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नरसी मेहता जी

गुजरात के जूनागढ़ में एक नरसी मेहता नाम के कृष्ण भगवान के एक अनन्य भक्त थे। किसी समय नरसी मेहता की बहुत बड़ी सी हवेली और जिमीदारी हुआ करती थी। इन की 2 बेटियां थी। एक बेटी का विवाह हो चुका था। और इनकी दूसरी बेटी इनके साथ रहती थी। और उस बेटी ने भी अपने आप को कृष्ण भगवान की भक्ति में लगाया हुआ था। नरसी मेहता जी का एक सारंग नाम का भाई था। जो जिमीदार भी था और मुगल सम्राट हुमायूं के समय पुलिस में बड़ा ऑफिसर था ।नरसी मेहता जी की सारी जिमीदारी चली गई थी। और वह बड़ा गरीबी का जीवन जीते थे। एक बार उनकी बड़ी बेटी कुंवर सेन के यहां उसकी छोटी बेटी का रिश्ता हो गया। कुंवर सेन के ससुराल वाले धन के नशे में चूर थे । उन्हें धन का बहुत अहंकार था । उन्होंने भात के लिए एक लंबी सी लिस्ट तैयार की। और कुंवर सेन को कहा- तुम्हारे घर से यह भात आना चाहिए। हमारी भी इज्जत का सवाल है।

पहले के जमाने में विवाह की पत्रिका लेकर नाई जाता था। अब एक नाई जूनागढ़ के लिए रवाना हुआ। उसने वहां जाकर पूछा -नरसी मेहता जी की हवेली कहां है? एक व्यक्ति ने मंदिर की तरफ इशारा करके कहा- आपको नरसी मेहता जी वही मिलेंगे। जब उस नाई ने नरसी मेहता जी को देखा तो मन ही मन सोचने लगा। यह मेरी क्या खातिरदारी करेगा ?क्योंकि यह तो खुद ही फटे हाल है। उस समय पत्रिका लाने वाले नाईयों की खूब आवभगत की जाती थी । नरसी मेहता जी ने नाई को ठंडा पानी पिलाया और कहा- आप बैठिए मैं कुछ भोजन की व्यवस्था करता हूं ।

उधर उनकी बेटी कुंवर सेन अपने भाग्य को रो रही थी और गोविंद को कह रही थी। मेरे पिताजी की लाज बचाओ । उधर उनकी दूसरी बेटी ने विवाह की पत्रिका गोविंद के चरणों में डाल दी। गोविंद अब तुम्हें ही यह सारी व्यवस्था करनी है। उधर नरसी मेहता जी अपने भाई सांरग के घर पहुंचे। और उन्होंने कहा- बेटी के घर विवाह है। नाई पत्रिका लेकर आया है। कुछ मदद हो जाती तो अच्छा था । उनके भाई सारंग ने उन को लात मारकर भगा दिया और कहा- सारा दिन द्वारिकाधीश द्वारिकाधीश करता है ।आप बुलाओ ना अपने द्वारिकाधीश को। और नरसी मेहता को वहां से भगा दिया। अब नरसी मेहता अपने एक मित्र किसान के खेत में पहुंचा वहां जाकर बथुए का साग तोड़ा उसके घर पर ही उबाल लिया और उसमें नमक मिलाकर नाई के लिए तैयार करने लगे।

उधर भगवान समझ गए। आज नरसी मेहता को मेरी जरूरत है। कृष्ण भगवान मुनीम का वेश बनाकर मंदिर में बैठे नाई के पास पहुंचे और उनके हाथ में एक बड़ा सा थाल भोजन का था। उन्होंने नाई को कहा- मैं नरसी मेहता जी का मुनीम हूं। उनको कोई जरूरी काम आन पड़ा है। उन्होंने आपके लिए छप्पन भोग भिजवाया है। आप भोजन कीजिए । नाई ने अपनी जिंदगी में ऐसा अलौकिक भोजन कभी नहीं किया था। वह बहुत प्रसन्न हुआ। अब कृष्ण भगवान ने 1000 सोने की मोहरों का भरा हुआ पर्स उस नाई को दक्षिणा सवरूप दिया और कहा- बेटी को बोलिए विवाह की तैयारी करो। हम समय पर भात लेकर पहुंच जाएंगे। अब भगवान तो भोजन का खाली थाल लेकर अंतर्ध्यान हो गए। तभी नरसी मेहता जी आए उन्होंने नाई को कहा- आइए साग का भोजन कीजिए । नाई ने मना कर दिया कि मेरा पेट भरा हुआ है। नरसी मेहता जी ने सोचा नाई मेरे ऊपर व्यंग्य कर रहा है। परंतु जब उसने सोने की मोहरों का पर्स दिखाया तब नरसी मेहता जी समझ गए। आज गोविंद अपने आप आए थे ।

नरसी मेहता जी बेटी के यहां जाने लगे तो जूनागढ़ में अंधे साधुओं का एक अखाड़ा था। नरसी मेहता जी सारा दिन संतो के बीच में रहते थे ।उन्होंने 16 संतो को बेटी के यहां जाने के लिए तैयार कर लिया उसने सोचा संतों के आशीर्वाद से बढ़कर और क्या भात हो सकता है। नरसी मेहता जी ने अपने किसान मित्र से एक टूटी फूटी बैलगाड़ी चार-पांच दिन के लिए उधार मांग ली और उस बैलगाड़ी में उन 16 अंधे साधुओं को बिठा लिया। जब वह जूनागढ़ से बाहर आए तभी उनकी गाड़ी एक गड्ढे में चली गई और उसका पहिया निकल गया सारे साधु नीचे गिर गए। बड़ी कोशिश की ना तो वह गाड़ी ठीक हुई नाही वह गाड़ी गड्ढे से बाहर आई। नरसी मेहता जी ने फिर भगवान को पुकारा- हे! भगवान इस गरीब की इतनी परीक्षा क्यों है। इतने में ही भगवान एक बढ़ई का रूप बनाकर वहां प्रगट हो गए उन्होंने नरसी मेहता जी की गाड़ी को दोबारा बना दिया और नरसी मेहता जी को कहा- मुझे भी उस गांव तक जाना है। मुझे अपनी बैलगाड़ी में जगह दे दो। मैं तुम्हारी गाड़ी भी हांक दूंगा। अब भगवान नरसी मेहता जी की बैलगाड़ी हांकने लगे। अब भगवान ने गाड़ी ठीक करने की अपनी मजदूरी मांगी। नरसी मेहता जी ने कहाकहा- हम तो साधु संत हैं हमारे पास कोई पैसे नहीं है हम सब आपको दिहाडी के रूप में भजन सुना देते हैं। भगवान भी अपने भक्तों का भजन सुनना चाहते थे । क्योंकि उस दिन नरसी मेहता उन्हें बेटी के यहां जाने की जल्दी में भजन नहीं सुना सके। अब सारे साधुओं ने अपनी सारंगी उठाई और नरसी मेहता जी भजन गाने लगे।

जब नरसी मेहता जी अपनी बेटी के गांव पहुंचे तो उस बढ़ई ने कहा- क्या मैं भी आपकी बेटी के भात में शामिल हो सकता हूं? नरसी मेहता जी ने कहा- इससे अच्छी बात और क्या होगी । बड़ई ने कहा- मैं अपनी पत्नी को लेकर भात के समय पहुंच जाऊंगा। जब नरसी मेहता जी बेटी के यहां पहुंचे। अंधे साधुओं को साथ में देखकर उसके बेटी के ससुराल वालों ने बुरा मूंह बना लिया और उनकी कोई आवभगत नहीं की। बेटी के ससुराल वाले पिता का बार-बार अपमान कर रहे थे। बेटी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। अब नरसी मेहता जी समझ गए ।यह लोग सब धन के नशे में चूर हैं । और इन लोगों को इंसानियत नहीं धन चाहिए। वह फिर गोविंद को पुकारने लगे- हे! गोविंद मेरी बिगड़ी बना दो नंदलाल ।मेरी बिगड़ी बना दो नंदलाल।तभी

वह बढ़ई अपनी पत्नी समेत गाड़ी भर कर भात के लिए लाया। उन्होंने नरसी मेहता जी को कहा- भात के लिए समान आ गया है ।अब तो नरसी मेहता जी समझ गए यही गोविंद है। उन्होंने प्रभु को कहा -प्रभु मुझे दर्शन दीजिए । अब तो गोविंद ने उन्हें लक्ष्मी और नारायण के रूप में दर्शन दिए और कहा- अपने भक्तों की इज्जत बचाने के लिए भगवान कभी देर नहीं करते। देर सिर्फ उनके पुकारने में होती है। आप भात भरने की तैयारी कीजिए और बेटी के ससुराल वालों की समान की लिस्ट के हिसाब से भात भरा जाएगा। पर आप किसी को यह मत बताना कि लक्ष्मी नारायण बेटी का भात भरने आए हैं। आप कहना- यह मेरा मुनीम और उसकी पत्नी है।

अब रात को 10:00 बजे भात भरने की तैयारी शुरू हुई और जितनी ससुराल वालों ने एक एक चीज की लिस्ट भेजी थी ।उससे कई गुना करके भगवान ने उनका भात भरा। राशन की बोरियां की बोरियां थी। सोने ,चांदी हीरे ,जवा राहत इस भात में सब कुछ था । कुंवर सेन की सास को जो कुछ भात में दिया गया बिल्कुल वैसे ही घर के नौकर चाकारो को भी दिया गया। कपड़े और हीरे जवाहरात सब था। रात के 10:00 बजे से भात भरना शुरू हुआ। सुबह 4:00 बजे तक भगवान ने भात भरा। कुंवर सेन भी समझ गई । यह लक्ष्मीनारायण है । आज जो मेरे भाई भाभी बनकर आए हैं। भगवान ने कुंवर सेंन को दर्शन दिए और चुप रहने के लिए कहा । 4:00 बजे भगवान ने नरसी मेहता जी को वापस चलने का आदेश दिया ।भगवान 4:00 बजे नरसी मेहता जी को गाड़ी में बिठा कर अंतर्ध्यान हो गए और रास्ते में भी थोड़े बहुत हीरे मोती बिखरे पड़े थे। जो नौकर चाकर उस भात में शामिल ना हो सके उन्होंने भी वह रास्ते में पड़े हुए हीरे मोती उठाए ।ऐसा भात देखकर बेटी के ससुराल वाले भी दंग रह गए ।लेकिन यह कृपा भगवान सिर्फ उन पर करते हैं। जो बड़े निर्मल हृदय से भगवान को चाहते हैं । यह वह भक्त होते है। जिन्होंने अपना पूरा जीवन बिना किसी कामना के भगवान की भक्ति में लगा रखा होता है। भगवान भी जानते हैं अपने भक्तों को किस समय क्या देना है। यह भक्त और भगवान का प्रेम है
जय जय श्री राधे

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श्री ब्रजमोहन दास जी

श्री ब्रजमोहन दास जी, वृदावंन के बडे सिद्ध संत है . जिनका पूरा चरित्र जीवन चमत्कारों से भरा है जोकि ब्रज में ही “सूरमा कुंज” में रहा करते थे. क्योंकि भजन में और सदा प्रभु की लीलाओ में मस्त रहते थे.
संत की अपनी मस्ती होती है, जिसे किसी से मोह, कोई आसक्ति नहीं है. ऐसे ही इनके जीवन का एक बडा प्रसंग है. जोकि वृदावंन की महत्वतता को बताता है.कहते है कि जो वृदांवन में शरीर को त्यागता है. तो उन्हें अगला जन्म श्री वृदांवन में ही होता है. और अगर कोई मन में ये सोच ले संकल्प कर ले कि हम वृदावंन जाएगे,

और यदि रास्ते में ही मर जाए तो भी उसका अगला जन्म वृदांवन में ही होगा. पर केवल संकल्प मात्र से उसका जन्म श्री धाम में होता है

प्रसंग १-ऐसा ही एक प्रसंग श्री ब्रजमोहन दास जी के सम्मुख घटा. तीन मित्र थे जो युवावस्था में थे तीनों बंग देश के थे. तीनों में बडी गहरी मित्रता थी,

तीनो में से एक बहुत सम्पन्न परिवार का था पर उसका मन श्रीधाम वृदांवन में अटका था, एक बार संकल्प किया कि हम श्री धामही जाएगें और माता-पिता के सामने इच्छा रखी कि आगें का जीवन हम वहीं बिताएगें, वहीं पर भजन करेंगे. पर जब वो नहीं माना तो उसके माता-पिता ने कहा – ठीक है बेटा!

जब तुम वृदांवन पहुँचोंगे तो प्रतिदिन तुम्हें एक पाव चावल मिल जाएगें जिसे तुम पाकर खा लेना और भजन करना.जब उसके मित्रो ने कहा -कि अगर तुम जाओगे तो हम भी तुम्हारे साथ वृदांवन जाए, तो वो मित्र बोला – कि ठीक है पर तुम लोग क्या खाओगे?

मेरे पिता ने तो ऐसी व्यवस्था कर दी है कि मुझे प्रतिदिन एक पाव चावल मिलेगा पर उससे हम तीनों नहीं खा पाएगें. तो उनमें से पहला मित्र बोला – कि तुम जो चावल बनाओगे उससे जों माड निकलेगा मै उससे जीवन यापन कर लूगाँ.दूसरे ने कहा- कि तुम जब चावल धोओगे तो उससे जो पानी निकलेगा तो उसे ही मै पी लूगाँ ऐसी उन दोंनों की वृदावंन के प्रति उत्कुण्ठा थी उन्हें अपने खाने पीने रहने की कोई चिंता नहीं है.

तो जब ऐसी इच्छा हो तो ये साक्षात राधारानी जी की कृपा है. तो वो तीनेां अभी किशोर अवस्था में थे.तीनों वृदांवन जाने लगे तो मार्ग में बडा परिश्रम करना पडा और भूख प्यास से तीनों की मृत्यु हो गई और वो वृदांवन नहीं पहुँच पाए. अब जब बहुत दिनों हो गए तीनों की कोई खबर नहीं पहुँची तो घरवालों को बडी चिंता हुई कि उन तीनो में से किसी कि भी खबर नहीं मिली.

तो उन लडको के पिता ढूढते वृदांवन आए, पर उनका कोई पता नहीं चला क्योंकि तीनों रास्ते में ही मर चुके थे.तो किसी ने बताया कि आप ब्रजमोहन दास जी के पास जाओ वो बडे सिद्ध संत है. तो उनके पिता ब्रजमोहन दास जी के पास पहुँचे और बोले – कि महाराज हमारे पुत्र कुछ समय पहले वृदांवन के लिए घर से निकले थे पर अब तो उनकी कोई खबर नहीं है.

ना वृदांवन में ही किसी को पता है .कुछ देर तक ब्रजमोहन दास जी चुप रहे और बोले -कि आप के तीनों बेटे यमुना जी के तट पर, परिक्रमा मार्ग में वृक्ष बनकर तपस्या कर रहे है . वैराग्य के अनुरूप उन तीनेां को नया जन्म वृदांवन में मिला है. जब वे श्री धामवृंदावन में आ रहे थे तभी रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई थी. और जो वृदावंन का संकल्प कर लेता है. उसका अगला जन्म चाहे पक्षु के रूप या पक्षी के या वृक्ष के रूप मेंवृदांवन में होता है.

तो आपके तीनेां बेटे यमुना के किनारे वृक्ष है वहाँ परिक्रमा मार्ग में है. और ये भी बता दिया कि कौन सा किसका बेटा है.बोले कि – जिसने ये कहा था कि मै चावल खाकर रहूगाँ वो“बबूल का पेड”है जिसने ये कहा था कि मै चावल का माड ही खा लूँगा “बेर का वृक्ष”है .

जिसने ये कहा था कि चावल केधोने के बाद जो पानी बचेगा उसे ही पी लूँगा तो वो बालक “अश्वथ का वृक्ष”है .उन्हें उन तीनो को ही वृदावंन में जन्म मिल गया उन तीनों का उददेश्य अभी भी चल रहा है. वो अभी भी तप कर रहे है . पर उनके पिता को यकीन नहीं हुआ तो ब्रज मोहन जी उनको यमुना के किनारे ले गए और कहा कि देखोये बबूल का वृक्ष है

ये बेर का और येअश्वथका.पर उन लेागों के दिल में सकंल्प की कमी थी तो उनको संत की बातों पर यकीन नहीं किया पर मुहॅ से कुछ नहीं बोले औरउसी रात को वृदांवन मे सो गए थे जब रात में सोए,तब तीनों के तीनों वृक्ष बने बेटे सपने में आए और कहा कि पिताजी जो सूरमा कुंज के संत है श्री ब्रजमोहन दास जी है . वो बडे महापुरूष है उनकी दिव्य दृष्टिी है

उनकी बातों पर संदेह नहीं करना वे झूठ नहीं बोलने है और ये राधा जी की कृपा है कि हम तीनों वृदांवन में तप कर रहे है .तो अब तीनेां को विश्वास हो गया और ब्रजमोहन दास जी से क्षमा माँगने लगे कि आप हमें माफ कर दो हमें आपकी बात परसदेंह हो गया था सपने की पूरी बात बता दी तो ब्रज मोहनदास जी ने कहा कि इस में आपकी कोई गलती नहीं है तीनों बडे प्रसन्न मन से अपे घर चले गए.

प्रसंग २. -एक संत ब्रजमोहनदास जी के पास आया करते थे श्री रामहरिदास जी, उन्हेंनें पूछाँ कि बाबा लोगों के मुहॅ से हमेशा सुनते आए कि“वृदांवन के वृक्ष को मर्म नाजाने केाय, डाल-डाल और पात-पात श्री राधे राधे होय”तो महाराज क्या वास्तव में ये बात सत्य है .
कि वृदावंन का हर वृक्ष राधा-राधा नाम गाता हैब्रजमोहनदास जी ने कहा-क्या तुम ये सुनना या अनुभव करना चाहते हो?तो श्री रामहरिदास जी ने कहा -कि बाबा! कौन नहीं चाहेगा कि साक्षात अनुभव कर ले. और दर्शन भी हो जाए. आपकी कृपा हो जाए, तो हमें तो एक साथ तीनो मिल जायेगे.

तो ब्रजमोहन दास जी ने दिव्य दृष्टिी प्रदान कर दी.और कहा -कि मन में संकल्प करो और देखो और सामने”तमाल कावृक्ष”खडा है उसे देखा, तो रामहरिदास जी ने अपने नेत्र खोले तो क्या देखते है कि उस तमाल के वृक्ष के हर पत्ते पर सुनहरे अक्षरों से राधे-राधे लिखा है उस वृक्ष पर लाखों तो पत्ते है. जहाँ जिस पत्ते पर नजर जाती है. उस परराधे राधे लिखा है तो और पत्ते हिलते तो राधे-राधे की ध्वनि निकलती है .

तो आष्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और ब्रजमोहन दास जी के चरणों में गिर पडे और कहा कि बाबा आपकी और राधा जी की कृपा से मैने वृदांवन के वृक्ष का मर्म जान लिया, केाई नहीं जान सकता कि वृदांवन के वृक्ष क्या है?

ये हम अपनेशब्दों में बयान नहीं कर सकते ,ये तो केवल संत ही बता सकता है हम साधारण दृष्टिी से देखते है. हमारी द्रष्टि मायिक है, परन्तु संत की द्रष्टि बड़ी उच्च और दिव्य है उन्हें हर डाल, हर पात पर, राधे श्याम देखते है

जय जय वृंदावन धाम की
जय जय श्यामा श्याम की

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बरसाने के ब्रजदास


बरसाना मे एक भक्त थे ब्रजदास।•••••
उनके एक पुत्री थी, नाम था रतिया।
यही ब्रजदास का परिवार था।
ब्रजदास दिन मे अपना काम क़रतै और शाम को श्री जी के मन्दिर मे जाते दर्शन करते और जो भी संत आये हुवे हो तै उनके साथ सत्संग करते।
यह उनका नियम था।

एक बार एक संत ने कहा भइया हमें नन्दगांव जाना है। सामान ज्यादा है पैसे है नही नही तो सेवक क़रलेते।
तुम हम को नन्दगाँव पहुँचा सकते हो क्या?
ब्रजदास ने हां भरली । ब्रजदास ने कहागर्मी का समय है सुबह जल्दी चलना ठीक रहेगा जिससे मै 10 बजे तक वापिस आजाऊ।
संत ने भी कहा ठीक है मै 4बजे तैयार मिलूँगा।
ब्रज दास ने अपनी बेटी से कहा मुझे एक संत को नन्दगाँव पहुचाना है।
समय पर आ जाऊँगा प्रतीक्षा मत करना।

ब्रजदास सुबह चार बजे राधे राधे करतै नंगे पांव संत के पास गये।
सन्त ने सामान ब्रजदास को दिया और ठाकुर जी की पैटी और बर्तन स्वयं ने लाई लिये।
रवाना तो समय पर हुवे लैकिन संत को स्वास् रोग था कुछ दूर चलते फिर बैठ जाते।
इस प्रकार नन्दगाँव पहुँचने मे ही 11 बज गये।
ब्रजदास ने सामान रख कर जाने की आज्ञा मांगी।
संत ने कहा जून का महीना है 11 बजे है जल पी लो।
कुछ जलपान करलो, फिर जाना।
ब्रजदास ने कहा बरसाने की वृषभानु नंदनी नन्दगाँव मे ब्याही हुई है अतः मै यहाँ जल नही पी सकता।
संत की आँखो से अश्रुपात होने लगा।

कितने वर्ष पुरानी बात है ,कितना गरीब आदमी है पर दिल कितना ऊँचा है।
ब्रजदास वापिस राधे राधे करते रवाना हुवे।
ऊपर से सूरज की गर्मी नीचे तपती रेत।
भगवान को दया आगयी वे भक्त ब्रजदास के पीछैपीछै चलने लगे।
एक पेड़ की छाया मे ब्रजदास रुके और वही मूर्छित हो कर गिर पड़ै।
भगवान ने मूर्छा दूर क़रने के प्रयास किये पर मूर्छा दूर नही हुई।
भगवान ने विचार किया कि मेने अजामिल गीध गजराज को तारा द्रोपदी को संकट से बचाया पर इस भक्त के प्राण संकट मे हैकोई उपाय नही लग रहा है।
ब्रजदास राधारानी का भक्त है वे ही इस के प्राणों की रक्षा कर सकती है ।
उनको ही बुलाया जावे।
भगवान ने भरी दुपहरी मे राधारानी के पास महल मे गये।
राधा रानी ने इस गर्मी मे आने का कारण पूछा।
भगवान भी पूरे मसखरे है।
उन्होंने कहा तुम्हारे पिताजी बरसाना और नन्दगाँव की डगर मे पड़ै है तुम चलकर संभालो।
राधा जी ने कहा कौन पिताजी?
भगवान ने सारी बात समझाई और चलने को कहा।
यह भी कहा की तुमको ब्रजदास की बेटी की रूप मे भोजन जल लेकर चलना है।
राधा जी तैयार होकर पहुँची।
पिताजी पिताजी आवाज लगाई।
ब्रजदास जागे।
बेटी के चरणों मे गिर पड़े आज तू न आती तो प्राण चले जाते।
बेटी से कहा आज तुझे बार बार देखने का मन कर रहा है।
राधा जी ने कहा माँ बाप को संतान अच्छी लगती ही है।
आप भोजन लीजिये।
ब्रजदास भोजन लेंने लगे तो राधा जी नेकहा घर पर कुछ मेहमान आये है मैउनको संभालू आप आ जाना।
*कुछ दूरी के बाद राधारानी अदृश्य हो गयी।
ब्रजदास ने ऐसा भोजन कभी नही पाया।

शाम को घर आकर ब्रजदास बेटी के चरणों मे गिर पड़े.... तो बेटी ने कहा आप ये क्या कर ऱहै है?

ब्रजदास ने कहा आज तुमने भोजन जल ला कर मेरे प्राण बचा लिये।
बेटी ने कहा मै तो कही नही गयी।
ब्रजदास ने कहा अच्छा बता मेहमान कहॉ है?
बेटी ने कहा कोई मेहमान नही आया।
अब ब्रजदास के समझ मे सारी बात आई।
उसनै बेटी से कहा कि आज तुम्हारे ही रूप मे राधारानी जी के दर्शन हुवे।

वृषभानु दुलारी की जय…….
जय जय श्री राधे ……………

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परम् वैष्णव भक्त बिल्वमंगल जी



बिल्वमंगल प्रसिद्ध दाक्षिणात्य ब्राह्मण तथा भगवान श्रीकृष्ण परम भक्त व कवि थे।

प्रारम्भिक समय:-

दक्षिण प्रदेश में कृष्‍णवीणा नदी के तट पर एक ग्राम में रामदास नामक भगवद्भक्‍त ब्राह्मण निवास करते थे। उन्‍हीं के पुत्र का नाम ‘बिल्‍वमंगल’ था। पिता ने यथासाध्‍य पुत्र को धर्मशास्‍त्रों की शिक्षा दी थी। बिल्‍वमंगल पिता की शिक्षा तथा उनके भक्तिभाव के प्रभाव से बाल्‍यकाल में ही अति शान्‍त, शिष्‍ट और श्रद्धावान हो गये थे।

मित्रों की कुसंगी :-

दैवयोग से पिता-माता के देहावसान होने पर जब से घर की सम्‍पत्ति पर बिल्वमंगल अधिकार हुआ, तभी से उनके साथ कुसंगी मित्र जुटने लगे। कुसंगी मित्रों की संगती से बिल्‍वमंगल के अन्‍त:करण में अनेक दोषों ने अपना घर कर लिया। एक दिन गांव में कहीं चिन्‍तामणि नाम की एक वेश्‍या का नाच था। शौकीनों के दल-के-दल नाच में जा रहे थे। बिल्‍वमंगल भी अपने मित्रों के साथ वहाँ जा पहुँचे। वेश्‍या को देखते ही बिल्‍वमंगल का मन चंचल हो उठा। विवेकशून्‍य बुद्धि ने सहारा दिया। बिल्‍वमंगल डूबे और उन्होंने हाड़-मांस भरे चामके कल्पित रूप पर अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर दिया। तन, मन, धन, कुल, मान, मर्यादा और धर्म सब को उत्‍सर्ग कर दिया। ब्राह्मण कुमार का पूरा पतन हुआ। सोते-जागते, उठते-बैठते और खाते-पीते सब समय बिल्‍वमंगल के चिन्‍तन की वस्‍तु केवल एक ‘चिन्‍ता’ ही रह गयी।

पिता का श्राद्धचिन्तामणि के प्रति प्रवल आसक्ति:-

बिल्‍वमंगल दौड़कर नदी के किनारे पहुँचे। भगवान की माया अपार है। अकस्‍मात् प्रबल वेग से तूफ़ान आया और उसी के साथ मूसलाधार वर्षा होने लगी। आकाश में अन्‍धकार छा गया। बादलों की भयानक गर्जना और बिजली की कड़कड़ाहट से जीवमात्र भयभीत हो गये। रात-दिन नदी में रहने वाले केवटों ने भी नावों को किनारे बांधकर वृक्षों का आश्रय लिया, परंतु बिल्‍वमंगल पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा। उसने केवटों से उस पार ले चलने को कहा। बार-बार विनती की, उतराई का भी गहरा लालच दिया, परंतु मृत्‍यु का सामना करने को कौन तैयार होता। सबने इनकार कर दिया। ज्‍यों-ही-ज्‍यों विलम्‍ब होता था, त्‍यों-ही-त्‍यों बिल्‍वमंगल की व्‍याकुलता बढ़ती जाती थी। अन्‍त में वह अधीर हो उठे और यह वेश्या चिन्तामणि के प्रति उनकी प्रवल आसक्ति ही थी कि वे कुछ भी आगा-पीछा न सोचकर तैरकर पार जाने के लिये सहसा नदी में कूद पड़े। भयानक दु:साहस का कर्म था, परंतु ‘कामातुराणां न भयं न लज्‍जा’। संयोगवश नदी में एक मुर्दा बहा जा रहा था। बिल्‍वमंगल तो बेहोश थे। उन्होंने उसे काठ समझा और उसी के सहारे नदी के उस पार चले गये। उन्हें कपड़ों की सुध नहीं है। बिल्कुल दिगम्‍बर हो गये हैं। चारों ओर अन्‍धकार छाया हुआ है। बनैले पशु भयानक शब्‍द कर रहे है, कहीं मनुष्‍य की गन्‍ध भी नहीं आती, परंतु बिल्‍वमंगल उन्‍मत्‍त की भाँति अपनी धुन में चले जा रहे हैं।

वेश्या की वाणी का प्रभाव:-

कुछ ही दूर पर चिन्‍तामणि का घर था। श्राद्ध के कारण आज बिल्‍वमंगल के आने की बात नहीं थी, अत: चिन्‍तामणि घर के सब दरवाज़ों को बन्‍द करके निश्चिन्‍त होकर सो चुकी थी। बिल्‍वमंगल ने बाहर से बहुत पुकरा, परंतु तूफ़ान के कारण अंदर कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। बिल्‍वमंगल ने इधर-उधर ताकते हुए बादलों में कड़कती हुई बिजली के प्रकाश में दीवार पर एक रस्‍सा-सा लटकता देखा, तुरंत उन्होंने उस रस्से को पकड़ा और उसी के सहारे दीवार फांदकर वेश्या चिन्तामणि के घर में प्रवेश कर गये। चिन्‍तामणि को जगाया। वह तो बिल्वमंगल को देखते ही स्‍तम्भित सी रह गयी। नंगा बदन, सारा शरीर पानी से भीगा हुआ, भयानक दुर्गन्‍ध आ रही है। उसने कहा- “तुम इस भयावनी रात में नदी पार करके बंद घर में कैसे आये?” बिल्‍वमंगल ने काठ पर चढ़कर नदी पार होने और रस्‍से की सहायता से दीवार पर चढ़ने की कथा सुनायी। वृष्टि थम चुकी थी। चिन्‍तामणि दीपक हाथ में लेकर बाहर आयी। देखती है तो दीवार पर एक भयानक काला नाग लटक रहा है और नदी के तीर सड़ा हुआ मुर्दा पड़ा है। बिल्‍वमंगल ने भी देखा ओर देखते ही कांप उठे। चिन्‍तामणि ने उनकी बड़ी भर्त्‍सना करके कहा-

“तू ब्राह्मण है? अरे, आज तेरे पिता का श्राद्ध था, परंतु एक हाड़-मांस की पुतली पर तू इतना आसक्‍त हो गया कि अपने सारे धर्म-कर्म को तिलांजलि देकर इस डरावनी रात में मुर्दे और सांप की सहायता से यहाँ दौड़ा आया। तू आज जिसे परम सुन्‍दर समझकर इस तरह पागल हो रहा है, उसका भी एक दिन तो वही परिणाम होने वाला है, जो तेरी आंखों के सामने इस सड़े मुर्दे का है। धिक्‍कार है तेरी इस नीच वृत्ति को। अरे! यदि तू इसी प्रकार उस मनमोहन श्यामसुन्दर पर आसक्‍त होता, यदि उससे मिलने के लिये यों छटपटाकर दौड़ता, तो अब तक उसको पाकर तू अवश्‍य ही कृताथ हो चुका होता।”

वेश्‍या की वाणी ने बड़ा काम किया। बिल्‍वमंगल चुप होकर सोचने लगे। बाल्‍यकाल की स्‍मृति उनके मन में जाग उठी। पिताजी की भक्ति और उनकी धर्मप्राणता के दृश्‍य उनकी आंखों के सामने मूर्तिमान होकर नाचने लगे। बिल्‍वमंगल की हृदयतंत्री नवीन सुरों से बज उठी। विवेक की अग्नि का प्रादुर्भाव हुआ, भगवत्-प्रेम का समुद्र उमड़ा और उनकी आंखों से अश्रुओं की धाराएँ बहने लगीं। बिल्‍वमंगल ने चिन्‍तामणि के चरण पकड़ लिये और कहा- “माता, तूने आज मुझको दिव्‍यदृष्टि देकर कृतार्थ कर दिया।” मन-ही-मन चिन्‍तामणि को गुरु मानकर प्रणाम किया और उसी क्षण जगच्चिन्‍तामणि की चारु चिन्‍ता में निमग्‍न होकर उन्‍मत्‍त की भाँति चिन्‍ता के घर से निकल पड़े। बिल्‍वमंगल के जीवन-नाटक की यवनिका का परिवर्तन हो गया था।

नैत्र फोड़ना:-

मनमोहन श्यामसुन्दर की प्रेममयी मनोहर मूर्ति का दर्शन करने के लिये बिल्‍वमंगल पागल की तरह जगह-जगह भटकने लगे। कई दिनों के बाद एक दिन अकस्‍मात् उन्हें रास्‍ते में एक परम रूपवती युवती दीख पड़ी। पूर्व संस्‍कार अभी सर्वथा नहीं मिटे थे। युवती का सुन्‍दर रूप देखते ही नेत्र चंचल हो उठे और नेत्रों के साथ ही मन भी खिंचा। बिल्‍वमंगल को फिर मोह हुआ। भगवान को भूलकर वह पुन: पतंग बनकर विषयाग्नि की ओर दौड़े। बिल्‍वमंगल युवती के पीछे-पीछे उसके मकान तक गये। युवती अपने घर के अंदर चली गयी। बिल्‍वमंगल उदास होकर घर के दरवाज़े पर बैठ गये। घर के मालिक ने बाहर आकर देखा कि मलिन मुख अतिथि ब्राह्मण बाहर बैठा है। उसने कारण पूछा। बिल्‍वमंगल ने कपट छोड़कर सारी घटना सुना दी और कहा कि- “मैं एक बार फिर उस युवती को प्राण भरकर देख लेना चाहता हूँ। तुम उसे यहाँ बुलवा दो।” युवती उसी गृहस्‍थ की धर्मपत्‍नी थी। गृहस्‍थ ने सोचा कि इसमें हानि ही क्‍या है। यदि उसके देखने से ही इसकी तृप्ति होती हो तो अच्‍छी बात है। अतिथिवत्‍सल गृहस्‍थ अपनी पत्‍नी को बुलाने के लिये अंदर गया। इधर बिल्‍वमंगल के मन-समुद्र में तरह-तरह की तरंगों का तूफ़ान उठने लगा। जो एक बार-अनन्‍यचित्‍त से उन अशरण-शरण की शरण में चला जाता है, उसके ‘योगक्षेम’ का सारा भार वे अपने उपर उठा लेते हैं। आज बिल्‍वमंगल को संभालने की चिन्‍ता उन्‍हीं को पड़ी।

दीनवत्‍सल भगवान ने अज्ञानान्‍ध बिल्‍वमंगल को दिव्‍यचक्षु प्रदान किये। उसको अपनी अवस्‍था का यथार्थ ज्ञान हुआ। हृदय शोक से भर गया और न मालूम क्‍या सोचकर उन्होंने पास के बेल के पेड़ से दो कांटे तोड़ लिये। इतने में ही गृहस्‍थ की धर्मपत्‍नी वहाँ आ पहुँची। बिल्‍वमंगल ने उसे फिर देखा और मन ही मन अपने को धिक्‍कार देकर कहने लगा कि- “अभागी आंखें, यदि तुम न होती तो आज मेरा इतना पतन क्‍यों होता। इतना कहकर बिल्‍वमंगल ने, चाहे यह उनकी कमज़ोरी हो या और कुछ, उस समय उन चंचल नेत्रों को दण्‍ड देना ही उचित समझा और तत्‍काल उन दोनों कांटों को दोनों आंखों में भोंक लिया। आंखों से रुधिर की अजस्‍त्र धारा बहने लगी। बिल्‍वमंगल हंसता और नाचता हुआ तुमुल हरिध्‍वनि से आकाश को गुंजाने लगा। गृहस्‍थ को और उसकी पत्‍नी को बड़ा दु:ख हुआ, परंतु वे बेचारे निरुपाय थे।‍ बिल्‍वमंगल का बचा-खुचा चित्‍त-मल भी आज सारा नष्‍ट हो गया और अब तो वह उस अनाथ के नाथ को अतिशीघ्र पाने के लिये बड़े ही व्‍याकुल हो उठे। उनके जीवन-नाटक का यह तीसरा पट-परिवर्तन हुआ।

भगवान का गोप बालक रूप में आगमन:-

परम प्रियतम श्रीकृष्ण के वियोग की दारुण व्‍यथा से उनकी फूटी आंखों ने चौबीस घंटे आंसुओं की झड़ी लगा दी। न भूख का पता है न प्‍यास का, न सोने का ज्ञान है और न जगने का। ‘कृष्‍ण-कृष्‍ण’ की पुकार से दिशाओं को गुंजाते हुए बिल्‍वमंगल जंगल-जंगल और गांव-गांव में घूमते रहे। जिस दीनबन्‍धु के लिये जान-बूझकर आंखें फोड़ीं, जिस प्रियतम को पाने के लिये ऐश-आराम पर लात मारी, वह मिलने में इतना विलम्‍ब करे, यह भला किसी से कैसे सहन हो। पर जो सच्‍चे प्रेमी होते हैं, वे प्रेमास्‍पद के विरह में जीवनभर रोया करते हैं, सहस्‍त्रों आपत्तियों को सहन करते हैं, परंतु उस पर दोषोरोपण कदापि नहीं करते, उनको अपने प्रेमास्‍पद में कभी कोई दोष दीखता ही नहीं। ऐसे प्रेमी के लिये प्रेमास्‍पद को भी कभी चैन नहीं पड़ता। उसे दौड़कर आना ही पड़ता है। आज अन्‍धा बिल्‍वमंगल श्रीकृष्‍ण–प्रेम में मतवाला होकर जहाँ-तहाँ भटक रहा है। कहीं गिर पड़ता है, कहीं टकरा जाता है, अन्‍न-जल का तो केाई ठिकाना ही नहीं। ऐसी दशा में प्रेममय श्रीकृष्‍ण कैसे निश्चिन्‍त रह सकते हैं।

एक छोटे-से गोप-बालक के वेष में भगवान बिल्‍वमंगल के पास आकर अपनी मुनि-मनमोहिनी मधुर वाणी से बोले- “सूरदास जी ! आपको बड़ी भूख लगी होगी, मैं कुछ मिठाई लाया हूँ, जल भी लाया हूँ, आप इसे ग्रहण कीजिये।” बिल्‍वमंगल के प्राण तो बालक के उस मधुर स्‍वर से ही मोहे जा चुके थे। उनके हाथ का दुर्लभ प्रसाद पाकर तो उनका हृदय हर्ष के हिलोरों से उछल उठा। बिल्‍वमंगल ने बालक से पूछा- “भैया! तुम्‍हारा घर कहाँ है, तुम्‍हारा नाम क्‍या है? तुम क्‍या किया करते हो?” बालक ने कहा- “मेरा घर पास ही है, मेरा कोई खास काम नही, जो मुझे जिस नाम से पुकारता है, मैं उसी से बोलता हूँ, गौऍं चराया करता हूँ।” बिल्‍वमंगल बालक की वीणा-विनिन्दित वाणी सुनकर विमुग्‍ध हो गये। बालक जाते-जाते कह गया कि- “मैं रोज आकर आपको भोजन करवा जाया करूँगा।” बिल्‍वमंगल ने कहा- “बड़ी अच्‍छी बात है, तुम आया करो।” बालक चला गया और बिल्‍वमंगल का मन भी साथ लेता गया। ‘मनचोर’ तो उसका नाम ही ठहरा। अनेक प्रकार की सामग्रियों से भोग लगाकर भी लोग जिनकी कृपा के लिये तरसा करते है, वही कृपासिन्‍धु रोज बिल्‍वमंगल को अपने करकमलों से भोजन करवाने आते हैं। धन्‍य है। भक्त के लिये भगवान क्‍या-क्‍या नहीं करते।

बिल्‍वमंगल अब तक तो यह नहीं समझे कि मैंने जिसके लिये फकीरी का बाना लिया और आंखों में कांटे चुभाये, वह बालक वही है, परंतु उस गोप-बालक ने उनके हृदय पर इतना अधिकार अवश्‍य जमा लिया कि उनको दूसरी बात का सुनना भी असह्य हो उठा। एक दिन बिल्‍वमंगल मन ही मन विचार करने लगे कि- “सारी आफतें छोड़कर यहाँ तक आया, यहाँ यह नयी आफत आ गयी। स्‍त्री के मोह से छूटा तो इस बालक ने मोह में घेर‍ लिया।” यों सोच ही रहे थे कि वह रसिक बालक उनके पास आ बैठा और अपना दीवाना बना देने वाली वाणी से बोला- “बाबा जी! चुपचाप क्‍या सोचते हो। वृन्दावन चलोगे?” वृन्‍दावन का नाम सुनते ही बिल्‍वमंगल का हृदय हरा हो गया, परंतु अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए बोले- “भैया! मैं अन्‍धा वृन्‍दावन कैसे जाऊँ?” बालक ने कहा- “यह लो मेरी लाठी, मैं इसे पकड़े-पकड़े तुम्‍हारे साथ चलता हूँ।” बिल्‍वमंगल का मुख खिल उठा। लाठी पकड़कर भगवान भक्त के आगे-आगे चलने लगे। धन्‍य दयालुता! भक्त की लाठी पकड़कर मार्ग दिखाते हैं। थोड़ी-सी दूर जाकर बालक ने कहा- “लो! वृन्‍दावन आ गया। अब मैं जाता हूँ।” बिल्‍वमंगल ने बालक का हाथ पकड़ लिया। हाथ का स्‍पर्श होते ही सारे शरीर में बिजली-सी दौड़ गयी। सात्त्विक प्रकाश से सारे द्वार प्रकाशित हो उठे। बिल्‍वमंगल ने दिव्‍य दृष्टि पायी और देखा कि बालक के रूप में साक्षात मेरे श्‍यामसुन्‍दर ही हैं। बिल्‍वमंगल का शरीर रोमांचित हो गया। आंखों से प्रेमाश्रुओं की अनवरत धारा बहने लगी। भगवान का हाथ और भी जोर से पकड़ लिया और कहा- “अब पहचान लिया है, बहुत दिनों के बाद पकड़ सका हूँ। प्रभु! अब नहीं छोड़ने का।” भगवान ने कहा- “छोड़ते हो कि नहीं?” बिल्‍वमंगल ने कहा- “नहीं, कभी नहीं, त्रिकाल में भी नहीं।”

भगवान ने जोर से झटका देकर हाथ छुड़ा लिया। भला, जिनके बल से बलान्वित होकर माया ने सारे जगत को पददलित कर रखा है, उसके बल के सामने बेचारा अन्‍धा क्‍या कर सकता था। परंतु उसने एक ऐसी रज्‍जु से उनको बांध लिया था कि जिससे छूटकर जाना उनके लिये बड़ी टेढ़ी खीर थी। हाथ छुड़ाते ही बिल्‍वमंगल ने कहा- “जाते हो, पर स्‍मरण रखो-

‘हस्‍तमुत्क्षिप्‍य यातोऽसि बलात्‍कृष्‍ण किमद्भुतम्।
हृदयाद् यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते।।

हाथ छुड़ाये जात हौ, निबल जानि कै मोहि।
हिरदै तें जब जाहुगे, सबल बदौंगो तोहि।।’

भगवान नहीं जा सके। जाते भी कैसे। प्रतिज्ञा कर चुके हैं-

“ये यथा मां प्रपद्यन्‍ते तांस्‍तथैव भजाम्‍यहम्।”

अर्थात “जो मुझको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ।”

भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन:-

भगवान ने बिल्‍वमंगल की आंखों पर अपना कोमल करकमल फिराया। उसकी आंखे खुल गयीं। नेत्रों से प्रत्‍यक्ष भगवान को देखकर, उनकी भुवनमोहिनी अनूप रूपराशि के दर्शन पाकर बिल्‍वमंगल अपने-आपको संभाल नहीं सका। वह चरणों में गिर पड़ा और प्रेमाश्रुओं से प्रभु के पावन चरण कमलों को धोने लगा। भगवान ने उठाकर उसे अपनी छाती से लगा लिया। भक्त और भगवान के मधुर मिलन से समस्‍त जगत में मधुरता छा गयी। देवता पुष्‍पवृष्टि करने लगे। संत-भक्‍तों के दल नाचने लगे। हरिनाम की पवित्र ध्‍वनि से आकाश परिपूर्ण हो गया। भक्त और भगवान दोनों धन्‍य हुए। वेश्‍या चिन्‍तामणि, गृहस्‍थ और उनकी पत्‍नी भी वहाँ आ गयीं। भक्त के प्रभाव से भगवान ने उन सबको अपना दिव्‍य दर्शन देकर कृतार्थ किया।

गोलोक धाम गमन:-

बिल्‍वमंगल जीवनभर भक्ति का प्रचार करके भगवान की महिमा बढ़ाते रहे और अन्‍त में भगवन नाम ‘श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण’ कहते कहते गोलोक धाम पधारे।

बिल्वमंगल जी ने चिन्तामणि को अपना गुरु माना और अपने ग्रन्थ ‘कृष्णकर्णामृत’ का मंगलाचरण ‘चिन्तामणिर्जयति’ से किया।
इन्होंने कृष्णकर्णामृत, कृष्णबालचरित, कृष्णाह्रिक कौमुदी, गोविंदस्तोत्र, बालकृष्ण क्रीड़ा काव्य, बिल्वमंगल स्तोत्र, गोविंद दामोदरस्तव आदि संस्कृत स्तोत्र एवं काव्यग्रंथों के रचना भी की।

कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त राज विल्वमंगल जी को कोटि-कोटि प्रणाम

जय श्रीमन्नारायण

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संत श्री बिहारीदास जी




एक रसिक संत हुए श्री बिहारीदास जी। मथुरा की सीमा पर ही भरतपुर वाले रास्ते पर कुटिया बनाकर भजन करते थे।
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एक दिन पास ही के खेत मे शौच करने चले गए। उस दिन खेत के मालिक को कुछ आवाज आयी तो जाकर बाबा को खूब मुक्के मार कर पीट दिया…
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और शोर करके अपने कुछ सखाओ को भी बुलाया। उन्होंने लंबी लकड़ियां और डंडा लेकर बाबा को पीटना शुरू किया तो बाबा के मुख से बार बार निकलने लगा..
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हे प्रियतम, हे गोकुलचंद्र, हे गोपीनाथ !!
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सबने मारना बंद किया, थोड़ी देर मे सुबह हुई तो देखा कि यह कोई चोर नही है, यह तो पास ही भजन करने वाला महात्मा है।
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आस पास के लोग जमा हुए और उन्होंने पुलिस को बुलाया।
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पुलिस ने आकर बाबा को गाड़ी में डाला और दवाखाने मे भर्ती करवाया। डॉक्टर ने दावा करके पट्टियां बांध दी।
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इसके बाद पुलिस इंसेक्टर ने पूछा, बता बाबा ! क्या घटना हुई है ?
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बाबा बोले मै शौच को गया था उसी समय कन्हैया वहां आ गयो ! उसने खूब मुक्के चलाये।
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वो कन्हैया खुद बहुत बड़ा चोर है फिर भी उसने अपने सखाओ को बुलाकर कहा, की खेत मे चोर घुस गया है।
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सखाओ ने छड़ी और लाठियों से पिटाई करी। बाद में कन्हैया ने पुलिस को बुलवाया और दवाखाने मे भर्ती कराया।
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फिर वही कन्हैया ने डॉक्टर बनकर इलाज किया और अब वही कन्हैया इंस्पेक्टर बनकर मुझसे पूछता है की तेरे साथ क्या घटना हुई ?
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सबने कहां की बाबा तो अटपटी सी बाते करता है, इनको कुछ दिन आराम की आवश्यता है।
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उसी रात बाबा भाव मे डूबकर हरिनाम कर रहे थे तब उनके सामने नीला प्रकाश प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण सहित समस्त सखाओ का दर्शन उनको हुआ।
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भगवान ने कहा, बाबा ! ब्रज वासियो के प्रति तुम्हारी भक्ति देखकर मै प्रसन्न हूँ। तुमने ब्रजवासियो को दोष नही दिया और सबमे मेरे ही दर्शन किए।
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भगवान ने अपना हाथ बाबा के शरीर पर फेरकर उन्हें ठीक कर दिया।
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भगवान ने कहा तुम्हे जो माँगना है मांग लो। बाबा ने संतो का संग और भक्ति का ही वरदान मांगा।
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इस घटना से शिक्षा मिलती है की रसिक संतो की तरह सभी मे श्रीभगवान का ही दर्शन करना है और धाम वासियों को भगवान के अपने जन मानकर उनमे श्रद्धा रखनी चाहिए।

जय जय श्री राधे

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संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी





संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधाकुंड गोवर्धन मे रहकर नित्य भजन करते थे।
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नित्य प्रभु को १००० दंडवत प्रणाम, २००० वैष्णवों को दंडवत प्रणाम और १ लाख हरिनाम करने का नियम था।
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भिक्षा मे केवल एक बार एक दोना छांछ (मठा) ब्रजवासियों के यहां से मांगकर पाते।
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एक दिन बाबा श्री राधा कृष्ण की मानसी सेवा कर रहे थे और उन्होंने ठाकुर जी से पूछा कि प्यारे आज क्या भोग लगाने की इच्छा है ?
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ठाकुर जी ने कहां बाबा ! आज खीर पाने की इच्छा है, बढ़िया खीर बना।
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बाबा ने बढ़िया दूध औटाकर मेवा डालकर रबड़ी जैसी खीर बनाई। ठाकुर जी खीर पाकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा..
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बाबा ! हमे तो लगता था कि तू केवल छांछ पीने वाला बाबा है, तू कहां खीर बनाना जानता होगा ? परंतु तुझे तो बहुत सुंदर खीर बनानी आती है।
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इतनी अच्छी खीर तो हमने आज तक नही पायी, बाबा ! तू थोड़ी खीर पीकर तो देख।
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बाबा बोले, हमको तो छांछ पीकर भजन करने की आदत है और आँत ऐसी हो गयी कि इतना गरिष्ट भोजन अब पचेगा नही, आप ही पीओ।
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ठाकुर जी बोले, बाबा ! अब हमारी इतनी भी बात नही मानेगा क्या?
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बातों बातों में ठाकुर जी ने खीर का कटोरा बाबा के मुख से लगा दिया।
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भगवान के प्रेमाग्रह के कारण और उनके अधरों से लगने के कारण वह खीर अत्यंत स्वादिष्ट लगी और बाबा थोड़ी अधिक खीर खा गए।
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मानसी सेवा समाप्त होने पर ठाकुर जी तो चले गए गौ चराने और बाबा पड़ गए ज्वर (बुखार) से बीमार।
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ब्रजवासियों मे हल्ला मच गया कि हमारा बाबा तो बीमार हो गया है।
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बात जब जातिपुरा (श्रीनाथ मंदिर) मे श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने वैद्य से कहाँ की जाकर श्री रघुनाथ दास जी का उपचार करो, वे हमारे ब्रज के महान रसिक संत है।
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वैद्य जी ने बाबा की नाड़ी देख कर बताया कि बाबा ने तो खीर खायी है।
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ब्रजवासी वैद्य से कहने लगे, २० वर्षो से तो नित्य हम बाबा को देखते आ रहे है, ये बाबा तो ब्रजवासियों के घरों से एक दोना छांछ पीकर भजन करता है।
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बाबा कही आता जाता तो है नही, खीर खाने काहाँ चला गया?
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ब्रजवासी वैद्य से लड़ने लगे और कहने लगे कि तुम कैसे वैद्य हो, तुम्हें तो कुछ नही आता है।
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वैद्य जी बोले, मै अभी एक औषधि देता हूं जिससे वमन हो जाएगा (उल्टी होगी) और पेट मे जो भी है वह बाहर आएगा।
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यदि खीर नही निकली तो मैं अपने आयुर्वेद के सारे ग्रंथ यमुना जी मे प्रवाहित करके उपचार करना छोड़ दूंगा।
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ब्रजवासी बोले, ठीक है औषधि का प्रयोग करो। बाबा ने जैसे ही औषधि खायी वैसे वमन हो गया और खीर बाहर निकली।
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ब्रजवासी पूछने लगे, बाबा ! तूने खीर कब खायी? बाबा तू तो छांछ के अतिरिक्त कुछ पाता नही है, खीर कहां से पायी?
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रघुनाथ दास जी कुछ बोले नही क्योंकि वे अपनी उपासना को प्रकट नही करना चाहते थे अतः उन्होंने इस रहस्य को गुप्त रहने दिया और मौन रहे।
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आस पास के जो ब्रजवासी वहां आए थे वो घर चले गए परंतु उनमे बाबा के प्रति विश्वास कम हो गया…
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सब तरफ बात फैलने लगी कि बाबा तो छुपकर खीर खाता होगा।
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श्रीनाथ जी ने श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी को सारी बात बतायी और कहां की आप जाकर ब्रजवासियों के मन की शंका को दूर करो – कहीं ब्रजवासियों द्वारा संत अपराध ना हो जाए।
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श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी ने ब्रजवासियों से कहां की श्री रघुनाथ दास जी परमसिद्ध संत है।
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वे तो दीनता की मूर्ति है, बाबा अपने भजन को गुप्त रखना चाहते है अतः वे कुछ बोलेंगे नही।
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उन्होंने जो खीर खायी वो इस बाह्य जगत में नही, वह तो मानसी सेवा के भावराज्य में ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें खिलायी है।
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धन्य है ऐसे महान संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी

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संत रसखान जी

भक्त कवि रसखान

           
‘रसखान’ अर्थात रस की खान उस कवि हृदय भगवद्‌भक्त और कृष्णमार्गी व्यक्तित्व का नाम था जिसने यशोदानंदन श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना समस्त जीवन व्यतीत कर दिया ।

भक्त-शिरोमणि रसखान का जन्म विक्रम संवत् 1635 (सन् 1578) में हुआ था । इनका परिवार भी भगवद्‌भक्त था । पठान कुल में जन्मे रसखान को माता-पिता के स्नेह के साथ-साथ सुख-ऐश्वर्य भी मिले । घर में कोई अभाव नहीं था ।

पादुका प्रसंग : भक्त रसखान रोज पान की दुकान पर पान खाने जाता था। एक दिन उसकी नजर वहाँ लगी हुई कन्हैया की तस्वीर पर पड़ी तो उसने पान वाले से पूछा भाई ये बालक किसका है और इसका क्या नाम है। पान वाला बोला ये श्याम है। खान साहब बोले ये बालक बहुत सुन्दर है, घुंघराले बाल हैं, हाथ में मुरली भी मनोहर लगती है मगर ये जिस जमीन पर खड़ा है वो खुरदरी है, इसके पैरों में छाले पड़ जायेंगे, इसको चप्पल क्यों नहीं पहनाते हो। पान वाला बोला तुझे दया आ रही है तो तू ही पहना दे।
         
ये बात खान भाई के दिल में उतर गई और दूसरे दिन कन्हैया के लिए चप्पल खरीदकर ले आया और बोला लो भाई मैं चप्पल ले आया बुलाओ बालक को। पान वाला बोला कि ये बालक यहाँ नहीं रहता है ये वृंदावन रहता है, वृंदावन ही जाओ। खान साहब ने पूछा की इसका पता तो बताओ कि वृंदावन में कहाँ रहता है पान वाला बोला इसका नाम श्याम है और वृंदावन के बांके बिहारी मन्दिर में रहता है।
        
खान साहब वृंदावन के लिए चल दिए वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर में जैसे ही प्रवेश करने लगा तो मंदिर के पुजारी ने बाहर ही रोक दिया और कहा कि तुम दूसरे समाज के हो इसलिए मंदिर में तुम्हारा प्रवेश नहीं कर सकते। खान भाई यह सोचकर कि मेरा श्याम कभी तो घर से बाहर आयेगा मन्दिर के गेट पर ही बैठकर इन्तजार करने लग गया।
       
उसे इन्तजार करते-करते पूरा दिन निकल गया रात भी निकल गई भोर का समय था तो उसके कानों में घुंघरूओं की आवाज आई उसने खड़ा होकर चारों तरफ देखा कुछ दिखाई नहीं दिया फिर उसने अपने चरणों की तरफ देखा तो श्याम उसके चरणों में बैठा हुआ दिखते हैं। श्याम को देखकर खान भाई की खुशी का ठिकाना नहीं रहा मगर उसे बहुत दुःख हुआ जब कन्हैया के चरणों से खून निकलता हुआ देखा।
        
खान भाई नें कन्हैया को गोद में उठाकर प्यार से उसके चरणों से खून पूँछते हुए पूछा बेटे तेरा क्या नाम है कन्हैया बोला श्याम, खान भाई बोला तुम तो मंदिर से आये हो फिर ये खून क्यों निकल रहे हैं।
       
कन्हैया बोला नहीं मैं मन्दिर से नहीं गोकुल से पैदल चलकर आया हूँ क्योंकि तुमने मेरी जैसी मूरत दिल में बसाई में उसी मूरत में तुम्हारे पास आया हूँ इसलिए मुझे गोकुल से पैदल आना पड़ा है और पैरों में काँटे लग गये हैं।
        
खान भाई भगवान को पहचान गया और वादा किया कि हे कन्हैया, हे मेरे मालिक, में तेरा हूँ और तेरे गुण गाया करुँगा और तेरे ही पद लिखा करूँगा इस तरह एक मुसलमान खान भाई से रसखान बनकर भगवान का पक्का भक्त बना।

दूसरा प्रसंग : चूंकि परिवार भर में भगवद्‌भक्ति के सस्कार थे इस कारण रसखान को भी बचपन से धार्मिक जिज्ञासा विरासत में मिली । बृज के ठाकुर नटवरनागर नंदकिशोर भगवान श्रीकृष्ण पर इनकी अगाध श्रद्धा थी । एक बार कहीं भगवत्कथा का आयोजन हो रहा था ।

व्यासगद्‌दी पर बैठे कथावाचक बड़ी ही सुबोध और सरल भाषा में महिमामय भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का सूंदर वर्णन कर रहे थे । उनके समीप ही वृजराय श्यामसुदर का मनोहारी चित्र रखा था । रसखान भी उस समय कथा श्रवण करने पहुंचे ।

ज्योंही उनकी दृष्टि व्यासगद्‌दी के समीप रखे कृष्ण-कन्हैया के चित्र पर पड़ी वह जैसे स्तम्भित हो गए । उनके नेत्र भगवान के रूप माधुर्य को निहारते रह गए । जैसे चुम्बक लोहे को अपनी तरफ खींचता है उसी प्रकार रसखान का हृदय उस मनमोहन की मोहिनी सूरत की तरफ खिंचा जा रहा था ।

कथा की समाप्ति तक रसखान एकटक उन्हें ही देखते रहे । जब सब लोग चले गए तो व्यासजी ने उनकी तरफ देखा और जब उनकी अपलक दृष्टि का केंद्र देखा तो व्यास महाराज भी मुस्कराने लगे । वह उठकर रसखान के पास आए ।

”वत्स! क्या देख रहे हो ?” उन्होंने सप्रेम पूछा । ”पंडितजी सामने रखा चित्र भगवान श्रीकृष्ण का ही है न ?” ”ही । यह उन्हीं नटवर नागर का चित्र है ।” ”कितना सुंदर चित्र है! क्या कोई इतना दर्शनीय और मनभावन भी हो सकता है ?” रसखान गद्‌गद् कंठ से बोले ।

”जिसने इतनी दर्शनीय सृष्टि का निर्माण कर दिया वह दर्शनीय और मनभावन तो होगा ही ।” व्यासजी ने कहा । ”पंडितजी यह मनमोहिनी सूरत मेरे हृदय में बस गई है । मैं साक्षात इस अद्‌भुत मुखमण्डल के दर्शन करने का अभिलाषी हूं । क्या आप मुझे उनका पता बता सकते हैं ?”

”वत्स बृज के नायक तो बृज में ही मिलेंगे न !” ”फिर तो मैं बृज को ही जाता हूं ।” जिसके हृदय में भाव जाग्रत हो जाएं और प्रभु से मिलन की उत्कठा तीव्र हो जाए उसे संसार में कुछ और दिखाई नहीं पड़ता । रसखान भी बृज की तरफ चल पड़े और वृदावन धाम में जाकर निवास किया ।

वृज की रज से स्पर्श होते ही मलीनता नष्ट हो जाती है । भगवती कालिंदी के पावन जल की पवित्र शीतलता के स्पर्श से ही रसखान के भावपूर्ण हृदय में प्रेमावेग से कम्पन होने लगा ।  वृदावन के कण-कण से गूंजती कृष्णनाम की सुरीली धुन ने उन्हें भावविभोर कर दिया । धामों का धाम परमधाम वृदावन जैसे स्वर्ग की अनुभूति करा रहा था ।

रसखान ने इस दिव्य धाम की अनुभूति को अपने पद में व्यक्त किया:

या लकुटी अरु कमरिया पर राज तिहु पुर कौ तजि डारौं । आठहु सिद्धि नवौं निधि कौ सुख नंद की गाय चराय बिसारौं । ‘रसखान’ सदा इन नयनन्हिं सौ बृज के वन बाग तड़ाग निहारौ । कोनहि कलधौत के धाम करील को कुंजन ऊपर वारौं ।

फिर रसखान के हृदय में गिरधारी के गिरि गोवर्धन को देखने की इच्छा हुई तो यह गोवर्धन जा पहुंचे । वहां श्रीनाथजी के दर्शनों के लिए मंदिर में घुसने लगे । ”अरे-रे…रे…कहां घुसे जा रहे हो?” द्वारपाल ने टोक दिया: ”तुम्हारी वेशभूषा तो मुस्लिम है । तुम मंदिर में नहीं जा सकते ।”

”यह कैसा प्रतिबंध! वेशभूषा से भक्ति का क्या सम्बंध ?” ”मैं कुछ नहीं सुनना चाहता । मैं तुम्हें अंदर नहीं घुसने दूंगा ।” ”भाई मैं भी इंसान ही हूं । तुम्हारी ही तरह मैंने भी एक स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है । तुम्हारी ही तरह ईश्वर ने मुझे भी भजन-सुमिरन और दर्शन का अधिकार दिया है ।

फिर तुम मुझे प्रभु के दर्शनों से क्यों वंचित रखना चाहते हो?” ”अपने यह तर्क किसी और को सुनाना । मैं विधर्मी को मंदिर में नहीं घुसने दे  सकता । मैं इसलिए यहां तैनात हूं ।” “परंतु…।” ”तुम इस प्रकार नहीं मानोगे ।” द्वारपाल ने गुस्से से रसखान को सीढ़ियों से धक्का दे दिया ।

रसखान उस व्यवहार पर व्यथित तो हुए और उन्हें आश्चर्य भी हुआ कि बृज में ऐसी मतिबुद्धि वाले इसान भी रहते हैं परतु अपने श्यामसखा पर उन्हें विश्वास था । रसखान ने अपने को पूरी तरह से अपने कृष्ण सखा के हवाले करके अन्न जल त्याग दिया ।

देस बिदेस के देखे नरेसन, रीझि की कोउ न बूझ करैगो । तातें तिन्हें तजजि जान गिरयौ गुन सौं गुन औगुन गांठि परैगो । बांसुरी वारौ बड़ौ रिसवार है श्याम जो नैकु सुठार ठरैगो । लाडिलौ छैल वही तो अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगो ।

भगवान भी कब अपने भक्त की हृदय वेदना से अनभिज्ञ थे । भक्त की विकलता तो भगवान को भी विकल कर देती है । प्राणवल्लभ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त की विकलता का आभास किया और भक्त की सारी पीड़ा हर ली । हरि का तो यही कार्य होता है ।

भक्त के समक्ष साक्षात प्रकट होकर भगवान ने द्वारपाल के दुर्व्यव्यवहार की क्षमा मांगी । फिर रसखान को गोसाईं विट्‌ठलनाथजी क पास जाने का आदेश दिया । रसखान प्रभु का आदेश पाकर गोसाईजी के पास पहुच अन्त्रं उन्होंने उन्हें गोविंदकुण्ड में स्नान कराकर दीक्षित कर दिया ।

फिर तो जैसे रसखान के अंदर से भक्ति काव्य के स्रोत फूट पड़े । आजीवन भगवान कृष्ण की लीला को काव्य रूद्र में वर्णन करते हुए बृज में रहे । केवल भगवान ही उनके सखा थे, सम्बंधी थे, मित्र थे । अन्य कोई चाह नहीं थी । कोई लालसा नहीं थी ।

परंतु एक इच्छा जो उनके पदो से स्पप्ट झलकती है वह जन्म-जन्मातर बृज की भूमि पर ही जन्म लेने की थी । उन्होंने कहा कि:

मानुष हों तो वही ‘रसखान’ बसौं बृज गोकुल गांव के गवारन । जो पसु हों तो कहा बस मेरौ चरौं नितनंद की धेनु मंझारन । पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरंदर कारन । जो खग हों तौ बसेरों करौं नित कालिन्दी कूल कदंब की डारन ।

यह उनकी इच्छा थी कि उन्हें किसी भी योनि में जन्म मिले पर जन्मभूमि बृज ही हो । उच्च कोटि के काव्य और भक्ति के धनी रसखान ने प्रभु स्मरण करते हुए पैंतालीस वर्ष की आयु में भगवान के निजधाम की यात्रा की ।

जिनके दर्शनों के लिए कितने ही योगी सिद्धपुरुष तरसा करते हैं उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण भक्तवत्सल भगवान ने अपने हाथों से अपने इस भक्त की अंत्येष्टि कर भक्त की कीर्ति को बढ़ाया । प्रेमपाश में बंधे भगवान की कृपा और दर्शन का परम सौभाग्य विरलों को ही मिलता है और रसखान भी उन्हीं में से थे ।

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संत श्री बिहारिन देव जी

बिहारी जी की मंगला आरती

श्री बिहारिन देव जी महाराज वृंदावन के हरिदासी सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है । श्री विट्ठल विपुल देव जी से विरक्त वेश प्राप्त करके भजन मे लग गए । श्री गुरुदेव के निकुंज पधारने के बाद बांकेबिहारी लाल जी की सेवा का भार बिहारिन देव के ऊपर था । एक दिन बिहारिन देव जी प्रातः जल्दी उठकर श्रीयमुना जी मे स्नान करने गए और उनका मन श्री बिहारी जी की किसी लीला के चिंतन मे लग गया । उनकी समाधि लग गयी और वे मानसी भाव राज्य मे ही अपनी नित्य सेवा करने लगे ।

प्रातः काल भक्त लोग और नित्य दर्शन को आने वाले ब्रजवासी मंगला आरती हेतु आये । बहुत देर तक पट नही खुले तो वहां के सेवको से पूछा – क्या आज प्यारे को जगाया नही गया? अभी तक मंगला आरती क्यो नही हुई? सेवको ने कहा की पट तो तभी खुलेंगे जब श्री बिहारिन देव जी यमुना स्नान से लौटेंगे क्योंकि ताले की चाबी उन्ही के पास है और सेवा भी वही करते है । बिहारिन देव जी की मानसी सेवा से समाधि खुली शाम ५ बजे और वे स्थान पर वापास आये ।

वैष्णवो और ब्रजवासियों ने पूछा – बाबा! कहां रह गए थे? आज बिहारी जी को नही जगाया , भोग नही लगाया , सुबह से कोई अता पता नही । बिहारिन देव जी बोले – बिहारी जी ने तो आज बहुत बढ़िया भोग आरोगा है । रसगुल्ला, दाल, फुल्का, पकौड़ी, कचौरियां, जलेबी खाकर बिहारी जी प्रसन्न हो गए । आज मैने ठाकुर जी को सुंदर गुलाबी रंग की पोशाख पहनायी है और केवड़ा इत्र लगाया है । सारा गर्भ गृह केवड़े की सुंदर सुगंध से महक रहा है ।

ब्रजवासी बोले – बाबा हम सुबह से यही बैठे है । ताला खोलकर तुम कब आये और कब बिहारी जी का श्रृंगार करके भोग धराया ? कैसी अटपटी बाते करते हो , क्यो असत्य बात करते हो? बाबा कोई नशा कर लिया है क्या ?

बाबा बोले –

कोऊ मदमाते भांग के , कोऊ अमल अफीम ।
श्री बिहारीदास रसमाधुरी, मत्त मुदित तोफीम ।।

कोई भांग के नशे मे मस्त रहता है तो कोई अफीम के परंतु बिहारीदास तो बिहारिणी बिहारी जी के रस माधुरी के नशे मे मस्त रहता है ।

बिहारिन दास जी ने आगे जाकर पट खोले तो सबने देखा की बिहारी जी ने सुंदर गुलाबी पोशाख पहनी है, गर्भगृह से केवड़े का इत्र महक रहा है और बगल मे भोग सामग्री भी वही रखी है जो बाबा ने बताई थी । सब समझ गए की बिहारिन दास जी सिद्ध रसिक संत है और इनको मानसी सेवा सिद्ध हो चुकी है ।

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संत श्री हरिवंश देवाचार्य जी

भूत का वृंदावन

जब रसिक संत की कृपा से एक भूत को भी हुई दिव्य वृंदावन की प्राप्ति –

श्री निम्बार्क सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है श्री हरिवंश देवाचार्य जी महाराज । एक बार वे युगल नाम का जप करते करते भरतपुर से गोवर्धन जा रहे थे ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

बीच के एक गांव मे उन्होंने देखा की एक युवक को कुछ लोग चप्पल जूतों से पीट रहे है । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने उन लोगो से पूछा की इस युवक को चप्पलों से क्यो पीटा जा रहा है ? लोगो ने बताया की इसपर प्रेत चढ़ गया है और हम इसको लेकर गांव की सीमा पर रहने वाले एक अघोरी के पास लेकर प्रेत उतरवाने जा रहे है । अघोरी अपने उपास्य देवता को मांस और शराब का भोग लगता है और तंत्र क्रिया से भूत को उतरवा देता है । संत ने कहा – क्या मै इस युवक पर चढ़ा हुआ भूत उतार दूं ? लोगो ने कहां – इस गांव मे महीने मे एक दो बार किसी न किसको भूत पकड़ लेता है । आप तो आज इसका भूत उतारकर चले जाओगे पर कहीं उस अघोरी को इस बात का पता चल गया तो फिर वह नाराज हो जाएगा और किसीका भूत नही उतरवायेगा ।

संत ने कहा देखो इस युवक की अवस्था तो बहुत दयनीय हो गयी है यदि अभी इसका भूत नही उतारा तो यह मर भी सकता है, तुम उस अघोरी को मत बताना पर इसका भूत मुझे उतारने दो । लोगो ने कहां चलो ठीक है आप ही इसका भूत उतरवा दो । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने अपना सीधा हाथ उसके मस्तक से लगाकर कहां की यदि मैने श्री वृंदावन की उपासना सच्चे हृदय से की है । यदि मेरी इस उपासना की कथनी और करनी मे कोई अंतर नही है तो यह भूत इसको तत्काल छोड़ दे । वह भूत उसी क्षण सामने आकर खड़ा हो गया और कहने लगा – संत जी आप मुझपर कृपा करें, मुझे इस योनि मे बहुत कष्ट होता है । आपके इस युवक को स्पर्श करने के कारण और आपके दर्शन से मेरी पीड़ा शांत हो गयी है । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने पूछा – तुम यहाँ के लोगो को क्यों बार बार पकड़ते हो ?

भूत ने कहा – अघोरी के मन मे मांस और शराब पाने की लालसा होती है । वह अघोरी लोगो को मांस और शराब के बारे मे अच्छी बातें बताकर उन्हे खिला पिला देता है । ऐसे आहार से उन लोगो का शरीर अपवित्र हो जाता है और मै उनको बहुत ही सरलता से पकड़ लेता हूं । इस तरह वह अघोरी मुझसे काम करवाता है । बहुत पाप करने के कारण मै इस योनि मे पड गया हूं पर जब मै जीवित था उस समय एक बार मैने संतो से श्रीवृंदावन की महिमा सुनी थी । आप मुझपर कृपा करो । संत ने पूछा – कैसे कृपा करूँ ?

भूत बोला – आप जैसे रसिक संत की चरण रज ही वृंदावन की प्राप्ति करवा सकती है, आप कृपा करके अपने दाहिने चरण की रज प्रदान करो । संत ने जैसे ही सुना की यह भूत वृंदावन प्राप्त करने की इच्छा रखता है , वे प्रसन्न हो गए । पास खड़े लोगो ने हंसते हुए भूत से कहां – अरे तुम तो बड़े मूर्ख मालूम पड़ते हो । यहां नीचे झुककर स्वयं ही अपने हाथ से रज प्राप्त कर लो । इसपर भूत ने अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही । भूत ने कहा – दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी ।

अभिमानी कभी संत के सामने झुकता नही और पापी व्यक्ति तो संत की किसी वस्तु का स्पर्श तक नही कर सकता । यदि संत अपनी ओर से कृपा करके उनकी चरण रज लेने की आज्ञा दे तब ही पापी को रज प्राप्त हो सकती है । यदि संत अनुमति देकर अपनी चरण रज लेने की आज्ञा देंगे तभी मै उसको स्पर्श कर सकूंगा । इस बात को सुनकर श्री हरिवंश देवाचार्य जी का हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने अपना चरण उठाकर कहां – इस पदरज को लेकर अपने मस्तक से लगा । भूत ने जैसे ही उनकी पदरज अपने मस्तक से लगायी वैसे ही उसने दिव्य शरीर धारण कर लिया और उसने संत को प्रणाम करके कहां की आपकी कृपा से मै श्रीवृंदावन को जा रहा हूँ ।

इस घटना मे भूत के द्वारा २ महत्वपूर्ण बातें बताई गई थी –
१. अपवित्र अवस्था मे रहने वाले और अपवित्र वस्तुओं का सेवन करने वाले व्यक्तियों को भूत प्रेत सरलता से पकड़ सकते है।
२. दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी । संत की अनुमति के बिना पापी व्यक्ति संत की किसी भी वस्तु का स्पर्श तक नह कर सकता ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

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संत श्री गौरांग दास जी

सखीरूप से मानसी सेवा और श्री कृष्ण का रसगुल्ला

ब्रज के परम रसिक संत बाबा श्री गौरांग दास जी को एकबार भगवान ने स्वप्न दिया कि मेरा एक विग्रह गिरिराज जी मे अमुक स्थान पर है, उसको निकालकर नित्य सेवा करो। बाबा बड़ी प्रेम से ठाकुर जी की सेवा करते । ठाकुर जी रोज बाबा से कुछ न कुछ मांगने लगे की आज मुकुट चाहिए, आज बंशी चाहिए, आज मखान चाहिए , आज बढ़िया पोशाख चाहिए । बाबा ने कहा – मै तो एक लंगोटी वाला बाबा, बिना धन के यह सब चीजे कहां से लाऊंगा? बाबा चलकर संत श्री जगदीश दास जी के पास गए और सारी बात बतायी । उन्होंने कहा – अपनी असमर्थता व्यक्त कर दो और मानसी मे ठाकुर जी की सारी मांगे पूरी कर दिया करो । अब बाबा नित्य मानसी सेवा करने लगे । एक दिन स्नान कर के भजन करने बैठे और जब उठे तो शिष्यों ने देखा कि उनके कमर और लंगोट पर शक्कर की चाशनी (शक्कर पाक) लगी थी।

शिष्यों ने पूछा – बाबा ये चाशनी कैसे लग गयी ? आप तो स्नान करके भजन करने बैठे थे । बाबा ने अपनी मानसी सेवा को गुप्त रखना चाहा और कहा – कुछ नही हुआ, कुछ नही हुआ । जब शिष्यों ने आग्रह करके पूछा तब बताया कि आज मानसी सेवा में मैने सोचा की शरीर से तो मै बंगाली हूं, रसगुल्ला अच्छे बना लूंगा और श्री प्रिया लाल जी को बडे सुंदर रसगुल्ला बनाकर खिलाऊंगा । मोटे मोटे रसगुल्ला बनाकर मैने श्री गुरु सखी के हाथ मे दिए और उन्होंने श्री राधा कृष्ण को दिए । राधारानी तो ठीक तरह से तोड तोड कर रसगुल्ला खाने लगी परंतु नटखट ठाकुर जी ने तो बडा सा रसगुल्ला एक बार मे ही मुख में डाल दिया और जैसे ही मुख में दबाया तो बगल मे सखी रूप मे मै ही खड़ा था । ठाकुर जी के उस रसगुल्ले का रस उड़कर मेरे शरीर पर लग गया ।