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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 69

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 69)

!! नन्दीश्वर पर्वत !!


गिरिराज गोवर्धन को दाहिनी ओर करके बृषभान जी के साथ बृजराज श्री नन्द जी , नन्दीश्वर पर्वत की ओर चल दिए थे ………

और पीछे पीछे सारे गोप ग्वाल, गोपी , गौएँ सब ।

क्या दिव्य शोभा थी गिरिराज की ………

अपलक नयनों से कन्हैया गोवर्धन के शिखर को देखते चल रहे थे ।

ये पर्वत भगवान नारायण का स्वरूप है…….महर्षि शाण्डिल्य नें बृजराज को बताया …….ये सुनकर बृजराज की श्रद्धा गिरी गोवर्धन के प्रति ओर बढ़ गयी , और बड़े प्रेम से हाथ जोड़कर प्रणाम किया था बृजराज नें ।

तीनों देव यहीं वृन्दावन में ही वास करते हैं ……..महर्षि प्रसन्नचित्त से ये बात कहते हुए चल रहे थे ।

कैसे भगवन् ! बृजराज नें प्रश्न भी किया ।

बृषभान जी भी बड़ी श्रद्धा से सुन रहे हैं महर्षि की बातें ।

गोवर्धन पर्वत ये नारायण स्वरूप हैं…….और जहाँ बृषभान जी रहते हैं ….जिस पर्वत की तलहटी में ये रहते हैं …….इनका महल है …..उस पर्वत का नाम है “ब्रह्माचल पर्वत” …..वो ब्रह्मा जी का स्वरूप है ।

और नन्दीश्वर पर्वत जो इनके बरसाना के पास ही है ……..वो भगवान शंकर का स्वरूप है ।

महर्षि ! मैं चाहता हूँ कि उसी नन्दीश्वर पर्वत की तलहटी में बृजराज अपना महल बनावें …..और उसके आस पास की जितनी भूमि है …..और मित्र बृजराज को जितना चाहिये – मै दूँगा ………महर्षि को ये बात हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक बृषभान जी बोले थे ।

“आप जैसा उचित समझें” ……….बृजराज मुस्कुराते हुए बोले ।

बैल गाड़ियां चल ही रही थीं …..रथ अपनी गति से दौड़ ही रहे थे ।

गौएँ आनन्दित, और स्वतंत्रता अनुभव कर रही थीं ।

भगवान शंकर अति आनन्दित हैं…….और क्यों न हों स्वयं परब्रह्म श्रीकृष्ण चन्द्र उनके यहाँ रहनें के लिये पधारे थे ।

शनिदेव तो इसी दिन की प्रतीक्षा में ही थे ……….कि कब हमारे यहाँ श्रीकृष्ण चन्द्र जु पधारेंगे …….और आज वो सुदिन आही गया था ।

मणिमाणिक्य सब प्रकट कर दिए थे शनिदेव नें ।

यक्ष लोक में कुबेर के पुत्रों नें जाकर श्रीकृष्ण के बारे में सब बताया था ……”जीवन का लक्ष्य मात्र श्रीकृष्ण प्रेम ही हो सकता है”…………

और भी बहुत कुछ बताया था नलकूबर, मणिग्रीव नें अपनें पिता कुबेर को ………ये सब सुनकर दर्शन के लिये कुबेर अपनें यक्ष लोक से पधारे ……….और बृजरानी के क्रोड में खेलते नन्दनन्दन के दर्शन करके अत्यधिक आनन्द की अनुभूति करनें लगे थे ।

ये है नन्दीश्वर पर्वत ।

……बैल गाड़ियाँ रोक दी गयीं …….रथों को रोक दिया गया ………गौओं को बड़े प्रेम से चारा इत्यादि खिलाया जानें लगा ।

हे मित्र बृजराज ! यही है नन्दीश्वर पर्वत ………बृजराज और ब्रजेश्वरी नें जब देखा…….तो दोनों नें ही झुक कर उस पर्वत को भगवान शंकर का स्वरूप मानकर प्रणाम किया था ।

पर आनन्दित तो भगवान शंकर भी हुए थे…….उन्होंने भी कन्हैया के माता पिता को वन्दन किया ।

यहाँ आप अपना महल बनावें……….बृषभान जी नें कहा ।

महर्षि शाण्डिल्य नें मुस्कुराकर उस स्थान में महल बनानें का अनुमोदन किया – बृजराज से ।

“और इसके आस पास का जितना क्षेत्र है सब आपका……..”

उदारमन से बृषभान जी बोले ।

आप चाहें तो पास में ही वो भूमि जो दिखाई दे रही है ……..वहाँ अपना “कोषागार” बना सकते हैं…….क्यों कि वो दिशा कुबेर की है ।

बृषभान जी के ये सब दिखानें के बाद……….कुबेर उसी स्थान पर जाकर बैठ गए थे ……जहाँ नन्द महाराज कोषागार बनानें वाले थे ।

उपनन्द जी नें नन्दीश्वर स्थान को देखा……हरियाली थी ……पास में ही यमुना बह रही थीं…….वन प्रदेश अत्यन्त मोहक था ……..पक्षियों का कलरव निरन्तर कर्ण रंध्रों को सुख पहुँचा रहा था ।

उपनन्द जी बहुत प्रसन्न हुए ………….ग्वालों को आदेश दिया ……..बैलों को निकाल कर गाड़ियों को एक तरफ पँक्ति बद्ध लगा दो ।

और उनके ऊपर सुन्दर वस्त्र तान दो…….उसे सजा दो…….उसी में आज की रात्रि हम सब रहेंगे ।

उपनन्द जी बोले –

आज की रात्रि इस तरह से बिताई जाए ……….कल देखेंगे कि क्या किया जा सकता है ……………उपनन्द जी नें प्रसन्नता पूर्वक ये बात कही …….और उन समस्त ग्वालों से भी पूछा …….आप लोगों को कुछ कहना हो तो कह सकते हो ………..

हे उपनन्द जी ! हम आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि ……..जहाँ हम आज अपनें छकडे सजाकर रखेंगे…….रहेंगे आज की रात …….वहाँ से हमें कल न हटाया जाए…..हमारा भवन उसी स्थान पर ही बनेगा ।

उपनन्द जी हँसे……ए मेरे भोले बृजवासियों ! हमनें कभी भेद नही किया कि हम राजा हैं और आप लोग हमारी प्रजा हो…..हम सब एक ही हैं…..कोई भेद नही है…………..आप लोगों की जहाँ
इच्छा हो……वहीँ अपनें छकडे लगाइये ……और वहीँ आपका भवन भी कुछ काल बाद बन ही जाएगा ।

बोलो ! वृन्दावन धाम की ….जय !

प्रसन्नता से उछल पड़े थे बृजवासी ।

अब सब अपना अपना स्थान खोजनें लगे ………..नन्द महल के पास ही हम रहेंगे …………कोई कहता है ………हम तो ऐसी जगह रहेंगे जहाँ से नन्दनन्दन दिखाई देते रहें ………कोई कहता है ……हमें वो जगह दे दो …….क्यों की खेलनें के लिये वहाँ आएगा नन्द लाल ।

बृजराज हँसते हैं……..सब हमारे महल में ही आजाना ।

बृषभान जी हँसते हैं………सब आनन्दित हैं ……गोकुल की किसी को याद भी नही आरही…….अपनें अपनें छकडे को सजा कर उसमें अपनी सामग्रियों को रखकर ……….बृजगोपीयाँ मटकी लेकर चलीं यमुना से जल भरनें …..अब भोजन भी तो बनाना है ।…..गोप भी वृन्दावन की शोभा देखना चाहते हैं ……वो भी चले गए ।

कन्हैया कैसे रह जाते ………..बलभद्र, मनसुख, मधुमंगल ,भद्र, तोक इन सबके साथ वन की शोभा देखनें निकल पड़े थे कन्हैया ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 68

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 68)

!! गिरी गोवर्धन पर बृषभान जी का आगमन – “वृन्दावन यात्रा” !!


दिव्य है वृन्दावन, अनादि है वृन्दावन , सच कहूँ तो वृन्दावन का नाम स्मरण भी कोई कर ले तो “श्रीकृष्ण कृपा” का भाजन वो प्राणी हो जाता है ।…… ..वृन्दावन , ऐसा कोई पुकारे भी तो श्रीराधा उसे अपनाकर, श्रीकृष्ण प्रदान कर देती हैं ………वृन्दावन तीर्थ नही है तात ! ये पुरी नही है ……ये चार धामों में भी कहाँ आता है …….ये तो नित्य निकुञ्ज है श्रीराधा श्याम सुन्दर का ………यहीं विहार है…..सत्य और प्रेम का ……यहीं विहरते हैं आनन्द और प्रेम …….यह भूमि ही चैतन्य है ………..तात ! यहाँ प्रवेश करते ही आनन्द सिन्धु में अवगाहन करनें लगता है प्राणी……….ये श्रीधाम वृन्दावन है ।

हाँ ……वृन्दावन बृहद है ……….वृन्दावन में ही गिरी गोवर्धन भी है ……बृहत्सानुपुर ( बरसाना ) भी है ………….यमुना भी हैं ………..ये “बृहद वृन्दावन” हुआ ।……एक वृन्दावन है “गोष्ठ वृन्दावन” ….जो गोचर भूमि है ….जहाँ अब गौचारण करेंगे कन्हैया ……….और एक वृन्दावन है ……. “सरस वृन्दावन” ……जहाँ प्रेम का रस सदैव बहता है ……और अपनी प्रिया श्रीराधारानी से प्रेमालाप में लीन रहते हैं श्याम सुन्दर ।

वृन्दावन , वृन्दावन, वृन्दावन ….

..तीन बार ऊँची साँस लेते हुए उद्धव नें इन नामों का उच्चारण किया ।

विदुर जी गहरे आनन्द सिन्धु में डूब चुके थे ।

ब्रह्ममुहूर्त का समय हो गया है ……सब बृजवासी जाग गए हैं ।

स्नानादि से शुद्ध होकर सन्ध्या इत्यादि में लग चुके थे बृजराज ।

भगवान नारायण की पूजा अर्चना करके अब ध्यान कर रहे हैं ।

कोई गोप स्नान करनें जा रहा है यमुना …….तो कोई स्नान करके आगया है ……बड़े बड़े नाविक खड़े हैं नावों को लेकर ……अब ये सब यमुना पार जायेंगे ………।

देवी ! अभी मत जगाना कन्हैया को ……….क्यों की पहले गौ इत्यादि पार होंगीं उसके बाद नौकाओं का सेतु बनेगा बैल गाड़ियाँ उस सेतु से होकर गुजरेंगी…उसमें अभी समय लगेगा……..बृजराज नें पूजा अर्चना से निवृत्त होकर ब्रजेश्वरी से कहा था ।

पर “कृष्ण बलराम तो जल क्रीड़ा कर रहे हैं”……….इनके जगे हुए तो घड़ी भर से भी ज्यादा हो गया …..बृजरानी नें दिखाया ।

छपाक , छपाक ………कई सखाओं के साथ ……….राम कृष्ण जल में खेल रहे हैं…….जल क्रीड़ा में उनकी शोभा अलग ही बन रही है ।

सारी गोपियाँ भी वहीँ आकर खड़ी हो गयीं …………और अपनें नयनों को शीतल करनें लगीं कन्हैया को देखकर ……….ग्वाले भी अब इधर ही आने लगे थे ………..अपनें प्राण धन कन्हाई को देखनें ……….

पर हँसते हुये उपनन्द जी नें कहा ……….ग्वालों ! इधर आओ …….उधर मत जाओ ……..मुझे पता है ……नन्दनन्दन को देखनें के बाद तुम लोग किसी काम के ही नही रहते ……..इसलिये इधर आओ ….और पहले गौओं और बृषभ – इनको यमुना के पार पहुँचाओ ।

उपनन्द जी की बात सबनें सुनी और …..चलो ! चलो ! गायों को पहुँचाना है परली पार ………चलो ! ये कहते हुए सहस्रों ग्वाले यमुना में उतर गए ………..और गायों को आगे किया ………उनके पीछे उनके बछड़ों को …………गायें निश्चिन्त होकर जा रही हैं …..निर्भर तो गौ के बछड़े हैं ……..क्यों की उनकी माँ उनके आगे ही है ।

“सम्भाल कर …..गौएं यमुना में बहनी नही चाहियें” ……….

मनसुख जल में कन्हैया के साथ खेलते हुए ही चिल्ला उठा था ।

कन्हैया भी मनसुख की नकल करके चिल्लाये ………..गौएँ यमुना में बहनी नही चाहिए …………..बलभद्र भी चिल्लाये ………..सखा सब यही बोल कर चिल्ला रहे हैं ………वो शोभा देखते ही बनती थी ।

कुशल तैराक हैं ……..जो छोटी बछिया है …….उसे कन्धे में रख कर पार कराया जा रहा है ….तैराकों के द्वारा ।

सब ग्वाल सखा और कन्हैया, इस दृश्य को देखकर बहुत प्रसन्न हैं ।

पर गौएँ भी बहुत प्रेम करती हैं अपनें गोपाल से ……….पार जाना चाहिए …… कोई कोई गौएँ तो कन्हैया के पास आरही हैं ।

सम्भाल लेते ग्वारिया गायों को …..और “हियो हियो, हियो, यही ध्वनि करते हुए गायों को पार लगा लिया ।

समय लगा …….पर सारी की सारी गौएँ बछिया बछडे बैल, सब पार हो गए…….तात ! पार लगते ही ये तो पूँछ उठाकर भांगी ।

उनके पीछे बछड़े ……..उन्मत्त होकर कूद रहे हैं इस भूमि में ।

चलो अब ! स्वास्थ बिगड़ जाएगा लाला ! चलो ! निकलो यमुना से ……मैया बृजेश्वरी नें डाँटा उसके बाद भी देरी से ही, यमुना से निकले ये लोग ।

केश सुखाये हैं लाला के और दाऊ के भी मैया नें ।

सुगन्धित तैल लगा दिया है………सुन्दर वस्त्र धारण कराये हैं …….

भगवान नारायण की प्रसादी केशर का चन्दन माथे पर ……….कार्तिक मास बीतनें वाला है …..इसलिये शीतल हवा चल रही है ……मैया नें काली कामरी आज पहली बार लाला को ओढाई ………मोतियों से जड़ी हुयी कामर थी वो ……..जब कन्हैया नें ओढ़ी ……..तात ! अद्भुत शोभा लग रही थी उस समय श्याम की ।

गोपियां देख रही हैं इस काली कामर वाले को ………..और इस रूप माधुरी में सब कुछ लुटानें का मन कर रहा है इन सबका ।

उधर सेतु का निर्माण करने में सब कुशल कारीगर लग गए हैं …….व्यवस्था स्वयं बृजराज और उपनन्द जी देख रहे हैं ।

नावों को पंक्तिबद्ध करके लगाया गया था ……….उन्हें रस्सियों से …..मूँज से ………. कस कर एक दूसरे से बाँधा गया था ।

कुछ ही देर में सेतु बनकर तैयार यमुना के ऊपर ।

अब तो बैल गाड़ियाँ निकलनें लगीं ……….लोग उसमें भी बैठे …..कुछ लोग पैदल ही सेतु से जा रहे हैं …….कुछ ग्वाले हैं जो मल्ल हैं …..वो कूद गए हैं यमुना में …………और तैरते हुए निकल गए हैं ।

इस तरह रविनन्दिनी यमुना को पार किया समस्त बृजवासियों नें ।

चारों ओर जयजयकार हो रही है श्री वृन्दावन धाम की ।

चलते चलते सामनें गिरी गोवर्धन पर्वत के दर्शन हुए सभी बृजवासियों को ……उस पर्वत से झरनें बह रहे थे ……..असंख्य मोर नाच रहे थे ……अद्भुत प्रेम की ऊर्जा से भरा हुआ था ये पर्वत …….।

कन्हैया दौड़े …………..कन्हैया के पीछे दाऊ , फिर तो सारे ग्वाल बाल दौड़ पड़े उस पर्वत की ओर ।

पर कोई इस बात को समझ न पाया …………साष्टांग प्रणाम किया था पाँच वर्ष के कन्हैया नें उस पर्वत को ।

तभी एक रथ आकर रुका वहीँ ……………बृजवासी देख रहे हैं …….सोच रहे हैं …..ये रथ किसका है ? और कौन आया है ?

उस रथ से बृजराज के परम मित्र बृषभान जी उतरे ।

बढ़कर , अतिआनन्द से – दोनों मित्र गले लगे ।

हम कहाँ रहें ? हमें बताओ हे बृषभान ! सूचना तो मैने आपको भिजवा ही दी थी ……….कि कंस का अत्याचार चरम पर है ……..इसलिये हमें गोकुल त्यागना पड़ा ……..आये हैं यहाँ वृन्दावन में ……..अब कहाँ आप हमें बसाओगे वो बताओ ।

मित्र बृजराज ! आपका ही है वृन्दावन …….आपको जहाँ सुखपूर्वक रहनें की इच्छा हो आप वहीँ रहें ………वैसे ? कुछ सोचकर बृषभान जी बोले – यहाँ पास में ही नन्दीश्वर पर्वत है ……….उस पर्वत की तलहटी में ही आपका महल बन जाएगा ……..और सम्पूर्ण क्षेत्र में आप अपनी प्रजा को बसा लीजियेगा …….फिर अति प्रसन्न होते हुये बृषभान जी बोले…….मैं आपके साथ सदैव हूँ बृजराज ।

आपके शरण में आये हैं हम सब ………….विनोद में बृजराज नें कहा और अपनें मित्र को हाथ भी जोड़ा ।

ये विनोद अच्छा नही था .बृजराज ! ……..ये कहते हुए बृषभान जी उन्मुक्त हँसें ।

कीर्ति भाभी कैसी हैं ? बृजरानी नें बृषभान जी से पूछा ।

आप लोगों की प्रतीक्षा में ही है वो भी……..बृषभान जी का उत्तर था ।

और राधा बेटी ?

राधा ! आहा ! ये नाम कन्हैया नें सुना …………….राधा !

ठीक है भाभी जी ! राधा बेटी भी ठीक है ……..चार वर्ष की हुयी है अभी ………..हाँ लाला से एक वर्ष छोटी है ……….बृजरानी नें कहा ।

और आपका लाला ? बृषभान जी नें पूछा ।

ये रहा ………..जैसे ही दिखानें लगीं ………….

लाला ! लाला !

यहीं तो था कहाँ गया ?

एकाएक कहाँ गया ? सब लोग इधर उधर ढूंढनें लगे थे ।

पर कन्हैया तो….गोवर्धन पर्वत के नीचे बैठकर….आँखें बन्दकर के –

राधा ! राधा ! राधा ! राधा !

इन नामों का बड़े प्रेम से उच्चारण कर रहे थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 67

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 67)

!! वृन्दावन – यात्रा !!


कितनें सुन्दर लग रहे हैं सट कर सोते हुए बलराम कृष्ण ……

अपना एक हाथ बलराम नें अनुज कृष्ण के ऊपर रखा है …गहरी नींद में भी ।……..केशराशि बिखरी हुयी हैं ………कन्हाई करवट लेते हुए लिपट जाते हैं बलराम से ……..बलभद्र भी अपनें अनुज को अपनें में पाकर प्रसन्नता से भर उठे हैं …….और एक बार उठकर अपनें छोटे भाई को देखा है ……….फिर गले लगकर सो गए हैं ।

इन दोनों भाइयों के श्रीअंग से कमल की सुगन्ध निकल रही है ……गलती से भौरें गवाक्ष में आजाते हैं…….पर स्वयं को भ्रमित मानकर लौट भी जाते हैं ………।

ब्रह्म मुहूर्त का समय होने को है……पर अभी रात ही है ………..

महर्षि शाण्डिल्य नें ब्रह्म मुहूर्त का समय यात्रा का उचित बताया था ………देवी ! अब हम लोगों को निकलना चाहिये ।

बृजराज नें अपनी भार्या बृजेश्वरी से कहा ।

बाहर देखो देवी ! लक्षाधिक बैल गाड़ियाँ तैयार खड़ी हैं ………..सहस्त्र रथ भी हैं …………

हमारा रथ मध्य में रहेगा ……..ये ग्वालों का ही कहना है …………

ताकि हमारे बालको की रक्षा हो सके……….हमारे आस पास दण्ड चलानें वाले , और विशेष धनुष लिए मल्ल चलेंगे………..

बृजराज अपनी भार्या यशोदा को बता रहे थे वृन्दावन यात्रा के सम्बन्ध में ।

आगे आगे गौ चलेंगीं ……..बृषभ की संख्या अगनित है ………..ये सब हमारे धन हैं ………इनके पीछे हम चलेंगे ।

बृजरानी नें अपनें महल से बाहर देखा …………….अगनित बैल गाड़ियाँ , अगनित रथ और पैदल चलनें वाले भी बहुत थे ……….

सबनें अपनें सामानों को अपनी अपनी गाड़ियों में रख लिया था …….बालक बहुत प्रसन्न थे ………वो अपनी बैल गाड़ियों से उचक उचक कर देख रहे थे महल की ओर …….कि उनका कन्हैया कब आएगा….।

गोकुल त्यागनें का किसी के मन में दुःख नही था ………हर बृजवासी, चाहे वो गोप हो या गोपी , चाहे वो बालक हो या वृद्ध …..सबके मन में एक मात्र कन्हैया की ही चिन्ता थी …….तात ! चिन्ता थी इसलिये चिन्तन भी स्वाभाविक बन रहा था ।

देवी ! जाओ बालकों को उठा दो, देखो महर्षि शाण्डिल्य पधार रहे हैं ………शंख ध्वनि करेंगें वे और तब हमारी यात्रा वृन्दावन के लिए प्रस्थान करेगी ।

ठीक है………इतना कहकर बृजरानी भीतर महल में आगयीं थीं ।

सामान सब रख लिया गया है ……….मार्ग में कलेवा , फिर भोजन ये सारी व्यवस्था हो चुकी है ।

बलभद्र और कन्हाई सो रहे हैं …….गहरी नींद में हैं दोनों ………

पास में बैठ जाती हैं बृजरानी……..और दोनों बालकों को देखनें लग जाती हैं ………मुग्ध हैं………समय का भान कहाँ रहता है जब कन्हैया को कोई देखता है तो ।

जीजी ! क्या कर रही हो ? रोहिणी नें आकर झँकझोरा ।

बृजरानी घबड़ाई हुयी उठीं ………क्या हुआ ?

जीजी ! बाहर सब आपकी ही प्रतीक्षा में हैं ……..गोकुल के ग्वाल गोपी सब आगये हैं…….आप बालकों को लेकर आओ ……..

और हाँ जीजी ! कलेवा और भोजन की सारी व्यवस्था मैने देख ली है ………सब ठीक है ……अब आप शीघ्र पधारो बालकों को लेकर ।

इतना कहकर रोहिणी बाहर चली गयीं ।

मैं भी ना ! हँसते हुए अपनें सिर में एक हाथ मारा बृजरानी नें …….फिर बालकों को उठानें लगीं ……….पर इतनी जल्दी कैसे उठ जाएंगे ये दोनों ।

बोलती हैं, पुकारती हैं ……लाला ! ए लाला ! उठ !

ऊँ ऊँ ऊँ ……..फिर सो गए ।

दाऊ ! तू तो उठ जा ! तू उठेगा तो तेरा भाई भी उठ जाएगा……..

दाऊ को उठानें का प्रयास करती हैं…..पर दाऊ भी तो छोटे ही हैं………वो भी करवट बदलते हुए फिर सो गए ।

जीजी ! शीघ्र करो ………बाहर से फिर आवाज दी रोहिणी नें ।

रोहिणी ! तुम आजाओ एक बार……..बृजरानी नें जोर से कहा …….क्यों की दोनों बालकों को उठाना बृजरानी के लिये सम्भव नही है ……..

रोहिणी आईँ …………दाऊ को बड़े प्रेम से पुचकारते हुए गोद में ले लिया रोहिणी नें ……….

पर यशोदा नन्दन इतना सरल कहाँ है……..उठानें पर रोनें लगा …….बृजरानी नें कहा …….अभी तो दिन भी नही हुआ ………रात ही है …इतनी जल्दी क्या थी ! मन ही मन ये कहते हुये फिर – लाला ! उठ ! लाला ! उठ ! लाला ! “वृन्दावन” जाना है ।

तात ! जैसे ही नन्दनन्दन नें सुना – “वृन्दावन जाना” है ………नींद में भी इस श्रीधाम का नाम सुनते ही उठ गए……दाऊ दादा ! उठो ! चलो वृन्दावन……दाऊ रोहिणी की गोद में थे ……उनको उठानें लगे कन्हैया ।

अनुज के उठानें पर अग्रज दादा उठ गए ……….अपनें अनुज को देखकर मुस्कुराये ……….हाँ ……..चलो ! गोद से उतर कर बाहर भागे दोनों ……….”अरे ! मुँह तो धोलो”……….यमुना में नहा लेंगें मैया ! कन्हैया ही बोले थे ये ।

बाहर सब खड़े हैं ……..सखाओं नें जब देखा अपनें कन्हैया को ……ख़ुशी से झूम उठे ………गोपों नें निहारा कन्हैया को तो निहाल हो गए ….वृद्धों नें मन ही मन आशीष दिया कन्हैया को ………

मनसुख कन्हैया से सटकर चल रहा है ……ताकि उसे सब छू न लें ।

“मैने लाठी को रात भर तेल पिलाया है”………….मधुमंगल नें कान में कहा कन्हैया के ।

अच्छा ! कन्हैया लाठी को देखते हैं मधुमंगल की ।

कंस को देखते ही भाग जाएगा……लाठी को तेल पिलाएगा तू ।

मनसुख मधुमंगल के लिये बोला ।

“कंस की कपाल क्रिया कर दूँगा इसी लाठी से……समझ क्या रखा है तेनें” – मधुमंगल रोष करता है ।

गोपियां बाहर देख रही हैं बैल गाडी में बैठे बैठे…………

कोई कोई पूछ रही हैं ……..बृजरानी का रथ कहाँ है ……….वो किस तरफ बेठेंगीं ? ताकि ये कन्हैया को देख सकें ।

दूध कटोरा में ही लेकर आगयीं बृजरानी ……..सब गोकुल की महिलाएं एक साथ हँसी ……..तुम तो यहीं दूध ले आईँ रानी !

क्या करूँ ? ये लाला है ना ! मानता ही नही है ।

अब तुम इस रथ में बैठ जाओ …….रोहिणी और तुम …….लाला को अपनें साथ रखो ………बलभद्र मनसुख तोक ये सब तुम्हारे साथ में ही रहेंगे……..बृजराज नें ब्रजेश्वरी से कहा ।

और आप का रथ ? बृजेश्वरी नें पूछा ।

मैं तुम्हारे आगे हूँ ……….इस रथ से आगे का रथ मेरा है ।

ठीक है ……..ऐसा कहकर बृजरानी अपनें लाला को लेकर रथ में बैठ गयीं ….और कटोरा का दूध पिलानें लगीं …..बलभद्र भी बैठ गए …..रोहिणी बालकों के लिए, कलेवा की सामग्री लेकर बैठी हैं ….मनसुख रथ में आ तो गया…..पर बैठता नही है, खड़ा है ।

शंख बजाया अब महर्षि शाण्डिल्य नें……

तात ! क्या अद्भुत शोभा बन रही है इस श्रीवृन्दावन यात्रा की …..

जब ठीक ब्रह्ममुहूर्त का समय हुआ था । ………..उपनन्द एक बड़ी शिला पर खड़े हो गए………और ताली बजाकर जोर से बोले – दौड़ो …
दौड़ो ……………ग्वालों नें श्रृंगी नाद् किया ………….बैल गाड़ियाँ धूल उड़ाती हुयी दौड़ पडीं ……..गौ एक तरफ चल रही हैं …..बैल दूसरी तरफ हैं …………मध्य में रथ है ………..बैल गाडी और रथ दोनों दौड़ रहे हैं …….धूल उड़ रही है ।

बैल गाड़ियों के ऊपर सुन्दर सुन्दर रेशमी वस्त्र लगाये हैं ……..ताकि धूप और वायु के झौंको से बचा जा सके ।

वो वस्त्र रंग विरंगें हैं …….लाल, पीले, हरे, गुलाबी ऐसे ऐसे रंगों के वस्त्रों से सजाया है बैल गाड़ियों को और रथों को भी ।

बैल बड़े सुन्दर हैं …….और रथ में लगे अश्व भी बड़े बलिष्ठ हैं ।

बैलों के सींग सुवर्ण से मढे हुए हैं ……..धूप जब पड़ती है उनमें तब एक चौंधा सा प्रकट होता है ….उससे इन सबकी शोभा और बढ़ रही है ।

बैलों के गले में सुन्दर घण्टी बांध दी गयी है …….जब ये एक साथ दौड़ते हैं …..तब जो ध्वनि वातावरण में गुँजित होती है ……वो अद्भुत है ।

उद्धव कहते हैं – तात ! देवों के विमान भी फीके लग रहे हैं इन बैल गाड़ियों की सज्जा के आगे ।

गोकुल को पार करके आगे बढ़े…………

मध्य दिवस हो रहा है ………..भोजन की व्यवस्था की गयी …….सबनें एक साथ बैठकर भोजन किया ………फिर कुछ विश्राम के बाद यात्रा आगे बढ़ी थी ।

सन्ध्या की वेला होनें को है अब ।

पर ये क्या ! अद्भुत शोभा बन गयी है यहाँ वनों की ।

मोरों का झुण्ड, पँक्ति बद्ध होकर खड़े हैं और देख रहे हैं नन्दनन्दन के रथ को …………..

उन मोरों को देखकर कन्हैया खड़े हो जाते हैं ………मैया डर जाती है ……लाला ! बैठ जाओ ! पर कन्हैया इतनी जल्दी कैसे मान जाते ।

“मनसुख भी तो खड़ा है……उसे तो कुछ बोलती नही”

मनसुख ! बैठो ! बृजरानी आदेश देती हैं …..मनसुख बैठ जाता है ।

तो कन्हैया भी बैठ जाते हैं …….मोर मानों स्वागत कर रहे हैं वृन्दावन में प्रवेश का …….कन्हैया मैया की गोद में बैठे बैठे ही हाथ हिलाते हैं मोरों को ।

मैया ! वो खरगोश ………

…..हाँ लाला ! कितना प्यारा है ना !

मुझे चाहिए ! रोनें लगे ………….चुप ! रो मत ……..

नही …..मुझे खरगोश चाहिए ।

मैया नें बड़े प्रेम से कहा ……….देख तू अगर खरगोश को ले जाएगा तो उसकी मैया रोयेगी ………है ना ? बृजरानी नें समझाया ।

कुछ देर सोचनें के बाद कन्हैया उठकर खड़े हो गए ……..

नही नही ……..हम तुम्हारे बच्चे को नही ले जायेगें …….तुम मत रोना !

तभी सामनें मोर, अनगिनत सहस्र मोर एक साथ नाच उठे थे ।

मैया ! देख !

पक्षियों की संख्या कितनी है ये कौन बता सकता है ………..

तोता बोल रहे हैं ………..

ये कौन है ? कन्हैया जानते हुए भी पूछते हैं ।

ये है तोता ……….मैया बताती है ।

उसके साथ ये कौन है ? कन्हैया दूसरे तोता को पूछते हैं ।

मैया हँसते हुए कहती है ……ये तोती है ……….मैया खूब हँसती है ……पर कन्हैया गम्भीर ही बने रहते हैं ………….कुछ सोचते हैं …..फिर कहते हैं ये “तोती” क्या होता है ………तोता की पत्नी है ये तोती ।

कन्हाई फिर तोता को देखते हैं ………फिर सोचते हैं …पूछते हैं…….पत्नी क्या होती है ?

लाला ! पत्नी होती है …………मैया लाला को चूमते हुए कहती हैं ।

तो मेरी पत्नी कहाँ है ? मासूम से कन्हैया पूछते हैं ।

तेरी पत्नी अभी नही है …………

क्यों नही है मैया ? इसके प्रश्न कभी खतम हुए हैं जो आज हो जायेगें !

फिर रोनें लगे इसी बात पर ………मेरी पत्नी कहाँ है ?

पर अब बैल गाड़ियाँ रुक गयीं थीं ………….गौ सब ठहर गए थे …….रथ इत्यादि सब को रोक दिया गया था ।

क्यों की यमुना आगयीं …………यमुना को पार करके ही वृन्दावन आएगा …………….

कन्हैया उतर गए …….बलभद्र मनसुख अन्य सब सखा उतर कर भागे कन्हैया के पीछे ……कन्हैया दौड़ते हुए बृजराज के पास गए …….प्रसन्न होकर बृजराज नें कन्हैया को अपनी गोद में ले लिया था ।

बृजराज ! आज यहीं पर विश्राम किया जाए ………….नौका की व्यवस्था कल होगी ……………बैलगाड़ियों को ही सजा कर उसी में आज रात्रि विश्राम करेंगें ………..बालकों को कुछ खिला दो ……और अन्य लोगों के लिये भोजन बनाया जाए ।

जी महर्षि !

इतना कहकर बृजराज यहाँ से ग्वालों के पास चले गए ….और सबको आदेश दे रहे थे ।

यमुना में स्नान किया सन्ध्या के समय सब नें ……..भोजन बनानें में सब लग गए ।

आहा ! तात ! वृन्दावन की शोभा देखते ही बन रही थी दूर से ………

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 66

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 66)

!! “प्रेम का अद्भुत उदाहरण” – बृजवासी !!


क्या प्रेमी अज्ञानी होता है ?

ये प्रश्न विदुर जी का था ।

नहीं तात ! सच्चा ज्ञानी तो प्रेमी ही होता है ……बल्कि ज्ञानी से भी बड़ा होता है …….बात ये है कि …….भगवान की भगवत्ता और भक्तवत्सलता देखकर ज्ञानी तो आनन्दित हो उठते हैं ……पर प्रेमी के चित की कुछ और स्थिति हो जाती है ………ज्ञान प्रेम के उत्कर्ष को पाकर अभिभूत हो उठता है । तात ! सामान्य जीवन में भी प्रेम के आगे व्यवहारिकी ज्ञान दव जाता है……ये देखा गया है ! उद्धव जी बोले ।

ज्ञान की ऊँचाई ही प्रेम है…..क्यों की प्रेमी समझ जाता है कि…..मेरा प्रियतम ही मेरा सर्वस्व है…..वही सत्य है ,बाकी सब मिथ्या है झुठ है ।

पर बृजवासियों का प्रेम और अद्भुत है ……..आनन्द रस का दान कर रहे हैं कन्हैया………अभिभूत हैं समस्त बृजवासी……..पर इस आनन्द रस में उन बृजवासियों का जो ज्ञान है वो अगर रस समुद्र में डूब कर अभिभूत हो जाए तो इसमें आश्चर्य क्या ?

तो प्रेम सबसे बड़ा है ? विदुर जी नें पूछा ।

हाँ …….निःसन्देह तात ! उद्धव बोले ।

पर इन बृजवासियों का प्रेम सर्वश्रेष्ठ है ….. उद्धव बड़े ठसक से बोले ।

कैसे ? कुछ बताओगे उद्धव ?

उद्धव मुस्कुराये और बतानें लगे थे ।

दूसरे दिन ही एक विशाल सभा लगी गोकुल में……….

बृजराज उस सभा के मुखिया थे……….इनके आठों भाई भी वहाँ उपस्थित थे………गोकुल के सब सम्माननीय व्यक्तित्व उस सभा की शोभा बढ़ा रहे थे ……महर्षि शाण्डिल्य पौर्णमासी इन सबका भी उच्च आसन था और ये उस आसन में विराजमान थे ।

सबसे प्रथम उपनन्द जी को बोलनें के लिये कहा गया………..

“मुझे लगता है गोकुल के अधिदेवता चले गए”…..उपनन्द बोल रहे थे ।

आप ये क्या कह रहे हैं ? उपनन्द जी से सभा में ही पूछा ।

हाँ ……..वो अर्जुन नामक वृक्ष ………उसके भीतर अधिदेवता रहते थे ………”तोक बालक” की बातों को हमें विस्मृत नही करना चाहिये ।

तोक बताओ तो ………क्या हुआ था वहाँ ? जब वृक्ष टूटे ?

तोक नें खड़े होकर कहा ……वृक्ष गिरे और उसमें से दो दिव्य पुरुष प्रकट होकर फिर अंतर्ध्यान हो गए !

बैठो तोक ! उपनन्द जी नें बिठा दिया ।

वो अधिदेवता थे ……….और जिस भवन का, गाँव का, नगर का अधिदेवता ही चला जाए तो वहाँ रहना नही चाहिये ……..

क्या होगा ? एक बूढ़े ग्वाले ने खड़े होकर पूछा ।

अनिष्ट , अज्ञात हिंसा, प्रिय जन की हानि, भय, ये सब बना रहता है ।

उपनन्द जी नें सबको बताया …….और हाथ जोड़कर महर्षि शाण्डिल्य से भी पूछा …….ऋषिवर ! मैं ठीक कह रहा हूँ ना ?

महर्षि नें सिर “हाँ” में हिलाया था ।

देखिये ! राक्षसों का अत्याचार चरम पर है …………कंस नें अपनें यहाँ जमावड़ा लगा रखा है राक्षसों का ……..सम्पूर्ण पृथ्वी के राक्षसों का पालनहार बन बैठा है कंस ………….इसलिये ……….

पर हम अहीर हैं ……वीर हैं ….डरते नही हैं ……….ग्वालों के एक समूह नें अपनी अपनी लाठियां उठाईँ …………….

सुनो ! सुनो ! मुझे पता है हम वीर हैं ……लाठियों से भी हम कंस के राक्षसों का मुकाबला कर जायेंगें…….पर युद्ध प्रत्यक्ष हो तब ना ?

वो तो अप्रत्यक्ष युद्ध कर रहा है …….तुमनें देखा नही ……..पूतना, कागासुर, श्रीधर , शकटासुर ……..ये सब !

“पर हम डर कर भाग नही सकते”…….ग्वालों नें एक साथ हुंकार भरी ।

पर “बृजराज के लाल” को कुछ हो गया तो ?

उपनन्द जी नें ये बात कह दी थी ।

तात ! समस्त ग्वाला समाज काँप गया ……..ओह ! नही ….हमारे प्राण भले ही चले जाएँ …….पर कन्हैया को कुछ नही होना चाहिये ।4

सम्पूर्ण समाज एक स्वर में बोला ।

हम अपनें रक्त का एक एक बून्द बहा देंगें अपनें कन्हैया के लिये …….

पर संकट बना ही रहेगा……..और वृक्षों के गिरनें से इस गाँव का अधिदेवता भी तो चला गया है !

एक बूढी गोपी उठी……..तुम कब तक लाठी लेकर खड़े रहोगे …….पूतना की तरह कोई राक्षसी आई ……..और अपनें कन्हैया को मार कर चली गयी तो ?

ए बुढ़िया ! शुभ शुभ बोल …… सब ग्वाले आक्रोशित हो उठे थे ।

काल से भी भीड़ जायेंगें हम कन्हाई के लिए……..ग्वालों में आक्रोश बढ़ गया था ।

हमारे लाला पे कोई हाथ तो रखकर दिखाये……..काट के फेंक देंगें ।

ग्वाले कन्हैया के बारे में ऐसा वैसा कैसे सुन लेते ?

“हम दूध दही मथुरा भेजना बन्द करते हैं”…….सभा में ग्वालों का एक वर्ग ये भी कहनें लगा ।

शान्त रहो ! सब शान्त रहो………

“हमें इस गोकुल को त्यागना होगा”……….महर्षि शाण्डिल्य नें कहा ।

ग्वाले एक दूसरे का मुँह देखनें लगे……….

हाँ ………..बृजराज और बृजरानी अपनें लाला को लेकर वृन्दावन जाकर रहें ……..क्यों कि बृहत्सानुपुर ( बरसाना ) के राजा बृषभान जी बृजराज के मित्र भी हैं………वो स्थान दे देंगे ।

ये गलत है ……ऐसा नही होगा……..सम्पूर्ण सभा चिल्ला उठी ।

क्या गलत है ? क्या बृजराज को न भेजा जाए वृन्दावन ? क्या उनके पुत्र को यहीं कंस के द्वारा ……महर्षि शाण्डिल्य पूरा बोल भी नही पाये थे कि ….सभा उठ गयी …….सब ग्वालों नें अपनी अपनी लाठियां लहराए आकाश में……..

गलत ये है महर्षि ! कि हम नन्दलाल के बिना रह जाएँ ……..इसलिये हम सब जाएंगे………..

क्या ? बृजराज उठ गए सभा में बोलनें के लिये ।

हाँ …….गोकुल गाँव का हर व्यक्ति जाएगा वृन्दावन……..

सबनें यही कहा…………..एक स्वर में ।

“जाकर आजाना वापस गोकुल” ………..बृजराज नें कहा ।

नही ………हम वहीं रहेंगे……..हमारे राजा हैं आप नन्दराय ! ……हमें कैसे छोड़ सकते हैं……..हमारा युवराज कन्हैया है …..वो हमारा प्राण है …….हमारा ही नही समस्त बृज का प्राण है वो……वो जहाँ रहेगा हम सब भी वहीँ रहेगें ।

बृजराज नें हर्षित होते हुए कहा…….फिर चलो ! सब चलो वृन्दावन ………जब तक भवन की व्यवस्था नही होती तब तक हम लोग बैल गाडी को ही सजाकर उसमें रहेंगे ।

समस्त ग्वाल समाज नें आनंदित होकर करतल ध्वनि की …….

हम सब जायेंगे वृन्दावन……..चलो ! अब वृन्दावन ।

सभा को यही विराम दे दिया गया था ।

तात ! ये कैसा अद्भुत प्रेम है …………विलक्षण प्रेम है ।

अपनें गाँव को कोई त्याग सकता है भला ! अपनें पीढ़ीदर पीढ़ी के आवास निवास को कोई त्याग सकता है भला !…..पर कन्हैया के लिये – जो समस्त गोकुल का प्राणप्यारा था ….सबका दुलारा था उसके लिये इन बृजवासियों नें अपना गाँव, अपना आवास सब कुछ छोड़ दिया……..ये प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है तात !

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 65

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 65)

!! “श्रीराधा मुझे बुला रही है” – अब वृन्दावन की ओर !!


ये गोकुल महावन अब कुछ सूखा सूखा सा लग रहा है ?

यमुना की धार भी पतली हो गयी है…….दाऊ नें कन्हैया की ओर देखा – पूछा……क्या बात है कन्हैया ?

कोई बात नही है दादा ! ……कन्हैया बस मुस्कुराये ।

माखन खिला दिया था मैया यशोदा नें………इन्द्रयज्ञ में आज रात्रि भर जागरण होगा…..कीर्तन करनें वाले आ चुके हैं….ग्वाल बाल सब उत्साहित हैं…….सज धज कर गोपियाँ भी आयी हैं ।

दाऊ दादा ऐसे ही घूमते हुये उस गिरे हुए अर्जुन वृक्ष के पास गए थे…….वृक्ष को अभी उठाया नही गया है…….क्यों की सब बृजवासी इन्द्र यज्ञ की तैयारी में ही थे………

दाऊ दादा गए…….और उस टूटे हुए एक शाख में बैठ गए ।

अब कन्हैया भी वहीँ पहुँचें दाऊ को खोजते हुए…….दाऊ एक डाली में बैठे हुए हैं ….जो टूटी पड़ी थी…….कन्हैया भी उछलते हुए उसी में बैठ गए ।

गोकुल कुछ सूखा नही लग रहा ?

बस मुस्कुरा दिए कन्हैया ।

क्या पृथ्वी को फिर दण्डित करना पड़ेगा ? दाऊ दादा रोष प्रकट कर रहे थे………कन्हैया ! तुम आये हो इस धरा धाम में…….फिर इस धरा की इतनी हिम्मत कि…….शेष स्वरूप दाऊ की आँखें लाल हो गयीं थीं ।

दाऊ दादा ! “गोकुल छोड़कर अब हम सब वृन्दावन चलते हैं”……

कन्हैया नें सहजता में कहा ।

क्या ? दाऊ दादा चौंकें…….फिर बोले – अच्छा ! तो ये तुम्हारी लीला है …….पर क्या गोकुल में तुम्हे अच्छा नही लग रहा ?

दाऊ नें इतना तो पूछ ही लिया ।

“इन्द्र यज्ञ” कर रहे हैं मेरे ये बृजवासी……पर दादा ! “मेरे” होकर, एक देवता की पूजा ! क्यों ?

फिर तुम क्या चाहते हो ? दाऊ दादा नें पूछा ।

मेरे ही स्वरूप गिरिराज – गोवर्धन की पूजा…….मैं ये चाहता हूँ कि देवराज की पूजा छोड़कर गिरिराज गोवर्धन की पूजा की जाए ।

पर यहाँ दादा ! गोवर्धन नही हैं ……..न वो कुँजें हैं …….मुझे वेणु नाद् करना है …….पर वो सब यहाँ नही होगा ।

कन्हैया बोलते गए – दादा ! मुख्य बात तो मैं कहना भूल ही गया …….

“मेरी श्रीराधा मुझे बुला रही है”……वृन्दावन हमारा स्थान नही है …….हमारा स्थान तो ये गोकुल है ……..वृन्दावन तो मेरी प्राणेश्वरी श्री राधा रानी का है ………और वो वृन्दावन , जब मेरे बाबा उनके बाबा से प्रार्थना करेंगें और वो कृपा करके दें “वृन्दावन वास” , तो ही हो सकता है ।

वो पूरा क्षेत्र बृहत्सानुपुर ( बरसाना ) के अंतर्गत आता है ……….और बरसाना के राजा हैं श्री बृषभान जी………कन्हैया वृन्दावन की चर्चा करते हुये अतिप्रफुल्लित थे ।

बहुत सुन्दर वन है वृन्दावन …………दाऊ दादा ! वहाँ बहुत आनन्द आएगा …………..वहाँ कुञ्ज हैं , वहाँ निकुञ्ज हैं ………मोरों की भरमार है ….पक्षियों का कलरव निरन्तर होता ही रहता है ………यमुना भरी हुयी हैं वहाँ ……दादा ! अद्भुत है वृन्दावन , हम सब अब वहाँ जायेंगे ।

कन्हैया इतना कहकर अपनें दोनों चरण हिलानेँ लगे थे ।

जायेंगे फिर यहाँ आयेंगें ? या वहीँ रहेंगें ? दादा दाऊ नें पूछा ।

“रहेंगे”………कन्हैया मुस्कुराये ।

हम अकेले जाएंगे या ? दाऊ दादा का ये दूसरा प्रश्न था ।

नही दादा ! हम सब जाएंगे ! पूरा गोकुल जाएगा हमारे साथ ।

दाऊ दादा हँसे ……….तुम्हे लगता है लाला ! कि ये सब गोकुल वासी तुम्हारे साथ वृन्दावन चल देंगे ?…….अपना सब कुछ छोड़ कर ……..घर वार सब कुछ छोड़कर चल देंगे ? दाऊ नें पूछा ।

ये बृजवासी प्रेम करते हैं मुझ से ……दादा ! इनके जैसा प्रेम मैने किसी अवतार में और किसी के पास नही देखा ………..

तुम घर बार छोड़नें की कह रहे हो……..दादा ! मेरे लिये ये गोप गोपी प्राण दे देंगे…….ये मुझे ही सब कुछ मानते हैं………मैं ही हूँ इनका सब कुछ……..कन्हैया बोलते गए ।……..दादा ! और हमारे पास कारण भी है ……..हम सबको कारण जब बताएंगे तब ये लोग चल देंगे जहाँ हम कहें ! बृजवासियों की प्रशंसा करते हुए गदगद् हो रहे थे कन्हैया ।

कारण क्या है तुम्हारे पास ?

गोकुल त्यागनें का कारण है ……….कि कंस के राक्षस मेरे प्राणों के पीछे पड़े हैं …….उन्हें जब भी अवसर मिलेगा मुझे मार देंगे ………..

दाऊ दादा क्रोधित हो गए ……….”मैं अभी फूँक से न उड़ा दूँ उस कंस के साम्राज्य को ही” ।

दादा ! आप क्रोध बहुत शीघ्र करते हो ……….कारण हम ये बताएंगे ग्वालों को गोपियों को ……….तब देखना …..इनका जो प्रेम है हृदय में …..वो प्रकट हो जाएगा ……….मेरे लिये ये गोकुल क्या संसार भी त्याग सकते हैं …….ये लोग प्रेम का साकार रूप हैं दादा ! ये बृजवासी लोग मेरे लिये हैं …….सिर्फ मेरे लिये ।

कन्हैया ! कन्हैया ! कन्हैया !

तभी – बृजरानी की पुकार सुनाई दी दोनों भाइयों को ।

उस टूटे हुए वृक्ष की शाखाओं से कूदे दोनों भाई ।

तो अब वृन्दावन चलना है ? दाऊ नें हँसते हुए फिर पूछा ।

हाँ ………..मेरी “सर्वेश्वरी श्रीजी” मुझे याद कर रही हैं ।

कन्हैया नें खिलखिलाते हुए दाऊ से कहा ।

दाऊ ! कन्हैया !

……..बृजरानी मैया नें फिर आवाज दी ।

“आयो मैया” ! ये कहते हुए दोनों भाई दौड़े थे मैया के पास ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 64

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 64)

!! जब परब्रह्म को मुक्ति मिली – अद्भुत लीला !!


दुनिया को मुक्ति प्रदान करनें वाला परब्रह्म…..अखिल कोटि ब्रह्माण्ड नायक परब्रह्म , वो परब्रह्म जिससे चर चराचर सम्पूर्ण सृष्टि मुक्ति की कामना करती है , वो परब्रह्म ! अद्भुत लीला है ये तात !

वो परब्रह्म जिससे हर बद्ध जीव याचना करता है कि हमें मुक्त कर दो ।

पर आज वही परब्रह्म , स्वयं बन्धन में है …..और अन्य से याचना कर रहा है कि ….मुझे बन्धन से मुक्त करो ।

“ये प्रेम नदी की उल्टी धार है”……उद्धव मुस्कुराये ।

बस एक प्रेम में ही ये ताकत है कि …परब्रह्म को भी बाँध दे……और अद्भुत ! कि परब्रह्म बंध कर भी आनन्दित है ।

..यही तो लीला है !

….उद्धव विदुर जी को अब आगे का प्रसंग सुनानें लगे थे ।

क्या हुआ ? कौन सा राक्षस कूदा ?

यज्ञ में सब लगे हुए थे ………कार्तिक अमावस्या के बाद सब बृजवासी इंद्र देवता की पूजा में तन्मयता से लग जाते थे ……सब कृषक थे ……इसलिये इन्द्र देव को ही ये विशेष पूजते ……..आज भी पूजा की तैयारी में ही सब ग्वाल बाल , और स्वयं बृजराज लगे थे ।

तभी भीषण आवाज हुई …………..सब डर गए ………बृजराज भी डर गए ……..नही नही ……ये बृजवासी भीरु नही हैं …….पर इन्हें अपना डर नही …..डर है तो केवल नन्दनन्दन का …………इन्हें डर है कि पूतना कागासुर की तरह कोई राक्षस उनके कन्हैया का अहित न करे ।

क्या हुआ ? कौन सा राक्षस कूदा ?

उस भीषण आवाज को सुनते ही सब काँप गए ।

बृजराज जु ! आपके आँगन में कुछ अनहोनी हुयी है ।

एक ग्वाले नें कहा ।

क्या ? सब चौंकें…….बृजराज तो तुरन्त उठकर खड़े हो गए थे ।

दाऊ , मनसुख, मधुमंगल इत्यादि सब यहीं थे …………वे सब भागे नन्दालय की ओर ………..

बृजराज भी अपनें साथ के ग्वालों को लेकर अपनें भवन की ओर तेज चाल से चल दिए थे ।

बृजराज आये, पहले दाऊ इत्यादि सब पहुँच गए थे वहाँ ।

“ओह ! “अर्जुन के वृक्ष गिर गए” ………..सब लोगों नें कहा ।

देखा सब लोगों नें……..दो वृक्ष गिर गए थे……उनके मध्य में फंसे हुए थे कन्हैया……..पर कोई चोट नही आयी थी लाला को ……वो बस हँस रहे थे……नन्द बाबा दौड़े…….उठाया अपनें पुत्र को गोद में……और लेकर आगये थे इस तरफ ।

दाऊ देख रहे हैं……..उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गए हैं…….कन्हैया के उदर में बंधी रस्सी तोड़ कर फेंक दी दाऊ नें ।

पर रस्सी के निशान उदर पर बन गए…….नेत्र बह चले दाऊ के ।

ये किसनें किया ? ये काम किसका है ? बृजराज को क्रोध आगया ।

तभी बृजरानी आगयीं………रसोई में ये पाक बनानें में तल्लीन थीं ………और लाला के लिये ही बना रही थीं…..इसलिये तल्लीनता इतनी थी कि वृक्ष के गिरनें की आवाज भी नही सुनीं ।

ये अब इसलिये आईँ थीं कि …लाला के हाथ दूख रहे होंगें ……खोल देती हूँ ।

पर यहाँ का दृश्य जब देखा ……तो…….चीख निकल गयी मुँह से मैया के…….वो दौड़ीं ………और कन्हैया को अपनें हृदय से लगा लिया ……….पेट में पड़े रस्सी के निशान देख रही हैं …….भीतर से ही हिलकियाँ फूट पड़ी थीं …….मैया यशोदा की ।

ये किसनें किया है ? बताओ ये किसका काम है ?

अरे ! तनिक भी दया नही आई उसे…….इतनें फूल से कोमल लाला को बाँध दिया रस्सी से……..बृजराज बहुत क्रोधित हैं ।

दाऊ नें भी मैया का नाम नही लिया ……..न कन्हैया नें नाम लिया …….मनसुख चुप ही रहा ……..भद्र मधुमंगल नें मौन ले लिया ।

मैया रोती हुयी भण्डार में गयीं ……….माखन लेंने के लिये …..पेट में बने रस्सी के निशान में ये माखन लगा देगी ।

उपनन्द जी नें वृक्षों को ध्यान से देखा ………..ये गिरनें जैसे थे तो नही ………गिरे कैसे ? और कोई ऐसी आँधी भी तो चली नही है ………फिर ये गिरे कैसे ?

ये अर्जुन वृक्ष हैं ….इनकी जड़ें बहुत गहरी जाती हैं धरती पर …..ये तनिक से झटके में गिरनें वाले नही थे …….और देखो ! इनकी जड़ें स्वस्थ हैं …….न कोई कीड़े लगे हैं ……फिर ये गिरे कैसे ?

उपनन्द जी सबके सामनें अपनी बात रख रहे हैं ।

मुझे पता है ……चार वर्ष के “तोक” नें आगे बढ़कर कहना शुरू किया ।

“इस कन्हैया नें गिराया”……..तोतली बोली में बोला ।

हाँ …..सच ! ये देखो …….ऊँखल को घसीटते हुए कन्हैया नें वृक्षों के बीचों बीच फँसा दिया ……..फिर झटका दिया ………।

बड़े बड़े लोगों नें तोक की बात सुनी तो……..पर विचार नही किया …….अब भला ! पाँच वर्ष का कन्हैया पेड़ को उखाड़ देगा ? बृजराज कैसे मानें ।

पर मेरे प्रश्न का किसी नें उत्तर नही दिया ……..कन्हैया को ऊँखल से बाँधा किसनें ? बृजराज फिर सबसे पूछनें लगे ।

“मैने बाँधा था”……………..बृजरानी रो पडीं ये कहते हुए ……ये हाथ ही अपराधी हैं ……..जिन्होनें इस कोमल लाला को बाँधा ।

दया नही आयी तुमको बृजरानी ? बृजराज रोष में थे ।

अपराधी हूँ मैं ………..सिर झुकाकर रोते हुए बोल रही थीं ।

कुछ हो जाता तो लाला को ? ये वृक्ष लाला के ऊपर ही गिर जाते तो ?

इन सारी बातों को सुनते हुए बस हिलकियों से रो रही हैं मैया ।

चल लाला ! उत्सव में चल ……..वहीँ खेलना कूदना ……चल !

कन्हैया को गोद में लिया नन्द बाबा नें और चलनें लगे ……..

दाऊ पीछे पीछे ……..सखा सब पीछे चल दिए ।

मैया अकेली खड़ी है आँगन में …..और अपनें लाला को जाते हुए देखकर रो रही है ……………

चार कदम ही आगे बढ़े थे नन्दबाबा की ……..कन्हैया नें मुड़कर अपनी मैया को देखा……….मैया रो रही है ………..

ये देख कर विकल हो उठे कन्हैया……..बृजराज से बोले …..”.बाबा ! मैया के पास जाऊँगा” ।

नही ….मैया गन्दी है…….मारती है मेरे लाला को…..नन्दबाबा नें कहा ।

बाबा की सफेद दाढ़ी पकड़ते हुए कन्हैया बोले…..”अच्छी है मैया” ।

सुनो ! बृजराज ! बालकों को अभी यज्ञ में मत ले चलो ……बालकों नें कुछ खाया भी नही है सुबह से ……इसलिये इनको यहीं रहनें दो ……ये शाम को आजायेंगे ।

उपनन्द जी की बातें सुनकर नन्द राय नें कन्हैया को गोद से उतार दिया ………और सब बालकों से कहा …..कुछ खा के आजाना ।

बृजराज अपनें ग्वालों के साथ यज्ञ मण्डप में चले गए थे ।

दाऊ ! ले माखन खा ……….माखन पहले दाऊ को खिलानें लगीं मैया यशोदा……..क्यों की दाऊ से विशेष प्रेम है कन्हैया का …….वो खाता है तभी ये खाता है ।

पर दाऊ भी रुष्ट हैं आज मैया यशोदा से ……….मुँह फेर लिया मैया की ओर से……….दुःखी हो गयीं मैया ………मनसुख नें भी मना कर दिया ………ऐसे भी कोई बान्धता है ……..कोई पशु है लाला ! मनसुख भी बोल उठा ………मधुमंगल नें तो दूर से ही ……..

बृजरानी बहुत दुःखी हो गयीं…….क्या करें ………गयीं अपनें लाला के पास ………..और मनुहार करते हुए लाला को माखन खिलानें लगीं ……पर नही ….लाला नें मैया के हाथ से माखन का गोला लिया……..

बृजरानी तो अब टूट गयीं थीं……उन्हें लगा अब लाला भी मेरे हाथ से माखन नही खायेगा ! ओह !

पर ऐसा नही था ………….लाला नें माखन लिया मैया के हाथों से …..और खिलानें लगे दाऊ को ……….मैया की नही दाऊ ! गलती मेरी थी……..मैया को दोष कोई मत दो ………..

दाऊ नें मैया की ओर देखा ………रो पडीं मैया फिर ।

लाला इस तरह सबको मना रहे थे …….अपनी मैया के लिये …….

मैया रो रही हैं, हिलकियों से रो रही हैं ……….कन्हैया नें मुस्कुराकर कहा ……मैया ! रो मत ………क्यों रो रही है ? गलती मेरी थी माँ !

ये कहते हुए कान पकड़े कन्हैया नें ……और जैसे ही उठक बैठक लगानें लगे ……….मैया दौड़ पड़ी ……….और अपनें लाला को हृदय से लगा लिया ।

तात ! ये अद्भुत वात्सल्य की लीला है ….परब्रह्म , जो जगत को मुक्ति देता है ……..उसे अब मुक्ति मिली थी ……..दामोदर – मुक्ति ।

अपनें आँसू पोंछते हुए उद्धव नें कहा था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 63

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 63 )

!! “यमलार्जुन उद्धार” – जब वृक्ष गिरे !!


हम हैं शापित वृक्ष – यमलार्जुन ।

शापित ? नही शापित कैसे कहें ……..ऐसा अहोभाग्य तो सिद्धों को भी प्राप्त नही हुआ …………..

देवर्षि नें हमें शाप दे दिया ……..पर हम उसे वरदान से भी ज्यादा मानते हैं ………शाप मिलते ही हम पृथ्वी में आ गिरे थे ………..और बीज के रूप में गोकुल में ही पड़े रहे ………अंकुर फूटा तो “अर्जुन” नामके दो वृक्ष बनकर हम खड़े ……..कृपा थी हमारे ऊपर देवर्षि की ……..तभी तो बृज मण्डल में ……और वो भी गोकुल में …….और गोकुल में भी उसी आँगन में जिस आँगन में परब्रह्म प्रकट होने वाले थे ।

बहुत पूजा की हमारी बृजरानी नें ………..तुलसी में जल देनें के साथ साथ हमको भी जल देती थीं ……..बृजराज हमारी प्रदक्षिणा करते थे ……ग्वाल गोपी कलावा बांध कर हमसे मनौती माँगते थे ……….

मनौती ? अजी ! ग्वालों की यही मनौती होती थी कि …..बृजराज के पुत्र हो ……..हम को हँसी आती………हम इनकी कामना पूरी करते ?

क्या हममें इतना सामर्थ्य था ? हम तो स्वयं शापित होकर पड़े थे ।

पर इन गोकुल वासियों का प्रेम ! भाव ! अद्भुत था …….

हुआ बृजराज के पुत्र…….हम बहुत प्रसन्न थे……हमें याद है …..ढोलक मंजीरा लेकर, “नारायण नारायण” का मंगलमय कीर्तन करते हुए, एक सौ आठ परिक्रमा लगाई थी हमारी बृजराज नें ।

समय बीतते भला देर लगती है ……..घुटवन चलते हुए आये थे हमारे पास कन्हैया पहली बार……..हमारी शाखाओं को छूआ था …..उस समय जो आनन्द की अनुभूति हुयी थी …….वो अवर्णनीय है ।

उद्धव विदुर जी को ये प्रसंग सुना रहे हैं ।

उस दिन की बात…..कुबेर के पुत्र कहते हैं – बहुत उपद्रव मचाया था कन्हैया नें…….हम तो बड़े प्रसन्न थे ………ऐसी अद्भुत लीला दर्शन भाग्यों से नही ….कृपा से ही प्राप्त होती है …….और हमारे ऊपर कृपा थी देवर्षि की……..हम बार बार वृक्ष बननें के बाद भी देवर्षि नारद जी का धन्यवाद करना न भूलते थे ।

बाँध दिया था उस परब्रह्म को आज बृजरानी नें………वो कितना रोया था ……..अंजन उसके आँखों से बहकर कपोलों में फैल गया था ……वो लीलाधारी सिसक रहा था …………

हम ये सब लीला देखकर आनन्दित थे ……….अति आनन्दित ।

ऊखल से बाँध दिया था……….और चली गयीं थीं बृजरानी रसोई घर में……….रोहिणी से, बृजरानी को ये कहते सुना था हमनें …….कि …….कुछ देर बन्धनें दो इसे……अभी छोड़ दूंगी तो कहीं भाग जायेगा ।

तात ! अब आगे सुनो …….कैसे ये अर्जुन नामक वृक्ष गिरे ।

उद्धव , विदुर जी को अब आगे की लीला सुनानें लगे थे ।

दाऊ ! भैया ! भैया !

बृजरानी के जानें के बाद , रोते हुए बड़ी जोर से चिल्लाये थे कन्हैया ।

पर दाऊ वहाँ थे नही………बृजरानी नें भगा दिया था वहाँ से ।

कुछ देर दाऊ को पुकारनें के बाद कन्हैया चुप हो गए …..पर सुबुक रहे थे अभी भी ।

हाँ तोक सखा आगया था ……..चुपके से उसनें रस्सी खोलनी चाही ……..पर ये तो 4 वर्ष का है ….कन्हैया से भी एक वर्ष छोटा ……इससे वो रस्सी क्या खुलती !

कन्हैया नें इधर उधर देखा ……गोपियाँ भी नही दीखीं ……….बृजरानी नें उन सबको भी आज भगा दिया था ………..।

तोक सखा तोतली बोली में बोला – मैं देखता हूँ …………वो गया ……..दो तीन अपनी आयु के बालकों को ले आया ……….

इनसे क्या होगा ? कन्हैया अब थोडा हँसे ………..

ये ऊखल को गिरा देंगें……..तोक नें कहा ।

“चलो गिराओ”……….कन्हैया सहज ही बोले थे ।

इन बालकों नें खूब जोर लगाया…………परिणाम स्वरूप वो ऊखल गिर गया ……जैसे ही ऊखल गिरा …….कन्हैया बड़े खुश हुये ………

और ऊखल को खींचते हुए ले चले थे ।

इतनें प्रसन्न थे अब ……रोना धोना सब खतम हो गया था…..ऊखल पीछे पीछे आरहा था ….आगे कन्हैया उसे खींच रहे थे……..

पर अब रुक गया था…….कन्हैया पीछे मुड़े …..रुका कहाँ ? ये कहीं अटका है …..पर कहाँ अटका ? पीछे मुड़कर देखा…….

तो – अर्जुन नामक वो दो वृक्ष जो थे….उनमें ही अटक गया था ऊखल ।

खींच के झटक दिया ऊखल को कन्हैया नें ।

क्षण भी न लगा होगा ………एक भीषण आवाज आयी……..आवाज बड़ी भीषण थी ……पूरे गोकुल गाँव में ये आवाज गूँजी …….सब भयभीत हो उठे थे ।

पर यहाँ तो वो पुराना वृक्ष …….जड़ के सहित ही उखड़ गया था ।

उखाड़ दिया था कन्हैया नें…….एक तीव्र झटका – और यमलार्जुन का उद्धार कर दिया……….आँधी न आयी थी ……न तूफ़ान आया था …..ग्वाल बाल समझ न पाये थे कि इतना बड़ा, पुराना वृक्ष जड़ सहित गिरा कैसे ?

पर – हमारा उद्धार हो गया था………हम अपनें स्वरूप में आगये थे ……..हम हाथ जोड़े उन नन्दनन्दन के सामनें खड़े थे ।

वो मुस्कुराये – कुबेर के पुत्रों नें कहा – आहा ! क्या रूप माधुरी थी वो ……मुस्कुराता मुखमण्डल …..घुँघराली अलकें ……श्याम वर्ण ….पीताम्बरी…..कटि में काँछनी….हमें देखकर वो मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे ।

“जाओ अब अपनें यक्ष लोक”………कमलनयन कन्हाई के मधुर बोल गूंजे हमारे कानों में……….

हमारा “बृजवास” छुड़ा रहे हो ? हमनें हाथ जोड़ कर कहा ।

हाँ तो ? जाओ फिर विलासिता में जीयो …….फिर किसी साधू सन्त का अपराध करो…….व्यंग में भी कितना सुन्दर बोल रहे वे ।

पर अब हम विलासिता को त्याग रहे हैं……..भोगों के प्रति हमारी अब कोई रूचि नही है ।

………फिर मुक्त हो जाओ ? बोलो – मुक्ति दूँ ? नन्दनन्दन नें कहा ।

नही ….नाथ ! मुक्ति नही ………..हमें तो प्रेम दीजिये …..हमें तो भक्ति दीजिये ……..नाथ ! दीजिये हमें कि – हमारी वाणी मात्र आपके ही गुणों का गान करती रहे …….हमारे कान आपकी लीलाओं को ही सुनते रहें ………हाथ आपकी सेवा में ही लगे रहें ……..और ये सिर ! ये सिर अब अहंकार में न उठे ………..ये अब झुके ……..नाथ ! आपके चरणों में झुके ………निरन्तर , सदा सर्वदा ……….ये कहते हुए कुबेर के पुत्रों नें नन्द नन्दन के चरणों में अपना मस्तक रख दिया था ।

तात ! भक्ति का वरदान प्राप्त करके ये कुबेर पुत्र अपनें लोक में चले गए………उद्धव नें विदुर जी को ये कथा सुनाई थी ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 62

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 62 )

!! कुबेर के पुत्र जब वृक्ष बनें – यमलार्जुन !!


” महत्पुरुषों का श्राप भी मंगलकारी होता है “

उद्धव की इस बात से विदुर जी अति प्रसन्न हुये ………

हाँ उद्धव ! इस बात का तो ये “दासीपुत्र विदुर” प्रमाण है …….माण्डव्य ऋषि का श्राप मुझ यमराज के लिये मंगलकारी हुआ ना !

मुझे श्राप दिया था माण्डव्य ऋषि नें ……..”जाओ ! धर्मराज ! तुम दासी पुत्र बनोगे” ………

उद्धव ! मैं तो दिन भर पापी और पुण्यात्माओं को ही देखता रहता था …..दण्डाधिकारी बना, मेरा यही काम था ……..पर ऋषि के श्राप से मैं विदुर बना ………..और मेरे यहाँ नन्दनन्दन केले के छिलके खानें आये ……आहा ! और इतना ही नही…….आज मैं उन्हीं गोविन्द की मंगलमयी कथा को श्रीधाम वृन्दावन में सुन रहा हूँ …………..

विदुर जी बोले ………सन्तों का वरदान मंगलमय है तो श्राप भी मंगलमय है……….विदुर जी के नेत्र सजल हो उठे थे ।

मैं भी अपनी व्यथा सुनानें लगा……..उद्धव ! छोडो इन बातों को ……अब बताओ ………तुम क्या कह रहे थे ? सन्तों का श्राप भी मंगलमय होता है ? पर यहाँ श्राप किसे दिया …..और किसनें ?

उद्धव ! तुम कह रहे थे ……….ऊखल में बंधे कन्हैया नें सामनें अपनें आँगन में अर्जुन के दो वृक्षों को बड़े ध्यान से देखा …………

क्या ये वृक्ष कोई देवता हैं ? श्राप के कारण ये वृक्ष बने ?

विदुर जी नें उद्धव से आगे कहा……..उद्धव ! क्या अद्भुत लीला सुनाई है तुमनें……..बंध गए ब्रह्म ! फिर कैसे खुले ? किसनें खोला ? मैं आगे की लीला सुनना चाहता हूँ …..सुनाओ ! उद्धव !

कुबेर के दो पुत्र थे ………नल कूबर, मणिग्रीव ।

बड़े अहंकारी थे तात ! और प्रभुता मिलनें पर किसे अहंकार नही आता ……फिर इनकी प्रभुता ? ये तो कुबेर के पुत्र जो ठहरे ।

“मन्दाकिनी गंगा”………हिमालय से बहती हुयी ये निकलती हैं………

बड़ा सुन्दर स्थान था वह हिमक्षेत्र का………..वहीँ कुबेर के ये पुत्र आकर विभिन्न भोगों में रत रहते थे …………..मदिरा पान , पर स्त्री का संग, और द्युत क्रीड़ा ।

वैसे तात ! जहाँ ‘अति धन” आता है ……..वहाँ ये तीन दोष आते ही हैं …..मदिरा, परस्त्री, और जूआ ।

बहुत कम लोग होते हैं जो इनसे बच जाएँ ।

हिमालय साधना की भूमि है ………हिमालय तपस्या की भूमि है ….पर इन क्षेत्रों में भोग विलास करना ……ये तो अपराध है ……….पाप है ।

उद्धव आगे बोले – कुबेर के ये दो पुत्र अपनें साथ आज चार सुन्दरी अप्सराओं को ले आये थे…..और मन्दाकिनी गंगा में पहले तो मदिरा का सेवन किया इन्होनें……..फिर उन अप्सराओं के साथ नग्न स्नान ………………

देवर्षि नारद जी बड़े प्रेम से …… भगवतगुणानुवाद गाते हुए वहाँ भ्रमण कर रहे थे…..उन्हें सर्वत्र अपनें “गोविन्द” ही दिखाई दे रहे थे ……प्रसन्न चित्त से वो वृक्ष, पर्वत, नदी सबको कह रहे थे …….”भगवान का नाम लो….भगवान की लीलाओं का गान करो….भगवान को भूलो मत ।”

नारद जी की बातों को प्रकृति भी सुन रही थी ……और आनन्दित थी ।

पर तभी मन्दाकिनी गंगा में स्नान करते हुए कुबेर के पुत्रों की ओर देवर्षि नारद जी की दृष्टि गयी ………मदिरा के कारण आँखें उनकी लाल हो गयीं थीं …..मत्त , उन्मत्त होकर वे सब नहा रहे थे ।

दया आई देवर्षि को …………कुबेर के पुत्रों की ये दुर्दशा ?

उनके ऊपर करुणा करनी थी इसलिये देवर्षि पास में ही गए ……….

क्या कर रहे हो ? मुस्कुराते हुए देवर्षि नें पूछा था ।

हँसे कुबेर के पुत्र ………….हम ? हम जो कर रहे हैं वो आपको बता नही सकते ! ये कहते हुए वो फिर हँसे ………और अप्सराओं के ऊपर जल का छींटा देनें लगे ……….।

हँसे तो अब देवर्षि…………..तुमनें मुझे प्रणाम नही किया ?

बड़ी सहजता में बोले थे ………”तुम्हे प्रणाम करना चाहिए था” ……..देवर्षि की सहजता देखते ही बन रही थी ।

कुबेर के पुत्र ठहाका लगानें लगे…….हम ? हम आपको प्रणाम करें ?

हम कुबेर के पुत्र हैं…….कुबेर ! धनाध्यक्ष कुबेर …….जानते हो ना ?

पर देवर्षि नें दूसरी ही बात कही …….क्या तुम्हे पता है जिन वृक्षों पर फल लगे होते हैं वो झुकते हैं ……..फलहीन वृक्ष, और गुणहीन व्यक्ति झुकता नही है ……………

हमें कौन सिखाएगा झुकना ? कुबेर के पुत्रों नें अहंकार में भरकर कहा ……..बताइये देवर्षि ! कौन सिखाएगा हमें ?

वृक्ष !

देवर्षि नारद जी के मुखारविन्द से निकला ।

क्या ? चौंक गए कुबेर के ये पुत्र ………….

हाँ …..तुम वृक्ष बनोगे ……जाओ ! फिर तुम उनसे सीखना कि झुकते कैसे हैं ? हँसते हुए नारद जी चल दिए आगे के लिये ।

तात ! सारा नशा उतार दिया था देवर्षि नें……….वो वस्त्र पहन कर भागे नारद जी के पास………और चरणों में साष्टांग गिर गए थे ।

देवर्षि ! क्षमा करें ! हमसे अपराध हो गया …….आगे से ऐसा नही होगा………कुबेर के पुत्र गिड़गिडाते रहे ।

क्या नही होगा ? देवर्षि मुस्कुरा रहे थे…………..देखो ! वृक्ष तो तुम्हे बनना ही पड़ेगा ………….ये बात अटल थी देवर्षि की ।

पर मैं एक बात कह देता हूँ ……..जो तुम्हारे जीवन को धन्य बना देगा ………..नारद जी आँखें मटकाते हुए बोले ।

क्या ? कुबेर के पुत्रों नें पूछा ।

यही कि …….तुम वृक्ष भी बनोगे तो नन्दालय के आँगन में खड़े वृक्ष ।

कन्हैया माखन खाते हुए अपनें हाथ का जूठन तुम्हारे में पोंछेंगे …………धन्य हो जाओगे तुम !

तुम्हारे आस पास ही रहेंगे कन्हैया……..तुम्हे अपनें गले से लगाएंगे …..तुम पर चढ़ेंगे…….तुमसे खेलेंगे …….आहा ! धन्य हो जाओगे ।

इतना कहते हुए देवर्षि आगे बढ़ गए थे ……………

कुबेर के पुत्रों को ये श्राप मिला था………उद्धव नें कहा ।

उद्धव ! ये श्राप कहाँ है ? ये तो वरदान है …….परम वरदान ।

इन कुबेर के पुत्रों की कोई गिनती है……..कि नन्द नन्दन के दर्शन भी कर लेते ये ………पर देवर्षि की कृपा से ………..आहा !

विदुर जी नें उद्धव से कहा ।

तात ! ऊखल में बंधे कन्हैया नें अब उन्हीं अर्जुन नामक दो जुड़वे वृक्षों को देखा था ………और मुस्कुराये थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 61

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 61 )

!!”दामोदर” – यानि बंधा हुआ ब्रह्म !!


पर नन्दरानी मानती नही हैं । कन्हैया भय के कारण रोते जा रहे हैं …….. नन्दरानी का हृदय लगता है आज कुछ कठोर हो गया है ।

कन्हैया अपनें आपको छुडानें की कोशिश कर रहे हैं ………वो कभी आगे आते हैं मैया के………फिर पीछे की ओर चले जाते हैं ……..धरती में गिर जाते हैं ……….पर बृजरानी हाथ छोड़ नही रहीं ।

सच में तात ! आज बुरी बीती कन्हैया पर……सोचा न था कन्हैया नें कि मैया इतना गुस्सा करेगी……एक मटकी फोड़नें पर ।

“अब तो बाँधूंगी मैं तुझे”……….मैया गुस्से में बोलीं ।

ये सुनते ही कन्हैया और जोर से चीखे………पर आज बृजरानी पर कोई असर नही हो रहा रोनें का …..न चिल्लानें का ……..

हाथ पकड़ती हैं……..दूसरे हाथ से पास में रखी गाय को बाँधनें वाली रस्सी लेती हैं …….उस रस्सी से बाँधनें का प्रयास करती हैं ……..पर डोरी कम पड़ गयी ……..दो अंगुल कम पड़ी ।

बृजरानी फिर परेशान हो उठीं …….दूर एक रस्सी और पड़ी थी ……..वहाँ गयीं ……….एक हाथ से कन्हैया का हाथ पकड़ा है ………दूसरे हाथ से वहाँ पड़ी रस्सी उठाई ………फिर बाँधनें लगीं ……पर ये क्या ! रस्सी फिर दो अंगुल कम ।

उद्विग्न हो, चारों ओर देखा बृजरानी नें ………गोपियाँ खड़ी हैं ………हाथ जोड़ रही हैं ……….मत मारो लाला को …..मैया ! मत बाँधों लाला को ।

पर मैया आज इनकी बातों पर क्यों ध्यान देनें लगीं ।

दूर ऊखल है ……….बृजरानी नें तुरन्त विचार किया …….ऊखल से बाँधूंगी इसे ……और वहीँ पास में एक रस्सी भी दीखी बृजरानी को ।

कन्हैया का हाथ पकड़ कर वहाँ लेकर गयीं……….दाऊ वहाँ आगये थे ……..रस्सी के पास ही खड़े थे ………बस स्तब्ध हो – खड़े थे ।

कन्हैया नें अपनें दाऊ भैया को देखा……तो और जोर से रोनें लगे ।

दाऊ से ये सब देखा नही जा रहा……उनका कान्हा आज इतनें जोर से रो रहा है…….कन्हैया के रोनें की आवाज नें दाऊ का हृदय मानों विदीर्ण ही कर दिया था । वो रुदन सुननें की स्थिति में नही थे ।

दाऊ ! रस्सी दे ……..बृजरानी नें आदेश किया ।

दौड़ पड़े दाऊ ……चरणों में गिर गए मैया के ……….मैया ! छोड़ दे लाला को ……….मैया ! तू तो इतनी कठोर न थी ……..फिर आज क्या हो गया है तुझे ……..! एक मटकी ही तो फोड़ी है ……….नीलमणी को देख …….एक मटकी के लिये तू इसे बान्धना चाह रही है …….नही मैया ! मत बाँध इसे …….छोड़ दे मैया ! छोड़ दे ।

दाऊ के नेत्रों से अश्रु गिरनें लगे थे ……………

तुझे माखन प्यारा हो गया है मैया !…….ये बृज का प्यारा कन्हैया, तुझे प्यारा नही लग रहा ? देख मैया ! कितना कोमल है ये …..और ये रस्सी ? गौ को बाँधनें वाली रस्सी से तू इसे बाँधेंगी ?

मत बांध , मैया ! मत बाँध इसे ! दाऊ प्रार्थना करनें लगे थे……..पर –

तू मुझे समझायेगा ! भाग यहाँ से नही तो मैं तुझे भी बाँध दूंगी ………

दाऊ को भगा दिया था मैया यशोदा नें ।

अब वहाँ पड़ी रस्सी को उठाया ……………दो रस्सी से बांध चुकी हैं ….ये तीसरी रस्सी है ……………इसे लेकर जोडा दूसरी रस्सी से ……..फिर बाँधनें लगीं …………पर नही ……….

उद्धव बोले – तात ! ऐसे कैसे बंध जाएगा ब्रह्म ।

पर ब्रह्म भले हों ……..जब पुत्र बनकर आये हैं तो बंधना पड़ेगा ही ।

विदुर जी बोले ………..फिर पूछ बैठे उद्धव से………..

ये दो अंगुल का रहस्य क्या है ? रस्सी कम क्यों पड़ रही है ?

उद्धव बोले – तात ! “मैं बाँधूंगी”…….यहाँ जो ये “मैं” है ना ……यही बाधक बन रहा है ………….

किसनें कहा वो साधना से मिलता है ……..तात ! वो तो कृपा से मिलता है …………हमारे करनें से मात्र हमारे अहंकार की पूर्ति ही तो होगी …. हमारा अहंकार ही तो पुष्ट होगा ! और इस मार्ग में तो अहंकार ही सबसे बड़ा बाधक है ।

तो कुछ न करें ? साधना बगैर कुछ नही ? विदुर जी नें पूछा ।

कृपा बरस रही है …….निरन्तर बरस रही है तात ! और ये कृपा शक्ति सभी के ऊपर , समान रूप से बरसती है ……….हाँ …….पात्र होना आवश्यक है……बिना पात्र के उस कृपा को कहाँ रखोगे ।

साधना से मात्र पात्रता का निर्माण होता है ।

उद्धव नें समाधान किया था ।

थक गयीं , हार गयीं अब बृजरानी……….रस्सियों पे रस्सियाँ जोड़ती जा रही हैं ………पर बारबार रस्सी कम ही पड़ती है ।

अब बैठ गयीं मैया……..पसीनें आगये………देह शिथिल पड़नें लगा ।

“ये मुझ से बंधेगा नही” ………….ये विचार मन में आया …………

क्या करे मैया अब ? कन्हैया भी अब चुप हो गए …….मैया थक गयी है ये बात जान रहे हैं …….अब कन्हैया को अपनी मैया के ऊपर दया आगयी थी …………..

अब देखा मैया के मुख मण्डल को ध्यान से कन्हैया नें ।

तू बंधेगा नही ? बड़ा दुष्ट है रे तू ? बंधता भी नही है ।

मैया अब दयनीय सी हो गयी थी……..पर अब……….

बृजरानी की चोटी आगे आगयी …….उस चोटी की डोर ढीली पड़ गयी थी भागते भागते ………..तुरन्त मैया उठीं ………और चोटी की डोर को निकालकर रस्सी से जोड़ दिया ……………

आकाश से महामाया नें वन्दन किया यशोदा मैया को …….मैया के वात्सल्य को………महालक्ष्मी नें सुमन बरसाए ऊपर से ……..

देवताओं नें जयजयकार किया ……………

और – तभी ….कमर से रस्सी को लेकर…..ऊखल से बाँध दिया मैया यशोदा नें ।

आकाश से पुष्प गिरे ………बोलो – दामोदर भगवान की – जय ।

बंध गए ब्रह्म ……..दुनिया को बन्धन मुक्त करनें वाला ब्रह्म ……आज स्वयं वात्सल्य के बन्धन में बंध गए थे………और दामोदर बन गए ।

दामोदर का मतलब होता है ……बंधा हुआ ब्रह्म ……….

तात ! अद्भुत नाम है ना ये ! दामोदर…………

मैया बृजरानी लाला को ऊखल से बांध कर चली गयीं रसोई में………क्यों की भूख लगी होगी ना इसे …….दिन भर से कुछ खाया भी तो नही है ……..रसोई में जाकर कुछ बनानें लगीं थीं ।

सामनें वृक्ष हैं….कन्हैया नें उन वृक्षों को देखा……अर्जुन नामके दो वृक्ष खड़े हैं नन्दालय के आँगन में…….कन्हैया नें देखा – और मुस्कुराये ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 60

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 60 )

!! “जब ब्रह्म डरनें लगा”- वात्सल्य की एक झाँकी !!


तात ! श्रीकृष्णावतार द्वापर के अंत और कलियुग के आगमन पर हुआ था ……….हर युग में भगवतभक्त अनन्त संख्या में मिल जायेगें ……पर कलियुग में ?

उद्धव, विदुर जी को “श्रीकृष्णचरितामृतम्” सुनाते हुए ये बात बोले थे ।

यमुना के तट पर , कालिन्दी के कूल पर …….शीतल वयार चल रही है ……वहीँ बैठे विदुर जी अपनें आराध्य श्रीकृष्णचन्द्र जु की दिव्य कथा सुन रहे हैं……और बड़े आनन्दित हैं ।

मैया बृजरानी भाग रही हैं अपनें सुत कन्हैया के पीछे ……..उपद्रव भी तो आज सीमा पार कर गयी थी ………उफ़ ! ऐसा भी कोई करता है …….मटकी एक फोड़ी होती तो चलो कोई बात न थी ….पर भण्डार के जितनें मटके थे सब फोड़ दिए !………उसका माखन भी बन्दरों और ग्वालों को लुटा दिया…….और अब भाग रहे हैं कन्हैया ।

पीछे छड़ी लेकर यशोदा दौड़ रही हैं…………

आज तक बृजेश्वरी क्यों दौड़ीं होंगीं ? बृज की महारानी हैं ये …”बृजेश्वरी” सब कहते हैं इन्हें , पर आज – चोटी ढीली हो गयी है ……मुख लाल हो गया है दौड़ते हुए…..अब तो पसीनें भी आने लगे हैं ।

लगभग हाँफनें लगीं थीं बृजरानी ।

आगे कन्हैया दौड़ रहे हैं ……….चपल उनके चरण ………गोल गोल घूमते हैं ……..फिर टेढ़े मेढ़े भाग रहे हैं ……….बेचारी बृजरानी कहाँ तक भागे इसके पीछे …….ये तो अद्भुत कुशल है भागनें में ………।

थक गयीं ………..बुरी तरह से थक गयीं मैया ………….

सुस्तानें के लिये बैठना ही पड़ा मैया को ……….हाँफ रही हैं …….

जो भी देख रहा था इस दृश्य को सब को दया आरही थी बृजरानी के ऊपर ……तो क्या कन्हैया को दया नही आवेगी ?

पकड़ ले मैया ! आ ! पकड़ !

कन्हैया चिढानें लगे थे अपनी मैया को ।

गर्मी के कारण सिर चकरानें लगा था मैया का …………

तभी उस स्थिति में बृजरानी को मिट्टी खानें का प्रसंग स्मरण हो आया ……..और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसके मुँह में मुझे दीखे थे ये भी तत्क्षण स्मृति में आगया ।

सामनें चिढ़ा रहे कन्हैया “नारायण” दिखाई देनें लगे ……….

पर मन में सोच रही हैं बृजरानी ………..तो क्या हुआ अगर ये नारायण है तो ! हो तो हो ……..मेरा पुत्र बनकर आया है तो उपद्रव का दण्ड इसे मिलेगा ही ………हाँ ये पक्का है ।

बृजरानी उठीं ………सामनें देखा, कन्हैया अंगूठा दिखा रहे हैं …….पर डरे हुए भी हैं ………कि जाना तो मैया के पास ही है ……….और जब जायेंगे तो पीटेगी ये …..और अच्छे से पीटेगी ।

बृजरानी बोलीं ………आजा ! आ मेरे पास आ ! लाला ! आ ।

ना ! तू मारेगी ………कन्हैया बोले ।

ना मारूँगी ! सच ! तू आ तो जा ……तेरी पूजा करूंगी …..आरती उतारूंगी …..आ ! आजा ! मैया आगे बढ़ रही हैं ये कहते हुए ।

पर तेरे हाथ में छड़ी है याकुं देख के मोय डर लगे ! कन्हैया बोले ।

लाला ! या छड़ी ते कहा डरनों…….ले ! मैने फेंक दियो …….

ऐसा कहते हुये बृजरानी नें अपनें हाथ की छड़ी फेंक दी ।

उद्धव प्रसन्नता में बोले ………तात ! जीव के हाथ में अहंकार रूपी छड़ी जब तक है ….तब तक परमात्मा कहाँ हाथ आवे ?

उद्धव ! क्या कन्हैया फिर हाथ में आये बृजरानी जु के ?

विदुर जी नें ये प्रश्न किया ।

नही ……..अभी भी भागनें में लगे हुए हैं ……………

भगवत्तत्व का बोध हुआ बृजरानी को ……..वो स्मृति आगयी …….ब्रह्माण्ड मुख में दीखा था ……वो स्मृति ।

“तुझे अपनें सतयुग के भक्तों की सौगन्ध है लाला ! “

मैया आवेश में बोलीं ।

सतयुग में तो मेरे बहुत भक्त हैं………..कन्हैया हँसे ।

तो फिर तुझे त्रेता युग के भक्तों की सौगन्ध है ……तू मेरे हाथ आजा ।

ना ! मैया ! त्रेता युग में भी मेरे भतेरे भक्त हैं……कन्हैया सहज ही रहे ।

द्वापर के समस्त भक्तन की सौगन्ध है तुझे ……….अब तो आजा !

मैया बोलीं, कसम देकर ।

पर कन्हैया नही आये ………कन्हैया नें सोचा द्वापर में भी मेरे बहुत भक्त हैं ।

“तुझे कलियुग के भक्तों की सौगन्ध है”……मैया के ये कहते ही , रुक गए कन्हैया……सजल नेत्र हो गए कन्हैया के…….

कलियुग में तो मेरे बहुत कम भक्त हैं……..भक्तों की संख्या कम है कलियुग में…….फिर उनकी सौगन्ध ? मैं कैसे टालूँ !

खड़े रहे कलियुग के भक्तों का स्मरण करते हुए कन्हैया …..आँखें बन्दकर ली थीं उस समय …………..

फिर उसी समय बृजरानी को………भगवतभाव की विस्मृति भी हो गयी ……सामनें पुत्र ही दीखा …..कोई भगवान नही ……बस ….वो दौड़ीं ………और धम्म् से जाकर पकड़ लिया…………

दो थप्पड़ पहले ही लगा दिए ………रो गए कन्हैया ।

करेगा ऊधम ? मचायेगा उपद्रव ?

कान पकड़ रही हैं ………गाल में थप्पड़ मार रही हैं…….क्रोध से भर गयी थीं बृजरानी आज……..चल ! बताउंगी मैं आज तुझे ।

गोपियां आगयीं नन्दालय के आँगन में……….कन्हैया को पीट रही हैं मैया यशोदा …………और हिलकियों से रो रहे हैं कन्हैया ………छड़ी दिखातीं हैं तो काँप जाते हैं एक अपराधी की तरह …………

मत मार ! बृजरानी ! “तेरो कठिन हियो री माई” ।

कैसा कठोर हृदय पाया है री बृजरानी ! मत मार अपनें लाला को …….

देख कितना कोमल है ये …..मत मार ! देख ! कैसे रो रहा है ……तुझे दया नही आरही ? बूढी गोपियाँ समझा रही हैं ।

हाँ नही आरही मुझे दया ! और तुम कौन होती हो ये बोलनें वाली …..कल तक तुम्ही आकर कहती थीं ना ……….कि तेरा लाला चोर है ….माखन चुराता है ………..फिर आज क्या होगया ? बोलो !

बृजरानी सच में आज बहुत क्रोधित हैं………..

कन्हैया बारबार कह रहे हैं ……..मत मार ! तू मुझे मत मार ! आँखों का काजल बह रहा है कपोलों में……….डर रहे हैं !

तात ! आँखें बन्द करो ……और इस झाँकी का ध्यान करो ………

ब्रह्मा से ये डरता नही है ………महाकाल इससे डरते हैं ………..पर ये एक सामान्य गोप पत्नी से डर रहा है !……..आहा ! कान पकड़े हैं ब्रह्म के इस नन्दगेहनी नें ………….नयन सभीत हैं इसके ।

उद्धव इतना बोलकर स्वयं ध्यान करनें लग गए थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 59

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 59 )

!! अहो ! जब “ब्रह्म” को पीटनें भागीं यशोदा !!


मैं वास्तु देवता !

…….नन्दमहल को पाकर मेरे भाग्य से देवता ही क्यों स्वयं विधाता भी ईर्ष्या करनें लगे हैं ।

उस दिन मैं था ………..मैने दर्शन किये उस लीला के ………..जब क्रोध में आकर नन्दनन्दन नें मटकी फोड़ दी थी ।

मैने सब देखा ……….मैं अपनें आपको बहुत भाग्य शाली मानता हूँ ……मानता नही …….”हूँ” ।

ब्रह्म , शिशु रूप में मेरे सामनें थे…………देवताओं की छोडो बड़े बड़े सिद्धात्मा भी इनकी एक छलक के लिए पागल हैं ……….कन्दराओं में , हिमालयों में हजारों वर्षों से तप कर रहे हैं…………पर ब्रह्म की अनुभूति उन्हें हुयी नही ……….मैं तो एक सामान्य वास्तु देवता हूँ ……मैं तो धन्य हो गया ……..मैं तो कृतकृत्य हो गया ……..मेरे सामनें नीलमणी दीखते हैं ………बाल चापल्य लीला करते हैं ……..और मैं उन्हें देखकर आनन्दित होता हूँ ……..अहो !

विदुर जी को उद्धव ये सब सुना रहे हैं ।

उस दिन वास्तु देवता नें ही कन्हैया के कान में कह दिया था ………

हे यशोदा के नीलमणी ! आपनें बहुत बड़ा अपराध कर दिया ……ये क्या किया ? अब झूठे आँसुओं से कुछ होनें वाला नही है ……..परदादी की मटकी थी ये ……….इस खानदान की सबसे पुरानी मटकी थी ये ………तुमनें तोड़ दी ।

डर गए कन्हैया ………..मैं वास्तुदेवता ………….उस रूप को देखकर मुझे बड़ा आनन्द आया ……काल जिससे डरता है ………..वो नन्दलाल आज यशोदा से डर रहा था ………रोना बन्द कर दिया ।

धरती में देखनें लगे कन्हैया …….मटकी फोड़ दी थी …….उसके टुकड़े चारों ओर बिखरे हुए थे ।

“अब तो मैया पीटेगी”………..आँखों में भय था ।

बचाव तो किया जाए……….पर कैसे ?

स्वयं ही सोच रहे हैं…….कुछ देर खड़े सोचते रहे मोरमुकुटी ।

फिर धीरे धीरे सामनें की ओर बढ़ चले………सामनें भण्डार घर था …….वहाँ कई माखन की मटकियाँ रखी हुयी थीं ……..द्वार खोला ……..पहली बार इस भण्डार में आये थे……..भीतर माखन से भरी मटकियाँ दीखीं ………कन्हैया तो खुश………..

माखन इतना रखा हुआ है यहाँ………….

ऊखल में चढ़ गए……..खिड़कियाँ खोल दीं ………

अब खिड़कियों के खुलते ही वानर समाज सब आगया …..वृक्षों में चढ़ कर खिड़कियों से देख रहे हैं बन्दर………तभी मनसुख इत्यादि ग्वाल सखा भी आगये …….उन्होंने भी देखा कि खिड़कियों में बन्दरों का उत्पात है……..माखन खा रहे हैं……..पर जैसे ही वहाँ गए …….तो मनसुख बोला ……उत्पात तो हमारे सखा नें मचा रखा है ।

खाओ ! खाओ माखन ! खूब खाओ ………भण्डार घर से माखन कि मटकी लेते हैं …..और बन्दरों को खिला रहे हैं कन्हैया ………माखन ही माखन हो गया है भण्डार में ……….

अब तो भण्डार से बाहर बहनें लगा था दही दूध ।

ग्वाल बाल भी कहाँ पीछे रहनें वाले थे………वो सब आगये ……….कन्हैया उन्हें देखकर और खुश हो गए ……..लो खाओ माखन ! खूब खाओ ! कन्हैया प्रसन्नता के कारण उछल रहे हैं आज ………बड़े प्रसन्न हैं आज कन्हैया ।

ये सब उपद्रव देखकर मुझे आनन्द तो आरहा था……अतिआनन्द …….पर अब तो मुझे भी डर लगनें लगा था कि बृजरानी कन्हैया को ताड़ना न दें……मैं कुछ कर भी नही पाउँगा वास्तुदेवता जो ठहरा ।

अब जाकर रसोई का कार्य पूरा हुआ था बृजरानी का ………..

कार्यपुरा करके जब आँगन में आईँ……..तब देखा – मटकी फूटी पड़ी है ……..उस मटकी का माखन आँगन में फ़ैल गया है ।

बृजरानी हँसी ……..मैने लाला को पटक दिया और रसोई में चली गयी इसलिये उसे क्रोध आया होगा…………बृजरानी नें ज्यादा गम्भीरता से इस बात को नही लिया था…….पर बृजरानी नें देखा , इधर उधर देखा ….किन्तु कन्हैया है कहाँ ?

वो थोडा डर भी गयीं ………कि मटकी फोड़कर वो गया कहाँ ?

तभी दूध और दही की धारा आती हुई दिखाई दी बृजरानी को ।

ये तो भण्डार से आरही है ……..तो क्या मेरा लाला भण्डार में पहुँच गया !……..बृजरानी गयीं भण्डार में …………

द्वार खुला है……….भीतर गयीं ……….तो वहाँ का दृश्य देखते ही क्रोध से भर गयीं ।

…….पर कन्हैया को कुछ भी भान नही है …….वो अपनें वानरों को और सखाओ को माखन लुटा रहे हैं ……और चिल्ला रहे हैं …………

भीतर का दृश्य बृजरानी नें देखा ………..माखन की सारी मटकियाँ फोड़ दी हैं कन्हैया नें……चारों ओर बस माखन ही माखन फैला हुआ है ।

क्रोध के कारण पहले बृजरानी बाहर आईँ ………गैया को मारनें वाली एक छड़ी वहीँ पड़ी हुयी थी ……उसे हाथ में उठा लिया ।

तात ! वास्तुदेवता स्वयं थरथर काँप उठे थे जब बृजरानी नें कन्हैया को पीटने के लिये छड़ी उठाई ………काल देवता स्वयं डर गए थे जब कन्हैया को पीटनें के लिये मैया नें छड़ी उठाई ……….

महालक्ष्मी काँप उठी थीं …………जब कन्हैया को पीटनें के लिये मैया नें छड़ी उठाई थी……….ओह ! अब क्या होगा ? क्यों की क्रोध से बृजरानी का मुखमण्डल लाल हो गया था ।

अपनें पीछे छड़ी को छुपाये मैया भण्डार घर में प्रवेश करनें लगी …….दवे पाँव ….ताकि लाला को पकड़ सके ……….

पर मनसुख नें देख लिया था ………वो चिल्लाया ….”.लाला ! देख तेरी मैया आरही है ” ।

कन्हैया नें पीछे मुड़कर देखा ……….दोनों हाथ पीछे हैं मैया के …….और वो चली आरही है ………मुख को देखा कन्हैया नें …….समझ गए कि आज तो “पिटेंगे”…………….खिड़की से कूदे कन्हैया ……और भागे – जोर लगाकर ।

बृजरानी भण्डार घर से बाहर आईँ ………और कन्हैया के पीछे दौड़ीं ।

स्थूल शरीर मैया का ………..और पाँचवर्ष के कन्हैया !

रुक ! मैं तुझे आज छोडूंगी नही ………..भाग के कहाँ जाएगा तू !

हद्द कर दी तेनें आज ………..साँस फूल रही है मैया की …….क्यों की भाग रही हैं लाला के पीछे ………

अब तो पसीनें आगये मैया के ……..बेणी ढीली हो गयी ……उसके फूल गिरनें लगे ………साँस तो रुकी पड़ी है आज सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की …….क्यों की ये पहली घटना है ……..जो ब्रह्म को ताड़ना देनें के लिये बृजरानी दौड़ रही हैं ……अहो ! तात !

उद्धव आज इतना ही बोले थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 58

Important

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 58 )

!! जब कन्हैया नें क्रोध में मटकी फोड़ी…!!


कन्हैया अपनी मैया की गोद में बैठकर “स्नेह रस” का पान कर रहे हैं ।

मैया, “दर्शन रस” का पान करते हुए मुग्ध हैं………

देवता तो अमृत का पान करके तृप्त हो गए ……..पर उस अमृत में ये रस कहाँ था…….इस अमृत में तो विशुद्ध वात्सल्य का भरपूर रस मिला हुआ है…..तभी तो ब्रह्म, यशोदा के वक्ष से निकल रहे दूध को पीते हुए भी अघाते नही हैं ।

अब प्रसन्न हैं ………अत्यधिक आनन्दित हैं ……क्यों की मैया का ध्यान अब पूर्णरूप से कन्हैया पर ही है ……..

अभी तक चिड़चिड़े से थे कन्हैया ………कारण ?

कारण यही कि…..मैया का ध्यान लाला पर नही था ….माखन पर था, …माखन निकालनें पर था ।

पर अब ? अब तो पूर्णरूप से लाला में ही ध्यान है …….

दूध पी रहे हैं कन्हैया……..बीच बीच में ……..स्तनाग्र से मुख हटाकर अपनी मैया को देखते हैं ………दूध मुख में भरा हुआ है ……तभी हँसी छूट पड़ती है और मैया के मुखमण्डल में वो दूध फैल जाता है ।

दुष्ट !

बड़े प्यार से कहते हुये कपोल में हल्की चपत लगा देती हैं ।

खिलखिलाकर फिर हँस पड़ते हैं कन्हैया ……….

पीले दूध लाला ! ऐसे हँस मत…….नही तो दूध कण्ठ में अटक जाएगा….मैया को हर तरह से सुरक्षा करनी है अपनें लाला की ।

कन्हैया फिर दूध पीनें लगे………पर बीच बीच में फिर खिलखिला उठते हैं……..जब स्तनाग्र से मुँह हटाकर मैया की ओर देखते हुए …….”नही, ….मारूँगी अब” ……….मैया समझ जाती है कि मुँह में दूध भर लिया है …..और अब मेरे मुँह में फैलायेगा ।

तब लाला हँसते हुए उस मुँह के दूध को वापस निगल लेते हैं …….पर निगलते समय दूध कण्ठ में अटक जाता है ……और कन्हैया खांसनें लग जाते हैं……मैया घबडा जाती है…..उठाकर पीठ में थपथपी देती हैं ।

कन्हैया फिर प्रसन्न हो जाते…….और दूध पीनें लगते हैं ।

पर तभी –

मैया नें एकाएक कन्हैया को धरती पर रख दिया और भागी रसोई की ओर…….उद्धव नें विदुर जी को कहा ।

पर क्यों ? विदुर जी नें पूछा ।

रसोई में दूध बैठाकर आईँ थीं बृजरानी…….और वो दूध उफ़न गया था …….इसलिये भागीं मैया……..उद्धव नें कहा ।

नही नही तात विदुर जी ! आप ऐसा मत सोचना कि …….कन्हैया से ज्यादा ममता मैया की दूध पर है ……नही ऐसा नही है ।

उद्धव रुके कुछ देर के लिये……..फिर बोले – तात ! प्रेम की गति बड़ी अटपटी है…….टेढ़ी मेढ़ी गैल है ये प्रेम की ।

तात ! कभी कभी प्रियतम की प्रिय वस्तु प्रियतम से भी ज्यादा प्यारी लगनें लगती है…….उसमें भी अगर “प्रिय” के खानें की वस्तु हो …….तब तो उसका प्रियतम से भी ज्यादा ध्यान सम्भाल किया जाता है ……..ये प्रेम का अनूठा प्रसंग है……..उद्धव नें कहा ।

तात ! ये सुरभि गाय का दूध था जो रसोई में आँच पर बृजरानी बिठाकर आईँ थीं…….मैया यशोदा का दूध पीनें के पश्चात्……..अगर किसी गाय का दूध कन्हैया पीते थे…..तो वो सुरभि गाय का दूध ही था……..मैया अगर न जातीं कन्हैया को छोड़कर तो वो दूध उफ़न गया था पूरा फैल जाता…..कन्हैया फिर किसका दूध पीते ? इसलिये कन्हैया के लिये ही कन्हैया को छोड़कर मैया गयीं रसोई में ।

पर – बालक ये सहन नही कर सकता…..बालक सब सह लेगा ….पर अपनी मैया का नजरअंदाज करना, ये उससे सहन नही होता ।

बस – कन्हैया अकेले धरती पर पड़े हैं……बृजरानी चली गयीं हैं दौड़ती हुयी दूध के पास, रसोई में ।

अब तो कन्हैया को क्रोध आया……और क्रोध भी बड़े जोर का आया …….लाल लाल नेत्र हो गए ….. अरुण अधर फड़कनें लगे उनके ।

नेत्रों में भी जल भर आये अब ………..भृकुटी टेढ़ी हो गयी ………

इधर उधर देखनें लगे ……………ये कैसे हो गया ? मैया नें मुझे कैसे पटक दिया और चली गयी दूध के पास ?

“दूध प्यारो है , पूत प्यारो नही है मैया कूँ”………..बस क्रोध और बढ़ा ये सोचकर ………..

इधर उधर दृष्टि घुमाए जा रहे हैं ………..तभी सामनें वही मटकी दीखी ……जिसमें से माखन अब निकलनें ही वाला था …..मैया, अभी मथानी जिसकी चला रही थीं ……….

बस – उसके पास गए कन्हैया ………….मटकी को हिलाया …..पर मटकी हिली नही ………बड़ी कोशिश की ……..कि मटकी को गिरा दिया जाय …और माखन फैला दिया जाए ……पर नही …..कुछ न हो सका ।

क्रोध से भरे हुए हैं कन्हैया ।

कन्हैया को भी क्रोध आता है ? विदुर जी नें सहजता में पूछा ।

उद्धव हँसे ……क्रोध से ही तो ये प्रलय करता है सृष्टी का ।

तात ! उसी समय सामनें एक लोढ़ी ( पत्थर का टुकड़ा ) दीखा ……वो बड़ा था …….कन्हैया उसे जैसे तैसे ले आये …….और ऊपर से मटकी में जोर से मार दिया ……….मटकी फूट गयी ……..माखन फ़ैल गया आँगन में ……………

मटकी फूटी ……..तो डर गए कन्हैया …………मैया की ओर , रसोई घर की ओर देखनें लगे ………..पूरा माखन फ़ैल गया था आँगन में ………

कन्हैया सोचनें लगे …….अब तो पीटेगी मैया !

तो करें क्या ?

उद्धव बोले …………रोनें लगे का कन्हैया …………सच में नही तात ! झूठे अश्रु लगाकर रोनें लगे …………….मृषाश्रु ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 57

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 57 )

!! “मेरो व्याह कराय दे मैया”- अटपटी लीला !!


तभी –

कन्हैया आँखें मलते हुए, दधिमन्थन करती हुई अपनी मैया बृजरानी के पीछे जाकर खड़े हो गए थे ।

नित्य, बृजेश्वरी ही जगाती थीं कन्हैया को …………पर आज इनका ध्यान माखन निकालनें पर था ……..और माखन निकालनें में इतनी तन्मय हो गयी कि ……..दिन भी निकल आया……..

आज स्वयं ही जगे थे नन्दलाल ………पहले कुछ देर ” ऊँ ऊँ ऊँ” करके रोये …….कुछ देर “मैया मैया” कहकर भी देख लिया …….पर जब देखा कि आज कोई नही है पास में …..न कोई सुन ही रहा है ……….तो उन्होंने रोना छोड़ दिया ………स्वयं ही उतरे पलंग से ……….और धीरे धीरे आँखों को मलते हुये आगये थे मैया के पास ।

पीछे से बृजरानी के गले में अपना एक हाथ रखा था …..और दूसरा हाथ उनकी ठोढ़ी में रखते हुए पूछा ……….”तू तो आजकल मेरी बात भी नही सुनती मैया ! ”

पीछे मुड़कर देखा मैया नें……फिर हँसीं……आगे धीरे से खींचा अपनें लाल को…….फिर बोलीं……बस, एक घड़ी भर रुक जा ……माखन आनें ही वाला है ऊपर…..इतना कहते हुए फिर दधिमन्थन करनें लगीं ।

“पर मुझे भूख लगी है”…….लाला इस बार चिल्लाये ।

पर आज मैया बस मुस्कुराई लाला की ओर देखकर ………हाँ एक बार मुख चूम लिया था ……….फिर मथानी चलानें लगी ।

कन्हैया भी कहाँ माननें वाले थे ……..इस बार तो मथानी को ही पकड़ लिया …………अब कोमल छोटे करों नें जब मथानी को रोक दी …..तब मैया में भी हिम्मत न रही कि मथानी को चला सके ।

लाला ! तुझे क्या चाहिये ? अच्छा बता तुझे क्या दूँ ?

गोद में बिठा लिया लाला को …….और बड़े प्रेम से पूछनें लगीं ।

माखन ! मटकी में हाथ डालते हुए बोले कन्हैया ।

हट्ट ! हाथ मत डाल इसमें…….मैया बृजरानी नें हाथ हटा दिया ।

फिर बोलीं – लाला ! बस …….कुछ देर और मथानी चलानें दे ……….माखन निकल आएगा तब खिलाऊँगी तुझे ………

न हीं …………….फिर जोर से चिल्लाये ।

अभी …….अभी चाहिये माखन ! अभी ………गोद से उठ गए कन्हैया ……..और धरती में उछलने लगे ……..”माखन चाहिये” ।

मटकी में देखा मैया नें ………….माखन ऊपर आनें ही वाला है अब तो ……बस दो तीन बार और चला लुंगी मथानी तो हो ही जाएगा ।

लाला ! ए मेरे लाला ! बस रुक जा ! कुछ देर के लिये रुक जा !

मना रही है मैया अपनें लाला को …………

पर लाला भी हठी है………..ये मानता ही नही जल्दी ।

मन्थन छोड़ दे …….मैया ! ये सब छोड़ दे ……मुझे माखन दे …….

मैया नें गोद में ले लिया……अब क्या करे ऐसे “हठी गोविन्दा” को, ……”लाला ! कल का माखन खा ले”…….मैया नें पुचकारते हुए कहा ।

नही ……..ये माखन ………मटकी की ओर दिखाते हुए बोले ।

हद्द है ………मथानी की रस्सी निकाल कर फेंक दी कन्हैया नें ।

मैया अब क्या करे…..”इतनी जिद्द तो तू कभी करता नही था ! मान ले ना बात को लाला !

“नही ….माखन ……..और इसी में से” ………फिर वही हठ ।

मैया बृजरानी नें लाला के कपोल में थपकी देते हुए कहा ……….ऐसे जिद्दी बनेगा ना, तो तेरा ब्याह भी नही होगा ।

मेरा ब्याह ? कन्हैया सोचनें लगे …………..

मैया ! ब्याह क्या होता है ? मासूम से कन्हैया पूछ रहे हैं ।

मैया क्या बोले ………तभी सामनें मोर और मोरनी दिखाई दिए ……जो आँगन में दाना चुगनें के लिये आगये थे ।

देख ……..ये मोर है ….और ये उसकी मोरनी है ……..ऐसे ही तेरा ब्याह होगा ना …..तो तेरी भी बहु आयेगी ………….

बड़े ध्यान से देखते रहे मोर और मोरनी को कन्हैया ……फिर बोले …..ये इसकी बहु है ?

हाँ …..ये इसकी बहु है ……….फिर कुछ सोचनें लगे ………..और फिर एकाएक गोद से उठकर खड़े हो गए धरती पर ।

मेरी बहु कहाँ है ? फिर दूसरा हठ शुरू ।

मैया हँसी ……..मैया को हँसते हुए देखा तो और गुस्सा आया लाला को ………गेंद की तरह मुँह फुला लिया …….टेढ़ी नजर से देख रहे हैं अपनी मैया को …….गुस्से में देख रहे हैं …….दोनों हाथों को कमर में रख लिया है ………ओ ! ओ मैया ! हँस मत, मुझे बता कि मेरी बहु कहाँ है ?

मैया इस छबि पर मुग्ध है…वारी जाऊँ लालन ! क्या छबि है तेरी….

पर कन्हैया गुस्से में हैं ……..”मेरी बहु कहाँ है ये बता ? “

“अभी तेरो ब्याह थोड़े ही भयो है” ……मैया नें कहा ।

तो मेरो ब्याह कराय दे ……..कन्हैया बोले ।

लाला की बातों को सुनकर, मैया हँस हँस के लोट पोट है रही है ।

अच्छा बता ! तुझे कैसी बहु चहिये ?

फिर लाला को खीचकर अपनी गोद में बिठाते हुए मैया नें पूछा ।

मुझे ? सोचनें लगे कन्हैया ……….फिर बोले …….छोटी सी ……छोटी सी बहु , मैया ! ।

कितनी छोटी सी ? मैया हँसते हुए पूछ रही हैं ।

पर कन्हैया गम्भीर होकर उत्तर दे रहे हैं –

इतनी छोटी सी की जब हम गैया चरावें जायो करें तब जेब में धरके ले जावें …….और वहाँ वा ते बतियामें …….।

मैया बोली ……….अरे ! तोय गुड़िया चहिये ?

नाय बहु चहिये ! कन्हाई फिर मचले ।

मैया बृजरानी समझ गयीं कि…..इसे भूख लगी है इसलिये ये चिड़चिड़ा हो गया है…..अपनी गोद में लेकर लाला को दूध पिलानें लगीं थीं ।

शेष चरित्र कल

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 56

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 56 )

!! आज – “मैया यशोदा के दर्शन कीजिये” !!


“विदुर उद्धव संवाद” के माध्यम से श्रीकृष्ण लीला का प्राकट्य यमुना पुलिन श्रीधाम वृन्दावन में हो रहा है …….दोनों ही परमभागवत हैं ….लीला रसिक हैं ……और जिनकी लीला ये सुन, सुना रहे हैं वो इनके सर्वस्व हैं ……यमुना का पुलिन भी आज आनन्दित है ………

जब उद्धव श्रीकृष्ण लीला का वर्णन करके सुनाते हैं…….तब अनगिनत पक्षी आकर उद्धव को घेर लेते हैं ……..कपि तो इधर उधर से फल तोड़कर ले आते, और इन दोनों महापुरुषों के सामनें रख देते हैं ।

मोर नृत्य करते हैं…….गर्मी ज्यादा हो जाए तो बादल ही छत्र बन जाते हैं, और बरस भी जाते हैं ।

आज प्रातः से ही उद्धव ध्यान मग्न हैं……. कन्हैया की लीला आज चल पड़ी है इनके हृदय में…….विदुर जी नें इस ध्यान से उद्धव को उठाया …….और बड़े प्रेम से बोले – उद्धव ! हमें भी उस लीलासिन्धु में अवगाहन करना है ……अकेले मत जाओ……..हम भी प्रतीक्षा में हैं ।

उद्धव नें नेत्र खोले…..प्रातः की वेला है…..सूर्योदय होनें वाला है ……विदुर जी को प्रणाम किया ……….कुछ समय लगा इन्हें बहिर्मुख होनें में ………जब सहज हुये तब इन्होनें कहना प्रारम्भ किया था ।

तात ! दर्शन करो मैया यशोदा के ……….क्यों की दर्शन करनें योग्य यही हैं …….ये सबसे बड़ी हैं ……इनसे बड़ा कौन होगा ?

उद्धव परमशान्त हैं आज ।

मैं पूर्व में भी कह चुका हूँ कि …..ब्रह्म की जो माँ हैं ………..उनसे बड़ा कौन होगा ।

सच कह रहे हो उद्धव ! अहो ! ऐसा अलभ्य लाभ बृजरानी को प्राप्त हो रहा है ! ब्रह्माण्ड का दर्शन मुख में…… ब्रह्म की एक झलक के लिए अनन्त काल से ऋषि मुनि तप कर रहे हैं …….उस ब्रह्म को गोद में बिठाकर खिला रही हैं ये ब्रजेश्वरी ………उसे पुचकार रही हैं …..उसे चूम रही हैं ………उसकी मनुहार कर रही हैं ………इतना ही नही ताड़ना भी दे रही हैं ……..आहा ! विदुर जी आनन्दित हो उठते हैं ।

उद्धव मुस्कुराये – बस, इतनें में ही आश्चर्यचकित हो गए तात ?

गौ को बाँधनें वाली रस्सी से बाँधा है यशोदा नें , अपनें लाला को ।

ये सुनकर विदुर जी के नेत्रों से आनन्दाश्रु बहनें लगे ……

.क्या ब्रह्म बंध गया ?

हँसे उद्धव …..”ये प्रेम की रज्जु से बन्धनें ही तो आया है इस गोकुल में ।”

ओह ! ……मुझे ले चलो गोकुल उद्धव ! मैं उसी नन्दालय में जाना चाहता हूँ …….और ब्रजेश्वरी के सामनें ठुमक ठुमक चलते हुए उस “शिशु ब्रह्म” को देखना चाहता हूँ ………जो प्रेम रस का प्यासा है ……हाँ उद्धव ! वो प्रेम को पीनें ही आया है ………इसलिये अवतार लिया है इसनें ……..नही तो, और कोई कारण मुझे तो समझ में नही आता ।

विदुर जी की बातें सुनकर उद्धव बहुत प्रसन्न हुए ………..

चलिये – तात ! उन नन्दनन्दन की मैया यशोदा के दर्शन कीजिये –

गोकुल है ये ……….बृज क्षेत्र का गोकुल गाँव ।

यहाँ सब ब्रह्म हैं …….कन्हैया ही ब्रह्म है ऐसा नही ……..ये बृज भी ब्रह्म है ……क्यों की बृज शब्द का अर्थ ही होता है …..जो व्यापक है …….जो बृज का अर्थ है वही ब्रह्म का भी अर्थ है ……जो व्यापक है वो ब्रह्म, जो व्यापक है वो बृज ……….तो ये स्थान भी ब्रह्म है …….स्वयं खेल रहे ….लीला कर रहे कन्हैया परब्रह्म हैं …….ये कार्तिक का महीना चल रहा है …….ये जो लीला मैं आपको सुनानें जा रहा हूँ ये कार्तिक मास की लीला है …इस कार्तिक मास को “दामोदर मास” भी कहते हैं …….उद्धव बोलते हुए कुछ देर के लिए रुके ……..फिर बोले …..लीला स्वयं ब्रह्म है ………..इसलिये जैसे ब्रह्म का अवतार विशेष समय में होता है …….ऐसे ही लीला का अवतरण भी विशेष काल में ही होता है तात ! ।

स्थान ब्रह्म, काल ब्रह्म, लीला ब्रह्म, लीलायित होनें वाले कन्हैया परब्रह्म ………यहाँ सब वही हैं……सब वही ……।

उद्धव के हृदय में अब आनन्द प्रवाहित होंने लगा था ।

यशोदा मैया में ऐसी क्या विशेषता है ?

तो पहले दर्शन कीजिये…….आज केवल मैया के ही दर्शन करनें हैं …….इधर उधर मत देखना तात ! कन्हैया को आज मत खोजना…..केवल ध्यान करना मैया यशोदा का ।

आज कुछ जल्दी ही उठ गयीं हैं………कई दिनों से परेशान थीं ……चिन्तन करते करते ……..चिन्ता करनें लगीं थीं ………

इनका एक नाम है “नन्दगेहनी”….”आनन्दगेहनी”……. जो आनन्दित है …..सदैव आनन्द में ही रहता है ……आनन्द, जिसके घर की बात है ….वो आज चिन्ता कर उठीं……..कि – मेरा बालक मेरे घर माखन क्यों नही खाता ! गोपियों के यहाँ जाकर क्यों खाता है ?

जहाँ प्रेम होता है ……वहाँ चिन्ता होती ही है…….और जहाँ चिन्ता होती है ……मन भी वहीँ होता है……..उद्धव बोले ।

ओह ! अब समझीं मैं …….मेरे घर का माखन तो दास दासियाँ निकालती हैं……….पर गोपियाँ तो अपनें घर में बड़े प्रेम से स्वयं ही माखन निकालती हैं…….तो मेरे लाल को …….

बृजरानी समझ गयीं …….सब समझ गयीं ………..कि लाला के लिये अब स्वयं ही माखन निकालना होगा ।

इसलिये आज कुछ जल्दी ही उठ गयीं हैं ये ।

स्नान किया है …….श्रृंगार किया है …….इत्र फुलेल लगाया है ……वेणी बनाई है ……उसमें गजरा लगाया है …………

इतना श्रृंगार क्यों ? विदुर जी नें पूछा ।

ये श्रृंगार अपनें लिये नही ……….अपनें लाला के लिये ……..शरीर से सुगन्ध आये …….क्यों की लाला बैठेगा गोद में ………इत्र फुलेल इसीलिये लगाया है ।

बेणी बनाई ……….उसमें गजरा लगाया है ……..

इसलिये कि कन्हैया जब कुछ रोष प्रकट करता है तो सबसे पहले मैया की चोटी ही खींचता है……..चोटी में फूल लगे हों तो इसे और अच्छा लगता है……….

अपनें आपको आईने में देखती हैं………कुछ मोटी हो गयी हैं आज कल ……हो नही गयी हैं ……ये मोटी बनी हैं……..उद्धव बोले ।

क्यों ? विदुर जी नें पूछा ।

इसलिये कि……..लाला जब दौड़ता आएगा …….गले लगनें के लिये …..तब मेरी हड्डियाँ लाला को चुभें नहीं……..

नितम्ब बढ़ा किया है यशोदा मैया नें……..तात ! इसलिये कि …..मैया के पीछे गले में दोनों हाथ डालकर कन्हैया झूलता है…….उस समय लाल अपनें चरण कहाँ रखे ……तो नितम्ब बड़ा कर लिया ।

सज धज कर अब तैयार हो गयीं …………

बाहर आयीं …….तो देखा दास दासी सब लगे हैं ……….

सबसे पहले तो इन सब को हटाया ……और अन्य कामों में लगा दिया ……फिर माखन की मटकी में दही भरकर बैठ गयीं ……….

आराम से बैठीं हैं …….और रईं चलानें लगीं ।

अपनें हाथों से पद्मगन्धा नामक गाय का दूध ये बृजरानी स्वयं दुहति हैं ………उसी को रात में जमा देतीं…….उसी जमें हुए दही का ये अभी मन्थन कर रही हैं ।

रईं तेज चलानें के कारण अब बेणी में लगे फूल गिरनें लगे थे …….और गिर रहे थे नन्दरानी के चरणों में ……..

पता है तात ! पुष्प भी सोचनें लगे …….अहो ! ब्रह्म की माँ हैं ये …….हम इनके सिर में रहनें लायक कहाँ ?

रईं को तेज चलानें के कारण उनके हाथों में जो चूड़ियाँ थीं …..वो बजनें लगी थीं ………उससे मधुर मधुर ध्वनि वातावरण में फैलनें लगी ।

कृष्ण कृष्ण कृष्ण ! कृष्ण कृष्ण कृष्ण !

ऐसा मधुर मधुर स्वर में गान कर रही हैं यशोदा मैया………।

तात ! “कृष्ण” कहते ही मैया के हृदय से वात्सल्य फूट पड़ा था ……वक्ष से दूध की धार बह चली थी ………..पर मैया को सुध नही है कुछ भी …..वो बस लगातार रईं को चलाये जा रही हैं ।

बृजरानी की दोनों भुजाएँ कमलनाल के समान सुन्दर लग रही थीं …….

वो कभी मुस्कुरातीं तो कभी गम्भीर हो जाती थीं ………

मुस्कुराती तो तब थीं ……जब कन्हैया के बाल चापल्य लीलाओं का स्मरण करतीं ……..उस समय खो जातीं ……..दधि मन्थन करना भी भूल जातीं…….फिर जब देह भान होता ………तब गम्भीर हो, फिर रईं चलानें लगतीं ………..कहीं मेरा लाला जग न जाए ………और जगेगा तो माखन मागेगा …….जगते ही माखन चाहिये उसे …..इसलिये अब ये शीघ्र कर रही हैं…………परिश्रम ज्यादा हो गया …….स्थूल शरीर भी हैं इनका………इसलिये पसीनें बह रहे हैं ।

तभी –

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 55

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 55 )

!! “आओ प्यारे” – गोकुल की एक कहानी !!


प्रभावती की बहु आरही थी……व्याह हुए तो वर्षों हो गए थे ……पर गौना कल ही हुआ था ………बड़ी धूमधाम से गौना करवा लाया था ये प्रभावती का बेटा……….

पर पता नही क्यों बड़ी डरी हुयी थी प्रभावती …………

किससे ?

अजी ! यह गोकुल है …..यहाँ कन्हैया के सिवा और कोई किससे डरता है ? उसकी नजर जिस पर पड़ी ……वो तो गया काम से ।

“तू कुछ मत करियो! सब मैं करूंगी” …….सास प्रभावती नें अपनी बहु को घर में आते ही समझाया था ।

बहु सोचती रही कि मेरी माँ नें मुझे कहा था – ससुराल में काम करना ……सास की सेवा करना ……..सास का हाथ बटाना …….पर यहाँ सासू जी तो कुछ और ही कह रही हैं………ठीक है …जैसा सासू माँ कहें ।

“सुन बहु ! चाहे कुछ भी हो जाए ………..साँझ के समय दरवाजा मत खोलियो”………..ये बात मुख्य कही थी सास नें ।

क्यों की साँझ के समय ही वो नन्दनन्दन अपनें सखाओं के साथ गोकुल में निकलता था ………..इसलिये सास बोली …….शाम के समय द्वार मत खोलना ।

क्यों ? बहु नें इतना तो पूछ ही लिया ।

बस बहु ! इतना समझ ले कि हवा खराब है या गोकुल की ……

और मैं नही चाहती कि वो हवा तुझे लगे ।

प्रभावती नें अच्छे से समझा दिया था अपनी बहु को ।

शाम के समय सब गोष्ठ में ही रहते थे…गोप वृन्द सब ……….प्रभावती भी इधर उधर जाती थी……..घर के भीतर बहु …….वो भोजन बनाती……..पर शाम होते ही खिड़कियाँ दरवाजा सब बन्द…….ताकि गोकुल की हवा न घुसे घर में ।

तात ! ये वो हवा है …..जिसे बड़े बड़े योगिन्द्र मुनींद्र चाहते हैं ……पर मिलती नही है…..किन्तु देखो यहाँ …..इन महाभागा गोपियों को ।

आज पाँच महिनें हो गए इस नई बहु के गोकुल आये हुए ।

शाम होते ही ये द्वार झरोखे सब बन्द कर लेती थी ………

आज शाम हुई……..झरोखे तो बन्द कर लिए………पर जैसे ही द्वार बन्द करनें के लिये गयी ………….

रुक गयी ………मन में आया कौन सी हवा है जिसके छूते ही “कुछ” हो जाता है …….ऐसा क्या होता है ? बहु सोच ही रही थी …..द्वार पर खड़ी ही थी अकेली….कि ……..तभी –

मोर मुकुट धारी …….पीताम्बर पहनें …घुँघराले बाल…….नीलवर्ण ………..काँछनी बान्धे ……..सखाओं के साथ हँसते , खिलखिलाते सामनें से आरहे थे ……….सच में हवा पागल करनें वाली थी ……बहू तो सब कुछ भूल गयी …….द्वार तो पूरा खुल गया ………..वो अपलक देखती ……..देह भान ही भूला बैठी …………कन्हैया को छूती हुयी हवा जब चली …..और उसी हवा नें बहु को छू लिया ………….

फिर क्या था …….बहु के केश उड़नें लगे उसी हवा में ……..वो अपनी बाँहों को फैलाये – मुस्कुराती हुयी …….उन्मत्त सी कन्हैया को आलिंगन करनें के लिये दौड़ी – बोल उठी – “आओ प्यारे “

कन्हैया नें हवा के साथ बिजुरी और गिरा दी…….उफ़ ! मुस्कुरा दिए ।

कन्हैया तो इतना करके चल दिए…..पर इस बहु को “हवा” लग गयी ।

ये हँस रही है ……….ये मुस्कुरा रही है …..अकेले ……….द्वार पर खड़ी है ……..और बड़े प्रेम से अकेले ही बोले जा रही है …..आओ प्यारे ।

इसे सर्वत्र कन्हैया ही दिखाई दे रहा है………..इसे सर्वत्र वही मोरमुकुट धारी ही दिखाई दे रहा है ।

सारे भेद खतम हो गए हैं इस की दृष्टि के …….स्त्री हो या पुरुष सबमें ये कन्हैया को ही देख रही है …..अजी ! इसके आँखों की पुतरी ही बदल चुकी है ।

कुछ देर बाद प्रभावती घर में आयी ……….अंदर नृत्य कर रही है बहु ………द्वार खुला है ………..प्रभावती नें सोचा ……आज बहु नें द्वार बन्द क्यों नही किया …….भीतर गयी ……तो जैसे ही प्रभावती को आते हुए बहु ने देखा …….लजा गयी …….शरमा गयी ……..और दोनों बाँहों को फैलाकर बोल पड़ी………आओ प्यारे !

ये क्या कह रही है ! डर गयी प्रभावती ……..वो समझ गयी कि मैं जिस बात से डरती थी वही हुआ है …………..

वह भागी गोष्ठ की ओर ……….अपनें पति को लेनें ………..यानि उस बहु के ससुर जी को बुलानें………..

ससुर जी उठे और घर की ओर भागे…..कि बहु को “हवा” लग गयी ….

द्वार खोला ……..तो बहु भीतर बैठी थी ……….द्वार के खुलते ही वो उठ गयी ……और दौड़ पड़ी ……..ससुर जी आये घर में ……जैसे ही ससुर जी को देखा ……….बहु को तो ससुर में भी कन्हैया दिखाई देंने लगे ….

दोनों बाँहों को फैलाये ससुर जी को बड़े प्रेम से बोली………..

आओ प्यारे !

ससुर नें कहा ……मेरी बहु की तबियत खराब हो गयी है …….अब क्या करूँ ?

तभी देवर आया घर में………बहु फिर उठी…….उसे लगा मेरा कन्हैया आया है…….फिर दोनों बाँहों को फैलाये………

आओ प्यारे !

प्रभावती आँगन में बैठ कर रो रही है………मैने कहा था द्वार मत खोल ……इसनें मानी नही …… अब देखो इसकी हालत ।

कोई उपाय है क्या माँ ? उस बहु के पति नें पूछा ।

हाँ …….अब तो एक ही उपाय है ! ……ये कहते हुए प्रभावती नन्दालय की ओर चल पड़ी थी ।

मिल गए नन्दालय के आँगन में ही ………..ग्वाल सखाओं के साथ बैठे थे …..हँस रहे थे ठिठोली कर रहे थे कन्हैया ।

लालन ! चलो ना मेरे घर !

प्रभावती पहुँची कन्हैया के पास , और प्रार्थना करनें लगी ।

नहीं …..लाला ! मत जइयो या के घर ……..ये गोकुल में सबको कहती है …शाम को द्वार बन्द रखना…..क्यों की कन्हैया निकलता है ।

इसलिये मत जाना इसके यहाँ ।

लालन ! मेरी बहु नें तुमको देख लिया है …..वो उन्मादिनी हो उठी है …..मैं जानती हूँ इसकी दवा तुम ही हो ………..मेरे ऊपर कृपा करो और मेरे घर चलो ।

नही ………..मैं नही जाउंगो तेरी बहु के पास …………तू तो दरवज्जो बन्द करवा वे , है ना ? कन्हैया रिसाय के बोले थे ।

अब चलो ना ! मेरी प्रार्थना कूँ मान लेओ लालन !

अच्छा ! ठीक है – चल प्रभावती ।

इतना कहते हुए छोटे से कन्हैया चल पड़े उस प्रभावती के साथ ।

यहाँ तो भीड़ लगी है प्रभावती के आँगन में ………क्यों कि –

सबरे गोकुल में हल्ला मच गयो कि …..प्रभावती की बहु पागल है गयी ।

प्रभावती कन्हैया को लेकर आई ………..चलो कन्हैया ।

द्वार बन्द था …….भीतर बहु बैठी है …..अब किसी की हिम्मत नही है जो भीतर जाये ……..पर वो आनन्दित है ……वो बहु गा रही है कभी पैर थिरकनें लगते हैं उसके ………..

कन्हाई नें द्वार खोला……..वही सुगन्ध , वही हवा का झौंका……

बहु दौड़ी द्वार की ओर…….इधर कन्हैया दौड़े बहु की ओर ।

बहु दोनों बाहों को फैलाये दौड़ रही है……और बोल रही है –

आओ प्यारे !

कन्हैया भी दोनो भुजाओं को फैला कर दौड़ रहे हैं……और बोल रहे हैं –

आगयो प्यारी !

आहा ! जन्मों जन्मों की इस गुजरिया की प्यास आज बुझी थी…….

क्यों की उस कन्हैया नें अपनें बाहों में इसे भर लिया था ।

चौर जार शिखामणि………

ये चोरों के और जारों के शिरोमणि हैं……….

मैं नही…भगवान शंकर ऐसा कहते हैं….उद्धव नें हँसते हुए कहा ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 54

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 54 )

!! अहो भाग्यम् ! अहो भाग्यम् !!


तात ! भगवत्लीला का प्रयोजन मात्र इतना ही है कि ………जगत के प्रपञ्च का विस्मरण, और भगवान का निरन्तर स्मरण ।

उद्धव बोले ।

तात ! जहाँ भगवान ही स्वयं लीलानायक हों …..उस लीला की पूर्णता में भी भला कोई सन्देह है ।

लीला के प्रतीकार्थ निकाले जाते हैं ……..पर लीला का क्या प्रतीक ?

निराकार का साकार प्रतीक है……परोक्ष का प्रत्यक्ष प्रतीक है ….अज्ञात का ज्ञात प्रतीक होता है …….परन्तु जो सर्वात्मा है …..सर्वरूप है …..वही यहाँ लीलाधारी है ……..और मात्र लीलाधारी नही ……वह लीला भी है ………जैसे ज्ञानी लोग कहते हैं ना तात ! कि सुनार भी वही और सुवर्ण भी वही …….बनानें वाला भी वही और बननें वाला भी वही ………ऐसे ही यहाँ है ……..लीलाधारी भी कन्हैया ……और लीला भी कन्हैया ………आहा !

सब कुछ भुला दे वह है भगवत्लीला ……..संसार की विस्मृति करवा दे …..संसार के दुःखों को भुला दे ……उसे कहते हैं लीला ।

फिर कुछ सोच कर उद्धव बोले – तात ! इतना ही नही ……..लीला तो वह है जो भगवान के ऐश्वर्य को भी भुलाकर अपनत्व जगा दे भगवान से ।

ऐसा अपनत्व कि लगे …..ये तो यशोदा जी का ही नही …..मेरा भी लाला है…..ये मनसुख का ही नही ….मेरा भी सखा है ……..ये गोपियों का ही नही ..मेरा भी प्रियतम है …………भगवत्ता की भी जहाँ विस्मृति होनें लग जाए……हृदय में मात्र उसके प्रति प्रेम जागे……विशुद्ध प्रेम ।

उल्लसित रस का नाम होता है – लीला ……….इसे साधारण मत समझना तात ! ये तो भगवन्मय भगवद् – विलास है …….भगवत्सत्ता का आल्हाद है ………..उल्लास है …..उमंग है ………छलकता रस है ……..जिसे रसिक लोग पीते हैं……..और उन्मत्त रहते हैं ।

उद्धव आज आनन्दित हैं ………..कुछ ज्यादा ही आनन्दित हैं ।

तात ! चलिये मेरे साथ मानसिक रूप से गोकुल …और दर्शन कीजिये …..गोकुलचन्द्र जु का । गोकुल – जहाँ गौ रूपी इन्द्रियाँ विचरण करती हैं………पर जन्म जन्मों के स्वभाव वश …….ये गौ यानि इन्द्रियाँ घूम फिर कर उसी विषयों को ही भोगना चाहती हैं ………..

वहीँ – इन्हीं के मध्य …….उन्हीं विषयों में ……..निराकार नही साकार ….अचल नही…….क्यों की ये इन्द्रियाँ चंचल हैं ………..इसलिये ये अचल नही ….यहाँ चंचल बने हैं ……..क्यों की हाँकना है इन इन्द्रियां रूपी गायों को ……….।

विराट ब्रह्म नही है यहाँ ……यहाँ तो शिशु ब्रह्म है………मैया की गोद में छिपा बैठा है…….स्नेह की जहाँ धारा बह रही है …….वहीँ ये गोपाल भी बैठा है …तुम्हारे स्नेह दुग्ध को पीनें के लिये ।

वो भूखा है …वो प्यासा है ……प्रेम और भाव का भूखा प्यासा है……इसलिये तो ये सब लीलाएँ रचता है …….शिशु बनकर रोते हुए यशोदा के वक्ष से गिरते स्नेह दूध को पीनें के लिये मचल उठता है ………..जिसकी एक भृकुटी के भय से सातों समुद्र उछलनें लगते हैं ……..वही ब्रह्म यहाँ यशोदा के आगे रोता है ……..

जिसका भोजन ही सम्पूर्ण सृष्टी है …….जो कालों का भी महाकाल है …..मृत्यु जिसकी चटनी है ……..जो मौत को भी चाट जाता है ……वह ब्रह्म …..यहाँ माखन के लिये मचलता हुआ दिखाई देता है ।

जो एक फूँक मार दे तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रलय आजाये ……..वही यहाँ ग्वालों के साथ गेंद लेकर उछलता रहता है…..पर हार जाता है ।

वो जो मौत की भी मौत है………वह यहाँ इन साधारण सखाओं से हारता हुआ , रोता है………ग्वाल सखा इसे घोड़ा बनाते हैं …….और इसके ऊपर चढ़ जाते हैं ।

जिसके एक इशारे पर देव ग्रह नक्षत्र तारे सब नाचते हैं ……..वही इन अहीर की छोरियों के आगे माखन के लिये नाचता डोलता है ।

बृजरानी इसे थप्पड़ मार देती है……..ये रोनें के सिवा और कुछ कर नही सकता……फिर उठाकर पुचकारती है ……तो ये ब्रह्म ख़ुशी से झूम उठता है ……ये लीला है…….इसे कहते हैं लीला ।

मैने इसलिये कहा…..वो ब्रह्म भी तरसता है……..प्रेम के लिये ।

वो ब्रह्म भी तड़फता है प्रेम पानें के लिये ।

उफ़ ! ये लीला………..

बृजरानी जु ! गोबर चाहिये……..गोपी नें कहा ।

“ले जा”….बृजरानी नें भी कह दिया……और अन्य कामों में लग गयीं ।

गोबर का तो बहाना है …….गोपाल को देखनें आयी है ये गोपी ।

गोबर परात में भर लिया ……..और इधर उधर देखनें लगी ।

किसे देख रही है ? विदुर जी नें पूछा ।

किसे देखेगी ? अपनें गोपाल के सिवा ये लोग देखते ही किसे हैं ?

ये गोपाल है भी ऐसा कि …..जो दिल से इसे चाहे ये तुरन्त उसके सामनें हाजिर हो जाता है …….हो गए हाजिर !

गोपी ! का कर रही है तू ? वही मधुर बोली …….आहा ! कुछ देर तक तो देखती ही रही अपनें गोपाल को ………..

पर कन्हैया नें फिर पूछा ……”.का कर रही है बता तो दे भाभी ! “

उसे अब होश आया था………हाँ …..लालन ! एक काम करो …….

कि ये मेरी गोबर की परात उठा दो ।

इधर उधर देखकर कन्हैया भी बोल उठे………का देगी ?

एक परात उठा दो उसके बदले माखन को एक लौंदा दूंगी …….गोपी नें भी कह दिया ।

पर मैं तो भूल जाऊँ ! गिनती मोकूँ याद नही रहे है ।

तो लालन ! एक परात उठा दो …….तुम्हारे कपोल में गोबर का एक टीका लगा दूंगी……….तो तुमको याद भी रहेगा ।

हाँ …..ये ठीक है………कुछ देर सोचकर कन्हैया बोले ।

एक परात गोबर उठा दी कन्हैया नें ……….

आहा ! गोबर का एक टीका नन्दनन्दन के कपोल में ……….

दूसरी परात गोबर की… ….दूसरा टीका ………….

आवश्यकता नही है गोपी को गोबर की ……..पर कन्हैया के प्रति उसका अगाध स्नेह ………वह बारबार आरही है और गोबर ले जा रही है ……..कन्हैया के कपोल में गोबर ही गोबर हो गया है ………..

इतना ही नही ………जब गोपी गोबर लेकर अपनें घर जाती …..तब छुप कर दो तीन गोबर के टीका स्वयं अपनें कपोल में कन्हैया लगा लेते ।

अब हो गया ! गोपी बोली ।

तो दे माखन को लौंदा …………….कन्हैया बोले ।

पर पहले गिनती तो हो कि …….कितनें परात है गए ?

हाँ तो कर गिनती सखी !………..कन्हैया को क्या आपत्ति ।

एक, दो, तीन, चार, पाँच, दस , बीस , पच्चीस …………..सखी बोली – पच्चीस ……….कन्हैया बोले – तीस ……..नही – पच्चीस …….नही – तीस …..।

तात विदुर जी ! कन्हैया को ही हारना पड़ा ……..चल दे पच्चीस ….माखन के लौंदा………..।

ना , ऐसे नही दूंगी………..गोपी मुकर गयी ।

फिर कैसे देगी ? मासूम से कन्हैया बोले ।

पहले नाचो ………..तब दूंगी ।

कन्हैया नें पीताम्बरी अपनी कमर में कसी और ठुमुक ठुमुक नाचनें लगे…………..

गोपी मुग्ध होकर देख रही है …………….

आकाश से देवता पुष्प बरसानें लगे ………जयजय हो ….की ध्वनि आकाश में गूंजनें लगी ……………..

ब्रह्मा शंकर ये सब यही कह रहे थे ……….

!! अहो भाग्यम् , अहो भाग्यम् !!

ये मधुर ब्रह्म है ……प्यारा ब्रह्म है ………ये प्रेम के मोल मिलता है ।

तात ! खरीदना है ? उद्धव हँसते हुए बोले ।

मेरे जैसे शुष्क हृदय में प्रेम कहाँ ? ये सौभाग्य तो इन बृज ललनाओं का ही है ………जय हो जय हो ……..विदुर जी भी आनन्दित हो गए थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 53

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 53 )

!! जब कन्हैया नें रामकथा सुनी…!!


बृजरानी दौड़ीं दौड़ीं आयीं ………बृजराज संकीर्तन में मग्न हैं …….बड़े प्रेम से – श्रीमन्नारायन नारायण नारायण , का उच्चस्वर से गान करते हुये पूर्ण भक्ति से ओतप्रोत थे ।साथ में ग्वाल मण्डली थी …..जो मंजीरा, ढोलक करताल के साथ संकीर्तन में सहयोग कर रही थी ।एकादशी की रात्रि में शयन कहाँ किया जाता है ……….उस समय तो जागरण होता है ….भक्तिभाव से इष्ट का स्मरण होता है ………आज एकादशी थी ……….बृजरानी भी बैठीं थीं संकीर्तन में …….गोपियाँ भी थीं ……….कन्हैया ऊँघ रहे हैं मैया की गोद में बैठे बैठे ।आहा ! कितनें सुन्दर लग रहे थे ऊँघते हुए भी ।बार बार गिर रहे थे ………बृजरानी उन्हें सम्भाल रही थीं ……..अर्धरात्रि भी तो हो चली है ………………वो उठ ही गयीं ………क्यों की लाला अब बैठ नही सकता था ……..बालक भी तो है …………कुछ देर तक तो उछलता रहा ……..ताली बजाकर नाचता रहा …….पर कब तक ? अब उसे नींद आरही थी …….तो बृजरानी लेकर चलीं गयीं भीतर महल में …………दो घड़ी ही बीती होगी …………कि बृजरानी बाहर आयीं …………घबड़ाई हुयी थीं ………..पसीनें आरहे थे माथे में ।बृजराज के कान में कुछ कहा …………….क्या ? बृजराज चौंक गए …………ग्वालों से इशारे में कहा …..संकीर्तन करते रहो …….मैं अभी आया …….ये कहते हुये महल की ओर बृजराज दौड़ पड़े थे ……पीछे बृजरानी ।कन्हैया सो गया है ………..गहरी नींद आगयी है अब उसे ।ये तो सो गया ? बृजराज नें यशुमति से कहा ।हाँ ……..ये सो गया…….पर मैं क्या बताऊँ आपको ? देखिये ना अभी भी मुझे डर लग रहा है …….कि कहीं कुछ अलाय बलाय न लगी हो इसे । पर हुआ क्या था ? कुछ बताओगी ?”लक्ष्मण ! मैं रावण को छोड़ूँगा नही ……रावण ! मैं तुझे मारूँगा !”सुनिये ! सुनिये ! अभी भी , नींद में ये वही बोल रहा है ।नन्दराय सुनते रहे …………कन्हैया नींद में भी बड़बड़ा रहे थे ।रावण ! मैं तुझे छोड़ूँगा नही …………….पर तुमनें ऐसा क्या सुनाया था इसे ? बृजराज नें यशोदा से पूछा ।मैने ? नन्दगेहनी बतानें लगीं थीं ।***************************************************मैं संकीर्तन से उठ गयी थी ……….क्यों की लाला ऊँघने लगा था ।मैनें उसे आकर सुला दिया ………और थपथपी देते हुए ……..”नारायण, नारायण नारायण” गुनगुना रही थी ।तभी – मैया ! ये नारायण कौन हैं ? उठ गया था लाला तो ।तू सोया नही ? वहाँ तो ऊँघ रहा था …………नही , मुझे नींद नही आरही …………..उठकर बैठ गया था ।फिर ? बृजराज नें पूछा ।फिर वही प्रश्न था उसका ……..ये नारायण कौन हैं ? बाबा नारायण नारायण क्यों करते रहते हैं ? ये नारायण कहाँ रहते हैं ? इसके प्रश्न कभी खतम हुए हैं जो आज हो जाते ?भगवान हैं ………..मैने इसे बताया ।फिर ऊँघने लगा …….तो मैं गोद में लेकर सुलानें लगी …………मैया ! कोई कहानी सुना ना ? धीमी आवाज में बोला था ……..मैने सोचा हाँ भगवान की कोई कथा सुना देती हूँ ……..मेरी वाणी भी पवित्र हो जायेगी ……..और एकादशी है ……..मेरे लाला के कान भी पवित्र हो जाएंगे ।मैया ! कोई कहानी सुना ना ? फिर बोला ।तो मैने इसे रामकथा सुनानी शुरू की …………..मुझे क्या पता था ये तो इस कथा को सुनते ही उठकर बैठ गया ।हाँ ……….अब सुना ……….आलती पालथी मारकर बोला ……अब सुना मैया !मैं हँसी …….और बड़े प्रेम से बोली …..श्रीराम चन्द्र भगवान की …..छोटे छोटे हाथों को उठाकर लाला नें जोर से कहा …….जय !एक राजा थे उनका नाम था – दशरथ ! अच्छा मैया ! कन्हैया बोले ।वो राजा थे अयोध्या के …..सबसे बड़े राजा ………….इत्ते बड़े राजा ? अपनें हाथों को फैलाकर पूछ रहे हैं कन्हैया ।हाँ…..इससे बड़े राजा …..चक्रवर्ती सम्राट ……….कन्हैया से चक्रवर्ती नही बोला गया ……पर “सम्राट” बोल दिया ।अच्छा मैया ! फिर ? फिर ………उनकी तीन रानियाँ थीं लाला ! बृजरानी नें केश की लटें लाला के मुख से हटाते हुये कहा । …..तीन रानियां ……कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा ।अच्छा मैया ! आगे क्या हुआ ?आगे ! लाला ! इनके चार पुत्र हुए ………….चार कहते ही …ऊँगली में गिननें लगे कन्हैया……एक , दो , तीन, चार ।फिर चार ऊँगली मैया को दिखाते हुये बोले ………मैया ! ये चार ।हाँ ……लाला ! चार पुत्र थे दशरथ के ……….बड़े का नाम था – राम, फिर लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ……..ये इनके नाम हैं ।अच्छा मैया !

जनकपुर में इनका विवाह हुआ……..बृजरानी नें अपनें लाला को चूमते हुए कहा ।मेरा विवाह कब होगा ? ये क्या प्रश्न था लाला का ……पर बालक के प्रश्न तो ऐसे ही होते हैं …………..होगा , होगा तेरा भी व्याह होगा …….मैया हँसी ।राम का विवाह हुआ सीता के साथ , लाला ! भरत का विवाह हुआ माण्डवी के साथ, लक्ष्मण का विवाह हुआ उर्मिला के साथ और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति के साथ ……………लाला ! विवाह करके ये सब अयोध्या लौट आये …………….अच्छा मैया ! फिर क्या हुआ ? आँखों को मलते हुए कन्हैया पूछ रहे हैं ।लाला ! अयोध्या में कुछ दिन के बाद राम को वनवास मिल गया ।क्यों ? क्यों वनवास मिला मैया ! वचन माँग लिये थे कैकई नें राजा दशरथ से …………उसी बात को लेकर राम को वनवास जाना पड़ा …………..इसके बाद कन्हैया गम्भीर ही बना रहा………पता नही उसे क्या हो गया था ……बृजराज सुन रहे हैं यशोदा मैया की बातें ।मैं सुनाती रही रामकथा लाला को ……वो सुनता रहा …….मैं उसकी आँखों में देख रही थी ………..नींद तो थी ही नही…….अजीब सी गम्भीरता आगयी थी उसके नयनों में ।एक राक्षसी आई लाला ! उस वन में ……………ये राक्षसी क्या होती है मैया ? ये प्रश्न भी गम्भीर होकर ही पूछा था ।बड़े बड़े दाँत, ….लाल लाल आँख……..सिर में सींग ………..पर मेरे ये सब कहनें का लाला के ऊपर कोई प्रभाव नही पड़ा ………वो डरा नही …..मैं तो ऐसे ही लाला को कुछ डरानें के लिये बोल रही थी ।आगे बता मैया ! आगे क्या हुआ ?उस राक्षसी के नाक कान काट दिए लक्ष्मण नें ……….ताली बजाई कन्हैया नें …….मैया ! अच्छा हुआ ………बढ़िया किया लक्ष्मण नें ………फिर क्या हुआ मैया !फिर ? फिर तो वो राक्षसी गयी अपनें भाई के पास ……..उसका भाई सबसे बड़ा राक्षस था……….वो उसको लेकर आई ।लाला ! उस राक्षस नें आकर सीता का हरण कर लिया ।सुनिये ! मैने इतना क्या कहा…….कन्हैया का मुख तो लाल हो गया उसकी आँखें लाल हो गयीं … क्रोध में आगया ……..देह कांपनें लगा ।इतना ही नहीं ………उठकर खड़ा हो गया ……और चिल्लाकर बोला -लक्ष्मण ! मेरा धनुष बाण लेकर आ ……मैं अभी रावण को मारूँगा ।सुनिये ना ! रावण नाम मैने बताया नही था ………..मैने तो मात्र राक्षस कहा था ……………….आप कुछ कहिये ना ! मैने उसी समय लाला को अपनी छाती से चिपका लिया ………..और थपथपी देती रही …………फिर ये सो गया था …….तब मैं आपके पास गयी ।मुझे डर लग रहा है ……….कहीं कुछ अलाय बलाय तो नही है ये …….कहीं कोई भूत प्रेत तो नही है ……….ये क्या हो गया ?बृजराज देख रहे हैं कन्हैया को …………….फिर सोते कन्हैया बड़बड़ाये …………लक्ष्मण ! मैं छोड़ूँगा नही रावण को …….मेरी सीता को वो कैसे ले गया ।बृजरानी रो पडीं ……बृजराज के गले लग कर रोईं ………..कुछ नही होगा …..सब नारायण भगवान ठीक करेंगें ……….ऐसा कहते हुये बृजराज बाहर गए …….बाहर संकीर्तन चल रहा है …..नारायण , नारायण नारायण ।मन्दिर में जाकर शालग्राम जी का जल लेकर आये …..और लाला के मुख में डाल दिया था …………..अब कुछ नही होगा लाला को ……..बृजरानी ! तुम अब यहीं रहो ……और सो जाओ तुम भी ……..इतना कहकर बृजराज चले गए थे संकीर्तन में ………….हाँ ………….इसके बाद कन्हैया एक बार नींद में मुस्कुराये ………अच्छा ! रावण मर गया लक्ष्मण ! अब सीता को ले आओ ।बस इतना बोले कन्हैया ।बृजरानी सो न सकीं थी पूरी रात ।तात ! रामावतार का आवेश था कन्हैया को ये ………..बस इतना ही बोले उद्धव…….आज उद्धव भी शान्त हैं …….श्रोता विदुर जी भी …………कन्हैया इनके हृदय में छा चुका है ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 52

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 52 )

!! “उपद्रवी कन्हैया”- एक सहज लीला !!


अच्छा उपद्रव किया आज तो इस नन्द के लाल नें …. उद्धव हँस रहे हैं । ऐसा क्या हुआ ? क्या किया नन्दनन्दन नें ऐसा कि तुम अकेले ही हँस रहे हो उद्धव ! विदुर जी नें प्रश्न किया था । तात ! एक प्रसंग स्मरण हो आया…..ओह ! उद्धव फिर हँसनें लगे । यमुना के तट पर बादल घुमड़ आये थे ………कपि आनन्दित हो उठे थे ….मोर नाच रहे थे …..कोयल, पपीहा , शुक सब अपनें अपनें राग अलाप रहे थे………..श्रीकृष्ण स्मृति नें सब को आनन्द से भर दिया था ………और क्यों न आनन्द आये ? ये स्वयं आनन्द के ही तो साकार रूप हैं……..कन्हैया । उद्धव उस लीला को सुनानें लगे थे ……….पर लीला को सुनानें से पहले उद्धव बहुत हँसे ………..तन पर ओढ़े हुए चादर को मुँह पर रखते हुये हँस रहे थे ……..हँसी संक्रामक होती है ……..हाँ ये फैलती है । तो विदुर जी भी हँस पड़े थे । ************************************************* उदासी छाई है आज ग्वाल मण्डली में ………….सब सुस्त हैं ………मध्य में कन्हैया बैठे हैं और सब को देख रहे हैं ……….चारों ओर सखा बैठे हैं ………..गोलाकार । मनसुख, मधुमंगल, तोक, भद्र सब थे ……..पर उदास से थे । अब यमुना के जल में कंकड़ फेंक रहे हैं कन्हैया ……………सब ग्वाल उसी को देख रहे हैं …………..क्या करें । कपि भी आकर बैठ गए ……..मोर आये तो हैं ……पर अपनें “घनश्याम” को गम्भीर देखकर ये भी चुप्प बैठ गए । चल कन्हैया ! चल ! यहाँ बैठ के कहा करेगो ? मनसुख नें कन्हैया को झँकझोरा । कहाँ जायगो दारिके ! मधुमंगल नें व्यंग किया । गोपियन के यहाँ ……….चल ! माखन खायेगें ……मनसुख नें फिर हाथ पकड़ा, और कन्हैया को उठाना चाहा । डण्डा ते अपनी पूजा करवाय लीयो………समझे नायँ का ? अब सब सावधान है गयीं हैं गोपियाँ……अपनें घरन में घुसवे हूँ नायँ देंगी …..खायेगो माखन ! मधुमंगल नें समझाया । अरे ! कितनों हूँ सावधान है जाएँ …………पर कन्हैया के सामनें उनकी कछु नाय चलेगी ………चौं लाला कन्हैया ? मनसुख , कन्हैया के पीठ में हाथ मारते भये बोलो । सुनो सुनो ! एक उपाय है …….कन्हैया उछलते हुए बोले । हाँ का उपाय है ? मनसुख के साथ साथ सबनें पूछा । चलो ! पीताम्बरी सम्भालते हुए कन्हैया उठे । उनके साथ सब ग्वाल बाल उठ गए ………….. पर ………..तुम लोग छिप जाना ……….मैं जब दो बार ताली बजाऊं तब तुम आना …………अभी चलो मेरे साथ ……..ये कहकर कन्हैया ग्वालों के साथ चल दिए ।……..किसके यहाँ जाऊँ ! किसके जाऊँ ! ……..विचार करते रहे ……..सामनें एक गोपी दीखी ………ग्वालों को छुपनें के लिये कह दिया और स्वयं चले उसी गोपी के यहाँ । गोपी तो प्रसन्न हो गयी ………देख रही है ….शान्त भाव से चले आरहे हैं कन्हैया ……मुखचन्द्र आज गम्भीर है …………गोपी देख रही है …….मुख में कोई भाव भी नही दिखाई दे रहे ………बस शान्त से चले आये गोपी के पास ………….. भाभी, राम राम ! उसी गम्भीर मुद्रा में ही कहा । गोपी हँसी …………कैसे आये आज यहाँ ? “हम अपनी इच्छा से अब कहीं जाते आते नही हैं आज कल” …………बड़ों की तरह बतिया रहे हैं कन्हैया । गोपी तुरन्त बैठ गयी द्वार पर ही……..कपोल में हाथ रख लिया मुग्ध सी हो कर बस कन्हैया को देखती जा रही है । अच्छा ! तो बता दो फिर किसकी इच्छा से हमारे यहाँ पधारे हो ? मैया नें भेजा है हमें……….कन्हैया नें उत्तर दिया । क्यू ? क्यू भेजा है मैया नें ? गोपी नें पूछा । वो इसलिये कि……..”.हमारे यहाँ बड़े बड़े सन्त महात्मा आये हैं” …..कन्हैया अपनी हँसी छुपा रहे हैं……..”.बड़े बड़े सन्त महात्मा ……जोगी, सन्यासी, बैरागी, सब आये हैं” ………. तो ? गोपी नें पूछा । सिर खुजलाते हुये कन्हैया बोले ……..तो ! मेरी मैया नें मुझ से कहा है ………इन सन्तों की सेवा के लिये प्रत्येक गोपी के यहाँ से माखन की एक एक मटकी ले आ । क्यों ? कपोल में हाथ रखे रखे ही गोपी पूछ रही है । इसलिये कि ……….तुम सबन कूँ पुण्य मिलेगो । गोपी प्रसन्न हुयी……….ओह ! ये तो बढ़िया काम है ………और आज अमावस्या भी है………दान को पुण्य मिलेगो ………. भाभी ! ज्यादा मिलेगो …..कन्हैया खुश होते हुए बोले । दो मटकी ले जाओ माखन की ………गोपी नें कहा । अब ये तो तुम्हारी श्रद्धा है ………दो, दो या चार दो ……….वैसे मैया नें एक ही मंगायो है । ले के कौन जावेगो ? गोपी नें प्रश्न किया । अरे ! सब व्यवस्था है भाभी ! तू दे दे माखन की मटकी ……. ये कहते हुए कन्हैया नें ताली बजाई……दो ताली बजाई …….. सोई ग्वाल सखा सब आगये…………. इनके मूड में धर दो , भाभी ! कन्हैया नें हँसते हुए कहा । अरी ! जि कहा दे रही है तू ? पड़ोस की गोपी नें पूछा ……… पहली गोपी नें सारी बात बता दी …..सन्तों और महात्माओं के लिये माखन जा रहा है मेरे यहाँ से ……गोपी प्रसन्नता में बोली । तो मेरे यहाँ से भी ले लो , लालन ! …………उस गोपी नें भी अपनें यहाँ से माखन की भरी मटकी दे दी …………. हँसते हुए उद्धव बोले – इस तरह से दस प्रमुख घरों से मटकी उठा ली इन लोगों नें………अब कन्हैया से पूछनें लगे कहाँ चलें ? कन्हैया बोले ……..चिन्ताहरण महादेव के पास …………..वहीँ चलो …..वहीँ बैठेंगे ……..और वहीँ माखन खाएंगे ………… तात ! सब ग्वाल बाल माखन की मटकी लेकर यमुना के किनारे आगये थे ……..और सब बैठ गए ……….मध्य में कन्हैया ………चारों ओर ग्वाल बाल ……….सब हंस रहे हैं ………कन्हैया हँसा रहे हैं । ************************************************** सुन वीर ! कन्हैया माखन ले गयो है ……आज मावस भी है ………सन्त महात्मा बृजरानी जु के यहाँ आये हैं ……..क्यों न हम भी चलें उन सबके दर्शन करवे कूँ ? दूसरी बोली ……….विचार तो उत्तम हैं तेरे ………..तीसरी गोपी बोली ……हमारे यहाँ ते माखन गयो है ….तो हमें जानो ही चहिए ………. सब तैयार होनें लगी ……..सुन्दर सुन्दर लंहगा पहनें, फरिया……..सुन्दर चोली …….पूरा सोलह श्रृंगार किया …….और अपनें अपनें घरन ते निकसीँ ………..खिलखिलाती भयी ……….आनन्द और उमंग मन में धारण करके ……..नन्द महल में पहुँची । नन्द महल में आज अकेली बृजरानी ही थीं ………….. पाँय लागूं बृजरानी जु ! गोपिन नें प्रणाम कियो …….पाँव छूए । जीती रहो …..खुश रहो …………और बताओ कैसे आई हो ? बृजरानी नें पूछ लिया । कहाँ हैं ? गोपियाँ पूछनें लगीं । कौन ? बृजरानी नें भी प्रतिप्रश्न किया । सन्त महात्मा कहाँ हैं ? गोपियों नें अब स्पष्ट किया । मेरे पास कहा धरे हैं सन्त महात्मा ? बृजरानी को अजीब लगा । री गोपी ! मेरे पास कहाँ हैं सन्त महात्मा ? तो, दो दो माखन की मटकी ले के गयो है तेरो छोरा …….और कह रो कि – सन्त महात्मा आये हैं घर में ….बेचारी गोपी समझ तो गयी कि कन्हैया नें आज फिर हमें बनाय दियो…….. देखो गोपियो ! मेरे पास तो सन्त महात्मा हैं नायँ ……आये नायँ ……अब लाला के पास आये हों तो मोय पतो नायँ ………..ये कहते हुए बृजरानी भी भीतर चली गयीं । अब सजी धजी गोपियाँ अपनें आपको ठगी अनुभव करनें लगीं थी…. एक गोपी नें दूसरी ते कही ……….तुम चलो मेरे साथ ……आज हम उसे छोड़ेंगी नही……….सब गोपिन नें हाथ में एक एक डण्डा ले लियो …….और खोजती भई वहीँ पहुँच गयीं ……..यमुना किनारे । ********************************************* चारों ओर ग्वाल सखा बैठे हैं …………सबके पीले वस्त्र हैं …….पगड़ी बंधी है पीली ………..मस्त – अलमस्त स्थिति है सबकी । मध्य में विराजे हैं कन्हैया…………. मैने कही …..सन्त आये हैं मेरे घर ……….तो कहवे लगी वो गोपी ……..दो दो मटकी माखन ले जाओ ….एक क्यों ? मैने भी कही ………..मनसुख ! सुन ! मोय हँसी आरही ………पर मैने हँसी कूँ रोक लियो…….मैने कही – मैया नें एक ही मटकी की कही है …..ज्यादा श्रद्धा होय तो दो मटकी दे दे ।…..ये कहते हुए कन्हैया हँसे…..खूब हँसे……सखा सब लोट पोट हो रहे हैं यमुना की बारू में । भैया लाला ! वाह ! आनन्द आगो …………..माखन खाते हुए मनसुख बोल रहा है ……और बड़ा प्रसन्न हो रहा है । देख भैया ! तेनें ब्राह्मण देवता की आत्मा तृप्त कर दई ……पर तोय पतो है …..ब्राह्मण कूँ जिमायवे के बाद दक्षिणा देनी पड़े…….दे दक्षिणा । मनसुख के मुख से जैसे ही कन्हैया नें ये सुनी ………….तभी मनसुख के पीछे एक गोपी आके ठाड़ी है गयी …….वा के हाथ में डण्डा । कन्हैया हँसे ………खूब हँसे ……और बोले ……..मनसुख ! चिन्ता मत करे ….दक्षिणा देवे वारी तेरे पीछे ही खड़ी है । अब वो गोपी सामनें आयी …………कन्हैया ! लाल जी !, बताओ कहाँ हैं सन्त ? कहाँ हैं तुम्हारे महन्त ! पीछे से अन्य गोपियाँ भी आगयी थीं ।……………कन्हैया उठकर खड़े है गए ………. गोपियों ! मैं झुठ नही बोलूँ हूँ ………..कन्हैया चंचल निगाह से इधर उधर देखते हुए बोले । हाँ हाँ ………तो बताओ ! कहाँ हैं सन्त ?

कन्हैया नें कहा ………गोपियों ! ये सब हैं सन्त ……..ग्वाल बाल, इनसे बड़ा कौन सन्त होगा……..ये सबसे बड़े सन्त हैं …….और मैं हूँ इनको महन्त……कन्हैया की बात सुनकर गोपियाँ हंस पडीं ………ग्वाल सखा हँसते हुए भागे ……कन्हैया नें भागते हुए कहा ……….हमारी पूजा करो ……….इनकी पूजा करो ……जो भी सन्त महन्त हैं हम ही हैं …..इधर उधर मत भटको ……………हँसते हुए सब भाग गए थे ……गोपियाँ भी कुछ दूर भागीं ……पर फिर वहीँ यमुना के कूल में बैठ कर खूब हँसती रहीं ……….खूब हँसती रहीं ।विदुर जी के तो हंस हंसकर अब आँसू भी बहनें लगे थे ।उत्तमा सहजावस्था – यही है सहज अवस्था …..सहज रहो तात !उद्धव आनन्दित हैं ये कहते हुए ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 51

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 51 )

!! “सुखिया मालिन”- एक दिव्य कथा !!


मेरा नाम सुखिया है , सुखिया मालिन…..

मैं रहती हूँ मथुरा में…..मेरे पतिदेव तो स्वर्ग सिधार गए …..पर एक पुत्र दे गए मुझे…..”सुदामा” । हाँ ……मैं स्नेह के दाम में बंध गयी इसलिये मैने ही अपनें सुत का नाम रख दिया था “सुदामा”।

“रहती हो तुम मथुरा में……और फल बेचनें आयी हो गोकुल , क्यों ? प्रभावती गोपी आज पूछ रही थी इस वृद्धा सुखिया से । अपनी फलों की टोकरी को सम्भाल कर एक तरफ रख दिया…..प्रभावती गोपी से बोली……थक गयी हूँ जल पिलाओगी ? हाँ हाँ…….ये कहते हुये गोपी भीतर गयी और घड़े का शीतल जल ले आई……वृद्धा मालिन नें जल पीया……पसीना पोंछा…….जल का झींटा आँखों में दिया ।

अब क्या बताऊँ ! मैं तो मथुरा की ही हूँ……..मेरा मायका भी मथुरा और ससुराल भी मथुरा……..वो दिन कितने अच्छे थे …….जब मथुरा के राजा उग्रसेन थे …..आहा ! महाराज उग्रसेन । सुन प्रभावती ! उन दिनों भी मैं फल बेचती थी ………..यदुवंशी लोग बड़े भले थे ………फल खाते ………फिर फलों का दाम भी मैं जितना बताती उससे ज्यादा ही देते ……..और हाँ पता है तुझे ! ……महाराज उग्रसेन भी मेरे फलों को चखते थे ……मेरे ही फल प्रिय थे उन्हें । सुखिया अपनें बारे में बताये जा रही थी …………. पर अब ?

अब तो क्रूर कंस आगया है………..हे भगवान ! जब से ये आया है …मथुरा में शान्ति नही है ……….विश्व के जितनें राक्षस हैं सब को एकत्रित कर लिया है उसनें ……..हाँ , और आये दिन प्रजाओं को दुःख देना ………कष्ट देना, बस यही काम रह गया है । सुखिया नें जब कंस की बात छेड़ी तो झुर्रियों से भरे उस चेहरे में दुःख के भाव स्पष्ट दिखाई देंने लगे थे ……………

मेरा बेटा सुदामा तो कंस के यहाँ ही जाकर माला दे आता है ……. करे क्या ……उसे अपनें बाल बच्चे भी तो पालनें हैं ……..पर मुझ से गलत देखा नही जाता…….इसलिये मैं बोल देती हूँ । अब कुछ महीनों से तो अत्याचार चरम पर है कंस का ………… मेरे ही साथ ……….उसके राक्षसों नें मेरे फल खा लिए …..जब मैने उनसे मोल माँगा ……….तो मेरी टोकरी ही फेंक दी ………..कुछ भी हो मेरा भी स्वाभिमान है ……..मालिन हूँ तो क्या हुआ …..गरीब हूँ तो क्या हुआ ………तुम किसी का भी अपमान करोगे । छि ! मैने तभी विचार कर लिया …..मैं नही बेचूंगी अब फल मथुरा में । फिर कहाँ जाओगी माँ ?

मेरे पुत्र नें पूछा । सुना है गोकुल महावन में बड़ा अच्छा है …….वहाँ के मुखिया भी अच्छे हैं ………वहाँ के लोग भी समृद्ध हैं …….इसलिये यहाँ आगयी थी । तो क्या फल बिके ? किसी नें खरीदा ? प्रभावती नें पूछा । जितना सोचा था उतना तो नही …….देखो ना ! आधे से ज्यादा फल तो अभी बाकी ही हैं …….शाम होनें आरही है ………अब तो मुझे जाना ही पड़ेगा मथुरा ………पर सच बताऊँ ! गोकुल बड़ा अच्छा है ………यहाँ के लोग भी बूढ़े बड़ों का आदर करते हैं ………….आपस में प्रेम भाव बहुत है । ………..सुखिया मालिन इतना कहते हुए उठी ……डलिया को सिर में रखा और वापस चल दी मथुरा की ओर । प्रभावती भी अपनें घर के भीतर आगयी थी …………पर पता नही उसे क्या सूझा …….वो फिर बाहर आयी……… ओ मालिन ! मालिन ! आवाज लगाई……….. हाँ ……सुखिया बुढ़िया नें मुड़कर देखा …………क्या बात है ? जाते जाते नन्दालय तो होती जाओ ……….प्रभावती बोल दी । अब कहीं ना जाय रही वीर ! रहनें दे……थक गयी हूँ …….जितना सोचा था उतना बिका भी नही ……कोई बात नही…….मालिन चल दी । अरी ! मेरी बात मान ले , एक बार हो तो आ, । प्रभावती की बात उसे लगी……मान ही लूँ । इतना समय हो ही गया ………..चलो नन्दालय भी देखती चलूँ । ठीक है , जा रही हूँ नन्दालय …..सुखिया बोलती हुयी, मुड गई ….नन्दमहल की ओर ।

कोई फल लो ! कोई फल लो री ! कोई फल लो ! ये बुढ़िया सुखिया आवाज लगाते हुए चल रही है । इधर नन्दमहल के आँगन में…..नन्दलाल बैठे हैं अपनी मैया की गोद में । सुन्दर से गोपाल , घुँघराले उनके बाल, मुस्कुराता हुआ उनका मुखमण्डल ……..पीताम्बरी धारण किये हुए……. मैया ! मैया ! कोई आया है ! मैया की ठोढ़ी पकड़ कर हिलाते हुए पूछ रहे हैं । हाँ ……कोई फल बेचनें वाली आयी है । मैया ! मैया ! मैं फल लूँगा……….. जा ले ले ………मैया नें कह दिया । गोद से उतरे नन्दनन्दन …….और भागे हुए गए सुखिया के पास । “मुझे फल दे दो” हाथ पसारे माँगनें लगे कन्हैया ……… सुखिया मालिन देखती रह गयी…….ओह ! क्या सौन्दर्य है ……क्या दिव्य रूप है…….क्या छटा है रूप की , चितवन बाँकी है इसकी …..मुस्कान मादक है । सुखिया मालिन नें जीवन में कितनें बसन्त देखे थे …….मथुरा के राज महल में भी इसनें कितनें बालकों को देखा था……..पर ऐसा सौन्दर्य ! दिव्य अद्भुत ….आज तक नही देखा । फल चाहियें ? मुस्कुराकर पूछा सुखिया नें । हाँ ………बड़े भोलेपन से सिर “हाँ” में हिलाया कन्हैया नें । पर मोल तो दो ………बिना मोल के लोगे फल ? सहजता में बोली थी सुखिया………… मोल ? सोचनें लगे कन्हैया………..फिर भागे अपनें मैया की तरफ ………..मैया ! मैया ! मोल चाहिए फल के लिये ! बृजरानी नें अपनें लाला को चूमते हुए कहा – अनाज ले आओ ….और फल उसके बदले मिल जाएंगे तुम्हे । कन्हैया “भण्डार” की ओर गए …………. तात विदुर जी ! छोटे से हाथ कन्हैया के ……..उसमें वैसे ही कुछ दानें ही आये थे अनाज के ………….वो भी दौड़ते हुए सब गिर गए ……..जब तक सुखिया मालिन के पास आये ……..मात्र चार दानें थे हाथों में । लो …..मोल ……….अब तो दो । मुग्ध हो गयी सुखिया…………इसका तो जीवन धन्य हो गया …….कन्हैया को ये फल दे रही है …………… पर – गोद में बिठा लिया था उस वृद्धा मालिन नें ……….इधर उधर देखकर मुख चूम लिया …………. नयनों से अश्रु गिरनें लगे ………….एक बार मुझे “मैया” कहो ना ! क्या ? कन्हैया नें मुस्कुराते हुए मुख की ओर देखा सुखिया के । हाँ …..एक बार ……..मैया कहो ….लालन !…..सारे फल दे दूंगी । मैया ! कन्हैया नें हँसते हुए कहा । आनन्द के हिलोरें चल पड़े ……..अपनें हृदय से लगाकर बारबार चूमनें लगी कन्हैया को । सारे फल दे दिए …….काँछनी में बांध दिए थे फल । ये ………कन्हैया नें अपनें हाथ दिखाये । ये क्या है ? सुखिया नें पूछा । मोल ! तेरे फलों का मोल । हँसी सुखिया………..मोल तो मुझे मिल गया । नही …..ये तुम्हारे लिये है ………कन्हैया फिर बोले । अच्छा ! दे दो …….चार दानें अनाज के ……टोकरी में डाल दिए कन्हैया नें ।………….सुखिया नें एक बार फिर निहारा लाला को ………. फिर टोकरी उठाकर चल दी । गोकुल गाँव पार किया ……….आनन्द में डूबी , हर्षोन्मत्त है ये ……… जीवन में पता नही कितना फल बेचा था इसनें ……पर आज ? आज की बात ही अलग थी ………. पर टोकरी क्यों भारी हो गयी ? मथुरा में पहुँची तो उसकी टोकरी और भारी होती जा रही थी ……उसके समझ में कुछ नही आरहा था ……वो बारबार सोचती ……….फल तो मैने सारे दे दिए थे ……टोकरी तो रीती थी ……………फिर रीते टोकरी में इतना भार कैसे ? घर के द्वार पर आकर उसनें टोकरी उतारी ……………. ओह ! चकित हो गयी सुखिया मालिन ……….उसकी टोकरी तो रत्नों से, मणियों से, हीरे और मोतियों से भर गए थे । ये सब देखकर सुखिया के नेत्रों से अश्रु बहनें लगे ………….मैने कब माँगा था तुमसे ये सब ………बताओ कन्हैया ! कब माँगा था ! मोल ………….ये मोल दिया है फलों का …………मानों कन्हैया बोल रहे हों …………… हँसी अब सुखिया ………..खूब हँसी ………….तेरे जैसा दयालु और कौन है …..चार फल के लिए इतना मोल ? हँसते हुए वो फिर रोनें लगी………..वो “कन्हैया कन्हैया” कहती रही । तात विदुर जी ! – कहते हैं ……….फिर वो पलटकर गोकुल नही गयी ………क्यों की गोकुल में ये बात फैल गयी थी कि अन्नपूर्णा भगवती ही आईँ और कन्हैया को फल देकर चली गयीं ……….. सुखिया हँसती है ……..मैं भगवती ? हाँ ….कन्हैया चाहे तो किसी को भी कुछ भी बना सकता है …………… अपनी माँ सुखिया की बात मानकर ही सुदामा ……मथुरा में नित्य माला बनाता है ………..बनाता तो पहले भी था ……पर अब कन्हैया के लिये एक माला नित्य बनाकर रखता ही है ।