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प्रभु मिलन को लालसा कैसे बढ़े ?

प्र०-गुरुदेव, हृदय में प्रभु से मिलने की व्याकुलता कैसे बढ़े ?

समाधान – जो श्रीप्रिया- प्रियतम से मिलन के लिए व्याकुल है, ऐसे किसी भगवत्प्रेमी रसिक संत का संग करना प्रारम्भ कर दो, ये छुआछूत का रोग है उनके संग से तुम्हारे अन्दर भी आ जाएगा । भगवत्प्रेमियों के संग के बिना व्याकुलता आ ही नहीं सकती –

रे मन रसिकनि संग बिनु, रंच न उपजै प्रेम ।
या रस कौ साधन यहै, और करी जिनि नेम ॥
दंपति-छबि में मत्त जे, चाहत दिन इक रंग ।
हित सौं चित चाहत रहौ, निशि- दिन तिनकौ संग ॥

(श्रीबयालीसलीला)

‘अर्थात् चाहे जितना नियम साधन कर लो लेकिन रसिकों का संग किये बिना प्रेम छटा का लेश भी प्राप्त नहीं हो सकता है, प्रेम प्राप्ति का एकमात्र साधन रसिक संतों का सत्संग ही है । अतः जो श्रीश्यामा-श्याम की रूप-माधुरी में मग्न हैं या जो श्रीश्यामा श्याम की रूप माधुरी में मग्न होना चाहते हैं रात-दिन ऐसे ही रसिकों के संग की चाह करो ।”

श्रीनारदजी महाराज ने भी ‘भक्तिसूत्र’ में यही कहा

‘तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम् ॥’

उस ( महत्संग) की ही साधना करो, अर्थात् भगवत्प्रेम की प्राप्ति के लिए भगवत्प्रेमी महापुरुषों के संग की ही प्रबल चाह करो ।

यहाँ तक कि प्रभु के संग से भी व्याकुलता नहीं प्राप्त होती है, श्रीउद्धवजी श्रीकृष्ण के साथ ही हर समय रहते हैं लेकिन अभी ज्ञानी उद्धव हैं, प्रेमी उद्धव नहीं; जब प्रेम-स्वरूपा ब्रजगोपियों का संग मिला, वे उनकी चरणरज में लोटे, तब वे प्रेमी उद्धव बने ।

सुनि ऊषो प्रेम मगन भयो ।
लोटत घर पर ज्ञान गरब गयो ॥ (श्रीसूरदासजी)

इसलिए भगवद्दर्शन प्राप्त हो जाने से भी बड़ी चीज है भगवत्प्रेमी महात्माओं का संग प्राप्त हो जाना । कितने ऐसे भक्त हुए हैं जिन्होंने भगवत् साक्षात्कार करने के बाद भी प्रभु से यही माँगा कि हमें अपने प्रेमी-भक्तों का संग दे दो । भगवान् शंकर स्वयं प्रभु से याचना करते हैं

बार-बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥

(श्रीरामचरितमानस ७/१४)

हिताचार्य श्रीहरिवंश महाप्रभु जी कहते हैं

जैश्रीहित हरिवंश प्रपंच बंच सब, काल-व्याल की खायी ।
यह जिय जानि श्याम-श्यामा-पद-कमल-संगी सिर नायौ ।

श्रीहितध्रुवदासजी ने भी कहा –

जहँ जहँ पिय की बात सुनें, खोजत तिन गैननिं ।
छिन छिन प्रति ‘ध्रुव’ लेत, प्रेम-जल भरि-भरि नैननिं ॥

(श्रीबयालीसलीला)

जो भगवत्प्रेमी महात्माजन श्रीप्रिया प्रियतम की चर्चा कर रहे हैं, उस चर्चा को सुनने का अगर चाव बढ़ जाए तो हमारे अन्दर प्रिया- प्रियतम से मिलने की निश्चित व्याकुलता आ जायेगी ।

बार-बार हम जिसकी चर्चा सुनते हैं तो उससे मिलने की आकाँक्षा हृदय में स्वतः आ ही जाती । जैसे रुक्मिणी जी ने श्रीकृष्ण को देखा नहीं था केवल उनके गुणों को ही सुना था, इतने से ही उन्हें श्रीश्यामसुन्दर से प्रेम हो गया था ।

ऐसे ही जब हम भगवत्प्रेमी महात्माओं के द्वारा प्रियालाल के स्वभाव, रूप- माधुरी, गुण- माधुरी आदि की चर्चा निरन्तर सुनेंगे तो उनसे मिलने की मन में स्वयमेव तीव्र चाह पैदा हो जायेगी ।

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बिना प्रयास के प्रभु का चिन्तन (स्मरण) कैसे हो ?



प्र० महाराज जी, अभी प्रभु का स्मरण करने में प्रयास करना पड़ता है, ऐसी स्थिति कब और कैसे आयेगी जब बिना प्रयास के सहज स्वभाविक रूप से प्रभु का चिन्तन (स्मरण) होने लगेगा ?

समाधान – सच्चा भजन-चिन्तन स्वाभाविक रूप से तब होता है जब हम प्रभु से अपना सम्बन्ध जोड़ लेते हैं कि ‘हम प्रभु के हैं । जैसे हम अपने शरीर से तन्मयता किये हुए हैं कि ‘मैं पुरुष हूँ या मैं स्त्री हूँ तो क्या हमें कभी याद करना पड़ता है कि मैं पुरुष हूँ या स्त्री हूँ; ब्राह्मण हूँ या क्षत्रिय हूँ; अर्थात् नहीं याद करना पड़ता अपितु स्वाभाविक ये स्मरण बना रहता है; हम ये कभी भूलते नहीं हैं हर समय स्मृति में बना रहता है क्योंकि हमने शरीर या वर्ण (जाति) ये से सम्बन्ध बना लिया है। इसी तरह से प्रभु से सम्बन्ध बना लेने से उनका चिंतन (स्मरण) स्वाभाविक रूप से होने लगता है । भले ही कोई भजन-साधन नहीं बन पा रहा है, परन्तु यदि सम्बन्ध दृढ़ हो गया कि मैं प्रियालाल का हूँ, मैं वृन्दावन का हूँ, मैं गुरुदेव का हूँ, बस यही चीज तुम्हारा कल्याण कर देगी ।

जब मरणकाल सन्त्रिकट होता है उस समय समस्त इन्द्रियाँ शिथिल (निश्चेष्ट) हो जाती हैं लेकिन उस समय सम्बन्ध ही याद रहता है, जहाँ आपने सम्बन्ध जोड़ा है; स्त्री से जोड़ा तो स्त्री की याद आयेगी, पुत्र से जोड़ा तो उसकी याद आयेगी, अर्थात् जीवन में जो प्रधान सम्बन्ध रहा वही अंतिम में बिना चेष्टा के याद आता है; इसीलिये प्रभु से सम्बन्ध जोड़ लेने वाले भक्त को निश्चित भगवत्प्राप्ति होती है क्योंकि अंतिम में उसे प्रभु की ही याद आयेगी ।

प्रभु की अनन्य शरणागति और उनसे सम्बन्ध स्वीकृत कर लो तो भजन करना नहीं पड़ेगा, स्वाभाविक भजन होगा। सम्बन्ध जोड़ने से तात्पर्य प्रभु से अपनापन कर लेना । भले हमारी समस्त क्रियाएँ (चेष्टाएँ) भागवतिक हो रही हैं लेकिन यदि सम्बन्ध संसार से बना हुआ है तो वह सच्चा भजन नहीं माना जाएगा। इसके विपरीत भले ही क्रियाएँ सांसारिक हो रही हैं लेकिन अगर सम्बन्ध प्रभु से जोड़ लिया है तो बात बन जायेगी । श्रीब्रह्माजी ने श्रीमद्भागवत में कहा है –
तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम् । तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जनाः ॥

‘हे श्यामसुन्दर ! तभी तक राग-द्वेष आदि दोष चोरों की भाँति सर्वस्व अपहरण करते रहते हैं, तभी तक घर और उसके सम्बन्धी कैदी की तरह सम्बन्ध के बन्धनों में बाँधे रखते हैं और तभी तक मोह पैरों में बेड़ियों के समान रहता है जब तक जीव आपका – नहीं हो जाता ।’

इसीलिये बड़े-बड़े ऐसे सिद्ध भक्त भी गृहस्थाश्रम में हुए जिनके दर्शन करने के लिए बड़े-बड़े विरक्त महापुरूष जाते थे ।

श्रीअर्जुनजी ने सम्पूर्ण गीता का उपदेश सुनने के बाद कोई साधन नहीं किया, श्रीकृष्ण कहते जा रहे हैं और अर्जुन एकाग्रचित से सुन रहे हैं, उसका परिणाम क्या हुआ ? स्वयं अर्जुन कह रहे हैं

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । (गीता. १८/७३)

हमारे मोह का नाश हो गया, अब हमें अपने सम्बन्ध की स्मृति (याद) आ गयी कि ‘मैं कौन हूँ, किनका हूँ ‘ ये बात समझ आ गयी ।

जैसे कोई राजकुमार अपने राज्य से बिछुड़कर जंगली कोल भीलों के बीच पहुँच जाए और फिर वहीं उनके संग में रहने लगे तो कुछ ही दिनों में उसकी प्रकृति (स्वभाव), उसकी चेष्टाएँ उन्हीं लोगों की तरह हो जायेंगी; लेकिन जब कोई बिचौलिया (मध्यस्थ) मिले जो राजा से भी परिचित हो और कोल-भीलों से भी; वह उस राजकुमार को जाकर के समझाए कि देख तू इन कोल-भीलों के बीच बैठा है लेकिन तू तो अमुक राजा का लड़का है, चल हम तुझे तेरे पिता से मिलवाते हैं, फिर जब उसे पक्का विश्वास हो जायेगा और वह अपने परिवारवालों से मिलेगा, तब उसे अपने यथार्थ स्वरूप की स्फूर्ति होगी कि मैं राजकुमार होकर, कहाँ जंगली लोगों के बीच में भटक गया था ।

इसी तरह से हमारे माता-पिता हैं ‘प्रभु’ । प्रभु ने गीता जी में स्वयं कहा- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । (१५/७) ‘तू मेरा ही अंश है’ किन्तु हम प्रभु को भूलकर फँस गए हैं कोल-भीलों में अर्थात् नानात्व में । अब कोई सद्गुरु रूपी बिचौलिया (मध्यस्थ) आकर के हमें समझावे कि देख, तेरा स्वरूप क्या है – ईश्वर अंश जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥ (उत्तरकाण्ड-११७) और तेरा जो अंशी है वह कैसा है ? ‘जो आनंद सिंधु सुखरासी ।’ देख, अंश अंशी दोनों सुखरासी हैं न, इसलिए सुखरासी का बच्चा सुखरासी हुआ; कहाँ तू दुःखों में फँसा हुआ है, अर्थात् शरीर-संसार ये दुःखमय हैं, सुखरासी प्रभु हैं चल उनकी तरफ । फिर वह चल देता है ।

अतः हम सबको इसलिए फँसाए हुए हैं क्योंकि हम अपने ये स्वरूप को भूल गए हैं किन्तु जब सद्गुरु आकर के बताते हैं अरे तू तो सच्चिदानन्द का अंश है, तब उसको स्वरूप बोध होता है, ओहो ‘नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।’ बस सभी साधनाओं का फल इतना ही है कि हमें याद आ जाए कि हम प्रभु के हैं, भजन का भी यही फल है मोह का नाश होकर इष्ट के चरणों में अपनापन हो जाना ।

जो प्रश्न था कि बिना प्रयास के अखण्ड स्मरण कैसे हो तो उसका यही उत्तर है- ‘सतत चिंतन होता है अपनेपन से ।’ जब किसी से अपनापन हो जाता है फिर उसका चिंतन करना नहीं पड़ता है, वह श्वासों में बस जाता है, यादों में बस जाता है, हृदय में बस जाता है । हम निकालना भी चाहें, भूलना भी चाहें तो भी नहीं भूल सकते । ऐसी स्थिति हो जाती है कि हम कुछ कार्य करना चाहते हैं, व्यवहार करना चाहते हैं लेकिन बार-बार स्मृतिपटल पर वही याद आता है; यही है सच्चे प्यार का स्वरूप, यही है सच्चे अपनेपन का स्वरूप । प्रभु से सहज प्रेम हो जाना अर्थात् उन्हें अपना मान लेना, ये जन्म-जन्म की साधना पूर्ण हो गयी। अभी हम ईमानदारी से अपने हृदय को टटोलकर देखें कि क्या हम वास्तविक प्रभु को प्यार करते हैं, जिससे हम प्यार करते हैं यदि उसकी जरा-सी दूरी आने की बात आ जाय तो तुरंत एक विकलता होने लगती है कि मैं इनके बिना कैसे जी पाउँगा; अभी क्या प्रभु के लिये ऐसा प्यार आया, जिस दिन ऐसा प्यार प्रभु से हो जाएगा उस दिन अलग ही दशा हो जायेंगी, उनके बिना जीना मुश्किल हो जाएगा।

जो पै चॉप मिलन की होइ ।
तौ कत रह्यौ परै सुनि सजनी ! लाख करै जो कोइ ॥
जो पै बिरह परस्पर व्यापै तौ इह बात बनैं ।
डरु अरु लोक-लाज अपकीरति एकौ चित न गर्ने ॥
‘कुंभनदास’ जो मन मानै तौ कत जिय और सुहाइ ।
गिरिधर लाल रसिक बिनु देखें पल भर कलप विहाइ ||

जैसे जिन महापुरुषों को वृन्दावन धाम से प्यार हुआ वह कहते हैं कि हमारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँ फिर भी मैं वृन्दावन के बाहर जाना नहीं पसंद करूंगा –

खंड खंड है जाइ तन, अंग अंग सत टूक ।
वृंदावन नहिं छाँड़ियै, छाँड़िबौ है बड़ी चूक |
बसि कै वृंदाविपिन में, ऐसी मन में राख ।
प्रान तजौं बन ना तजौं कहौ बात कोउ लाख ॥

इसी तरह से जिन महापुरुषों को नाम से प्रेम हुआ उन्होंने यही कहा, नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं

खण्ड-खण्ड हइ देह जाय यदि प्राण ।
तबु आमि वदने ना छाड़ि हरिनाम ॥

ये है वास्तविक प्यार का स्वरूप |

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तुलसी जी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी

तुलसी का पौधा भगवान विष्णु को अति प्रिय है। भगवान विष्णु की पूजा में किसी भी तरह से तामसिक चीजों का प्रयोग वर्जित माना गया है। इसलिए जहां पर भी तुलसी का पौधा लगा हो वहां पर कभी मांस मदिरा का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। जो लोग अपने गले में तुलसी की माला धारण करते हैं, उन्हें भी तामसिक चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।



तुलसी दल और मंजरी चयन समय कुछ बातों का ख्याल रखें

  • तुलसी की मंजरी सब फूलों से बढ़कर मानी जाती है। मंजरी तोड़ते समय उसमें पत्तियों का रहना भी आवश्यक माना गया है। तुलसी का एक-एक पत्ता तोड़ने के बजाय पत्तियों के साथ अग्रभाग को तोड़ना चाहिए. यही शास्त्रसम्मत भी है.प्राय: पूजन में बासी फूल और पानी चढ़ाना निषेध है, पर तुलसीदल और गंगाजल कभी बासी नहीं होते। तीर्थों का जल भी बासी नहीं होता।
  • ब्रह्म वैवर्त पुराण में श्री भगवान तुलसी के प्रति कहते है –
    पूर्णिमा, अमावस्या , द्वादशी, सूर्यसंक्राति , मध्यकाल रात्रि दोनों संध्याए अशौच के समय रात में सोने के पश्चात उठकर,स्नान किए बिना,शरीर के किसी भाग में तेल लगाकर जो मनुष्य तुलसी दल चयन करता है वह मानो श्रीहरि के मस्तक का छेदन करता है.
  • द्वादशी तिथि को तुलसी चयन कभी ना करे, क्योकि तुलसी भगवान कि प्रेयसी होने के कारण हरि के दिन -एकादशी को निर्जल व्रत करती है.अतः द्वादशी को शैथिल्य,दौबल्य के कारण तोडने पर तुलसी को कष्ट होता है.
  • तुलसी चयन करके हाथ में रखकर पूजा के लिए नहीं ले जाना चाहिये शुद्ध पात्र में रखकर अथवा किसी पत्ते पर या टोकरी में रखकर ले जाना चाहिये.
  • इतने निषिद्ध दिवसों में तुलसी चयन नहीं कर सकते,और बिना तुलसी के भगवत पूजा अपूर्ण मानी जाती है अतः वारह पुराण में इसकी व्यवस्था के रूप में निर्दिष्ट है कि निषिद्ध काल में स्वतः झडकर गिरे हुए तुलसी पत्रों से पूजन करे.और अपवाद स्वरुप शास्त्र का ऐसा निर्देश है कि शालग्राम कि नित्य पूजा के लिए निषिद्ध तिथियों में भी तुलसी दल का चयन किया जा सकता है.

तुलसी जी की आरती

तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।

धन तुलसी पूरण तप कीनो,
शालिग्राम बनी पटरानी ।
जाके पत्र मंजरी कोमल,
श्रीपति कमल चरण लपटानी ॥

धूप-दीप-नवैद्य आरती,
पुष्पन की वर्षा बरसानी ।
छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन,
बिन तुलसी हरि एक ना मानी ॥

सभी सखी मैया तेरो यश गावें,
भक्तिदान दीजै महारानी ।
नमो-नमो तुलसी महारानी,
तुलसी महारानी नमो-नमो ॥

तुलसी महारानी नमो-नमो,
हरि की पटरानी नमो-नमो ।

तुलसी विवाह

कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी को तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है, आज के पावन पर्व पर शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह कराकर पुण्यात्मा लोग कन्या दान का फल प्राप्त करते है,

पदम पुराण में कहा गया है की तुलसी जी के दर्शन मात्र से सम्पूर्ण पापों की राशि नष्ट हो जाती है,उनके स्पर्श से शरीर पवित्र हो जाता है,उन्हे प्रणाम करने से रोग नष्ट हो जाते है,सींचने से मृत्यु दूर भाग जाती है,तुलसी जी का वृक्ष लगाने से भगवान की सन्निधि प्राप्त होती है,और उन्हे भगवान के चरणो में चढाने से मोक्ष रूप महान फल की प्राप्ति होती है.अंत काल के समय ,तुलसीदल या आमलकी को मस्तक या देह पर रखने से नरक का द्वार बंद हो जाता है

धात्री फलानी तुलसी ही अन्तकाले भवेद यदिमुखे चैव सिरास्य अंगे पातकं नास्ति तस्य वाई

श्रीमद्भगवत पुराण के अनुसार प्राचीन काल में जालंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ़ बड़ा उत्पात मचा रखा था। वह बड़ा वीर तथा पराक्रमी था। उसकी वीरता का रहस्य था, उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। उसी के प्रभाव से वह सर्वजंयी बना हुआ था। जालंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गये तथा रक्षा की गुहार लगाई। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया। उधर, उसका पति जालंधर, जो देवताओं से युद्ध कर रहा था, वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही मारा गया। जब वृंदा को इस बात का पता लगा तो क्रोधित होकर उसने भगवान विष्णु को शाप दे दिया, ‘जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया है, उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छलपूर्वक हरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे।’ यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। जिस जगह वह सती हुई वहाँ तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ।

एक अन्य प्रसंग के अनुसार वृंदा ने विष्णु जी को यह शाप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है। अत: तुम पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, ‘हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।’

बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह है।


तुलसी जी के नामो के अर्थ 

  1. वृंदा :- सभी वनस्पति व वृक्षों की आधि देवी 
  2. वृन्दावनी :- जिनका उदभव व्रज में हुआ 
  3. विश्वपूजिता :- समस्त जगत द्वारा पूजित
  4. विश्व -पावनी :- त्रिलोकी को पावन करनेवाली 
  5. पुष्पसारा :- हर पुष्प का सार 
  6. नंदिनी :- ऋषि मुनियों को आनंद प्रदान करनेवाली 
  7. कृष्ण-जीवनी :- श्री कृष्ण की प्राण जीवनी 
  8. तुलसी :- अद्वितीय

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कलियुग के दोषों से कैसे बचे ?

प्र० : महाराजजी, कलिकृत विघ्नों का हम पर कोई प्रभाव न पड़े, ये कैसे हो, यानी कलयुग के दोषों से कैसे बचा जाए ?

समाधान : आगे मनुष्यों के लिए बड़ा अहितकारी समय आने वाला है क्योंकि धीरे धीरे महापुरुषजन लीला संवरण कर रहे हैं और जब संत नहीं रहेंगे तो दम्भ पाखण्ड का बोलबाला होगा, जीव छले जायेंगे लेकिन उस समय भी जो सच्चे सन्तों के सानिध्य में रहेंगे तो कलिकृत विघ्न आदि उस उपासक के ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकते। श्रीसेवकजू महाराज कहते हैं

कलि अभद्र वरनत सहस, कलि कामादिक द्वंद तब । सेवक शरण सदा रहै, सुविधि साँचे अनन्य सब ॥
(श्रीसेवकवाणी)

राधावल्लभ-भजत भजि भली भली सब होइ ।
जिते विनायक शुभ-अशुभ विन करैं नहिं कोई ॥
विघ्न करैं नहिं कोई डरैं कलि-काल कष्ट भय ॥
हरें सकल संताप हरषि हरिनाम जपत जय ।
(श्रीसेवकवाणी)

जब तक श्रीराधावल्लभ का भजन करने वालों का भजन अर्थात् उनका सान्निध्य, उनकी सेवा, उनका कृपा प्रसाद मिलता रहेगा तब तक कलियुग के जो अभद्र हैं वो सब डरते हैं, उस साधक को कहीं बाधा नहीं पहुँचा सकते हैं ।
चाहे जितनी आँधी आ जाए जो गाँव किसी पहाड़ की ओट में है तो वह सारा का सारा गाँव उस भयंकर आँधी-तूफान से बच जाता है; ऐसे ही एक भगवत्प्राप्त महापुरुष जहाँ होता है, वह बहुत बड़े वायुमंडल को विघ्नों से बचाता है। जो दीनता पूर्वक सदैव भजन परायण महापुरुष हैं वो महापुरुष इस संसार को नाना प्रकार की विपत्तियों से बचाने के लिए पहाड़ जैसे हैं। उन्हीं की छत्रछाया में हम जैसे लोग अधर्माचरण करते हुए भी आनंद से रह रहे हैं । आज के समय में अर्थ प्राप्ति, कामना पूर्ति, भोग-विलासिता यही हमारा उद्देश्य रह गया है। हमारा खूब यश हो जाए, हम खूब धनी मानी बन जाएँ और मनचाही भोग-सामाग्री हमें मिलती रहे बस यही हमारा जीवन का उद्देश्य बन गया है । जबकि भगवत-मार्ग के पथिक के लिए ये सब चीजें बाधक हैं

सुख सम्पति परिवार बड़ाई ।
सब परिहरि करिहऊँ सेवकाई ।
ये सब रामभक्ति के बाधक ।
कहहिं संत तव पद अवराधक ॥
(श्रीरामचरितमानस ४/७)

लेकिन यही सब चीजें हमारा लक्ष्य बन गयीं, अब दुर्दशा नहीं होगी तो और क्या होगा । धीरे-धीरे सच्चे संतों का अंतर्ध्यान होना हम लोगों के लिए अहित सूचक है; इसलिए शीघ्रातिशीघ्र ऐसी स्थिति बना लें कि इसी जन्म में भगवत्प्राप्ति हो जाए। अगर दूसरा जन्म भी हो तो कर्मबंधन के अधीन न हो, भगवद् अनुराग से युक्त हो।

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भगवान को कैसे पहचाने ?



प्र० महाराजजी, संतजन कहते हैं कि भगवान् किसी भी रूप में आ जाते हैं तो हम उन्हें पहचानें कैसे ?

समाधान – जो भी रूप सामने आये, सबको प्रणाम करने की आदत डाल लो –

तुलसी या संसार में सबसों मिलिए धाय ।
न जाने केहि वेश में नारायण मिलि जाएँ ॥

सही पूछो तो भगवान् किसी भी रूप में नहीं आते बल्कि भगवान् तो सभी रूपों में हैं ही; सबकुछ प्रभु ही बने हुए हैं.

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः । (गीताजी ७/१९)

जब सृष्टि नहीं थी तब केवल भगवान् श्रीकृष्ण थे, जब सृष्टि नहीं रहेगी तब भी केवल भगवान् श्रीकृष्ण रहेंगे तो बीच में जो कुछ बने हुए हैं वो प्रभु ही तो बने हुए हैं, दूसरा कोई है ही नहीं । जब तक अज्ञान की दृष्टि है तब तक दूसरा दिखाई पड़ता है

वासनात् वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ (विष्णुसहस्त्रनामस्तोत्र)

‘त्रिभुवन जिनकी सत्ता भाव से सुवासित है, सभी प्राणियों के हृदयस्य ऐसे वासुदेव श्रीकृष्ण को नमस्कार है ।”

इसीलिये जो भी सामने आए हमारे प्रभु ही इस रूप में हैं ऐसा मानकर उसको प्रणाम करोगे वो धीरे-धीरे दृष्टि बदलेगी और आपको सही मायने में दिखाई देने लगेगा कि प्रभु ही सब रूपों में है । जैसे गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कह रहे हैं

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।
बंदउँ सबके पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥

( श्रीरामचरित. १७) समस्त जड़-चेतनात्मक जगत् प्रभु का ही स्वरुप है, ऐसा जानकर मैं सबको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ । गोपीजन कहती हैं – “जित देखूँ तित श्याममयी है, सारा जगत् श्यामसुन्दर ही है, ऐसा गोपीजनों को अनुभव हुआ । अगर आप भी अभ्यास करेंगे तो आपको भी अनुभव होने लगेगा क्योंकि भगवान् ही सब रूपों में हैं । श्रीनामदेवजी का चरित्र पढ़कर के देखो – ‘कुत्ता, प्रेत, मुगल सिपाही’ उन्होंने सभी में भगवद्भाव किया तो वहीं वहीं उन्हें प्रभु के दर्शन हुए ।

अपवित्र मन ये बात नहीं समझ सकता कि ‘प्रभु कहीं कुत्ते प्रेत में भी हो सकते हैं, ये दुष्ट कहीं प्रभु हो सकता है ये बातें मन में आती रहेंगी । जब तक हमें प्रभु के अलावा कुछ और दिखाई दे रहा है तो समझो अभी हमारा अन्तःकरण अशुद्ध है । दे अन्तःकरण में ये बात समझ में नहीं आती है कि सब रूपों में प्रभु हैं ; इसलिए पहले साधन (नामजप, कथा-कीर्तन) आदि के द्वारा अन्तःकरण को पवित्र करो, ज्यों ही अन्तःकरण पवित्र हुआ तो दिखाई देने लगेगा कि चराचार जगत् के रूप में वही एकमात्र सच्चिदानंद प्रभु है ।

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साधक का व्यवहार कैसा होना चाहिए ?


प्र० पहले मैं किसी से बात नहीं करती थी, बहुत एकान्तिक रहती थी, अब गुरुदेव ! मेरा व्यवहार सबसे बढ़ने लगा है ?

समाधान : ये बहुत बड़ी हानि की बात है, यदि अपनी उपासना पद्धति में लगना है तो

न काहू सॉ बोलिबो, न काहू सो व्यवहार । अपनी कुँवार किशोरी को जियत निहार-निहार ॥

व्यवहार हर उपासना में बाधक है । ये माया (प्रपंच) है, ये आता जाएगा बढ़ता जाएगा, इसलिए सम्बन्ध रहित उदासीन रहना चाहिए । ये प्रेमियों का मार्ग है, कोई आए तो एक बार हृदय में चुभना चाहिए की हमारा एकांत चला जाएगा

सुनत न काहूकी कही कहै न अपनी बात ।
नारायण वा रुप में मगन रहे दिन-रात ॥

श्रीपादप्रबोधानन्द जी ने भी वृन्दावनमहिमामृत में कहा है

कुरु न वद किञ्चद् विस्मराशेषदृश्यं स्मर मिथुनमहस्तद् गौरनीलं स्मरार्त्तम् ।
बहुजन समवायाद् दूरमुद्विज्य याहि
प्रिय निवसतु दिव्य श्रीलवृन्दावनान्तः ॥ (१/३२)

‘न तुम्हारे लिए कोई कर्त्तव्य है और न किसी से बोलो, दृश्यमान (दिखाई पड़ने वाले) सारे संसार को भूल जाओ, केवल तुम्हारा एक ही कर्तव्य है- प्रेमातुर उस गौर-नील जोड़ी का निरंतर चिंतन करना । जिस स्थान में बहुत लोग हों, उस स्थान से उद्विग्न चित्त होकर दूर एकांत में चले जाओ । इस तरह से दिव्य वृन्दावनधाम में वास करना चाहिए ।

प्रेमी को एकांत प्रिय होने लगता है, वार्ता तो उसे सुहाती ही नहीं । रात-दिन हमसे कोई न मिले, हम प्रियालाल के चिंतन में डूबे रहें, यही हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाए। हम एक-एक क्षण श्रीप्रिया प्रियतम के चिंतन में लगावें, इससे बढ़कर कुछ नहीं है। ज्यादा लोगों के साथ सम्बन्ध बनाने से अच्छे-अच्छों का पतन हो जाता है।

किसी से द्वेष मत करो लेकिन श्रीजी के अलावा न किसी से कोई व्यवहार करो और न परिचय जोड़ो । किसी से भी मिलो तो उदासीन भाव से । सम्बन्ध केवल श्रीजी से । ये बहुत फिसलन वाला मार्ग है, प्रभु की माया शक्ति बड़ी प्रबल है

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । (गी. ७/१४)
‘सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन।’ (मानस. ७/६२)
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । बलादाकृष्य मोहाय, महामाया प्रयच्छति ॥ (दुर्गासप्तसती)

‘बड़े-बड़े ज्ञानियों के चित्त को भी महामाया बलात् आकृष्ट करके मोह में डाल देती है ।’ बहुत विचित्र माया है – अनेकों रूप धारण करके आ जाती है; इसीलिये बहुत सावधानी से उदासीन भाव से रहते हुए, निरन्तर भजन परायण रहो । साधक को व्यवहार नहीं रखना चाहिए, व्यवहार शून्य जीवन होना चाहिए। अगर संग करना भी है तो

इष्ट मिलै अरु मन मिलै, मिलै भजन रस रीति ।
मिलियै तहाँ निसंक है, कीजै तिनसौं प्रीति ॥ (श्रीबयालीसलीसा)

जिनसे अपना आराध्यदेव, अपनी उपासना, अपना मन मिल रहा है, उन भक्तों से मिलते हैं और मिलने का तात्पर्य है- ‘अगर हमें कोई भगवद्वार्ता सुननी है तो अन्यथा सबको मानसिक प्रणाम कर लो, सम्बन्ध किसी से नहीं रखना है, क्योंकि आज उसमें गुण दिखाई पड़ रहे है कल दोष भी दिखाई पड़ेगा और अगर दोष देख लिया तो भक्ति की हानि होगी ।

ज्यादा व्यवहार करना उपासक के लिए बहुत हानिकारक है, अपनी कुटिया में कोई आये तो भगवद्भाव से उसे प्राणाम कर लो ‘हँसि बोलै बहु मान दै’, मृदु वचन से उसका सम्मान किया, जो रूखा सूखा है पवा दिया, प्रियालाल की बातें की, हमें किसी से अपना पर्सनल (निजी) सम्बन्ध नहीं बनाना है ।

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भगवत मार्ग में क्या सगे संबंधियों की परवाह करनी चाहिए ?


प्र० : महाराजजी कोई हमारा प्रिय सगा-सम्बन्धी है, अगर इस मार्ग में स्वयं नहीं चलना चाहता है किन्तु हमारी लालसा है चलने की, तो क्या हमें उसकी परवाह करनी चाहिए या नहीं ?

समाधान : श्रीतुलसीदास जी ने विनयपत्रिका में लिखा है –

‘जाके प्रिय न राम-बैदेही
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥

हमारा संसार में कोई सगा-संबंधी नहीं है, सब नाटक चल रहा है माया का । हमारे सगे-संबंधी केवल श्रीप्रिया प्रियतम हैं, बाकी यहाँ सब केवल स्वार्थ का सम्बन्ध है । जिसको हमसे जिस तरह से सुख मिल रहा है वह वैसा ही प्यार कर रहा है, जिस दिन सुख मिलना बंद हो जाएगा कोई हमसे प्यार नहीं करेगा । वेदों में लिखा है

न या अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न या अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।
न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति ।

(बृहदारण्यकोपनिषद् २/४/५)

कोई स्त्री पति से प्रेम करती है तो पति के सुख के लिए नहीं बल्कि अपने सुख के लिए: कोई पुरुष अपनी स्त्री से प्रेम करता है। उसके सुख के लिए नहीं अपितु अपने सुख के लिए; इसी तरह से पिता या पुत्र परस्पर एक दूसरे से जो प्रेम करते हैं वे स्वसुखवाँछा के लिए करते हैं तत्सुख के लिए नहीं । ये है संसारी प्रेम का स्वरूप । श्रीमद्भागवत में भी श्रीकृष्ण ने गोपियों से कहा है

मिथो भजन्ति ये सख्यः स्वार्थीकान्तोद्यमा हि ते ।
न तत्र सौहृदं धर्मः स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा ॥ (१०/३२/१७)

‘हे ब्रजदेवियो! संसार में जो लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, उनका सारा उद्योग स्वार्थ को लेकर है क्योंकि वहाँ लेन-देन का व्यापार है, ‘हम तुमसे प्रेम करेंगे तुम हमसे करो’ ये एकमात्र स्वार्थ है, प्रेम नहीं । न वहाँ सौहार्द है और न ही धर्म ” आप खूब घुसकर संसार में देख लो सर्वत्र एकमात्र स्वार्थ – ही स्वार्थ दृष्टिगोचर होगा, तभी तो महापुरुषों ने लिखा है –

सुर नर मुनि सब कै यह रीति ।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति ॥ (मानस ४/१२)

एक हमारे परिचित व्यक्ति थे, उनको लकवा मार गया था, उनकी एक बड़ी-सी बाजार में दुकान थी, बहुत चलती थी रहने के लिए कई मंजिल मकान उन्होंने बनवाया था । अब लकवा मार गया था तो उन्होंने हमें स्वयं अपनी स्थिति रोते हुए बताई । वे बोले कि देखो बेटा ! ये सब मेरा कमाया हुआ है । पत्नी की तरफ इशारा करके बोले कि मैं इसका पति हूँ और आज
यही स्त्री हमें भरपेट रोटी भी नहीं देती है, कहती है कि बार-बार शौच करोगे तो कौन फेकेगा। मेरे ही सामने दूसरे पुरुष से बात करती है और जब में डाटता हूँ तो मुझे थप्पड़ मारती है। बेटा मुझ कोई जहर लाकर के दे दे मैं मर जाऊं तो अच्छा है। मैं यहीं पड़े पड़े सब देखता रहता हूँ लेकिन कुछ बोल नहीं सकता । अब बताओ कैसा स्वार्थी संसार है । वह ये बता रहा था कि जब तक मैं कमा रहा था तो मैं जब घर में आता था तब यही हमारे पैरों से जूते-मोजे उतार कर रखती थी और बहुत प्यार दिखाती थी और आज जब मैं असमर्थ अवस्था में हैं तो वही मुझे गाली देती है, मारती है, भर पेट भोजन भी नहीं देती हैं।

अतः संसार में सब स्वार्थ का व्यापार है, एक मात्र प्रभु ही हमें सच्चा प्यार करने वाले हैं दूसरा कोई नहीं । वे बड़े भाग्यशाली जन हैं जो प्रभु प्राप्ति के इस मार्ग पर चल पड़ते हैं बिना किसी की परवाह किये । श्रीकृष्णचन्द्रजू महाराज ने स्वयं गीता जी में कहा

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (१८/६६)

न किसी कर्तव्य की परवाह करो और किसी धर्म की, एकमात्र मेरी शरण में आओ, अगर स्वधर्म त्याग से तुम्हें पाप भी लगेगा तो उससे मैं तुम्हें पावन करूँगा, तुम तो केवल मेरी शरण में आ जाओ । इसलिए हमें प्रभु के वचनों पर पूर्ण विश्वास रखते उनकी शरण ग्रहण करनी है और उसमें जो भी बाधक बने, उसकी तरफ ध्यान नहीं देना है अर्थात उनकी परवाह नही करनी है

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घर वाले ठाकुर सेवा नही करने देते ?


प्र० : महाराजजी, जब मैं घर में प्रभु की सेवा करती हूँ या भजन करती हूँ तो मेरे पति एवं घरवाले मुझे डाटते रहते हैं, मैं क्या करूँ ?

समाधान : ये तुम्हें सहना पड़ेगा, ‘गाली मिलना, निंदा होना, अपमान मिलना’ ये हमारे मार्ग के पुरस्कार हैं। जब ये मिलने लगें तो समझिये कि आपकी भक्ति में मोहर लग गयी, अब भक्ति चमकने वाली है । जितना लोग तुम्हारी निंदा करेंगे उतना ही तुम आगे बढ़ती चली जाओगी। श्रीरत्नावतीजी ने जब भगवत मार्ग में आगे बढ़ना चाहा तो उनका पति ही उनका कट्टर विरोधी हो श्रीमीराजी का राणा विक्रम विरोधी हो गया, सास विरोधी हो गयी ‘सास कहे कुल नासी रे’, ऐसे कितने चरित्र हैं भक्तों के, जब हम भक्तिमार्ग में आगे बढ़ते हैं तो ये सब बाधाएँ आती रहती हैं, हमें इनको सहना पड़ेगा । नामाचार्य श्रीहरिदासठाकुरजी का क्या दोष था लेकिन २२ बाजारों में उनको पीटा गया; ये इनाम है इस मार्ग का । हमारे प्रियतम से प्यार करने का ये इनाम है । जिसे इस मार्ग में चलना है तो फूल माला भी मिलेंगी और कोड़े भी मिलेंगे। प्रशंसा यानी जय जयकार भी होगी तो निंदा भी होगी, गालियाँ भी मिलेंगी। जब दोनों को समान भाव से स्वीकार करने की शक्ति आ जाएगी तब श्रीप्रियाप्रियतम मिल जायेंगे । इसलिए विरोध होगा ही होगा, अगर अभी नहीं हो रहा है तो इन्तजार करो आगे होना प्रारम्भ होगा। अरे, आपके परिवारीजनों की बुद्धि में बैठकर देवता उन्हें आपके खिलाफ कर देंगे; किसी भी भक्त के जीवन में देख लो, सबका विरोध हुआ। गया।

श्रीसखूबाईजी के चरित्र में आता है इन्होने बचपन से अपने घर से ही भक्ति प्रारंभ की थी, अब उनका विवाह जिस घर में हुआ तो पति और सास-ससुर तीनों दुष्ट प्रवृत्ति के थे । जब भी वे ठाकुर जी की सेवा पूजा करतीं या भजन-कीर्तन करतीं तो वे लोग उन्हें पीटते थे लेकिन वे सब सहती रहतीं तो इसका फल ये हुआ कि उनको साक्षात् प्रभु के एक सहेली के रूप में दर्शन हुए । अतः सहने की आदत डाल लेनी चाहिए ।

ओरछा में रानी भागमती जी हुई हैं, ये श्रीराधारानी की भक्त थीं । जब वो भजन करती थीं तो उनका पति (राजाओं की कई रानियाँ होती थीं) उनके ऊपर विस्तर (पलंग) बिछाता और उनका उपहास करने के लिए उसके ऊपर दूसरी रानी के साथ शयन करता और भागमती जी को मारता कोड़ों से, लेकिन भागमती रानी श्रीराधारानी के चरणों के चिन्तन में मगन रहतीं ।

“तो देखो सभी भक्तों के जीवन में कितने कष्ट आये, क्यों? ये भगवान् दिखाते हैं कि देखो, हमारे भक्त की सहनशीलता; तब वो भगवद्-रस का अधिकारी बनता है। अगर गाली मिलने लगे तो हर्षित हो जाओ कि ठाकुर के मिलने की सूचना आ गयी और अगर सम्मान मिलने लगे तो भयभीत हो जाओ कि कहीं फँस न जाएँ । सम्मान फँसा लेता है बड़े बड़ों को । इसीलिये भर्तृहरिजी ने महादेव जी की आराधना करके माँगा था की मैं जिस घर में भिक्षा के लिए जाऊं वहीं हमारा अपमान हो । मुझे अनादरपूर्वक भिक्षा मिले । श्रीनागरीदासजी महाराज ने एक पद में लिखा है

बड़ौई कठिन है भजन ढिंग ढरिबौ ।

तमक सिंदूर मेलि माथे पर, साहस सिद्ध सती कौ सौ जरिबौ ॥

रण के चार घायल ज्यौं घूमै, मुरै न गरूर सूर कौ सौ लरिबौ । नागरीदास सुगम जिन जानों, श्रीहरिवंश पंथ पग धरिबौ ॥ भजन करना कोई खेल नहीं है, भजन के लिए शूरवीर बनना पड़ता है; शूर वह होता है युद्ध में सिर कटने पर भी जिसका धड़ आगे बढ़ता जाता है –

सूर सोई रन भूमि कौं, तजै न जब लगि प्रान ।
धर्मी ऐसी चाहिये, उर नहिं आनै आन ॥ (श्रीबयालीसलीला)

वह युद्ध ही क्या जिसमें घाव न हों, वह योद्धा ही क्या जिसके खरोंच न लगी हो,अगर भगवत-मार्ग में चले और इसलिए किसी भी बाधा से घबड़ाना नहीं चाहिए, उसका डटकर सामना करना चाहिए ।

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क्या वृन्दावनधाम कृष्णावतारकाल के पूर्व भी था ?


प्र० महाराजजी, क्या वृन्दावनधाम कृष्णावतारकाल के पूर्व भी था ?

समाधान : वृन्दावन श्रीकृष्णावतारकाल द्वापरान्त के समय ही प्रकट नहीं हुआ अपितु वृन्दावन नित्य है, सनातन है, कालातीत है ।

श्रीहरिरामव्यास जी ने लिखा है

फनि पर रवि तर नहिं विराट महँ नहिं संध्या नहीं प्रात ।
माया काल रहित नित नूतन सदा फूल फल पात ॥

महाप्रलय में भी इसका नाश नहीं होता है क्योंकि यह ब्रह्माजी द्वारा रचित सृष्टि में नहीं है, उससे अलग है । शेष जी के फण के ऊपर नहीं है । यह सूर्य-चन्द्र से प्रकाशित नहीं है अपितु तेजोमय है और स्वयंप्रकाशित है; गीताजी में भी भगवान् ने कहा है

‘न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्कको न पावकः । (१५/६)

जब अवतार होता है तो यही चिदानंद स्वरूप धारण कर लेता है । ऐसा नहीं कि ये वृन्दावन द्वापर में प्रकट हुआ, इसके पहले वृन्दावन नहीं था; श्यामा श्याम की रसमयी लीलाएँ नहीं थीं । प्रियालाल के ‘नाम-रूप-लीला और धाम ये सब अनादि तत्त्व हैं । युगलकिशोर श्रीलाड़िली-लाल अनादिकाल से अनन्तकाल तक नवनिभृत निकुँज श्रीवृन्दावनधाम में अद्भुत रसमयी केलि करते रहते में हैं। श्रीध्रुवदासजी ने कहा है- ‘न आदि न अन्त विहार करें दोउ’ ये हमारी जोरी अनादि और अनन्त है । अवतार काल के समय इसी सदा सनातन एकरस जोरी निकुँज बिहारी-बिहारिनजू के अंश से नन्दनन्दन और वृषभानुनन्दिनी का प्राकट्य होता है ।

जिस वृन्दावन धाम में हम सब बैठे हैं, यह अनादि धाम हैं । अवतार काल में व्रज वृन्दावन का जो स्वरूप प्रकट होता है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवतादि पुराणों एवं गर्गसंहिता में मिलता है, वह इसी नवनिभृत निकुँज वृन्दावनधाम से ही प्रकट होता है । गोलोकधाम का संचालन भी इसी वृन्दावनधाम से होता है । यद्यपि जो महापुरुषजन गोलोकधाम की प्रधानता का भाव रखने वाले हैं वे ऐसा मानते हैं कि गोलोक से वृन्दावन इस भूलोक पर उतरा है –

वेदनागक्रोशभूमिं स्वधाम्नः श्रीहरिः स्वयम् ।
गोवर्धनं च यमुनां प्रेषयामास भूपरि ॥ (गर्गसंहिता)

वह जैसा भी मानें ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ जो जिस प्रकार का भाव करेंगे वैसे ही अनुभव में आयेगा; पर हमारे रसिकजन मानते हैं कि इसी धामी-धाम से अन्य धाम एवं धामी प्रकाशित हुए हैं। मूल महल यह वृन्दावनधाम है ।

यही है यही है भूलि भरमौ न कोऊ
भूलि भरमें ते भव भटक मरिहौ ॥ (श्रीमहावाणीजी)

इस धाम में जो जोरी रास-विलास परायण है, वह भी निर्गुण और सगुण दोनों से परे है और उसी से निर्गुण-सगुण की सत्ता है –

नहिं निर्गुन, सर्गुन नहीं, नहीं नेरे नहिं दूरि ।
भगवत रसिक अनन्य की, अद्भुत जीवन मूरि ॥
(श्रीभगवतरसिकजी)

श्रीहरिराम व्यासजी भी कहते हैं- ‘निर्गुण सगुण ब्रह्म ते न्यारी’, यह जोरी निर्गुण और सगुण ब्रह्म दोनों से न्यारी है लेकिन यह बात वृन्दावन की रज और रसिकों की कृपा से ही समझ में आयेगी। जिनको रजरानी का सेवन करने को और रसिकों का संग मिला, उनके लिये यह जोरी बहुत नजदीक है; क्योंकि जहाँ हम सब बैठे हैं, यह जोरी इसी धाम में क्रीड़ा परायण है

यद्वृन्दावनमात्रगोचरमहो यन्त्र श्रुतीकं शिरो
प्यारोढुं क्षमते न यच्छिवशुकादीनां तु यद्-ध्यानगम् ॥ (रा.सु.नि ७६)

महाप्रेमरस स्वरूप हमारी नवकिशोर किशोरी युगलजोरी, वह एकमात्र नवनिभृत निकुँज वृन्दावन में ही गोचर है । यह जोरी न तो वेदों के अनुसार साधना करने पर मिल सकती है और न बड़े-बड़े महापुरुषों के ध्यान में आती है यह तो केवल वृन्दावन रजरानी की कृपा से जो सहचरीभावापन्न रसिकाचार्यों की शरण लिए हुए हैं एवं उनके द्वारा उपदिष्ट उपासना पद्धति के अनुसार उपासना परायण हैं, तथा अपने मन व प्राण सब कुछ समर्पित किये हुए हैं, उनके हृदय में ये जोरी सहज रूप में प्रकाशित हो जाती है अन्यथा अति दुर्लभ और अति दूर है यह जोरी ।

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कृष्ण का साक्षात्कार कैसे हो?


महाराज श्री, श्रीकृष्ण साक्षात्कार कैसे और कब होता है ?

समाधान – बिना श्रीकृष्ण बने श्रीकृष्ण का साक्षात्कार नहीं होता है, जब हमारा अन्तःकरणचतुष्टय ‘मन, बुद्धि, चित्त, अहं’ सब श्रीकृष्ण बन जाए यानी सम्पूर्ण अन्तःकरण कृष्णमय हो जाए तो जिधर दृष्टि डालो वहीं कृष्ण ही दिखाई पड़ेंगे । पहले अन्तःकरण की वृत्तियों को निरंतर कृष्ण सुमिरन से कृष्णमय बनाओ । जब हमारे रोम-रोम, श्वाँस-श्वाँस से नाम निकलेगा तब नामी अपने आप आ जाएगा । खूब नामजप करते हुए भजन परायण रहो, इसी से प्रभु से प्रेम और प्रेम होने पर उनका साक्षात्कार हो जाएगा। अब इसमें सावधानी ये रखनी है कि हर समय दीनता का भाव बना रहे कि मैं नामजप कर नहीं रहा हूँ, प्रभु कृपा करके करा रहे हैं । मैं तो इतना नीच हूँ कि एक ‘राधा नाम या कृष्ण नाम भी नहीं बोल सकता हूँ श्रीहितहरिवंश महाप्रभु जी ने एक स्थान पर श्रीराधासुधानिधि में कहा है

क्वाहं तुच्छः परममधमः प्राण्यहो गर्ह्यकर्मा
यत्तन्नाम स्फ़ुरति महिमा एष वृन्दावनस्य || (२६०)

‘कहाँ तो मैं तुच्छ, परम अधम और निंदनीय कर्म करने वा साधारण प्राणी और कहाँ श्रीप्यारीजू का महामहिमामय नाम; इसलिए मैं जो ‘राधा’ नाम ले रहा हूँ ये इस वृन्दावन धाम की कृपा है अन्यथा वृन्दावन की कृपा के बिना कोई ‘राधा’ नाम ले ही नहीं सकता ।’ अतः हमसे जो नामजप हो रहा है, वह प्रभु करुणा करके करा रहे हैं, मुझे अपनी तरफ घसीट रहे हैं ऐसी दीनता से युक्त साधक बहुत जल्दी आगे बढ़ जाता है। अगर ये भाव रहा कि मैं इतना भजन कर रहा हूँ तो लड़खड़ाना पड़ता है, गिरना पड़ता है। क्योंकि अहंकार की धुलाई आवश्यक है

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ । जन अभिमान न राखर्हि काऊ || संसृति मूल सूलप्रद नाना । सकल सोक दायक अभिमाना ॥ ताते करहिं कृपानिधि दूरी । सेवक पर ममता अति भूरी ॥

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प्रभु को कैसे पहचाने ?




महाराजजी, संतजन कहते हैं कि भगवान् किसी भी रूप में आ जाते हैं तो हम उन्हें पहचानें कैसे ?

समाधान- जो भी रूप सामने आये, सबको प्रणाम करने की आदत डाल लो

तुलसी या संसार में सबसों मिलिए धाय ।
न जाने केहि वेश में नारायण मिलि जाएँ ॥

भगवान् सही पूछो तो भगवान् किसी भी रूप में नहीं आते बल्कि तो सभी रूपों में हैं ही; सबकुछ प्रभु ही बने हुए हैं. वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः । (गीताजी ७/१९)

जब सृष्टि नहीं थी तब केवल भगवान् श्रीकृष्ण थे, जब सृष्टि नहीं रहेगी तब भी केवल भगवान् श्रीकृष्ण रहेंगे तो बीच में जो बने हुए हैं वो प्रभु ही तो बने हुए हैं, दूसरा कोई है ही नहीं जब तक अज्ञान की दृष्टि है तब तक दूसरा दिखाई पड़ता है।

वासनात् वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ (विष्णुसहस्त्रनामस्तोत्र)

‘त्रिभुवन जिनकी सत्ता भाव से सुवासित है, सभी प्राणियों के हृदयस्थ ऐसे वासुदेव श्रीकृष्ण को नमस्कार है ।’ इसीलिये जो भी सामने आए हमारे प्रभु ही इस रूप में हैं। ऐसा मानकर उसको प्रणाम करोगे तो धीरे-धीरे दृष्टि बदलेगी और आपको सही मायने में दिखाई देने लगेगा कि प्रभु ही सब रूपों में हैं। जैसे गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कह रहे हैं

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।
बंदउँ सबके पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥
( श्रीरामचरित १ ७ )

समस्त जड़-चेतनात्मक जगत् प्रभु का ही स्वरुप है, ऐसा जानकर मैं सबको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ । गोपीजन कहती हैं – “जित देखूँ तित श्याममयी है’, सारा जगत् श्यामसुन्दर ही है, ऐसा गोपीजनों को अनुभव हुआ । अगर आप भी अभ्यास करेंगे तो आपको भी अनुभव होने लगेगा क्योंकि भगवान् ही सब रूपों में हैं । श्रीनामदेवजी का चरित्र पढ़कर के देखो ‘कुत्ता, प्रेत, मुगल सिपाही’ उन्होंने सभी में भगवद्भाव किया तो वहीं वहीं उन्हें प्रभु के दर्शन हुए ।

अपवित्र मन ये बात नहीं समझ सकता कि ‘प्रभु कहीं कुत्ते प्रेत में भी हो सकते हैं, ये दुष्ट कहीं प्रभु हो सकता है ये बातें मन में आती रहेंगी । जब तक हमें प्रभु के अलावा कुछ और दिखाई दे रहा है तो समझो अभी हमारा अन्तःकरण अशुद्ध है । गन्दे अन्तःकरण में ये बात समझ में नहीं आती है कि सब रूपों में प्रभु हैं; इसलिए पहले साधन (नामजप, कथा-कीर्तन) आदि के द्वारा अन्तःकरण को पवित्र करो, ज्यों ही अन्तःकरण पवित्र हुआ तो दिखाई देने लगेगा कि चराचार जगत् के रूप में वही एकमात्र सच्चिदानंद प्रभु है ।

जय जय श्री राधे

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गोपी भाव और सखी (सहचरी ) भाव में क्या अन्तर है ?




दोनों ही भाव श्रृंगाररस के अन्तर्गत हैं गोपी (कांता) – भाव माने माधुर्य रस और सहचरी भाव माने महामाधुर्य रस ।

गोपी (कांता) भाव में श्रीकृष्ण की प्रधानता है, श्रीकृष्ण हमें मिलें आलिंगन आदि करें; जैसे रासपंचाध्यायी में गोपीगीत में गोपियों ने श्रीकृष्ण से याचना की ‘प्रेम वीक्षणम्’ या ‘नस्तेऽधरामृतम्’; हे कृष्ण! आप प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखो, हमें अपने अधरामृत का पान कराओ ।

सहचरी भाव में श्रीराधाचरणारविन्द की प्रधानता है । सहचरियाँ श्रीकिशोरीजू की निज दासी हैं; और श्रीप्रिया प्रियतम की बड़े दुलार से आठों प्रहर सेवा करती है; पर गोपियों की भाँति दासी के मन में यह कामना नहीं होती कि कृष्ण हमें आलिंगन आदि देकर आनंद प्रदान करें; सहचरी की तो एकमात्र यही इच्छा रहती है कि श्रीप्रिया प्रियतम आपस में मिलें, हम उनकी सेवा में मगन रहें, उनको सुख पहुँचाते रहें, उनको आशीर्वाद देते रहें –

‘जैश्रीहित हरिवंश लाल-ललना मिलि, हियौ सिरावत मोर ।
‘दै असीस हरिवंश प्रसंसत, करि अंचल की छोर ।’
‘जैश्रीहितहरिवंश असीस देत मुख, चिरजीवौ भूतल यह जोरी ॥
‘दै असीस हरिवंश प्रसंसत, करि अंचल की छोर ।’
देत असीस निरखि जुवतीजन, जिनकै प्रीति न थोरी ।
जै श्रीहित हरिवंश विपिन भूतल पर, संतत अविचल जोरी ॥

श्रीप्रियालाल की सुख सामाग्री सँजोना, दोनों को सुख प्रदान करना, दोनों को दुलार करना, दोनों को आशीर्वाद देना यही सहचरी भाव है; मतलब उनसे सुख लेने की कोई भावना नहीं; क्योंकि दोनों ही सहचरियों के प्रीतम हैं ‘विहरत दोऊ प्रीतम कुञ्ज । अगर श्रीकृष्ण किसी सहचरी को आलिंगन आदि प्रदान करते भी हैं (सहचरियों को श्रीलालजू की अयाचित कृपा प्राप्त होने पर ) तब भी उनका मन, श्रीस्वामिनी जू के श्रीचरणों के रस विलास में मग्न रहता


निजप्राणैश्वर्या यद् अपि दयनीयेन्यमिति मां मुहशुम्बत्यालिङ्गतिसुरतमाध्व्या मदयति ।
विचित्रां स्नेहर्धिं रचयति तथाप्यद्भुतगतेस्
तवैव श्रीराधे पदरसविलासे मम मनः ॥ (रा.सु.नि. ५५)

महाराज जी दास्य भाव और दासी भाव में क्या अन्तर है ?

दास्य-भाव में ऐश्वर्य रहता है, ये हमारे भगवान् अनन्त ब्रह्माण्डों के स्वामी, अनन्त महिमा वाले हैं । श्रीरूपगोस्वामी जी दास का लक्षण भक्तिरसामृतसिन्धु में लिखते हैं

दासास्तु प्रश्रितास्तस्य निदेशवशवर्तिनः ।
विश्वस्ताः प्रभुता ज्ञान विनम्रतधियश्च ते ॥

आज्ञाकारी, विश्वासी, स्वामी की महिमा का ज्ञान रखने वाले और विनम्र मति वाले होते हैं ।’ ऐश्वर्य रहने के कारण दास संकोच में रहता है वो कुछ कह नहीं सकता, अपनी मन की सेवा नहीं कर सकता; जैसी आज्ञा हुई वैसा करता है और यहाँ दासी (किंकरी, सहचरी) भाव में भगवद् ऐश्वर्य का विस्मरण होकर उन्हें आठों प्रहर दुलार देना, आशीर्वाद देना –

ऐसें ही रंग करौ निशि-बासर, वृन्दाविपिन कुटी अभिराम ( श्रीहितचतुरासी ५६ )

बिलकुल लाड़ भरी सेवा, प्यार भरी सेवा; यह हमारे भगवान् नही हमारे प्रिया प्रियतम, हमारे लाड़िली लाल । देखो वृन्दावन में ‘राधावल्लभ लाल, राधारमणलाल, बाँके विहारीलाल; वहाँ दास्य भाव में ऐश्वर्य की प्रधानता है और ऐश्वर्य में खुलकर के सेवा नहीं हो पाती हैं । दास हर समय स्वामी के समक्ष ग्रीवा झुकाए खड़ा रहेगा और जो आज्ञा होगी, वही करेगा । यहाँ ऐसा नहीं है यहाँ हमारे ही मन के अनुसार सेवा होगी; क्योंकि हमारा (सहचरी का) मन श्री जी का मन, श्री जी का मन हमारा मन –

‘मन-मन की रुचि जानि नेह-विधि अनुसरैं ।’

श्रीप्यारीजू और श्रीप्यारेजू दोनों हमारे प्राण प्यारे हैं; यहाँ ये स्मरण नहीं रहता कि ये भगवान् हैं । बहुत प्यार भरी सेवा है निकुँज की उपासना में ।