रणाम किया। गोविंद देव जी का प्रसाद पवाया बगल वाली कुटिया में विश्राम करने को कहा।
दूसरे दिन जीव गोस्वामी जी गोपाल भट्ट जी के पास ले गए। और उनके द्वारा श्रीनिवास जी को दीक्षा दिलवा दी। श्रीनिवास ने गुरु सेवा को सर्वस मानकर अंग -सेवा का भार अपने ऊपर ले लिया। शीघ्र ही कविराज आदि संतो के दर्शन करा लाए। अब वृंदावन में गुरु सेवा करते हुए श्री निवास जी जप, ध्यान, कीर्तन आदि दैनिक कृत्य करने लगे और जीव गोस्वामी जी के पास शास्त्र अध्ययन आरंभ किया। लीला स्मरण में श्रीनिवास का असाधारण अभिनिवेश देख श्री गोपाल भट्ट जी बहुत प्रसन्न हुए। एक दिन लीला ध्यान में श्रीनिवास जी सुगंधित तेल, माला, चंदनादि से महाप्रभु जी की सेवा करके उनके पास खड़े होकर चँवर डुला रहे थे। उसी समय महाप्रभु जी के इशारे करने से दूसरे सेवक ने महाप्रभु जी के गले से माला उतारकर श्रीनिवास जी को पहना दी। ध्यान भंग होने पर देखा कि वही माला गले में पड़ी थी।
एक दिन बसंत के अवसर पर ब्रज लीला का ध्यान कर रहे थे। वहाँ होली लीला चल रही थी। अचानक किशोरी जी के हाथ का गुलाल शेष हो गया तो उसी समय मंजरी स्वरूप में श्रीनिवास जी ने गुलाल लाकर श्री किशोरी जी को दिया। ध्यान भंग हुआ तो देखा कि सारे वस्त्र होली के रंग से रंगे हुए हैं।
श्रीनिवास जी का ध्यान में तीव्र अनुराग था। थोड़े ही समय में यह श्रीमद्भागवत और भक्ति शास्त्रों में पारंगत हो गए और जीव गोस्वामी के द्वारा आचार्य ठाकुर की उपाधि प्राप्त की। श्री नरोत्तम ठाकुर, श्री श्यामानन्द प्रभु दोनों श्रीनिवास जी के सहपाठी थे। जीव गोस्वामी जी की बहुत इच्छा थी कि जिन भक्ति ग्रंथों की रचना श्री रूप जी, श्री सनातन जी, और स्वयं ने की है उन का प्रचार गौड़ देश में भली-भांति हो। जीव जी ने सभी भक्तों एवं संतों के मत से श्रीनिवास आचार्य जी को भक्ति के प्रचार के लिए भेजने का निश्चय किया। और नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को उनकी सहायता के लिए सारे ग्रंथों को एक बड़े काठ के संदूक में बंद किया और दस शास्त्र धारी रक्षको को साथ करके दो बैल गाड़ी में बिठा कर विदा किया। गौड़ देश की सीमा के भीतर गोपालपुर ग्राम में विश्राम किया। अचानक एक लुटेरों का दिल आया और मारपीट कर बैलगाड़ी सहित ग्रंथों के संदूक को लेकर अदृश्य हो गए। प्रातः काल तीनो ने बहुत खोजा लेकिन कुछ पता ना चला। एक प्रहरी के हाथ ग्रन्थों की चोरी की सूचना जीव गोस्वामी जी को भेजी और नरोत्तम एवं श्यामानन्द जी ने कहा- तुम गौड़ देश जाकर भक्ति का प्रचार करो।
श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों की खोज में पागल की भांति इधर-उधर भटकते रहे। विष्णुपुर राज्य में कृष्ण बल्लभ नाम के एक ब्राह्मण से मुलाकात हुई। वो इन्हें पाठ सुनने के लिए राज्य के राजा वीरहाम्वीर की सभा में ले गया। व्यास चक्रवती नामक एक ब्राहमण राजा को नित्य भागवत सुनाया करते थे। आज रास पंचाध्यायी का पाठ था। और वक्ता महाशय सिद्धांत विरुद्ध व्याख्या कर रहे थे। तब श्रीनिवासाचार्य जी ने प्रतिवाद कर के अद्भुभुत रसपूर्ण व्याख्या की। राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। राजा ने उन्हें कुछ दिन रुकने का आग्रह करके एक निर्जन स्थान में वास दे दिया। श्रीनिवास जी ने विचार किया कि राजा से ग्रन्थ चोरी की बात कहूँ जो शायद ग्रंथ को खोजने में मेरी मदद कर दे। दूसरे दिन कथा के विश्राम के बाद राजा निवासाचार्य जी को अपने कक्ष में ले गया और परिचय पूछा। श्रीनिवास जी ने संपूर्ण बात कह दी। ग्रंथ चोरी की बात सुनकर राजा रोने लगा और बोला- महाराज! डाकुओं का सरदार मैं ही हूँ। मैं राजा होते हुए भी अपने सैनिकों को लूटने के लिए भेजता हूँ। आपके सारे ग्रंथ मेरे पास है। मैं आपका अपराधी हूँ। आप दंड दे या क्षमा करें। ऐसा कहकर फूट- फूट कर रोने लगा। श्री निवास जी ग्रंथ प्राप्ति की बात सुनकर अति प्रसन्न हुए और राजा का हृदय से लगा लिया।
अगले दिन श्रीनिवास जी ने राजा आदि अनेक परिकरो को अपना शिष्य बनाया, और ग्रंथ प्राप्ति का संदेश वृंदावन जीव गोस्वामी जी को और खेतुरी के निकट गोपालपुर नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को भेजा। दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए और आनन्द में नृत्य करने लगे। अब श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों को लेकर अपनी मां के पास याजिग्राम पहुँचे। माँ अपने पुत्र को देखकर आनन्द में डूब गई। याजिग्राम में श्रीनिवास जी ने एक विद्यालय की स्थापना की अध्यापन का कार्य प्रारंभ कर दिया। कुछ समय पश्चात श्रीनिवास जी का श्री गोपाल चक्रवर्ती की सुपुत्री द्रोपदी नाम की कन्या के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात द्रोपदी का नाम ईश्वरी ठकुरानी रखा। एक दिन श्रीनिवास घर के निकट वृक्ष के नीचे सत्संग कर रहे थे। एक युवक विवाह करके अपनी पत्नी को पालकी में विदा करा कर ला रहा था। श्रीनिवास ने उसे देखा और बोल पड़े- देखो! यह नवयुवक रूपवान और तेजस्वी है। लेकिन इसका यौवन प्रभु सेवा में न लगकर कामिनी सेवा में लगेगा। यह वचन उस युवक के कान में पड़ गए। बस तुरंत वह श्रीनिवास जी के चरणों में गिर पड़ा, और हमेशा के लिए दीक्षा लेकर सेवा में ही रह गया। महापुरुषो की दृष्टि पड़ते ही जीव का कल्याण हो जाता है।
श्री नरोत्तम ठाकुर के आग्रह पर श्रीनिवास जी एक महीने खेतुरी ग्राम पधारे। वहाँ बहुत विशाल उत्सव हुआ। दोल पूर्णिमा के दिन छय विग्रहों की धूम धाम से प्रतिष्ठा हुई। खूब संकीर्तन की धूम मची।
श्रीनिवास जी का दूसरा विवाह गोपालपुर ग्राम के राघव चक्रवर्ती की सुपुत्री श्री पद्मावती के साथ शुभ मुहूर्त में हुआ। विवाह के पश्चात पद्मावती जी का नाम हुआ गौरांग प्रिया। श्रीनिवास जी के तीन पुत्र एवं तीन कन्या हुईं।
एक बार श्रीनिवास जी विष्णु पुर ग्राम में लीला स्मरण कर रहे थे। लीला- स्मरण में मणि मंजरी स्वरूप से लीला के गंभीरतम प्रदेश में प्रवेश कर गए। शरीर निश्चल हो गया, श्वास बंद हो गया। दो दिन तक यही स्थिति रही, सभी घबरा गए सभी विचार करने लगे क्या करें ? उसी समय खेतुरी ग्राम से रामचंद्र जी आ गए और बोले — आप घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा। रामचंद्र जी श्रीनिवास जी के पास बैठकर ध्यान मग्न हो गए। करुणा मंजरी स्वरूप से लीला में प्रवेश कर के देखा कि अन्य मंजरियां यमुना जल के भीतर कुछ खोज रही है। पूछा तो पता चला कि किशोरी जी की बेसर खोज रही है। और जलक्रीडा करते समय गिर गई थी। यह भी खोजने लगे तो कमल पत्र के नीचे बेसर मिल गई। तुरंत गुरुदेव को प्रदान की। गुरुदेव ने गुण मंजरी (गोपाल भट्ट), गुण मंजरी ने रूप मंजरी (रूप गोस्वामी) को रुप मंजरी ने श्री जी को प्रदान की। किशोरी जी ने प्रसन्न होकर करुणा मंजरी को अपना चार्बित ताम्बूल देकर पुरस्कृत किया। उसी समय श्रीनिवास जी की समाधि टूट गई। रामचंद्र जी के हाथ में प्रसादी तांबूल देखकर सभी आश्चर्यचकित हुए। सबको कणिका प्रसाद प्राप्त हुआ। जीव का यही वास्तविक स्वरुप है। रामचंद्र जी खेतुरी में नरोत्तम दास जी के पास थे। एक दिन श्रीनिवास जी ने पत्र द्वारा रामचंद्र जी को शीघ्र याजि ग्राम आने का संदेश भेजा। पत्र पाते ही रामचंद्र जी गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर नरोत्तम ठाकुर से आज्ञा मांगी। दोनों हृदय से मिले क्योंकि अब यह अंतिम मिलन था। नरोत्तम ठाकुर बोले- मैं उस घड़ी की प्रतीक्षा करूँगा, जिस में हमारा मिलन पुनः होगा। रामचंद्र जी वहाँ से चल कर याजि ग्राम श्रीनिवास जी के पास आ गए। आकर गुरुदेव चरणों में प्रणाम किया। दो दिन बाद दोनों गुरु शिष्य श्री वृंदावन धाम प्रस्थान किया।
श्री वृंदावन धाम आने के पश्चात श्रीनिवास जी वापिस कहीं नहीं गए। श्रीराम चंद्रजी निरंतर गुरु सेवा में निरत रहते। सन 1603 कार्तिक शुक्ल अष्टमी को श्रीनिवास जी अपने निज स्वरूप मणि मंजरी रूप में श्यामा-श्याम के नृत्य लीला में प्रवेश कर गए। सन 1612 कार्तिक कृष्ण अष्टमी को रामचंद्रजी ने गुरुदेव के पथ का अनुसरण किया। श्री धाम वृंदावन में गोपेश्वर महादेव के निकट श्रीनिवास जी एवं श्री रामचंद्र जी दोनों की समाधि विराजमान हैं। श्री धाम वृंदावन वास करने का यही फल है कि इसी रज में रज होकर मिल जाए।

तजिकै वृंदाविपिन कौ, अन्य तीरथ जे जात।
छाडि विमल चिंतामणि, कौड़ी को ललचात्॥
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स्रोत: ‘ब्रज भक्तमाल’

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श्रीलाला बाबू (वृन्दावन/गोवर्धन)

कलकत्ता शहर है और शीतकाल की सन्ध्या की बेला। अस्ताचलगामी सूर्य अपनी मधुर किरणें बिखेर रहा है। पवन मन्द;मन्द बह रहा है। लालाबाबू पालकी पर निकले हैं सैर करने। पालकी के आगे हैं बन्दूकची और पोछे सिपाहियों और नौकरों की टोली। गंगा-तटपर पहुँचकर पालकी उतारी गयी, लता-पताओं के बीच एक सुरम्य और सुरभित स्थान में।
हुक्काबरदार ने झट चिलम भरकर लालाबाबू के सामने फरसी पर रख दी। कीनखाबमण्डित नरम तकिये का सहारा लेते हुए उन्होंने फरसी की नली मुँह में दबा ली। छल-छल करती बहती सुरधुनी के मधुर स्वर में हुक्के की गुड़-गुड़ बीच-बीच में सुर मिलाने लगी।
मुख से निकला सुगन्धित अम्बरी तम्बाकू का धुआँ कुण्डली बाँधकर आकाश में उड़ने लगा। लालाबाबू का मन एक अनिर्वचनीय आनन्द के झूले में झूलता हुआ धीमे-धीमे पेंग भरने लगा। उसी समय उनके हृदय में लगी एक चिनगारी ने विस्फोट किया और आनन्द का उत्सविषाद में विलीन हो गया।
पासकी एक झोपड़ी में दिन के परिश्रम से क्लांत, सोते हुए धीमर को जगाते हुए उसकी कन्या कह रही थी–‘बाबा, उठो ! दिन शेष ह्य गयौ–बाबा, उठो ! दिन डूब चला।
धीमर-कन्या का आह्वान तिर्यक् गति से जाकर भेद गया लालाबाबू के मर्मस्थल को। ‘बाबा, उठो दिन शेष हय गयौ’ यह शब्द बार-बार उनके हृदयाकाश में गूँजने लगे।
उनकी मोह-निद्रा भंग हुई। फरसी की नली मुँह से छूट गयी। महा ऐश्वर्यशाली, महाविलासी लालाबाबू अब वह लालाबाबू न रहे। सब कुछ त्यागकर कंगालवेश में वृन्दावन जाने के लिए कृतसंकल्प हो वे चल दिये घर की ओर।
किसी तरह रात व्यतीत की। दूसरे दिन कहा घरके लोगोंसे–‘मेरे जीवन की सन्ध्या आ गयी है। दिन डूबने को है। राधारानी की पुकार सुन पड़ी है। मैं जा रहा हूँ वृन्दावन।’ पत्नी, पुत्र, परिजनों के अनुरोध और कातर क्रन्दन की उपेक्षा कर वे चल दिये वृन्दावन की ओर।
लालाबाबू का असली नाम था श्रीकृष्णचन्द्र सिंह। आनुमानिक सन् १७७५ में उनका जन्म हुआ। उनके दादा गंगागोविन्द सिंह थे अंग्रेज गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवान थे।
उन्होंने अपनी असाधारण योग्यता से अपने वंश के लिए अर्जित की थी विशाल जमींदारी और अपरिमेय धनराशि। उनके भाई राधागोविन्द भी बहुत बड़ी धन-सम्पत्ति के मालिक थे। कृष्णचन्द्र सिंह के पिता प्राणकृष्ण थे। दोनों भाइयों की सम्पत्ति के एकमात्र उत्तराधिकारी और उस समय के पूर्व भारत के सबसे बड़े धनी-मानी व्यक्ति।
कृष्णचन्द्र उनके इकलौते बेटे थे। दादा गंगागोविन्दसिंह उन्हें प्यार से ‛लाला’ पुकारा करते थे। नौकर-चाकर और अन्य सभी लोग उन्हें आदर पूर्वक ‛लाला बाबू’ कहते थे। इसलिए वे इसी नाम से समस्त भारत में विख्यात हुए।
लाला बाबू की मेधा तो असामान्य थी ही, उनके पिता ने बड़े-से-बसे विद्वानों को उन्हें अँग्रेजी, फारसी और संस्कृत पढ़ाने को नियोजित किया। फलस्वरूप अल्प समय में ही उन्होंने इन भाषाओं में व्युत्पत्ति हासिल कर ली। श्रीमद्भागवत से उन्हें बहुत प्रेम था। उनमें इतनी दक्षता थी कि वे उसके किसी श्लोक की सुन्दर और रसमयी व्याख्या कर लोगों को चमत्कृत कर सकते थे।
उनका हृदय इतना कोमल था कि वे किसी का दुःख नहीं देख सकते थे। एक गरीब आदमी अर्थाभाव के कारण अपनी कन्या का विवाह नहीं कर पा रहा था। दुःखी होकर उसने उनसे प्रार्थना की। उन्होंने खजानची को आदेश दिया १०००) उसे तुरन्त दे देने का। खजानची ने प्राणकृष्ण सिंह से पूछा, तो उन्होंने कहा–‘अब लाला ने उस व्यक्ति को वचन दे ही दिया, तो इस बार तो उसे १०००) दे दो। पर लाला से कह दो कि इस प्रकार दान तभी करे जब स्वयं कुछ कमायी करने लगे या जमींदारी की आय बढ़ा ले।’
लाला बाबू को पिता की यह बात शूल की तरह चुभ गयी–‘कोटिपति गंगागोविन्द सिंह का पौत्र होते हुए मुझे इतना भी अधिकार नहीं कि मैं किसी गरीब की सामान्य सेवा कर सकूँ। तो ठीक है, अब अपने पैरों पर खड़ा होकर ही कुछ करूँगा।’
वे अपने संकल्प पर दृढ़ रहे। कुछ ही दिनों में माता-पिता के रोने-धोने की उपेक्षा कर वर्धमान चले गये। फारसी और अँग्रेजी भाषाओं का अच्छा ज्ञान उन्हें था ही। वर्धमान कलेक्टरी के सेरेस्तादार पद पर उनकी नियुक्ति हो गयी। कार्य में असाधारण दक्षता प्रदर्शन करने के कारण पदोन्नति भी जल्दी-जल्दी होने लगी। इसी समय उन्होंने विवाह किया। एक पुत्र रत्न भी उत्पन्न हुआ।
सन् १८०३ में उड़ीसा प्रदेश अँग्रेजी सरकार के अधिकार में आ गया। तब उनकी नियुक्ति उड़ीसा के सर्वोच्च दीवान के पदपर हो गयी। श्रीचैतन्य महाप्रभु की लीला-स्थली श्रीधाम पुरी में रहने का अवसर मिला। भक्तिलता बीज, जो जन्म से ही उनमें रोपित था, अंकुरित हो उठा और क्रमश: पल्लवित और पुष्पित होने लगा। राज-काज को छोड़ उनका बाकी समय भक्ति-शास्त्राध्ययन, नाम-जप और कीर्तनादि में बीतने लगा।
कुछ दिन बाद घर से संवाद आया पिता श्रीप्राणसिंह के परलोक-गमन का। घर छोड़ने के पश्चात् लालाबाबू ने घर लौटकर जाने का पिता का आग्रह कई बार ठुकरा दिया था। वे अपने इकलौते बेटे को एक बार फिर से देख लेने की अपूर्ण साध लिये ही परलोक सिधार गये थे। इसलिए लालाबाबू के हृदय में यह संवाद शूल-सा चुभकर रह गया। नेत्रों से बह पड़ी अविरल अश्रुधारा। हृदय में धधक उठी अनुताप की प्रबल ज्वाला।
कलकत्ते जाकर उन्होंने पिता का पारलौकिक कार्य विधि पूर्वक सम्पन किया। पिता की जमींदारी और धन-सम्पत्ति की देखभाल का भार अब उनके ऊपर आ पड़ा। इसलिए वे उड़ीसा की दीवानी का काम छोड़कर स्थायी रूप से कलकत्ते रहने लगे।
पर उनके जीवन में होने लगा एक अन्तर्द्वन्द। बार-बार मन में उठता एक प्रश्न–यह धन, ऐश्वर्य, मान-सम्मान सब किसलिए ? यह क्या चिरस्थायी हैं ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं इन्हें त्यागकर उस पथ का सन्धान किया जाय, जिससे चिर शान्ति मिल सकती है ?
पर संसार के प्रति उनके दायित्व और कर्तव्य की भावना हर बार इस प्रश्न को दबा देती। उसी समय उन्हें प्राप्त हुआ उस धीमर कन्या के माध्यम से राधारानी का दिव्य आह्वान।
वृन्दावन जाकर उन्होंने अपनाया त्याग, तितीक्षा और कठोर व्रतमय साधन जीवन। सारा दिन भजन करते। सन्ध्या समय एक बार मधुकरी को जाते। जो मिल जाता उसी से उदरपूर्ति करते।
वृन्दावन में भग्न मन्दिरों और विग्रहों की सेवा-पूजा की दुर्दशा देख उनके प्राण रो दिये। कितना अच्छा होता यदि इनकी दशा सुधारने के लिए वे कुछ कर सकते। पर वे ठहरे कंगाल। उनकी लाचारी उन्हें कचोटने लगी। फिर खेल उठी मन में एक नयी तरंग- कंगाल मैं हूँ। प्रभु तो कंगाल नहीं।
उनकी विपुल सम्पत्ति में छोड़कर आया हूँ। उसमें से पत्नी और पुत्र का हिस्सा निकालकर अपना हिस्सा प्रभु की सेवा में लगाऊँ और स्वयं भिक्षा-वृत्ति से जीवन निर्वाह करूँ, तो भजन की दृष्टि से क्या कोई हानि होगी ? देव-देवालयों की सेवा होगी, वृन्दावन के धार्मिक अनुष्ठानों का उज्जीवन होगा।’
उन्होंने तदनुरूप कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। थोड़े ही समय में उनकी बंगाल और उड़ीसा की जमींदारी से पचीस लाख रुपये की धनराशि आ गयी। उनके कर्मचारियों ने वृन्दावन में बहुत-सी जमीन-जायदाद खरीदना प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे व्रजमण्डल के चौहत्तर परगने उन्होंने क्रय कर डालें। इनकी आय से भग्न मन्दिरों की मरम्मत, नये मन्दिर और धर्मशालाओं का निर्माण और जगह-जगह देव सेवा की सुव्यवस्था करने की एक विराट योजना बनायी गयी।
इस योजना में वृन्दावन में एक ऐसा सुरम्य मन्दिर बनवाने की परिकल्पना भी सम्मिलित थी, जिसमें राधा-कृष्ण के अति सुन्दर विग्रहों की स्थापना हो और शत-शत साधु-महात्माओं और गरीब दुःखियों के नित्य महाप्रसाद ग्रहण करने की सुव्यवस्था हो।
मन्दिरका निर्माण-कार्य प्रारम्भ हुआ। जयपुर अञ्चल से कीमती पत्थर क्रय करने के लिए लालाबाबू का कभी-कभी राजस्थान जाना होता। मार्ग में पड़ता भरतपुर। भरतपुर के महाराजा उनके पुराने बन्धु थे। उनके विशेष आग्रह के कारण उन्हें आते-जाते एक-दो दिन उनके यहाँ ठहर जाना पड़ता।
महाराजा के साथ घनिष्टता होने के कारण उन्हें एक बार बड़ी विपदा में पड़ना पड़ा। उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी की राजस्थान के राजाओं के साथ एक सन्धि की बातचीत चल रही थी, जिसमें भरतपुर के महाराजा की प्रधान भूमिका थी।
किसी कारण उन्होंने सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। सर चार्ल्स मेटकॉफ उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरफ से दिल्ली दरबार के रेजिडेन्ट पद पर नियुक्त थे।
उन्हें उनके कुछ कर्मचारियों ने समझा दिया कि महाराजा हस्ताक्षर करने को प्रस्तुत थे परन्तु लालाबाबू की कुमन्त्रणा के कारण नहीं किये। मेटकॉफ ने क्रुद्ध हो लालाबाबू को बन्दी बनाकर दिल्ली बुलवा मँगाया। विचार की व्यवस्था की जाने लगी।
लालाबाबू की गिरफ्तारी का संवाद सारे व्रजमण्डल में फैल गया। इसका विरोध करने के लिए सहस्रों व्रजवासी दिल्ली की ओर उमड़ पड़े। लालाबाबू की लोकप्रियता और उनके प्रभाव को देख मेटकॉफ बहुत चिंतित हुए। उनके और उनके परिवार के सम्बन्ध में गुप्तरूप से जाँच-पड़ताल करवायी।
पता चला कि उनके पूर्वपुरुष सदा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हितैषी रहे हैं। उसका उपकार भी उन्होंने बहुत किया है। मेटकॉफ की आँखें खुल गयीं और लालाबाबू को मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, उन्हें महाराजा की उपाधि देना चाहा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
धीरे-धीरे वृन्दावन का विशाल मन्दिर बनकर तैयार हो गया। मुरलीधर श्रीकृष्णचन्द्र की नयनाभिराम मूर्ति स्थापित हो गयी। अतिथिशाला में सैकड़ों लोगों के प्रसाद की व्यवस्था भी कर दी गयी। पर लालाबाबू स्वयं कंगाल वैष्णवों की तरह ही जीवनयापन करते हुए भजन करते रहे।
माघ का महीना था। कड़ाके की शीत पड़ रही थी। मन्दिर के एक कोने में खड़े लालाबाबू दर्शन कर रहे थे श्रीकृष्णचन्द्र की भुवनमोहन श्रीमूर्ति का। भावावेश में उनका देह विकम्पित हो रहा था। नेत्रों से बह रही थी प्रेमाश्रुधारा। उनके अन्तर में जाग उठी एक विचित्र अभिलाषा। उन्होंने भोग के थाल में से एक टिकिया मक्खन की उठाकर पुजारी को दी और कहा–‘यह मक्खन श्रीमूर्ति की चाँद पर रखना तो।’
पुजारी सुनकर अवाक् ! वह चुपचाप लालाबाबू के मुख की ओर देखता खड़ा रह गया। लालाबाबू ने फिर कहा–‘हाँ, हाँ, रक्खो तो, देखते क्या हो। मुझे आज श्रीमूर्ति की परीक्षा करनी है। इसकी विधिवत् प्राण-प्रतिष्ठा हुई है, सेवा भी षोडशोपचार से विधिवत् हो रही है। तो देखना है कि इसमें सचमुच प्राण हैं या नहीं। यदि हैं, तो इनके मस्तक के ताप से मक्खन पिघल जाना चाहिये।’
पुजारी क्या करता। उसने आज्ञा का पालन करते हुए मक्खन की टिक्की श्रीमूर्ति की चाँद पर रख दी और पूर्ववत् सेवा-पूजा का कार्य करने लगा। कुछ देर पश्चात् सचमुच मक्खन धीरे-धीरे पिघलकर श्रीमूर्ति के अङ्गपर बहने लगा। ऐसी भयंकर शीत में मक्खन का अपने-आप गल जाना सम्भव नहीं था। निश्चय ही उसका पिघलना इस बात का प्रमाण था कि श्रीविग्रह जीवित है।
श्रीकृष्णचन्द्र के मुखारविन्द से मक्खन बहता देख पुजारी और दर्शकगण जयध्वनि करने लगे। लालाबाबू भावावेशमें मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े।
एक और दिन लालाबाबू के मन में एक और ढंग से श्रीमूर्ति की परीक्षा की बात आयी। उन्होंने सोचा कि यदि श्रीमूर्ति के सिर में ताप है तो नासिका में निःश्वास भी होगा अवश्य। क्यों न इसकी भी परीक्षा की जाय। उन्होंने पुजारी को थोड़ी-सी रुई देकर कहा–‘’इसे थोड़ी देर श्रीमूर्ति की नाक के नीचे लगाकर हाथ से पकड़े रहना। देखना कि श्रीमूर्ति में निःश्वास है या नहीं।’
पुजारी ने हँसते-हँसते रुई श्रीमूर्ति की नाक के नीचे लगा दी। देखा कि रुई में कम्पन होने लगा।
लालाबाबू के आनन्द की सीमा न रही। वे भावाविष्ट हो श्रीमूर्ति के सामने नाट्य-मन्दिर में लोट-पोट होने लगे।
एक दिन स्वप्न में श्रीकृष्णचन्द्र ने लाला बाबू से कहा–‘मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूँ। पर मुझे कुछ और भी भिक्षा चाहिये तुमसे।’
लालाबाबू ने चौंककर कहा–‘भिक्षा ? ऐसे क्यों कहते हो प्रभु ? आज्ञा करो न तुम्हारी और क्या सेवा करनी है मुझे ?’
‛जानते नहीं लालाबाबू ! मैं जन्म का भिखारी हूँ ? घर-घर भिक्षा माँगता डोलता हूँ ? मेरे लिए एक और मन्दिर का निर्माण करना है तुम्हें।’
‛एक और मन्दिर ? मैं तो सर्वस्व दानकर चुका हूँ प्रभु। मेरे पास अब बचा ही क्या है नये मन्दिर के लिए ? घर से अपने हिस्से के जो २५ लाख रुपये मँगाये थे, उसमें से तो अब कुछ भी नहीं बचा है।’
‛मैं जिस मन्दिर की बात कह रहा हूँ उसका निर्माण साधक के पास जो कुछ है उसे सबको दे चुकने के बाद ही होता है। सर्वस्व दानकर चुकने के बाद भक्त अपने हृदय में जो मन्दिर बनाता है, वही मेरे रहने का प्रिय स्थान है। तुम हृदय की वेदी पर मेरे रहने योग्य ऐसे हो एक प्रेम-मन्दिर का निर्माण करो। मैं तुमसे यह भिक्षा लेने के लिए ही आज तुम्हारे द्वार पर खड़ा हूँ।’
‛तो प्रभु ! आप ही कृपाकर बतायें, इस हृदय को किस प्रकार बनाऊँ आपकी अवस्थिति के योग्य ?’
‛तुम ब्रजमण्डल के सब तीर्थों का दर्शन करो। उसके पश्चात् गोवर्धन में जाकर भजन करो।’
‛प्रभु ! मेरे द्वारा स्थापित इस श्रीमूर्ति में तो आप जाग्रत हो उठे हैं। इसे छोड़कर कैसे कहीं जाऊँ दयामय ?’
‛तुम समझते हो कि मेरा लीला-विलास तुम्हारे द्वारा स्थापित इस मूर्ति में ही निबद्ध है। वह तो सभी विग्रहों में रूपायित है। श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके पार्षद श्रीरूप-सनातन आदि ने जिन लीला स्थलों का ब्रज में अन्वेषण किया है, वे क्या तुम्हारे द्वारा स्थापित विग्रह से कम जाग्रत हैं ?’
लालाबाबू के सन्देह के लिए अब कोई स्थान न रहा। वे ब्रज के सभी तीर्थों का दर्शन करने के पश्चात् गोवर्धन में एक कच्ची गुफा के भीतर रहकर भजन करने लगे। नित्य प्रातः गोवर्धन की परिक्रमा करते। दिन भर भजन में रहते। सन्ध्या समय एक बार मधुकरी को जाते।
उस दिन, जब वे गोवर्धन की परिक्रमा कर रहे थे, मन्दिर का पुजारी बोला–‘बाबा ! आज आप मधुकरी को न जायें। मैं सन्ध्या समय का ठाकुर का भोग-प्रसाद आपको पहुँचा दूँगा।’
सन्ध्या समय घनघोर वृष्टि हुई। प्रसाद लेकर बाहर जाना सम्भव ही न रहा। रात्रि में भी देर तक वृष्टि होती रही। पुजारी बड़े संकट में पड़ गया। सोचने लगा–‘बाबा कब से भूखे प्रतीक्षा में बैठे होंगे !’ श
वृष्टि जब कम हुई, वह गया मन्दिर के भीतर। यह देखकर अवाक् रह गया कि जो थाल बाबा के लिए सजाकर रखा था ठाकुर के सामने, वह वहाँ नहीं है ! क्या हुआ ? कोई तो मन्दिर के भीतर गया नहीं। पर अब सोच-विचार का समय कहाँ। पुजारी ने एक दूसरे थाल में सजाया भोग-प्रसाद और चला गया बाबा के पास।
उसे देखते ही बाबा बोले–‘यह क्या पुजारी बाबा ? और क्या ले ? आये ? पहले का ही बहुत-सा बच रहा है। वह देखो।’
पुजारी मन्दिर के भोग का थाल और खाद्य सामग्री गुफा में रखा देखकर चौंक पड़ा–‘यह थाल यहाँ कहाँ से आया ? कौन दे गया ?’
‛यह आप क्या कह रहे हैं ? आप ही तो दे गये हैं !’
‛मैं दे गया हूँ। मैं शपथ खाकर कहता हूँ मैं तो वृष्टि के कारण मन्दिर से बाहर ही नहीं हो सका। दृष्टि कम होने पर गया मन्दिर के भीतर, तो देखा, वहाँ ना थाल है और ना थाल में रखी सामग्री। फिर दूसरे मिट्टी के थाल में, जो फलादि मन्दिर में थे, लेकर आया हूँ।’
यह सुन लालाबाबू का देह सात्विक प्रेम-विकारों से परिपूर्ण हो अचेतावस्था में भूमि पर पड़ गया। चेतना आने पर अश्रु-गद्गद कण्ठ से वे कहने लगे–‘हाय प्रभु ! इस अधम के लिए इतना कष्ट किया ! और यह पहचान भी न सका। पहचानता भी कैसे ? यदि आप पहचान में न आना चाहें, तो किसकी शक्ति हैं, जो आपको पहचान सके। आपने क्यों इतने छल के साथ कृपा की प्रभो ? कृपा की तो कृपा में कृपणता क्यों कृपा-सिन्धु ?’
मथुरा के कृष्णदास बाबाजी की उन दिनों सिद्ध महात्मा के रूप में बड़ी ख्याति थी। उनका भक्तमाल का बँगला अनुवाद बँगला-भाषी लोगों में बहुत प्रिय था। लालाबाबू ने बहुत दिनों से मन ही मन उन्हें गुरुरूप में वरण कर रखा था।
उस दिन जब वे गोवर्धन-परिक्रमा के लिए गोवर्धन गये, तो उन्होंने उनके चरणों में गिरकर दीक्षा के लिए प्रार्थना की। वे बोले–‘मैं तुम्हें दीक्षा दूँगा। पर अभी समय नहीं हुआ है। तुम्हारे विषयी जीवन के सूक्ष्म संस्कार अभी कुछ शेष हैं। उन्हें तीव्र वैराग्य की अग्नि में भस्म करना होगा। उपयुक्त समय पर मैं स्वयं ही आकर तुम्हें दीक्षा दूँगा। तुम्हें मेरे पास आने की आवश्यकता नहीं।’
कुछ दिनों के लिए कौपीन कन्थाघारी लालाबाबू वृन्दावन जाकर रहने लगे। उनका वैराग्य और भजन दिनों-दिन बढ़ता गया। दिन भर भजन में रहते। सन्ध्या समय एक बार मधुकरी को जाते। बहुत दिन हो गये इस प्रकार पूर्ण वैराग्यमय जीवन व्यतीत करते-करते। पर गुरुदेव की कृपा फिर भी न हुई।
वे सोचने लगे कि उनमें कौन-सा ऐसा दोष है, जिसके कारण वे गुरुदेव की कृपा से अब तक वंचित हैं। एकाएक मन में आया–‘मैंने सारे ऐश्वर्य का त्याग कर कंगाल वेश तो धारण किया है, पर क्या मैं अपने अभिमान का पूर्ण रूप से त्याग कर पाया हूँ ? मैं मधुकरी के लिए कितने मन्दिरों और कुञ्जों में जाता हूँ; पर उस सेठ के कुञ्ज की ओर क्या मेरे पैर कभी बढ़े हैं ?’
रंगजी के विशाल मन्दिर के निर्माता सेठ लक्ष्मीचन्दजी लालाबाबू के प्रतिद्वन्द्वी थे। मन्दिर निर्माण, साधु-वैष्णव-सेवा और दान-दक्षिणा आदि में उनसे बराबर होड़ लगी रहती थी। जमीन-जायदाद को लेकर उनसे मुकदमा भी चल चुका था, जिसमें उनकी हार हुई थी। उनके प्रति पहले का द्वेष, सूक्ष्मरूप में अब भी बना हुआ था। यही कारण था कि लालाबाबू के पैर उधर नहीं पड़ते थे।
एक दिन रंगजी के मन्दिर में भिखारियों की बड़ी भीड़ थी। भीड़ में कन्धे पर भिक्षा की झोली डाले एक कनक कान्तिपूर्ण दीर्घ देहधारी भिखारी भी था। वह करताल बजा-बजाकर उच्च स्वर से कृष्णनाम कीर्तन कर रहा था। उसे पहचानते किसी को देर न लगी। तुरन्त दरबान ने सेठजी से जा कहा–‘लालाबाबू आपके द्वार पर भिक्षा के लिए खड़े हैं।’
सेठजी यह सुनकर चकित स्तम्भित रह गये। कुछ ही देर में वे स्वयं बाहर आये एक थाल में दाल, चावल, फल-मूल और सौ. अशर्फियाँ लेकर। लालाबाबू के सामने आदर पूर्वक मस्तक झुकाकर बोले–‘बाबूजी, आपके पदार्पण से आज इस दीन की कुटी पवित्र हुई। कृपाकर भिक्षा में यह थाल ग्रहण करें, जिससे मैं कृतार्थ होऊँ।’
लालाबाबू ने उत्तर दिया–‘मैं तो भिक्षा के लिए आया था सेठजी। आप जो दे रहे हैं यह तो भिक्षा नहीं।’
‛आपने ठीक समझा। यह भिक्षा नहीं है। मेरी क्या सामर्थ्य जो आपको भिक्षा दे सकूँ। आप राजा हैं, राजा-भिखारी होकर आपने मुझे पराजित कर दिया हैं। आपसे यह मेरी दूसरी पराजय है। इसलिए यह नजराना है।’
‛यह नहीं हो सकता, सेठजी कंगाल तो सदा कंगाल है। आपका यह थाल स्पर्श करने योग्य मैं नहीं हूँ। इसमें से एक मुट्ठी चावल मेरी झोली में डाल दें। इसके अतिरिक्त एक और भिक्षा देने की कृपा करें। जाने-अनजाने यदि मुझसे कभी कोई अपराध बन गया हो आपके चरणोंमें, तो क्षमा करें और आशीर्वाद दें, जिससे श्रीकृष्ण-भक्ति मेरे हृदय में उदित हो।’
लालाबाबू के इतना कहते ही दोनों ने एक दूसरे को अपनी बाँहों में भरकर एक दूसरे को प्रेमाश्रुओं से अभिषिक्त कर दिया।
लाला बाबू रङ्गजी के मन्दिर से अपनी भजन-कुटी को लौट रहे थे। उसी समय पथ में प्रसन्न मुद्रा में आते दीखे महात्मा कृष्णदास। भक्ति-पूर्वक उन्हें प्रणाम कर जैसे ही उठे, महात्मा ने प्रेम पूर्वक उन्हें आलिंगन कर लिया और कहा–‘लाला ! अब समय हो गया है तुम्हारी दीक्षा का।
शुभ लग्न में लालाबाबू की दीक्षा हो गयी। दीक्षा के उपरान्त उपदेश देते हुए गुरुदेव ने कहा–‘अब गोवर्धन में उसी गुफा में जाकर निरन्तर भजन करो। गुफा से तब तक न निकलना जब तक अभीष्ट की प्राप्ति न हो जाय। इस बीच किसी मनुष्य का मुख भी न देखना।’
लालाबाबू आशानुसार रात-दिन गुफा में रहकर भजन करने लगे। कई वर्ष बाद उन्हें इष्टदेव के दर्शन हुए। उनकी दिव्य लीलाओं के भी दर्शन उन्हें होने लगे। उनकी निभृत तपस्या का अन्त हुआ। व्रजमण्डल के सिद्ध महात्मा के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन करने आने लगे।
एक बार सिंधिया महाराज व्रज गये वहाँ के तीर्थों के दर्शन करने के उद्देश्य से। वे जहाँ भी गये वहाँ उन्होंने प्रशंसा सुनी लालाबाबू के असाधारण त्याग, वैराग्य, भक्ति-भाव और परमार्थ में उनकी असाधारण उपलब्धियों की। उनके हृदय में उत्कण्ठा जागी उनसे दीक्षा लेने की। वे सदलबल गोवर्धन पहुँचे। लालाबाबू के सामने प्रणत हो उनसे दीक्षा के लिए प्रार्थना की।
उन्होंने कहा–‘महाराज ! यदि भगवान् को पाना चाहते हैं, तो केवल दीक्षा से कुछ न होगा। उन्हें पाने के लिए दोनों हाथ बढ़ाने होगे। एक हाथ से संसार को पकड़े रहेंगे, दूसरे से उनके चरण स्पर्श करना चाहेंगे, तो उनके चरणों की प्राप्ति कभी न होगी। आप दोनों हाथ बढ़ाने को तैयार हैं क्या ?’
सिंधिया महाराज तो दोनों हाथ बढ़ाने को तैयार थे नहीं। उन्होंने कहा–‘आप ठीक कहते हैं महाराज यह पथ सबके लिए नहीं है। इसके लिए चाहिये पूर्वजन्म की साधना और सुकृति।’ इतना कह वे लालाबाबू के चरणों में प्रणाम कर गोवर्धन चले गये।
इसी प्रकार जो भी व्रज में आता, लालाबाबू की प्रशंसा सुन उनके दर्शन अवश्य करता। उनकी गुफा के सामने इतनी भीड़ होने लगी कि उन्होंने चुपचाप किसी निर्जन स्थान में चले जाने का निश्चय किया।
अर्धरात्रि में अपनी गुफा से वे चल पड़े। उसी समय ग्वालियर से कुछ अश्वारोही आ रहे थे उनके दर्शन करने। दुर्भाग्य से रात्रि के अँधियारे में एक घोड़े के खुर से उनका पैर कुचल गया। कुछ ही दिनों में घाव ने असाधारण रूप धारण कर लिया।
भक्त लोग उन्हें वृन्दावन के मन्दिर में ले गये। बहुत दिनों तक चिकित्सा चलती रही। पर कोई लाभ न हुआ। भक्तों ने प्रश्न किया–‘प्रभु ! आपके प्राणप्रिय विग्रह श्रीकृष्णचन्द्र के सान्निध्य में भी आपको इतना कष्ट ! ऐसा क्यों ?’
रोगाक्रान्त लालाबाबू का मुखारविन्द एक अपूर्व आनन्द-किरण से मुकुलित हो उठा।
उन्होंने कहा–‘तुमने तो मेरे प्रभु का दिया यह दुःख हो देखा है। तुमने कब देखा है उनका दिया वह दिव्य आलोक, जो सदा मेरे हृदय में झलमल करता रहता है, जिसमें श्रीकृष्णचन्द्र और राधारानी का सुमधुर लीला-विलास चलता रहता है ? कौन-सा पलड़ा भारी है–दुःख का या आनन्द का ??’
धीरे-धीरे महाभागवत लालाबाबू की जीवन-धारा क्षीण पड़ने लगी। उनके इङ्गित पर लोग उन्हें ले गये यमुना तटपर। वहाँ युगल की प्रेममयी लीला का दर्शन करते-करते उन्होंने लीला में प्रवेश किया।

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श्री हरिवंश महाप्रभु जीवन परिचय

श्री श्यामाश्याम की नित्य निभृत निकुंज लीला का रस अनवरत बरस रहा है। एक समय श्री श्यामा जू की प्रधान सखी श्री ललिता जू ने विचार किया की “यह दिव्य मधुर रस धरा धाम पर मनुष्य मात्र के लिए कैसे सुलभ हो।” ऐसा विचार कर श्री ललिता जू ने महारास के मध्य श्री स्वामिनी जू की ओर प्रार्थनामयि दृष्टि से देखा। श्री श्यामा जू ने श्री श्यामसुंदर की ओर मधुर चितवन भरी दृष्टि से देखा तो श्री श्यामसुंदर श्री श्यामा जू के हृदय की बात समझ गए और प्रेमरस रसास्वादन कराने वाली अपनी वंशी को श्री श्यामा जू के कर कमलों में दे दिया।

प्यारी जू ने वंशी को ललिता जू को दिया और कहा “हे ललिते, आप और ये वंशी दोनों मिलकर हमारे नित्य विहार रस को प्रकाशित करो।” प्यारी जू की वह वंशी श्री हित हरिवंश महाप्रभु के रूप में ब्रज मंडल में श्री राधारानी के ग्राम रावल के निकट बाद ग्राम में प्रकट हुई और तीनो लोकों में इस दिव्य मधुर नित्य विहार रस का विस्तार किया। श्री ललिता जू श्री स्वामी हरिदास जू के रूप में वृन्दावन के राजपुर ग्राम में प्रकट हुए।


व्यासनंदन व्यासनंदन व्यासनंदन गाइये, जाको हित नाम लेत दम्पति रति पाइये ॥

रास मध्य ललितादिक प्रार्थना जू किन्हीं ।, कर ते सुकुमारी प्यारी वंशी तब दीन्हीं ॥

सोइ कलि प्रगट रूप वंशी वपु धार्यौ, कुञ्ज भवन रास रवन त्रिभुवन विस्तार्यौ ॥

गोकुल रावल सु ठाम बाद निकट राजे ।, विदित प्रेमरासि जनम रसिकन हित काजे ॥

तिनको पिय नाम सहित मन्त्र दियौ श्री राधे, सत-चित-आनंद रूप निगम अगम साधे ॥

श्री वृन्दावन धाम तरणि जासु तीर वासी ।, श्री राधापति रति अनन्य करत नित खवासी ॥

अद्भुत हरि जू को वंश भनत नाम श्यामा ।, जय श्री रूपलाल हित चित दै पायौ विश्रामा ॥

– श्री हित रूपलाल जी


उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में एक ग्राम है देववन, जहाँ श्री तपन मिश्र के पुत्र, ज्योतिष के परम विद्वान्, यजुर्वेदीय, कश्यप गोत्रीय, गौड़ ब्राह्मण श्री व्यास मिश्र जी निवास करते थे ।

व्यास मिश्र जी उस समय के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे और इस विद्या के द्वारा उन्होंने प्रचुर संपत्ति प्राप्त की थी। धीरे-धीरे उनकी ख्याति तत्कालीन पृथ्वीपति के कानों तक पहुँची और उसने बहुत आदर सहित व्यास मिश्र जी को बुला भेजा। व्यास मिश्र बादशाह से चार श्रीफल लेकर मिले। बादशाह उनसे बातचीत करके उनके गुणों पर मुग्ध हो गया और उनको ‘चार हजारी की निधि’ देकर सदैव अपने साथ रखने लगा। व्यास मिश्र की समृद्धि का अब कोई ठिकाना नहीं रहा और वे राजसी ठाट-बाट से रहने लगे।

व्यास मिश्र के पूर्ण सुखी जीवन में एक ही प्रबल अभाव था वे निस्संतान थे इस अभाव के कारण वे एवं उनकी पत्नी तारारानी सदैव उदास रहते। व्यास मिश्र जी बारह भाई थे जिनमें एक नृसिंहाश्रम जी विरक्त थे। नृसिंहाश्रम जी उच्चकोटि के भक्त थे, एवं लोक में उनकी सिद्धता की अनेक कथायें प्रचलित थीं। विरक्त होते हुए भी इनका व्यास जी से स्नेह था और कभी-कभी यह उनसे मिलने आया करते थे। एक बार मिश्र-दंपति को समृद्धि में भी उदास देख कर उन्होंने इसका कारण पूछा। व्यास मिश्र ने अपनी संतान हीनता को उदासी का कारण बताया और नृसिंहाश्रम जी के सामने ‘परम भागवत रसिक अनन्य’ पुत्र प्राप्त करने की अपनी तीव्र अभिलाषा प्रगट की। नृसिंहाश्रम जी ने उत्तर दिया “भाई, तुम तो स्वयं ज्योतिषी हो तुमको अपने जन्माक्षरों से अपने भाग्य की गति को समझ लेना चाहिये और संतोष-पूर्ण जीवनयापन करना चाहिये।”

यह सुनकर व्यास मित्र तो चुप हो गए, किन्तु उनकी पत्नी ने दृढ़ता-पूर्वक पूछा “यदि सब कुछ भाग्य का ही किया होता है, यदि विधि का बनाया विधान ही सत्य है, तो इसमें आपकी महिमा क्या रही ?” इस बार नृसिंहाश्रम जी उत्तर न दे सके और विचारमग्न होकर वहाँ से चले गये। एकान्त वन में जाकर उन्होंने अपने इष्ट का आराधन किया और उनसे व्यास मिश्र की मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना की। रात्रि को स्वप्न में प्रभु ने

उनको सन्देश दिया कि “तुम्हारे सत्संकल्प को पूर्ण करने के लिये स्वयं हरि अपनी वंशी सहित व्यास मिश्र के घर में प्रगट होंगे।”

नृसिंहाश्रम जी ने यह सन्देश व्यास मिश्र को सुना दिया और इसको सुनकर मिश्र-दम्पति के आनन्द का ठिकाना नही रहा..!!

बादशाह व्यास मिश्र जी को सर्वत्र अपने साथ तो रखता ही था। श्री हित हरिवंश के जन्म के समय भी व्यास मिश्र अपनी पत्नी सहित बादशाह के साथ थे और ब्रजभूमि में ठहरे थे। वहीं मथुरा से 5 मील दूर ‘बाद’ नामक ग्राम में वैशाख शुक्ला एकादशी सोमवार सम्वत 1559 में अरुणोदय काल में श्रीहित हरिवंश का जन्म हुआ। महापुरुषों के साथ साधारणतया जो मांगलिकता संसार में प्रगट होती है, वह श्री हित हरिवंश के जन्म के साथ भी हुई और सब लोगों में अनायास धार्मिक रुचि, पारस्परिक प्रीति एवं सुख-शान्ति का संचार हो गया। ब्रज के वन हरे-भरे हो गए, लताओं में पुष्प खिलने लगे, सूखे सरोवर जल से भर गए, वातावरण में सुगन्धि व्याप्त हो गयी, आकाश में बिजली चमकने लगी, हलकी हलकी बारिश की बूंदे गिरने लगी, वातावरण सुहावना हो गया, ब्रजवासियों के हृदय अकस्मात ही प्रेम एवं हर्ष से भर गए, पक्षीगण मधुर कलरव करने लगे, मोर नृत्य करने लगे।

जब श्री हिताचार्य 6 मास के थे तब उनके मुख से संस्कृत के श्लोक उद्धृत होने लगे, जिसे वहां उपस्थित श्री नृसिंहाश्रम जी ने श्रवण किया। वह कोई साधारण श्लोक नहीं थे, अपितु श्री श्यामाश्याम की दिव्य निकुंज लीला से सम्बंधित थे। ऐसा बहुत दिनों तक होता रहा और जब श्लोकों की संख्या 270 पहुंची तो श्री हिताचार्य के मुख से श्लोक उद्धृत होना बंद हो गया। उन समस्त 270 श्लोकों को श्री नृसिंहाश्रम जी ने ग्रन्थ में लिपिबद्ध कर लिया जिसका नाम “श्री राधासुधानिधि” हुआ ।

श्री हित हरिवंश के पिता श्री व्यास जी ब्रज दर्शन के उद्देश्य से आये थे अतः उन्होंने ब्रज में छह महीने निवास कर दिव्य लीला स्थलों के दर्शन किये और देववन चले गये। नामकरण के समय ज्योतिषियों ने बतलाया था कि यह बालक अनेक अद्भुत कर्म करने वाला होगा। उनकी भविष्य वाणी बालक की जन्म कुण्डली पर आधारित थी अतः वह सम्पूर्णतः सत्य भी हुई। बालक हरिवंश के उन शैशव कालीन अनेक चमत्कार पूर्ण कार्यों का वर्णन रसिकजन प्रणीत अनेक चरित्र ग्रन्थों में मिलता है। श्री हिताचार्य को समवयस्क कुमारों के साथ साधारण बाल क्रीड़ा करते देखकर ज्ञानू नामक भक्त को ज्योतिषियों की बात पर अविश्वास होने लगा था अतः वह अपना सन्देह दूर करने के उद्देश्य से एक दिन बालक हरिवंश की परीक्षा लेने गया किन्तु उसे श्री हिताचार्य ने अपनी बाल क्रीड़ा में ही श्यामा-श्याम की कुंज केलि के प्रत्यक्ष दर्शन करा दिये और वह देह त्याग कर निकुंज महल में सम्प्रविष्ट हो गया।

एक दिन रात्रि में हित हरिवंश को श्रीजी ने आज्ञा दी कि “बाग़

में एक कुंआ है जिसमे हमारा एक द्विभुज स्वरुप है जो कर में बांसुरी लिए हुए हैं, उन्हें मेरी गादी संग स्थापित कर सेवा करो।”

दूसरे दिन श्री हरिवंश जी कुएँ में कूद पड़े और वहाँ से श्याम वर्ण द्विभुज मुरलीधारी एक श्री विग्रह निकालकर ले आये उन्होंने उस विग्रह को श्रीराधाजी की गद्दी के साथ एक नव निर्मित मन्दिर में विराजमान करके विधि निषेध शून्य अपनी मौलिक सेवा पद्धति का शुभारम्भ किया। बालक हरिवंश ने उस विग्रह का नाम ‘रंगीलाल’ रक्खा; जो अद्यापि देववन नगरस्थ मन्दिर में विराजमान है इस घटना का स्मारक वह कुंआ भी ‘हरिवंश चह’ के नाम से विख्यात आज भी देखा जाता है यह घटना तब की है जब श्री हिताचार्य की आयु सात वर्ष की थी..!!

श्री हिताचार्य को किन-किन विद्वानों से कब और किन-किन शास्त्रों की शिक्षा हुई यह अज्ञात है किन्तु इनके द्वारा विरचित ‘हित चौरासी’ और ‘स्फुट वाणी’ नामक ब्रजभाषा ग्रन्थ तथा ‘राधासुधानिधि’ एवं ‘यमुनाष्टक’ जैसी संस्कृत कृतियों से ज्ञात होता है कि उन्हें संस्कृत व्याकरण, साहित्य, संगीत, ज्योतिष तथा श्रुति पुराणादिकों की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त हुई होगी। उनकी चारों कृतियाँ ही इस तथ्य को प्रमाण बनाती हैं


रसिकों द्वारा विरचित चरित्र ग्रन्थों व वाणी ग्रन्थों के अनुसार श्री हिताचार्य को उनकी ईष्ट श्रीराधाजी ने मंत्र प्रदान किया था ।

एक दिवस सोवत सुख लह्यौ श्री राधे सुपने में कह्यौ ॥, द्वार तिहारे पीपर जो है । ऊँची डार सबनि में सोहै ॥

तामै अरुन पत्र इक न्यारौ । जामें जुगल मंत्र है भारौ ॥, लेहु मंत्र तुम करहु प्रकाश । रसिकजननि की पुजवहु आश ॥

श्री हित चरित्र, उत्तमदास जी, व्यासनंदन व्यासनंदन व्यासनंदन गाइये ।

तिनको पिय नाम सहित मन्त्र दियौ श्री राधे सत-चित-आनंद रूप निगम अगम साधे ॥

– श्री हित रूपलाल जी


स्वयं श्री हिताचार्य ने अपनी ‘राधासुधानिधि’ नामक रचना में अनेक स्थलों पर श्री राधा को अपनी इष्ट के साथ ही गुरु रूप में भी स्मरण किया है ।


यस्याः कदापि वसनाञ्चल खेलनोत्थ, धन्याति धन्य पवनेन कृतार्थ मानी ।, योगीन्द्र दुर्गम गतिर्मधुसूदनोपि, तस्या नमोस्तु वृषभानु भुवनोदिशेऽपि ॥

रहौ कोउ काहू मनहि दिए, मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा शपथ करौं तृण छिये ॥


एक दिन श्री हिताचार्य रात्रि में सो रहे थे, तब श्री राधा जी ने स्वप्न में आदेश दिया “तुम्हारे घर के सामने जो पीपल का वृक्ष है, उसकी सबसे ऊँची डाल पर एक अद्भुत अरुण पत्र है, उसमें हमारा युगल मन्त्र है, उसे ग्रहण कर उसका रसिकजनों में प्रकाश करो ।” इस आदेश को पाकर श्री हिताचार्य ने सुबह उस अरुण पत्र को पीपल वृक्ष की डाल से उतार कर उसका रसिकजनों में प्रकाश किया ।

जब श्री हिताचार्य देववन में निवास करते थे, तब श्री राधा ने स्वयं प्रकट होकर श्री हिताचार्य को “हित” छाप प्रदान किया था। तभी से श्री हिताचार्य का नाम हित हरिवंश हो गया। “हित” का अर्थ है प्रेम ।


रसमय करे चरित परशंश । जगगुरु विदित श्री हरिवंश ॥, श्री राधा अनुग्रह कियौ श्री मुख मंत्र निजु कर दियौ ॥

दयिता कृष्ण जिनके इष्ट । पुनि गुरु भाव प्रीति गरिष्ट ॥, दीनी रीझ हित की छाप । ता करि बढ्यौ भक्ति प्रताप ॥

– चाचा वृन्दावन दास जी


आठ वर्ष की आयु में श्री हिताचार्य जी का उपनयन संस्कार हुआ। इस आयु मे इनकी बुद्धि सामान्य बालकों से कहीं अधिक तीव्र और धारणाशक्ति चमत्कारी थी। इन्होंने अपने स्नेह और सौजन्य से शैशव में ही अपने चारो ओर अच्छा-खासा सखा – मण्डल स्थापित कर लिया था। इन बाल-सखाओं के साथ इनकी क्रीडाएँ असाधारण होती थी। प्रायः भगवद्भक्ति के आश्रित ही कोई न कोई खेल यह खेलते थे। ठाकुर जी की सेवा-पूजा करने की ओर भी इनकी नैसर्गिक रुचि थी और इन्होंने महाप्रसाद का माहात्म्य का शैशव अवस्था में ही अपने बाल सखाओं के समक्ष वर्णन किया था। एकादशी व्रत के प्रति इनका विलक्षण भाव इसी आयु में व्यक्त हो गया था। शनै शनै अपनी अनन्य भावना और सेवा-पूजा के कारण इनकी ख्याति समीपवर्ती प्रदेश में भी हुई और इनके पास रसपिपासुओं का आगमन होना प्रारम्भ हुआ। इस आयु में इन्होंने जो चमत्कार किए उनका वर्णन साम्प्रदायिक वाणी-ग्रंथों में भरा पड़ा है।

सोलह वर्ष की आयु में श्री हिताचार्य जी का विवाह रुक्मिणी देवी के साथ सम्पन्न हुआ। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर भी इन्होंने अपनी धार्मिक निष्ठा में परिवर्तन नही किया। गृहस्थाश्रम के समस्त कर्त्तव्यों का पालन करते हुये ये सच्चे रूप में भक्त और सन्त बने रहे। इस जीवन के प्रति इनके मन मे न तो वैराग्य भावना थी और न इसके प्रति किसी प्रकार का हीन भाव ही ये रखते थे। इनका दाम्पत्य-जीवन सुखी-सम्पन्न और आदर्श था। सर्व प्रकार के ऐश्वर्य एवं भोगविलास की सामग्री इनके पास थी किन्तु इनकी भावना में उसके लिये किसी प्रकार की आसक्ति न होने से उसको लेकर ये कभी व्यग्र, विचलित या लिप्त न होते थे।

श्रीमती रुक्मिणी देवी से श्री हिताचार्य के एक पुत्री और तीन पुत्र उत्पन्न हुए। ज्येष्ठ पुत्र श्री वनचंद्रजी स० 1585, द्वितीय पुत्र श्री कृष्णचंद्रजी संवत् 1587, तृतीय पुत्र श्री गोपीनाथजी सवत् 1588 तथा पुत्री साहिब दे सम्वत् 1589 मे उत्पन्न हुई। श्री हरिवंशजी की माता तारारानी का 1589 में तथा पिता श्री व्यास मिश्र का निकुंजगमन 1590 सम्वत् में हुआ। माता-पिता की मृत्यु के उपरान्त श्री हरिवंशजी के मन में यह भाव आया कि किसी प्रकार भगवान् की लीलास्थली में जाकर वहाँ की रसमयी भक्ति-पद्धति में लीन होकर जीवन सफल करें। उसी समय इनकी ख्याति से प्रभावित होकर तत्कालीन राजा ने इनको अपने दरबार में बुलाने के लिये सादर निमंत्रण भेजा किन्तु इन्होंने अपने अन्तर्मन में भगवान् की लीलाभूमि का निमंत्रण स्वीकार कर लिया था इसलिये राजा के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया और एक श्लोक में यह उत्तर भिजवा दिया कि सृष्टि के आदि से नरेन्द्र-सुरेन्द्र, ब्रह्मा आदि कालग्रसित होते आये हैं अतः हरिचरण में लीन होकर उनका ही ध्यान करना अभीष्ट है।

बत्तीस वर्ष की आयु में श्रीराधा जी ने श्री हित हरिवंश को श्री वृन्दावन-वास एवं धर्म-प्रचार की आज्ञा दी। इस आज्ञा के प्राप्त होते ही श्री हित जी वृन्दावन चल दिए। उन्होंने चलते समय रुक्मिणी जी से साथ चलने को कहा किन्तु वे साथ न आ सकी।

देववन से प्रस्थान के बाद मार्ग में इनको श्री राधा के स्वप्न में दर्शन हुये और उन्होने इनसे कहा कि “आगे एक चिरथावल नाम का गाँव तुम्हारे मार्ग में पड़ेगा, उस गांव में यदि कोई ब्राह्मण अपनी दो कन्याओं का तुम से विवाह करना चाहे तो तुम उसे स्वीकार कर लेना। यह विवाह तुम्हारे भक्ति-पथ मे किसी प्रकार का अन्तराय उत्पन्न करने वाला न होगा। इस विवाह के द्वारा तुम दाम्पत्य जीवन का आदर्श प्रतिष्ठित करोगे।” साथ ही यह भी उस स्वप्न मे उन्हें राधाजी ने कहा कि “मेरा एक विग्रह (राधावल्लभजी के रूप मे ) तुम्हे मिलेगा जिसे तुम वृन्दावन मे ले जाकर मंदिर में विधिवत् स्थापित करना।”

ऐसा ही स्वप्न आत्मदेव नामक ब्राह्मण को भी हुआ जो उसी चिरथावल गाँव का रहने वाला था। इस स्वप्न के बाद श्री हरिवंश जी अपने यात्रा पथ में अग्रसर हुये और उस गाँव मे (चिरथावल) पहुँचे जिसमें आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था। उसके दो नवयुवती कन्याएँ थी और पूर्व दृष्ट स्वप्न के आधार पर वह श्री हरिवंशजी के आगमन की सतत प्रतीक्षा कर रहा था। उनके आते ही उसने अपनी दोनों कन्याओं का पाणिग्रहण करने के लिये हरिवंशजी से प्रार्थना की जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार किया इन कन्यायों के नाम कृष्णदासी और मनोहरीदासी थे। चिरथावल गाँव में कुछ समय तक ठहर कर फिर श्री हरिवंश जी ने अपनी यांत्रा प्रारम्भ की और सम्वत् 1590 को फाल्गुन की एकादशी को वृन्दावन पहुंचे। यहाँ पहुँचने पर मदनटेर नामक स्थान पर विश्राम के लिये डेरा डाला। यह स्थान आज भी वृन्दावन प्रसिद्ध है। वहीँ श्री हिताचार्य ने श्री राधावल्लभ के लिए लता-कुञ्ज निर्माण कर उन्हें स्थापित किया और सेवा प्रारम्भ की..!!

श्री हिताचार्य जिस समय वृन्दावन में आये उस समय वह लता पुंजाकार दल फल और फूलों से परिपूर्ण एक सघन कुंज के रूप में था। यह लता पुंजाकार वृन्दावन शुक पिक-सारस हंस आदि पक्षियों के कलरव से मुखरित और चारों ओर यमुना से समावृत्त था। कहीं-कहीं यमुना तटस्थ ऊँचे टीलों पर यमुना स्नान हेतु आये हुए ब्रजवासीगण अवश्य दिखाई देते थे। समागत श्री हिताचार्य के द्वारा यह ज्ञात होने पर कि इस सघन निर्जन वन में हम निवास करेंगे, उन सभी ब्रजवासियों को अत्यधिक विस्मय और हार्दिक प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्री हिताचार्य के हाथ में तीर कमान देते हुए कहा कि “गुसाईं जी आप तीर चलाइये, आपका तीर जहाँ तक पहुँचेगा वहाँ तक की भूमि आपकी होगी।”

यह श्री हिताचार्य का मधुर प्रभाव ही था कि इन बटमार वृत्ति वाले ब्रजवासियों के चित्तों का पूर्ण परिवर्तन हो गया और वे पंचकोसी वृन्दावन श्री हिताचार्य को भूमि प्रदान करने के लिये तैयार हो गये। ब्रजवासियों के कहने पर श्री हिताचार्य नें एक तीर छोड़ा और वह पर्याप्त दूरी पर जाकर गिरा। श्री हिताचार्य ने जहाँ से तीर फेंका, अपना निवासालय उसी स्थान को बनाया और जहाँ पर वह तीर गिरा, कालान्तर में वह स्थान ‘तीर घाट’ और बाद में ‘चीर घाट’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। श्री हिताचार्य के दिव्य स्वरूप पर मुग्ध होकर ब्रजवासी दर्शनार्थ आने लगे और शीघ्र ही समीपवर्ती गाँवो में इनके आगमन का समाचार फैल गया।

जब श्री हिताचार्य वृन्दावन आये तब उस समय वृन्दावन घनघोर जंगल था। वहां एक नरवाहन नाम का डाकू रहता था जिसके भय से वहां दिन में भी कोई न आता। उसने अपनी शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण ब्रज प्रदेश पर अपना अधिकार ही बना लिया था । उसकी इस शक्ति से बड़े-बड़े राजे महाराजे भी डरते थे यहाँ तक कि दिल्लीश्वर का भी इस नरवाहन पर कोई नियन्त्रण नहीं था। जब नरवाहन को अपने गुप्तचरों द्वारा यह ज्ञात हुआ कि कोई ऐसा चमत्कारी महापुरुष हिंसक जन्तुओं से संसेवित निर्जन वन में आया है; जिसके मधुर प्रभाव से हिंसक जन्तु तथा निर्जन वन के परिसर में बसे बटमारों के मन-बुद्धि और चित्त बदल गये हैं और वे सब उस महापुरुष की सेवा सुश्रुषा में निरत हो गये हैं; तो कुतूहल देखने की दृष्टि से एक दिन नरवाहन भी श्री हिताचार्य के निवास स्थान पर आया। उस समय श्री हिताचार्य अपने शिष्यों तथा ब्रजवासियों से समावृत्त थे और ‘नवल’ नामक शिष्य के साथ कुछ आलाप संलाप कर रहे थे। नरवाहन भी श्री हिताचार्य के मधुर प्रभाव से अछूता न रह सका। वार्तालाप सुनकर उसे अपनी वृत्ति पर बहुत खेद हुआ। उसने अपना हार्दिक दुख प्रकट करते हुए श्री हिताचार्य से स्वयं को शरण में लेने की प्रार्थना की।

श्री हिताचार्य ने उसकी निष्कपट वाणी सुनकर मन्त्रदान के साथ-साथ उपदेश भी दिये जिससे उसके जीवन का आमूलचूल परिवर्तन हो गया। नरवाहन जैसे खूँखार डाकू के जीवन के इस परिवर्तन से पंचकोसी वृन्दावन में निवास करना सबके लिए सुगम हो गया। फलतः बृहद वृन्दावनस्थ ब्रज के नन्दग्राम, बरसाना, राधाकुंड और संकेत आदि ग्रामों में बसे हुए सन्तजन श्री हिताचार्य द्वारा प्रकटित इस पंचकोसी रासस्थल वृन्दावन में निवास करने लगे। इससे पूर्व सभी भक्तगण इस पंचकोसी वृन्दावन से अपरिचित ही थे।

श्री हिताचार्य ने जिस स्थान से तीर फेंका था उसी स्थान पर लता विनिर्मित मन्दिर या पर्ण कुटी में श्री राधाबल्लभलाल जी को विराजमान कर दिया और अपने निवास के लिए किसी प्रकार का निवासालय बनाकर श्री राधाबल्लभलाल जी की अष्टयामी सेवा करने लगे। वे इस पर्ण विनिर्मित मन्दिर में उस समय तक सेवा करते रहे जब तक नरवाहन द्वारा नवीन मन्दिर का निर्माण नहीं हुआ था। नरवाहन ने श्री राधाबल्लभलाल जी का नवीन मन्दिर उसी स्थान पर बनवाया था, जहाँ पर श्री हिताचार्य सपरिवार निवास करते थे। नवीन मन्दिर निर्माण हो जाने पर वि. सं. 1591 की कार्तिक शुक्ल तेरस को श्री हिताचार्य ने श्री राधाबल्लभलाल जी को उसमें विराजमान किया और विशेष समारोह के साथ पाटोत्सव मनाया। अनेक संतगण गोकुल, गोवर्धन, नंदगाव और बरसाने में निवास करते थे। उस समय गोवर्धन, नंदगाव और बरसाना भी वृहद् वृन्दावन था। श्री हरिवंश जी ने यहाँ अनेक लीला स्थलियों को प्रकट किया और वृन्दावन की सीमा पंचकोसी निर्धारित की। उसी दिन से आज भी वृन्दावन प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है..!!


रहें भौगाँव नांव नरबाहन साधुसेवी, लूटि लई नाव, जाकी बन्दीखानै दियौ है ।

लौंड़ी आवै न कछू, खायवे को, आई दया, अति अकुलाई लै, उपाय यह किया है ॥

बोलौ राधवल्लभ औ, लेवौ हरिवंश नाम, पूछे शिष्य नाम कहौ, पूछी नाम लियौ है ।

दई मँगवाय वस्तु, राखियो दुराय बात, आय दास भयौ, कही रीझि पद दियौ है ॥

– श्री भक्तमाल (419)


श्री “नरवाहन” जी श्रीहरिवंशजी के शिष्य हो गए थे, परम संतसेवी बन गए थे, वे “भैगाँव” में रहते थे। वे ब्रज के एक जमींदार थे और लुटेरे भी। एक दिन कोई सेठ लाखों की संपदा नाव में भरे यमुना जी के मार्ग से जा रहा था, नरवाहन ने संतसेवा के लिये सब लूट लिया, और उस सेठ को कारागार (बन्दीघर) में डाल दिया। उस वणिक (सेठ) को भोजन देने एक टहलनी कारागार में जाती थी, सेठ की दुर्दशा देखकर उस टहलनी के हृदय में बड़ी दया आई, तब बहुत अकुला के उसको एक उपाय बताया कि “तुम बड़े ऊँचे स्वर से “राधावल्लभ श्रीहरिवंश !” यह नाम जपो, जब पूछा जाय, तब कहना कि श्रीहरिवंश जी का शिष्य हूँ ।”

उस सेठ ने ऐसा ही किया और उच्च स्वर से “राधावल्लभ श्रीहरिवंश” नाम रटने लगा। जब श्रीनरवाहनजी ने यह सुना तो उस सेठ के पास गए और पूछा कि “तुम यह नाम क्यों जपते हो?” उस सेठ ने कहा “मैं श्रीहरिवंशजी का शिष्य हूँ।” राजा नरवाहन बड़े ही गुरुनिष्ठ थे । सुनते ही उस सेठ को मुक्त कर दिया और धन देकर कहा कि “श्रीगुसाईंजी से यह बात नहीं कहना।” वह सेठ शीघ्र ही श्रीवृन्दावन जाकर श्रीहित हरिवंशजी का शिष्य हो गया, और अपना वृत्तान्त भी सुनाया “नरवाहन जी ने लाखों का धन लेकर मुझे कारागार में डाल दिया सो मैंने आपका नाम लिया और झूठ ही कहा कि “आपका शिष्य हूँ, यह सुनते ही नरवाहन जी ने मुझे मुक्त कर दिया और मेरा सम्पूर्ण धन देकर मुझे घर भेज दिया।”

सुनकर प्रसन्न हो श्री गुसाईंजी ने दोनों को प्रभुपद प्रेम प्रदान किया। श्रीनरवाहन जी की गुरुभक्ति पर रीझकर इन्हीं की छाप देकर श्री हरिवंश जी ने दो पद बनाकर अपनी “चौरासी” ग्रन्थ में रख लिया और श्री नरवाहन जी को नित्य विहार रस का साक्षात्कार करा दिया।

श्री हिताचार्य के परमोपास्य षटैश्वर्य सम्पन्न भगवान नहीं थे; प्रत्युत कोटि ब्रह्म ऐश्वर्य के परकोटे के अन्तर्गत किन्तु उससे दूर पूर्ण माधुर्य मूर्ति, रस-रसिक, अद्वय युगल किशोर थे। भगवान की सेवा पूजा वैदिक विधान द्वारा ही संविधेय होती है किन्तु माधुर्य मूर्ति, ‘प्रेम’ किंवा ‘रस’ विग्रह श्री राधावल्लभलाल जी की सेवा प्रीति-विधान से ही सम्भव थी अतः श्री हिताचार्य ने अपने स्नेह भाजन श्रीराधाबल्लभलाल जी का अहर्निशि समयानुरूप अनेक प्रकार से लाड़-दुलार प्यार किया। इस लाड़-प्यार को ही उन्होंने सात भोग और पाँच आरती वाली विधि निषेध शून्य ‘अष्टयामी सेवा’ तथा वर्ष में आने वाले ऋतु उत्सवों [वसन्त, होली, होरीडोल, जलबिहार, पावस, झूला आदि) की ‘उत्सविक सेवा’ का सुरम्य रूप प्रदान किया, साथ ही अपने आचरणों एवं वाणी द्वारा दैनिक स्वेष्ट की मानसी सेवा करने का भी मूर्त विधान दिया।

श्री हिताचार्य ने ऐसे वृन्दावन का प्रागट्य किया था जोकि भूतलस्थ होते हुए भी ‘देवानामथ भक्त-मुक्त’ और श्री कृष्ण लीला परिकर के लिए भी दुर्लक्ष्य था। इसीलिए यह वृन्दावन परम रहस्य संज्ञक बना रहा और बना रहेगा। ऐसे वृन्दावन में होने वाली लीलायें और लीला स्थलों का प्रागट्य भी अनेक दृष्टियों से अनिवार्य था। अतः श्री हिताचार्य ने उन लीला स्थलों का भी प्रागट्य किया जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवत आदि पुराणों में नहीं है। इन लीला स्थलों का प्रागट्य ही पंचकोसी वृन्दावन का प्रागट्य है और जो रहस्य रूप वृन्दावन के परिचय प्रदाता तथा प्रत्यक्ष प्रतीक हैं। पंचकोसी वृन्दावन में उनके द्वारा प्रकटित लीला स्थल हैं- रासमण्डल, सेवाकुंज, वंशीवट, धीरसमीर, मानसरोवर, हिंडोल स्थल, शृंगारवट और वन विहार


नमो जयति जमुना वृन्दावन ।

नमो निकुंज कुंज सेवा, हित मण्डल रास, डोल, आनंदघन ॥

नमो पुलिन वंशीवट, रसमय धीरसमीर, सुभग भुव खेलन ।

नमो-नमो जै मानसरोवर सुख उपजावन दंपति के मन ॥

नमो-नमो दुम बेली खग-मृग जे-जे प्रगट गोप्य श्री कानन ।

नमो जयति हित स्वामिनि राधा अलबेली अलबेलौ मोहन ॥

– श्री अलबेलीशरण जी


प्रेम किंवा रस मूर्ति श्यामा-श्याम प्रकृतितः रास और विलास प्रिय हैं। रास और विलास प्रियता इनके स्वरूप की प्रकट प्रतीक है। इसीलिए श्री हिताचार्य इन्हें आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि रास-विलास के साथ यह जो सदा विराजमान रहे –

नव निकुंज अभिराम श्याम सँग नीको बन्यो है समाज ।

जै श्री हित हरिवंश विलास रास जुत जोरी अविचल राजु ॥

राधाकिंकरीगण इस रास-रस का पान नेत्र-चक्षुओं द्वारा किया करती हैं। राधाकिंकरी भावानुभावितहृदय रसिकों को भी प्रत्यक्ष दर्शन द्वारा इस रास-विलास का रसास्वाद निरन्तर मिल सके इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए श्री हिताचार्य ने प्रेम मूर्ति श्यामाश्याम की इस नित्य रासलीला के अनुकरण का प्रागट्य किया यह रासलीलानुकरण वृंदावन में होने वाले उस नाद्यन्त नित्यरास का अनुकरण था जो मुक्तजनों, भक्तजनों और गोविन्द प्रिय परिकर से सर्वथा अलक्षित है। यह भागवत वर्णित द्वापरान्त में होने वाले महारास से भिन्न उस नित्यरास का अनुकरण था जिसे केवल राधा-प्रिय किंकरीगण ही देखा करती हैं। इस रासलीलानुकरण का शुभारंभ श्री हिताचार्य ने वि. से. 1592 के लगभग पंचकोसी वृन्दावनस्थ चैन घाट [वर्तमान नाम गोविन्द घाट) में विनिर्मित रास मण्डल पर ब्रजवासी बालकों को श्यामा-श्याम व सहचरियों के वेष से सुसज्जित करके किया था। इसी रासमण्डल में एक समय महारास के मध्य श्री राधा के चरणों की नूपुर टूट गयी थी और वहां उपस्थित श्री हरिराम व्यास जी ने अपने यज्ञोपवीत से नूपुर गूंथ कर श्री प्रिया जी के चरणों में धारण कराया था।

’प्रेम’ किंवा ‘रस’ जब उज्जृम्भित होता है तब उसमें राग की ऊर्मियाँ प्रकृतितः उच्छलित होती हैं श्यामा-श्याम- प्रेम किंवा रस की सघन मूर्ति ही हैं। यही कारण है कि उन्हें रागालापन तथा वीणा-वंशी वादन अत्यधिक प्रिय है। कभी रसिकशेखर श्यामसुन्दर वंशी वादन के माध्यम से श्री प्रिया के साथ गायन करके उन्हें प्रसन्न करते हैं तो कभी केवल प्रिया जी अपने मधुर गायन तथा वीणा वादन-द्वारा अपने प्रियतम को आनंदित करती हैं। इसी प्रकार राग और अनुराग की राजीव मूर्तियाँ सहचरीगण भी समय-समय पर युगल के रागालाप का अनुगमन करके कभी प्रातः, कभी मध्यान्तर, उत्थापन काल में और कभी रात्रि रास में गायन-वादन करके युगलवर का मनोरंजन किया करती हैं।

राधाकिंकरी भावानुभावित रसिक इसी प्रकार से रस लीलाओं के पद्यात्मक गायन द्वारा अपने इष्ट युगल को आनन्दित कर सके तथा स्वयं वृन्दावन रसानन्द का अनुभव कर सके, इस उद्देश्य से श्री हिताचार्य जी ने ‘समाज गायन’ की अभिनव और मौलिक गायन पद्धति का भी समुद्भव किया। यहाँ पर यह नितान्त अविस्मरणीय है कि उन्होंने सामवेद के स्वर प्रधान संगीत को अक्षर प्रधान बनाकर इस मौलिक गान पद्धति को जन्म दिया और रस लीला संबंधी गेय पदों को एक धुन विशेष में आबद्ध करके उन विशिष्ट ‘धुनों’ का भी आविष्कार किया; जो आज भी राधावल्लभीय समाजगान गायको के कण्ठ में परम्परा से सुरक्षित हैं।

रसिकाचार्य गो. हित हरिवंश जी के अनेक शिष्य हुए, उनमें से भगवत मुदित जी द्वारा रचित ‘रसिक अनन्यमाल’ में वर्णित शिष्यों का नामोल्लेख किया जाता है

इन उल्लिखित रसिकों में से श्री नरवाहन, हरिरामव्यास, छबीलेदास, नाहरमल, बीठलदास, मोहनदास, नवलदास, हरीदास तुलाधार, हरीदास जी [कर्मठी बाई के ताऊ ], परमानन्ददास, प्रबोधानन्द सरस्वती, कर्मठी बाई, सेवक जी, खरगसेन, गंगा, जमुना, पूरनदास, किशोर, सन्तदास, मनोहर, खेम, बालकृष्ण, ज्ञानू, गोपालदास नागर, आदि है..!!

श्री हिताचार्य द्वारा विरचित रचनायें निम्नांकित हैं –

1: श्रीराधासुधानिधि

यह एक संस्कृत काव्य है जिसकी श्लोक संख्या 270 है। इस ग्रन्थ में श्री राधाकृष्ण की विभिन्न निकुञ्ज लीलाओं का वर्णन है, संग में अभिलाषा एवं वंदना के श्लोक भी संगृहीत हैं।

2: श्री यमुनाष्टक

श्री यमुनाष्टक संस्कृत में रचित एक अष्टक है जिसकी श्लोक संख्या 9 है। इसमें श्री यमुना जी का यश एवं उनकी वंदना का वर्णन है।

3: श्री हित चौरासी

श्री हित चौरासी ब्रजभाषा में एक पद्य रचना है जिसमें 84 पद संकलित हैं। इस ग्रन्थ में श्री श्यामाश्याम की निकुंज लीला का वर्णन है।

4: स्फुट वाणी

इस ग्रन्थ में ब्रजभाषा में 24 पद संकलित हैं, जिसमें सिद्धांत, आरती, श्री श्यामाश्याम की निकुंज लीला, आदि के पद हैं।

इन 4 रचनाओं के अतिरिक्त श्री हिताचार्य जी के 2 पत्र ब्रजभाषा गद्य में रचित हैं।



जयकृष्ण जी ने श्री हिताचार्य का निकुंज गमन वर्णन करते हुए लिखा है कि

श्री यमुना जी के तट पर मानसरोवर के निकट भांडीरवट है। कुसुमित ललित लतिकाओं से रमणीय इस वन स्थली में ‘भँवरनी भवन’ नामक एक निभृत निकुंज है। इस निकुंज में श्यामा-श्याम रति रस विहार किया करते हैं। शारदीय पूर्णिमा [आश्विन की पूर्णिमा] की चन्द्र-चन्द्रिका में रति रस बिहार के रसासव से आघूर्णित नयन श्री रसिक युगल झूम रहे थे, घूम रहे थे, उनकी श्री अंग की कान्ति चन्द्र-कान्ति को अत्यधिक कान्त बना रही थी। श्री हिताचार्य को प्रिया जी के अंग की सुगन्ध ने अपनी ओर बलात् आकर्षित किया परिणामतः वे उस सुगन्ध के आधार से “प्रिया जी ! आप कहाँ हो ? कहाँ हो ?” यह कहते हुए उस वन में घुसते ही चले गये और थोड़ी देर में प्रिया जी की अंग- चन्द्रिका में घुल मिल गये। इस प्रकार से वि. सं. 1609 की आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में श्री हित जी लोक- दृष्टि से ओझल हो गये।

दिव्य कमल श्री यमुना कूल वट भांडीर निकट रस मूल ॥

संतत जहँ भँवरन की भीर शीतल- मन्द-सुगंध समीर ॥

हँ बिहरत श्री रवनी-रवन । ताकौ नाम भँवरनी भवन ॥

शरद मास राका उजियारी पूरन शशि जु प्रकाशित भारी ॥

प्रिया-जौन्ह में यौं मिलि गई तिहि छिन सहचरि संभ्रम भई ॥

कहत कि कहाँ-कहाँ हो लली। सौंधे के डोरे लगि चली ॥

दृष्टान्तर यौं श्री हरिवंश । मानसरोवर रस के हंस ॥

भँवर भँवरनी में दोउ चलें । श्री हित जू तिन सँग ही रलें ॥

सम्वत सोरह सैरु नव, आश्विन पूनौ मास ।

ता दिन श्री हित जग दृगन, कियौ अप्रगट विलास ॥

श्री हरिराम व्यास जी ने हिताचार्य के निकुंज गमन कर जाने के फलस्वरूप वृन्दावन के रसिक समाज की दुर्दशा और अपनी हार्दिक वेदना का वर्णन किया है –

हुतौ रस रसिकन कौ आधार ।

बिनु हरिवंशहि सरस रीति कौ कापै चलिहै भार ॥

को राधा दुलरावे गावै वचन सुनावै चार ।

वृन्दावन की सहज माधुरी कहिहै कौन उदार ॥

पद रचना अब कापै है है निरस भयौ संसार बड़ौ अभाग अनन्य सभा कौ उठिगौ ठाठ सिंगार ॥

जिन बिनु दिन छिन सत युग बीतत सहज रूप आगार ।

‘व्यास’ एक कुल कुमुद बन्धु बिनु उड़गन जूठौ थार ॥


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“श्री नारायणदास भक्तमाली (मामा जी)”

“श्री नारायणदास भक्तमाली (मामा जी)”
मामाजी महाराज का जन्म बक्सर जिले के अंतर्गत बक्सर प्रखंड के पाण्डेयपट्टी ग्राम में एक चतुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में अश्विन कृष्ण षष्ठी संवत् 1990 तदनुसार दिन रविवार “10 सितम्बर 1933 ई.” को हुआ था।
इनके दादाजी का नाम मेघवर्ण चतुर्वेदी था, जो प्यार से मामाजी महाराज को मन्नाजी कह कर पुकारते थे। इनके पिताजी का नाम मधुसुधन चतुर्वेदी था, जो बहुत बड़े कर्मकांडी एवं ज्योतिषी में पारंगत थे। इनकी माताजी का नाम श्रीमती रामा देवी था, जो बिल्कुल संत ह्रदय, ममता की मूरत, कुशल गृहिणी थी।
मामाजी महाराज के माता पिता ने इनका शुभ नाम “श्रीमन्ननारायण चतुर्वेदी” रखा था। जो प्यार से “नारायण” जी भी कह कर पुकारा करते थे। मामाजी महाराज की प्रारंभिक शिक्षा बक्सर से ही संपन्न हुई तथा उच्च शिक्षा आरा तथा रांची से वाणिज्य विभाग से स्नातक की शिक्षा संपन्न हुई। बचपन से ही भगवद् गीता के प्रति झुकाव था, तथा प्रभु श्री राम में अनन्य भक्ति थी। धीरे-धीरे समय बीतता गया और 1952 ई. में मामाजी महाराज ने किसी शासकीय सेवा में पदाधिकारी के तौर पर नियुक्ति हुई। शासकीय पद पर तैनात रहने के दौरान आरा में पहली बार “महर्षि खाकी बाबा सरकार” के किसी कार्यक्रम में दर्शन का सौभाग्य मिला, दर्शन के उपरान्त मामाजी महाराज, खाकी बाबा से इतने प्रभावित हुए की 1955 ई. में ही शासकीय पदाधिकारी की सेवा त्याग कर तथा पद से इस्तीफा देकर “श्री खाकी बाबा सरकार” से दीक्षा लेकर उनका शिष्य बन गए, तथा उनके साथ रहने लगे। बाद में संत शिरोमणि स्वामी श्री रामचरण दास जी “श्री फलाहारी बाबा” के संपर्क में आए तथा उनकी खूब निष्ठा-भाव से सेवा की, इससे “श्री फलाहारी बाबा” ने प्रसन्न होकर मामाजी महाराज को “श्री नारायण दास” की उपाधि से विभूषित किया।
युगल सरकार की नित्य लीला स्थली श्रीधाम वृन्दावन में मामाजी ने साधना करने हुए श्रीधाम वृन्दावन में निवास करने लगे। वही साधना करते हुए सुदामाकुटीर में इन्हें भक्तमाल के रसज्ञ, मर्मज्ञ, “पं. श्री जगरनाथप्रसाद भक्तमाल” जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। जिनसे इन्होंने संत शिरोमणि “नाभादास” जी द्वारा रचित भक्तमाल का अध्ययन किया। संत सेवा तथा संतो के आशीर्वाद से भागवत कथा भी कहने लगे, तथा सरस कथा व्यास हुए। बिना भाव के व्यक्ति कितना भी ज्ञानी हो, उसकी अभिव्यक्ति में मधुरता नहीं आ पाती है। युगल सरकार के प्रति भक्तिभाव तथा जगजननी माँ सीताजी जनकपुर की उपासना से भक्ति रस में आकंठ डूब गए, तथा कथा के माध्यम से भक्ति के मधुर रस का वितरण करने लगे। बिहार के होने के नाते तथा श्री सीता माँ का मिथिलांचल का होने के नाते श्री सीता माँ को वो इस भक्ति भाव में कब बहन मानने लगे कुछ पता नहीं चला। सीताजी को अपनी बहन मानने के नाते प्रभु श्री राम को अपना बहनोई मानने लगे। इसी रिश्ते के कारण आगे चलकर “मामाजी” महाराज के नाम से विश्वविख्यात हुए।
मामाजी महाराज ने अनेकों नाटकों, पुस्तकों, दोहों, कविताओं की रचना की। जिसमें प्रमुखता से उनकी विश्वविख्यात भोजपुरी कविता जो प्रभु श्री राम को “पाहुन” कह गाए थे :-
“ए पहुना अब मिथिले में रहु ना,
जवने सुख बा ससुरारी में, तवने सुख कहू ना,,
ए पहुना अब मिथिले में रहु ना।…”
अद्भुत क्षमता थी मामाजी महाराज की लेखनी में, साथ ही उन्हें अंग्रेजी भाषा का भी बहुत ज्ञान था उन्होंने अंग्रेजी में भी टी शब्द से सैकड़ो वाक्य एक कविता के माध्यम से लिख डाले थे :-
“जगत में कोई ना परमानेन्ट, जगत में प्रभु ही परमानेंट…”
इस कविता में अंतिम शब्द में सैकड़ो बार टी शब्द का प्रयोग अलग-अलग वाक्यों का प्रयोग कर प्रमुखता से मामा जी द्वारा किया गया था।
भाषा का ज्ञान मामा जी महाराज के अंदर कूट-कूट कर भरा था, संस्कृत हो, हिंदी हो, अंग्रेजी हो, सही शब्द का सही प्रयोग मामाजी की लेखनी की महानतम श्रेणी को दर्शाता था। “मामाजी महराज” तथा उनके परम प्रिय गुरु महाराज “महर्षि खाकी बाबा सरकार” के प्रयासों के बदौलत आज भी बक्सर में “श्री सिय पिय मिलन महामहोत्सव” का कार्यक्रम हर वर्ष नवम्बर-दिसम्बर महीनें में होता है।
भक्तमाल रसज्ञ, मर्मज्ञ “पं. श्री जगरन्नाथप्रसाद जी भक्तमाली” की प्रथम पुण्यतिथि पर आयोजित “प्रिया प्रीतम मिलन महोत्सव” में पधारे जगतगुरु “श्री निम्बकाचार्य जी महाराज” ने “श्री मामाजी” महाराज के अंदर “जगरन्नाथप्रसाद भक्तमाल” जी के प्रति भाव देखकर उन्हें “पं. श्री जगरन्नाथप्रसाद भक्तमाल” जी का उत्तराधिकारी घोषित कर उन्हें “भक्तमाली” की उपाधि से विभूषित किया। इस तरह से मामाजी महाराज का पूरा नाम ” श्री नारायण दास भक्तमाली जी” हुआ।
ऐसी अद्भुत भाव, अभिव्यक्ति के स्वामी होते हुए भी मामाजी महाराज अत्यंत विनयशील, निराभिमानी एवं सरल थे, अतिथि सत्कार उनकी सबसे बड़ी विशेषता रही थी। जो मानव एक बार परम पूज्य मामाजी महाराज का सान्निध्य का सुख पा लेता था, वह सदा के लिए उनका हो जाता था। हमेशा अपनी कथा के माध्यम से मामाजी ने सदा जीवन उच्च विचार जीवन जीने की कथा अपने भक्तों श्रोताओं के बीच कहा करते थे, जिससे भक्त तथा श्रोता जीवन जीने की कला सीखते थे। ऐसे सरस कथा अपनी मधुर वाणी से कहते थे की श्रोता जीवन जीने की इच्छा छोड़ कर बाकी बची जीवन की अभिलाषा भगवत भजन में लगाने लगते थे। मामाजी महाराज को दूसरे साधु, महात्माओं द्वारा उन्हें संतो की वाणी, भक्तों के चरित्र तथा मार्ग खोजने वाला व्यक्ति कहा गया है।
अचानक एक ऐसा दिन आया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, इस महान पुण्यात्मा की मृत्यु 75 वर्ष की आयु में एक सड़क दुर्घटना में अपने कृपा पात्र शिष्य श्री लक्ष्मणशरण दास जी तथा श्री ओम प्रकाश जी सहित 24 फरवरी 2008 में हो गई।
इस घटना से पूरे बक्सर सहित बिहार की जनता में शोक की लहर दौड़ गई, उनके अंतिम दर्शन को देश, विदेश से उनके अनेक शिष्यों भक्तों के साथ-साथ बक्सर की लाखों लाख जनता सड़को पर अपने बक्सर के गौरव की एक झलक देखने के लिए उमड़ पड़ी। सबकी आँखों में आश्रु भरे पड़े थे, सब नियति को दोष दे रहे थे, सबके अंदर उस दिन भगवान् की आस्था के प्रति गुस्सा का भाव था। किसी तरह भक्तों को समझा बुझाकर तथा मामाजी द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने की संकल्प के साथ “मामाजी” का अंतिम संस्कार हुआ।
पूज्य मामाजी द्वारा रचित कविता, दोहे, कहानी, नाटक, ग्रन्थ, श्लोक इत्यादि मामाजी महाराज से हमलोगों को दूर कभी नहीं होने देती हैं। साथ ही आपके द्वारा शुरू किया हुआ “श्री सिय पिय मिलन महामहोत्सव” में एक बार ऐसा लगता है हर साल आपके दर्शन हो जाते हैं।
आज भी मामाजी महाराज का आश्रम बक्सर नई बाजार में स्थित है, दर्शन की अभिलाषा लिए आए हुए भक्त यहाँ जाकर मामाजी के प्रति-मूर्ति के दर्शन कर उनकी यादों को जी सकते है। बक्सर वासी अपने आपको धन्य समझते हैं कि मामाजी जैसे महान सन्त ने बक्सर की धरती पर जन्म लेकर बक्सर का मान पूरे देश में बढ़ाया है। आप सदैव बक्सर के मनुष्य रूपी जीवों के दिलों में जिन्दा रहेंगे।
श्री नारायण दास भक्तमालि मामा जी महाराज की जय।
“जय जय श्री राधे”

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श्रीतिलोक जी सुनार



श्री त्रिलोक भक्त जी पूर्व देश के रहने वाले थे और जाति के सोनार थे। उन्होंने हृदय में भक्तिसार संत सेवा का व्रत धारण कर रखा था। एक बार वहां के राजा की लड़की का विवाह था।

उसने इन्हें एक जोड़ा पायजेब बनाने के लिए सोना दिया। परंतु इनके यहां तो नित्य प्रति अनेकों संत महात्मा आया करते थे। उनकी सेवा से इन्हें किंचित मात्र भी अवकाश नहीं मिलता था ।अतः आभूषण नहीं बना पाए। जब विवाह के दो ही दिन रह गए और आभूषण बनकर नहीं आया तो राजा को क्रोध हुआ और सिपाहियों को आदेश दिया कि तिलोक सुनार को पकड़ लाओ ।

सिपाहियों ने इन्हें तुरंत ही पकड़ कर ला कर राजा के सम्मुख कर दिया ।राजा ने इन्हें डाँट कर कहा कि ‘ तुम बड़े धूर्त हो ‘ ।समय पर आभूषण बनाकर लाने को कह कर भी नहीं लाए ।उन्होंने कहा- महाराज ! अब थोड़ा काम शेष रह गया है। अभी आपकी पुत्री के विवाह के दो दिन शेष हैं। यदि मै ठीक समय पर ना लाऊं तो आप मुझे मरवा डालना।

राजा की कन्या के विवाह का दिन भी आ गया, परन्तु इन्होंने आभूषण बनाने के लिए जो सोना आया था उसे हाथ से स्पर्श भी नहीं किया।फिर इन्होंने सोचा समय पर आभूषण न मिलने से अब राजा मुझे जरूर मार डालेगा ।

अतः डर के मारे जंगल में जाकर छिप गये । यथा समय राजा के चार-पांच कर्मचारी आभूषण लेने के लिए श्री तिलोक जी के घर आए । भक्त के ऊपर संकट आया जानकर भगवान ने श्री तिलोक भक्त का रूप धारण कर अपने संकल्प मात्र से आभूषण बनाया और उसे लेकर राजा के पास पहुंचे ।वहां जाकर राजा को पायजेब का जोड़ा दिया ।राजा ने उसे हाथ में ले लिया ।

आभूषण को देखते ही राजा के नेत्र ऐसे लुभाये कि देखने से तृप्त ही नहीं होते थे। राजा श्री तिलोक जी पर बहुत प्रसन्न हुआ। उनकी पहले ही सब भूल चूक माफ कर दी और उन्हें बहुत सा धन पुरस्कार में दिया ।श्री तिलोक रूप धारी भगवान मुरारी इस प्रकार धन लेकर श्री तिलोक भक्त के घर आकर विराजमान हुए ।

श्री तिलोक रूप धारी भगवान ने दूसरे दिन प्रातः काल ही महान उत्सव किया ।उसमें अत्यंत रसमय , परम स्वादिष्ट अनेकों प्रकार के व्यंजन बने ।साधु ब्राह्मणों ने खूब पाया। फिर भगवान एक संत का स्वरूप धारण कर झोली भर प्रसाद लिए वहां गए ।जहां श्री तिलोक भक्त छिपे बैठे थे ।

श्री तिलोक जी को प्रसाद देकर संत रूप धारी भगवान ने कहा – श्री तिलोक भक्त के घर गया था।उन्होंने भी खूब प्रसाद पवाया और झोली भी भर दी। श्री तिलोक भक्त ने पूछा – कौन तिलोक ?भगवान ने कहा- जिसके समान त्रैलोक्य में दूसरा कोई नहीं है। फिर भगवान ने पूरा विवरण बताया ।संत रूप धारी भगवान के वचन सुनकर श्री तिलोक जी के मन को शांति मिली ।

फिर भगवत प्रेम में मग्न श्री तिलोक जी रात्रि के समय घर आए। घर पर साधु-संतों की चहल-पहल तथा घर को धन-धान्य से भरा हुआ देखकर श्री तिलोक जी का श्री प्रभु के चरणों की ओर और भी अधिक झुकाव हो गया । वे समझ गए कि श्री प्रभु ने मेरे ऊपर महान कृपा की है। निश्चय ही मेरे किसी महान भाग्य का उदय हुआ है।

भक्त की कोई जाती नहीं होता

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श्रीगोपालदास बाबाजी ‘उत्सवी’

(वृन्दावन)


गङ्गा-तटपर एक निर्जन स्थान में श्रीमद्भागवत की कथा बैठी है। वक्ता हैं एक महात्मा, जिनके शरीर पर एक लंगोटी के सिवा और कुछ नहीं है। श्रोता हैं स्वयं गङ्गा महारानी। महात्मा तन्मय हो गङ्गा माता को लक्ष्य कर उच्च स्वर से कथा कह रहे हैं। गङ्गा कल-कल करती हुँकारें भर रही हैं। और कोई श्रोता वहाँ नहीं है। किसीको निमन्त्रण भी नहीं है।

पर भ्रमर निमन्त्रण की प्रतीक्षा कब करता है ? जहाँ भी पुष्प खिलता है, वहाँ पहुँच जाता है। पुष्प के सौरभ को पवन दिक्-विदिक् ले जाता है। उसी को भ्रमर निमन्त्रण मान लेता है। श्रीमद्भागवत की कथा में भी कुछ ऐसा ही दिव्य आकर्षण है। कथा की स्वर-लहरी से स्पन्दित आकाश के अणु-परमाणुओं ने जाकर स्पर्श किया कहीं दूर ध्यानमग्न बैठे परमहंस वृत्ति के एक महात्मा को। वे वहाँ आ विराजे कथा के दूसरे श्रोता के रूप में।

तीसरे श्रोता स्वयं श्रीनन्दनन्दन तो अलक्षित रूप से वहाँ रहे होंगे ही। उन्होंने कहा जो है-‘मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद-हे नारद ! मेरे भक्त जहाँ मेरा गुणगान करते हैं, मेरी लीला-कथा कहते हैं, वहाँ मैं जा बैठता हूँ।’ उन्हीं को लक्ष्य कर परमहंसजी ने कहा-‘जिनकी कथा हो रही है, उनके लिए कुछ भोग तो रखा नहीं। उन्हें माखन-मिश्री बहुत प्रिय हैं।

उसी समय शुभ्र वस्त्र धारण किये एक वृद्धा माखन-मिश्री लेकर वहाँ लायीं। नन्दनन्दन को माखन-मिश्री का भोग लगाया गया। कथा के पश्चात् दोनों महात्माओं ने उसका सेवन किया। उसके अलौकिक स्वाद और गंध से दोनों चमत्कृत हो गये। उसे ग्रहण करने के पश्चात् सात दिन तक उन्हें भूख नही लगी। एक दिव्य मस्ती बराबर छायी रही। दोनों ने समझ लिया कि माखन-मिश्री लाने वाली वृद्धा स्वयं गङ्गा महारानी ही थीं, अन्य कोई नहीं।

गङ्गा महारानी में इतनी निष्ठा रखने वाले और उन्हें श्रीमद्भागवत की कथा सुनाने वाले यह महात्मा थे निम्बार्क सम्प्रदाय के श्रीमत् स्वभू-रामदेवाचार्य की परम्परा में जूनागढ़ के गोदाबाव स्थान के महन्त श्रीमत-सेवादासजी महाराज के शिष्य श्रीगोपालदासजी। टीकमगढ़के निकट किसी ग्राम में गौड़ ब्राह्मण कुल में सम्वत् १८६८ में उनका प्रादुर्भाव हुआ। बाल्यकाल में ही जूनागढ़ के श्रीसेवादासजी महाराज से दीक्षा ले वे चारों धाम की यात्रा को निकल पड़े। यात्रा समाप्त कर व्रज के अन्तर्गत कामवन में रहने लगे। परसरामद्वारे के पण्डित रघुवरदासजी से श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों का अध्ययन किया। भगवत्कथादि में आसक्ति के साथ-साथ उनका वैराग्य दिन-पर-दिन बढ़ता गया। कुछ दिन बाद वे केवल एक लंगोटी लगाये, बगल में श्रीमद्भागवत दबाये गंगा-तट पर चले गये। गङ्गा के किनारे-किनारे जहाँ-तहाँ विचरते रहे और गङ्गाजी को श्रीमद्भागवत सुनाते रहे। गंगा महारानी का आशीर्वाद ले व्रज लौट आये और वृन्दावन में रहने लगे।

वृन्दावनमें वे उदरपूर्ति मधुकरी द्वारा करते और आत्मपूर्ति भगवान् कघ लीला-कथाओं द्वारा। राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं के मनन और कीर्तन में ही उनका सारा समय व्यतीत होता। उनकी श्रीमद्भागवत की कथा वृन्दावन में कहीं-न-कहीं होती रहती। कथा बड़ी रसमय होती। शुक सम्प्रदाय के रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरीजी भी कथा में आया करते।

वैष्णव सेवा में उनकी बड़ी निष्ठा थी। कथाओं में जो भेंट आती, उससे महावन के निकट दाऊजी के मन्दिर में जाकर वैष्णव-सेवा कर दिया करते एक बार दाऊजी ने स्वप्न में वृन्दावन में ही वैष्णव-सेवा करते रहने का आदेश दिया। तब से वे वृन्दावन में सेवा करने लगे।

उन्हें प्रेरणा हुई श्रीनिम्बार्काचार्य का जन्मोत्सव मनाने की। उन्होंने इस उत्सव की प्रथा डाली, जो आज तक चली आ रही है। प्रतिवर्ष वे श्रीनिम्बार्काचार्य की जन्म-तिथि पर विशाल शोभायात्रा, श्रीमद्भागवत-सप्ताह, रास-लीला, समाज-गान और ब्राह्मण-वैष्णव-भोजन आदि की व्यवस्था करते। बड़ी धूमधाम से सारा उत्सव मनाते। उसके लिए उनके प्रभाव से धन भी पर्याप्त मात्रा में आ जाता। उसका एक-एक पाई खर्च कर अन्त में अपने लंगोटी और करुआ ले किनारे हो जाते। संचय एक पैसा भी न करते।

एक बार इस उत्सव के अवसर पर उन्होंने २०० ब्राह्मणों द्वारा श्रीमद्भागवत-पाठ की व्यवस्था की। पर उन्हें ज्वर हो आया। अतः धन की समुचित व्यवस्था न हो सकी। पाठ आरम्भ हो गया। वे चिन्ता में पड़ गये कि ब्राह्मणों को दक्षिणा कहाँ से दी जायगी। तब प्रियाजी ने स्वप्न में दर्शन दे ढाढ़स बंधाया। दूसरे दिन एक परदेसी साहूकार आया। उसने उत्सव का सारा भार अपने ऊपर ले लिया। कई दिन तक कथा-कीर्तन, रास और वैष्णव-भोजनादि का दौर आनन्दपूर्वक चलता रहा। अन्त में साहूकार ने मोहरों की दक्षिणा दे ब्राह्मणों को तृप्त किया। इन उत्सवों के कारण ही गोपालदासजी का नाम ‘उत्सवीजी’ पड़ गया।

गोपालदासजी भक्तमाल की कथा भी बहुत सुन्दर कहते। जिस शैली में भक्तमाल की कथा का आज प्रचलन है, उसका सूत्रपात्र उन्हीं से हुआ। उन्ही से प्रसिद्ध भक्तमाली टोपीकुञ्ज के श्रीमाधवदास बाबाजी ने भत्तमाल का अध्ययन किया।

उनकी जैसी कथनी थी, वैसी ही करनी थी। इसलिए उनकी वाणी में ओज था। उसका लोगों पर स्थायी और गंभीर प्रभाव पड़ता था। बहुत-से लोगों में उससे चमत्कारी परिवर्तन हुआ। बहुत-से उनसे मन्त्र-दीक्षा ग्रहण कर भक्ति-पथ के पथिक बने।

उनके शिष्यों में प्रधान थे बाबा हंसदासजी, बाबा श्यामदासजी, बाबा कारे कृष्णदासजी, बाबा किशोरीदासजी, बाबा राधिकादासजी, राजा भवानीसिंहजी और श्रीमती गोपाली बाई। इनके अतिरिक्त श्रीसुदर्शनदासजी (ललित प्रियाजी) जैसे बहुत-से रसिक महानुभावों ने उनसे भजन-प्रणाली- की शिक्षा ग्रहण की।

सम्वत् १९५२ में उन्हें निकुञ्ज-प्राप्ति हुई।

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श्री निवासाचार्य जी-वृन्दावन

(कालावधि-1518-1603)

श्रीनिवासाचार्य जी, गौरांग महाप्रभु के प्रेम की मूर्ति थे। बंगदेश के चाकन्दी ग्राम में इनका जन्म हुआ। अल्प आयु में ही इन्होंने ग्रंथों को कंठस्थ कर लिया। इनका पांडित्य सबके हृदय को आकर्षित कर लेता। श्री गोपाल भट्ट जी सदगुरुदेव हुए और जीव गोस्वामी जी ने इन्हें भक्ति शास्त्रों का अध्ययन कराया। गुरु आज्ञा से बंगाल क्षेत्र में प्रचुर गौड़ीय भक्ति का प्रचार किया। एक बार मानसी सेवा में होली लीला का आस्वादन कर रहे थे और ध्यान टूटने पर देखा कि सारे वस्त्र रंगे हुए हैं।

बंगदेश गंगातटवर्ती चाकंदी ग्रामवासी श्री गंगाधर भट्टाचार्य जी का चैतन्य महाप्रभु जी के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था। महाप्रभुजी के सन्यास ग्रहण के समय चैतन्य-चैतन्य पुकारते हुए विक्षप्त दशा को प्राप्त हो गए। तब से लोग इन्हें चैतन्य दास पुकारने लगे। पूर्णस्वस्थ होने पर एक दिन श्रीजगन्नाथ पुरी की ओर पत्नी के साथ प्रस्थान किया। पूरी पहुँचकर महाप्रभु जी का दर्शन किया। रात्रि में जगन्नाथ भगवान ने स्वपन दिया – तुम घर चले जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे एक सर्वांग सुंदर पुत्र होगा। जो प्रेम और पांडित्य से तुम्हारे कुल को धन्य करेगा। प्रातकाल महाप्रभु जी को प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त करके वापस ग्राम आ गए। कुछ समय पश्चात अचल जगन्नाथ और सचल जगन्नाथ की कृपया से सन 1518 को वैशाखी पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी प्रिया देवी के गर्भ से परम् रूपवान पुत्र का जन्म हुआ। इसी पुत्र का नाम हुआ श्रीनिवास। गौर नाम श्रवण करके अति प्रसन्न हो जाते थे। अपने मधुर स्वर से गौर-गौर का उच्चारण कर नृत्य करने लगते।
जब यह 5 वर्ष के हुए तो पिता जी ने चांकन्दी के महामहोपाध्याय धनंजय वाचस्पति को पढ़ाने लिखाने का भार सौपा। गुरमुख से जो श्रवण कर लेते तुरंत कंठ हो जाता। मेघा शक्ति के अति धनी थे। कुछ ही समय में व्याकरण, दर्शन आदि संपूर्ण शास्त्रों में निष्णात हो गए। संपूर्ण वैष्णव समाज में उनके पांडित्य की चर्चा होने लगी।
एक दिन पूरी में महाप्रभु जी ने कीर्तन करते हुए अचानक श्रीनिवास- श्रीनिवास उच्चारण किया। भक्तों ने कारण पूछा तो महाप्रभु जी बोले मेरे विशुद्ध प्रेम की मूर्ति श्री निवास का चाकंदी ग्राम में आविर्भाव होगा। इसलिए सभी गौर प्रेमी अब श्रीनिवास जी के पास आने जाने लगे।
कर्णानद के अनुसार वृंदावन के गोविंद देव ने गोस्वामी गणों से कहा था। मेरी शक्ति से मेरे प्रेम का ही श्रीनिवास के रूप में अविर्भाव हुआ है।

मोर शक्ति ते जन्म इहार करिला प्रकाश।
प्रेम रुपे जन्म हैल नाम श्रीनिवास॥

एक दिन अकस्मात पिताजी का निकुंज वास हो गया। ह्रदय में अत्यंत वेदना हुई क्योंकि गौर- लीला रसस्वादन के साथी थे। माँ विलाप कर रही थी। श्रीनिवास जी ने अब पुरी में महाप्रभु के दर्शन के लिए जाने का विचार किया। मां से आज्ञा ली, इच्छा ना होते हुए भी माँ ने आज्ञा प्रदान की। गौर प्रेम में अश्रु प्रवाहित करते हुए, बाह्य ज्ञान शून्य नीलाचल के पथ पर चले जा रहे हैं। मार्ग में अचानक किसी ने महाप्रभु जी के अंतर्ध्यान का समाचार सुनाया तो मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
महा प्रभु जी की कृपा हुई स्वपन में बोले – तुम नीलाचल चले जाओ। गदाधर आदि परिक्रमा वहाँ है। मुझे तुम्हारे द्वारा बहुत कार्य कराने हैं। श्रीनिवास जी प्रातः जी उठकर नीलाचल की ओर चल पड़े। कई दिनों के पश्चात पूरी पहुँचे। जगन्नाथ जी का दर्शन किया। जगन्नाथ जी की छद्ध रूप से प्रसाद का थाल दे गये, प्रसाद पाकर प्रभु की कृपा का अनुभव किया। फिर श्री गदाधर जी से मुलाकात की। श्री गदाधर जी ने इन्हें राय रामानंद जी और सार्वभौम जी के पास दर्शन कराने ले गए। गौर – विरह में निमग्न दोनों ने धैर्य धारण करके महाप्रभु जी की कुछ चर्चा की। इस प्रकार गौर- प्रेमियों के दर्शन एवं गौर -चर्चा मैं दिन बीतने लगा।
एक दिन गदाधर जी से भागवत पढ़ाने की प्रार्थना की तो गदाधर बोले – मेरी इच्छा बहुत थी तुम्हें भागवत पढ़ाने की लेकिन महाप्रभु जी के अश्रु जल से भागवत के कुछ अक्षर मिट गए हैं। इसलिए तुम वृंदावन जाकर जीव से भागवत अध्यन करो। कई दिनों की यात्रा के पश्चात भूखे-प्यासे श्रीनिवास जी मथुरा पहुंचे। यहां सूचना प्राप्त हुई के रूप, सनातन और रघुनाथ भट्ट जी का निकुंज प्रवेश हो गया। अत्यंत दुखी हुए और अर्ध वाह्य दशा में वृंदावन के गोविंद देव जी मंदिर में आकर गिर पड़े। जीव गोस्वामी जी दर्शन को पधारे तो देखा कि मंदिर में भीड़ है। वहाँ जाकर सभी को हटाया। अद्भुत दृश्य सामने था। श्रीनिवास जी के वपु में अष्ट सात्विक भाव, अश्रु, कम्प, पुलक रोमांच आदि प्रकट हो रहे थे। जीव गोस्वामी जी पहचान गए कि यह श्रीनिवास है। उनको उठा कर कुटिया में लाए। दो पहर बीतने पर वाह्य ज्ञान हुआ। जीव जी को प्रणाम किया। गोविंद देव जी का प्रसाद पवाया बगल वाली कुटिया में विश्राम करने को कहा।
दूसरे दिन जीव गोस्वामी जी गोपाल भट्ट जी के पास ले गए। और उनके द्वारा श्रीनिवास जी को दीक्षा दिलवा दी। श्रीनिवास ने गुरु सेवा को सर्वस मानकर अंग -सेवा का भार अपने ऊपर ले लिया। शीघ्र ही कविराज आदि संतो के दर्शन करा लाए। अब वृंदावन में गुरु सेवा करते हुए श्री निवास जी जप, ध्यान, कीर्तन आदि दैनिक कृत्य करने लगे और जीव गोस्वामी जी के पास शास्त्र अध्ययन आरंभ किया। लीला स्मरण में श्रीनिवास का असाधारण अभिनिवेश देख श्री गोपाल भट्ट जी बहुत प्रसन्न हुए। एक दिन लीला ध्यान में श्रीनिवास जी सुगंधित तेल, माला, चंदनादि से महाप्रभु जी की सेवा करके उनके पास खड़े होकर चँवर डुला रहे थे। उसी समय महाप्रभु जी के इशारे करने से दूसरे सेवक ने महाप्रभु जी के गले से माला उतारकर श्रीनिवास जी को पहना दी। ध्यान भंग होने पर देखा कि वही माला गले में पड़ी थी।
एक दिन बसंत के अवसर पर ब्रज लीला का ध्यान कर रहे थे। वहाँ होली लीला चल रही थी। अचानक किशोरी जी के हाथ का गुलाल शेष हो गया तो उसी समय मंजरी स्वरूप में श्रीनिवास जी ने गुलाल लाकर श्री किशोरी जी को दिया। ध्यान भंग हुआ तो देखा कि सारे वस्त्र होली के रंग से रंगे हुए हैं।
श्रीनिवास जी का ध्यान में तीव्र अनुराग था। थोड़े ही समय में यह श्रीमद्भागवत और भक्ति शास्त्रों में पारंगत हो गए और जीव गोस्वामी के द्वारा आचार्य ठाकुर की उपाधि प्राप्त की। श्री नरोत्तम ठाकुर, श्री श्यामानन्द प्रभु दोनों श्रीनिवास जी के सहपाठी थे। जीव गोस्वामी जी की बहुत इच्छा थी कि जिन भक्ति ग्रंथों की रचना श्री रूप जी, श्री सनातन जी, और स्वयं ने की है उन का प्रचार गौड़ देश में भली-भांति हो। जीव जी ने सभी भक्तों एवं संतों के मत से श्रीनिवास आचार्य जी को भक्ति के प्रचार के लिए भेजने का निश्चय किया। और नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को उनकी सहायता के लिए सारे ग्रंथों को एक बड़े काठ के संदूक में बंद किया और दस शास्त्र धारी रक्षको को साथ करके दो बैल गाड़ी में बिठा कर विदा किया। गौड़ देश की सीमा के भीतर गोपालपुर ग्राम में विश्राम किया। अचानक एक लुटेरों का दिल आया और मारपीट कर बैलगाड़ी सहित ग्रंथों के संदूक को लेकर अदृश्य हो गए। प्रातः काल तीनो ने बहुत खोजा लेकिन कुछ पता ना चला। एक प्रहरी के हाथ ग्रन्थों की चोरी की सूचना जीव गोस्वामी जी को भेजी और नरोत्तम एवं श्यामानन्द जी ने कहा- तुम गौड़ देश जाकर भक्ति का प्रचार करो।
श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों की खोज में पागल की भांति इधर-उधर भटकते रहे। विष्णुपुर राज्य में कृष्ण बल्लभ नाम के एक ब्राह्मण से मुलाकात हुई। वो इन्हें पाठ सुनने के लिए राज्य के राजा वीरहाम्वीर की सभा में ले गया। व्यास चक्रवती नामक एक ब्राहमण राजा को नित्य भागवत सुनाया करते थे। आज रास पंचाध्यायी का पाठ था। और वक्ता महाशय सिद्धांत विरुद्ध व्याख्या कर रहे थे। तब श्रीनिवासाचार्य जी ने प्रतिवाद कर के अद्भुभुत रसपूर्ण व्याख्या की। राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। राजा ने उन्हें कुछ दिन रुकने का आग्रह करके एक निर्जन स्थान में वास दे दिया। श्रीनिवास जी ने विचार किया कि राजा से ग्रन्थ चोरी की बात कहूँ जो शायद ग्रंथ को खोजने में मेरी मदद कर दे। दूसरे दिन कथा के विश्राम के बाद राजा निवासाचार्य जी को अपने कक्ष में ले गया और परिचय पूछा। श्रीनिवास जी ने संपूर्ण बात कह दी। ग्रंथ चोरी की बात सुनकर राजा रोने लगा और बोला- महाराज! डाकुओं का सरदार मैं ही हूँ। मैं राजा होते हुए भी अपने सैनिकों को लूटने के लिए भेजता हूँ। आपके सारे ग्रंथ मेरे पास है। मैं आपका अपराधी हूँ। आप दंड दे या क्षमा करें। ऐसा कहकर फूट- फूट कर रोने लगा। श्री निवास जी ग्रंथ प्राप्ति की बात सुनकर अति प्रसन्न हुए और राजा का हृदय से लगा लिया।
अगले दिन श्रीनिवास जी ने राजा आदि अनेक परिकरो को अपना शिष्य बनाया, और ग्रंथ प्राप्ति का संदेश वृंदावन जीव गोस्वामी जी को और खेतुरी के निकट गोपालपुर नरोत्तम जी एवं श्यामानंद जी को भेजा। दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए और आनन्द में नृत्य करने लगे। अब श्रीनिवासाचार्य जी ग्रंथों को लेकर अपनी मां के पास याजिग्राम पहुँचे। माँ अपने पुत्र को देखकर आनन्द में डूब गई। याजिग्राम में श्रीनिवास जी ने एक विद्यालय की स्थापना की अध्यापन का कार्य प्रारंभ कर दिया। कुछ समय पश्चात श्रीनिवास जी का श्री गोपाल चक्रवर्ती की सुपुत्री द्रोपदी नाम की कन्या के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात द्रोपदी का नाम ईश्वरी ठकुरानी रखा। एक दिन श्रीनिवास घर के निकट वृक्ष के नीचे सत्संग कर रहे थे। एक युवक विवाह करके अपनी पत्नी को पालकी में विदा करा कर ला रहा था। श्रीनिवास ने उसे देखा और बोल पड़े- देखो! यह नवयुवक रूपवान और तेजस्वी है। लेकिन इसका यौवन प्रभु सेवा में न लगकर कामिनी सेवा में लगेगा। यह वचन उस युवक के कान में पड़ गए। बस तुरंत वह श्रीनिवास जी के चरणों में गिर पड़ा, और हमेशा के लिए दीक्षा लेकर सेवा में ही रह गया। महापुरुषो की दृष्टि पड़ते ही जीव का कल्याण हो जाता है।
श्री नरोत्तम ठाकुर के आग्रह पर श्रीनिवास जी एक महीने खेतुरी ग्राम पधारे। वहाँ बहुत विशाल उत्सव हुआ। दोल पूर्णिमा के दिन छय विग्रहों की धूम धाम से प्रतिष्ठा हुई। खूब संकीर्तन की धूम मची।
श्रीनिवास जी का दूसरा विवाह गोपालपुर ग्राम के राघव चक्रवर्ती की सुपुत्री श्री पद्मावती के साथ शुभ मुहूर्त में हुआ। विवाह के पश्चात पद्मावती जी का नाम हुआ गौरांग प्रिया। श्रीनिवास जी के तीन पुत्र एवं तीन कन्या हुईं।
एक बार श्रीनिवास जी विष्णु पुर ग्राम में लीला स्मरण कर रहे थे। लीला- स्मरण में मणि मंजरी स्वरूप से लीला के गंभीरतम प्रदेश में प्रवेश कर गए। शरीर निश्चल हो गया, श्वास बंद हो गया। दो दिन तक यही स्थिति रही, सभी घबरा गए सभी विचार करने लगे क्या करें ? उसी समय खेतुरी ग्राम से रामचंद्र जी आ गए और बोले — आप घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा। रामचंद्र जी श्रीनिवास जी के पास बैठकर ध्यान मग्न हो गए। करुणा मंजरी स्वरूप से लीला में प्रवेश कर के देखा कि अन्य मंजरियां यमुना जल के भीतर कुछ खोज रही है। पूछा तो पता चला कि किशोरी जी की बेसर खोज रही है। और जलक्रीडा करते समय गिर गई थी। यह भी खोजने लगे तो कमल पत्र के नीचे बेसर मिल गई। तुरंत गुरुदेव को प्रदान की। गुरुदेव ने गुण मंजरी (गोपाल भट्ट), गुण मंजरी ने रूप मंजरी (रूप गोस्वामी) को रुप मंजरी ने श्री जी को प्रदान की। किशोरी जी ने प्रसन्न होकर करुणा मंजरी को अपना चार्बित ताम्बूल देकर पुरस्कृत किया। उसी समय श्रीनिवास जी की समाधि टूट गई। रामचंद्र जी के हाथ में प्रसादी तांबूल देखकर सभी आश्चर्यचकित हुए। सबको कणिका प्रसाद प्राप्त हुआ। जीव का यही वास्तविक स्वरुप है। रामचंद्र जी खेतुरी में नरोत्तम दास जी के पास थे। एक दिन श्रीनिवास जी ने पत्र द्वारा रामचंद्र जी को शीघ्र याजि ग्राम आने का संदेश भेजा। पत्र पाते ही रामचंद्र जी गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर नरोत्तम ठाकुर से आज्ञा मांगी। दोनों हृदय से मिले क्योंकि अब यह अंतिम मिलन था। नरोत्तम ठाकुर बोले- मैं उस घड़ी की प्रतीक्षा करूँगा, जिस में हमारा मिलन पुनः होगा। रामचंद्र जी वहाँ से चल कर याजि ग्राम श्रीनिवास जी के पास आ गए। आकर गुरुदेव चरणों में प्रणाम किया। दो दिन बाद दोनों गुरु शिष्य श्री वृंदावन धाम प्रस्थान किया।
श्री वृंदावन धाम आने के पश्चात श्रीनिवास जी वापिस कहीं नहीं गए। श्रीराम चंद्रजी निरंतर गुरु सेवा में निरत रहते। सन 1603 कार्तिक शुक्ल अष्टमी को श्रीनिवास जी अपने निज स्वरूप मणि मंजरी रूप में श्यामा-श्याम के नृत्य लीला में प्रवेश कर गए। सन 1612 कार्तिक कृष्ण अष्टमी को रामचंद्रजी ने गुरुदेव के पथ का अनुसरण किया। श्री धाम वृंदावन में गोपेश्वर महादेव के निकट श्रीनिवास जी एवं श्री रामचंद्र जी दोनों की समाधि विराजमान हैं। श्री धाम वृंदावन वास करने का यही फल है कि इसी रज में रज होकर मिल जाए।

तजिकै वृंदाविपिन कौ, अन्य तीरथ जे जात।
छाडि विमल चिंतामणि, कौड़ी को ललचात्॥
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स्रोत: ‘ब्रज भक्तमाल’

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त्रिलोचन जी


एक कथा है भक्तमाल में त्रिलोचन भक्त की, बड़े भारी भक्त थे और उनके यहाँ भक्त लोग आया करते थे, सदा भीड़ लगी रहती थी। ५०-५०, १००-१०० भक्त कीर्तन करते हुए आते और भोजन प्रशादी पाते।
ऐसी जगह भगवान् जरूर आते हैं और सेवा करने आते हैं, खाली ये ही नहीं कि भण्डारा पा के चले गये। त्रिलोचन जी के यहाँ भगवान् गये एक मजदूर का रूप बनाकर के नौकरी ढूँढ़ने कि हमको कोई नौकर रख ले। त्रिलोचन जी को जरूरत भी थी, क्योंकि १००-१००, ५०-५० के टोल आ जाएँ भक्त लोग और उनको भोजन बनाना, खिलाना। त्रिलोचन बैठे थे वहाँ और भगवान् एक मजदूर का रूप (फटी-सी एक फितूरी है, पाँव में जूता नहीं है, बहुत गरीब रूप) बनाकर आ गये। त्रिलोचन जी के यहाँ हर समय कीर्तन होता था, भगवान् के सच्चे भक्त थे। उनके यहाँ सैकड़ों भक्त प्रसाद पा रहे हैं, आ रहे हैं-जा रहे हैं; तो भगवान् गोपाल जी स्वयं पहुँचे एक मजदूर का रूप बनाकर के और जाकर के बोले-

कोई नौकरी में रख ले, भक्तों की सेवा करवा ले।
मैं तो दास पुराना दासों का, मैं तो दास पुराना दासों का॥

मजदूर रूप ठाकुर जी ने आवाज लगाई, “हमें कोई नौकर बना के रख ले, हम नौकरी माँगने आये हैं।”
त्रिलोचन जी भीतर से दौड़े, अरे ! हमारे यहाँ तो बहुत भीड़ रहती है, कोई आ गया, चलो बात करते हैं।
त्रिलोचन जी मजदूर रूप ठाकुर जी के पास गये और बोले, “अरे भैया ! तुम कौन हो, कहाँ से आये हो? तुम तो बड़े सुंदर सरल और आकर्षक हो तुम्हें देख कर तो एकाएक ही मुझे अपने ठाकुर जी का स्मरण होता है।”
ठाकुरजी हँस गये, समझ गए कि अब हमारा भक्त आ गया, बोले, “भाई ! देखो, मैं नौकरी ढूँढ़ने आया हूँ और एक साधारण सा नौकर हूँ मुझे नौकरी चाहिए।”
त्रिलोचन जी बोले, “अच्छा, भाई ! तुम नौकरी चाहते हो, तुम्हारा कोई पता-ठिकाना?”
मजदूर रूप ठाकुर जी बोले, “मेरे कोई माँ नहीं, मेरे कोई बाप नहीं।”
अब ठाकुर जी कह तो रहे हैं सच लेकिन त्रिलोचन भक्त समझ रहे हैं कि कहीं ऐसे अनाथ होयगो, काऊ ने पालन-पोषण कियो होयगो।
त्रिलोचन बोले, “तो भाई ! तेरी तनखाय क्या है? क्या लेगा तू?”
मजदूर रूप में श्रीठाकुर जी, “देखो जी, एक भी पैसा नहीं लूँगो।”
त्रिलोचन, “तो नौकरी काय बात की?”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “मैं खाऊँ ज्यादा, या मारे मोय कोई नौकर नहीं रखे।”
त्रिलोचन जी, “भैया ! कितनो खावै?”
मजदूर रूप ठाकुर जी,“पाँच किलो।”
त्रिलोचन जी, “अच्छा, भैया ! खायवै की कमी तो है नहीं। यहाँ सैकड़ों भक्त भोजन करते हैं।” जो सेवा करता है, वहाँ घाटा नहीं रहता; चाहे कैसी भी सेवा हो।
त्रिलोचन जी, “भाई ! पाँच किलो हम रोज खवायेंगे तोय। और कोई तेरी ठहर, कोई शर्त?”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “हमारी कोई निन्दा न करे तब हम नौकरी करते हैं। जा दिन कोई निन्दा करेगो, हम छोड़ के चले जायेंगे।”
त्रिलोचन जी, “अच्छा, भाई ! हम निन्दा क्यों करेंगे, हमारे यहाँ तो निन्दा को काम ही नहीं है, दिन-रात कीर्तन करैं और हमारे यहाँ जितने आवैं (कोई नातेदार, रिश्तेदार ‘सांसारिक सम्बन्धी’ नहीं आवैं), भगवान् के भक्त आवैं, उनकी सेवा कर लैगो?”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “अरे, वही सेवा तो मैं जानूँ, भक्तन की सेवा मैं करूँ, याही मारे मैं तेरे दरवाजे आयो हूँ।” (त्रिलोचन जी ने मन में सोचा, अरे, ये तो कोई भगत मालूम पड़े।)
त्रिलोचन, “भाई ! भक्त बड़े-बड़े आवैं, टेढ़े-मेढ़े आवैं, रिसेले-गुस्सेले आवैं।”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “मैं सब झेल लूँगो।”
त्रिलोचन जी, “अच्छा ! तो भाई, ये कपड़ा पहन ले। फटे-फटे तेरे कपड़ा हैं।” त्रिलोचन जी ने मजदूर रूप ठाकुर जी की फटी सी फितूरी उतरवाय करके नए वस्त्र धारण कराये।
त्रिलोचन जी,“तेरो नाम का है? ”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “मेरो नाम है, अन्तर्यामी।”
त्रिलोचन जी, “अन्तर्यामी नाम तो बड़े जोर को रखो, कौन ने रखो भाई?”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “पतौ नहीं साहब, मैंने पहले कह्यो, मेरी मैया-बाप नहीं।”
सब सच कह रहे हैं कि हम अन्तर्यामी भगवान् हैं लेकिन उनको पहिचान कौन सकै? मुश्किल तो ये है। फटे-फटे कपड़े में आये हैं, कोई पनहैया नहीं, जूती नहीं।
त्रिलोचन जी, “अच्छा भाई, अन्तर्यामी ! तू एक बात बताय कि सेवा कैसी कर सकैगो?”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “सुनो,”

मैं तो दास पुराना दासों का।
सेवा करने में मैं हूँ बड़ा चातुर सेवक मैं पुराना।
सेवा ही की मैंने अब तक, सेवा धर्म ही जाना॥
कोई एक बार अजमा ले, भक्तों की सेवा करवा ले।
कोई नौकरी में रख ले, भक्तों की सेवा करवा ले॥
मैं तो दास पुराना दासों का।

त्रिलोचन जी, “भाई ! तू कैसी-कैसी सेवा कर सकै, ये भी बता दे?”

मजदूर रूप ठाकुर जी, सुनो, भाई !
कोई पग चप्पी करवा ले, चाहे सिर को मलवा ले।
कोई सेना नाई की सी मालिस भी करवाय ले॥
कोई नौकरी में रख ले, भक्तों की सेव करवा ले।
चाहे जूती गठवाय ले, अच्छी गाठूँ रविदास से।
चाहे कपड़ा सिलवाय ले, सिलूँ अच्छी परमेष्ठी से॥
कोई मुझसे कुछ करवा ले, भक्तों की सेवा करवा ले।
कोई नौकरी में रख ले, भक्तों की सेवा करवा ले॥
मैं तो दास पुराना दासों का।

त्रिलोचन, “अरे भाई ! तू इतने काम जाने और तऊ तेरे ऊपर फटी सी फितूरी।”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “साहब ! हमने तो बता दियौ, हम सब काम जानैं लेकिन खावैं ज्यादा सो कोई नौकर नहीं रखे और रखउ ले तो बुराई करै, तो मैं भाग जाऊँ वहाँ ते।”
त्रिलोचन जी, “और क्या जाने? ”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “सुनो, भाई !”

चाहे चरखा चलवाय ले, अच्छी कातूँ मैं कबिरा से।
चाहे कपड़ा रँगवा ले, अच्छी रँग दूँ मैं नामा से॥
कोई सेवा कैसी भी करवा ले, भक्तों की सेवा करवा ले।
कोई नौकरी में रख ले, भक्तों की सेवा कर ले॥
मैं तो दास पुरानों दासों का।

त्रिलोचन जी, “अरे भाई ! तेरे में तो बड़े गुण हैं और कहा जानै?”
मजदूर रूप ठाकुर जी, “और सुनो, साहब !”

चाहे चक्की पिसवाये ले, पीसा जनाबाई संग मैंने।
चाहे नाच नचा ले मुझसे, नाचा मीरा संग मैंने॥
मनचाही से कुछ करवा ले, भक्तों की सेवा करवा ले।
कोई नौकरी में रख ले, भक्तों की सेवा करवा ले॥
मैं तो दास पुराना दासों का।
कैसे भी गहना गढ़वाय ले, अच्छा गढ़ूँ त्रिलोकी भक्त से।
खेत जुताय ले कुम्भन जैसा, खेत कटाय ले धन्ना जैसा॥
कोई टहल सभी करवा ले, भक्तों की सेवा करवा ले।
कोई नौकरी में रख ले, भक्तों की सेवा करवा ले॥
मैं तो दास पुराना दासों का।

त्रिलोचन जी, “बस-बस, भैया ! तू तो बड़े काम को आदमी है और हमने तोय रख लियो।”
अब (ठाकुर जी) अन्तर्यामी सेवा करने लग गये और कोई जान नहीं पायो।
१०० साधु आ जायें, प्रसाद पायके जब सोवें तो उतने ही रूप धर लें और सबन्ह के जाय के पाँव दाबें, हर साधु सोचे हमारे ही पास है अन्तर्यामी।
काऊ ने सोचो प्यास लगी है तो पहले पहुँच जायें लौटा लेकर के। प्यासा साधु बोला, “अरे भाई ! अन्तर्यामी, तेरो नाम सच में अन्तर्यामी है, मोय प्यास लग रही और तू पहले से लौटा लेके आय गयो।”
अन्तर्यामी, “हाँ जी, मोय सेवा को अभ्यास है।”
ठाकुरजी ने बड़ी सेवा करी और १३ महीने तक सेवा करते रहे।
एक दिन त्रिलोचन भक्त की स्त्री गयीं पानी भरवे कुआ पै, तो वहाँ और गाँव की पनिहारी मिलीं (परस्पर में बातें करने लगीं),
पनिहारिन, “अरे वीर ! तेरे यहाँ तो बड़ो अच्छो सेवक आ गयो है अन्तर्यामी, सब काम कर दे।”
त्रिलोचन की स्त्री, “हाँ, सब काम कर दे, ढेर के ढेर बर्तन माँज दे, लकड़ी फाड़ दे, पानी भर दे, जहाँ जाय कोई काम बाकी नहीं रहे। काम करने की कहो और काम पूरो तैयार। लेकिन एक बात है, खावै बहुत, ५ किलो भोजन पूरो खाय जाय।”
उधर बुराई करी और इधर अन्तर्यामी गायब। उनकी ठहर थी कि हम से सेवा तुम जन्म भर करवा लो, लेकिन निन्दा करने पर चला जाऊँगा।
भगवान् शिक्षा दे रहे हैं कि हम लोगों को निन्दा नहीं करनी चाहिए (यह एक अक्षम्य पाप है)। महात्माओं ने लिखा है :-
संसार में सबसे बड़ी मैया मानी गयी, क्योंकि अपने हाथों से मल आदि धोवे बच्चा के, मैया पाप को नहीं धुल सकती है और जो दुष्ट लोग होते हैं वो जीभ से हम सबके पाप को निन्दा कर-करके अपनी जीभ से चाट-चाट के सब पाप को खा जाएँ। जो काम मैया नहीं कर सकती है वो काम निन्दक लोग (हम जैसे लोग) किया करते हैं, पाप तुमने किया निन्दा कर करके तुम्हारा सारा पाप खा लिया हमने जीभ से।
इसीलिये शास्त्र में कहा गया है, पराई निन्दा के समान पाप कुछ नहीं है।
तो जैसे ही अन्तर्यामी के बारे में त्रिलोचन जी की स्त्री ने पनहारिन से कहा कि अरी ! खावै बहुत, वैसे ही अन्तर्यामी गायब हो गये। अब गायब हो गये तो वहाँ सब काम फैल रहा है।
त्रिलोचन जी बोले, “अरे अन्तर्यामी ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ! ओ रे अन्तर्यामी ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ! ”
और दिना तो बुलाने की जरूरत नहीं थी, पहले ही हाजिर हो जाते थे। आज चिल्ला रहे हैं, अन्तर्यामी ! अन्तर्यामी ! ! अरे अन्तर्यामी ! ! !
कोई नहीं आ रहा है, त्रिलोचन जी समझ गये कि कोई न कोई किसी ने बुराई किया है, उसकी ठहर थी कि जिस दिन तुम बुराई करोगे हम यहाँ से चले जायेंगे।
भगवान् कभी नहीं चाहते हैं कि हमारा भक्त किसी की बुराई करे, निन्दा करे या पाप खावै। ये जीभ भगवान् के नाम के लिए है, भगवान् शिक्षा देते हैं कि तुम क्यों बुराई करते हो?
त्रिलोचन जी समझ गये थे, उतने में उनकी स्त्री आयी पानी भर के और उससे पूछा कि तेने क्या बुराई करी थी अन्तर्यामी की? पहले कुछ नहीं बोली चुप रही, बाद में कहा कि हाँ, अन्तर्यामी की निन्दा की थी पनिहारियों से कि ‘खावै बहुत’।
त्रिलोचन जी ने अपनी स्त्री से कहा, “अरे, तेने अन्तर्यामी को गायब करा दियौ।”
त्रिलोचन जी अन्तर्यामी के वियोग में पागल होकर के चारों ओर घूमने लग गये और पुकारने लगे,
अन्तर्यामी ऽ ऽ ऽ ! अन्तर्यामी ऽ ऽ ऽ ऽ !! कहाँ गया अन्तर्यामी ऽ ऽ ऽ ! ! !
मेरो प्राण अन्तर्यामी ! मेरो देह अन्तर्यामी !! ……………………………
मेरी मैया अन्तर्यामी ! मेरो बाबा अन्तर्यामी !! …………………………….
मेरो भैया अन्तर्यामी ! मेरो बन्धु अन्तर्यामी !! अन्तर्यामी ऽ ऽ ऽ ! ………..
सारा दिन बीत गया पागल की तरह, रात बीत गयी, अन्तर्यामी ! अन्तर्यामी ! ! चिल्लाते चिल्लाते। न खाना खा रहे हैं, न पानी पी रहे हैं। स्त्री भी चुप, क्या करे? पति पागल हो गया। दूसरा दिन बीत गया, दूसरी रात बीत गयी, अन्तर्यामी ! …. कहाँ? अन्तर्यामी! ! …..कहाँ?
चिल्लाते हुए तीन दिन-तीन रात बीत गयीं बिना खाये-पिये; तब आकाशवाणी हुई (बड़ी मीठी वाणी आकाश से आयी),“अरे त्रिलोचन जी !”
त्रिलोचन जी की ऊपर दृष्टि गयी, है तो कोई नहीं लेकिन आवाज आ रही है, बोले, “कौन है भैया !”
आकाशवाणी, “मैं हूँ तुम्हारा इष्ट, मैं ही तुम्हारे घर में सेवा करने के लिए आया था। देखो, हमारी-तुम्हारी ठहर थी कि जब निन्दा होगी तब हम वहाँ से चले जायेंगे। अब तुम भोजन करो, हमारी आज्ञा मानकर के। तुम कहो तो फिर से तुम्हारी सेवा कर सकता हूँ, बोलो क्या चाहते हो?”
अब त्रिलोचन जी चुप। भगवान् से कैसे कहें कि आप फिर से आओ, जूठे बर्तन माँजना, हमारी जूती को गाँठ देना, हमारे कपड़ों को धो देना, हमारी लंगोटी धो देना, कैसे कह सकता है भगवान् का भक्त।
त्रिलोचन जी हाय हाय करते हुए आर्तनाद करके पछाड़ खाकर धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़े और रो रो कर कहने लगे– “प्रभु ! , यह मुझसे कैसा भीषण अपराध हुआ हाय आपने ऐसी नीच सेवायें किया, मोरी साफ करते थे, मल-मूत्र तक, जूठे बर्तन माँजते थे आप, जूती गाँठते थे, आपने क्या नहीं किया। मैं तो पापी हूँ, नीच हूँ, मुझको तो डूब कर मर जाना चाहिए, आपसे मैंने सेवा ली।

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भक्त माधव दास जी

“भक्त के प्रारब्ध लेकर–बीमार पड़ गये श्रीजगन्नाथ भगवान्”

(भक्त माधव दास जी)

उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में एक भक्त रहते थे, श्री माधव दास जी अकेले रहते थे, कोई संसार से इनका लेना देना नही। अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे, और उन्हीं को अपना सखा मानते थे, प्रभु के साथ खेलते थे। प्रभु इनके साथ अनेक लीलाएँ किया करते थे। प्रभु इनको चोरी करना भी सिखाते थे भक्त माधव दास जी अपनी मस्ती में मग्न रहते थे।
एक बार माधव दास जी को अतिसार (उलटी-दस्त) का रोग हो गया। वह इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे, पर जब तक इनसे बना ये अपना कार्य स्वयं करते थे और सेवा किसी से लेते भी नही थे। कोई कहे महाराजजी हम कर दें आपकी सेवा तो कहते नही मेरे तो एक जगन्नाथ ही हैं वही मेरी रक्षा करेंगे। ऐसी दशा में जब उनका रोग बढ़ गया वो उठने-बैठने में भी असमर्थ हो गये, तब श्री जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर इनके घर पहुँचे और माधवदासजी को कहा की हम आपकी सेवा कर दें।
क्योंकि उनका इतना रोग बढ़ गया था कि उन्हें पता भी नही चलता था, कब वे मल मूत्र त्याग देते थे। वस्त्र गंदे हो जाते थे। उन वस्त्रों को जगन्नाथ भगवान अपने हाथों से साफ करते थे, उनके पूरे शरीर को साफ करते थे, उनको स्वच्छ करते थे। कोई अपना भी इतनी सेवा नही कर सकता, जितनी जगन्नाथ भगवान ने भक्त माधव दास जी की करते थे।
जब माधवदासजी को होश आया, तब उन्होंने तुरन्त पहचान लिया की यह तो मेरे प्रभु ही हैं। एक दिन श्री माधवदासजी ने पूछ लिया प्रभु से – “प्रभु ! आप तो त्रिभुवन के मालिक हो, स्वामी हो, आप मेरी सेवा कर रहे हो। आप चाहते तो मेरा ये रोग भी तो दूर कर सकते थे, रोग दूर कर देते तो ये सब करना नही पड़ता।” ठाकुरजी कहते हैं – “देखो माधव ! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता, इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की। जो प्रारब्ध होता है उसे तो भोगना ही पड़ता है। अगर उसको इस जन्म में नहीं काटोगे तो उसको भोगने के लिए फिर तुम्हें अगला जन्म लेना पड़ेगा और मैं नहीं चाहता की मेरे भक्त को जरा से प्रारब्ध के कारण अगला जन्म फिर लेना पड़े। इसीलिए मैंने तुम्हारी सेवा की लेकिन अगर फिर भी तुम कह रहे हो तो भक्त की बात भी नहीं टाल सकता। (भक्तों के सहायक बन उनको प्रारब्ध के दुखों से, कष्टों से सहज ही पार कर देते हैं प्रभु) अब तुम्हारे प्रारब्ध में ये 15 दिन का रोग और बचा है, इसलिए 15 दिन का रोग तू मुझे दे दे।” 15 दिन का वो रोग जगन्नाथ प्रभु ने माधवदासजी से ले लिया।
वो तो हो गयी तब की बात पर भक्त वत्सलता देखो आज भी वर्ष में एक बार जगन्नाथ भगवान को स्नान कराया जाता है (जिसे स्नान यात्रा कहते हैं)। स्नान यात्रा करने के बाद हर साल 15 दिन के लिए जगन्नाथ भगवान आज भी बीमार पड़ते हैं। 15 दिन के लिए मन्दिर बन्द कर दिया जाता है। कभी भी जगन्नाथ भगवान की रसोई बन्द नही होती पर इन 15 दिन के लिए उनकी रसोई बन्द कर दी जाती है। भगवान को 56 भोग नही खिलाया जाता, (बीमार हो तो परहेज तो रखना पड़ेगा)
15 दिन जगन्नाथ भगवान को काढ़ो का भोग लगता है। इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ धाम मन्दिर में तो भगवान की बीमारी की जांच करने के लिए हर दिन वैद्य भी आते हैं। काढ़े के अलावा फलों का रस भी दिया जाता है। वहीं रोज शीतल लेप भी लगया जाता है। बीमार के दौरान उन्हें फलों का रस, छेना का भोग लगाया जाता है और रात में सोने से पहले मीठा दूध अर्पित किया जाता है।
भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए है और अब 15 दिनों तक आराम करेंगे। आराम के लिए 15 दिन तक मंदिरों पट भी बन्द कर दिए जाते है और उनकी सेवा की जाती है। ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएँ। जिस दिन वे पूरी तरह से ठीक होते हैं उस दिन जगन्नाथ यात्रा निकलती है, जिसके दर्शन हेतु असंख्य भक्त उमड़ते हैं।
खुद पे तकलीफ ले कर अपने भक्तों का जीवन सुखमयी बनाये, ऐसे भक्तवत्सलता है प्रभु जगन्नाथ जी की।

इस साल 14 जून को स्नान यात्रा हुई थी और 15 दिन बाद 1 जुलाई को रथयात्रा होगी

“जय जय श्रीजगन्नाथ जी”

जय जय श्री राधे

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भक्त नंददास

विक्रम संवत् 1570 में सूकर क्षेत्र में श्री नंददास का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम जीवाराम था। कहा जाता है कि श्री नंददास ‘रामचरितमानस’ के प्रणेता और भगवान श्रीराम के परम भक्त तुलसी दास जी के चचेरे भाई थे। तुलसी दास जी इन्हें बहुत स्नेह करते थे। तुलसी दास के भक्तिमय जीवन का इन पर भी गहरा प्रभाव था। इसी कारण श्री नंददास जी भक्ति रस के पूर्ण मर्मज्ञ और ज्ञानी थे।

एक बार काशी में वैष्णवों का एक दल भगवान कृष्य के दर्शन हेतु द्वारिका जा रहा था। नन्ददास भी अपने राम के कृष्णरूप के दर्शन को उद्वेलित हो उठे। उन्होंने तुलसी दास जी से आज्ञा मांगी। ”मैं भगवान राम के कृष्ण रूप के दर्शन हेतु द्वारिका जाने की आज्ञा चाहता हूँ। मर्यादा पुरुषोत्तम का प्रेमरूप कितना मन मोहक होगा ?” अवश्य जाओ भाई !” तुलसी दास जी ने आज्ञा दे दी। और नंददास उस वैष्णव दल के साथ द्वारिका की तरफ चल पडे।

मार्ग में यह दल कितने ही संतों भक्तों के दर्शन कर रहा था। हर स्थान पर कृष्ण महिमा का गुणगान होता। कृष्ण के मनोहर रूप की झांकी का वर्णन संत इस प्रकार करते कि नंददास को प्रतीत होता कि श्यामल सूरत मयूर पंखधारी भगवान श्रीकृष्ण उनके समक्ष खड़े हैं। उन्हें भगवान कृष्ण में प्रीति लग गई और हर क्षण उनका हृदय व्याकुल हो उठा। उनका हृदय चाहता कि उन्हें पंख लग जाए और वह क्षण-भर में द्वारिका पहुँच जायें। प्रीति एक जलतरंग वायुतरंग की तरह होती है। जिससे प्रीति हो जाए उसके हृदय से वह तरंगित होकर टकराती है। नंददास की व्याकुलता चरम पर थी। वैष्णव दल ने उनकी यह स्थिति देखी तो उन्हें चलने में असमर्थ मानकर मथुरा में ही छोड़ कर द्वारिका की तरफ बढ़ गया।

नंददास अकेले रह गए। आगे बड़े तो महावन में मार्ग भटक गए । कालिन्दी के तट पर पहुँच गए। वहाँ श्री यमुनाजी के पावन दर्शन पाकर हृदय प्रफुल्लित हो उठा। मोह-माया ने भी अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और नंददास जी को प्रणाम कर भाग ली। लौकिक माया के बंधन हटे तो अलौकिक माया का ज्ञान हो गया। द्वारिका में ही क्या, कृष्ण तो ब्रज के कण-कण में निहित हैं जिसे चाह होती है उसे भगवान वहीं दर्शन दे देते हैं।

उधर वैष्णव समाज द्वारिका पहुँचा तो गोसाईं विट्ठलनाथ जी के प्रथम दर्शन हुए। सर्वज्ञ और परमभक्त श्री स्वामी विट्ठलनाथ ने सबको देखा। “ब्राह्मण देवता को कहाँ छोड़ दिया भक्तगणों ?” गोसाईं ने पूछा। ”कौन” सभी आश्चर्य से बोले। ”नंददास जी ? आपके साथ ही तो थे ? दिखाई तो नहीं दे रहे ?” ”वे तो चलने में असमर्थ थे। थकान के कारण जाने क्या-क्या बातें करने लगे।” ”भक्तो, जिसे स्वयं ब्रजराय ने बुलाया हो उसे थकान कैसे सता सकती है ? नंददास जी तो ठाकुर जी के परम प्रिय हैं। आप लोग निश्चिंत रहें। हम अभी उन्हें सादर बुलाते हैं।”

विट्ठलनाथ जी ने अपना एक शिष्य नंददास जी को सविनय बुला लाने भेज दिया। शिष्य ने नंददास जी को खोज लिया और गोसाई जी की प्रार्थना कह डाली। नंददास तत्काल चल पड़े और गोसाई जी के दर्शन पाकर धन्य हो गए। गोसाईं ने स्नेह से उन्हें हृदय से लगाया और उन्हें दीक्षा देकर माखन चोर का दर्शन कराया। तत्पश्चात नंददास ने बडे ही भाव और प्रेम से भगवान कृष्ण की लीला का काव्य वाणी में सरस गान किया। उनके हृदय में भगवतेम की सरिता बहने लगी। गोसाई जी भी भक्ति की उस सरिता के साक्षी थे। गुरु स्तुति का गान भी नंददास ने बड़े ही मधुर स्वर में किया। नंददास केवल भक्त ही नहीं थे बल्कि उच्च कोटि के कवि भी थे। उन्होंने सम्पूर्ण भागवत को भाष्य रूप दे दिया। यह एक अनूठी उपलब्धि थी। भागवत का यह रूप बड़ा ही सरल और सुबोध था। विट्ठलनाथ जी बड़े हर्षित हुए। ”नंददास तुम्हारा यह अनुवाद अति उत्तम है परन्तु इससे अन्य भक्त लोगों की जीविका चली जाएगी।” गोसाई जी ने कहा। और नंददास ने अपूर्व त्याग और निस्पृहता दिखाते हुए अपनी लिखित टीका यमुना की पवित्र धारा में अर्पण कर दी। ऐसे गुरुभक्त और संत शिरोमणि वक पाकर विट्ठलनाथ जी भी आह्वादित हो उठे। महाकवि नंददास संत समाज में श्रद्धैय हो गए।

परम कृष्ण भक्त सूरदास जी नंददास के घनिष्ठ मित्रों में थे। कवि से कवि की मित्रता साहित्य का सोपान है। महाकवि सूर ने नंददास को बोध कराने के लिए ‘साहित्य लहरी’ की रचना कर दी। फिर एक दिन उन्होंने नंददास से कह दिया। ”मित्र, एक सच्चे संत की तरह तुममें वैराग्य का अभाव है। वैराग्य की भावना कुछ पाकर उसे छोड़ देने से प्रबल होती है। अत: तुम्हें घर जाकर वैराग्य का ज्ञान लेना चाहिए।” मित्र की राय अमूल्य होती है। नंददास घर लौट आए और अपना विवाह कर लिया। गृहस्थाश्रम में रहकर वैराग्य की उत्पत्ति कर लेना ही भक्ति है। उन्होंने अपने गांव रामपुर का नाम श्यामपुर रख दिया। गृहस्थ में रहकर भी कृष्ण की प्रेममयी लीलाओं को माध्यम मान कर काव्य लिखते रहे। परन्तु कृष्ण का आकर्षण किसे चैन से रहने देता है ? एक दिन सब कुछ त्यागकर गोवर्धन चले आए। मानसी गंगा पर निवास किया। आजीवन वहीं उन्होंने कृष्णनाम जपा।

एक बार अकबर बादशाह की सभा में गायनगुरु तानसेन ने नंददास जी के एक पद को प्रेमपूर्वक गाया। उनके गायन में तो विशेषता थी ही परन्तु उस पद ने भी सारे दरबार को प्रेमोन्मत्त कर दिया। बादशाह अकबर तो जैसे झूम ही उठे। ”तानसेन इस सुंदर पद के रचयिता कौन हैं ?” सम्राट ने पूछा। ”महाकवि नंददास।” तानसेन ने बताया। तत्काल बादशाह ने तानसेन के साथ जाकर नंददास के दर्शन किए और उनसे सत्सर्ग का लाभ लिया।
कृष्णनाम को काव्य के रूप में आयाम देने वाले और अपनी भक्ति से सबको कृष्णमय कर देने वाले महाकवि नंददास जी ने संवत् 1640 (सन् 1583) में कृष्णलोक में वास कर परमधाम प्राप्त किया।

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श्रीदयालदास बाबाजी

श्रीदयालदास बाबा कब कहाँ से आये, किसके शिष्य थे और क्या भजन करते थे कोई नहीं जानता। पर वे अपने वैराग्य और भजनावेश के लिए जितना व्रजमण्डल में प्रसिद्ध थे, उतना ही गौड़मण्डल में भी। वे अपने पास कथा, करुआ, कौपीन और बहिर्वास के सिवा और कुछ न रखते। प्रायः ब्रज में ही जहाँ-तहाँ घूमते रहते। अकसर कंथा से सिर ढककर एक ही स्थान पर निश्चल भाव से चौबीस-चौबीस घण्टे बैठे रहते। दूर से लगता जैसे कोई गठरी रखी हो।
वे अधिकतर मौन रहते। पर मधुकरी भिक्षा के समय व्रजवासी गृहस्थ के दरवाजे पर उच्च स्वर से ‘हरे कृष्ण’ कहते। यदि वह उससे भी ऊँचे स्वर से ‘हरे कृष्ण’ कहता, तो भिक्षा के लिए रुक जाते, नहीं तो आगे बढ़ जाते। वे अन्धे थे, फिर भी चुटकी (आटा या चावल) भिक्षा करते थे और स्वयं पकाकर खाते थे।

राजार्षि वनमालीराय से वे कभी-कभी व्रजवासियों की सेवा के लिए कुछ अर्थ माँग लेते थे। पर अपने व्यवहार में पैसा-कौड़ी कभी नहीं लाते थे। यदि कोई कुछ दे जाता था, तो उसे राजर्षि बहादुर की पत्नी के पास रख देते थे। इस प्रकार राजार्षि बहादुर की पत्नी के पास तीन सौ रुपये हो गये तब एक दिन उन्होंने सब रुपये माँग लिए और यमुना किनारे बैठकर एक-एककर यमुना में फेंक दिये।

उनकी अलौकिक शक्ति का पता चला जब एक दिन उन्होंने राजरर्षि बहादुर के बड़े भाई श्रीगिरधारीदास बाबाजी (पूर्वाश्रम के श्रीअन्नदाबाबू) पर विशेष कृपा की। गिरिधारीदासजी उन दिनों गोवर्धन में गोविन्दकुण्ड पर भजन करते। वे दयालदास बाबा को साथ ले व्रज के कुछ गाँवों में प्राचीन लीला-स्थलियों के दर्शन करने गये। उन्हें हरनियां की बीमारी थी और वे ट्रस (कमर में बाँधने का एक यन्त्र) पहना करते थे। दूसरे दिन किसी कुण्ड में स्नान करते समय उन्होंने ट्रस खोला। दयालदास बाबा ने पूछा- ‘यह क्या है ?’ उन्होंने कहा-मुझे हरनियां है। हरनियां में इसे पहनना आवश्यक होता है।’
बाबा ने कहा-‘उसे फेंक दो। अब उसकी आवश्यकता न होगी।’

उन्होंने ट्रस फेंक दी। उसी समय से उनका हरनियां भी न जाने कहाँ चला गया। उन्हें सारा जीवन हरनियां की शिकायत फिर नहीं हुई। शेष जीवन में बाबा वृन्दावन में कालीदह पर सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबा की कुटिया के पीछे एक कुटिया में रहने लगे थे। श्रीप्राणकृष्णदास बाबा तब उनकी सेवा करते थे

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श्रीसीतानाथदास बाबाजी

( गोवर्धन )

पूर्वाश्रम के उत्कलवासी गोप, श्रीसीतानाथदास बाबाजी महाराज अनपढ़, पर अति सरल और उदार थे। गोविन्दकुण्ड, गोवर्धनमें श्रीनाथजी के मन्दिर के उत्तर एक कुटियामें रहते थे। शेष रात्रि में स्नानादिकर गिरधारी की सेवा के पश्चात् उनके सामने पाँच घण्टे लगातार क्रन्दन करते हुए नृत्य कीर्तन करते थे। उसके पश्चात् तुलसी की सेवा पूजाकर श्रीनाथजी के सम्मुख उत्कल भाषा में रो-रोकर प्रार्थनादि करते थे। दोपहर २ बजे मधुकरी को जाते थे । ज्येष्ठ मास में सूर्य की प्रखर किरणों से गिरिराज तट की बालु का अतिशय तप्त हो जाती थी। फिर भी बाबाके नियम में कोई परिवर्तन नहीं होता था । बिना छत्र पादुकाbके घर-घर मधुकरी के लिए जाते थे। लौटते समय प्रत्येक वैष्णव की कुटिया में जाकर कुछ-कुछ मधुकरी दे आते थे।

उन्हें कुछ गोप-गीत याद थे। उन्हीं का वे अधिकांश समय बड़े मधुरभाव से कीर्तन करते । नियमपूर्वक दो बार गोविन्दकुण्ड में स्नान करते । रात्रि में दो बजे उठ बैठते और तीन बजे प्रथम स्नान करते। एक बार श्रीअद्वैतदास बाबाजी ने, जो उनके निकट रहते थे, कहा- ‘इस समय स्नान करना उचित नहीं, क्योंकि यह आंसुरिककाल होता है । उन्होंने उत्तर दिया – मैं क्या करूँ ? बिलकुल अस्वतन्त्र हूँ। श्रीनाथजी, जिस समय जगा देते हैं, उसी समय उठ बैठता हूँ।’ जिस दिन सीतानाथजी अप्रकट हुए, उसके दो-तीन दिन पहलेसे उन्हें सान्निपातिक ज्वरातिसार था। उसमें भी उनका स्नानादि का नियम नहीं छूटा । अन्तिम रात्रि में वे अवश हो शय्या पर पड़े थे। माघ मास की भयंकर शीत थी । उस रात श्रीमतदासजी बराबर जागते रहे । ठीक तीन बजे कुण्डमें किसी के डुबकी लगाने का शब्द हुआ। बाहर निकलकर देखा तो वृद्ध सोतानाथ बाबा स्नान कर रहे थे।

बारह बजे दिनमें वे श्रीजद्व तदाससे बोले- ‘अद्वैतदास ! मुझे श्रीनाथजीके सामने ले चलो।’ ‘मैं अकेला कैसे ले चलूं ?” अद्वै तदास जी ने उत्तर दिया।

‘सहारा तो लगा सकोगे।’ उन्होंने फिर आग्रह किया। श्रीअ दास बाबा हाथ पकड़कर उन्हें श्रीनाथजीके सामने ले गये।

श्रीनाथजीके सामने वरुण वृक्षके नीचे बेदीपर बैठा दिया। तब वे बोले ‘कुण्डका जल लाकर स्नान करा दो ।’ स्नानके पश्चात् कहा- ‘तिलक कर दो।’ तिलक हो जाजैपर पूछा- सब लोगोंने प्रसाद पा लिया है ?”

अर्द्ध तदासजीने कहा- ‘पा लिया है ?’

तो तुलसीजीको स्नान करा स्नानीय जल मुझे पान करा दो।’

तुलसीका स्नान-जल जैसे ही उनके मुखमें दिया, उन्होंने शरीर छोड़ दिया। कहने को आवश्यकता नहीं कि वृन्दादेवीने उन्हें ले जाकर राधारानी के चरणोंमें समर्पित कर दिया।

वृन्दादेवीका साक्षात्कार उन्हें पहले ही हो चुका था; यह बात सर्वविदित थी। एक अद्वै तदास बाबासे उन्होंने कहा, वृन्दादेवीको माधुरीका वर्णन करनेको। वे बोले- मैं क्या जानूं उनकी माधुरी। मैंने

क्या उन्हें देखा है ?”

‘तो सुनो’ श्रीसीतानाय बाबाने कहा और भावाविष्ट हो वृन्दादेवी की रूपमाधुरीका इस प्रकार वर्णन किया कि उसकी स्फूति अद्वै तदास बाबाके हृदय में स्वतः होने लगी ।

बृन्दादेवीकी उनपर कितनी कृपा थी, यह इस बातसे भी स्पष्ट है कि जिस तुलसीके पौधेको कीड़ा चाट जाता और जिसके हरा होनेकी कोई सम्भावना न रहती, वह उनके स्नान कराने मात्रसे फिर हरा-भरा हो जाता ।

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श्रीस्वामी बलदेवदासजी


( वृन्दावन )

जगत का नियम है पहले साधन, पीछे सिद्धि; पहले कुआ खोदना, फिर पानी पीना। पर परमार्थं जगत में कभी-कभी इसका उल्टा होता है- पहले सिद्धि होती है, पीछे साधना होती है। भगवान् के नित्य-सिद्ध या कृपा-सिद्ध भक्तों के जीवन में ऐसा ही होता है। उनके नित्य-सिद्ध परिकरों को सिद्धि के लिए साधना नहीं करनी होती सिद्धि तो उन्हें अनादिकाल से ही प्राप्त रहती है। वे जगत में आविर्भूत होते हैं भगवदिच्छा से जगत के जीवों के लिए साधना का आदर्श उपस्थित करने । कृपा सिद्ध जीवों को भी सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना नहीं करनी होती। उन पर बिना साधना के ही भगवत कृपा बरस पड़ती है। सच तो यह है कि भगवत कृपा साधन-सापेक्ष है ही नहीं। भगवान् परम स्वतन्त्र हैं। जिसपर इच्छा होती है कृपा करते हैं। कभी-कभी ऐसे व्यक्ति पर भी अनायास कृपा कर देते हैं, जिसने कोई साधन-भजन किया ही नहीं । पर जब उसके ऊपर कृपा हो जाती है, तब वह साधन-भजन के सिवा और कुछ करता ही नहीं। उसपर पहले कृपा होती है पीछे उसका भजन होता है। श्रीस्वामी वलदेवदास जी के जीवन में भी ऐसा ही हुआ। उन्हें बाल्यावस्था में ही पहले भगवत्प्राप्ति हुई। फिर अबाध गति से वह चली उनके भजन-साधनमय पावन जीवन की निर्मल धारा ।

व्रज के किसी ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर वे आठ वर्ष की अवस्था में ही बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात् वीतराग हो घर से निकल पड़े और द्वारिका जाने वाले साधुओं की मण्डली के साथ हो लिये। द्वारिका में जब रणछोर जी के मन्दिर में गये, रणछोर जी का भोग लग रहा था। मन्दिर के दरवाजे पर परदा पड़ा हुआ था और पुजारी जगमोहन में इधर-उधर डोल रहा था। उस समय वलदेवदास जी को एकाएक न जाने कैसा आवेश हुआ, वे पुजारी की पीठ मुड़ते ही परदा उठाकर मन्दिरके भीतर घुस गये। वहाँ उन्हें रणछोर जी के साक्षात् दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि मूर्तिरूप में तो वे सिंहासन पर विराजमान हैं और प्रत्यक्षरूप में नीचे बैठे भोग आरोग रहे हैं। वे तन्मय हो, उनका रूप निहारते रहे। थोड़ी देर में जत्र भोग आरोगने वाले स्वरूप अन्तर्धान हो गये,वे भी चुपके से बाहर निकल आये। उन्हें किसी ने न मन्दिर के भीतर जाते देखा, न बाहर आते। इसलिए किसी के द्वारा रोक-टोक या डाँट-फटकार भी नहीं की गयी। जिसे रणछोर जी स्वयं भीतर बुलाकर दर्शन देना चाहें और जिसका मार्ग उनकी शक्ति योगमाया अपने आप प्रशस्त कर दें, उसे किसी के द्वारा रोका जाना सम्भव ही कब है ?

उसी दिन रात में रणछोर जी ने बलदेवदास जी को स्वप्न में आज्ञा की –’दिल्ली के निकट लुकसर ग्राम में ठाकुरदास मेरा परम भक्त रहता है। उससे जाकर दीक्षा लो और वह जिस रीति से उपदेश करे, उस रीति से भजन करो।’ उधर ठाकुरदास जी को भी उन्होंने इसी प्रकार आज्ञा देकर कहा ‘मेरा भक्त बलदेवदास तुम्हारे पास आ रहा है। बालक जानकर उसकी उपेक्षा न करना। उसे दीक्षा देकर भजन की रीति बता देना ।’

रणछोर जी ने जिसके लिए इतना किया, उसका दिल्ली का मार्ग भी अपने-आप प्रशस्त हो जाना था। द्वारिकाजी में बालक वलदेवदासकी भेंट हुई कुछ चरणदासी सन्तों से, जो दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने प्रेम से उसे ठाकुरदास जी के पास ले चलने का आश्वासन दिया। वह उनके साथ वहाँ पहुँच गया। उसे देखते ही ठाकुरदास जी ने कहा- ‘आओ वत्स, मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा में था और उसे हृदय से लगा लिया । मन्त्र दीक्षा देकर भजन की रीति का उपदेश किया।

बलदेवदासजी उनके पास रहकर उनकी और उनके ठाकुर श्रीयुगलबिहारीजी की तन-मनसे सेवा करने लगे । उस अल्पावस्था में ही उन्होंने ठाकुर-सेवा की सारी विधि सीख ली। युगलबिहारीजी की रसोई भी वह स्वयं बनाने लगे।

ठाकुरदास जी एक उच्चकोटि के सन्त थे। उनके सम्बन्ध में एक घटना प्रसिद्ध है। एक बार उनके आश्रम में एक अभ्यागतका अचानक देहान्त हो गया। पुलिस ने आश्रमवासियों को परेशान करना शुरू किया। उस समय ठाकुरदासजी ने मुर्दे को अपनी खड़ाऊँ से ठोकर मारते हुए कहा- ‘उठ, ऐसे क्यों पड़ा है साधुओं को परेशान करने के लिए।’ वह झट उठ खड़ा हुआ । तभी से लोग उन्हें एक सिद्ध सन्त के रूपमें जानने लगे ।

वे मानसी सेवा में दो-दो दिन एक ही आसनपर बैठे रह जाते। उन्हें देह की बिलकुल सुध न रहती प्रसाद सेवन करते समय वे कभी रोदन करने लगते, कभी बहुत प्रसन्न होने लगते । वलदेवदास जी यह देखकर विस्मय में डूब जाते। जब वे उनसे इसका कारण पूछते, तो वे टाल जाते । एक दिन उन्होंने इसका रहस्य जानने का बहुत हठ किया। तब ठाकुरदास जी ने कहा -‘जब मै भोजन करता हूँ, तब गोपाल जी भी मेरे साथ बैठकर मेरे थाल में से भोजन करने लगते हैं। मैं कभी यह सोचकर रो देता हूँ कि गोपालजी मेरा जूठा खाते हैं, कभी यह सोचकर प्रसन्न होता हूं कि वे मुझमे कितना प्रेम करते हैं।’ ठाकुरदासजी वलदेवदासजीको अपने इस प्रकार के अनुभवोंbकी बातें अकसर बताया करते गलदेवदासजी पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। उनका भक्तिभाव गुरुदेव के सान्निध्य में दिन-पर-दिन बढ़ता गया। वे भी गुरुदेव की तरह मानसिक चिन्तन में लीन रहने लगे।

कुछ दिन पश्चात् ठाकुरदासजी धाम पधार गये। बलदेवदासजी उनके स्थान के महन्त हुए। महन्ताई का भार वे अधिक दिन तक न झेल सके । उसे अपने गुरुभाई श्रीध्यानदासजी पर डाल केवल गुरुदेव की खड़ाऊं लेकर वे भ्रमण के लिए निकल पड़े। चारों धामों की यात्रा की । उसके पश्चात् अधिकतर वृन्दावन में कालीयदह पर या व्यास घेरे में सन्त गोविन्ददास जी के पास रहने लगे। उन्होंने अपने लिए कभी किसी कुटिया का निर्माण नहीं किया।

उन दिनों शुक-सम्प्रदाय के दिल्ली गुरुद्वारे के रसिक सन्त श्रीमोहनदासजी जिनका प्रेम पयोधि’ नामका ग्रन्थ है, वृन्दावनके युगल घाटपर ग्वालियर वाले प्राचीन मन्दिर में आकर रहा करते। उनका संग बलदेवदासजी अधिक में अधिक करते और उसमें अनिर्वचनीय सुख का अनुभव करते। दोनों मन्न प्रिया प्रियतमकी रसमयी बातें करते-करते भाव-समाधि में डूब जाते ।

वलदेवदासजी नित्य प्रातः ३ वजे वृन्दावन की परिक्रमा को जाया करते। एक दिन परिक्रमा के मार्ग में उन्होंने देखा कि एक जगह बड़ा भण्डारा हो रहा है और बहुत से साधु बैठे प्रसाद पा रहे हैं। उन्होंने वलदेवदास जी को भी प्रसाद पाने को कहा । बलदेवदासजीने कहा- ‘मैं इस समय प्रसाद नहीं पाऊँगा ।’ ‘तो परोमा लेते जाओ’, उन्होंने आग्रह करते हुए कहा । बलदेवदासजीने परोसा अंगोछे में बाँध लिया। कुटियापर पहुँच कर नित्य नियमसे निवृत्त हो जब अंगोठा खोला, तो यह देखकर वे आश्चर्यचकित हुए कि उसमें अखाद्य भरा है। उन्होंने अंगोछे सहित उसे फेंक दिया और फिरसे यमुना-स्नान कर अपने आपको पवित्र किया ।

दूसरे दिन जब वे फिर परिक्रमाको गये, तो साधु-रूप में उन भूतोंकी मण्डली से फिर उनकी भेंट हुई। वे कौतूहलवश रुककर उनसे बातें करने लगे। उन्होंने कहा – ‘क्या तुम बता सकते हो, तुम्हारी ऐसी गति क्यों हुई ?”

उत्तरमें उन्होंने कहा – ‘हम वृन्दावनके ही हैं। हमने ठाकुर-सेवा के – लिए प्राप्त धन और सामग्री का स्वयं उपभोग किया था। इसलिए हमें यह योनि प्राप्त हुई है । वृन्दावन में रहने के कारण यमराज का हमारे ऊपर अधिकार नहीं था। वे हमें न ले जा सके। इसलिए धाम में रहकर ही हम भुतेश्वरके शासन में अपने किये का फल भोग रहे हैं।’

वलदेवदास जी अच्छे संगीतज्ञ थे। वे नित्य तानपूरे पर आवेश में देर तक ठाकुरजी के सामने गान करते थे। श्रीमद्भागवत का नित्य पाठ करते थे और एक हजार दानों की तुलसी को मालापर नाम-जप करते थे। जपके साथ प्रेम-मञ्जरी के आनुगत्य में मानसिक स्मरण करते थे। व्रज को लताओ के नीचे बैठकर लीला स्मरण करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। कभी-कभी किसी लता के नीचे बैठकर स्मरण करते उन्हें सारा दिन बीत जाता था। क्षुधा तृष्णा का भी लोप हो जाता था।

एक बार वे बरसाने गये हुए थे। यहाँ विलासगढ़ के निकट लताओंके नीचे बैठे भजन कर रहे थे। भजनमें इतना आवेश हो गया कि वे लगातार तीन दिन तक उसी स्थानपर बैठे भजन करते रहे। उनकी अयाचक वृति थी। किसी से खाने के लिए कुछ मांगने का प्रश्न ही न था। किसी के यहां जाकर उन्हें कुछ दे आने का भी प्रश्न नहीं था, क्योंकि उनका किसी को पता ही न था। उस समय श्रीराधारानी ने पुजारी से स्वप्न में कहा- ‘मेरा अनन्य भक्त बलदेवदास विलासगढ़ के निकट तीन दिनसे भूखा पड़ा है। उसे मेरा प्रसाद पहुंचा दो।’ पुजारी ने तुरन्त श्रीजी की आज्ञाका पालन किया ।

बलदेवदासजीने प्रेमाश्रु विसर्जन करते हुए श्रीजीका प्रसाद प्रेमसे ग्रहण किया। फिर प्रतिष्ठाके भयसे तुरन्त उस स्थानको छोड़ वे गहवरवन चले गये। वहां एकान्त में रो-रोकर श्रीजीसे कहने लगे- ‘हाय, करुणामयी ! तुम इस अधमपर इतनी कृपा करती हो। फिर अदृश्य रहकर विरहकी वेदना क्यों देती हो ? परोक्ष में कृपाकर उत्कण्ठाका वर्धन करती हो । प्रत्यक्ष में दूररहकर प्राणोंका मर्दन करती हो। कब तक इस तरह प्यास बढ़ाकर बिना बुझाये तड़पाती रहोगी स्वामिनी ?’

इस प्रकार मन-ही-मन जब वे आक्षेप कर रहे थे, उन्होंने राधारानी को देखा सखियों सहित वन-बिहार में फूल चयन करते और उनकी ओर प्यार से दृष्टि फेरकर कहते- ‘मैं दूर कब हूँ तुझसे पगली ?”

तभी से उनकी स्वरूप सिद्धि हो गयी और वे सिद्ध देह से मञ्जरी रूप में राधा-कृष्ण की अटकालीन सेवा में तल्लीन रहने लगे। बाहरी सेवा पूजा उन्हें कुछ भार-स्वरूप लगने लगी। वे किसी योग्य शिष्य की कामना करने लगे जिसे अपने ठाकुर और गुरुदेव की पादुका सौंप सकें। उसी समय उन्हें श्रीजी की प्रेरणा हुई अलवर के पास बहादुरपुर जाने की, जहाँ चरणदासी सन्त श्रोडण्डोती रामजी का स्थान और उनके बिहारीजीका मन्दिर है। वहाँ श्रीशिवदयालजी नाम के एक नव किशोर अपनी ननिहाल में रहकर विद्याध्ययन करते थे। उनकी बिहारी जी के मन्दिर में बलदेवदासजी से भेंट हुई। बलदेवदास जी जान गये कि उनके द्वारा भविष्य में चरणदासी सम्प्रदायका विशेष उत्कर्ष होगा। इसलिए उन्हें शिष्य बनाकर और उन्होंको अपने ठाकुर और गुरुदेव की पादुका सोंपकर वे निश्चिन्त हुए। वही श्रीसरसमाधुरी शरणजी के नामसे चरणदासी सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध रसिक सन्त हो गये हैं।

गुरुदेव की पादुका और अपने सेवित श्रीविग्रह को सरसमाधुरीजी को सौंप देने के पश्चात् अब उनके पास अपने शरीर के सिवा और कुछ न रह गया। सरसमाधुरी शरणजीको अपनी इस अलौकिक सम्पत्ति को सौंप देना इस बात का संकेत था कि वे शरीर को भी वसुन्धरा को सौंपकर अपनी लीला संवरण करने जा रहे हैं । तदनुसार सं० १६५८, आषाढ़ सुदी नवमी को उन्होंने अपनी लौकिक लीला संवरण कर राधा-कृष्णकी दिव्य लीला में प्रवेश किया “

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स्वामी श्रीकृष्णानन्ददासजी ( हिंडौल )


स्वामी कृष्णानन्दजी के पूर्वाश्रमका नाम था श्रीकर्मचन्द । उनका जन्म सन् १८८३ में पंजाब के जालंधर जिले के अन्तर्गत बुण्डाला नामक उपनगर में उच्च गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता का नाम था श्रीभोलाराम, माता का श्रीमती रली । दोनों बड़े सदाचारी और धर्मात्मा व्यक्ति थे। गीता और रामायण के पाठ और साधु-महात्माओ के संग में ही उनका अधिकांश समय व्यतीत होता था।

माता-पिता के धार्मिक संस्कारों का प्रभाव बालक कर्मचन्द पर पड़ना स्वाभाविक था । वह घ व प्रह्लादादिके चरित्रोंको बड़े चावसे सुनता और उनका मनन करता । हिन्दी और संस्कृत पढ़ने में उसकी स्वाभाविक रुचि थी। पर पंजाब में उर्दू का प्रचार अधिक था। माता-पिता ने उसे उर्दू मिडिल रास कराकर बड़े भाई श्रीदोलतरामजीके पास अंग्रेजी पढ़ने के लिए कालका ज दिया।कर्मचन्द की उम्र उस समय चौदह वर्ष की थी। उसने अपने जीवनका लक्ष्य पहले हो स्थिर कर लिया था। उसे घ व प्रह्लादकी तरह साधनामय जीवन व्यतीतकर भगवत साक्षात्कार लाभ करमा था। अंग्रेजीकी शिक्षाका उस लक्ष्यसे कोई सम्बन्ध था नहीं । उसे संस्कृत पढ़कर शास्त्राध्ययन द्वारा अपने भगवत प्राप्तिके मार्गको प्रशस्त करना था। पर माता-पिता उसके सस्कारोंसे प्रसन्न होते हुए भी उसे एक सुशिक्षित, सुसम्पन्न उच्च पदाधिकारी के रूप में देखना चाहते थे। इसलिए उसे अंग्रेजी पढाना आवश्यक समझते थे।

कर्मचन्द इस समय अपने जीवन पथके एक महत्वपूर्ण चौराहेपर खडा था उसे निर्णय करना था, वहाँ से उसे किधर जाना है। निर्णय करते उस देर न लगी। उसने सोचा कि माता-पिता और बड़े भाईके अधीन रहकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में उसे बड़ी मुश्किलोंका सामना करना पड़ेगा। इसलिए उसने संसार त्यागकर एक स्वतन्त्र पथका पथिक बननेका निश्चय कर लिया।

आज कर्मचन्द घरसे भागकर काशी चला आया है। विश्वनाथ के दर्शन कर गंगा के तटपर चिन्तित बैठा है और विश्वनाथ बाबा से मन-ही-मन कुछ प्रार्थना कर रहा है। उसके गौरवर्ण और तेजपूर्ण कलेवर पर काशी के एक बड़े मठाधीशकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने निकट जाकर पूछा- वत्स, तुम कहाँसे आये हो ? कैसे चिन्ता में बैठे हो ?’

कर्मचन्द ने अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। साथ ही विद्याध्ययन और सन्यास- ग्रहण करने का अपना निश्चय प्रकट किया। मठाधिपति ऐसे ही एक नवयुवक की खोज में थे। उन्होंने उसके अध्ययनादि को समुचित व्यवस्था देने का वचन दिया और उसे अपने साथ मठ में ले गये।

दस वर्ष तक कर्मचन्दने उस मठ में रहकर संस्कृत व्याकरण, न्याय मिमांस और शांकर-वेदान्तका अध्ययन किया। इसी बीच संन्यास-दीक्षा भी ग्रहण की। नाम हुआ श्रीकृष्णानन्द । स्वामी कृष्णानन्दजी को मठाधिपति ने मठका सारा भार सौप देने का पहले ही निश्चय कर लिया था। उन्हें गद्दी पर बैठा देने के लिए वे एक शुभ तिथि की प्रतीक्षा करने लगे ! स्वानी कृष्णान्दजी अब अपने जीवन के एक और चौराह पर आ खड़े हुए थे। उन्हें निश्चय करना था कि उन्हें मठाधीशका वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत करना है, हाथी घोड़े, नौकर-चाकर, सोने-चाँदीके छत्र-सिंहासन और विलास की अन्य सामग्री का उपभोग करना है, या विरक्त संन्यासी के कंटकाकीर्ण पथका अवलम्बन करना है। मठाधीशका वैभव उन्हें अपने निर्दिष्ट पथसे विचलित करने में असमर्थ था। पर वे एक धर्मसंकट में पड़ गये थे। जिस मठाधिपतिने उनके लिए इतना कुछ किया था उन्हें अपना भार सौंप देनेके उद्देश्य से उसकी सारी आशाओं पर वे सहसा पानी कैसे फेर देते ? एक वे दिन यही सब सोचते सोचते उन्हें झपकी लग गयी। अर्धनिद्रित अवस्था में उन्होंने देखा कि एक सुन्दर गौरवर्ण बालक उनसे कह रहा है-‘यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो, तो इस स्थानको छोड़कर चले जाओ।’

दूसरे दिन प्रातः वे दण्ड-कमण्डलु और ‘खण्डनखाद्य’ नामक ग्रन्थ लेकर मठसे निकल पड़े। गंगा स्नानकर श्रीविश्वनाथजी के दर्शन किये और गंगाके किनारे-किनारे पश्चिमकी ओर चल दिये। ढाई साल तक गंगा भ्रमण करते रहे। दिनमें एक बार किसी गाँवसे भिक्षा कर लेते। यदि गांव मार्गमें न पड़ता तो गङ्गाजल पीकर ही रह जाते। अधिकतर मौन धारणकर रहते। आवश्यकतानुसार किसीसे थोड़ा बहुत आलाप करते ।

इस बीच उन्होंने यथासम्भव साधुसंग भी किया और जिसने जो बताया उसके अनुसार ध्यान प्राणायामादि कर शान्ति लाभ करने की चेष्टा की पर उन्हें वास्तविक शान्ति न मिली। अन्त में चलते-चलते वे अनूपशहर पहुँचे, जहाँ गङ्गा-किनारे नावमें श्री अच्युत मुनि रहते थे। वे एक विद्वान और अनुभवी महात्मा थे। उनके दर्शन और उपदेशसे उन्हें कुछ शान्ति मिली । उन्होंने उन्हें भावुक और रसिक जान ब्रजमे रहकर भजन करनका उपदेश किया |

कृष्णानन्दजी वृन्दावन पहुँच गये। वहां रासबिहारीकी रासलीला देख एकाएक उनका कायापलट हो गया। उनका ब्रह्मज्ञान वैसे ही विलीन हो गया, जैसे सूर्यके प्रकाश में दीप का प्रकाश विलीन हो जाता है। रासनृत्यमें रास-बिहारी की थिरकन के साथ उनके प्राण भी थिरकने लगे। उनका हृदय रस से परिपूर्ण हो गया। वे समझ गये कि जिस शान्ति की वे इतने दिनों से खोज में थे वह उन्हें रासबिहारी के चरणतल में ही मिल सकती है, अन्यत्र कहीं नहीं । रासलीला देखकर उनकी इच्छा हुई श्रीमद्भागवत का अध्ययन करने ।

वे दिनभर रास देखते और श्रीमद्भागवत का अध्ययन करते । जहां कहीं रास होता वहीं पहुँच जाते। रासमें बराबर खड़े रहकर ठाकुरजी को पंखा झलते या घमर हुलाते। रास-लीला का चिंतन करते-करते रात में जहाँ स्थान मिलता सो जाते।

उस समय व्रज में बहुत से भजनानन्दी और सिद्ध गौड़ीय महात्मा रहते थे, जिनमें पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी महाराज मुख्य थे । कृष्णानन्दजीने उनका संग किया। उनके संग से उनमें परम करुण, पतित पावन श्रीगौरांग महाप्रभु की भक्ति का उन्मेष हुआ बँगला भाषा सीखकर व श्रीचैतन्य चरितामृत और श्रीचैतन्य भागवतादि ग्रन्थों का पाठ करने लगे । दिन पर दिन श्रीगौरांग महाप्रभु में उनकी निहा-भक्ति बढ़ती गयी। उन्होंने किसी गौड़ीय महात्मामे दीक्षा लेकर महाप्रभु के चरणोंमें आत्मसमर्पण करने का निश्चयकर लिया।

कुछ दिन बाद वे किवाठिवन में एक कुटियामें रहकर भजन करने लगे। उस समय श्री माधवदास बाबाजी भी किवाढ़िवन में रहते थे। जैसा हम पहले वर्णन कर आये हैं श्रीमाधवदास बाबाजी एक सिद्धकोटिके वैष्णव सन्त थे। उन्हीं की कृपा से कृष्णानन्दजी को वैष्णव गुरु की प्राप्ति हुई। उन्होंने मध्वगोड़ीय सम्प्रदाय में दीक्षा ग्रहण करने के लिए उन्हें उत्कण्ठित देखकर कहा- ‘तुम्हारे से विद्वान और तेजस्वी पुरुषके लिए योग्य गुरु हैं १०८ श्रीप्राणगोपाल गोस्वामी प्रभुपाद वे नित्यानन्द प्रभु के वंशज और माध्वगौडीय वैष्णव सम्प्रदायके मुख्य स्तम्भ हैं। कुछ दिन उनके वृन्दावन आनेकी प्रतीक्षा करो। मैं उन्हींसे तुम्हें दीक्षा दिलबाऊंगा।’

कृष्णानन्दजी श्रीप्राणगोपाल प्रभुपादके वृन्दावन आगमनकी उत्कण्ठा सहित प्रतीक्षा करने लगे। कुछ ही दिनों बाद प्रभुपादका शुभागमन हुआ।

उनके शुभागमनके साथ ही उनकी अमृतमयो कथाका शुभारम्भ हुवा कथा सुनकर कृष्णानन्दजी इतना प्रभावित हुए कि मन-ही-मन उन्हें गुरु रूप वरण किये बिना न रह सके पीछे एक शुभ दिन शुभ महूर्तमें उनसे दीक्षा ग्रहण की । दीक्षा ग्रहण कर वे व्रज के हिंडील ग्राम में रहकर भजन करने लगे यह मांट तहसील में नन्दघाट से दो मील दूर एक सुन्दर ग्राम है। इसके उत्तर में कुछ प्राचीन खण्डहर और जंगल हैं। यहीं एक ऊँचे स्थानपर, जहाँनन्दघाटके दर्शन होते हैं, गांववालों ने अपने आय से एक कुटियां का निर्माण किया। कृष्णानन्द बाबा उसी में रहने लगे। बीच-बीच में व्रज के अन्य स्थानांपर चले जाते या व्रज में भ्रमण करते। पर घूम-फिरकर वहीं आ जाते

कुछ दिन भजन करते हो गये, तो उन्हें एक बड़ी समस्याका सामना करना पड़ा। गुरुदेवने उन्हें मधुर भाव की उपासना का उपदेश किया था। पर उनका हृदय उसे नहीं स्वीकार करता जान पड़ रहा था। उनकी स्वाभाविक रुचि सख्य-भावकी उपासनामें थी। बहुत चेष्टा करनेपर भी वे मधुर भाव को नहीं अपना पा रहे थे। उनका सख्य-भाव दिनपर दिन और दृढ़ होता जा रहा था। चिन्ता यह थी कि गुरुदेव की आज्ञाके विरुद्ध समय रस की उपासना में क्या उन्हें सफलता मिल सकेगी। एक दिन जब उन्हें गुरुदेव के वृन्दावन आगमन का सम्वाद मिल चुका था, वे उनसे इस समस्या का समाधान कराने के उद्देश्य से वृन्दावन चल पड़े। वृन्दावन के निकट मार्ग में उन्हें एक कागज पड़ा दिखा प्रभु की प्रेरणा से उन्होंने उसे उठा लिया। खोलकर देखा तो उसमें उनकी समस्या के उनके भावानुकूल समाधान का स्पष्ट इंगित था। उसे पढ़ उनका हृदय भर आया। नेत्रों मे अश्रुधार बह निकली । उसी भाव-विभोर अवस्था में उन्होंने गुरुदेव के निकट अपनी स्थिति का और कागज द्वारा प्राप्त उस दंवो इंगित का वर्णन करते हुए उनसे आवश्यक निर्देश की प्रार्थना की। गुरुदे वने सख्य भाव में उनकी स्वाभाविक रुचि देख सहर्ष उस भाव की उपासना के लिए आज्ञा दे दी।

तबसे दिन-प्रतिदिन उनकी भजन में तल्लीनता बढ़ती गयी। जन्म जन्मान्तर के अपने सखा श्रीकृष्ण से मिलने के लिए उनके प्राण छटपटाने लगे। हर समय उसकी याद में अश्रु बहाते रहते। कब सोते, कब जागते, कोई जानता नही; क्योंकि सन्ध्यांकाल के एक-दो घण्टे का समय छोड़ और किसी समय उनके पास कोई न जा पाता। कई बार लोग कौतूहलवश जब अर्धरात्रि में उनकी कुटियापर गये, तो देखा कि वे नहीं हैं और कहीं दूर जलसे उनके कृष्ण-विरह में रोदन करने की आवाज आ रही है। एक बार उनके एक अनन्य भक्त श्रीरामचरणदासने उस आवाज का अनुसरण करते जंगल में प्रवेश किया, तो देखा कि वे अपने दोनों हाथोंसे एक वृक्ष की डाल पकड़कर गद्गद कण्ठ से एक श्लोक गा रहे हैं, जिसकी प्रथम पंक्ति थी
‘श्यामेन साकं गवां चारणाय मातस्तवाप्र प्रवदामि योनः ।
‘अर्थात्, हे मात यशोदा ! मैं दीन भावसे तुमसे प्रार्थना करता हूँ । मुझे श्यामसुन्दरके साथ गोचारण की आज्ञा प्रदान करो।

इस प्रकारको उनकी दिव्योन्मादकी अवस्था कई वर्ष रही। अन्त में एक दिन नन्दग्राम में जब वे श्रीकृष्णचन्द्र के मन्दिर में उनके दर्शन करते हुए उन्हें खरी-खोटी सुना रहे थे, उन्होंने देखा कि श्रीकृष्णचन्द्र अपनी दिव्य श्यामकान्ति बिखेरते हुए मन्दिरसे निकलकर बाहर आये और थोड़ी देर में वापस जाकर पुजारीसे बोले-‘जा बाबाजी मोते छेड़खानी करे है। जाको खायबेको रोटी दे दे।

बस अब भक्त और भगवान्‌की परस्पर छेड़-छाड़ आरम्भ हो गयी। • इसी समय कृष्णानन्दजी की ग्वारिया बाबासे मैत्री हो गयी। ग्वारिया बाटा भी सध्य-भाव के एक सिद्ध महात्मा थे। उस समय वे रंगजी के मन्दिरvके पूर्वी फाटकbके ऊपरवाले कमरे में रहते थे। कृष्णानन्दजी भी वहाँ जाकर उनके साथ रहने लगे। दोनों सखाओं की खूब घुटती। दोनों प्रौढ़ावस्था को प्राप्त होते हुए भी बालकृष्णके बाल सखा होनेbका अभिमान करते। दोनों एक अनिर्वचनीय भाव-जगत्में विचरते हुए कृष्णचन्द्र के साथ तरह-तरह के लीला रंग में खोये रहते। एक दिन ग्वारिया बाबा ने कृष्णानन्दजी से कहा ‘नन्दबावाने आज्ञा की है पाठशाला में पढ़ने जानेbकी उन्होंने कहा है- तुम लोग कृष्णके साथ मिलकर बहुत ऊधम करते हो। इसलिए पाठशाला जाय करो। तो चलो पाठशाला चला करें, नहीं तो बाबा मारेंगे।’ दोमं वृन्दावनके प्रेम महाविद्यालय की प्रथम कक्षामें जाकर बैठने लगे। उस समय कृष्णानन्दजी का पाण्डित्य न जाने कहाँ लुप्त हो गया। जो बड़े- बड़े पण्डितोंकी वेद-वेदान्त सम्बन्धी शंकाओ का समाधान करते थे, वे ग्वारि बाबाके साथ अ, आ, इ, ई पढ़नेमें लग गये। यह क्रम तबतक चलता रह जबतक दोनोंको इस भावमें स्थिति रही। विद्यालयके अध्यापक दोन महात्माओंसे भली-भांति परिचित थे। इसलिए वे उनके इस लीलारंग सहयोग देते रहे।

भाव-जगत्की लोलाएँ साधारण लोगों के समझने की नहीं होतीं। भले ही इन्हें नाटक समझें, पर भावुक भक्तों के लिए इसमें नाटक नहीं होती। श्रीरामकृष्ण परमहंस गोपालेर माँ को देख अपने व्यक्तित्वव भूल जाते थे। वे बालसुलभ भावसे उनकी गोदीमें जा बंठते थे और उन खानेकी तरह-तरह की चीजोंकी फरमाइश करने लगते थे। प्राणगोपाल गोस्वामीने आशा की थी कि स्वामी कृष्णानन्दजी जैसे सुयोग्य शिष्य द्वारा जगत्‌में भक्तिका प्रचार होगा और अनेकों नास्तिक और अधर्मी लोगोंका उद्धार होगा। उन्हें यह देखकर चिन्ता हो गयी कि वे ग्वारिया बाबाके साथ भाव-समुद्र में निरन्तर डूबे रहकर इस लक्ष्य से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने एक दिन उन्हें अपने निकट बुलाकर आज्ञा की ‘तुम्हें प्रभुकी कृपासे जो मिला है, उसका दूसरे लोगों में बांटकर उपभोग करो। जगत्में कृष्ण भक्ति और कीर्तनका प्रचार करो।’

उन्होंने गुरुदेवको आशाका पालन करनेका निश्जय किया। पर स्वतन्त्र रूपसे प्रचार करने में उनके सामने एक बहुत बड़ी बाधा थी। उन्होंने सङ्कल्प कर रखा था यथासम्भव किसी स्त्रीका मुख न देखनेका। वर्षोंसे वे इस सङ्कल्पको निभाते आ रहे थे। उनकी कुटियापर स्त्रियोंको आना मना था। वे जब मधुकरीको जाते, तो सिरपर कपड़ा डालकर निगाह नीची किये जाते ।

एक दैवी घटनाके कारण उन्हें अपना सङ्कल्प तोड़ना पड़ा। घटना इस प्रकार है। हिंदील ग्रामके निकट नगला लक्ष्मणपुरमें श्रीलालारामजीको पुत्री श्रीमती देवा ग्यारह वर्षकी अवस्थामें विधवा हो गयी थी। वह मन-ही-मन स्वामी कृष्णानन्दजीको गुरु मानकर तन-मनसे ठाकुर सेवामें लगी रहती थी। पर गुरुजीके दर्शन न कर सकनेके कारण वह बहुत दुःखी थी। लोगांके बहुत आग्रह करनेपर स्वामीजीने एक कागजपर महामन्त्र लिखकर उसका जप करने और सरूप भावसे श्रीकृष्णका चिन्तन करने को उसे कहला भेजा। वह तदनुसार जप और चिन्तन करने लगी। पर उसने यह प्रण कर लिया कि जबतक गुरुजी के दर्शन न होंगे, सूर्यके दर्शन नहीं करूंगी। वह प्रातः ४ बजेसे अपनी भजन कुटी में बैठ जाती और सूर्यास्ततक भजन करतो रहती। तीन वर्ष इस प्रकार बीत गये। पर गुरुदेवके दर्शन न हुए। अन्त में उसने अन्न-जल त्याग दिया। नौ दिन हो गये बिना अन्न-जल ग्रहण किये तब कृष्णानन्दजीको दाऊजीका दिव्य सन्देश प्राप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप उन्हें स्त्रीका मुख न देखनेका सङ्कल्प त्यागकर उसे दर्शन देने पड़े।

थोड़े ही दिनों में उस लड़कीका सख्य-प्राव सिद्ध हो गया। उसकी चाल, रहन-सहन सब कुछ श्रीकृष्ण के सखाक़े समान हो गया। लोग उसे ‘भैया’ कहकर पुकारने लगे। श्रीकृष्ण अंयाके साथ बातें करते, खेलते और भाँति-भांतिकी लीलाए करते। भैयाका पार्थिव शरीर श्रीकृष्णके दिष्य सान्निध्यको कबतक झेल सकता था। उसकी शारीरिक अवस्था दिन पर दिन शोचनीय होती गयी । अन्तमें एक दिन जब वह मूर्छित अवस्था में गुरुदेवकी गोदमें सिर रखे लेटा था, उसने एकदम आँखे खोलकर गुरुजी की ओर देखा और कहा ‘भैया ! चलो चलें। देखो राम-कृष्णादि सखा बुलाने आये हैं। गुरुदेवने अश्रु गद्गद कण्ठसे कहा- भैया, तुम चलो मैं पीछे आऊँगा।’ गुरुदेव की आज्ञा प्राप्त करते ही वह राम-कृष्णके साथ उनके दिग्य धाममें प्रवेश कर गया।

स्वामीजी ने भंवासे उसका अनुगमन करने को कहा था पर ऐसा करने को अभी उन्हें गुरुदेव की आशा नहीं थी। उन्हें उनकी आज्ञानुसार जगत्के कल्याणके लिए कुछ करना था। वे इस कार्य में जुट गये। गाँव-गाँव में जाकर कीर्तनका प्रचार किया। अद्वैतवाद, आयंसमाज और नास्तिक मतोंका खण्डन कर वहाँ घंष्णय-धर्मकी जड़ सुदृढ़ की। उनके गौरकान्तियुक्त प्रभावशाली वपु, विद्या, वैराग्य और भक्ति-भाव से आकर्षित हो अनेकों लोगोंने उनका अनुगत्य स्वीकार किया। आज भी महामण्डलेश्वर श्रीरामदास शास्त्री तथा महाकवि श्रीबनमालीदास शास्त्री जैसे बहुत-से विद्वान और गणमान्य व्यक्ति उनके शिष्य हैं।

प्रचारके उद्देश्यसे उन्होंने बहुत से ग्रंथोंकी रचना भी की, जिनमें से

नाम इस प्रकार हैं

१. वैदिक प्रमाण-पत्रिका. २. भक्ति रत्नावली, ३. श्रीमद्भागवत-तत्व रिमर्श, ४. श्रीरामकृष्ण लीलामृत, ५. अद्वैत-भेदक- प्रश्नावली, ६. आर्य समाज मत-समीक्षा, ७. भक्ति-सिद्धान्त विवेचन, ८. श्रीमद्भगवतगीता ( विस्तृत हिन्दी टीका सहित ) ।

इनना सब कर चुकनेपर उन्होंने भी अपनी पूर्वघोषणाके अनुसार

सन् १८४१ की फाल्गुन कृष्णा सप्तमीके दिन रात्रिके ठीक १२ बजे ‘हरेकृष्ण’

उच्चारण करते हुए प्रसन्न मुद्रामें राम-कृष्णके धाममें प्रवेश किया।

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श्रीस्वामी रूपमाधुरीशरणजी


( वृन्दावन )

श्रीस्वामी रूपमाधुरी शरणजी का जन्म संम्वत् १८५५ में ज्येष्ठ मास की शुक्ला नवमी को जयपुर के एक कुलीन माहेश्वरी तोपनीवाल वंश में हुआ। आपके पिता का नाम था श्री दामोदर जी और माता का श्रीमती गणेशी देवी । दोनों बड़े धर्मपरायण और सत्संगी थे।

श्री रूपमाधुरी जी की प्रारम्भ से ही भजन-साधन में विशेष रुचि थी। इसलिए उन्होंने शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। पर उन्हें हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी का सामान्य ज्ञान था। उन्होंने अपनी शिक्षा के सम्बन्ध में लिखा है

पढ़ो लिखो में कछु नहीं, मूरख हूं मतिहीन । हरिदासन को दास हूँ, रूप माधुरी बीन ॥

विद्या में व्युत्पन्नता न होते हुए भी विद्या का जो चरम-फल है सरलता, निश्छलता, विषय-वैराग्य, दैन्य और भक्ति वह सब उनकी नैसगिक सम्पति था। छोटी अवस्था में ही उन्होंने शुक सम्प्रदाय के प्रसिद्ध रसिक सन्त श्री सरस माधुरी जी महाराज से दीक्षा प्राप्त कर ली और आजीवन ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करते हुए भक्ति-पथ का पथिक बनने का निश्चय कर लिया। उन्होंने स्वयं तो भक्ति-पथ का अवलम्बन किया हो, जयपुर के असंख्य लोगों को भी उस पर ले चले। उनके प्रयास से जयपुर में भक्ति मन्दाकिनी बह निकली वे अपने निवास स्थान पर प्रति गुरुवार को सत्संग का आयोजन करते। कभी कभी नगर कीर्तन द्वारा मोह-निद्रा में पड़े जयपुर वासियों को झकझोर कर जगा देते, उनसे तुलसीदास को निम्न पंक्तियों को दोहराते हुए हरिनाम का दीपक जलाकर अपने हृदय के अन्धकार को दूर करने का आग्रह करते ।

राम नाम मनिदीप घर जोह देहरी द्वार।

तुलसी भीतर बाहिरं जो चाहे उजियार ।

उनको गुरु भक्ति सराहनीय थी। जयपुर में ही शुक सम्प्रदाय का एक प्रमुख स्थान है, जहां श्री सरस माधुरी जी रहते थे। वे उनके सान्निध्य में रहकर उनकी अधिक-से-अधिक सेवा करते। गुरु-स्थान के सभी उत्सवों में उनका महत्वपूर्ण योगदान होता सरस माधुरी जी के संग के प्रभाव से उनका सरस हृदय और अधिक सरस हो गया। वे राधा-कृष्ण की अटयाम-लीला के चिन्तन में तल्लीन रहने लगे।

गुरुदेव की आज्ञा से उन्होंने श्री गोपाल मन्त्र के १८ पुरश्चरण किये। पुरश्चरण के दिनों में वे केवल दूध पीकर और मौन धारण कर रहते। गुरुवार को सत्संग के समय मौन तोड़ देते। पुरश्चरण के समय एक दिन उन्हें एक विचित्र अनुभव हुआ। उन्होंने सुनी बहुत बाजों की गगनभेदी ध्वनि । वह ध्वनि धीरे-धीरे उनके घर के निकट जाती जान पड़ी, जैसे कोई बड़ी बारात चली आ रही हो। थोड़ी देर में उन्होंने देखा बाजों के साथ एक देवी और उसके अनेक गणों को घर के भीतर प्रवेश करते। देवी उनके सामने आकर खड़ी हो गयीं, उनका कुछ अनिष्ट करने के उद्देश्य से। पर वे निविघ्न मन्त्र जप करते रहे। उसी समय अकस्मात् देवी और उसके गणों में भगदड़ मच गयी श्री शुकदेव जी को आते देख।
शुकदेव जी ने पधार कर देवी से तो उनकी रक्षा की ही, उनके मस्तक पर अपना वरद हस्त रखकर आशीर्वाद भी दिया। शुकदेव जी का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात् उनका गृहस्थ में रहना असम्भव हो गया। उन्होंने शुक सम्प्रदाय की संगरूर की गद्दी के महंत श्री बालमुकुन्ददास महाराज से संन्यास-दीक्षा ली और शेष जीवन वृन्दावन में एकान्त भजन में व्यतीत करने के उद्देश्य से वृन्दावन चले गये। वहां युगल पाट पर ‘सरजकुञ्ज’ के नाम से एक स्थान का निर्माण किया। उसमें युगल सरकार की प्रतिष्ठा कर उनकी रसमयी सेवा की व्यवस्था की । वृन्दावन में भी ये भगवत्स्वरूपों और आचार्यों की जयन्तियाँ बड़े उत्साह से मनाते । संतों की सेवा भी खूब करते। पर यह सब करते हुए भी जगत के प्रपंच से दूर रहते। एक पल भी बिना भजन के न जाने देते_
जग प्रपञ्च परस्यो नहि, करि वृन्दावन वास। निमिष में खोयो भजन बिन रूप माधुरी दास ॥

( श्रीजगदीश राठौर )

उन्होंने शुक्र सम्प्रदाय की श्री रामसखी जी के अप्रकाशित ( गुप्त ) वाणीग्रन्थ ‘भक्तिरस मञ्जरी’ का अपने गुरुजी के पास अध्ययन किया था। उसी के अनुसार वे प्रातः ३ बजे से राधा-कृष्ण की अष्टयाम लीला-चिन्तन में लगे रहते । साथ-साथ ‘राधा’ नाम का जप करते। राधा-कृष्ण के भक्त होते हुए भी वे राधारानी के अनन्य उपासक थे, जैसा कि राधाजी के प्रति उनके कुछ विनय-सूचक पदों से विदित है—

किशोरी मैं तो भलो बुरी सो तेरी ।
अब जिन करो अबेर लडै़ती, रक्खियो चरणन नेरी।
अवगुण मेरे सफल बिसारो, जानि आपनी चेरी ॥

भक्तिरस-मञ्जरी के अनुसार राधा जी की उपासना ही सर्वोपरि है—

साधन एक अनूप है, सो मैं कहत सुनाय ।
राधा राधा भजन सम, दूजो नाहि उपाय ॥ (भक्तिरस मञ्जरी)

श्री रूपमाधुरी जी बोलते बहुत कम थे। खाते-पीते भी उतना ही थे, जितना शरीर धारण करने के लिए नितान्त आवश्यक समझते थे। उनके स्थान में जगह भी उतनी ही थी, जितनी उनके और उनके कुछ शिष्यों के रहने के लिए आवश्यक थी। उसका विस्तार करने के लिए जब कोई धन देना चाहता, तो उसे अस्वीकार कर देते रातमें किसीको अपने स्थानपर टहरने न देते।

वृन्दावन आने के पश्चात् उनका परिवार बहुत बढ़ गया । अनेकों शिष्य हो गये। शिष्य सेवक बराबर उनके स्थान पर जाते रहते। पर उनके आने से उनके अपने कार्यक्रम में कोई अन्तर न पड़ता। घड़ी की सुई के अनुसार नियमित समय पर ठाकुर-सेवा, प्रसाद-सेवा, भजन-कीर्तनादि होता रहता। सभी को उसके अनुसार चलना पड़ता। प्रसादादि के समय यदि कोई न पहुंच पाता, तो उससे वंचित रहता। गरीब-अमीर, छोटे-बड़े सभी के साथ उनका व्यवहार एक-सा होता।

वे बड़े सत्संग-प्रेमी थे। साम्प्रदायिक भेद-भाव उनमें लेशमात्र भी न था। सभी सम्प्रदायों के ऊंचे सन्तों का वे सत्संग करते थे। गौड़ीय सम्प्रदाय के पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी, श्रीगौरांगदास बाबाजी, श्रीप्राण कृष्णदास बाबाजी, श्रीअवध्दास बाबाजी और निम्बार्क सम्प्रदाय के श्री हंसदासजी तथा प्रियाशरणजी से उनकी विशेष प्रीति थी। उन्होंने ‘श्रीनवसन्तमाल’ नामक अपने ग्रन्थ में ४१ सन्तों का उल्लेख किया है, जिनका उन्होंने सत्संग किया । उनमें से प्रत्येक का गुणगान करते हुए उन्होंने उन पर कवित्त लिखे हैं, जैसे श्रीगौरांगदास बाबाजी के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है—

रहते बंगदेश खास, अब कीनों व्रजवास,
जिनकी वाणी रसरास, सन्त गौरांगदासजु । गौरहरि नित गावे, लाल-लली के लड़ावे,
संग किये प्रेम प्यावे, छटी, मोह-माया फांस जु।
राधा नामके उपासी सखीभाव सुखीरासी,
सेवा मानसो विलासो, सुख पावे गये पास जु सम्पत्ति लाखनकी त्यागी, ऐसे भारी अनुरागो,
ये तो पूरे बड़भागी, बन्दे रूपदास जु ।

भजन और सत्संग के प्रभाव से रूपमाधुरी जी की चित्तवृत्ति युगल के चरणों में अधिकाधिक लीन रहने लगी। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति हो गयी कि सोते-जागते, चलते-फिरते हर समय युगल की नयी-नयी रूपमाधुरी का सहज ही आस्वादन होने लगा –

सुरत भई सहजानन्दमई ॥ टेक ॥
या सुख आगे कह कछु नाहीं, दुविधा दूर भई। सोवत जागत, डोलत-बोलत, छिन छिन मौज नई ॥ युगल लालकी सरस रुप छबि, मो उर माहि छई ॥ ‘रूपमाधुरी’ गुरु कृपा करि, ऐसो मौज दई ॥

उस समय की उनकी अलौकिक स्थिति का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है उस समय की एक-दो घटनाओ से जो उनके द्वारा घटीं । श्री सरसमाधुरी जी के शिष्य रांची के श्री रामचरणजी भाला उनमें गुरुबुद्धि रखते थे। जब सम्भव होता वे गुरुपूर्णिमा पर उनका पूजन करते थे। एक बार वे आषाढ़ के महीने में सपरिवार वृन्दावन आये। गुरुपूर्णिमा से कुछ पहले बिना किसी से कुछ कहे वृन्दावन से निकल पड़े मुजफ्फरनगर के निकट शुकताल जाने के उद्देश्य से, जहाँ शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को भागवत सुनायी थी और श्री शुक सम्प्रदाय के आचार्य श्री चरणदास जी महाराज को मन्त्र दिया था। वहाँ श्री शुकदेवजी के मन्दिर में शुकदेवजी के दर्शन कर गुरुपूर्णिमा तक वे वृन्दावन लौट आना चाहते थे। उनकी पत्नी श्रीमती सूरजबाई को बहुत चि चिंता हुई। उन्होंने जब रूपमाधुरीजी से उनके अकस्मात अन्तर्धान हो जाने की बात कही, तो उन्होंने कहा- ‘चिंता मत करो। वह शीघ्र आ जायेगा।’

पूर्णिमा के एक दिन पूर्व रामचरणजी मार्ग में किसी बीहड़ जंगल में भटक गये। यह सोचकर कि अब वे गुरुपूर्णिमा पर न तो शुकताल ही पहुँच सकेंगे, न श्रीरूपमाधुरीजी का पूजन कर सकेंगे बहुत दुःखी होने लगे। उसी समय एक घुड़सवार यहाँ आ निकला। उसने पूछा- “आप यहाँ कैसे भटक रहे हैं ?” उन्होंने अपनी दुःखभरी कहानी कह सुनायी। तब घुड़सवार कहा- ‘आप चिंता न करें। मैं मयुरा की ओर ही जा रहा हूँ । कल प्रातः आपको वृन्दावन पहुँचा दूंगा।’ वे उसके पीछे घोड़े पर बैठ लिये और दूसरे दिन प्रातः वृन्दावन पहुंच गये। उन्हें देखते ही श्रीरूपमाधुरी जी ने कहा गुरु-पूजा वहीं क्यों न कर ली, जहाँ गया था ? जानता नहीं, तुझे यहाँ लाने के लिए ठाकुरजी को घुड़सवार भेजना पड़ा।

श्रीराधाकृष्णदासजी, जो आजकल श्रीरूपमाधुरीजी के स्थान के महन्त हैं, उस समय उनके ठाकुरकी सेवा किया करते थे। उन्हें हैजा हुआ और वृन्दावन के हैजा अस्पताल में दाखिल किया गया। अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गयी। संध्या समय अस्पताल से रूपमाधुरीजी को खबर भेजी गयी। खबर पाकर वे बहुत दुःखी हुए। मन ही मन श्री चरणदासजी महाराज से कहने लगे-‘यह आपने क्या किया ? मेरी अवस्था ठाकुर-सेवा करने लायक है नहीं अब सेवा कैसे होगी, आप जाने।’ अस्पताल उन्होंने कहला दिया— ‘इस समय मेरे पास आदमी है नहीं। प्रातः शव को उठाने की व्यवस्था कर दी जायगी।’ प्रातः जब लोग इस व्यवस्था में लगे हुए थे, डाक्टर के यहां से संवाद आया- ‘मरीज अब जीवित दिख रहा है। आप कोई व्यवस्था न करें।’

कार्तिक कृष्णा १४ सम्वत् २०३२ को सतहत्तर वर्ष की आयु में श्रीरूपमाधुरीजी ने नित्य धाम में प्रवेश किया। उनके प्रमुख शिष्यों में हैं श्रीराधाकृष्णदास जी और श्रीवंशीदास जी।

उनकी वाणियों का संग्रह ‘श्रीरूपमाधुरीजी की वाणी के नाम से प्रकाशित है। कई और भी छोटे-छोटे ग्रन्थ उन्होंने लिखे हैं, जिनमें मुख्य हैं (१) श्रीगुरुपरत्व, (२) श्रीशुक महत्व, (३) चरणावत-वैष्णव-सदाचार, (५) शुकसम्प्रदाय रहस्य, (५) तिमिर-प्रकाश, (६) नवसन्तमाल।

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“भक्ता श्रीवारमुखीजी”

एक वेश्या भक्ता थी। उसका घर धन-सम्पति से भरा था परन्तु वह किसी काम का न था, क्योंकि भक्त भगवान की सेवा में नहीं आ रहा था। एक दिन एक विशाल सन्त मंडली रास्ते-रास्ते जा रही थी। सायंकाल हो रहा था, विश्राम योग्य स्थान की आवश्यकता थी। वेश्या के घर के सामने छाया युक्त, स्वच्छ सुन्दर स्थान देखकर संतों के मनको अच्छा लगा। सभी ने यत्र-तत्र अपने ठाकुर पधरा दिये, आसन लगा लिये। अच्छी ठौर देखकर ठहर गए, उनके मन में धन का लोभ कदापि न था। इतने में ही वह वेश्या आभूषणों से लदी हुई बाहर द्वार पर आई। हंसों के समान स्वच्छ चित्त वाले दर्शनीय सन्तों को देखकर वह मन में विचारने लगी- आज मेरे कौनसे भाग्य उदय हो गए ? जो यह सन्त गण मेरे द्वार पर विराज गये। निश्चय ही इन्हें मेरे नाम या जाति का पता नहीं है। इस प्रकार वह सोच विचार कर घर में गई और एक थाल में मुहरें भरकर ले आई। उसे महंतजी के आगे रखकर बोली- ‘प्रभो ! इस धन से आप अपने भगवान का भोग लगाइये।’ प्रेमवश उसकी आँखों में आँसू आ गये।

मुहरें भेंट करती देख कर श्रीमहन्तजी ने पूछा- ‘तुम कौन हो, तुम्हारा जन्म किस कुल में हुआ है ?’ इस प्रश्न को सुनकर वह वेश्या चुप हो गई। उसके चित्त में बड़ी भारी चिंता व्याप्त हो गई। उसे चिन्तित देख कर श्रीमहन्तजी ने कहा कि तुम नि:शंक हो कर सच्ची बात खोल कर कह दो, मन में किसी भी प्रकार की शंका न करो। तब वह बोली ‘मैं वेश्या हूँ’, ऐसा कहकर वह महन्तजी के चरणों में गिर पड़ी। फिर सँभलकर प्रार्थना की- ‘प्रभो ! धन से भण्डार भरा हुआ है। आप कृपा कर इसे स्वीकार कीजिये। यदि आप मेरी जाति का विचार करेंगे और धन को नहीं लेंगे, तब तो मुझे मरी हुई समझिये, मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।’ तब श्रीमहन्तजी ने कहा- ‘इस धन को भगवान की सेवा में लगाने का बस यही उपाय मेरे हाथ में है और वह यह कि- इस धन के द्वारा श्रीरंगनाथजी का मुकुट बनवाकर उन्हें अर्पण कर दो। इसमें जाति बुद्धि दूर हो जायगी। श्रीरंगनाथ जी इसे स्वीकार करेंगे।’ वेश्या बोली- ‘भगवन् ! जिसके धन को ब्राह्मण छूते तक नहीं हैं, उसके द्वारा अर्पित मुकुट को श्रीरंगनाथजी कैसे स्वीकार करेंगे ?’ महन्तजी ने कहा- ‘हम तुम्हें विश्वास दिलाते हैं कि वे अवश्य ही तुम्हारी सेवा स्वीकार करेंगे। इस कार्य के लिए हम तब तक यहीं रहेंगे, तुम मुकुट बनवाओ।’

वेश्या ने अपने घर का सब धन लगाकर सुन्दर मुकुट बनवाया। अपना श्रृंगार करके थाल में मुकुट को रखकर वह चली। सन्तों की आज्ञा पाकर वह वेश्या नि:संकोच श्रीरंगनाथजी के मन्दिर में गई, पर अचानक ही सशंकित हो कर लौट पड़ी, अपने को धिक्कारने लगी क्योंकि उसे संयोगवश मासिक-धर्म हो गया था वह अपवित्र हो गई थी। सन्तों ने संकोच का कारण पूछा। उसने बताया कि- ‘मैं अब जाने योग्य नहीं हूँ।’ तब भक्तवत्सल श्रीरंगनाथजी ने वेश्या की दैन्यता एवं प्रेम को देख कर अपने पुजारियों को आज्ञा दी- ‘इसे ले आओ और यह अपने हाथ से हमें मुकुट पहनावे।’ ऐसा ही किया गया, जैसे ही उसने हाथ में मुकुट लेकर पहनाना चाहा, वैसे ही श्रीरंगनाथजी ने अपना सिर झुका दिया और मुकुट को धारण कर लिया। इस चरित्र से भक्त-भगवान की मति रीझ गई। पतित-पावनता देख कर लोग भक्त-भगवान की जय-जयकार करने लगे। भक्तवत्सल भगवान की जय हो।

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“भक्ता सखूबाई”

महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के किनारे करहाड़ नामक एक स्थान है, वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। उसके घर में चार प्राणी थे- ब्राह्मण, उसकी स्त्री, पुत्र और साध्वी पुत्रवधू। ब्राह्मण की पुत्रवधू का नाम था ‘सखूबाई’।
सखूबाई जितनी अधिक भक्त, आज्ञा कारिणी, सुशील, नम्र और सरल हृदय थी उसकी सास उतनी ही अधिक दुष्टा, अभिमानी, कुटिला और कठोर हृदय थी। पति व पुत्र भी उसी के स्वभाव का अनुसरण करते थे। सखूबाई सुबह से लेकर रात तक बिना थके-हारे घर केे सारे काम करती थी। शरीर की शक्ति से अधिक कार्य करने के कारण अस्वस्थ रहती, फिर भी वह आलस्य का अनुभव न करके इसे ही अपना कर्तव्य समझती। मन ही मन भगवान् के त्रिभुवन स्वरूप का अखण्ड ध्यान और केशव, विठ्ठल, कृष्ण गोविन्द नामों का स्मरण करती रहती।
दिन भर काम करने के बाद भी उसे सास की गालियाँ और लात-घूंसे सहन करने पड़ते। पति के सामने दो बूँद आँसू निकालकर हृदय को शीतल करना उसके नसीब में ही नहीं था। कभी-कभी बिना कुसूर के मार गालियों की बौछार उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थीं, परन्तु अपने शील स्वभाव के कारण वह सब बातें पल में ही भूल जाती। इतना होने पर भी वह इस दुःख को भगवान् का आशीर्वाद समझकर प्रसन्न रहती और सदा कृतज्ञता प्रकट करती कि मेरे प्रभु की मुझ पर विशेष कृपा है। जो मुझे ऐसा परिवार दिया वरना सुखों के बीच में रहकर मैं उन्हें भूल जाती और मोह वश माया जाल में फँस जाती।
एक दिन एक पड़ोसिन ने उसकी ऐसी दशा को देखकर कहा- ‘‘क्या तेरे पीहर में कोई नहीं है जो तेरी खोज ख़बर ले’। उसने कहा ‘‘मेरा पीहर पण्ढ़रपुर है, मेरे माँ-बाप रुक्मिणी-कृष्ण हैं। एक दिन वे मुझे अपने पास बुलाकर मेरा दुःख दूर करेंगे।’’
सखूबाई घर के काम ख़त्म कर कृष्णा नदी से पानी भरने गयी, तभी उसने देखा कि भक्तों के दल नाम-संकीर्तन करते हुए पण्ढ़रपुर जा रहे हैं। एकादशी के दिन वहाँ बड़ा भारी मेला लगता है। उसकी भी पण्ढ़रपुर जाने की प्रबल इच्छा हुई पर घरवालों से आज्ञा का मिलना असम्भव जान कर वह इस संत मण्डली के साथ चल दी। यह बात एक पड़ोसिन ने उसकी सास को बता दी।
माँ के कहने पर पुत्र घसीटते हुए सखू को घर ले आया और उसे रस्सी से बाँध दिया, परन्तु सखू का मन तो प्रभु के चरणों में ही लगा रहा। वह प्रभु से रो-रोकर दिन-रात प्रार्थना करती रही, क्या मेरे नेत्र आपके दर्शन के बिना ही रह जायेंगे ? कृपा करो नाथ ! मैंने अपने को तुम्हारे चरणों मे बाँधना चाहा था, परन्तु बीच में यह नया बंधन कैसे हो गया ? मुझे मरने का डर नहीं है पर सिर्फ एक बार आपके दर्शन की इच्छा है। मेरे तो माँ-बाप, भाई, इष्ट-मित्र सब कुछ आप ही हो, मैं भली-बुरी जैसी भी हूँ, तुम्हारी हूँ।
सच्ची पुकार को भगवान् अवश्य सुनते हैं और नकली प्रार्थना का जवाब नहीं देते। असली पुकार चाहे धीमी हो, वह उनके कानों तक पहुँच जाती है। सखू की पुकार को सुनकर भगवान् एक स्त्री का रूप धारण कर उसके पास आकर बोले- “मैं तेरी जगह बँध जाऊँगी, तू चिन्ता मत कर।” यह कहकर उन्होंने सखू के बंधन खोल दिये और उसे पण्ढ़रपुर पहुँचा दिया।
इधर सास-ससुर रोज उसके पास जाकर खरी-खोटी सुनाते, वे सब सह जाती। जिनके नाम स्मरण मात्र से माया के दृढ़ बन्धन टूट जाते हैं, वे भक्त के लिए सारे बंधन स्वीकार करते हैं। आज सखू बने भगवान् को बँधे दो हफ्ते हो गये, उसकी ऐसी दशा देखकर पति का हृदय पसीज गया। उसने सखू से क्षमा माँगी और स्नान कर भोजन के लिए कहा। आज प्रभु के हाथ का भोजन कर सबके पाप धुल गये।
उधर सखू यह भूल गयी कि उसकी जगह दूसरी स्त्री बँधी है। उसका मन वहाँ ऐसा लगा कि उसने प्रतिज्ञा की कि शरीर में जब तक प्राण हैं, वह पण्ढ़रपुर में ही रहेगी। प्रभु के ध्यान में उसकी समाधि लग गयी और शरीर अचेत हो जमीन पर गिर पड़ा। गाँव के लोगों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया।
माता रुक्मिणी को चिन्ता हुई कि मेरे स्वामी सखू की जगह पर बहू बने हैं। उन्होंने शमशान पहुँचकर सखू की अस्थियों को एकत्रित कर उसे जीवित किया और सब स्मरण कराकर करहड़ जाने की आज्ञा दी।
करहड़ पहुँचकर जब वह स्त्री बने प्रभु से मिली तो उसने क्षमा-याचना की। जब घर पहुँची तो सास-ससुर के स्वभाव में परिवर्तन देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। दूसरे दिन एक ब्राह्मण सखू के मरने का समाचार सुनाने करहड़ आया और सखू को काम करते देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सखू के ससुर से कहा- ‘‘तुम्हारी बहू तो पण्ढ़रपुर में मर चुकी थी।” पति ने कहा- ’’सखू तो पण्ढ़रपुर गयी ही नहीं, तुम भूल से ऐसा कहते हो।”
जब सखू से पूछा तो उसने सारी घटना सुना दी। सभी को अपने कुकृत्यों पर पश्चाताप हुआ। अब सब कहने लगे कि निश्चित ही वे साक्षात् लक्ष्मीपति थे, हम बड़े ही नीच और भक्ति हीन हैं। हमने उनको न पहचानकर व्यर्थ ही बाँधे रखा और उन्हें न मालूम कितने क्लेश दिये।
अब तीनों के हृदय शुद्ध हो चुके थे और उन्होंने सारा जीवन प्रभु भक्ति में लगा दिया। प्रभु अपने भक्तों के लिए क्या कुछ नहीं करते।

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भक्त राजा जयमल्ल सिंहजी

राजा जयमल्लसिंहजी मेड़ता के राजा थे। ये बड़े ही नीतिज्ञ, सदाचारी, साधु-स्वभाव नियमों में तत्पर और दृढ़निश्चयी भगवद्भक्त थे। यद्यपि ये भगवान् का स्मरण रखते हुए ही राज्य का सारा काम करते थे, तथापि प्रात:काल डेढ़ पहर दिन चढ़ने तक तो प्रतिदिन एकान्त स्थल में नियमितरूप से भगवान् का ध्यान-भजन करते थे। इस समय बड़े-से-बड़े जरूरी काम के लिये भी कोई आपके पास नहीं जा सकता था। वे भगवत्-पूजन के आनन्द सागर में ऐसे डूबे रहते थे कि किसी प्रकार के बाहरी विध्न से उनका ध्यान नहीं टूटता था। इस समय उनकी अन्तर और बाहर की दृष्टि मिलकर एक हो जाती थी, और वह देखती थी-केवल एक श्याम-सुन्दर की त्रिभुवन-मोहन अनूप रूपराशि को। इस समय की उनकी प्रेम विह्नलता और समाधिनिष्ठा को सौभाग्यवश जो कोई देख पाता, वहीं भगवत् प्रेम की ओर बलात् आकर्षित हो जाता था। इस प्रतिदिन की नियमित साघना के समय अत्यन्त आवश्यक कार्य उपस्थित हुए। परन्तु जयमल्ल अपने प्रण से नहीं डिगे।

जयमल्लसिंहजी इस प्रण की बात चारों ओर फैल गयी। एक दूसरा राजा, जो इनके कुटुम्ब का ही था, ईर्ष्यां और दुर्बद्धि-वश जयमल्ल से वैर रखता और इन्हें सताने का मौका ढूँढ़ा करता था। उसे यह बात मालूम हुई तो उसने एक दिन प्रात:काल के समय बहुत-सी सेना साथ लेकर मेड़ता आ घेरा लोगों ने आकर राज्य में सूचना दी। राजा का कड़ा हुक्म था कि उसकी आज्ञा बिना किसी से युद्ध आदि न किया जाय। अतएव दीवान ने आकर महलो में खबर दी, परन्तु राजा जयमल्ल के

पास तो इस समय कोई जा नहीं सकता था। आखिर राजमातासे नहीं रहा गया। राज्यनाश की आशंका से राजमाता साहस करके पुत्र के पास उनकी कोठरी में गयी। उसने जाकर देखा – जयमल्ल समाधिनिष्ठ बैठे हैं, वाह्यज्ञान बिल्कुल नहीं है, नेत्रों से प्रेमात्रु बह रहे हैं, बीच बीच में अनुपम आनन्द की हँसी हँस देते हैं उनके मुखमण्डल पर एक अपूर्व ज्योति फैल रही है माता एक बार तो रुक गयी, परन्तु पुत्र के अनिष्ट की सम्भावना से उसने कहा, ‘बेटा! शत्रु ने चढ़ाई कर दी, कुछ उपाय करना चाहिये।’ जयमल्ल का चित्त तो भगवान् की रूप-छटा में निरुद्ध था। उसको कुछ भी सुनायी नहीं दिया। जब तीन-चार बार पुकारने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला, तब माता ने हाथ से जयमल्ल के शरीर को हिलाया। ध्यान छूटने से जयमल्ल ने आश्चर्य चकित हो नेत्र खोले। मन में बड़ा क्षोभ हुआ परन्तु सामने विषण्ण-वदना जननी को खड़ी देखकर तुरन्त ही भाव बदल गया और उन्होंने माता को प्रणाम किया। माता ने शत्रु के आक्रमण का समाचार सुना दिया। परन्तु जयमल्ल को इस समय भगवत चर्चा के सिवा दूसरी बात सुनने का अवसर ही नहीं था उन्होंने चाहा कि माता को नम्रता से समझा दूँ, लेकिन डनकी वृत्तियाँ तो भगवत्- रूप की ओर प्रबल वेग से खिची जा रही थीं, समझावे कौन ? जयमल्ल कुछ भी बोल नहीं पाये और उनकी समाधि होने लगी। माता ने फिर कहा, तब परमविश्वासी भक्त जयमल्लजी के मुँह से केवल इतने शब्द निकले भगवान् सब कल्याण ही करते हैं।’ तदनन्तर उनकी आँखें मुँद गयी। वह फिर सुख-दुःख, हानि-लाभ और जय पराजय की भावना से बहुत परे के मनोहर नित्यानन्दमय प्रेम-राज्य में प्रवेश कर गये। जगत् की क्षुद्र आँधी उनकी मनरूपी हिमालय के अचल शिखर को तनिक भी नहीं हिला सकी। माता दुःखी मन से निराश होकर लौट आयी।
रणभेरी बजने लगी, शत्रु सेना कोई बाधा न पाकर नगर में घुसने लगी। अब योगक्षेम का भार वहन करने वाले भक्तभावन से नहीं रहा गया। श्यामसुन्दर त्रिभुवन-कँपाने वाले वीरेन्द्रवेश में शस्त्रादि सुसज्जित हो अकस्मात् शत्रु-सैन्य के सामने प्रकट हो गये महाणज रघुराजसिंह जी
लिखते हैं-

जानि निज सेवक निरत निज पूजनमें,
चढ़िकै तुरंग श्याम रंग को सवार है।
कर करवाल धारि कालहू को काल मान,
पहुँच्यो उताल जहाँ सैन्य बेशुमार है।
चपलासों चमकि चहुँकित चलाइ बाजी,
भटनकी राजी कादि करत प्रहार है।
रघुराज भक्तराज-लाज राखिबेके काज,
समर बिरान्यो वसुदेवको कुमार है।

ब्रह्मा और यमराज जिसके शासन से सृष्टि की उत्पति और संहार करते हैं, उनके सामने क्षुद्र राजपूत सेना किस गणना में थी? बात की बात में सब धराशायी हुए। उनका पुण्य आज सर्वतोभाव से सफल हो गया! भगवान् के हाथ से निधन हो वे सदा के लिये परम धन पा गये। शत्रु राजा घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा। पलों में इतना काम कर घोड़े को घुड़साल में बाँध सवार अन्तघ्यान हो गये।

इघर जयमल्लजी की पूजा शेष हुई। उन्होंने तुरन्त अपना घोड़ा मँगवायाः देखते हैं तो घोड़ा थक रहा है, उसका शरीर पसीने से भींग रहा है और वह हाँफ रहा है। राजा ने पूछा कि इस घोड़े पर कौन चढ़ा था? परन्तु किसी ने कोई जबाब नहीं दिया। इस रहस्य को कोई जानता भी हो नहीं था। इतने में लोगों ने दौड़ते हुए आकर खबर दी कि ‘शत्रुसेना तो सब मरी पड़ी है।’ राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह घोड़े की बात भूलकर तुरन्त नगर के बाहर पहुँचे। देखते हैं, लाशों का ढेर लगा है और विपक्षी-राजा घायल-से पड़े हैं। जयमल्ल उसके पास गये और प्रेमभाव से ‘जय श्रीकृष्ण’ करने के बाद उससे युद्ध का विवरण पूछने लगे। उसने हाथ जोड़कर कहा, ‘महाराज! आपके यहाँ अनूप-रूप-शिरोमणि श्यामलमूर्ति महावीर कौन हैं ? उन्होंने अकेले ही मेरी सारी सेना का संहार कर डाला और मुझको भी घायल करके गिरा दिया। अहा! कैसा अनौखा उनका रूप है, जबसे मैंने उन नौजवान त्रिभुवन-मन-मोहन को देखा है, मेरा चित्त उन्हें फिर से देखने के लिये व्याकुल हो रहा है।’ जयमल्ल अब समझे कि यह सारी मेरे प्रभु की लीला है! उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वे गद्गद-बाणी से बोले- ‘भाई! तुम थन्य हो, तुम्हारे सौभाग्य की ब्रह्म भी प्रशंसा करेंगे। अहा! मेरी तो आँखें उस साँवरे सलोने के लिये तरस ही रही हैं, तुम धन्य हो जो सहज ही में उसका दर्शन पा गये?

अब उसका सारा वैरभाव जाता रहा, जयमल्ल ने बड़े सम्मान और आराम के साथ उसे अपने घर पहुँचा दिया, वहाँ पहुँचकर वह भी सपरिवार भगवान् का परमभक्त हो गया!
बोलो भक्त और उनके भगवान् की जय!

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भक्त जोग परमानन्द जी

दक्षिण भारत के वारसी नामक प्रांत में महान भक्त जोग परमानन्द जी का जन्म हुआ था। जब ये छोटे बालक थे, इनके गाँव में भगवान की कथा तथा कीर्तन हुआ करता था। इनकी कथा सुनने में रुचि थी। कीर्तन इन्हें अत्यन्त प्रिय था। कभी रात को देर तक कथा या कीर्तन होता रहता तो ये भूख प्यास भूलकर मन्त्रमुग्ध से सुना करते।

एक दिन कथा सुनते समय जोग परमानन्द जी अपने आपको भूल गये। व्यासगद्दी पर बैठे वक्ता भगवान् के त्रिभुवन कमनीय स्वरूप का वर्णन कर रहे थे। जोग परमानन्द का चित्त उसी श्यामसुन्दर की रूपमाधुरी के सागर में डूब गया। नेत्र खेला तो देखते हैं कि वही वनमाली, पीताम्बर धारी प्रभु सामने खडे हैं। परमानन्द की अश्रुधारा ने प्रभु के लाल-लाल श्री चरणों को पखार दिया और कमललोचन श्रीहरि के नेत्रों से कृपा के अमृत बिन्दुओं ने गिरकर परमानन्द के मस्तक को धन्य बना दिया। लोग कहने लगे कि जोग परमानन्द पागल हो गये। संसार की दृष्टि मे जो विषय की आसक्ति छोडकर, इस विष के प्याले को पटककर व्रजेन्द्र सुन्दर मे अनुरक्त होता है, उस अमृत के प्याले को होठों से लगाता है, उसे यहाँ की मृग मरीचिका में दौड़ते, तड़पते, जलते प्राणी पागल ही कहते हैं। पर जो उस दिव्य सुधा रस का स्वाद पा चुका, वह इस गढ्ढे जैसे संसार के सड़े कीचड़ की और केसे देख सकता है। परमानन्द को तो अब परमानन्द मिल गया।

जगत् के भोग और मान बड़ाई से उन्हे क्या लेना-देना। अब तो वे बार-बार राम कृष्ण हरि जपते हैं और कभी नाचते हैं, कभी रोते हैं, कभी हँसते हैं, कभी भूमि पर लोटते हैं और विट्ठल-विट्ठल कहते हुए, उनका चित्त अब और कुछ सोचता ही नहीं। जोग परमानन्द जी अब पंढरपुर आ गये थे।

श्री परमानंद जी विलक्षण महात्मा थे, पंढ़रीनाथ का षोडशोपचार से नित्य पूजन करते और उसके पश्चात् मन्दिर के बाहर भगवान् के सामने गीता जी का एक श्लोक पढकर साष्टाङ्ग दण्डवत् करते। इस प्रकार सात सौं श्लोक पढ़कर सात सौ दण्डवत नित्य करने का उन्होंने नियम बना लिया था। सम्पूर्ण गीता का पाठ कर के सात सौ दण्डवत पूरी हो जाने पर ही वे भिक्षा करने जाते और भिक्षा में प्राप्त अन्न से भगवान को नैवेद्य अर्पण करके प्रसाद पाते। गरमी हो या सर्दी, पानी पड़े या पत्थर, श्री परमानन्द-जी को तो सात सौ दण्डवत नित्य करनी ही थीं। नेत्रों के सम्मुख पंढरीनाथ का श्री विग्रह, मुख मे गीता के श्लोक और हदय मे भगवान का ध्यान, सारा शरीर दण्डवत करने में लगा है। ज्येष्ठ में पृथ्वी तवे सी जलती हो तो भी परमानन्द जी की दण्डवत चलेगी और पौष माघ मे बरफ सी शीतल हो जाय तो भी दण्डवत् चलेगी। वर्षा हो रही है, भूमि कीचड़ से ढक गयी है, पर परमानन्द जी भीगते हुए, कीचड़ से लथपथ दण्डवत करते जा रहे हैं।

एक बार एक साहूकार बाजार करने पण्ढरपुर आया। श्री जोग परमानन्द जी की तितिक्षा देखकर उसके मन में श्रद्धा हुई। रेशमी कपड़े का एक थान लेकर वह उनके पास पहुँचा और स्वीकार करने की प्रार्थना करने लगा। परमानन्दजी ने कहा- “भैया ! मैं इस वस्त्र को लेकर क्या करूँगा। मेरे लिये तो फटे-चिथड़े ही पर्याप्त हैं। इस सुन्दर वस्त्र को तुम श्री भगवान् को भेंट करो।” परन्तु व्यापारी समझाने से मान नहीं रहा था। वह आग्रह करता ही जाता था। वस्त्र न लेने से उसके ह्रदय को दुख होगा, यह देखकर परमानन्द जी ने वह रेशमी वस्त्र स्वीकार कर लिया। जोग परमानन्द जी ने रेशमी वस्त्र स्वीकार तो लिया था व्यापारी को कष्ट न हो इसलिये। पर जब वस्त्र ले लिया, तब इच्छा जगी कि उसे पहनना भी चाहिये। दूसरे दिन वे रेशमी वस्त्र पहनकर भगवान की पूजा करने आये। आज भी वर्षा को रही थी। पृथ्वी कीचड़ से भरी थी। परमानन्द जी का मन वस्त्र पर लुभा गया। पूजा कर के दण्डवत करते समय उन्होंने वस्त्र समेट लिये। आज उनकी दृष्टि भगवान् विट्ठल प्रभुपर नहीं थी, वे बार-बार वस्त्र देखते थे, वस्त्र संभालते थे। दण्डवत् ठीक नहीं होती थी, क्योंकि मूल्यवान् नवीन रेशमी वस्त्र के कीचड़ से खराब हो जाने का भय था। भक्ति मार्ग में दयामय भगवत अपने भक्त की सदा उसी प्रकार रक्षा करते रहते हैं, जैसे स्नेहमयी माता अपने अबोध शिशु की करती है। बालक खिलौना समझ कर जब सर्प या अग्नि के अंगारे लेने दौड़ता है तब जननी उसे उठाकर गोद में ले लेती है। जहाँ माया के प्रलोभन दूसरे साधकों को भुलावे में डालकर पथ भ्रष्ट कर देते हैं, वहाँ भक्त का उनसे कुछ भी नहीं बिगड़ता। जो अपने को श्रीहरि के चरणों में छोड़ चुका, वह जब कहीं भूल करता है, तब झट उसे वे कृपा-सिन्धु सुधार देते हैं। वह जब कहीं मोह में पड़ता है, तब वे हाथ पकड़कर उसे वहाँ से निकाल लाते हैं। आज जोग परमानन्द रेशमी वस्त्रों के मोह में पड़ गये थे। अचानक किसी ने पूछा- ‘परमानन्द ! तू वस्त्र को देखने लगा। मुझे नहीं देखता आज तू ?” परमानन्द जी ने दृष्टि उठायी तो जैसे सम्मुख श्री पांडुरंग भगवान् कुछ मुस्कराते, उलाहना देते खड़े हों। झट उस रेशमी वस्त्र को टुकड़े-टुकड़े फाड़कर उन्होंने फेंक दिया। मुझ से बड़ा पाप हुआ। मैं बड़ा अधम हूँ। जोग परमानन्द जी को बड़ा ही दु:ख हुआ। वे अपने इस अपराध का प्रायश्चित्त करने का विचार करके नगर से बाहर चले गये। दो बैलों को जुए में बाँधा और अपने को रस्सी के सहारे जुए से बाँध दिया। चिल्लाकर बैलों को भगा दिया। शरीर पृथ्वी में घसिटता जाता था, कंकडों से छिल रहा था, काँटे चुभते और टूटते जाते थे, रक्त की धारा चल रही थी, किन्तु परमानन्द उच्चस्वर से प्रसन्न मन से राम ! कृष्ण ! गोविन्द ! की टेर लगा रहे थे। जैसे-जैसे शरीर छिलता, घसिटता, वैसे-वैसे उनकी प्रसन्नता बढ़ती जाती थी। वैसे-वैसे उनका स्वर ऊँचा होता जाता था, और वैसे-वैसे बैल भड़क कर जोर से भागते जाते थे। भक्तवत्सल प्रभु से अपने प्यारे भक्त का यह कष्ट देखा नहीं गया। श्री कृष्ण एक ग्वाले के रूप में प्रकट हो गये। बैलों को रोककर जोग परमानन्द को उन्होंने रस्सी से खोल दिया और बोले- “तुमने अपने शरीर को इतना कष्ट क्यों दिया। भला, तुम्हारा ऐसा कौन सा अपराध था ? तुम्हारा शरीर तो मेरा को चुका है। तुम जो कुछ खाते हो, वह मेरे ही मुख में जाता है। तुम चलते हो तो मेरी उससे प्रदक्षिणा होती है। तुम जो भी बातें करते हो, वह मेरी स्तुति है। जब तुम सुख से लेट जाते हो तब वह मेरे चरणों में तुम्हारा साष्टाङ्ग प्रणाम हो जाता है। तुमने यह कष्ट उठाकर मुझे रुला दिया है।” प्रभु ने उठाकर उन्हें हृदय से लगा लिया और सारी पीड़ा गायब हो गयी। जोग परमानन्द जी श्याम सुन्दर से मिलकर उनमें एकाकार हो गये। श्री जोग परमानन्द जी का नाम इस लीला के कारण आगे दण्डवती अथवा दण्डवत् जोग परमानन्द जी पड़ गया

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श्री जयदेव जी

निम्बार्क सम्प्रदाय के महान संत महाकवि श्रीजयदेव जी संस्कृत के कविराजों के राजा चक्रवर्ती सम्राट थे । शेष दूसरे सभी कवि आपके सामने छोटे बड़े राजाओं के समान थे । आपके द्वारा रचित  गीतगोविन्द महाकाव्य तीनों लोको में बहुत अधिक प्रसिद्ध एवं उत्तम सिद्ध हुआ । यह गीतगोविन्द कोकशास्त्र का, साहित्य के नवरसो का और विशेषकर उज्वल एवं सरस श्रृंगार रस का सागर है ।

इसकी अष्टपदियो का जो कोई नित्य अध्ययन एवं गान करे, उसकी बुद्धि पवित्र एवं प्रखर होकर दिन प्रतिदिन बढेगी । जहां अष्टपदियो का प्रेमपूर्वक गान होता है, वहाँ उन्हें सुनने के लिये भगवान् श्रीराधारमण जी अवश्य आते हैं और सुनकर प्रसन्न होते हैं । श्री पद्मावती जी के पति श्री जयदेव जी सन्तरूपी कमलवन को आनन्दित करनेवाले सूर्य के समान इस पृथ्वीपर अवतरित हुए ।

श्री जयदेव जी का जन्म और बाल्यकाल की लीलाएं –
कविसम्राट श्री जयदेव जी बंगाल प्रान्त के वीरभूमि जिले के अन्तर्गत किन्दुबिल्व नामक ग्राममें बसंत पंचमी के दिन पाँवह सौ साल पूर्व प्रकट हुए थे । आप के पिता का नाम भोजदेव और माता का नाम वामदेवी था । भोजदेव कान्यकुब्ज से बंगाल मे आये हुए पञ्च ब्राह्मणो में भरद्वाजगोत्रज श्रीहर्ष के वंशज थे । पांच वर्ष के थे तब इनके माता पिता भगवान् के धाम को पधार गए। ये भगवान ला भजन करते हुए किसी प्रकार अपना निर्वाह करते थे । पूर्व संस्कार बहुत अच्छे होने के कारण इन्होंने कष्टमें रहकर भी बहुत अच्छा विद्याभ्यास कर लिया था और सरल प्रेमके प्रभाव से भगवान् श्री कृष्ण की परम कृपा के अधिकारी हो गये थे ।

इनके पिता को निरंजन नामक उसी गांव के एक ब्राह्मण के कुछ रुपये देने थे । निरंजन ने जयदेव को संसार से उदासीन जानकर उनकी भगवद्भक्ति से अनुचित लाभ उठाने के विचार से किसी प्रकार उनके घर द्वार हथियाने का निक्षय किया । उस ने एक दस्तावेज बनाया और आकर जयदेव से कहा- देख जयदेव! मैं तेरे राधा कृष्ण को और गोपी कृष्ण को नहीं जानता ,या तो अभी मेरे रुपये ब्याज समेत है दे, नहीं तो इस दस्तावेज पर सही करके घर द्वारपर मुझें अपना कब्जा कर लेने दे ।

जयदेव तो सर्वथा नि:स्पृह थे । उन्हें घर द्वार में रत्तीभर भी ममता नहीं थी । उन्होंने कलम उठाकर उसी क्षण दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये । निरञ्जन कब्जा करने के तैथारी से आया ही था । उसने तुरंत घरपर कब्जा कर लिया । इतनेमें ही निरञ्जन की छोटी कन्या दौड़ती हुई आकर निरञ्जन से कहने लगी- बाबा ! जल्दी चलो, घरमें आग लग गयी; सब जल गया । भक्त जयदेव वहीं थे । उनके मनमें द्वेष हिंसा का कहीं लेश भी नहीं था, निरञ्जन के घरमें आग लगने की खबर सुनकर वे भी उसी क्षण दौडे और जलती हुई लाल लाल लपटोंके अंदर उसके घरमें घुस गये ।

जयदेव, घरमें घुसना ही था है कि अग्नि वैसे ही अदृश्य को गयी, जैसे जागते ही सपना! जयदेव की इस अलौकिक शक्ति को देखते ही निरञ्जन के नेत्रों मे जल भर आया । अपनी अपवित्र करनीपर पछताता हुआ निरंजन जयदेव के चरणो में गिर पड़ा और दस्तावेज़ को फाड़कर कहने लगा- देव ! मेरा अपराध क्षमा हो, मैने लोभवश थोडे से पैसों के लिये जान बूझकर बेईमानी से तुम्हारा घर द्वार छीन लिया ।

आज तुम न होते तो मेरा तमाम घर खाक हो गया होता । धन्य हो तुम ! आज़ मैंने भगवद्भक्त का प्रभाव जाना । उसी दिनर से निरञ्जन का हदय शुद्ध हो गया और वह जयदेव के संग से लाभ उठाकर भगवान के भजन कीर्तन में समय बिताने लगा । भगवान की अपने उपर इतनी कृपा देखकर जयदेव का हृदय द्रवित हो गया । उन्होंने घर द्वार छोड़कर पुरुषोत्तम क्षेत्र -पूरी जाने का विचार किया ।

पराशर नामक ब्राह्मण को साथ लेकर वे पुरी की ओर चल पड़े । भगवान का भजन कीर्तन करते हुए जयदेव जी चलने लगे । एक दिन मार्ग में जयदेव जी को बहुत दूरतक कहीं जल नहीं मिला । बहुत जोर की गरमी पड़ रही थी, वे प्यास के मारे व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े । तब भगवान् स्वयं गोपाल बालक के वेष में पधारकर जयदेव को कपड़े से हवा की और जल तथा मधुर दूध पिलाया । तदनन्तर मार्ग बतलाकर उन्हें शीघ्र ही पुरी पहुंचा दिया । अवश्य ही भगवान् को उस वेषमे स समय जयदेव जी और उनके साथी पराशर ने पहचाना नहीं ।

जयदेव जी प्रेम मे डूबे हुए सदा श्रीकृष्ण का नाम गान  करते रहते थे । एक दिन भावावेश मे अकस्मात् उन्होंने देखा मानो चारों ओर सुनील पर्वत श्रेणी है, नीचे कलकल निनादिनी कालिन्दी बह रही है । यमुना तीस्पर कदम्ब के नीचे खडे हुए भगवान् श्री कृष्ण मुरली हाथ में लिये मुसकरा रहे हैं । यह दृश्य देखते ही जयदेवजी के मुखसे अकस्मात् यह गीत निकल पडा –

मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुव: श्यामास्तमालद्रुमैर्नक्तं
भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे गृहं प्रापय ।
इत्थं नन्दनिदेशतश्चलितयो: प्रत्यध्वकुञ्जद्रुमं राधामाधवयोर्जयन्ति यमुनाकूले रह:केलय: ।। 

पराशर इस मधुर गान को सुनकर मुग्ध हो गया । कहा जाता है, यहीं जयदेव जी  ने भगवान के दशावतारों के प्रत्यक्ष दर्शन हुए और उन्होंने जऐ जगदीश हरे की टेर लगाकर दसों अवतारों की क्रमश: स्तुति गायी । कुछ समय बाद जब उन्हें बाह्य ज्ञान हुआ, तब पराशर को साथ लेकर वे चले भगवान् श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करने ।

आपका वैराग्य ऐसा प्रखर था कि एक वृक्ष के नीचे एक ही दिन निवास करते थे, दूसरे दिन दूसरे वृक्षके नीचे आसक्ति रहित रहते थे । जीवन निर्वाह करने की अनेक सामग्रियों मे से आप केवल एक गुदरी(मोटी चादर) और एक कमण्डलु ही अपने पास रखते थे और कुछ भी नहीं ।

श्री जयदेव जी का विवाह –

जगन्नाथ पुरी में ही सुदेव नामके एक ब्राह्मण श्री जगन्नाथ भगवान् के भक्त थे । उनके कोई सन्तान न थी, उन ब्राह्मण ने श्री जगन्नाथजी से प्रार्थना की कि यदि मेरे सन्तान होगी तो पहली सन्तान आपको अर्पण कर दूंगा । कुछ समय के बाद उसके एक कन्या हुई और जब द्वादश वर्षकी विवाह-के योग्य हो गयी तो उस ब्राह्मण ने श्री जगन्नाथ जी के मंदिर में उस कन्या (पद्मावती) को लाकर प्रार्थना की के हे प्रभो ! मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार आपको भेंट करने के लिये यह कन्या लाया हूं । उसी समय श्री जगन्नाथ जी ने आज्ञा दो कि इस समय हमारे ही स्वरुप परमरसिक जयदेव नामके भक्त पुरी में विराज रहे हैं, अत: इसे अभी ले जाकर उन्हें अर्पण कर दो और उनसे कह देना कि जगन्नथ जी की ऐसी ही आज्ञा हुई है ।

भगवान् की आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण वनमें वहां गया, जहां कविराजराज भक्त श्री जयदेव जी बैठे थे और उनसे बोला -हे महाराज ! आप मेरी इस कन्या को पत्नी रूप से अपनी सेवामें लीजिये, जगन्नाथजी की ऐसी आज्ञा है । जयदेवजीने कहा – जगन्नाथ जी की बात जाने दीजिये, वे यदि हजारों स्त्रियां भी सेवा में रखें तो उनकी शोभा है, वे समर्थ है । परंतु हमको तो एक ही पहाड के समान भारवाली हो जायगी। अत: अब तुम कन्या के साथ यहा से लौट जाओ ।

ये भगवान् की आज्ञाको भी नहीं मान रहे हैं, यह देखकर ब्राह्मण खीज गया और अपनी लड़की से बोला -मुझे तो जगन्नाथजी की आज्ञा शिरोधार्य है, मैं उसे कदापि टाल नहीं सकता है । तुम इनके ही समीप स्थिर होकर रहो । श्री ज़यदेव जी अनेक प्रकार की बातो से समझाकर हार गये, पर वह ब्राह्मण नहीं माना और अप्रसन्न होकर चला गया । तब वे बड़े भारी सोचमे पड़ गये । फिर वे उस ब्राह्मण की कन्यासे बोले -तुम अच्छी प्रकार से मनमें विचार करो कि तुम्हारा अपना क्या कर्तव्य है ? तुम्हारे योग्य कैसा पति होना चाहिये ? यह सुनकर उस कन्या ने हाथ जोड़कर कहा की मेंरा वश तो कुछ भी नहीं चलता है । चाहे सुख हो या दुख, यह शरीर तो मैंने आपपर न्यौछावर कर दिया है ।

श्री पद्मावती का भावपूर्ण निश्चय सुनकर श्री जयदेव जी ने प्रसन्न हुए । उन्होंने सोचा की भगवान् जगन्नाथ ही यही  इच्छा है ऐसा लगता है और प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा को मिला दिया। श्री जयदेव जी और श्री पद्मावती की का विवाह संपन्न हुआ । निर्वाह के लिये झोपडी बना कर छाया कर ली । अब छाया हो गयी तो उसमें भगवान् श्यामसुन्दर की एक मूर्ति सेवा करने के लिये पधरा ली ।

श्री गीतगोविन्द महाकाव्य की रचना :

श्री जयदेव जी प्रभु की सुमधुर लीला का दर्शन नित्य करते परंतु एक दिन मन में आया कि जिन प्रभु की लीलाओ का मै अपने उर अंतर में दर्शन करता हूं उसका गान करुँ ।परम प्रभु की ललित लीलाएँ जिसमें वर्णित हों, ऐसा एक ग्रन्थ बनाऊं और अपनी वाणी पवित्र करू। जिन जिन संतो ने प्रभु के मधुर स्वरुप का भजन किया उन्होंने गाकर किया है। उनके इस निश्चय के अनुसार अति सरस गीतगोविन्द महाकाव्य की रचना वे करने लगे ।

गीतगोविन्द लिखते समय एक बार श्री जयदेव जी को एक विलक्षण भाव का दर्शन हुआ की श्री श्यामसुंदर विरह कें ताप से तप्त है, वे श्री किशोरी जी से विनती करते है के आप अपना चरणकमल  मेरे मस्तकपर पधरा दीजिये । इस आशय का पद ग्रन्थ में लिखते समय सोच विचार मे पड़ गये कि इस गुप्त रहस्य को कैसे प्रकट किया जाय ?इस महाश्रृंगार रस को संसार के सामने प्रकट कैसे करू? कलम रुक गयी और सोचने लगे की क्या करे । सोच विचार करते करते संध्या हो गयी और संध्या में गंगा स्नान का नियम था ।आप स्नान करने चले गये ।

पीछे से श्रीकृष्ण जयदेव जी का रूप धारण कर आये और पद्मावती जी से पोथी मांगने लगे । पद्मावती ने कहा – प्रभु आज आप बिना स्नान किये लौट आये? जयदेव रूप धारी भगवान् ने कहा की एक भाव मन में आया है वह लिख देता हूं कही विस्मरण न हो जाए, पोथी में प्रभु ने जयदेव जी के मन में आयी हुई पंक्ति लिख दी ।पद्मावती जी का नियम था की से जयदेव जी को भोजन प्रसाद परोस कर ही वे भोजन करती थी। प्रभु ने सोचा आज आया हूं तो इनका आतिथ्य स्वीकार करना चाहिए । प्रभु ने कहा हमें जोर की भूख लगी है । पद्मावती ने भोजन परोसा और भोजन पाकर भगवान् चले गए और बाद में पद्मावती जी ने भी भोजन पाया । इतने में श्री जयदेव जी स्नान करके लौट आये और देखा तोह पद्मावती भोजन पा रही है ।उन्होंने कहा – पद्मावती आज तुमने पहले ही भोजन पा लिया ? तुम्हारा तो नित्य नियम है की हमारे भोजन पाने के बाद ही तुम भोजन करती हो।

पद्मावती ने कहा – जी प्रभु आप कैसी बाते कर रहे है ? अभी अभी अभी मैंने आपको भोजन पवाया है । आप ही ने आकर पोथी मांगी और उसमें कोई पद लिखा और भोजन करके चले गए । श्री जयदेव जी ने देखा कि वह पद जो अभिव्यक्त करने में संकोच हो रहा था वह पद पोथी में लिख दिया गया है । जयदेव जी समझ गए की प्रभु ने ही यह लीला की है  ।

जयदेव वेषधारी महमायावी श्री कृष्ण ने देहि मे पदपल्लवमुदारं लिखकर कविता की पूर्ति कर दी थी।

श्री जयदेवजी अति प्रसन्न हुए और पद्मावती से कहने लगे की तुम धन्य हो ,तुम्हारा सौभाग्य अखंड है की प्रभु ने तुम्हारे हाथ का भोजन पाया है। लपक कर पद्मावती जिस थाली में खा रही थी उसमे का उच्चिष्ठ जयदेव जी पाने लगे । यह देख कर पद्मावती जी को संकोच हुआ की मेरे पतीदेव आज ये क्या कर रहे है ।श्री जयदेव जी प्रभु की कृपा का अनुभव कर के कहने लगे – हे कृष्ण ! हे नंदनंदन !हे राधावल्लभ! हे व्रजांगनाधव आज आपने लिस अपराध से इस किंकर त्यागकर केवल पद्मावती का मनोरथ पूर्ण किया ? इस घटना के बाद उन्होंने  गीत गोविन्द को शीघ्र ही समाप्त कर दिया ।

श्री गीतगोविन्द की महिमा :

जगन्नाथ धाम में एक राजा पण्डित था । उसने भी एक पुस्तक बनायी और उसका गीतगोविन्द नाम रखा ।
उसमें भी से कृष्ण चरित्रों का वर्णन था । राजा ने ब्राहाणो को बुलाकर कहा कि यही गीतगोविन्द है । इसकी प्रतिलिपियां करके पढिये और देश देशांतर में प्रचार करिये ।

इस बात को सुनकर विद्वान् ब्राह्मणोंने असली गीत-गोविन्द को खोलकर दिखा दिया और मुसकराकर बोले कि यह तो कोई नयी दूसरी पुस्तक है, गीतगोविन्द नहीं है । राजा का तथा राजभक्त विद्वानोंका आग्रह था कि यही गीतगोविन्द है । अब इस बात से लोगों की बुद्धि भ्रमित हो गयी । कौन सी पुस्तक असली है, यह निर्णय करने के लिये दोनों पुस्तकें श्री जगन्नाथ देव जी के मन्दिर में रखी गयी । बाद में जब पट खेले गये तो देखा गया कि जगन्नाथ जी ने राजाकी पुस्तक को दूर फेंक दिया है और श्री जयदेव कवि कृत गीत-गोविन्द को अपनी छाती से लगा लिया है ।

इस दृश्यको देखकर राजा अत्यन्त लज्जित हुआ । अपनी पुस्तक का अपमान जानकर बड़े भारी शोक में पड़
गया और निश्चय किया कि अब मैं समुद्र में डूबकर मर जाऊँगा । जब राजा डूबने जा रहा था तो उस समय  प्रभुने दर्शन देकर आज्ञा दी कि तू समुद्र में मत डूब । श्री जयदेव कवि कृत गीतगोविन्द जैसा दूसरा ग्रन्थ नहीं को सकता है । इसलिये तुम्हारा शरीर त्याग करना वृथा है । अब तुम ऐसा करो कि गीतगोविन्द के बारह सर्गो में अपने बारह शलोक मिलाकर लिख दो । इस प्रकार तुम्हारे बारह रलोक उसके साथ प्रचलित हो जायेंगे, जिसकी प्रसिद्धि तीनों लोकों में फैल जायगी ।

श्री गीतगोविन्द का गान सुनने श्री जगन्नाथ जी का पधारना :

एकबार एक माली की लड़की बैंगन के खेत मे बैंगन तोड़ते समय गीतगोविन्द के पांचवें सर्ग की धीर समीरे यमुनातीरे वसति वने वनमाली  इस अष्टपदी का गान कर रही थी । उस मधुर गान को सुनने के लिये श्री जगन्नाथ जी जो उस समय अपने श्री अंगपर महीन एवं ढीली पोशाक धारण किये हुए थे, उसके पीछे पीछे डोलने लगे । प्रेमवश बेसुध होकर उस माली की लड़की के पीछे पीछे घूमन से कांटों में उलझकर श्री जगन्नाथ जी के वस्त्र फट गये । उस लड़की के गान बन्द करने पर भगवान मंदिर में पधारे ।

संध्या का दर्शन खुला तब फटे वस्त्रो को देखकर पुरीके राजाने आश्चर्य चकित होकर पुजारियों से पूछा -अरे ! यह क्या हुआ, ठाकुर जी के वस्त्र कैसे फट गये हैं ? पुजारियों ने कहा कि हमें तो कुछ भी मालूम नहीं है ।राजा ने सैनिको को भेजा तब खेत में भगवान् के फाटे हुए वस्त्र कांटो में फसे मिले।  तब स्वयं ठाकुर जी ने ही सब बात बता दी । जयदेव जी ने कहा – राजन् ! जो भीं इन अष्टपदियो का गान करता है ,श्री श्यामसुंदर वहा जाकर उसे सुनते है । राजा ने प्रभु की रुचि जानकर पालकी भेजी, उसमें बिठाकर उस लड़की को बुलाया । उसने आकर ठाकुर जी के सामने नृत्य करते हुए उसी अष्टपदी को गाकर सुनाया । प्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए । तब से राजा ने मंदिर में नित्य गीत गोविन्द गान की व्यवस्था है ।

उक्त धटना से गीत गोविन्द के गायन को अति गम्भीर रहस्य जानकर पुरीके राजाने सर्वत्र यह ढिंढोरा पिटवाया कि कोई राजा हो या निर्धन प्रजा हो, सभी को उचित है कि इस गीत गोविन्द का मधुर स्वरों से गान करे । उस समय ऐसी भावना रखे कि प्रियाप्रियतम श्री राधा श्यामसुन्दर समीप विराजकर श्रवण कर रहे हैं ।

गीतगोविन्द के महत्व को मुलतान के एक मुगल सरदार ने एक ब्राह्मण से सुन लिया । उसने घोषित रीति के अनुसार गान करने का निश्चय करके अष्टपदियों को कणठस्थ कर लिया । जब वह घोड़ेपर चढकर चलता था तो उस समय घोड़ेपर आगे भगवान् विराजे हैं ऐसा ध्यान कर लेता था, फिर गान करता था । एकदिन उसने घोड़ेपर प्रभु को आसन नहीं दिया और गान करने लगा, फिर क्या देखा कि मार्ग में घोड़े के आगे आगे मेरी ओर मुख किये हुए श्यामसुन्दर पीछे को चलते हैं और गान सुन रहे हैं । घोड़े से उतरकर उसने प्रभु के चरणस्पर्श किये तथा नौकरी छोड़कर विरक्त वेश धारण कर लिया ।

अतः आगे जो भी गीतगोविन्द का गान् करना चाहे वे लोग भगवान् को पहले आसान निवेदन करे ऐसी घोषणा राज्य में कर दिया गया । गीतगोविन्द का अनन्त प्रताप है, इसकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जिसपर स्वयं रीझकर भगवान ने उसमें अपने हाथसे पद लिखा है ।

श्री जयदेव जी की साधुता :

श्रीजयदेव जी को एक बार एक सेवक ने अपने घर बुलाया । दक्षिणा में आग्रह करके कुछ मुहरें देने लगा, आपके मना करने पर भी उसने आपको चद्दर में मुहरें बाँध दीं । आप अपने आश्रम को चले, तब मार्ग में उन्हें ठग मिल गये । आपने उनसे पूछा कि तुमलोग कहाँ जाओगे ? ठगोंने उत्तर दिया- जहाँ तुम जा रहे हो, वहीं हम भी जायेंगे । श्री जयदेवजी समझ गये कि ये ठग हैं । आप तो परम संत थे ,आपने गाँठ खेलकर सब मुहरें उन्हें दे दीं और कहा कि इनमे से जितनी मोहर आप लेना चाहें ले लें ।

उन दुष्टो ने अपने मनमें सोच समझकर कहा कि इन्होंने हमारे साथ चालाकी की है । अभी तो भयवश सब धन बिना माँगे ही हमें सोंप दिया है । परंतु इनके मनमें यही है कि यहाँ से तो चलने दो, आगे जब नगर आयेगा तो शीघ्र ही इन सबों को पकडवा दूँगा और दण्डित करवाऊंगा ।

चार ठगों ने आपस में विचार किया कि क्या करे । एक ने कहा धन लेकर इनके प्राण लेकर भाग चलो, दूसरे ने कहा मारकर क्या करे ?धन तो मिल गया। तब सबने निर्णय किया के न मारो न छोडो ,यह सोचकर उन ठगोंने श्री जयदेवजी के हाथ -पैर काटकर बड़े गड्ढे में डाल दिया और अपने अपने घरोंको चले गये ।जयदेव जी वहा पड़े पड़े मधुर स्वर में श्री युगल नाम संकीर्तन करने लगे।

थोड़े समय बाद ही वहाँ से एक राजा जिनक नाम लक्ष्मणसेन था ,वहाँ से निकल रहे थे ।राजा भक्तहृदय थे, उन्होंने युगलनाम संकीर्तन सुना तो सैनिको को आदेश दिया की ये वाणी कहा से आ रही है यह ढूंढ कर निकालो । सैनिको ने देखा की एक अंधकूप में श्रीज़यदेव जी संकीर्तन कर रहे हैं और गड्ढे में दिव्य प्रकाश छाया है तथा हाथ पैर  कटे होनेपर भी वे परम प्रसन्न हैं । तब उन्हें गड्डेसे बाहर निकालकर राजा ने हाथ पैर कटने का प्रसंग पूछा । जयदेवजी ने उत्तर दिया कि मुझे इस प्रकार का ही शरीर प्राप्त हुआ है । राजा समझ गए की ये परम संत है,किसीकी निंदा शिकायत नहीं करना चाहते ।

सच्चे संत को परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती उनका आभामंडल ही सब बता देता है । श्री जयदेव जी के दिव्य दर्शन एवं मधुर वचनामृत को सुनकर राजाने मनमें विचारा कि मेरा बड़ा भारी सौभाग्य है कि ऐसे सन्तके दर्शन प्राप्त हुए । राजा उन्हें पालकी में बिठाकर घर ले आया । चिकित्सा के द्वारा कटे हुए हाथ पैरो के घाव ठीक करवाये, फिर श्री जयदेव जी से प्रार्थना  कि अब आप मुझे आज्ञा दीजिये कि कौन सी सेवा करूं ? श्री जयदेवजी ने कहा कि राजन्! भगवान् और भक्तो की सेवा कीजिये । ऐसी आज्ञा पाकर राजा साधु सेवा करने लगा ।

इसकी ख्याति चारों ओर फैल गयी की राजा लक्ष्मण सेन ने संत सेवा आरम्भ की है और सब सम्प्रदायो के संतो को केवल वेश देखकर राजा सेवा करते है।  एक दिन वे ही चारों ठग सुन्दर कण्ठी माला धारण कर राजा के यहां आये । उन्हें देखते ही श्री जयदेव जी पहचान गए । ठग डर गए की अब दंड मिलेगा । श्री जयदेव जी ने नाही उन्हें अन्य संतो के साथ रखने का विचार किया न अपने साथ रखाने का सोचा ,उनका विशेष सत्कार करवाने का विचार किया जिससे उनका सत्य सामने न आये और दंड से बच जाए। जयदेव जी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा – देखो, आज तो मेरे बड़े गुरु भाई लोग पधारे है।उन सबका उन्होंने बड़ा स्वागत किया।

श्री जयदेव जी ने शीघ्र राजा को बुलवाकर कहा कि इनकी प्रेम से यथोचित सेवा करके संत सेवाकर फल प्राप्त कर लो । आज्ञा पाकर राजा उन्हें भीतर महल में ले गया और अनेक सेवको को उनकी सेवा-में लगा दिया, परंतु उन चारोंके मन अपने पापसे व्याकुल थे, उन्हें भय था कि यह हमें पहचान गया है, राजासे कहकर मरवा देगा । वे राजासे बार बार विदा मांगते थे, पर राजा उन्हें जाने नहीं देता था । तब श्री जयदेव जी के कहनेपर राजाने अनेक प्रकार के वस्त्र रत्न आभूषण आदि देकर उन्हें विदा किया । धन और कीमती सामान साथ में था अतः राज ने साथमें कई मनुष्यों को भी भेजा ।

राजा के सिपाही गठरियों को लेकर उन उग सबको पहुंचा ने के लिये उनके साथ साथ चले, कुछ दूर जानेपर राजपुरुषो ने उन सन्तो से पूछा कि भगवन् ! राजा के यहां नित्य संत महात्मा आते जाते रहते हैं, परंतु राज के गुरुदेव जी ने जितना सत्कार आपका किया और राजासे करवाया है, ऐसा किसी दूसरे साधु सन्त का सेवा सत्कार आजतक नहीं हुआ । इसलिये हम प्रार्थना करते हैं कि आप बताइये कि स्वामी जी से आपका क्या सम्बन्ध है ?

उन्होंने कहा यह बात अत्यन्त गोपनीय है, हम तुम्हें बताते है पर तुम किसीसे मत कहना । पहले तुम्हारे स्वामी जी और हम सब एक राजा के यहां नौकरी करते थे । वहाँ इन्होंने बड़ा भारी अपराध किया,इन्होंने राजा का बहुत सा धन लूट लिया । राजा ने इन्हें मार डालने की आज्ञा दी परंतु हमने अपना प्रेमी जानकर इनको मारा नहीं ।केवल हाथ पैर काटकर राजा को दिखा दिया और कह दिया कि हमने मार डाला । उसी उपकार के बदले में हमारा सत्कार विशेष रूप से कराया गया है ।

उन साधु वेषधारियो के इस प्रकार झूठ बोलते ही पृथ्वी फट गयी और वे सब उसमें समा गये । इस दुर्धटना से राजपुरुष लोग आश्चर्य चकित हो गये । वे सब के सब दौड़कर स्वामीजी के पास आये और जैसा हाल था, कह खुनाया । उसके सुनते ही से जयदेव जी दुखी होकर हाथ-पैर मलने लगे । उसी क्षण उनके हाथ पैर पहले जैसे वापस आ गए ।  राजपुरुषो ने दोनों आश्चर्यजनक घटनाओ को राजा से कह सुनाया । हाथ पैर पहले जैसे पूरे हो जाने की घटना सुनकर राजा अति प्रसन्न हुआ । उसी समय वह दौड़कर श्री जयदेव जी के समीप आया और चरणों में सिर रखकर पूछने लगा  -प्रभो! मैं अधिकारी तो नहीं हूं परंतु कृपा करके इन दोनों चरित्रों का रहस्य खोलकर कहिये कि क्यों धरती फटी और उसमें सब साधु कैेसे समाये ? आपके ये हाथ पैर कैसे निकल आये ?

श्री जयदेव जी ने पहले बात को टालना चाहा । राजा ने स्वामीजी से जब अत्यन्त हठ किया तब उन्होंने सब बात खोलकर कह दी, फिर बोले कि देखो राजन् ! यह संतो का वेश अत्यन्त अमूल्य है, इसकी बडी भारी महिमा है । संतो।के साथ कोई चाहे जैसी और चाहे जितनी बुराई करे तो भी वे उस बुराई करनेवाले का बुरा न सोचकर बदले में उसके साथ भलाई ही करते हैं । साधुता का त्याग न करनेपर सन्त, महापुरुष एवं भगवान् श्री श्यामसुन्दर मिल जाते हैं ।

श्री जयदेव जी की पत्नी श्री पद्मावती जी का पतिप्रेम :

अब तक राजा ये नहीं जनता था की ये हमारे स्वामी जी जो महल में विराजते है यही जयदेव जी है ।राजा ने श्रीज़यदेव जी  का नाम तो सुना था, पर उसने कभी दर्शन नहीं किया था । आज जब उसने जाना की यही श्री जयदेव जी है ,उनके  नाम और गांव को जाना तो प्रसन्न होकर कहने लगा कि आप कृपाकर यहां विराजिये । आपके यहां विराजने से मेरे पूरे देश में प्रेमभक्ति फैल गयी है ।

राजा की अब इच्छा हुई की श्री जयदेव जी की पत्नी को भी महल में ही निवास करवाना चाहिए । श्री जयदेव जी की आज्ञा से राजा कीन्दुबिल्ब आश्रम से उनकी पत्नी श्री पद्मावतीजी को लिवा लाये । श्री पद्मावती जी रानी के निकट रनिवास में रहने लगी । एक दिन जब रानी पद्मावती के निकट बैठी थी उसी समय किसीने आकर रानीको सूचित किया कि तुम्हारा भाई युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ है और तुम्हारी भाभी जी उनके साथ सती हो गयी ।

यह सुनकर रानी को अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि हमारी भाभी कितनी श्रेष्ठ सती साध्वी थी । श्री पद्मावती जी कोे इससे कुछ भी आश्चर्य न हुआ । उन्होंने रानी को समझाया कि पति के स्वर्गवासी होनेपर उनके मृत शरीर के साथ जल जाना उत्तम पातिव्रत सूचक है, परंतु सबसे श्रेष्ठ पातिव्रत की यह रीति है कि प्रियतम के प्राण छूट जायं तो अपने प्राण भी तुरंत उसी क्षण शरीर को छोड़कर साथ चले जायं ।

श्री पद्मावती जी ने रानी के भाभी की प्रशंसा नहीं की, इससे रानीने व्यंग्य करते हुए कहा कि आपने जैसी पतिव्रता बतायी ऐसी तो केवल आप ही हो । समय पाकर सब बात रानी ने राजा से कहकर फिर यों कहा आप स्वामी जी को थोडी देर के लिये बाग में ले जाओ, तब मैं इनके पातिव्रत की परीक्षा करुँगी । राजाने रानी-का विचार सुनकर कहा कि यह उचित नहीं है ।

जब रानीने बड़ा हठ किया, तब राजाने उसकी बात मानकर वैसा ही किया, राजा के साथ स्वामी जी के बागमें चले जानेपर रानी की सिखायी हुई एक दासी ने आकर पद्मावतीजी से कहा कि स्वामीजी भगवान के धाम को चले गये । यह सुनते ही रानी और समीप बैठी हुई स्त्रीयां दुख प्रकट करने के ढोंग को रचकर धरतीपर लेटने और रोने लगी । ध्यान लगाकर पद्मावती जी ने पति को जीवित जानकर थोडी देर बाद कहा -अजी रानीजी! मेरे स्वामी जी तो बहुत अच्छी तरह से हैं, तुम अचानक ही इस प्रकारर क्यों धोखे में आकर डर रही हो ?

रानी की माया का श्री पद्मावती जी पर कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ, भेद खुल गया, इससे रानी को बडी लजा हुई । जब कुछ दिन बीत गये तो फिर दूसरी रानी ने उसी प्रकार की तैयारी कर के माया जाल रचा । श्री पद्मावती जी अपने मनमें समझ गयी कि रानी परीक्षा लेना चाहती है तो परीक्षा ही देना चाहिये । इस बार जैसे ही किसी दासी ने आकर कहा की स्वामी जी तो प्रभुको प्राप्त हो गये । वैसे ही झट पतिप्रेम से परिपूर्ण होकर श्री पद्मावती जीने अपना शरीर छोड़ दिया । इनके मृत शरीर को देखकर रानीका मुख कान्तिहीन सफेद हो गया ।

राजा आये और उन्होंने जब यह सब जाना तो कहने लगे कि इस स्त्री के चक्कर में आकर मेरी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गयी, अब इस पाप का यही प्रायश्चित्त है कि मैं भी जल मरूं । श्री जयदेव-जी को जब यह समाचार मिला तो वे दौड़कर वहाँ पर आये और मरी हुई पद्मावती को तथा मरने के लिये तैयार राजा को देखा । राजाने कहा कि इनको मृत्यु मैंने दी है । जयदेव जी ने कहा -तो अब तुम्हारे जलने से ये जीवित नहीं हो सकती हैं । अत: तुम मत जलो। राजाने कहा-महारज ! अब तो मुझे जल ही जाना चाहिये; क्योकि मैंने आपके सभी उपदेशों को धुलमें मिला दिया ।

श्री जयदेवजी ने राजा को अनेक प्रकार से समझाया, परंतु उसके मन को कुछ भी शान्ति नहीं मिली, तब आपने गीत गोविन्द की एक अष्टपदी का गान आरम्भ किया । संगीत विधि से अलाप करते ही पद्मावती जी जीवित हो गयी । इतने पर भी राजा लज्जा के मारे मरा जा रहा था और आत्महत्या कर लेना चाहता था ।

वह बार बार मनमें सोचता था कि ऐसे महापुरुष का संग पाकर भी मेरे मनमें भक्ति का लेशमात्र भी नहीं आया । श्री जयदेव जी ने समझा बुझाकर राजा को शान्त किया  परंतु इस घटना के बाद श्री जयदेव ने कहा की अब हम महल में नहीं रह सकते ,हम अपने गाँव वापस जा रहे है क्योंकि न तुम इस घटना को भूलोगे न हम अतः रस में नीरस होगा और सेवा भजन ठीक से नहीं हो पायेगा ।वैसे भी साधू को अधिक समय दूसरे स्थान पर नहीं निवास करना चाहिए।  तुम भजन और संत सेवा में लगे रहना ।

श्री जयदेव जी की गंगा के प्रति निष्ठा और गंगा जी का आश्रम के निकट प्राकट्य :

श्री जयदेवजी का जहाँ आश्रम था, वहांसे गंगाजी की धारा अठारह कोस दूर थी । परंतु आप नित्य गंगा स्नान करते थे । जब आपका शरीर अत्यन्त वृद्ध हो गया, तब भी आप अपने गंगा स्नान के नित्य नियम को कभी नहीं छोड़ते थे । इनके बड़े भारी प्रेम को देखकर इन्हें सुख देनेके लिये रांत को स्वप्न में श्री गंगा जी ने कहा अब तुम स्नानार्थ इतनी दूर मत आया करो, केवल ध्यान में ही स्नान कर लिया करो । धारा में जाकर स्नान करनेका हठ मत करो ।

श्री जयदेव जी को धरा में न जाने पर अच्छा नहीं लगता। अतः इस आज्ञा को स्वीकार नहीं किया । तब फिर गंगाजी ने स्वप्न में कहा – तुम नहीं मानते को तो मैं ही तुम्हारे आश्नम के निकट सरोवर में आ जाऊँगी । तब आपने कहा-मैं कैसे विश्वास करुंगा कि आप आ गयी हैं । गंगाजी ने कहा जब आश्रम के समीप जलाशय में कमल खिले देखना, तब विश्वास करना कि गंगा जी आ गयी ।

ऐसा ही हुआ, खिले हुए कमलो को देखकर श्री जयदेव जी ने वहीं स्नान करना आरम्भ कर दिया ।अंतकाल में आपको श्री ब्रजभूमि में जाने का विचार हुआ। आपने अन्तकाल में श्री वृन्दावनधाम को प्राप्त किया और श्री राधामाधव के चरणकमलों की प्राप्ति की।

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श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु

श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु
(श्रृंगारवट वृन्दावन)

बंग देश के बाँकुड़ा जिले के पुरुणिया पाट के श्रीरसिकानन्द प्रभु के कनिष्ठ पुत्र श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी श्रीश्रीमन् नित्यानन्द प्रभुकी सातवीं पीढ़ी में थे। वे शैशव से ही विषयविरक्त थे। नित्यानन्द-सन्तान होने के नाते वैष्णव शिष्टाचार के अनुसार वैष्णव मात्र के पूज्य थे। छोटे-बड़े, गृहस्थ और त्यागी सब उसी दृष्टि से उनका आदर करते थे। पर यह उनके ‘तृणादपि सुनीचेन’ भाव के प्रतिकूल था। इससे उन्हें हार्दिक कष्ट होता था। उनकी प्रबल इच्छा थी भगवत्-कृपालब्ध किसी विशिष्ट वैष्णव के आनुगत्य में भजन-शिक्षा ग्रहण करने की। यह भी नित्यानन्द प्रभु के वंशज होने के कारण उनके लिए सम्भव नहीं था। जो सभी वैष्णवों के पूज्य थे और स्वयं आचार्य स्वरूप थे, उन्हें कोई वैष्णव अपने अनुगत मानकर भजन-शिक्षा कैसे देता ?

इसलिए वे चुपचाप घर छोड़कर वृन्दावन चले गये। उस समय गौड़ीय वैष्णव समाज के मुकुटमणि श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीपाद वृन्दावन में रहते थे। उनसे उन्होंने बिना अपने स्वरूप का परिचय दिये भजन-शिक्षा देने और शास्त्राध्ययन कराने की प्रार्थना की। विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। कुछ दिन वे उनके आनुगत्य में भजन और शास्त्राध्ययन करते रहे। किसी ने न जाना कि वे नित्यानन्द-सन्तान हैं।

पर उनकी मां उनके बिना किसी से कहे घर छोड़कर चले जाने के कारण बहुत दुःखी थीं। उन्होंने उन्हें खोजने के लिए कई भक्तों को इधर उधर भेज रखा था। उनमें से एक उन्हें खोजते-खोजते वृन्दावन में चक्रवर्तीपाद के पास जा पहुंचे। चक्रवर्तीपाद को उन्होंने नंदकिशोरदास जी का परिचय देते हुए उनकी मां की दारुण व्यथा का वर्णन किया और घर लौटकर उनकी इच्छानुसार विवाह करने की आज्ञा देने का अनुरोध किया।

चक्रवर्तीपाद परमपूज्या माँ गोस्वामिनी की इच्छा की अवहेलना कैसे करते ? उन्होंने नन्दकिशोर गोस्वामी से कहा–’आपने मुझे अपने शिक्षा गुरु के रूप में अङ्गीकार किया है। मैं यदि कुछ गुरु-दक्षिणा माँगूं तो देंगे ?’
‘क्यों नहीं ? आप आज्ञा करें।’ नन्दकिशोरजी ने तुरन्त कहा।
‘मेरी गुरु-दक्षिणा रूप में आप अब माँ की आज्ञानुसार घर लौट जायें और विवाह करें।’

नन्दकिशोरजी घर लौट गये, विवाह किया और एक पुत्र को जन्म दिया। उसके पश्चात् वे फिर गृह त्यागकर वृन्दावन चले गये। अपने साथ सम्वत् १८१५ की वादशाही सनद के साथ श्रीश्रीनिताइ-गौरांग विग्रह लेते गये, जिनकी आज भी शृङ्गारवट में विधिवत् सेवा-पूजा चल रही है। उनका अलौकिक प्रभाव देख तत्कालीन जोधपुर के राजा ने उन्हें बहुत-सी भू-सम्पत्ति प्रदान की, जिसका उनके वंशज निताइ-गौरांग की सेवा में उपयोग कर रहे हैं।

श्रीपाद नन्दकिशोरजी के पास भोंदू नाम का एक व्रजवासी बालक रहता था, जो उनकी गैयों की देखभाल करता था। उसे लोग भोंदू इसलिए कहते थे कि उसे छल-कपट और चतुराई छूकर भी नहीं गये थे। उससे यदि उपहास में कोई कुछ झूठ भी कह देता, तो वह उसे मान लेता। शंका करना तो उसे आता ही न था। वह नित्य बालभोग-प्रसाद पाकर श्रीपाद की गायें चराने जमुनापार भांडीरवन में जाया करता। उससे किसी ने कहा था कि भांडीरवन में नन्दलाल ग्वाल-वाल सहित गायें चराने जाते हैं। वह यह सोचकर खुश होता कि किसी दिन उनसे भेंट होगी, तब वह उनसे मित्रता कर लेगा और उनके साथ खेला-कूदा करेगा।

भोले-भाले भोंदू के हृदय की भाव-तरङ्ग उमड़-घुमड़कर जा टकरायी भक्तवत्सल भगवान् के मन-मन्दिर से। उनमें भी एक अपूर्व आलोड़न की सृष्टि हुई और जाग पड़ी एक नयी वासना भोंदू के साथ मित्रता कर खेल-कूद का आनन्द लेने की।
तो हो गयी एक दिन भेंट दोनों में। भेंट को मित्रता में बदलते देर न लगी। भोंदू नित्य कुछ खाने-पीने की सामग्री अपने साथ ले जाता। नन्दलाल और उनके साथी ग्वाल-बाल उसके साथ खाते-पीते, खेलते और नाचते कूदते। कई दिन श्रीपाद ने देखा भोंदू को सामान सिर पर ढोकर ले जाते। एक दिन उन्होंने पूछा–’भोंदू, यह क्या ले जा रहा है ?”
‘जे दाल-बाटी के ताईं है श्रीपाद।’
‘दाल-बाटी ? किसके लिए ?’
‘नन्दलाल और बिन के साथी ग्वाल-बालन के लिए। हम सब मिलके रोज दाल-बाटी बनामें हैं।’
‘नन्दलाल ! कौनसे नन्दलाल रे ?’
‘बेई बंसीबारे, जो भांडीरवन में गैया चरामें हैं।’
‘बंसीबारे ! भांडीरवन में गैया चरामें हैं ! अच्छा, बता तो उनका मुखारविन्द और वेशभूषा कैसी है ?’
‘बे बड़े मलूक हैं। सिर पै मोर-मुकुट धारन करे हैं। कानन में कुण्डल, गले में बनमाला धारन करे हैं और पीरे रंग को ओढ़ना ओढ़े हैं। सच बे बड़े मलूक लगै हैं।’
श्रीपाद आश्चर्यचकित नेत्रों से भोंदू की ओर देखते रह गये। उन्हें उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। पर वे विश्वास किये बिना रह भी नहीं सक रहे थे; क्योंकि वे जानते थे भोंदू झूठ नहीं बोलता।
उन्होंने कहा–’अच्छा भोंदू, एक दिन नन्दलाल और उनके साथियों को यहाँ ले आना। उनसे कहना श्रीपाद के यहाँ आपका दाल-बाटी का निमन्त्रण है। वे आ जायेंगे न ?’
‘आमेंगे च्यौं नई। मैं विनकू ले आऊँगो’ भोंदूने खुश होकर कहा।
उस दिन भाँडीरवन जाते समय भोंदू सोच रहा था–’आज नन्दलाल से श्रीपाद के निमन्त्रण की कहूँगा, तो वह कितना खुश होगा !’ पर जब उसने उनमे निमन्त्रण की बात कही, तो वे बोले–’हम काऊकौ नौतौ-औतौ नायं खामें।’
भोंदू का चेहरा सुस्त पड़ गया। उसने कहा–’नायँ नन्दलाल, तोको चलनौ परैगौ। मैंनै श्रीपाद से कह दी है, मैं तोय ले जाऊँगौ।’
‘नायें, हम नायें जायें। हमकू श्रीपाद सों कहा करनौ ?’ नन्दलाल ने गरदन हिलाकर मुँह बिचकाते हुए कहा।
भोंदू रोष करना नहीं जानता था, पर उस समय उसे रोष आ गया। उसने नन्दलाल से कुछ नहीं कहा। पर वह अपनी गैयों को अलग कर कहीं अन्यत्र जाने लगा, जैसे वह नन्दलाल से कह रहा हो–’तुझे श्रीपाद से कुछ नहीं करना, तो मुझे भी तुझमे कुछ नहीं करना। बस, हो चुकी मेरी-तेरी मैत्री।’
वह थोड़ी दूर ही जा पाया था कि नन्दलालने पुकारा–’भोंदू, ओ भोंदू ! नैक सुन जा।’
भोंदू क्या अब सुनने वाला था ? वह और भी तेजी से गैयों को हाँकने लगा। भोंदू सुनने वाला नहीं था, तो भगवान् भी उसे छोड़ने वाले कब थे ? वे भागे उसके पीछे-पीछे।
वाह रे व्रज के भगवान् ! तुम्हें ‘भगवान्’ कहते भी वाणी लजाती है। भगवान्, जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकर्ता हैं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश जिनके अंश के भी अंश हैं, वे क्या किसी व्यक्ति के पीछे ऐसे भागते हैं, जैसे उनकी उससे कोई अपनी गरज अटकी हो, जैसे उसके रूठ जाने से उनका त्रिलोकी का साम्राज्य छिन जाने वाला हो !
पर वे जिसके पीछे भागें वह भागकर जाय कहाँ ? नन्दलाल जा खड़े हुए भोंदू का रास्ता रोककर उसके सामने और बोले–’सुनें नायँ ?’
उनका स्वर ऊँचा था, पर उसमें विनय का भाव था। भोंदू ने उनके नेत्रों की ओर देखा, तो वे सजल थे। उसने कहा–’कहा कहँ ?’
‘मैं कहूँ, मैं श्रीपाद को निमन्त्रण अस्वीकार नायँ करूँ। मैं तो कहूँ, मैं शृङ्गारवट नायँ जाऊँगौ तू तौ भोरौ है, जानें नायँ शृङ्गारवट राधारानी को ठौर है। हुआँ दाऊ दादा कैसे जायगौ ? मेरे सखा कैसे जायेंगे ? श्रीपादकूँ ह्याँई आवनी होयगौ अपने माथे पै सामग्री लैकें। वे अपने हाथ से दाल-बाटी बनामेंगे, तो हम पामेंगे।’ भोंदू प्रसन्न हो गया। उसने उसी प्रसन्न मुद्रा में श्रीपाद से जाकर सब कुछ निवेदन किया।
श्रीपाद दूसरे दिन प्रचुर सामग्री अपने मस्तक पर वहनकर भांडीरवन ले गये। वे राम-कृष्ण और ग्वाल-बालो के साथ उनका क्रीड़ा विनोद देखकर कृतार्थ हुए। थोड़ी देर में सब कुछ अन्तर्हित हो गया। तब वे मूच्छित हो भूमि पर गिर पड़े। उस समय उन्हें आदेश हुआ–’अधीर न हो। घर जाओ और मेरी लीला स्थलियों का वर्णन करो।’
इस आदेश का पालन कर श्रीपाद ने ‘श्रीवृन्दावन-लीलामृत’ और ‘श्रीश्रीरसकलिका’ नाम के दो ग्रंथों का प्रणयन किया।

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आनन्दी बाई

गोकुल के पास ही किसी गाँव में एक महिला थी जिसका नाम था आनंदीबाई। देखने में तो वह इतनी कुरूप थी कि देखकर लोग डर जायें। गोकुल में उसका विवाह हो गया, विवाह से पूर्व उसके पति ने उसे नहीं देखा था। विवाह के पश्चात् उसकी कुरूपता को देखकर उसका पति उसे पत्नी के रूप में न रख सका एवं उसे छोड़कर उसने दूसरा विवाह रचा लिया। आनंदी ने अपनी कुरूपता के कारण हुए अपमान को पचा लिया एवं निश्चय किया कि ‘अब तो मैं गोकुल को ही अपनी ससुराल बनाऊँगी।

वह गोकुल में एक छोटे से कमरे में रहने लगी। घर में ही मंदिर बनाकर आनंदीबाई श्रीकृष्ण की भक्ति में मस्त रहने लगी। आनंदीबाई सुबह-शाम घर में विराजमान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ बातें करती, उनसे रूठ जाती, फिर उन्हें मनाती, और दिन में साधु सन्तों की सेवा एवं सत्संग-श्रवण करती। इस प्रकार कृष्ण भक्ति एवं साधुसन्तों की सेवा में उसके दिन बीतने लगे।

एक दिन की बात है गोकुल में गोपेश्वरनाथ नामक जगह पर श्रीकृष्ण-लीला का आयोजन निश्चित किया गया था। उसके लिए अलग-अलग पात्रों का चयन होने लगा, पात्रों के चयन के समय आनंदीबाई भी वहाँ विद्यमान थी। अंत में कुब्जा के पात्र की बात चली। उस वक्त आनंदी का पति अपनी दूसरी पत्नी एवं बच्चों के साथ वहीं उपस्थित था, अत: आनंदीबाई की खिल्ली उड़ाते हुए उसने आयोजकों के आगे प्रस्ताव रखा “सामने यह जो महिला खड़ी है वह कुब्जा की भूमिका अच्छी तरह से अदा कर सकती है, अतः उसे ही कहो न, यह पात्र तो इसी पर जँचेगा, यह तो साक्षात कुञ्जा ही है।”

आयोजकों ने आनंदीबाई की ओर देखा, उसका कुरूप चेहरा उन्हें भी कुब्जा की भूमिका के लिए पसंद आ गया। उन्होंने आनंदीबाई को कुब्जा का पात्र अदा करने के लिए प्रार्थना की। श्रीकृष्णलीला में खुद को भाग लेने का मौका मिलेगा, इस सूचना मात्र से आनंदीबाई भाव विभोर हो उठी। उसने खूब प्रेम से भूमिका अदा करने की स्वीकृति दे दी। श्रीकृष्ण का पात्र एक आठ वर्षीय बालक के जिम्मे आया था।

आनंदीबाई तो घर आकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे विह्वलता से निहारने लगी, एवं मन-ही-मन विचारने लगी कि ‘मेरा कन्हैया आयेगा, मेरे पैर पर पैर रखेगा, मेरी ठोड़ी पकड़कर मुझे ऊपर देखने को कहेगा। वह तो बस, नाटक में दृश्यों की कल्पना में ही खोने लगी।

आखिरकार श्रीकृष्णलीला रंगमंच पर अभिनीत करने का समय आ गया। लीला देखने के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुए। श्रीकृष्ण के मथुरागमन का प्रसंग चल रहा था, नगर के राजमार्ग से श्रीकृष्ण गुजर रहे हैं, रास्ते में उन्हे कुब्जा मिली। आठ वर्षीय बालक जो श्रीकृष्ण का पात्र अदा कर रहा था उसने कुब्जा बनी हुई आनंदी के पैर पर पैर रखा और उसकी ठोड़ी पकड़कर उसे ऊँचा किया। किंतु यह कैसा चमत्कार..। कुरूप कुब्जा एकदम सामान्य नारी के स्वरूप में आ गयी। वहाँ उपस्थित सभी दर्शकों ने इस प्रसंग को अपनी आँखों से देखा। आनंदीबाई की कुरूपता का पता सभी को था, अब उसकी कुरूपता बिल्कुल गायब हो चुकी थी। यह देखकर सभी दाँतो तले ऊँगली दबाने लगे। आनंदीबाई तो भाव विभोर होकर अपने कृष्ण में ही खोयी हुई थी।

उसकी कुरूपता नष्ट हो गयी यह जानकर कई लोग कुतुहल वश उसे देखने के लिए आये। फिर तो आनंदीबाई अपने घर में बनाये गये मंदिर में विराजमान श्रीकृष्ण में ही खोयी रहतीं। यदि कोई कुछ भी पूछता तो एक ही जवाब मिलता “मेरे कन्हैया की लीला कन्हैया ही जाने”।

आनंदीबाई ने अपने पति को धन्यवाद देने में भी कोई कसर बाकी न रखी। यदि उसकी कुरूपता के कारण उसके पति ने उसे छोड़ न दिया होता तो श्रीकृष्ण में उसकी इतनी भक्ति कैसे जागती ? श्रीकृष्णलीला में कुब्जा के पात्र के चयन के लिए उसका नाम भी तो उसके पति ने ही दिया था, इसका भी वह बड़ा आभार मानती थी।
प्रतिकूल परिस्थितियों एवं संयोगों में शिकायत करने की जगह प्रत्येक परिस्थिति को भगवान की ही देन मानकर धन्यवाद देने से प्रतिकूल परिस्थिति भी उन्नतिकारक हो जाती है।

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श्री बहिणाबाई जी

संत चरित्रों का श्रवण और मनन करना ,मानव के मन पर अच्छे संस्कार करने का श्रेष्ठ साधन है । पंढरपुर धाम मे विराजमान श्री कृष्ण ,पांडुरंग अथवा विट्ठल नाम से जाने जाते है। भगवान् श्री विट्ठल के अनन्य भक्त जगतगुरु श्री तुकाराम जी महाराज के कई शिष्य हुए परंतु स्त्री वर्ग में उनकी मात्र एक ही शिष्या हुई है जिनका नाम संत श्री बहिणाबाई था।

बहिणाबाई का जन्म मराठवाड़ा प्रांत में वैजपूर तालुका के देवगांव में शेक १५५० में हुआ था।( बहुत से विद्वानों का मत है के जन्म १५५१ में हुआ था ।) इनके पिता का नाम श्री आऊ जी कुलकर्णी और माता का नाम श्री जानकीदेवी था। गाँव के पश्चिम दिशा में शिवानंद नामक महान तीर्थ है,जहाँ श्री अगस्त्य मुनि ने अनुष्ठान किया था। ग्रामवासियो की श्रद्धा थी की इस तीर्थ के पास ‘लक्ष्यतीर्थ ‘ में स्नान करके अनुष्ठान करने से मनोकामना पूर्ण होती है । इसी तीर्थ पर श्री आऊ जी कुलकर्णी ने अनुष्ठान करने पर श्री बहिणाबाई का जन्म हुआ था ।

जन्म होते ही विद्वान पंडितो ने इनके पिता को बता दिया था की यह कन्या महान भक्ता होगी । जब बहिणाबाई नौ वर्ष की थी उस समय देवगांव से १० मिल दूर शिवपुर से बहिणाबाई के लिए विवाह का प्रस्ताव आया। उनका विवाह चंद्रकांत पाठक नामक तीस वर्ष के व्यक्ति से तय किया गया और यह उसका दूसरा विवाह था । वह कर्मठ ब्राह्मण था और कुछ संशयी वृत्ति का भी था। बहिणाबाई बाल्यकाल से ही बहुत सरल स्वभाव की थी, वह सोचती की हमरे पति ज्ञानी है और इस विवाह से वह अप्रसन्न नहीं हुई ।


अपने पति के साथ रहते रहते ९ वर्ष की आयु से ही – ये यात्रा करो,ये व्रत करो ,ये नियम पालन करो यह सब शिक्षा उसे बहुत मिली, परंतु अभी उसके ह्रदय में भक्ति का उदय नहीं हुआ था । एक दिन बहिणाबाई के माता पिता पर संकट आया , उनके पिता के भाई बंधुओ से पैसो को लेकर कुछ विवाद हो गया । बहिणाबाई और उनके पति उनके गांव मदद करने के लिए तत्काल आ गए । बहिणाबाई के माता पिता भी बड़े सरल थे,उनको धन का लोभ नहीं था अतः वे रात को ही अपने बेटी -जमाई के साथ घर छोड़कर चल दिए । पैदल चलते चलते वे लोग श्री धाम पंढरपुर में आये और पांच दिन वाही वास किया ।भगवान् श्री विट्ठल के दर्शन करके बहिणाबाई का मन उस रूप में आसक्त हो गया , वहां संतो का कीर्तन ,नाम श्रवण सुनकर उसको बहुत आनंद हुआ।

आगे चलते चलते वे सब कोल्हापुर नगर में आये,बहुत दिन तक यहाँ वहाँ भटकना संभव नहीं था अतः कोल्हापुर नगर में ही निवास करने का विचार उन्होंने किया । कोल्हापुर में हिरंभट नामक व्यक्ति ने इनको आधार दिया और अपने घर में निवास करने के लिए थोड़ी जगह दे दी । हिरंभट ने बहिणाबाई के पति रत्नाकर पाठक को एक बछड़े सहित गौमाता दान में दी। कोल्हापुर महालक्ष्मी का सिद्ध शक्तिपीठ होने के कारण बहुत से साधु संतो का वह आना जाना रहता था । बारह महीने कोल्हापूर में कथा,कीर्तन, प्रवचन, परायण ,अनुष्ठान का वातावरण रहता था । संतो से कथा श्रवण करना बहिणाबाई को बहुत प्रिय लगता, उसने संत्संग से कई बातो की शिक्षा मिली। उसमे कथा के संस्कार , पति भक्ति के संस्कार, गौ भक्ति के संस्कार जागृत हो गए । घर पर जो कपिला गौ और उसके बछड़े से बहिणाबाई का बड़ा ही प्रेम था ।

एक दिन कोल्हापूर में श्री जयराम स्वामी (जयरामस्वामी वडगावकर )नाम के वैष्णव अपने शिष्यमंडली सहित पधारे में । शिष्यो के घर नित्य कीर्तन होने लगा । बहिणाबाई अपने माता पिता के साथ कीर्तन में जाती और आश्चर्य है की गाय का बछड़ा भी उनके पीछे जहाँ तहाँ आ जाता । कीर्तन की समाप्ति तक वह बछड़ा एक जगह खड़ा रहता और आरती होने पर मस्तक झुकाकर प्रणाम् करता ,संतो को प्रणाम् करता । इस बात का सबको आश्चर्य लगता अतः लोग कहने लगे की अवश्य की यह पूर्वजन्म में कोई हरि भक्त होगा।

एक बार मोरोपंत नामक व्यक्ति के घर कीर्तन था। जगह कम पड गयी थी अतः बछड़े को बहार निकाल दिया । बहिणाबाई को बहुत कष्ट हुआ, उनकी गौ भक्ति उच्च कोटि की थी । वह सोचने लगी की यह बछड़ा भी भक्त है, इसको कीर्तन से क्यों बहार निकल गया? ऐसा लगता है इनलोगो के ह्रदय में गौ भक्ति नहीं है, गौ माता का माहात्म्य ये लोग नहीं जानते । जो गाय से विमुख है वो भक्त नहीं हो सकता ,जो गाय से विमुख है वो देवता भी देवता कहलाने योग्य नहीं है । जयराम स्वामी भी गौमाता के चरणों में भक्ति रखते थे , उनको जैसे ही ये बात पता लगी की गौमाता को बहार निकला गया है ,वे दौड़ते हुए आये और बछडे को अंदर लिया ।

बहिणाबाई का पति यह सब पसंद नहीं करता था, बछड़े को लेकर घूमना, कीर्तन, कथा ,सत्संग । आजकल का बहिणाबाई का व्यवहार ये सब उसे नहीं पसंद आ रहा था । वो केवल कर्मकाण्डी था और भक्ति विहीन था । बहुत से लोग बहिणाबाई का मज़ाक उडाया करते, जिसके कारण रत्नाकर पाठक ब्राह्मण को क्रोध आता ।उसे लगने लगा की उसके घर की इज्जत कम हो रही है। इसी बिच एक व्यक्ति ने रत्नाकर ब्राह्मण के कान भर दिए । रत्नाकर को क्रोध आया और उसने बहिणाबाई को बहुत मारा ,बाँध कर रखा,कष्ट दिया । गौ और बछड़े ने चारा -पानी लेना बंद कर दिया ।

यह बात जयराम स्वामी को पता लगी तो वे ब्राह्मण के घर आये और उसे समझाया – इन तीनो ने पूर्वजन्म में एकत्र अनुष्ठान किया था ,इस बछड़े का अनुष्ठान पूर्ण होनेपर वह देहत्याग करेगा । जितने शरीर है वे सब भगवान् के घर ही है चाहे वह देह मानव का हो अथवा पशु का। ब्राह्मण को बात समझ आ गयी । बहिणाबाई महान् पतिव्रता स्त्री थी,उसने किसी तरह का विरोध नहीं किया। वो चुप चाप जाकर बछड़े और गाय से लिपट गयी ।

हिरंभट जिनके घर में बहिणाबाई और उनके पति निवास करते थे ,उन्हें लगा की जयरमस्वामी ने अभी अभी कहा की बछड़े का अनुष्ठान पूर्ण होने पर वो शरीर त्याग देगा। एक बछड़ा कैसे अनुष्ठान पूर्ण करेगा ? हिरंभट एक दिन श्लोक बोल रहे थे – मूकं करोति वचालम् । पंगु लंघयते गिरिम् ।। आश्चर्य हुआ की बछड़े ने आगे का श्लोक अपने मुख से शुद्ध उच्चारण किया – यत्कृपा तमहं वंदे । परमानंद माधवम् । इस घटना से सबको महान आश्चर्य हुआ । बछड़े ने अपना सर बहिणाबाई की गोद में रखा और प्राण छोड़ दिया ।

अब सब लोगो को विश्वास हो गया की यह बछड़ा कोई पूर्वजन्म का महात्मा था। उसकी अंतिम यात्रा भजन गाते गाते निकाली गयी । जिस क्षण से बछड़े ने प्राण छोड़ा उसके तीसरे दिन तक बहिणाबाई बेसुध अवस्था में पड़ी रही ।चौथे दिन मध्यरात्री के समय एक तेजस्वी ब्राह्मण उसके स्वप्न में आया और कहने लगा – बेटी विवेक रखना सीखो, विवेक और सावधानता कभी छोड़ना नहीं । अचानक बहिणाबाई उठकर बैठ गयी और सोचने लगी – ये महात्मा कौन थे ?
जयराम स्वामी अपने कथा, कीर्तन में संत श्री तुकाराम जी के पद(अभंग वाणी) गाय करते ।

उनके पदों में वर्णित तत्वज्ञान ,वैराग्यवृत्ती ,समाधान, व्यापक दृष्टी ,न्याय नीती, शुद्ध चरित्र का आचरण बताने वाला भक्तिमार्ग बहिणाबाई को आकर्षित करने लगा । इस कारण से बहिणाबाई को संत तुकाराम जी के दर्शन की लालसा बढ़ने लगी , एक दिन संत तुकाराम जी से मिलान की तड़प बहुत अधिक बढ़ गयी । तुकाराम जी को बहिणाबाई का आध्यात्मिक सामर्थ्य अच्छी तरह ज्ञात हो गया । बछड़े की मृत्यु के सातवे दिन रविवार को कार्तिक वद्य पंचमी को (शके १५६९) जगतगुरु श्री तुकाराम महाराज ने स्वप्न में बहिणाबाई को दर्शन दिया , मस्तक पर हाथ रखा और कान में गुरुमंत्र का प्रसाद दिया – ‘राम कृष्ण हरि ‘ । जिस समय गुरुमंत्र दिया उस समय संत तुकाराम जीवित थे ।

बहिणाबाई अब संत हो गयी थी । दिनरात गुरुप्रदत्त मंत्र – ‘राम कृष्ण हरि ‘का जप करती रहती ।इस काल में सबको बहिणाबाई की भक्ति समझ आने लगी और बहुत भक्तो के झुण्ड बहिणाबाई के दर्शन को नित्य आने लगे ,परंतु पति रत्नाकर को यह बात पसंद नहीं आयी । वो कहने लगा – तुकाराम जी तो छोटी जाती के है ,उन्हीने ब्राह्मण स्त्री को गुरुदीक्षा कैसे दे दी ? ये सब पाखंड है ऐसा कहकर वह पत्नी का त्याग करके वन को जाने की तयारि करने लगा ।

रत्नाकर वेदांती कर्मठ ब्राह्मण और बहिणाबाई भोली भली भक्ति करने वाली स्त्री ,पति को उसका मार्ग पसंद नही था । वह तुकाराम जी,बहिणाबाई और पांडुरंग को अपशब्द कहने लगा,गालियां देने लगा ।

जिस समय की यह घटना है उस समय बहिणाबाई गर्भवती थी । बहिणाबाई महान् पतिव्रता स्त्री थी, गर्भवती अवस्था में भी पति ने उसे मारा परंतु वह शांत बानी रही । बहिणाबाई के माता -पिता ने रत्नाकर को बहुत समझाया परंतु उसका क्रोध शांत नहीं हो रहा था । वह घर से निकल कर वन में जाना चाहता था, परंतु बहिणाबाई बहुत दुखी हो गयी और प्रार्थना करने लगी की पति ही स्त्री का परमेश्वर है ,पति के बिना अब मै कैसे रहूंगी ? संतो और भगवान् को भक्तो की अवस्था ज्ञात हो जाती है। बहिणाबाई की प्रार्थना भगवान् और गुरुमहाराज के कानो में पड़ी और एकाएक रत्नाकर के शरीर में भयंकर दाह उत्पन्न हो गया । औषधि से भी दाह कम नहीं हुआ , बहिणाबाई पति की सेवा में लगी रही । रत्नाकर को पश्चाताप होने लगा । उसे लगा की कही हमने भगवान्, तुकाराम जी और भक्त की निंदा की है इसीलिए हमारी ऐसी अवस्था तो नही हुई ?

रात्री में रत्नाकर को स्वप्न हुआ और एक तेजस्वी ब्राह्मण ने उससे कहा – मुर्ख तुम संत शिरोमणि तुकाराम जी की निंदा मत करो, वे बहुत उच्च कोटि के अद्भुत संत है, संतो की जाती नहीं होती । तुकाराम जी सही अर्थ में जगतगुरु है और बहिणाबाई महान तपस्विनी है। तुम्हे यदि जीवित रहने की इच्छा है तो बहिणाबाई का त्याग मत करो और उसका अनादर मत करो । रत्नाकर ने चरणों पर मस्तक रखा और क्षमायाचना करने लगा । उसकी नींद खुल गयी और शरीर का दाह शांत हो गया । रत्नाकर ने भगवान् और संत तुकाराम को मन ही मन क्षमायाचना की और निश्चय कर लिया की वह बहिणाबाई का आदर करेगा । इस घटना के बाद रत्नाकर की संत तुकाराम के चरणों में बहुत श्रद्धा हो गयी और बछड़े की माता सहित सब परिवार तुकाराम जी के दर्शन हेतु देहु(तुकाराम जी का गाँव) गए ।

गुरु महाराज के दर्शन कर के बहुत आनंद हुआ ,इस समय बहिणाबाई की आयु मात्र २० वर्ष की थी । बहिणाबाई को देहु में आने के बाद कशी नाम की पुत्री हुई । बहिणाबाई की भक्ति दिन दिन बढ़ती गयी ।तुकाराम महाराज के गाँव देहु में मम्बाजी नाम का एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण अपने शिष्यो के साथ मठ में निवास करता था । बहिणाबाई और उसके पति ने मम्बाजी से मठ में रहने की जगह मांगी पर उसने मन कर दिया क्योंकि वह बहिणाबाई से द्वेष करता था क्योंकि उसका कहना था की बहिणाबाई ने तुकाराम जी जैसे छोटी जाती के व्यक्ति को गुरु माना था । उसने बहिणाबाई और रत्नाकर के साथ आई गौमाता को अपने घर ले जाकर रखा ,तीन दिन तक अन्न जल नहीं दिया क्योंकि वह जनता था की बहिणाबाई का गौमाता पर बहुत स्नेह है । गौ माता को बहुत ढूंढा पर नहीं मिली । एक दिन मम्बाजी ने गौमाता पर चाबुक से बहुत प्रहार किया ।

तुकाराम महाराज ने गौमाता के शरीर पर किये गए चाबुक के फटके अपने शरीर के ऊपर ले लिए । तुकाराम जी सिद्ध कोटि के संत हो चुके थे और उनके चरणों के समस्त सिद्धियां उपस्तिथ रहती थी परंतु कभी भी उन्होंने सिद्धियों का प्रयोग नहीं किया, वे इन सब से दूर ही रहे । केवल हरिनाम ,हरिकथा और संत गौ सेवा में ही उन्हें सुख आता । गौ माता पर संकट अर्थात धर्म पर संकट जानकार उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की – हे प्रभु ! गौ माता का सब कष्ट हमारे शरीर पर आ जाये । गौ माता पर लगी मार अपने शरीर पर ले ली। शिष्या बहिणाबाई तो महान् गौभक्त थी ही, तो गुरुमहाराज का क्या कहना ?

देहु गाँव में सब भक्तो ने देखा की संत तुकाराम की पीठ पर मार के निशान है , सब अस्वस्थ हो गए । जैसे ही संत तुकाराम के शरीर पर मार लगा उसी समय मम्बाजी के घर को आग लग गयी । सब लोगो ने देखा की गाय तो वही है, गौमाता को वह से बहार निकाला, बहिणाबाई और रत्नाकर के पास लाकर दिया। बहिणाबाई को बहुत कष्ट हुआ और जब उसे पता चला की गुरुमहाराज ने गौमाता के शरीर पर लगी मार अपने ऊपर ले ली तब उसे समझ आया की संत तुकाराम किस आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँचे है। उसको समझा की हमारी विपत्ति तो गुरुमहाराज ने दूर की थी, पर हमारे परिवार की सदस्य ये गौमाता की समस्या भी इन्होंने अपनी मान कर दूर कर दी। इस गाय से गुरुमहारज का सीधा संबंध न होने पर भी तुकाराम जी ने उसका दुःख दूर किया । संतो का ह्रदय कैसा होता है उसने आज प्रत्यक्ष देख लिया।

जगतगुरु श्री तुकाराम महाराज शके १५७१ फाल्गुन वद्य द्वितीया को शनिवार के दिन सदेह भगवान् श्रीकृष्ण के साथ वैकुण्ठ को पधारे ,उस समय बहिणाबाई देहु से बहार थी । अंत दर्शन नहीं हुआ इसी कारण वे व्याकुल थी और उन्हीने १८ दिन अन्न जल छोड़ दिया, अंत में तुकाराम महाराज ने उन्हें दर्शन दिया । संत बहिणाबाई की दो संताने थी -पुत्र विट्ठल और पुत्री कशी ।

अंतिम समय में सब परिवार शिरूर नमक स्थान में निवास करने चला गया । एक दिन बहिणाबाई का लगातार ध्यान चलता रहा ,तीसरे दिन उन्हें संत तुकाराम का दर्शन हुआ और उनके द्वारा अभंग (पद ) रचना की आज्ञा मिली । नदी में बहिणाबाई ने स्नान किया और जैसे ही बहार निकली उनके मुख से पद निकलने लगे । ७३ वर्ष की आयु तक बहिणाबाई जीवित रही । बहिणाबाई संत सेवा और भक्ति के प्रताप से इतनी सिद्ध हो चुकी थी की अंत समय में उन्होंने अपने पुत्र विट्ठल को बुलवा लिया और अपने पूर्व १३जन्मों की जानकारी देते हुए कहा – बेटा तुम पिछले बारह जन्मों से मेरे ही पुत्र थे और इस १३ वे जन्म में भी हो ,परंतु अब मेरा यह अंतिम जन्म है परंतु बेटा तुम्हारी मुक्ति के लिए और ५ जन्म लगेंगे ।अंत समय पुत्र से संसार की बाते नहीं की , पुत्र को भजन, संत सेवा, गौसेवा करते रहने का उपदेश दिया । प्रतिपदा शके १६२२ को उन्होने ७३ वर्ष की अवस्था में देहत्याग किया । इनकी समाधी शिऊर में ही है ।

ऐसी महान् पतिव्रता , संसार में रहकर परमार्थ साध्य करने वाली ,बच्चों को भजन में लगाने वाली, छल करने वाले पति का ह्रदय परिवर्तन करके उनको भी संतो के चरणों में लगाने वाली ,गुरुदेव को साक्षात् श्री विट्ठल रूप मान कर सेवा करने वाली महान गुरु भक्ता और गौ भक्ता यह संत बहिणाबाई भक्ति की दिव्या ज्योति हुई है।

समस्त हरी हर भक्तो की जय।।

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संत दादू दयाल जी

संतो का हृदय कैसा होता है –संत दादू दयाल जी भिक्षा मांगने जिस रास्ते से निकलते वहां बीच मे एक ऐसा घर पड़ता था जहां रहने वाला व्यक्ति दयाल जी की भरपूर निंदा करता था । उनको देखते ही कहता था – बडा संत बना फिरता है, बड़ा ज्ञानी बना फिरता है । कई प्रकार के दोष गिनाता और अंदर चला जाता । कई बार जब वह निंदक नजर नही आता तब भी दयाल जी उसके मकान के सामने कुछ देर प्रतीक्षा करते और आगे बढ़ जाते । कुछ दिन वह निंदक नही दिखाई पड़ा तो दयाल जी ने आसपास पूछा । पूछने पर पता लगा की उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी है । इस बात से दयाल जी अत्यंत दुखी होकर जोर जोर से रोने लगे ।

सुना कि निंदक मर गया , तो दादू दीना रोए ।।

शिष्य ने पूछा – गुरुदेव ! आप क्यों रोते हो? दयाल जी ने कारण बताने पर शिष्य बोला – वह तो आपका निंदक था , वह मर गया तो आप को प्रसन्न होना चाहिए परंतु आप तो रो रहे है – ऐसा क्यों ? दयाल जी बोले – वह मेरी निंदा करके मुझे सदा स्मरण करवाता रहता की मै कोई संत महात्मा नही हूँ, मै कोई ज्ञानी नही हूं, वह मुझे स्मरण करता रहता था की यह संसार कांटो से भरा है । वह मुझे ज्ञान और त्याग का अहंकार नही होने देता था । यह सब उसने मेरे लिए किया वह भी मुफ्त मे । वह बडा नेक इंसान था, अब उसके जाने पर मेरे मन का मैल कौन धोएगा ?इतना ही नही , इसके कुछ दिन बाद वह व्यक्ति दिव्य शरीर धारण करके दयाल जी के सामने प्रकट हुआ । उससे दयाल जी ने पूछा की तुम्हारी तो कुछ समय पहले मृत्यु हो चुकी थी ? उस व्यक्ति ने कहां – आप जैसे परम संत की निंदा करने के पाप से मैं प्रेत योनि मे चला गया था और कुछ दिनों से कष्ट पा रहा था परंतु कुछ दिनों के बाद मेरी मृत्यु की घटना सुनते ही आपने मेरा स्मरण किया और प्रभु से मेरे उद्धार की प्रार्थना भी की । मुझ जैसे निंदक पर भी आप जैसे महात्मा कृपा करते है । आप जैसे परम नामजापक संत के संकल्प से मै प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य लोक को जा रहा हूँ ।

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श्रीभक्तमाल का परिचय

भक्तमाल का परिचय :

महाभागवत श्री नाभादास जी महाराज उच्च कोटि के संत हुए है जिन्होंने इस संसार में श्री भक्तमाल ग्रन्थ प्रकट किया । भगवान् के भक्तो के चरित्र इस ग्रन्थ में नाभाजी द्वारा स्मरण किये गए है । इस ग्रन्थ की यह विशेषता है की इसमें सभी संप्रदयाचार्यो एवं सभी सभी सम्प्रदायो के संतो का सामान भाव से श्रद्धापूर्वक संस्मरण श्री नाभा जी ने किया है ।
संत तो प्रियतम के भी प्रिय है , भगवान् अपने से अधिक भक्तो को आदर देते है ।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है – मोते संत अधिक कर लेखा । भगवान् से भी अधिक महिमा उनके भक्तो की है । गोस्वामी जी ने एक और पद में लिखा है –मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम ते अधिक राम कर दासा ।।

भक्तमाल नाम का रहस्य :
जैसा की इसके भक्तमाल नाम से स्पष्ट है की यह ग्रन्थ भक्तो के परम पवित्र चरित्र रुपी पुष्पों की एक परम रमणीय माला के रूप में गुम्फित है और इस सरस सौरभमयी तथा कभी भी म्लान न होनेवाली सुमन मालिका को श्री हरि नित्य -निरंतर अपने श्री कंठ में धारण किये रहते है ।

जैसे माला में चार वस्तुएं मुख्य होती है – मणियाँ ,सूत्र ,सुमेरु और फुंदना (गुच्छा ) वैसे ही भक्तमाल में भक्तजन मणि है ,भक्ति है सूत्र (जिसमे मणियाँ पिरोयी जाती है ),माला के ऊपर जो सुमेरु होता है वह श्री गुरुदेव है और सुमेरु का जो गाँठ रुपी गुच्छा है वह है हमारे श्री भगवान् ।

भक्तमाल कोई सामान्य रचना नहीं है,अपितु यह एक आशीर्वादात्मक ग्रन्थ है । यह श्री नाभादास जी की समाधि वाणी है । तपस्वी, सिद्ध एवं महान् संत की अहैतुकी कृपा और आशीर्वाद से इस ग्रन्थ का प्राकट्य हुआ है । महाभागवत नाभादास जी जन्म से नेत्रहीन थे , जब श्री गुरुदेव की कृपा से बालक को दृष्टी प्राप्त हुई तब सर्वप्रथम संसार का नहीं अपितु संत दर्शन ही किये । (आगे चरित्र में पढ़े )

श्री नाभादास जी का वास्तविक स्वरुप :
एक बार ब्रह्मा जी ने  व्रज के सब ग्वालबालों तथा गौओ और बछड़ो का हरण कर लिया था । इसपर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया के प्रभाव से वैसे ही अन्य ग्वाल – बालों ,गौओं तथा बछड़ो की सृष्टि कर दी ,व्रज के लोगो को इस बात का पता ही नहीं लगा । बाद में ब्रह्मा जी ने भगवान् श्रीकृष्ण से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी तो भगवान् ने उन्हें इतना ही दंड दिया की तुम कलियुग में नेत्रहीन होकर जन्म ग्रहण करोगे ,किन्तु तुम्हारा यह अंधापन केवल पांच वर्ष तक ही रहेगा बाद में महात्माओ की कृपा से तुम्हे दिव्य दृष्टि प्राप्त होगी । इस किंवदन्ती के अनुसार ब्रह्मा जी ही श्री नाभादास जी के रूप में प्रकट हुए ।

जो अन्य युगों में भक्त प्रकट हुए उनके चरित्र पुराणों में उपलब्ध होते है परंतु विशेषतः कलिकाल के जो भक्त है उनके चरित्र पुराणों में उपलब्ध नहीं है अतः इन चरित्रों का विस्तार करने हेतु, शैव वैष्णव भेद समाप्त करने हेतु ,संत सेवा ,भगवान् के उत्सवो एवं व्रतो में निष्ठा हेतु ,भक्त सेवा में अपराध से बचने हेतु  और संत वेश निष्ठा प्रकट करने हेतु श्री नाभादास जी ने इस ग्रन्थ को प्रकट किया ।

संतो की दृष्टी में भक्तमाल का माहात्म्य :
वृन्दावन के महान सिद्ध संत पूज्य श्री जगन्नाथ प्रसाद भक्तमाली जी महाराज से  पूज्य बक्सर वाले मामाजी (श्रीमन्नारायण दास  नेहनिधि  सियाअनुज )भक्तमाल ग्रंथ का अध्ययन करने लगे। जब ग्रन्थ कि पूर्णनता होने लगी तब आपने श्री भक्तमाली जी के सम्मुख श्रीमद भागवत श्लोकार्थ समेत पढ़ने की इच्छा प्रकट कि तो वे बड़े प्रेम से बोले – नारायणदास!क्या तुम्हारी इच्छा दास से पंडित बनने की है ?

यह सुन कर श्री मामाजी गुरुदेव के चरण पकड़ विव्हल हो गये  और बोले – नहीं गुरु देव  मुझ दास को संतो का दास ही बने रहने की इच्छा है पंडित बनाने कि इच्छा नहीं है । तब भक्तमाली जी ने कहा – फिर तुम केवल भक्तमाल जी का आश्रय लो इनका पठन पाठन , इनका ही धयान करो और इन्ही को प्रसाद रूप में भक्तो में वितरण करो भक्तमाल जी कि कृपा से एक दिन तुम्हारे हृदय में श्रीमद भगवत स्वयं प्रकट हो जायेगा । उनके दिव्य प्रकाश से तुम्हारा अंतःकरण प्रकाशित हो जाएगा और भक्तमाल जी कि कृपा से तुम महान् प्रेमी और वक्ता बनोगे । महान संत के आशीर्वाद द्वारा मामाजी भक्तमाली नाम से विभूषित हुए।

पुराणों में ,महाभारत में भी भक्त चरित्रों का ही वर्णन है । यह सब भी एक प्रकार से भक्त चरित्र ही है । पुराने समय में लोग विद्वान हुआ करते थे, वे पुराणों और शास्त्रो को पढ़ कर भक्तो के आचरण से शिक्षा लेते थे ,भक्ति के स्वरुप को समझते थे । कलियुग के जीव इतने जड़ बुद्धि के हुए की वे प्रायः कहने लगे- भगवान् की लीलाएं और उनका दर्शन अन्य युगों में होता था परंतु आज के समय में ऐसा कुछ नहीं होता । नाभा जी ने ऐसे बहुत से चरित्र भक्तमाल वे वर्णन किये है है जो कल- परसो के ही है । इन चरित्रों का पठन एवं श्रवण करने से हम कलिकाल के जड़ बुद्धि जीवो को बहुत लाभ मिलेगा और संतो में श्रद्धा बनेगी ।

पूज्य स्वामी जयरामदेव आदि अनेक सिद्ध संतो का मत है की भगवान् अपने नित्य धाम में श्री भक्तमाल का सदा स्वाध्याय करते है ,यही नहीं जो भगवान् के नित्य पार्षद और महाभागवत भक्त है वे भी नित्य भक्तमाल की कथा सुनते है । श्री अम्बरीष जी, श्री ध्रुव जी सभी नित्य भक्तमाल कथा सुनते है । श्री भक्तमाल के प्रमुख श्रोता श्री भगवान् है ।

पूज्य श्रीमन्नारायण दास (मामाजी ), श्री गणेशदास जी आदि भक्तमाली संतो ने सम्पूर्ण जीवन संतो को और भगवान् को भक्तमाल सुनाया । अवध के महान संत पूज्य श्री ब्रह्मचारी जी महाराज नित्य भगवान् को भक्तमाल कथा सुनते । धर्मसम्राट श्री स्वामी करपात्री जी महाराज को तो भक्तमाल की कथा का व्यसन ही था । जब कभी वे वृन्दावन पधारते, वे ताड़वाली कुंज (श्री जगन्नाथ प्रसाद भक्तमाली जी की साधना स्थली ) मे जाकर भक्तमाली जी से कथा श्रवण करते । अन्य संतो से भी स्वामी करपात्री भक्तमाल कथा ही सुनना पसंद करते ।

एक समय की बात है पूज्य मामाजी को दवाखाने में भर्ती करवाया गया था और डॉक्टर ने बोलने से मना कर रखा था ।मामाजी को नित्य भगवान् और किसी न किसी संत को भक्तमाल सुनाने का अभ्यास था । रात बीतने पर सुबह जब डॉक्टर कक्ष में आया तब उसने आश्चर्य से पूछा – मामाजी पंख चल रहा है,अधिक गर्मी भी नहीं है फिर आप पसीने से लतपत कैसे ? मामाजी ने पहले कुछ बताया नहीं । डॉक्टर ने कहा – मामाजी डॉक्टर से कुछ नहीं छिपाना चाहिए तब मामाजी ने बताया की कल स्वप्न में धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी पधारे और उनको हमने रात भर कथा सुनायी है ,इसी कारण से पसीना आ रहा है । ऐसे महान भक्तमाली सिद्ध संत श्री मामाजी महाराज ।

श्री नाभादास जी की गुरु परंपरा :
यतिराज श्रीमद् आद्य रामानंदाचार्य स्वामी के पवित्र परंपरा में श्री नाभादास जी का प्राकट्य हुआ । श्री रामानंद स्वामी के शिष्य हुए श्री अनंतानन्दचार्य जी , उनके शिष्य हुए श्री कृष्णदास पयोहारी जी ,उनके शिष्य हुए श्री अग्रदेवाचार्य जी, और उनके शिष्य हुए श्री नाभादास जी महाराज ।

कुछ संतो ने श्री नाभादास जी के जन्म के बारे में इस प्रकार जानकारी दी है : इनका जन्म ८ अप्रैल १५३७ को भद्राचलम नामक ग्राम में गोदावरी नदी के तट पर हुआ था । यह ग्राम आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में स्थित है परंतु अधिकतम संतो ने इनके पूर्वजो को हनुमानवंशीय महाराष्ट्रीय ब्राह्मण माना है । इनके पिता का नाम श्री रामदास जी और माता का नाम श्रीमती जानकी देवी था । 

कुछ संतो के मत यह भी है :परंपरा के अनुसार नाभादास डोम अथवा महाराष्ट्रीय ब्राह्मण जाति के थे। टीकाकार प्रियादास ने इन्हें हनुमानवंशीय महाराष्ट्रीय ब्राह्मण माना है। टीकाकार रूपकला जी ने इन्हें डोम जाति का मानते हुए लिखा है कि डोम नीच जाति नहीं थी, वरन्‌ कलावंत, ढाढी, भाट, डोम आदि गानविद्याप्रवीण जातियों के ही नाम हैं। मिश्रबंधुओं ने भी इन्हें हनुमानवंशी मानते हुए लिखा है कि मारवाड़ी में हनुमान शब्द ‘डोम’ के लिए प्रयुक्त होता है। 

श्री नाभाजी का जन्म प्रशंसनीय हनुमान-वंशमे हुआ।*हनुमान वंश क्या है ? 

महाराष्ट्र में एक ऋग्वेदि ब्राह्मण परिवार था,हनुमान जी के वे अनन्य भक्त थे ।  उनके कोई संतान नहीं थी। किसी लौकिक प्रसंग में किसी ने पुत्रहीन कहकर उन्हें पीड़ित कर दिया और इस बात से दुखी होकर उन्होंने एक संत से पुत्र प्राप्ति की इच्छा की प्रार्थना करने लगे । संत ने उन्हें श्री हनुमान जी की उपासना करने के लिए कहा । श्री हनुमान जी की नित्य उपासना वे करने लगे और उनके चरणों में पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने लगे ।

एक दिन प्रसन्न होकर श्री हनुमान जी ने दर्शन दे कर कहा की तुम्हारे भाग्य में पुत्र सुख नहीं है पर आप हमारे बहुत प्रेमी भक्त हो अतः हनुमान जी ने आशीर्वाद दिया की मेरी कृपा से तुम्हारा वंश चलेगा । श्री हनुमान जी ने यह भी कहा था की आपके वंश में एक अद्भुत महात्मा प्रकट होंगे जिनके द्वारा जगत का कल्याण होगा । उस समय से इस वंश को हनुमान वंश कहा जाने लगा ।

श्री नाभादास जी जन्म से ही नेत्रहीन थे, नेत्र के चिन्ह तक नहीं थे । इस बात से इनके पिताजी बड़े दुखी हुए । पिताजी ने ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों से इनके भविष्य के बारे में पूछा तो ज्योतिषियों ने बताया की यह बहुत अद्भुत बालक है , यह जगत में लाखो  लोगो का भक्ति मार्ग प्रशस्त करेगा ।जब ये २ वर्ष के थे तब इनके पिताजी का देहांत हो गया । उस के बाद माता ने इनका पालन पोषण किया । जब श्री नाभाजी ५ वर्ष के हुए उस समय  महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पड गया था , कोई फल खाकर , कोई घास खाकर गुजर करने लगा ।

अकाल से पीड़ित हो कर बालक को लेकर उनकी माता जल और अन्न की खोज में भटकने लगी । कही दूर दूर तक कुछ नही मिल रहा था । भटकते हुए वे राजस्थान की ओर आये और वहाँ एक वन में वृक्ष के निचे बालक को बिठा दिया ।थकान के कारण बालक को साथ ले कर घूमना कठिन हो गया था अतः माता ने कहा की बेटा तुम यही बैठो ,मै अन्न जल की खोज करने जाती हूँ ।अन्न जल की खोज में माता बहुत दूर तक निकल गयी और कमजोरी के कारण पृथ्वी पर गिरने लगी ।

उस समय उनको यह विश्वास हो गया की अब प्राण रहेंगे नहीं । इन्होंने भगवान् से विनती की – मेरे बालक को मै निर्जन वन में छोड़ कर आयी हूँ, नेत्रहीन ,पितृहीन बालक के अब आप ही रक्षक है । अपने अपने घर की तो सबको ममता होती है पर आपको तो सबके घरोकी ममता है । मै तो केवल जन्म देने वाली माता हूं , परंतु वास्तव में सबके माता -पिता आप ही है । इनकी माता का शरीर छूट गया और नाभाजी वन में रह गए।  बहुत देर तक माता नहीं आयी जानकार नाभा जी माता को पुकारने लगे और कभी किसी वृक्ष से टकराते , कभी किसी वृक्ष से । श्री नाभा जी ने निश्चय किया की अब किसी नर से सहायता मांग कर कुछ नहीं होगा अब तो केवल नारायण ही सहायता कर सकते है ।

नाभाजी भगवान् नारायण को पुकारने लगे और इसी पुकार से भगवान् ने उनपर महान् कृपा की थी । श्री नभा जी की करुण पुकार को भगवान् ने सुन लिया । दैवयोग से श्री किल्हदेव जी और श्री अग्रदेव जी -यह दो महापुरुष हरिद्वार कुम्भ स्नान करके अपने आश्रम गलता जी (जयपुर) जा रहे थे। यह गलता आश्रम श्री गालव ऋषि का आश्रम माना जाता है । चलते चलते संतो को दो मार्ग पड़े ,एक वन (जंगल )वाला रास्ता और दूसरा राजमार्ग वाला रास्ता । उन्होंने सोचा की जंगल से जाना ठीक नहीं होगा अतः राजमार्ग से जाना ही उचित है । जैसे ही वे राजमार्ग की ओर चलने लगे उसी समय आवाज आयी – हे संतो ! ठहरए । आस पास कोई नहीं दिखाई पड़ा , इस बात से निश्चित ही गया की यह आकाशवाणी है ।

दोनों संत हाथ जोड़े खड़े हो गए । आगे आकाशवाणी हुई की आप इस रास्ते को छोड़कर वनमार्ग से जाएं , वहाँ आपको एक अनोखा रत्न प्राप्त होगा जिसके द्वारा जगत का बहुत बड़ा कल्याण होगा ।आकाशवाणी मौन होने पर दोनों संत सोचने लगे की हम फक्कड़ महात्माओ को रत्न से क्या लेना देना ? ये कैसी आकाशवाणी हो गयी ? तब श्री किल्हदेवजी कहने लगे की हो सकता है की वह रत्न पत्थर का न हो ।वह रत्न किसी और रूप में भी हो सकता है । दोनों संत जंगल वाले मार्ग की ओर चल दिए ।

रास्ते में उन्हें यह नेत्रहीन बालक दिखाई पड़ा।  वह वन में भटक रहा है, पेड़ो से बारबार टकराता है । कह रहा है – हे दीनबंधु प्रभु नारायण चरणों में मुझे चकाना दो,जिसमे यह जीवन सार्थक हो ऐसा कोई सहज बहना हो ।  संतो ने सोचा की कही इसी बालक के लिए ही तो आकाशवाणी नहीं हुई ।संत उसके पास गए और श्री किल्हदेवजी जी ने नाभाजी से कहा – वत्स । जैसे ही यह शब्द नाभाजी ने सुना ,वे जान गए की यह कोई महात्मा है । आवाज की दिशा का अनुसंधान करके नाभाजी ने संत को प्रणाम् किया । नाभा जी  से सन्तों ने कुछ प्रश्न किये – तुम्हारा पीता कौन है? बालक ने कहा -जो सबके पीता है वही हमारे पिता है?

आगे पूछा गया -क्या तुम अनाथ हो? बालक ने कहा – नहीं, जिसके नाथ जगन्नाथ वह अनाथ कैसे हो सकता है ? फिर संतो ने पूछा-  कहा से आये हो? बालक ने कहा- अपने स्वरुप को भुला हुआ जीव यह नहीं जान पता की वह कहाँ से आया है, पर जहाँसे सब आये है मैं भी उसी भगवान् के नित्य धाम से आया हु । संतोने पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?बालक ने कहा- पञ्च महाभूत और सात धातुओ से बना शरीर है, कैसे कहु मैं कौन हु । तुम्हे कहा जाना है – जाना तो मुझे भगवन के चरणकमलों में है परंतु संसार के जाल में फस गया हु , आप जैसे महापुरुष जब तक मार्ग नहीं बताते तब तक संसार को पार करना कैसे संभव है । 

फिर संतो ने पूछा – इस निर्जन वन में तुम्हारा रक्षक कौन है ? – जो माता के गर्भ में रक्षा करता है वही मेरी रक्षा कर रहा है । दोनों संत समझ गए के यह साधारण बालक नहीं है, अवश्य इसी बालक रत्न के लिए आकाशवाणी हुई थी , बड़े बड़े साधक भी ऐसे उत्तर नहीं दे पाते । शरीर के माता पिता के बारे में संतो ने पूछा तब नाभा जी ने सारी घटना सुनायी । संत जान गए की माता पिता शरीर छोड़ चुके है । सन्तों ने बालक से पूछा – क्या तुम हमारे साथ चलोगे ? हम गलता गादी ,जयपुर में विराजते है । बालक ने हाँ कहा ।

श्री अग्रदास जी ने अपने बड़े गुरुभाई श्री किल्हदेवजी जी से कहा – यह तो निश्चित है की इस बालक की भीतर वाली आँखे तो खुली हुई है परंतु यदि इसकी बहार वाली आखें खुल जाए तो यह और अधिक सेवा के योग्य हो जायेगा ।सर्व समर्थ सिद्ध महात्मा श्री किल्हदेवजी ने अपने कमण्डलु से जल लेकर नाभजी के नेत्रो पर छिड़क दिया। संतो की कृपा से नाभाजी के दोनों नेत्र खुल गये और सामने दोनों संतो की जोड़ी को नाभा जी ने निहारा । संतो के दर्शन पाकर श्री नाभा जी को परम आनंद हुआ । दोनों सिद्ध महापुरुषो के दर्शन पाकर नाभा जी उनके चरणोंमे पड गये। उनके नेत्रो में आँसू आ गये। दोनों संत कृपा करके बालक नाभजी को अपने साथ गलता जी (जयपुर )लाये।

संत महात्मा अवैष्णव के हाथ की सेवा ग्रहण करते नहीं अतः बालक को दीक्षा देने का निर्णय किया गया । श्री अग्रदेव जी ने से किल्हदेवजी से प्रार्थना की के आप बड़े है ,आप इस बालक पर कृपा करे । श्री किल्हदेव जी ने कहा – नहीं आप ही इसे दीक्षा दीजिये ,यह आपका ही है । श्री किल्हदेवजी की आज्ञा पाकर श्री अग्रदेव जी ने नाभा जी से कहा – बड़े गुरुभाई दीक्षा के लिए कह रहे है ,क्या तुम दीक्षा ग्रहण करोगे ?नाभा जी बोले – मुझे तो पता ही नहीं की मेरा हित किसमें है, मेरे जीवन की डोर तो अब आपके हाथ में है । शुभ मुहूर्त देखकर श्री अग्रदेव जी ने इन्हें श्रीराम मंत्रका उपदेश दिया और विधिवत पंचसंस्कार किये ।

पांचवा संस्कार – नामकरण का समय आनेपर गुरुदेव सोचने लगे की इसका क्या नाम रखा जाए ?( नाभा नाम तो इनका बहुत बाद में पड़ा , माता पिता द्वारा रखा नाम तो इन्हें याद ही नहीं था )।गुरुद्वव ने कहा – जब तुम हमें मिले थे तब तुम नारायण नाम पुकार रहे थे और जब तुमने हमारे दर्शन किये तब भी तुमने कहा – हे प्रभु नारायण आपकी जय हो ,आपने हमें चरणों में स्थान दिया है । तुम्हारा नाम आज से   ‘नारायण दास’  होगा । गुरूजी के नाभि अथवा पेट की बात जान लेने के कारण आगे इनका नाम नाभा /नाभादास जी पड गया(आगे के प्रसंग में पढ़े) ।

गलता आश्रम ,जयपुर में साधुसेवा प्रकट प्रसिद्ध थी। श्री अग्रदेवजी ने अपनी गुरुपरम्परा के अनुसार उपासना की विधि बताई और दो नियम इनके लिए निश्चित कर दिए – प्रथम संतो की सेवा (संतो की सीथप्रसादि, चरणोदक ग्रहण ) और दूसरी ठाकुरसेवा । गुरुदेव संतसेवा के महत्व को जानते थे और उनके गुरुदेव श्री कृष्णदास पयहारी जी द्वारा ही गलता जी में नित्य संत सेवा की परंपरा चलायी गयी थी । नाभाजी को भी उन्होंने संतसेवा में लगा दिया । संतों के चरणोदक तथा उनके सीथ-प्रसाद का सेवन करने से श्री नाभजी का संतोमे अपार प्रेम हो गया । आने जाने वाले सब संत श्री नारायणदास जी की संत सेवा की खूब प्रशंसा करते थे । श्री अग्रदेव जी और श्री किल्हदेवजी को यह सुनकर बहुत हर्ष होता था ।

गुरुदेव श्री अग्रदेव स्वामी द्वारा नाभा जी को भक्तमाल ग्रन्थ रचना की आज्ञा :

श्री जानकी जी की प्रधान सखी चन्द्रकला जी ही आचार्य स्वामी श्रीअग्रदेवजी महाराज के रूप में प्रकट हुई है । एक बार प्रातः काल श्री अग्रदेव जी महाराज भगवान् श्री सीताराम जी की मानसी सेवा में संलग्न थे और उनके शिष्य श्री नाभाजी महाराज अतिकोमल अवं मधुर संरक्षण के साथ धीरे-धीर प्रेमसेे पंखा कर रहे थे । मानसी सवा में श्री अग्रदेव जी ने श्री सीताराम जी को सुंदर स्नान करवाया, प्रक्षालन किया ,श्रृंगार किया,  वस्त्र अर्पण किये और अंतिम सेवा थी पुष्पमाला धारण करवाने की । श्री रामजी सर झुकाये खड़े है पुष्पमाला पहन ने के लिए ।

उसी सम श्री अग्रदास जी का एक व्यापारी सेठ शिष्य जहाज पर चढ़ा हुआ समुद्री यात्रा कर रहा था। जहाज से व्यापार करने दूर निकल था । उसका जहाज भँवर में फस गया , जहाज में बड़े के भीतर जल भरने लग गया । चालाक निरुपाय हो गये , उन्होंने कहा – समुद्र में अताह जल है, बेड़े में छिद्र है । बचना बहुत मुश्किल है सेठ जी , अब तो कोई चमत्कार हो जाए तो ही बचना संभव है । आपका जिसपर विश्वास हो उसीको याद कर लो ।  तब उस शिष्य ने सोचा की हमारे गुरुदेव श्री अग्रदेवजी बड़े सिद्ध महात्मा है , बहुत से लोग भी उनको सिद्ध कोटि के संत बताते है । वह श्री अग्रदेव जी का स्मरण करने लगा । उससे श्रीअग्रदेव जी का ध्यान अतिसुंदर स्वरुप भगवान् श्री सीतारामजी की सेवा से हट गया।

अग्रदेव जी सोचने लगे की अब क्या किया जाए , इधर सरकार सर झुकाये खड़े है और उधर शिष्य के प्राण संकट में है । सेवा छोड़ कर शिष्य को बचते है तो सेवा अपराध हो जायेगा  और सेवा करने में लग गए तो शिष्य डूब जायेगा । इसी विचार में अग्रदेव जी कोई सही निर्णय नहीं ले पा रहे थे । गुरुदेव की मानसी सेवा में विघ्न जानकार श्री नाभाजी ने वही पर खड़े खड़े पंखे को जोर से चलाया  । पंखा चला इधर और हवा का झोंक पंहुचा समुद्र में । नाविक को भी संत कृपा से बुद्धि सुझी और छिद्र का पता चल गया ,उसने अपनी एड़ी वह लगा ली और एक क्षण में ऐसा हवा का झोंक आया की जहाज किनारे पर लग गया । 

नाविक ने कहा – सेठ जी ! आखें खोलो । आपकी पुकार स्वीकार हो गयी , हम लोग दिनरात समुद्र में यात्रा करते है अतः हमें हवाओ की दिशा का ज्ञान है परंतु पता नहीं आज अचानक विपरीत दिशा से हवा का झोंक आया और जहाज किनारे आ गयी । व्यापारी ने कहा – तुम्हे हवा का झोंका दिखाई दिया ,मुझे तो गुरु कृपा का झोंका दिखाई दिया । अब अग्रदेव जी ने सोचा की आश्रित की लाज बचनी चाहिए , भगवान को माला पीछे पहनाएंगे पहले शिष्य के प्राण बचाने चाहिए । मन से गुप्त रूप में समुद्र पर पहुचे । वहाँ उन्हें ना कोई जहाज दिखाई पड़ा ना कोई शिष्य ना तूफ़ान । अब वे सोचने लगे की इतने विशाल समुद्र पर मेरे प्रभु ने सेतु कैसे बनाया होगा ? एक क्षण के लिए भी यह नहीं ठहर रहा । वे सेतुबंधन लीला के चिंतन में डूब गए ।

बहुत देर तक गुरुदेव नहीं लौटे , वही समुद्र पर सेतुबंधन लीला का स्मरण करने में मग्न हो गए । श्री नाभाजी ने सोचा अब थोडा ढिठाई करनी पड़ेगी अथवा प्रभु सर झुकाये ऐसे ही खड़े रह जायेंगे । श्रीगुरुदेव से नाभा जी ने नम्र निवेदन किया – प्रभो ! जहाज तो बहुत दूर निकल गया,अब आप कृपा कर के समुद्र को मत निहारिये , आप तो प्रिय प्रियतम के रूप समुद्र का दर्शन कीजिये , उसी शोभापूर्ण भगवान् की सेवा में पुनः लग जाइये। यह सुनकर श्री अग्रदेव जी ने आँखे खोली और देखने लगे की हमारे मन की बात किसने जान ली ? 

उनहे लगा की शायद यहां कोई सिद्ध महात्मा आ गए है जिन्होंने मेरे ह्रदय की बात जान ली हो । उन्हें यह लगा ही नहीं की नाभा जी यह बात बोल सकते है । जब आस पास कोई नहीं दिखाई दिया तब नाभादास जी से  पूछा की अभी कौन बोला ? किसकी आवाज हमने सुनी ? श्री नाभाजी ने हाथ जोड़कर कहा- जिस अनाथ को आपने कृपा करके जंगल से यहां लाया ,जिसको आपने बचपन से सीथ-प्रसाद (संतो के पत्तल में बचा शेष भोजन प्रसाद) देकर पाला है,आपके उसी दास ने अभी यह प्रार्थना की है।

श्री नभाजी का उपर्युक्त कथन सुनकर श्री अग्रदेव जी को महान् तथा नवीन आश्चर्य हुआ। मनमें विचार करने लगे कि इसका यहाँ मेरी मानसी सेवा में प्रवेश कैसे हो गया और यही खड़े खड़े इसने जहाज की रक्षा कैसे की? विचार करते ही उनके मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। वे जान गए कि यह सब संतो की सेवा तथा उनकेे सीथ- प्रसाद ग्रहण करने का ही प्रभाव है,जिससे ऐसी दिव्या दृष्टि प्राप्त हो गयी है। 

अब जो मानसी सेवा अधूरी रह गयी थी ,उसमे पुनः लग गए । विलंभ के लिए सखी चन्द्रकला जी(अग्रदेव जी ) ने क्षमा मांगी । प्रभु श्रीराम मुस्कुराते दिखाई पडे , चन्द्रकला जी ने पूछा की प्रभु आप क्यों मुस्कुरा रहे है ?प्रभु ने कहा – चन्द्रकला ! यह बालक जो आपकी सेवा में है यह कोई साधारण बालक नहीं है ,साक्षात् ब्रह्मा जी ही है ।यह सब लीला हमारी इच्छा से हुई है , इस बालक के द्वारा जगत का बहुत बड़ा कल्याण होना है इसका बहुत अच्छे से संभल करना । प्रभु को माला पहनाकर मानसी सेवा से बहार आये और नारायणदास से कहा की तुमने हमारे पेट की बात (नाभि की बात ) जान ली इसीलिए तुम्हे जगत में नाभा नाम से जाना जायेगा । इस घटना के बाद से उनका नाम नाभा पड गया ।

**(नाभा नाम के संबन्ध में संतोंके मुख से एक और कथा सुनी गई है। वह यह कि अग्रदास जी भगवान् श्रीसीतारामजी की मानसी सेवा कर रहे थे। मानसी सेवामें प्रभुको मुकुट धारण करवा दिया था और माला धारण करानी थी। मानसी भावना में माला छोटी थी जो मुकुट के ऊपर से धारण कराने में कुछ जटिल-सी लग रही थी।

अग्रदास जी प्रयास कर रहे थे, परन्तु वह माला भगवान् श्रीसीतारामजी के गलेमें जा नहीं रही थी। उसी समय नारायणदास ने कहा – गुरुदेव! पहले यदि मानसी सेवामें मुकुट उतार लिया जाए, माला धारण कराकर फिर मुकुट धारण करा दिया जाए, सब ठीक हो जाएगा। तब अग्रदासजी ने कहा कि – नारायणदास ! तुमने तो मेरी नाभि की बात जान ली, आजसे तुम्हारा उपनाम नाभा होगा।)**

श्री अग्रदेव जी ने कहा कि तुम्हारे ऊपर यह साधुओ की कृपा हुई है। यह नहीं कहा की हमारी कृपा अथवा तुम्हारी सेवा का प्रताप है , उन्होंने कहा की संतो की कृपा से हुआ है । श्री अग्रदेव जी ने आगे कहा की अब तुम उन्ही साधु-संतों के गुण, स्वरुप और हृदय के भावो का वर्णन करो । इस आज्ञा को सुनकर श्री नाभा जी ने हाथ जोड़कर कहा- भगवन् ! मैं श्रीराम-कृष्ण के चरित्रों को तो कुछ गा भी सकता हूँ क्योंकि उन चरित्रों का आधार श्रीमद् भागवत ,वाल्मीकि रामायण इत्यादि परंतु संतों के चरित्रों का ओर छोर नहीं पा सकता हूँ, क्योंकि उनके रहस्य अति गंभीर है । बहुत से भक्त हुए जिन्होंने बडे गुप्त रूप में भजन किया । मैं भक्तो की भक्ति के रहस्य को नहीं पा सकता । तब श्रीअग्रदेव जी ने समझाकर कहा-  जिन्होंने तुम्हे मेरी मानसी सेवा और सागर में नाव दिखा दी,वे ही भक्त भगवान् तुम्हारे ह्रदय में आकर सब रहस्यों को कहेंगे और अपना स्वरुप दिखाएंगे ।

श्री नाभादास जी जिन भक्तो का स्मरण करते वह नाभाजी के चित्त में अपनी लीला प्रकट कर देते और नाभा जी उसको लिखते जाते परंतु जब उन्होंने वृन्दावन के अनन्य रसिको का स्मरण किया तब उनके चित्त में कोई लीला प्रकट नहीं हुई । श्री गुरुदेव से प्रार्थना करने पर उन्होंने बताया की इनकी स्वामिनी तो श्री राधारानी है ,उनका स्मरण किये बिन रसिको के चरित्र चित्त में नहीं आ सकते । अतः श्री नाभाजी ने पहले श्री राधारानी जी के चरणो का समरण किया उसके बाद समस्त रसिको की लीलाएं उनके चित्त में प्रकट हो गयी ।

किसी भी ग्रन्थ के लेखन का प्रारम्भ मंगलाचरण से होता है । ३ प्रकार के मंगलाचरण होते है – आशीर्वादात्मक , वस्तुनिर्देशात्मक , नमस्करात्मक । पहले में पाठको के लिए आशीर्वाद दिया जाता है । दूसरे में बताया जाता है की इस ग्रन्थ में किस विषय की चर्चा है । तीसरे में श्री गुरु इष्ट गणेश आदि को नमस्कार किया जाता है । विशेष बात यह है की  श्री भक्तमाल के मंगलाचरण में तीनो प्रकार के मंगलाचरण आते है । नाभादास जी ने ग्रन्थ का प्रारम्भ मंगलाचरण के रूप में निम्न दोहे से किया है :

भक्त भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक
इनके पद बंदन किएँ नासत बिघ्न अनेक ।।
मंगल आदि विचार रहि वस्तु न और अनूप ।
हरि जन को जस गावते हरिजन मंगल रूप।।
संतन निरने कियो माथि श्रुति पुराण इतिहास ।
भजिबे को दोई सुघर के हरि के हरिदास ।।
(श्री गुरु)अग्रदेव आग्या दई भक्तन को जस गाऊ ।
भवसागर के तरन को नाहिंन और उपाउ ।।

जैसे गाय के थन देखने में चार है परंतु चारो के अंदर एक ही सामान दूध भरा रहता है,वैसे ही भक्त,भक्ति ,भगवान् और गुरु ये चारो अलग अलग दिखाई देने पर भी सर्वदा सर्वथा अभिन्न है । चारो में से एक से प्रेम हो जानेपर तीनो स्वतः प्राप्त हो जाते है । इनके श्रीचरणो की वन्दना करनेसे समस्त विघ्नों का पूर्णरूप से नाश हो जाता है । ग्रन्थ के आरम्भ मे मंगलाचाण के सम्बन्ध मे विचार करनेपर यही समझ मे आता है कि भक्त चरित्रो के समान दूसरी और कोई वस्तु सुन्दर नहीं है, जिससे मंगलाचरण किया जाय ।

भगवद्भक्तों का चरित्रगान करने मे भगवद्भक्त ही मंगलरूप हैं ।  वेद, पुराण, इतिहास आदि सभी शास्त्रो ने तथा सभी साधु सन्तो ने यही निर्णय किया है कि भजन, आराधना के लिये भगवान् या भगवान् के भक्त…दो ही सबसे सुन्दर है ।।स्वामी श्रीअग्रदेव जी ( श्री अग्रदग्स जी) ने मुझ नारायण दास (नाभादास) को आज्ञा दी कि भक्तों के यशोगान करो; क्योकि संसार सागर से पार होने का इससे सरल दूसरा कोई उपाय नहीं है ।। 
श्री नाभा जी कहते है की भगवद्भक्तों के गुण और चरित्र का वर्णन करने से इस संसार में कीर्ति और सभी प्रकार के कल्याणों की प्राप्ति होती है  ; आधिभौतिक , आधिदैविक , आध्यात्मिक -तीनो तापो का नाश होता है ।
जग कीरति मंगल उदै तीनौं ताप नसायँ ।
हरिजन को गन बरनते हरि हृदि अटल बसायँ ।।( भक्तमाल दोहा १०८)

श्री नाभाजी जीवो को सावधान करते हुए कहते है -यदि भगवान् को प्राप्त करने की आशा है तो भक्तो के गुणोंको गाइये ,निस्संदेह भगवत्प्राप्ति हो जायेगी ।नहीं तो जन्म -जन्मान्तरों में किये गए अनेक पुण्य भुने हुए बीज की तरह बेकार हो जायेंगे (भुने हुए बीज पुनः अंकुरित नहीं होते )। उनसे कल्याण न होगा, फिर जन्म -जन्म में पछताना पड़ेगा ।

(जो)हरि प्रापति की आस है तौ हरिजन गुन गाव ।
नतरु सुकृत भुंजे बीज ज्यौ जनम जनम पछिताय ।।
(भक्तमाल दोहा २१०)

जो भक्तो के चरित्रों को गाता है,श्रवण करता है तथा उनका अनुमोदन करता है ,वह भगवान् को पुत्र के सामान प्रिय है,उसे भगवान् अपनी गोद में बिठा लेते है ।

सो प्रभु प्यारौ पुत्र ज्यों बैठे हरि की गोद ।(दोहा २११)

सत्संग में संत चरित्रों को सुनते -सुनते उनमे श्रद्धा और विश्वास दृढ़ हो जाता है ।भक्त ,भक्ति ,भगवान् और गुरुदेव में श्रद्धा रखने वाले सभी प्राणी इसके अधिकारी है ।श्रद्धा विश्वास विहीन ,नास्तिक और कुतर्की व्यक्ति श्री भक्तमाल का अधिकारी नहीं है ।वे कदाचित् पढ़ेंगे और सुनेंगे तो संतो की और ग्रंथो की निंदा करेंगे । इससे लोक और परलोक दोनों बिगड़ जायेंगे ।

जैसे श्रीमद्भागवत और रामायण में चीर हरण,रास लीला और बाली वध की लीला रहस्यमयी है ,वैसे ही श्री भक्तमाल में कुछ भक्तो के चरित्र रहस्यपूर्ण है । इन लीलाओ को सबके लिए समझ पाना कठिन है अतः भक्तमाल को गुरुदेव अथवा संतो के श्रीमुख से श्रवण करना उत्तम है ।अविश्वास और कुतर्को को त्यागकर भक्तमाल का श्रवण ,मनन और निदिध्यासन करके जीवन को सफल बनाये । संत महात्माओ द्वारा श्री भक्तमाल का श्रवण करने से मनकी शंकाए मिटेंगी । यदि भक्त चरित्रों को समझने में परेशानी हो तो संतो के चरणों में जाकर उन्हें समझना चाहिए , संत और ग्रंथो के बारे में गलत विचार ,कुतर्क और अविश्वास नहीं करना चाहिए ।

जो भक्तमाल के रहस्य को जानने वाले है वे कभी भी किसी संत वेशधारी की निंदा नहीं करेंगे । प्रायः लोग कही सुनते है की अमुक संत ने ऐसा व्यवहार किया तो उसके बारे में गलत वचन प्रयोग करने लगते है ।यदि आपको उनपर श्रद्धा नहीं है तो न रखे,परंतु निंदा न करे । यदि वह सच्चा संत हुआ तो यह बहुत भारी अपराध निश्चित रूप से होगा । जिनमे वैष्णव चिन्ह (तिलक ,कंठी ) न भी दिखाई पड़े उन्हें ऐसा सोच कर सम्मान करे की इनके हृदय में अभी तक भक्ति जागृत नहीं हुई है । यह बहुत से भक्तमाली संतो का मत है ।

सभी संतो का बिना जाति विचार किये सम्मान करना सबसे जरुरी बात है । भक्ति का अधिकार सभी वर्णों के व्यक्तियो को है इस बात को प्रमाणित करने के लिए अनेक संत महात्मा विविध जातियों में प्रकट हुए है  जैसे शबरी ,निषाद , चोखमेळा , तुकाराम ,कबीर ,रैदास ,धन्ना ,रसखान ,गुलाब सखी आदि । जो हरी को भजे वही हरी का है । पीपल का वृक्ष कौवे की विष्ठा से उत्पन्न होता है परंतु उसकी पूजा परिक्रमा पंडित करते है । तुलसी गन्दी जगह में भी प्रकट हो फिर भी उसे अपवित्र नहीं समझा जाता । कबीरदास जी ने कहा है – 

जाति न पूछो साधू की ,पूछ लीजिये ज्ञान ।
मोल करो तलवार का ,पड़ा रहन दो म्यान ।।

ग्रंथ के उपसंहार में श्री नाभादास जी कहते है – किसीको योग का भरोसा है ,किसी को यज्ञ का ,किसीको कुल का और किसी को अपने सत्कर्मो का , किंतु मुझ नारायण (नाभादास ) की तो केवल यही अभिलाषा है कि गुरुदेव की कृपा से भक्तो की यह माला मेरे हृदय देश में सदा विराजमान रहे ।

भक्तमाल के सुमेरु :
श्री नाभादास जी ने भक्तो की माला (भक्तमाल ) तो बनायीं परंतु माला का सुमेरु का चयन करना कठिन हो गया। किस संत को सुमेरु बनाएं इस बात का निर्णय कठिन हो रहा था । पूज्य श्री अग्रदेवचार्य जी के चरणों में प्रार्थना करने पर उन्होंने प्रेरणा की के वृंदावन में भंडारा करो और संतो का उत्सव करो ,उसी भंडारे उत्सव में कोई न कोई संत सुमेरु के रूप में प्राप्त हो जायेगा । सभी तीर्थ धामो में संतो को कृपापूर्वक भंडारे में पधारने का निमंत्रण भेजा गया । काशी में अस्सी घाट पर श्री तुलसीदास जी को भी निमंत्रण पहुंचा था परंतु उस समय वे काशी में नहीं थे । उस समय वे भारत के तत्कालीन बादशाह अकबर के आमंत्रण पर दिल्ली पधारे थे ।

दिल्ली से लौटते समय गोस्वामी तुलसीदास जी वृंदावन दर्शन के लिए पहुंचे । वे श्री वृंदावन में कालीदह के समीप श्रीराम गुलेला नामक स्थान पर ठहर गए । श्री नाभाजी का भंडारे में पधारना अति आवश्यक जानकार गोपेश्वर महादेव ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर गोस्वामी जी से भंडारे में जाकर संतो के दर्शन करने का अनुरोध किया । गोस्वामी जी भगवान् शंकर की आज्ञा पाकर भंडारे में पधारे । गोस्वामी जी जब वहां पहुंचे उस समय संतो की पंगत बैठ चुकी थी । स्थान पूरा भरा हुआ था ,स्थान पर बैठने की कोई जगह नहीं थी ।

तुलसीदास उस स्थान पर बैठ गए, जहां पूज्यपाद संतों के पादत्राण (जूतियां )रखी हुई थीं। परोसने वालो ने उन्हें पत्तल दी और उसमे सब्जियां व पूरियां परोस दीं। कुछ देर बाद सेवक खीर लेकर आया । उसने पूछा – महाराज ! आपका पात्र कहाँ है ? खीर किस पात्र में परोसी जाये ?
तुलसीदास जी ने एक संत की जूती हाथो में लेकर कहा -इसमें परोस दो खीर । यह सुनते ही खीर परोसने वाला क्रोधित को उठा बोला – अरे राम राम ! कैसा साधू है जो कमंडल नहीं लाया खीर पाने के लिए ,अपना पात्र लाओ । पागल हो गये हो जो इस जूती में खीर लोगे?

शोर सुनाई देने पर नाभादास जी वह पर दौड़ कर आये ।उन्होने सोचा कही किसी संत का भूल कर भी अपमान न हो जाए । नाभादास जी यह बात नहीं जानते थे की तुलसीदास जी वृंदावन पधारे हुए है । उस समय संत समाज में गोस्वामी जी का नाम बहुत प्रसिद्ध था, यदि वे अपना परिचय पहले देते तो उन्हें सिंहासन पर बिठाया जाता परंतु धन्य है गोस्वामी जी का दैन्य ।

नाभादास जी ने पूछा – संत भगवान् !आप संत की जूती में खीर क्यों पाना चाहते है ?यह प्रश्न सुनते ही गोस्वामी जी के नेत्र भर आये । उन्होंने उत्तर दिया – परोसने वाले सेवक ने कहा की खीर पाने के लिए पात्र लाओ । संत भगवान् की जूती से उत्तम पात्र और कौनसा हो सकता है ? जीव के कल्याण का सरल श्रेष्ठ साधन है की उसे अकिंचन भक्त की चरण रज प्राप्त हो जाए । प्रह्लाद जी ने कहा है – न अपने आप बुद्धि भगवान् में लगती है और न किसी के द्वारा प्रेरित किये जाने पर लगती है । तब तक बुद्धि भगवान् में नहीं लगती जब तक किसी आकिंचन प्रेमी रसिक भक्त की चरण रज मस्तक पर धारण नहीं की जाती । यह जूती परम भाग्यशालिनी है ।

इस जूती को न जाने कितने समय से संत के चरण की रज लगती आयी है और केवल संत चरण रज ही नहीं अपितु पवित्र व्रजरज इस जूती पर लगी है । यह रज खीर के साथ शरीर के अंदर जाएगी तो हमारा अंत:करण पवित्र हो जाएगा । संत की चरण रज में ऐसी श्रद्धा देखकर नाभा जी के नेत्र भर आये । उन्होंने नेत्र बंद कर के देखा तो जान गए की यह तो भक्त चरित्र प्रकट करते समय(भक्तमाल लेखन के समय) हमारे ध्यान में पधारे हुए महापुरुष है । नाभाजी ने प्रणाम् कर के कहा – आप तो गोस्वामी श्री तुलसीदास जी है , हम पहचान नहीं पाये ।

गोस्वामी जी ने कहा – हां ! संत समाज में दास को इसी नाम से जाना जाता है । परोसने वाले सेवक ने तुलसीदास जी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की । सभी संतो ने गोस्वामी जी की अद्भुत दीनता को प्रणाम् किया । इसके बाद श्री नाभादास जी ने गोस्वामी तुलसीदास जी को सिंहासन पर विराजमान करके पूजन किया और कहा की इतने बड़े महापुरुष होने पर भी ऐसी दीनता जिनके हृदय में है ,संतो के प्रति ऐसी श्रद्धा जिनके हृदय में है, वे महात्मा ही भक्तमाल के सुमेरु हो सकते है ।

संतो की उपस्तिथि में नाभादास जी ने पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी को भक्तमाल सुमेरु के रूप में स्वीकार किया ।जो भक्तमाल की प्राचीन पांडुलिपियां जो है ,उनमे श्री तुलसीदास जी के कवित्त के ऊपर लिखा है – भक्तमाल सुमेरु श्री गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ।

महान संत पूज्य श्री रामकुमार दास जी का एक भाव है – तुलसीदास जी के सुमेरु होने पर किसी प्रकार की कोई शंका नहीं है , संदेह नहीं है और कोई विरोध भी नहीं है  परंतु एक भाव उनका है की भक्तमाल सुमेरु पूज्य श्री कृष्णदास पयोहारी जी महाराज है (नाभा जी के दादा गुरु ) । उनका भाव है की कीसी भी माला के एक एक दाने में सूत्र एक ओर से जाता है परंतु एक सुमेरु ऐसा होता है जिसमेे सूत्र दोनो ओर से जाता है ।

माला के दानों में एक विशिष्ट दाना है सुमेरु । भक्तमाल में जितने भक्त है उनके प्रायः एक भक्त का एक छप्पय है । कही कही तो एक ही छप्पय में अनेक भक्तो का स्मरण किया गया है परंतु श्री कृष्णदास पयहारी जी ऐसे संत है जिनके लिए नाभा जी ने दो छप्पय छंद लिखे है । इस भाव के कारण उन्होंने श्री कृष्णदास पयहारी जी को सुमेरु के रूप में स्वीकार करने का भाव भी संतो को प्रिय है ।

ग्रंथ में दोहे तथा छप्पय संख्या :
श्री नाभादास जी की भक्तमाल में दोहे तथा छप्पयों की कुल संख्या २१४ है, कुछ संतो का मत है २१५ । एक पद को कुछ संत प्रक्षिप्त मानते है तथा कुछ संत मूल में मानते है । श्री अवध के महान रसिक संत श्री रूपकला जी की भक्तमाल पर टीका बहुत प्रसिद्ध है, उनका भाव है –

दशरथ जी का स्मरण भक्तमाल में अलग से नहीं किया गया है । श्री रूपकला जी कहते है की दशरथ जी का स्मरण तो भक्तमाल में है परंतु सीधे सीधे नहीं है । श्री मनु और शतरूपा जी ने नैमिषारण्य क्षेत्र में तपस्या करके भगवान् से अपने जैसा होने का वर माँगा ।

मनु जी ही दशरथ जी हुए और शतरूपा जी ही कौशल्या माता हुई । यह बात सभी के समझ में नहीं आती इसीलिए श्री रूपकला जी ने दशरथ जी के लिए एक छप्पय लिखा है । इसका भाव वे यह देते है की इस एक छप्पय को मिलाने पर संख्या २१६ हो जाती है । दशरथ जी के छप्पय को मिला लिया जाए तो १०८ और १०८ के बराबर २१६ हो जायेगा । यह २ अष्टोत्तरी हो जायेगी , एक माला श्री कनक बिहारी सरकार के कंठ में और एक माला श्री कनक बिहारिणी के कंठ में सुशोभित होगी ।अतः दशरथ जी के छप्पय को मिलाकर २१६ संख्या ही लेना उचित है और श्री रूपकला जी यह भी मानते है की किसी प्राचीन प्रति में कही उपलब्ध भी होता है ।

भक्तिरसबोधिनि टीका :

नाभादास जी के एक शिष्य हुए श्री गोविन्ददास जी जिन्होंने नाभाजी की आज्ञा से भक्तमाल जी की कथा का बहुत प्रचार किया । नाभाजी जब श्री साकेत धाम पधार गए उस समय भक्तमाल कथा का प्रचार कुछ कम हो गया । श्री नाभादास जी सखी रूप(नभा अली ) में श्री साकेत धाम में श्री सीताराम जी की नित्य सेवा किया करते थे । एक दिन प्रभु को नाभा अली के मुख पर उदासी दिखाई पड़ी । प्रभु ने पूछा की आपकी उदासी का क्या कारण है ? नाभा अली ने कहा की आपकी सेवा प्राप्त हो रही है ,दुःख तो नहीं है परंतु अब भक्तमाल की कथा का प्रचार कम होने लगा है क्योंकि छप्पय के अर्थ बहुत गूढ़ है । 

गोविन्ददास जी कथा तो कहते है पर उन्हें भी ऐसा लगता है की भक्तमाल जी की टीका हो जाए तो अच्छा होगा , आगे चलकर कही भक्तमाल कथा लुप्त न हो जाए ।प्रभु ने नाभा अली से कहा की आप किसी संत को भक्तमाल पर टीका करने की प्रेरणा करें । नाभा अली ने कहा – मुझे ऐसा कोई सुझ नहीं रहा , आप ही कृपा कर के आज्ञा करे की हम किस संत को प्रेरणा करे । श्री राम जी ने गौड़ीय वैष्णव संत श्री प्रियादास जी को प्रेरणा करने की आज्ञा करी । 

श्री प्रियादास जी का परिचय और भक्तमाल की टीका :
श्री गौरांग महाप्रभु  ने नवद्वीप से अपने छः प्रमुख अनुयायियों को वृंदावन भेजा तथा वहां सप्त देवालयों की आधारशिला रखवाई और गौड़ीय संप्रदाय एवं महामंत्र का प्रचार करवाया । श्री चैतन्य महाप्रभु  की पवित्र परंपरा के ६ गोस्वामी गण इस प्रकार है :

श्री रूप गोस्वामी पाद, श्री सनातन गोस्वामी पाद ,श्री जीव गोस्वामी पाद, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी पाद,श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी पाद, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी पाद ।

श्री मद् गोपालभट्ट गोस्वामी पाद के शिष्य श्री निवासचार्य जी , उनके शिष्य श्री मनोहर दास जी ,उनके शिष्य हुए श्री प्रियादास जी महाराज । श्री प्रियादास जी के विषय में अधिक वर्णन प्राप्त नहीं हो पाता । बताया जाता है की इनका जन्म राजपुरा नामक ग्राम सूरत (गुजरात) में हुआ ।ये नवीन अवस्था में श्री वृन्दावन आ गए और श्री राधारमण मंदिर में श्री मनोहरदास जी के शिष्य हो गए । श्री साकेत धाम पधारने के १०० वर्ष बाद वैष्णवरत्न श्री प्रियादास जी को एक दिन श्री नाभादास जी द्वारा भक्तमाल पर टीका करने की आज्ञा हुई जिसका उन्होंने स्वयं इस प्रकार वर्णन किया है :

श्री प्रियादासकृत भक्तिरसबोधिनी टीका का मंगलाचरण :

महाप्रभु कृष्णचैतन्य मनहरनजू के चरण कौ ध्यान मेरे नाम मुख गाइये। ताही समय नाभाजू ने आज्ञा दई लई धारि टीका विस्तारि भक्तमाल की सुनाइये।।
कीजिये कवित्त बंद छंद अति प्यारो लगै जगै जग माहिं कहि वाणी विरमाइये। जानों निजमति ऐ पै सुन्यौ भागवत शुक द्रुमनि प्रवेश कियो ऐसेई कहाइये।। १।।

श्रीप्रियादासजी भक्तमाल की भक्तिसबोधिनी टीका का मंगलाचरण एवं इस टीका के लिखे जाने का हेतु बताते हुए कहते हैं कि एक बार मैं महाप्रभु श्री कृष्णचैतन्य एवं गुरुदेव श्री मनोहर दास जी के श्रीचरणकमल का हृदय मे ध्यान और मुख से नाम संकीर्तन कर रहा था, उसी समय श्रीनाभा जी ने मझे आज्ञा दी जिसे मैने शिरोधार्य कर लिया ।

वह आज्ञा यह थी कि श्री भक्तमाल की विस्तार पूर्वक टीका करके सुनाइये । टीका कवित्त छन्दों मे कीजिये, जो कि अत्यन्त प्रिय लगे और सम्पूर्ण संसार में प्रसिद्ध हो । इस प्रकार भक्तोंका चरित्र कहकर अपनी वाणी को विश्राम दीजिये अर्थात् भक्तोंका चरित्र कहने में वाणी को लगा दीजिये ।

ऐसा कह श्रीनाभा जी ने वाणी को विश्राम दिया, तब मैने भावना में ही निवेदन किया कि मैं तो अपनी बुद्धि को जानता हूँ कि वह टीका करने में सर्वथा असमर्थ है परतु मैने श्रीमद्भागवत में सुना है कि श्री शुकदेव जी वृक्षो मे प्रवेश करके स्वयं बोले थे, वैसे ही आप भी मेरी जड़मति में प्रवेश कर के टीका की रचना कर लेंगे ।

भक्तिसबोधिनी टीका का नामस्वरूप वर्णन:
रची कविताई सुखदाई लागै निपट सुहाई औ सचाई पुनरुक्ति लै मिटाई है। अक्षर मधुरताई अनुप्रास जमकाई अति छवि छाई मोद झरी सी लगाई है।।
काव्य की बडाई निज मुख न भलाई होति नाभाजू कहाई , याते प्रौढ़िकै सुनाई है। हृदै सरसाई जो पै सुनिये सदाई यह भक्तिरसबोधिनी सुनाम टीका गाईं है।। २ ।।

इस कवित्त मे श्रीप्रियादास जी अपने काव्य की विशेष ताएं एवं टीका का नाम बताते हुए कहते हैं कि मैंने टीका काव्य की ऐसो रचना की है, जो पाठकों और श्रोताओ को सुख देनेवाली है और अत्यन्त सुहावनी लगती है । इसमें सचाई हें अर्थात सत्य सत्य कहा गया है । पुनरुक्ति दोष को मिटा दिया गया है ।

अक्षरो की मधुरता, अनुप्रास और यमक आदि अलंकारो से अत्यन्त सुशोभित होकर इस टीका काव्य ने आनन्द की झरी सी लगा दी है । अपने काव्य की अपने मुखसे प्रशंसा करना अच्छा नहीं होता, परंतु इसे तो श्रीनाभाजी ने कहलवाया है, इसीसे इसकी प्रशंसा नि:शक होकर दृढतापूर्वक सुनायी है । यदि नीरस हृदय वाला व्यक्ति भी सदा इसका श्रवण करे तो उसके हृदय में सरसता होगी और सरस हृदयवाले के लिये बारम्बार सुननेपर भी यह टीका उत्तरोत्तर सरस प्रतीत होगी । ऐसी यह  भक्तिरसबोधिनी सुन्दर नामवाली टीका गायी है, जो भक्ति के सभी रसों का बोध करानेवाली है ।

श्री भक्तिदेवी का श्रृंगार 
श्रद्घाई फुलेल औ उबटनौ श्रवण कथा मैल अभिमान अंग अंगनि छुड़ाइये । मनन सुनीर अन्हवाइ अंगुछाइ दया नवनि वसन पन सोधो लै लगाइये।।
आभरन नाम हरि साधु सेवा कर्णफूल मानसी सुनथ संग अंजन बनाइये। भक्ति महारानीकौ सिंगार चारु बीरी चाह रहै जो निहारि लहै लाल प्यारी गाइये।। ३।।

श्रृंगारीत रूप विशेष आकर्षक होता है, अत: इष्टदेव को प्रसन्न  करनेके लिये टीकाकार ने इस कवित्त में श्रीभक्ति देवी के श्रृंगार का वर्णन एक रूपक के द्वारा किया है । भक्ति देवी के श्रीविग्रह की निर्मलता के लिये श्रद्धारूपी फुलेल से शुष्कता दूरकर कथाश्रवणरूपी उबटन लगाइये और अहंकार रूपी मैल को प्रत्येक अंगसे छुडाइये । फिर मनन के सुन्दर जलसे स्नान कराकर दयाके अंगोछे से पोछिये ।

उसके बाद नम्रता के वस्त्र पहनाकर भक्तिमें प्रतिज्ञारूपी सुगन्धित द्रव्य लगाइये । फिर नाम संकीर्तन रूप अनेक आभूषण, हरि और साधुसेवा के कर्णफूल तथा मानसी सेवा की सुन्दर नथ पहनाइये । फिर सत्संग रुपी अंजन लगाइये। जो भक्तिमहारानी का इस प्रकार श्रृंगार करके फिर उन्हे अभिलाषारूपी बीडा (पान) अर्पण करके उनके सुन्दर स्वरूप का दर्शन करता रहे, वह श्रीप्रिया प्रियतम को प्राप्त करता है । ऐसा सन्तो एवं शास्त्रो ने गाया है ।।

भक्तिरसबोधिनी टीका की महिमा 
शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, औ श्रृंगारु चारु, पाँचों रस सार विस्तार नीके गाये हैं । टीका कौ चमत्कार जानौगे विचारि मन, इनके स्वरूप मै अनूप लै दिखाये हैं।।
जिनके न अश्रुपात पुलकित गात कभू  ,तिनहूँ को भाव सिंधु बोरि सो छकाये है । जौलौं रहैं दूर रहैं विमुखता पूर हियो, होय चूर चूर नेकु श्रवण लगाये हैं ।। ४ ।।

इस कवित्त में टीकाकार टीका की विशेषता बताते हुए कहते है कि इस भक्तिरसबोधिनी टोका में शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और श्रृंगार – भक्ति के इन पाँचो रसो का तत्त्व विस्तार से अच्छी प्रकार वर्णन किया गया है । इनके सुन्दर स्वरूपो को जैसा मैने भलीभाँति उत्तम रीतिसे वर्णन करके दिखाया है, इस चमत्कार को पाठक एवं श्रोता अपने मनमें अच्छी तरह से विचार करनेपर ही जानेंगे ।

श्रवण, कीर्त्तन आदि करके प्रेमवश जिनके नेत्रो मे कभी भी आनन्द के आंसू नहीं आते हैं और शरीर में रोमांच नहीं होता है, ऐसे नीरस, कठोर हृदयवाले लोगो को भी भक्तिके भावरूपी समुद्र में डुबाकर तृप्त कर दिया है । जबतक वे इससे दूर है तभीतक भक्ति से पूर्ण विमुख हैं, किंतु यदि कान लगाकर इसका थोडा भी श्रवण करेंगे तो उनका हदय चूर चूर होकर रस से परिपूर्ण हो जायगा ।।

प्रियादास जी द्वारा भक्तमाल की महिमा :
पंच रस सोई पंच रंग फूल थाके नीके, पीके पहिराइवे को रचिकै बनाई है। वैजयन्ती दाम भाववती अलि ‘नाभा’, नाम लाई अभिराम श्याम मति ललचाई हैं।।
धारी उर प्यारी ,किहूँ करत न न्यारी ,अहो ! देखौ गति न्यारी ढरियापनको आई है। भक्ति छबिभार, ताते, नमितशृंगार होत, होत वश लखै जोई याते जानि पाई हैं ।। ५।।

प्रस्तुत कवित्त में श्रीभक्तमाल को पंचरंगी वैजयंती माला बताकर उसकी महिमा, सुन्दस्ता और भगवत्प्रियता का वर्णन किया क्या है । पूर्व कवित्त में कहे गये पांच रस ही मानो फूलों के सुन्दर गुच्छे हैं, भाववती नाभा नामकी  सखीने अपने प्रियतम को पहनाने के लिये इसे अच्छी तरह से बनाया है ।

यह वैज़यन्ती माला इतनी सुन्दर है कि लोकामिराम श्यामसुन्दर श्रीराम की बुद्धि भी इसे देखकर ललचा गयी । उन्होने इस प्यारी वनमाला को अपने वक्ष:स्थलपर धारण किया, उन्हें यह इतनी प्रिय लगी कि इसे वे कभी भी अपने कण्ठ से अलग नहीं करते हैं । इस माला की विचित्र गति तो देखिये कि भगवान् ने इसे कण्ठ में धारण किया और यह लटक कर श्रीचरणोमे आ लगी है ।

इस मालामें भक्ति की सुन्दरता का भार है, इसीसे झुकी है । पंचरंगी भक्तमाल पहने हुए श्यामसुंदर क जो दर्शन करता है, वह उनके वशमें होकर उन्हें वशमें कर लेता है । यह रहस्य की बात भक्तमाल के द्वारा जानी गयी है ।।

सत्संग के प्रभाव का वर्णन :
भक्ति तरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरीहू कौ, वारिदैे बिचारि वारि सींच्यो सत्संग सों । लाग्योई बढ़न, गोंदा चहुँदिशि कढन सो चढन अकाश, यश फैल्यों बहुरंग सों।।
संत उर आल बाल शोभित विशाल छाया ,जिये जीव जाल ,ताप गये यों प्रसंग सों । देखौ बढ़वारि जाहि अजाहू की शंका हुती, ताहि पेड बाँधे झूमें हाथी जीते जंग सों ।। ६।।

भक्ति का वृक्ष जब साधक के हृदय में छोटे से पौधे रूपमें होता है, तब उसे हानिका भय मायारूपी बकरी से भी होता है, अत: पौधे की रक्षाके लिये उसके चारों ओर विचाररूपी घेरा ( थाला ) लगाकर सत्संगरूपी जलसे सींचा जाता है, तब उसमें चारों ओर से शाखा प्रशाखाएं निकलने लगती हैं और वह आकाश की और चढने बढते लगता है ।

सरल साघुहृदयरूप थाले में सुशोभित इस विशाल भक्ति वृक्ष की छाया अर्थात् सत्संग पाकर त्रिविध तापोसे तपे जीवसमूह सन्तापरहित होकर परमानन्द प्राप्त करते हैं । इस प्रकार सार सम्भार करनेपर इस भक्ति का विचित्र रूप से बढना तो देखो कि जिसको पहले कभी छोटी सी बकरी भी डर था, उसीमें आज महासंग्रामविजयी काम, क्रोध आदि बड़े बड़े हाथी बंधे हुए झूम रहे है, परंतु उस वृक्ष को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा सकते हैं  ।।

भक्तमाल स्वरुप वर्णन:
जाको जो स्वरूप सो अनूप लैे दिखाय दियो, कियो यों कवित्त पट मिहिं मध्य लाल है । गुण पै अपार साधु कहैं आंक चारिही में, अर्थ विस्तार कविराज टकसाल है।। सुनि संत सभा झूमि रही, अलि श्रेणी मानो, धूमि रही, कहैं यह कहा धौं रसाल है। सुने हे अगर अब जाने मैं अगर सही, चोवा भये नाभा, सो सुगंध भक्तमाल है।। ७।।

जिस भक्त का जैसा सुन्दरस्वरूप है, उसको  श्रीनाभा जी ने अति उत्तम प्रकार से अपने काव्यों में स्पष्ट  कर दिया है । कविता ऐसी की है कि जैसे महीन वस्त्रके  अन्दर रखे हुए माणिक्य रत्न की चमक बाहर प्रकाश करे उसी प्रकार कविता की शब्दावली से भक्तस्वरूप  प्रक्ट होता है । साधु भक्तो के गुण और उनकी महिमा अपार है, किंतु नाभाजी ने सन्तगुरुकृपा से थोड़े ही ‘अक्षरो मे भक्तोंके’ गुणोका ऐसो विचित्रता के साथ वर्णन  किया है कि उसके अनेक अर्थ होते हैं और गुणोका  अपार विस्तार हो जाता है ।

यही सच्चे टकसाली कवि की विशेषता है । संतो की सभा इसे सुनकर भक्तमाल काव्य का रसास्वादन कर आनन्द विभोर होकर झूम रही है, मानो सन्तरूपी भ्रमर समूह चरित्ररूपी सुगन्धित पुष्पो पर मंडरा रहा है । आश्वर्यचकित होकर वे कहते है कि यह कैसी विचित्र रसमयी कविता है ! मैने अगर अर्थात् स्वामी श्रीअग्रदेवजी का नाम तो सुना था, परंतु अब मैने जाना और अनुभव किया कि अगर (श्रीअग्रदेव जी – नाभाजी के गुरुदेव ) वस्तुत: अगर (सुगंधित वृक्ष ही) हैं, जिन से नाभाजी जैसा इत्र उत्पन्न हुआ है और जिसकी दिव्य सुगंध यह भक्तमाल है ।।

प्रियादास जी द्वारा भक्तमाल माहात्म्य वर्णन :

बड़े भक्तिमान, निशिदिन गुणगान करैं हरैं जगपाप, जाप हियो परिपूर है। जानि सुख मानि हरिसंत सनमान सचे बचेऊ जगतरीति, प्रीति जानी मूर है।।
तऊ दुराराध्य ,कोऊ कैसे के अराधिसकै, समझो न जात, मन कंप भयो चूर है। शोभित तिलक भाल माल उर राजै, ऐ पै बिना भक्तमाल भक्तिरूप अति दूर है।। ८।।

कोई बड़े साधक कैसे ही अच्छे भक्तिमान् हों, रात दिन भागवान् के गुणो को गान करते हों, संसार के पापो को हरते हों ,जप ध्यान आदि से उनका ह्रदय परिपूर्ण हो श्रीहरि और सन्तो के स्वरूप को जानकर सचाइसे उनकी सेवा और उनका आदर भी करते हों तथा उसमें सुख भी मानते हों – ज़गत के मायिक प्रपंचोसे बचे भी हों और प्रेम कोही मूलतत्त्व मानते हो इतनेपर भी भक्ति की आराधना कठिन है, उसकी आराधना कोई कैसे कर सकता है ?

विशुद्ध भक्ति का स्वरूप समझ में नहीं आता है, मन कम्पित होकर शिथिल हो जाता है ।चाहे मस्तकपर सुन्दर तिलक और गलेमें कण्ठी माला सुशोभित हो, परंतु बिना भक्तमाल पठन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन किये भक्ति का स्वरूप बहुत दूर है, उसका जानना असम्भव है ।।

श्री प्रियादास जी ने सं १७६९ फाल्गुन कृष्णपक्ष सप्तमी को श्री वृंदावन धाम में भक्तमाल की टीका पूर्ण की । प्रियादास जी ने टीका में ६३४ कवित्त रचे है । बिना प्रियादास जी की टीका के भक्तमाल की कथाओ को समझना बड़ा कठिन है । श्री प्रियादास जी यह सिद्धांत निश्चित करते है की अन्य साधनों में साधना का अभिमान आने की संभावना रहती है परंतु भक्तो के चरित्र श्रवण से विनय,दैन्य एवं शरणागत होने का भाव पैदा होता है ,इसलिए भक्ति का सच्चा अधिकारी बनने के लिये भक्तो के चरित्रों का श्रवण करना आवश्यक है ।

श्री भक्तमाल के माहात्म्य का वर्णन करने वाले ३ सच्चे इतिहास पूज्य संत श्री वैष्णवदास जी द्वारा लिखे गए है । श्री वैष्णव दास जी यह प्रियादास जी के नाती चेला है अर्थात शिष्य के शिष्य है । किसी भी ग्रंथ का माहात्म्य श्रवण करने से उसमे अधिक श्रद्धा होती है । श्री वैष्णव दास जी द्वारा वर्णित भक्तमाल माहात्म्य के विषय में ३ सच्ची घटनाएँ इस प्रकार है :

भयौ चहै हरि पांति को सुनै सोई हरषाय । तहां दोय इतिहास है सुनिये चित्त लगाय ।।

१. श्री वैष्णवदास जी द्वारा भक्तमाल माहात्म्य का पहला इतिहास वर्णन : श्री भक्तमाल के प्रथम श्रोता भगवान् ही है – 
वृन्दावन में श्री प्रियादास जी के एक मित्र थे जिनका नाम था श्री गोवर्धननाथ दास । इन्होंने प्रियादास जी के सानिध्य में भक्तमाल का अध्ययन किया था ,वे भक्तमाल की बहुत मधुर कथा कहते थे । एक समय संतो की जमात लेकर साथ ये जयपुर पहुंचे । यह उस समय की बात है जब मुघलो के अत्याचार के कारण राज मानसिंह श्री गोविन्द देव जी को वृंदावन से जयपुर ले गए थे । संतो ने प्रेम से गोविन्द देव जी मंदिर में दर्शन किया । वहाँ के वासियो ने श्री गोवर्धननाथ दास जी से ठाकुर जी को भक्तमाल कथा सुनाने का आग्रह किया ।

उन्होंने कहा – हमें पास ही साम्भर गांव में एक उत्सव में जाना है ।श्रोताओ ने आग्रह किया किंउत्सव जब आएगा तब आप चले जाना तब तक यहाँ कृपा करके भक्तमाल कथा सुनावे । कुछ दिन कथा कहने पर उन्होंने कहा – अब हमें उत्सव क निमित्त सम्भर गाँव जाना है ,लौटकर आनेपर पुनः कथा सुनाएंगे ।

जब महाराज जी पुनः जयपुर आये तब श्रोता आनंदित हुए और भीड़ जमा होने लगी । संत भगवान् श्री गोविन्द देव जी के मंदिर में कथा सुनाने बैठे । कथा के प्रारम्भ में संत जी ने पूछा – हमें नित्य कथा कहने का अभ्यास है ,हमें क्रम मालुम नहीं है । हमने कथा कहाँ पर रोकी थी ? पिछली कथा में किस भक्त का चरित्र सुनाया था ?

सब श्रोता मौन हो गए ,एक दूसरे का मुख देखने लगे । संत भगवान कहने लगे – आप लोग ध्यान देकर कथा नहीं सुनते है तब कथा आगे क्यों सुनावे ? वह पोथी बाँधने लगे और कहने लगे हम वृन्दावन जा रहे है । उस समय मंदिर में गौड़ीय परंपरा के सिद्ध संत गोस्वामी श्री राधारमण लाल जी विराजमान थे  जो वहाँ के प्रमुख पूजारी भी थे। श्री गोविन्द देव जी उनसे प्रत्यक्ष बातें करते थे ।

प्रभु ने श्री राधारमण गोस्वामी जी को आवाज लगाकर अंदर बुलाया और कहा – बाबा आप कृपया जाकर श्री गोवर्धन नाथ दास जी से कह दीजिये की भक्त श्री रैदास जी का प्रसंग चल रहा था ,अब आप आगे की कथा सुनावे । प्रभु के श्रीमुख से यह बात सुनकर श्री राधारमण गोस्वामी जी के आँखों में अश्रु आ गए । उन्होंने जाकर गोवर्धन नाथ दास जी से कहा की – प्रभु कह रहे है की श्री रैदास भक्त तक की कथा हो चुकी है, अब आगे की कथा सुनावे ।

गोवर्धन नाथ दास जी कहने लगे – हम इस बात को कैसे मान ले की प्रभु ने कहा है ? वे जानते तो थे की प्रभु ने यह बात कही है परंतु संत जी इस बात की प्रतिष्ठा करने चाहते थे की भक्तमाल के प्रथम श्रोता श्री भगवान् है । संत ने कहा – यदि सभी सामने भगवान् ने आपसे कही बात पुनःकहे तब हम मानेंगे । ऐसा लहत ही मंदिर से मधुर आवाज आयी – श्री रैदास भक्त तक की कथा हो चुकी है ,अब आगे की कथा सुनावे । भगवान् की बात सबने सुनी , श्री गोवर्धननाथ दास जी के आँखों से अश्रु बहने लगे । उन्होंने कहा – अब कितना भी विलंभ हो हम भगवान् को कथा सुनाकर ही जायेंगे ।

इस तरह भगवान् ने स्वयं प्रमाणित किया की भक्तमाल के प्रथम श्रोता श्री भगवान् है – 

श्री गोविंद देव विख्याता ,कही पुजारी सौं यह बाता । श्री रैदास भक्त की गाथा, भई कहो आगे अब नाथा ।।

सुनि सु पुजारी के दृगन पानी बह्यो अपार । याके श्रोता आप हैं यहै कियो निरधार ।

श्री भगवान् को भक्तमाल कथा बहुत अधिक प्रिय है । अनेक सिद्ध संतो का मत है की भगवान् नित्य अपने धाम में श्री भक्तमाल का पाठ करते है ।

२.श्री वैष्णवदास जी द्वारा भक्तमाल माहात्म्य का दूसरा इतिहास वर्णन : श्री भक्तमाल के प्रति भगवान् का प्रेम –
एक बार संतो ने प्रार्थना की के भक्तमाल की भक्तिरसबोधिनी टीका पूर्ण हो गयी है अतः ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करनी चाहिए । इसमें ऐसा कोई नियम नही रखा की कुछ निश्चित समय में परिक्रमा पूरी करनी है ,जितने दिन में परिक्रमा पूरी हो जाये उतने दिन सही । रास्ते में श्री भक्तमाल की कथा भी चलती रहेगी । संतो के संग परिक्रमा करने प्रियदास जी चल पड़े ।ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा मार्ग पर होडल नाम का एक निम्बार्क संप्रदाय का पुराण स्थान पड़ता है । उस समय वहाँ के महंत पूज्य श्री लालदास जी महाराज थे । श्री लालदास जी महान रसिक संत थे और संतो के चरणों में बहुत श्रद्धा रखते थे ।

श्री लालदास जी ने प्रियादास जी से श्री भक्तमाल कथा कहने का निवेदन किया । कथा में बहुत श्रोताओ की भीड़ होने लगी , बहुत से संत भी विराजे और श्री लालदास जी के सब शिष्य भी भक्तमाल कथा का रसपान करने बैठे ।जहाँ भक्तमाल की कथा होती है वहाँ भोज भंडारे भी बहुत होते है । भीड़ के साथ साथ कुछ चोर भी साधुओं का वेष बनाकर वहाँ आ गए ,वही खाने पिने लगे और मस्त रहने लगे ।  एक रात मौका पाकर चोरों ने कुछ सामान और उसके साथ में भगवान् की मूर्ति चुरा ली ।

प्रातः काल साधू जल्दी जाग जाते है, उन्होंने प्रातः काल देखा की मंदिर के गर्भगृह के द्वार खुले पड़े है, सिंहासन पर भगवान् नहीं है । भगवान् चोरी हो गए । समस्त साधू रोने लगे ,श्री लालदास जी भी रोने लगे । प्रियादास को यह सुनते ही ऐसा लगा की प्राण ही चले गए. प्रियादास जी का प्राण धन जीवन भक्तमाल को ही था । प्रियादास जी कहने वे कहने लगे की नाभा जी ने तो कहा था -भक्तों का चरित्र भगवान को बहुत प्रिय है । त्यों जन के गुन प्यारे हरि को 

श्री प्रियादास जी कहने लगे – ठाकुर जी को हम कथा सुना रहे थे और ठाकुर जी बिच में ही भाग गए । ऐसा लगता है भगवान् को यह भक्तमाल कथा अच्छी नहीं लगती । साधुओं की दृष्टी संसार से अलग है, वे कहने लगे ठाकुर जी को यह भक्तमाल कथा अच्छी नहीं लगी इसलिए यहाँ से उठ कर चोरो के साथ चले गए ।

ठाकुर को यह चरित न प्यारे, यही ते चोरन संग पधारे।

अब हमारी परिक्रमा पूरी हुई, हम वृन्दावन वापस जा रहे है , हम अनशन करके प्राण त्याग देंगे और इसके बाद कभी कथा नहीं कहेंगे । श्री भक्तमाल के प्रधान श्रोता भगवान् ही यहाँ से चले गए अब कथा कैसे सुनाये । श्री लालदास जी रोने लगे और कहने लगे – श्री ठाकुर जी तो पहले ही चले गए अब संत भी चले जायेंगे तो हम क्या करेंगे । सब संत रोते हुए भगवान् को याद करने लगे ।

चोर भगवान् के मूर्ति लेकर एक खेत में आकर रुक गए और सोक्सहने लगे की यही विश्राम कर लेते है ,बाद में आगे बढ़ेंगे । चोर मूर्ति खेत में रख कर सो गए । संतो का दुःख ठाकुर से देखा नहीं गया, उन्होंने चोरो को स्वप्न में आदेश दिया की हमको वापस संतो के पास ले चलो।  तुमने मुझे दो तरह का दुःख दिया –  एक तो संत भूखे और हम भूखे और दूसरा हमको भक्तमाल कथा सुनने नहीं मिल रही अतः मैं तुम्हें चार प्रकार के दुःख दूँगा ।

चोर बहुत डर गए और कहने लगे – भाई  ! हम अभी बहुत दूर नहीं आये है ,ठाकुर जी को वापस ले चलो । ठाकुर जी का डोला सजाकर चोर लालदास जी के स्थान की ओर नाचते गाते कीर्तन करते चलने लगे । होडल के ही एक ब्राह्मणदेवता ने यह बात प्रियादास जी और संतो को बताई। समस्त संत ठाकुर आनंद में हरिनाम का कीर्तन करने लगे और ठाकुर जी का स्वागत करने चले गए ।

श्री प्रियादास जी के चरणों में दण्डवत् करके चोरो ने कहा कि अब तक हम चोरी करने के लिए साधु बने थे परंतु अब संतो के चरणों के दास बने रहेंगे ,अब सच्चे साधु बनेंगे ।

संतो की कृपा से हम चोरो ने भगवान् के स्वप्न में दर्शन किये , भगवान् को संत और भक्तमाल अति प्रिय है । हम अब संत सेवा में लगे रहना चाहते है । चोरो ने श्री पूज्य श्री लालदास जी महाराज की शरण ग्रहण कर ली और सब उनके शिष्य हो गए ।

३.श्री वैष्णवदास जी द्वारा भक्तमाल माहात्म्य का तीसरा इतिहास वर्णन : श्री भक्तमाल ग्रंथ के स्पर्श मात्र  से व्यापारी का उद्धार होना –
श्री वृन्दावन में एक दिन श्री प्रियादास जी भक्तमाल की कथा कह रहे थे । अलवर राजस्थान का एक वैश्य व्यापारी व्यक्ति श्री प्रियादास जी की भक्तमाल कथा श्रवण करने के लिए बैठ गया । उसको श्री भक्तमाल में वर्णित संत सेवा ,वैष्णव स्वरूप निष्ठा , धाम निष्ठा , नाम निष्ठा सुनकर अद्भुत आनंद हुआ ,उसकी संतो में और भक्तमाल ग्रन्थ में बहुत श्रद्धा हो गयी ।कथा समाप्ति पर श्री प्रियादास जी महाराज के पास वह  व्यापारी आया और प्रणाम् करके कहने लगा महाराज जी आप कृपा करके यह भक्तमाल ग्रन्थ हमें लिखवा कर दीजिए।

उस ज़माने में हाथ से पाण्डु लिपि लिख कर दी जाती थी ,उस समय छापखाने नहीं हुआ करते थे अतः संत महात्मा ही ग्रन्थ लिख कर देते थे ।  श्री प्रियादास जी ने उस व्यक्ति से पूछा – भाई क्या तुम्हे भक्तमाल की कथा सुनने का या पढ़ने का कुछ अभ्यास है ? अथवा क्या तुम्हे भक्तमाल का वक्ता होना है ? या कोई अन्य प्रयोजन है । वह व्यापारी व्यक्ति  कहने लगा -महाराज हमने तो पहली बार कथा सुनी है ।

हमें न पाठ करना है न किसी को यह कथा सुनना चाहते है क्योंकि हम तो व्यापारी है ,हमारे पास इतना समय भी नहीं है । प्रियादास जी ने कहा – जब तुम्हारे पास ग्रन्थ का उपयोग ही नहीं है तो क्यों हमसे इतना श्रम कराना चाहते हो ? तुम हमें सही उपयोग बताओ तो हम अवश्य तुम्हे ग्रन्थ लिख देंगे । उस व्यापारी ने कहा -महाराज मै घर के काम धंदे, स्त्री पुत्रो में उलझा हुआ हूँ ,साधू संग का अवसर नहीं है मेरे जीवन में ।

महाराज परंतु एक बात मै पक्की जानता हूँ की श्री  भक्तमाल में समस्त संत विराजते है ,इस बात पर मेरी दृढ निष्ठा है की जैसे भागवत् जी में श्री कृष्ण विराजमान है, श्री रामायण में श्री राघव जी विराजमान है वैसे ही भक्तमाल मे सब संत विराजमान है । मै अपने लड़को से कह दूंगा की जब हमारा अंत समय आएगा ,उस समय यह ग्रन्थ हमारे छाती पर पधर देना, इतने संतो की कृपा से मेरी मृत्यु सुधर जायेगी और यमदूतों की हिम्मत नहीं होगी की हमें नर्क ले जाएं । संतो के बल से हमको भगवान् के चरण कमल अवश्य प्राप्त होंगे ।

उसका भाब सुन कर प्रियादास जी के नेत्र भर आये ।श्री प्रियादास जी  ने कहा – तुमने भले ही भजन साधन न किया हो परंतु आपकी इस भक्तमाल ग्रन्थ पर अद्भुत निष्ठा है,मै आपको यह ग्रन्थ लिख कर देता हूँ तुम मरते समय इसे अपने हृदय (छाती )पर रख लेना, तुम साधुओं के बल से  इस भवसागर से उबर जाओगे ।

मरती बार हृदय पर धरिहौं, इतने साधुन संग उबरिहौं

वह बनिया व्यक्ति ग्रन्थ लेकर घर गया, पूजन करके एक वस्त्र में लपेट कर आले में रख दिया । अब न नित्य पूजन करता, न तुलसी फूल पधराता ,कुछ नहीं बस रखा रह गया और भूल गया । उसने अपने पुत्रो से कह रखा था – देखो जब हमारा अंत समय आएगा उस समय हमारे ह्रदय पर यह आले में राखी पुस्तक पधरा देना ,वृन्दावन के एक महात्मा से एक ग्रन्थ लिखवा कर हमने लाया है । देखते देखते मृत्यु का समय निकट आया । गले में कफ अटक गया । वह थोडा इशारा करके पुत्रो से कुछ कहने लगा ।

पुत्र समझ गए की पिताजी ने अंत समय में आले में रखे ग्रन्थ को ह्रदय पर रखने को कहा था । पुत्रो ने ऐसा ही किया  और जैसे ही ग्रन्थ ह्रदय पर स्पर्श हुआ  उसका कंठ खुल गया और वह मुख से हरे कृष्ण गोविन्द नाम का उच्चारण करने लगा । पहले उसे भयंकर यमदूत दिख रहे  आने लगे पर जैसे ही पोथी उसकी छाती पर रखी गयी वैसे ही सारे यमदूत वहाँ से चले गए । पुत्रो ने पिता से पूछा – पिताजी !पहले तो आप को देख के लगता था आप बहुत कष्ट में है परंतु अब आप बहुत प्रसन्न होकर भगवान् का नाम जप कर रहे है । लगता है कोई आश्चर्य घटना घटित हुई है ।

उसने कहा मुझे भयंकर यमदूत पीड़ा पंहुचा रहे थे परंतु तुम लोगो ने जैसे ही पोथी छाती पर रखी तब वे भाग गए । अब हमें संतो का दर्शन हो रहा है ,हमको श्री  नामदेव ,श्री रैदास ,श्री सेना, श्री धन्ना ,श्री पीपा, श्री कबीर जी, श्री तुलसीदास जी आकाश में खड़े हैं । वे हमें अपने साथ भगवान् के धाम चलने को कह रहे है  सो अब मै भगवान् के धाम जा रहा हूं । तुम मेरे जाने पर दुःख मत करना और यह नियम बना लेना की इस परिवार में किसीकी भी मृत्यु निकट आए , यह भक्तमाल ग्रन्थ उसके हृदय पर पधर दिया जाए । वह भगवान् का नाम उच्चारण करते करते संतो के साथ भगवान् के नित्य धाम को चला गया ।

श्री वैष्णवदास जी कहते हैं – जिस परिवार के यह व्यक्ति थे उनके सब संबंधी हमारे पास आये और उन्होंने हमें यह घटना सुनायी है अब और कितनी महिमा गाऊं इसकी महिमा तो अनंत है । उस परिवार के सदस्यों ने भक्तमाल कि कथा भी करवाई । श्री भक्तमाल की केवल पोथी को घर में रखना भी संत शुभ मानते है ।

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इस चरित्र से यह बात सोलह आना सिद्ध होती है की भक्तमाल में सम्पूर्ण संतो का निवास है और यह कोई सामान्य ग्रंथ नहीं है ।बहुत से संत कंठ में श्री भक्तमाल जी का मूल पाठ तावीज़ में बंद कर के निष्ठा से धारण करते है ।

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नरसी मेहता जी

गुजरात के जूनागढ़ में एक नरसी मेहता नाम के कृष्ण भगवान के एक अनन्य भक्त थे। किसी समय नरसी मेहता की बहुत बड़ी सी हवेली और जिमीदारी हुआ करती थी। इन की 2 बेटियां थी। एक बेटी का विवाह हो चुका था। और इनकी दूसरी बेटी इनके साथ रहती थी। और उस बेटी ने भी अपने आप को कृष्ण भगवान की भक्ति में लगाया हुआ था। नरसी मेहता जी का एक सारंग नाम का भाई था। जो जिमीदार भी था और मुगल सम्राट हुमायूं के समय पुलिस में बड़ा ऑफिसर था ।नरसी मेहता जी की सारी जिमीदारी चली गई थी। और वह बड़ा गरीबी का जीवन जीते थे। एक बार उनकी बड़ी बेटी कुंवर सेन के यहां उसकी छोटी बेटी का रिश्ता हो गया। कुंवर सेन के ससुराल वाले धन के नशे में चूर थे । उन्हें धन का बहुत अहंकार था । उन्होंने भात के लिए एक लंबी सी लिस्ट तैयार की। और कुंवर सेन को कहा- तुम्हारे घर से यह भात आना चाहिए। हमारी भी इज्जत का सवाल है।

पहले के जमाने में विवाह की पत्रिका लेकर नाई जाता था। अब एक नाई जूनागढ़ के लिए रवाना हुआ। उसने वहां जाकर पूछा -नरसी मेहता जी की हवेली कहां है? एक व्यक्ति ने मंदिर की तरफ इशारा करके कहा- आपको नरसी मेहता जी वही मिलेंगे। जब उस नाई ने नरसी मेहता जी को देखा तो मन ही मन सोचने लगा। यह मेरी क्या खातिरदारी करेगा ?क्योंकि यह तो खुद ही फटे हाल है। उस समय पत्रिका लाने वाले नाईयों की खूब आवभगत की जाती थी । नरसी मेहता जी ने नाई को ठंडा पानी पिलाया और कहा- आप बैठिए मैं कुछ भोजन की व्यवस्था करता हूं ।

उधर उनकी बेटी कुंवर सेन अपने भाग्य को रो रही थी और गोविंद को कह रही थी। मेरे पिताजी की लाज बचाओ । उधर उनकी दूसरी बेटी ने विवाह की पत्रिका गोविंद के चरणों में डाल दी। गोविंद अब तुम्हें ही यह सारी व्यवस्था करनी है। उधर नरसी मेहता जी अपने भाई सांरग के घर पहुंचे। और उन्होंने कहा- बेटी के घर विवाह है। नाई पत्रिका लेकर आया है। कुछ मदद हो जाती तो अच्छा था । उनके भाई सारंग ने उन को लात मारकर भगा दिया और कहा- सारा दिन द्वारिकाधीश द्वारिकाधीश करता है ।आप बुलाओ ना अपने द्वारिकाधीश को। और नरसी मेहता को वहां से भगा दिया। अब नरसी मेहता अपने एक मित्र किसान के खेत में पहुंचा वहां जाकर बथुए का साग तोड़ा उसके घर पर ही उबाल लिया और उसमें नमक मिलाकर नाई के लिए तैयार करने लगे।

उधर भगवान समझ गए। आज नरसी मेहता को मेरी जरूरत है। कृष्ण भगवान मुनीम का वेश बनाकर मंदिर में बैठे नाई के पास पहुंचे और उनके हाथ में एक बड़ा सा थाल भोजन का था। उन्होंने नाई को कहा- मैं नरसी मेहता जी का मुनीम हूं। उनको कोई जरूरी काम आन पड़ा है। उन्होंने आपके लिए छप्पन भोग भिजवाया है। आप भोजन कीजिए । नाई ने अपनी जिंदगी में ऐसा अलौकिक भोजन कभी नहीं किया था। वह बहुत प्रसन्न हुआ। अब कृष्ण भगवान ने 1000 सोने की मोहरों का भरा हुआ पर्स उस नाई को दक्षिणा सवरूप दिया और कहा- बेटी को बोलिए विवाह की तैयारी करो। हम समय पर भात लेकर पहुंच जाएंगे। अब भगवान तो भोजन का खाली थाल लेकर अंतर्ध्यान हो गए। तभी नरसी मेहता जी आए उन्होंने नाई को कहा- आइए साग का भोजन कीजिए । नाई ने मना कर दिया कि मेरा पेट भरा हुआ है। नरसी मेहता जी ने सोचा नाई मेरे ऊपर व्यंग्य कर रहा है। परंतु जब उसने सोने की मोहरों का पर्स दिखाया तब नरसी मेहता जी समझ गए। आज गोविंद अपने आप आए थे ।

नरसी मेहता जी बेटी के यहां जाने लगे तो जूनागढ़ में अंधे साधुओं का एक अखाड़ा था। नरसी मेहता जी सारा दिन संतो के बीच में रहते थे ।उन्होंने 16 संतो को बेटी के यहां जाने के लिए तैयार कर लिया उसने सोचा संतों के आशीर्वाद से बढ़कर और क्या भात हो सकता है। नरसी मेहता जी ने अपने किसान मित्र से एक टूटी फूटी बैलगाड़ी चार-पांच दिन के लिए उधार मांग ली और उस बैलगाड़ी में उन 16 अंधे साधुओं को बिठा लिया। जब वह जूनागढ़ से बाहर आए तभी उनकी गाड़ी एक गड्ढे में चली गई और उसका पहिया निकल गया सारे साधु नीचे गिर गए। बड़ी कोशिश की ना तो वह गाड़ी ठीक हुई नाही वह गाड़ी गड्ढे से बाहर आई। नरसी मेहता जी ने फिर भगवान को पुकारा- हे! भगवान इस गरीब की इतनी परीक्षा क्यों है। इतने में ही भगवान एक बढ़ई का रूप बनाकर वहां प्रगट हो गए उन्होंने नरसी मेहता जी की गाड़ी को दोबारा बना दिया और नरसी मेहता जी को कहा- मुझे भी उस गांव तक जाना है। मुझे अपनी बैलगाड़ी में जगह दे दो। मैं तुम्हारी गाड़ी भी हांक दूंगा। अब भगवान नरसी मेहता जी की बैलगाड़ी हांकने लगे। अब भगवान ने गाड़ी ठीक करने की अपनी मजदूरी मांगी। नरसी मेहता जी ने कहाकहा- हम तो साधु संत हैं हमारे पास कोई पैसे नहीं है हम सब आपको दिहाडी के रूप में भजन सुना देते हैं। भगवान भी अपने भक्तों का भजन सुनना चाहते थे । क्योंकि उस दिन नरसी मेहता उन्हें बेटी के यहां जाने की जल्दी में भजन नहीं सुना सके। अब सारे साधुओं ने अपनी सारंगी उठाई और नरसी मेहता जी भजन गाने लगे।

जब नरसी मेहता जी अपनी बेटी के गांव पहुंचे तो उस बढ़ई ने कहा- क्या मैं भी आपकी बेटी के भात में शामिल हो सकता हूं? नरसी मेहता जी ने कहा- इससे अच्छी बात और क्या होगी । बड़ई ने कहा- मैं अपनी पत्नी को लेकर भात के समय पहुंच जाऊंगा। जब नरसी मेहता जी बेटी के यहां पहुंचे। अंधे साधुओं को साथ में देखकर उसके बेटी के ससुराल वालों ने बुरा मूंह बना लिया और उनकी कोई आवभगत नहीं की। बेटी के ससुराल वाले पिता का बार-बार अपमान कर रहे थे। बेटी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। अब नरसी मेहता जी समझ गए ।यह लोग सब धन के नशे में चूर हैं । और इन लोगों को इंसानियत नहीं धन चाहिए। वह फिर गोविंद को पुकारने लगे- हे! गोविंद मेरी बिगड़ी बना दो नंदलाल ।मेरी बिगड़ी बना दो नंदलाल।तभी

वह बढ़ई अपनी पत्नी समेत गाड़ी भर कर भात के लिए लाया। उन्होंने नरसी मेहता जी को कहा- भात के लिए समान आ गया है ।अब तो नरसी मेहता जी समझ गए यही गोविंद है। उन्होंने प्रभु को कहा -प्रभु मुझे दर्शन दीजिए । अब तो गोविंद ने उन्हें लक्ष्मी और नारायण के रूप में दर्शन दिए और कहा- अपने भक्तों की इज्जत बचाने के लिए भगवान कभी देर नहीं करते। देर सिर्फ उनके पुकारने में होती है। आप भात भरने की तैयारी कीजिए और बेटी के ससुराल वालों की समान की लिस्ट के हिसाब से भात भरा जाएगा। पर आप किसी को यह मत बताना कि लक्ष्मी नारायण बेटी का भात भरने आए हैं। आप कहना- यह मेरा मुनीम और उसकी पत्नी है।

अब रात को 10:00 बजे भात भरने की तैयारी शुरू हुई और जितनी ससुराल वालों ने एक एक चीज की लिस्ट भेजी थी ।उससे कई गुना करके भगवान ने उनका भात भरा। राशन की बोरियां की बोरियां थी। सोने ,चांदी हीरे ,जवा राहत इस भात में सब कुछ था । कुंवर सेन की सास को जो कुछ भात में दिया गया बिल्कुल वैसे ही घर के नौकर चाकारो को भी दिया गया। कपड़े और हीरे जवाहरात सब था। रात के 10:00 बजे से भात भरना शुरू हुआ। सुबह 4:00 बजे तक भगवान ने भात भरा। कुंवर सेन भी समझ गई । यह लक्ष्मीनारायण है । आज जो मेरे भाई भाभी बनकर आए हैं। भगवान ने कुंवर सेंन को दर्शन दिए और चुप रहने के लिए कहा । 4:00 बजे भगवान ने नरसी मेहता जी को वापस चलने का आदेश दिया ।भगवान 4:00 बजे नरसी मेहता जी को गाड़ी में बिठा कर अंतर्ध्यान हो गए और रास्ते में भी थोड़े बहुत हीरे मोती बिखरे पड़े थे। जो नौकर चाकर उस भात में शामिल ना हो सके उन्होंने भी वह रास्ते में पड़े हुए हीरे मोती उठाए ।ऐसा भात देखकर बेटी के ससुराल वाले भी दंग रह गए ।लेकिन यह कृपा भगवान सिर्फ उन पर करते हैं। जो बड़े निर्मल हृदय से भगवान को चाहते हैं । यह वह भक्त होते है। जिन्होंने अपना पूरा जीवन बिना किसी कामना के भगवान की भक्ति में लगा रखा होता है। भगवान भी जानते हैं अपने भक्तों को किस समय क्या देना है। यह भक्त और भगवान का प्रेम है
जय जय श्री राधे

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श्री हरिवंश महाप्रभु जीवन परिचय

हित हरिवंश  महाप्रभु जी के माता पिता का नाम व जन्म स्थान ?

माता का नाम – श्रीमती तारा रानी
पिता का नाम – पं. व्यास मिश्र जी
निवास : सहारनपुर ज़िले के देववन्द गाव के कश्यप गौत्र के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे .



श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के जन्म की कथा


सबसे पहले जानते है हितहरिवंश जी के पिता जी के बारे में :

श्री व्यास जी विद्वानों के प्रकांड विद्वान थे |ये ज्योतिषाचार्य भी थे |इन्हें बहुत सारे वेदों का भी ज्ञान था ,जिससे इनकी ख्याति दिनों दिन फ़ैल गयी |इस कारण देववृन्द का और भी महत्व बढ़ गया |इनकी ख्याति तत्कालीन बादशाह तक पहुची तो बादशाह ने आदर सहित इनको अपने दरबार बुला लिया |राजा इनके सत्संग से बहुत प्रसन्न हुए और इनको अपने दरबार में रख लिया तथा इन्हें चार हजारी मनसब भी प्रदान की |कुछ समय राजदरबार में रहने के बाद व्यास जी अपने निज स्थान देववृन्द आ गए | श्री व्यास जी धन धान्य से भरपूर सब शास्त्रों के ज्ञाता रहे| धर्म शीलता तो मानो इनमे कूट कूट कर भरी थी | उनके पास सब कुछ था ! बस सिर्फ एक ही चीज की कमी थी वो था संतान का सुख , व्यास जी तारा रानी अपनी किस्मत को इसका कारण समझते थे पर ताराजी का मानना था की व्यास जी लोगो की किस्मत पढ़ते है किस्मत बदलते है, तो फिर हमारा भाग्य क्यों ऐसा है, वो हर दिन ऐसा ही सोचते रहते थे

एक दिन एक संत वहाँ से गुजर रहे थे व्यास जी तारा रानी जी ने संत को सादर से मखमली आसन पर विठाया पखारे सेवा की भोजन कराया उसके बाद वो संत के पास बैठे ताकि कुछ वचनों का आनद ले सके वो ताराजी जी देख कर बोले की आपके पास इतना सब कुछ तो है फिर अब किस बात की कमी है आपके इस उदासी का क्या कारण है तो व्यास जी बताते है की किस्मत में बस संतान की कमी है गोद सूनी है तो संत बोलते है ये तो भाग्य की बात है !

तभी तारा रानी बोल उठी ‘ जब सब भाग्य किस्मत पर ही निर्भर है तो फिर संतो की क्या महिमा और फिर तो सर्वोपरि भाग्य को ही होना चाहिए भगवान को नहीं’ ये बात तारा रानी की ममता उससे बुलवा रही थी ! तभी संत ने उपदेश दे दिया की आपकी कोख से साधारण बच्चे का जन्म नहीं उनका जन्म होगा जो तीनो लोको के स्वामी है वो श्री राधे कृष्णा के बंसी के अवतार होगे ! इस बात से व्संयास जी तारा जी बहुत ही प्रफुलित हो गये और वहाँ से चले गये पर संत की बात कभी भी झूठी नहीं हो सकती थे तो उन्होंने उनका वचन स्वीकार किया ! ये उनका कितने जन्मो का फल था ! उन्होंने बहुत भक्तो की सेवा कप्रभु के आगमन की प्रतीक्षा का आनंद लेने लगे उनकी कृपा से ही ये संबभ हो पाया.

( इन संत के बारे में : व्यास जी 9 भाई थे उनमे से सबसे बड़े भाई थे नर्सिंआश्राम जी ये नरशिंह भगवान के परम भक्जित थे उन्होंने कुछ समय पहले ही सन्यास लिया था ये वही थे )

तारारानी का पूर्ण समय भजन पूजा में ही बीतता था अचानक से उनके मन में पता नहीं कहा से पर वृन्दावन जाने की लालसा होने लगती है वो इस बारे में व्यास जी के बात करती है उन्होंने समझाया की इस समय जाना उचित नहीं है पर वो इच्छा के आगे व्यास जी की भी नहीं चली और वैद लोगो ने भी बोला की इस समय तो जो इच्छा हो वो तो पूरी करनी ही पड़ेगी !

तारारानी व्यास जी के साथ काफिला वृन्दावन की और निकल पड़ा ! काफी समय चलते चलते वो मथुरा में प्रवेश करते है दशमी का दिन था रात्री हो गयी थी तारारानी ने अपने मस्तक पर रज लगाई मथुरा में एक स्थान का नाम है ‘ वाद ‘ गाव. उनका काफिला वहा रुकता है ! वहाँ पर उनके आगमन भर से प्रकति जैसे खिल उठी हो मोर नाचने लगे प्रकति जैसे उनके ही स्वागत में हो ! फिर व्यास जी चिंचित होने लगे क्योकि प्रसव का समय निकट था ! वहाँ के लोग बोलते है बड़ा ही आश्चर्य की बात है पहली बार वातावरण ऐसा हो गया जैसे की आनद ही आनंद हो गया नाचने का मन होने लगा ! व्यास जी उनसे सहयोग मांगते है की प्रसव का समय है !


श्री हरिवंश जी का जन्म विक्रम संवत् 1559 में वैशाख शुक्ला एकादशी, सोमवार को प्रातः सूर्योदयकाल में हुआ था 

उस दिन मोहिनी एकादशी है जिनका जन्म व्रज भूमि पर होता है ( केवल यही एक ऐसे आचार्य है जिनका जन्म व्रज धाम पर हुआ ) जो की ठाकुर जी के बंसी का प्राकट्य है !

सभी व्रज वासी ऐसे झूमे नाचे की अपने बच्चे के जन्म पर भी नहीं नाचे ! पुरे व्रज के लोग कितना आनंद लुटने में व्यस्त थे बच्चे बुठे सब बधाई गाने लगे ! बहुत ही अध्बुध दर्शय होता है ! वो फिर अपने गाव देववन्द आ जाते है ! और वहाँ भी बहुत बड़ा उत्सव करते है !

5 दिन हो जाते है, वहाँ नर्शिंग जी आ जाते है वो सबसे पहले हरिवश जी की 7 परिकर्मा करते है व्यास जी उनसे अनुरोध करते है की इनका नामकरण भी आप ही करे व्यास जी द्वारा जन्म कुंडली बना तो लेते है पर वो पूरी तरह कृष्ण जी की थी

फिर नरशी जी उनका नाम हरिवंश रखते है ( हरि के वंश है वो इसलिए उनका नाम रखा गया )
कोई हरिवंश जी के सामने राधा नाम लेता है तो वो किलकारी मारने लगता है !


हित हरिवंश महाप्रभु जी के बचपन के पल


प्रसंग 1

हितहरिवंश महाप्रभु जी 4-5 साल के थे तब का एक प्रसंग बताते है , एक दिन वो जल्दी उठ गये और उस समय उनकी मैया ने ठाकुर सेवा भी नहीं की थी और मंदिर के पट भी बंद थे वो उठे और बोलते है मुझे चरणामृत दो तो वो रोने लग गये माने ही नहीं तो उनकी माँ ने उनको पानी में ही चन्दन डाल कर दे दिया बोली रो मत ये लो चरणामृत है वो बोले चरणामृत नहीं है, और दिन तो इनमे राधा माधव के चरणों की सुघंद आती थी पर इसमें नहीं आ रही है !

तब उनके माता पिता चकित रह जाते है हम पुरे जीवन में ये बात नहीं जान पाए और ये अभी इस उम्र में इस अवस्था में है इसे ही बोलते है अनन्य भक्त !

प्रसंग 2

एक बार श्रीहित उन्होंने दो बालकों का राधा और मोहन के रूप में श्रृंगार किया फिर कुछ देर बाद श्रृंगार बदल कर राधा को मोहन और मोहन को राधा का श्रृंगार धारण करा दिया । अंदर घर में इनके पिता व्यासजी अपने आराध्य श्रीराधाकान्त का श्रृंगार कर उनकी छवि निहार रहे थे। तभी अचानक वे चौंक पड़े। उन्होंने श्रीराधा को श्रीकृष्ण वृद्धावस्था के कारण उन्हें भ्रम हुआ होगा परन्तु तुरन्त ही वह श्रृंगार अपने-आप बदलने लगा।

वह घबराकर बाहर आए तो देखते है कि बगीचे में श्री हित हरिवंश अपने सखाओं के साथ राधा और कृष्ण का श्रृंगार बदलने का खेल खेल रहा है उनको आभास हो गया कि निश्चय ही कोई असाधारण महापुरुष उनके घर प्रकट हुआ है।

प्रसंग 3

एक दिन इनके पिता व्यासजी ने ठाकुरजी के सामने लड्डुओं का भोग रखा और आँखें बंद कर भोग मन्त्र बोलने लगे। जब उन्होंने आंखे खोली तो देखते हैं कि भोग के थाल में फलों के दोने रखे हैं। उन्हें पुरानी घटना याद आ गयी । उन्होंने बाहर आकर देखा कि बालक श्रीहित हरिवंश ने बगीचे में दो वृक्षों को नीली-पीली पुष्पमाला पहनाकर राधा कृष्ण का स्वरूप बनाया है ओर उनके सामने फलों का भाग रखा है

प्रसंग 4

एक बार उनके मन मे विचार आता है कि ये ठाकुर जी तो मेरे माता पिता के है वो अपनी मर्जी से सृंगार भोग सेवा करते है हमारे भी अपने ठाकुर होने चाहिए तो एक दिन पांच वर्ष की आयु में श्रीहित हित हरिवंश जी को ठाकुर जी ने सूचना दी कि हमारे विग्रह बगीचे के सूखे कुएं में है इतना जाना और वो तो कुँए में कूद गए ।

यह देखकर माता-पिता और कुटुम्बीजन अत्यन्त व्याकुल हो उठे। तभी लोगों ने देखा कि कुएं में एक दिव्य प्रकाश फेल गया है और बालक श्री हित हरिवंश श्याम सुंदर की एक सुन्दर मूर्ति को अपने कर कमलों में सम्हाले हुए अपने-आप कुएं से ऊपर उठते चले आ रहा है। उनके ऊपर पहुंचते ही कुंआ मीठे जल से भर गया ।

ठाकुर जी को लाकर राजमहल में पधराया गया और श्रीहित हरिवंशजी के पिता जी ने उनका नाम रखा- श्रीनवरंगीलाल ( क्योकि वो रोज नई नई लीला करते है ) और उनकी पूजा सेवा बड़े प्रेम से करने लगे। आज भी देववन्द में श्रीराधनावरंगी लाल जी के दर्शन कर सकते है बिल्कुल राधावल्लभजी जैसे है बस उनसे थोड़े छोटे है पर बहुत ही अधबुद्ध है ।


हित हरिवंश  महाप्रभु जी 16 वर्ष में


अब व्यास जी को विवाह की चिंता हुई तो महाप्रभु जी का विवाह रुक्मणी जी से हुआ । उन्होंने उनकी भक्ति को आगे ही बढ़ाया । उनकी माता तरारानी और उनके पिता जी व्यास जी की इच्छा थी कि वो राधामाधव जी का दर्शन करें तो जीवन धन्य हो जाये तो उनको भी हरिवंशजी ने ठाकुर जी के प्रत्यक्ष दर्शन कराए !! फिर पहले माता का फिर पिता का शरीर पूरा हो जाता है ! श्री हरिवंशजी की माता तारारानी का निकुंजगमन संवत् 1589 में तथा पिता श्री व्यास मिश्र संवत् 1590 में हुआ !


श्रीमती रुकिमणी देवी से इनके एक पुत्री और तीन पुत्र उत्पन्न हुए !

ज्येष्ठ पुत्र श्रीवनचन्द्रजी संवत् 1585

द्वितीय पुत्र श्रीकृष्णचन्द्र संवत् 1587

तृतीय पुत्र श्री गोपीनाथजी संवत् 1588

पुत्री साहिब दे संवत् 1589


माता पिता की मृत्यु के उपरांत श्री हरिवंशजी को श्री जी ने सपने में आकर आदेश दिया कि किसी प्रकार भगवान् की लीलास्थली में जाकर वहाँ की रसमयी भक्तिपद्धति में लीन होकर जीवन सफल करें | उन्होंने साथ चलने के लिए बोला पर उनकी पत्नी ने बोला भी वो वहाँ कैसे रहेगी वहाँ तो खतरनाक जंगल है और बच्चे भी छोटे थे और उनके 4 सखा थे जो उनके अलावा किसी के साथ जीवन की नहीं सोच सकते थे महाप्रभु जी ने उनको साथ आने से काफी मना किया पर वो नहीं माने तो फिर वो भी साथ में उनके चल पड़ते है

वो भजन करते करते पैदल निकल जाते है । रास्ते मे प्रेम बाँटते जाते है रास्ते मे एक शेर लेता होता है पर हरिवंशजी को सुध नही होती है उनका पैर उस के उप्पर पड़ गया था तो शेर खड़ा हो गया तब हरिवंशजी उनकी ठोड़ी ( Chin ) पकड़ कर बोलते है भाई हरि बोल हरि बोल । उतने में शेर में भी कृष्ण प्रेम का संचार हो जाता है। शेर के साथ हरिवंशजी खूब नाचे ।

उनके एक चरण को शेर चाट रहे है एक हो हिरण ।। वहाँ के वातावरण में बस हरि बोल हरि बोल गूँजता है । थोड़ी दूर जाकर वो एक सरोवर में जाकर स्नान करते है और उसी में जंगली हाथी भी स्नान कर रहे होते है हरिवंशजी ने कुछ छीटे उन पर भी डाले और बोले हरि बोल । पूरे जंगल मे आनंद हो गया ।

चरथावल में आत्मदेव नामक ब्राह्मण के यहां ठाकुर श्रीराधाबल्लभजी विराजमान थे। आत्मदेव को श्री राधा जी ने स्वप्न में आज्ञा दी कि अपनी दोनों पुत्रियों ( कृष्णदासी एवं मनोहरी ) का विवाह श्रीहित हरिवंशजी से कर दो और दहेज में मुझे दे देना । यही सपना श्री जी का हरिवंश जी को भी आया । आत्मदेव ने श्री राधा जी की आज्ञा बताकर श्रीहित हरिवंशजी को ठाकुर श्री राम बल्लभ जी दे दिए और अपनी पुत्रियों का विवाह उनसे कर दिया। चथड़ावल गांव में ही उनकी शादी हुई ।


राधावल्लभ जी रस मूर्ति आत्मदेव को कहा से मिली ??


राधावल्लभ जी शिव शंकर जी द्वारा दिये गये जो कि आत्मदेव द्वारा भक्ति से एवं श्री जी की आज्ञा से राधावल्लभजी आत्म देव जी को दिए । आत्मदेव जी के सामने जब शिव जी प्रकट हुए तब उन्होंने कुछ मांगने को बोला तो आत्मदेव जी ने बस इतना ही बोला की जो आपको सबसे प्रिय है वो ही देदो तो उन्होंने स्मरण किया की सबसे ज्यादा तो हम राधावल्लभ जी को ही प्रेम करते है तो ठाकुर जी की आज्ञा से वो रस मूर्ति आत्मदेव जी को दे दी एवम् काफी साल आत्मदेव जी ने उनकी पूजा की प्रेम किया और निश्चय किया की हम इनको उसी को देगे जो हमारी पुत्रियों से विवाह करेगे ! वही राधावल्लभ जी हरिवंश को मिले और जिस गांव से वो गुजरते थे उसी गांव में उत्सव होता है । 2 महीने में जाकर वो वृंदावन पहुचते है और सबसे पहले यमुना जी का दर्शन करते है ।
मदनटेर नाम की जगह पर वो रुके और विराजमान हुये वहाँ व्रजवासी आये और पहले तीर छोड़ा जाता था जहाँ तीर गिरता था वही तक उनको जमीन दे दी गयी थी जहां तीर गिरता है पहले इस जगह का नाम तीर घाट था फिर बाद में चीर घाट हुआ वो सारी जमीन हरिवंशजी को दे दी गयी थी । फिर सेवा कुँज में ठाकुर जी विराजमान हुये । श्री हरिवंश जी पहले आचार्य थे जो परिवार के साथ आये और रहे ।


“ हम श्री राधा महारानी जू के बल अभिमानी, किशोरी अली निवास हमारो, श्री वृन्दावन रजधानी ” – श्री अली किशोरी


हम सदा ही श्री किशोरी जी के बल के अभिमानी हैं। हमारा मन सदैव प्रिय प्रियतम के निज महल वृन्दावन में रहता है, जो कि रसिक संतों और युगल सरकार की राजधानी है।

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संत श्री बिहारीदास जी




एक रसिक संत हुए श्री बिहारीदास जी। मथुरा की सीमा पर ही भरतपुर वाले रास्ते पर कुटिया बनाकर भजन करते थे।
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एक दिन पास ही के खेत मे शौच करने चले गए। उस दिन खेत के मालिक को कुछ आवाज आयी तो जाकर बाबा को खूब मुक्के मार कर पीट दिया…
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और शोर करके अपने कुछ सखाओ को भी बुलाया। उन्होंने लंबी लकड़ियां और डंडा लेकर बाबा को पीटना शुरू किया तो बाबा के मुख से बार बार निकलने लगा..
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हे प्रियतम, हे गोकुलचंद्र, हे गोपीनाथ !!
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सबने मारना बंद किया, थोड़ी देर मे सुबह हुई तो देखा कि यह कोई चोर नही है, यह तो पास ही भजन करने वाला महात्मा है।
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आस पास के लोग जमा हुए और उन्होंने पुलिस को बुलाया।
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पुलिस ने आकर बाबा को गाड़ी में डाला और दवाखाने मे भर्ती करवाया। डॉक्टर ने दावा करके पट्टियां बांध दी।
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इसके बाद पुलिस इंसेक्टर ने पूछा, बता बाबा ! क्या घटना हुई है ?
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बाबा बोले मै शौच को गया था उसी समय कन्हैया वहां आ गयो ! उसने खूब मुक्के चलाये।
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वो कन्हैया खुद बहुत बड़ा चोर है फिर भी उसने अपने सखाओ को बुलाकर कहा, की खेत मे चोर घुस गया है।
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सखाओ ने छड़ी और लाठियों से पिटाई करी। बाद में कन्हैया ने पुलिस को बुलवाया और दवाखाने मे भर्ती कराया।
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फिर वही कन्हैया ने डॉक्टर बनकर इलाज किया और अब वही कन्हैया इंस्पेक्टर बनकर मुझसे पूछता है की तेरे साथ क्या घटना हुई ?
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सबने कहां की बाबा तो अटपटी सी बाते करता है, इनको कुछ दिन आराम की आवश्यता है।
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उसी रात बाबा भाव मे डूबकर हरिनाम कर रहे थे तब उनके सामने नीला प्रकाश प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण सहित समस्त सखाओ का दर्शन उनको हुआ।
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भगवान ने कहा, बाबा ! ब्रज वासियो के प्रति तुम्हारी भक्ति देखकर मै प्रसन्न हूँ। तुमने ब्रजवासियो को दोष नही दिया और सबमे मेरे ही दर्शन किए।
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भगवान ने अपना हाथ बाबा के शरीर पर फेरकर उन्हें ठीक कर दिया।
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भगवान ने कहा तुम्हे जो माँगना है मांग लो। बाबा ने संतो का संग और भक्ति का ही वरदान मांगा।
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इस घटना से शिक्षा मिलती है की रसिक संतो की तरह सभी मे श्रीभगवान का ही दर्शन करना है और धाम वासियों को भगवान के अपने जन मानकर उनमे श्रद्धा रखनी चाहिए।

जय जय श्री राधे

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संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी





संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधाकुंड गोवर्धन मे रहकर नित्य भजन करते थे।
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नित्य प्रभु को १००० दंडवत प्रणाम, २००० वैष्णवों को दंडवत प्रणाम और १ लाख हरिनाम करने का नियम था।
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भिक्षा मे केवल एक बार एक दोना छांछ (मठा) ब्रजवासियों के यहां से मांगकर पाते।
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एक दिन बाबा श्री राधा कृष्ण की मानसी सेवा कर रहे थे और उन्होंने ठाकुर जी से पूछा कि प्यारे आज क्या भोग लगाने की इच्छा है ?
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ठाकुर जी ने कहां बाबा ! आज खीर पाने की इच्छा है, बढ़िया खीर बना।
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बाबा ने बढ़िया दूध औटाकर मेवा डालकर रबड़ी जैसी खीर बनाई। ठाकुर जी खीर पाकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा..
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बाबा ! हमे तो लगता था कि तू केवल छांछ पीने वाला बाबा है, तू कहां खीर बनाना जानता होगा ? परंतु तुझे तो बहुत सुंदर खीर बनानी आती है।
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इतनी अच्छी खीर तो हमने आज तक नही पायी, बाबा ! तू थोड़ी खीर पीकर तो देख।
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बाबा बोले, हमको तो छांछ पीकर भजन करने की आदत है और आँत ऐसी हो गयी कि इतना गरिष्ट भोजन अब पचेगा नही, आप ही पीओ।
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ठाकुर जी बोले, बाबा ! अब हमारी इतनी भी बात नही मानेगा क्या?
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बातों बातों में ठाकुर जी ने खीर का कटोरा बाबा के मुख से लगा दिया।
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भगवान के प्रेमाग्रह के कारण और उनके अधरों से लगने के कारण वह खीर अत्यंत स्वादिष्ट लगी और बाबा थोड़ी अधिक खीर खा गए।
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मानसी सेवा समाप्त होने पर ठाकुर जी तो चले गए गौ चराने और बाबा पड़ गए ज्वर (बुखार) से बीमार।
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ब्रजवासियों मे हल्ला मच गया कि हमारा बाबा तो बीमार हो गया है।
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बात जब जातिपुरा (श्रीनाथ मंदिर) मे श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने वैद्य से कहाँ की जाकर श्री रघुनाथ दास जी का उपचार करो, वे हमारे ब्रज के महान रसिक संत है।
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वैद्य जी ने बाबा की नाड़ी देख कर बताया कि बाबा ने तो खीर खायी है।
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ब्रजवासी वैद्य से कहने लगे, २० वर्षो से तो नित्य हम बाबा को देखते आ रहे है, ये बाबा तो ब्रजवासियों के घरों से एक दोना छांछ पीकर भजन करता है।
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बाबा कही आता जाता तो है नही, खीर खाने काहाँ चला गया?
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ब्रजवासी वैद्य से लड़ने लगे और कहने लगे कि तुम कैसे वैद्य हो, तुम्हें तो कुछ नही आता है।
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वैद्य जी बोले, मै अभी एक औषधि देता हूं जिससे वमन हो जाएगा (उल्टी होगी) और पेट मे जो भी है वह बाहर आएगा।
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यदि खीर नही निकली तो मैं अपने आयुर्वेद के सारे ग्रंथ यमुना जी मे प्रवाहित करके उपचार करना छोड़ दूंगा।
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ब्रजवासी बोले, ठीक है औषधि का प्रयोग करो। बाबा ने जैसे ही औषधि खायी वैसे वमन हो गया और खीर बाहर निकली।
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ब्रजवासी पूछने लगे, बाबा ! तूने खीर कब खायी? बाबा तू तो छांछ के अतिरिक्त कुछ पाता नही है, खीर कहां से पायी?
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रघुनाथ दास जी कुछ बोले नही क्योंकि वे अपनी उपासना को प्रकट नही करना चाहते थे अतः उन्होंने इस रहस्य को गुप्त रहने दिया और मौन रहे।
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आस पास के जो ब्रजवासी वहां आए थे वो घर चले गए परंतु उनमे बाबा के प्रति विश्वास कम हो गया…
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सब तरफ बात फैलने लगी कि बाबा तो छुपकर खीर खाता होगा।
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श्रीनाथ जी ने श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी को सारी बात बतायी और कहां की आप जाकर ब्रजवासियों के मन की शंका को दूर करो – कहीं ब्रजवासियों द्वारा संत अपराध ना हो जाए।
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श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी ने ब्रजवासियों से कहां की श्री रघुनाथ दास जी परमसिद्ध संत है।
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वे तो दीनता की मूर्ति है, बाबा अपने भजन को गुप्त रखना चाहते है अतः वे कुछ बोलेंगे नही।
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उन्होंने जो खीर खायी वो इस बाह्य जगत में नही, वह तो मानसी सेवा के भावराज्य में ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें खिलायी है।
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धन्य है ऐसे महान संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी

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संत श्री बिहारिन देव जी

बिहारी जी की मंगला आरती

श्री बिहारिन देव जी महाराज वृंदावन के हरिदासी सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है । श्री विट्ठल विपुल देव जी से विरक्त वेश प्राप्त करके भजन मे लग गए । श्री गुरुदेव के निकुंज पधारने के बाद बांकेबिहारी लाल जी की सेवा का भार बिहारिन देव के ऊपर था । एक दिन बिहारिन देव जी प्रातः जल्दी उठकर श्रीयमुना जी मे स्नान करने गए और उनका मन श्री बिहारी जी की किसी लीला के चिंतन मे लग गया । उनकी समाधि लग गयी और वे मानसी भाव राज्य मे ही अपनी नित्य सेवा करने लगे ।

प्रातः काल भक्त लोग और नित्य दर्शन को आने वाले ब्रजवासी मंगला आरती हेतु आये । बहुत देर तक पट नही खुले तो वहां के सेवको से पूछा – क्या आज प्यारे को जगाया नही गया? अभी तक मंगला आरती क्यो नही हुई? सेवको ने कहा की पट तो तभी खुलेंगे जब श्री बिहारिन देव जी यमुना स्नान से लौटेंगे क्योंकि ताले की चाबी उन्ही के पास है और सेवा भी वही करते है । बिहारिन देव जी की मानसी सेवा से समाधि खुली शाम ५ बजे और वे स्थान पर वापास आये ।

वैष्णवो और ब्रजवासियों ने पूछा – बाबा! कहां रह गए थे? आज बिहारी जी को नही जगाया , भोग नही लगाया , सुबह से कोई अता पता नही । बिहारिन देव जी बोले – बिहारी जी ने तो आज बहुत बढ़िया भोग आरोगा है । रसगुल्ला, दाल, फुल्का, पकौड़ी, कचौरियां, जलेबी खाकर बिहारी जी प्रसन्न हो गए । आज मैने ठाकुर जी को सुंदर गुलाबी रंग की पोशाख पहनायी है और केवड़ा इत्र लगाया है । सारा गर्भ गृह केवड़े की सुंदर सुगंध से महक रहा है ।

ब्रजवासी बोले – बाबा हम सुबह से यही बैठे है । ताला खोलकर तुम कब आये और कब बिहारी जी का श्रृंगार करके भोग धराया ? कैसी अटपटी बाते करते हो , क्यो असत्य बात करते हो? बाबा कोई नशा कर लिया है क्या ?

बाबा बोले –

कोऊ मदमाते भांग के , कोऊ अमल अफीम ।
श्री बिहारीदास रसमाधुरी, मत्त मुदित तोफीम ।।

कोई भांग के नशे मे मस्त रहता है तो कोई अफीम के परंतु बिहारीदास तो बिहारिणी बिहारी जी के रस माधुरी के नशे मे मस्त रहता है ।

बिहारिन दास जी ने आगे जाकर पट खोले तो सबने देखा की बिहारी जी ने सुंदर गुलाबी पोशाख पहनी है, गर्भगृह से केवड़े का इत्र महक रहा है और बगल मे भोग सामग्री भी वही रखी है जो बाबा ने बताई थी । सब समझ गए की बिहारिन दास जी सिद्ध रसिक संत है और इनको मानसी सेवा सिद्ध हो चुकी है ।

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संत श्री हरिवंश देवाचार्य जी

भूत का वृंदावन

जब रसिक संत की कृपा से एक भूत को भी हुई दिव्य वृंदावन की प्राप्ति –

श्री निम्बार्क सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है श्री हरिवंश देवाचार्य जी महाराज । एक बार वे युगल नाम का जप करते करते भरतपुर से गोवर्धन जा रहे थे ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

बीच के एक गांव मे उन्होंने देखा की एक युवक को कुछ लोग चप्पल जूतों से पीट रहे है । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने उन लोगो से पूछा की इस युवक को चप्पलों से क्यो पीटा जा रहा है ? लोगो ने बताया की इसपर प्रेत चढ़ गया है और हम इसको लेकर गांव की सीमा पर रहने वाले एक अघोरी के पास लेकर प्रेत उतरवाने जा रहे है । अघोरी अपने उपास्य देवता को मांस और शराब का भोग लगता है और तंत्र क्रिया से भूत को उतरवा देता है । संत ने कहा – क्या मै इस युवक पर चढ़ा हुआ भूत उतार दूं ? लोगो ने कहां – इस गांव मे महीने मे एक दो बार किसी न किसको भूत पकड़ लेता है । आप तो आज इसका भूत उतारकर चले जाओगे पर कहीं उस अघोरी को इस बात का पता चल गया तो फिर वह नाराज हो जाएगा और किसीका भूत नही उतरवायेगा ।

संत ने कहा देखो इस युवक की अवस्था तो बहुत दयनीय हो गयी है यदि अभी इसका भूत नही उतारा तो यह मर भी सकता है, तुम उस अघोरी को मत बताना पर इसका भूत मुझे उतारने दो । लोगो ने कहां चलो ठीक है आप ही इसका भूत उतरवा दो । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने अपना सीधा हाथ उसके मस्तक से लगाकर कहां की यदि मैने श्री वृंदावन की उपासना सच्चे हृदय से की है । यदि मेरी इस उपासना की कथनी और करनी मे कोई अंतर नही है तो यह भूत इसको तत्काल छोड़ दे । वह भूत उसी क्षण सामने आकर खड़ा हो गया और कहने लगा – संत जी आप मुझपर कृपा करें, मुझे इस योनि मे बहुत कष्ट होता है । आपके इस युवक को स्पर्श करने के कारण और आपके दर्शन से मेरी पीड़ा शांत हो गयी है । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने पूछा – तुम यहाँ के लोगो को क्यों बार बार पकड़ते हो ?

भूत ने कहा – अघोरी के मन मे मांस और शराब पाने की लालसा होती है । वह अघोरी लोगो को मांस और शराब के बारे मे अच्छी बातें बताकर उन्हे खिला पिला देता है । ऐसे आहार से उन लोगो का शरीर अपवित्र हो जाता है और मै उनको बहुत ही सरलता से पकड़ लेता हूं । इस तरह वह अघोरी मुझसे काम करवाता है । बहुत पाप करने के कारण मै इस योनि मे पड गया हूं पर जब मै जीवित था उस समय एक बार मैने संतो से श्रीवृंदावन की महिमा सुनी थी । आप मुझपर कृपा करो । संत ने पूछा – कैसे कृपा करूँ ?

भूत बोला – आप जैसे रसिक संत की चरण रज ही वृंदावन की प्राप्ति करवा सकती है, आप कृपा करके अपने दाहिने चरण की रज प्रदान करो । संत ने जैसे ही सुना की यह भूत वृंदावन प्राप्त करने की इच्छा रखता है , वे प्रसन्न हो गए । पास खड़े लोगो ने हंसते हुए भूत से कहां – अरे तुम तो बड़े मूर्ख मालूम पड़ते हो । यहां नीचे झुककर स्वयं ही अपने हाथ से रज प्राप्त कर लो । इसपर भूत ने अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही । भूत ने कहा – दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी ।

अभिमानी कभी संत के सामने झुकता नही और पापी व्यक्ति तो संत की किसी वस्तु का स्पर्श तक नही कर सकता । यदि संत अपनी ओर से कृपा करके उनकी चरण रज लेने की आज्ञा दे तब ही पापी को रज प्राप्त हो सकती है । यदि संत अनुमति देकर अपनी चरण रज लेने की आज्ञा देंगे तभी मै उसको स्पर्श कर सकूंगा । इस बात को सुनकर श्री हरिवंश देवाचार्य जी का हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने अपना चरण उठाकर कहां – इस पदरज को लेकर अपने मस्तक से लगा । भूत ने जैसे ही उनकी पदरज अपने मस्तक से लगायी वैसे ही उसने दिव्य शरीर धारण कर लिया और उसने संत को प्रणाम करके कहां की आपकी कृपा से मै श्रीवृंदावन को जा रहा हूँ ।

इस घटना मे भूत के द्वारा २ महत्वपूर्ण बातें बताई गई थी –
१. अपवित्र अवस्था मे रहने वाले और अपवित्र वस्तुओं का सेवन करने वाले व्यक्तियों को भूत प्रेत सरलता से पकड़ सकते है।
२. दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी । संत की अनुमति के बिना पापी व्यक्ति संत की किसी भी वस्तु का स्पर्श तक नह कर सकता ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

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संत श्री गौरांग दास जी

सखीरूप से मानसी सेवा और श्री कृष्ण का रसगुल्ला

ब्रज के परम रसिक संत बाबा श्री गौरांग दास जी को एकबार भगवान ने स्वप्न दिया कि मेरा एक विग्रह गिरिराज जी मे अमुक स्थान पर है, उसको निकालकर नित्य सेवा करो। बाबा बड़ी प्रेम से ठाकुर जी की सेवा करते । ठाकुर जी रोज बाबा से कुछ न कुछ मांगने लगे की आज मुकुट चाहिए, आज बंशी चाहिए, आज मखान चाहिए , आज बढ़िया पोशाख चाहिए । बाबा ने कहा – मै तो एक लंगोटी वाला बाबा, बिना धन के यह सब चीजे कहां से लाऊंगा? बाबा चलकर संत श्री जगदीश दास जी के पास गए और सारी बात बतायी । उन्होंने कहा – अपनी असमर्थता व्यक्त कर दो और मानसी मे ठाकुर जी की सारी मांगे पूरी कर दिया करो । अब बाबा नित्य मानसी सेवा करने लगे । एक दिन स्नान कर के भजन करने बैठे और जब उठे तो शिष्यों ने देखा कि उनके कमर और लंगोट पर शक्कर की चाशनी (शक्कर पाक) लगी थी।

शिष्यों ने पूछा – बाबा ये चाशनी कैसे लग गयी ? आप तो स्नान करके भजन करने बैठे थे । बाबा ने अपनी मानसी सेवा को गुप्त रखना चाहा और कहा – कुछ नही हुआ, कुछ नही हुआ । जब शिष्यों ने आग्रह करके पूछा तब बताया कि आज मानसी सेवा में मैने सोचा की शरीर से तो मै बंगाली हूं, रसगुल्ला अच्छे बना लूंगा और श्री प्रिया लाल जी को बडे सुंदर रसगुल्ला बनाकर खिलाऊंगा । मोटे मोटे रसगुल्ला बनाकर मैने श्री गुरु सखी के हाथ मे दिए और उन्होंने श्री राधा कृष्ण को दिए । राधारानी तो ठीक तरह से तोड तोड कर रसगुल्ला खाने लगी परंतु नटखट ठाकुर जी ने तो बडा सा रसगुल्ला एक बार मे ही मुख में डाल दिया और जैसे ही मुख में दबाया तो बगल मे सखी रूप मे मै ही खड़ा था । ठाकुर जी के उस रसगुल्ले का रस उड़कर मेरे शरीर पर लग गया ।