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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 69

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 69)

!! नन्दीश्वर पर्वत !!


गिरिराज गोवर्धन को दाहिनी ओर करके बृषभान जी के साथ बृजराज श्री नन्द जी , नन्दीश्वर पर्वत की ओर चल दिए थे ………

और पीछे पीछे सारे गोप ग्वाल, गोपी , गौएँ सब ।

क्या दिव्य शोभा थी गिरिराज की ………

अपलक नयनों से कन्हैया गोवर्धन के शिखर को देखते चल रहे थे ।

ये पर्वत भगवान नारायण का स्वरूप है…….महर्षि शाण्डिल्य नें बृजराज को बताया …….ये सुनकर बृजराज की श्रद्धा गिरी गोवर्धन के प्रति ओर बढ़ गयी , और बड़े प्रेम से हाथ जोड़कर प्रणाम किया था बृजराज नें ।

तीनों देव यहीं वृन्दावन में ही वास करते हैं ……..महर्षि प्रसन्नचित्त से ये बात कहते हुए चल रहे थे ।

कैसे भगवन् ! बृजराज नें प्रश्न भी किया ।

बृषभान जी भी बड़ी श्रद्धा से सुन रहे हैं महर्षि की बातें ।

गोवर्धन पर्वत ये नारायण स्वरूप हैं…….और जहाँ बृषभान जी रहते हैं ….जिस पर्वत की तलहटी में ये रहते हैं …….इनका महल है …..उस पर्वत का नाम है “ब्रह्माचल पर्वत” …..वो ब्रह्मा जी का स्वरूप है ।

और नन्दीश्वर पर्वत जो इनके बरसाना के पास ही है ……..वो भगवान शंकर का स्वरूप है ।

महर्षि ! मैं चाहता हूँ कि उसी नन्दीश्वर पर्वत की तलहटी में बृजराज अपना महल बनावें …..और उसके आस पास की जितनी भूमि है …..और मित्र बृजराज को जितना चाहिये – मै दूँगा ………महर्षि को ये बात हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक बृषभान जी बोले थे ।

“आप जैसा उचित समझें” ……….बृजराज मुस्कुराते हुए बोले ।

बैल गाड़ियां चल ही रही थीं …..रथ अपनी गति से दौड़ ही रहे थे ।

गौएँ आनन्दित, और स्वतंत्रता अनुभव कर रही थीं ।

भगवान शंकर अति आनन्दित हैं…….और क्यों न हों स्वयं परब्रह्म श्रीकृष्ण चन्द्र उनके यहाँ रहनें के लिये पधारे थे ।

शनिदेव तो इसी दिन की प्रतीक्षा में ही थे ……….कि कब हमारे यहाँ श्रीकृष्ण चन्द्र जु पधारेंगे …….और आज वो सुदिन आही गया था ।

मणिमाणिक्य सब प्रकट कर दिए थे शनिदेव नें ।

यक्ष लोक में कुबेर के पुत्रों नें जाकर श्रीकृष्ण के बारे में सब बताया था ……”जीवन का लक्ष्य मात्र श्रीकृष्ण प्रेम ही हो सकता है”…………

और भी बहुत कुछ बताया था नलकूबर, मणिग्रीव नें अपनें पिता कुबेर को ………ये सब सुनकर दर्शन के लिये कुबेर अपनें यक्ष लोक से पधारे ……….और बृजरानी के क्रोड में खेलते नन्दनन्दन के दर्शन करके अत्यधिक आनन्द की अनुभूति करनें लगे थे ।

ये है नन्दीश्वर पर्वत ।

……बैल गाड़ियाँ रोक दी गयीं …….रथों को रोक दिया गया ………गौओं को बड़े प्रेम से चारा इत्यादि खिलाया जानें लगा ।

हे मित्र बृजराज ! यही है नन्दीश्वर पर्वत ………बृजराज और ब्रजेश्वरी नें जब देखा…….तो दोनों नें ही झुक कर उस पर्वत को भगवान शंकर का स्वरूप मानकर प्रणाम किया था ।

पर आनन्दित तो भगवान शंकर भी हुए थे…….उन्होंने भी कन्हैया के माता पिता को वन्दन किया ।

यहाँ आप अपना महल बनावें……….बृषभान जी नें कहा ।

महर्षि शाण्डिल्य नें मुस्कुराकर उस स्थान में महल बनानें का अनुमोदन किया – बृजराज से ।

“और इसके आस पास का जितना क्षेत्र है सब आपका……..”

उदारमन से बृषभान जी बोले ।

आप चाहें तो पास में ही वो भूमि जो दिखाई दे रही है ……..वहाँ अपना “कोषागार” बना सकते हैं…….क्यों कि वो दिशा कुबेर की है ।

बृषभान जी के ये सब दिखानें के बाद……….कुबेर उसी स्थान पर जाकर बैठ गए थे ……जहाँ नन्द महाराज कोषागार बनानें वाले थे ।

उपनन्द जी नें नन्दीश्वर स्थान को देखा……हरियाली थी ……पास में ही यमुना बह रही थीं…….वन प्रदेश अत्यन्त मोहक था ……..पक्षियों का कलरव निरन्तर कर्ण रंध्रों को सुख पहुँचा रहा था ।

उपनन्द जी बहुत प्रसन्न हुए ………….ग्वालों को आदेश दिया ……..बैलों को निकाल कर गाड़ियों को एक तरफ पँक्ति बद्ध लगा दो ।

और उनके ऊपर सुन्दर वस्त्र तान दो…….उसे सजा दो…….उसी में आज की रात्रि हम सब रहेंगे ।

उपनन्द जी बोले –

आज की रात्रि इस तरह से बिताई जाए ……….कल देखेंगे कि क्या किया जा सकता है ……………उपनन्द जी नें प्रसन्नता पूर्वक ये बात कही …….और उन समस्त ग्वालों से भी पूछा …….आप लोगों को कुछ कहना हो तो कह सकते हो ………..

हे उपनन्द जी ! हम आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि ……..जहाँ हम आज अपनें छकडे सजाकर रखेंगे…….रहेंगे आज की रात …….वहाँ से हमें कल न हटाया जाए…..हमारा भवन उसी स्थान पर ही बनेगा ।

उपनन्द जी हँसे……ए मेरे भोले बृजवासियों ! हमनें कभी भेद नही किया कि हम राजा हैं और आप लोग हमारी प्रजा हो…..हम सब एक ही हैं…..कोई भेद नही है…………..आप लोगों की जहाँ
इच्छा हो……वहीँ अपनें छकडे लगाइये ……और वहीँ आपका भवन भी कुछ काल बाद बन ही जाएगा ।

बोलो ! वृन्दावन धाम की ….जय !

प्रसन्नता से उछल पड़े थे बृजवासी ।

अब सब अपना अपना स्थान खोजनें लगे ………..नन्द महल के पास ही हम रहेंगे …………कोई कहता है ………हम तो ऐसी जगह रहेंगे जहाँ से नन्दनन्दन दिखाई देते रहें ………कोई कहता है ……हमें वो जगह दे दो …….क्यों की खेलनें के लिये वहाँ आएगा नन्द लाल ।

बृजराज हँसते हैं……..सब हमारे महल में ही आजाना ।

बृषभान जी हँसते हैं………सब आनन्दित हैं ……गोकुल की किसी को याद भी नही आरही…….अपनें अपनें छकडे को सजा कर उसमें अपनी सामग्रियों को रखकर ……….बृजगोपीयाँ मटकी लेकर चलीं यमुना से जल भरनें …..अब भोजन भी तो बनाना है ।…..गोप भी वृन्दावन की शोभा देखना चाहते हैं ……वो भी चले गए ।

कन्हैया कैसे रह जाते ………..बलभद्र, मनसुख, मधुमंगल ,भद्र, तोक इन सबके साथ वन की शोभा देखनें निकल पड़े थे कन्हैया ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 68

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 68)

!! गिरी गोवर्धन पर बृषभान जी का आगमन – “वृन्दावन यात्रा” !!


दिव्य है वृन्दावन, अनादि है वृन्दावन , सच कहूँ तो वृन्दावन का नाम स्मरण भी कोई कर ले तो “श्रीकृष्ण कृपा” का भाजन वो प्राणी हो जाता है ।…… ..वृन्दावन , ऐसा कोई पुकारे भी तो श्रीराधा उसे अपनाकर, श्रीकृष्ण प्रदान कर देती हैं ………वृन्दावन तीर्थ नही है तात ! ये पुरी नही है ……ये चार धामों में भी कहाँ आता है …….ये तो नित्य निकुञ्ज है श्रीराधा श्याम सुन्दर का ………यहीं विहार है…..सत्य और प्रेम का ……यहीं विहरते हैं आनन्द और प्रेम …….यह भूमि ही चैतन्य है ………..तात ! यहाँ प्रवेश करते ही आनन्द सिन्धु में अवगाहन करनें लगता है प्राणी……….ये श्रीधाम वृन्दावन है ।

हाँ ……वृन्दावन बृहद है ……….वृन्दावन में ही गिरी गोवर्धन भी है ……बृहत्सानुपुर ( बरसाना ) भी है ………….यमुना भी हैं ………..ये “बृहद वृन्दावन” हुआ ।……एक वृन्दावन है “गोष्ठ वृन्दावन” ….जो गोचर भूमि है ….जहाँ अब गौचारण करेंगे कन्हैया ……….और एक वृन्दावन है ……. “सरस वृन्दावन” ……जहाँ प्रेम का रस सदैव बहता है ……और अपनी प्रिया श्रीराधारानी से प्रेमालाप में लीन रहते हैं श्याम सुन्दर ।

वृन्दावन , वृन्दावन, वृन्दावन ….

..तीन बार ऊँची साँस लेते हुए उद्धव नें इन नामों का उच्चारण किया ।

विदुर जी गहरे आनन्द सिन्धु में डूब चुके थे ।

ब्रह्ममुहूर्त का समय हो गया है ……सब बृजवासी जाग गए हैं ।

स्नानादि से शुद्ध होकर सन्ध्या इत्यादि में लग चुके थे बृजराज ।

भगवान नारायण की पूजा अर्चना करके अब ध्यान कर रहे हैं ।

कोई गोप स्नान करनें जा रहा है यमुना …….तो कोई स्नान करके आगया है ……बड़े बड़े नाविक खड़े हैं नावों को लेकर ……अब ये सब यमुना पार जायेंगे ………।

देवी ! अभी मत जगाना कन्हैया को ……….क्यों की पहले गौ इत्यादि पार होंगीं उसके बाद नौकाओं का सेतु बनेगा बैल गाड़ियाँ उस सेतु से होकर गुजरेंगी…उसमें अभी समय लगेगा……..बृजराज नें पूजा अर्चना से निवृत्त होकर ब्रजेश्वरी से कहा था ।

पर “कृष्ण बलराम तो जल क्रीड़ा कर रहे हैं”……….इनके जगे हुए तो घड़ी भर से भी ज्यादा हो गया …..बृजरानी नें दिखाया ।

छपाक , छपाक ………कई सखाओं के साथ ……….राम कृष्ण जल में खेल रहे हैं…….जल क्रीड़ा में उनकी शोभा अलग ही बन रही है ।

सारी गोपियाँ भी वहीँ आकर खड़ी हो गयीं …………और अपनें नयनों को शीतल करनें लगीं कन्हैया को देखकर ……….ग्वाले भी अब इधर ही आने लगे थे ………..अपनें प्राण धन कन्हाई को देखनें ……….

पर हँसते हुये उपनन्द जी नें कहा ……….ग्वालों ! इधर आओ …….उधर मत जाओ ……..मुझे पता है ……नन्दनन्दन को देखनें के बाद तुम लोग किसी काम के ही नही रहते ……..इसलिये इधर आओ ….और पहले गौओं और बृषभ – इनको यमुना के पार पहुँचाओ ।

उपनन्द जी की बात सबनें सुनी और …..चलो ! चलो ! गायों को पहुँचाना है परली पार ………चलो ! ये कहते हुए सहस्रों ग्वाले यमुना में उतर गए ………..और गायों को आगे किया ………उनके पीछे उनके बछड़ों को …………गायें निश्चिन्त होकर जा रही हैं …..निर्भर तो गौ के बछड़े हैं ……..क्यों की उनकी माँ उनके आगे ही है ।

“सम्भाल कर …..गौएं यमुना में बहनी नही चाहियें” ……….

मनसुख जल में कन्हैया के साथ खेलते हुए ही चिल्ला उठा था ।

कन्हैया भी मनसुख की नकल करके चिल्लाये ………..गौएँ यमुना में बहनी नही चाहिए …………..बलभद्र भी चिल्लाये ………..सखा सब यही बोल कर चिल्ला रहे हैं ………वो शोभा देखते ही बनती थी ।

कुशल तैराक हैं ……..जो छोटी बछिया है …….उसे कन्धे में रख कर पार कराया जा रहा है ….तैराकों के द्वारा ।

सब ग्वाल सखा और कन्हैया, इस दृश्य को देखकर बहुत प्रसन्न हैं ।

पर गौएँ भी बहुत प्रेम करती हैं अपनें गोपाल से ……….पार जाना चाहिए …… कोई कोई गौएँ तो कन्हैया के पास आरही हैं ।

सम्भाल लेते ग्वारिया गायों को …..और “हियो हियो, हियो, यही ध्वनि करते हुए गायों को पार लगा लिया ।

समय लगा …….पर सारी की सारी गौएँ बछिया बछडे बैल, सब पार हो गए…….तात ! पार लगते ही ये तो पूँछ उठाकर भांगी ।

उनके पीछे बछड़े ……..उन्मत्त होकर कूद रहे हैं इस भूमि में ।

चलो अब ! स्वास्थ बिगड़ जाएगा लाला ! चलो ! निकलो यमुना से ……मैया बृजेश्वरी नें डाँटा उसके बाद भी देरी से ही, यमुना से निकले ये लोग ।

केश सुखाये हैं लाला के और दाऊ के भी मैया नें ।

सुगन्धित तैल लगा दिया है………सुन्दर वस्त्र धारण कराये हैं …….

भगवान नारायण की प्रसादी केशर का चन्दन माथे पर ……….कार्तिक मास बीतनें वाला है …..इसलिये शीतल हवा चल रही है ……मैया नें काली कामरी आज पहली बार लाला को ओढाई ………मोतियों से जड़ी हुयी कामर थी वो ……..जब कन्हैया नें ओढ़ी ……..तात ! अद्भुत शोभा लग रही थी उस समय श्याम की ।

गोपियां देख रही हैं इस काली कामर वाले को ………..और इस रूप माधुरी में सब कुछ लुटानें का मन कर रहा है इन सबका ।

उधर सेतु का निर्माण करने में सब कुशल कारीगर लग गए हैं …….व्यवस्था स्वयं बृजराज और उपनन्द जी देख रहे हैं ।

नावों को पंक्तिबद्ध करके लगाया गया था ……….उन्हें रस्सियों से …..मूँज से ………. कस कर एक दूसरे से बाँधा गया था ।

कुछ ही देर में सेतु बनकर तैयार यमुना के ऊपर ।

अब तो बैल गाड़ियाँ निकलनें लगीं ……….लोग उसमें भी बैठे …..कुछ लोग पैदल ही सेतु से जा रहे हैं …….कुछ ग्वाले हैं जो मल्ल हैं …..वो कूद गए हैं यमुना में …………और तैरते हुए निकल गए हैं ।

इस तरह रविनन्दिनी यमुना को पार किया समस्त बृजवासियों नें ।

चारों ओर जयजयकार हो रही है श्री वृन्दावन धाम की ।

चलते चलते सामनें गिरी गोवर्धन पर्वत के दर्शन हुए सभी बृजवासियों को ……उस पर्वत से झरनें बह रहे थे ……..असंख्य मोर नाच रहे थे ……अद्भुत प्रेम की ऊर्जा से भरा हुआ था ये पर्वत …….।

कन्हैया दौड़े …………..कन्हैया के पीछे दाऊ , फिर तो सारे ग्वाल बाल दौड़ पड़े उस पर्वत की ओर ।

पर कोई इस बात को समझ न पाया …………साष्टांग प्रणाम किया था पाँच वर्ष के कन्हैया नें उस पर्वत को ।

तभी एक रथ आकर रुका वहीँ ……………बृजवासी देख रहे हैं …….सोच रहे हैं …..ये रथ किसका है ? और कौन आया है ?

उस रथ से बृजराज के परम मित्र बृषभान जी उतरे ।

बढ़कर , अतिआनन्द से – दोनों मित्र गले लगे ।

हम कहाँ रहें ? हमें बताओ हे बृषभान ! सूचना तो मैने आपको भिजवा ही दी थी ……….कि कंस का अत्याचार चरम पर है ……..इसलिये हमें गोकुल त्यागना पड़ा ……..आये हैं यहाँ वृन्दावन में ……..अब कहाँ आप हमें बसाओगे वो बताओ ।

मित्र बृजराज ! आपका ही है वृन्दावन …….आपको जहाँ सुखपूर्वक रहनें की इच्छा हो आप वहीँ रहें ………वैसे ? कुछ सोचकर बृषभान जी बोले – यहाँ पास में ही नन्दीश्वर पर्वत है ……….उस पर्वत की तलहटी में ही आपका महल बन जाएगा ……..और सम्पूर्ण क्षेत्र में आप अपनी प्रजा को बसा लीजियेगा …….फिर अति प्रसन्न होते हुये बृषभान जी बोले…….मैं आपके साथ सदैव हूँ बृजराज ।

आपके शरण में आये हैं हम सब ………….विनोद में बृजराज नें कहा और अपनें मित्र को हाथ भी जोड़ा ।

ये विनोद अच्छा नही था .बृजराज ! ……..ये कहते हुए बृषभान जी उन्मुक्त हँसें ।

कीर्ति भाभी कैसी हैं ? बृजरानी नें बृषभान जी से पूछा ।

आप लोगों की प्रतीक्षा में ही है वो भी……..बृषभान जी का उत्तर था ।

और राधा बेटी ?

राधा ! आहा ! ये नाम कन्हैया नें सुना …………….राधा !

ठीक है भाभी जी ! राधा बेटी भी ठीक है ……..चार वर्ष की हुयी है अभी ………..हाँ लाला से एक वर्ष छोटी है ……….बृजरानी नें कहा ।

और आपका लाला ? बृषभान जी नें पूछा ।

ये रहा ………..जैसे ही दिखानें लगीं ………….

लाला ! लाला !

यहीं तो था कहाँ गया ?

एकाएक कहाँ गया ? सब लोग इधर उधर ढूंढनें लगे थे ।

पर कन्हैया तो….गोवर्धन पर्वत के नीचे बैठकर….आँखें बन्दकर के –

राधा ! राधा ! राधा ! राधा !

इन नामों का बड़े प्रेम से उच्चारण कर रहे थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 67

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 67)

!! वृन्दावन – यात्रा !!


कितनें सुन्दर लग रहे हैं सट कर सोते हुए बलराम कृष्ण ……

अपना एक हाथ बलराम नें अनुज कृष्ण के ऊपर रखा है …गहरी नींद में भी ।……..केशराशि बिखरी हुयी हैं ………कन्हाई करवट लेते हुए लिपट जाते हैं बलराम से ……..बलभद्र भी अपनें अनुज को अपनें में पाकर प्रसन्नता से भर उठे हैं …….और एक बार उठकर अपनें छोटे भाई को देखा है ……….फिर गले लगकर सो गए हैं ।

इन दोनों भाइयों के श्रीअंग से कमल की सुगन्ध निकल रही है ……गलती से भौरें गवाक्ष में आजाते हैं…….पर स्वयं को भ्रमित मानकर लौट भी जाते हैं ………।

ब्रह्म मुहूर्त का समय होने को है……पर अभी रात ही है ………..

महर्षि शाण्डिल्य नें ब्रह्म मुहूर्त का समय यात्रा का उचित बताया था ………देवी ! अब हम लोगों को निकलना चाहिये ।

बृजराज नें अपनी भार्या बृजेश्वरी से कहा ।

बाहर देखो देवी ! लक्षाधिक बैल गाड़ियाँ तैयार खड़ी हैं ………..सहस्त्र रथ भी हैं …………

हमारा रथ मध्य में रहेगा ……..ये ग्वालों का ही कहना है …………

ताकि हमारे बालको की रक्षा हो सके……….हमारे आस पास दण्ड चलानें वाले , और विशेष धनुष लिए मल्ल चलेंगे………..

बृजराज अपनी भार्या यशोदा को बता रहे थे वृन्दावन यात्रा के सम्बन्ध में ।

आगे आगे गौ चलेंगीं ……..बृषभ की संख्या अगनित है ………..ये सब हमारे धन हैं ………इनके पीछे हम चलेंगे ।

बृजरानी नें अपनें महल से बाहर देखा …………….अगनित बैल गाड़ियाँ , अगनित रथ और पैदल चलनें वाले भी बहुत थे ……….

सबनें अपनें सामानों को अपनी अपनी गाड़ियों में रख लिया था …….बालक बहुत प्रसन्न थे ………वो अपनी बैल गाड़ियों से उचक उचक कर देख रहे थे महल की ओर …….कि उनका कन्हैया कब आएगा….।

गोकुल त्यागनें का किसी के मन में दुःख नही था ………हर बृजवासी, चाहे वो गोप हो या गोपी , चाहे वो बालक हो या वृद्ध …..सबके मन में एक मात्र कन्हैया की ही चिन्ता थी …….तात ! चिन्ता थी इसलिये चिन्तन भी स्वाभाविक बन रहा था ।

देवी ! जाओ बालकों को उठा दो, देखो महर्षि शाण्डिल्य पधार रहे हैं ………शंख ध्वनि करेंगें वे और तब हमारी यात्रा वृन्दावन के लिए प्रस्थान करेगी ।

ठीक है………इतना कहकर बृजरानी भीतर महल में आगयीं थीं ।

सामान सब रख लिया गया है ……….मार्ग में कलेवा , फिर भोजन ये सारी व्यवस्था हो चुकी है ।

बलभद्र और कन्हाई सो रहे हैं …….गहरी नींद में हैं दोनों ………

पास में बैठ जाती हैं बृजरानी……..और दोनों बालकों को देखनें लग जाती हैं ………मुग्ध हैं………समय का भान कहाँ रहता है जब कन्हैया को कोई देखता है तो ।

जीजी ! क्या कर रही हो ? रोहिणी नें आकर झँकझोरा ।

बृजरानी घबड़ाई हुयी उठीं ………क्या हुआ ?

जीजी ! बाहर सब आपकी ही प्रतीक्षा में हैं ……..गोकुल के ग्वाल गोपी सब आगये हैं…….आप बालकों को लेकर आओ ……..

और हाँ जीजी ! कलेवा और भोजन की सारी व्यवस्था मैने देख ली है ………सब ठीक है ……अब आप शीघ्र पधारो बालकों को लेकर ।

इतना कहकर रोहिणी बाहर चली गयीं ।

मैं भी ना ! हँसते हुए अपनें सिर में एक हाथ मारा बृजरानी नें …….फिर बालकों को उठानें लगीं ……….पर इतनी जल्दी कैसे उठ जाएंगे ये दोनों ।

बोलती हैं, पुकारती हैं ……लाला ! ए लाला ! उठ !

ऊँ ऊँ ऊँ ……..फिर सो गए ।

दाऊ ! तू तो उठ जा ! तू उठेगा तो तेरा भाई भी उठ जाएगा……..

दाऊ को उठानें का प्रयास करती हैं…..पर दाऊ भी तो छोटे ही हैं………वो भी करवट बदलते हुए फिर सो गए ।

जीजी ! शीघ्र करो ………बाहर से फिर आवाज दी रोहिणी नें ।

रोहिणी ! तुम आजाओ एक बार……..बृजरानी नें जोर से कहा …….क्यों की दोनों बालकों को उठाना बृजरानी के लिये सम्भव नही है ……..

रोहिणी आईँ …………दाऊ को बड़े प्रेम से पुचकारते हुए गोद में ले लिया रोहिणी नें ……….

पर यशोदा नन्दन इतना सरल कहाँ है……..उठानें पर रोनें लगा …….बृजरानी नें कहा …….अभी तो दिन भी नही हुआ ………रात ही है …इतनी जल्दी क्या थी ! मन ही मन ये कहते हुये फिर – लाला ! उठ ! लाला ! उठ ! लाला ! “वृन्दावन” जाना है ।

तात ! जैसे ही नन्दनन्दन नें सुना – “वृन्दावन जाना” है ………नींद में भी इस श्रीधाम का नाम सुनते ही उठ गए……दाऊ दादा ! उठो ! चलो वृन्दावन……दाऊ रोहिणी की गोद में थे ……उनको उठानें लगे कन्हैया ।

अनुज के उठानें पर अग्रज दादा उठ गए ……….अपनें अनुज को देखकर मुस्कुराये ……….हाँ ……..चलो ! गोद से उतर कर बाहर भागे दोनों ……….”अरे ! मुँह तो धोलो”……….यमुना में नहा लेंगें मैया ! कन्हैया ही बोले थे ये ।

बाहर सब खड़े हैं ……..सखाओं नें जब देखा अपनें कन्हैया को ……ख़ुशी से झूम उठे ………गोपों नें निहारा कन्हैया को तो निहाल हो गए ….वृद्धों नें मन ही मन आशीष दिया कन्हैया को ………

मनसुख कन्हैया से सटकर चल रहा है ……ताकि उसे सब छू न लें ।

“मैने लाठी को रात भर तेल पिलाया है”………….मधुमंगल नें कान में कहा कन्हैया के ।

अच्छा ! कन्हैया लाठी को देखते हैं मधुमंगल की ।

कंस को देखते ही भाग जाएगा……लाठी को तेल पिलाएगा तू ।

मनसुख मधुमंगल के लिये बोला ।

“कंस की कपाल क्रिया कर दूँगा इसी लाठी से……समझ क्या रखा है तेनें” – मधुमंगल रोष करता है ।

गोपियां बाहर देख रही हैं बैल गाडी में बैठे बैठे…………

कोई कोई पूछ रही हैं ……..बृजरानी का रथ कहाँ है ……….वो किस तरफ बेठेंगीं ? ताकि ये कन्हैया को देख सकें ।

दूध कटोरा में ही लेकर आगयीं बृजरानी ……..सब गोकुल की महिलाएं एक साथ हँसी ……..तुम तो यहीं दूध ले आईँ रानी !

क्या करूँ ? ये लाला है ना ! मानता ही नही है ।

अब तुम इस रथ में बैठ जाओ …….रोहिणी और तुम …….लाला को अपनें साथ रखो ………बलभद्र मनसुख तोक ये सब तुम्हारे साथ में ही रहेंगे……..बृजराज नें ब्रजेश्वरी से कहा ।

और आप का रथ ? बृजेश्वरी नें पूछा ।

मैं तुम्हारे आगे हूँ ……….इस रथ से आगे का रथ मेरा है ।

ठीक है ……..ऐसा कहकर बृजरानी अपनें लाला को लेकर रथ में बैठ गयीं ….और कटोरा का दूध पिलानें लगीं …..बलभद्र भी बैठ गए …..रोहिणी बालकों के लिए, कलेवा की सामग्री लेकर बैठी हैं ….मनसुख रथ में आ तो गया…..पर बैठता नही है, खड़ा है ।

शंख बजाया अब महर्षि शाण्डिल्य नें……

तात ! क्या अद्भुत शोभा बन रही है इस श्रीवृन्दावन यात्रा की …..

जब ठीक ब्रह्ममुहूर्त का समय हुआ था । ………..उपनन्द एक बड़ी शिला पर खड़े हो गए………और ताली बजाकर जोर से बोले – दौड़ो …
दौड़ो ……………ग्वालों नें श्रृंगी नाद् किया ………….बैल गाड़ियाँ धूल उड़ाती हुयी दौड़ पडीं ……..गौ एक तरफ चल रही हैं …..बैल दूसरी तरफ हैं …………मध्य में रथ है ………..बैल गाडी और रथ दोनों दौड़ रहे हैं …….धूल उड़ रही है ।

बैल गाड़ियों के ऊपर सुन्दर सुन्दर रेशमी वस्त्र लगाये हैं ……..ताकि धूप और वायु के झौंको से बचा जा सके ।

वो वस्त्र रंग विरंगें हैं …….लाल, पीले, हरे, गुलाबी ऐसे ऐसे रंगों के वस्त्रों से सजाया है बैल गाड़ियों को और रथों को भी ।

बैल बड़े सुन्दर हैं …….और रथ में लगे अश्व भी बड़े बलिष्ठ हैं ।

बैलों के सींग सुवर्ण से मढे हुए हैं ……..धूप जब पड़ती है उनमें तब एक चौंधा सा प्रकट होता है ….उससे इन सबकी शोभा और बढ़ रही है ।

बैलों के गले में सुन्दर घण्टी बांध दी गयी है …….जब ये एक साथ दौड़ते हैं …..तब जो ध्वनि वातावरण में गुँजित होती है ……वो अद्भुत है ।

उद्धव कहते हैं – तात ! देवों के विमान भी फीके लग रहे हैं इन बैल गाड़ियों की सज्जा के आगे ।

गोकुल को पार करके आगे बढ़े…………

मध्य दिवस हो रहा है ………..भोजन की व्यवस्था की गयी …….सबनें एक साथ बैठकर भोजन किया ………फिर कुछ विश्राम के बाद यात्रा आगे बढ़ी थी ।

सन्ध्या की वेला होनें को है अब ।

पर ये क्या ! अद्भुत शोभा बन गयी है यहाँ वनों की ।

मोरों का झुण्ड, पँक्ति बद्ध होकर खड़े हैं और देख रहे हैं नन्दनन्दन के रथ को …………..

उन मोरों को देखकर कन्हैया खड़े हो जाते हैं ………मैया डर जाती है ……लाला ! बैठ जाओ ! पर कन्हैया इतनी जल्दी कैसे मान जाते ।

“मनसुख भी तो खड़ा है……उसे तो कुछ बोलती नही”

मनसुख ! बैठो ! बृजरानी आदेश देती हैं …..मनसुख बैठ जाता है ।

तो कन्हैया भी बैठ जाते हैं …….मोर मानों स्वागत कर रहे हैं वृन्दावन में प्रवेश का …….कन्हैया मैया की गोद में बैठे बैठे ही हाथ हिलाते हैं मोरों को ।

मैया ! वो खरगोश ………

…..हाँ लाला ! कितना प्यारा है ना !

मुझे चाहिए ! रोनें लगे ………….चुप ! रो मत ……..

नही …..मुझे खरगोश चाहिए ।

मैया नें बड़े प्रेम से कहा ……….देख तू अगर खरगोश को ले जाएगा तो उसकी मैया रोयेगी ………है ना ? बृजरानी नें समझाया ।

कुछ देर सोचनें के बाद कन्हैया उठकर खड़े हो गए ……..

नही नही ……..हम तुम्हारे बच्चे को नही ले जायेगें …….तुम मत रोना !

तभी सामनें मोर, अनगिनत सहस्र मोर एक साथ नाच उठे थे ।

मैया ! देख !

पक्षियों की संख्या कितनी है ये कौन बता सकता है ………..

तोता बोल रहे हैं ………..

ये कौन है ? कन्हैया जानते हुए भी पूछते हैं ।

ये है तोता ……….मैया बताती है ।

उसके साथ ये कौन है ? कन्हैया दूसरे तोता को पूछते हैं ।

मैया हँसते हुए कहती है ……ये तोती है ……….मैया खूब हँसती है ……पर कन्हैया गम्भीर ही बने रहते हैं ………….कुछ सोचते हैं …..फिर कहते हैं ये “तोती” क्या होता है ………तोता की पत्नी है ये तोती ।

कन्हाई फिर तोता को देखते हैं ………फिर सोचते हैं …पूछते हैं…….पत्नी क्या होती है ?

लाला ! पत्नी होती है …………मैया लाला को चूमते हुए कहती हैं ।

तो मेरी पत्नी कहाँ है ? मासूम से कन्हैया पूछते हैं ।

तेरी पत्नी अभी नही है …………

क्यों नही है मैया ? इसके प्रश्न कभी खतम हुए हैं जो आज हो जायेगें !

फिर रोनें लगे इसी बात पर ………मेरी पत्नी कहाँ है ?

पर अब बैल गाड़ियाँ रुक गयीं थीं ………….गौ सब ठहर गए थे …….रथ इत्यादि सब को रोक दिया गया था ।

क्यों की यमुना आगयीं …………यमुना को पार करके ही वृन्दावन आएगा …………….

कन्हैया उतर गए …….बलभद्र मनसुख अन्य सब सखा उतर कर भागे कन्हैया के पीछे ……कन्हैया दौड़ते हुए बृजराज के पास गए …….प्रसन्न होकर बृजराज नें कन्हैया को अपनी गोद में ले लिया था ।

बृजराज ! आज यहीं पर विश्राम किया जाए ………….नौका की व्यवस्था कल होगी ……………बैलगाड़ियों को ही सजा कर उसी में आज रात्रि विश्राम करेंगें ………..बालकों को कुछ खिला दो ……और अन्य लोगों के लिये भोजन बनाया जाए ।

जी महर्षि !

इतना कहकर बृजराज यहाँ से ग्वालों के पास चले गए ….और सबको आदेश दे रहे थे ।

यमुना में स्नान किया सन्ध्या के समय सब नें ……..भोजन बनानें में सब लग गए ।

आहा ! तात ! वृन्दावन की शोभा देखते ही बन रही थी दूर से ………

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 66

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 66)

!! “प्रेम का अद्भुत उदाहरण” – बृजवासी !!


क्या प्रेमी अज्ञानी होता है ?

ये प्रश्न विदुर जी का था ।

नहीं तात ! सच्चा ज्ञानी तो प्रेमी ही होता है ……बल्कि ज्ञानी से भी बड़ा होता है …….बात ये है कि …….भगवान की भगवत्ता और भक्तवत्सलता देखकर ज्ञानी तो आनन्दित हो उठते हैं ……पर प्रेमी के चित की कुछ और स्थिति हो जाती है ………ज्ञान प्रेम के उत्कर्ष को पाकर अभिभूत हो उठता है । तात ! सामान्य जीवन में भी प्रेम के आगे व्यवहारिकी ज्ञान दव जाता है……ये देखा गया है ! उद्धव जी बोले ।

ज्ञान की ऊँचाई ही प्रेम है…..क्यों की प्रेमी समझ जाता है कि…..मेरा प्रियतम ही मेरा सर्वस्व है…..वही सत्य है ,बाकी सब मिथ्या है झुठ है ।

पर बृजवासियों का प्रेम और अद्भुत है ……..आनन्द रस का दान कर रहे हैं कन्हैया………अभिभूत हैं समस्त बृजवासी……..पर इस आनन्द रस में उन बृजवासियों का जो ज्ञान है वो अगर रस समुद्र में डूब कर अभिभूत हो जाए तो इसमें आश्चर्य क्या ?

तो प्रेम सबसे बड़ा है ? विदुर जी नें पूछा ।

हाँ …….निःसन्देह तात ! उद्धव बोले ।

पर इन बृजवासियों का प्रेम सर्वश्रेष्ठ है ….. उद्धव बड़े ठसक से बोले ।

कैसे ? कुछ बताओगे उद्धव ?

उद्धव मुस्कुराये और बतानें लगे थे ।

दूसरे दिन ही एक विशाल सभा लगी गोकुल में……….

बृजराज उस सभा के मुखिया थे……….इनके आठों भाई भी वहाँ उपस्थित थे………गोकुल के सब सम्माननीय व्यक्तित्व उस सभा की शोभा बढ़ा रहे थे ……महर्षि शाण्डिल्य पौर्णमासी इन सबका भी उच्च आसन था और ये उस आसन में विराजमान थे ।

सबसे प्रथम उपनन्द जी को बोलनें के लिये कहा गया………..

“मुझे लगता है गोकुल के अधिदेवता चले गए”…..उपनन्द बोल रहे थे ।

आप ये क्या कह रहे हैं ? उपनन्द जी से सभा में ही पूछा ।

हाँ ……..वो अर्जुन नामक वृक्ष ………उसके भीतर अधिदेवता रहते थे ………”तोक बालक” की बातों को हमें विस्मृत नही करना चाहिये ।

तोक बताओ तो ………क्या हुआ था वहाँ ? जब वृक्ष टूटे ?

तोक नें खड़े होकर कहा ……वृक्ष गिरे और उसमें से दो दिव्य पुरुष प्रकट होकर फिर अंतर्ध्यान हो गए !

बैठो तोक ! उपनन्द जी नें बिठा दिया ।

वो अधिदेवता थे ……….और जिस भवन का, गाँव का, नगर का अधिदेवता ही चला जाए तो वहाँ रहना नही चाहिये ……..

क्या होगा ? एक बूढ़े ग्वाले ने खड़े होकर पूछा ।

अनिष्ट , अज्ञात हिंसा, प्रिय जन की हानि, भय, ये सब बना रहता है ।

उपनन्द जी नें सबको बताया …….और हाथ जोड़कर महर्षि शाण्डिल्य से भी पूछा …….ऋषिवर ! मैं ठीक कह रहा हूँ ना ?

महर्षि नें सिर “हाँ” में हिलाया था ।

देखिये ! राक्षसों का अत्याचार चरम पर है …………कंस नें अपनें यहाँ जमावड़ा लगा रखा है राक्षसों का ……..सम्पूर्ण पृथ्वी के राक्षसों का पालनहार बन बैठा है कंस ………….इसलिये ……….

पर हम अहीर हैं ……वीर हैं ….डरते नही हैं ……….ग्वालों के एक समूह नें अपनी अपनी लाठियां उठाईँ …………….

सुनो ! सुनो ! मुझे पता है हम वीर हैं ……लाठियों से भी हम कंस के राक्षसों का मुकाबला कर जायेंगें…….पर युद्ध प्रत्यक्ष हो तब ना ?

वो तो अप्रत्यक्ष युद्ध कर रहा है …….तुमनें देखा नही ……..पूतना, कागासुर, श्रीधर , शकटासुर ……..ये सब !

“पर हम डर कर भाग नही सकते”…….ग्वालों नें एक साथ हुंकार भरी ।

पर “बृजराज के लाल” को कुछ हो गया तो ?

उपनन्द जी नें ये बात कह दी थी ।

तात ! समस्त ग्वाला समाज काँप गया ……..ओह ! नही ….हमारे प्राण भले ही चले जाएँ …….पर कन्हैया को कुछ नही होना चाहिये ।4

सम्पूर्ण समाज एक स्वर में बोला ।

हम अपनें रक्त का एक एक बून्द बहा देंगें अपनें कन्हैया के लिये …….

पर संकट बना ही रहेगा……..और वृक्षों के गिरनें से इस गाँव का अधिदेवता भी तो चला गया है !

एक बूढी गोपी उठी……..तुम कब तक लाठी लेकर खड़े रहोगे …….पूतना की तरह कोई राक्षसी आई ……..और अपनें कन्हैया को मार कर चली गयी तो ?

ए बुढ़िया ! शुभ शुभ बोल …… सब ग्वाले आक्रोशित हो उठे थे ।

काल से भी भीड़ जायेंगें हम कन्हाई के लिए……..ग्वालों में आक्रोश बढ़ गया था ।

हमारे लाला पे कोई हाथ तो रखकर दिखाये……..काट के फेंक देंगें ।

ग्वाले कन्हैया के बारे में ऐसा वैसा कैसे सुन लेते ?

“हम दूध दही मथुरा भेजना बन्द करते हैं”…….सभा में ग्वालों का एक वर्ग ये भी कहनें लगा ।

शान्त रहो ! सब शान्त रहो………

“हमें इस गोकुल को त्यागना होगा”……….महर्षि शाण्डिल्य नें कहा ।

ग्वाले एक दूसरे का मुँह देखनें लगे……….

हाँ ………..बृजराज और बृजरानी अपनें लाला को लेकर वृन्दावन जाकर रहें ……..क्यों कि बृहत्सानुपुर ( बरसाना ) के राजा बृषभान जी बृजराज के मित्र भी हैं………वो स्थान दे देंगे ।

ये गलत है ……ऐसा नही होगा……..सम्पूर्ण सभा चिल्ला उठी ।

क्या गलत है ? क्या बृजराज को न भेजा जाए वृन्दावन ? क्या उनके पुत्र को यहीं कंस के द्वारा ……महर्षि शाण्डिल्य पूरा बोल भी नही पाये थे कि ….सभा उठ गयी …….सब ग्वालों नें अपनी अपनी लाठियां लहराए आकाश में……..

गलत ये है महर्षि ! कि हम नन्दलाल के बिना रह जाएँ ……..इसलिये हम सब जाएंगे………..

क्या ? बृजराज उठ गए सभा में बोलनें के लिये ।

हाँ …….गोकुल गाँव का हर व्यक्ति जाएगा वृन्दावन……..

सबनें यही कहा…………..एक स्वर में ।

“जाकर आजाना वापस गोकुल” ………..बृजराज नें कहा ।

नही ………हम वहीं रहेंगे……..हमारे राजा हैं आप नन्दराय ! ……हमें कैसे छोड़ सकते हैं……..हमारा युवराज कन्हैया है …..वो हमारा प्राण है …….हमारा ही नही समस्त बृज का प्राण है वो……वो जहाँ रहेगा हम सब भी वहीँ रहेगें ।

बृजराज नें हर्षित होते हुए कहा…….फिर चलो ! सब चलो वृन्दावन ………जब तक भवन की व्यवस्था नही होती तब तक हम लोग बैल गाडी को ही सजाकर उसमें रहेंगे ।

समस्त ग्वाल समाज नें आनंदित होकर करतल ध्वनि की …….

हम सब जायेंगे वृन्दावन……..चलो ! अब वृन्दावन ।

सभा को यही विराम दे दिया गया था ।

तात ! ये कैसा अद्भुत प्रेम है …………विलक्षण प्रेम है ।

अपनें गाँव को कोई त्याग सकता है भला ! अपनें पीढ़ीदर पीढ़ी के आवास निवास को कोई त्याग सकता है भला !…..पर कन्हैया के लिये – जो समस्त गोकुल का प्राणप्यारा था ….सबका दुलारा था उसके लिये इन बृजवासियों नें अपना गाँव, अपना आवास सब कुछ छोड़ दिया……..ये प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है तात !

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 65

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 65)

!! “श्रीराधा मुझे बुला रही है” – अब वृन्दावन की ओर !!


ये गोकुल महावन अब कुछ सूखा सूखा सा लग रहा है ?

यमुना की धार भी पतली हो गयी है…….दाऊ नें कन्हैया की ओर देखा – पूछा……क्या बात है कन्हैया ?

कोई बात नही है दादा ! ……कन्हैया बस मुस्कुराये ।

माखन खिला दिया था मैया यशोदा नें………इन्द्रयज्ञ में आज रात्रि भर जागरण होगा…..कीर्तन करनें वाले आ चुके हैं….ग्वाल बाल सब उत्साहित हैं…….सज धज कर गोपियाँ भी आयी हैं ।

दाऊ दादा ऐसे ही घूमते हुये उस गिरे हुए अर्जुन वृक्ष के पास गए थे…….वृक्ष को अभी उठाया नही गया है…….क्यों की सब बृजवासी इन्द्र यज्ञ की तैयारी में ही थे………

दाऊ दादा गए…….और उस टूटे हुए एक शाख में बैठ गए ।

अब कन्हैया भी वहीँ पहुँचें दाऊ को खोजते हुए…….दाऊ एक डाली में बैठे हुए हैं ….जो टूटी पड़ी थी…….कन्हैया भी उछलते हुए उसी में बैठ गए ।

गोकुल कुछ सूखा नही लग रहा ?

बस मुस्कुरा दिए कन्हैया ।

क्या पृथ्वी को फिर दण्डित करना पड़ेगा ? दाऊ दादा रोष प्रकट कर रहे थे………कन्हैया ! तुम आये हो इस धरा धाम में…….फिर इस धरा की इतनी हिम्मत कि…….शेष स्वरूप दाऊ की आँखें लाल हो गयीं थीं ।

दाऊ दादा ! “गोकुल छोड़कर अब हम सब वृन्दावन चलते हैं”……

कन्हैया नें सहजता में कहा ।

क्या ? दाऊ दादा चौंकें…….फिर बोले – अच्छा ! तो ये तुम्हारी लीला है …….पर क्या गोकुल में तुम्हे अच्छा नही लग रहा ?

दाऊ नें इतना तो पूछ ही लिया ।

“इन्द्र यज्ञ” कर रहे हैं मेरे ये बृजवासी……पर दादा ! “मेरे” होकर, एक देवता की पूजा ! क्यों ?

फिर तुम क्या चाहते हो ? दाऊ दादा नें पूछा ।

मेरे ही स्वरूप गिरिराज – गोवर्धन की पूजा…….मैं ये चाहता हूँ कि देवराज की पूजा छोड़कर गिरिराज गोवर्धन की पूजा की जाए ।

पर यहाँ दादा ! गोवर्धन नही हैं ……..न वो कुँजें हैं …….मुझे वेणु नाद् करना है …….पर वो सब यहाँ नही होगा ।

कन्हैया बोलते गए – दादा ! मुख्य बात तो मैं कहना भूल ही गया …….

“मेरी श्रीराधा मुझे बुला रही है”……वृन्दावन हमारा स्थान नही है …….हमारा स्थान तो ये गोकुल है ……..वृन्दावन तो मेरी प्राणेश्वरी श्री राधा रानी का है ………और वो वृन्दावन , जब मेरे बाबा उनके बाबा से प्रार्थना करेंगें और वो कृपा करके दें “वृन्दावन वास” , तो ही हो सकता है ।

वो पूरा क्षेत्र बृहत्सानुपुर ( बरसाना ) के अंतर्गत आता है ……….और बरसाना के राजा हैं श्री बृषभान जी………कन्हैया वृन्दावन की चर्चा करते हुये अतिप्रफुल्लित थे ।

बहुत सुन्दर वन है वृन्दावन …………दाऊ दादा ! वहाँ बहुत आनन्द आएगा …………..वहाँ कुञ्ज हैं , वहाँ निकुञ्ज हैं ………मोरों की भरमार है ….पक्षियों का कलरव निरन्तर होता ही रहता है ………यमुना भरी हुयी हैं वहाँ ……दादा ! अद्भुत है वृन्दावन , हम सब अब वहाँ जायेंगे ।

कन्हैया इतना कहकर अपनें दोनों चरण हिलानेँ लगे थे ।

जायेंगे फिर यहाँ आयेंगें ? या वहीँ रहेंगें ? दादा दाऊ नें पूछा ।

“रहेंगे”………कन्हैया मुस्कुराये ।

हम अकेले जाएंगे या ? दाऊ दादा का ये दूसरा प्रश्न था ।

नही दादा ! हम सब जाएंगे ! पूरा गोकुल जाएगा हमारे साथ ।

दाऊ दादा हँसे ……….तुम्हे लगता है लाला ! कि ये सब गोकुल वासी तुम्हारे साथ वृन्दावन चल देंगे ?…….अपना सब कुछ छोड़ कर ……..घर वार सब कुछ छोड़कर चल देंगे ? दाऊ नें पूछा ।

ये बृजवासी प्रेम करते हैं मुझ से ……दादा ! इनके जैसा प्रेम मैने किसी अवतार में और किसी के पास नही देखा ………..

तुम घर बार छोड़नें की कह रहे हो……..दादा ! मेरे लिये ये गोप गोपी प्राण दे देंगे…….ये मुझे ही सब कुछ मानते हैं………मैं ही हूँ इनका सब कुछ……..कन्हैया बोलते गए ।……..दादा ! और हमारे पास कारण भी है ……..हम सबको कारण जब बताएंगे तब ये लोग चल देंगे जहाँ हम कहें ! बृजवासियों की प्रशंसा करते हुए गदगद् हो रहे थे कन्हैया ।

कारण क्या है तुम्हारे पास ?

गोकुल त्यागनें का कारण है ……….कि कंस के राक्षस मेरे प्राणों के पीछे पड़े हैं …….उन्हें जब भी अवसर मिलेगा मुझे मार देंगे ………..

दाऊ दादा क्रोधित हो गए ……….”मैं अभी फूँक से न उड़ा दूँ उस कंस के साम्राज्य को ही” ।

दादा ! आप क्रोध बहुत शीघ्र करते हो ……….कारण हम ये बताएंगे ग्वालों को गोपियों को ……….तब देखना …..इनका जो प्रेम है हृदय में …..वो प्रकट हो जाएगा ……….मेरे लिये ये गोकुल क्या संसार भी त्याग सकते हैं …….ये लोग प्रेम का साकार रूप हैं दादा ! ये बृजवासी लोग मेरे लिये हैं …….सिर्फ मेरे लिये ।

कन्हैया ! कन्हैया ! कन्हैया !

तभी – बृजरानी की पुकार सुनाई दी दोनों भाइयों को ।

उस टूटे हुए वृक्ष की शाखाओं से कूदे दोनों भाई ।

तो अब वृन्दावन चलना है ? दाऊ नें हँसते हुए फिर पूछा ।

हाँ ………..मेरी “सर्वेश्वरी श्रीजी” मुझे याद कर रही हैं ।

कन्हैया नें खिलखिलाते हुए दाऊ से कहा ।

दाऊ ! कन्हैया !

……..बृजरानी मैया नें फिर आवाज दी ।

“आयो मैया” ! ये कहते हुए दोनों भाई दौड़े थे मैया के पास ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 64

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 64)

!! जब परब्रह्म को मुक्ति मिली – अद्भुत लीला !!


दुनिया को मुक्ति प्रदान करनें वाला परब्रह्म…..अखिल कोटि ब्रह्माण्ड नायक परब्रह्म , वो परब्रह्म जिससे चर चराचर सम्पूर्ण सृष्टि मुक्ति की कामना करती है , वो परब्रह्म ! अद्भुत लीला है ये तात !

वो परब्रह्म जिससे हर बद्ध जीव याचना करता है कि हमें मुक्त कर दो ।

पर आज वही परब्रह्म , स्वयं बन्धन में है …..और अन्य से याचना कर रहा है कि ….मुझे बन्धन से मुक्त करो ।

“ये प्रेम नदी की उल्टी धार है”……उद्धव मुस्कुराये ।

बस एक प्रेम में ही ये ताकत है कि …परब्रह्म को भी बाँध दे……और अद्भुत ! कि परब्रह्म बंध कर भी आनन्दित है ।

..यही तो लीला है !

….उद्धव विदुर जी को अब आगे का प्रसंग सुनानें लगे थे ।

क्या हुआ ? कौन सा राक्षस कूदा ?

यज्ञ में सब लगे हुए थे ………कार्तिक अमावस्या के बाद सब बृजवासी इंद्र देवता की पूजा में तन्मयता से लग जाते थे ……सब कृषक थे ……इसलिये इन्द्र देव को ही ये विशेष पूजते ……..आज भी पूजा की तैयारी में ही सब ग्वाल बाल , और स्वयं बृजराज लगे थे ।

तभी भीषण आवाज हुई …………..सब डर गए ………बृजराज भी डर गए ……..नही नही ……ये बृजवासी भीरु नही हैं …….पर इन्हें अपना डर नही …..डर है तो केवल नन्दनन्दन का …………इन्हें डर है कि पूतना कागासुर की तरह कोई राक्षस उनके कन्हैया का अहित न करे ।

क्या हुआ ? कौन सा राक्षस कूदा ?

उस भीषण आवाज को सुनते ही सब काँप गए ।

बृजराज जु ! आपके आँगन में कुछ अनहोनी हुयी है ।

एक ग्वाले नें कहा ।

क्या ? सब चौंकें…….बृजराज तो तुरन्त उठकर खड़े हो गए थे ।

दाऊ , मनसुख, मधुमंगल इत्यादि सब यहीं थे …………वे सब भागे नन्दालय की ओर ………..

बृजराज भी अपनें साथ के ग्वालों को लेकर अपनें भवन की ओर तेज चाल से चल दिए थे ।

बृजराज आये, पहले दाऊ इत्यादि सब पहुँच गए थे वहाँ ।

“ओह ! “अर्जुन के वृक्ष गिर गए” ………..सब लोगों नें कहा ।

देखा सब लोगों नें……..दो वृक्ष गिर गए थे……उनके मध्य में फंसे हुए थे कन्हैया……..पर कोई चोट नही आयी थी लाला को ……वो बस हँस रहे थे……नन्द बाबा दौड़े…….उठाया अपनें पुत्र को गोद में……और लेकर आगये थे इस तरफ ।

दाऊ देख रहे हैं……..उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गए हैं…….कन्हैया के उदर में बंधी रस्सी तोड़ कर फेंक दी दाऊ नें ।

पर रस्सी के निशान उदर पर बन गए…….नेत्र बह चले दाऊ के ।

ये किसनें किया ? ये काम किसका है ? बृजराज को क्रोध आगया ।

तभी बृजरानी आगयीं………रसोई में ये पाक बनानें में तल्लीन थीं ………और लाला के लिये ही बना रही थीं…..इसलिये तल्लीनता इतनी थी कि वृक्ष के गिरनें की आवाज भी नही सुनीं ।

ये अब इसलिये आईँ थीं कि …लाला के हाथ दूख रहे होंगें ……खोल देती हूँ ।

पर यहाँ का दृश्य जब देखा ……तो…….चीख निकल गयी मुँह से मैया के…….वो दौड़ीं ………और कन्हैया को अपनें हृदय से लगा लिया ……….पेट में पड़े रस्सी के निशान देख रही हैं …….भीतर से ही हिलकियाँ फूट पड़ी थीं …….मैया यशोदा की ।

ये किसनें किया है ? बताओ ये किसका काम है ?

अरे ! तनिक भी दया नही आई उसे…….इतनें फूल से कोमल लाला को बाँध दिया रस्सी से……..बृजराज बहुत क्रोधित हैं ।

दाऊ नें भी मैया का नाम नही लिया ……..न कन्हैया नें नाम लिया …….मनसुख चुप ही रहा ……..भद्र मधुमंगल नें मौन ले लिया ।

मैया रोती हुयी भण्डार में गयीं ……….माखन लेंने के लिये …..पेट में बने रस्सी के निशान में ये माखन लगा देगी ।

उपनन्द जी नें वृक्षों को ध्यान से देखा ………..ये गिरनें जैसे थे तो नही ………गिरे कैसे ? और कोई ऐसी आँधी भी तो चली नही है ………फिर ये गिरे कैसे ?

ये अर्जुन वृक्ष हैं ….इनकी जड़ें बहुत गहरी जाती हैं धरती पर …..ये तनिक से झटके में गिरनें वाले नही थे …….और देखो ! इनकी जड़ें स्वस्थ हैं …….न कोई कीड़े लगे हैं ……फिर ये गिरे कैसे ?

उपनन्द जी सबके सामनें अपनी बात रख रहे हैं ।

मुझे पता है ……चार वर्ष के “तोक” नें आगे बढ़कर कहना शुरू किया ।

“इस कन्हैया नें गिराया”……..तोतली बोली में बोला ।

हाँ …..सच ! ये देखो …….ऊँखल को घसीटते हुए कन्हैया नें वृक्षों के बीचों बीच फँसा दिया ……..फिर झटका दिया ………।

बड़े बड़े लोगों नें तोक की बात सुनी तो……..पर विचार नही किया …….अब भला ! पाँच वर्ष का कन्हैया पेड़ को उखाड़ देगा ? बृजराज कैसे मानें ।

पर मेरे प्रश्न का किसी नें उत्तर नही दिया ……..कन्हैया को ऊँखल से बाँधा किसनें ? बृजराज फिर सबसे पूछनें लगे ।

“मैने बाँधा था”……………..बृजरानी रो पडीं ये कहते हुए ……ये हाथ ही अपराधी हैं ……..जिन्होनें इस कोमल लाला को बाँधा ।

दया नही आयी तुमको बृजरानी ? बृजराज रोष में थे ।

अपराधी हूँ मैं ………..सिर झुकाकर रोते हुए बोल रही थीं ।

कुछ हो जाता तो लाला को ? ये वृक्ष लाला के ऊपर ही गिर जाते तो ?

इन सारी बातों को सुनते हुए बस हिलकियों से रो रही हैं मैया ।

चल लाला ! उत्सव में चल ……..वहीँ खेलना कूदना ……चल !

कन्हैया को गोद में लिया नन्द बाबा नें और चलनें लगे ……..

दाऊ पीछे पीछे ……..सखा सब पीछे चल दिए ।

मैया अकेली खड़ी है आँगन में …..और अपनें लाला को जाते हुए देखकर रो रही है ……………

चार कदम ही आगे बढ़े थे नन्दबाबा की ……..कन्हैया नें मुड़कर अपनी मैया को देखा……….मैया रो रही है ………..

ये देख कर विकल हो उठे कन्हैया……..बृजराज से बोले …..”.बाबा ! मैया के पास जाऊँगा” ।

नही ….मैया गन्दी है…….मारती है मेरे लाला को…..नन्दबाबा नें कहा ।

बाबा की सफेद दाढ़ी पकड़ते हुए कन्हैया बोले…..”अच्छी है मैया” ।

सुनो ! बृजराज ! बालकों को अभी यज्ञ में मत ले चलो ……बालकों नें कुछ खाया भी नही है सुबह से ……इसलिये इनको यहीं रहनें दो ……ये शाम को आजायेंगे ।

उपनन्द जी की बातें सुनकर नन्द राय नें कन्हैया को गोद से उतार दिया ………और सब बालकों से कहा …..कुछ खा के आजाना ।

बृजराज अपनें ग्वालों के साथ यज्ञ मण्डप में चले गए थे ।

दाऊ ! ले माखन खा ……….माखन पहले दाऊ को खिलानें लगीं मैया यशोदा……..क्यों की दाऊ से विशेष प्रेम है कन्हैया का …….वो खाता है तभी ये खाता है ।

पर दाऊ भी रुष्ट हैं आज मैया यशोदा से ……….मुँह फेर लिया मैया की ओर से……….दुःखी हो गयीं मैया ………मनसुख नें भी मना कर दिया ………ऐसे भी कोई बान्धता है ……..कोई पशु है लाला ! मनसुख भी बोल उठा ………मधुमंगल नें तो दूर से ही ……..

बृजरानी बहुत दुःखी हो गयीं…….क्या करें ………गयीं अपनें लाला के पास ………..और मनुहार करते हुए लाला को माखन खिलानें लगीं ……पर नही ….लाला नें मैया के हाथ से माखन का गोला लिया……..

बृजरानी तो अब टूट गयीं थीं……उन्हें लगा अब लाला भी मेरे हाथ से माखन नही खायेगा ! ओह !

पर ऐसा नही था ………….लाला नें माखन लिया मैया के हाथों से …..और खिलानें लगे दाऊ को ……….मैया की नही दाऊ ! गलती मेरी थी……..मैया को दोष कोई मत दो ………..

दाऊ नें मैया की ओर देखा ………रो पडीं मैया फिर ।

लाला इस तरह सबको मना रहे थे …….अपनी मैया के लिये …….

मैया रो रही हैं, हिलकियों से रो रही हैं ……….कन्हैया नें मुस्कुराकर कहा ……मैया ! रो मत ………क्यों रो रही है ? गलती मेरी थी माँ !

ये कहते हुए कान पकड़े कन्हैया नें ……और जैसे ही उठक बैठक लगानें लगे ……….मैया दौड़ पड़ी ……….और अपनें लाला को हृदय से लगा लिया ।

तात ! ये अद्भुत वात्सल्य की लीला है ….परब्रह्म , जो जगत को मुक्ति देता है ……..उसे अब मुक्ति मिली थी ……..दामोदर – मुक्ति ।

अपनें आँसू पोंछते हुए उद्धव नें कहा था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 63

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 63 )

!! “यमलार्जुन उद्धार” – जब वृक्ष गिरे !!


हम हैं शापित वृक्ष – यमलार्जुन ।

शापित ? नही शापित कैसे कहें ……..ऐसा अहोभाग्य तो सिद्धों को भी प्राप्त नही हुआ …………..

देवर्षि नें हमें शाप दे दिया ……..पर हम उसे वरदान से भी ज्यादा मानते हैं ………शाप मिलते ही हम पृथ्वी में आ गिरे थे ………..और बीज के रूप में गोकुल में ही पड़े रहे ………अंकुर फूटा तो “अर्जुन” नामके दो वृक्ष बनकर हम खड़े ……..कृपा थी हमारे ऊपर देवर्षि की ……..तभी तो बृज मण्डल में ……और वो भी गोकुल में …….और गोकुल में भी उसी आँगन में जिस आँगन में परब्रह्म प्रकट होने वाले थे ।

बहुत पूजा की हमारी बृजरानी नें ………..तुलसी में जल देनें के साथ साथ हमको भी जल देती थीं ……..बृजराज हमारी प्रदक्षिणा करते थे ……ग्वाल गोपी कलावा बांध कर हमसे मनौती माँगते थे ……….

मनौती ? अजी ! ग्वालों की यही मनौती होती थी कि …..बृजराज के पुत्र हो ……..हम को हँसी आती………हम इनकी कामना पूरी करते ?

क्या हममें इतना सामर्थ्य था ? हम तो स्वयं शापित होकर पड़े थे ।

पर इन गोकुल वासियों का प्रेम ! भाव ! अद्भुत था …….

हुआ बृजराज के पुत्र…….हम बहुत प्रसन्न थे……हमें याद है …..ढोलक मंजीरा लेकर, “नारायण नारायण” का मंगलमय कीर्तन करते हुए, एक सौ आठ परिक्रमा लगाई थी हमारी बृजराज नें ।

समय बीतते भला देर लगती है ……..घुटवन चलते हुए आये थे हमारे पास कन्हैया पहली बार……..हमारी शाखाओं को छूआ था …..उस समय जो आनन्द की अनुभूति हुयी थी …….वो अवर्णनीय है ।

उद्धव विदुर जी को ये प्रसंग सुना रहे हैं ।

उस दिन की बात…..कुबेर के पुत्र कहते हैं – बहुत उपद्रव मचाया था कन्हैया नें…….हम तो बड़े प्रसन्न थे ………ऐसी अद्भुत लीला दर्शन भाग्यों से नही ….कृपा से ही प्राप्त होती है …….और हमारे ऊपर कृपा थी देवर्षि की……..हम बार बार वृक्ष बननें के बाद भी देवर्षि नारद जी का धन्यवाद करना न भूलते थे ।

बाँध दिया था उस परब्रह्म को आज बृजरानी नें………वो कितना रोया था ……..अंजन उसके आँखों से बहकर कपोलों में फैल गया था ……वो लीलाधारी सिसक रहा था …………

हम ये सब लीला देखकर आनन्दित थे ……….अति आनन्दित ।

ऊखल से बाँध दिया था……….और चली गयीं थीं बृजरानी रसोई घर में……….रोहिणी से, बृजरानी को ये कहते सुना था हमनें …….कि …….कुछ देर बन्धनें दो इसे……अभी छोड़ दूंगी तो कहीं भाग जायेगा ।

तात ! अब आगे सुनो …….कैसे ये अर्जुन नामक वृक्ष गिरे ।

उद्धव , विदुर जी को अब आगे की लीला सुनानें लगे थे ।

दाऊ ! भैया ! भैया !

बृजरानी के जानें के बाद , रोते हुए बड़ी जोर से चिल्लाये थे कन्हैया ।

पर दाऊ वहाँ थे नही………बृजरानी नें भगा दिया था वहाँ से ।

कुछ देर दाऊ को पुकारनें के बाद कन्हैया चुप हो गए …..पर सुबुक रहे थे अभी भी ।

हाँ तोक सखा आगया था ……..चुपके से उसनें रस्सी खोलनी चाही ……..पर ये तो 4 वर्ष का है ….कन्हैया से भी एक वर्ष छोटा ……इससे वो रस्सी क्या खुलती !

कन्हैया नें इधर उधर देखा ……गोपियाँ भी नही दीखीं ……….बृजरानी नें उन सबको भी आज भगा दिया था ………..।

तोक सखा तोतली बोली में बोला – मैं देखता हूँ …………वो गया ……..दो तीन अपनी आयु के बालकों को ले आया ……….

इनसे क्या होगा ? कन्हैया अब थोडा हँसे ………..

ये ऊखल को गिरा देंगें……..तोक नें कहा ।

“चलो गिराओ”……….कन्हैया सहज ही बोले थे ।

इन बालकों नें खूब जोर लगाया…………परिणाम स्वरूप वो ऊखल गिर गया ……जैसे ही ऊखल गिरा …….कन्हैया बड़े खुश हुये ………

और ऊखल को खींचते हुए ले चले थे ।

इतनें प्रसन्न थे अब ……रोना धोना सब खतम हो गया था…..ऊखल पीछे पीछे आरहा था ….आगे कन्हैया उसे खींच रहे थे……..

पर अब रुक गया था…….कन्हैया पीछे मुड़े …..रुका कहाँ ? ये कहीं अटका है …..पर कहाँ अटका ? पीछे मुड़कर देखा…….

तो – अर्जुन नामक वो दो वृक्ष जो थे….उनमें ही अटक गया था ऊखल ।

खींच के झटक दिया ऊखल को कन्हैया नें ।

क्षण भी न लगा होगा ………एक भीषण आवाज आयी……..आवाज बड़ी भीषण थी ……पूरे गोकुल गाँव में ये आवाज गूँजी …….सब भयभीत हो उठे थे ।

पर यहाँ तो वो पुराना वृक्ष …….जड़ के सहित ही उखड़ गया था ।

उखाड़ दिया था कन्हैया नें…….एक तीव्र झटका – और यमलार्जुन का उद्धार कर दिया……….आँधी न आयी थी ……न तूफ़ान आया था …..ग्वाल बाल समझ न पाये थे कि इतना बड़ा, पुराना वृक्ष जड़ सहित गिरा कैसे ?

पर – हमारा उद्धार हो गया था………हम अपनें स्वरूप में आगये थे ……..हम हाथ जोड़े उन नन्दनन्दन के सामनें खड़े थे ।

वो मुस्कुराये – कुबेर के पुत्रों नें कहा – आहा ! क्या रूप माधुरी थी वो ……मुस्कुराता मुखमण्डल …..घुँघराली अलकें ……श्याम वर्ण ….पीताम्बरी…..कटि में काँछनी….हमें देखकर वो मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे ।

“जाओ अब अपनें यक्ष लोक”………कमलनयन कन्हाई के मधुर बोल गूंजे हमारे कानों में……….

हमारा “बृजवास” छुड़ा रहे हो ? हमनें हाथ जोड़ कर कहा ।

हाँ तो ? जाओ फिर विलासिता में जीयो …….फिर किसी साधू सन्त का अपराध करो…….व्यंग में भी कितना सुन्दर बोल रहे वे ।

पर अब हम विलासिता को त्याग रहे हैं……..भोगों के प्रति हमारी अब कोई रूचि नही है ।

………फिर मुक्त हो जाओ ? बोलो – मुक्ति दूँ ? नन्दनन्दन नें कहा ।

नही ….नाथ ! मुक्ति नही ………..हमें तो प्रेम दीजिये …..हमें तो भक्ति दीजिये ……..नाथ ! दीजिये हमें कि – हमारी वाणी मात्र आपके ही गुणों का गान करती रहे …….हमारे कान आपकी लीलाओं को ही सुनते रहें ………हाथ आपकी सेवा में ही लगे रहें ……..और ये सिर ! ये सिर अब अहंकार में न उठे ………..ये अब झुके ……..नाथ ! आपके चरणों में झुके ………निरन्तर , सदा सर्वदा ……….ये कहते हुए कुबेर के पुत्रों नें नन्द नन्दन के चरणों में अपना मस्तक रख दिया था ।

तात ! भक्ति का वरदान प्राप्त करके ये कुबेर पुत्र अपनें लोक में चले गए………उद्धव नें विदुर जी को ये कथा सुनाई थी ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 62

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 62 )

!! कुबेर के पुत्र जब वृक्ष बनें – यमलार्जुन !!


” महत्पुरुषों का श्राप भी मंगलकारी होता है “

उद्धव की इस बात से विदुर जी अति प्रसन्न हुये ………

हाँ उद्धव ! इस बात का तो ये “दासीपुत्र विदुर” प्रमाण है …….माण्डव्य ऋषि का श्राप मुझ यमराज के लिये मंगलकारी हुआ ना !

मुझे श्राप दिया था माण्डव्य ऋषि नें ……..”जाओ ! धर्मराज ! तुम दासी पुत्र बनोगे” ………

उद्धव ! मैं तो दिन भर पापी और पुण्यात्माओं को ही देखता रहता था …..दण्डाधिकारी बना, मेरा यही काम था ……..पर ऋषि के श्राप से मैं विदुर बना ………..और मेरे यहाँ नन्दनन्दन केले के छिलके खानें आये ……आहा ! और इतना ही नही…….आज मैं उन्हीं गोविन्द की मंगलमयी कथा को श्रीधाम वृन्दावन में सुन रहा हूँ …………..

विदुर जी बोले ………सन्तों का वरदान मंगलमय है तो श्राप भी मंगलमय है……….विदुर जी के नेत्र सजल हो उठे थे ।

मैं भी अपनी व्यथा सुनानें लगा……..उद्धव ! छोडो इन बातों को ……अब बताओ ………तुम क्या कह रहे थे ? सन्तों का श्राप भी मंगलमय होता है ? पर यहाँ श्राप किसे दिया …..और किसनें ?

उद्धव ! तुम कह रहे थे ……….ऊखल में बंधे कन्हैया नें सामनें अपनें आँगन में अर्जुन के दो वृक्षों को बड़े ध्यान से देखा …………

क्या ये वृक्ष कोई देवता हैं ? श्राप के कारण ये वृक्ष बने ?

विदुर जी नें उद्धव से आगे कहा……..उद्धव ! क्या अद्भुत लीला सुनाई है तुमनें……..बंध गए ब्रह्म ! फिर कैसे खुले ? किसनें खोला ? मैं आगे की लीला सुनना चाहता हूँ …..सुनाओ ! उद्धव !

कुबेर के दो पुत्र थे ………नल कूबर, मणिग्रीव ।

बड़े अहंकारी थे तात ! और प्रभुता मिलनें पर किसे अहंकार नही आता ……फिर इनकी प्रभुता ? ये तो कुबेर के पुत्र जो ठहरे ।

“मन्दाकिनी गंगा”………हिमालय से बहती हुयी ये निकलती हैं………

बड़ा सुन्दर स्थान था वह हिमक्षेत्र का………..वहीँ कुबेर के ये पुत्र आकर विभिन्न भोगों में रत रहते थे …………..मदिरा पान , पर स्त्री का संग, और द्युत क्रीड़ा ।

वैसे तात ! जहाँ ‘अति धन” आता है ……..वहाँ ये तीन दोष आते ही हैं …..मदिरा, परस्त्री, और जूआ ।

बहुत कम लोग होते हैं जो इनसे बच जाएँ ।

हिमालय साधना की भूमि है ………हिमालय तपस्या की भूमि है ….पर इन क्षेत्रों में भोग विलास करना ……ये तो अपराध है ……….पाप है ।

उद्धव आगे बोले – कुबेर के ये दो पुत्र अपनें साथ आज चार सुन्दरी अप्सराओं को ले आये थे…..और मन्दाकिनी गंगा में पहले तो मदिरा का सेवन किया इन्होनें……..फिर उन अप्सराओं के साथ नग्न स्नान ………………

देवर्षि नारद जी बड़े प्रेम से …… भगवतगुणानुवाद गाते हुए वहाँ भ्रमण कर रहे थे…..उन्हें सर्वत्र अपनें “गोविन्द” ही दिखाई दे रहे थे ……प्रसन्न चित्त से वो वृक्ष, पर्वत, नदी सबको कह रहे थे …….”भगवान का नाम लो….भगवान की लीलाओं का गान करो….भगवान को भूलो मत ।”

नारद जी की बातों को प्रकृति भी सुन रही थी ……और आनन्दित थी ।

पर तभी मन्दाकिनी गंगा में स्नान करते हुए कुबेर के पुत्रों की ओर देवर्षि नारद जी की दृष्टि गयी ………मदिरा के कारण आँखें उनकी लाल हो गयीं थीं …..मत्त , उन्मत्त होकर वे सब नहा रहे थे ।

दया आई देवर्षि को …………कुबेर के पुत्रों की ये दुर्दशा ?

उनके ऊपर करुणा करनी थी इसलिये देवर्षि पास में ही गए ……….

क्या कर रहे हो ? मुस्कुराते हुए देवर्षि नें पूछा था ।

हँसे कुबेर के पुत्र ………….हम ? हम जो कर रहे हैं वो आपको बता नही सकते ! ये कहते हुए वो फिर हँसे ………और अप्सराओं के ऊपर जल का छींटा देनें लगे ……….।

हँसे तो अब देवर्षि…………..तुमनें मुझे प्रणाम नही किया ?

बड़ी सहजता में बोले थे ………”तुम्हे प्रणाम करना चाहिए था” ……..देवर्षि की सहजता देखते ही बन रही थी ।

कुबेर के पुत्र ठहाका लगानें लगे…….हम ? हम आपको प्रणाम करें ?

हम कुबेर के पुत्र हैं…….कुबेर ! धनाध्यक्ष कुबेर …….जानते हो ना ?

पर देवर्षि नें दूसरी ही बात कही …….क्या तुम्हे पता है जिन वृक्षों पर फल लगे होते हैं वो झुकते हैं ……..फलहीन वृक्ष, और गुणहीन व्यक्ति झुकता नही है ……………

हमें कौन सिखाएगा झुकना ? कुबेर के पुत्रों नें अहंकार में भरकर कहा ……..बताइये देवर्षि ! कौन सिखाएगा हमें ?

वृक्ष !

देवर्षि नारद जी के मुखारविन्द से निकला ।

क्या ? चौंक गए कुबेर के ये पुत्र ………….

हाँ …..तुम वृक्ष बनोगे ……जाओ ! फिर तुम उनसे सीखना कि झुकते कैसे हैं ? हँसते हुए नारद जी चल दिए आगे के लिये ।

तात ! सारा नशा उतार दिया था देवर्षि नें……….वो वस्त्र पहन कर भागे नारद जी के पास………और चरणों में साष्टांग गिर गए थे ।

देवर्षि ! क्षमा करें ! हमसे अपराध हो गया …….आगे से ऐसा नही होगा………कुबेर के पुत्र गिड़गिडाते रहे ।

क्या नही होगा ? देवर्षि मुस्कुरा रहे थे…………..देखो ! वृक्ष तो तुम्हे बनना ही पड़ेगा ………….ये बात अटल थी देवर्षि की ।

पर मैं एक बात कह देता हूँ ……..जो तुम्हारे जीवन को धन्य बना देगा ………..नारद जी आँखें मटकाते हुए बोले ।

क्या ? कुबेर के पुत्रों नें पूछा ।

यही कि …….तुम वृक्ष भी बनोगे तो नन्दालय के आँगन में खड़े वृक्ष ।

कन्हैया माखन खाते हुए अपनें हाथ का जूठन तुम्हारे में पोंछेंगे …………धन्य हो जाओगे तुम !

तुम्हारे आस पास ही रहेंगे कन्हैया……..तुम्हे अपनें गले से लगाएंगे …..तुम पर चढ़ेंगे…….तुमसे खेलेंगे …….आहा ! धन्य हो जाओगे ।

इतना कहते हुए देवर्षि आगे बढ़ गए थे ……………

कुबेर के पुत्रों को ये श्राप मिला था………उद्धव नें कहा ।

उद्धव ! ये श्राप कहाँ है ? ये तो वरदान है …….परम वरदान ।

इन कुबेर के पुत्रों की कोई गिनती है……..कि नन्द नन्दन के दर्शन भी कर लेते ये ………पर देवर्षि की कृपा से ………..आहा !

विदुर जी नें उद्धव से कहा ।

तात ! ऊखल में बंधे कन्हैया नें अब उन्हीं अर्जुन नामक दो जुड़वे वृक्षों को देखा था ………और मुस्कुराये थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 61

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 61 )

!!”दामोदर” – यानि बंधा हुआ ब्रह्म !!


पर नन्दरानी मानती नही हैं । कन्हैया भय के कारण रोते जा रहे हैं …….. नन्दरानी का हृदय लगता है आज कुछ कठोर हो गया है ।

कन्हैया अपनें आपको छुडानें की कोशिश कर रहे हैं ………वो कभी आगे आते हैं मैया के………फिर पीछे की ओर चले जाते हैं ……..धरती में गिर जाते हैं ……….पर बृजरानी हाथ छोड़ नही रहीं ।

सच में तात ! आज बुरी बीती कन्हैया पर……सोचा न था कन्हैया नें कि मैया इतना गुस्सा करेगी……एक मटकी फोड़नें पर ।

“अब तो बाँधूंगी मैं तुझे”……….मैया गुस्से में बोलीं ।

ये सुनते ही कन्हैया और जोर से चीखे………पर आज बृजरानी पर कोई असर नही हो रहा रोनें का …..न चिल्लानें का ……..

हाथ पकड़ती हैं……..दूसरे हाथ से पास में रखी गाय को बाँधनें वाली रस्सी लेती हैं …….उस रस्सी से बाँधनें का प्रयास करती हैं ……..पर डोरी कम पड़ गयी ……..दो अंगुल कम पड़ी ।

बृजरानी फिर परेशान हो उठीं …….दूर एक रस्सी और पड़ी थी ……..वहाँ गयीं ……….एक हाथ से कन्हैया का हाथ पकड़ा है ………दूसरे हाथ से वहाँ पड़ी रस्सी उठाई ………फिर बाँधनें लगीं ……पर ये क्या ! रस्सी फिर दो अंगुल कम ।

उद्विग्न हो, चारों ओर देखा बृजरानी नें ………गोपियाँ खड़ी हैं ………हाथ जोड़ रही हैं ……….मत मारो लाला को …..मैया ! मत बाँधों लाला को ।

पर मैया आज इनकी बातों पर क्यों ध्यान देनें लगीं ।

दूर ऊखल है ……….बृजरानी नें तुरन्त विचार किया …….ऊखल से बाँधूंगी इसे ……और वहीँ पास में एक रस्सी भी दीखी बृजरानी को ।

कन्हैया का हाथ पकड़ कर वहाँ लेकर गयीं……….दाऊ वहाँ आगये थे ……..रस्सी के पास ही खड़े थे ………बस स्तब्ध हो – खड़े थे ।

कन्हैया नें अपनें दाऊ भैया को देखा……तो और जोर से रोनें लगे ।

दाऊ से ये सब देखा नही जा रहा……उनका कान्हा आज इतनें जोर से रो रहा है…….कन्हैया के रोनें की आवाज नें दाऊ का हृदय मानों विदीर्ण ही कर दिया था । वो रुदन सुननें की स्थिति में नही थे ।

दाऊ ! रस्सी दे ……..बृजरानी नें आदेश किया ।

दौड़ पड़े दाऊ ……चरणों में गिर गए मैया के ……….मैया ! छोड़ दे लाला को ……….मैया ! तू तो इतनी कठोर न थी ……..फिर आज क्या हो गया है तुझे ……..! एक मटकी ही तो फोड़ी है ……….नीलमणी को देख …….एक मटकी के लिये तू इसे बान्धना चाह रही है …….नही मैया ! मत बाँध इसे …….छोड़ दे मैया ! छोड़ दे ।

दाऊ के नेत्रों से अश्रु गिरनें लगे थे ……………

तुझे माखन प्यारा हो गया है मैया !…….ये बृज का प्यारा कन्हैया, तुझे प्यारा नही लग रहा ? देख मैया ! कितना कोमल है ये …..और ये रस्सी ? गौ को बाँधनें वाली रस्सी से तू इसे बाँधेंगी ?

मत बांध , मैया ! मत बाँध इसे ! दाऊ प्रार्थना करनें लगे थे……..पर –

तू मुझे समझायेगा ! भाग यहाँ से नही तो मैं तुझे भी बाँध दूंगी ………

दाऊ को भगा दिया था मैया यशोदा नें ।

अब वहाँ पड़ी रस्सी को उठाया ……………दो रस्सी से बांध चुकी हैं ….ये तीसरी रस्सी है ……………इसे लेकर जोडा दूसरी रस्सी से ……..फिर बाँधनें लगीं …………पर नही ……….

उद्धव बोले – तात ! ऐसे कैसे बंध जाएगा ब्रह्म ।

पर ब्रह्म भले हों ……..जब पुत्र बनकर आये हैं तो बंधना पड़ेगा ही ।

विदुर जी बोले ………..फिर पूछ बैठे उद्धव से………..

ये दो अंगुल का रहस्य क्या है ? रस्सी कम क्यों पड़ रही है ?

उद्धव बोले – तात ! “मैं बाँधूंगी”…….यहाँ जो ये “मैं” है ना ……यही बाधक बन रहा है ………….

किसनें कहा वो साधना से मिलता है ……..तात ! वो तो कृपा से मिलता है …………हमारे करनें से मात्र हमारे अहंकार की पूर्ति ही तो होगी …. हमारा अहंकार ही तो पुष्ट होगा ! और इस मार्ग में तो अहंकार ही सबसे बड़ा बाधक है ।

तो कुछ न करें ? साधना बगैर कुछ नही ? विदुर जी नें पूछा ।

कृपा बरस रही है …….निरन्तर बरस रही है तात ! और ये कृपा शक्ति सभी के ऊपर , समान रूप से बरसती है ……….हाँ …….पात्र होना आवश्यक है……बिना पात्र के उस कृपा को कहाँ रखोगे ।

साधना से मात्र पात्रता का निर्माण होता है ।

उद्धव नें समाधान किया था ।

थक गयीं , हार गयीं अब बृजरानी……….रस्सियों पे रस्सियाँ जोड़ती जा रही हैं ………पर बारबार रस्सी कम ही पड़ती है ।

अब बैठ गयीं मैया……..पसीनें आगये………देह शिथिल पड़नें लगा ।

“ये मुझ से बंधेगा नही” ………….ये विचार मन में आया …………

क्या करे मैया अब ? कन्हैया भी अब चुप हो गए …….मैया थक गयी है ये बात जान रहे हैं …….अब कन्हैया को अपनी मैया के ऊपर दया आगयी थी …………..

अब देखा मैया के मुख मण्डल को ध्यान से कन्हैया नें ।

तू बंधेगा नही ? बड़ा दुष्ट है रे तू ? बंधता भी नही है ।

मैया अब दयनीय सी हो गयी थी……..पर अब……….

बृजरानी की चोटी आगे आगयी …….उस चोटी की डोर ढीली पड़ गयी थी भागते भागते ………..तुरन्त मैया उठीं ………और चोटी की डोर को निकालकर रस्सी से जोड़ दिया ……………

आकाश से महामाया नें वन्दन किया यशोदा मैया को …….मैया के वात्सल्य को………महालक्ष्मी नें सुमन बरसाए ऊपर से ……..

देवताओं नें जयजयकार किया ……………

और – तभी ….कमर से रस्सी को लेकर…..ऊखल से बाँध दिया मैया यशोदा नें ।

आकाश से पुष्प गिरे ………बोलो – दामोदर भगवान की – जय ।

बंध गए ब्रह्म ……..दुनिया को बन्धन मुक्त करनें वाला ब्रह्म ……आज स्वयं वात्सल्य के बन्धन में बंध गए थे………और दामोदर बन गए ।

दामोदर का मतलब होता है ……बंधा हुआ ब्रह्म ……….

तात ! अद्भुत नाम है ना ये ! दामोदर…………

मैया बृजरानी लाला को ऊखल से बांध कर चली गयीं रसोई में………क्यों की भूख लगी होगी ना इसे …….दिन भर से कुछ खाया भी तो नही है ……..रसोई में जाकर कुछ बनानें लगीं थीं ।

सामनें वृक्ष हैं….कन्हैया नें उन वृक्षों को देखा……अर्जुन नामके दो वृक्ष खड़े हैं नन्दालय के आँगन में…….कन्हैया नें देखा – और मुस्कुराये ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 60

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 60 )

!! “जब ब्रह्म डरनें लगा”- वात्सल्य की एक झाँकी !!


तात ! श्रीकृष्णावतार द्वापर के अंत और कलियुग के आगमन पर हुआ था ……….हर युग में भगवतभक्त अनन्त संख्या में मिल जायेगें ……पर कलियुग में ?

उद्धव, विदुर जी को “श्रीकृष्णचरितामृतम्” सुनाते हुए ये बात बोले थे ।

यमुना के तट पर , कालिन्दी के कूल पर …….शीतल वयार चल रही है ……वहीँ बैठे विदुर जी अपनें आराध्य श्रीकृष्णचन्द्र जु की दिव्य कथा सुन रहे हैं……और बड़े आनन्दित हैं ।

मैया बृजरानी भाग रही हैं अपनें सुत कन्हैया के पीछे ……..उपद्रव भी तो आज सीमा पार कर गयी थी ………उफ़ ! ऐसा भी कोई करता है …….मटकी एक फोड़ी होती तो चलो कोई बात न थी ….पर भण्डार के जितनें मटके थे सब फोड़ दिए !………उसका माखन भी बन्दरों और ग्वालों को लुटा दिया…….और अब भाग रहे हैं कन्हैया ।

पीछे छड़ी लेकर यशोदा दौड़ रही हैं…………

आज तक बृजेश्वरी क्यों दौड़ीं होंगीं ? बृज की महारानी हैं ये …”बृजेश्वरी” सब कहते हैं इन्हें , पर आज – चोटी ढीली हो गयी है ……मुख लाल हो गया है दौड़ते हुए…..अब तो पसीनें भी आने लगे हैं ।

लगभग हाँफनें लगीं थीं बृजरानी ।

आगे कन्हैया दौड़ रहे हैं ……….चपल उनके चरण ………गोल गोल घूमते हैं ……..फिर टेढ़े मेढ़े भाग रहे हैं ……….बेचारी बृजरानी कहाँ तक भागे इसके पीछे …….ये तो अद्भुत कुशल है भागनें में ………।

थक गयीं ………..बुरी तरह से थक गयीं मैया ………….

सुस्तानें के लिये बैठना ही पड़ा मैया को ……….हाँफ रही हैं …….

जो भी देख रहा था इस दृश्य को सब को दया आरही थी बृजरानी के ऊपर ……तो क्या कन्हैया को दया नही आवेगी ?

पकड़ ले मैया ! आ ! पकड़ !

कन्हैया चिढानें लगे थे अपनी मैया को ।

गर्मी के कारण सिर चकरानें लगा था मैया का …………

तभी उस स्थिति में बृजरानी को मिट्टी खानें का प्रसंग स्मरण हो आया ……..और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसके मुँह में मुझे दीखे थे ये भी तत्क्षण स्मृति में आगया ।

सामनें चिढ़ा रहे कन्हैया “नारायण” दिखाई देनें लगे ……….

पर मन में सोच रही हैं बृजरानी ………..तो क्या हुआ अगर ये नारायण है तो ! हो तो हो ……..मेरा पुत्र बनकर आया है तो उपद्रव का दण्ड इसे मिलेगा ही ………हाँ ये पक्का है ।

बृजरानी उठीं ………सामनें देखा, कन्हैया अंगूठा दिखा रहे हैं …….पर डरे हुए भी हैं ………कि जाना तो मैया के पास ही है ……….और जब जायेंगे तो पीटेगी ये …..और अच्छे से पीटेगी ।

बृजरानी बोलीं ………आजा ! आ मेरे पास आ ! लाला ! आ ।

ना ! तू मारेगी ………कन्हैया बोले ।

ना मारूँगी ! सच ! तू आ तो जा ……तेरी पूजा करूंगी …..आरती उतारूंगी …..आ ! आजा ! मैया आगे बढ़ रही हैं ये कहते हुए ।

पर तेरे हाथ में छड़ी है याकुं देख के मोय डर लगे ! कन्हैया बोले ।

लाला ! या छड़ी ते कहा डरनों…….ले ! मैने फेंक दियो …….

ऐसा कहते हुये बृजरानी नें अपनें हाथ की छड़ी फेंक दी ।

उद्धव प्रसन्नता में बोले ………तात ! जीव के हाथ में अहंकार रूपी छड़ी जब तक है ….तब तक परमात्मा कहाँ हाथ आवे ?

उद्धव ! क्या कन्हैया फिर हाथ में आये बृजरानी जु के ?

विदुर जी नें ये प्रश्न किया ।

नही ……..अभी भी भागनें में लगे हुए हैं ……………

भगवत्तत्व का बोध हुआ बृजरानी को ……..वो स्मृति आगयी …….ब्रह्माण्ड मुख में दीखा था ……वो स्मृति ।

“तुझे अपनें सतयुग के भक्तों की सौगन्ध है लाला ! “

मैया आवेश में बोलीं ।

सतयुग में तो मेरे बहुत भक्त हैं………..कन्हैया हँसे ।

तो फिर तुझे त्रेता युग के भक्तों की सौगन्ध है ……तू मेरे हाथ आजा ।

ना ! मैया ! त्रेता युग में भी मेरे भतेरे भक्त हैं……कन्हैया सहज ही रहे ।

द्वापर के समस्त भक्तन की सौगन्ध है तुझे ……….अब तो आजा !

मैया बोलीं, कसम देकर ।

पर कन्हैया नही आये ………कन्हैया नें सोचा द्वापर में भी मेरे बहुत भक्त हैं ।

“तुझे कलियुग के भक्तों की सौगन्ध है”……मैया के ये कहते ही , रुक गए कन्हैया……सजल नेत्र हो गए कन्हैया के…….

कलियुग में तो मेरे बहुत कम भक्त हैं……..भक्तों की संख्या कम है कलियुग में…….फिर उनकी सौगन्ध ? मैं कैसे टालूँ !

खड़े रहे कलियुग के भक्तों का स्मरण करते हुए कन्हैया …..आँखें बन्दकर ली थीं उस समय …………..

फिर उसी समय बृजरानी को………भगवतभाव की विस्मृति भी हो गयी ……सामनें पुत्र ही दीखा …..कोई भगवान नही ……बस ….वो दौड़ीं ………और धम्म् से जाकर पकड़ लिया…………

दो थप्पड़ पहले ही लगा दिए ………रो गए कन्हैया ।

करेगा ऊधम ? मचायेगा उपद्रव ?

कान पकड़ रही हैं ………गाल में थप्पड़ मार रही हैं…….क्रोध से भर गयी थीं बृजरानी आज……..चल ! बताउंगी मैं आज तुझे ।

गोपियां आगयीं नन्दालय के आँगन में……….कन्हैया को पीट रही हैं मैया यशोदा …………और हिलकियों से रो रहे हैं कन्हैया ………छड़ी दिखातीं हैं तो काँप जाते हैं एक अपराधी की तरह …………

मत मार ! बृजरानी ! “तेरो कठिन हियो री माई” ।

कैसा कठोर हृदय पाया है री बृजरानी ! मत मार अपनें लाला को …….

देख कितना कोमल है ये …..मत मार ! देख ! कैसे रो रहा है ……तुझे दया नही आरही ? बूढी गोपियाँ समझा रही हैं ।

हाँ नही आरही मुझे दया ! और तुम कौन होती हो ये बोलनें वाली …..कल तक तुम्ही आकर कहती थीं ना ……….कि तेरा लाला चोर है ….माखन चुराता है ………..फिर आज क्या होगया ? बोलो !

बृजरानी सच में आज बहुत क्रोधित हैं………..

कन्हैया बारबार कह रहे हैं ……..मत मार ! तू मुझे मत मार ! आँखों का काजल बह रहा है कपोलों में……….डर रहे हैं !

तात ! आँखें बन्द करो ……और इस झाँकी का ध्यान करो ………

ब्रह्मा से ये डरता नही है ………महाकाल इससे डरते हैं ………..पर ये एक सामान्य गोप पत्नी से डर रहा है !……..आहा ! कान पकड़े हैं ब्रह्म के इस नन्दगेहनी नें ………….नयन सभीत हैं इसके ।

उद्धव इतना बोलकर स्वयं ध्यान करनें लग गए थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 59

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 59 )

!! अहो ! जब “ब्रह्म” को पीटनें भागीं यशोदा !!


मैं वास्तु देवता !

…….नन्दमहल को पाकर मेरे भाग्य से देवता ही क्यों स्वयं विधाता भी ईर्ष्या करनें लगे हैं ।

उस दिन मैं था ………..मैने दर्शन किये उस लीला के ………..जब क्रोध में आकर नन्दनन्दन नें मटकी फोड़ दी थी ।

मैने सब देखा ……….मैं अपनें आपको बहुत भाग्य शाली मानता हूँ ……मानता नही …….”हूँ” ।

ब्रह्म , शिशु रूप में मेरे सामनें थे…………देवताओं की छोडो बड़े बड़े सिद्धात्मा भी इनकी एक छलक के लिए पागल हैं ……….कन्दराओं में , हिमालयों में हजारों वर्षों से तप कर रहे हैं…………पर ब्रह्म की अनुभूति उन्हें हुयी नही ……….मैं तो एक सामान्य वास्तु देवता हूँ ……मैं तो धन्य हो गया ……..मैं तो कृतकृत्य हो गया ……..मेरे सामनें नीलमणी दीखते हैं ………बाल चापल्य लीला करते हैं ……..और मैं उन्हें देखकर आनन्दित होता हूँ ……..अहो !

विदुर जी को उद्धव ये सब सुना रहे हैं ।

उस दिन वास्तु देवता नें ही कन्हैया के कान में कह दिया था ………

हे यशोदा के नीलमणी ! आपनें बहुत बड़ा अपराध कर दिया ……ये क्या किया ? अब झूठे आँसुओं से कुछ होनें वाला नही है ……..परदादी की मटकी थी ये ……….इस खानदान की सबसे पुरानी मटकी थी ये ………तुमनें तोड़ दी ।

डर गए कन्हैया ………..मैं वास्तुदेवता ………….उस रूप को देखकर मुझे बड़ा आनन्द आया ……काल जिससे डरता है ………..वो नन्दलाल आज यशोदा से डर रहा था ………रोना बन्द कर दिया ।

धरती में देखनें लगे कन्हैया …….मटकी फोड़ दी थी …….उसके टुकड़े चारों ओर बिखरे हुए थे ।

“अब तो मैया पीटेगी”………..आँखों में भय था ।

बचाव तो किया जाए……….पर कैसे ?

स्वयं ही सोच रहे हैं…….कुछ देर खड़े सोचते रहे मोरमुकुटी ।

फिर धीरे धीरे सामनें की ओर बढ़ चले………सामनें भण्डार घर था …….वहाँ कई माखन की मटकियाँ रखी हुयी थीं ……..द्वार खोला ……..पहली बार इस भण्डार में आये थे……..भीतर माखन से भरी मटकियाँ दीखीं ………कन्हैया तो खुश………..

माखन इतना रखा हुआ है यहाँ………….

ऊखल में चढ़ गए……..खिड़कियाँ खोल दीं ………

अब खिड़कियों के खुलते ही वानर समाज सब आगया …..वृक्षों में चढ़ कर खिड़कियों से देख रहे हैं बन्दर………तभी मनसुख इत्यादि ग्वाल सखा भी आगये …….उन्होंने भी देखा कि खिड़कियों में बन्दरों का उत्पात है……..माखन खा रहे हैं……..पर जैसे ही वहाँ गए …….तो मनसुख बोला ……उत्पात तो हमारे सखा नें मचा रखा है ।

खाओ ! खाओ माखन ! खूब खाओ ………भण्डार घर से माखन कि मटकी लेते हैं …..और बन्दरों को खिला रहे हैं कन्हैया ………माखन ही माखन हो गया है भण्डार में ……….

अब तो भण्डार से बाहर बहनें लगा था दही दूध ।

ग्वाल बाल भी कहाँ पीछे रहनें वाले थे………वो सब आगये ……….कन्हैया उन्हें देखकर और खुश हो गए ……..लो खाओ माखन ! खूब खाओ ! कन्हैया प्रसन्नता के कारण उछल रहे हैं आज ………बड़े प्रसन्न हैं आज कन्हैया ।

ये सब उपद्रव देखकर मुझे आनन्द तो आरहा था……अतिआनन्द …….पर अब तो मुझे भी डर लगनें लगा था कि बृजरानी कन्हैया को ताड़ना न दें……मैं कुछ कर भी नही पाउँगा वास्तुदेवता जो ठहरा ।

अब जाकर रसोई का कार्य पूरा हुआ था बृजरानी का ………..

कार्यपुरा करके जब आँगन में आईँ……..तब देखा – मटकी फूटी पड़ी है ……..उस मटकी का माखन आँगन में फ़ैल गया है ।

बृजरानी हँसी ……..मैने लाला को पटक दिया और रसोई में चली गयी इसलिये उसे क्रोध आया होगा…………बृजरानी नें ज्यादा गम्भीरता से इस बात को नही लिया था…….पर बृजरानी नें देखा , इधर उधर देखा ….किन्तु कन्हैया है कहाँ ?

वो थोडा डर भी गयीं ………कि मटकी फोड़कर वो गया कहाँ ?

तभी दूध और दही की धारा आती हुई दिखाई दी बृजरानी को ।

ये तो भण्डार से आरही है ……..तो क्या मेरा लाला भण्डार में पहुँच गया !……..बृजरानी गयीं भण्डार में …………

द्वार खुला है……….भीतर गयीं ……….तो वहाँ का दृश्य देखते ही क्रोध से भर गयीं ।

…….पर कन्हैया को कुछ भी भान नही है …….वो अपनें वानरों को और सखाओ को माखन लुटा रहे हैं ……और चिल्ला रहे हैं …………

भीतर का दृश्य बृजरानी नें देखा ………..माखन की सारी मटकियाँ फोड़ दी हैं कन्हैया नें……चारों ओर बस माखन ही माखन फैला हुआ है ।

क्रोध के कारण पहले बृजरानी बाहर आईँ ………गैया को मारनें वाली एक छड़ी वहीँ पड़ी हुयी थी ……उसे हाथ में उठा लिया ।

तात ! वास्तुदेवता स्वयं थरथर काँप उठे थे जब बृजरानी नें कन्हैया को पीटने के लिये छड़ी उठाई ………काल देवता स्वयं डर गए थे जब कन्हैया को पीटनें के लिये मैया नें छड़ी उठाई ……….

महालक्ष्मी काँप उठी थीं …………जब कन्हैया को पीटनें के लिये मैया नें छड़ी उठाई थी……….ओह ! अब क्या होगा ? क्यों की क्रोध से बृजरानी का मुखमण्डल लाल हो गया था ।

अपनें पीछे छड़ी को छुपाये मैया भण्डार घर में प्रवेश करनें लगी …….दवे पाँव ….ताकि लाला को पकड़ सके ……….

पर मनसुख नें देख लिया था ………वो चिल्लाया ….”.लाला ! देख तेरी मैया आरही है ” ।

कन्हैया नें पीछे मुड़कर देखा ……….दोनों हाथ पीछे हैं मैया के …….और वो चली आरही है ………मुख को देखा कन्हैया नें …….समझ गए कि आज तो “पिटेंगे”…………….खिड़की से कूदे कन्हैया ……और भागे – जोर लगाकर ।

बृजरानी भण्डार घर से बाहर आईँ ………और कन्हैया के पीछे दौड़ीं ।

स्थूल शरीर मैया का ………..और पाँचवर्ष के कन्हैया !

रुक ! मैं तुझे आज छोडूंगी नही ………..भाग के कहाँ जाएगा तू !

हद्द कर दी तेनें आज ………..साँस फूल रही है मैया की …….क्यों की भाग रही हैं लाला के पीछे ………

अब तो पसीनें आगये मैया के ……..बेणी ढीली हो गयी ……उसके फूल गिरनें लगे ………साँस तो रुकी पड़ी है आज सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की …….क्यों की ये पहली घटना है ……..जो ब्रह्म को ताड़ना देनें के लिये बृजरानी दौड़ रही हैं ……अहो ! तात !

उद्धव आज इतना ही बोले थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 58

Important

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 58 )

!! जब कन्हैया नें क्रोध में मटकी फोड़ी…!!


कन्हैया अपनी मैया की गोद में बैठकर “स्नेह रस” का पान कर रहे हैं ।

मैया, “दर्शन रस” का पान करते हुए मुग्ध हैं………

देवता तो अमृत का पान करके तृप्त हो गए ……..पर उस अमृत में ये रस कहाँ था…….इस अमृत में तो विशुद्ध वात्सल्य का भरपूर रस मिला हुआ है…..तभी तो ब्रह्म, यशोदा के वक्ष से निकल रहे दूध को पीते हुए भी अघाते नही हैं ।

अब प्रसन्न हैं ………अत्यधिक आनन्दित हैं ……क्यों की मैया का ध्यान अब पूर्णरूप से कन्हैया पर ही है ……..

अभी तक चिड़चिड़े से थे कन्हैया ………कारण ?

कारण यही कि…..मैया का ध्यान लाला पर नही था ….माखन पर था, …माखन निकालनें पर था ।

पर अब ? अब तो पूर्णरूप से लाला में ही ध्यान है …….

दूध पी रहे हैं कन्हैया……..बीच बीच में ……..स्तनाग्र से मुख हटाकर अपनी मैया को देखते हैं ………दूध मुख में भरा हुआ है ……तभी हँसी छूट पड़ती है और मैया के मुखमण्डल में वो दूध फैल जाता है ।

दुष्ट !

बड़े प्यार से कहते हुये कपोल में हल्की चपत लगा देती हैं ।

खिलखिलाकर फिर हँस पड़ते हैं कन्हैया ……….

पीले दूध लाला ! ऐसे हँस मत…….नही तो दूध कण्ठ में अटक जाएगा….मैया को हर तरह से सुरक्षा करनी है अपनें लाला की ।

कन्हैया फिर दूध पीनें लगे………पर बीच बीच में फिर खिलखिला उठते हैं……..जब स्तनाग्र से मुँह हटाकर मैया की ओर देखते हुए …….”नही, ….मारूँगी अब” ……….मैया समझ जाती है कि मुँह में दूध भर लिया है …..और अब मेरे मुँह में फैलायेगा ।

तब लाला हँसते हुए उस मुँह के दूध को वापस निगल लेते हैं …….पर निगलते समय दूध कण्ठ में अटक जाता है ……और कन्हैया खांसनें लग जाते हैं……मैया घबडा जाती है…..उठाकर पीठ में थपथपी देती हैं ।

कन्हैया फिर प्रसन्न हो जाते…….और दूध पीनें लगते हैं ।

पर तभी –

मैया नें एकाएक कन्हैया को धरती पर रख दिया और भागी रसोई की ओर…….उद्धव नें विदुर जी को कहा ।

पर क्यों ? विदुर जी नें पूछा ।

रसोई में दूध बैठाकर आईँ थीं बृजरानी…….और वो दूध उफ़न गया था …….इसलिये भागीं मैया……..उद्धव नें कहा ।

नही नही तात विदुर जी ! आप ऐसा मत सोचना कि …….कन्हैया से ज्यादा ममता मैया की दूध पर है ……नही ऐसा नही है ।

उद्धव रुके कुछ देर के लिये……..फिर बोले – तात ! प्रेम की गति बड़ी अटपटी है…….टेढ़ी मेढ़ी गैल है ये प्रेम की ।

तात ! कभी कभी प्रियतम की प्रिय वस्तु प्रियतम से भी ज्यादा प्यारी लगनें लगती है…….उसमें भी अगर “प्रिय” के खानें की वस्तु हो …….तब तो उसका प्रियतम से भी ज्यादा ध्यान सम्भाल किया जाता है ……..ये प्रेम का अनूठा प्रसंग है……..उद्धव नें कहा ।

तात ! ये सुरभि गाय का दूध था जो रसोई में आँच पर बृजरानी बिठाकर आईँ थीं…….मैया यशोदा का दूध पीनें के पश्चात्……..अगर किसी गाय का दूध कन्हैया पीते थे…..तो वो सुरभि गाय का दूध ही था……..मैया अगर न जातीं कन्हैया को छोड़कर तो वो दूध उफ़न गया था पूरा फैल जाता…..कन्हैया फिर किसका दूध पीते ? इसलिये कन्हैया के लिये ही कन्हैया को छोड़कर मैया गयीं रसोई में ।

पर – बालक ये सहन नही कर सकता…..बालक सब सह लेगा ….पर अपनी मैया का नजरअंदाज करना, ये उससे सहन नही होता ।

बस – कन्हैया अकेले धरती पर पड़े हैं……बृजरानी चली गयीं हैं दौड़ती हुयी दूध के पास, रसोई में ।

अब तो कन्हैया को क्रोध आया……और क्रोध भी बड़े जोर का आया …….लाल लाल नेत्र हो गए ….. अरुण अधर फड़कनें लगे उनके ।

नेत्रों में भी जल भर आये अब ………..भृकुटी टेढ़ी हो गयी ………

इधर उधर देखनें लगे ……………ये कैसे हो गया ? मैया नें मुझे कैसे पटक दिया और चली गयी दूध के पास ?

“दूध प्यारो है , पूत प्यारो नही है मैया कूँ”………..बस क्रोध और बढ़ा ये सोचकर ………..

इधर उधर दृष्टि घुमाए जा रहे हैं ………..तभी सामनें वही मटकी दीखी ……जिसमें से माखन अब निकलनें ही वाला था …..मैया, अभी मथानी जिसकी चला रही थीं ……….

बस – उसके पास गए कन्हैया ………….मटकी को हिलाया …..पर मटकी हिली नही ………बड़ी कोशिश की ……..कि मटकी को गिरा दिया जाय …और माखन फैला दिया जाए ……पर नही …..कुछ न हो सका ।

क्रोध से भरे हुए हैं कन्हैया ।

कन्हैया को भी क्रोध आता है ? विदुर जी नें सहजता में पूछा ।

उद्धव हँसे ……क्रोध से ही तो ये प्रलय करता है सृष्टी का ।

तात ! उसी समय सामनें एक लोढ़ी ( पत्थर का टुकड़ा ) दीखा ……वो बड़ा था …….कन्हैया उसे जैसे तैसे ले आये …….और ऊपर से मटकी में जोर से मार दिया ……….मटकी फूट गयी ……..माखन फ़ैल गया आँगन में ……………

मटकी फूटी ……..तो डर गए कन्हैया …………मैया की ओर , रसोई घर की ओर देखनें लगे ………..पूरा माखन फ़ैल गया था आँगन में ………

कन्हैया सोचनें लगे …….अब तो पीटेगी मैया !

तो करें क्या ?

उद्धव बोले …………रोनें लगे का कन्हैया …………सच में नही तात ! झूठे अश्रु लगाकर रोनें लगे …………….मृषाश्रु ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 57

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 57 )

!! “मेरो व्याह कराय दे मैया”- अटपटी लीला !!


तभी –

कन्हैया आँखें मलते हुए, दधिमन्थन करती हुई अपनी मैया बृजरानी के पीछे जाकर खड़े हो गए थे ।

नित्य, बृजेश्वरी ही जगाती थीं कन्हैया को …………पर आज इनका ध्यान माखन निकालनें पर था ……..और माखन निकालनें में इतनी तन्मय हो गयी कि ……..दिन भी निकल आया……..

आज स्वयं ही जगे थे नन्दलाल ………पहले कुछ देर ” ऊँ ऊँ ऊँ” करके रोये …….कुछ देर “मैया मैया” कहकर भी देख लिया …….पर जब देखा कि आज कोई नही है पास में …..न कोई सुन ही रहा है ……….तो उन्होंने रोना छोड़ दिया ………स्वयं ही उतरे पलंग से ……….और धीरे धीरे आँखों को मलते हुये आगये थे मैया के पास ।

पीछे से बृजरानी के गले में अपना एक हाथ रखा था …..और दूसरा हाथ उनकी ठोढ़ी में रखते हुए पूछा ……….”तू तो आजकल मेरी बात भी नही सुनती मैया ! ”

पीछे मुड़कर देखा मैया नें……फिर हँसीं……आगे धीरे से खींचा अपनें लाल को…….फिर बोलीं……बस, एक घड़ी भर रुक जा ……माखन आनें ही वाला है ऊपर…..इतना कहते हुए फिर दधिमन्थन करनें लगीं ।

“पर मुझे भूख लगी है”…….लाला इस बार चिल्लाये ।

पर आज मैया बस मुस्कुराई लाला की ओर देखकर ………हाँ एक बार मुख चूम लिया था ……….फिर मथानी चलानें लगी ।

कन्हैया भी कहाँ माननें वाले थे ……..इस बार तो मथानी को ही पकड़ लिया …………अब कोमल छोटे करों नें जब मथानी को रोक दी …..तब मैया में भी हिम्मत न रही कि मथानी को चला सके ।

लाला ! तुझे क्या चाहिये ? अच्छा बता तुझे क्या दूँ ?

गोद में बिठा लिया लाला को …….और बड़े प्रेम से पूछनें लगीं ।

माखन ! मटकी में हाथ डालते हुए बोले कन्हैया ।

हट्ट ! हाथ मत डाल इसमें…….मैया बृजरानी नें हाथ हटा दिया ।

फिर बोलीं – लाला ! बस …….कुछ देर और मथानी चलानें दे ……….माखन निकल आएगा तब खिलाऊँगी तुझे ………

न हीं …………….फिर जोर से चिल्लाये ।

अभी …….अभी चाहिये माखन ! अभी ………गोद से उठ गए कन्हैया ……..और धरती में उछलने लगे ……..”माखन चाहिये” ।

मटकी में देखा मैया नें ………….माखन ऊपर आनें ही वाला है अब तो ……बस दो तीन बार और चला लुंगी मथानी तो हो ही जाएगा ।

लाला ! ए मेरे लाला ! बस रुक जा ! कुछ देर के लिये रुक जा !

मना रही है मैया अपनें लाला को …………

पर लाला भी हठी है………..ये मानता ही नही जल्दी ।

मन्थन छोड़ दे …….मैया ! ये सब छोड़ दे ……मुझे माखन दे …….

मैया नें गोद में ले लिया……अब क्या करे ऐसे “हठी गोविन्दा” को, ……”लाला ! कल का माखन खा ले”…….मैया नें पुचकारते हुए कहा ।

नही ……..ये माखन ………मटकी की ओर दिखाते हुए बोले ।

हद्द है ………मथानी की रस्सी निकाल कर फेंक दी कन्हैया नें ।

मैया अब क्या करे…..”इतनी जिद्द तो तू कभी करता नही था ! मान ले ना बात को लाला !

“नही ….माखन ……..और इसी में से” ………फिर वही हठ ।

मैया बृजरानी नें लाला के कपोल में थपकी देते हुए कहा ……….ऐसे जिद्दी बनेगा ना, तो तेरा ब्याह भी नही होगा ।

मेरा ब्याह ? कन्हैया सोचनें लगे …………..

मैया ! ब्याह क्या होता है ? मासूम से कन्हैया पूछ रहे हैं ।

मैया क्या बोले ………तभी सामनें मोर और मोरनी दिखाई दिए ……जो आँगन में दाना चुगनें के लिये आगये थे ।

देख ……..ये मोर है ….और ये उसकी मोरनी है ……..ऐसे ही तेरा ब्याह होगा ना …..तो तेरी भी बहु आयेगी ………….

बड़े ध्यान से देखते रहे मोर और मोरनी को कन्हैया ……फिर बोले …..ये इसकी बहु है ?

हाँ …..ये इसकी बहु है ……….फिर कुछ सोचनें लगे ………..और फिर एकाएक गोद से उठकर खड़े हो गए धरती पर ।

मेरी बहु कहाँ है ? फिर दूसरा हठ शुरू ।

मैया हँसी ……..मैया को हँसते हुए देखा तो और गुस्सा आया लाला को ………गेंद की तरह मुँह फुला लिया …….टेढ़ी नजर से देख रहे हैं अपनी मैया को …….गुस्से में देख रहे हैं …….दोनों हाथों को कमर में रख लिया है ………ओ ! ओ मैया ! हँस मत, मुझे बता कि मेरी बहु कहाँ है ?

मैया इस छबि पर मुग्ध है…वारी जाऊँ लालन ! क्या छबि है तेरी….

पर कन्हैया गुस्से में हैं ……..”मेरी बहु कहाँ है ये बता ? “

“अभी तेरो ब्याह थोड़े ही भयो है” ……मैया नें कहा ।

तो मेरो ब्याह कराय दे ……..कन्हैया बोले ।

लाला की बातों को सुनकर, मैया हँस हँस के लोट पोट है रही है ।

अच्छा बता ! तुझे कैसी बहु चहिये ?

फिर लाला को खीचकर अपनी गोद में बिठाते हुए मैया नें पूछा ।

मुझे ? सोचनें लगे कन्हैया ……….फिर बोले …….छोटी सी ……छोटी सी बहु , मैया ! ।

कितनी छोटी सी ? मैया हँसते हुए पूछ रही हैं ।

पर कन्हैया गम्भीर होकर उत्तर दे रहे हैं –

इतनी छोटी सी की जब हम गैया चरावें जायो करें तब जेब में धरके ले जावें …….और वहाँ वा ते बतियामें …….।

मैया बोली ……….अरे ! तोय गुड़िया चहिये ?

नाय बहु चहिये ! कन्हाई फिर मचले ।

मैया बृजरानी समझ गयीं कि…..इसे भूख लगी है इसलिये ये चिड़चिड़ा हो गया है…..अपनी गोद में लेकर लाला को दूध पिलानें लगीं थीं ।

शेष चरित्र कल

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 56

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 56 )

!! आज – “मैया यशोदा के दर्शन कीजिये” !!


“विदुर उद्धव संवाद” के माध्यम से श्रीकृष्ण लीला का प्राकट्य यमुना पुलिन श्रीधाम वृन्दावन में हो रहा है …….दोनों ही परमभागवत हैं ….लीला रसिक हैं ……और जिनकी लीला ये सुन, सुना रहे हैं वो इनके सर्वस्व हैं ……यमुना का पुलिन भी आज आनन्दित है ………

जब उद्धव श्रीकृष्ण लीला का वर्णन करके सुनाते हैं…….तब अनगिनत पक्षी आकर उद्धव को घेर लेते हैं ……..कपि तो इधर उधर से फल तोड़कर ले आते, और इन दोनों महापुरुषों के सामनें रख देते हैं ।

मोर नृत्य करते हैं…….गर्मी ज्यादा हो जाए तो बादल ही छत्र बन जाते हैं, और बरस भी जाते हैं ।

आज प्रातः से ही उद्धव ध्यान मग्न हैं……. कन्हैया की लीला आज चल पड़ी है इनके हृदय में…….विदुर जी नें इस ध्यान से उद्धव को उठाया …….और बड़े प्रेम से बोले – उद्धव ! हमें भी उस लीलासिन्धु में अवगाहन करना है ……अकेले मत जाओ……..हम भी प्रतीक्षा में हैं ।

उद्धव नें नेत्र खोले…..प्रातः की वेला है…..सूर्योदय होनें वाला है ……विदुर जी को प्रणाम किया ……….कुछ समय लगा इन्हें बहिर्मुख होनें में ………जब सहज हुये तब इन्होनें कहना प्रारम्भ किया था ।

तात ! दर्शन करो मैया यशोदा के ……….क्यों की दर्शन करनें योग्य यही हैं …….ये सबसे बड़ी हैं ……इनसे बड़ा कौन होगा ?

उद्धव परमशान्त हैं आज ।

मैं पूर्व में भी कह चुका हूँ कि …..ब्रह्म की जो माँ हैं ………..उनसे बड़ा कौन होगा ।

सच कह रहे हो उद्धव ! अहो ! ऐसा अलभ्य लाभ बृजरानी को प्राप्त हो रहा है ! ब्रह्माण्ड का दर्शन मुख में…… ब्रह्म की एक झलक के लिए अनन्त काल से ऋषि मुनि तप कर रहे हैं …….उस ब्रह्म को गोद में बिठाकर खिला रही हैं ये ब्रजेश्वरी ………उसे पुचकार रही हैं …..उसे चूम रही हैं ………उसकी मनुहार कर रही हैं ………इतना ही नही ताड़ना भी दे रही हैं ……..आहा ! विदुर जी आनन्दित हो उठते हैं ।

उद्धव मुस्कुराये – बस, इतनें में ही आश्चर्यचकित हो गए तात ?

गौ को बाँधनें वाली रस्सी से बाँधा है यशोदा नें , अपनें लाला को ।

ये सुनकर विदुर जी के नेत्रों से आनन्दाश्रु बहनें लगे ……

.क्या ब्रह्म बंध गया ?

हँसे उद्धव …..”ये प्रेम की रज्जु से बन्धनें ही तो आया है इस गोकुल में ।”

ओह ! ……मुझे ले चलो गोकुल उद्धव ! मैं उसी नन्दालय में जाना चाहता हूँ …….और ब्रजेश्वरी के सामनें ठुमक ठुमक चलते हुए उस “शिशु ब्रह्म” को देखना चाहता हूँ ………जो प्रेम रस का प्यासा है ……हाँ उद्धव ! वो प्रेम को पीनें ही आया है ………इसलिये अवतार लिया है इसनें ……..नही तो, और कोई कारण मुझे तो समझ में नही आता ।

विदुर जी की बातें सुनकर उद्धव बहुत प्रसन्न हुए ………..

चलिये – तात ! उन नन्दनन्दन की मैया यशोदा के दर्शन कीजिये –

गोकुल है ये ……….बृज क्षेत्र का गोकुल गाँव ।

यहाँ सब ब्रह्म हैं …….कन्हैया ही ब्रह्म है ऐसा नही ……..ये बृज भी ब्रह्म है ……क्यों की बृज शब्द का अर्थ ही होता है …..जो व्यापक है …….जो बृज का अर्थ है वही ब्रह्म का भी अर्थ है ……जो व्यापक है वो ब्रह्म, जो व्यापक है वो बृज ……….तो ये स्थान भी ब्रह्म है …….स्वयं खेल रहे ….लीला कर रहे कन्हैया परब्रह्म हैं …….ये कार्तिक का महीना चल रहा है …….ये जो लीला मैं आपको सुनानें जा रहा हूँ ये कार्तिक मास की लीला है …इस कार्तिक मास को “दामोदर मास” भी कहते हैं …….उद्धव बोलते हुए कुछ देर के लिए रुके ……..फिर बोले …..लीला स्वयं ब्रह्म है ………..इसलिये जैसे ब्रह्म का अवतार विशेष समय में होता है …….ऐसे ही लीला का अवतरण भी विशेष काल में ही होता है तात ! ।

स्थान ब्रह्म, काल ब्रह्म, लीला ब्रह्म, लीलायित होनें वाले कन्हैया परब्रह्म ………यहाँ सब वही हैं……सब वही ……।

उद्धव के हृदय में अब आनन्द प्रवाहित होंने लगा था ।

यशोदा मैया में ऐसी क्या विशेषता है ?

तो पहले दर्शन कीजिये…….आज केवल मैया के ही दर्शन करनें हैं …….इधर उधर मत देखना तात ! कन्हैया को आज मत खोजना…..केवल ध्यान करना मैया यशोदा का ।

आज कुछ जल्दी ही उठ गयीं हैं………कई दिनों से परेशान थीं ……चिन्तन करते करते ……..चिन्ता करनें लगीं थीं ………

इनका एक नाम है “नन्दगेहनी”….”आनन्दगेहनी”……. जो आनन्दित है …..सदैव आनन्द में ही रहता है ……आनन्द, जिसके घर की बात है ….वो आज चिन्ता कर उठीं……..कि – मेरा बालक मेरे घर माखन क्यों नही खाता ! गोपियों के यहाँ जाकर क्यों खाता है ?

जहाँ प्रेम होता है ……वहाँ चिन्ता होती ही है…….और जहाँ चिन्ता होती है ……मन भी वहीँ होता है……..उद्धव बोले ।

ओह ! अब समझीं मैं …….मेरे घर का माखन तो दास दासियाँ निकालती हैं……….पर गोपियाँ तो अपनें घर में बड़े प्रेम से स्वयं ही माखन निकालती हैं…….तो मेरे लाल को …….

बृजरानी समझ गयीं …….सब समझ गयीं ………..कि लाला के लिये अब स्वयं ही माखन निकालना होगा ।

इसलिये आज कुछ जल्दी ही उठ गयीं हैं ये ।

स्नान किया है …….श्रृंगार किया है …….इत्र फुलेल लगाया है ……वेणी बनाई है ……उसमें गजरा लगाया है …………

इतना श्रृंगार क्यों ? विदुर जी नें पूछा ।

ये श्रृंगार अपनें लिये नही ……….अपनें लाला के लिये ……..शरीर से सुगन्ध आये …….क्यों की लाला बैठेगा गोद में ………इत्र फुलेल इसीलिये लगाया है ।

बेणी बनाई ……….उसमें गजरा लगाया है ……..

इसलिये कि कन्हैया जब कुछ रोष प्रकट करता है तो सबसे पहले मैया की चोटी ही खींचता है……..चोटी में फूल लगे हों तो इसे और अच्छा लगता है……….

अपनें आपको आईने में देखती हैं………कुछ मोटी हो गयी हैं आज कल ……हो नही गयी हैं ……ये मोटी बनी हैं……..उद्धव बोले ।

क्यों ? विदुर जी नें पूछा ।

इसलिये कि……..लाला जब दौड़ता आएगा …….गले लगनें के लिये …..तब मेरी हड्डियाँ लाला को चुभें नहीं……..

नितम्ब बढ़ा किया है यशोदा मैया नें……..तात ! इसलिये कि …..मैया के पीछे गले में दोनों हाथ डालकर कन्हैया झूलता है…….उस समय लाल अपनें चरण कहाँ रखे ……तो नितम्ब बड़ा कर लिया ।

सज धज कर अब तैयार हो गयीं …………

बाहर आयीं …….तो देखा दास दासी सब लगे हैं ……….

सबसे पहले तो इन सब को हटाया ……और अन्य कामों में लगा दिया ……फिर माखन की मटकी में दही भरकर बैठ गयीं ……….

आराम से बैठीं हैं …….और रईं चलानें लगीं ।

अपनें हाथों से पद्मगन्धा नामक गाय का दूध ये बृजरानी स्वयं दुहति हैं ………उसी को रात में जमा देतीं…….उसी जमें हुए दही का ये अभी मन्थन कर रही हैं ।

रईं तेज चलानें के कारण अब बेणी में लगे फूल गिरनें लगे थे …….और गिर रहे थे नन्दरानी के चरणों में ……..

पता है तात ! पुष्प भी सोचनें लगे …….अहो ! ब्रह्म की माँ हैं ये …….हम इनके सिर में रहनें लायक कहाँ ?

रईं को तेज चलानें के कारण उनके हाथों में जो चूड़ियाँ थीं …..वो बजनें लगी थीं ………उससे मधुर मधुर ध्वनि वातावरण में फैलनें लगी ।

कृष्ण कृष्ण कृष्ण ! कृष्ण कृष्ण कृष्ण !

ऐसा मधुर मधुर स्वर में गान कर रही हैं यशोदा मैया………।

तात ! “कृष्ण” कहते ही मैया के हृदय से वात्सल्य फूट पड़ा था ……वक्ष से दूध की धार बह चली थी ………..पर मैया को सुध नही है कुछ भी …..वो बस लगातार रईं को चलाये जा रही हैं ।

बृजरानी की दोनों भुजाएँ कमलनाल के समान सुन्दर लग रही थीं …….

वो कभी मुस्कुरातीं तो कभी गम्भीर हो जाती थीं ………

मुस्कुराती तो तब थीं ……जब कन्हैया के बाल चापल्य लीलाओं का स्मरण करतीं ……..उस समय खो जातीं ……..दधि मन्थन करना भी भूल जातीं…….फिर जब देह भान होता ………तब गम्भीर हो, फिर रईं चलानें लगतीं ………..कहीं मेरा लाला जग न जाए ………और जगेगा तो माखन मागेगा …….जगते ही माखन चाहिये उसे …..इसलिये अब ये शीघ्र कर रही हैं…………परिश्रम ज्यादा हो गया …….स्थूल शरीर भी हैं इनका………इसलिये पसीनें बह रहे हैं ।

तभी –

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 55

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 55 )

!! “आओ प्यारे” – गोकुल की एक कहानी !!


प्रभावती की बहु आरही थी……व्याह हुए तो वर्षों हो गए थे ……पर गौना कल ही हुआ था ………बड़ी धूमधाम से गौना करवा लाया था ये प्रभावती का बेटा……….

पर पता नही क्यों बड़ी डरी हुयी थी प्रभावती …………

किससे ?

अजी ! यह गोकुल है …..यहाँ कन्हैया के सिवा और कोई किससे डरता है ? उसकी नजर जिस पर पड़ी ……वो तो गया काम से ।

“तू कुछ मत करियो! सब मैं करूंगी” …….सास प्रभावती नें अपनी बहु को घर में आते ही समझाया था ।

बहु सोचती रही कि मेरी माँ नें मुझे कहा था – ससुराल में काम करना ……सास की सेवा करना ……..सास का हाथ बटाना …….पर यहाँ सासू जी तो कुछ और ही कह रही हैं………ठीक है …जैसा सासू माँ कहें ।

“सुन बहु ! चाहे कुछ भी हो जाए ………..साँझ के समय दरवाजा मत खोलियो”………..ये बात मुख्य कही थी सास नें ।

क्यों की साँझ के समय ही वो नन्दनन्दन अपनें सखाओं के साथ गोकुल में निकलता था ………..इसलिये सास बोली …….शाम के समय द्वार मत खोलना ।

क्यों ? बहु नें इतना तो पूछ ही लिया ।

बस बहु ! इतना समझ ले कि हवा खराब है या गोकुल की ……

और मैं नही चाहती कि वो हवा तुझे लगे ।

प्रभावती नें अच्छे से समझा दिया था अपनी बहु को ।

शाम के समय सब गोष्ठ में ही रहते थे…गोप वृन्द सब ……….प्रभावती भी इधर उधर जाती थी……..घर के भीतर बहु …….वो भोजन बनाती……..पर शाम होते ही खिड़कियाँ दरवाजा सब बन्द…….ताकि गोकुल की हवा न घुसे घर में ।

तात ! ये वो हवा है …..जिसे बड़े बड़े योगिन्द्र मुनींद्र चाहते हैं ……पर मिलती नही है…..किन्तु देखो यहाँ …..इन महाभागा गोपियों को ।

आज पाँच महिनें हो गए इस नई बहु के गोकुल आये हुए ।

शाम होते ही ये द्वार झरोखे सब बन्द कर लेती थी ………

आज शाम हुई……..झरोखे तो बन्द कर लिए………पर जैसे ही द्वार बन्द करनें के लिये गयी ………….

रुक गयी ………मन में आया कौन सी हवा है जिसके छूते ही “कुछ” हो जाता है …….ऐसा क्या होता है ? बहु सोच ही रही थी …..द्वार पर खड़ी ही थी अकेली….कि ……..तभी –

मोर मुकुट धारी …….पीताम्बर पहनें …घुँघराले बाल…….नीलवर्ण ………..काँछनी बान्धे ……..सखाओं के साथ हँसते , खिलखिलाते सामनें से आरहे थे ……….सच में हवा पागल करनें वाली थी ……बहू तो सब कुछ भूल गयी …….द्वार तो पूरा खुल गया ………..वो अपलक देखती ……..देह भान ही भूला बैठी …………कन्हैया को छूती हुयी हवा जब चली …..और उसी हवा नें बहु को छू लिया ………….

फिर क्या था …….बहु के केश उड़नें लगे उसी हवा में ……..वो अपनी बाँहों को फैलाये – मुस्कुराती हुयी …….उन्मत्त सी कन्हैया को आलिंगन करनें के लिये दौड़ी – बोल उठी – “आओ प्यारे “

कन्हैया नें हवा के साथ बिजुरी और गिरा दी…….उफ़ ! मुस्कुरा दिए ।

कन्हैया तो इतना करके चल दिए…..पर इस बहु को “हवा” लग गयी ।

ये हँस रही है ……….ये मुस्कुरा रही है …..अकेले ……….द्वार पर खड़ी है ……..और बड़े प्रेम से अकेले ही बोले जा रही है …..आओ प्यारे ।

इसे सर्वत्र कन्हैया ही दिखाई दे रहा है………..इसे सर्वत्र वही मोरमुकुट धारी ही दिखाई दे रहा है ।

सारे भेद खतम हो गए हैं इस की दृष्टि के …….स्त्री हो या पुरुष सबमें ये कन्हैया को ही देख रही है …..अजी ! इसके आँखों की पुतरी ही बदल चुकी है ।

कुछ देर बाद प्रभावती घर में आयी ……….अंदर नृत्य कर रही है बहु ………द्वार खुला है ………..प्रभावती नें सोचा ……आज बहु नें द्वार बन्द क्यों नही किया …….भीतर गयी ……तो जैसे ही प्रभावती को आते हुए बहु ने देखा …….लजा गयी …….शरमा गयी ……..और दोनों बाँहों को फैलाकर बोल पड़ी………आओ प्यारे !

ये क्या कह रही है ! डर गयी प्रभावती ……..वो समझ गयी कि मैं जिस बात से डरती थी वही हुआ है …………..

वह भागी गोष्ठ की ओर ……….अपनें पति को लेनें ………..यानि उस बहु के ससुर जी को बुलानें………..

ससुर जी उठे और घर की ओर भागे…..कि बहु को “हवा” लग गयी ….

द्वार खोला ……..तो बहु भीतर बैठी थी ……….द्वार के खुलते ही वो उठ गयी ……और दौड़ पड़ी ……..ससुर जी आये घर में ……जैसे ही ससुर जी को देखा ……….बहु को तो ससुर में भी कन्हैया दिखाई देंने लगे ….

दोनों बाँहों को फैलाये ससुर जी को बड़े प्रेम से बोली………..

आओ प्यारे !

ससुर नें कहा ……मेरी बहु की तबियत खराब हो गयी है …….अब क्या करूँ ?

तभी देवर आया घर में………बहु फिर उठी…….उसे लगा मेरा कन्हैया आया है…….फिर दोनों बाँहों को फैलाये………

आओ प्यारे !

प्रभावती आँगन में बैठ कर रो रही है………मैने कहा था द्वार मत खोल ……इसनें मानी नही …… अब देखो इसकी हालत ।

कोई उपाय है क्या माँ ? उस बहु के पति नें पूछा ।

हाँ …….अब तो एक ही उपाय है ! ……ये कहते हुए प्रभावती नन्दालय की ओर चल पड़ी थी ।

मिल गए नन्दालय के आँगन में ही ………..ग्वाल सखाओं के साथ बैठे थे …..हँस रहे थे ठिठोली कर रहे थे कन्हैया ।

लालन ! चलो ना मेरे घर !

प्रभावती पहुँची कन्हैया के पास , और प्रार्थना करनें लगी ।

नहीं …..लाला ! मत जइयो या के घर ……..ये गोकुल में सबको कहती है …शाम को द्वार बन्द रखना…..क्यों की कन्हैया निकलता है ।

इसलिये मत जाना इसके यहाँ ।

लालन ! मेरी बहु नें तुमको देख लिया है …..वो उन्मादिनी हो उठी है …..मैं जानती हूँ इसकी दवा तुम ही हो ………..मेरे ऊपर कृपा करो और मेरे घर चलो ।

नही ………..मैं नही जाउंगो तेरी बहु के पास …………तू तो दरवज्जो बन्द करवा वे , है ना ? कन्हैया रिसाय के बोले थे ।

अब चलो ना ! मेरी प्रार्थना कूँ मान लेओ लालन !

अच्छा ! ठीक है – चल प्रभावती ।

इतना कहते हुए छोटे से कन्हैया चल पड़े उस प्रभावती के साथ ।

यहाँ तो भीड़ लगी है प्रभावती के आँगन में ………क्यों कि –

सबरे गोकुल में हल्ला मच गयो कि …..प्रभावती की बहु पागल है गयी ।

प्रभावती कन्हैया को लेकर आई ………..चलो कन्हैया ।

द्वार बन्द था …….भीतर बहु बैठी है …..अब किसी की हिम्मत नही है जो भीतर जाये ……..पर वो आनन्दित है ……वो बहु गा रही है कभी पैर थिरकनें लगते हैं उसके ………..

कन्हाई नें द्वार खोला……..वही सुगन्ध , वही हवा का झौंका……

बहु दौड़ी द्वार की ओर…….इधर कन्हैया दौड़े बहु की ओर ।

बहु दोनों बाहों को फैलाये दौड़ रही है……और बोल रही है –

आओ प्यारे !

कन्हैया भी दोनो भुजाओं को फैला कर दौड़ रहे हैं……और बोल रहे हैं –

आगयो प्यारी !

आहा ! जन्मों जन्मों की इस गुजरिया की प्यास आज बुझी थी…….

क्यों की उस कन्हैया नें अपनें बाहों में इसे भर लिया था ।

चौर जार शिखामणि………

ये चोरों के और जारों के शिरोमणि हैं……….

मैं नही…भगवान शंकर ऐसा कहते हैं….उद्धव नें हँसते हुए कहा ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 54

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 54 )

!! अहो भाग्यम् ! अहो भाग्यम् !!


तात ! भगवत्लीला का प्रयोजन मात्र इतना ही है कि ………जगत के प्रपञ्च का विस्मरण, और भगवान का निरन्तर स्मरण ।

उद्धव बोले ।

तात ! जहाँ भगवान ही स्वयं लीलानायक हों …..उस लीला की पूर्णता में भी भला कोई सन्देह है ।

लीला के प्रतीकार्थ निकाले जाते हैं ……..पर लीला का क्या प्रतीक ?

निराकार का साकार प्रतीक है……परोक्ष का प्रत्यक्ष प्रतीक है ….अज्ञात का ज्ञात प्रतीक होता है …….परन्तु जो सर्वात्मा है …..सर्वरूप है …..वही यहाँ लीलाधारी है ……..और मात्र लीलाधारी नही ……वह लीला भी है ………जैसे ज्ञानी लोग कहते हैं ना तात ! कि सुनार भी वही और सुवर्ण भी वही …….बनानें वाला भी वही और बननें वाला भी वही ………ऐसे ही यहाँ है ……..लीलाधारी भी कन्हैया ……और लीला भी कन्हैया ………आहा !

सब कुछ भुला दे वह है भगवत्लीला ……..संसार की विस्मृति करवा दे …..संसार के दुःखों को भुला दे ……उसे कहते हैं लीला ।

फिर कुछ सोच कर उद्धव बोले – तात ! इतना ही नही ……..लीला तो वह है जो भगवान के ऐश्वर्य को भी भुलाकर अपनत्व जगा दे भगवान से ।

ऐसा अपनत्व कि लगे …..ये तो यशोदा जी का ही नही …..मेरा भी लाला है…..ये मनसुख का ही नही ….मेरा भी सखा है ……..ये गोपियों का ही नही ..मेरा भी प्रियतम है …………भगवत्ता की भी जहाँ विस्मृति होनें लग जाए……हृदय में मात्र उसके प्रति प्रेम जागे……विशुद्ध प्रेम ।

उल्लसित रस का नाम होता है – लीला ……….इसे साधारण मत समझना तात ! ये तो भगवन्मय भगवद् – विलास है …….भगवत्सत्ता का आल्हाद है ………..उल्लास है …..उमंग है ………छलकता रस है ……..जिसे रसिक लोग पीते हैं……..और उन्मत्त रहते हैं ।

उद्धव आज आनन्दित हैं ………..कुछ ज्यादा ही आनन्दित हैं ।

तात ! चलिये मेरे साथ मानसिक रूप से गोकुल …और दर्शन कीजिये …..गोकुलचन्द्र जु का । गोकुल – जहाँ गौ रूपी इन्द्रियाँ विचरण करती हैं………पर जन्म जन्मों के स्वभाव वश …….ये गौ यानि इन्द्रियाँ घूम फिर कर उसी विषयों को ही भोगना चाहती हैं ………..

वहीँ – इन्हीं के मध्य …….उन्हीं विषयों में ……..निराकार नही साकार ….अचल नही…….क्यों की ये इन्द्रियाँ चंचल हैं ………..इसलिये ये अचल नही ….यहाँ चंचल बने हैं ……..क्यों की हाँकना है इन इन्द्रियां रूपी गायों को ……….।

विराट ब्रह्म नही है यहाँ ……यहाँ तो शिशु ब्रह्म है………मैया की गोद में छिपा बैठा है…….स्नेह की जहाँ धारा बह रही है …….वहीँ ये गोपाल भी बैठा है …तुम्हारे स्नेह दुग्ध को पीनें के लिये ।

वो भूखा है …वो प्यासा है ……प्रेम और भाव का भूखा प्यासा है……इसलिये तो ये सब लीलाएँ रचता है …….शिशु बनकर रोते हुए यशोदा के वक्ष से गिरते स्नेह दूध को पीनें के लिये मचल उठता है ………..जिसकी एक भृकुटी के भय से सातों समुद्र उछलनें लगते हैं ……..वही ब्रह्म यहाँ यशोदा के आगे रोता है ……..

जिसका भोजन ही सम्पूर्ण सृष्टी है …….जो कालों का भी महाकाल है …..मृत्यु जिसकी चटनी है ……..जो मौत को भी चाट जाता है ……वह ब्रह्म …..यहाँ माखन के लिये मचलता हुआ दिखाई देता है ।

जो एक फूँक मार दे तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रलय आजाये ……..वही यहाँ ग्वालों के साथ गेंद लेकर उछलता रहता है…..पर हार जाता है ।

वो जो मौत की भी मौत है………वह यहाँ इन साधारण सखाओं से हारता हुआ , रोता है………ग्वाल सखा इसे घोड़ा बनाते हैं …….और इसके ऊपर चढ़ जाते हैं ।

जिसके एक इशारे पर देव ग्रह नक्षत्र तारे सब नाचते हैं ……..वही इन अहीर की छोरियों के आगे माखन के लिये नाचता डोलता है ।

बृजरानी इसे थप्पड़ मार देती है……..ये रोनें के सिवा और कुछ कर नही सकता……फिर उठाकर पुचकारती है ……तो ये ब्रह्म ख़ुशी से झूम उठता है ……ये लीला है…….इसे कहते हैं लीला ।

मैने इसलिये कहा…..वो ब्रह्म भी तरसता है……..प्रेम के लिये ।

वो ब्रह्म भी तड़फता है प्रेम पानें के लिये ।

उफ़ ! ये लीला………..

बृजरानी जु ! गोबर चाहिये……..गोपी नें कहा ।

“ले जा”….बृजरानी नें भी कह दिया……और अन्य कामों में लग गयीं ।

गोबर का तो बहाना है …….गोपाल को देखनें आयी है ये गोपी ।

गोबर परात में भर लिया ……..और इधर उधर देखनें लगी ।

किसे देख रही है ? विदुर जी नें पूछा ।

किसे देखेगी ? अपनें गोपाल के सिवा ये लोग देखते ही किसे हैं ?

ये गोपाल है भी ऐसा कि …..जो दिल से इसे चाहे ये तुरन्त उसके सामनें हाजिर हो जाता है …….हो गए हाजिर !

गोपी ! का कर रही है तू ? वही मधुर बोली …….आहा ! कुछ देर तक तो देखती ही रही अपनें गोपाल को ………..

पर कन्हैया नें फिर पूछा ……”.का कर रही है बता तो दे भाभी ! “

उसे अब होश आया था………हाँ …..लालन ! एक काम करो …….

कि ये मेरी गोबर की परात उठा दो ।

इधर उधर देखकर कन्हैया भी बोल उठे………का देगी ?

एक परात उठा दो उसके बदले माखन को एक लौंदा दूंगी …….गोपी नें भी कह दिया ।

पर मैं तो भूल जाऊँ ! गिनती मोकूँ याद नही रहे है ।

तो लालन ! एक परात उठा दो …….तुम्हारे कपोल में गोबर का एक टीका लगा दूंगी……….तो तुमको याद भी रहेगा ।

हाँ …..ये ठीक है………कुछ देर सोचकर कन्हैया बोले ।

एक परात गोबर उठा दी कन्हैया नें ……….

आहा ! गोबर का एक टीका नन्दनन्दन के कपोल में ……….

दूसरी परात गोबर की… ….दूसरा टीका ………….

आवश्यकता नही है गोपी को गोबर की ……..पर कन्हैया के प्रति उसका अगाध स्नेह ………वह बारबार आरही है और गोबर ले जा रही है ……..कन्हैया के कपोल में गोबर ही गोबर हो गया है ………..

इतना ही नही ………जब गोपी गोबर लेकर अपनें घर जाती …..तब छुप कर दो तीन गोबर के टीका स्वयं अपनें कपोल में कन्हैया लगा लेते ।

अब हो गया ! गोपी बोली ।

तो दे माखन को लौंदा …………….कन्हैया बोले ।

पर पहले गिनती तो हो कि …….कितनें परात है गए ?

हाँ तो कर गिनती सखी !………..कन्हैया को क्या आपत्ति ।

एक, दो, तीन, चार, पाँच, दस , बीस , पच्चीस …………..सखी बोली – पच्चीस ……….कन्हैया बोले – तीस ……..नही – पच्चीस …….नही – तीस …..।

तात विदुर जी ! कन्हैया को ही हारना पड़ा ……..चल दे पच्चीस ….माखन के लौंदा………..।

ना , ऐसे नही दूंगी………..गोपी मुकर गयी ।

फिर कैसे देगी ? मासूम से कन्हैया बोले ।

पहले नाचो ………..तब दूंगी ।

कन्हैया नें पीताम्बरी अपनी कमर में कसी और ठुमुक ठुमुक नाचनें लगे…………..

गोपी मुग्ध होकर देख रही है …………….

आकाश से देवता पुष्प बरसानें लगे ………जयजय हो ….की ध्वनि आकाश में गूंजनें लगी ……………..

ब्रह्मा शंकर ये सब यही कह रहे थे ……….

!! अहो भाग्यम् , अहो भाग्यम् !!

ये मधुर ब्रह्म है ……प्यारा ब्रह्म है ………ये प्रेम के मोल मिलता है ।

तात ! खरीदना है ? उद्धव हँसते हुए बोले ।

मेरे जैसे शुष्क हृदय में प्रेम कहाँ ? ये सौभाग्य तो इन बृज ललनाओं का ही है ………जय हो जय हो ……..विदुर जी भी आनन्दित हो गए थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 53

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 53 )

!! जब कन्हैया नें रामकथा सुनी…!!


बृजरानी दौड़ीं दौड़ीं आयीं ………बृजराज संकीर्तन में मग्न हैं …….बड़े प्रेम से – श्रीमन्नारायन नारायण नारायण , का उच्चस्वर से गान करते हुये पूर्ण भक्ति से ओतप्रोत थे ।साथ में ग्वाल मण्डली थी …..जो मंजीरा, ढोलक करताल के साथ संकीर्तन में सहयोग कर रही थी ।एकादशी की रात्रि में शयन कहाँ किया जाता है ……….उस समय तो जागरण होता है ….भक्तिभाव से इष्ट का स्मरण होता है ………आज एकादशी थी ……….बृजरानी भी बैठीं थीं संकीर्तन में …….गोपियाँ भी थीं ……….कन्हैया ऊँघ रहे हैं मैया की गोद में बैठे बैठे ।आहा ! कितनें सुन्दर लग रहे थे ऊँघते हुए भी ।बार बार गिर रहे थे ………बृजरानी उन्हें सम्भाल रही थीं ……..अर्धरात्रि भी तो हो चली है ………………वो उठ ही गयीं ………क्यों की लाला अब बैठ नही सकता था ……..बालक भी तो है …………कुछ देर तक तो उछलता रहा ……..ताली बजाकर नाचता रहा …….पर कब तक ? अब उसे नींद आरही थी …….तो बृजरानी लेकर चलीं गयीं भीतर महल में …………दो घड़ी ही बीती होगी …………कि बृजरानी बाहर आयीं …………घबड़ाई हुयी थीं ………..पसीनें आरहे थे माथे में ।बृजराज के कान में कुछ कहा …………….क्या ? बृजराज चौंक गए …………ग्वालों से इशारे में कहा …..संकीर्तन करते रहो …….मैं अभी आया …….ये कहते हुये महल की ओर बृजराज दौड़ पड़े थे ……पीछे बृजरानी ।कन्हैया सो गया है ………..गहरी नींद आगयी है अब उसे ।ये तो सो गया ? बृजराज नें यशुमति से कहा ।हाँ ……..ये सो गया…….पर मैं क्या बताऊँ आपको ? देखिये ना अभी भी मुझे डर लग रहा है …….कि कहीं कुछ अलाय बलाय न लगी हो इसे । पर हुआ क्या था ? कुछ बताओगी ?”लक्ष्मण ! मैं रावण को छोड़ूँगा नही ……रावण ! मैं तुझे मारूँगा !”सुनिये ! सुनिये ! अभी भी , नींद में ये वही बोल रहा है ।नन्दराय सुनते रहे …………कन्हैया नींद में भी बड़बड़ा रहे थे ।रावण ! मैं तुझे छोड़ूँगा नही …………….पर तुमनें ऐसा क्या सुनाया था इसे ? बृजराज नें यशोदा से पूछा ।मैने ? नन्दगेहनी बतानें लगीं थीं ।***************************************************मैं संकीर्तन से उठ गयी थी ……….क्यों की लाला ऊँघने लगा था ।मैनें उसे आकर सुला दिया ………और थपथपी देते हुए ……..”नारायण, नारायण नारायण” गुनगुना रही थी ।तभी – मैया ! ये नारायण कौन हैं ? उठ गया था लाला तो ।तू सोया नही ? वहाँ तो ऊँघ रहा था …………नही , मुझे नींद नही आरही …………..उठकर बैठ गया था ।फिर ? बृजराज नें पूछा ।फिर वही प्रश्न था उसका ……..ये नारायण कौन हैं ? बाबा नारायण नारायण क्यों करते रहते हैं ? ये नारायण कहाँ रहते हैं ? इसके प्रश्न कभी खतम हुए हैं जो आज हो जाते ?भगवान हैं ………..मैने इसे बताया ।फिर ऊँघने लगा …….तो मैं गोद में लेकर सुलानें लगी …………मैया ! कोई कहानी सुना ना ? धीमी आवाज में बोला था ……..मैने सोचा हाँ भगवान की कोई कथा सुना देती हूँ ……..मेरी वाणी भी पवित्र हो जायेगी ……..और एकादशी है ……..मेरे लाला के कान भी पवित्र हो जाएंगे ।मैया ! कोई कहानी सुना ना ? फिर बोला ।तो मैने इसे रामकथा सुनानी शुरू की …………..मुझे क्या पता था ये तो इस कथा को सुनते ही उठकर बैठ गया ।हाँ ……….अब सुना ……….आलती पालथी मारकर बोला ……अब सुना मैया !मैं हँसी …….और बड़े प्रेम से बोली …..श्रीराम चन्द्र भगवान की …..छोटे छोटे हाथों को उठाकर लाला नें जोर से कहा …….जय !एक राजा थे उनका नाम था – दशरथ ! अच्छा मैया ! कन्हैया बोले ।वो राजा थे अयोध्या के …..सबसे बड़े राजा ………….इत्ते बड़े राजा ? अपनें हाथों को फैलाकर पूछ रहे हैं कन्हैया ।हाँ…..इससे बड़े राजा …..चक्रवर्ती सम्राट ……….कन्हैया से चक्रवर्ती नही बोला गया ……पर “सम्राट” बोल दिया ।अच्छा मैया ! फिर ? फिर ………उनकी तीन रानियाँ थीं लाला ! बृजरानी नें केश की लटें लाला के मुख से हटाते हुये कहा । …..तीन रानियां ……कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा ।अच्छा मैया ! आगे क्या हुआ ?आगे ! लाला ! इनके चार पुत्र हुए ………….चार कहते ही …ऊँगली में गिननें लगे कन्हैया……एक , दो , तीन, चार ।फिर चार ऊँगली मैया को दिखाते हुये बोले ………मैया ! ये चार ।हाँ ……लाला ! चार पुत्र थे दशरथ के ……….बड़े का नाम था – राम, फिर लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ……..ये इनके नाम हैं ।अच्छा मैया !

जनकपुर में इनका विवाह हुआ……..बृजरानी नें अपनें लाला को चूमते हुए कहा ।मेरा विवाह कब होगा ? ये क्या प्रश्न था लाला का ……पर बालक के प्रश्न तो ऐसे ही होते हैं …………..होगा , होगा तेरा भी व्याह होगा …….मैया हँसी ।राम का विवाह हुआ सीता के साथ , लाला ! भरत का विवाह हुआ माण्डवी के साथ, लक्ष्मण का विवाह हुआ उर्मिला के साथ और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति के साथ ……………लाला ! विवाह करके ये सब अयोध्या लौट आये …………….अच्छा मैया ! फिर क्या हुआ ? आँखों को मलते हुए कन्हैया पूछ रहे हैं ।लाला ! अयोध्या में कुछ दिन के बाद राम को वनवास मिल गया ।क्यों ? क्यों वनवास मिला मैया ! वचन माँग लिये थे कैकई नें राजा दशरथ से …………उसी बात को लेकर राम को वनवास जाना पड़ा …………..इसके बाद कन्हैया गम्भीर ही बना रहा………पता नही उसे क्या हो गया था ……बृजराज सुन रहे हैं यशोदा मैया की बातें ।मैं सुनाती रही रामकथा लाला को ……वो सुनता रहा …….मैं उसकी आँखों में देख रही थी ………..नींद तो थी ही नही…….अजीब सी गम्भीरता आगयी थी उसके नयनों में ।एक राक्षसी आई लाला ! उस वन में ……………ये राक्षसी क्या होती है मैया ? ये प्रश्न भी गम्भीर होकर ही पूछा था ।बड़े बड़े दाँत, ….लाल लाल आँख……..सिर में सींग ………..पर मेरे ये सब कहनें का लाला के ऊपर कोई प्रभाव नही पड़ा ………वो डरा नही …..मैं तो ऐसे ही लाला को कुछ डरानें के लिये बोल रही थी ।आगे बता मैया ! आगे क्या हुआ ?उस राक्षसी के नाक कान काट दिए लक्ष्मण नें ……….ताली बजाई कन्हैया नें …….मैया ! अच्छा हुआ ………बढ़िया किया लक्ष्मण नें ………फिर क्या हुआ मैया !फिर ? फिर तो वो राक्षसी गयी अपनें भाई के पास ……..उसका भाई सबसे बड़ा राक्षस था……….वो उसको लेकर आई ।लाला ! उस राक्षस नें आकर सीता का हरण कर लिया ।सुनिये ! मैने इतना क्या कहा…….कन्हैया का मुख तो लाल हो गया उसकी आँखें लाल हो गयीं … क्रोध में आगया ……..देह कांपनें लगा ।इतना ही नहीं ………उठकर खड़ा हो गया ……और चिल्लाकर बोला -लक्ष्मण ! मेरा धनुष बाण लेकर आ ……मैं अभी रावण को मारूँगा ।सुनिये ना ! रावण नाम मैने बताया नही था ………..मैने तो मात्र राक्षस कहा था ……………….आप कुछ कहिये ना ! मैने उसी समय लाला को अपनी छाती से चिपका लिया ………..और थपथपी देती रही …………फिर ये सो गया था …….तब मैं आपके पास गयी ।मुझे डर लग रहा है ……….कहीं कुछ अलाय बलाय तो नही है ये …….कहीं कोई भूत प्रेत तो नही है ……….ये क्या हो गया ?बृजराज देख रहे हैं कन्हैया को …………….फिर सोते कन्हैया बड़बड़ाये …………लक्ष्मण ! मैं छोड़ूँगा नही रावण को …….मेरी सीता को वो कैसे ले गया ।बृजरानी रो पडीं ……बृजराज के गले लग कर रोईं ………..कुछ नही होगा …..सब नारायण भगवान ठीक करेंगें ……….ऐसा कहते हुये बृजराज बाहर गए …….बाहर संकीर्तन चल रहा है …..नारायण , नारायण नारायण ।मन्दिर में जाकर शालग्राम जी का जल लेकर आये …..और लाला के मुख में डाल दिया था …………..अब कुछ नही होगा लाला को ……..बृजरानी ! तुम अब यहीं रहो ……और सो जाओ तुम भी ……..इतना कहकर बृजराज चले गए थे संकीर्तन में ………….हाँ ………….इसके बाद कन्हैया एक बार नींद में मुस्कुराये ………अच्छा ! रावण मर गया लक्ष्मण ! अब सीता को ले आओ ।बस इतना बोले कन्हैया ।बृजरानी सो न सकीं थी पूरी रात ।तात ! रामावतार का आवेश था कन्हैया को ये ………..बस इतना ही बोले उद्धव…….आज उद्धव भी शान्त हैं …….श्रोता विदुर जी भी …………कन्हैया इनके हृदय में छा चुका है ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 52

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 52 )

!! “उपद्रवी कन्हैया”- एक सहज लीला !!


अच्छा उपद्रव किया आज तो इस नन्द के लाल नें …. उद्धव हँस रहे हैं । ऐसा क्या हुआ ? क्या किया नन्दनन्दन नें ऐसा कि तुम अकेले ही हँस रहे हो उद्धव ! विदुर जी नें प्रश्न किया था । तात ! एक प्रसंग स्मरण हो आया…..ओह ! उद्धव फिर हँसनें लगे । यमुना के तट पर बादल घुमड़ आये थे ………कपि आनन्दित हो उठे थे ….मोर नाच रहे थे …..कोयल, पपीहा , शुक सब अपनें अपनें राग अलाप रहे थे………..श्रीकृष्ण स्मृति नें सब को आनन्द से भर दिया था ………और क्यों न आनन्द आये ? ये स्वयं आनन्द के ही तो साकार रूप हैं……..कन्हैया । उद्धव उस लीला को सुनानें लगे थे ……….पर लीला को सुनानें से पहले उद्धव बहुत हँसे ………..तन पर ओढ़े हुए चादर को मुँह पर रखते हुये हँस रहे थे ……..हँसी संक्रामक होती है ……..हाँ ये फैलती है । तो विदुर जी भी हँस पड़े थे । ************************************************* उदासी छाई है आज ग्वाल मण्डली में ………….सब सुस्त हैं ………मध्य में कन्हैया बैठे हैं और सब को देख रहे हैं ……….चारों ओर सखा बैठे हैं ………..गोलाकार । मनसुख, मधुमंगल, तोक, भद्र सब थे ……..पर उदास से थे । अब यमुना के जल में कंकड़ फेंक रहे हैं कन्हैया ……………सब ग्वाल उसी को देख रहे हैं …………..क्या करें । कपि भी आकर बैठ गए ……..मोर आये तो हैं ……पर अपनें “घनश्याम” को गम्भीर देखकर ये भी चुप्प बैठ गए । चल कन्हैया ! चल ! यहाँ बैठ के कहा करेगो ? मनसुख नें कन्हैया को झँकझोरा । कहाँ जायगो दारिके ! मधुमंगल नें व्यंग किया । गोपियन के यहाँ ……….चल ! माखन खायेगें ……मनसुख नें फिर हाथ पकड़ा, और कन्हैया को उठाना चाहा । डण्डा ते अपनी पूजा करवाय लीयो………समझे नायँ का ? अब सब सावधान है गयीं हैं गोपियाँ……अपनें घरन में घुसवे हूँ नायँ देंगी …..खायेगो माखन ! मधुमंगल नें समझाया । अरे ! कितनों हूँ सावधान है जाएँ …………पर कन्हैया के सामनें उनकी कछु नाय चलेगी ………चौं लाला कन्हैया ? मनसुख , कन्हैया के पीठ में हाथ मारते भये बोलो । सुनो सुनो ! एक उपाय है …….कन्हैया उछलते हुए बोले । हाँ का उपाय है ? मनसुख के साथ साथ सबनें पूछा । चलो ! पीताम्बरी सम्भालते हुए कन्हैया उठे । उनके साथ सब ग्वाल बाल उठ गए ………….. पर ………..तुम लोग छिप जाना ……….मैं जब दो बार ताली बजाऊं तब तुम आना …………अभी चलो मेरे साथ ……..ये कहकर कन्हैया ग्वालों के साथ चल दिए ।……..किसके यहाँ जाऊँ ! किसके जाऊँ ! ……..विचार करते रहे ……..सामनें एक गोपी दीखी ………ग्वालों को छुपनें के लिये कह दिया और स्वयं चले उसी गोपी के यहाँ । गोपी तो प्रसन्न हो गयी ………देख रही है ….शान्त भाव से चले आरहे हैं कन्हैया ……मुखचन्द्र आज गम्भीर है …………गोपी देख रही है …….मुख में कोई भाव भी नही दिखाई दे रहे ………बस शान्त से चले आये गोपी के पास ………….. भाभी, राम राम ! उसी गम्भीर मुद्रा में ही कहा । गोपी हँसी …………कैसे आये आज यहाँ ? “हम अपनी इच्छा से अब कहीं जाते आते नही हैं आज कल” …………बड़ों की तरह बतिया रहे हैं कन्हैया । गोपी तुरन्त बैठ गयी द्वार पर ही……..कपोल में हाथ रख लिया मुग्ध सी हो कर बस कन्हैया को देखती जा रही है । अच्छा ! तो बता दो फिर किसकी इच्छा से हमारे यहाँ पधारे हो ? मैया नें भेजा है हमें……….कन्हैया नें उत्तर दिया । क्यू ? क्यू भेजा है मैया नें ? गोपी नें पूछा । वो इसलिये कि……..”.हमारे यहाँ बड़े बड़े सन्त महात्मा आये हैं” …..कन्हैया अपनी हँसी छुपा रहे हैं……..”.बड़े बड़े सन्त महात्मा ……जोगी, सन्यासी, बैरागी, सब आये हैं” ………. तो ? गोपी नें पूछा । सिर खुजलाते हुये कन्हैया बोले ……..तो ! मेरी मैया नें मुझ से कहा है ………इन सन्तों की सेवा के लिये प्रत्येक गोपी के यहाँ से माखन की एक एक मटकी ले आ । क्यों ? कपोल में हाथ रखे रखे ही गोपी पूछ रही है । इसलिये कि ……….तुम सबन कूँ पुण्य मिलेगो । गोपी प्रसन्न हुयी……….ओह ! ये तो बढ़िया काम है ………और आज अमावस्या भी है………दान को पुण्य मिलेगो ………. भाभी ! ज्यादा मिलेगो …..कन्हैया खुश होते हुए बोले । दो मटकी ले जाओ माखन की ………गोपी नें कहा । अब ये तो तुम्हारी श्रद्धा है ………दो, दो या चार दो ……….वैसे मैया नें एक ही मंगायो है । ले के कौन जावेगो ? गोपी नें प्रश्न किया । अरे ! सब व्यवस्था है भाभी ! तू दे दे माखन की मटकी ……. ये कहते हुए कन्हैया नें ताली बजाई……दो ताली बजाई …….. सोई ग्वाल सखा सब आगये…………. इनके मूड में धर दो , भाभी ! कन्हैया नें हँसते हुए कहा । अरी ! जि कहा दे रही है तू ? पड़ोस की गोपी नें पूछा ……… पहली गोपी नें सारी बात बता दी …..सन्तों और महात्माओं के लिये माखन जा रहा है मेरे यहाँ से ……गोपी प्रसन्नता में बोली । तो मेरे यहाँ से भी ले लो , लालन ! …………उस गोपी नें भी अपनें यहाँ से माखन की भरी मटकी दे दी …………. हँसते हुए उद्धव बोले – इस तरह से दस प्रमुख घरों से मटकी उठा ली इन लोगों नें………अब कन्हैया से पूछनें लगे कहाँ चलें ? कन्हैया बोले ……..चिन्ताहरण महादेव के पास …………..वहीँ चलो …..वहीँ बैठेंगे ……..और वहीँ माखन खाएंगे ………… तात ! सब ग्वाल बाल माखन की मटकी लेकर यमुना के किनारे आगये थे ……..और सब बैठ गए ……….मध्य में कन्हैया ………चारों ओर ग्वाल बाल ……….सब हंस रहे हैं ………कन्हैया हँसा रहे हैं । ************************************************** सुन वीर ! कन्हैया माखन ले गयो है ……आज मावस भी है ………सन्त महात्मा बृजरानी जु के यहाँ आये हैं ……..क्यों न हम भी चलें उन सबके दर्शन करवे कूँ ? दूसरी बोली ……….विचार तो उत्तम हैं तेरे ………..तीसरी गोपी बोली ……हमारे यहाँ ते माखन गयो है ….तो हमें जानो ही चहिए ………. सब तैयार होनें लगी ……..सुन्दर सुन्दर लंहगा पहनें, फरिया……..सुन्दर चोली …….पूरा सोलह श्रृंगार किया …….और अपनें अपनें घरन ते निकसीँ ………..खिलखिलाती भयी ……….आनन्द और उमंग मन में धारण करके ……..नन्द महल में पहुँची । नन्द महल में आज अकेली बृजरानी ही थीं ………….. पाँय लागूं बृजरानी जु ! गोपिन नें प्रणाम कियो …….पाँव छूए । जीती रहो …..खुश रहो …………और बताओ कैसे आई हो ? बृजरानी नें पूछ लिया । कहाँ हैं ? गोपियाँ पूछनें लगीं । कौन ? बृजरानी नें भी प्रतिप्रश्न किया । सन्त महात्मा कहाँ हैं ? गोपियों नें अब स्पष्ट किया । मेरे पास कहा धरे हैं सन्त महात्मा ? बृजरानी को अजीब लगा । री गोपी ! मेरे पास कहाँ हैं सन्त महात्मा ? तो, दो दो माखन की मटकी ले के गयो है तेरो छोरा …….और कह रो कि – सन्त महात्मा आये हैं घर में ….बेचारी गोपी समझ तो गयी कि कन्हैया नें आज फिर हमें बनाय दियो…….. देखो गोपियो ! मेरे पास तो सन्त महात्मा हैं नायँ ……आये नायँ ……अब लाला के पास आये हों तो मोय पतो नायँ ………..ये कहते हुए बृजरानी भी भीतर चली गयीं । अब सजी धजी गोपियाँ अपनें आपको ठगी अनुभव करनें लगीं थी…. एक गोपी नें दूसरी ते कही ……….तुम चलो मेरे साथ ……आज हम उसे छोड़ेंगी नही……….सब गोपिन नें हाथ में एक एक डण्डा ले लियो …….और खोजती भई वहीँ पहुँच गयीं ……..यमुना किनारे । ********************************************* चारों ओर ग्वाल सखा बैठे हैं …………सबके पीले वस्त्र हैं …….पगड़ी बंधी है पीली ………..मस्त – अलमस्त स्थिति है सबकी । मध्य में विराजे हैं कन्हैया…………. मैने कही …..सन्त आये हैं मेरे घर ……….तो कहवे लगी वो गोपी ……..दो दो मटकी माखन ले जाओ ….एक क्यों ? मैने भी कही ………..मनसुख ! सुन ! मोय हँसी आरही ………पर मैने हँसी कूँ रोक लियो…….मैने कही – मैया नें एक ही मटकी की कही है …..ज्यादा श्रद्धा होय तो दो मटकी दे दे ।…..ये कहते हुए कन्हैया हँसे…..खूब हँसे……सखा सब लोट पोट हो रहे हैं यमुना की बारू में । भैया लाला ! वाह ! आनन्द आगो …………..माखन खाते हुए मनसुख बोल रहा है ……और बड़ा प्रसन्न हो रहा है । देख भैया ! तेनें ब्राह्मण देवता की आत्मा तृप्त कर दई ……पर तोय पतो है …..ब्राह्मण कूँ जिमायवे के बाद दक्षिणा देनी पड़े…….दे दक्षिणा । मनसुख के मुख से जैसे ही कन्हैया नें ये सुनी ………….तभी मनसुख के पीछे एक गोपी आके ठाड़ी है गयी …….वा के हाथ में डण्डा । कन्हैया हँसे ………खूब हँसे ……और बोले ……..मनसुख ! चिन्ता मत करे ….दक्षिणा देवे वारी तेरे पीछे ही खड़ी है । अब वो गोपी सामनें आयी …………कन्हैया ! लाल जी !, बताओ कहाँ हैं सन्त ? कहाँ हैं तुम्हारे महन्त ! पीछे से अन्य गोपियाँ भी आगयी थीं ।……………कन्हैया उठकर खड़े है गए ………. गोपियों ! मैं झुठ नही बोलूँ हूँ ………..कन्हैया चंचल निगाह से इधर उधर देखते हुए बोले । हाँ हाँ ………तो बताओ ! कहाँ हैं सन्त ?

कन्हैया नें कहा ………गोपियों ! ये सब हैं सन्त ……..ग्वाल बाल, इनसे बड़ा कौन सन्त होगा……..ये सबसे बड़े सन्त हैं …….और मैं हूँ इनको महन्त……कन्हैया की बात सुनकर गोपियाँ हंस पडीं ………ग्वाल सखा हँसते हुए भागे ……कन्हैया नें भागते हुए कहा ……….हमारी पूजा करो ……….इनकी पूजा करो ……जो भी सन्त महन्त हैं हम ही हैं …..इधर उधर मत भटको ……………हँसते हुए सब भाग गए थे ……गोपियाँ भी कुछ दूर भागीं ……पर फिर वहीँ यमुना के कूल में बैठ कर खूब हँसती रहीं ……….खूब हँसती रहीं ।विदुर जी के तो हंस हंसकर अब आँसू भी बहनें लगे थे ।उत्तमा सहजावस्था – यही है सहज अवस्था …..सहज रहो तात !उद्धव आनन्दित हैं ये कहते हुए ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 51

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 51 )

!! “सुखिया मालिन”- एक दिव्य कथा !!


मेरा नाम सुखिया है , सुखिया मालिन…..

मैं रहती हूँ मथुरा में…..मेरे पतिदेव तो स्वर्ग सिधार गए …..पर एक पुत्र दे गए मुझे…..”सुदामा” । हाँ ……मैं स्नेह के दाम में बंध गयी इसलिये मैने ही अपनें सुत का नाम रख दिया था “सुदामा”।

“रहती हो तुम मथुरा में……और फल बेचनें आयी हो गोकुल , क्यों ? प्रभावती गोपी आज पूछ रही थी इस वृद्धा सुखिया से । अपनी फलों की टोकरी को सम्भाल कर एक तरफ रख दिया…..प्रभावती गोपी से बोली……थक गयी हूँ जल पिलाओगी ? हाँ हाँ…….ये कहते हुये गोपी भीतर गयी और घड़े का शीतल जल ले आई……वृद्धा मालिन नें जल पीया……पसीना पोंछा…….जल का झींटा आँखों में दिया ।

अब क्या बताऊँ ! मैं तो मथुरा की ही हूँ……..मेरा मायका भी मथुरा और ससुराल भी मथुरा……..वो दिन कितने अच्छे थे …….जब मथुरा के राजा उग्रसेन थे …..आहा ! महाराज उग्रसेन । सुन प्रभावती ! उन दिनों भी मैं फल बेचती थी ………..यदुवंशी लोग बड़े भले थे ………फल खाते ………फिर फलों का दाम भी मैं जितना बताती उससे ज्यादा ही देते ……..और हाँ पता है तुझे ! ……महाराज उग्रसेन भी मेरे फलों को चखते थे ……मेरे ही फल प्रिय थे उन्हें । सुखिया अपनें बारे में बताये जा रही थी …………. पर अब ?

अब तो क्रूर कंस आगया है………..हे भगवान ! जब से ये आया है …मथुरा में शान्ति नही है ……….विश्व के जितनें राक्षस हैं सब को एकत्रित कर लिया है उसनें ……..हाँ , और आये दिन प्रजाओं को दुःख देना ………कष्ट देना, बस यही काम रह गया है । सुखिया नें जब कंस की बात छेड़ी तो झुर्रियों से भरे उस चेहरे में दुःख के भाव स्पष्ट दिखाई देंने लगे थे ……………

मेरा बेटा सुदामा तो कंस के यहाँ ही जाकर माला दे आता है ……. करे क्या ……उसे अपनें बाल बच्चे भी तो पालनें हैं ……..पर मुझ से गलत देखा नही जाता…….इसलिये मैं बोल देती हूँ । अब कुछ महीनों से तो अत्याचार चरम पर है कंस का ………… मेरे ही साथ ……….उसके राक्षसों नें मेरे फल खा लिए …..जब मैने उनसे मोल माँगा ……….तो मेरी टोकरी ही फेंक दी ………..कुछ भी हो मेरा भी स्वाभिमान है ……..मालिन हूँ तो क्या हुआ …..गरीब हूँ तो क्या हुआ ………तुम किसी का भी अपमान करोगे । छि ! मैने तभी विचार कर लिया …..मैं नही बेचूंगी अब फल मथुरा में । फिर कहाँ जाओगी माँ ?

मेरे पुत्र नें पूछा । सुना है गोकुल महावन में बड़ा अच्छा है …….वहाँ के मुखिया भी अच्छे हैं ………वहाँ के लोग भी समृद्ध हैं …….इसलिये यहाँ आगयी थी । तो क्या फल बिके ? किसी नें खरीदा ? प्रभावती नें पूछा । जितना सोचा था उतना तो नही …….देखो ना ! आधे से ज्यादा फल तो अभी बाकी ही हैं …….शाम होनें आरही है ………अब तो मुझे जाना ही पड़ेगा मथुरा ………पर सच बताऊँ ! गोकुल बड़ा अच्छा है ………यहाँ के लोग भी बूढ़े बड़ों का आदर करते हैं ………….आपस में प्रेम भाव बहुत है । ………..सुखिया मालिन इतना कहते हुए उठी ……डलिया को सिर में रखा और वापस चल दी मथुरा की ओर । प्रभावती भी अपनें घर के भीतर आगयी थी …………पर पता नही उसे क्या सूझा …….वो फिर बाहर आयी……… ओ मालिन ! मालिन ! आवाज लगाई……….. हाँ ……सुखिया बुढ़िया नें मुड़कर देखा …………क्या बात है ? जाते जाते नन्दालय तो होती जाओ ……….प्रभावती बोल दी । अब कहीं ना जाय रही वीर ! रहनें दे……थक गयी हूँ …….जितना सोचा था उतना बिका भी नही ……कोई बात नही…….मालिन चल दी । अरी ! मेरी बात मान ले , एक बार हो तो आ, । प्रभावती की बात उसे लगी……मान ही लूँ । इतना समय हो ही गया ………..चलो नन्दालय भी देखती चलूँ । ठीक है , जा रही हूँ नन्दालय …..सुखिया बोलती हुयी, मुड गई ….नन्दमहल की ओर ।

कोई फल लो ! कोई फल लो री ! कोई फल लो ! ये बुढ़िया सुखिया आवाज लगाते हुए चल रही है । इधर नन्दमहल के आँगन में…..नन्दलाल बैठे हैं अपनी मैया की गोद में । सुन्दर से गोपाल , घुँघराले उनके बाल, मुस्कुराता हुआ उनका मुखमण्डल ……..पीताम्बरी धारण किये हुए……. मैया ! मैया ! कोई आया है ! मैया की ठोढ़ी पकड़ कर हिलाते हुए पूछ रहे हैं । हाँ ……कोई फल बेचनें वाली आयी है । मैया ! मैया ! मैं फल लूँगा……….. जा ले ले ………मैया नें कह दिया । गोद से उतरे नन्दनन्दन …….और भागे हुए गए सुखिया के पास । “मुझे फल दे दो” हाथ पसारे माँगनें लगे कन्हैया ……… सुखिया मालिन देखती रह गयी…….ओह ! क्या सौन्दर्य है ……क्या दिव्य रूप है…….क्या छटा है रूप की , चितवन बाँकी है इसकी …..मुस्कान मादक है । सुखिया मालिन नें जीवन में कितनें बसन्त देखे थे …….मथुरा के राज महल में भी इसनें कितनें बालकों को देखा था……..पर ऐसा सौन्दर्य ! दिव्य अद्भुत ….आज तक नही देखा । फल चाहियें ? मुस्कुराकर पूछा सुखिया नें । हाँ ………बड़े भोलेपन से सिर “हाँ” में हिलाया कन्हैया नें । पर मोल तो दो ………बिना मोल के लोगे फल ? सहजता में बोली थी सुखिया………… मोल ? सोचनें लगे कन्हैया………..फिर भागे अपनें मैया की तरफ ………..मैया ! मैया ! मोल चाहिए फल के लिये ! बृजरानी नें अपनें लाला को चूमते हुए कहा – अनाज ले आओ ….और फल उसके बदले मिल जाएंगे तुम्हे । कन्हैया “भण्डार” की ओर गए …………. तात विदुर जी ! छोटे से हाथ कन्हैया के ……..उसमें वैसे ही कुछ दानें ही आये थे अनाज के ………….वो भी दौड़ते हुए सब गिर गए ……..जब तक सुखिया मालिन के पास आये ……..मात्र चार दानें थे हाथों में । लो …..मोल ……….अब तो दो । मुग्ध हो गयी सुखिया…………इसका तो जीवन धन्य हो गया …….कन्हैया को ये फल दे रही है …………… पर – गोद में बिठा लिया था उस वृद्धा मालिन नें ……….इधर उधर देखकर मुख चूम लिया …………. नयनों से अश्रु गिरनें लगे ………….एक बार मुझे “मैया” कहो ना ! क्या ? कन्हैया नें मुस्कुराते हुए मुख की ओर देखा सुखिया के । हाँ …..एक बार ……..मैया कहो ….लालन !…..सारे फल दे दूंगी । मैया ! कन्हैया नें हँसते हुए कहा । आनन्द के हिलोरें चल पड़े ……..अपनें हृदय से लगाकर बारबार चूमनें लगी कन्हैया को । सारे फल दे दिए …….काँछनी में बांध दिए थे फल । ये ………कन्हैया नें अपनें हाथ दिखाये । ये क्या है ? सुखिया नें पूछा । मोल ! तेरे फलों का मोल । हँसी सुखिया………..मोल तो मुझे मिल गया । नही …..ये तुम्हारे लिये है ………कन्हैया फिर बोले । अच्छा ! दे दो …….चार दानें अनाज के ……टोकरी में डाल दिए कन्हैया नें ।………….सुखिया नें एक बार फिर निहारा लाला को ………. फिर टोकरी उठाकर चल दी । गोकुल गाँव पार किया ……….आनन्द में डूबी , हर्षोन्मत्त है ये ……… जीवन में पता नही कितना फल बेचा था इसनें ……पर आज ? आज की बात ही अलग थी ………. पर टोकरी क्यों भारी हो गयी ? मथुरा में पहुँची तो उसकी टोकरी और भारी होती जा रही थी ……उसके समझ में कुछ नही आरहा था ……वो बारबार सोचती ……….फल तो मैने सारे दे दिए थे ……टोकरी तो रीती थी ……………फिर रीते टोकरी में इतना भार कैसे ? घर के द्वार पर आकर उसनें टोकरी उतारी ……………. ओह ! चकित हो गयी सुखिया मालिन ……….उसकी टोकरी तो रत्नों से, मणियों से, हीरे और मोतियों से भर गए थे । ये सब देखकर सुखिया के नेत्रों से अश्रु बहनें लगे ………….मैने कब माँगा था तुमसे ये सब ………बताओ कन्हैया ! कब माँगा था ! मोल ………….ये मोल दिया है फलों का …………मानों कन्हैया बोल रहे हों …………… हँसी अब सुखिया ………..खूब हँसी ………….तेरे जैसा दयालु और कौन है …..चार फल के लिए इतना मोल ? हँसते हुए वो फिर रोनें लगी………..वो “कन्हैया कन्हैया” कहती रही । तात विदुर जी ! – कहते हैं ……….फिर वो पलटकर गोकुल नही गयी ………क्यों की गोकुल में ये बात फैल गयी थी कि अन्नपूर्णा भगवती ही आईँ और कन्हैया को फल देकर चली गयीं ……….. सुखिया हँसती है ……..मैं भगवती ? हाँ ….कन्हैया चाहे तो किसी को भी कुछ भी बना सकता है …………… अपनी माँ सुखिया की बात मानकर ही सुदामा ……मथुरा में नित्य माला बनाता है ………..बनाता तो पहले भी था ……पर अब कन्हैया के लिये एक माला नित्य बनाकर रखता ही है ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 50

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 50 )

!! “तेरे लाला नें माटी खाई”- हितप्रेम !!


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प्रेम की नदी चारों ओर बह रही है बृज मण्डल में ………

सबका प्रेम है कन्हैया के प्रति ……..ये जो शिकायत की भावना है …ये भी प्रेम का ही स्वरूप है …….तात ! प्रेम की गति टेढ़ी मेढ़ी होती है ।

“चोर कहना” , चोर कहकर मैया यशोदा से शिकायत करना उसके लाल की …….ये भी प्रेम है ………इसे कहते हैं – दर्शन प्रेम ।

“प्रिय” देखनें को मिलेगा इसलिये शिकायत लेकर आयी हैं …….और कोई उद्देश्य नही है …………..अब दूसरी शिकायत की है यहाँ ग्वाल – सखाओं नें कि …….”.मिट्टी खाई तेरे लाला नें” ।

ये भी प्रेम का एक रूप है ……..इस प्रेम को “हित प्रेम” कहते हैं ……वैसे तो प्रेम का स्वरूप ही “हित” है ……प्रिय के “हित”की भावना ही प्रेम कहलाता है…….पर ग्वाल सखाओं का ये शिकायत लेकर पहुँचना कि ….”तेरे लाला नें माटी खाई”……..इसमें पूर्ण हित ही है …..।

सख्य रस ……अपनें आपमें अद्भुत रस है…….इसमें कहीं छोटे बड़े की भावना नही है……..कहते हैं ना …..सख्य भाव तभी प्रकट होता है …..जब – बड़े छोटे का भेद मिट जाए ।

प्रारम्भ में ही मैने कह दिया है तात ! कि “प्रेम की नदी चारों ओर बह रही है बृज मण्डल में”…….इसलिये – मात्र गोपियों का ही प्रेम नही है ……सखाओ का भी अपना प्रेम है ……मर्कट भी अपना प्रेम प्रकट करते हैं ……वृक्ष भी प्रेम करते हैं अपनें कन्हैया से …..मोर …….इनका तो ऐसा अद्भुत प्रेम है ………कि श्याम सुन्दर मोर मुकुट धारी ही बन गए ।

यमुना का अपना प्रेम है ……….आकाश का अपना प्रेम है …..बादलों का भी अपना प्रेम है …….इस तरह सब अपनें अपनें ढंग से प्रेम प्रकट करते हैं इस नन्दनन्दन के प्रति ……अद्भुत है ये सब ।

और मैया यशोदा ?

आहा ! इनका तो लाला को छड़ी लेकर पीटना भी “हितप्रेम” के अंतर्गत ही आता है ।

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मैया ! मैया ! मैया !

ग्वाल सखा उस दिन दौड़े दौड़े आरहे थे मैया यशोदा के पास ।

दाऊ, मनसुख, मधुमंगल, भद्र , तोक आदि सब दौड़ पड़े थे ।

अरे ! क्या हुआ ? सुबह से ही हल्ला मचाना शुरू तुम लोगों का ……

क्या हुआ ? बृजरानी रसोई से आईँ और पूछा ।

“मिट्टी खाई लाला नें”……साँस लेते हुए बोला मनसुख ।

नही मैया ! मिट्टी ही नही खाई ……..मिट्टी की ढ़ेर में बैठ गया था ….”इत्ती मिट्टी”……….मधुमंगल हाथ को फैलाकर बता रहा है – मैने मना किया उसे ……..पर जिद्दी हो गया है बहुत …….मानता ही नही ।

भद्र आगे आया…….वो कैसे पीछे रहता……मैया ! तू ही तो कहती है ना ….पेट में कीड़े पड़ते हैं मिट्टी खानें से ……..मैने उससे ये भी कहा ……पर नही माना ।

तभी पीछे से आगये थे कन्हैया…….सबकी ओर देखा ……….सबके मुख में देखा ……समझ गए कि मेरी शिकायत कर दी गयी है ।

“इत्ती बड़ी माटी की डली थी…पूरा खा गया” ….मनसुख कन्हैया की ओर देखते हुए फिर बोला मैया से ।

कन्हैया नें सिर झुका लिया ……………पर मनसुख की बात जब खतम हुयी तब एक बार मैया के मुख में देखा था ………मैया का मुख आज लाल हो गया है क्रोध से ……….पता नही क्यों मैया नें आज की बात को गम्भीरता से ले लिया था …………और क्यों न ले ……मिट्टी खानें से उसके लाला का स्वास्थ भी तो बिगड़ सकता है ………और इतनें उपद्रव की छूट मैया दे भी कैसे सकती है जी ।

छड़ी उठा ली आज मैया नें ……..कन्हैया नें सोचा भी नही था कि मेरी मैया मुझे पीटनें के लिये छड़ी उठा लेगी ।

हाँ …..उठा ली थी छड़ी ………ग्वाल सखा थोडा डर गए थे ………कन्हैया ? कन्हैया तो डर में मारे कांपनें लगे थे ……..

ओ ! मर्कट बन्धु ! कन्हैया को छड़ी दिखाती हुयी बोलीं ।

सजल नयन हो गए कन्हैया के ……….पर आज, आज मैया इन सब के बहानों में आनें वाली नही है ।

तेनें मिट्टी खाई ? गम्भीर होकर पूछ रही हैं …….छड़ी दिखाते हुए पूछ रही हैं …….बोल ! मिट्टी खाई ?

कन्हैया रोनें लगे……नही नही…….जोर जोर से रोनें लगे ….ताकि मैया उसे छोड़ दे …….पर आज मैया छोड़नें के मूड में लगती नही है ।

बोल……रो मत ………अब ये तेरा रोना धोना मेरे आगे नही चलेगा …

बोल …..मिट्टी खाई है तेनें ?

सिर हिलाकर मना किया ………..पर रोते हुए ।

मुँह से बोल …………..मिट्टी खाई ? मैया नें फिर पूछा ।

नहीं ……..कन्हैया बोले …….”नही” ।

फिर ये तेरे सखा क्यों कह रहे हैं कि – तेनें मिट्टी खाई ?

झुठ बोल रहे हैं……….ये भी चिल्लाकर बोले थे ………

सब मुझ से चिढ़ते हैं………हाँ ये सब मुझ से चिढ़ते हैं ………इसलिये झुठ बोल रहे हैं …….कन्हैया नें भी बोल दिया ।

हाय ! झूठा कन्हैया ! मनसुख बोला …..मैया ! ये झुठ बोल रहा है ……मैं ब्राह्मण हूँ झुठ नही बोलुँगो……इसनें मिट्टी खाई है ।

अब बोल ? मैया नें फिर छड़ी दिखाई ।

इसको मैने माखन नही दिया था कल ………इसलिये ये झूठ बोल रहा है …..कन्हैया हिलकियों से रो रहे थे ।

क्या होगया है आज यशोदा मैया को ……..इतना क्रोध अपनें लाला के प्रति ……………

दाऊ ! तू बोल ! इसनें मिट्टी खाई ?

क्रोध में भरकर दाऊ से पूछा मैया नें …….तो दाऊ भी डर गए ………उन्हें लगा क्या बोलूँ ? सच बोलूँ तो अपना लाला पिटेगा ……और झुठ बोलूँ तो मैं पिटूँगा ………..

दाऊ सोच में पड़ गए थे ।

तभी कन्हैया नें ही आगे बढ़कर कहा ………….

अपनें पुत्र पर विश्वास नही है ……तो मेरे मुख में ही देख ले मैया !

अगर मिट्टी खाई होगी तो मुँह में लगी तो होगी ना !

अच्छा मुख खोल !

मैया भी आज कठोर बन गयी हैं ………….खोल मुख …….देखूंगी मैं तेरे मुख में ………..मिट्टी खाई है तो लगी तो होगी ।

अब कहाँ लगी होगी ? मनसुख बोला ।

मैया नें लाल लाल आँखों से कन्हैया को देखा ……….फिर बोलीं ….सुना नहीं …….मुख खोल ।

रोते हुए कन्हैया नें मुख खोला – अरे ! ये क्या …………मैया यशोदा तो मुख देखते ही कांपनें लगी थीं………..कन्हैया अभी तक रो रहे थे ……वो चुप हो गए ……..मैया मुख में देख रही है ………माथे पे पसीना आनें लगे मैया के ………..अरे ये क्या ! हाथ जोड़ लिये मैया नें …….

हँस गया कन्हैया ……………कन्हैया हँसता है तो उसकी योग माया को अवसर मिल जाता है ………मिल गया अवसर माया को ।

मैया थोड़ी देर तक देखती रही कन्हैया के मुख में ……..सह्य न हुआ ये सब तो .मूर्छित होकर गिर पड़ी थी मैया यशोदा ।

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श्याम के छोटे से मुख में सब कुछ दिखाई दे गया था बृजरानी को ।

सारी सृष्टि देख ली थी मैया नें …………सब कुछ ……जीव , काल, प्रारब्ध, और उसके संचालक, कारण तत्व, प्रकृति , महत्, अहंकार , मन , इन्द्रियां, त्रिगुण ……….ये सब नाम मैया को पता नही थे …….पर उसनें ये सब देखा …….हाँ मैया ही कहती है – जब वो लाला के मुख में ये सब देख रही थी ….उस समय उस उस तत्व के देवता उसे इनका नाम भी बता रहे थे ………..इसका मतलब देवता भी मैया नें देखे ।

वायु, अग्नि, आकाश, वरुण, इन्द्रादि ……सब दीखे ………महानदी, महासागर, महाद्वीप पर्वत, कानन ……सब देखे मैया नें ……..।

अनन्त ब्रह्माण्ड देखे, उन अनन्त में अपना ब्रह्माण्ड भी देखा ……….अपनें ब्रहमाण्ड में पृथ्वी भी दीखी …पृथ्वी में भारत वर्ष भी देखा …..भारत वर्ष में बृजमण्डल भी ……बृज में भी गोकुल महावन भी मैया को कन्हैया के मुख में ही दिखाइ दिया था ।

इतना ही नही तात ! मुख में मैया नें ये भी देखा कि ………छड़ी लेकर स्वयं ये खड़ी हैं …..और सामनें कन्हैया रो रहा है ……ये भी मुख में ही देखा ……….।

मूर्छित हो गयीं थीं बृजरानी ………………

उद्धव बोलते हैं……..महाभारत में अर्जुन को भी विराट दिखाया था श्री कृष्ण नें ………..पता है तात ! अर्जुन , इतना वीर ……….वो भी डर गया …काँप गया …………पसीने से नहा गया था ।

ये तो बेचारी ममता की मारी ……साक्षात् वात्सल्य रूपा यशोदा मैया हैं ……….मूर्छित हो गयीं …..माधुर्य की उपासिका मैया …..ऐसे भयानक ऐश्वर्य को कैसे सम्भाल पातीं ।

मैया ! मैया ! मैया !

हिला कर देख रहे हैं मैया यशोदा को , कन्हैया ।

उठ मैया ! मैया भूख लगी है, उठ ।

अचेतन मन में भी वात्सल्य छा जाता है माताओं के …………फिर ये तो यशोदा मैया हैं ……….जैसे ही सुना ……….”भूख लगी है मैया” ।

मूर्च्छावस्था से भी उठ गयीं …….लाला ! लाला ! बाबरी की तरह मैया अपनें लाला को छू रही है …….फिर एकाएक – लाला ! मुँह खोल …….मुख खोल ……कन्हैया नें मुँह खोला …………देखती हैं …..पर अब तो कुछ दिखाई नही दे रहा ………..।

तू भगवान है ? मैया पूछती हैं ।

भूख लगी है दूध पीयूँगा ………चिल्लाकर बोले ।

मैया नें तुरन्त अपनी गोद में कन्हैया को लिया …..और मुख चूमते हुए अपनें वक्षःस्थल से लाला को लगा लिया ……..लाला दूध पीनें लगे ।

“कोई सपना देखा होगा”……….मैया सोच रही हैं ……..ये तो मेरा लाला है …..कोई भगवान थोड़े है !

तात विदुर जी ! अद्भुत है ये बृज, माधुर्य ही माधुर्य है जहाँ ।

ऐश्वर्य दिखाई भी दे तो उसकी ओर से मुँह फेर लेते हैं यहाँ ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 49

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 49 )

!! “चोर -चिन्तन” !*


तात ! भगवान को भगवान मानना, जो अखिल विश्व का स्वामी है, उसी को चोर कहना ! कितना असंगत है ।

सही में चोर कौन है ? श्रीकृष्ण या हम जीव ?

उद्धव विदुर जी से पूछते हैं ।

“चोर तो हम हैं” ……..फिर स्वयं उद्धव ही श्रीकृष्ण लीला की भूमिका भी बाँधते चलते हैं………हम हैं चोर तो ………क्यों की उनकी वस्तु को हम अपना कहते हैं……….ये सम्पत्ती उनकी है ………क्यों की लक्ष्मी तो उन्हीं नारायण की ही है ना ? फिर उनकी लक्ष्मी को अगर हम अपना कहें तो चोर कौन हुआ ? ये जगत उनका है …..पर हम अपना मानकर बैठे हैं …….चोर कौन हुआ ?

किन्तु करुणा कितनी है मेरे नन्दनन्दन की ………कि हमें चोर न बनाकर …..बताकर …….स्वयं ही चोर बनकर आजाते हैं …….और सब कुछ लूट लेते हैं……..पर लूटना कैसा ? उन्हीं का तो है सब ।

उद्धव आनन्दित होते हुये इस प्रसंग को आगे बढ़ा रहे हैं ।

तात ! धन्य हैं गोपियाँ ………जो “चोर चोर” कहते हुए उन परब्रह्म का चिन्तन करती हैं……….हँसती हैं , चोरी करते हुए देखकर आनन्दित होती हैं …….फिर उन्हीं का चिन्तन …..अविरल चिन्तन की धारा ।

नही नही ……..इनका नाम “गोपी” है ……….गोपी शब्द का अर्थ होता है …..जो गोपनशील है ……यानि छुपाना इन्हें अच्छे से आता है ।

पता है तात ! कंस कहीं समझ न ले……कि मुझे मारनें वाला यही है ….इसलिये चोर चोर का प्रचार करती हैं …..ताकि कंस को भी ये लगे …..जो माखन चुराए ….मटकी फोड़े….गोपियों को छेड़े वो मेरा काल ?

इन्हें छुपाना आता है ……..अपनी साधना को , अपनें साध्य को, अपनें प्रेम को, अपनें प्रेमास्पद को ……।

उद्धव हँसे …………कुछ देर तक हँसते रहे ……शायद उनके हृदय में वो “चित चोर” प्रकट हो गया था ।

पता है तात विदुर जी ! उद्धव कुछ देर बाद बोले थे ।

एक दिन माखन की चोरी की कन्हैया नें…..हद्द है अपनें ही घर में, ……..गोपी नें देख लिया ….बाहर जा नही सकते ……क्यों की लोग हैं …….अब भीतर मैया यशोदा आगयी हैं ………वो देख लेंगीं ………अन्धेरा खोजनें लगे ….की कहीं अन्धकार मिले तो छुपूं

गोपी नें देख लिया तो हँसी ……….और बडे धीमे स्वर में उसनें कहा ………क्या खोज रहे हो लालन ?

कन्हैया भी धीमे स्वर से ही बोले ……..”अन्धेरा” …..ताकि मेरी मैया मुझे देख न सके ।

गोपी गदगद् होकर बोली …….प्यारे ! मेरे हृदय में छुप जाओ ना …….वहाँ बहुत अन्धेरा है ……………उफ़ !

विदुर जी आनन्दित होते हुए बोले …………..उद्धव ! धन्य हैं ये गोपियाँ ….और धन्य है इनका ये “चोर- चिन्तन” ।

और क्या क्या शिकायतें की बृजरानी से , इन बृजभामाओं नें …….ये तो इनकी साधना ही लगती है …………इनका चिन्तन कितना गहरा है ना…….हर समय, ये श्रीकृष्ण में ही डूबी रहती हैं ।

हमें सुनाओ उद्धव ! बृजरानी को और कितनी शिकायतें सुननी पडीं अपनें लाल की ……….और बृजरानी नें क्या कहा ?

वैसे माताएँ अपनें बालक का ही पक्ष लेती हैं …………..ये कहते हुए विदुर जी हँसे ……….हँसे उद्धव भी …………बोले …….बृजरानी कोई अपवाद नही हैं ………ये भी अपनें लाला की शिकायतें गम्भीरता से नही सुनतीं । उद्धव सुनानें लगे थे अब आगे का प्रसंग ।

सुन सुन गोपी ! ……….अब मेरी बात सुन !……..तू ना अपनी माखन की मटकी को अन्धकार में रख दिया कर ………..मेरा लाल, अन्धकार से डरता है ……..वो कभी अँधेरे में नही जाएगा ।

बृजरानी नें उलाहना दे रही गोपियों को ये समाधान दिया था ।

अरी मेरी भोरी बृजरानी जु ! ये ? ये अन्धकार से डरेगा ?

तो दूसरी बृजभामा आगे आयी ………..और उसनें कहा ………..अन्धकार इसके सामनें टिकता ही नही है ………..ये जहाँ जाता है वहाँ प्रकाश ही प्रकाश कर देता है …………

कैसे ? अपनें लाला को बड़े ध्यान से देख रही हैं यशुमति ।

ये मणि माणिक्य हीरे जो तुमनें अपनें लाला को पहना राखें हैं ना …..बस इसी के कारण अन्धकार में भी प्रकाश हो जाता है ।

तो अभी उतार देती हूँ इसके मणि माणिक्य ……..ऐसा कहते हुए यशोमती लाला के आभूषणों को उतारनें लगीं ………….

पर ये सब गोपियों को असह्य हो गया……..सब का हृदय चीत्कार कर उठा……..नही नहीं बृजरानी जु ! आभूषणों को मत उतारो …….

ये गोपी तो बाबरी है …..इसे कुछ पता नही है………..आभूषणों से मात्र तेज की बात कर रही है……….अरे ! ये कन्हैया है ….इसके तो अंग अंग से तेज प्रकट होता है ………इसका तो अंग ही प्रदीप है ।

ये जहाँ जाता है….इसके साथ ही एक “श्याम ज्योति” चलती रहती है ।

और पता है बृजरानी जु ! उस स्वयं ज्योति के आलोक में कितना भी अन्धकार हो ………वहाँ प्रकाश कर देता है ये …………फिर माखन चुरा लेता है ………….।

पर बृजरानी ये नही समझ पा रहीं कि …………ये गोपियाँ आखिर चाहती क्या हैं ? आभूषणों को उतारनें देती नहीं …………

बृजरानी सोच ही रही थीं ……..कि एक गोपी फिर बोल उठी –

ऊँचें में , ऊँचे छीके में जब माखन की मटकी हम रखती हैं ना ……तब तो ये बड़े विचित्र ढंग से मटकी को निकाल लेता है ………हम भी चकित हो जाती हैं ………हाँ मैया ! हम साँची कह रही हैं ।

बृजरानी के फिर समझ में नही आरहा कि गोपियाँ शिकायत करते करते अब तो प्रशंसा करनें लगीं ………ये आखिर चाहती क्या हैं ?

और ऊँचें छीके में लटकाओ मटकी ……..छोटा ही तो है लाला….पहुँच ही नही पायेगा . ……यशोदा जी बोलीं ।

अरी बृजरानी ! हम क्या बताएं …….एक दिना तो हमनें पीपल के पेड़ में माखन की मटकी बाँध दई ………..हमारे आँगन में, वर्षों पुरानों बड़ो पीपल को पेड़ है ।.

अब कन्हैया आओ …………हम सब छुप कर देख रहीं थीं ……….

बृजरानी भी सुन रही हैं इस लीला को ।

बृजरानी जु ! तुम्हारे छोरा के साथ मण्डली चले ग्वालन की ………और सब ऐसे ही हैं …………

आगे क्या हुआ ? जब पीपल के पेड़ में मटकी लटकाये दियो तुमनें ?

बृजरानी नें फिर पूछा ।

हाँ ……तो ये आओ…….अपनें ग्वालन के साथ आओ ………

बड़े ध्यान से इसनें मटकी को टंगे हुए देखा ……..फिर अपनें सखान ते बोलो …………”भाभी नें तो आज ऊँचे टाँग राखे हैं मटकी ?”

फिर सोचवे लगो …………और कहीं ते बाँस ले आओ ……….बीस फुट को बाँस ……….और मटकी के नीचे लगाय दियो ………..सब सखान ते बोलो ……..”ओप” लगाय के खड़े है जाओ ……….सब नें हाथन ते ओप लगाय लिए …….और सबरो माखन खाय लियो ………नेंक हूँ नाय छोडो ।

ये जब सुना तो यशुमति बोलीं ……….”तुम कुछ कहा मत करो “

अजी ! बृजरानी जु ! कछु नाय कहें , और पतो है …..जब हम कछु नाय कहें हैं ना ! तब तो ये तेरो 4 बरस को छोरा मूंछन में ताव देवे ……….और कहे …..”.नन्द को छोरा चोरी करके जाय रह्यो है …..काहूँ कू रोकनी होय तो रोक लियो ” ।

ये सुनकर बृजरानी हँस दीं………….गोपियों नें कहा ……….ऐसे नही होयगो …………हम अब तो गारी देंगी, तुम्हारे छोरा कूँ ।

बस …….हृदय भर आया …….हाथ जोड़ लिया नन्दरानी नें …..

री गोपियों ! जो करनी होय सो कर ले ……पर मेरे लाला को गारी मत दे ………देख तो – छोटो सो लाला है ……..बड़े बड़े देवता मनाय के मैने याकुं पायो है ……गारी मत दे ……..और सुन ! तेरो जो बिगारो होय, माखन खायो होय, मटकी फोड़ी होय ……मैं दूंगी ….सब मैं दूंगी …..पर गारी मत दे री ।

गोपियाँ बस देख रही हैं कन्हैया को…………

तात ! कन्हैया डर गए हैं………उन्हें डर लग रहा है अब …..कि मैया उन्हें अब पीट न दे ……….

पर उनका डर सही निकला …………कान पकड़ लिए मैया नें ………और पूछनें लगीं ………..क्यों किया तूनें इनके यहाँ ऐसा ? बोल !

छड़ी लेकर आयीं नन्दगेहनी…………

नयनों से अश्रु गिर गए कन्हैया के ……….

रो पड़े …….हिलकियों से रोनें लगे …………..

गोपियों का हृदय भर आया ………मत मारो …….. बृजरानी जु ! मत मारो …….ये कहते हुए स्वयं गोपियाँ रोनें लगीं ………

बृजरानी के समझ में नही आरहा कि…….ये गोपियाँ आखिर चाहती क्या हैं ? मैं पीटूं ये चाहती नही हैं ….मैं डाँटूं ये चाहती नही हैं ……….और मेरा लाला रोये, ये इनको सह्य नही है ।

अजी ! ये गोपियाँ हैं …….सब श्री कृष्ण से प्रेम करती हैं………और ये सब प्रेम का ही एक रूप है ………..अद्भुत रूप !

“चोर” कहकर आनन्दित होना …….ये भी प्रेम की उच्चावस्था है ।

उफ़ ! इनका ये “चोर चिन्तन” ।

चली गयीं सब गोपियाँ……और ये कहती गयीं …..”पीटना नही लाला को बृजरानी जु ” ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 48

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 48 )

!! “अपनों गाँव लेओ नन्दरानी”- गोपियों का उलाहना !!


हमें नही रहना तुम्हारे गाँव में ……….हाँ, रानी हो तुम तो इस गोकुल की …….वाह ! अच्छी शिक्षा दे रही हो अपनें पूत को ……….

ये गोपी तो अन्य से तेज थी ……….बस बोलती गयी ।

बृजरानी सुन रही हैं………वो शान्त हैं ………बगल में उनके कन्हैया खड़े हैं ……हाँ वो अवश्य डर रहे हैं …………

“अभी तो छोटा है ………पर छोटे में ही ये हालत है ………पूरे गोकुल को रुला कर रख दिया है …..उपद्रव तो सीमा पार कर चुकी है इसकी …….नन्दगेहनी ! तनिक विचार तो करो ……..ऐसे ही रहा तो बड़े होनें पर क्या होगा ? “

इतना बोल कर वो पीछे चली गयी …..फिर दूसरी गोपी आगे आयी ।

बृजरानी हँसीं………तू तो कविता सुनाकर चली गयी …….अरी ! ये बता कि तेरे यहाँ किया क्या है मेरे लाला नें ?

ये कहते हुये सिर में हाथ फेरा अपनें कन्हैया के ……..कन्हैया खुश ! चलो मेरी मैया मेरे साथ है ।

मैं बताती हूँ ……..हे बृजरानी ! सुनो अपनें लाला की करतूत ।

आज कल हमें गायों का दूध नही मिलता ……..हमारे घर के बालक बिना दूध के ही रहते हैं ?

क्यों ? तेरी गैया दूध नही देती ? बृजरानी नें पूछा ।

देती है …खूब देती है……..पर तुम्हारा ये जो लाला है ना ….दूध दुहनें से पहले ही बछड़ों को खोल देता है …..बछड़े दूध पी जाते हैं ……..

गोपी ये कहते हुए कन्हैया को ही देख रही है ।

और विचित्र बात उस समय ये होगयी ……कि कन्हैया की ओर देखते हुए ये गोपी हँस पड़ी …………

पर बृजरानी गम्भीर हैं ………बोलीं – अब समझीं मैं ………बालक के सामनें ऐसे ही “खें खें” करती होगी …..हँसती होगी ……..तभी लाला तुम्हे गम्भीरता से लेता नही है……….थोडा गम्भीर रहो ……..आँखें दिखाओ ……क्रोध करो ……..तब ये ऊधम नही मचायेगा ।

एक गोपी फिर आगे आई……….बृजरानी जु ! जब हम क्रोध करती हैं ……इसको आँखें दिखाती हैं …….तो ये हमें देखकर हँसता है ……..और इतना हँसता है कि लोट पोट हो जाता है ……..इसको हँसते हुए देखकर हमारा क्रोध पता नही कहाँ चला जाता है ……..हमें हँसी आजाती है ……..हम क्या करें ।

नन्दरानी नें देखा अपनें लाला की ओर…….लाला नें सिर हिला दिया ये कहते हुए …..झुठ बोल रही है ।

“चोर है तुम्हारा लाला” ……………एक गोपी आगे आकर बोली ।

ये बात बृजरानी को अच्छी नही लगी ……………..चोर क्यों ?

क्या चुराया तेरा, मेरे लाला नें ? हीरे , मोती , क्या ?

“माखन चुराया”…………वही गोपी बोली ।

हे भगवान ! बालक तेरे घर में जाकर कुछ खा लेता है …… उसे तू चोर कह रही है ? ऐसा नही कहते ……….मुझे अच्छा नही लगा ।

बृजरानी नें गम्भीरता में ये बता कही ।

अब हम क्या करें तो ………तुम्हे अच्छा क्यों लगेगा ……….तुम्हारा तो बेटा है ……पर हमसे पूछो कि ये क्या क्या करता है ? माखन ही नही खाता ……..मटकी भी फोड़ता है …………..गोपी बोल रही है ।

बृजरानी नें बीच में टोका ………..तेरे घर में जब ये जाए …..तो माखन दे दिया कर ……….और यहाँ से ले लिया कर ………..छोटा सा है लाला ……छोटा सा पेट है ……कितना खायेगा ! ………….ये कहते हुए बृजरानी नें कन्हैया के पेट में हाथ रखा …..तो कन्हैया हँसे ……मैया ! गुदगुदी लग रही है। ।

हम इनको दे देतीं ………….पर ये लेता कहाँ है माखन …………हठी है तेरो लाला ……..कहता है …..”हमें राजी को माखन नाय ……चोरी के माखन में ही स्वाद आवे”…………ये कहते हुए ये गोपी हँस पड़ी …….गोपी को हँसते देखा तो मैया यशुमति भी हँसीं ……..यशुमति हँसीं तो लाला भी हँसनें लगे ।

“ये बन्दरों को भी माखन लुटाता है”……..एक गोपी फिर बाहर आयी ।

नहीं….नहीं …….बन्दरों को ही नही ………..बर्तन भी फोड़ देता है ……..

और जब हमारे घर में इसे माखन नही मिलता ……तो घर के ऊपर ही अपना क्रोध निकालता है ………..या हमारे पति हैं ……….उनको ही अपनें क्रोध का भाजन बना लेता है ………..सच !

मैं और मेरे पति…….रात्रि में सो रहे थे ….एक दिन की बात ।

ये कन्हैया पता नही कहाँ से आया……….माखन की चोरी करनें …..पर इसे माखन मिला नही………

फिर इधर उधर देखनें लगा……….बृजरानी ! उन दिनों नवरात्रि चल रहे थे ……..मेरे पति अनुष्ठान में थे ………दाढ़ी बाल नख कुछ भी काटे नही थे उन्होंने ………….

मैं बगल में सो रही थी ………..इसनें देखा होगा हमें ………..

हम दोनों तो गहरी नींद में सो रहे थे………..ये आया और मेरे पति की दाढ़ी से मेरी चोटी बांध कर चला गया ।

बृजरानी हँसीं……….उनकी हँसी अब रुक नही रही थी ।

गोपी आगे बोली………..मैं सुबह उठी …….मुझे यमुना जल भरनें जाना था ………….जैसे ही मैं उठी ……….पीछे से मेरे पति चिल्लाये …….मैने कहा……..देखो जी ! अभी नवरात्रि चल रहे हैं ……ऐसा विनोद ठीक नही है …………छोडो मुझे जानें दो ………अजी ! मेरी चोटी छोडो ……….पर मेरे पति मुझ से बोले ……….तेरी चोटी मैनें नही ……..तेरी चोटी नें मेरी दाढ़ी पकड़ रखी है …..देख तो ।

और जैसे ही मैने पीछे मुड़ कर देखा …….तो वो बेचारे रो रहे थे …….वो करते क्या !

फिर क्या हुआ ? बृजरानी नें उत्सुकता वश पूछा ।

फिर क्या होना था ………चोटी और दाढ़ी खोलनें की कोशिश की ……..पर खुली ही नही ।

तात ! कैसे खुलती ……..जिसकी गाँठ स्वयं कन्हैया नें बाँधी हो …उसे भला कौन खोल सकता है ।

उद्धव नें विदुर जी को कहा ।

हमें कैची से काटनी पड़ी उनकी दाढ़ी ……….वो गोपी बोली ।

इस प्रसंग पर तो अन्य गोपियाँ भी हँस पड़ी थीं ।

पर वो गोपी बोली –

“अपनों गाँव लेओ नन्दरानी

बड़े बाप की बेटी पूतहिं, भली पढ़ावती बानी”

वो गोपी अब गम्भीर हो गयी थी ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 47


(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 47 )

!! “उलाहना है बहाना”- अद्भुत प्रसंग !!


तात ! नन्दमहल में अब तो, उलाहनों देवे वारी गोपियाँ, नित आवें ।

उद्धव नें यमुना के तट चल रही “श्रीकृष्णचरितामृतम्” की कथा को ये कहते हुए आगे बढ़ाया ।

उलाहना ? पर क्यों ? विदुर जी नें पूछा ।

तात ! उलाहना तो बहाना है……इन्हें कन्हैया को निहारना है ।

उद्धव नें बड़े प्रसन्न चित्त से ये बात कही ।

गोपियाँ साधारण नही हैं ………ये प्रेम का शिखर हैं ………इनकी स्थिति में पहुँचना सामान्य बात कहाँ है ?

तात ! चौबीस घन्टे बस श्रीकृष्ण की यादों में डूबे रहना………उनकी लीलाओं का गान करना …..उनके रूप ध्यान में मग्न रहना ………और ये सहज है इनका ………इसके लिये कोई प्रयास नही है ।

विदुर जी मुस्कुराते हैं……….उद्धव ! सुनाओ आगे का प्रसंग …..नन्द नन्दन नें इन्हें अपना बनाया है ……….ये भाग्यशाली तो हैं हीं ।

और सबसे बड़ी बात गृहस्थ में रहते हुये, अपनें बालक, पति परिवार के अन्य सभी की सेवा करते हुए , अपनें चित्त को मुरारी पादपद्म में लगा देना ……..ये सामान्य बात कहाँ है ।

विदुर जी की बातें सुनकर आनन्दित उद्धव अब आगे का प्रसंग सुनानें को तैयार हुए थे ।

गोकुल की शोभा इन दिनों और बढ़ गयी है …………क्यों की नन्दनन्दन की बाल चापल्य लीला और उसपर इन गोपांगनाओं का उनके प्रति आगाध स्नेह ………

एक दिन भी न देखें कन्हैया को, तो इनको चैन न मिले ।

गोकुल की हर गली में बस श्रीकृष्ण चर्चा ………….

पर इन दिनों विवाह का मुहूर्त है …..तो विवाह भी खूब हुए बृज में …..गोकुल में नई नई बहुएँ आगयीं ………….पर खबरदार ! आते ही सासुओं नें इनकी कक्षा ली ………..यमुना जाना तो सीधे जाना …और सीधे आना ……इधर उधर देखना नही …………और सुन ! कदम्ब वृक्ष के नीचे तो देखना ही नही ………और कदम्ब में कभी दृष्टि पड़ भी जाए तो वहाँ बैठे , मुस्कुराते हुए उस काले छलिया को तो देखना ही मत ।

अगर देख लिया तो सासू माँ ? कोई कोई बहु तेज भी थी ।

फिर तो तू काम से गयी बेटा ! …..वही छलिया तुझे अपना बना लेगा ।

श्याम रंग चढ़ जाएगा तेरे ऊपर……..फिर तो तू ……….

बहुएँ सावधान थीं……….क्यों की उनकी सासू उन्हें बाहर ज्यादा घूमनें नही देतीं ………यमुना में भी जाते समय इधर उधर देखनें नही देतीं ……….पर इन्होनें सुनना शुरू कर दिया था ………”.बड़ा सुन्दर है …….बड़ा चंचल है ……….उसकी लटें घुँघराली हैं ………वो जब मुस्कुराता है तब फूल झरते हैं ………..वो जब चलता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई गज अपनी मदमाती चाल में चल रहा हो ………..उसकी पीताम्बरी की वो छोर” ………उफ़ !

बहुएँ ये सब सुन सुन कर मुग्ध हो रही थीं…………..

पर देखें कैसे ? हमारी सासू नें हमारे ऊपर हजारों पाबन्दियाँ लगा रखी हैं ……..फिर कैसे उस छलिया को देखें ………..आपस में बातें करतीं और अपनें भाग्य को कोसतीं …….कि गोकुल में आनें के बाद भी “गोकुल चन्द्र” के दर्शन नही किये ।

तात विदुर जी ! आज इन सबको एक उपाय सूझा …………..

उद्धव मुस्कुराते हुये ये लीला सुना रहे हैं ।

और सबनें, जब उनकी सासू घर में नही थीं …….तब घर की सारी मटकियां फोड़ दीं ……माखन स्वयं ही फैला दिया ………..और कपोल में हाथ रखकर बैठ गयीं द्वार पर ही ।

ये सब क्या है ? तेज आवाज में चिल्लाई सासू ………जब उसनें घर में आते ही देखा कि …….सारा माखन फ़ैल गया है चारों ओर ………मटकी फूटी पड़ी हैं …….और बहु गालों में हाथ रख कर शोक मुद्रा में बैठी है ।

ये सब क्या है ? किसनें किया ?

सासू माँ ! वो नन्द का छोरा ………..बस इतना ही बोल सकी गोपी …..ज्यादा बोलती तो हँसी आजाती इन्हें ।

वो आया था यहाँ ? सासू माँ नें पूछा, कड़क आवाज में ।

हाँ …आया था …..और मटकी फोड़ कर चला गया …..माखन कुछ खाया कुछ फैला कर चला गया ……..बहु, सास को बता रही है ।

तू कुछ नही कर सकी ?

मैं क्या करती ? उसनें जो उपद्रव मचाया ……..ओह !

बहु घूँघट करके बोल रही थी ………….इसलिये उसकी थोड़ी बहुत हँसी छुप रही थी ।

लम्बी साँस ली सासू नें ………..माथा पीटा …….ये ऊधम ! ऐसा कोई करता है क्या किसी के घर में ?

हाँ सासू माँ ! बताओ ! मुझे तो बहुत रिस आरही थी ……..अभी भी आरही है …..सासू माँ ! आप अगर कहो तो मैं नन्द महल में जाऊँ ?

सासू माँ ! आप कहो तो बृजरानी जु को उलाहना देके आऊँ ?

तात ! यही तो चाहती थीं ये बहुएँ …………और ये एक घर नही …..हर घर की बहुओं नें ये किया था ………….

जा ! और बृजरानी को अच्छे से कहना …..और ये भी कहना ……

कि – आज के बाद अगर फिर उसके लाला नें ये लिया तो ……..

तो ? बहु नें पूछा ।

“अपनों गाँव लेओ नन्दरानी, हम कहूँ अंत बसेंगी जाय”

बहु खुश……आनन्दित हो गयी बहु……..मैं जाऊँ ?

हाँ हाँ जा ! और अच्छे से कहना…….डरना नही ……जो जो ऊधम मचाया है सब कहना ………जा अब ।

….इस तरह हर घर की सास नें अपनी अपनी बहुओं को भेजा था नन्द महल में …..उस दिन तात ।

आहा ! सब निकलीं घरों से…….आनन्दित हैं ……बीच में जाकर सबका मिलन हुआ……..हँसती खेलती मन में मनमोहन के दर्शन की आस लिये ……..सब नन्द महल की ओर चल रही थीं ।

आज कल तो उलाहना देनें वाली गोपियों का ताँता लगा ही रहता था नन्द भवन में……..बृजरानी पहले तो गम्भीरता से सुनती थीं…….पर आज कल उनको भी आदत पड़ गयी है ………वो मात्र सुनती हैं ……और स्वयं गोपी को ही समझा बुझाकर भेज देती हैं ।

पर आज तो एक साथ दस बीस नई नई गोपियाँ जो अभी अभी ब्याही हैं ………..वो झुण्ड में आगयी थीं ।

“नन्द गेहनी” दधि मंथन कर रही हैं ………..दधि मन्थन करते हुए कंकण, किंकिणि सब बज रहे हैं……वो मुग्ध हैं ……..शायद चिन्तन कर रही हैं अपनें लालन का …….तभी तो इनके नेत्र बन्द हैं ।

मैया ! पाँय लागूं ! गोपियों नें आकर बृजरानी के पैर छूये ।

ओह ! कहाँ से आयी हो ? नई नई लग रही हो ? आओ बैठो ।

बड़े प्रेम से बृजरानी नें उन नई गोपियों का स्वागत किया ……….

फिर बोलीं……नई बहु लग रही हो ? अभी अभी ब्याह हुआ दीखे ?

शरमा कर नजरें झुका लीं ………और सिर “हाँ” में हिलाया ।

अच्छा अच्छा ! बैठो ! जल पियोगी ? बृजरानी जल और कुछ मीठा लेनें को जैसे ही भीतर गयीं ………….

गोपियों नें इधर उधर देखना शुरू कर दिया ……

जिसके लिये यहाँ आयी थीं …….वो कन्हैया कहाँ है ?

पर वो तो दिखाई दे ही नही रहे …………

अच्छा ! लो …..ये लड्डू खाओ …और जल पीयो ……….लड्डू बड़े प्रेम से यशुमति नें उन बहुओं को दिया ……..बहुओं नें हाथ में ही रख लिया …….फिर बोलीं …….आपके लालन ? बड़े संकोच के साथ पूछा ।

मेरा लाला ? वो तो यहीं कहीं होगा ……अभी तो यहीं था ……..बृजरानी नें कहा ……….और फिर पूछनें लगीं ……..तुम लोग आयी क्यों हो ? गोपियों नें एक दूसरे को देखा ………..फिर बोलीं …….पहले आपका लाला आजाये हमारे सामनें ।

क्यों, लाला क्यों ? मुस्कुराईं यशोदा……अब समझ गयीं थीं कि उनके लालन को देखनें ही ये यहाँ आयीं हैं ।

नही ………बात ये है कि मैया ! तेरे लाला नें ऊधम मचाओ है !

क्या ऊधम मचाया ? गम्भीर हो गयीं बृजरानी ……बताओ निस्संकोच होकर बताओ ……क्या बात है ?

पहले लाला को बुलाओ …………गूजरी हैं नई नवेली …….जिद्द पकड़ के ही बैठ गयीं ………लाला कहाँ है ?

मैया यशोदा नें इधर उधर देखा …………दूर से पीताम्बरी दीखी ……..तो चिल्लाईं ………..लाला ! ओ लाला !

हाँ , मैया ! उधर से आवाज आयी ………..

गोपियों नें जैसे ही आवाज सुनी-

….”धक्क” करके रह गया इनका हृदय तो ।

इधर आ ! लाला ! इधर आ !

मैया के बुलानें पर लाला आगये ……….

क्या है मैया ? दौड़ते हुए आये थे तो साँसें चल रही थीं ………

क्या है मैया ? सामनें खड़े हैं…………

नई गूजरी सब देख रही हैं………आहा ! क्या सुन्दर झाँकी है ……साँवरा सलोना, मुस्कुराहट अद्भुत ……घुँघराले काले बाल ………

नयनों की पूतरी गिरनी बन्द हो गयी ………..गोपियाँ बस इस “मोर मुकुटी” को देखे जा रही हैं …………..

उलाहना देनें वाली थीं ना तुम तो ? अब बताओ क्या किया मेरे लाला नें ? बृजरानी नें पूछा ।

उलाहना ?

“भूलि गयी री, उलहानो देवो”

तात विदुर जी ! ये बृज गूजरी सब भूल गयीं ………क्या कहनें आयीं थीं …….उलाहना क्या है ? सब भूल गयीं ये ।

क्यों की सामनें गोकुल चन्द्र खड़े हैं ………उनके रूप सुधा का पान करते ही ये सब भूल गयीं ।

लाला ! तू जानें इन गोपियों को ?

बृजरानी नें लाला से पूछा ।

ना ! ना मैया ! मोय तो जि भी नाय मालूम कि इनको घर कौन से मोहल्ले में पड़े ! लाला भी बड़ी मासूमियत से बोल पड़े थे ।

सुन लो ! मेरो लाला नाय जानें तुम्हे ……..अब बोलो ?

बृजरानी नें उनकी और देखते हुये फिर पूछा ।

झुठो है तेरो लाला ! एक गूजरी बोल पड़ी ।

झुठो ? ऐसे मत बोल …….मेरो लाला झुठो नायँ !

चोर है तेरो लाला ! दूसरी बोल उठी ……..

ओये ! ऐसे बदनाम मत कर …..मेरे लाला को ब्याह नही होयेगो ।

गोपियाँ फिर चुप हो गयीं ………क्यों की इनका ध्यान कन्हैया पर ही है ………और ये कन्हैया को देखते ही सब कुछ भूल जाती हैं ।

फिर भूल गयीं ………….कि कहना क्या है ।

उलाहना तो बहाना है …….इन्हें कन्हैया को ही तो निहारना था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 46


(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 46 )

!! “कोई नींद खरीदो री”- गोपी प्रेम !!


वो गोपियाँ, जो गौओं का दूध दुहते समय, धान कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकों को सुलाते समय, रोते हुए बालकों को लोरी गाते समय, घर के आँगन में झाड़ू देते समय……ये प्रेमपूर्ण चित्त से, नयनों में अश्रु भरकर गदगद् कण्ठ से श्रीकृष्ण का ही गान करती रहती हैं…….तात विदुर जी ! इनसे बड़ा भाग्यशाली और कौन होगा……इसलिये इस विश्व ब्रह्माण्ड में धन्य अगर कोई हैं तो यही गोपांगनाएं ही हैं ।

तात विदुर जी ! गोकुल की गोपियाँ अब निरन्तर श्रीकृष्ण चिन्तन में ही लगी रहती हैं……..सोते, जागते, खाते, खिलाते हर समय इनके चित्त में वही माखन चोर ही गढ़ गए हैं……….

” री ! चित में माखन चोर गढ़ें”

“मेरे घर चोरी की”……ये कहते हुए गोपी कितनी आनन्दित होती ।

“मुझ से झुठ बोला उसनें”……ये कहते हुए गदगद् हो जाती ।

“मेरी बैयाँ मरोरी”…….उफ़ ये कहते हुए तो आत्म मुग्ध ही हो जाती ।

“मेरी मटकी फोरी”……आहा ! आत्मश्लाघा से भर जाती ।

कन्हैया , कन्हैया बस कन्हैया……..तात इसी यमुना के किनारे सुबह शाम मिलती थीं गोपियाँ……..और चर्चा होती……..पर चर्चा का विषय एक ही होता ……नन्दनन्दन ।

तात ! अब क्या ये गोपियाँ श्रीकृष्ण से अलग हैं ? इनका अन्तःकरण विशुद्ध रूप से श्रीकृष्णमय हो चुका है ।

प्रेम के अनेक रूप हैं ……….सख्य भी प्रेम है ……..वात्सल्य भी प्रेम है …..श्रृंगार तो प्रेम है ही । ये सब प्रेम की धाराएं हैं ………..अद्भुत हैं ………एक मापदण्ड नही होता इन धाराओं का ……….ये किस तरह, किस ओर बहेंगीं आप कह नही सकते तात ।

ज्ञान का एक मापदण्ड है ………योग का एक मापदण्ड है ……पर प्रेम का एक मापदण्ड ? हो ही नही सकता ।

रोना प्रेम, हँसना प्रेम , मनुहार करना प्रेम , गाली देना भी प्रेम , स्वीकार करना प्रेम, अस्वीकार करना प्रेम …….सोना प्रेम, जागना प्रेम ।

उफ़ ! ज्ञान पर बोला जा सकता है …….योग पर और अच्छा बोला जा सकता है …..पर प्रेम पर ?

कैसे बोलें तात ! और फिर इन “बृज गूजरी” का प्रेम ये तो सर्वोत्तम है…….इस प्रेम के लिये तो ब्रह्मा तक तरसते हैं ……..भगवान शंकर इन्हीं का भेष बनाकर बृज में गोपी बन जाते हैं ।

इनकी तुलना किससे तात !

उद्धव कुछ देर शान्त रहे …..फिर बृज की लीलाओं को सुनानें लगे ।

बाबरी हो गयी है क्या ये गोपी !……..सुबह से ही चिल्लाये जा रही है………और गोकुल की गलियों में पुकार मचा रखी है ।

कोई नींद खरीदो…….मेरी कोई नींद खरीदो………

गोकुल के लोग उसे देखते हैं…….पहले तो सोचते हैं कोई वस्तु बेच रही होगी …….फिर जब ध्यान से सुनते हैं …..तब हँस पड़ते हैं ।

नींद खरीदो ?

पर वो गोपी गम्भीर है……..और गम्भीरता में ही पुकार लगा रही है –

कोई नींद खरीदो ।

वो बारबार नन्द महल में भी जाती है ………….नन्द महल के चक्कर लगाती है …….और वही पुकार – कोई नींद खरीदो ।

गोकुल के लोग अपनें अपनें घर से बाहर आगये थे……..उस विचित्र गोपी को सुननें के लिये………..ये गोपी उन्हीं की थी ……..गोकुल की ही थी ………परिचित ग्वाले की पत्नी थी……सब जानते थे ………पर सबको विचित्र लग रहा था कि इसे हो क्या गया है ये ?

सुन सखी ! अपनी नींद मुझे दे दे …………

ये दूसरी बाबरी आगयी थी, और उसनें इस गोपी की नींद माँग ली थी ।

पर तू बेंचना क्यों चाहती है ? क्या तुझे नींद प्रिय नही है ?

हँसते हुए उस नींद बेचनें वाली से पूछ ही लिया था ।

वो तो बैठ गयी…..सिर पकड़ लिया…….नेत्रों से अश्रु बहनें लगे ।

बता तो ………..क्यों बेच रही है अपनी नींद ? फिर पूछा ……तब उस गोपी नें अपनें हृदय के भाव खोले ।

सखी ! मैं क्या बताऊँ ! मैने कन्हैया को एक दिन देखा ……..उसकी सुन्दरता ……उसकी चपलता , उसकी मोहनी मुस्कान …..वैसे तो मैने उसकी बातें खूब सुनी थी…….घर घर उसकी ही तो बातें हैं………पर सुननें में और देखनें में अंतर तो होता ही है ……

उस दिन मैने उसे देख लिया …….वो माखन चुरा कर गोपी के घर से निकल रहा था…….आहा ! उसका वो मदमाता पन , उसका वो अल्हड़ पन ………उसकी सुन्दरता …….मैं तो बस मुग्ध ही हो गयी ………कुछ देर के लिये जड़वत् हो गयी……….मुझे कुछ सुध न रही अपनी ………तब मैने देखा वो चला गया था आगे ……मैं भागी उसके पीछे………वो रुक गया मुझे देखकर ………

मेरी साँसें फूल रही थी भागते भागते …..और जब उसके पास गयी ……तब और साँस चढ़नें लगी …….

मैने झट् से उसका हाथ पकड़ लिया……..वो मुस्कुराते ही रहा ।

मैनें उस बाल गोपाल को चूम लिया इधर उधर देखकर ……….

वो फिर भी मुस्कुराता रहा …..उफ़ ! उसकी वो मुस्कुराहट ।

मैने उसके आगे हाथ जोड़ते हुए कहा ………मेरे घर आओ ना !

वो कुछ नही बोला………मैने फिर विनती करते हुए कहा ……आओ ना लाला ! कल मेरे घर आओ ना !

ठीक है …..कल रात्रि को आऊँगा…..मेरी प्रतीक्षा करना ।

वो पीताम्बरधारी ये कहते हुए भाग गया……और दूर जाकर रुका फिर बोला ……सोना नही …..प्रतीक्षा करना …..अवश्य आऊँगा ।

वो गोपी अपनी बात बता रही है ……………

फिर आगे क्या हुआ ? दूसरी गोपी नें पूछा ।

आगे ? आगे ……….उस दिन मैने आँगन बुहारा …………फूल फैलाये आँगन में …….शाम को जल का छिड़काव भी किया ………

और जल्दी अपनें परिवार को भोजन कराकर सुला दिया ………..और स्वयं प्रतीक्षा करनें लगी ……… लाला आएगा !

फिर आगे क्या हुआ ?

आगे ? आगे तो जैसे जैसे रात होती गयी ………..ठण्डी वयार चल रही थी ……….मुझे नींद आगयी ।

ओह ! दूसरी गोपी तुरन्त बोली ।

क्या नन्द के लाला आये थे ?

आये थे ………उन्होंने घर में प्रवेश भी किया पर मैं सो गयी थी ।

वो चले गए…….मुझे सोती हुयी देख कर चले गए ……… ..

गोपी रोनें लगी ……आज के बाद मैं कभी सोऊँगी ही नहीं ………..इसलिये मैं अपनी नींद बेचनें निकल पड़ी हूँ ।

अपनी आँसू पोंछे उस गोपी नें ।

दूसरी बोली ………मुझे दे दे अपनी नींद ।

पर, री ! तू क्या करेगी नींद का ? पहली गोपी नें पूछा ।

दूसरी गोपी हँसी ……..मेरे साथ भी एक घटना घटी है …………


रात में मैं थकी थी …………..काम बहुत किया था दिन भर मैने ……..तो ठण्डी हवा में चादर बिछा कर छत में सो गयी ………….

फिर क्या हुआ ? पहली गोपी नें पूछा ।

फिर ? फिर मैने एक सपना देखा ……अद्भुत सपना ।

कन्हाई मेरे घर आये……..मेरे घर के एक एक कक्ष को देखनें लगे ।

मुझे लगा शायद ये माखन खोज रहे हैं………….पर नही …..वो माखन नही खोज रहे थे …….वो तो मुझे ही खोज रहे थे ……….

मैं जैसे ही उसे दीखी ……….वो मुस्कुराये …………मानों फूल झर गए थे मेरे अंगना में …………मैं प्रेम के कारण रोमांचित हो रही थी …..

वो आगे बढ़े ……और दोनों हाथों को उन्होंने उठा दिया मेरी ओर …..

मानों मुझे कह रहे हों ……….मुझे गले लगा ………

आहा ! ऐसा सौभाग्य मेरा ………मैं जैसे ही आगे बढ़ीं और उसे उठानें लगी …….उसी समय धत् ! मेरी नींद खुल गयी सखी ।

इसलिये मैं कह रही हूँ कि मुझे अपनी नींद दे दे ।

तात ! विदुर जी ! ये स्थिति है बृज की ………..यहाँ सब बाबरे हो गए हैं …………कन्हैया के प्रेम में सब, सब भूल गए हैं ।

और ये प्रेम ? प्रेम की धारा कैसे बहेगी…….किस ओर बहेगी…..

इसे कौन जानता है …………ये तो बस प्रेम देवता ही जानें …….।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 45

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 45 )

!! “यह ऊधम सुनी सबहीं रिसाय”- बाल लीला !!


परस्पर जुड़े हुए तारों में से किसी एक पर भी स्वर लहरी का उदय हो जाए तो अन्य तार भी झंकृत हो ही उठते हैं …..ऐसे ही वात्सल्यमयी स्नेह से सनी प्रेमिन गोपियों के हृदय तन्तु पर श्रीकृष्ण, और उनकी लीलाएँ झंकृत हो उठीं हैं । तात ! पहले स्वर मात्र था ……..फिर संगीत प्रकट होनें लगा ……अब तो तालबन्ध में इन गोपियों के आगे कन्हैया नाचता है…….और ये आभीर कन्याएं नचाती हैं……..

“बृज” शब्द आज सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड में गूँज रहा है…….विदुर जी ! बृज का अर्थ होता है…….बृ , मानें ब्रह्म और र , मानें रज…….ये ब्रह्म का रज है …….बृज ।

ब्रह्म नाचता है यहाँ ……ब्रह्म उन्मुक्त खेलता है यहाँ…….ब्रह्म चुराता है यहाँ…….ब्रह्म छेड़ता है यहाँ……किसे ? विदुर जी नें हँसते हुए पूछा । उद्धव ! किसी और की वस्तु चुराता है …..किसी और को छेड़ता है ?

नही……..ये लीला स्वयं के लिये है……और स्वयं से है ।

न बृज अलग है ब्रह्म से……..न गोपियाँ अलग हैं …………

ये तो इतनी निर्दोष लीला है ……जैसे – छोटा सा बालक अपने प्रतिबिम्ब से खेलता है……ऐसे ही ये सब ब्रह्म की बिम्ब ही तो हैं ।

लीला है ये …….उस लीला धारी की………और लीला का कोई उद्देश्य नही होता तात ! बस अपनें आनन्द की अभिव्यक्ति ही मात्र है ये ।

वो आनन्द रूप है……..उसका स्वरूप आनन्द है ……..उसके परिकर आनन्द हैं …….वो आनन्द से ही निर्मित है ………..आहा !

उद्धव आगे की लीला सुनानें लगे –

सुबह सुबह उस गोपी के यहाँ नन्दनन्दन पहुँच गए थे……..कई दिनों से इसकी इच्छा थी , इसनें मनोरथ किया था कि ……मेरे घर कन्हैया पधारें …….पर आज ? आज तो अमावस्या है …….और अमवस्या के दिन इसके यहाँ सत्यनारायण की पूजा होती है ।

सुबह ही सुबह इसनें आँगन लीपा था…….और सुन्दर आँगन में एक लकडी का सिंहासन भी रख दिया था सत्यनारायण भगवान के लिये ………भोग – अमनिया बना रही थी ये गोपी ……..

तभी पहुँच गए ये नटखट नन्दकिशोर ।

भाभी ! राम राम ……रसोई में ही पहुँच कर राम राम कर रहे थे ।

गोपी नें पलट कर देखा ……बस – वो तो अतिआनन्द के कारण जड़वत् हो गयी ……….सुन्दर नन्द गोपाल , नीलमणी, घुँघराले बाल …….मुस्कुराता और चंचल नयन ………वो गोपी तो देखती ही रह गयी …..अद्भुत रूप ………..

भाभी ! “राम राम” नाय बोलेगी ?

वो बाबरी तो अपलक निहार रही है……क्या बोलना है ये भी भूल गयी है वो……मुस्कुरा रही है……और बस नन्द लाल को देखे जा रही है ।

ओ भाभी ! राम राम तो बोल दे ! फिर कहा कन्हैया नें ।

उसे सुध आयी अब……..अपनें आपको सम्भाला ……..इधर उधर देखा ….फिर गम्भीर बननें का स्वांग करती हुयी बोली……राम राम ।

क्या कर रही है तू भाभी ! उफ़ ! कलेजा चीर दिया हो, ऐसी मादक बोली……..और उसपर “भाभी” और सम्बोधन ।

मैं ? मैं तो सत्यनारायण भगवान के लिये पंजीरी भून रही हूँ ………

उस गोपी नें जैसे तैसे ये उत्तर दिया ।

सुनो ! लाला ! शाम को सत्यनारायण भगवान की कथा होगी …….अपनी मैया को कह देना ……वैसे मैं कल निमन्त्रण दे आयी हूँ …..इतना कहकर गोपी फिर चुप हो गयी ………उसके कान, कन्हैया आगे क्या कहते हैं ……….ये सुननें के लिये बेचैन से हो रहे थे ।

बैठ गए कन्हैया तो उस गोपी के पास ही……..उफ़ ! हृदय धड़कनें लगा उस गोपी का…….भाभी ! फिर मधुर वाणी कानों में घुल गयी ।

भाभी ! लो कन्धे में हाथ भी रख दिया अपनी भाभी के। ।

देह कांपनें लगा उस गोपी का ……….छू लिया था कन्हैया नें ……….विद्युत तरंगें दौड़ पडीं सम्पूर्ण शरीर पर ………वो कांपनें लगी ……….फिर पलट कर देखा कन्हैया की ओर ………वो तो मुस्कुरा रहे हैं ………..उनकी वो मुस्कुराहट ……….गोपी अपनें आपको सम्भाले हुए है …….पर ऐसे ही ये यहाँ बैठे रहे तो कब तक अपनें आपको सम्भाल पायेगी …..फिर तो इसे लिपट ही जाना पड़ेगा कन्हैया से ।

लाला ! मुझे काम करनें दो ना ! ये बात भी प्रार्थना के स्वर में कह रही थी ये गोपी….हाँ हाँ कर लो काम ……हम कहाँ मना कर रहे हैं भाभी !

मटकते हुये कन्हैया बोले ।

तुम जाओगे तभी तो मैं आगे का काम कर पाऊँगी…….गोपी भी बोली ।

झूठो दोष लगावे ? ऐसा कहते हुये अपना हाथ हटा लिया गोपी के कन्धे से ……………डर गयी गोपी तो …….उसे डर ये लगा कि कहीं लाला रिसाय न जाये ……….तुरन्त पीछे मुड़ कर देखा ……..क्यों की लाला रूठ गया तो जगत ही रूठ जायेगा इन गोपियों का तो ।

मुस्कुरा रहे थे कन्हैया ………..गोपी को तसल्ली हुयी ।

भाभी ! तेरे सत्यनारायण भगवान कहाँ हैं ? इधर उधर देखते हुए कन्हैया नें ऐसे ही पूछ लिया ।

क्यों ? तुम्हे क्यों चाहिए सत्यनारायण भगवान ? गोपी नें पूछा ।

नहीं ………मैया आवेगी ना शाम को कथा सुननें…. .पर मै तो नही आपाऊंगा ….तो मैने सोचा है कि उनके दर्शन नहीं तो कमसे कम उनके सिंहासन के ही दर्शन कर लूँ ।

गोपी मुस्कुराई……..बाहर है सिंहासन…….पर जाना नही …….छूना नही………सत्यनारायण भगवान तो भीतर हैं ………बाहर सिंहासन है कर लो दर्शन । गोपी नें कह दिया ।

जाऊँ ? मुस्कुराते हुए पूछनें लगे……..गोपी का हृदय तो बड़ी तेजी से धड़क रहा है ……उनकी मुस्कुराहट देख देख कर ही ।

कैसे कह दूँ लालन ! कि तुम चले जाओ ।

अब तो उठ ही गए……..और उठकर बाहर चले आये ।

सिंहासन बाहर है…..आँगन लीपा हुआ है गोबर से……कन्हैया नें देखा…….तुरन्त शरारत सूझी……..

भाभी ! भाभी ! भाभी ! जोर जोर से चिल्लाना शुरू किया कन्हैया नें ।

भीतर पंजीरी भून रही थी गोपी, उसनें सुनी आवाज……….अब पंजीरी छोड़कर जाए तो जल जायेगी ये ………….तो इसनें भी भीतर से ही आवाज दी ………क्या है ? क्यों चिल्ला रहे हो ?

देख तेरे सत्यनारायण भगवान ! और हँसते जा रहे हैं….जोर जोर से हँसते जा रहे हैं ……….ताली बजाकर लोट पोट हो रहे हैं ।

गोपी दौड़ कर बाहर आयी ……….और जैसे ही देखा ……….

कुत्ते के दो पिल्ले सिंहासन में बैठा दिए थे …………..और हँसते हुए कहते जा रहे थे……. …..तेरे सत्यनारायण भगवान !

हे भगवान ! गोपी सिर पकड़ कर बैठ गयी थी ……….चंचलता की पराकाष्ठा …………….

” परमानन्द दास को ठाकुर, पिल्ला लाओ घेर “

उद्धव के मुख से ये प्रसंग सुनकर विदुर जी हँसते हुए नेत्रों से अश्रु प्रवाहित करनें लगे थे …..आहा ! क्या लीला है ये ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 44


(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 44 )

!! उफ़! ये ऊधम – बाल लीला !!


मन कहीं और नही जाएगा तात ! मैं मानता हूँ मन ऊधमी है …..पर इस नन्दनन्दन के आगे ये हाँफ जाएगा…..भले ही ये मन बड़े बड़े योगियों को नचाता हो …….पर नन्दनन्दन के आगे इसकी कुछ नही चलती ।

कहते हैं – ये मन भागता बहुत है ……वायु से तेज प्रकाश की गति है ….पर प्रकाश से तेज गति मन की है ……तात विदुर जी ! पर हमारे नन्दनन्दन की गति तो विचित्र है …..ये बड़ा टेडा मेडा चलता है…….मन कहाँ पकड़ पायेगा इस नन्हे से सुकुमार को……..चंचल है मन …..भले ही लाख चंचल हो ……पर ये हमारा कन्हाई मन का बाप है ……..अजी ! फंस जाएगा बुरी तरह ये मन , बंध जाएगा उस नन्दनन्दन की पीली पीताम्बरी में ………कस देगा अपना कन्हैया मन को ।

बताइये तात ! कोई और इतनी सरल साधना है जो मन को बाँध दे ?

नही , बस यही एक साधना है……”उस नटखट कन्हैया का चिन्तन” ।

उस चंचल का चिन्तन करो ………उस चंचल कन्हैया के लीला रस में डूब जाओ …….मन अपनें आप बंध जायेगा .।

दौड़ेगा मन ? इधर उधर भागेगा मन ? नही तात ।

उद्धव बोल रहे हैं – कन्हैया बराबर ये दौड़ पायेगा ?

विदुर जी बहुत प्रसन्न हैं उद्धव से …….तुम्हे क्या दूँ मैं ? उद्धव ! तुम मुझे अमृत का दान दे रहे हो ……..ये लीलामृत है ………इसके बदले मैं तुम्हे कुछ दे भी नही सकता ……..क्यों की मणि के बदले काँच नही दी जाती उद्धव !

तुम सुनाओ ……….नही नही ….तुम सुना नही रहे ……तुम तो दर्शन करा रहे हो उन लीलाओं का …………धन्य हो उद्धव ! तुम धन्य हो ।

.साधू ! साधू साधू !

विदुर जी नें आगे कन्हैया की लीला सुननी चाही ।

उद्धव भाव में भींगें लीला रस का गान करनें लगे थे ।

ईर्श्या , जलन, – वो “भागवान” तो मैं क्यों नही ?

हँसे उद्धव ………..ये ईर्श्या ज्ञान में बाधक है ………पर प्रेम की नगरी में आते ही ये ईर्श्या भी काम की बन जाती है .।

“प्यार में जलन भी मधुर है”

अब गोपियों के मन में ईर्श्या जागनें लगी ……..क्यों की –

“बृज घर-घर यह प्रकटी बात !

दधि माखन चोरी करि लै, हरि ग्वाल सखा संग खात ।”

प्रभावती के यहाँ माखन खाया यशोदा के लाल नें………फिर दूसरी गोपी के यहाँ भी…….और ये सब अन्य गोपियों को बता रही हैं …….गोकुल में बात फ़ैल रही है ……….अन्य गोपियाँ मन में सोच रही हैं ………भागवान हैं ये गोपी तो, जिनके यहाँ कन्हैया नें माखन खाया ……वो नीलमणी …..वो साँवरा नन्हा सा सुकुमार ……..उफ़ !

ऐसा विचार करतीं अन्य गोपियां ………और उन गोपी से जलतीं जिनके यहाँ कन्हैया माखन खानें गए …….”मेरे यहाँ कब आओगे !

आह भरकर गोपियाँ विधाता को मनातीं…………”मेरे भाग जगा दो …..मेरे यहाँ नन्द लाल को बुला दो” ………उनकी यही प्रार्थना होती ….ये सुबह तुलसी में जल चढातीं ……तो यही मांगती कि …..मेरे यहाँ कन्हैया आज आये …………सूर्य को जल देतीं तो यही कहतीं ……..मेरे घर आज कन्हैया को भेज दो ……….फिर कल मैं भी यमुना किनारे चटखारे ले लेकर कन्हैया के बारे में सब को बताउंगी ……..अपनें कुल देवता को मनातीं तब भी यही कहतीं ……..कन्हैया मेरे घर आजाये ।

एक गोपी है ……….”सुबला”…….ये अन्य गोपियों से थोड़ी तेज है ……मैं तो पिटाई करूंगी ……..मेरे यहाँ आया तो कन्हैया ।

हाय ! तू उस फूल से कोमल कन्हैया को मारेगी ?

हाँ ………ये कहते हुए वो मन ही मन प्रसन्न होती……उसे पता था कि उसके यहाँ कन्हैया आएगा ही नही……क्यों की झगड़ालू ये सब गोपियों में ज्यादा थी ……..छोटी छोटी सी बातों में बस झगड़ा करती …….इसलिये गोपियाँ भी इससे दूर ही रहतीं ।

मन ही मन सुबला कहती – मेरे यहाँ तो कन्हैया कभी नही आयेगें…….पर आगये तो ? पता नही क्यों उसके मन में ये विचार उठते ही गुदगुदी सी होनें लगती …….वो आनन्दित हो उठती …….पर ये भाव किसी के सामनें व्यक्त न करती………बस मन ही मन मुस्कुराती कन्हैया के बारे में सुनकर ।

एक दिन सुबला –

प्रभात की वेला होनें जा रही थी …….यमुना से जल भर कर ये लाई थी

गोष्ठ में गोप चले गए थे……और गोष्ठ से ही यमुना स्नान के लिये ।

घर में उस समय कोई नही था………

सुबला घर में आयी …….”कन्हैया कान्हा रे , कन्हैया कान्हा रे” ……गुनगुनाती हुयी मटकी में जल भर कर ले आयी थी ……..रसोई में जल रख दिया ……….जल रखनें के बाद भी गुनगुना ही रही थी …….पर वो एकाएक चुप हो गयी …….उसे लगा की गोरस वाले कक्ष में कोई है …..पहले तो उसे लगा कि बिल्ली होगी ………पर कक्ष से जो सुगन्ध आरही थी …..वो मन मोहनें वाली थी……गवाक्ष् से उसनें झाँका ………..उफ़ ! पहले तो उसे अपनें नेत्रों पर भरोसा ही नही हुआ …..पर आँखों को मलकर जब देखा तो चकित थी ।

नीलसुन्दर श्याम , पीताम्बरी ओढ़े हुए ………नीचे काछनी बाँधे ..मोर का पंख सिर में ……….अधर गुलाबी ……….श्रीअंग से ही सुगन्ध की वयार चल रही है ………और ये सुगन्ध ऐसी कि किसी को भी मदहोश कर दे …………..

उफ़ ! वो सुबला देखती रही …….अतिआनन्द कारण जड़ जैसी हो रही थी वो……उसे कुछ समझ नही आरहा था….वो बस देखती जा रही थी ।

नीलमणी आगे बढ़ रहे थे ………दीप के उज्वल प्रकाश को अपनी फूँक से बुझा रहे थे ………..कई दीये थे बारी बारी से सबको बुझा दिए ……उनकी सुरभित श्वास, उफ़ ! सुबला देख रही है ।

सारे दीये बुझ गए थे …….अब निश्चिन्त हो गए लाला ……….कि उन्हें कोई देख नही रहा ………माखन मटकी के पास बैठकर प्रसन्न मन से माखन खानें लगे थे अब ।

सुबला ठगी सी देख रही है ……….उसके देह में रोमांच हो रहा है ……प्रेम के कारण वो काँप भी रही है ……..मन्द मन्द मुस्कुरा रही है …….नेत्रों से उसके अश्रु बह रहे हैं……..आहा !

कब तक नन्दनन्दन का ये भोग चलता रहा …..उसे कुछ पता ही नही …….उसके लिये तो क्षण भर का ही था ।

मटकी खाली हो गयी थी माखन से…….अब बड़े प्रेम से वे निकले बाहर ……और जैसे ही बाहर निकले…….सामनें खड़ी है सुबला ….

ये चाहते तो भाग सकते थे ………..पर नही भागे ……सुबला के सामनें ही खड़े रहे……मुस्कुरा और दिए ……..सुबला थोड़ी देर तो देखती रही …….अपलक निहारती रही…….मुग्ध हो गयी थी ये ।

पर एकाएक फिर होश में आगयी……”छोडूंगी नही तुम्हे”…..और कन्हैया का हाथ पकड़ लिया…..पर कोमल है हाथ तो …अत्यन्त कोमल …….पकड़ ढीली कर दी……और बोली – चलो मैं छोडूंगी नही …….तो कहाँ ले जायेगी तू ? मधुर वाणी कानों में अमृत रस घोल रही थी ।

बृजरानी के पास……वो तेरी पिटाई करेंगी ।

चल …………कन्हैया की और ज्यादा देखनें की भी हिम्मत नही है इस सुबला में …….ये देखती रही तो सबकुछ भूल जायेगी ……इसलिये कन्हैया का हाथ पकड़ा और ले चली नन्द महल की ओर ।

“हाय ! तेरे ससुर जी” ………..कन्हैया नें धीरे से कहा …………

कहाँ हैं ? शरमा कर घूँघट कर लिया सुबला नें ।

कन्हैया हँसे …….खूब हँसें…….सुबला आनन्दित हो रही है मन ही मन …….पर बाहर से कहती हैं………तुम्हारी मैया, आज पीटेगी तुम्हे ।

मेरी मैया को अपनें पुत्र पर भरोसा है……..खिलखिलाते हुए कह रहे हैं …..अच्छा ! चल तो बताउंगी कि – “मेरे घर तेरे लाला नें चोरी की है” ।

तुझे दया न आएगी ? कन्हैया फिर मासूमियत से बोले ।

तू तो मेरी है ना सुबला ! फिर ?

हाय ! सुबला तो बस प्रेम सिन्धु में डूब ही गयी थी ये सब सुनकर ।

मार्ग में ग्वाल बाल सब मिल रहे हैं कन्हैया को …………सब इशारे में पूछ रहे हैं ……..क्या हुआ ? पकड़े गए साहब आज ?

पर तभी कन्हैया नें इशारे से सुबला के देवर को बुलाया ……..वो जा रहा था उधर से ही ………सुबला के देखनें का प्रश्न नही …..क्यों की घूँघट जो काढ़ा है उसनें ।

सुबला ! ओ सुबला ! कन्हैया बोले ।

हाँ ……….क्या बात है, सुबला नें पूछा ।

मेरा ये हाथ दूख रहा है ……..दूसरा पकड़ ले ………कन्हैया बोले ।

सुबला का हृदय कराहनें लगा ……..ओह ! इनके कितनें कोमल हाथ हैं और मेरे हाथ कठोर हैं ………..लाओ ! दूसरा हाथ ।

सुबला के देवर को पास में ही खड़ा कर रखा था……..”ले दूसरा हाथ”……देवर का हाथ पकड़वा कर कन्हैया भागे अपनें महल की और……..ग्वाल बाल सब हँसते हुए उछलते हुए कन्हैया के पीछे चल दिए ।

सुबला देवर को पकड़ कर चली जा रही है नन्द महल ।

कौन है ये ? हँसती हुयी गोपियाँ मार्ग में सुबला से पूछ रही हैं…….

कन्हैया ! देखो कन्हैया ! आज मेरे घर में चोरी की है इसनें ।

सब गोपियां कहतीं ………बाबरी हो गयी है ये सुबला ……..देवर को पकड़ के कहती है कन्हैया को पकड़ा है ।

इस तरह नन्द महल में पहुँच तो गयी सुबला ……अब आगे ?

बृजरानी !

निकलो बाहर ! देखो ! तुम्हारे लाला को पकड़ कर लाई हूँ ..........

कन्हैया बृजेश्वरी की गोद में बैठे हैं………और हँस रहे हैं …….खूब हँस रहे हैं ताली बजा बजाकर हँस रहे हैं …..और इशारे से अपनी मैया को कह रहे हैं ……….देख मैया ! पीछे, किसे पकड़ कर लाइ है ।

अब तो बृजरानी भी हँसनें लगीं……….सुबला बोली ……….पिटाई नही करोगी बृजरानी अपनें लाला की !

बृजरानी नें अपनी हँसी रोकी और बोली …….यहाँ बृजराज नही हैं …….न तेरे ससुर हैं ….घूँघट खोल और देख !

सुबला नें जैसे ही घूँघट खोला …………..नमस्कार ! हाथ जोड़कर कन्हैया बोल पड़े जो बृजरानी की गोद में थे ।

तुम ? तो मेरे पीछे कौन है ? सुबला नें जैसे ही पीछे देखा …….उसका देवर रो रहा था ……और कह रहा था ……..भाभी ! आज तो भैया से शिकायत करूँगा ………सुबला के कुछ समझ में नही आरहा कि ये हुआ कैसे ?

सुबला नें सिर झुका लिया ………उसे बड़ी शर्म आरही थी ।

फिर धीरे धीरे कन्हैया को एक नजर देखती हुयी वो चल पड़ी ….नन्दालय से …….बृजरानी उसे बुलाती रहीं पर वो चली गयी ।

सुबला ! ओ सुबला ! मधुर आवाज फिर कानों में गूँजी ।

वो रुकी ………..कन्हैया पीछे भागे हुए आरहे थे …………..

क्या है ? जब मुखचन्द्र देखा कन्हैया का ………सुबला फिर सहज हो गयी …….मुग्ध होकर देखनें लगी ।

सुन ! आजके बाद मुझे पकड़ना मत …..सुबला ! आज तूनें मुझे पकड़ा तो मैं तेरा देवर बन गया ……..फिर कभी पकड़ा ना ….तो मैं तेरा “खसम” बन जाऊँगा ………….ये कहते हुए कन्हैया भागे …………..पर सुबला तो बाबरी सी उस रूप माधुरी में डूब गयी थी ………..वो खड़ी रही वो देखती रही ……..फिर हँसनें लगी ……….देवर जा रहा था …..उसे बुलाकर पीटनें लगी ……..और खूब हँसती जा रही है ।

उद्धव हँस रहे हैं …….विदुर जी हँसते हुए लोटपोट हो रहे हैं यमुना की बालुका में ………उफ़ ! ये कन्हैया का ऊधम ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 43


(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 31 )

!! “तस्कराणां पतये नमः”- बाल लीला !!


तात विदुर जी ! वेद कहते हैं…..तस्कराणां पतये नमः……

वेद भी हाथ जोड़कर कन्हैया को नमन करते हुये कहते हैं ……..हे चोरों के सरदार ! हम आपको नमस्कार करते हैं ।

ये चोर है ……पर ये चोरी उसी के यहाँ करता है ……जो अपनें द्वार खुला रखे …….मन के द्वार……..मन इस चोर के स्वागत के लिये आतुर हो …….ये उसी के यहाँ चोरी करता है…….फिर तात ! सब कुछ चुरा लेता है ……माखन तो बहाना है…….अजी ! ये आपके दुःख शोक सन्ताप दरिद्रता, इतना ही नहीं तुम्हे भी चुरा लेता है ।

पर उद्धव ! श्रीकृष्ण चोर हैं ? विदुर जी नें बीच में टोका ।

मैने कब कहा वे चोर हैं…….वे चोर नही ….चोरों के राजा हैं तात !

उद्धव नें हँसते हुए उत्तर दिया ।

पर चोर ? विदुर जी नें फिर टोका । चोर कहना अच्छा नही लग रहा मुझे ………..विदुर जी बार बार कह रहे हैं ।

तात ! इस जगत में कौन चोर नही है……..उद्धव हँसते हुए बता रहे हैं ……….सब चोर हैं ………क्या इस जगत में राजा चोर नही है ? वो प्रजा के धन की चोरी नही करता ? और प्रजा भी तो चोर है ……..जो राजा की चोरी करती है……..उद्धव बोले ……….वैसे तात ! आप जानते ही हैं ……….पाँच चोर सबके ही भीतर हैं …..चाहे पुरुष हों या नारी …….काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर ……….ये सबके अंदर हैं ।

हँसे उद्धव ……. मनुष्य ही क्यों देवता भी चोर हैं……..देवराज इंद्र ही सबसे बड़ा चोर है …..अहिल्या प्रकरण किसी से छूपा नही है ….सृष्टिकर्ता ब्रह्मा चोर हैं तात ! वृन्दावन में आकर ग्वालों की और गायों की चोरी की….आगे प्रसंग आएगा ।…….हँसते हुए आगे उद्धव बोले …..और सबसे बड़े चोर तो महादेव भगवान शंकर हैं…….जो भी “शिव शिव” बोलता है उसके पाप अवगुण सबकी चोरी कर लेते हैं ।

और इन सबकी बातें हम छोड़ भी दें तो चोर तो ये निश्छल हृदय वाले सन्त भी हैं ……जो किसी और की चोरी नही ….स्वयं श्री हरि के हृदय की चोरी कर लेते हैं …..क्या ये बात सही नही है तात ?

फिर क्यों कन्हाई को ही दोष दिया जाता है …..ये तो सिर्फ माखन की ही चोरी करते हैं ना ?

विदुर जी आनन्दित हो उठे उद्धव की बातें सुनकर …………बोले – मैं तुम्हारे मुख से ये सब सुनना चाहता था ……..आहा ! ये चोर है ये चोरों का सरदार है ….मेरे मन को भी इसनें ही चुराया है ।

अब सुनाओ इस प्यारे चोर की कथा……..सुनाओ उद्धव ।

विदुर जी नें अत्यधिक भावोन्माद में भरकर उद्धव को कहा था ।


गोपी प्रभावती सबको बता रही है ……..और बताते हुए स्वयं आनन्द सागर में डूबती भी जा रही है ……..गोपियाँ पूछती हैं – क्या हुआ तुझे ऐसा, कि तू हर समय हँसती है आजकल ……….और अकारण हँसती है …….बता क्या हुआ प्रभावती ?

तब प्रभावती सबको बताती है – आहा ! वो नीलमणी मेरे घर आया ……मैं छुप गयी थी ………मैं उसे देखती रही छुप कर ……उफ़ ! क्या बताऊँ, मैं आगे बता नही पाऊँगी …………प्रभावती की बातें सुनकर सब गोपियाँ भी मुग्ध हो जाती ……….तू झुठ तो नही कह रही ? अपनी कसम , अपनें खानदान की कसम ……..मैं क्यों झुठ बोलनें लगी ….प्रभावती कहती जाती है ……..वो आजकल चलती नही है उड़ती है …..उसके पैर धरती पर कहाँ पड़ते हैं ………..उसके यहाँ नन्दनन्दन जो आगये ।

ये दूसरी ग्वालिन है …………प्रभावती की बातों का इसपर ज्यादा असर हो गया है ………..और इसनें भी देखा है मुँह बनाते हुये नन्दनन्दन को ……….उसका मुँह बनाना इसके भी जिया में छप चुका है ।

ये अब जा रही है नन्द के महल की ओर……..कोई कारण नही है …….बस प्रभावती की बातों का असर ।

बृजरानी ! कहाँ है कन्हैया ? ये क्या प्रश्न हुआ ?

पर बृजरानी भी किसी कार्य में व्यस्त थीं इसलिये कह दिया उन्होंने वो पास में कदम्ब वृक्ष के नीचे बैठा है ।……..”ठीक है” कह कर वो गोपी वहाँ से चली गयी …….पर पीछे से बृजरानी नें आवाज दी ……..”अरी ! लेती आना कन्हैया को” …….ठीक है …..उसनें भी कह दिया ।


दो घड़ी पहले ही खूब वर्षा हुयी है………बारिश घनघोर हुयी थी ……अब तो बादल छंट गए हैं……..अब तो मानों वर्षा रानी नें आकाश में बन्दनवार टाँग दिया…….इंद्र धनुष आकाश में फ़ैल गया है ।

कदम्ब वृक्ष के नीचे………..मनसुख की गोद में सिर रखकर आकाश के उसी इंद्रधनुष को बड़े ध्यान से देख रहे हैं कन्हैया ।

और आकाश के उस धनुष के रंगों को गिन भी रहे हैं …………मनसुख गिननें में सहायता कर रहा है ……….घुँघराले बाल आज रह रहकर कन्हैया को परेशान किये जा रहे हैं …..बारबार आँखों में आजाते हैं …..इन केशों को बाँधना शायद आज भूल गयीं बृजरानी ………नही नही ……भूली नही ………उछलते खेलते हुये ये बिखर गए हैं …..पर बहुत सुन्दर लग रहे हैं…….ऐसा लग रहा है कि बादलों में चन्द्र छुप गया हो …………

गोपी दर्शन कर रही है दूर से ।

उफ़ ! क्या रूप माधुरी है ……..लाल लाल अधर ………..मुँह मटका के बोलनें की प्यारी अदा…….तिरछी चितवन…. ……ऐसा लग रहा है कलेजे में बरछी मार रहा है ये ।

गोपी तुरन्त दुःखी हो गयी …….उस गोपी के हृदय में विषाद नें जगह बना ली ……..”प्रभावती का घर तो पास था इसलिये ये चले गए ……पर मेरा घर तो….ये कहाँ आएंगे मेरे घर ! “

मन उदासी से भर गया था उस गोपी का ……वो अपलक देखे जा रही है ……….पर दुःखी हो रही है ये सोचकर की ……..मेरे घर तो नही ही आएंगे ।

वो चल पड़ी धीरे धीरे अपनें घर की ओर ……बाबरी, बृजरानी नें कन्हैया को बुलानें को कहा था ये भी भूल गयी ……….ये सब कुछ भूल गयी है …….ये तो अपनें आपको ही भूल गयी है आज ।

घर में पहुँची ………….कुछ समझ नही आरहा इसके ………..

दोपहर का समय है ………..परिवार के लोग काम पर गए हैं ……..अकेली है ये घर में ………पर ये क्या ! इसे तो चारों ओर कन्हैया ही कन्हैया दिखाई देनें लगे ………….ये बाबरी ही हो गयी थी ।

मटकी ली …….और मन्थन करनें लगी ……करे क्या ?


मनसुख ! कन्हैया नें नाम लेकर कहा ।

हाँ …….मनसुख नें भी पूछा ।

यार ! तू इतना दुबला पतला क्यों है ?

मेरी मैया खानें नही देती……मुँह फट है मनसुख कुछ भी बोल देता है ।

तो तू स्वयं लेकर खाया कर ………..कन्हैया बोले ।

घर में कुछ होता ही नही , तो खाऊँ क्या ? मनसुख बोला ।

पड़ोस में तो होता है ……..किसी गोपी के यहाँ जाकर खा …..।

गोपी माखन देगी ? मनसुख नें कन्हैया से ही पूछा ।

अच्छा …..नही देती है क्या ?

ना जी ! मथुरा में बेच देती हैं माखन …..पर यहाँ नही देगी ।

हूँ ………..कन्हाई कुछ सोचनें लगे ………….फिर एकाएक सामनें एक सखा जा रहा था ………..कन्हैया का ही भाई था ये …….भद्र …..उपनन्द जी का बेटा ……….।

भद्र ! भद्र !

कन्हैया से छोटा है ……ज्यादा छोटा नही है ……कुछेक महिनें का अंतर है ……….कन्हैया नें आवाज देकर बुलाया ।

भद्र आगया ……….उछलते कूदते हुये आगया ।

क्या है ! बताओ क्या है ?

सुन चोरी करेगा ? बड़े गम्भीर होकर कन्हैया नें पूछा था ।

ना ! मैं तो नही करूँगा ……मनसुख नें पहले ही बोल दिया ।

हट् ……..आज कह रहा है चोरी कर …..कल कहेगा डाका डाल ………तू बड़ा विचित्र है रे नन्द के । मनसुख बोले जा रहा है ।

देख यार ! माखन की चोरी ……….कोई सोना चाँदी की नही …….कन्हैया नें मनसुख के पीठ में एक थप्पड़ मारा ……….माखन की चोरी ……….और ये चोरी नही है ।

माखन की चोरी ? खुश हो गया मनसुख …………

भद्र ! तू चलेगा ? भद्र सीधा सादा है ……….ज्यादा बोलता नही है ……कन्हैया की हर बातें आँखें बन्दकर के मान लेता है ……….

मधुमंगल ! ओ मधुमंगल !

ये भी सखा है …….इसको भी आवाज देकर कन्हैया नें बुला लिया ।

हट् दारिके ! चोरी ? और हम ? ना ये काम हम से नही होगा ।

मधुमंगल नें साफ़ मना कर दिया ।

और सुन ! तू भी मत कर …..तेरो बड़ो नाम है ……..नाम खराब है जायगो तेरो………मधुमंगल बोले जा रहा है ।

अच्छा ! खराब है जायगो तो कहा होयगो ? कन्हैया नें पूछा ।

तेरो व्याह नही होयगो ……….मधुमंगल बोला ……तो कन्हैया हँसे ……बोले ……तू चलेगो या नही ? हम तो जा रहे हैं ……

कन्हैया जानें लगे तो सब पीछे पीछे चल दिए…….और मार्ग में जो जो सखा मिल रहे थे ….उनको भी लेते चले कन्हैया ।

उद्धव आनन्दित होते हुए बोले – उसी गोपी के यहाँ गए कन्हाई ।


वो गोपी माखन निकाल रही थी ……..मन्थन हो चुका था ………और माखन निकालनें के लिये वो बर्तन लेने गयी ………….

देख लिया कन्हैया नें …………बस उसी समय मटकी के पास कोई नही है ऐसा देखकर सब ग्वाल बाल घुस गए ………..आगे आगे सरदार कन्हैया ।

समझा दिया था सबको कि विलम्ब नही करना……..माखन निकाल कर खा लेना…….और कुछ ले लेना ………भाग जाना उसी समय ……भैया ! पकड़े मत जाना बस ।

ग्वालों नें माखन लिया …….और खाना शुरू ………..कन्हैया नें माखन का एक लौंदा लेकर मुख में डाल लिया …….दूसरा लौंदा हाथ में …..

तभी गोपी आगयी बर्तन लेकर……जिसमें माखन निकालना था उसे ।

बस ….उसी समय सब ग्वाल बाल भागे ……….

कन्हैया भागनें वाले थे……पर गोपी उनके सामनें ही आकर खड़ी हो गयी ……….अब वो भागे नही …..खड़े रहे ….और मुस्कुरानें लगे ।

उफ़ ! गोपी नें देखा ……..गालों में माखन लगा है …….हाथ में माखन लगा है ……..पेट में माखन लगा है ………और इस पर मुस्कुरा भी रहे हैं ……..गोपी की बुद्धि काम नही कर रही ……..गोपी का मन मयूर तो नृत्य कर रहा था …….उसनें ये सोचा भी नही था कि आज ही मनोरथ की थी और आज ही पूरी भी हो जायेगी ।

सामनें कन्हैया खड़े हैं ……..गोपी अपनें आपको नोचती है ………कहीं मैं सपना तो नही देख रही ……पर नही ….ये सपना नही था कन्हाई सामनें खड़े थे…..पर कुछ तो कहना पड़ेगा ……..

क्यों आये यहाँ ? बेचारी जैसे तैसे इतना ही बोल पाई ।

कन्हैया नें मुस्कुराते हुये इशारा किया ……..नीचे झुक ……..गोपी नीचे झुकी……तो बड़े प्यार से कन्हैया नें उसके कान में कहा ……..”.तूनें तो बुलाया था”………..ओह ! गोपी तो वहीँ गिर गयी भावोन्माद के कारण …..देह सुध नही है उसे …….वो बस गिरकर भी मुस्कुरा रही है ।

कन्हैया नें जब देखा ये गिर गयी ……..अत्यधिक भाव के कारण गिर गयी है ……तब मुस्कुराते हुये उसको लांघ कर निकल गए बाहर ।

वो बाबरी गोपी कब तक इस अवस्था में रही……..कहते हैं – एक मास तक वो गोपी कभी हँसती, कभी भावातिरेक के कारण रोती
कभी नन्दालय में जानें की जिद्द करती ।

तात विदुर जी ! ये माखन की चोरी कहाँ है …..ये तो मन की चोरी है ।

है ना ?

शेष चरित्र कल –

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 42

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 42 )

!! “गए श्याम तिहिं ग्वालन के घर”- बाल लीला !!


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कन्हैया को कोई बुलाये….हृदय से बुलाये….तो ये क्यों नही जाएगा ?

इसे कोई और भाषा समझ में ही कहाँ आती है…..इसे तो बस हृदय की भाषा यानि प्रेम की भाषा ही समझ आती है ।

जी ! ये नन्दनन्दन है ……प्रेम के बन्धन को ही ये स्वीकार करता है ….बाकी तो – ये खम्भे को भी फाड़ दे……समुद्र को रोक दे ……काल को पटकनी दे दे…….पर प्रेम की डोरी…..जो झीनी है …….बहुत झीनी है …..उसे ये नही तोड़ पाता……अजी ! ये प्रेम के हाथों बिक जाता है ।

तात !

उद्धव, विदुर जी को सम्बोधन कर रहे हैं ।

प्रसन्न हैं उद्धव ……..और प्रसन्न हों क्यों नहीं…….उनके “प्रिय” की चर्चा जो हो रही है…….और चर्चा ही नही …..उनके बाल लीला का गान हो रहा है……उद्धव प्रसन्न हैं ।

विदुर जी के नेत्रों से अश्रु बह रहे हैं………उद्धव ! कितनी विचित्र बात है ………मणि स्तम्भ में अपनें प्रतिबिम्ब को देखकर वो मोहित हो जाते हैं………सुखद आश्चर्य ! ओह ! जिनके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत की सृष्टि हो रही है ……पालन हो रहा है और संहार भी हो रहा है ……और जगत का संहार होनें के बाद भी वो अखण्ड अबाध हैं …..ज्ञान स्वरूप हैं…….और स्वयं प्रकाशमान हैं………इनके द्वारा ही ब्रह्मा की उत्तपत्ति है …….पद्मयोनि ब्रह्मा को भी ये सृष्टि के प्रारम्भ में ही ज्ञान प्रदान करनें वाले हैं………..उद्धव ! वो मणि के खम्भों में अपना प्रतिबिम्ब देखकर स्वयं मोहित हो जाते हैं………उफ़ ! क्या लीला है ।

विदुर जी भाव में डूब गए हैं……….

उद्धव ! सुनाओ…..उन नन्दनन्दन की लीलाओं को सुनाओ…….उद्धव ! तुम जितना मुझे सुनाते जा रहे हो ना श्रीकृष्ण लीला ……मेरी प्यास और बढ़ती ही जा रही है…….आहा !

घड़ी भर के लिये विदुर जी कुछ बोल न सके…….उनकी वाणी अवरुद्ध हो गयी थी……..उनके हृदय में बालकृष्ण खेलनें लगे थे ।

उद्धव ! क्या उस बड़भागन ग्वालिनि प्रभावती के यहाँ कन्हैया गए ?

गए होंगें, अवश्य गए होंगे …..वे तो भाव के भूखे हैं …….मेरे जैसे अपात्र दासी पुत्र विदुर के यहाँ आकर केले के छिलके खा सकते हैं ………तो ये प्रभावती तो प्रेमिन है ……..अद्भुत प्रेम से लवालव है इसका हृदय तो …..और इसका ही क्यों ……बृज के हर जीव का हृदय प्रेम से भरा है और जब ये कन्हैया को देखते हैं तो उबाल आजाता है ……….वो प्रेम छलकनें लगता है …….आहा ! उद्धव ! सुनाओ मुझे …….आगे क्या हुआ उस प्रभावती का ? विदुर जी नें भाव में भरकर ये बात पूछी थी ।

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प्रभावती चल दी थी अपनें घर की ओर…..नन्दमहल के पास में ही इसका घर था…….सबकुछ भूली हुयी है ये……इसे अपनें देह का कुछ भान नही है……..पैर कहाँ पड़ रहे हैं इसके, इसे कुछ पता नही है ।

गुनगुना रही है …………….

” आज मोरे अंगना में आओ नन्द लाल , दर्शन की प्यासी गुजरिया रे “

माखन प्रिय है ना तुम्हे ……..मिठाई कुछ भी नही खाते तुम ………

आज मैं तुम्हे खिलाऊँगी जी भर के माखन……..मेरे घर आओ ना !

वो अकेले हँस रही है…….वो अकेले कभी अश्रु विसर्जन करते हुए चल रही है…….जैसे तैसे अपनें घर में पहुँच गयी थी ।

जाते ही सबसे पहले उसनें……..दही को मथना शुरू किया ।

मथती जा रही है …………और बाहर की ओर देख रही है ……..आया क्या ? मेरा कन्हैया आया ?

बाबरी हो गई है ये प्रभावती………हवा का झौंका भी आये तो ये खुश हो जाती …….मेरे श्याम आये……..जब नही आते तब दुःखी हो जाती ………वो बस, दधि मन्थन किये जा रही है ………..उसको विश्वास है कि आज उसके यहाँ कन्हैया अवश्य आयेंगें ।

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नही खाऊँगा मिठाई………मैने कहा ना ! मुझे प्रिय नही है ये सब ।

कन्हैया झगड़ रहे हैं अपनी मैया से…….बृजरानी भी समझा समझा के हार गयीं…….अच्छा ! ले माखन ही खा……ऐसा कहकर एक लौंदा माखन का मुँह में डाल दिया और स्वयं चली गयीं रसोई घर में ।

इधर कन्हैया अकेले ही निकल गए आज बाहर……..छुपते हुये जा रहे हैं कोई देख न ले ……..प्रभावती का घर ढूंढनें में समय लगा…….जब ढूंढ लिया तब बहुत प्रसन्न हुए……द्वार पर जाकर खड़े हो गए ………

प्रभावती नें देखा ……..अद्भुत सुगन्ध का झौंका उसके घर में आरहा है …….वो उठी …….दधि मन्थन से वो उठी ……और जैसे ही देखा ………द्वार पर कन्हैया खड़े हैं……..प्रभावती की साँसें रुक गयीं ……ओह ! लाला आगया मेरे यहाँ ! आनन्द की बाढ़ में वो डूबनें लगी थी ।

प्रभावती को देखा तो छुप गए कन्हैया…….प्रभावती नें देखा ……मुझे देखकर ये छुप गये……..इसलिये अब प्रभावती छुप गयी ।

कन्हैया नें देखा………प्रभावती नही है ………तो धीरे धीरे वो आगे बढ़े………..पीताम्बरी का एक छोर धरती में गिर रहा है ……..मोर का पच्छ बाँधे हैं सिर में……..छोटे से हैं, नन्हे से कन्हैया ।

मणियों का खम्भ है……..उसी मणि खम्भ में छुप गयी है प्रभावती ……और छुप कर देख रही है नन्दनन्दन को ……..

भाल पर केशर का तिलक है ……घुँघराले केश ……..नीलावर्ण …….प्रभावती देख रही है……..मटकी के पास जाकर बैठ गए हैं कन्हैया…….सौन्दर्य सागर कन्हाई……..ग्वालिन मन्त्रमुग्ध है ।

पर ये क्या ! कन्हैया चारों ओर देख रहे हैं …..कोई आतो नही गया ?

कोई आतो नही जाएगा ? फिर नजरें बचाकर मटकी में से एक माखन का लौंदा निकाला …….और जैसे ही मुख में डालनें लगे ………

सामनें मणि का खम्भ …उसमें प्रतिविम्ब दिखाई दिया कन्हाई को ।

रुक गए खाते खाते ……. ये कौन है ? मन ही मन सोचनें लगे ।

फिर डर गए…….मुझ से पहले ये आकर यहाँ चोरी कर रहा था ।

मन में विचार कर रहे हैं ……..पर बालकों का “मन विचार” भी बाहर सुनाई दे जाता है……ग्वालिन प्रभावती को सब सुनाई दे रहा है ।

तू कौन है ? कन्हैया पूछ रहे हैं अपनें ही प्रतिबिम्ब को देखकर ।

तू तो मेरी ही नकल कर रहा है …….अच्छा सुन !……..देख ! मैया को जाकर मत कहना कि मैने यहाँ चोरी की……ठीक है ?

फिर कुछ देर में कन्हैया बोले – सुन ! ले माखन खा ………इस मटकी में जितना माखन है ……आधा आधा खाते हैं …..ठीक है ? अब ले …..ये तू खा……….माखन लेकर अपनें ही प्रतिबिम्ब को खिलानें लगे ………पर माखन गिर गया ………

“न ई”….सिर हिलाकर बोले……ऐसे अपमान नही करना चाहिये …..माखन को क्यों फेंका तुमनें……जाओ मैं तुम्हे माखन नही देता ।

हद्द है तात ! ……स्वयं से रूठ गए लालन ।

प्रभावती की हँसी छूट गयी ………उसनें कोशिश की ……..कि हँसी न निकले …….पर ये स्वयं में थी कहाँ……ये तो हँस दी ……..

और जैसे ही हँसी की आवाज सुनी ………मुख में माखन भर कर बाहर भागे कन्हैया……..क्या रूप था उस समय कन्हाई का …….मुख में माखन लगा हुआ है ………..और नन्हें चरणों से ठुमुक ठुमुक भाग रहे हैं……प्रभावती तो हँसते हुए लोट पोट हो गयी है ……….पर आगे जाकर कन्हैया भी रुक गए ……….उन्होंने देखा रुक कर ……….प्रभावती खड़ी है मुग्ध सी …………देख रही है ………..

तभी – अंगूठा दिखा कर हँसे कन्हैया……मुख में माखन लगा है …….चिढ़ा रहे हैं कन्हैया प्रभावती को……और मानों ऐसे प्रसन्न हो रहे हैं जैसे इन्होनें महाभारत का युद्ध अभी जीत ही लिया हो ।

विदुर जी हँसते जा रहे हैं इन लीलाओं को सुनकर…….उनके आनन्द का ठिकाना नही है……तात ! ये प्रथम माखन की चोरी थी नन्दनन्दन की ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 41

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 41 )

!! “वो बाबरी प्रभावती” – बाललीला !!



उस ग्वालिन का नाम था “प्रभावती” ।

समस्त गोकुल की गोपियों में इसका प्रभाव अच्छा था ।

ये अपनें को सबसे बुद्धिमान और चतुर् समझती……सुन्दर थी ….किन्तु जितनी सुन्दर थी उससे ज्यादा अपनें को मानती ।

पर – तात ! एक दिन नन्दनन्दन को इसनें देख लिया ……….”मुँह में माखन लगा है ……..और अंगूठा दिखाते हुए चिढ़ा रहे हैं “…….उफ़ ! वो झाँकी ……बस इसी झाँकी नें इसे बाबरी बना दिया था ।

इसकी बुद्धि अब कन्हैया के पास है ……….ये कुछ भी सोचती है – कन्हैया के बारे में ही सोचती है……….”मुँह में माखन लगा है और अंगूठा दिखा रहे हैं”…….इसके कलेजे में गढ़ गयी थी ये छबि ।

सब को पता है प्रभावती में कितनी अकड़ है ……पर ये “लगन” ऐसी है कि अच्छे अच्छों की अकड़ निकाल दे ………फिर इसकी लगन तो कन्हैया से लगी थी ।

बेचारी अपनें स्वाभिमान को ताक में रखकर आगयी आज तो ……..नन्द महल में ……द्वार पर खड़ी है ………..पर कोई दिखाई नही दे रहा इसे ……इसनें धीरे से महल के भीतर झाँका …….

ओह ! बृजरानी की गोद में कन्हैया बैठे हैं………..इसनें देख लिया …….श्याम घन ………नीलमणी …….केश घुँघराले …….काले ………उनको ही बांध दिया है बृजरानी नें ……..और ऊपर एक मयूर का पच्छ लगा दिया है ………..अधर लाल हैं और पतले हैं ……..

प्रभावती छुप के देख रही है ………………..

बृजरानी इधर उधर देखती हैं………दही मथना है ……….और ये कन्हैया अब दूध पीनें के लिये मचल रहा है ………….क्या करूँ ?

दधि मन्थन न करूँ तो दही बिगड़ जाएगा ….और दूध न पिलाऊं कन्हैया को तो, ये जिद्दी है ………..क्या करूँ ?

बृजरानी इधर उधर देख रही हैं………कोई गोपी भी आज दिखाई नही दे रही …………..

तभी बृजरानी नें प्रभावती को देख लिया ………..और बड़े प्रेम से बोलीं ………अरे ! प्रभावती ! तू ? सुन तो ………मेरा एक काम कर दे ।

प्रभावती यही तो चाहती थी कि इसको नन्द महल में कुछ काम मिले …..ताकि ये कन्हैया को जी भर के देख सके ।

सुन ना ……..दधिमन्थन कर दे ……! प्रार्थना के स्वर में बोलीं थीं बृजरानी । देख ! मैं तब तक इसको दूध पिला देती हूँ ……….

प्रभावती नें सिर “हाँ” में हिलाया ……….उसनें अपनी प्रसन्नता प्रकट न होनें दी ……..उसका तो मनमयुर नाच रहा था ……वो यही तो चाहती थी ।…….इधर कन्हैया को गोद में लेकर दूध पिलानें लगीं बृजरानी …..प्रभावती बृजरानी की गोद में देखते हुए दधि मटकी की ओर बढ़ी ………यशोदा तो दूध पिलानें में व्यस्त हो गयीं……….प्रभावती का ध्यान कन्हैया की ओर ही था…….चलते हुये …..दही की मटकी गिर गयी ……..दही फ़ैल गया ।

बाबरी प्रभावती को कुछ भान नही है ………मटकी को सीधा करके “रई” चलानें लगी ……………मटकी खाली है ……..दही तो फ़ैल चुका है आँगन में ………..खाली मटकी को चला रही है प्रभावती ।

उसे कुछ भान नही है …….उसे बस नन्दनन्दन की छबि का ध्यान है ……..फिर मन में सोचती है …..क्या भाग्य पाया है इस बृजरानी नें ……आहा ! ऐसा सुन्दर गोपाल गोद में है और दूध पी रहा है ।

“अरी ! अपनें को सम्भाल”……..बृजरानी नें पीछे से आवाज दी ।

प्रभावती को अब होश आया …….. उसनें जब देखा आँगन में दही फैला हुआ है ……और वो खाली मटकी में रई चलाये जा रही है …… अब तो प्रभावती संकोच और लज्जा के मारे धरती में गढ़ी जा रही थी।

पर बृजरानी नें भी प्रभावती को कुछ नही कहा ………….बेचारी नें एक बार फिर यशोदा जी के गोद में देखा …………दूध, मुँह में फैला हुआ था कन्हैया के……..और वो मुस्कुरा के प्रभावती की ओर ही देख रहे थे ।

इस मुस्कुराहट नें – अग्नि में घी का काम किया था ………

प्रभावती चली गयी अपनें घर …..किन्तु दूसरे दिन फिर –


आज फिर आगयी………..और द्वार से खड़ी होकर महल के भीतर देख रही है ये प्रभावती ।

बृजेश्वरी दूध पिला रही हैं…….पर कन्हैया मान नही रहे……..

दाऊ भी खड़े हैं बगल में…….उन्होंने तो पी लिया ……….

देख ! तेरा भाई दूध पी लेता है ……तू नही पीता …….तू गन्दा है ।

“मैं गन्दा नही हूँ”………….चिल्लाये कन्हैया …………प्रभावती मुग्ध हो गयी ……..उसे यही तो चाहिए था ………….आहा ! उसका हृदय गदगद् हो उठा …….”कन्हैया” …..भीतर से चीत्कार उठी वो ।

देख ! देख लाला ! गोद में बिठा लिया बृजरानी नें…….तू तो राजा बेटा है…..तू तो सबसे अच्छा है…..मुख चूम रही हैं अपनें लाल का …

“दूध पी लाला”………बृजरानी नें फिर दूध पिलाना चाहा ।

नही …….मैं दूध नही पीयूँगा…………. फिर मना ।

प्रभावती देख रही है ………….देह भान भूल गयी है ये ।

अच्छा देख ! तुझे चोटी बड़ी करनी है ना ? मैया नें ये भी पूछ लिया । फिर बोलीं ……..दाऊ भैया की चोटी कितनी बड़ी है …..और तेरी चोटी तो नेक सी है ……इत्ती सी …………

“मुझे भी चोटी बड़ी करनी है” ………कन्हैया फिर मचले …….

प्रभावती हँस पड़ी …………वो आनन्दित हो उठी ।

तू दूध पी ……दूध पीयेगा तो चोटी बड़ी होगी …….नही तो ।

दूध पीनें से चोटी बड़ी होती है ? भोलेपन से पूछा ।

और क्या ! ले पी ……..दूध का कटोरा मुँह में लगा दिया ………

प्रभावती छुप छुप कर देख रही है………एक घूँट पीया ………फिर चोटी नापनें लगे ……..चोटी तो बड़ी हुयी नहीं ? कन्हैया नें पूछा ।

पूरा दूध पीयेगा तब बड़ी होगी……..दूध पी ………

प्रभावती देख रही है ……नापते जा रहे हैं चोटी …..और दूध पीते जा रहे हैं…………

अपनें को भूली सी वो प्रभावती अपलक देख रही है कन्हैया को …….रोष में आगये लालन ……….मुँह फुला लिया गेंद की तरह …..कमर में हाथ रख लिया …….झूठी है तू मैया ! चोटी तो बड़ी हुयी नही ?

हँसी फूट पड़ी यशोदा की …………पकड़ कर अपनें हिय से लगा लिया था अपनें प्यारे बाल गोपाल को ।

उफ़ ! प्रभावती की दशा देखनें जैसी थी ।


तीसरे दिन फिर आयी प्रभावती नन्द महल में…….इसका मन नही लगता अब घर में ……….ये तो बस घर का काम किसी तरह कर लेती है ……..चिर अभ्यास वश ……..बाकी इसका मन तो नन्दनन्दन में ही अटक गया है ।

बृजरानी नें आज नाना प्रकार के मिष्ठान्न बनाये हैं…………और उन्हें सजाकर एक बड़ी सी थाल में रख दिया है ।

मनुहार कर रही हैं……..लला ! खाओ मिठाई ………

“मुझे नही खाना”…………जिद्दी है ये बाल गोपाल ।

मिठाई खाना तो अलग बात है ……ये तो उस तरफ देख भी नही रहे ।

प्रभावती विचार करती है ………….और मन ही मन पूछती है ……फिर क्या खाना है लालन तुम्हे ?

“मुझे माखन खाना है” ………..खींज कर बोले ।

प्रभावती आनन्द सिन्धु में डूब गयी ………..आहा ! माखन प्रिय है मेरे कन्हैया को ………..कन्हैया के अमृतमय वचनों को बड़े ध्यान से सुन रही है ये ग्वालन ………उन अमृत वचनों के श्रवण से उसमें मत्तता छाती जा रही है ……..और उसी मत्तता के कारण प्रभावती में एक भावना जाग्रत हुयी ……..और ये भावना सच्चे हृदय की थी ।

क्या कभी कन्हैया मेरे घर भी आयेंगें ? क्या कभी कन्हैया मेरे घर आकर माखन भी खायेगें ?

पर – प्रभावती फिर शान्त हो गयी………नही आयेगें…….मेरे घर ये नही आयेंगें…….क्यों की मुझे देख लेंगे तो इन्हें संकोच होगा ……

फिर तुरन्त प्रभावती सोचती है……….नही नही …….जब ये मेरे घर आकर माखन खायेगें तब मैं इनके सामनें नही आऊँगी ………छुप कर इन्हें देखती रहूँगी…….ओह ! कितना आनन्द आएगा मुझे ये सब देखकर ……..मैं तो निहाल हो जाऊँगी ………

फिर उदास हो गयी ………..मेरी कामना पूरी होगी ?

नही होगी , मेरी ये साध पूरी……….प्रभावती अब धीरे धीरे अपनें घर की ओर चली………….

तात विदुर जी ! ये कन्हैया है ………..सबकी सुनता है ……..और सच्चे हृदय से कोई कामना करे …….तो ये अवश्य पूरी करता है ।

“सूरदास प्रभु अन्तर्यामी, ग्वालिन मन की जानी”

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 40

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 40 )

!! “नाचे नन्दलाल” – दिव्य बाल लीला !!


हे बृजराज दुलारे ! अपनी बाल लीलाओं से विमोहित करनें वाले !

हम तेरी बलिहारी जाती हैं…..तू नाच ना ! नाच दे ! हे दाऊ के अनुज !

ये ले – थेई थेई थेई तत् थेई । इस प्रकार मनुहार करती हुयी बृजगोपियाँ ताल देनें लगीं और छोटे से कन्हैया नाचनें लगे ।

तात ! ये अद्भुत लीला है नन्दनन्दन की ……भगवान रूद्र भी इन अन्तरंग लीलाओं को देख नही पाते हैं ……..ब्रह्मा तरसते हैं कि हमें वो मेघश्याम की सुन्दर झाँकी के दर्शन हो जाएँ ……देवराज की पहुँच नही है नन्दमहल तक……..ऋषि मुनि प्रयासरत हैं कि एक झलक तो मिल जाए ………पर नहीं !

उद्धव बोले – रूप भार से दबी स्वर्ग की अप्सरायें भी जो आज तक ऐसे सुन्दर बाल गोपाल को देख नही पाई हैं …….पायल की झंकार से बृह्माण्ड सुन्दर पुरुषों को आकर्षित करनें वाली गन्धर्व बालाएं, कभी सोच भी नही सकतीं कि सुन्दरता ऐसी भी होती है ………जिसे देखते रहें देखते रहें ……तो क्षण क्षण में सुन्दरता कम नही अपितु बढ़ती ही जाती है ………….और ये बढ़ना कम नही होता …..चाहे आप घड़ी भर देख लो ……या वषों तक देखते रहो ……ये हर क्षण में नव नवायमान ही लगता है ।………….तात विदुर जी ! उन्हीं नन्दलाल को ये गोबर थापनें वाली आभीर कन्याएं नचा रही हैं ……..और वो ज्ञानी का ब्रह्म, योगी का परमात्मा, भक्त का भगवान ……ओह ! नाच रहा है ।

ये गोपियाँ !

देख ! देख ! लाला ! वो मोर ! गोपियाँ मोर दिखाती हैं ।

अब नाचना बन्द ……..मुग्ध होकर ये मोर को देखते हैं ……..मोर, पंख फैलाकर नाच रहा है……..लाला ! तू भी नाच ऐसे ही …….गोपियाँ कहती हैं……कितनें प्रसन्न हो जाते हैं ये ……और अपनी छोटी छोटी दोनों भुजाओं को पीठ में लेजाकर फैला देते हैं ……..और नाचनें लगते हैं ।

तुलसी में जल चढ़ा रही हैं बृजरानी ……..ये दृष्य देख लिया ……..वो तो जल चढ़ाना ही भूल गयीं……..

उसी समय बृजराज गोष्ठ से आये महल में……जब देखा कि अपना लाला मोर की तरह नाच रहा है…….वो मुग्ध होकर बस देखनें लग गए……वो ये भी भूल गए कि मैं गौशाला से यहाँ क्यों आया !

हये मेरे प्राण ! अपनें बाबा को देख लिया लाला नें ……बस संकोच करके नाचना रोक दिया …….मैया बृजरानी दूर खड़ी हैं……….लाला उनको देखकर दौड़ पड़े …..और गोद में चढ़ गए ।

तात ! धन्य हैं ये यशुमति ………आहा ! माताओं का हृदय वैसे भी वात्सल्यरस से ओतप्रोत होता है …….फिर उसमें बृजरानी !

स्नेह का कैसा अद्भुत विस्तार है ! किन स्वर्गीय उपादानों से निर्मित किया है विधाता नें इस श्रीकृष्ण जननी का हृदय ……..वात्सल्य का कैसा विस्तीर्ण पयोनिधि है आहा ! और हाँ इस वात्सल्य सिन्धु में कितनें अमूल्य भाव – रत्न पड़े हैं कह नही सकते ।

तात विदुर जी ! यशोमती का हृदय वैसे भी स्निग्ध और कोमल है …प्यारा कन्हैया कहाँ गया ? वो कब से खेल रहा है थक गया होगा ।

ग्वाले थका देते हैं भगा भगा कर……. बहुत देर से उसनें दूध नही पीया ………दाऊ भी तो उसके पक्ष में नही खड़ा होता ……..वो भी अन्य ग्वालों की बातें सुनता है…….अन्तःकरण ही कन्हैया बन गया है बृजरानी का…….उफ़ ! ये यशोदा है……..कोई साधारण नही ।

सबसे छोटी है…….हाँ सबसे छोटी है मैया यशोदा……कहते हैं नन्दबाबा से दस वर्ष छोटी है …………इसकी सब जेठानी हैं ……..क्यों की सबसे छोटी यही हैं ……..पर यशोदा मैया छोटी कहाँ है …..ये तो सबसे बड़ी है…….हाँ सबसे ……इससे बड़ा कोई नही है ……तात ! आप ही बताइये परब्रह्म को जो अपनी गोद में खिला रही हो …….उससे बड़ा कोई होगा ? भाव में पूरी तरह डूब गए हैं आज उद्धव ।

आज, लो , आज दाऊ की कुशल नही है ………….क्यों की कन्हैया नें शिकायत जो कर दी अपनी मैया से , दाऊ की ………..

और रोते हुए शिकायत की ……..रो रहे हैं ……….दोनों हाथों से आँसू पोंछ रहे हैं………….साँस लेते हुए भी बोल रहे हैं और साँस छोड़ते हुए भी ………..अद्भुत झाँकी हैं इनकी तो ।

कन्हैया छोटा है तो क्या हुआ ……पर लगनें वाली बात तो सबको लगती ही है …….चाहे छोटा हो चाहे कोई बड़ा हो ।

अच्छा बता ! बात क्या है ? बृजरानी नें भी पुचकारते हुए पूछा ।

दाऊ नें कहा मुझे – तू मैया यशोदा का जाया नही है ……तुझे तो मोल से खरीदा गया है……लाला आँसू पोंछते हुए बोल रहे हैं ।

जब मैने कहा …….नही मेरी मैया तो यशोदा ही है ………तब बोलते हैं दाऊ …….कि “तू काला , और मैया गोरी ….और बाबा भी गोरे ………..इसलिये तू मैया यशोदा और बाबा नन्द का जाया नही है ।

कोई बात नही लाला ! दाऊ से कुट्टी कर दे ……….मत बोलना अब दाऊ से ……..मैया नें अपनें लाल को पुचकारा ।

मैया ! दाऊ ही कहे तो कोई बात नही …..पर दाऊ नें अन्य सभी सखाओं को भी ये सिखा दिया है कि ……मैं तेरा बेटा नही हूँ …….मुझे तूनें खरीदा है……….फिर रोना शुरू ।

तू मार उसे ……तू पीट दाऊ को……कन्हैया रोते जा रहे हैं और कहते जा रहे हैं …….मैया ! .दाऊ के कहनें से …..चुटकी दे देकर मेरी हँसी करते हैं मेरे सखा…..मेरे सखाओं को भी दाऊ नें अपनी तरफ कर लिया है ।

अच्छा ! छोड़ दाऊ को …….छोड़ दे ………मैया नें इस बात को सरलता से कहा… ……पर बालक की बात को माँ सरलता से ले कैसे सकती है ?

दहाड़ मारकर रोनें लगे कन्हैया ………..धरती में गिर गए ……दोनों चरणों को पटकनें लगे ……………और हिलकियों से रोते हुये बोले – तू दाऊ को क्यों मारेगी ! तू तो मुझे ही मारेगी …………मारना पीटना तो मुझे ही है ……….।

बस इतना सुनते ही बृजरानी का हृदय भर आया ……..उठाकर लाला को, मुख चूम लिया …….और बोलीं……..बेकार है दाऊ ………मैं उसे जन्म से ही जानती हूँ………लाला ! तू दाऊ की बातों पर क्यों विश्चास करता है ……..वो झूठा है ………वो कुछ भी बोलता है ।

अच्छा तुझे विश्वास नही है मेरी बात का ……….तो सुन ……….

गायों की सौगन्ध खा कर कहती हूँ…….अपनें सम्पूर्ण गौ धन की सौगन्ध खा कर कहती हूँ ……तू ही मेरा पुत्र है ….और मैं ही तेरी मैया हूँ ।

ये कहते हुये मैया यशोदा के नेत्रों से अश्रु बहनें लगे थे ………पता नही क्या हुआ था इस ममता की मारी को ………..अपनी मैया को रोते हुये जब कन्हैया नें देखा …..तो पुचकारते हुये मैया को चुप करानें लगे ।

मैया भाव में भर गयी थी ……….वो अपनें लाला की लीलाओं में खो गयी थी……..वात्सल्य का ज्वार उमड़ उमड़ आया था ।

तभी – सामनें एक पोखर था ……… पोखर में कमल खिले थे ……उन कमलों में अनगिनत भौरें थे …….वो गुनगुना रहे थे ।

मैया ! मैया ! गूँ ऊँ ऊँ ऊँ ऊँ……..भौरें की नकल करनें लगे लाला ।

तो मैया हँसी ……….मैया को हँसते हुये देखकर लाला प्रसन्न हुए ।

नाच !

यशोदा मैया मुग्ध हो गयीं और अपनी गोद से उतार दिया …..

लाला ! नाच !

मैया के कहनें पर लाला नाचनें लगे……….आहा !

ताली बजा रही हैं बृजरानी …….और उनके लाला नाच रहे हैं ।

ध्यान में डूब गए थे उद्धव, इन लीलाओं का गान करते हुए ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 39

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 39 )

!!”चन्द्र खिलौना लैहों”- अद्भुत बाल लीला !!


तात विदुर जी ! हमें एक ही बात से बचना चाहिये …….और सबको बचना चाहिये ……..कि “नन्दनन्दन न रूठे” ।

जगत रूठे, कोई बात नही ….क्या फ़र्क पड़ता है जी ! पर “श्याम” न रूठे …..क्यों की वो रूठता है ना तो लगता है हृदय फट जाएगा ….फिर लगता है सारा संसार ही असार हो गया….क्यों की “श्याम” रूठ गया ।

देखो ना ! आज श्याम रूठ गया है …….तात ! दर्शन कीजिये ….रूठ गया है श्याम ……….भूमि पर लोटनें लगा है ……….नन्दगेहनी गोद में लेना चाहती हैं…….पर वो मुँह नोच रहा है अपनी मैया का…….

जीजी ! छोड़ दो उसे……नही तो और खीजेगा…..रोहिणी नें कहा ।

मैया यशोदा नें उसे फिर धरती में रख दिया……अरे ! ये क्या, ये तो और जोर से रो रहा है…..और जोर से ……काजल फैल गया है उन सुन्दर कपोलों में…..कमलदल से लोचन लाल हो गए हैं रो रोकर ।

हिचकियाँ लेकर रो रहा है…….और इतना तेज़ रो रहा है ……कि जिस जिस घर में ये आवाज जा रही है ……..वही गोपी अपना काम धन्धा छोड़कर भाग रही है नन्दालय की ओर ।

आँगन में भीड़ लग गयी …..गोपियाँ खड़ी हैं……देख रही हैं…..ये तो रोते हुए भी सुन्दर लगता है…..तात ! ज्यादा सुन्दर लगता है ।

मुँह बनाकर रो रहा है …….हये ! कितनी सुन्दर झाँकी है…….गोपियाँ मन्त्रमुग्ध सी बस देखे जा रही हैं ।

पर ये क्या, गोपियाँ अपनें घर से जब आयीं नन्दालय में ……..तब उनके पीछे पीछे उनके बालक भी चले आये ………….

यहाँ जब देखा नन्दलाल रो रहा है …………तो सारे बालक भी रोनें लगे …………रोहिणी माथा पकड़ कर बैठ गयीं ………….

अब तो ये चुप होनें से रहा ……………हाँ एक उपाय था …..दाऊ आगे बढ़कर अगर आँसू पोंछ देते हैं कन्हैया का …..तब कन्हैया चुप हो जाता है ………पर आज तो दाऊ भी रो रहे हैं ।

क्यों रो रहे हैं दाऊ ? ये प्रश्न बालकों के सम्बन्ध में व्यर्थ है ।

बालक एक दूसरे को देखकर रोते हैं ………कारण में न जाइए तात !

उद्धव नें कहा ।

विदुर जी इस प्रसंग को सुनते हुए ध्यानमग्न हो जाते हैं ।

समय बीतता जा रहा है ………दोपहर से साँझ होनें लगी है अब …….पर कन्हैया का रोना कम ही नही हो रहा ।

बालकों की भीड़ जमा हो रही है नन्द आँगन में…….गोपियाँ उपाय बताती हुयी बृजरानी को अब थक चुकी हैं ।

“जाओ ! तुम सब बालक जाओ यहाँ से”……..बृजरानी नें अन्य समस्त बालकों को उनके घर भेजना चाहा ……बृजरानी को लगा कि ये बालक चले जाएंगे तो मेरा लाला शान्त हो जाएगा ……..पर ।

बालक जैसे ही जानें लगे …….कन्हैया ये देख कर तो और रोये……बृजरानी नें बालकों को वापस बुला लिया ।

धूल ही धूल में सनें बैठे हैं……..मुँह सूख गया होगा……जल पिला दो…..कण्ठ देखो ! …….बृजरानी को गोपियों नें कहा ।

अब तो बृजरानी आगे बढ़ीं……..और जबरदस्ती गोद में लेकर बोलीं -“लाला ! जल पी ले……..देख ! जल पी ले”…..जिद्द नही करते ।

आँसुओं की धार कपोलों में काजल के चिन्ह बना रहे हैं …. …अभी भी सुबुक रहे हैं लाला……नहीं……जल को हटा दिया अपनें सामनें से ।

और अपनें दोनों नन्हें नन्हें करों से बृजरानी के केश खींच रहे हैं………..

फिर जब केशों को छुड़ा लेती हैं…..तो मुँह को नोचनें का प्रयास करते हैं………..

अच्छा ! अच्छा ! मेरे लाला को आज एक खिलौना दिखाऊँ ?

गोद में लेकर गयीं बृजरानी……..नन्दनन्दन नें सुना नही ……तो फिर बोलीं लाला ! एक खिलौना लेगा ?

कहाँ है ? रोना थोडा कम हुआ……..आँसुओं को दोनों हाथों से पौंछते हुये कन्हैया बोले ……कहाँ है खिलौना ?

देख ! ये है…..देख ! आकाश में चन्द्रमा दिखाई दे रहे थे……सूर्य ढल चुके थे…….चन्द्रमा को देखकर ही बृजरानी नें कहा …..देख ! तेरा खिलौना ।

कन्हैया चुप हो गए ……..बड़े ध्यान से देखनें लगे चन्दा को…….मैया खुश हो गयी ……..चलो ! ये युक्ति काम कर गयी ।

पर धीरे से कन्हैया बोले……खिलौना दे ।

अब कहाँ से दे बृजरानी उस चन्द्र खिलौना को……………

पर बालक की जिद्द है……उसमें कोई तर्क तो है नही …….न तर्क का कोई काम है यहाँ ।

अब लाला को चन्द्रमा चाहिये…………”मैया चन्दा ” ।

फिर रोना शुरू …….फिर अँसुवन की धार शुरू ……..धरती में बैठ गए फिर से ……दोनों चरणों को पटक रहे हैं……..और जोर से रो रहे हैं ।

हे भगवान ! ये कैसो हठी मेरो बाल मुकुन्दा !

भीतर से रोहिणी नाना प्रकार के खिलौना ले आयीं ………और सब रख दिया …….पर इन सबसे आज ये नही खेलेंगें …..इन्हें चन्द्रमा से ही खेलना है ……..अद्भुत !

तू पकड़ कर ला ! तू ला ! चिल्ला रहे हैं अपनी मैया पर ।

हृदय में बड़ा कष्ट हो रहा है बृजरानी के …………कोमल सा मेरा लाला …….आज दोपहर से ही रो रहा है ………….रूठ गया है ये …….अब कैसे मानेगा ! बृजरानी को कोई उपाय नही सूझ रहा ।

गोपियों के भी कुछ समझ में नही आरहा ……….क्या करें ?

तभी हँसी बृजरानी …………लाला ! तुझे चन्दा चाहिए ना ?

हाँ ….वो , छोटी सी ऊँगली से आकाश की ओर दिखाते हुए कहा ।

बृजरानी भीतर गयीं……और एक बड़ी सी चाँदी की थाल ले आयीं …….उसमें पानी भरकर लाईं थीं…….लाला के बीच में रख दिया …….चन्द्र का प्रतिविम्ब दिखाती हुयी बोलीं……..

देख ! चन्दा ! लाला ! देख चन्दा !

अब तो लाला का रोना धोना सब बन्द………बड़े कौतुहल से झुककर थाल में देखनें लगे थे चन्द्रमा को ।

बृजरानी बड़ी प्रसन्न हो गयीं ……. रोहिणी नें कहा ….जीजी ! ये उपाय पहले क्यों नही सूझा आपको…….वाह बृजरानी ! बूढी गोपियाँ भी बोल रही थीं, ” ये अच्छी बुद्धि लगाई तुमनें ” । बृजरानी बहुत प्रसन्न हैं ।

तभी लाला नें थाल में हाथ रख दिया ……..क्यों कि उसे पकड़ना हैं खिलौना को …..बिना पकड़े खेलेगा कैसे खिलौना से ।

थाल में हाथ को घुमाते हैं ………थाल का जल घूमता है तो चन्द्रमा भी घूमता है……….

फिर रोना शुरू – मैया ! ये चन्द्रमा घूमता है ! इसे पकड़ कर मुझे दे ।

अब कैसे पकड़े चन्द्रमा को बृजरानी……….जैसे तैसे तो ये उपाय निकाला था पर अब क्या करे ?

तभी बृजराज आगये ………लाला नें बृजराज को देखा तो और रोनें लगे ……जोर से रोनें लगे ……….

बृजराज को समझते हुये देर न लगी कि, यहाँ हुआ क्या है !

बाबा ! मुझे चन्दा ! कन्हैया नें सुबुकते हुए कहा ।

अरे ! ये भी रो रहा है ……चन्दा भी रो रहा है …..देख लाला !

बाबा बृजराज नें अपनें कुँवर को पुचकारते हुए कहा ।

चुप हो गए कन्हैया ।

….अब देख ! चुप हो गया ना चन्दा भी……..तू रोयेगा तो ये रोयेगा ……तू हँसेगा तो ये भी हँसेगा ………अब हँस …….कन्हैया हँसे ……….बृजराज उछलते हुए बोले ……देखा ! ये भी हँस रहा है ……कन्हैया प्रसन्न हो गए ……मैया ! चन्द्रमा हँस रहा है कन्हैया नें अपनी मैया को बताया ।……… तभी बृजराज नें हँसते हुए कन्हैया को गोद में उठा लिया था …..और चूमते हुये महल के भीतर ले गए ………….

सारी गोपियाँ लौट गयीं अपनें अपनें घरों की ओर …..पर दुःखी हैं लौटते हुए ………नन्दलाल के दर्शन जो हो रहे थे ……….पर अब रात, बिना नन्दनन्दन को देखे बीतेगी ।

तात विदुर जी ! ये लीला, समाधि के लिये है ………ये लीला न उपदेश है ….न इसका कोई सामाजिक सन्देश है …….न कोई आध्यात्मिक आदेश है………आप तो बस इन लीलाओं का ध्यान कीजिये ……..अपनें हृदय में कन्हैया को खेलनें दीजिये ………और आप उसे बस देखते जाइए…….ये आनन्द है यही आल्हाद है । और यही साधना की पूर्णता है । बस उसे रूठनें मत देना …..रूठ भी जाए तो मना लेना …..जैसे भी हो ।

उद्धव बताते हैं विदुर जी को ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 38

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 38 )

!! आनन्द की आल्हादिनी का जन्म महोत्सव !!


तात विदुर जी ! श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण अधूरा है ……….

दोनों एक ही हैं तात ! जैसे – जल और तरंग ।

इसलिये मैं आपको श्रीराधा रानी के चरित्र को भी सुना रहा हूँ ……..श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण कुछ नही हैं………हँसे उद्धव ! वो प्रेमिन श्रीकृष्ण की……नही नही श्री कृष्ण का प्रेम ही तो श्रीराधा है……प्रेम नें ही मानों आकार ले लिया हो तात !

उद्धव के नेत्रों से अश्रु बहनें लगे श्रीराधा का स्मरण करते ही ।

उद्धव ! क्या तुमनें दर्शन किये हैं श्रीराधा के ?

विदुर जी नें प्रश्न किया ।

हाँ …..हाँ तात विदुर जी ! श्रीकृष्ण कृपा से ये सम्भव हो सका ।

श्रीकृष्ण का मेरे प्रति बड़ा स्नेह था ………वो मुझे अपना बनाना चाहते थे ……..पर मुझ में तो “मैं” था …….ज्ञान, बोध का अहं………मैं देव गुरु का शिष्य……….कितना अहं ओढ़े बैठा था मैं ……..और श्रीकृष्ण इस बात को समझते थे कि वो मेरे इन अहंकारों की सम्पूर्ण श्रृंखला को नही तोड़ पाएंगे………इसलिये मुझे उन्होंने अपनी प्रिया के पास भेजा था …..ओह ! उनका दर्शन ……..मानों प्रेम ही विराजमान हो ………….मुझे तराशा श्रीराधा नें ……….मेरे भीतर जो भी अहं था उसे धीरे धीरे तोड़ कर मिटा ही दिया ……..विशुद्ध प्रेम का उदय कर दिया मेरे हृदय में ……….मेरी गुरु हैं श्रीराधा ।

उद्धव इतना ही बोले ……और कुछ देर के लिये चुप हो गए थे ……वो भाव सिन्धु में डूब रहे थे ……..राधा ! राधा ! राधा ! राधा ! उनके रोम रोम से यही नाम प्रकट हो रहा था ।

उद्धव ! उद्धव !

तुम अगर ठीक हो तो मुझे आगे का प्रसंग सुनना है ………सुनाओ ना उद्धव ! विदुर जी नें भाव में भरकर कहा ।

रावल में श्री राधा रानी के अवतरण के बाद ? उद्धव आगे बताओ !

विदुर जी नें कहा……कौन ऐसा शुष्क हृदय होगा जो नन्दनन्दन के रसमय चरित्रों को छोड़कर व्यर्थ और नीरस सांसारिक वार्ता में अपनें मन को लगायेगा …..उद्धव ! सुनाओ, आगे बरसानें की कुछ बातें…..मेरे नन्दनन्दन की, अल्हादिनी की कुछ आल्हादकारी चर्चाएं ।

उद्धव बतानें लगे – तात ! रावल गाँव से अपनें बरसाना आगये थे बृषभान जी उनकी अर्धांगिनी कीर्तिरानी उनके कुँवर श्रीदामा और भानु दुलारी ….लाली …….जिनका जन्म अभी हुआ ही था ।

मेरी कभी पटी नही, मेरे पिता जी से ……… …..मैं शनिश्चर ।

मेरे पिता भास्कर, सूर्य, भानु……..हम दोनों पिता पुत्र हैं……पर शत्रु की तरह हम दोनों का व्यवहार है …….मुझे स्मरण नही है कि कभी हम दोनों की कोई बातें भी हुयी हों ……..मुझे काला कहकर …..मुझे कुरूप कह कर मेरे पिता नें मेरा अपमान किया था……तब मेरी माँ ही थी जिसनें मुझे कहा……काला ? पुत्र शनि ! काले तो श्रीकृष्ण भी हैं ।

आहा ! तभी मेरे मन में श्रीकृष्ण के प्रति अगाध श्रद्धा जाग्रत हो गयी ………कहूँ तो मैं उसी दिन से श्रीकृष्ण का भक्त बन गया था ।

एक दिन मेरे पिता नें मुझे देखा और कहा ……जाओ ! बरसाना जाओ …….वहीँ जाकर रहो ………क्यों की वहाँ श्रीकृष्ण प्रिया श्रीराधा का अवतार होगा ……….वो भानु नन्दिनी हैं ………..जाओ !

मेरे पिता सूर्य नें मुझ से पहली बार बात की थी………मैं उसी समय चल दिया था बरसानें की ओर …….मेरे श्रीकृष्ण की, प्रिया की स्थली है ये …….मेरे मन में अगाध श्रद्धा का उदय होनें लगा था इस क्षेत्र के प्रति………मणियों की खदानें मैने प्रकट कर दी थी बरसानें में……….मैं ? मैं क्या प्रकट करता ! ग्रह ही तो हूँ मैं ……..एक क्रूर ग्रह …बरसाना तो स्वयं में समृद्ध था ……..और क्यों न हो ब्रह्म की अल्हादिनी यहीं पर आनें वाली थीं ………पर मेरे ऊपर कृपा हुयी श्रीराधा रानी की……तभी मुझे श्रीकृष्ण नें स्वीकार किया ।

धन्यवाद करता हूँ मैं आज अपनें पिता सूर्य का…….जिन्होनें मुझे इस स्थान में आने को कहा………और प्रसन्नता मुझे इस बात की हुयी कि ……..बाद में मेरे स्वामी , मेरे आराध्य श्रीकृष्ण भी यहीं पर आगये थे ……और उन्होंने यहाँ “नन्द गाँव” बसाया ।

यानि मेरे आराध्य भी श्रीजी की कृपा छायाँ में ही रहनें लगे थे….ओह !

आज छटी है ………..बहुत रुष्ट होंगें मित्र बृषभान तो !

कहेंगें – छ दिन हो गए लाली जन्में हुए …..और अब आरहे हो ? जाओ ! बृजराज ! हम तुमसे बात ही नही करेंगें ।

बृजरानी ! सोच लो ………कीर्ति भाभी भी बहुत कुछ सुनाएंगी ।

रोहिणी कहती हैं…………पर बृषभान भाई जी आपसे बड़ा प्रेम रखते हैं………….शिकायत करनें का अधिकार तो उनका है ही ।

पर ये क्या ! उत्सव तो ऐसा मन रहा था वहाँ कि नन्द राय भी चकित हो गए …….मणियों का अम्बार लग गया था लुटाते लुटाते ……लूटनें वाले थक गए थे ……….माणिक्य, जिधर देखो उधर चमकते हुये दिखाई दे जायेंगें …….हीरों से तो बरसानें के बालक खेल रहे थे …….जैसे उनके लिये ये एक चमकता पत्थर हो ।

बन्दनवार हर घर में लगाया है……रंगोली से हर घर को सजाया है ….दूध दही हल्दी की कीच मची हुयी है ……….”भानु दुलारी नें जन्म लियो है”….”कीरत प्यारी नें जन्म लियो है”………….सब यही गा रहे हैं ……….सब इस आनन्द में डूबे हुए हैं ।

सुन्दर बैल गाडी बृषभान के आँगन में आकर रुकी ………पीछे पचासों गाड़ियाँ आरही थीं……उनमें नाना उपहार भरे पड़े थे ।

बृषभान नें बृजराज को अपनें हृदय से लगाया ………….मुझे क्षमा करना मित्र ! मुझे तो जन्म समाचार मिलते ही आना था …….पर मैं आ न सका ।

लाली हुयी है बधाई हो……..बृजरानी नें बड़े उत्साह से बधाई दी ।

मुस्कुराये बृषभान जी……और भीतर ले गए इन सब गोकुल वालों को ।

बधाई हो कीर्तिरानी ! बृजरानी ये कहते हुए दौड़ीं ।

कीर्ति रानी नें भी बड़े उत्साह के साथ बृजरानी को अपनें हृदय से लगाया ……..नन्हे कन्हैया भी साथ में ही है ……दाऊ भी साथ में हैं ।

लाली कहाँ है ? बृजरानी नें आनन्दित होते हुए पूछा ।

चलिये ! मैं दिखाती हूँ लाली को ……..कीर्तिरानी यशोदा को लेकर चलीं …………..

हाथ पकड़ा यशुमति नें……..क्या बात है ? उदास हो ? कीर्ति रानी से पूछा – और बृषभान जी भी उदास से लग रहे थे ….वो ख़ुशी नही दिखाई दी ……..लाली ही तो आप चाहती थीं ना ? फिर क्या बात हो गयी ? बृजरानी नें हाथ पकड़ कर पूछा ।

कीर्तिरानी नें कहा……..बृजरानी ! आज छ दिन हो गए हैं …….पर लाली नें अपनें नेत्र नही खोले…..कहीं मेरी लाली ? रो पडीं कीर्ति ।

चिन्ता मत करो कीर्तिरानी ! सब ठीक हो जाएगा ……..सांत्वना देकर लाली के पास सब गए ………….

बृजरानी तो देखती ही रहीं ……आहा ! कितनी सुन्दर है ये लाली… ….तपते सुवर्ण की तरह गौरवर्णी ……….नन्हें नन्हें चरण ………छोटे छोटे हाथ ……..पर नेत्र बन्द हैं …………..बृजरानी ये देखकर दुःखी हो जाती हैं …..पर कीर्तिरानी ! – ये सब ठीक हो जायेगा ……….

कीर्तिरानी भी समझती हैं कि………ये मेरे लिये सांत्वना है ।

मुखरा माँ हैं कीर्तिरानी की ………वो देख रही हैं लाली को …….वहीँ सम्भाल करती हैं ……………

मैया ! मैया ! ये कौन है ? कन्हैया नें अपनी मैया से पूछा ।

छेड़ना नही ……..छूना नही ….लाला ! ये लाली है ……..बृजरानी नें कन्हैया को समझाया फिर बातें करनें लगीं कीर्तिरानी से ।

ये आँखें क्यों नही खोलती ? खोलो !…….. राधे ! .मैं आगया हूँ …..मैं आपहुँचा हूँ तुम्हारे पास…..फिर तुम आँखें क्यों नही खोलतीं …….

किसी को पता नही क्या बातें कर रहे हैं कन्हैया ………….पर वो ये सब कहते हुए श्रीजी को छूनें लगे …..और जैसे ही छूआ ……..श्रीजी को कम्पन सा हुआ …………….और ………….

मैया ! मैया ! मैया ! देख ! लाली नें आँखें खोल लीं ………..

कन्हैया चिल्लाकर बोले थे ……बृजरानी नें सुना ……..वो आयीं पालनें के पास में ………जैसे ही देखा …….भानु दुलारी नें अपनें नेत्रों को खोल लिए थे ….कमल की तरह थे उनके नेत्र ……बड़े बड़े ……कमल के सिवा और कोई उपमा ही नही है, तात ! इसलिए कमल ।

कीर्तिरानी ! देखो……..कीर्तिरानी दौड़ीं ……..क्या हुआ ?

हँसते हुए मुस्कुराते हुए बृजरानी बोलीं……….क्या सुन्दर लाली जाई है तुमनें कीर्ति ! देखो ! इसके नेत्र ……….

कीर्तिरानी नें जैसे ही देखा …………..नेत्रों को खोलकर टुकुर टुकुर कन्हैया को ही देख रही हैं कीर्तिकिशोरी ……….आनन्द के अश्रु बहनें लगे कीर्ति के ……..वो बृजरानी का हाथ पकड़ कर उछलनें लगीं ……..बृषभान को ये खबर दी …..वो बृजराज के साथ बैठे थे …..जैसे ही सुना ………वे भी महल के भीतर दौड़े…….सबनें देखा भानु नन्दिनी देख रही हैं…….पर सबको नही ……..मात्र अपनें “प्रिय” को ।

बृजरानी इतनी आनन्दित हुयीं …………..हाय ! कितनी सुन्दर है तेरी लाली, कीर्ति ! क्या दूँ इसे ………मोतियों का हार उतार कर दे दिया …….फिर भी जी नही भरा …….कहाँ ये अनन्त रूप राशि की कन्या और कहाँ ये तुच्छ मोतियों का हार …………क्या दूँ ? क्या करूँ ?

बृजरानी परेशान हो उठती हैं…………

तभी अपनें लाला कन्हैया को देखती हैं……..बस उन्हीं को उठाकर, भानु दुलारी के चारों और घुमाकर, वार देती हैं ।

सब आनन्दित हो उठते हैं………….अभी तक जो ये उदासी थी कि लाली नें नेत्र नही खोले ……..वो सबकी उदासी दूर हो गयी थी …..सब उन्मत्त होकर नाच गा रहे थे ।

तात विदुर जी ! ये श्रीराधा रानी की प्रतिज्ञा थी कि ……मैं अवतार तो लुंगी …..पर प्रियतम ! पहले तुम्हे ही देखूंगी ……तुम नही दीखोगे तो मैं नेत्र ही नही खोलूंगी……..ये दोनों सनातन प्रेमी हैं तात !

उद्धव नें ये प्रसंग भावसिन्धु में डूब कर सुनाया था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 37

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 37 )

!! श्रीराधा जन्म !!


तात विदुर जी ! यमुना के किनारे बसा एक गाँव है …….जिसका नाम है “रावल” । ये गोकुल के निकट ही है…….

बृजराज और बृषभान दोनों बाल्यावस्था के मित्र हैं ……..जब दोनों का विवाह भी नही हुआ था तभी से इनकी मित्रता थी …….कहें तो – गोप सम्राट पर्जन्य और महिभान इन दोनों की प्रगाढ़ मैत्री ……पर्जन्य के “नन्दराय” हुये और महिभान के “बृषभान” ।

मित्रता इनकी दृढ़ थी……अपनें रावल गाँव के ही एक समृद्ध गोप की सुन्दर सुशील कन्या “कीर्ति” से बृषभान का विवाह करवाया था बृजराज नें ।

उद्धव आज का प्रसंग बड़े भाव से सुना रहे हैं…….

बृषभान बृहत्सानुपुर ( बरसाना ) के राजा हैं …….इनका क्षेत्र बृजराज के क्षेत्र से भी बड़ा है……ये बड़े सरल हैं सहज हैं…….करुणा से ओत प्रोत इनका हृदय है……इनको अर्धांगिनी भी बहुत पतिपरायणा मिलीं ।

हे तात विदुर जी ! इनके प्रथम पुत्र हुये थे “श्रीदामा”……दाऊ के जन्म साथ ही , बरसानें में इनका भी जन्म हुआ था ……ये स्वर्ण समान तेजवान थे …..अत्यन्त सुन्दर इनका रूप था…….पर इनकी माता कीर्तिरानी को पुत्री की कामना थी……ये श्रीदामा को भी देखतीं तो भगवान से यही प्रार्थना करतीं ……अब एक “लाली” देना ।

काल अपनी गति से चलता है……..उसे कोई मतलब नही है ।

श्रीदामा बड़े हो गए हैं…….दो वर्ष की आयु हो गयी है इनकी अब ।

इतनी ही दाऊ भैया की भी है …………पर “बृजराज कुँवर” अभी छोटे हैं ………एक वर्ष से कुछ दिन ही बड़े हैं ये ।

प्रातः की वेला थी……..एक सुन्दर सुसज्जित बैल गाडी आकर रुकी बृजराज के सामनें……..मुस्कुराते हुए उठे बृजराज……..”बृषभान पधारे हैं” – बृजरानी को बताया……..वो भी अंदर से दौड़ी हुयी आयीं ।

उस बैल गाडी के पीछे ……चार गाड़ियाँ और थीं ……उनमें उपहार भरे थे ……नाना प्रकार के उपहार ।

बृषभान और बृजराज दोनों गले मिले ………..कीर्ति और बृजरानी गले मिलीं ………रोहिणी नें आगे बढ़कर कीर्ति रानी का आदर किया ।

श्रीदामां का हाथ पकड़ कर दाऊ भीतर चले गए ………..दाऊ नें अपनें छोटे भाई को दिखाया ……श्री दामा को देखकर “लाला” बहुत खुश हुए ……वो किलकते ही जा रहे थे ।

कीर्ति रानी ! मैं तुमसे रूठी हूँ….बृजरानी नें आत्मीयता के साथ कहा ।

मैं समझती हूँ ……..पर क्या करूँ ? इनका कार्य ही इतना रहता है कि बरसाना ये छोड़ ही नही पाते …..अब देखो ना ! आपके लाला की वर्ष गाँठ में उपस्थित होनें की बड़ी इच्छा थी ………पर इनको काम था ।

कीर्तिरानी और बृजरानी दोनों बातें कर रही हैं ।

वो तो मैं इस बार आगयी……..मुझे पीहर में भी कुछ दिन रहना था ।

क्या कुछ खुश खबरी है ? बृजरानी नें छेड़ा कीर्तिरानी को ।

हाँ ……..पर मैने तो भगवान से प्रार्थना की है कि ……अब मुझे लाली ही देना ………मुझे बहुत इच्छा है मेरे अपनें लाली हो ………

मेरे अंगना में डोले लाली ………रुनझुन करती खेले ………सुन्दर लंहगा पहन कर नाचे, कितनी प्यारी लगती हैं ।

” लाली ही होगी “………..क्यों की पेट देखकर लग नही रहा कि लाला होगा …….8 महिनें का पेट इतना छोटा नही होता ……लाली ही है ।

“त्वन् मुखे घृत शर्करा”………..कीर्ति ये कहती हुयीं हँसी ।

चलो ! अपनें लाला को तो दिखाओ ………कहाँ है लाला ?

कीर्तिरानी की बातें सुनकर बृजेश्वरी उन्हें ले गयीं अपनें लाला के पास …….श्रीदामा के साथ खेल रहे थे लाला……….मुग्ध हो गयीं कीर्ति …….तुम्हे पता तो है ना नन्दरानी ! हम लोगों की क्या बात हुयी थी …..हँसते हुये बृजरानी के हाथ में थपड़ी मारते हुये कीर्तिरानी नें कहा था । हाँ हाँ …पता है …….”तुम्हारी लाली और हमारे लाला को व्याह होयगो”……..पक्की बात है ये ।

दोनों यही बातें करती हुयी, खूब हँसती रहीं, देर तक ।

भोजन किया सबनें मिलकर……..फिर बातें………..

इस तरह शाम हो गयी ।

अब हम चलते हैं ? कीर्तिरानी नें उठते हुए कहा ।

बृषभान ! यहीं रुक जाओ न आज ! कितनें दिनों में तो आये हो ।

नही …..बृजरानी ! मेरी मैया भी रावल में बाट देख रही हैं……..

अरे ! पास में ही तो है रावल …….चले जाना……बड़ी जल्दी पड़ रही है ससुराल में जानें की ……..छेड़ते हुए बृजराज नें कहा ।

अब आप आना बृजेश ! बरसाना……….

हाँ अब तो आना ही पड़ेगा………नन्द जी सहज में बोलते हैं ।

वैसे आप भी प्रार्थना करो कि हमारे अब लाली हो ………बृषभान नें अपनें मित्र को कहा ……और श्रीदामा को लेकर कीर्तिरानी के साथ बृषभान जी रावल गाँव में आगये थे …..जो पीहर है कीर्ति का ।

मैं बहुत प्रसन्न हूँ ……..तुम मेरे हो वृषभान ! ………शशि के नही हो ……वैसे मेरी शशि से कोई प्रतिस्पर्धा नही है ….शशि से क्या स्पर्धा होगी मेरी ……..मुझ भास्कर की ……..मुझे पता है ……वो मुझ से बदला लेना चाहता है …….रामावतार में मैने 1 महिनें का दिन जो बना लिया था इस बात से वो मुझ से चिढ़ता है …………..भगवान श्रीकृष्ण नें भी उसका मन तो रख ही दिया ………उसके चन्द्र वंश में अवतरित हुये …….और रात्रि में ही अवतार लिया ………….इस बात से वो बड़ा प्रसन्न है …….पर मैं आज प्रसन्न हूँ ……..मैं आज बहुत प्रसन्न हूँ ……….हे बृषभान ! तुम मेरे हो……बृष राशि के सूर्य हो तुम …….बृषभान !

तुम्हारी लाली आने वाली है……….आल्हादिनी हैं वो श्रीकृष्ण की ।

श्रीकृष्ण के हृदय का जो प्रेम है वह प्रेम ही आकार लेकर प्रकट होनें वाला है …….स्वामिनी हैं वो ब्रह्म की ……….सर्वेश्वरी हैं वो परब्रह्म की ……..आल्हाद की भी आल्हादिनी हैं वो ……….और मेरे “भानु कुल” में वो आरही हैं ………….मेरी शशि क्या होड़ करेगा ! उसका नन्दनन्दन तो हमारी भानु नन्दिनी के चरणों में ही पड़ा रहेगा ।

“भानु नन्दिनी” ………आहा ! ये कहने में भी कितना आनन्द आता है मुझे …….मुझे गौरव का भान होता है ………जब श्रीकृष्ण प्रिया का एक नाम मुझ से जुड़ा होगा …..भानु नन्दिनी ।

और हाँ …….प्रातः के समय उनका जन्म है …..जब मैं उपस्थित होऊंगा नभ में ………….शशि से मेरी क्या स्पर्धा !

वो लाली ……..तपते हुये कुन्तल की तरह उसका रूप रंग होगा …….वो प्रेम की देवी ……वो प्रेम की आराधिका ………..राधा !

अब उठो ………..आज ही होगा जन्म उन ब्रह्मशक्ति का ……..उठो बृषभान ! उठो ।

सूर्य ही स्वप्न में आकर बृषभान को ये सब बता रहे थे ।

बृषभान उठे ………ओह ! सपना था ये ।

पर आज देर तक सोते रह गए थे बृषभान…….उठे और चल दिए यमुना स्नान के लिये ।

रावल गाँव………यमुना के किनारे बसा हुआ गाँव है ये ।

सूर्योदय अभी हुआ नही है…….पर होनें वाला है ।

किन्तु मन आज प्रसन्न है ………..अति प्रसन्न है……….पक्षियों का कलरव चल रहा है …..हँसों का जोड़ा खेल रहे हैं यमुना में ……।

कमल खिले हैं नाना प्रकार के……..उनमें से सुगन्ध की वयार चल रही है …….हवा शीतल है …….स्वच्छ निर्मल पवित्र यमुना जी में गोता लगाया बृषभान जी नें ………पर आनन्द ! जैसे ही गोता लगाकर बाहर आये …….सामनें देखा यमुना के मध्य भाग में एक कमल खिला हुआ है ………बड़ा सुन्दर कमल है ………उस कमल में हलचल हो रही है……..कौतुक वश देखनें गए बृषभान जी …….पर ये क्या ! पास में जाकर जैसे ही देखा …….प्रकाश निकल रहा था उसमें से ………..प्रकाश पुञ्ज प्रकट हो रहा था ……….बृषभान और पास गए उस कमल के …..आहा ! ……..उसमें एक लाली सोई हुयी थी नन्हीं सी लाली …………उस लाली में तेज़ इतना था कि अपनें नेत्रों से पहली बार में तो देख भी न सके थे बृषभान जी । ओह ! स्वप्न याद आनें लगा बृषभान जी को …………

जो उन्होंने सपना देखा था ……..भानु नन्दिनी………सूर्य यानि भानु कितनें प्रसन्न थे सपनें में……..तो यही है मेरी लाली !

ख़ुशी से उछल पड़े थे बृषभान जी ………गोद में उठा लिया उस लाली को ……..कमल की सुगन्ध आरही है लाली के श्री अंगों से ………उसके नेत्र बन्द थे …….वो इतनी सुन्दर हैं…..जिसका वर्णन कठिन है ।

गोद में लेकर चल पड़े महल की ओर ……रावल गाँव की अपनी ही सुन्दरता है पर आज ये तो दिव्यातिदिव्य लग रहा है ।

जब गए महल में …….तब बृषभान नें देखा कि ………कीर्तिरानी के बगल में एक दिव्य प्रकाश है ……….बृषभानु के कुछ समझ नही आया ……….गोद की लाली को बगल में सुलाया बृषभान नें…..

…. आनन्द में डूब गए हैं………वो आनन्द मनाना चाहते हैं…….वो नाचना चाहते हैं …….वो सब कुछ लुटा देना चाहते हैं आज ।

तात विदुर जी ! पूरी प्रकृति झूम उठी है …….अस्तित्व आनन्द मना रहा है आज ………भास्कर के आनन्द का तो ठिकाना ही नही है ।

भादौं शुक्ल अष्टमी के प्रातः श्रीराधारानी का अवतार “रावल” में हुआ ।

! बृषभान गोप के कन्या जाई …….रावल में बजत बधाई !

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 36

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 36 )

!! बरष गाँठ मोहन की सजनी …!!


वो प्रलय था ….महाप्रलय …….मेरे आराध्य नें मुझे महाप्रलय के दर्शन कराये थे ……..कामना तो मैने ही की थी कि मुझे प्रलय का दर्शन करना है ………बस …..साधक की सच्ची कामना को साध्य कैसे मना कर दे ………..

सातों समुद्र उमड़ पड़े थे …………उन समुद्रों की लहरें आकाश छू रही थीं …………बड़ी बड़ी मछलियाँ समुद्री जीव मुझे खानें के लिये दौड़ रहे थे ……….मैं कितना घबड़ाया हुआ था …..मैं तेज़ और तेज़ तैरता हुआ भाग रहा था …….पर कितना भागता ………….सामनें से एक लहर और आयी …………वो मुझे ले गयी ………….एक शान्त स्थान में …….समुद्र भी इतना शान्त , कैसे ? मेरे मन में यही आरहा था ।

तभी मैने एक वट का विशाल वृक्ष देखा था …………मैं उस वृक्ष की ओर ही बढ़ा इसलिये बढ़ा ताकि उस वृक्ष में चढ़ कर इस महाप्रलय से बच जाऊँ ………..पर जैसे ही मैं चढ़नें को हुआ ……….वट पत्र है ………बड़ा ही पत्ता है …..उसमें एक बालक सोया हुआ – मैने देखा ………..वो बालक बड़ा ही सुन्दर था ………सुन्दर कहना भी कम है ………सुन्दरतम था ……….उसकी मुस्कुराहट ………….मैं उसको देखकर सब भूल गया ………..वो अपनें चरण के अँगूठे को मुख में डाल कर चूस रहा था……..ओह ! क्या छबि थी वो ।

इस घटना के घटे कई युग बीत चुके हैं………………युगों के कई चक्र घूम चुके हैं……….मैं कल्पान्त जीवी हूँ ……….ये आशीर्वाद मुझे स्वयं भगवान शंकर से मिला है ……………मैं ऋषि मार्कण्डेय हूँ ।

पर वत्स ! वो बाल मुकुन्द अब कुछ बड़े हो गए हैं ……………

मेरे ही आराध्य भगवान शिव नें मुझे ध्यान की अवस्था में बताया था ।

मैं भी वहीँ हूँ जहाँ बाल कृष्ण का अवतार हुआ है ………..भगवान शिव नें मेरे ऊपर परम कृपा कर दी थी ये बात बता कर ………

ओह ! मैं तो कल्पना भी नही कर सकता था कि ………..उनका अवतार भी होगा और मुझ जैसे तपश्वी को दर्शन भी होंगें ……..क्यों की मेरे ही आराध्य नें मुझे कहा था कि……इन नन्द लाल के दर्शन तपस्या से नही ……….प्रेम से होते हैं ………पर मेरे अंदर कहाँ प्रेम ?

तप करना हो तो युग बिता दूँ …….पर प्रेम मेरे शुष्क हृदय में कहाँ ।

मैं उठा ………और गोकुल के लिये प्रस्थान किया ………..क्यों की मुझे दर्शन करनें ही थे अपनें बालमुकुन्द के ।

हजारों गोपी और गोपों का झुण्ड नन्दमहल की ओर बढ़ रहा था……

सब सुन्दर थे और उनके परिधान भी ।

सबके हाथों में थाल थी, चाँदी की थाल ……..उस थाल में उपहार था …….जो वो नन्द नन्दन के लिये लाईं थीं ।

पीले पीले वस्त्रों से सुसज्जित स्वर्णादि आभूषणों से लदी हुयीं गोपियाँ जब चल रही थीं , उनके चोटी के पुष्प गिर रहे थे……….

आज बरष गाँठ है कन्हैया का…….आकाश से ऋषि मार्कण्डेय देख रहे हैं और गद् गद् हैं ।

हरे हरे केले के खम्भे जगह जगह पर लगाये गए हैं …….

हर द्वार द्वार पर धुजा पताका बन्दनवार इत्यादि लगाया गया है ……

गोपियाँ नन्दरानी से मिलती हैं……बधाई हो …..कहते हुये गले लगती हैं ……..बृजरानी आनन्दित हैं और क्यों न हों उनके लाल का आज बरष गाँठ है ……साल भर के हो गए हैं कन्हैया आज ।

तात विदुर जी ! उद्धव विदुर जी को बोले……….

आकाश से ऋषि मार्कण्डेय नें देखा……..बाल मुकुन्द – वही श्याम अंग, पर सौन्दर्य, माधुर्य, मृदिमा सौ सौ गुना अधिक हो गया है ।

ऋषि मार्कण्डेय देखते हैं………अब ये चलनें लगे हैं……..बोलनें लगे हैं…..काली घुँघराली अलकों से घिरे मुखचन्द्र से जब ये बोलनें लगते हैं तब जो अमृत का वर्षण होता है …….उफ़ ! उसे कैसे बताऊँ !

आये हैं बाहर आँगन में कन्हैया……..अपनी मैया की ऊँगली पकड़े ….

नेत्रों में काजल , कण्ठ में मुक्ता माल , वक्ष पर श्री वत्स चिन्ह …….नील वर्ण ………..रोक कर मैया नें पीली छोटी सी पोटरी में कुछ डालकर ……..नीम, गुग्गल, सरसों , दूर्वा इन सबको रखकर एक पोटरी बनाई है …….उसी को बाहु में बाँध दिया है ।

पर अजीब लग रहा है इन्हें ………बारबार टटोल रहे हैं बाहु को …….बाहु में बन्धे उस पोटरी को ।

लाला ! मत छू उसे……..और इसे खोलना नही ……तेरा आज जन्म दिन है ना ! मैया समझा रही है ।

“दाऊ को भी बाँध”………कन्हैया बोल उठे ।

दाऊ को नही बाँध सकती……..उसका जन्म दिन थोड़े ही है ……..बृजरानी समझा रही है ।

“तो मनसुख के बाँध”………कन्हैया को अब कैसे समझायें ।

पर मनसुख का बरष गाँठ नही है ना ! बृजरानी फिर समझाती हैं ।

क्यों नही है……..मेरा ही क्यों है ? अब इसका क्या जबाब है ।

क्यों की तू बड़ा है …..बड़े का बरष गाँठ आज है … छोटों का कल है ।

तो दाऊ का कल है ? कन्हैया नें पूछा ………हाँ …कल है …मैया को कहना पड़ा …..और मनसुख का ? मैया नें कहा उसका भी कल है ।

खींज जाएँ सुबह सुबह कन्हैया, ये बृजरानी नही चहाती ।

तभी महर्षि शाण्डिल्य मन्त्रोच्चार करते हुये वहाँ आगये ।

बृजपति नें चरणों में वन्दन किया ………….पूजन की सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं………….बस महर्षि बैठे और – गणेश पूजन, मातृका पूजन, वरुण पूजन, नवग्रह पूजन, ………..ऋषि मार्कण्डेय नें देखा ये सब देवता, ग्रह इत्यादि , स्वयं उपस्थित हो पूजन स्वीकार कर रहे थे और अपनें को धन्य धन्य मान रहे थे ।

महर्षि नें मन्त्रोच्चार किया ……भगवान विष्णु का ध्यान मन्त्र पढ़ा …….

पर किसी के भी ध्यान में भगवान विष्णु नही आरहे हैं ……..वही यशोदा के गोद में खेलता कन्हैया ही आरहा था ।

मेरा भी पूजन होता है …………क्यों की मैं दीर्घजीवी हूँ ……..मेरा नाम लेकर बालक को आशीर्वाद दिया जाता है …..”मार्कण्डेय की तरह तुम भी जीते रहो”………..

मैं आज बहुत प्रसन्न हूँ ………….मेरा नाम लिया गया बालमुकुन्द के सामनें ………..वो हँसे …………उन्होंने आकाश की ओर देखा …….मैने उन्हें दोनों हाथों से प्रणाम किया ……..वो मुस्कुराये ।

उनकी मुस्कुराहट ही तो माया है ……..मैं तुरन्त उतर गया नभ से …….और मैने उनके नन्हे चरणों में अपना प्रणाम निवेदित किया ।

बृजराज उठ खड़े हुये …………आप कौन हैं ? आप सप्तऋषियों में कोई एक हैं क्या ?

महर्षि शाण्डिल्य मेरा परिचय देंने जा रहे थे ……..पर मैने ही मना कर दिया ……वो बस मुस्कुराते रहे ।

आप हमारा आतिथ्य तो स्वीकार करें ……….आप हमारी सुरभि गाय का दूध स्वीकार करें …..इसका पान करें …….बृजराज कितनें सरल हैं …..मैं ऋषि मार्कण्डेय ब्रह्म के पिता को कैसे मना करता ……….

मैने दूध का पात्र अपनें हाथो में लिया ………..फिर एक लोभ मेरे मन आगया था …..उस लोभ से मैं बच न सका ………..

मैने तुरन्त दूध के पात्र को लेकर कन्हैया के मुख से लगा दिया ……..बृजराज बोले ……अरे ! ये क्या कर रहे हैं आप ?

पर मैने कहा …….जन्म दिन तो इनका है आज …….मैं अपनें हाथों से बृजराज कुमार को कुछ तो ……..ऐसा कहते हुए दूध को मैने प्रसादी बना दिया था …………..बस …..मुझे यही चाहिये था …….मैने तुरन्त उस पात्र का दूध ले, पी गया सब ………….बृजराज नें क्या सोचा होगा …….कि उनके बालक का जूठा दूध मैने क्यों पीया !

पर सोचें तो सोचें …………..मुझे जो आनन्द आया …….वो अवर्णनीय था ……….मैं तो बस प्रसादी दूध का पान करके वहाँ से चल ही दिया था यमुना के किनारे …………..क्यों की मुझे अब कुछ दिन बृज वास करना था …………आहा ! मेरा कन्हैया ।

तात ! विदुर जी ! इस तरह गोकुल में आनन्द रस की धारा प्रवाहित हो रही है ……..गोपियाँ नाच रही है …….दूध दही की कीच मची है ……गोपों का उत्साह तो देखनें जैसा ही है ।

“बरष गाँठ मोहन की सजनी, सब मिल मंगल गावो !
रंग महल के राय आँगन में , मोतिन चौक पुरावो !!”

गोपियाँ गा रही हैं……नृत्य उनका जो चल रहा है वो अद्भुत है ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 35

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 35 )

!! गोकुल में जब पहुँचे कागभुसुन्डी !!


कागासुर श्रीकृष्ण कथा सुना रहा है ………सबसे ऊँचा पर्वत है नीलगिरि …….वहीँ पर रहते हैं श्रीरघुनाथ जी के परमभक्त कागभुसुंडि ….कागासुर श्रीकृष्ण भक्त हैं…………ये श्रीकृष्ण कथा सुनाता है …….आज ये श्रीकृष्ण के रूप का दर्शन करा रहा है ……..सब काग शान्त चित्त से कथा सुन रहे हैं…….कागभुसुंडी भी सुन रहे हैं ।

श्रीकृष्ण ………क्या छबि है उनकी ……पीली झगुलिया पहनें …….पांवों में पैजनियाँ ………करधनी कमर में ………….सिर के बालों को सुगन्धित तैल लगाकर बांध दिया है मैया नें ………नील वर्ण ……….नेत्रों में चंचलता ……..कागासुर तन्मय हो जाता है रूप का वर्णन करते हुये ।

मैं भी दर्शन करके आऊँ……….मन में इच्छा जागी इन महाभागवत कागभुसुंडी के ।

सीधे उड़ चले कैलाश की ओर……..माता पार्वती को प्रणाम करके…..प्रश्न किया – महादेव कहाँ हैं ?

वो तो गोकुल गए हैं………….

माता पार्वती को इससे ज्यादा बोलनें की अभी इच्छा भी नही है ।

प्रणाम करके कागभुसुंडी , उड़ चले कैलाश से गोकुल की ओर ।

प्रभात वेला थी………सूर्योदय होनें में अभी समय बाकी था ।

नीलसुन्दर श्याम को बृजरानी अपनें अंक में रखकर दूध पिला रही थीं ।

आनन्द में मग्न, अधखुले कज्जल रंजित विशाल लोचन ……..माता के एक स्तन से मुख हटा कर दूसरे में लगा लिया है ।

दूध फैल रहा है……..क्यों की वात्सल्य की अधिकता हो गयी है बृजरानी में…….एक स्तन से पीते समय दूसरे से दूध बहता रहता है ……..एक प्रकार से कन्हैया दूध पीते भी हैं और नहाते भी हैं…..बड़ा दिव्य और अद्भुत रूप हो उठा है कन्हैया का ।

कागभुसुंडी आनन्दित हैं……..वो बस चक्कर लगा रहे हैं……….परिक्रमा कर रहे हैं ……मैया और लाला की , दोनों की ।

अरे ! लीला रच दी कन्हैया नें तभी…….कागभुसुंडी विचार करते हैं ।

हुआ ये कि ………बाल कृष्ण नें तभी जम्हाई ली ……………जम्भाई लेते हुये जब यशुमति नें देखा ……तो चुटकी बजानें के लिये जैसे ही उनके हाथ उठे ………..मुँह में कुछ और देख लिया मैया नें …….सागर, नदी, समुद्र, तारे, चन्द्रमा, सूर्य पृथ्वी वृक्ष…….और इतना ही नही ….इनकी संख्या भी सैकड़ों में …..भोली बृजरानी के तो नेत्र आश्चर्य से फैल गए……..ओह ! ये क्या ! वो कांपनें लगीं …….कन्हैया हँसनें लगे ……सबसे पहला काम तो ये किया मैया नें कि – लाला के मुख से दूध हटाया पहले……..उन्हें लगा अपच हो गया मेरे लाल को ।

कागभुसुंडी आनन्दित हैं …….ये हँस नही सकते क्यों की काग के देह में हैं………पर आनन्द प्रकट करनें के लिये ये बस घूम रहे हैं ……..और प्रसन्न हो रहे हैं ।

ये क्या हो गया मेरे लाला को ? मेरे लाला को अपच हो गया ……….इसनें कहीं मिट्टी खाई होगी ……..तो इसके मुँह में मिट्टी है ……पत्ते खाये होंगें पेड़ ही खड़ा है इसके मुँह में ……..इसे कुछ नही पच रहा ………ओह ! अब ? मैया इधर उधर देख रही है ।

काग भुसुंडी हँसे ……….खूब हँसे मन ही मन में ……….

मैं भगवान शंकर का स्नेहभाजन योगसिद्ध , किन्तु कितना व्याकुल हो उठा जब यही सब मैने रामावतार में बाल रूप श्रीराम के मुखारविन्द में देखा था ………मैं तो माया के प्रभाव से मूर्छित ही हो गया था …..मुझे तो ज्ञान दिया था उन राघव नें …………पर ये मैया ! माया तो सिर पीटती होगी इन मैया के वात्सल्य को देखकर ………सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देख लिया मुख में , पर मैया माननें को राजी ही नही है कि ये कोई भगवान या ब्रह्म है ………….हँसते हैं कागभुसुंडी – कह रही है मैया …..कि “लाला को अपच हो गया है “……

कागभुसुंडी खूब हँसे ……..और नन्दलाला के पास में आकर धीरे से बोले ………ये सब ऐश्वर्य मत दिखाओ यहाँ …………आपको ये मैया भगवान माननें से रही ………..हाँ ……आप अगर ये सब दिखाते रहे …….तो यहाँ कोई नही है अयोध्या की तरह राजवैद्य ………यहाँ तो गौ मूत्र पिलाएगी मैया …..पीना है तो ये सब करो ……..गौ मूत्र कड़वा होता है …….कोई मिश्री नही है……..ये कहते हुये कागभुसुंडी चरणों में प्रणाम करते हुये उड़ गए थे अपने नीलगिरि पर्वत की ओर ……..पर जाते जाते ……..”चिन्ताहरण महादेव” के दर्शन भी कर लिए …….जो यहीं पर हैं …..और तब तक यही रहेंगें जब तक लाला यहाँ रहेगा ……

कागभुसुंडि ! दर्शन कर लिए कन्हैया के ?

भगवान शंकर नें आनन्दित होते हुये पूछा था ।

हाँ …….बाबा ! दर्शन करि आये ।

उतर कर कागभुसुंडी नें चिन्ताहरण महादेव को प्रणाम किया ……..और अपनें स्थान की ओर उड़ चले थे ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 34

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 34 )

!! “क्या तू सुअर भी बना था” – जब मैया नें पूछा !!


मुझ से कल एक साधक नें पूछा…..तनाव मुक्त होनें के लिये क्या करें ?

उन्होंने ये प्रश्न किया था इन दिनों चल रहे रोग “कोरोना” को लेकर ।

मैने उनको कहा – घर में ही रहें , घर में अगर नन्हे बालक हों तो उनके साथ खेलें ………..बन जाएँ बालक ……..करें उनकी तरह शरारतें …..उनकी तरह मुँह बनाएं …….हँसें …….खिलखिलाएं ।

सन्तों का संग करनें को नही कहेंगें ? आप तो यही कहते थे…….

उन्होंने फिर मुझ से पूछ लिया ।

मैने कहा ….सन्तों से बड़े होते हैं परमहंस …….और मेरी दृष्टि में बालकों से बड़ा परमहंस और कौन होगा ?

अभी रो रहा था ………..अभी फिर हँसनें लगा ……..सुख दुःख से परे है बालक ………..अभी अच्छा बोल रहा था अभी गाली देनें लग गया …..अच्छाई बुराई से परे है बालक ………..

वह जब चाहता है स्त्रियों में दौड़ जाता है …….जब चाहता है पुरुषों में बैठ जाता है …..स्त्री और पुरुषों के भेद से परे है बालक ……….

अभी कपड़े पहना था ……..अभी कपडों को फेकते हुये नंगा होकर शरीर में मिट्टी लगा लेता है ………..सामाजिक मान्यताओं को धता बतानें का साहस बालक ही करता है ………..

अद्भुत है बालक ……….इसलिये मैं कहता हूँ …….सन्त न मिलें …..तो कोई बात नहीं …….घर में बालक हैं ना ………..वो परम हँस हैं …….उनके साथ गाओ, उनके साथ खेलो …..उनके साथ नाचो ……उनके साथ खिलखिलाओ………..

मैने उन साधक को कहा……..महाप्रभु श्री बल्लभ अपनें पुत्रों में कन्हैया का दर्शन करते थे……उनको वो कन्हैया के रूप में ही देखते थे ।

…..ये भी एक सरल और उत्तम साधना है ।

यमुना का पुलिन है ……….शीतल वयार चल रही है ……किनारे में कमल खिले हैं , अगनित कमल खिले हैं ।

बालुका में कौरव त्राता विदुर जी बैठे हैं……..श्रोता के रूप में ……और वक्ता के रूप में बैठे हैं उद्धव …….जो श्रीकृष्ण लीला का श्रवण करा रहे हैं…….क्यों कि श्रीकृष्ण को इन्होनें जाना है ….जीया है …..इसलिये ये इस “श्रीकृष्णचरितामृतम्” के प्रामाणिक वक्ता हैं ।

तात विदुर जी ! अब कन्हैया चलनें लगे ……….

…..उद्धव नें नेत्रों को बन्दकर, प्रसंग आगे बढ़ाते हुये कहा ।

जहाँ गोबर , जहाँ गायों का गोष्ठ है ………ये नन्द नन्दन वहीँ जाते हैं ।

आज सुबह उठ गए थे कन्हैया ………….रोनें लगे ……..मैया बृजरानी नें गोद में लिया और पयपान करानें लगीं…………कन्हैया पयपान करते हुये अपनी मैया को देख रहे हैं………..मैया अपनें लाला को देख रही है…………..दोनों एक दूसरे को देखते हुये आनन्दित हैं ।

मैया नें अब हटाया लाला को अपनें वक्ष से …………..मैया को ये भी लगता है कि ज्यादा दूध पी लिया तो कहीं अपच न हो जाए ।

हटाया अपनें बालक को………बस कन्हैया तो फिर रोनें लगे …….नन्हें नन्हें हाथों से अपनी मैया को मारनें लगे………मैया को बड़ा सुख मिल रहा है ……….नन्हीं उँगलियों में मैया के केश उलझ जाते हैं ………कन्हैया गुस्से से खींच रहे हैं……………मैया हँस रही है …….खूब हँस रही है ।

जीजी ! थोडा रसोई में आओ तो ! रोहिणी नें आवाज दी ।

कन्हैया को धरती में रख दिया मैया नें , और रसोई में घर में गयीं ।

इधर कन्हैया रो रहे हैं…..अपनें नन्हें नन्हें पाँव पटक रहे हैं……….

गोपियाँ रोते हुये बाल गोपाल को देख रही हैं……पर ये रोते हुए इतनें सुन्दर लगते हैं….कि देखनें वाला चुप कराना भी भूल जाता है …..बस देखता रहता है ….यहाँ गोपियाँ मन्त्र मुग्ध सी देख रही हैं कन्हैया को ।

धरती में लोट पोट हो गए हैं कन्हैया ……………गोबर इनके शरीर में लग गया है …………मिट्टी ही मिट्टी से सन गए हैं ये ………पर सुन्दर बहुत लग रहे हैं ।

…..धूल धूसरित ब्रह्म…आहा ! उद्धव को ये लीला दीख रही है ।

हे भगवान ! मैं क्षण भर के लिये क्या गयी ……इसनें अपनी क्या हालत बना ली है……….बृजरानी नें आकर लाला को अपनी गोद में उठा लिया था ।

नन्दरानी ! पैजनियाँ बाँध दो लाला के पाँव में …….

हाथों में भी बजनी ………..इससे क्या होगा ना ……बालक जब चलता है ……तब अलग कुछ बजे तो उसे चलनें में और आनन्द आता है …………और हम लोगों को भी सुननें में आनन्द आएगा !

कुछ बूढी गोपियाँ थीं ………उन्होंने मैया को सलाह दे दी ।

पहले तो लाला को नहलाया मैया नें ……..क्यों की गोबर पूरे शरीर में लगा लिया था …..बालों को भी धोना पड़ा …….क्यों की धूल से भर गए थे उनके घुँघराले केश…….मुख में मिट्टी लगी थी …….मैया नें बड़ी तसल्ली से नहलाया …………मुख धोया ………..फिर सुन्दर वस्त्र से उनके शरीर को पोंछा………..वस्त्र पहनाये …… सुगन्धित .तैल लगा दिया बालों में……….काजल आँखों में …….फिर टीका काजल का ………..ताकि नजर न लगे ।

अपने वक्ष से सटाकर फिर मैया दूध पिलानें लगी ……..दूध पेट भर कर पीया लाला नें …………..फिर बड़े प्रेम से पालनें में सुलानें लगीं ……तो रोये लाला …………अच्छा ठीक है ……रेशमी वस्त्र धरती में बिछा दिया और उसी में खेलनें के लिये कहा ………।

तभी उधर से दाऊ आये …………चलते हुए …………

तू कहाँ घूमता है ……देख ! तेरा लाला अकेला है यहाँ ……इसका ध्यान रखना चाहिये ना ? तू कहाँ गया था………अब कहीं मत जा ठीक है ? मैया की बात पर दाऊ नें भी सिर हिलाकर कहा ….ठीक है ।

हाँ ….अपनें भैया का ख्याल रखना ………..मैं अभी आती हूँ …..बृजरानी दाऊ को लाला के पास छोड़कर फिर रसोई में गयीं ।

इधर दोनों खेल रहे हैं……………बड़ी मस्ती में खेल रहे हैं ……….किलकारियाँ मार रहे हैं……………भैया ! भैया ! ये शब्द अब स्पष्ट बोलते हैं कन्हैया …….मैया और बाबा भी बोलते हैं………”गैया” भी बोलना सीख गए हैं ये ।

भैया ! तलो ….तलो वहाँ …..अभी हर शब्द स्पष्ट नही है इनका ।

दाऊ नें देखा ……किस और दिखा रहा है लाला ………..

गैया …..गैया पास तलो …………..

दाऊ नें कहा ………नहीं ……वहाँ बैल है ……..वो मारता है ।

दाऊ नें देख लिया था एक बैल था नन्द जी के गोष्ठ में ……..जो विशाल था …..बड़ी बड़ी नुकीली सींगें थीं उसकी …….एक अकेला ग्वाला वहाँ नही जा सकता था ।

आज कन्हैया उसी के पास चलनें के लिये कह रहे थे ।

नही ……..लाला ! वहाँ नही …….मारेगा वह बैल ।

दाऊ नें समझाना चाहा……पर लाला कहाँ मानता ।

भैया ! त लो…….त लो…….उठ गए थे लाला .जिद्द करनें लगे थे …….इसलिए अब दाऊ नें हाथ पकड़ा कन्हैया का ……और दोनों चल दिए उसी बैल की ओर ।

दोपहर का समय होनें जा रहा था ………..कोई आस पास था नही ……मैया भी गृहकार्य में व्यस्त थीं ….रोहिणी हाथ बंटा रही थीं ।

दोनों बालक धीरे धीरे चलते हुए गए थे उस विशाल बैल के पास ………

वो भी बैठा था ………….

पर अब कन्हैया नें दाऊ का हाथ छोड़ स्वयं ही दौड़ पड़े उस बैल के पास ……….और जाकर एक सींग उस बैल की पकड़ ली ।

उस सींग में झूलनें लगे और किलकिलानें लगे…..भैया ! भैया ! आओ !

अपनें प्रिय दाऊ भैया को बुलानें लगे …….वो भी खुश होते हुये आगये और बैल की दूसरी सींग दाऊ नें पकड़ ली ।

झूलनें लगे थे दोनों ……..बैल आलस में था आज ………दोपहर का समय “उसे क्रोध दिखाना है” इसमें भी वो आलस कर रहा था ।

किलकिलाते हुए दोनों झूले जा रहे हैं बैल की सींग पर ……..

कुछ देर तक तो बैल सहता रहा ……..पर कुछ देर बाद ही वो उठ गया ……और जैसे ही वो विशाल बैल उठा ………….मैया ! मैया ! मैया ! दोनों बालक चिल्लाये ………..पर इनकी आवाज वहाँ तक कैसे जाती ……बस चिल्लाये जा रहे हैं दोनों ।

तभी मैया ऐसे ही बाहर आगयी थी ……देखनें के लिये कि कहाँ हैं ? क्या कर रहे हैं दोनों बालक ।

जैसे ही आयीं , वहाँ तो हैं नहीं …….वो डर गयीं , वो भागीं …….

पर , मैया ! मैया ! मैया ! की आवाज सुनी बृजरानी नें ।

वो जैसे ही उस आवाज के पीछे दौड़ीं………..हाथ छूट गया इन दोनों का ….गोबर का ढ़ेर पड़ा हुआ था उसमें धम्म् से गिर पड़े ।

मैया नें आकर देखा ………….गोबर का ढ़ेर है …..उसमें ये दोनों पड़े हैं ….मुख में गोबर, हाथ में गोबर , सम्पूर्ण शरीर में गोबर ।

माथा पकड़ के बैठ गयीं बृजरानी …………..

क्यों रे ! तू क्या , पिछले जनम में सुअर था ?

मैया नें गुस्से में कह दिया ।

तू इसी गन्दगी में खेलता है …..मुझे लगता है तू पक्का सुअर ही होगा ।

विदुर जी हँसते हुये बोले ……उद्धव ! सच तो कह रहीं हैं बृजरानी ……वराह का रूप धारण तो किया था कन्हैया नें ।

उद्धव हँसते हुये बोले……कन्हैया की मैया है झुठ कैसे बोल सकती हैं !

मैया माथे में हाथ रखकर अपनें लाला को देख रही है ……….लाला गोबर की ढ़ेर में पड़ा हुआ है और मुस्कुरा रहा है ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 33

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 33 )

!! नन्द देहरी में अटका ब्रह्म – एक अद्भुत लीला !!


एक दिन रुद्रांश ऋषि दुर्वासा पधारे गोकुल में ।

ऋषि ! आप ? झुक कर भगवती पौर्णमासी नें प्रणाम किया ।

आप यहाँ भगवती ? परम शैव हैं आप……और शैवों को तो शिव धाम में ही वास करना चाहिये…..आप यहाँ कैसे ?

दुर्वासा ऋषि नें पौर्णमासी से चकित हो, प्रश्न किया था ………और भगवती ! मुझे स्मरण होता है जब आप काशी में समाधिस्थ होती थीं ……..निराकार के ध्यान में आपका लीन हो जाना मुझे आनन्दित करता था ………आपके भाई ऋषि सान्दीपनि से मैं मिला था महाकाल के मन्दिर में …….वो हैं अनन्य शैव ……….काशी छोड़कर गए भी तो शिव धाम अवन्तिका में ………पर आप यहाँ क्यों ?

प्रणाम मामा जी ! पीछे से आकर मनसुख नें प्रणाम किया ऋषि को ।

मनसुख मामा ही कहता है जो भी ऋषि इसे मिलें ।

और ये तो तुम्हारा पुत्र है ? दुर्वासा नें जब मनसुख को देखा तो पूछा ।

जी ! ऋषि ये मेरा ही पुत्र है………पौर्णमासी नें इतना ही कहा ।

इसे ब्रह्मनिष्ठ बनातीं ……..ब्रह्म वेत्ता बनाना था इसे ………ब्रह्म कुल का ये बालक है………कहाँ ले आयी हो तुम इसे ….और स्वयं भी ।

दुर्वासा को अच्छा नही लग रहा है पौर्णमासी और मनसुख का गोकुल में रहना …………

आप “गौ रस” कुछ तो स्वीकार करें मेरी कुटिया में चलकर ?

पौर्णमासी नें आग्रह किया ।

दुर्वासा भगवती पौर्णमासी कि बात मानकर उनकी कुटिया में चल तो दिये और कुछ गौ दुग्ध का पान भी किया पर ………

वत्स ! ब्रह्म को जब तक नही जाना सब जानना व्यर्थ है ……….मनसुख के सिर में हाथ रखते हुये दुर्वासा नें कहा ।

तात विदुर जी ! भगवती पौर्णमासी के प्रति विशेष श्रद्धा रखते थे ऋषि दुर्वासा ……..क्यों कि उस समय शायद ही कोई हो ……जो पूर्ण शिवानुरागिनी अगर कोई थीं तो पौर्णमासी ही थीं ।

समाधि लग जाती इनकी तो वर्षों यूँ ही बीत जाते ………..इसलिये तो दुर्वासा आज पौर्णमासी के यहाँ पहुँच गए थे ।

मनसुख ! तुमनें काल को जीत लिया है ……सनकादिकों कि तरह तुम भी हो……..एक ही वय तुम्हारी है ……..तुम सिद्ध योगियों में से एक हो…….फिर क्यों उस ब्रह्मानुभूति को त्याग कर तुम यहाँ ?

मामा जी ! ब्रह्म तो मेरा यहीं है ………कल ही उसनें चलना सीखा है …..नही नही , घुटवन चलना सीखा है……..निराकार ही यहाँ नराकार हो गया है मामा जी ! खूब किलकारियाँ मारता है ……नन्हें नन्हें पाँव पटकता है ……..जब इन आँखों से ही दिखाई पड़ रहा है तो कौन ध्यान करे …….और कौन आँखें बन्द करे ?

हँसते हुये मनसुख नें ये सारी बातें कह दी थीं……….

तो ब्रह्म को हमें नही दिखाओगे ?

ऋषि नें भी मनसुख से कह दिया ।

क्यों नही मामा जी ! ……सबको सुलभ है वो यहाँ ? ज्ञानियों के ब्रह्म कि तरह दुर्लभता नही है उसकी यहाँ ………न आँखें बन्द करनी है आपको …..न “अहंब्रह्मास्मि” का अनुसन्धान.. …….बस देखना है …….उस नन्द के आँगन में…….वहीँ खेलता है आपका ब्रह्म ।

पौर्णमासी हँस रही हैं………दुर्वासा ऋषि नें उठते हुये कहा ……अब तो चलो ……नन्द के आँगन में ही चलो ….देखते हैं तुम्हारे ब्रह्म को ……….ऐसा कहकर दुर्वासा ऋषि चल पड़े …..आगे आगे मनसुख बड़े उत्साह से चल रहा था ।

लाला ! लाला !

उधर से दाऊ आगये थे ….और कन्हैया को पकड़ के कुछ कह रहे थे ।

अभी बोलना नही आता कन्हैया को……ना, हाँ, हत्…. बस ऐसे ही कुछ शब्द हैं जो कन्हाई बोल लेता है ।

चलो ! उधर ! ऊँगली के इशारे से बताया दाऊ नें ।

दाऊ भी तो छोटे ही हैं………पर हाँ ये बोल लेते हैं ।

नन्द महल के बाहर जानें के लिये दाऊ कह रहे हैं कन्हैया को ।

खुश हो गए कन्हैया…….किलकारियाँ मारनें लगे…….तो दाऊ नें हाथ पकड़ लिया कन्हैया का……और लेकर चले …….पर अपनें को न सम्भाल पानें के कारण कन्हैया गिर गए …….गिर गए तो रोनें लगे …..दाऊ नें चुप कराया……..फिर धीरे से बोले ….लाला ! चल ! उधर ……कन्हैया लगी चोट को फिर भूल गए ……और घुटवन – घुटवन आगे बढ़ने लगे ……..चाल तेज है दोनों कि …….आज दोनों नें ही ये संकल्प कर लिया है कि …..देहरी पार करनी ही है……….

जैसे तैसे घुटनों को छिल छिला के पहुँच ही गए थे ये देहरी में ।

अब देहरी से नीचे उतरना है…….दाऊ नें देखा……..पर चंचलता कि पराकाष्ठा कन्हैया ………वो तो नीचे उतर भी गए …….पर नीचे गहरा है बहुत…….दो फुट भी तो इनके लिए गहरा है ….देहरी को पकड़ लिया है ऊपर …..अब हाथ छोड़ें तो गिर पड़ेंगें……गिर पड़ेंगें तो बुरी लगेगी……..

अब तो आ, ऊँ , जोर से चिल्लाना शुरू किया कन्हैया नें ……… कन्हैया के चिल्लानें से डर गए दाऊ ……..क्यों कि यहाँ वही तो लाये थे कन्हैया को…….वो कहें – चुप ! मैं खींचता हूँ तुझे , पर तू चुप रह ……….समझ गए कन्हैया भी ………वो चुप भी हो गए …दाऊ नें खींचना भी चाहा पर……फिर लटक गए कन्हैया देहरी में ।

वत्स ! ब्रह्म को जानना ही ब्राम्हणत्व है……

…..दुर्वासा समझाते हुए चल रहे थे ।

हँसा मनसुख ……..और हँसते हुए रुक गया ………….वो देखिये आपका ब्रह्म …….नन्द कि पौरी में अटका हुआ है ……..

दुर्वासा नें देखा……वो स्तब्ध हो गए….उनके नेत्र खुले के खुले रह गए ।

दिव्य नीलमणी के समान चमकता हुआ एक बालक है……सूर्य चन्द्र जिसके प्रकाश के आगे कुछ नही है ……प्रकाश हजारों सूर्यों के समान है ……पर शीतलता इतनी जितनी चन्द्रमा में भी नही है……….

अधर लाल …………घुँघराले केश ………ऐसा लग रहा है जैसे मुख रूपी कमल में सैकड़ों भौरें घूम रहे हों………….

नन्हें नन्हें हाथ ………..वक्ष में भृगु चरण चिन्ह ……….छोटा सा उदर ……गम्भीर नाभि…….चरण छोटे छोटे जो लटके हैं………

चरणों में चिन्ह हैं …..चक्र ,शंख, गदा पदम् यव, मछली, षट्कोण ।

आहा ! दुर्वासा ऋषि कि आँखें खुली की खुली रह गयीं……..हाँ …..यही तो है ब्रह्म ……..जो निराकार था आज साकार होकर प्रकटा है…..पर दुर्वासा उस समय चौंक गए …….जब यह ब्रह्म रोनें लगा …….और रोते हुये दाऊ से इशारे में कहनें लगा – “मुझे ऊपर खींच” ।

दाऊ भी तो बालक ही हैं………पूरी ताकत लगाकर कन्हैया को दाऊ नें खींचा ……..जैसे तैसे खींच लिया ऊपर ।

ऋषि दुर्वासा को अब देह भान नही है…..वो सब कुछ भूल चुके… ……बस उनके हृदय में यही “बाल कृष्ण” अच्छे से बस गए हैं अब ।

ऋषि आनन्द में डूब कर यही गा रहे थे……..

श्रुति जिसे पढ़नी हो, पढ़े , जिसे उपनिषद् पढ़ना हो वो भी पढ़े …….जिसे निराकार ब्रह्म ज्योति में अपना ध्यान लगाना हो लगाये …..पर मैं तो इस “नन्द देहरी” को प्रणाम करता हूँ …जिसमें ब्रह्म अटक गया था …….दुनिया को उबारनें वाला स्वयं उबरनें के लिये याचना कर रहा था ……आहा ! ये कहते हुये ऋषि दुर्वासा आनन्दित हो नाचते रहे ……बृज रज को अपनें शरीर में लगाते रहे ………

मनसुख ये देखकर बहुत प्रसन्न हुआ था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 32

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 32 )

!! कान्हा चलनें लगे…!!


आहा ! कभी सोचा भी नही था कि विधाता हमें इतना सुख देगा ।

मेरी तो आस ही टूट चुकी थी कि मेरे भी लाला होगा ……..बृजराज तो सच में गृहस्थ के भेष में एक महात्मा हैं………उच्चकोटि के महात्मा ।

पुत्र नही था तब भी चिन्तातुर इनको मैने कभी नही देखा ……..”गोकुल के समस्त बालक क्या हमारे ही बालक नही हैं ? ये कहना था बृजराज का…….सकाम अनुष्ठान से इन्हें चिढ थी………पर बड़ों का आदर करना इन्हें आता था……..और इन्होनें किया भी …..फलस्वरूप आज हमारे यहाँ नीलमणी सा लाला हुआ है ।

नामकरण भी सम्पन्न हो गया ……..आचार्य गर्ग तो क्या क्या कह रहे थे ……….मुझे लगता है वो भावुक ज्यादा हैं………..कह रहे थे “भगवान नारायण” के समान है तुम्हारा बालक ……..रोहिणी ठीक कह रही थी …साधू पुरुष समस्त बालकों में भगवान का ही रूप देखते हैं …।

सुबह ही सुबह स्नानादि से पवित्र होकर पूजन इत्यादि करके ……..कुछ कलेवा बनाकर अपनें लाला के पालनें के पास बैठ गयी हैं बृजरानी ……….सोते हुये अपनें लाला को निहार रही हैं……….और लाला के विषय में ही सोच रही हैं ।

“कितना सुन्दर है मेरा लाला”……ये कहते हुये फिर डर जाती हैं……मेरी नजर भी तो खराब है……अपनें ही लाला को लग जाती है ….ये कहते हुए बृजरानी आँखों का काजल निकाल कर लाला के माथे में लगा देती हैं ।

अरे ! तुम ऐसे ही बैठी हो गाल में हाथ रखे ……बृजरानी! उठो ……उत्सव है आज ……..द्वार सजाओ ! …….गोबर से लीपो आँगन ………..रंगोली काढो ……….उपनन्द जी की पत्नी नें आकर बृजरानी को ये सब करनें को कहा ।

पर आज उत्सव क्या है ? मेरे तो कुछ ध्यान में नही आ रहा !

यशोमती नें पूछा ।

लाला के मुख से ध्यान हटे तब ना उत्सव का ध्यान हो…..उपनन्द जी की पत्नी सहजता में बोलीं ये सब ।

अरे बृजरानी ! बाहर देखो ! पूरे गोकुल की धरती को लीप दिया है गोप और गोपियों नें …..फिर हँसीं उपनन्द जी की पत्नी…..मानों उनके आँगन में भी आज ही लाला घुटवन चलते हुए पहुँच जाएगा ।

पगला गए हैं सब गोकुल वारे……….उत्सव नन्दालय में है सजा रहे हैं पूरे गोकुल को…………

ओह ! मैं तो भूल ही गयी ….बृजरानी भीतर भागीं………मुझे कहा था महर्षि शाण्डिल्य नें……..कि आज मेरा लाला भूमि पर बैठेगा …..खेलेगा……घुटवन चलेगा ……..इसी का उत्सव है आज ।

बृजरानी भीतर गयीं………सज धज कर कुछ ही देर में बाहर आगयीं थीं…..रोहिणी भी आगयीं …….नन्दालय में सुबह से ही माखन निकलना शुरू हो जाता है…….सैकड़ों गोपियाँ तो माखन ही निकालती रहती हैं……….ये माखन मथुरा और आस पास के क्षेत्रों में जाता है ।

बाहर आकर बृजरानी नें अपनें लाला को गोद में लिया ………नींद खुलनें के कारण कन्हैया जब रोनें लगे ……..तब दूध पिलानें लगीं बृजरानी ……दूध से पेट भर गया ……तब आँखें खोलकर इधर उधर देखनें लगे थे कान्हा……..बृजरानी नें हल्के ऊष्ण जल से स्नान कराया……चोटी बना दी…….काजल लगा दिया……काजल का टीका भी लगा दिया लाला के…….फिर सुला दिया पालनें में ।

अब बृजरानी उत्सव के कार्यों को देखनें लगीं थीं ।

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हे तात विदुर जी !

पृथ्वी में भगवान नें अवतार किया…….पर पृथ्वी को अभी तक उनका स्पर्श नही मिला……..इसलिये पृथ्वी दुःखी थीं ।

पर आज पृथ्वी एकाएक प्रसन्न हो उठी …………क्यों कि आज से नन्दनन्दन पृथ्वी में बैठेंगे ……चलेंगें ……।

ये भी संस्कार है ………..”भुम्यूपवेश संस्कार” ।

पूरा गोकुल ही आज प्रसन्न है ……….वैसे तो उत्सवों कि कोई कमी नही है यहाँ ……….जब से लाला हुआ है बृजरानी के ……तब से उत्सव ही उत्सव हो रहे हैं ……पर आज कुछ ख़ास है ………..क्यों कि गोकुल वासियों को लग रहा है …..आज से लाला चलेगा ……..पैंयां पैंयाँ नही चलेगा तो क्या हुआ ……घुटवन तो चलेगा …..और क्या पता घुटवन चलते हुये हमारे यहाँ तक आजाये……..”सच में बाबरे है गए हैं सबरे गोकुल वारे” ।

हल्दी, कुंकुंम, अबीर से जगह जगह रंगोली बनाई जा रही है………शुद्ध गौ के ताजे गोबर से सम्पूर्ण गोकुल को ही लीप दिया गया है ………बन्दनवार, रंगीन ध्वजा पताके , सर्वत्र लगाये गए हैं……….गुलाब जल का छिड़काव किया गया है जिससे पूरा गोकुल ही महक रहा है ………

तभी महर्षि शाण्डिल्य अपनें ब्राह्मणों को साथ में लेकर स्वस्तिवाचन करते हुए नन्दालय के आँगन में पहुँच गए थे ।

महर्षि के चरण स्वयं नन्द दम्पति नें धोये …….आसन दिया ……समस्त ब्राह्मणों को सुन्दर आसन में बैठाया ।

मन्त्रोच्चार के कारण वातावरण और दिव्य बन रहा था……..तभी पीपल आम इत्यादि कि सूखी लकड़ियों में अग्नि का आव्हान किया……एक वेदिका में इन सब लकड़ियों को रखा गया था…..ऊपर से घृत कि धार छोड़ते हुये अग्नि का जब अव्हान किया गया …..बस देखते ही देखते अग्नि देवता भी शुद्ध सत्व रूप से प्रकट हो गए………

कुछ देर तक मन्त्रोच्चार होता रहा ……आहुति भी बृजराज और बृजरानी देते रहे……….पौर्णमासी नें अब आकर कहा ……..बृजरानी ! आप उठो ………और लाला के पास चलो ………बृजरानी उठकर लाला के पास आयीं …………..

हजारों गोप गोपियाँ खड़े हैं………और लोक गीत गाकर सब आनन्दित हो रहे हैं……..बीच बीच में गोप “बृजराज कि जय”…”बृजराज के लाला कि जय” जयकार लगा रहे हैं ।

पालनें से उठाया बृजरानी नें ………..

महर्षि शाण्डिल्य नें बृजराज के द्वारा पृथ्वी कि पूजा कराई …..जल, फिर चन्दन रोरी, फिर अक्षत मोली इत्यादि से पृथ्वी कि पूजा की ।

इशारा किया महर्षि नें …….तो पौर्णमासी नें बृजरानी से कहा …….लाला को पृथ्वी में रख दो अब ………….

रुक गयीं बृजरानी ………कठोर है, कठोर है पृथ्वी …….और मेरा लाला बहुत कोमल है ………..हे भगवती पौर्णमासी ! आप कहें तो नीचे कुछ वस्त्रों को बिछाकर लाला को बैठा दूँ ?

हँसते हुये पौर्णमासी बोलीं ………नही बृजरानी ! कुछ नही होगा ……और लाला को तो सीखना ही पड़ेगा ना चलना ….बैठना ।

बृजरानी कि दशा देखकर सब हँसनें लगे ………..क्यों कि उनका वात्सल्य उमड़ पड़ा था ………

पर लाला को पृथ्वी में रखना ही पड़ेगा …………डरते हुए उन्होंने जैसे ही लाला को पृथ्वी में रखा ……….लाला तो बैठ गया ……….अपनें आपको साध लिया ………..सब गोप गोपी प्रसन्न हो उठे ………

लाला सबको देखकर किलकारियाँ भरनें लगा …….. ताली बजानें लगा ………पर कुछ ही देर में अपनें आपको न सम्भाल पानें के कारण वो गिर गया ……..जब गिरा ……….तब पौर्णमासी नें बृजरानी को रोक दिया ………उसे खेलनें दो रानी !

लाला जब गिरा ……तब थोड़ा ही रोया होगा ………फिर देखते ही देखते वो पलट गया …………फिर कोशिश करते हुये सिर उठाया ………..सब लोग देख रहे हैं………ये आनन्द देवों को भी दुर्लभ था ……..जो इस समय गोकुल वासी ले रहे थे ………..हाँ तात ! दुनिया को चलानें वाला आज चलना सीख रहा था …….ये अद्भुत लीला थी ब्रह्म की ।

अपनें दोनों नन्हें नन्हे घुटनों को उठाया और चल पड़े कन्हैया घुटवन घुटवन ……..नेत्रों से आनन्द के अश्रु छलक पड़े थे नन्द दम्पति के ।

आगे कहाँ जाएगा ……..भीड़ तक गया लाला ……जब भीड़ देखी सामनें तो मुँह बनाकर रोनें लगा …..गोप गोपियों की भीड़ .रोते कन्हैया को देखकर भी आनन्दित है …..क्यों कि इसका रोना भी अद्भुत है ….ये और सुन्दर लगता है , मुँह बनाकर रोते हुए ……..पीछे से मैया नें आवाज दी ….लाला ! लाला ! लाला ! आवाज सुनते ही मुड़ा कन्हैया ………..अपनी मैया को देखा तो ख़ुशी से उस तरफ ही चल पड़ा …………बृजरानी दौड़ पडीं …….और अपनें लाला को गोद में ले ही लिया ………..लाला के मुख को चूमती रहीं यशोदा मैया ………… इस दृश्य को देखकर सब मुग्ध थे ….मुग्ध गोकुल वासी ही नही ……….देवता भी मन्त्र मुग्ध हो रहे थे ।

“कान्हा चलनें लगे , कान्हा चलनें लगे”

गोपियाँ नृत्य कर रही हैं………

उनको देखकर स्वर्ग कि अप्सरायें भी नाच रही थीं……….

“रुनझुन झनके पैजनियाँ कान्हा चलनें लगे , कान्हा चलनें लगे”

तात विदुर जी ! इस रूप सुधा का पान कीजिये ……….

उद्धव स्वयं डूब गए थे ……..वही बाल कृष्ण कि छबि उनके हिय में प्रकट हो गयी थी ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 31

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 31 )

!! अनाम ब्रह्म का नामकरण संस्कार !!


बृजरानी और रोहिणी दोनों नें पृथ्वी में मस्तक रखकर आचार्य गर्ग और महर्षि शाण्डिल्य को प्रणाम किया था ।

सौभाग्यवती भवः ……दोनों नें आशीर्वाद दिया ।

बृजरानी आसन में बैठ गयीं …….रोहिणी बैठते हुये बोलीं …..जीजी ! ये तो हमारे पुरोहित हैं……..आचार्य गर्ग इनका नाम है …….त्रिकालदर्शी हैं ऐसा आर्यपुत्र कहते थे ।

तो देखते हैं ……ये त्रिकालदर्शी हैं या नहीं !

बृजरानी परीक्षा लेनें चलीं, भूतभावन के शिष्य आचार्य गर्ग की ।

देखते ही देखते ………..दोनों माताओं नें अपनें अपनें बालकों को बदल लिया ……..यानि यशुमति नें दाऊ को ले लिया और रोहिणी नें कन्हैया को ……और सहज ही बैठी रहीं ……..रोहिणी ! तुम्हारे पुरोहित जी की आज परीक्षा होगी !

धूप, दीप, पुष्प माला , रोली, मोली पान, सुपारी ये सब लाकर ग्वालों नें रख दिया था……..”अपवित्र पवित्रो वा”……..यहीं से पूजन आरम्भ किया आचार्य नें…….फिर संकल्प…….अन्य देवी देवताओं को मनानें के बाद ……अब नाम करण की बारी आयी थी ………

इतनी देर तक यशुमति की गोद में गर्ग जी नें देखा ही नही……..क्यों की वे डर रहे थे……अगर उन्होंने देख लिया तो समाधिस्थ हो जायेगे यहीं ……..फिर ये नाम करण का सौभाग्य उनके हाथों से निकल जाएगा ।

हाँ …….बृजराज ! अब नाम करण……आचार्य नें अब देखा बृजरानी की गोद में……..पर गोद में तो कन्हैया नही हैं……..गर्ग चकित हो गए ……फिर उन्होंने रोहिणी की गोद में देखा ……तो वहाँ कन्हैया अपनें नन्हे नन्हे चरण पटक रहे थे ………वसुदेव के इन पुरोहित को समझते देर न लगी …….कि ये माताएँ मेरी परीक्षा लेना चाहती हैं …….हँसे आचार्य , ये ब्रह्म की माता हैं…….तो इनके आगे मैं क्या ?

सबसे पहले मन ही मन यशुमति को नमन किया………फिर मुस्कुरा कर बोले गर्ग जी ………नामकरण की बारी आयी है अब ………..

मैं ……..आचार्य के चरणों में, मैं नन्द भार्या यशुमति प्रणाम करती हूँ…..आचार्य ! मैं बड़ी हूँ…..रोहिणी मुझ से छोटी है ….इसलिये मेरे पुत्र का नाम पहले रखिये……मन्द स्मित हास्य के साथ बृजरानी नें कहा ।

ये तो रोहिणी का पुत्र है !

……यशोदा की गोद में देखते ही आचार्य बोल उठे थे ।

वसुदेव का सुत है ये……..”राम” नाम रखता हूँ मैं इसका …..सारे गुण इस बालक में रमण करते हैं……इसलिये इस बालक नाम होगा राम !

बल अधिक होनें के कारण इसको “बलराम” कहेंगें ।

संकर्षण ……….ये किसी गर्भ से खींचा गया है ……..इसलिये इस बालक नाम होगा “संकर्षण”……हे वसुदेव भार्या रोहिणी ! तुम ध्यान से सुनो ……….ये बालक बड़ा ही अद्भुत है ……..बल , पराक्रम इसके रोम रोम में है……..पर मात्र बल , पराक्रम आपसे आपकी भद्रता छीन लेता है ……….पर इस बालक में बल भी है और भद्रता भी है …..इसलिये इसका नाम “बलभद्र” भी होगा ।

ये शेष स्वरूप है …….इसी में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड टिका हुआ है…….

और यही बालक यदुवंशियों में भी एकता बनाकर रखेगा ।

ये कहकर आचार्य चुप हो गए थे ।

यशुमति नें रोहिणी की और देखा……फिर धीरे से बोलीं …….तुम्हारे आर्यपुत्र सत्य कहते थे ……ये तो त्रिकालदर्शी हैं ।

भगवन् ! क्षमा करें ……..मेरा बालक ये है ………ये तो रोहिणी का पुत्र है ……..बृजरानी नें ये कहते हुये दाऊ को दे दिया रोहिणी की गोद में ….और अपनें कन्हैया को अपनी गोद में ले लिया ।

अब मेरे बालक का नामकरण करें प्रभु !

बृजरानी और बृजराज नें प्रार्थना की आचार्य गर्ग से ।

देखा कन्हैया को गर्ग जी नें……….आहा ! नीलमणी सा अद्भुत सुन्दर बालक खेल रहा है यशोदा की गोद में ……….बस उसी क्षण आचार्य गर्ग समाधिस्थ हो गए……जड़वत् हो गए……आँखें खुली की खुली रह गयीं…..साँसें रुक गयीं………….

ये क्या हुआ ! नन्दराय काँप गए थे…..बृजरानी डर गयीं………

स्वाभाविक था तात विदुर जी ! भोले भाले ये ग्वाला समाज क्या समझे कि उनकी गोद में जो क्रीड़ा कर रहा है …..वो ब्रह्मादिकों को भी दुर्लभ परब्रह्म है ……..जो आज आकार लेकर प्रकट हुआ है यहाँ ।

पौर्णमासी उसी समय गोष्ठ में आगयी थीं………उन्होंने जब यहाँ की स्थिति देखी तो समझ गयीं…….कि यशोदा के लाल को देखकर आचार्य गर्ग समाधि में चले गए हैं…….तब आगे बढ़कर पौर्णमासी नें आचार्य गर्ग को झँकझोरा…..और कहा …..आचार्य ! नामकरण कीजिये !

देहभान हुआ गर्ग को ……….फिर उन्होंने बड़े प्रेम से नामकरण करना आरम्भ किया ……….पर माताओं का विनोद याद था आचार्य गर्ग को …..मेरी परीक्षा लेनें चली थीं ये ……..चलो ! मैं भी एक विनोद करता हूँ……..ऐसा विचार करते हुये गर्ग जी बोले ………….

भगवन् !

बृजरानी नें गर्ग जी को बीच में रोकते हुये कहा…….

बढ़िया सा नाम रखना……आचार्य ! अच्छा सा नाम रखना ।

हँसते हुए आचार्य बोले – इस बालक का नाम है “रंग पलटू” ।

क्या ? बृजरानी नें फिर पूछा ……..”रंगपलटू” गर्ग जी फिर बोले ।

बड़ी दुःखी हो गयीं बृजरानी ………..ऐसा भी कहीं नाम होता है ।

पर आचार्य गर्ग बोलते गए …………ये बालक हर युग में रंग बदलता है ……जैसे – सतयुग में इसका रंग होता है सफेद , त्रेता युग में इसका रंग होता है लाल, और द्वापर में इसका रंग है पीला …..और कलियुग में इसका रंग है काला …….यानि कृष्ण !

इसका नाम क्या हुआ ? यशोदा जी नें फिर पूछा ।

खूब हँसते हुए गर्ग जी बोले ……….कृष्ण ……श्री कृष्ण चन्द्र ।

हाँ …..ये नाम ठीक है …..अब बृजरानी बहुत प्रसन्न हुयीं…….

रोहिणी ! मैं तो डर ही गयी थी ….हाय ! कैसा नाम है “रंगपलटू”……बृज के लोग क्या कहते ……कि यशोदा के छोरा का नाम “रंगपलटू” है ।

पर ये नाम ठीक है………किसन, यशोदा जी बोलीं ।

फिर हँसे गर्ग जी ……..बोले ….किसन नही …. कृष्ण …..

तात विदुर जी ! ये मैया यशोदा हैं…..पढ़ी लिखी हैं नहीं………भोली भाली हैं……बड़ी सीधी सरल हैं……उच्चारण नही हो रहा इनको कृष्ण नाम का ………….

पौर्णमासी नें भी कोशिश की…….बृजरानी ! कृष्ण बोलो …कृष्ण ।

पर यशोदा जी से बोला ही नही जा रहा……बेचारी बड़ी शरमा रही हैं ।

फिर महर्षि शाण्डिल्य नें बड़े प्रेम से कहा ……….आप माता हो ….आप कुछ भी कह सकती हो अपनें लाल को ।

फिर धीरे से रोहिणी के कान में बृजरानी नें कहा……मैं तो “कनुआ” कहूँगी……”कन्हैया” बोलूंगी ………..मुझे नही आता ये “किसन” नाम !

बृजरानी के भोलेपन पर सब रीझ गए थे ………………..

अब आगे गर्ग जी फिर कहनें लगे……..हे बृजराज ! इस बालक के नाम अनन्त हैं गुण अनन्त हैं….मैं उन सबका गान नही कर सकता…

गौ का पालक है इसलिये इसका नाम ………गोपाल है ।

गौओं का ये राजा है इसलिये इसका नाम ….गोविन्द भी होगा ।

मैं कहाँ तक कहूँ…………इस बालक के सारे गुण भगवान नारायण से मिलते हैं…………इसलिये भगवान नारायण के समान गुण वाला इसे कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी ।

ये कहते हुए अपनें नेत्रों को बन्दकर गर्ग जी नें श्रीकृष्ण चरणों का ध्यान किया था ……………..

कुछ ही देर उन्हें फिर आवेश आगया…….. हे बृजवासियों ! इस बालक के जन्म लेने से आप समस्त बृज का मंगल ही मंगल हो गया है ।

देवता लोग स्पृहा करनें लगे हैं इस बृज मण्डल से……धन्य हो गया है आपका जन्म लेना ……..और बृजराज ! धन्यातिधन्य तो आप दोनों दम्पति हो ………जिनके गोद में ये ब्रह्मस्वरूप बालक खेल रहा है ।

गर्ग जी आज जितनें आनन्दित हो रहे हैं ….उतनें आज तक नही हुये थे ।

व्याह होगा ?

मैया को क्या लेना देना ………कि देवता स्पृहा क्यों कर रहे हैं ? या ये ब्रह्म क्या होता है ? इसे तो सीधी सादी बात जाननी है …….व्याह होगा मेरे लाला का ?

बहुत होगा …………हँसे ये कहते हुए गर्ग जी ।

फिर ग्रह नक्षत्र मिलाये…हिसाब किया..फिर बोले….व्याह बहुत होंगें ।

दो करेगा ? मैया पूछ रही है ।

ज्यादा ! और ज्यादा …………चार करेगा ? मैया नें फिर पूछा ।

गर्ग जी हँसते जा रहे हैं ……..और कहते जा रहे हैं………ज्यादा और ज्यादा …………..फिर बाद में बोले ………तू पचास में रुक रही है …..बृजरानी ! ये तो हजारन बहुएँ ले के आयेगा ।

अब बृजरानी बहुत हँसने लगीं ………….रोहिणी से कहती हैं……”.बड़ो रसिया है छोरा”

तात विदुर जी ! देवताओं नें पुष्प वृष्टि की ……….जयजयकार किया …..नभ से दुन्दुभि भी बज उठे थे ।

“अनाम” का आज “नाम” रखा गया था ……..यही तो लीला है ।

उद्धव नें विदुर जी को कहा ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 30

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 30 )

!! आचार्य गर्ग नें जब कन्हैया को देखा !!


“आचार्य गर्ग”

ज्योतिष विद्या के अद्भुत ज्ञाता….महान विद्वान….तपस्वी…..।

भगवान चन्द्रशेखर से इन्होनें विद्या ग्रहण की थी ……….इनके गुरुदेव भगवान शंकर ही थे ।

“तुम वसुदेव के पुरोहित बनो”……ये आज्ञा भी भूतभावन से ही मिली ।

लाभ क्या होगा उससे ? ये प्रश्न किया तो नही गर्ग नें ……पर उत्तर दे दिया था भगवान चन्द्र मौली नें ……………

भगवान श्रीकृष्ण का अवतार होगा इनके यहाँ ।

भगवान शंकर की आज्ञा और भगवतदर्शन की लालसा ………….तो आचार्य गर्ग नें वसुदेव का पौरोहित्य कर्म करना स्वीकार किया ।

पर भगवान अवतरित भी हो गए …….और गोकुल भी जा चुके थे ।

आचार्य आज वसुदेव की ही प्रेरणा से गोकुल की और प्रस्थान कर गए …….यमुना के किनारे किनारे चलते हुये गोकुल में पधारे थे ।

आचार्य ! दौड़ पड़े थे महर्षि शाण्डिल्य...........प्रातः का समय था यमुना किनारे सन्ध्या वन्दन कर रहे थे महर्षि, तभी सामनें दिखाई दिए आचार्य गर्ग ......तो दौड़ते हुए गए उनके पास........अपनें हृदय से लगा लिया था आचार्य को ।

भाग्यशाली तो तुम हो महर्षि ! जो नन्दनन्दन की समस्त बाल लीलाओं का आस्वादन करोगे……विधाता नें सच में तुम्हे भाग्यशाली बनाकर भेजा है…….मैं तो दर्शन भी न कर सका उन परात्पर ब्रह्म श्रीकृष्ण चन्द्र का ……कारागार में प्रकट हुये ……और यजमान तुरन्त ही गोकुल में उन्हें छोड़ गए !…….आचार्य गर्ग नें अपनें हृदय की बात महर्षि शाण्डिल्य के सामनें रखी ।

हाँ ……..मैं सौभाग्यशाली तो हूँ………आचार्य ! मैं नित्य नन्दनन्दन के दर्शन करता हूँ……….फिर कुछ विचार करते हुये महर्षि बोले …….

आचार्य ! मैं तो ज्योतिष का ज्ञाता नही हूँ………इसलिये मैं सोच भी रहा था कि नन्दनन्दन का नाम करण अगर आप कर दें तो ?

महर्षि नें विनम्रता से ये बात कही थी आचार्य गर्ग से ।

मैं इस आते हुये सौभाग्य को कैसे रोक दूँ महर्षि !

अत्यधिक प्रसन्नता में बोल पड़े थे आचार्य ।

तो फिर देरी क्यों, चलें बृजराज के गोष्ठ की ओर !

……महर्षि उठ गए …….और दोनों महत्पुरुष चल पड़े थे ।

गोष्ठ में विराजें हैं नन्दराय…….गौर वर्ण…….विशाल भाल……मस्तक में पीला चन्दन …..कण्ठ में तुलसी की माला ……..सुन्दर रेशमी पीताम्बरी……दिव्य मुस्कुराता हुआ मुखमण्डल ।

उठ गए एकाएक अपनी गद्दी से बृजराज ……..साष्टांग प्रणाम किया दोनों को…….और दोनों ऋषियों नें आशीर्वाद भी दिया ।

हे बृजेश ! ये हैं भगवान शंकर के कृपापात्र आचार्य गर्ग. ….ज्योतिष विद्या के उद्भट विद्वान्……और वसुदेव के पुरोहित !

महर्षि शाण्डिल्य की बातें सुनकर हाथ जोड़कर बोले नन्द जी ……..

भगवन् ! मैने भाई वसुदेव के यहाँ आपके दर्शन किये हैं…….और मेरा ये परम सौभाग्य है कि मेरे गोकुल में भी आप के चरण पड़े …….अब सब शान्ति बनी रहेगी मेरे यहाँ ।

पर बृजराज ! मैं कुछ और कह रहा हूँ ………….

महर्षि ! आज्ञा कीजिये ! ऋषि शाण्डिल्य से नन्द जी नें कहा ।

हमारे दो बालक हैं……उनमें से रोहिणी नन्दन का नाम करण तो इनके द्वारा ही होगा…….क्यों की वसुदेव नन्दन हैं वो तो …और ये वसुदेव के पुरोहित हैं………..किन्तु मेरी ये इच्छा है कि …..आपके लाला का नाम करण भी इन्हीं के द्वारा हो …..तो उत्तम कार्य हो जाता ।

महर्षि की बातें सुनकर बृजराज प्रसन्न चित्त होकर बोले ……..महर्षि ! आप जैसा कहेंगें हम सदैव वही मानेंगें ………क्यों की हमें विश्वास है कि ……..हमारा कल्याण आपके आज्ञा पालन करनें में ही है ।

तो फिर ठीक है …….मुहूर्त कब का है ? आप देखिये आचार्य गर्ग ?

महर्षि नें गर्ग से पूछा ।

आज का ही मुहूर्त श्रेष्ठ है ! गर्ग नें तुरन्त उत्तर दिया ।

आज ? नाम करण संस्कार होगा हमारे लाला का, और आज ?

इतनी जल्दी तो तैयारी भी नही हो पायेगी ……….आचार्य ! कुछ समय और दे देते !

उपनन्द जी नें जब सुना तो उन्होंने कह दी अपनी बात ।

हे बृजराज ! ……. ज्यादा हल्ला करना ये उचित नही है आपके लिये ………….आचार्य गर्ग ने समझाया ।

हाँ …….पूतना, श्रीधर ब्राह्मण , कागासुर , शकटासुर ……..इनकी घटनाओं को हमें भूलना नही चाहिये ………..बृजराज नें गर्ग की बातों का ही समर्थन किया ……..और अपनें भाई उपनन्द जी को कहा ………नजर लग जाती है…….इसलिये नाम करण संस्कार को गुप्त रीत से ही किया जाए ………ये उचित भी होगा ।

पर कहाँ ? किस स्थान पर किया जाए नाम करण संस्कार ?

बृजराज नें आचार्य और महर्षि से पूछा ।

गर्ग नें इधर उधर देखा …….फिर बोले ………गौशाला से सुन्दर और पवित्र स्थान दूसरा हो ही नही सकता ……….

हे बृजराज ! बन्दनवार यहीं लगा दो ……….रंगोली यहीं बनवा दो ……सुन्दर सुन्दर रंगीन पताके यहीं बंधवा दो ………..

चन्दन लड़की का धूआँ जलाकर इस स्थान को महकाओ …….

बृजराज नें देखते ही देखते ग्वालों को आदेश देकर तुरन्त सब सजा दिया ……….सारा कार्य हो गया …..पुष्प, फल, पान , सुपाड़ी ….यज्ञ सामग्री ……रोली मोली ………सब कुछ आगया ………..

उपनन्द जी की पत्नी को भेज दिया बृजरानी और रोहिणी को लानें के लिए ………..अब नाम करण होगा ये सूचना देकर बालको को भी संग लाएं , ये भी सूचना दी गयी ।

प्रातः का समय है ……..

सुबह की वेला थी………..लाला द्वय को भी स्नान करा दिया था माताओं नें ।

गृह कार्यों में व्यस्त थीं दोनों माताएँ …………

तभी उपनन्द जी की पत्नी पहुँची …………बृजरानी ! आज हमारे बालकों का नाम करण होगा ……इसलिये जल्दी चलो गौशाला में ।

काहे विनोद कर रही हो……हमारे बालकों का नाम करण जब होगा …..3 महिनें पहले से निमन्त्रण पूरे बृज में देना पड़ेगा…..अरे ! सम्पूर्ण बृज मण्डल इसी आस में तो है कि बृजराज कुँवर का जब नाम करण होगा तब हम सब जायेंगे……बृजरानी अपनी बात बता रही थीं ।

पर ये सम्भव नही है…………क्यों की कंस का अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है ……और हमसे चिढ़नें भी लगा है कंस ……….उपनन्द जी की पत्नी नें इतना ही कहा ……….तब बृजरानी चुप हो गयीं ………मन में विचार करके बोलीं ………….पूतना ! हाँ …….सही विचार किया है उन्होंने ……….पूतना कैसे आगयी थी ……और हमारे लाला को ।

नही …..ठीक है ……….बृजराज जैसा उचित समझें ……..बृजरानी नें स्वीकार किया ।

तो फिर तैयार हो जाओ…….उपनन्द जी की पत्नी नें तैयारी में लगा दिया दोनों को …..रोहिणी और यशोदा को……दोनों तैयार हुयीं ….अपनें अपनें बालकों को तैयार किया…….और गोष्ठ की और चल पडीं थीं ।

एक गोपी दौड़ी दौड़ी आती है …..धूप , दीप, गन्ध जल पात्र इत्यादि लेकर ………..

तभी बृजराज सामनें देखते हुए मुस्कुराये ……………

भगवन् ! मेरी भार्या और वसुदेव पत्नी बहू रोहिणी आरही हैं ।

बृजराज की बातें सुनकर दृष्टि आचार्य नें थोड़ी सी उठाई ………

सामनें से आरही थीं…….गौरवर्णा , सोलह श्रृंगार से सजी ……लंहगा पहली हुयी …….अत्यन्त सुन्दर…..यशुमति और रोहिणी ……..

दृष्टि झुकाकर फिर अपनें पूजन कार्यों में लग रहे थे गर्ग कि तभी उनका ध्यान इन दोनों माताओं की गोदी में गया ………..

गोद में शिशु……बृजरानी आरही थीं…….उनके गोद में…….ओह !

उस सुन्दर शिशु को देखकर एक क्षण के लिये तो गर्ग को ऐसा लगा कि …….मैं देहातीत हो जाऊँगा …………..ऐसा अद्भुत बालक !

नील मणि जैसा बालक…..केश घुँघराले……..नेत्र चंचल …….

आचार्य को रोमांच होनें लगा ……उनके नेत्रों से आनन्दाश्रु बहनें लगे ….

वो अपनें को बारबार सम्भालनें की कोशिश करते हैं……पर सम्भाल नहीं पा रहे हैं…………..ब्रह्म वेत्ता ज्ञानी शिरोमणि आचार्य गर्ग के हृदय में एक दिव्य प्रकाश फैलनें लगा ……….उनका शान्त मन नन्दनन्दन को देखते हुये आज उल्लसित हो उठा था ।

ओह ! ये क्या देख रहा हूँ मैं ……..क्या यही अनादि मोहान्ध को नष्ट कर देनें वाला विशुद्ध ब्रह्मरूप रत्नप्रदीप का अंकुर तो नही है ? अथवा समस्त उपनिषदों नें ही ब्रह्म को साकार प्रकट कर दिया है…..अथवा आनन्द सागर का यह मूर्त स्वरूप है ? या जिसे ज्ञानी ब्रह्म कहते हैं….या जिसे योगी परमात्मा कहते हैं….भक्त जिसे भगवान कहकर प्रसन्न होता है……ओह ! क्या वही आज बृजरानी के गोद में खेल रहा है ?

फिर एकाएक आनन्दित होकर आचार्य गर्ग कहनें लगते हैं……….

आज मेरा जन्म धारण करना सफल हो गया ……..मेरे नेत्र सफल हो गए ……मेरी विद्या सफल हो गयी …….मेरा तप , मेरा कुल ……सब कुछ सफल हो गया ……..मुझे कृतार्थ किया मेरे गुरु भगवान शंकर नें …..जिन्होनें मुझे वसुदेव का पुरोहित बनाया ………आज मुझे सौभाग्य मिल रहा है कि ….जो अनाम है उसका नामकरण मैं करूँ ! ओह !

आचार्य गर्ग हँसते हैं……प्रसन्नता अतिरेकता को पार कर रही है ।

जड़वत् होनें लगे थे आचार्य गर्ग……समाधि कह सकते हो आप इसे ।

आरही हैं सामनें से बृजरानी और रोहिणी ……………

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 29

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 29 )

!! “मनसुख” – जब इसे खीर न मिली !!


पञ्च रस हैं भक्ति के ……शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर ।

बृज में इन दिनों पञ्च रसों की नदी बह चली है……और जिसे अवगाहन करना हो वो आजाये……डूबनें वालों को इसका आनन्द है ।

कल मैने एक सपना देखा …………मैं दिव्य गोलोक धाम में हूँ……….मैने आदत अनुसार अपनी आँखें बन्द कर लीं ……और ध्यान करनें लगा ।

गोलोक में ऐसे ध्यान कौन करता है ?

एक प्यारी सी हँसी गूँजी मेरे कानों में ………..

मैनें आँखें खोलीं तो सामनें एक बृजवासी बालक खड़ा है ……..माथे में चन्दन ………चन्दन भी बस पोत लिया है माथे में ।

गले में माला है तुलसी की ………..कितनी लरें हैं माला की कहना मुश्किल है …………..पीली बगलबन्दी है ……….और नीचे धोती ….धोती भी शायद पीली ही थी ।

गौर वर्ण …………सुन्दर उन्नत भाल ……….मुस्कुराता मुखमण्डल …….निर्भय खड़ा था वो बृजवासी बालक ।

क्यों ऐसे ध्यान करनें में तुम्हे कोई दिक्कत ? मैने भी पूछ लिया ।

नही ……मुझे क्या दिक्कत है …………मैं तो इसलिये कह रहा था कि जब प्रत्यक्ष इस गोलोक में अपना कन्हैया जहाँ तहाँ डोले है ………वहाँ खुली आँखों से न देखकर आँखें बन्दकरनें का औचित्य क्या ?

वो ये कहकर फिर हँसा ……………..

पर तुम ? मैने उससे पूछा ।

मैं ? मैं तो कन्हैया का सखा हूँ मनसुख !

ये कहकर वो तो जानें लगा …….मैं उसके पीछे ……..

ये हैं मनसुख …….सख्यरस के आचार्य !

इनकी चरण धूल तो ले लूँ ……………मैं जैसे ही आगे बढ़ता कि मेरी नींद खुल गयी थी ………..सुबह के 4 बज रहे थे ।

मैं सोचता रहा ……”मनसुख सखा” के बारे में ………….हाँ मेरे मन में उनकी छबि भी गहरे बस गयी है …………..वो मनसुख !

एक अल्हड़ सखा ……………

ये महल गिर जाए और सब दव जाएँ ………….

ये महल की छत गिर जाए ….और सब इसके नीचे दव जाएँ ……..

मनसुख आज यही कह रहा है …………..और सबको सुना सुनाकर कह रहा है …………वो कह ही इसलिये रहा है कि लोग उसकी सुनें ।

हट्ट ! कैसा ब्राह्मण बालक है तू ! ऐसे कोई बोलता है क्या ?

बृजरानी नें डाँटा मनसुख को …………..

मैं ऐसा ब्राह्मण हूँ………..चोटी दिखाई मनसुख नें ।

बेटा ! ऐसे अमंगल शब्दों का उच्चारण नही करते…….अन्नप्राशन संस्कार हुआ है ना तेरे सखा का……….फिर तू तो हमारा पूज्य भी है …….ब्राह्मण है तू……इसलिये मनसुख लाला ! ऐसे नही बोलते ।

मनसुख को समझाया यशोदा जी नें …….फिर पूछा …..पूड़ी लेगा ? कचौड़ी लेगा ? बोल !

मनसुख को नमकीन वस्तु से प्रेम नही है …………मीठे का ये प्रेमी है …..पर आज ………….।

चलो अब …..ब्राह्मण भोज होगा ……….पहले ब्राह्मण देवता भोजन करेंगें………सब व्यवस्था करो ।

तुरन्त सब ग्वालों नें आसन बिछाये ……..महर्षि शाण्डिल्य विराजे हैं………अन्य ब्राह्मण सब पँक्तिबद्ध होकर बैठ गए हैं ………….

मनसुख ! तू क्या कर रहा है …….चल आ ………भूख लग रही होगी तुझे भी …….आ बेटा ! भोजन कर ले ।

मनसुख को यशोदा जी नें बुलाया ………..वो तो बस उछलते हुए आगया ………मैं कहाँ बैठूँ ! सोचनें लगा …..फिर बोला ……मामा ! मैं तुम्हारे पास बैठ जाऊँ ? महर्षि शाण्डिल्य हँसें …….हाँ हाँ …..मेरे पास ही बैठो ।

हाँ …मैं तो अपनें मामा के पास बैठूंगा …………..सबको प्रिय लगता है ये मनसुख ……शायद ही सृष्टि में कोई ऐसा हो ………जिसे ये अल्हड़ कृष्ण सखा प्रिय न हो ………।

पत्तल दी गयी …………मनसुख आज बहुत आनन्दित है …………

मेरे सखा का अन्नप्राशन हुआ है ………..मैं भी उसकी तरह आज खीर खाऊँगा …………..सबसे कह रहा है वो ।

पत्तल में पूड़ी दी गयी …………पूड़ी को देखकर मनसुख कोई ख़ास प्रसन्न नही हुआ था …….कचौड़ी ………ये तो इसे प्रिय है ही नही ।

सब्जी दी गयी ……..पर ये कोई ख़ास वस्तु थी नही ………पूड़ी के साथ खाना है इसे ………..बेसन के लड्डू दिए ………….हाँ ये प्रिय तो है ….पर आज बेसन के लड्डू नही …………मन्त्र शुरू किया ब्राह्मणों नें ………तो मनसुख बोला ……बड़ी जल्दी है तुम लोगों को ……अरे रुको ….अभी खीर आएगी ……..फिर मन्त्र पढ़ना ।

पर सब हँसते रहे ब्राह्मण और मन्त्र पढ़ते रहे ………….

खीर नही आई …………………..

उधर ग्वाले हाथ में लेकर खीर खा रहे हैं…………….मनसुख देख रहा है ………..और हद्द ये हो गयी कि कई ग्वाल बाल तो मनसुख को दिखा दिखाकर खीर खा रहे थे …..और नाच रहे थे ।

मनसुख ! शुरू करो ………सब खा रहे हैं देखो !

बृजरानी नें कहा ।

मनसुख नें नाक भौं सिकोड़ कर इधर उधर अपनें ब्राह्मणों को देखा….

ये लोग पूड़ी ही खाये जा रहे हैं ……..कचौड़ी भी ………

अरे ! खीर तो माँगों …………..खीर के बिना क्या खा रहे हो ?

मनसुख नें धीरे से कहा था ………..पर बृजरानी नें सुन लिया …..और बोलीं ……खीर तो कच्चे में आता है ………हम गोपों के हाथ का कच्चा भोजन तुम ब्राह्मण कैसे करोगे ?

अब मनसुख के सब समझ में आयी थी कि खीर उसे क्यों नही दी गयी है ……………..

सब तो खा रहे हैं खीर ! झुंझला उठा था मनसुख ।

वो सब ग्वाले हैं…………..पर तुम तो ब्राह्मण हो !

बृजरानी नें फिर कह दिया ।

खाओ ! खाओ ! ज्यादा नही बोलते खाते समय …..महर्षि शाण्डिल्य नें भी टोक दिया …….।

बिना कुछ बोले मनसुख नें धरती में देखना शुरू किया…….फिर महल के छत की ओर देखते हुए बोला …………महल की छत गिर जाए ।

महल गिर जाए ……………..महल की छत गिर जाये ।

ये क्या बोल रहा है तू ! राम राम बोल मनसुख ! ऐसे वाक्य नही बोलते । बृजरानी नें समझाया ।

तभी हँसते हुये बृजराज आगये ………..मनसुख ! एक बात बता अगर छत गिर गयी तो तू बच जायेगा ?

मनसुख नें तुरन्त जबाब दिया ……..हाँ, मैं बच जाऊँगा …….

कैसे ? बृजराज नें मुस्कुराते हुए पूछा ।

“जैसे मैं खीर से बच गया”…………….मनसुख का उत्तर था ।

बृजराज बहुत हँसे ……..बृजरानी भी हँस रही थीं ……….गोप वृंद सब ठहाके लगानें लगे थे ।

देखो मनसुख ! तुम ब्राह्मण हो ……..और खीर कच्ची रसोई में आती है …..ब्राह्मण को हम अपनें हाथों की कच्ची रसोई नही दे सकते ना !

मनसुख नें तुरन्त अपनें कन्धे में हाथ रखा और जनेऊ को दिखाते हुए कहा ………..मैं इसे निकाल दूँ तब तो मैं ब्राह्मण नही रहूँगा ?

महर्षि हँसते हुए बोले ………..नही नही ……..मनसुख ! जनेऊ मत निकालो ………तुम को खीर दे देंगे …………हे बृजराज ! ये वर्ण व्यवस्था से ऊँचा योग सिद्ध महापुरुष है …….इसे खीर क्या ये तुम्हारे लाला का झूठा भी मांगे तो दे देना ……..ये अनादिकाल से ही तुम्हारे लाला का सखा है ………गोलोक से आया है ……इसलिये ।

कहते हैं ………मनसुख को खीर बृजरानी नें स्वयं अपनें हाथो से दी …..मनसुख आनन्दित होते हुए खीर खाता रहा ………और लाला की जयकारा मनाता रहा ………..।

बाबा !
अब तेरो महल नायँ गिरेगो ….ये कहते हुए मनसुख खूब हँस रहा था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 28

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 28 )

!! जब अन्नप्राशन संस्कार में बैलगाडी पलटी !!


सच में कंस जैसा दुष्ट राजा शायद ही कोई पृथ्वी में हुआ हो …….

तात ! समस्त लोकों के राक्षसों से परिचय बढ़ा रखा था कंस नें ।

कंस से सभी राक्षस प्रेम करते थे…..राक्षस, सतयुग से लेकर वर्तमान द्वापर के अन्त्य तक के समस्त राक्षसों का कंस के यहाँ आना जाना था ……..या कहें कंस इन सब को पाल के रखता था ।

वाणासुर से राक्षस राज रावण भी कभी भिड़ा नही ……….पर कंस नें वाणासुर को भी छटी का दूध याद दिला दिया था ।

तब से वाणासुर भी बड़ा आदर करता कंस का ।

दैत्यराज हिरण्याक्ष का एक पुत्र था ……जिसका नाम था “उत्कच” ।

महर्षि लोमश नें इसे श्राप दे दिया …..कि “तू देह रहित हो जा !”

तात ! लोमश ऋषि के आश्रम में जाकर उत्कच, उनके सुन्दर सुन्दर वनों को उजाड़नें लगा था …….इसके देह में खुजली शुरू हो गयी थी ……तो ऋषि के वनों में अपनें देह को रगड़नें लगा ……..ये रगड़ता ……वृक्ष गिर जाते ……..वनौषधि का बड़ा नुकसान होनें लगा ……..उनकी कुटिया भी गिर गयी थी ।

तब श्राप दे दिया ……जा दुष्ट ! तू देह से रहित हो जा !

ओह ! राक्षसों का देह से रहित रहना…..कितना कठिन है….ये देह से ही तो चिपके रहते हैं…………….

चरणों में गिर गया वो राक्षस उत्कच ….महर्षि लोमश से प्रार्थना करनें लगा ………….मेरा क्या होगा ? मैं ऐसे कैसे रहूंगा !

करुणावान ऋषि नें करुणा करते हुये कह दिया …….”द्वापर युग के अंत में श्रीकृष्ण चन्द्र जु का स्पर्श पाकर तू मुक्त हो जाएगा “

ओह ! सतयुग से द्वापर तक…….द्वापर के भी अन्त्य तक ……….

पर उत्कच करता क्या…….श्राप तो दे दिया था ऋषि नें………

सतयुग बीता, त्रेता बीता द्वापर भी जब बीतनें में आया……….तब कंस से इसका परिचय हुआ ……….इसको अच्छा लगता था कंस …….इसका मनोरंजन मथुरा में कंस अच्छे से कर देता ………मल्लयुद्ध का प्रदर्शन विश्व में कंस के दरवार में ही होता था………और जो हार जाता ……उसे कुबलियापीढ़ हाथी के नीचे फेंक दिया जाता ……..राक्षसों के लिये ये मनोरंजन था ।

मैं जाऊँगा और तुम्हारे कष्ट को मैं दूर करूँगा………उत्कच बोला ।

पर अब कंस टूट चुका है………पूरी तरह से टूट गया है ।

पूतना गयी …श्री धर गया …..कागासुर गया………उत्कच ! तुम भी क्या कर लोगे ? रहनें दो ……कंस नें साफ़ मना कर दिया था ।

वो सब देह सहित थे ….पर मैं देह रहित हूँ……….मुझे कोई देख नही सकता ……….मैं किसी दिशा से भी घात कर सकता हूँ ……….और मथुराधीश कंस ! मैं जड़ वस्तु में भी प्रवेश करके उस बालक को मार सकता हूँ……….बोलो ! मुझे जानें दो ! तुम्हारे संकट को मैं आज ही समाप्त कर दूँगा ।………..उत्कच आक्रामक था ।

बात तो सही कर रहा है ये …….कंस विचार करनें लगा….पूतना दिखी थी ……..श्रीधर भी दिखाई दे रहा था ……कागासुर भी …..पर ये तो दिखाई नही देगा …………तब ये कुछ भी कर सकता है ।

हाँ ……..तुम जाओ उत्कच ! तुम जाओ …….

गोकुल में बृजराज के महल में उस बालक का जन्म हुआ है ……..जाओ तुम ! और मुझे विश्वास है कि …….तुम अपनें कार्य में सफल रहोगे ।

उत्कच मथुरा से चल दिया ………….बस उसकी हँसी गूँजी थी उस सभा में …………और इतना सबको सुनाई दिया …….कि मैने वराह नारायण को देखा है ………..उनके जैसा रूप ……विशाल रूप ……आज तक किसी का नही है ………..मैने उनसे टक्कर लेते हुए अपनें पिता जी को देखा था ………….तुम एक शिशु के लिये ?

उत्कच चला गया ……..और कंस अपनें विचारों में खो गया था ।

अब अन्नप्राशन संस्कार होगा मेरे सखा का !

कितना खुश है ये मनसुख…………आज इसी नें सबको निमन्त्रण दिया है …..पूरे गोकुल में यही न्यौता देकर आया है ………..

मेरे सखा का अन्नप्राशन संस्कार होगा ………..सब आना ।

माता जी ! आप सुन्दर लंहगा पहन कर आना …………..मनसुख हर स्त्री को माता ही कहता है …………जिससे इसनें अभी माता कहा है ……वो 15 वर्ष की युवा गोपी है ।

पर इसका कोई बुरा नही मानता ……………

मनसुख ! अन्नप्राशन संस्कार तू ही करा दे ………….ऋषि शाण्डिल्य जानते हैं ….ये परम सिद्ध है ………..ये श्रीकृष्ण का अनादि सखा है ……….और ब्राह्मण है …………इसलिये कह दिया ।

नही, मामा जी ! संस्कार तो आप ही कराओ …..पर हाँ ……..मन्त्र मैं भी पढूंगा …….दक्षिणा हम दोनों बाँट लेंगें ……………बहन मानते हैं ऋषि शाण्डिल्य मनसुख की माता पौर्णमासी को ……इसलिये मनसुख ऋषि शाण्डिल्य को “मामा” कहता है ।

तू क्यों आया मनसुख ! बृजराज नही आये ? ऋषि नें पूछा ।

पीछे खड़े थे बृजराज ……….धीरे से बोले ……..मुझे मनसुख ने मना किया था ….कह रहा था इस अन्नप्राशन संस्कार की जिम्मेवारी सब मेरी है ………..मेरा सखा आज से अन्न खायेगा ……..तब मैं भी खाऊंगा ………इसलिये सब को मैं ही निमन्त्रण देकर आता हूँ ।

आप क्यों आये बाबा ! मनसुख बृजराज को “बाबा” कहता है ।

ठीक है मैं अवश्य आऊँगा ………ऋषि शाण्डिल्य मुस्कुराये ।

पर मुहूर्त ? कौन सा मुहूर्त ठीक रहेगा ? बृजराज नें पूछा ।

आँखें बन्दकर के ऋषि नें विचार किया …….फिर बोले …..मुहूर्त तो आज का ही ठीक है ।

“तो आज ही हो जाए”…….मनसुख ख़ुशी से उछल पड़ा ।

बृजराज नें भी कहा……शुभ कर्म शुभ मुहूर्त में ही सम्पन्न हो गुरुदेव !

तो जाओ …..बस एक घड़ी शेष है …..एक घड़ी में ही समस्त तैयारियाँ हो जाएँ ।

हो जायेंगी ….मामा जी ! सब हो जायेंगीं ………..मनसुख आनन्द में भरकर बोला ।

पर क्या क्या सामग्रियाँ चाहियें आप बता देते ? नन्द जी ने पूछा ।

अरे बाबा ! मैं किस दिन काम आऊँगा ………मुझे सब पता है ……रोली, मोली, पान पत्ता सुपाड़ी, बाबा को लेकर चल दिया मनसुख और रास्ते भर पूजन सामग्रियाँ बता रहा था ।

लाला ! आज तेरा अन्न खानें का दिन है ………..मैं भी तेरे साथ आज अन्न खाऊंगा …………..पालनें के पास जाकर मनसुख कन्हैया से कह रहा है ……..कन्हैया किलकारियाँ मार रहे हैं………….हँस रहे हैं..अपनें नन्हे नन्हे चरण फेंक रहे हैं………….मनसुख नीचे झुक गया है …….मनसुख के मुख में नन्हीं उँगलियाँ डाल रहे हैं लाला ।

ग्वाले वन्दनवार टाँग रहे हैं………रंगोली गोपियां बना रही हैं ।

ब्राह्मणों की मण्डली लेकर ऋषि शाण्डिल्य आगये ………मनसुख नें देखा वो ख़ुशी से नाच उठा ………….

मनसुख की माता पौर्णमासी नें बृजरानी से कहा…….लाला का अब स्नान होगा …………

बृजरानी नें लाला को उठाया वस्त्र उतारे…..और सुन्दर से चाँदी के बड़े से परात में लाला को रख दिया ।

मनसुख – मैं स्नान कराऊंगा……कलश में दूध भर कर लाया है वह ।

ब्राह्मणों नें स्वस्तिवाचन शुरू कर दिया ……….”.सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष, सहस्रपातः”…….मनसुख आनन्दित हो दूध डाल रहा है कन्हैया के ऊपर ………

तभी ” बधाई हो ” कहते हुये समस्त गोकुल वासी आगये गोप गोपी आगये …..और नाचनें गानें लगे ………सब आनंदित हैं ।

अब चन्दन का लेप किया है कन्हैया के अंगों में बृजरानी नें …………

फिर गौ मूत्र से स्नान करानें लगा मनसुख …………..

बृजरानी मना करती हैं मनसुख को ….धीरे जल डाल ………शिशु है उसे घबराहट होगी ……..पर मनसुख हँस रहा है ……..उसके आनन्द का ठिकाना नही है ।

देवता आकाश से दर्शन कर रहे हैं इस दिव्य स्नान के ……….

अब अंतिम में सुगन्धित गर्म जल औषधियुक्त ……..वो कन्हैया के ऊपर डाला गया था ……….दाऊ रोनें लगे ………मैं भी जल डालूँगा लाला के ऊपर ………अच्छा ! अच्छा ! तू भी डाल ……मनसुख नें दाऊ को भी जल दे दिया ।

बृजरानी नें सुन्दर वस्त्र धारण कराये ………लाला के केशों को सम्भार दिया …………….काजल का टीका लगा दिया …….सुन्दरता भी लज्जित हो जाए ऐसे सुन्दर लग रहे थे ये कन्हैया ।

पालनें में सुला दिया ……दूध की खीर बनाई थी ……….वही मनसुख नें चटा दी लाला के मुख में ……..महर्षि नें अपनें हाथों से चटाई …….फिर मैया नें ….बाबा नें …..सुनन्दा भूआ नें …….इस तरह .अन्नप्राशन संस्कार सम्पन्न हो गया ।

पर बृजरानी को चिन्ता हुयी…….कि लाला को मैने यहाँ रखा तो कोई न कोई गोपी आएगी ……….लाला के गालों को पकड़ेगी ……लाला को अपलक देखती रहेगी …और नजर लगा देगी ……..फिर पूतना जैसी कोई आगयी तो ………..बृजरानी नें देखा …..भीड़ कितनी बढ़ती जा रही है …………गोपी गोपों का झुण्ड न जानें कहाँ से आरहा है ……….फिर किसी को मना भी तो नही कर सकते ।

सामनें देखा बृजरानी नें ……..एक बड़ी सी बैल गाडी है ……….बैल नही है उसमें ……पर माखन की मटकियां , दूध दही की मटकियां सब भरी पड़ी हैं……..बृजरानी नें इधर उधर देखा ……बस गयीं बैलगाड़ी के पास ……….एक रेशमी वस्त्र लिया…..झूला बनाया…….उसमें सुला दिया लाला को ।

यशोदा जी तो चलीं गयीं , ब्राह्मणों को दान देना है ….फिर अतिथि भी तो बहुत आये हैं……….बृजरानी गयीं ।

इधर मनसुख खड़ा है पालनें के पास ……..दाऊ खड़े हैं………छोटे छोटे बालक सब खड़े हैं……हँसते हुए चरण फेंक रहे हैं लाला ……बालक हँसते हैं……..”.फिर कर लाला ” लाला फिर करते हैं ………

अपनें चरणों के अँगूठे को मुँह में डालते हैं…….चूसते हैं………..फिर जब उनका चरण छूट जाता है ……तब रोते हैं……..पर रोते भी इतना सुन्दर हैं कि देखनें वाले को लगता है …….बस देखते रहें ……..कितनी सुन्दर झाँकी है ये ………..।

हा हा हा हा हा हा हा ……….

उत्कच ………..ये राक्षस आगया है ………..ये किसी को नही दीखता ……पर ये सबको देख लेता है ।

ये शिशु है ? कंस का काल ये है ? बहुत हँसता रहा उत्कच ।

क्यों न मैं इस बैलगाड़ी में ही प्रवेश करूँ …….और इसको इसी के नीचे दवा दूँ …..मर जाएगा………..बस – देखते ही देखते वो उत्कच बैल गाडी में प्रवेश कर गया…….कन्हैया नें देखा……..अब रोना बन्द उनका ……..अपनें चरणों को फेंकना शुरू किया……..पर ये क्या ! ..बैल गाडी चर्र चर्र करती हुयी बीच में से टूट गयी ………केवल इतना ही नही ……बैल गाडी के पहिये ……..बैल गाडी के टुकड़े टुकड़े होकर बिखर गए थे कुछ ही क्षणों में………ये देखा सब बालकों नें …………

उस भीड़ में हाहाकार मच गया ………राक्षसी आई ! राक्षसी आई ! किसी नें ये हल्ला और मचा दिया ……..ग्वाले लाठी लेकर दौड़ पड़े ……….पकड़ो ! मारो !

मैया यशोदा नें जैसे ही सुना ………बैल गाडी पलट गयी ……….कोई राक्षसी आगयी है……….इतना सुनते ही यशोदा जी तो मूर्छित ही हो गयीं ………सब इधर यशोदा को भी सम्भालनें में लग गए थे ।

रोहिणी आगे गयीं……….बैल गाडी टूट गयी है …………बैल गाडी में रखे माखन दूध दही सब फैल चुका है ………..इधर उधर देखा तो मनसुख नें कहा ……….माता ! लाला को कुछ नही हुआ …….वो तो मजे से उधर पालनें में पड़ा है ………..

रोहिणी नें देखा ……..पालना दूर है …….पर पालनें को कुछ नही हुआ था ….वो दौड़ीं पालनें की ओर ……कन्हैया अभी भी किलकारियाँ मार रहे हैं……………

ये कैसे हुआ ? रोहिणी नें घबडा कर पूछा ।

रोते हुये लाला नें चरण पटके……..तो बैल गाडी पलट गयी !

ग्वालों नें रोहिणी माँ को बताया ………..पर इस बात को रोहिणी माता नें महत्व नही दिया ……..बालक कुछ भी बोलते हैं ऐसा विचार करके ।

उत्कच का उद्धार कर दिया था श्री कृष्ण नें……….वो अब जाकर मुक्त हुआ…….कहते हैं तात ! कि देवताओं नें उस समय पुष्प वृष्टि की थी …..जयजयकार किया था ।

पर अब मनसुख की बारी थी खानें की …….उसे खीर खाना था …..जैसे कन्हैया नें खाया था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 27

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 27 )

!! कागासुर और कागभुसुंडी !!


तात ! उसे असुर कैसे कहूँ ? जिसे नन्दनन्दन नें छूआ हो !

उसका असुरत्व तो तभी समाप्त हो गया …..जब उसनें “नन्दतनय” के दर्शन किये ।

वो कागासुर गया सीधे महर्षि लोमश के पास ………….

महर्षि ! मुझे उन “नन्दकिशोर” के दर्शन हुये ……….उन्होंने मुझे देखा ……फिर मारनें का प्रयास भी किया ……..कागासुर बोल रहा था ।

नही ….मारनें का प्रयास नही…….तुम्हे क्या लगता है कागासुर ! ….बृजराज तनय अगर चाहते तो तुम आज बच जाते !

महर्षि लोमश के नेत्र बन्द हो गए थे…….तुम्हारे ऊपर कृपा हुयी है ……..कृपा करना उस नन्द कुमार का स्वभाव है …..और वो स्वभाव के वश में हैं ……..कृपा उन्होंने किस पर नही की ! अधिकारी अनधिकारी ये कृपा शक्ति देखती कहाँ है कागासुर !

पर कागासुर , ऐसा क्या हुआ ? बताओ ? तुम गए क्यों थे गोकुल में ? क्या तुम्हे पता नही था कि बृजराज के लाल स्वयं पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं !

अहंकार जब चरम पर होता है …….तब जीव ईश्वर को भी ईश्वर कहाँ मानता है महर्षि !

अच्छा बताओ ! हुआ क्या था ? तुम्हे राजा कंस नें भेजा था ना ?

महर्षि लोमश नें कागासुर से पूछा ।


राजा कंस !

श्रीधर ब्राह्मण के एक माँस का टुकड़ा कल मैने खाया…..

क्या ! कंस अपनी सभा में चिल्ला उठा था ।

कागासुर ! क्या श्रीधर को भी मार दिया उस नन्द के शिशु नें !

काँप रहा था कंस का शरीर………पर तुमनें उसके देह को कहाँ देखा ?

यमुना जी में ……कालिय नाग नें निगल लिया था श्रीधर को ……..पर जब वमन किया तो श्रीधर के अर्ध देह का ही वमन किया कालिय ने ।

मुझे उस समय भूख लग रही थी कंस ! तो आकाश में उड़ते हुये मैने उस माँस के लोथरे को चबा गया ………पर मैं समझ गया था ये तो श्रीधर के देह का माँस है ।

कागासुर ! मेरी सत्ता को भी वो एक दिन निगल जाएगा………..कंस डर ही रहा था ।

कौन ! कौन निगलेगा ? कंस नें कहा – बृजराज का लाला ………वो पता नही क्या है ? देवताओं की कुटिल चाल लग रही है मुझे तो ।

कागासुर …….

………काग के रूप में एक राक्षस था ……….और राक्षस भी साधारण नही …..महाभयानक ………..ये आकाश में जब उड़ता तो समस्त दैवीय शक्ति इससे काँपती थी ……… बालक और नारियों के अंगों को खाना इसे प्रिय था ………।

तुम डरते क्यों हो कंस ? वीरों के माथे में ये चिन्ता की लकीरें शोभा नही देतीं……एक साधारण शिशु ? देवताओं से भिड़नें की बात हो तो कहो ……… ..एक मनुज का शिशु ? हँसा कागासुर ।

कंस नें गम्भीरता के साथ कहा …..पूतना भी यही कहती थी …….वो श्रीधर ब्राह्मण भी यही कहता था ……..तुम कुछ अलग नही कह रहे …………कागासुर ! मैं तुम्हारी शक्ति पर विश्वास करता हूँ……..पर वो बालक ………वो कुछ और ही है ।

मेरे ऊपर विश्वास है ना युवराज कंस ? कागासुर नें पूछा ।

हाँ …..विश्वास है….पूरा विश्वास है…..कंस क्या कहे…..अपनें सहायकों को हतोत्साहित करना ये तो कोई राजा का कर्तव्य नही है !

जाओ ! कंस नें उसे भी भेज दिया गोकुल में ।

साँय साँय साँय – करता हुआ ……..एक विशाल कौआ आकाश में उठ रहा था …….और क्षणों में ही वो गोकुल पहुँच गया ।


बृजरानी …….पालनें को अपनें आस पास ही रखती हैं ………कभी कभी तो पालनें की डोरी लम्बी कर देती है …….और रसोई से भी झुलाती रहती है……….दुनिया को झुलानें वाला ये है ………उसे मैया यशोदा झूला रही है ।

सूप रख देती है खड़ा करके…पालनें के सामनें…….ताकि सीधे नन्द भवन में आनें वाला उसके लाला को देख न सके …..नही तो नजर लग जायेगी ना !

और क्या पता किसकी नजर कैसी हो !

ये सुनते हुये विदुर जी की हँसी छूट गयी थी…………

जगत का रक्षक………जगत का ईश…..ब्रह्माण्ड जिसके इशारे पर चलता है ….सूर्य जिसके कारण उगता और ढलता है …..समुद्र अपनी मर्यादा नही छोड़ता ।……ऐसे को नजर न लगे कहकर पालनें के पास सूप को खडा कर देती है यशोदा । विदुर जी की बातें सुनकर उद्धव भी आनन्दित हो उठे थे ।

तात ! यही है लीला……इसी को कहते हैं लीला ।

आज यशोदा जी नें – लाला को स्नान कराके…….भरपेट दूध पिलाके …….काजल का टीका लगाके ……पालनें में सुला दिया था ।

तभी ……..आकाश से कागासुर आया ……और मुँडेर पर बैठ गया ।

यही है ? पालनें में झूल रहे नन्हे से शिशु को बड़े ध्यान से देखा कागासुर नें ………”अपनी चोंच से इसका गला दवा दूँगा”……यही विचार कर ही रहा था कि ………..नन्हे से कर उठे ऊपर की और ……..कागासुर देख रहा है ………वो पालनें के पास आया ………

पर किलकारियाँ भरते हुये ……कन्हैया नें अपनें छोटे छोटे करों को फिर उठाया आकाश की और ……अरे ! ये क्या ! कागासुर तो , जैसे लौह चुम्बक में खिंच जाता है ………ऐसे ही नन्द नन्दन नें उसे खींच लिया था ……….वो लाला की हाथों में आगया……..कागासुर को पहले तो लगा ये सपना है क्या ? पर असुर पर तो बीत रही थी …..सपना कैसे कह दें ।

कागासुर का गर्दन पकड़ लिया उन नन्हे हाथों नें ……….और देखते ही देखते ……फेंक दिया उसे मथुरा की सभा में ही ………….

सभा लगी हुयी थी ……….कंस सभासदों से वार्ता कर रहा था कि ………कौआ आकर गिरा …..एक विशाल कौआ ।

ओह ! तू जिन्दा है ? कंस नें कागासुर से व्यंग में पूछा ।

बड़ी बड़ी बातें बना रहा था……….अब क्या हुआ ?

कंस का ये व्यंग उसे अच्छा नही लगा ………और दूसरी तरफ उसके हृदय में अब यशोदानन्दन की छवि बस गयी थी ।

बिना बोले …….वो उड़ गया था महर्षि लोमश के पास ……..क्यों की कागभुसुंडी इन्हीं के शिष्य थे ……….एक बार मिला भी था ये काग भुसुंडी से ……उन्होंने इसे भक्ति की शिक्षा भी देनी चाही ……..पर ये तब अहंकार में था ………..और अहंकार भी चरम पर था ।


तुम धन्य होगए !….. कृतकृत्य हो गए !

…..अरे ! तुम्हे छू लिया नन्द नन्दन नें …….और क्या चाहते हो ? महर्षि लोमश नें कागासुर से कहा ।

आप से दीक्षा ! सिर झुकाकर महर्षि से बोला ।

कुछ देर विचार करते रहे महर्षि ……फिर बोले ………तुम नीलगिरि पर्वत में जाओ ……..मेरा शिष्य काग भुसुंडी है वहाँ ………तुम उनके शिष्य बनो ….वो परम भागवत है …..वो परम भक्त है ……….और तुम भी पक्षी हो …और वो भी पक्षी हैं ।

तात विदुर जी !

कागासुर महर्षि लोमश को प्रणाम करके नीलगिरि पर्वत की और उड़ा…….जहाँ मुक्ति को भी त्याग कर सत्संग के लिये आदिकाल से ही कागभुसुंडि जी विराजमान हैं ।

भगवन् ! मुझे शरण में लीजिये !

सत्संग चल रहा था वहाँ ……..श्री राम कथा का गान कर रहे थे काग भुसुंडी जी ……कागासुर नें जाकर वहाँ साष्टांग प्रणाम किया ।

तुरन्त उठकर खड़े हो गए थे कागभुसुंडी……..”तुम बड़े भक्त हो कागासुर”……….अपनें हृदय से लगा लिया था ।

पर मैं भक्त कहाँ ? मैं तो राक्षस हूँ भगवन् !

भक्त तो कोई भी हो सकता है …………ये देखो ! मेरे पास ये पक्षी हैं …….सब बड़े बड़े भक्त हैं………भक्त तो पक्षी भी हो सकता है …..पशु भी ….सुर भी और असुर भी ………कोई भी ।

और तुमनें तो नन्दनन्दन के दर्शन कर अपनें को धन्य बना लिया है कागासुर !

मैने भी दर्शन किये हैं नन्द कुमार के…….कागभुसुंडी बता रहे थे……हाँ ….ये बात दूसरे कल्प की है …….उस कल्प में भी अवतार हुआ था – कृष्णावतार ।

आनन्द रस में डूब गए थे कागभुसुंडी……..श्रीकृष्ण लीला रस में उनकी समाधि ही लग गयी थी

“लाला की सुन्दर चोटी मैया यशोदा नें बना दी थी …………हाथ में रोटी और माखन था ………चरणों में पैजनियाँ थी जो बज रही थी जब वो चलते …….या जब हिलते थे ।

उस समय वो हाथ में माखन रोटी लेकर नाच रहे थे ……..मैया यशोदा गीत गा रही थीं…….नन्हे से नन्द लाला ………..छोटे छोटे उनके चरण …….उनके छोटे छोटे हाथ ………..उनकी वो चपलता से भरी आँखें ……..मैं मुग्ध हो गया था ……….कागासुर ! तब मेरे मन में एक विनोद सूझा ……..मैं उड़ते हुये “नंदलाल” के हाथो की रोटी लेकर चला गया ……….

मैं तो चला गया ……पर जब घूमकर देखा तो वो धरती पर रोते हुए लोटनें लगे थे …..अपनें चरणों को पटक रहे थे …..मेरी ओर बारबार अपनी मैया को दिखा रहे थे ……..उफ़ ! वो झाँकी ! क्या दिव्य थी ……..कागभुसुंडी नें जब ये कहते हुये अपनें नेत्रों को खोला तो सामनें कागासुर भी उच्च भावस्थिती में पहुँच गया था………….

कागभुसुंडी नें उसको दीक्षा दी………तब से वो कागासुर नीलगिरि पर्वत में ही रहता है …..और सुना है राम कथा काग भुसुंडी सुनाते हैं …तो कृष्ण कथा ये कागासुर सुनाता है ।

सच ! भक्ति के मार्ग में कोई भी आ सकता है……….ये मार्ग सबके लिये है तात !………उद्धव नें कहा ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 26



(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 26 )

!! कंस का पुरोहित – वो श्रीधर ब्राह्मण !!

मैं मथुरा के युवराज कंस का पुरोहित बननें जा रहा हूँ………गुरुदेव ! मुझे आशीर्वाद दीजिये !

श्रीधर ब्राह्मण नें अपनें दैत्य गुरु शुक्राचार्य के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा था ।

कौन कंस ? आचार्य शुक्र नें अपनें शिष्य की ओर देखा ।

गुरुदेव ! मथुरा के युवराज कंस !…..श्रीधर नें डरते हुए कहा ।

ओह ! कंस ? जिसनें परशुराम जी से शिव धनुष प्राप्त किया है ……महाप्रतापी जरासन्ध का जामाता ! शुक्राचार्य नें आश्चर्य से पूछा ।

हाँ …गुरुदेव ! हाँ………श्रीधर नें सिर झुकाकर ही उत्तर दिया ।

“वीरता मुझे प्रिय है……वीर होना ही मेरे लिये प्रयाप्त है”…..कंस मुझे प्रिय है …..जाओ ! जाओ श्रीधर ! कंस का पौरोहित्य कर्म तुम ही सम्भालो…….जाओ !

आचार्य शुक़्र की आज्ञा पाकर श्रीधर ब्राह्मण मथुरा में आगया था ….कंस नें अपना पुरोहित इसी को बनाया ।

हे तात विदुर जी ! बाहर से ही ब्राह्मण था ये श्रीधर….इसके भीतर तो दैत्यों का अन्न ही पच रहा था …..वही अन्न तो इसका मन बन गया ।

राजा उग्रसेन को गद्दी से उतारकर युवराज कंस को गद्दी में बैठानें का श्रेय श्रीधर को भी जाता है …….ऐसे तन्त्र का प्रयोग कंस के कहनें पर इसनें किया था कि…….राजा उग्रसेन को कारागार का वास ही मिला …..और गद्दी पर अपनें यजमान कंस को बिठाया था इसनें ।

ब्राह्मण – सत्य, तप के तेज से सम्पन्न होना चाहिये……..यजमान को आज्ञा दे…….यजमान की आज्ञा माननें वाला ब्राह्मण भी भला कहीं ब्राह्मण कहलानें योग्य है ?

तात विदुर जी ! ब्राह्मण सत्य का नाम है ….ब्राह्मण तप का नाम है ….ब्राह्मण तेज का नाम है…..ओज का नाम है ब्राह्मण ।

पर ये श्रीधर ब्राह्मण, ब्राह्मण के नाम पर कलंक ही था ….क्रूर, पाखण्डी, दम्भी ।

एक दिन…………


कई दिनों से देख रहा हूँ तुम्हे मथुरेश कंस ! तुम चिंतित हो ?

क्या हुआ ? अरे ! देवकी का अष्टम गर्भ अभी तक मर भी चुका होगा ……..श्रीधर नें कंस को चिंतित देखा तो आज कह ही दिया ।

नही ……..ब्राह्मण ! नही ……..मेरे साथ छल हुआ है ……….देवकी का अष्टम गर्भ यशोदा के यहाँ पल रहा है………कंस नें कहा ।

कौन यशोदा ? श्री धर नें पूछा था ।

नन्दराय ……..क्या तुम परिचित नही हो ? बृजराज नन्द से ।

हूँ ……….सोचनें लगा था श्री धर…..फिर बोला …….हम क्षत्रियों से परिचय रखते हैं ग्वालों से नही…..अहंकार चरम पर है श्रीधर का ।

मेरी बात सुनो पहले ………नन्द के यहाँ जो शिशु है ………वही देवकी का अष्टम गर्भ है ……….क्या तुम्हे पता नही ……..पूतना मर गयी !

क्या ! श्रीधर भी चौंका……..कैसे ? कब ?

उसी नन्द के शिशु नें मार दिया………कंस नें बताया ।

क्या होगया तुम्हे आज कल युवराज कंस ? इतनें हताश निराश तुम कभी न थे ………तुम तो वीर थे ……….फिर आज ये कैसी बातें कर रहे हो ? एक शिशु नें मार दिया पूतना को ! श्रीधर हँसा ……….पर कंस की गम्भीरता देखकर फिर चुप हो गया ।

तो तुम मार दो ब्राह्मण ! उस शिशु को । …….जो कहोगे मैं तुम्हारे लिये वही करूँगा ………कंस नें श्रीधर ब्राह्मण को उकसाया ।

ठीक है ………..ये ब्राह्मण तुम्हे वचन देता है ………कि कल मारा जाएगा तुम्हारा वो शत्रु ……..शिशु ………ग्वालों का वह बालक ……..कल काल के गाल में समा जाएगा……..ये कहते हुए श्री धर हँसा…….हा हा हा हा हा ……. और उसी समय गोकुल की ओर चल दिया था ।


आइये आइये ! ब्राह्मण देवता ! आइये !

बृजराज नें देखा ….श्रीधर ब्राह्मण को ………….मस्तक के त्रिपुण्ड्र , शाक्त है ये …..पर लोगों को बताता है कि मैं परम शिव भक्त हूँ …..गले में रुद्राक्ष की माला ……..काला वस्त्र ……….लाल लाल नेत्र …….।

और ये गोकुल वाले परम वैष्णव !…………पर भगवान शिव तो इनके परम गुरु हैं……..महादेव को अपना गुरु मानते हैं ये गोकुल वाले ……इष्ट हैं भगवान नारायण इनके ………पर भगवान शंकर इनके जगद्गुरु हैं……….पूरी श्रद्धा है इनकी ।

सुबह का समय था ………..नन्दराय जा रहे थे गौशाला की ओर …….तभी सामनें से आगया श्रीधर ब्राह्मण ।

ब्राह्मणों के प्रति अपार श्रद्धा है, नन्द जी की ही नही ….सम्पूर्ण गोकुल वासियों की ।

आइये ! आइये ! ब्राह्मण देवता ! ……..आइये ।

देखो यशोदा !………प्रातः के समय ब्राह्मण पधारे हैं ……हमारे अहो भाग्य ! ………..नन्द राय नें यशोदा जी को कहा ।

यशोदा आयीं …….हे ब्राह्मणदेवता ! आज का प्रसाद हमारे यहाँ ग्रहण करें ! झुक कर प्रणाम करती हुयी यशोदा जी बोलीं ।

रोहिणी नें भी प्रणाम किया ।

ठीक है .. ……पर मैं तो स्वयं पाकी ब्राह्मण हूँ…….अपनें हाथों से ही बनाकर खाता हूँ ……..दुष्ट श्री धर नें अपनी चाल चली ।

तो क्या हुआ ……सीधा सामान में रख देती हूँ……और गोबर से स्थान लीप देती हूँ……..ये कहकर बृजरानी स्वयं सेवा में लग गयीं ।

मैं गौशाला होकर आऊँ ब्राह्मण देवता ! आवश्यक कार्य है …….आप को जो आवश्यकता हो माँग लीजियेगा ……..मैं अभी तुरन्त आया !

श्रीधर यही तो चाहते थे………हाँ हाँ …..नन्दराय ! आप जाओ !

बृजराज चले गए ।

…………. श्री धर नें अब चारों ओर देखा ……..।

यशोदा जी नें, पालनें में सुलाया है अपनें लाला को …….बगल में दाऊ सो रहे हैं………..श्री धर नें कुटिल दृष्टि डाली ……….ओह ! ये बालक है मेरे यजमान का शत्रु ! कंस को भी आज कल …..हँसा श्रीधर ।

देवी ! तुम ही हमारे लिये जल, यमुना से भर कर लाओगी ………..

यशोदा जी बहुत प्रसन्न हुयीं………..उन्हें लगा मुझे सेवा का अवसर दिया है ब्राह्मण देवता नें ……भोली हैं ये ।

रोहिणी ! मैं अभी आयी यमुना जल भरकर …….बृजरानी नें कहा ।

……..पर आप क्यों जीजी ! अन्य दासियाँ हैं ना ! या मैं ले आऊँ ?

रोहिणी नें मना किया कि……..जीजी ! आप न जाओ ।

पर मानी नहीं यशोदा ….धीरे से बोलीं ………सेवा करूंगी ब्राह्मण देवता की तो मेरे लाला को ये आशीष देंगे ………फिर देखना मेरा लाला कभी बीमार नही पड़ेगा ।………….बेचारी भोली यशोदा …….. कलश लेकर चल पडीं थीं यमुना की ओर ।

रोहिणी भीतर आयीं…….पालनें में सो रहे हैं बालक ……….उठाकर महल में ले जानें लगीं ……तो श्रीधर नें कहा …..शिशु को यहीं रखो ……….मैं मन्त्र पढूंगा तो इनका भी कल्याण ही होगा ।

रोहिणी भी कुछ नही बोलीं…….ठीक है……..वो चली गयीं भीतर ……रसोई में ……..पर .जाते जाते एक नजर पालनें में डाला…..सो रहे हैं बालक ।

श्रीधर के मन में आया ………अब कोई नही है ………बृजराज भी गए …….बृजरानी भी गयीं ……….रोहिणी भी रसोई में हैं ……..बहुत खुश हुआ श्रीधर ……..पर उसे देखते ही दाऊ की नींद खुल गयी थी ………..

पर श्रीधर कन्हैया के पालनें के पास आया था ……..उसनें सोचा मैं शिशु का गर्दन दवा दूँगा …..बस ये खतम ……….हँसा श्रीधर ……….इस शिशु के लिये कंस इतना परेशान !

वो झुका …पालनें में ………..और झुका ………..जब वो कन्हैया के बिलकुल पास में झुका…………..तभी कन्हैया हँसे ……..वो चौंका ………वो कुछ समझ पाता कि ………नन्हे हाथ कन्हैया के कब उठे ………और पलक झपकते भी शायद देर हो ……..पर यहाँ तो ……..मुख में हाथ डाल दिया कन्हैया नें ब्राह्मण के…….और भीतर तक पहुंचाकर ……बोलनें की शक्ति वाली नस ही मसल दी ।

बेचारा चीख भी न सका……….वो धड़ाम से गिरा धरती पर …….दाऊ ताली बजानें लगे……..और बजाते ही जा रहे थे ताली ।

पर श्रीधर ? वो अब बोल नही सकता ………..वो घबराहट से जब धरती में गिरा तो उसकी रीढ़ भी टूट गयी थी ………

वो दर्द के मारे चिल्लाना चाहता है …पर उसकी वाणी अवरुद्ध हो गयी ।

वो भागा …………लंगड़ाता हुआ भागा ……………पागलों की तरह भागा ……”उसके साथ क्या हुआ”…… ये अब वो किसी को बता भी नही सकता ……..क्यों की उसकी वाणी ही खतम हो चुकी थी ।

बृजराज नें देखा ……….. ब्राह्मण जा रहा है ………गोपों नें देखा , ब्राह्मण जा रहा है ……जा नही रहा भागता हुआ जा रहा है ।

तो सब लोग उसके पीछे भागे ….श्री धर को लगा कि, अब ये सब मुझे मारेंगें ………..श्रीधर डर गया ……..और कहते हैं …..डर इतना गया ये कि …….यमुना में ही कूद गया था ………. और कालिय नाग इसे एक ही बार में निगल लिया था ।

हे तात विदुर जी ! बृजराज बहुत दुःखी हुए ……..एक ब्राह्मण का हमारे यहाँ अपमान हुआ …….वो ब्राह्मण भागा…………..हमारा आतिथ्य भी स्वीकार नही किया …..ये तो शुभ नही है ।

पर ऋषि शाण्डिल्य नें समझाया – हे बृजराज ! तुम्हारे लाला का दर्शन कर वो ब्राह्मण धन्य हो गया ……देहातीत हो चला था………ऐसे सिद्धों के देह त्याग पर शोक नही ……आनन्द मनाते हैं…………..

विदुर जी बहुत हँसें ये सुनकर ……….

तो उद्धव नें कहा…….क्या कहते ऋषि शाण्डिल्य भी……बृजराज की ब्राह्मणों पर श्रद्धा ही इतनी थी ।

पर तात ! मुक्त हो गया वो श्रीधर……….होगा ही, कन्हैया जिसे छू लें ………वो तो परम मुक्त हो ही जाएगा ना !

तात ! कहते हैं …..श्रीधर के ऊपर उसके गुरु शुक्राचार्य नें फूल बरसाए थे …….जब वह दिव्य रूप धारण करके गोलोक धाम जा रहा था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 25

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 25 )

!! वात्सल्य भाव का उत्सव !!


जीवन को उत्सव के रूप में अगर किसी मार्ग नें देखा है तो वह है – “भक्ति” ।

भक्ति के भी पञ्च रसों में वात्सल्य अद्भुत है ……..माँ के हृदय का एक भाग होता है उसकी – सन्तान ।

माँ सन्तान के लिये ही सबकुछ करती है…..उसका उठना , खाना, सोना चलना बैठना ……अजी ! माँ का सर्वश्व जीवन ही उसकी सन्तान है ।

उसके बालक का मुख ही उसके लिए उत्सव है ……उस मुख में आयी प्रसन्नता ही उसका उमंग है …….वही उमंग उत्साह तो माँ के वक्ष में दूध उतपन्न कर देता है ……….विज्ञान चकित है …….माँ का उत्साह- उत्सव रक्त को दूध में परिवर्तित करके बालक के पोषण का कारण बनता है ।

माँ की महिमा ऐसे ही नही है ।

मुझे याद आती हैं वो महाराष्ट्र की माता जी ………..मैने दर्शन किये उनके ……..लड्डू गोपाल की एक मूर्ति उन्होंने रखी थी …….मुझे अपनें घर में उन्होंने बुलाया ……….इधर उधर की बातें हुयीं ……फिर मुझ से कहा ……मेरे लाल जी से नही मिलोगे ? वो “लाल जी” कहती थीं लड्डू गोपाल को …….उनके पति पधार गए थे ……….उनका एक ही बेटा था वो भी एक्सीडेंट में चल बसा था ……….उनके गुरु जी नें उनको कहा …..बाल कृष्ण को ही अपना पुत्र मानों ……….ये बात उनको जँच गयी ……..उन्होंने यही किया ……….लड्डू गोपाल की मूर्ति उनके गुरु जी ही दे गए थे ……तब से वो वात्सल्य भाव की मूर्ति स्वयं बन गयीं ।

मुझे उन्होंने कहा ………..एक दिन गलती से जल रखना भूल गयी ……तो मुझे इसनें कहा ……..मैया ! प्यास लगी है ।

बस उस दिन से ये मेरा सब कुछ हो गया ……….कभी कभी मैं भोग लगाकर , पर्दा करके चली जाती थी ……उस दिन ये खाता ही नही था ।

ये सब बातें बताते हुये वो भाव में डूब गयीं थीं……….मेरा बेटा ! मेरा लाल जी …..मेरा कानुडा …………..

उन्होंने एकाएक अपनी आँखें खोलीं ……….साडी को सम्भाला ……..संकोच करती हुयी वो वहाँ से गयीं………..

मैं स्तब्ध हो गया था ……..क्यों की उनके वक्ष से दूध झरनें लगा था ।

उन्होंने तो नही कहा ……पर मैं कहता हूँ …….उसका गोपाल दूध पीता होगा अपनी इस यशोदा का …………

साधकों ! ये सत्य घटना है , वो माता जी अभी भी हैं ।

वात्सल्य भाव अद्भुत भाव है ……मैं फिर कहता हूँ ……..

क्यों की इसमें अपनें आराध्य को पुत्र मानना है ………….उसका ख्याल रखना है ………….।

अब थोडा विचार कीजिये …….यशोदा जी के बारे में ……….

चिन्ता कन्हैया की है यशोदा जी को ………..वो सब कुछ करती हैं ….पर कन्हैया के लिये ……..जप , तप , पूजा , पाठ व्रत …..और कोई निष्कामता का दम्भ भी नही करती ………कामना से करती हैं……..और कामना ये है कि ….मेरा लाला प्रसन्न रहे ………इसके लिये जिसे मानना हो ये मनाती हैं……शनि देव , राहू केतु सबको मनाती हैं……..भूत प्रेत को भी मानना पड़े तो भी इस “नन्द गेहनी” को कोई आपत्ति नही है ।

लाला की ख़ुशी ही इसकी ख़ुशी है……….लाला का दुःख इसके लिये महादुख है ………..होगा ब्रह्म कृष्ण ……..पर इसका तो ये लाला है …….होगा परमात्मा कृष्ण पर ये तो इसकी नजर उतारेगी ।

क्या इस ब्रह्माण्ड में “यशोदा” से बड़ा कोई भगवान है ?

मैं तो कहूँगा …………नही ।


जीजी ! जीजी ! जीजी !

रोहिणी आज पहली बार इतनी खुश हुयी थीं ।

वो आनन्द से यशोदा जी को पुकारती हुयी रसोई में गयीं ।

अभी अभी पालनें में लाला को सुलाकर कर आयीं थी यशोदा ।

लोरी गाती रहीं …….कुछ कुछ गुनगुनाती रहीं ………दूध पिला चुकी थीं……..थपथपी देती रहीं…………थोड़ी देर में लाला नें आँखें बन्दकर लीं ……..यशोदा जी नें देखा तो पालनें में सुलाकर रसोई घर में आगयीं थीं …………कुछ देर बाद ही रोहिणी पुकारती हुयी आयीं……

जीजी ! जीजी ! जीजी !

जब से लाला हुआ है और पूतना की घटना के बाद से यशोदा जी छोटी छोटी बातों से डर जल्दी जाती हैं………….अज्ञात भय, अपनें लाला के प्रति यशोदा जी के मन में बना ही रहता है ……।

क्या हुआ रोहिणी ? वो सहम गयीं …….पर हँसते हुये जब रोहिणी को देखा तब उन्हें कुछ शान्ति मिली थी ।

मेरे तो प्राण ही निकल जाते ……..क्या हुआ ? लाला ठीक तो है ?

जीजी ! चलो तो …….यशोदा जी का हाथ पकड़ कर रोहिणी बोलीं ।

पर रोहिणी ! आज तुम बड़ी प्रसन्न हो ? क्या हुआ ?

चलो तो जीजी !

रोहिणी नें वहाँ बताना उचित नही समझा ……वो नन्दरानी को कुछ दिखाना चाहती थीं ।


दाऊ ….रोहिणी नन्दन !

……..एक वर्ष से भी ज्यादा के हो गए थे दाऊ…….पर अभी तक इनकी आवाज नही खुली थी ………कुछ बोले ही नही थे ….इसलिये रोहिणी भी दुःखी थीं……….कहीं पिता वसुदेव का दुःख तो बालक में नही आगया ………..

पर आज ! …….पालनें के पास घुटवन चलते हुए दाऊ गए ……..गौर वर्ण के दाऊ……..कन्हैया के पालनें के पास जैसे ही गए ………

लाला ! लाला ! लाला !

स्पष्ट आवाज में बोलनें लगे ……. सोते हुए लाला को छूनें लगे……..

रोहिणी आगयी थीं वहाँ…और जैसे ही देखा…..उनका दाऊ “लाला” कह रहा है ………बस उनके आनन्द का कोई ठिकाना न रहा ……..नेत्रों से ख़ुशी से अश्रु झरने लगे ……..वो दौड़ीं …….जीजी ! जीजी !


देखो ! जीजी ! यशोदा जी देखनें लगीं………..रोहिणी भी देख रही हैं………..दोनों माताएँ मन्त्रमुग्ध हैं……..पर ये क्या !

अपनें दाऊ को जब “लाला” कहते हुए सुना………छूते हुए देखा …..तो किलकारियाँ छोड़ते हुये कन्हैया नें तुरन्त करवट बदल ली ।

रोहिणी ! लाला नें करवट बदली है ……….

यशोदा जी नें आनन्द की अतिरेकता में रोहिणी को अपनें हृदय से लगा लिया ……..लाला नें करवट बदल ली ।

तो भाभी ! अब तो उत्सव होना चाहिये !

सुनन्दा नें पीछे से आकर कहा ।

……..सुनन्दा ! तुम आगयीं ?

भाभी ! यहाँ से जानें के बाद मेरा तो घर में मन ही नही लगा ……….

बारबार मुझे लाला ही याद आती रही…….मैं खोई खोई रहती थी ……मेरे पति बोले ……..तू कुछ दिन और रह आ गोकुल में ….

भाभी ! मैं तो बस भागी वहाँ से …………

यशोदा जी नें कहा ……अच्छा किया …………..

पर भाभी ! अब तो करवट बदलनें का उत्सव होना चाहिये …….

सुनन्दा कितनी खुश है ……रोहिणी को आज आनन्द आरहा है …..यशोदा जी के तो आनन्द का पारावार ही नही है ।

सुनन्दा दौड़ी …………..वो सीधे ऋषि शाण्डिल्य के पास गई ……..चार सुवर्ण के मोहर उनके चरणों में रखते हुए बोली …….लाला नें करवट बदली है …..उत्सव तो होना ही चाहिये !

हँसे ऋषि शाण्डिल्य ………तुम लोगों को तो बस उत्सव मनानें का बहाना ही चाहिये …………..चलो ! देखता हूँ रुको ……..ये कहकर ऋषि शाण्डिल्य नें आँखें बन्द की ……….फिर बोले ……..लाला के पास क्या कोई “नाग” था क्या आज ?

डर गयी सुनन्दा…….ऋषिवर ! ऐसे मत बोलो ….कोई नाग नही था ।

ऋषि शाण्डिल्य नें कहा …….पर मेरा अनुमान गलत नही होता …..लाला तभी करवट बदलेगा जब उसके पास कोई नाग होगा ……….

सुनन्दा नें कहा ……..कोई नाग नही था ।

ऋषि शाण्डिल्य भी कुछ समझ न पाये…….नाग होना ही चाहिये ।

चलो ! तुम तो उत्सव मनाओ………..ये कहकर सुनन्दा को ऋषि नें भेज दिया ।

फिर नन्दालय के आँगन में धूम मची …….बड़े बड़े गवैये आये ………नन्दराय आज फिर नाचे ……..अरे हाँ …..आज तो रोहिणी भी नाचीं …..और सुनन्दा नें यशोदा जी को पकड़ा और …….ना ! भाभी ! आज तो तुम्हे भी नाचना ही पड़ेगा …………बड़ी शरमा रही हैं यशोदा जी ……….पर जब नाचीं तो उन्मुक्त होकर नाचीं ……..अपनें लाला के करवट बदलनें के उत्सव में ।

उद्धव ! ये “नाग” वाली बात, क्या बोले थे ऋषि शाण्डिल्य ?

विदुर जी नें बीच में प्रश्न किया था ।

हाँ ……….वो “शेष नाग” के लिए कह रहे थे ……दाऊ जी, शेष नाग के ही तो अवतार हैं ना तात !

हाँ ………विदुर जी मुस्कुराये ………अच्छा ! इसलिये कह रहे थे ऋषि कि लाला के पास कोई “नाग” होना चाहिये !

विदुर जी को अब समाधान मिला था ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 24

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 24 )

!! जगत रक्षक  की गोपियों द्वारा रक्षा !!
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आहा ! “जगत रक्षक” की रक्षा करनें चली हैं अब ये गोपियाँ ।

जिनका नाम लेनें से जगत का अमंगल नष्ट होता है ……उसी का अमंगल दूर करनें चली हैं ये गोपियाँ ………क्या अद्भुत बात है …है ना तात !

विदुर जी से उद्धव नें कहा ।

ये वात्सल्य भाव है ….वात्सल्य भाव की नदी ही बह चली है अब यहाँ ।

पूतना के देह से कन्हैया को लेकर बृजरानी की गोद में दे दिया था ।

गोपियों नें घेर लिया यशुमति को …..कन्हैया को लेकर सब चिंताएं करनें लगी थीं……यह तो चुड़ैल थी , चुड़ैल……कोई भूतनी बता रही थी ।

डाकिनी है ये …….एक गोपी नें कहा …………….कहीं लाला के ऊपर इसकी छायाँ ……….दूसरी गोपी ये भी कह रही थी ।

अरे ! बातें ही बनाती रहोगी ………मोरपंख लाओ ….और उससे झाड़ो ……..दूर से एक गोपी दौड़ती हुयी आयी …….”नीम के पत्तों का झाड़ा दो” …….कहती हुयी आयी थी ।

मैं जानती हूँ एक ओझा को …….भूत प्रेत उतारती है वो ……….मैं उसे बुलाती हूँ………ये कहनें लगी एक गोपी ।

हट्ट ! यहाँ भूत प्रेत कहाँ ? ये नन्दालय वैष्णवों का है ……यहाँ सब वैष्णव हैं ….भगवान नारायण की सेवा होती है यहाँ ………एक बूढी गोपी लाठी टेकती हुयी आयी ….और सबको हटाती हुयी बोली थी ।

पर यशोदा जी, सबकी बातें सुनकर रोनें लगीं………….वो लाला को लेकर धरती में ही बैठ गयीं………..तभी दाई आयी ……..बूढी दाई ……सबको चिल्लाकर बोली ……मेरे होते हुये सब क्यों बकरबकर कर रही हो …….हटटो यहाँ से …………..

हाँ बृजरानी ! तुम रोओ मत ……लाला को कुछ नही होगा ……

दाई के आते ही ……बृजरानी दीन हीन सी , हाथ जोड़कर बोलीं – …….दाई ! तुम इस बृज की सबसे बूढी गोपी हो……..तुम बताओ ना ! मैं क्या करूँ ?

तुम तो झाड़ फूँक सब जानती हो न ! …….करो ……बस मेरे लाला को कुछ नही होना चाहिये…….ये स्वस्थ रहे ……….भले ही मुझे कुछ हो जाए ….पर इस को कुछ न हो ………बृजरानी आँसू बहाती जा रही थीं ।

तू क्यों रो रही है …….मैं हूँ ना यशोदा ! चलो ….सब चलो ……..गौशाला चलो ……..मैं ऐसा उपाय करूंगी कि लाला अभी ठीक हो जाएगा ………..इतना कहकर लाठी टेकते हुए दाई आगे आगे चल दी …..पीछे यशुमति अपनें लाला को लेकर चल रही थीं……..और उनके पीछे सभी गोपियाँ ।

लाला टुकुर टुकुर देख रहे हैं……….”कि ये हो क्या रहा है” ।

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अद्भुत ! दिव्य !

विदुर जी गदगद् हो उठे थे ये सब सुनकर ।

उद्धव हँसते हुए बोले ………”मंगल भवन” का अमंगल नष्ट करनें के लिये ये सब गोपियाँ चल रही हैं……जिनका नाम लेंने से समस्त ब्रह्माण्ड का अमंगल नष्ट होता है ……..उनका अमंगल नष्ट करनें की कामना लेकर आज ये सब गौशाला आयी हैं ।

यशोदा तू बैठ ! …….दाई नें कहा……..यशोदा जी बेचारी जो कहो वही कर रही हैं …….क्यों की लाला का प्रश्न है …..कहीं लाला को कुछ हो न जाए……बारबार हृदय काँप रहा है यशोदा का……उस राक्षसी नें पता नही क्या किया हो मरते मरते । यशोदा जी बैठ गयी हैं ।

दाई, श्यामा गौ को लेकर आयी……….और लाला के सिर में मन्त्र पढ़ते हुये गौ की पूँछ घुमानें लगी ।

फिर उसी गौ के गोबर का टीका मस्तक में लगा दिया लाला के ……..उसके बाद गौ मूत्र का छींटा भी देंने लगीं ।

दाई और अन्य गोपियाँ मन्त्र पढ़नें लगीं………….

उद्धव हँसते हुये बोले ………इनका मन्त्र !

हे ऋषिकेश भगवान ! लाला के इन्द्रियों की रक्षा करना ।

हे नारायण भगवान ! यशोदा और नन्दराय आपकी बहुत आराधना करते हैं……इसलिये आप लाला के प्राणों की रक्षा करना !

हे योगेश्वर भगवान ! लाला के मन की रक्षा आप करना ……….

हे विष्णु भगवान ! आप मेरे लाला के आगे आगे अपना चक्र लेकर रक्षा करते हुए चलना …………

हे गोविन्द भगवान ! लाला जब खेले तब आप रक्षा करना ………

और जब लाला सो जाए तब, हे माधव भगवान ! आप रक्षा करना ।

हे बैकुण्ठ नाथ ! आप मेरे लाला की चलते हुए रक्षा करना ……..बैठते हुए लाला की रक्षा श्री पति भगवान करना ।

हे यज्ञ पति भगवान ! जब लाला भोजन करे तब रक्षा करना ।

“अब सब बड़े मन से “विष्णु विष्णु विष्णु” नाम का उच्चारण करो” …..दाई नें गोपियों को आदेश दिया ………..

बृजरानी ! तुम भी मन ही मन में “विष्णु” नाम का उच्चारण करो ।

दाई की बातें सुनते ही यशोदा जी नें बड़े मनोयोग से “भगवान विष्णु” का नामोच्चारण प्रारम्भ कर दिया था ।

हजारों गोपियों नें एक साथ “विष्णु विष्णु विष्णु” नाम को बोलना जब शुरू किया…..तब दाई सबसे तेज़ आवाज में कहनें लगी …..

जितनें भूत ,प्रेत , डाकिनी , साकिनी , यातुधानी, कूष्माण्डा , बाल घातिनी , पिशाच, यक्ष, राक्षस , जो भी लाला के देह से चिपक गए हैं वो सब हट जाएँ …….नही तो भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र उन्हें जलाकर भस्म कर देगा ……….हट् हट् हट् हट्ट ………..बूढी दाई आँखें बन्दकर के जोर से चिल्लाई…………..

पर ये क्या ……दाई के चिल्लानें से …….यशोदा की गोद में लेटे कन्हैया हँसे ……खिलखिलाकर हँसे …………….

ये जब देखा…..तो दाई खुश हो गयी, बोली -……..देखा ……..सब भूत प्रेत भाग गए…..देख यशोदा ! तेरा लाला अब हँस रहा है……….

यशोदा जी नें देखा……..लाला सच में हँस रहा है……यशोदा जी ख़ुशी से झूम उठीं…….गोपियाँ आनन्दित हो गयीं……..हाँ …दाई ! सच में तू तो बहुत बड़ी मन्त्र तन्त्र की ज्ञाता है , गोपियों नें कहा । ……और क्या ! क्या समझती हो तुम लोग …..ऐसे भूत प्रेत मैने कितनें भगाए हैं ।

पर कन्हैया हँसे क्यों ? विदुर जी नें पूछा था ।

उद्धव नें कहा…….तात ! इसलिये कन्हैया हँसे …….कि ये सब इनके ही नाम तो हैं…….और इनके ही नाम और इनके ऊपर ही झाड़ा ।

तात विदुर जी ! ये वात्सल्य मयी हैं गोपियाँ …………स्नेह रस से सिक्त हैं………..ये नही मानती कन्हैया को परब्रह्म ……इनके लिये तो ये बालक है …..निरा बालक ।

शेष चरित्र कल

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 23

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 23 )

!! मातु की गति दई ताहि !!


लाला कहाँ है ? एकाएक चीखीं बृजरानी ।

रोहिणी भी दौड़ीं………..

पर लाला पालनें में नही है लाला……..वह ब्राह्मणी भी नही है ……रोहणी ! कहाँ गयी वो ? यशुमति की आवाज सुनते ही दास दासियाँ दौड़ीं ……….गोपियाँ और गोप सब दौड़ पड़े थे ।

पागलों की तरह सब दौड़ रहे थे इधर उधर…….लाला कहाँ है ? सबके मुख में यही प्रश्न था………

गोपियाँ बृजरानी को सांत्वना दे रही थीं…….आप शान्त होइये पहले …….बताइये ! कौन आया था आपके महल में ?

“पण्डितानी” कह रही थी वो अपनें आपको…….मथुरा से आयी हूँ….. बता रही थी…..दूध लेनें रोहिणी गयी ……फिर मुझे कहा उसनें कि “मैं छाँछ लुंगी”…….मुझे क्या पता था कि ऐसा हो जाएगा……..मैं क्यों गयी ! हे भगवान ! घबराहट बढ़ती ही जा रही थी बृजरानी की ।

नेत्रों से अश्रु गिरनें लगे थे …………………

आप ऐसे किसी पर भी कैसे विश्वास कर सकती हैं……….

कहनें के लिये गोपियाँ ये भी कह रही थीं ।

अरे ! मुझे क्या पता था ……………सुनो ! उधर देखो तो ………..शायद उधर मेरा लाला हो ……..सब दासियाँ यशुमति जिधर कह रही थीं उधर देखनें लगीं थीं ।


उद्धव ! हुआ क्या था ? पूतना नें क्या किया कन्हैया के साथ ?

वो कहाँ ले गई कन्हैया को ? क्या मथुरा ले गयी ?

विदुर जी नें उद्धव से प्रश्न किया ।

नही तात विदुर जी ! मथुरा कहाँ से ले जाती वो ……..वो तो अच्छे से चंगुल में फंस चुकी थी कन्हैया के ……..और मैने आपको कहा ही है ….जिसे ये पकड़ लेता है छोड़ता कहाँ है ।

तात विदुर जी ! बृजरानी के जानें के बाद …….पूतना पालनें के पास आयी थी……उसनें ध्यान से देखा ……..आलस से भरे हुए थे कन्हैया………क्यों की दूध अभी पिला कर ही गयीं थीं यशोदा मैया …….इसलिये आलस आरहा था उन्हें ।

पूतना नें इधर उधर देखा……और झट् से उठा लिया था कन्हैया को ।

अस्फुटित दो कमल कली के समान उनके गोल गोल से रसीले ओठ बन्द थे …….वो कुछ देर तो उन अधरों को देखती रही……..पर फिर उसनें सोचा समय को इस तरह बिताना उचित नही है………….कोई आगया तो ? यशोदा ही आगयी तो ?

तुरन्त उसनें अपना वक्ष खोला …….और स्तन कन्हैया के मुख में दिया …………मुख बन्द थे …….कन्हैया खोल नही रहे थे ………क्यों की उनका पेट भरा हुआ था ………..पर जबरदस्ती पूतना नें अपना स्तन कन्हाई के मुख में दिया ……अब दे दिया …… इस पर कन्हैया को गुस्सा आया ………….दाँत अभी निकले नही हैं……….ओठ से ही पान करनें लगे स्तन को ……..पूतना हँस पड़ी ….उसे अच्छा लगनें लगा ……पर ये क्या ? वो कुछ ही देर में चिल्लानें लगी ………..वो भागी ……….वो इधर उधर दौड़नें लगी ……….वो कन्हैया को अपनें वक्ष से हटानें का प्रयास करनें लगी ………पर ये तो चिपक गए थे उसकी छाती से …………

उद्धव बोले …तात ! पिलानें आयी थी दूध ……..पर ये तो परम उदार हैं………तुम थोड़ा दो ये पूरा लेते हैं………….हँसे उद्धव ।

विष मिश्रित दूध पिलानें आयी थी ……पिला रही थी …..पर कन्हैया नें कहा ……इतनें से अब काम नही चलनें वाला ………हम तो अब तुम्हारे प्राणों को ही पीएंगें………….

वो भागनें लगी , वो छटपटानें लगी ……….उसका वो सौन्दर्य सब खतम हो रहा था ……..वो राक्षसी रूप में आने लगी थी ।

हाँ तात विदुर जी ! पूतना नें एक बार सोचा कि ……इस बालक को ऐसे ही लेकर मथुरा जाऊँ………वो भागी मथुरा की ओर ……..पर भागते हुये वो गिरी……..जब गिरी ……..तो जंगल के जंगल उसके देह के नीचे आकर दव गए थे……..उसका भयानक रूप वापस आगया था ……….पर कन्हैया बड़े प्रेम से स्तन पान करते ही रहे अभी भी…..वो हटा रही है ……..वो चीख रही है ……वो छटपटा रही है ।


मैया ! ओ बृजरानी मैया !

दो ग्वाले दौड़े हुए आये ।

बृजरानी उठीं………मेरे लाला को देखा क्या ? बृजरानी नें पूछा ।

हाँ …..हाँ …….उधर उधर ………..ग्वाले भी घबराये हुये थे ।

अरे क्या हुआ ? बता तो ? रोहिणी नें पूछा ।

एक विशाल देह है …………राक्षसी का देह है …………उसके ऊपर हमारा लाला खेल रहा है ।

बस ये सुनते ही बृजरानी तो धड़ाम से धरती में गिर गयीं……और मूर्छित ही हो गयीं ।

नन्द राय जी आगये थे …….उनके साथ चार पाँच ग्वाले थे ……….वो सब दौड़े …….कहाँ है राक्षसी ? अब तो पूरा गोकुल ही आगया था …..ग्वाल बाल लाठी फरसा सब ले आये थे ………

यशोदा जी कुछ देर में उठीं………..वो फिर रोहिणी को लेकर दौड़ीं उस राक्षसी की ओर ।

ग्वाल बाल नें देखा विशाल देह है …… पड़ा हुआ है …………उसके ऊपर लाला खेल रहा है ……….

सबसे पहले तो ग्वालों नें देखा पूतना मर चुकी थी………

फिर उसके देह में चढ़कर लाला को उठा लाये ……………

यशोदा की गोद में लाकर दिया…….यशोदा जी नें देखा ……सबसे पहले लाला के नाक में हाथ रखा……साँस चल रही है लाला की……

पर ये रो क्यों नही रहा ? मैया घबरा गयीं ।

रोहिणी ! ये रो नही रहा ? देख ना ? यशुमति की घबराहट बढ़ती जा रही थी………तभी कन्हैया नें रोना शुरू किया ……..बस रोनें की आवाज सुनते ही………प्रसन्नता से भर गयीं यशोदा जी …….नेत्रों से सुख के अश्रु बहनें लगे थे……….चूमनें लगीं लाला का मुख ।

पर उसी समय क्रोध से भर गए थे ग्वाले ………फरसा लिया और पूतना के अंगों को काटनें5 लगे …….हाथ काट दिए …….पैर काट दिए …….और सब नें मिलकर सूखी लकड़ियां पूतना के ऊपर डाल, आग लगा दी ।

पर तात विदुर जी ! सब आश्चर्य से देख रहे थे उस दृश्य को ……..

कि पूतना के देह से एक सुगन्ध प्रकट हुआ……दिव्य सुगन्ध……पूरे वातावरण को सुगन्ध से भर दिया उसनें …….किसी को कुछ समझ में नही आरहा था कि ये दिव्य गन्ध इस राक्षसी के देह से क्यों ?

हाँ ….ऐसा क्यों ? उद्धव ! विदुर जी नें भी प्रश्न किया ।

तात ! चन्दन वृक्ष को काटनें वाली जो कुल्हाड़ी होती है ना ……..चन्दन के प्रभाव से कुल्हाडी में भी सुगन्ध आजाता है ।

तात ! कन्हैया के दिव्य देह का इस राक्षसी ने स्पर्श किया था…..ये साधारण बात नही थी ।

इसे तो अपनी माता की गति दे दी थी…….गोलोक भेज दिया कन्हैया नें इसे …….अपनी धाय माँ बनाकर सदा के लिए ।

धन्य है कन्हैया की करुणा ……आहा !

गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाई ,
मातु की गति दई ताहि, कृपालु जादव राई !!

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 22

(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 22 )

!! कन्हैया ने जब पूतना को देखा !!


बधाई हो ! बधाई हो !

नाचती गाती गोपियाँ लौट रही थीं नन्दालय से ।

पूतना देख रही है ।

“धन्य हो गया ये गोकुल ……….आज छ दिन हो गए हैं यशोदा के लाला हुये ……….पर उत्सव अभी भी चल ही रहा है ………कितनी उदार हैं हमारी बृजरानी……….अरी ! लाला कितना सुन्दर है ! दूसरी गोपी तुरन्त कह रही थी………..पूतना इन सबकी बातें सुन रही है ।

पता है ……..बृजरानी नें मुझे मोतियों का हार दिया है ….देख !

दे तो मुझे भी रही थीं पर मैने नही लिया ! दूसरी गोपी नें कहा ।

क्यों ? फिर बधाई में तेनें क्या माँगा ? पहली गोपी नें पूछा ।

मैने तो कह दिया ……..मुझे ये सब नही …….मुझे तो अपनें लाला का मुख दिखा दो ! पहले तो मना किया बृजरानी नें ……पर बाद में मुझे लेकर गयीं पालनें के पास ……………आहा ! सखी !

क्या सुन्दरता ! माखन में मानों नीला रँग मिला हो ……ऐसा देह है बृजरानी के लाला का……..चंचल नयन………उसनें मुझे देखा……अपनें नन्हे पाँव पटके …….मैं तो मन्त्र मुग्ध हो गयी ….सबकुछ भूल गयी थी , सच ! अद्भुत बालक जाया है बृजरानी नें ।

पूतना सुन रही है गोपियों की बातें ।

सुनिये !

पूतना नें गोपियों को रोका ।

हाँ ………..गोपियाँ रुकीं ।

ये नन्दालय कहाँ है ? पूतना नें पूछा ।

क्यों ? नयी आई हो ? क्या गोकुल की नही हो ?

गोपियों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी ।

कहाँ की हो ? बड़ी सुन्दर हो ? यशोदा की बहन लगती हो ?

ओह ! उसके लाला हुआ है इसलिये आयी हो………कुछ लाई हो ? खिलौनें ? अच्छा दिखाओगी, क्या लाई हो ?

प्रश्न इतनें कर दिए कि पूतना तो घबडा गयी …………..

तुम भी ना !

एक गोपी, बूढी बड़ी थी. उसनें पहले तो गोपियों को टोक कर चुप कराया……फिर आगे बढ़कर कहा , पूतना से बोली ……जाओ ! सीधे जाओ……..दूध दही की कीच मची है …..हल्ला हो रहा है ….लोग लुगाई सब नाच रहे हैं………..जाओ ! बस वही है नन्दालय ।

पूतना गयी ………………

भीड़ थी लोग नाच गा रहे थे वहाँ…….धूम मची थी उत्सव की ।

आज छठी उत्सव मनाया जा रहा था ……..बृजरानी का लाला आज छ दिन का जो हो गया था ।

पूतना नें देखा …….भीड़ बहुत है ………..और मुझे जाना है यशोदा के अन्तःपुर में………वहाँ तक कैसे जाऊँ ।

पर जाना तो है ……..पूतना चली भीड़ के पास ……….

पर पूतना को देखते ही भीड़ छंटनें लगी……….क्यों की ये इतनी बन ठन के जो आई थी ………..सुन्दर- अतिसुन्दर रूप जो इसनें बनाया था ……..गोपों नें रास्ता दे दिया पूतना को ………..

नाचना गाना सब रुक गया ग्वालों का …………

“बड़ी सुन्दर है ये” ………एक नें दूसरे के कान में कहा ।

बृजरानी के पीहर की लग रही है…………देखो तो !

ग्वाले सब देख रहे हैं पूतना को………..पर पूतना सीधे गयी ।

यशोदा जी रोहिणी ये दोनों ही बैठी थीं पालनें के पास में ।

पूतना को जैसे ही यशोदा जी नें देखा …….उठ गयीं ।

कौन हो ? उठते हुए पूछा …….रोहिणी भी उठीं ।

मैं ? मैं मथुरा से आयी हूँ………..पण्डितानी हूँ……….पूतना इतना बोलकर चुप हो गयी ।

क्यों आयी हो ? बृजरानी नें पूछा ।

क्यों आयी हो ? क्या तुम्हारे लाला नही हुआ ? मैने सुना कि तुमनें एक लाला को जन्म दिया है …….और वो बहुत सुन्दर है ।

हाँ ……..लाला हुआ है ………..यशोदा जी नें कहा ।

तो दिखाओगी नही ? ब्राह्मणी हूँ , क्या मेरा आशीष नही लोगी ?

वैसे – मेरा आशीष फलता बहुत है ……..पूतना आँखें मटका रही थी ।

हाँ हाँ…..क्यों नही ……..मेरे बालक को तुम पण्डित- पण्डितानियों के ही आशीष की जरूरत है ………..खूब दो मेरे लाल को आशीष ।

ये रहा मेरा लाला ………ये कहते हुये पालनें की ओर बृजरानी नें पूतना को दिखाया ………….मैं तुम्हारे लिये दूध मंगाती हूँ………रोहिणी ! पण्डितानी के लिये दूध ला दो ।

जीजी ! अभी लाई ……..रोहिणी गयी दूध लेनें ।

ओह ! ये है तुम्हारा लाला ! पालनें में देखा पूतना नें कन्हैया को ।

कन्हैया नें टेढ़ी नजर से पूतना को देखा ……………

फिर तुरन्त अपनें नेत्रों को बन्द कर लिया ।

मैं दूध नही पीऊँगी ……..क्या छाँछ ला सकती हो ?

पूतना नें यशोदा जी को कहा ।

हाँ …हाँ ………मैं लेकर आती हूँ छाँछ ……………यशोदा जी इस बार स्वयं गयीं पूतना के लिये छाँछ लेनें ………….

पर इसे छाँछ पीना कहाँ था …….ये तो एकान्त चाहती थी ……ताकि अपना स्तन कन्हैया के मुख में दे सके ……उद्धव बोले ।


पर उद्धव ! कन्हैया नें नेत्र बन्द क्यों किये ?

पूतना को देखकर नेत्रों को बन्द करनें का कारण क्या था ?

चपलता ! बालक की अपनी एक चपलता होती है …….उद्धव नें कहा ।

पर तात ! महत्पुरुषों नें इसपर बहुत कुछ कहा है …………

किसी नें कहा………..कन्हैया के नेत्रों में सूर्य चन्द्र का वास है …….तो सूर्य चन्द्र नें इस पापात्मा पूतना को देखना न चाहा ….और पलकों से स्वयं को ढँक लिया ।

तात ! किसी नें कहा ……..कन्हैया के पास बिना पुण्य के कौन आएगा ……पर पूतना का पुण्य तो शून्य है …..है ही नही ……..किन्तु पूर्वजन्मों में कोई पुण्य हो ………ऐसा विचार कर कन्हैया उसके पूर्व जन्मों को देख रहे हों ……….नेत्रों को बन्द करके ।

हँसे उद्धव …………कन्हैया नें सोचा ………..विष तो हम पीयेंगे नही …….क्यों न महादेव को कहा जाए ……….क्यों की उनको विष का अभ्यास है ………..ऐसा विचार कर आँखें बन्दकर के महादेव का ध्यान कर रहे हैं कन्हैया ……..और उन्हें बुला रहे हैं…….कि आओ ……विष आप पीयो दूध हम पीयेंगे ………..तात ! विदुर जी ! इसलिये कन्हैया नें अपनें नेत्रों को बन्द किया ।

ये सुनकर विदुर जी बहुत हँसे …………साथ में उद्धव भी हँसे जा रहे थे …………इसलिये कन्हैया नें अपनें नेत्रों को बन्द किया ।

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – 21



(“श्रीकृष्णचरितामृतम्”- भाग 21 )

!! आई मारन पूतना !!

भैया ! चिन्ता क्यों करते हो तुम्हारी बहन किस दिन काम आएगी !

बृज में जन्म लिया है तुम्हारे काल नें ? मैं मार दूंगी उसे …..मैं भी तो राक्षसी हूँ……समस्त राक्षस विद्याओं की ज्ञाता ।

कंस नें अपनी बहन को बुलवाया था मथुरा में ।

ये सगी बहन नही है ………पर इसमें जो राक्षसी शक्तियाँ थीं उससे प्रभावित होकर ही कंस नें इसे अपनी बहन बना लिया था ।

एक तीर से कई निशानें साधे थे कंस नें………पूतना को मथुरा में क्या लाया कंस ………इसके साथ, इसके अन्य राक्षस भाई भी आगये थे …..वकासुर, अघासुर तृणावर्त………ये सब पूतना के भाई थे ……और सबके सब आसुरी शक्तियों से सम्पन्न थे……..इसलिये तो पूतना को कंस अपनी बहन बनाकर मथुरा में ले आया था ।

तुम मेरे काल को मारोगी कैसे ? कंस नें पूतना की ओर देखकर पूछा ।

भैया ! मैं अपनें स्तनों में काल कूट विष लगाकर जाऊँगी……..और बृज के गाँवों में जहाँ जहाँ बालकों नें अभी जन्म लिया है …..उन सब बालकों को दूध पिलाऊंगी और बालक मर जाएगा……अट्टहास करनें लगी पूतना……भैया ! इस बहन के होते हुये तुम्हे चिन्ता क्यों ?

तो कैसे जाओगी ? किसी यान से ? या आकाश में उड़ते हुए ?

कंस नें पूछा ।

भैया ! बड़े भोले हो तुम ……..मैं कह चुकी हूँ ना ……मैं राक्षसी हूँ……..और राक्षसी विद्याओं में पारंगत हूँ………मैं जल में चल सकती हूँ……..अग्नि में खेल सकती हूँ……..नभ चारिणी हूँ मैं ।

पर ……कंस रुक गया बोलते हुये………पर पूतना ! तुम इतनी भयानक हो……..कि तुम्हे अपनें घर में कोई प्रवेश करनें ही नही देगा …….और प्रवेश मिल भी जाए ……..तो उसके शिशु को तुम दूध पिलाओ ये कौन माँ चाहेगी………तुम तो महाभयानक हो ।

पूतना हँसी…….उसकी हँसी भी सामान्य को भयभीत करनें वाली थी ।

कुछ ही क्षण में पूतना वहाँ से चली गयी…..ये सब एकाएक हुआ था ।

निरपराध शिशु बहुत मारे गए होंगें ना ? उद्धव ! पूतना नें बृज के बहुत शिशु मारे …….ओह ! इन सद्योजातः शिशु का अपराध क्या था ?

बेचारे वे शिशु ! विदुर जी नें उद्धव से कहा ।

उद्धव, विदुर जी के मुखमण्डल की ओर चकित भाव से देखनें लगे थे ।

तात ! ये प्रश्न आपका है ?

विदुर जी बोले …….नही …..ये प्रश्न मेरा नही है ….पर सामान्य जन तो यही सोचेगा ना ?

तात ! यह प्रश्न उन्हीं के मन में उठेगा …..जो जन्म को तो श्रेष्ठ, उत्तम, और आवश्यक मानते हैं……पर मृत्यु को निम्न , निकृष्ट और अनावश्यक समझते हैं……….तात ! क्या जन्म और मृत्यु एक लीला मात्र नही है उस लीलाधारी की……फिर इस बात को इतनी गम्भीरता से क्या लेना ?

माली जानें कि उसे अपना बगीचा कैसे सजाना है !

किस पौधे को रखना है ……..और पौधे के पास में उगे व्यर्थ के घास को उखाड़कर फेंकना है ………..ये माली पर छोड़ दो ना ।

ये संसार हमनें नही बनाना ….ये कन्हैया नें ही बनाया है …….वही इस संसार रूपी वन का माली है……….”वनमाली” जानें ………..

उद्धव नें कहा ।

तुम कौन हो ?

कंस नें उस सुन्दरी को देख, चौंक कर पूछा था ।

एक हाथ लम्बे घूँघट से उसका मुख ऐसा दीख रहा था ….जैसे चन्द्रमा ।

उसकी बेणी कमर तक लटक रही थी……बेणी में फूल लगे थे …..मालती, जूही, माधवी, मल्लिका आदि के फूलों की मालायें गुँथी थीं ।

रेशमी वस्त्र झीना था ….जिसमें से उसका यौवन छन छनकर गिर रहा था…….कमर इतनी पतली थी कि वह लताओं की तरह हिलती दिखाई देती….नितम्ब स्थूल थे…..वह उसके सौन्दर्य को और निखार रहा था ।

तुम कौन हो ? कंस पहचान नही पाया ।

मैं पूतना ! भैया ! आप भी धोखा खा गए तो मुझे कौन पहचानेंगा ।

पूतना ! तू ? इतनी सुन्दर बन गयी ?

अब तुझे कौन रोक सकता है ……..अच्छे घर की लग रही है………तू जिस घर में जायेगी वो अपनें आपको धन्य मानेगा ……तेरा सौन्दर्य ही ऐसा है ………

कंस की बातें सुनकर पूतना बहुत प्रसन्न हुयी थी ………..

वो उड़ चली …….कंस देखता रहा ………कंस को विश्वास हो गया था कि अब उसका ‘काल” बचेगा नही ……जहाँ भी छुपा होगा ये पूतना उसे खोज निकालेगी ।

पूतना इधर उधर जानें की सोच रही थी कि …….गोकुल की धूम उसे दिखाई दी …..नाचते गाते लोग दिखाई दिए ….”बधाई हो …बधाई हो”…… के शब्द गूँज रहे थे नभ में ………

ये कोई विशेष बालक है ……क्यों न इसे ही देखा जाये ……ऐसा विचार कर पूतना गोकुल में ही उतर गयी….और चारों ओर देखने लगी थी ।