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श्री वृन्दावन सतलीला

“श्री वृन्दावन सतलीला”

श्री राधावल्लभो जयति, श्री हित हरिवंशचन्द्रो जयति



सर्वाद्य रसिक जन वन्दित चरणा, रसिक आचार्य शिरोमणि, वंशीवतार श्री श्री हित हरिवंश चंद्र महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय में वाणी साहित्य की प्रचुरता है। रसिक महानुभावों ने निज भाव भावना को सिद्ध कर जिस परम रस का आस्वादन किया, वाणी ग्रन्थ उसी रस का सहज सरल उद्गलन हैं।

इसी परंपरा में रसिक भूषण सन्त श्री ध्रुवदास जी की वाणी श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय का भाष्य ग्रन्थ है। इस वाणी का सर्वाधिक महत्व यह है कि यह स्वयं श्री रास रसेश्वरी, नित्य निकुञ्जेश्वरी प्रिया श्री राधा द्वारा प्रदत्त प्रीति प्रसाद है। अत: यह रस गिरा स्वतः सिद्ध एवं सर्वरसिक जन पोषिणी तो है ही, अनेकानेक रसिक महानुभाव इस वाणी के अनुशीलन द्वारा ही सैद्धान्तिक मर्म को हृदयङ्गम कर उपासना सिद्ध करते आ रहे हैं। अत: यदि कहा जाए कि हित रस तरु को श्री ध्रुवदास जी ने बयालीस लीला के वर्णन द्वारा सुफलित किया है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

इसी ग्रन्थ रुपी भाव मंजूषा में एक अति प्रिय और महामधुर भाव रत्न”श्री वृंदावन सतलीला” है, जिसका पठन एवं श्रवण मात्र सहज रुप से श्री वृंदावन अधिकारिणी का कृपा पात्र बना देता है, स्वयं श्री हित आचार्य महाप्रभु ने श्रीमद् सुधा निधि में कहा है कि :

“क्वासौ राधा निगम पदवी दूरगा कुत्र चासौ,
कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरैकान्तवासः।
क्वाहं तुच्छः परममधमः प्राण्यहो गयकर्मा,
इयत्ता नाम स्फुरति महिमा एष वृन्दावनस्य।।

श्री राधा माधव युगल के मधुरातिमधुर नित्य केलि रस का चिंतन तभी हो सकता है जब सर्वप्रथम सम्यक रूप से श्री वृन्दावन का स्वरूप हृदय में आए और यह स्वयं श्री वृन्दावन की कृपा से ही सम्भव है।

यह हित सौरभ सुवासित वाणी पुष्प रसिक समाज को आनन्दित करे यही श्रीहितमहाप्रभु के श्री चरण कमलों में प्रार्थना है। अभिलाषा है।


“श्री वृन्दावन सतलीला”

श्लोक – 1
प्रथम नाम हरिवंश हित, रट रसना दिन रैन।
प्रीति रीति तब पाइयै, अरु वृंदावन ऐन ॥1॥

श्रीहितध्रुवदास जी कहते हैं – हे जिह्वा ! तू सर्वप्रथम प्रेम मूल श्रीहित हरिवंश नाम ही सतत् रट, इसी परम मधुर नाम का ही गान कर। क्योंकि इस नाम की रटन के फलस्वरूप ही श्री हित युगल की अद्भुत प्रीति रीति और श्री वृंदावन रूपी विश्राम प्राप्त होगा।


श्लोक – 2
चरन सरन हरिवंश की, जब लगि आयौ नाहिं।
नव निकुंज निजु माधुरी, क्यौं परसै मन माहिं।।2।।

जब तक प्रकट प्रेम स्वरूप श्री हरिवंश के श्री चरणों की शरण न ली जाए, तब तक नित्य निकुंज की नित्य नवायमान रस माधुरी को मन स्पर्श भी कैसे कर सकता है अर्थात् नहीं कर सकता।


श्लोक – 3
वृंदावन सत करन कौं, कीन्हौं मन उत्साह।
नवल राधिका कृपा बिनु, कैसे होत निबाह ॥3॥

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि मेरे मन ने ” श्री वृंदावन सत”ग्रंथ रूपी श्री वृन्दावन का गुणगान करने का उत्साह तो किया है परन्तु नवल किशोरी श्री राधिका के कृपा कटाक्ष के बिना कैसे ये आशा पूर्ण हो सकती है।


श्लोक – 4
यह आसा धरि चित्त में, कहत जथा मति मोर।
वृन्दावन सुख रंग कौ, काहु न पायौ ओर ।।4।।

अत: उन्हीं श्री बनराज रानी की कृपा की आशा अपने चित्त में रखकर यथामति श्री वृंदावन की महिमा वर्णन करता हूँ, क्योंकि श्री वृंदावन की माधुरी अनन्त है जिसका आज तक किसी ने ओर छोर नहीं पाया है।


श्लोक – 5
दुर्लभ दुर्घट सबनि कैं, वृन्दावन निजु भौन।
नवल राधिका कृपा बिनु, कहिधौं पावे कौन ।।5।।

यह परम रसमय काव्य श्री वृंदावन जो श्री राधा माधव युगल का निज धाम है, सबसे दुर्लभ और अगम अगोचर है। नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधाकी कृपा बिना कोई कदापि इसे प्राप्त नहीं कर सकता।


श्लोक – 6
सबै अंग गुन हीन हौं, ताको जतन न कोई।
एक किशोरी कृपा तैं, जो कछु होइ सो होई ।।6।।

और मैं तो वैसे ही सब प्रकार से गुणहीन एवं सर्वथा असमर्थ हूँ, करूणा धाम श्री किशोरी जी की कृपा से ही जो होना है सो होगा।


श्लोक – 7
सोऊ कृपा अति सुगम नहिं, ताको कौन उपाय ।
चरन सरन हरिवंश की, सहजहिंबन्यौ बनाव ।।7।।

परन्तु उन श्री किशोरी जी की कृपा प्राप्त करने का भी कौन सा उपाय है, क्योंकि वह कृपा भी तो सहज सुलभ नहीं है। पर श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्री हरिवंश के श्री चरणों की शरण में जाने से यह दुर्लभ कृपा सहज सुलभ हो गई है।


श्लोक – 8
हरिवंश चरन उर धरनि धरि, मन वच कै विश्वास।
कुँवरि कृपा है है तबहि, अरु वृन्दावन वास ।।8।।

अत: यदि मनसा वाचा कर्मणा श्री हरिवंश के शरणागत होकर, अपनी हृदय भूमि पर भाव से उनके चरण युगल धारण करता हूँ। तभी नित्य किशोरी श्री राधा कृपा करेंगी और श्री वृन्दावन वास सुलभ होगा।


श्लोक – 9
प्रिया चरन बल जानि कै, बाढ़यौ हिये हुलास।
तेई उर में आनि हैं, श्री वृन्दा विपिन प्रकाश ।।9।।

प्रिया श्री राधा के श्री चरणों की कृपा एवं सामर्थ्य जानकर मेरे हृदय में हर्षोल्लास बढ़ रहा है कि इन्हीं की कृपा से मेरे हृदय में श्री वृन्दावन का रस रंग प्रकाशित होगा।


श्लोक – 10
कुवारी किसोरी लाडिली, करुनानिधि सुकुमारि।
वरनौं वृन्दा विपिन कौं, तिनके चरन संभारि ।।10।।

करुणाधाम, कृपालु किशोरी कुँवरि श्री राधा प्यारी के श्री चरणों का सप्रेम स्मरण करते हुए श्री वृन्दावन का वर्णन करता हूँ।


श्लोक – 11
हेममई अवनी सहज, रतन खचित बहु रंग।
चित्रित चित्र विचित्र गति, छबि की उठत तरंग।।11।।

श्री वृंदावन की भूमि सहज स्वरुप से ही स्वर्णमयी है जिसमें नाना रंगों के अद्भुत रत्न जड़े हैं। अद्भुत भांति से विलक्षण चित्र चित्रित हैं जिनमें सौंदर्य की तरंगे सतत उठती रहती है।


श्लोक – 12
वृंदावन झलकनि झमकि, फूले नैन निहारि।
रवि ससि दुतिधर जहाँ लगि, ते सब डारे वारि।।12।।

श्री वृन्दावन की यह अनिर्वचनीय कांति एवं शोभा भावपूर्ण नेत्रों से देखने पर अनुभव होता है कि सूर्य चन्द्रमा जैसे जितने भी ज्योति धारक हैं, सब वृन्दावन पर न्योछावर हैं।


श्लोक – 13
वृन्दावन दुतिपत्र की, उपमा कौं कछु नाहिं।
कोटि-कोटि बैकुण्ठ हूँ, तिहि सम कहेन जाहिं।।13।।

श्री वृंदावन के एक पत्ते की शोभा की समता कोटि-कोटि बैकुण्ठ भी नहीं कर सकते। अर्थात् श्री वन का सौंदर्य अनुपम, अतुल्य है।


श्लोक – 14
लता-लता सब कल्पतरु, पारिजात सब फूल।
सहज एक रस रहत हैं, झलकत यमुना कूल।।14।।

यहाँ की एक-एक लता कल्पवृक्ष है, एक-एक पुष्प पारिजात है जो श्री यमुना जी के किनारे सतत एक रस झिलमिलाते रहते हैं, अर्थात् इनकी शोभा कभी मंद नहीं होती।


श्लोक – 15
कुंज-कुंज अति प्रेम सौं, कोटि-कोटि रति मैन।
दिनहिं सँवारत रहत हैं, श्री वृंदावन ऐन ।15। ।

वृंदावन की एक-एक कुंज को कोटि-कोटि रति एवं कामदेव महा प्रेम में भरकर नित्य निरन्तर सजाते-संवारते रहते हैं।


श्लोक – 16
विपिन राज राजत दिनहि, बरषत आनन्द पुंज।
लुब्ध सुगन्ध पराग रस, मधुप करत मधु गुंज।।16।।

सर्वोत्कृष्ट श्री वृंदावन परमानन्द की वर्षा करता हुआ सर्वोपरि विराजमान है जहाँ दिव्य सुगंध एवं पुष्पों के पराग से आकर्षित भ्रमर मधुर-मधुर गुंजार करते रहते हैं।


श्लोक – 17
अरुन नील सित कमल कुल, रहे फूल बहुरंग।
वृन्दावन पहिरे मनौ, बहु विधि वसन सुरंग।।17।।

लाल नीले एवं श्वेत कमलों के समूह एवं नाना प्रकार के पुष्प ऐसे खिले हैं जिन्हें देखकर लगता है मानों श्री वृंदावन ने नाना प्रकार के सुन्दर रंगों के वस्त्र पहन रखे हों।


श्लोक – 18
हित सौं त्रिविध समीर बहै, जैसी रुचि जिहिं काल।
मधुर-मधुर कल कोकिला, कूजत मोर मराल।।18।।

जिस समय श्री प्रिया प्रियतम की जैसी रुचि होती है, वैसी ही शीतल मंद सुगंधित पवन श्री वृंदावन में बहती है। कहीं महा मधुर स्वर में कोयल कूजती है तो कहीं मोर मराल आदि मधुर स्वर करते हैं।


श्लोक – 19
मण्डित जमुना वारि यौं, राजति परम रसाल।
अति सुदेस सोभित मनौं, नील मनिन की माल।।19।।

नील कांति युक्त परम मधुर श्री यमुना जल श्री वृंदावन के चहुँ ओर ऐसे बहता हुआ सुशोभित होता है जैसे नील मणियों की माला।


श्लोक – 20
विपिन धाम आनन्द कौ, चतुरई चित्र ताहि।
मदन केलि सम्पति सदा, तिहि करि पूरन अहि ।।20 ।।

श्री वृंदावन सजाया संवारा है। श्री प्रिया लाल की रस केलि के अनुरुप एवं अनुकूल संपत्ति वहां सदा भरपूर है।


श्लोक – 21
देवी वृन्दाविपिन की, वृन्दा सखी सरूप।
जिहिंविधि रुचि है दुहुँनि की, तिहिं विधि करत अनूप।।21।।

श्री वृंदावन की अधिष्ठात्री वृंदा देवी सखी स्वरूप में होकर जैसी युगल की रुचि होती है वैसी ही वृंदावन कुंजों की रचना करती रहती है।


श्लोक – 22
छिन छिन बन की छवि नई, नवल युगल के हेत।
समुझि बात सब जीय की, सखि वृन्दा सुख देत।।22।।

युगल को प्रसन्न करने के हित प्रशिक्षण वृंदावन का नई-नई भाँति श्रृंगार करती है। उनके हृदय की रुचि भली-भाँति जान सेवा कर वृंदा सखी उन्हें सुख देती है।


श्लोक – 23
गावात वृन्दाविपिन गुन, नवल लाड़ली लाल।
सुखद लता फल फूल दुम, अद्भुत परम रसाल।।23।।

जहां के लता, वृक्ष, पुष्प फल आदि विलक्षण हैं, अद्भुत सुखदायक हैं, सरस हैं, ऐसे वृंदावन के गुणों का स्वयं नवल किशोर लाड़िली लाल भी गाना करते हैं।


श्लोक – 24
उपमा वृंदाविपिन की, कहि धौं दीजै काहि।
अति अभूत अद्भुत सरस, श्री मुख बरनत ताहि।।24।।

स्वयं श्री युगल किशोर जिसकी महिमा का गान कर सुखी होते हैं ऐसे अतुल्य, अनिर्वचनीय, रस स्वरुप श्री वृंदावन की समता किससे की जाए।


श्लोक – 25
आदि अन्त जाकौ नहीं, नित्य सुखद बन आहि ।
माया त्रिगुन प्रपंच की, पवन न परसत ताहि।।25।।

सदा सुख वर्षणकारी अनादि अनंत इस श्री वृंदावन को त्रिगुण का प्रपंच (माया) स्पर्श भी नहीं कर सकता।


श्लोक – 26
वृन्दाविपिन सुहावनौं, रहत एक रस नित्त।
प्रेम सुरंग रँगे तहाँ, एक प्रान द्वै मित्त।।26।।

यह मन भावन श्री वृंदावन अखंड आनंदमय है। जहां अनुराग रंग में रंगे एक प्राण दो मित्र प्रेम क्रीड़ा परायण रहते हैं।


श्लोक – 27
अति सुरूप सुकुवाँर तन, नव किसोर सुखरासी ।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मन्द मृदु हसि। ।27 ।।

जहां परम सुन्दर, अनन्त सुख, रुप, रस की निधि सुकुमार युगल अपनी मृदु मनोहर मुस्कान से सब सखियों को मोहित करते हैं।


श्लोक – 28
न्यारौ है सब लोक तें, वृन्दावन निज गेह।
खेलत लाड़िली लाल जहाँ, भींजे सरस सनेह।।28।।

श्री राधा माधव युगल का निज गृह स्वरुप यह श्री वृंदावन सब लोकों से न्यारा है, सर्वोपरि है, जहां युगल सहज प्रेम में मत्त सतत विहार करते हैं।


श्लोक – 29
गौर-स्याम तन मन रँगे, प्रेम स्वाद रस सार।
निकसत नहिं तिहिं ऐंन ते, अटके सरस बिहार।।29।।

सर्वरसों के सार स्वरुप प्रेम के आस्वादन में ही जिनके तन मन रंग रहे हैं, ऐसे गौर स्याम किसी अद्भुत प्रेम खेल को ही सदा खेलते हुए श्री वृंदावन से बाहर नहीं निकलते।


श्लोक – 30
बन है बाग सुहाग कौ, राख्यौ रस में पागि।
रूप-रंग के फूल दोउ, प्रीति लता रहे लागि।।30।।

परम सौभाग्य स्वरुप इस परम रसमय वृंदावन की माधुरी ने प्रीति लता पर लगे रुप और रंग के दो पुष्पों (श्री श्यामा-श्याम) को भी रस मत्त कर रखा है।


श्लोक – 31
मदन सुधा के रस भरे, फूलि रहे दिन रैन।
चहुँदिसि भ्रमत न तजत छिन, भृंग सखिन के नैंन।।31।।

यह रुप और रंग के मूर्त रुप दो पुष्प (श्री श्यामा-श्याम) प्रेम सुधा रस से भरे दिन रैन प्रफुल्लित ही रहते हैं एवं सखियों के नैन रुपी भ्रमर इन पर सदा मंडराते हुए रुप माधुरी का सतत पान करते हैं।


श्लोक – 32
कानन में रहे झलकि कैं, आनन विवि विधु काँति।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति।।32।।

श्री वृंदावन में हित युगल के मुख चन्द्र की कांति झिलमिलाती ही रहती है जिसे सहज स्नेह मूर्ति सखियां चकोर की भांति निरखि कर अपने मन प्राण शीतल करती है।


श्लोक – 33
ऐसे रस में दिन मगन, नहिं जानत निसि भोर।
वृंदावन में प्रेम की, नदी बहै चहुँ ओर।।33।।

इस प्रकार समस्त हित रसिक परिकर इस अद्भुत प्रेमानन्द में मग्न रहता हुआ काल की । सीमा से परे रहता है और ऐसा लगता है मानो श्री वृंदावन में चारों ओर प्रेम सुधा धारा ही प्रवाहित हो रही है।


श्लोक – 34
महिमा वृन्दा विपिन की, कैसे कै कहि जाय।
ऐसे रसिक किशोर दोऊ, जामें रहे लुभाय।।34।

परम रसिक शिरमौर श्री राधा माधव युगल भी जिसकी माधुरी के लोभी है , ऐसे विलक्षण वृंदावन की महिमा कहना कैसे संभव है ।


श्लोक – 35
विपिन अलौकिक लोक में, अति अभुत रसकंद।
नव किसोर इक वैस दुम, फूले रहत सुछंद ।।35।।

इस लोक में प्रकट होते हुए भी वृंदावन अलौकिक है, परमाद्भुत है, सरस है, जिसमें नवल किशोर दो ऐसे समवयस वृक्षों की भांति सुफलित है, जिनकी फलन सतत वर्द्धमान है।


श्लोक – 36
पत्र-फूल-फल-लता प्रति, रहत रसिक पिय चाहि।
नवल कुँवरि देख छटा जल, तिहिं करिसींचे आहि।।36।।

वृंदावन के पत्र-पुष्प, फल, लता आदि को रसिक सिरमौर प्रियतम निहारते ही रहते हैं क्योंकि इन्हें किशोरी राधिका ने अपने स्नेह जल पूरित दृष्टिपात से सींचा है।


श्लोक – 37
कुँवरि चरन अंकित धरनि, देखत जिहि-जिहिं ठौर।
प्रिया चरन रज जानि कै, लुठत रसिक सिरमौर।।37।।

जहाँ – जहाँ धरती पर प्रिया श्री राधा के श्री चरणों के चिन्ह प्रियतम देखते हैं , वहीं प्राण प्रिया की चरण धूलि जान भाव विह्वल होकर लोटने लगते हैं।


श्लोक – 38
वृंदावन प्यारौ अधिक, यातें प्रेम अपार।
जामें खेलति लाडिली, सर्वस्व प्रान अधार।।38।।

प्रियतम का श्री वृंदावन में अपार प्रेम है, यह प्रीतम को प्राणाधिक प्रिय है क्योंकि इसमें उनकी प्राणाधार, जीवन धन प्रिया श्री राधा सदा क्रीड़ा करती है ।


श्लोक – 39
सबै सखी सब सौंज लै, रँगी जुगल ध्रुव रंग।
समै – समै की जानि रुचि, लियै रहति हैं संग।।39।।

युगल के अविचल प्रेम रंग में रंगी सखियां समय-समय की रूचिनुसार सेवा की सब सामग्री लिये निरन्तर युगल के संग बनी, रहती है।


श्लोक – 40
श्री वृंदावन सतलीला वृंदावन वैभव जितौ, तितौ कह्यौ नहिं जात।
देखत सम्पति विपिन की, कमला हू ललचात।।40।।

श्री वृंदावन की संपत्ति, रस वैभव, जिसे देखकर लक्ष्मी भी ललचा जाती है, वाणी द्वारा उसे कहना असम्भव है।


श्लोक – 41
वृंदावन की लता सम, कोटि कल्पतरु नाहिं।
रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहि माहिं।।41।।

करोड़ों कल्पवृश्च वृंदावन की एक लता की प्रमता नहीं कर सकते। अरे, जहाँ की रज के तुल्य बैकुण्ठ भी नहीं हैं तो अन्य लोकों की चर्चा ही क्या करना?


श्लोक – 42
श्रीपति श्रीमुख कमल कह्मौ, नारद सौं समुझाई।
वृन्दावन रस सबनि तें, राख्यौ दूरि दुराइ।।42।।

रमाकांत भगवान नारायण ने श्री नारद जी से स्वयं कहा है कि मैंने श्री वृंदावन रस सबसे छिपाकर रखा है। यह रस परम रहस्य है।


श्लोक – 43
अंस – कला औतार जे, ते सेवत हैं ताहि।
ऐसे वृन्दाविपिन कौं , मन – वच कै अवगाहि।।43।।

प्रभु के जितने अंश कला अवतार हैं , सब श्री वृंदावन धाम का ही इष्ट भाव से सेवन भजन करते हैं। ऐसे अनन्त महिमावंत श्री वृंदावन का ही सर्वतोभावेन सेवन करना चाहिए।


श्लोक – 44
सिव – विधि – उद्धव सबनि कै, यह आसा रहै चित्त।
गुल्म लता है सिर धरै, वृंदावन रज नित्त।।44।।

शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि के मन में यही आशा रहती है कि हम श्री वृंदावन की कोई लता या वृक्ष होकर श्री वृंदावन रज को नित्य शिरोधार्य कर सकें


श्लोक – 45
चतुरानन देख्यौ कछुक, वृंदाविपिन प्रभाव।
दुम – दुम प्रति अरु लता प्रति, औरे बन्यौ बनाव।।45।।

ब्रह्मा जी ने किंचित श्री वृंदावन के अद्भुत प्रभाव का अनुभव किया और पाया कि यहां तो तरु लता की रचना किसी और ही भाँति की है।


श्लोक – 46
आप सहित सब चतुर्भुज , सब ठाँ रह्यौ निहारि।
प्रभुता अपनी भूलि गयौ , तन मन के रह्यौ हारि।।46।।

ब्रह्मा ने स्वयं सहित, सब ओर जब श्री वृंदावन को निहारा तो सबको ही चतुर्भुज रुप पाया। यहां का वैभव देखकर अपनी प्रभुता तो सर्वथा भूल ही गया, गति मति भी थकित हो गई।


श्लोक – 47
लोक चतुर्दश ठकुरई, सम्पति सकल समेत
सब तजि बसि वृन्दाविपिन, रसिकनि कौ रस खेत।।47।।

अत: यदि एक ओर चौदह भुवनों का वैभव, संपत्ति आदि प्राप्त होता हो तो भी उसे त्याग रसिकों के रस क्षेत्र श्री वृंदावन में ही बसना चाहिए।


श्लोक – 48
सकहि तौ वृंदापिपिन बसि, छिन-छिन आयु बिहात।
ऐसौ समै न पाइहै, भली बनी है बात।।48।।

प्रति क्षण आयु क्षीण हो रही है, अब तो सुंदर सुयोग बना है। अत: कर सको तो श्री वृंदावन वास करो, फिर ऐसा संयोग नहीं बनेगा।


श्लोक – 49
छाँड़ि स्वाद सुख देह के, और जगत की लाज।
मनहिं मारि तन हारि कै, वृंदावन में गाज।।49।।

अत: लोक लाज, देह के सुख स्वादादि का त्याग कर और तन मन से दीन हो वृंदावन में निर्भय होकर रह।


श्लोक – 50
वृन्दावन के बसत ही, अन्तर जो करै आनि।
तिहि सम सत्रु न और कोऊ, मन बच कै यह जानि।।50 ।।

दृढ़तापूर्वक यह जान लो, मान लो कि वृंदावन वास में जो आकर बाधा डाले उसके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है।


श्लोक – 51
वृंदावन के वास कौ, जिनकै नाहिं हुलास।
माता-मित्र-सुतादि-तिय, तजि ध्रुव तिनके पास।।51।।

श्री वृंदावन वास के लिए जिनके मन में उत्साह उल्लास नही है वे चाहे माता-पिता, पुत्र-पत्नी आदि परम स्नेही क्यों न हो, उनका सामीप्य त्याग दो


श्लोक – 52
और देस के बसत ही, अधिक भजन जो होय।
इहि सम नहिं पूजत तऊ, वृन्दावन रहै सोय।।52।।

अन्य देशों में निवास करते हुए चाहे विशाल भजन होता हो परन्तु वह वृंदावन में सोते रहने के समान भी नहीं है।


श्लोक – 53
वृन्दावन में जो कबहूँ, भजन कछू नहिं होय।
रज तौ उड़ि लागै तनहिं, पीवै जमुना तोय।।53।।

श्री वृंदावन में वास करते हुए यदि कुछ भी भजन नहीं होगा तो भी देव मुनि दुर्लभ श्री वृंदावन रज तो उड़कर देह को लगेगी पीने को परम पावन श्री यमुना जल तो मिलेगा ही।


श्लोक – 54
वृन्दाविपिन प्रभाव सुनि, अपनौ ही गुन देत।
जैसे बालक मलिन कौं, मात गोद भर लेत।।54।।

इस वृंदावन का अद्भुत प्रभाव सुनो। यह मलिन जीव को भी युगल प्रेम स्वरुप अपना गुण बिना विचारे प्रदान करता है। जैसे मैले-कुचैले बालक को भी वात्सल्यमयी माता स्नेहवश गोद में भर लेती है।


श्लोक – 55
और ठौर जो जतन करै, होत भजन तऊ नाहिं।
ह्याँ फिरै स्वारथ आपने, भजन गहे फिरै बाँहि।।55।।

श्री वृंदावन से अन्यत्र बहुत प्रयत्न करने पर भी भजन नहीं होता। पर यहां कोई निज स्वार्थ वश भी विचरण करे तो भजन स्वयं उसे पकड़े रहता है।


श्लोक – 56
और देस के बसत ही, घटत भजन की बात।
वृन्दावन में स्वारथौ, उलटि भजन है जात।।56।।

अन्यत्र कहीं बसते ही भजन का उत्साह उल्लास घट जाता है और वृन्दावन की महिमा देखो कि यहां स्वार्थ से की गई क्रिया भी भजन स्वरुप हो जाती है।


श्लोक – 57
यद्यपि सब औगुन भरयौ, तदपि करत तुव ईठ।
हितमय वृन्दाविपिन कौं, कैसे दीजै पीठ।।57।।

यद्यपि मैं सब अवगुणों का भण्डार हूँ, फिर भी हे हितस्वरुप वृंदावन! आपकी इच्छा करता हूँ। आपके स्वभाव को देखते हुए कैसे आपका त्याग कर दूँ।


श्लोक – 58
वृंदावन तें अनत ही, जेतिक द्यौस बिहात।
ते दिन लेखे जिनि लिखौ, वृथा अकारथ जात।।58।।

वृंदावन से अन्यत्र जितने भी दिन बीतें उन्हें गिनना ही नहीं चाहिए क्योंकि वह तो सर्वथा निष्फल ही है।


श्लोक – 59
भजन रसमई विपिन धर, समुझि बसै जो कोई।
प्रेम-बीज तिहिं खेत तें, तब ही अंकुर होई।।59।।

श्री वृंदावन की भूमि भजन रस युक्त है, ऐसा समझ कर जो यहाँ बसता है उसके हृदय में प्रेम बीज निश्चित रुप से अंकुरित होता है।


श्लोक – 60
यद्यपि धावत विषै कौं, भजन गहत बिच पानि।
ऐसे वृन्दाविपिन की, सरन गही ध्रुव आनि।।60।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने ऐसे वृंदावन की शरण ली है जहां चंचल मन यदि विषयों की ओर दौड़ता भी है तो भी भजन बीच में ही हाथ पकड़ सँभाल लेता है अर्थात् रक्षा करता है।


श्लोक – 61
बसिबौ वृन्दाविपिन कौ, जिहि तिहि विधि दृढ़ होई।
नहिं चूकै ऐसौ समौ, जतन कीजिए सोई।।61।।

अत: श्री वृंदावन वास जैसे-तैसे भी दृढ़ हो, निश्चित हो, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। यह अवसर खोना नहीं चाहिए।


श्लोक – 62
कहँ तू कहँ वृन्दाविपिन, आनि बन्यौ भल बान।
यहै बात जिय समुझि कै, आपनौ छोड़ सयान।।62।।

हे मन, कहाँ विषय वासित तू और कहाँ परम सच्चिदानन्दघन वृंदावन। हित कृपा से ऐसा सुन्दर सुयोग बना है। यह बात अच्छी तरह समझ कर अपनी चतुराई छोड़ दे और वृंदावन का सेवन कर।


श्लोक – 63
छिन भंगुर तन जात है, छाँड़हि विषै अलोल।
कौड़ी बदले लेहि तू, अद्भुत रतन अमोल।63।।

क्षण भंगुर यह देह काल के गाल में पड़ी है। अत: विषयों का लोभ त्याग और विषय सुख रुपी कौड़ी को छोड़, और श्री वृंदावन रस रुपी अनमोल रत्न प्राप्त कर।


श्लोक – 64
कोटि-कोटि हीरा रतन, अरु मनि विविध अनेक।
मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक।।64।।

करोड़ों रत्नादिक, विविध मणि रुप जड़ सम्पत्ति का झूठा लोभ त्याग एक श्री वृंदावन को ग्रहण कर।


श्लोक – 65
नहिं सो माता पिता नहिं, मित्र पुत्र कोउ नाहीं।
इनमें जो अन्तर करै, बसत वृन्दावन माँहि।।65।।

वह माता-पिता, मित्र-पुत्र स्वप्न में भी अपने नहीं हैं जो वृंदावन के वास में व्यवधान डालते हैं।


श्लोक – 66
नाते नाते जगत के, ते सब मिथ्या मान।
सत्य नित्य आनन्द मय, वृंदावन पहिचान।।66।।

जगत के जितने भी सम्बन्ध हैं, सबको मिथ्या मान और सच्चिदानन्दमय श्री वृंदावन को ही निज सर्वस्व स्वरुप पहिचान।


श्लोक – 67
बसिकै वृन्दाविपिन में, ऐसी मन में राख।
प्रान तजौं बन ना जौ, कहौ बात कोऊ लाख।।67।।

श्री वृंदावन में वास कर यह धारणा मन में दृढ़ कर लो कि चाहे कोई लाख प्रलोभन दे, मैं प्राण तो त्यागूंगा पर श्री वृंदावन को नहीं।


श्लोक – 68
चलत फिरत सुनियत यहै, (श्री) राधावल्लभ लाल।
ऐसे वृन्दाविपिन में, बसत रहौ सब काल।।68।।

जहां श्री राधावल्लभलाल का नामामृत सहज ही चलते-फिरते श्रवण पुटों में पड़ता रहता है। ऐसे मधुर वृंदावन में सदा वास करना चाहिए।


श्लोक – 69
बसिबौ वृंदाविपिन कौ, यह मन में धरि लेहु।
कीजै ऐसौ नेम दृढ़, या रज में परै देह।।69 ।।

वृंदावन वास की आशा मन में दृढ़ करके धारण कर लो। ऐसा सुदृढ़ व्रत लो कि श्री वृंदावन की रज में ही देह पात हो।


श्लोक – 70
खण्ड-खण्ड है जाइ तन, अंग-अंग सत टूक।
वृंदावन नहिं छाँड़िये, छाँड़िबौ है बड़ चूक ।।70।।

चाहे यह शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाए। एक-एक अंग के सौ-सौ टुकड़े हो जाएं। पर वृंदावन मत छोड़ना। क्योंकि वृंदावन का त्याग ही सबसे बड़ी भूल होगी।


श्लोक – 71
पटतर वृंदाविपिन की, कहिं धौं दीजै काहि।
जेहि बन की ध्रुव रैनु में, मरिबौउ मंगल आहि।।71।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं, वृंदावन की समता किससे की जाए जिसकी रज में मृत्यु भी मंगलमयी है


श्लोक – 72
वृंदावन के गुनन सुनि, हित सों रज में लोट।
जेहि सुख के पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोट।।72।।

श्री वृंदावन के गुण श्रवण कर, प्रेम भाव पूर्वक यहां की रज में लोटो। इस सुख की बराबरी अनंत मुक्ति सुख भी नहीं कर सकते।


श्लोक – 73
सुरपति-पसुपति-प्रजापति, रहे भूल तेहि ठौर।
वृंदावन वैभव कहौ, कौन जानिहै और।।73।।

स्वयं ब्रह्मा, शिव इन्द्रादिक भी जहां का वैभव देख बौरा जाते हैं उस वृंदावन की महिमा, वहां का रस विभु और कौन जान सकता है।


श्लोक – 74
यद्यपि राजत अवनि पर, सबते ऊँचौ आहि।
ताकी सम कहिये कहा, श्रीप्रीति बंदत ताहि।।74।।

धरा धाम पर विराजमान होते हुए भी श्री वृंदावन सर्वोपरि है, जिसकी वंदना स्वयं लक्ष्मी पति करते हैं, उसके समान और कौन हो सकता है।


श्लोक – 75
वृंदावन वृंदाविपिन, वृंदा कानन ऐन।,
छिन-छिन रसना रटौ कर, वृंदावन सुख दैन।।75।।

हे जिह्वे तू हर क्षण “वृंदावन, वृंदाविपिन, वृंदाकानन, सुखद श्री धाम, श्री वन” इन्हीं परम मधुर नामों को रट।


श्लोक – 76
वृंदावन आनन्द घन, तो तन नश्वर आहि।
पशु ज्यों खोवत विषै रस, काहि न चिंतत ताहि।।76।।

तेरा यह तन क्षण भंगुर है। पशु की भांति विषय भोग में इसे खो रहा है। आनन्द घन श्री वृन्दावन का चिंतन क्यों नहीं करता।


श्लोक – 77
वृन्दावन वृन्दा कहत, दुरित वृन्द दुरि जाहिं।
नेह बेलि रस भजन की, तब उपजै मन माहिं।।77।।

वृन्दावन। अरे आधा नाम वृन्दा कहते ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और निर्मल चित्त में रस भजन की प्रेम लता उत्पन्न हो जाती है।


श्लोक – 78
वृन्दावन श्रवनन सुनहि, वृन्दावन कौ गान।
मन वच कै अति हेत सौं, वृन्दावन उर आन।।78।।

अत: कानों से श्री वृन्दावन की महिमा सुन। जिह्वा से श्री वृन्दावन की महिमा का गान कर और प्रीति पूर्वक श्री वृन्दावन को हृदय में धारण कर।


श्लोक – 79
वृन्दावन कौ नाम रट, वृन्दावन कौं देखी ।
वृन्दावन से प्रीत कर, वृन्दावन उर लेखी।।79।।

श्री वृन्दावन का नाम रट, श्री वृन्दावन का दर्शन कर, इसी वन्दावन से स्नेह कर और हृदय में श्री वृन्दावन को ही बसा।


श्लोक – 80
वृन्दाविपिन प्रनाम करि, वृन्दावन सुख खान।
जो चाहत विश्राम ध्रुव, वृन्दावन पहचान।।80।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं सर्व सुखों की खान श्री वृन्दावन की शरण पकड़ इसी की वंदना कर। श्री वृन्दावन को पहचान तभी विश्राम पाएगा।


श्लोक – 81
तजि कै वृन्दाविपिन कौं, और तीर्थ जे जात।
छाँड़ि विमल चिंतामणी, कौड़ी कौं ललचात।।81।।

जो श्री वृन्दावन को छोड़ स्वार्थ सिद्धि के लिए अन्यान्य तीर्थों में भटकते हैं वह मृढ़ मानो निर्मल चिंतामणि को त्याग कौड़ी के लिए ललचाते हैं।


श्लोक – 82
पाइ रतन चीन्हौं नहीं, दीन्हों कर तें डार।
यह माया श्री कृष्ण की, मौह्यौ सब संसार।।82।।

मनुष्य देह जैसा रत्न पाकर भी तू इसे व्यर्थ खो रहा है, अपने ही हाथ से फेंक रहा है। अरे श्री कृष्ण की इसी माया ने तो सारे संसार को मोहित कर रखा है।


श्लोक – 83
प्रगट जगत में जगमगै, वृन्दाविपिन अनूप।
नैन अछत दीसत नहीं, यह माया कौ रूप।।83।।

संसार में प्रकट रुप से अनुपम वृन्दावन झिलमिला रहा है, सुशोभित हो रहा है। फिर भी जीव उस रस स्वरुप का अनुभव नहीं कर पाता यह भी माया का ही रुप है।


श्लोक – 84
वृन्दावन को जस अमल, जिहि पुरान में नाहिं।
ताकी बानी परौ जिनि, कबहूँ श्रवनन माहिं।।84।।

श्री वृन्दावन का त्रिभुवन पावन यश जिस पुराण में नहीं है, उसकी बात कभी मेरे कानों में न पड़े।


श्लोक – 85
वृन्दावन कौ जस सुनत, जिनकै नाहिं हुलास।
तिनके पर न कीजिये, तजि ध्रुव तिनकौ पास।।85।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं, श्री वृन्दावन की महिमा सुन कर के जिन्हें उत्साह नहीं होता, हृदय हर्षित नहीं होता, उनका स्पर्श भी नहीं करना चाहिए। उनका संग त्याग ही देना चाहिये।


श्लोक – 86
भुवन चतुर्दश आदि दै, द्वै है सबकौ नास।
इक छत वृन्दाविपिन घन, सुख कौ सहज निवास।।86।।

चौदह भुवन पर्यन्त सब नाशवान है परन्तु यह एक मात्र श्री वृन्दावन धाम सहज सुख धाम है, अविनाशी है।


श्लोक – 87
वृन्दावन इह विधि बसै, तजि कै सब अभिमान।
तृण ते नीचौ आप कौं, जानै सोई जान।।87।।

जो स्वयं को तिनके से भी नीचा मान, सब प्रकार के अहंकार का त्याग कर श्री वृन्दावन में बसता है वही परम लाभ प्राप्त कर पाता है।


श्लोक – 88
कोमल चित्त सब सौं मिलै, कबहूँ कठोर न होइ।
निस्प्रेही निर्वैरता, ताकौ शत्रु न कोइ।।88।।

जो सब प्रकार की इच्छा एवं राग द्वेष से रहित है उसका कहीं कोई शत्रु नहीं है। इसी भाव से वृन्दावन में वास करे, सबसे विनीत हो कर मिले। चित्त में कठोरता न लावे।


श्लोक – 89
दूजे – तीजे जो जुरै, साख-पत्र कछु आय।
ताही सों संतोष करि, रहै अधिक सुख पाय।।89।।

दूसरे तीसरे दिन अनुमति भाव से जो शाक पत्र प्राप्त हो जाए उसी में संतोष मान, निश्चित हो कर सुख से रहे।


श्लोक – 90
देह स्वाद छुटि जाहिं सब, कछु होइ छीन शरीर ।
प्रेम रंग उर में बढ़े, बिहरै जमुना तीर।।90।

देह के सुख स्वाद विस्मृत हो जाएँ, तन कुछ क्षीण हो जाए, परन्तु हृदय में प्रेम रंग प्रवृद्धमान हो, ऐसी अवस्था में यमुना तट पर विचरण करता रहे।


श्लोक – 91
जुगल रूप की झलक उर, नैननि रहै झलकाइ।
ऐसे सुख के रंग में, राखै मनहिं रँगाइ।।91।।

श्री श्यामा श्याम के दिव्यातिमधुर रूप की झलक नैनों में हो और इसी सुख के रंग में मन भी रंगा रहे।


श्लोक – 92
आवै छबि की झलक उर, झलकै नैनन वारि।
चिंतन स्यामल-गौर तन, सकहि न तनहिं संभारि।।92।।

हृदय में गौर स्याम बसते हों, नैनों से प्रेमाश्रु छलकते हों, परम प्रेमास्पद श्री राधावल्लभलाल का स्मरण करते-करते तन की भी सुधि ना रहे।


श्लोक – 93
जीरन पट अति दीन लट, हिये सरस अनुराग।
विवस सघन बन में फिरै, गावत युगल सुहाग।।93।।

चाहे तन पर फटे पुराने वस्त्र हो, देह क्षीण हो, सर्व विधि दीन हो परन्तु हृदय युगल प्रेम रस से सरोबार हो और इसी प्रेमाधिक्य वश वृन्दावन की करील कुंजों में युगल यश गान करता हुआ विचरण करे।


श्लोक – 94
रसमय देखत फिरै बन, नैनन बन रहै आई।
कहुँ-कहुँ आनँद रंग भरी, परै धरनि थहराइ।।94।।

रसिक उपासक श्री वृन्दावन को रस रुप देखते हुए विचरण करे, नैनों में बन की छवि बसी हो और कभी-कभी प्रेमावेशवश पृथ्वी पर गिरे पड़े ।


श्लोक – 95
ऐसी गति ह्वै है कबहुँ, मुख निसरत नहिं बैन।
देखि-देखि वृन्दाविपिन, भरि-भरि ढ़ारै नैन।।95।।

श्री वृन्दावन की शोभा देख-देख नैनों से प्रेमाश्रु प्रवाहित हो रहे हों, प्रेमाधिक्य के कारण मुख से स्वर न निकले। ऐसी अद्भुत दशा मेरी कब होगी?


श्लोक – 96
वृन्दावन तरु-तरु तरे, ढरै नैन सुख नीर।
चिंतत फिरै आबेस बस, स्यामल-गौर सरीर।।96।।


श्री वृन्दावन के वृक्षों की छाँह तले प्राण धन जीवन सर्वस्व गौर स्याम का चिंतन करता फिरे और नैनों से प्रेमाश्रु डरते हों।

श्लोक – 97
परम सच्चिदानंद घन, वृन्दाविपिन सुदेश ।
जामें कबहूँ होत नहिं, माया काल प्रवेस।।97।।

यह सुन्दरता की सीव वृन्दावन परम सच्चिदानन्दघन स्वरुप हैं। जिसमें कभी माया काल का प्रवेश नहीं होता


श्लोक – 98
सारद जो सत कोटि मिलि, कलपन करें विचार।
वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पावै पार।।98।।

यदि कोटि-कोटि सरस्वती कल्पों तक विचार करें तब भी श्री वृन्दावन की सुख संपत्ति का पार नहीं पा सकती।


श्लोक – 99
वृन्दावन आनन्द घन, सब तें उत्तम आहि।
मोते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि ।।99।।

यह श्री वृन्दावन परमानन्द स्वरुप, सर्वोपरि, सर्वोत्कृष्ट है और इधर मैं पतितों का सिरमौर कैसे इसे प्राप्त कर सकता हूँ।


श्लोक – 100
इत बौना आकाश फल, चाहत है मन माहिं।
ताको एक कृपा बिना, और जतन कछु नाहिं।।100।।

यह तो ऐसा ही है जैसे एक बौना व्यक्ति आकाश में लगे फल की आशा करे। अत: एक मात्र कुंवरि श्री राधा की कृपा के बिना और कोई भी उपाय नहीं है।

श्लोक – 101
कुँवरि किशोरी नाम सौं, उपज्यौ दृढ़ विस्वास।
करुणानिधि मृदु चित्त अति, तातें बढ़ी जिय आस।।101।।

परम उदार श्री राधा के नाम का सुदृढ़ विश्वास मेरे हृदय में उत्पन्न हुआ है और उनकी करुणा एवं हृदय की कोमलता का विचार करके हृदय में आशा बढ़ चली है।


श्लोक – 102
जिनको वृन्दाविपिन है, कृपा तिनहि की होइ।
वृन्दावन में तबहि तौ, रहन पाइ है सोइ।।102।।

श्री वृन्दावन जिनका धाम है उन्हीं की कृपा बल से कोई यहाँ वास कर सकता है अन्यथा नहीं।


श्लोक – 103
वृन्दावन सत रतन की, माला गुही बनाइ।
भाग भाग जाके लिखी, सोई पहिरै आइ।।103।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने श्री वृन्दावन यशरुपी सौ रत्नों की माला गूंथ कर बनाई है। जिसके मस्तक पर इसे धारण करने का सौभाग्य संयोग लिखा होगा सोई इसे धारण करेगा।


श्लोक – 104
वृन्दावन सुख रंग की, आशा जो चित्त होइ।
निसि दिन कंठ धरे रहै, छिन नहिं टारै सोइ।।104।।

अत: जिसे श्री वृन्दावन के सुख रंग की इच्छा हो वह इस माला को सदा धारण किये रहे (अर्थात् सदा इसका गान करता रहे) एक क्षण के लिए भी इस रस का चिंतन न छोड़े।


श्लोक – 105
वृन्दावन सत जो कहै, सुनि है नीकी भाँति।
निसिदिन तेहि उर जगमगै, वृन्दावन की काँति।।105।।

जो कोई इस वृन्दावन शत लीला को भाव से कहेगा अथवा सुनेगा उसके हृदय वृन्दावन का प्रकाश सदा झिलमिलाता रहेगा।


श्लोक – 106
वृन्दावन कौ चितवन, यहै दीप उर बार।
कोटि जन्म के तम अगहि, काटि करै उजियार।।106।।

हृदय में श्री वृन्दावन के चिंतन रुपी दीपक को प्रज्ज्वलित कर। यह कोटि जन्मों की अघ राशि रुप अंधकार का नाश कर प्रेम का प्रकाश करेगा।


श्लोक – 107
बसिकै वृन्दाविपिन में, इतनौ बड़ौ सयान।
जुगल चरण के भजन बिन, निमिष न दीजै जान।।107 ।।

श्री वृन्दावन में वास करके सबसे बड़ी चतुराई यही है कि श्री युगल के चरण कमलों के सुमिरन के बिना एक क्षण भी न जाने पाये।


श्लोक – 108
सहज विराजत एक रस, वृन्दावन निज धाम।
ललितादिक सखियन सहित, क्रीड़त स्यामास्याम।।108।।

श्रीराधावल्लभलाल का निज धाम श्री वृन्दावन अनादि काल से सहज शोभा सहित नित्य विद्यमान है जहाँ अपनी ललितादिक सखियों सहित युगल सदैव केलि परायण हैं।


श्लोक – 109
प्रेमसिंधु वृन्दाविपिन, जाकौ आदि न अन्त ।
जहाँ कलोलत रहत नित, युगल किशोर अनादि।।109 ।।

वृन्दावन दिव्यप्रेम का अगाध अबाध सिंधु है जहाँ अनादि काल से श्री राधावल्लभ युगल किशोर कल्लोल मान है।


श्लोक – 110
न्यारौ चौदह लोक तें, वृन्दावन निज भौन।
तहाँ न कबहूँ लगत है, महा प्रलय की पौन।।110।।

युगल का निज धाम यह श्री वृन्दावन चौदह लोकों से विलक्षण है जिसे महाप्रलय की पवन स्पर्श करने में भी असमर्थ है।


श्लोक – 111
महिमा वृन्दाविपिन की, कहि न सकत मम जीह।
जाके रसना द्वै सहस, तिनहूँ काढ़ी लीह।।111।।

मेरी जिह्वा तो श्री वृन्दावन की महिमा कहने में सर्वथा असमर्थ है। अरे दो सहस्र जिह्वाओं वाले शेष भी जिसे कहते कहते थकित हो जाते हैं, हार ही जाते हैं।


श्लोक – 112
एती मति मोपै कहा, सोभा निधि बनराज।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज।।112।।

शोभा की सींवा श्री वृन्दावन की बात कहने के लिए मुझमें मति कहाँ से आयी? फिर भी निर्लज्ज होकर, धृष्टतापूर्वक ही कुछ कहता हूँ।


श्लोक – 113
मति प्रमान चाहत कह्यौ, सोऊ कहत लजात।
सिन्धु अगम जिहिं पार नहिं, कैसे सीप समात।।113।।

यथामति जो कुछ भी कहा, कहते-कहते संकुचित और लज्जित हो रहा हूँ। जिसका कोई परिवार नहीं ऐसा सिंधु भला सीप में कैसे समा जाए।


श्लोक – 114
या मन के अवलंब हित, कीन्हौं आहि उपाय।
वृन्दावन रस कहन में, मति कबहूँ उरझाय।।114।।

मैंने तो अपने मन को कुछ आधार देने के लिए यह उपाय किया है जिससे श्री वृन्दावन रस का वर्णन करते हुए मन बुद्धि कभी इसमें लग जाएँ।


श्लोक – 115
सोलह सै ध्रुव छयासिया, पून्यौ अगहन मास।
यह प्रबन्ध पूरन भयौ, सुनत होत अघ नास।।115।।

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं संवत सौलह सौ छयासी की मार्गशीर्ष पूर्णिमा को यह “वृन्दावन सत” नामक ग्रंथ पूर्ण हुआ जिसके श्रवण मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है।


श्लोक – 116
दोहा वृन्दाविपिन के, इकसत षोड़श आहि।
जो चाहत रस रीति फल, छिन-छिन ध्रुव अवगाहि।।116।।

श्री वृन्दावन यश के यह एक सौ सोलह दोहे हैं। यदि आप रस रीति का फल चाहते हैं तो प्रतिक्षण इस वृन्दावन महिमा सुधा धारा में अवगाहन करते रहो।


।। इति श्री वृन्दावन सत लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।

“जा पर श्री हरिवंश कृपाला।
ता की बाँह गहे दोऊ लाला।।”

जय जय श्री वृंदावन
जय जय श्री राधे

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भक्त नामावली

हमसों इन साधुन सों पंगति।
जिनको नाम लेत दुःख छूटत, सुख लूटत तिन संगति।।

मुख्य महंत काम रति गणपति, अज महेस नारायण।
सुर नर असुर मुनि पक्षी पशु, जे हरि भक्ति परायण।।

वाल्मीकि नारद अगस्त्य शुक, व्यास सूत कुल हीना।
शबरी स्वपच वशिष्ठ विदुर, विदुरानी प्रेम प्रवीणा।।

गोपी गोप द्रोपदी कुंती, आदि पांडवा ऊधो।
विष्णु स्वामी निम्बार्क माधो, रामानुज मग सूधो।।

लालाचारज धनुरदास, कूरेश भाव रस भीजे।
ज्ञानदेव गुरु शिष्य त्रिलोचन, पटतर को कहि दीजे।।

पदमावती चरण को चारन, कवि जयदेव जसीलौ।
चिंतामणि चिदरूप लखायो, बिल्वमंगलहिं रसिलौ।।

केशवभट्ट श्रीभट्ट नारायण, भट्ट गदाधर भट्टा।
विट्ठलनाथ वल्लभाचारज, ब्रज के गूजरजट्टा।।

नित्यानन्द अद्वैत महाप्रभु, शची सुवन चैतन्या।
भट्ट गोपाल रघुनाथ जीव, अरु मधु गुसांई धन्या।।

रूप सनातन भज वृन्दावन, तजि दारा सुत सम्पत्ति।
व्यासदास हरिवंश गोसाईं, दिन दुलराई दम्पति।।

श्रीस्वामी हरिदास हमारे, विपुल विहारिणी दासी।
नागरि नवल माधुरी वल्लभ, नित्य विहार उपासी।।

तानसेन अकबर करमैति, मीरा करमा बाई।
रत्नावती मीर माधो, रसखान रीति रस गाई।।

अग्रदास नाभादि सखी ये, सबै राम सीता की।
सूर मदनमोहन नरसी अली, तस्कर नवनीता की।।

माधोदास गुसाईं तुलसी, कृष्णदास परमानन्द।
विष्णुपुरी श्रीधर मधुसूदन, पीपा गुरु रामानन्द।।

अलि भगवान् मुरारि रसिक, श्यामानन्द रंका बंका।
रामदास चीधर निष्किंचन, सम्हन भक्त निसंका।।

लाखा अंगद भक्त महाजन, गोविन्द नन्द प्रबोधा।
दास मुरारि प्रेमनिधि विट्ठलदास, मथुरिया योधा।।

लालमती सीता प्रभुता, झाली गोपाली बाई।
सुत विष दियौ पूजि सिलपिल्ले, भक्ति रसीली पाई।।

पृथ्वीराज खेमाल चतुर्भुज, राम रसिक रस रासा।
आसकरण मधुकर जयमल नृप, हरिदास जन दासा।।

सेना धना कबीरा नामा, कूबा सदन कसाई।
बारमुखी रैदास सभा में, सही न श्याम हंसाई।।

चित्रकेतु प्रह्लाद विभीषण, बलि गृह बाजे बावन।
जामवन्त हनुमन्त गीध गुह, किये राम जे पावन।।

प्रीति प्रतीति प्रसाद साधु सों, इन्हें इष्ट गुरु जानो।
तजि ऐश्वर्य मरजाद वेद की, इनके हाथ बिकानौ।।

भूत भविष्य लोक चौदह में, भये होएं हरि प्यारे।
तिन-तिन सों व्यवहार हमारो, अभिमानिन ते न्यारे।।

“भगवतरसिक” रसिक परिकर करि, सादर भोजन पावै।
ऊंचो कुल आचार अनादर, देखि ध्यान नहिं आवै।।

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श्री हित सेवक वाणी : Shree Hit Sevak Vani

।।श्रीहित राधावल्लभो जयति, श्रीहित हरिवंश चन्द्रो जयति।।


श्रीहित जस – विलास
( प्रथम प्रकरण ) पूर्व परिचय –


रसिक आचार्य श्री हित हरिवंश चन्द्र के पश्चात् इस रस का विशद प्रचार किया, श्री दामोदरदास सेवकजी ने। यह सेवकजी कौन थे और उन्होंने कैसे इसका व्यापक प्रचार किया? यह बात पाठकों को सेवकजी के चरित्र में मिलेगी; जो इसी ग्रन्थ में सम्बद्ध है हम यहाँ केवल सेवकजी के ग्रन्थ ‘सेवक वाणी’ की ही चर्चा करेंगे, जिसके आधार पर गोस्वामी हित हरिवंश चन्द्र द्वारा स्थापित-रस मार्ग ‘नित्य-विहार’ की नींव सुदृढ़ हुई और उसका प्रचार भी हुआ। विक्रम संवत १६०९ में दामोदर दास जी गोस्वामी श्री हित हरिवंश चन्द्र के कृपापात्र शिष्य हुए। उन पर वंशी अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु की कृपा हुई और उन्हें इष्ट-तत्व नित्य विहार रस का साक्षात्कार हुआ। तदुपरान्त उनके निर्मल हृदय में दिव्य वाणी का प्रादुर्भाव हुआ यही दिव्य वाणी ‘सेवक-वाणी’ के नाम से प्रख्यात हुई।

‘श्री सेवक वाणी’ एक दिव्य प्रसाद ग्रन्थ है। इसका प्राकट्य सेवकजी- दामोदरदास जी की महा प्रेमोन्मत्त दशा में हुआ है, अत: इसकी भाषा जटिल, क्लिष्ट, असम्बद्ध जैसी और ग्रामीण भाषा मिश्रित है फिर भी इसमें परम तत्व प्रेम का बड़ा विशद वर्णन है। सेवकजी के मत से गोस्वामी श्री हित हरिवंश चन्द्र साक्षात् प्रेम तत्व के अवतार हैं। वे नित्य विहारी श्री राधावल्लभ लाल की प्रेम नादमयी एवं विश्व विमोहनी वंशी के स्वरूप हैं। जिस प्रकार प्रेम व्यापक और एक देशीय है, उसी प्रकार श्रीहरिवंशचन्द्र भी व्यापक प्रेम होते हुए भी व्यास मिश्र के कुल-दीपक हैं। वे प्रिया प्रियतम सखी एवं श्रीवन हैं। वे रस हैं. रस के आधार हैं और रसमय केलि के सूत्रधार एवं स्वयं रस केलि हैं। इसके सिवाय वे चराचर व्यापी प्रेम हैं, उनके सिवाय और कुछ नहीं हैं।

‘सेवक वाणी’ में कुल सोलह प्रकरण हैं। इन प्रकरणों में क्रमश: श्री हरिवंश का यश-विस्तार (अर्थात् वैभव ऐश्वर्य रूप) श्री हरिवंश का रसमय स्वरूप, उनके नाम का प्रताप, उनकी रसमयी वाणी (वचनावली) का प्रभाव, प्रताप उनके स्वरूप का विचार, उनके द्वारा प्रकाशित नित्य-विहार के उपासकों का धर्म-कर्तव्य, रस-रति, अनन्यता, श्रीहरिवंश की कृपा एवं कृपा हीनता के लक्षण; भक्तों के प्रति भाव; युगल की केलि का स्वरूप श्रीहरिवंश का नाम प्रभाव-धाम-ध्यान; श्रीहरिवंश मंगल गान, कच्चे एवं पक्के हित धर्मियों का स्वरूप; उनका कर्तव्य, अलभ्य वस्तु (नित्य विहार दाता श्रीहरिवंश) का लाभ और युगल किशोर के पारस्परिक मान के स्वरूप का वर्णन है। इसके सिवाय इस ग्रन्थ में अनेकों युक्तियों, तकों एवं प्रमाणों के द्वारा प्रेम-धर्म (हित-रीति) को ही सर्वोपरि बताया गया है। सेवकजी ने प्रेम जैसे अनिर्वचनीय विषय का बड़ी कुशलता के साथ केवल सोलह प्रकरणों में विस्तीर्ण एवं समुज्ज्वल वर्णन किया है। प्रेम तत्व की प्राप्ति के विविध साधनों (उपायों) का सप्रभाव वर्णन किया है उन्होंने इसमें। इस विचार से यदि इस ग्रन्थ को थोड़े शब्दों में श्रीराधावल्लभीय सम्प्रदाय का भाष्य ग्रन्थ कह दें तो कोई अत्युक्ति न होगी। जो लोग सेवक वाणी के तत्व एवं सिद्धान्तों से दूर हैं, अनभिज्ञ हैं, श्रीराधावल्लभीय नित्य-विहार रसोपासना मार्ग में ठीक-ठीक रीति से चलने में असमर्थ होंगे, ऐसा विज्ञ रसिक महानुभावों का मत ही नहीं वरं आग्रह है। जो सेवक बानी नहिं जानें। ताकी बात न रसिक प्रमानें ॥ अतएव प्रत्येक रसोपासक के लिये विशेषतया श्रीहित राधावल्लभीय साधक के लिये इस ग्रन्थ का प्रणयन-अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। इसके स्वाध्याय से प्रेम-जिज्ञासु का पथ प्रशस्त होगा।


पद – 1

श्रीहरिवंश – चंद्र सुभ सुभ नाम , सब सुख – सिंधु प्रेम रस धाम ।

जाम घटी बिसरै नहीं ॥

यह जु पस्यौ मोहि सहज सुभाव , श्रीहरिवंश नाम रस चाव ।

नाव सुदृढ़ भव तरन कौं ।

नाम रटत आईं सब सोहि , देहु सुबुद्धि कृपा करि मोहि ।

पोइ सुगुन माला रचौं ।

नित्य सुकंठ जु पहिरौं तासु , जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – ( श्रीहित दामोदर ‘ सेवक जी ‘ कहते हैं ) – अहो ‘ श्रीहरिवंश चन्द्र ‘ यह ऐसा पवित्र नाम है , जो सब सुखों का समुद्र और प्रेम रस का ( एक मात्र ) धाम है , ( इसीलिये मुझे ) यह घड़ी पहर के लिये भी नहीं भूलता । इसका सतत् स्मरण मानों मेरा सहज स्वभाव बन गया है । श्री हरिवंश नाम और श्रीहरिवंश रस के प्रति चाह – चौंप ही सुदृढ़ संसार ( आवागमन ) से पार होने के लिये नौका ( नाव ) है । इस नाम के रटते रहने से वह सब ( नित्य विहार – रस ) हृदय में आ गया किंतु हे श्रीहरिवंश चन्द्र ! अब आप कृपा करके मुझे सुबुद्धि दीजिये , जिससे मैं आपके सद्गुणों की सुन्दर माला पिरोऊँ और उसे सदा अपने कण्ठ में पहिनुँ । हे प्रेमियों ! मैं ( इस प्रकरण में ) श्रीहरिवंश यश का विलास वर्णन करता हूँ और श्रीहरिवंश का ही अंत तक गान करुंगा ।


पद – 2

श्रीवृंदावन वैभव जिती , बरनत बुद्धि प्रमानौं किती ।

तिती सबै हरिवंश की ।

सखी सखा क्यौं कहौं निबेर , तौ मेरे मन की अवसे ।

टेर सकल प्रभुता कहौं ।

हरि हरिवंश भेद नहिं होइ , प्रभु , ईश्वर जानैं सब कोइ ।

दोइ कहैं न अनन्यता ।

विस्वम्भर सब जग आभास , जस बरनौं हरविंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – श्रीवृन्दावन का जितना कुछ वैभव ( विस्तार ) है , वह सब श्रीहरिवंश का ही वैभव – विस्तार है जिसका मैं ( इस ग्रन्थ में ) वर्णन कर रहा हूँ । उसके ( समर्थन में ) कितने क्या प्रमाण दूँ ? नहीं दे सकता । ( वृन्दावन विलास में ) सखी और सखा ऐसे ( भेद पूर्वक ) अलग – अलग करके कैसे कहूँ ? यदि कहूँ तो यह मेरे मन की अज्ञता ही होगी । अत : स्पष्टतया पुकार – पुकार कर कह रहा हूँ कि यह सब प्रभुता ( वृन्दावन – लीला ) उन्हीं की है – उन्हीं का रूप है । हरि और हरिवंश में कोई भेद ही नहीं है । जैसे जो प्रभु ( नाम से ) है , वही ईश्वर है यह सभी जानते हैं । यदि [ इन दो नामों वाली एक वस्तु को अलग – अलग करके द्वैत – बुद्धि से ] दो कह दिया जाय तो अनन्यता ( सर्वत्र एक तत्व का दर्शन ) नहीं है । और भी जैसे जो विश्वम्भर ( अर्थात् सम्पूर्ण विश्व का भरण – पोषण करने वाला विष्णु भगवान् सगुण ब्रह्म ) है , वही सारे संसार में आभासित भी है ( अर्थात् निर्गुण निराकार रूप से व्यापक ब्रह्म भी है । इसी प्रकार श्रीहरिवंश ही सगुण निर्गुण सब रूपों में प्रकाशित हैं । ) अतः मैं उन्हीं सर्व रूप श्रीहरिवंश के यश – विस्तार का एवं उनका वर्णन करूँगा – गान करूँगा ।


पद – 3

जन्म कर्म गुन रूप अपार ,

बाढे कथा कहत विस्तार

बार – बार सुमिरन करौं ।

हौं लघुमति जु अंत नहिं लहौं ,

बुद्धि प्रमान कछू कथि कहौं ।

रहौं सरन हरिवंश की ।

सो धौं कहि मोहि केतिक मती ,

जस बरनत हारै सरसुती ।

तिती सबै हरिवंश की ।

देहु कृपा करि बुद्धि प्रकास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ

भावार्थ – ( श्रीहरिवंश के ) जन्म , कर्म , गुण एवं रूप अनन्त हैं – अपार हैं , सबका विस्तार कहते कथा बढ़ जायगी अतः ( मन – मन केवल ) उनका बारम्बार स्मरण ही कर लेता हूँ , क्योंकि मैं मन्द – बुद्धि हूँ । चूँकि उन सबका छोर – पता नहीं पा सकता फिर भी मैं अपनी ( यथा तथा ) बुद्धि के अनुसार कुछ कहूँगा । और उन्हीं श्रीहरिवंश की शरण में हूँ । भला , कहो तो मेरी ऐसी कितनी बुद्धि जो उनके सम्पूर्ण जन्म , कर्म , गुण , और रूपों का वर्णन कर सके ? जिन का यश वर्णन करते स्वयँ सरस्वती ( वाणी ) भी हारं जाती है । अतएव हे श्री हरिवंश ! कृपा करके आप मेरी बुद्धि में ( अपना स्वरूप ) प्रकाश कीजिये जिससे मैं आपके यश – वैभव का विलास वर्णन कर सकूँ । रसिक जनो ! मैं आद्यन्त श्री हरिवंश का ही गान करूँगा ।

पद – 4

कलिजुग कठिन वेद विधि रही ,

धर्म कहूँ नहिं दीसत सही ।

कही भली कोउ ना करै ।।

उदबस विश्व भयौ सब देस ,

धर्म रहित मेदिनी नरेस ।

म्लेच्छ सकल पुहुमी बढ़े ।

सब जन करहिं आधुनिक धर्म ,

वेद विहित जानैं नहिं कर्म ।

मर्म भक्ति कौ क्यों लहैं ।

बूड़त भव आवै न उसास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।।

भावार्थ – उस समय ( जब श्रीहिताचार्य का प्राकट्य हुआ ) कलियुग में वेदों की रीति – पद्धतियों का पालन कठिन हो गया था । यथोचित – ठीक – ठीक धर्म ( और उसका आचरण ) तो कहीं देखने में भी नहीं आता था । कहीं कोई कही – समझायी भली बातों को करता – मानता ही नहीं था । संसार के सब देश उत्पथ गामी ( कुमार्ग में चलने वाले ) हो गये थे , सम्पूर्ण पृथ्वी और उस पर के नृपति गण भी धर्म से रहित हो गये थे । समस्त पृथ्वी पर म्लेच्छ ही म्लेच्छ बढ़ गये थे । ( उनके संग एवं प्रभाव से ) प्रायः सभी लोग ( वेद – शास्त्रोक्त धर्म को छोड़कर ) तात्कालिक ( लौकिक , भोग – परक , स्वेच्छाचार पूर्ण ) धर्म का आचरण करने लगे थे । जब कोई वेदोक्त कर्म मार्ग को ही नहीं जानते थे , तब फिर वे अज्ञ लोग भक्ति – मार्ग का ही मर्म कैसे पा लेते ? अतएव उस मर्म को न पा सकने के कारण कर्म , ज्ञान एवं भक्ति से हीन रहकर संसार रूप आवागमन समुद्र में डूब उतरा रहे थे , उनसे साँस भी लेते नहीं बनती थी अर्थात् वे संसार – सागर में पड़े हुए थे और अत्यन्त दुखी थे । अस्तु , मैं श्रीहरिवंश – यश का विलास वर्णन करता हूँ और श्रीहरिवंश का ही गान करूँगा , ( जिन्होंने प्रकट होकर अपने प्रेम – ध र्म से समस्त अधर्मों का नाश कर दिया । )

पद – 5

धर्म – रहित जानी सब बदइ दुनी ,

म्लेच्छनि भार दुखित मेदिनी ।

धनी और दूजौ नहीं ।

करी कृपा मन कियौ विचार ,

श्रुतिपथ विमुख दुखित संसार ।

सार वेद – विधि उद्धरी ॥

सब अवतार भक्ति विस्तरी ,

पुनि रस – रीति जगत उद्धरी ।

करयौ धर्म अपनौ प्रगट ।

प्रगटे जानि धर्म को नास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – जब आप ( श्रीहरिवंशचन्द्र ) ने समस्त संसार को धर्म से हीन जाना और उस पृथ्वी को म्लेच्छों के भार से दुखित देखा , जिसके एक मात्र स्वामी आप ही हैं अन्य नहीं । इसी प्रकार सारे विश्व को वेद – पथ से विमुख होकर दुखी होते देखकर आपने अनुग्रह पूर्वक प्रथम तो ( अनेकानेक वेदाचार्यों के रूप में प्रकट होकर ) वेदों की सार रूप पद्धति का प्रकाश किया ; पश्चात् ( भक्तिमार्ग के अनेक आचार्यों के रूप में अवतरित होकर ) प्राय : सभी भगवदावतारों की नवधा – भक्ति का विस्तार – प्रचार किया और ( सबके अन्त में स्वयं प्रकट होकर ) अपने निज धर्म रस – रीति ( महामधुर प्रेमलक्षणा पूर्ण निकुञ्ज – केलि ) का प्रकाश किया । इस तरह जो धर्म का नाश देखकर अपनी कृपा से परवश होकर इस भूतल पर श्रीहरिवंश चन्द्र नाम से प्रकट हुए हैं मैं उन्हीं के प्रेम – विलास का यशोगान करूँगा – केवल उन्हीं का गान करूँगा ।

पद – 6

मथुरा मंडल भूमि आपनी ,

जहाँ बाद प्रगटे जग धनी ।

भनी अवनि वर आप मुख ।

सुभ बासर सुभ रिक्ष विचार ,

माधव मास ग्यास उजियार ।

नारिनु मंगल गाइयो ।

तच्छिन देव दुंदुभी बाजिये ,

जै – जै शब्द सुरनि मिलि किये ।

हिये सिराने सबनि के ।

तारा जननि जनक रिषि व्यास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – मथुरा मण्डल ( या ब्रज मण्डल की ) भूमि जो आपकी अपनी ( नित्य ) भूमि है उसके अन्तर्गत ‘ बाद ‘ नामक ग्राम में सम्पूर्ण विश्व के स्वामी ये श्री हरिवशं चन्द्र प्रकट हुए । इस ब्रज – मण्डल की श्रेष्ठता का गान आपने स्वयं श्री मुख से अन्यत्र किया है । आपका प्राकट्य शुभ दिन , शुभ नक्षत्र , एवं शुभ लग्न – विचार में वैशाख मास की शुक्ल पक्षीय एकादशी को हुआ । तब जन्म के समय नारियों ने मर्गल गान किया और देवताओं ने दुन्दुभियाँ बजायीं और जय – जय – जय के शुभ शब्द उच्चारण किये । आपके जन्म से सबके हृदय को शीतलता – शान्ति मिली । जिनकी माता श्री तारा रानी और पिता ऋषि श्रीव्यास मिश्र हैं , मैं उन श्रीहरिवंश के विलास का यशोगान करता हूँ और अन्त तक उन्हीं का गान करूँगा ।

पद – 7

श्रीभागवत जु शुक उच्चरी ,

तैसी विधि जु व्यास * विस्तरी ।

करी नंद जैसी हुती ॥

घर – घर तोरन बंदनवार ,

घर – घर प्रति चित्रहिं दरबार ।

घर – घर पंच शब्द बाजिये ।

घर – घर दान प्रतिग्रह होइ ,

घर – घर प्रति निर्तत सब कोइ ।

घर – घर मंगल गावहीं ॥

घर – घर प्रति अति होत हुलास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – श्रीशुकदेव जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण में जैसा कुछ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वर्णन किया है और भगवान् वेद – व्यास ने उसे ग्रन्थ रूप में विस्तृत किया लिखा है एवं श्री नन्द राय जी ने जिस तरह वर्णित विषय को प्रत्यक्ष करके दिखाया अर्थात् बड़े उत्साह से श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया । तदवत् ‘ बाद ‘ ग्राम में भी घर – घर मंगल स्तम्भ और बन्दनवार – तोरणे सजायी गयीं । घर – घर में प्रत्येक ने अपने द्वार , दीवारों पर चित्र विचित्र रचना कर हृदय का उल्लास प्रकट किया । वहाँ घर – घर में मंगल – सूचक पञ्च शब्द ( दुन्दुभि आदि ) बजने लगे , प्रत्येक घर में दान दिये जाने लगे और घर – घर प्रति नृत्य गान राग रंग का समारोह प्रगट होने लगा । सब लोग व्यास – सुवन के जन्म के आनन्द में भरकर नाचने लगे । इस प्रकार घर – घर में सब लोग मंगल गाने लगे और बाद ग्राम के घर – घर में आनन्द का उल्लास होने लगा । मैं ऐसे मंगलमय श्रीहरिवंश के विलास का यश – गायन करता हूँ और उन्हीं को गाऊँगा भी ।

पद – 8

निर्जल सजल सरोवर भये ,

उखटे वृक्षनि पल्लव नये ।

दये सकल सुख सबनि कौँ ।

असन सैन सुख नित – नित नये ,

अन्न सुकाल चहूँ दिसि भये ।

गये अशुभ सब विश्व के ।

म्लेच्छ सकल हरि जस विस्तरहिं ,

परम ललित बानी उच्चरहिं ।

करहिं प्रजा पालन सबै ॥

अपनी – अपनी रुचि बस वास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ ( आपके प्रकट होते ही ) बहुत काल के सूखे हुए सरोवर भी जल पूर्ण हो गये , उकठे हुए शुष्क वृक्षों में भी नये – नये पल्लव ( पत्ते ) आ गये । इस तरह मानों सम्पूर्ण विश्व में आनन्द छा गया । सबको अब भोजन , शयन आदि के नित्य – नित्य नये – नये सुख मिलने लगे । सब के लिये सर्वत्र सर्वकाल अन्न सुलभ हो गया- कमी न रही । अधिक क्या , सारे विश्व के मानो अमंगल ही नष्ट हो गये । सभी म्लेच्छ लोग ( अपने अधार्मिक आचरणों को छोड़ कर ) श्रीहरि के यश का विस्तार करने लगे और उनका व्यवहार सरस एवं प्रेममय हो गया , ( मानो उन्होंने भी अपनी स्वाभाव जन्य कठोरता त्याग दी ) और ( दया एवं स्नेह पूर्वक पुत्रवत् अपनी ) प्रजा का पालन करने लगे । प्रजा अपनी अपनी रुचि के आवास स्थानों में ( अब निर्भय रूप से ) रहने लगी । ( जिनके जन्म होते ही यह सब आनन्द मंगल हो गया ) मैं ( उन परम प्रभावशाली ) श्रीहरिवंश का यशोगान करता हूँ और श्री हरिवंश का ही सर्वत्र गान करूँगा ।

पद – 9

चलहिं सकल जन अपने धर्म ,

ब्राह्मन सकल करहिं षट् कर्म ।

भर्म सबनि कौ भाजियौ ।

छूटि गई कलिजुग की रीति ,

नित – नित नव – नव होत समीति ।

प्रीति परस्पर अति बढ़ी ॥

प्रगट होत ऐसी विधि भई ,

सब भव जनित आपदा गई ।

नई – नई रुचि अति बढ़ी ।

सब जन करहिं धर्म अभ्यास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – अब सब लोग अपने अपने धर्म के अनुसार चलने लगे । समस्त ब्राह्मण गण अपने षट् कर्मों को यथावत् करने लगे , लोगों के भ्रम – संशय का निवारण हो गया और कलियुग की रीति ( कलह पाखण्ड आदि ) तिरोहित हो गयीं । सब लोगों में पारस्परिक प्रीति में अभिवृद्धि हुई और नित्य नव – नव प्रेम मैत्री के भाव जागृत हो उठे । आपके प्रकट होते ही कुछ ऐसा हुआ कि जन्म – मरण जन्य आपत्तियाँ संसार से नष्ट हो गयीं और लोगों की धर्म के प्रति अधिकाधिक रुचि होने लगी । सब लोग धर्म का पालन करने लगे । अस्तु , जिनके प्राकट्य मात्र से यह सब होने लगा मैं उन परम कृपामय श्रीहरिवंश के यश – विलास का वर्णन करता हूँ और उनके ही नाम , रूप , गुण , लीला , प्रभाव आदि का वर्णन – गान करूँगा ।

पद – 10

बाल विनोद न बरनत बनहि ,

अपनौ सो उपदेसत मनहि ।

गनहि कवन लीला जिती ।

सब हरि सम गुन , रूप अपार ,

महा पुरुष प्रगटे संसार ।

मार विमोहन तन धरयौ ।

छिन न तृपित सुभ दरसन आस ,

दुलरावत बोलत मृदु हास ।

व्यास मिश्र को लाड़िलौ ॥

मुदित सकल नहिं छाँड़त पास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – आपका बाल विनोद वर्णन करते नहीं बनता मैं ( तो केवल अपने ) मन को समझा रहा हूँ । भला उनकी जितनी लीलाएँ हैं उन्हें कौन गिन सकता है ? आपका रूप और सभी गुण श्रीहरि के गुणों के समान अपार हैं , क्योंकि ( स्वयं भगवान् ही ) महापुरुष ( रूप में ) संसार में प्रकट हुए हैं न ! तभी तो आपने कामदेव को भी मोहित कर देने वाला – मदन मोहन रूप धारण किया है । जिसे देखकर क्षण मात्र के लिये भी तृप्ति नहीं होती । उस पवित्र एवं मंगलमय दर्शन की आशा लालसा लगी ही रहती है । कितना सुन्दर है यह व्यास मिश्र का लाडला जो दुलराते , बोलते – बुलाते एक मीठी हँसी का अमृत सा बरसाता रहता है जिससे सब प्रसन्नता से उसे घेरे ही रहते हैं । उसकी समीपता को छोड़ना ही नहीं चाहते । श्री सेवक जी कहते हैं – रसिको ! मैं ऐसे प्रेमानन्दमय श्रीहरिवंश के यश का विलास वर्णन करता हूँ और उन्हीं सर्वोपरि श्रीहरिवंश का गान करता रहूँगा ।

पद – 11

अब उपदेश भक्ति को कह्यौ ,

जैसी विधि जाके चित रह्यो ।

लह्यौ सु मनवांछित सुफल ।।

सब हरि भक्ति कही समुझाइ ,

जैसी – जैसी जाहि सुहाइ ।

आइ चकल चरननि भजे ।

साधन सकल कहे अविरुद्ध ,

वेद – पुरान सु आगम सुद्धा

बुध – विवेकि जे जानहीं ॥

समुझ्यौ सबनि सु भक्ति उजास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ जिस साधक के चित्त में जिस प्रकार की इष्ट भावना थी आपने उसीके अनुरूप भक्ति का उपदेश दिया जिससे उसने अपने मनचाहा सुन्दर फल ( इष्ट सिद्धि ) प्राप्त कर लिया । इसके पश्चात् जिस – जिसको जैसी – जैसी रीति – पद्धति से प्रीति एवं रुचि थी आपने उसी – उसी प्रकार से उन्हें सम्पूर्णतया भगवद्भक्ति के मार्गों एवं लक्षणों का भेद प्रभेद समझा , इस प्रकार प्रायः सभी ( भक्तों ) ने आ- आकर आपके श्रीचरणों का सेवन किया । आपने वेद – पुराण शास्त्रों से प्रतिपादित शुद्ध ( केवल अनन्य भक्ति के ) साधनों का उपदेश भी किया ; जिन्हें ज्ञानी एवं विवेकी – जन ही जान – समझ सकते हैं । इस तरह जिनकी कृपा से समस्त जगत ने भक्ति के उज्ज्वल प्रकाश ( महत्व , प्रभाव आदि ) को समझा मैं उन्हीं श्रीहरिवंश चन्द्र का यश विलास वर्णन करता हूँ और उन्हीं का गान करता रहूँगा ।

पद – 12

अब अवतार भेद तिन कहे ,

सकल उपासक तिन मन रहे ।

कहे भक्ति साधन सबै ॥

मथुरा नित्य कृष्ण को वास ,

निस दिन स्याम न छाँड़त पास ।

तासु सकल लीला कही ।

कही सबनि की एक रीति ,

श्रवन – कथन सुमिरन परतीति ।

बीति काल सब जाइयौ ॥

उपज्यौ सबनि सुदृढ़ विस्वास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशह गाइ हौं ।

भावार्थ – ( पहले सामान्य भगवद्भक्ति का उपदेश करके ) अब ( विशेष रूप से ) भगवदावतारों का भेद उन ( अवतार उपासकों ) के प्रति कहा ( जो जिन अवतारों के प्रति प्रीति एवं निष्ठावान् थे । ) उस उपदेश को सुनकर उन उपासकों ने अपनी – अपनी इष्ट – निष्ठा दृढ़ की । इन्हें भी भक्ति के ( वे ही ) साधन बताये , ( जो नवधा – भक्ति के क्रम में हैं । ) ( समस्त अवतारों के बीज श्रीकृष्ण – अवतार का निरूपण करते हुए आपने बताया कि ) श्रीकृष्ण नित्य – निरन्तर मथुरा में निवास करते हैं । ये मथुरा – वासी श्यामसुन्दर मथुरा का सामीप्य ( निवास ) कभी छोड़ते ही नहीं । इनकी समस्त लीलाओं का भी वर्णन आपने किया । ( उपासना – साधना क्रम में भगवदावतार , भगवत्तत्व , एवं मथुरा वासी श्रीकृष्ण ) सभी भक्तों के लिये विश्वास पूर्वक गुण – लीला श्रवण , कथन , स्मरण आदि यही साधन एक ही रीति से आपने बताया । ( और यह भी कहा कि ) इस प्रकार नवधा भक्ति करते – करते ही ( जीवन का ) सारा समय व्यतीत होना चाहिये । श्रीसेवक जी कहते हैं कि आपकी इन बातों पर सबका सुदृढ़ विश्वास उत्पन्न हो गया , मैं ऐसे हरिवंश चन्द्र का यश विलास वर्णन और गुण – गान करता हूँ और करूँगा ।

पद – 13

अब जु कही सब ब्रज की रीति ,

जैसी सबनि नंद – सुत प्रीति ।

कीर्ति सकल जग विस्तरी ॥

बाल – चरित्र प्रेम की नींव ,

कहत सुनत सब सुख की सींव ।

जीवन ब्रज – वासिनु सफल ॥

ब्रज की रीति सु अगम अपार ,

विस्तरि कही सकल संसार ।

कारज सबहिनु के भये ॥

ब्रज की प्रीति रीति अनियास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – जैसी सब ब्रज – वासियों की नन्द – नन्दन श्रीकृष्ण पर प्रीति थी और जैसी जो कुछ ब्रज की प्रीति – रीति है , जिसका सुयश सारे विश्व में अभी भी व्याप्त है , वह आपने कही । श्रीकृष्ण के बाल – चरित्र क्या हैं ? प्रेम की नींव ( मूल , बुनियाद ) जो वर्णन – गान कहते सुनते समस्त सुखों की सीमा रूप हैं । वे ( नन्द – किशोर ) श्रीकृष्ण सब ब्रज – वासियों के जीवन के संचित परम फल हैं । ब्रज की प्रीति जो अगम और अपार है , आपने उसका भी विस्तार पूर्वक वर्णन किया , जिससे सब के मनोरथ पूर्ण हो गये । ( आपने बताया कि यह ब्रज की प्रीति – रीति सहज – स्वाभाविक है साधन सिद्धा किंवा सहैतुकी नहीं । मैं ऐसे सर्वज्ञ , भक्ति विधायक श्रीहरिवंश चन्द्र का यशोगान करता हूँ और उन्हीं का वर्णन – गान करूँगा ।

पद – 14

जेहि विधि सकल भक्ति अनुसार ,

तैसी विधि सब कियौ विचार ।

सारासार विवेक कैं ।

अब निजु धर्म आपुनौं कहत ,

तहाँ नित्य वृंदावन रहत ।

बहत प्रेम – सागर जहाँ ।

साधन सकल भक्ति जात नौं ,

निजु निज वैभव प्रगटत आपुनौं ।

भनौं एक रसना कहा ।

श्रीराधा जुग चरन निवास ,

जस बरनौं हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – श्रीहरिवंश चन्द्र ने अभी तक सार एवं असार के विवेक निर्णय के साथ उसी विधि – विधान साधन का विचार किया या उपदेश दिया जिस प्रकार से लोग भक्ति का आचरण कर सकें किन्तु अब इसके आगे अपना निज धर्म ( सहज धर्म ) कहते हैं- ( वह क्या है ? ) जहाँ नित्य वृन्दावन है और जिसमें नित्य प्रेम का समुद्र निरन्तर प्रवाहित रहता – उमड़ता रहता है । जिस तक पहुँचने का प्राथमिक एवं पूर्णतया साधन है भक्ति जन्य नवधा भेद भक्ति । जिससे आप अपने उसी निज – वैभव ( नित्य – विहार रस ) का प्रकाश करते हैं । मैं उस अवर्णनीय रस का अपनी एक जड़ जिह्वा से कैसे वर्णन कर सकता हूँ ? जिस नित्य विहार वैभव की अन्तिम गति परम आह्लादिनि रस रूपा श्रीराधा के युगल चरणों का निवास है । मैं उन्हीं नित्य – विहार तत्व प्रकाशक श्रीहरिवंश चन्द्र के यश विलास का वर्णन करता हूँ और उन्हीं श्रीहरिवंश चन्द्र के नाम , गुण , लीला , माहात्म्य एवं स्वरूप आदि का गान करता रहूँगा ।


श्रीहित रस – विलास
( द्वितीय प्रकरण )
पूर्व परिचय –

यश विलास नामक प्रथम प्रकरण में श्रीहरिवंश चन्द्र के व्यापक स्वरूप ( हित – तत्व ) का वर्णन किया गया और साथ ही उनके जन्म कर्म गुण एवं रूप की अनिर्वचनीयता कही गयी किन्तु फिर भी शाखा – चन्द्र न्याय से उक्त बातों की ओर संकेत भी किया गया । अन्तिम छन्द के पूर्व तक श्री कृष्ण भक्ति , ब्रज रस एवं उसके साधनों का विचार किया गया और अन्तिम छन्द में ” अब निजु धर्म आपुनो कहत ” कह कर नित्य विहार रस के वर्णन – कथन की प्रतिज्ञा की गयी । वही ‘ निजु धर्म ‘ नित्य विहार यहाँ ‘ रस विलास ‘ के नाम से वर्णन किया जायगा । ‘ यश – विलास ‘ नाम से प्रथम प्रकरण का अर्थ पाठकों ने समझ लिया होगा कि वह श्रीहरिवंश के यश वैभव विस्तार का वाचक है , इसी तरह यह दूसरा प्रकरण ‘ रस – विलास ‘ भी अपने नाम की सार्थकता रखता है । इसमें युगल किशोर के नित्य – विहार रस किंवा वृन्दावन रस – विलास के सूत्रों का संकेत है , इसलिये इसे रस विलास कहा गया है । किन्हीं किन्हीं के मत से इसे ‘ हरिवंश विलास ‘ भी कहा जाता है । ठीक भी है क्योंकि श्रीहरिवंश ही तो रस हैं । इस प्रकरण में क्रमश : केलि – विलास का स्वरूप , रस का स्वरूप , रसिकों का स्वरूप , रस – साधना का स्वरूप , रसोपासना का फल , रस की सर्वश्रेष्ठता , रसिकता एवं रस के समक्ष अन्य साधन एवं फलों की हेयता , रसिक चित्त की दृढ़ता और रसिक उपासक की सर्व निरपेक्ष बुद्धि की प्रशंसा आदि विषयों का वर्णन है ।

पद – 1

श्रीहरिवंश नित्य वर केलि ,

बाढ़त सरस प्रेम रस बेलि ।

मेलि कंठ भुज खेलहीं ।

बनितन गन मन अधिक सिरात ,

निरखि – निरखि लोचन न अघात ।

गात गौर – साँवल बनैं ।।

जूथ जूथ जुवतिनु के घनैं ,

मध्य किशोर – किशोरी बनें ।

गनैं कवन रति अति बढ़ी ।

नित – नित लीला नित – नित रास ,

सुनहु रसिक हरिवंश बिलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।।

भावार्थ – श्रीहरिवंश की यह श्रेष्ठ एवं नित्य रस – केलि ( नित्य विहार क्रीड़ा ) प्रतिक्षण सरस है एवं इसमें प्रेम रस रूपी लता नित्य वर्धमान रहती है । ( इस विहार में दोनों प्रिया – प्रियतम ) गल बहियाँ दिये सदा क्रीड़ा – परायण रहते हैं , जिनका दर्शन कर सहचरि – गणों का मन अधिकाधिक शीतल होता रहता है । वे देखती ही रहती हैं , इस विहार को , किन्तु देखते हुए भी उनके नेत्र अतृप्त बने रहते हैं ।

( नृत्य क्रीड़ा के समय की छटा भी बड़ी अपूर्व है । ) गौर – श्याम – तनु युगल किशोर भली प्रकार सुशोभित हैं और सब सहचरियों के मध्य में शोभा पा रहे हैं । युवती – गणों के अनेकानेक यूथ हैं । उस रास में अत्यधिक बढ़ी प्रीति का वर्णन कौन कर सकता है ? हौं ।

श्री सेवक जी कहते हैं- हे रसिकों ! सुनो , मैं श्रीहरिवंश विलास का जो वर्णन करूँगा , उसमें सदा – सदा ऐसा ही रास और सदा – सदा ऐसी ही लीलाएँ हैं अत : मैं ऐसे ही रसमय श्रीहरिवंश का ही गान करूँगा ।

पद – 2

लता भवन सुख शीतल छहाँ ,

श्रीहरिवंश रहत नित जहाँ ।

तहाँ न वैभव आन की ।

जब – जब होत धर्म की हानि ,

तब – तब तनु धरि प्रगटत आनि ।

जानि और दूजौ नहीं ।

जो रस रीति सबनि तें दूरि ,

सो सब विश्व रही भरपूरि ।

मूरि सजीवनि कहि दई ॥

सब जन मुदित करत मन हास ,

सुनहु रसिक हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ॥

भावार्थ – श्रीवृन्दावन के लता – भवन में जहाँ सुखमयी शीतल छाया है वहीं श्री हरिवंश चन्द्र नित्य – निरन्तर निवास करते हैं , वहाँ किसी दूसरे का कोई भी अधिकार या महत्त्व नहीं है , केवल श्री हरिवंश का ही एकमात्र स्वत्व है वहाँ । जब जब इस विश्व में ( रस – रीति रूप आपके निज ) धर्म की हानि – ग्लानि होती है तब – तब यह समझ कर कि ( मेरे सिवाय ) इसका कोई दूसरा रक्षक नहीं है आप मानव शरीर धारण करके प्रकट हो जाते हैं ।

( इस सिद्धान्त से इस समय आपने प्रकट होकर ) वह रस रीति जो सारे विश्व में परिपूर्ण व्याप्त रहकर भी सबसे दूर – अलक्षित थी सबकी सञ्जीवनी उस जड़ी को वर्णन द्वारा ( ग्रन्थों में ) प्रकट कर दिया । जिसे पाकर सब रसिक जन मुदित हो गये सबके मन प्रसन्नता से खिल उठे ऐसा है रसिको ! श्रीहरिवंश का विलास , उसे आप सुनिये मैं उसका गान करूँगा ।

पद – 3

ललितादिक स्यामा अरु स्याम ,

श्रीहरिवंश प्रेम रस धामा ।

नाम प्रगट जग जानिये ॥

श्रीहरिवंश – जनित जहाँ प्रेम ,

तहाँ कहाँ व्रत – संयम – नेम ।

छम सकल सुख संपदा ॥

तहाँ जाति कुल नहीं विचार ,

कौन सु उत्तम कौन गँवार ।

सार भजन हरिवंश कौ ॥

या रस मगन मिटै भव – त्रास ,

सुनहु रसिक हरिवंश – विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ॥

भावार्थ – ललिता , विशाखा आदि सखियाँ , श्यामा – श्रीराधा , श्याम – श्रीकृष्ण और श्रीहरिवंश ये सब प्रेम रस के धाम हैं ( अथवा श्रीहरिवंश प्रेम रस धाम के ललिता विशाखादि , श्यामा और श्याम ये अनेक रूप हैं । ) विश्व में इनके नाम प्रगट हैं । जहाँ श्रीहरिवंश जनित ( अर्थात् श्रीहरिवंश चन्द्र के द्वारा प्रकाशित ) प्रेम प्रकट हो रहा है वहाँ बेचारे व्रत , संयम और नियम कहाँ रह सकते हैं ? अपने आप भाग जाते हैं । वहाँ पूर्ण सुरक्षा ( क्षेम ) है , सम्पूर्ण सुख हैं और सब सम्पत्ति है । वहाँ न जाति विचार है और न कुल का ही । इसी तरह उत्तम कौन है और कौन गँवार है ? यह भी विचार – भेद नहीं ( वरं उस प्रेम राज्य में सब एक ही दृष्टि से केवल प्रेम – दृष्टि से देखे जाते हैं ) क्योंकि यह श्रीहरिवंश के द्वारा प्रकटित भजन सार रूप है ; ( द्वैत बुद्धि से उठा हुआ अद्वैतमय है । ) जो इस रस में मग्न हो जाता है , उसका सांसारिक क्लेश तत्काल मिट जाता है । ( अर्थात् प्रेमी के सामने जन्म – मरण को स्मृति ही कहाँ रह पाती है वह तो प्रेम – प्रवाह में बह जाती है । ) हे रसिक जनो ! आप श्रीहरिवंश – विलास का स्वरूप सुनिये , मैं ऐसे ( रसमय , भव – भीति विस्मारक ) श्रीहरिवंश का ही गान करूँगा ।

पद – 4

श्रीहरिवंश सुजस गाईयो ,

सो रस सब रसिकनि पाईयौ ।

कियौ सुकृत सबको फल्यौ ।

या रस में विधि नहीं निषेध ,

तहाँ न लगन ग्रहन के बेध ।

तहाँ कुदिन दिन कछु नहीं ।

नहिं सुभ – असुभ मान – अपमान ,

नहीं अनृत भ्रम कपट सयान ।

स्नान क्रिया जप – तप नहीं ।

ग्यान ध्यान तहाँ सकल प्रयास ,

सुनहु रसिक हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – श्रीहरिवंश चन्द्र ने ( प्रिया प्रियतम का रस – विलास रूप ) जो सुयश गान किया है उस रस को समस्त रसिक जनों ने प्राप्त किया , मानो उन सबके सुकृतों ( किंवा प्रभु कृपा ) का उन्हें यही फल मिला । इस प्रेम रस में ( वेद – विहित ) विधि और निषेध नहीं है । यहाँ लग्न ( राशि नक्षत्र के योग ) और ग्रहण के वेध आदि के भी दोष नहीं हैं और दिन – कुदिन का भी कोई विचार नहीं है । यहाँ शुभ अशुभ , मान – अपमान , असत्य , भ्रम , कपट चतुराई आदि कुछ नहीं है । और तो क्या इस रस ( उपासना ) में स्नान , क्रिया ( कर्म काण्ड , सन्ध्या – तर्पण आदि ) जप , तप आदि किसी विषय की न तो महत्ता है और न आवश्यकता ही । यहाँ ज्ञान ( वेदान्त ज्ञान ) और ध्यान ( अष्टाङ्ग योग ध्यान धारणा ) केवल श्रम हैं – अतः व्यर्थ हैं ।

हे रसिको ! आप श्री हरिवंश विलास का श्रवण करें मैं इन्हीं प्रेम रस प्रकाशक विधि निषेधातीत श्रीहरिवंश का गान करूँगा ।

पद – 5

जहाँ श्रीहरिवंश प्रेम – उन्माद ,

तहाँ कहाँ स्वारथ निस्वाद ।

वाद – विवाद तहाँ नहीं ।

जे श्रीहरिवंश – नाद मोहिये ,

तिन फिर बहुरि न कुल – क्रम किये ।

जिये काल बस ना परे ।।

कुल बिनु कहौ कौन सौ चाक ,

सहज प्रेम रस साँचे पाक ।

रंक – ईश समुझत नहीं ।।

विप्र न शूद्र कौन कुल कास ,

सुनहु रसिक हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – जहाँ ( जिस हृदय में ) श्रीहरिवंश – चन्द्र की कृपा से उदय हुआ प्रेमोन्माद है , वहाँ स्वादहीन – नीरस स्वार्थ कैसे रह सकता है ? वहाँ वाद – विवाद भी नहीं रह सकता है । जो लोग श्री हरिवंश ( श्री हरि की वंशी ) के मधुर स्वर में मोहित हुए फिर उन्होंने कभी कुल कर्म ( लोक वेद धर्म ) तो किये ही नहीं । वास्तव में वे ही जीवित रहे ( जीवन युक्त हैं शेष मृतवत् हैं । ) वे कभी काल के वश में नहीं हुए , ( काल पर भी विजय पा गये । ) जो लोग सहज प्रेम रस में सच्चे एवं परिपक्व हैं वे ईश्वर को भी तो कुछ नहीं समझते फिर कुल ( कर्म ) के बिना उनका बिगड़ता ही क्या है । बेचारा कुल कर्म का चक्र है ही क्या उनके लिये ? ऐसे प्रेमी रसिकों के लिये ने कोई विप्र है न शूद्र । ( उनकी दृष्टि एक रसमयी हो चुकी है । ) उनके लिये कौन किस कुल का ? इस बात का विचार ही नहीं । ( सब एक सा है ) हे रसिको ! सुनिये ; मैं ( ऐसे प्रेम – स्वरूप ) श्री हरिवंश का विलास गा रहा हूँ और उसे ही गाता रहूँगा ।

पद – 6

या रस विमुख करत आचार ,

प्रेम बिना जु सबै कृत आर ।

भार धरत कत विप्र कौ ॥

श्रीहरिवंश किसोर अहीर ,

अरु तिन संग बनितन की भीर ।

तीर जमुन नित खेलहीं ॥

तिनकी दई जु जूठन खात ,

आचारी निज कहत खिस्यात ।

बात यहै साँची सदा ॥

श्रीहरिवंश कहत नित जास ,

सुनहु रसिक हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – यदि कोई व्यक्ति इस प्रेम रस से विमुख हो कर आचार ( बहुत सी पवित्रताएँ ) भी करता है , तो उसके सभी कार्य प्रेम से रहित होने के कारण ‘ आर ‘ ( लोहे की वह नोंक जो बैलों के चूतड़ों में कोंची जाती है ) के समान हैं और वह केवल आचारी पुरुष व्यर्थ ही ब्राह्मणत्व के भार को ढो रहा है । श्रीहरिवंश किशोर ( अर्थात् आपके आराध्य तत्व श्रीराधावल्लभ लाल ) तो अहीर ( किशोर ) हैं जिनके साथ नित्य – निरन्तर कोटि – कोटि वनिताओं की अपार भीड़ रही आती है और ये सब यमुना के पुलिन पर सदा क्रीड़ा परायण रहते हैं ।

प्रेमीगण इन्हीं अहीर किशोर की प्राप्त गूंठन प्रसादी पाते हैं ( और जात्याभिमान से दूर रहते हैं । ) यदि उन्हें कोई आचारी कह दे ( तो उसे अपना अपमान समझकर ) खिसया उठते हैं और है भी यही बात सच्ची- त्रिकाल सच्ची । ( प्रश्न होता है कि ये लोग ऐसा क्यों करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि ) श्री हरिवंश चन्द्र ही तो इस बात को सदा कहते हैं ।

अतएव हे रसिक जनो ! आप श्री हरिवंश का विलास – रस सुनें ; मैं ऐसे अनुपम मार्ग – प्रदर्शक श्रीहित हरिवंश चन्द्र का गान करूँगा ।

पद – 7

निसि – दिन कहत पुकारि – पुकारि ,

स्तुति करहु देहु कोउ गारि ।

हार न अपनी मानिहौं ।

श्रीहरिवंश – चरन नहिं तजौं ,

अरु तिनके भजतिन कौं भजौं ।

लजौं नहीं अति निडर है ।

श्रीहरिवंश नाम बल लहौं ,

अपने मन भाई सब कहौं ।

रहौं शरन हरिवंश की ।

कहत न बनत प्रेम उज्जास ,

सुनहु रसिक हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – ( श्री सेवकजी कहते हैं- ) मैं तो रात दिन पुकार – पुकार कर कहता हूँ और कहूँगा , फिर चाहे कोई मेरी स्तुति करे या गाली ही क्यों न दे पर मैं अपनी हार किसी प्रकार नहीं मानूँगा । श्रीहरिवंश के चरणों को नहीं छोडूंगा और उनका भजन करने वाले भक्तों ( किंवा उनके भजनीय श्री राधावल्लभलाल ) का ही मैं भजन ( सेवन ) करूँगा । मैं इसमें न तो लजाता हूँ और न डरता ही वरं पूर्ण निडर हूँ । मैं श्री हरिवंश नाम का बल प्राप्त करके यह सब अपनी मन भायी बातें कह रहा हूँ और रहता भी हूँ सदैव उन्हीं की शरण में । इन चरणों की शरण में मुझे जो प्राप्त है , उस प्रेम की उज्वलता कहते नहीं बनती । हे रसिको ! श्री हरिवंश का विलास सुनो , मैं ऐसे ( निर्भयकारी ) श्रीहरिवंश का ही गान करूँगा ।

पद – 8

जे हरिवंश प्रेम – रस झिले ,

क्यौं सोहैं लोगनि में मिले ।

गिल्यौ काल जग देखिये ॥

कर्म सकाम न कबहूँ करें ,

स्वर्ग न इच्छै नर्क न डरें ।

धरै धर्म हरिवंश कौ ॥

श्रीहरिवंश धर्म निर्बहैं ,

श्रीहरिवंश प्रेम लहैं ।

ते सब श्रीहरिवंश के ।

‘ सेवक ‘ तिन दासनि कौ दास ,

सुनहु रसिक हरिवंश विलास ।

श्री हरिवंशहि गाइ हौं ।

भावार्थ – जो कृपापात्र जन श्रीहरिवंश चन्द्र के द्वारा प्रकाशित प्रेम रस से परिपूर्ण हो चुके हैं , वे भला जन साधारण में मिले हुए कैसे शोभा पा सकते हैं ? वे विश्व को काल कवलित देखा करते हैं ।

[ यहाँ तक प्रेम धर्म का वर्णन करके अब संक्षेपतः प्रेमियों के लिये साधन रूप से कुछ आवश्यक सूत्र बताते हैं कि- ] वह कभी भी सकाम कर्म न करे । न तो स्वर्ग की इच्छा करे और न नरकों से डरे ही । श्रीहरिवंश – धर्म को ही सदा धारण किये रहे और इसी का निवाह करे तो अवश्य श्रीहरिवंश रस ( प्रेम ) को प्राप्त कर लेगा । ( जो इस प्रकार से श्रीहरिवंश धर्म को धारण करते हैं ) वे निश्चित ही श्रीहरिवंश के निज जन हैं । ‘ सेवक ‘ ऐसे श्री हरिवंश – दासों का दास है । कितना महान् है यह धर्म ? अतः हे रसिको ! आप श्री हरिवंश का रस – विलास सुनें – आदर और प्रेम पूर्वक सुनें । मैं ऐसे लोक – विलक्षण प्रेमावतार श्रीहित हरिवंश का ही गान करूँगा ।


श्रीहित नाम प्रताप
( तृतीय प्रकरण )
पूर्व परिचय –

पहले एवं दूसरे प्रकरण में क्रमश : श्रीहरिवंश यश ( व्यापकत्व ) और रस – विलास का वर्णन किया गया । अब तीसरे प्रकरण में प्रथम श्रीहरिवंश नाम के स्मरण पूर्वक मंगलानुशासन करके रस – मार्ग की साधना का उपदेश करते हैं कि यदि कोई महाभाग्यवान् जीव उस दिव्य प्रेम रस का पान करने की अभिलाषा करता हो तो उसका क्या धर्म है ? उसे अपने साधन काल में किस क्रम से अपनी उपासना – साधना प्रारम्भ करनी चाहिये ? कोई पूछ सकता है कि प्रेम तो साधन – साध्य नहीं बल्कि कृपा – साध्य है ; फिर उसके लिये श्रीसेवक जी कैसे साधनों का विधान कर सकते हैं ? तो संक्षेप में इतना ही कथन पर्याप्त होगा कि वे प्रेम – प्राप्ति के साधनों के जो स्वरूप बता रहे हैं वे साधन भी प्रेम रूप हैं और प्रेम प्राप्ति के पूर्व , नियमों का पालन आवश्यक है क्योंकि प्रेम का महल नियमों की खाई के भीतर है किन्तु वे नियम भी प्रेम रूप हैं । नियमों के पालन के उपरान्त ही कोई उसे समझ सकता है । स्वेच्छाचारी व्यक्ति उस प्रेम के स्वरूप को कभी नहीं समझ सकता । खेत , बोने के पहले जोत कर साफ किया जाता है , तब उसमें बीज डाला जाता है तो वह ऊगता भी है । झाड़ – झंखाड़ युक्त खेत में बिना जोते ही बो देने से बीज तो व्यर्थ जाता ही है श्रम भी व्यर्थ जाता है ।

इसी प्रकार यहाँ श्रीसेवक जी ने साधन प्रेम के नियमों का विधान करके मानो चित्त भूमि को जोत कर तैयार किया है ।

पद – 1

श्रीहरिवंश नाम नित कहौं ,

नाम प्रताप नाम फल लहौं ।

नाम हमारी गति सदा ॥

जे सेवै हरिवंश सु नाम ,

पावै तिन चरननि विश्राम ।

नाम रटन संतत करें ॥

नाम प्रसंग कहत उपदेस ,

जहाँ यह धर्म धन्य सो देस ।

धन्य सु कुल जिहि जन्म भयौ ॥

धन्य सु तात धन्य सो माइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ॥

भावार्थ – ( श्रीसेवक जी कहते हैं कि मैं ) सदा सर्वदा श्रीहरिवंश कहा करूँ और इस नाम के प्रताप से नाम ही फल प्राप्त करूँ क्योंकि नाम ही सदा हमारी गति है । जो लोग श्रीहरिवंश इस सुन्दर नाम का सेवन करते हैं , वे उन्हीं ( श्रीहरिवंश ) के चरणों में विश्राम ( स्थान ) पाते हैं और निरन्तर इसी नाम को रटा करते हैं ।

यहाँ नाम प्रसंगवश ही यह बात विशेष कह रहा हूँ कि जहाँ यह ( श्रीहरिवंश ) धर्म है , वह देश धन्य है । जिस कुल में इस धर्म के पालन करने वाले का जन्म हुआ वह कुल भी धन्य है । वह पिता , वह माता धन्य है , ( जिन्होंने उसे जन्म दिया । )

भाइयो ! सब लोग चित्त देकर सदा ही श्रीहरिवंश – प्रताप – यश का श्रवण करो ।

पद – 2

प्रथम हृदै श्रद्धा श्रद्धा जो करै ,

आचारजनि* जाइ अनुसरै ।

जहाँ – जहाँ हरिवंश के ॥

रसिकनि की सेवा जब होइ ,

प्रीति सहित बूझहु सब कोइ ।

कौन धर्म हरिवंश कौ ॥

कौन सु रीति कौन आचरन ,

कौन सुकृत जिहिं पावै शरन ।

क्यौं हरिवंश कृपा करें ॥

तब सब धर्म कह्यौ समुझाइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ॥

भावार्थ – ( यदि प्रभु कृपा से किसी के ) हृदय में ( इस धर्म के प्रति ) श्रद्धा का प्राथमिक उदय हो , तो वह जाकर श्रीआचार्य चरणों का अनुसरण करे । कौन से आचार्य ? श्रीहरिवंशचन्द्र के ( धर्मधारक एवं गोत्रज ) ; कहाँ पावे उन्हें ? जहाँ कहीं भी मिलें वे ; उन्हीं की शरण ले । जब उन आचार्यों – रसिकों की सेवा से उन्हें पूर्ण प्रसन्न करले तब उनसे प्रीति – पूर्वक पूछे कि श्रीहरिवंश का धर्म क्या है ? उस धर्म की रीतियाँ हैं क्या ? उनका आचरण कैसे किया जाय ? वह कौन – सा सत्कार्य है जिससे श्रीहरिवंश की चरण – शरण मिलती है ? और हम पर श्रीहरिवंश कैसे कृपा करेंगे ?

श्रद्धालु के इतना पूछने पर वे कृपालु रसिक आचार्य गण धर्म का पूर्ण स्वरूप समझा कर कहेंगे , उसे आप सब लोग भी चित्त लगाकर श्रवण कीजिये वह श्रीहरिवंश का प्रताप – यश ही तो है ।

पद – 3

प्रथमहिं सेवहु गुरु के चरन ,

जिन यह धर्म कह्यौ सब करन ।

नाम – प्रताप बताइयो ।।

जो श्री हरिवंश नाम अनुसरहु ,

निशिदिन गुरु को सेवन करहु ।

सकल समर्पन प्रान – धन ।।

गुरु – सेवा तजि करहिं जे बानि ,

यहै अधर्म यहै सब हानि ।

कानि न रसिकनि में रहै ।।

गुरु – गोविन्द न भेद कराइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश – प्रताप जस ।।

भावार्थ – ( इस प्रकार पूर्व कथित रीति से ) सर्व प्रथम श्रीगुरु चरणों का सेवन करो जिन्होंने इस ( हित ) धर्म के पालन करने के लिये आज्ञा दी और जिन्होंने नाम का प्रताप बताया है । यदि तुम वास्तव में श्रीहरिवंश नाम का अनुसरण ( आश्रय ) कर रहे हो तो तुम्हें चाहिये कि अपने प्राण , धन और सर्वस्व के समर्पण पूर्वक दिन रात श्रीगुरुदेव का ही सेवन करो । जो लोग श्री गुरु – सेवा को छोड़कर अन्य साधनों में मन लगाते हैं , यही उनका अधर्म और बड़ी भारी हानि है । ऐसे हठशील अधर्मी की रसिकों में कोई प्रतिष्ठा या मर्यादा मान नहीं रह पाता । अतएव सच्चे उपासक का धर्म है कि वह श्री गुरुदेव एवं गोविन्द में कोई भेद न देखे न करे ।

श्रीसेवक जी कहते हैं- रसिको । आप निरन्तर चित्त लगाकर श्रीहरिवंश का प्रताप – यश सुनिये ।

पद – 4

गुरु – उपदेश सुनहु सब धर्म ,

श्रीहरिवंश – नाम फल-मर्म ।

भर्म भग्यौ बचननि सुनत ॥

सुक मुख – वचन जु श्रवन सुनावहु ,

तब श्रीहरिवंश सु नाम कहावहु ।

मन सुमिरन बिसरै नहीं ॥

हरि , गुरु , चरन , सेवा अनुसरहु,

अर्चन – बंदन संतत करहु ।

दासंतनि करि सुख लहौ ॥

सख्य समर्पन भक्ति बढ़ाइ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ॥

भावार्थ – श्रीगुरुदेव के उपदेश से सम्पूर्ण धर्म का श्रवण करो , जिसका मर्म अर्थात् रहस्य श्रीहरिवंश नाम ही है । श्रीगुरु के प्रकाशमय वचनों को सुनते ही तुम्हारा भ्रमरूपी अज्ञान – अन्धकार भाग जायगा ।

पहले जब श्रीशुकदेव जी के श्रीमुख – वचन ( श्रीमद्भागवत पुराण ) तुम्हारे द्वारा सुने जायेंगे , तब तुम्हें ( सारासार विवेक होकर ) श्रीहरिवंश नाम में निष्ठा होगी तुम उस नाम को कह सकोगे । ( यदि इस प्रकार क्रम से तुम चल सके तो फिर तुम्हारा ) मन ( उन श्रीहरिवंश के ) स्मरण को कभी भूलेगा ही नहीं । फिर भी तुम साथ – साथ श्रीहरि ( राधावल्लभ लाल ) और श्रीगुरु के चरणों की सेवा का अनुसरण ही निरन्तर उनके प्रति अर्चन और वन्दन करते रहना एवं उनकी सेवा आदि करके दास्य सुख प्राप्त करना । पश्चात् नवधा क्रम से सख्य और अन्तिम आत्म – समर्पण पूर्वक सेवन करने से भक्ति अभिवृद्धि को प्राप्त होती है । श्रीहरिवंश प्रताप – यश की प्राप्ति का यही पथ है , उसे सब लोग चित्त लगाकर सुनिये ।

पद – 5

गुरु-उपदेश चलहु एहिं चाल ,

ऐसी भक्ति करै बहु काल ।

ये नव लच्छन भक्ति के ॥

यह हरि-भक्ति करै जब कोई ,

तब श्री हरिवंश नाम रति होइ ।

यह जो बहुत हरि की कृपा ॥

हरि-हरिवंश भेद नहिं करै ,

श्री हरिवंश नाम उच्च ।

छिन-छिन प्रति बिसरै नाहीं ॥

प्रीति सहित यह नाम कहाइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश-प्रताप जस ॥

भावार्थ – श्रीगुरुदेव द्वारा उपदेश की गयी पद्धति का अनुसरण करते हुए बहुत काल तक भक्ति करता रहे। यदि कोई ऐसी नवधा भक्ति करता रहेगा, तो अवश्य उसकी श्री हरिवंश नाम में निष्ठा हो जायगी, यह श्रीहरि की बहुत बड़ी कृपा है। साधक को चाहिये कि वह हरि और हरिवंश में भेद बुद्धि न करके प्रतिक्षण हरिवंश नाम का ही उच्चारण करता रहे; इसका विस्मरण न करे- इसे भूले नहीं वरं प्रीति पूर्वक इस नाम को लिया ही करे। रसिको ! श्री हरिवंश का यह प्रताप यश चित्त लगाकर सुनो।

पद – 6

गुरु-उपदेश चलहु एहि रीति ,

श्री हरिवंश-नाम-पद-प्रीति ।

प्रेम मूल यह नाम है ॥

प्रेमी रसिक जपत यह नाम ,

प्रेम मगन निजु बन विश्राम ।

श्री हरिवंश जहाँ रहैं ॥

प्रेम प्रवाह परै जन सोइ ,

तब क्यौं लोक-वेद-सुधि होइ ।

जब श्रीहरिवंश कृपा करी ॥

व्रत-संयम तब कौन कराइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ॥

भावार्थ – यदि श्रीगुरुदेव के उपदेश के अनुसार इस (पर कही गयी नवधा-भक्ति एवं हरिवंश नाम-स्मरण की) रीति से चलोगे तो श्रीहरिवंश नाम और चरणों में प्रीति हो जायगी, क्योंकि यह (हरिवंश) नाम प्रेम का उद्गम स्थल है। प्रेमी रसिक जन इस नाम को जपते हैं और इस नाम के प्रताप से प्रेम मग्न हुए श्रीहरिवंश के निज-वन (ऐकान्तिक केलि भूमि श्रीवृन्दावन) में अचल विश्राम पा रहे हैं जहाँ निरन्तर श्रीहरिवंश रहते हैं। इस नाम का जाप जब प्रेम के प्रवाह में पड़ जायगा तो भला उसे लोक एवं वेद की मर्यादाओं की सुधि कैसे हो सकती है? जबकि उस पर स्वयं प्रेम रूप श्री हरिवंश ने कृपा की है, तब व्रत और संयम कौन कर सकता है? (अर्थात् प्रेमी तो केवल अपने प्रभु के रूप में तल्लीन हो जाता है, उसे फिर बाह्य आचारों और मर्यादाओं की खबर तक नहीं रह जाती।) हे रसिया! यह है श्रीहरिवंश का प्रताप-यश, आप चित्त देकर इसका श्रवण करें।

पद – 7

जब यह नाम हृदै आइ है ,

तब सब सुख-संपति पाइ है ।

श्रीहरिवंश सुजस कहै ।।

अरु अपनी प्रभुता नहिं सहै ,

तृन ते नीच अपनपौ कहै ।

सुभ अरु असुभ न जानही ।।

समुझै नहीं कछू कुल-कर्म ,

सूधौ चलै आपने धर्म ।

रसिकनि सौं प्रीतम कहै ।।

कबहुँ काल वृथा नहिं जाइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ।।

भावार्थ – जब यह (श्री हरिवंश) नाम (साधक के) हृदय में आवेगा, तभी वह सब सुख और सम्पत्ति (प्रेमरूपी धन) प्राप्त करेगा और हरिवंश के पवित्र यश का गान करेगा। वह अपने आपको तृण से तुच्छ मानेगा अर्थात् उसका स्वाभिमान् होगी ‘लघुता’। वह अपने बड़प्पन का भार नहीं सह सकेगा; उसे शुभ एवं अशुभ दोनों से उपरामता हो जायगी। वह (प्रेम की इस उन्मत्त दशा में) कुलोचित आचार-विचार रूप कर्मों को भी नहीं समझना चाहेगा, वह तो सीधे सरल ढंग से अपने (अनन्य हित) धर्म का पालन करेगा। वह रसिकजनों को प्रिय-तम (इष्टवत् परम प्रिय) भाव से देखेगा, यही समझेगा और कहेगा ऐसे रस मग्न प्रेमी हित-धर्मी का एक क्षण भी कभी व्यर्थ नहीं जाता, क्योंकि वह सदा अपने भाव में विभोर है।सेवकजी कहते हैं- भाइयो ! चित्त लगाकर ऐसे महिमाशाली श्रीहरिवंश के प्रताप यश का श्रवण करो।

पद – 8

जब हरिवंश नाम जानि है ,

तब सब ही तें लघु मानि है ।

हँसी बोलै बहु मान दै ॥

तरु सम सहन शीलता होइ ,

परम उदार कहें सब कोइ ।

सोच न मन कबहूँ करै ॥

श्रीहरिवंश सुजस मन रहै ,

कोमल बचन चरन मुख कहै ।

परम सुखद सबकौं सदा ॥

दुखद बचन कबहूँ न कहाइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ॥

भावार्थ – जब उपासक श्री हरिवंश नाम (की यथार्थता) जानेगा तब वह अपने आपको सबसे छोटा (दीन) मान लेगा और सबको सम्मान देता हुआ ही उनसे हँसकर प्रसन्नता पूर्वक बोलेगा उसमें वृक्ष के समान सहनशीलता होगी और उसे सभी लोग परम उदार कहेंगे, उसे चिन्ता तो कभी किसी बात की न हो उसका मन श्रीहरिवंश के सुयश में ही रमेगा, उसकी वचन रचना (सम्भाषण-शैली) बड़ी कोमल होगी और वह सबके लिये सदा सर्वदा सुखद ही होगी वह दुःखद वचन तो कभी बोलेगा ही नहीं। आप लोग सब ऐसे श्रीहरिवंश प्रताप यश का गान सुनिये।

पद – 9

प्रगट धर्म जैसे जानियें ,

श्री हरिवंश नाम जा हिये ।

नाम सिद्धि पहिचानियें ॥

श्री हरिवंश नाम सब सिद्धि ,

सबै रसिक बिलसे नव निद्धि ।

भुगते दैहिं न जाँचहीं ॥

पोषन भरन न चिंता कराहिं ,

श्री हरिवंश विभव विलसाहिं ।

श्री बृंदावन की माधुरी ॥

गुन गावत जु रसिक सचु पाइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ॥

भावार्थ – जिसके हृदय में श्री हरिवंश नाम है, और उसे नाम की सिद्धि प्राप्त है इसके प्रकट लक्षण जैसे जाने पहचाने जायँ उनका वर्णन (ऊपर के छन्दों में किया गया ) है श्री हरिवंश नाम ही समस्त सिद्धियों की मूल सिद्धि है। समस्त प्रेमी रसिक जन इसी हरिवंश नाम रूप नव-निधि का विलास-सुख भोगते रहते हैं। इस नाम सिद्धि एवं नव-निधि के समक्ष वे अणिमा महिमा लघिमा..आदि सिद्धि निधियों को न तो भोगते न किसी को देते और न इनकी किसी से याचना ही करते हैं। वे प्रेम मतवाले रसिक इन्हें स्वयं तो माँगे और भोगेंगे ही क्यों? यहाँ तक कि वे अपने भोजन-भरण पोषण तक की चिन्ता नहीं करते और एक मात्र श्रीहरिवंश के रस वैभव का ही विलास करते हुए अपनी भजन-भावना में डूबे रहते हैं। वह वैभव है श्रीवृन्दावन की रस माधुरी। वे रसिक जन उसी वृन्दावन माधुरी रूप श्री हरिवंश की गुण-माला पिरोते और सुखी रहते हैं अत: आप सब भी उस प्रताप यश का श्रवण कीजिये।

पद – 10

श्री हरिवंश धर्म जे धरहिं ,

श्री हरिवंश नाम उच्चरहिं ।

ते सब श्री हरिवंश के ॥

श्रवन सुनहिं जे श्रीहरिवंश ,

मुख बरनत बानी हरिवंश ।

मन सुमिरन हरिवंश को ॥

ऐसे रसिक कृपा जो करहिं ,

तौ हमसे सेवक निस्तरहिं ।

जूठनि ले पावै सदा ॥

सेवक सरन रहे गुन गाइ ,

संतत सकल सुनहु चित लाइ ।

श्री हरिवंश प्रताप जस ॥

भावार्थ – जो लोग श्री हरिवंश धर्म को धारण करते और जो श्री हरिवंश नाम का उच्चारण ही करते हैं वे सभी श्री हरिवंश के ( निज-जन) हैं जो केवल अपने कानों से श्रीहरिवंश-नाम सुनते, जो मुख से उनकी वाणी (श्रीहरिवंश-रचित रस ग्रंथावली) का गान करते और जो मन-मन उन श्री हरिवंश का स्मरण ही करते हैं, (वे सभी श्री हरिवंश के निज-जन हैं।) यदि ऐसे रसिक जन कृपा कर दें तो हमारे जैसे (अयोग्य) ‘सेवक’ (दास) भी अपना निर्वाह पा सकते उद्धार पा सकते हैं, अन्यथा नहीं। हमारा धर्म है कि हम उनकी सदा जूठन प्रसादी पाया करें और उनके गुण गाते हुए उन्हीं की शरण में बने रहें।

श्री सेवक जी कहते हैं कि जिनके नाम का यह माहात्म्य है उन्हीं श्री हरिवंश का प्रताप यश यह गया जा रहा है इसे आप सब चित्त लगा कर सुनिये।


श्रीहित बानी – प्रताप
( चतुर्थ प्रकरण )
पूर्व परिचय

इस प्रकरण में श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु की श्रीमुख – वाणी श्री राधा सुधा – निधि , हित चौरासी आदि काव्य ग्रन्थों का प्रताप परिचय दिया गया है कि उनमें क्या है ? उन वाणियों में वृन्दावन – वर्णन , नव -निकुञ्ज वर्णन , शरद – प्रावृट् वर्णन , हिंडोला , सुरत – विहार एवं सुरतान्त आदि का ही वर्णन है ।

यह श्रीहरिवंश वाणी रस से ओत – प्रोत है इसमें जिस मधुर शैली से वृन्दावन नित्य – विहार का वर्णन किया है ; वैसा कहीं किसी और वाणी – ग्रन्थों में नहीं किया गया । जो लोग इसे छोड़ कर अन्यत्र रस खोजते फिरते हैं , वे मानों ज्येष्ठ की लू – धधक में मृग की तरह जल खोजते फिरने का विफल प्रयास करते हैं ।

श्री हरिवंश – वाणी का श्रवण करते ही श्रीश्यामा और श्याम वश में हो जाते हैं , बस इससे अधिक इस हरिवंश वाणी के सम्बन्ध में और क्या परिचय दिया जाए ? इस प्रकरण में जो कुछ कहा गया है , वह अक्षरशः सत्य है । पाठक गण इस प्रकरण में उस वाणी की महिमा पढ़कर उस वाणी की माधुरी भी चखें , तब उन्हें इस प्रकरण की सत्यता का पता लगेगा । यदि वे सच्चे जौहरी हैं , तो परख सकेंगे कि ‘ सेवक जी ‘ जैसे रसज्ञ – रस – जौहरी ने कितने मूल्यावान् मणि परखे हैं।

पद – 1

समुझौ श्रीहरिवंश सु बानी । रसद मनोहर सब जग जानी ॥

कोमल ललित मधुर पद श्रैंनी । रसिकनि कौं जु परम सुख दैंनी ॥

श्रीहरिवंश नाम उच्चारा । नित बिहार रस कह्यौ अपारा ॥

श्रीबृंदावन भूमि बखानौं । श्रीहरिवंश कहे ते जानौं ॥

श्रीहरिवंश – गिरा रस सूधी । कछु नहिं कहौं आपनी बूधी ॥

श्री हरिवंश – कृपा मति पाऊँ । तब रसिकनि कौं गाइ सुनाऊँ ॥

भावार्थ – ( सेवक जी कहते हैं ) रसिक – जनो ! श्री हरिवंश की सुन्दर वाणी ( रचना ) को समझिये कि वह कितनी कोमल , मधुर ललित पदावली से युक्त है । इस वाणी की रस दान – शीलता और मनोहरता विश्व विख्यात है किन्तु यह प्रेमी रसिकों को तो परम सुख की दाता है । मैंने ( पूर्व तीन प्रकरणों में ) श्रीहरिवंश नाम उच्चारण पूर्वक अपरिमित नित्य – विहार रस का वर्णन किया है । अब श्रीवृन्दावन – भूमि का वर्णन करता हूँ जिसे मैंने श्री हरिवंश हूँ जिसे मैंने श्री हरिवंश के कथन ( वचन ) से ही जाना है । श्रीहरिवंश की वाणी सरल रस रूपा है । मैं ( उसे ही यहाँ ज्यों की त्यों कह दूंगा ) कुछ अपनी बुद्धि से नहीं कहूँगा । यदि श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा से मैं सुबुद्धि प्राप्त करूँ तभी तो कुछ ( उस वाणी का वैभव ) रसिक जनों को सुना सकता हूँ , ( अन्यथा यह मेरी शक्ति के परे है । )

पद – 2

श्रीहरिवंश जु श्रीमुख भाखी । सो बन – भूमि चित्त में राखी ॥

हौं लघु मति नहिं लहौं प्रमाना । जानत श्रीहरिवंश सुजाना ॥

नव पल्लव फल – फूल अनंता । सदा रहत रितु सरद – बसंता ॥

श्री बृंदावन सुंदरताई । श्रीहरिवंश नित्य प्रति गाई ॥

भावार्थ – श्रीहित हरिवंशजी ने श्रीवृन्दावन का जो कुछ वर्णन किया है , मैंने उसी श्रीवन भूमि वर्णन को अपने चित्त में रख लिया है । यों तो मैं अत्यन्त अल्प मति हूँ ( वृन्दावन वर्णन और उसकी सौन्दर्य सिद्धि के ) कोई प्रमाण आदि जानता भी नहीं और न कहीं ( शास्त्रादि में ) खोजे ही पाता ; इस ( भूमि के यथार्थ रूप और वैभव ) को तो केवल सुजान ( परम चतुर ) श्रीहरिवंश ही जानते हैं ।

( ऐसा सब भाँति अगम्य एवं अगोचर श्रीवृन्दावन ) नवीन – नवीन पल्लव , फल और अनन्त फूलों से शोभित है , वहाँ नित्य शरद एवं वसन्त ऋतुएँ छायी रहती हैं । श्रीवृन्दावन की इस सुन्दरता का गान श्रीहरिवंशचन्द्र ने नित्य नव – नवायमान् रूप में किया है ।

पद – 3

श्रीवृंदावन नव – नव कुंजा । श्री हरिवंश प्रेम रस पुंजा ॥

श्रीहरिवंश करत नित केली । छिन – छिन प्रति नव – नव रस झेली ।

कबहुँक निर्मित तरल हिंडोला । झूलत – फूलत करत कलोला ॥

कबहुँक नव दल सेज रचावहिं । श्रीहरिवंश सुरत रति गावहिं ॥

भावार्थ – श्रीवृन्दावन की नवीन – नवीन कुजें ही मानो श्रीहरिवंश के प्रेम की पुञ्ज ( समूह ) हैं । उन्हीं कुञ्जों में प्रतिक्षण नित्य नूतन रस का पान करते हुए श्रीहरिवंश ही युगल रूप से मानों निरन्तर क्रीड़ा करते रहते हैं । कभी तरल ( चंचल ) हिण्डोल की रचना करते हैं , तो कभी उसमें युगल किशोर को झुलाते – झूलते , प्रसन्न होते और किलोल करते हैं । फिर कभी नवीन – नवीन कोमल पल्लवों की शैय्या रचते और ( उसमें युगल किशोर की रति केलि सम्पन्न कराके ) आप सुरत रति का गान करते हैं । श्रीवृन्दावन की नव निकुञ्जों में युगल की प्रेम – केलि के वर्णन पदों एवं श्लोकों में मिलेंगे ।

पद – 4

सुरत अंत छबि बरनि न जाई । छिन – छिन प्रति हरिवंश जु गाई ॥

आजु सँभारत नाहिंन गोरी । अंग – अंग छबि कहौं सु थोरी ॥

नैंन – बैंन – भूषन जिहिं भाँती । यह छबि मोपै बरनि न जाती ॥

प्रेम – प्रीति रस – रीति बढ़ाई । श्रीहरिवंश बचन सुखदाई ।

भावार्थ – श्रीहरिवंश जी ने अपनी वाणी में श्रीप्रियालाल की जिस सुरतान्त ( सुरत विहार के उपरान्त की ) छवि का प्रतिक्षण गान किया है , उसका वर्णन करना अति कठिन है । ( श्रीहरिवंश जी ने कहा है- ) ‘ आजु गोरी श्रीराधा अपने आपको सम्हाल नहीं पा रही हैं ; ” ( उसकी ऐसी सुरतालस छवि के विषय में जो कुछ कहूँ सो कम है । ( सुरतान्त समय में गोरी ) राधा के नयन , वचन , भूषण जैसे कुछ ( शिथिल , लज्जा , भय जागर एवं अस्त व्यस्त ) हैं , वह छवि मुझ से तो वर्णन करते ही नहीं बनती । ऐसी परम सुखदायी और प्रेम प्रीति रस रीति को बढ़ाने वाली है , श्रीहरिवंश की रस – पगी वचनावली !

पद – 5

बंशि बजाइ विमोहित नारी । बोली संग सु नित्यबिहारी ॥

परिरंभन चुंबन रस केली । बिहरत कुँवरि कंठ भुज मेली । ॥

सुंदर रास रच्यौ बन माँही । जमुना पुलिन कलपतरु छाँहीं ॥

रास – रंग – रति बरनि न जाई । नित – नित श्रीहरिवंश जु गाई ॥

भावार्थ – श्रीनित्यविहारी लाल ने वंशी बजाकर नारियों को मोहित कर लिया और अपने समीप बुला लिया , तत्पश्चात् आलिङ्गन एवं चुम्बन पूर्वक रस केलि होती है और कँवरि श्रीराधा , श्रीनित्यविहारी लाल से गलबहियाँ देकर विहार करती हैं । युगल – किशोर ने यमुना के तट पर विमल कल्पतरु की छाया तले श्रीवन में सुन्दर रास की रचना की ।

जिस रास रंग और प्रीति – रति का वर्णन असम्भव है , श्रीहरिवंश चन्द्र ने नित्य निरन्तर उसीका गान किया है ।

पद – 6

श्रीहरिवंश प्रेम रस गाना । रसिक बिमोहित परम सुजाना ॥

अंसनि पर भुज दिये बिलोकत । त्रिपित न सुंदर मुख अवलोकत ।।

इंदु बदन दीखत विवि ओरा । चारु सुलोचन तृषित चकोरा ॥

करत पान रस मत्त सदाई । श्री हरिवंश प्रेम रति गाई ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश के इस प्रेम रस गान पर परम सुजान रसिकगण किंवा परम रसिक युगल किशोर मोहित हैं । ( अपनी इस प्रेम रस वाणी में श्रीहरिवंश ने कहा है- ) युगल किशोर अपने कन्धों पर एक दूसरे की भुज लताओं को रखे हुए एक दूसरे की ओर देख रहे हैं किन्तु सुन्दर मुख माधुरी का पान करके तृप्त नहीं हो पाते हैं । दोनों दोनों की ओर ऐसे देख रहे हैं जैसे दोनों के चारु लोचन क्या हैं मानों प्यासे चार चकोर , जो सदा रस का पान कर – करके रस में मतवाले हो रहे हैं ।

श्रीहरिवंश ने उक्त प्रकार से युगल किशोर की पारस्परिक प्रेम रति का गान किया है ( ऐसा श्री सेवकजी कहते हैं । )

पद – 7

श्रीहरिवंश सुरीति सुनाऊँ । स्यामा – स्याम एक सँग गाऊँ ।।

छिन इक कबहुँ न अंतर होई । प्रान सु एक देह हैं दोई ।।

राधा संग बिना नहिं स्याम । स्याम बिना नहिं राधा नाम ।।

छिन – छिन प्रति आराधत रहहीं । राधा नाम स्याम तब कहहीं ।।

ललितादिकनि संग सचु पावै । श्रीहरिवंश सुरत – रति गावै ।।

भावार्थ – मैं हरिवंश की सुन्दर रीति ( प्रेम रीति को सुनाता हूँ जहाँ श्रीश्यामा – श्याम का एक साथ ( एकीभाव से ) गान किया गया है । ये दोनों कभी एक क्षण भर के लिये भी विलग नहीं होते- सदा एक साथ , मिले ही रहते हैं । ये श्यामा – श्याम प्राणों से तो एक और देह से दो विलग – विलग जान पड़ते हैं । श्यामसुन्दर श्रीराधा के सङ्ग बिना कहीं , कभी रह ही नहीं सकते , इसी प्रकार श्यामसुन्दर के बिना श्रीराधा का [ वहाँ दर्शन तो दूर ] नाम भी नहीं [ सुना जा सकता ] । श्यामसुन्दर क्षण – क्षण प्रति श्रीराधा की आराधना करते रहते हैं और इसी प्रकार श्रीराधा भी श्रीश्याम नाम कहती या रटती रहती हैं ।

इनकी ऐसी पारस्परिक आसक्ति से ललिता विशाखा आदि सहचरियाँ प्रेम सुख प्राप्त करती हैं और श्रीहरिवंश युगल की इस रस – विभोर सुरत रति का गान करते हैं ।

पद – 8

श्रीहरिवंश गिरा – जस गायें । श्रीहरिवंश रहत सचु पाय ॥

श्रीहरिवंश – नाम परसंगा । श्रीहरिवंश गान इक संगा ॥

मन – क्रम – बचन कहौं नित टेरें । श्रीहरिवंश प्राण – धन मेरैं ॥

सेवक श्रीहरिवंशहि गावै । श्रीहरिवंश – नाम रति पावै ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश की वाणी का यशोगान करने से श्रीहरिवंश प्रसन्नता प्राप्त करते हैं ; ( या श्रीहरिवंश की वाणी का गान करने से श्री ह – रि – वंश रूप चतुर्दूहात्मक परिकर युगल , वन और अलि सभी सुख प्राप्त करते हैं । ) श्रीहरिवंश का नाम और श्रीहरिवंश की वाणी एक ही संङ्ग रहती हैं- दोनों में अभेद है ।

मैं मन , वचन एवं कर्म से टेर – टेर कर स्पष्ट कहता हूँ कि मेरे प्राणधन श्रीहरिवंश ही हैं । यह सेवक श्रीहरिवंश का ही गान करता और उसके फलस्वरूप श्रीहरिवंश के नाम में रति हो , यह चाहता है अन्य कुछ नहीं ।

पद – 9

जयति जगदीस – जस जगमगत जगत – गुरु ,

जगत बंदित सु हरिवंश बानी ।

मधुर कोमल सुपद प्रीति आनंद – रस ,

प्रेम बिस्तरित हरिवंश बानी ॥

रसिक रस – मत्त श्रुति सुनत पीवंत रस ,

रसनि गावंत हरिवंश बानी ।

कहत हरिवंश हरिवंश हरिवंश हित ,

जपत हरिवंश हरिवंश बानी ॥

भावार्थ – जगत् के एकमात्र स्वामी ( नित्य विहारी श्रीराधावल्लभलाल ) के यशोगान से जगमगाती हुई , जगत् की गुरु रूपा – सर्वश्रेष्ठ , जगत् – वन्दनीय श्रीहरिवंश – वाणी ही उत्कर्ष को प्राप्त है । यह हरिवंश वाणी मधुर , कोमल सुन्दर पदों से युक्त एवं प्रीति आनन्द , रस तथा प्रेम – केलि का विस्तार करने वाली है । जिसे रसिक जन अपने कानों से सुनते ही रस से मत्त हो जाते और फिर जिसका पान करते ही रहते हैं , वे अपनी रसना से जिसका गान किया करते हैं , वह श्रीहरिवंश वाणी ही है । वे इसका गान करते , श्रवण करते इतने मतवाले हो जाते हैं कि ‘ श्रीहरिवंश ! हरिवंश ! ‘ ही जोर से कहते , ‘ हरिवंश ! हित – हरिवंश ! ‘ ही जपते और फिर श्रीहरिवंश नाम और हरिवंश – वाणी में एक हो जाते हैं ।

पद – 10

कही नित केलि रस – खेल बृंदाविपिन ,

कुंज तें कुंज डोलनि बखानी ।

पट न परसंत निकसंत बीथिनु सघन ,

प्रेम – विह्वल नहिं देह मानी ॥

मगन जित – जित चलत , छिन सुडगमग मिलत ,

पंथ बन देत अति हेत जानी ।

रसिक हित परम आनंद अवलोकतन ,

सरस विस्तरित हरिवंश – बानी ॥

भावार्थ – [ श्रीहरिवंश ने अपनी वाणी में ] नित्य – केलि रस – क्रीड़ा – कौतुक का गान किया है और कुञ्ज से कुञ्ज में डोलने – विहार करने का भी वर्णन किया है । युगल किशोर प्रेम से विह्वल हुए अपनी देह – दशा को भुलाकर एक दूसरे से लिपटे गलबहियाँ दिये हुए अत्यन्त सकरी [ लतामण्डित ] गलियों से होकर निकलते हैं , फिर भी उनके वस्त्र – लताओं में उलझते नहीं , लताओं का स्पर्श तक नहीं करते , इतने एकमेक हो जाते हैं दोनों । इस प्रकार प्रेम मग्न दशा में एक दूसरे से मिले – लिपटे जिधर – जिधर डगमगाते हुए चले जाते हैं , श्रीवन युगल का अत्यन्त स्नेह जानकर अपने आप उन्हें मार्ग दे देते हैं ।

इस रसकेलि का हितमय रसिक ललिता आदि अवलोकन करती और परमानन्द से पूर्ण हो जाती हैं ।

इस सुन्दर रस का विस्तार करती है श्रीहित हरिवंश की वाणी । [ ऐसा श्रीसेवकजी कहते हैं । ]

पद – 11

वंश रस नाद मोहित सकल सुंदरी ;

आनि रति मानि कुल छाँड़ि कानी ।

बाहु परिरंभ , नीवी उरज परस , हँसि ;

उमगि रति पति रमत रीति जानी ।

जूथ जुवतिनु खचित , रासमंडल रचित ,

गान गुन निर्त , आनंद दानी ।

तत्त थेइ थेइ करत , गतिव नौतन धरत ,

रास – रस रचित , हरिवंश – बानी ॥

भावार्थ – वंशी के रस – गान से मोहित समस्त सुन्दरियाँ अपनी कुल – मर्यादा त्याग कर प्रीति पूर्वक श्रीश्यामसुन्दर के समीप आईं और वहाँ आने पर श्रीलाल जी ने उनकी बाहुओं का आलिङ्गन , नीवी और उरोजों का स्पर्श एवं हास – परिहास के द्वारा उनमें रति – पति – मदन की उमङ्ग जगाकर उनसे रमण – विहार किया । पश्चात् युवती – यूथ में सुव्यवस्थित रास – मंडल की रचना की गयी और बड़ा ही आनन्द – दायक गान और कला पूर्ण नृत्य हुआ । वे सब नृत्य में ” ता थेई तत्ता थेई ” कहते और नवीन – नवीन गतियों को धारण करते हुए शोभा को प्राप्त हुए ।

उक्त प्रकार से रास – रस का वर्णन करने वाली है श्रीहरिवंश की वाणी ।

पद – 12

रास रस रचित बानी जु प्रगटित जगत ,

सुद्ध अविरुद्ध परसिद्ध जानी ।

स्याम – स्यामा प्रगट प्रगट अक्षर निकट ,

प्रगट रस श्रवत अति मधुर बानी ॥

सो बानी रसिक नित्य निसि – दिन रटत ,

कहत अरु सुनत रस – रीति जानी ।

ताहि तजि और गाऊँ न कबहूँ कछु ,

प्रान रमि रही हरिवंश – बानी ॥

भावार्थ – रसिकाचार्य श्रीहित हरिवंशचन्द्र ने रास रस रचना – वर्णन से पूर्ण वाणी को जगत् में प्रकट किया जो शुद्ध , अविरुद्ध ( अनुकूल ) और प्रसिद्ध है । जिस वाणी के प्रत्येक अक्षर के निकट श्रीश्यामा – श्याम प्रकट हैं , जो अत्यन्त मधुर और प्रकट रूप से रस की धारा प्रवाहित वाली है । जिस वाणी का रसिक जन नित्य – निशिदिन गान करते रहते हैं और जिसका कथन – श्रवण करने से रस – रीति ज्ञात होती है । श्रीसेवकजी कहते हैं- मैं उस वाणी को छोड़कर कभी और कुछ गाऊँगा , कहूँगा ही नहीं ; क्योंकि मेरे प्राणों में तो केवल वही श्रीहरिवंश – वाणी ही रम रही है ।

पद – 13

भाग – अनभाग जानत जु नहिं आपनौं ,

कौन धौं लाभ अरु कौन हानी ।

प्रगट – निधि छाँड़ि कत फिरत रूँका * करत ,

भरम भटकत सु नहिं भूल जानी ।।

प्रीति बिनु रीति रूखी जु लागति सकल ,

जुगत करि होत कत कवित – मानी ।

रसिक जो सद्य चाहत जु रस – रीति फल ,

तौ कहौ अरु सुनौ हरिवंश – बानी ।।

भावार्थ – कितने ही लोग अपना भाग्य – दुर्भाग्य नहीं जानते और न यही जानते हैं कि क्या लाभ है और क्या हानि है ? यदि वे यह जान ही लेते तो क्यों प्रकट निधि ( भण्डार ) को छोड़कर जहाँ – तहाँ टुकड़ खोरी करते फिरते ? दुख है कि वे भ्रम में ही भटक रहे हैं उन्हें अपनी भूल का भी पता नहीं है ।

[ ऐसे भटके हुए लोगों से सेवकजी कहते हैं- ] अरे भाईयों ! तब फिर तुम व्यर्थ ही क्यों युक्तियों के द्वारा काव्यादि रचना करके कविताई का केवल स्वाभिमान लाद रहे हो ? अर्थात् केवल सुछन्द – रचना कर देने से कोई प्रेमी नहीं बन सकता । यदि तुम रसिक बनना चाहते हो ? अभी सद्य रस रीति का फल ( सुखास्वादन ) चाहते हो ? तो [ मेरी राय मान कर ] श्रीहरिवंश – वाणी को ही कहो और सुनो !

पद – 14

यहै नित केलि येई जु नाइक निपुन ,

यहै बन भूमि नित नित बखानी ।

बहुत रचना करत राग – रागिनी धरत ,

तान बंधान सब ठाँनि आनी ॥

ज्यौं मूंद नहिं मिलत टकसार रौं बाहिरी ,

लाख में गैर मुहरी जु जानी ।

यौं जु रस – रीति बरनत न ठाँई मिलत ,

जो न उच्चरत हरिवंश – बानी ॥

भावार्थ – श्रीसेवक जी कहते हैं- यह हरिवंश वाणी ही नित्य केलि है , यही निपुण नायक श्रीलाल एवं श्रीप्रिया जी है और यही श्रीवृन्दावन भूमि है , जिसका बखान ‘ नित्य – नित्य ‘ कहकर किया गया है , ( अर्थात् दम्पति , वन और अलिगणों से सम्पन्न चतुर्दूहात्मक नित्य विहार यह वाणी ही है । ) फिर क्यों लोग व्यर्थ ही बहुत सी रचना करते , राग – रागिनियों को धारण करते और अन्य – अन्य प्रकार के तान बन्धान ठानते हैं ? [ इसी श्रीहरिवंश वाणी में क्यों नहीं रमते ? यह तो निश्चित है कि ] जो सिक्का टकसाल से बाहर ढाला गया है उसकी बनावट ( ढाल ) टकसाली सिक्के से नहीं मिल सकती ; वह टकसाली मोहर छाप से हीन सिक्का तो लाखों में पहचान लिया जायगा । इसी प्रकार जो श्रीहरिवंश वाणी उच्चारण – गान नहीं करते उन्हें रस – रीति का वर्णन करते हुए भी रसिकों में ठाँव ठिकाना नहीं मिल सकता । [ चाहे भले ही वे अपने आपको रसिक कहा करें । जैसे बाहरी सिक्का , सिक्का होने पर भी टकसाली सिक्का नहीं कहा सकता इसी प्रकार श्रीहरिवंश – वाणी से दूर रहने वाला व्यक्ति रसिक कहलाकर भी टकसाली – पक्का मोहरी रसिक नहीं है ।

पद – 15

रसिक बिनु कहे सब ही जु मानत बुरौ ,

रसिकई कहौ कैसे जु जानी ।

आपनी आपनी ठौर जेही तहाँ ,

आपनी बुद्धि के होत मानी ॥

निपट करि रसिक जौ होहु तैसी कहौ ,

अब जु यह सुनौं मेरी कहानी ।

जौरु तुम रसिक रस रीति के चाडिले ,

तौरु मन देहु हरिवंश – बानी ॥

भावार्थ – ‘ रसिक ‘ न कहने पर तो सभी [ उपासक – गण ] बुरा मान लेते हैं ; [ कि हम रसिक क्यों नहीं , तुम्हीं क्यों ? ] किन्तु यदि उनसे पूछा जाय कि तुमने रसिकता कैसे जानी ? [ तो शायद बोल न आवेगा । तात्पर्य यह कि वे रसिक – फसिक तो कुछ हैं नहीं पर उनमें रसिक पने का मिथ्या अभिमान अवश्य है । ] वे रहते तो हैं अपनी उसी पुरानी ठौर ( स्थिति ) में , पर बुद्धि के मानी अवश्य बन जाते हैं [ कि हम भी रसिक हैं । ]

सेवक जी कहते हैं कि भाइयों ! यदि तुम सचमुच भीने सुलझे और पक्के रसिक हो तो वैसा स्पष्ट कहो ; अथवा अब यह मेरी कथा – चर्चा ही चित्त देकर सुनो । वह क्या ? तुम सचमुच रसिक तो हो नहीं पर हाँ ; यदि रसिक बनना चाहते हो , तुममें रस रीति पाने की चाह चाड़ -उसके तुम इच्छुक हो तो [ विश्वासपूर्वक ] श्रीहरिवंश – वाणी में मन दो । [ वही एकमात्र रसदात्री है । ]

पद – 16

वेद – विद्या * पढ़त कर्म धर्मनि करत ,

जलप तन – कलप की अवधि आनी ।

चारु गति छाँड़ि संसार भटकत भ्रमत ,

आस की पासि नहिं तोरि जानी ।।

सकल स्वारथ करत रहत जनमत – मरत ,

दुःख अरु सुक्ख के होत मानी ।

छाँड़ि जंजार कैसे न निश्चय धरत ,

एक किन रमत हरिवंश – बानी ।।

भावार्थ – अरे मूढ़ ! वेद – विद्याओं को पढ़ते , कर्म – धर्मों को करते और व्यर्थ जल्पना ( बकवास ) करते तो तेरे मरने की अवधि आ गयी । तू सुन्दर मार्ग और गति को छोड़कर संसार में भ्रमता भटकता है ; तू आशा की फाँसी भी तोड़ न पाया अर्थात् आशापाश से बँधा ही रहा । तू स्वार्थ के सब कार्यों को करते हुए बार – बार जन्मता और मरता ही रहा । दु : ख और सुखों का मिथ्या भोक्ता ( मानी ) बना रहा । अरे ! अब भी [ समय है ] इस माया – जंजाल को त्यागकर क्यों नहीं एक निश्चय धारण कर लेता [ कि श्रीहरिवंश – वाणी ही सर्वोपरि है ? ] और तब फिर क्यों इस हरिवंश – वाणी में नहीं रमता ? [ जहाँ तहाँ क्यों भटकता फिरता है ? इससे शान्ति कैसे पा सकेगा , अभागे ? ]

पद – 17

बृथा बलगन करत द्यौस खोवत सकल ,

सोवतन राति नहिं जाति जानी ।

ऐसैं भाँति समुझ्यौ न कबहूँ कछु ,

कौन सुख – दुःख को लाभ – हानी ॥

तब सुक्ख हरिवंश गुन नाम रसना रटत ,

और बहु वचन अति दुःख दानी ।

हानि हरिवंश के नाम अंतर परे ,

लाभ हरिवंश उच्चरत बानी ॥

भावार्थ – अरे भाई ! तू व्यर्थ बकबाद करता हुआ अपने सारे जीवन के दिन खो रहा है और सोते – सोते रातें जा रहीं हैं उन्हें भी बीतते नहीं जान पा रहा है । इसी प्रकार तूने यह भी कभी कुछ न समझा कि क्या सुख है , क्या दु : ख है , क्या लाभ है और क्या हानि है ? [ तू तो पूरा अनजान रहा पर ले मैं तुझे बताता हूँ कि ] सुख वही है , जो तेरी वाणी श्रीहरिवंश के गुण और नामों को रटती रहे और इसके सिवाय बाकी सब बहुत सा बोलना – कहना ही अत्यन्त दुःखप्रद है । श्रीहरिवंश – नाम स्मरण में अन्तराय पड़ना ही सबसे बड़ी हानि है और लाभ है- श्रीहरिवंश वाणी का उच्चारण करते रहना ।

पद – 18

नाम – बानी निकट स्याम – स्यामा प्रगट ,

रहत निसि – दिन परम प्रीति जानी ।

नाम – बानी सुनत स्याम – स्यामा सुबस ,

रसद माधुर्य अति प्रेम दानी ॥

नाम – बानी जहाँ स्याम – स्यामा तहाँ ,

सुनत गावंत मो मन मन जु मानी ।

बलित सुभ नाम बलि विसद कीरति जगत ,

हौं जु बलि बलि जाउँ हरिवंश – बानी ॥

भावार्थ – [ श्रीसेवकजी कहते हैं- ] श्रीहरिवंश के नाम और वाणी के निकट श्रीश्यामा – श्याम उसे परम प्रेममयी जानकर दिन – रात प्रकट रूप से विद्यमान् रहते हैं । श्रीहरिवंश – नाम और वाणी को सुनते ही श्रीश्यामा – श्याम उस नाम – वाणी गायक के वशीभूत होकर उसके लिये माधुर्य – रस के दाता और महान् प्रेम के दाता बन जाते अर्थात् उसे प्रेम रस प्रदान कर देते हैं इस नाम और वाणी के प्रताप से । किं बहुना ? जहाँ नाम और वाणी हैं , श्रीश्याम और श्यामा भी वहीं हैं , [ अन्यत्र नहीं ; ] इस नाम और वाणी को सुनते और गाते रहने पर ही मेरा मन मानता है अर्थात् मुग्ध रहता है । मैं इस शुभ नाम [ श्रीहरिवंश ] की बलिहारी जाऊँ ; नाम की विश्वव्यापी कीर्ति की बलिहारी जाऊँ और बलिहारी जाऊँ इस श्रीहरिवंश – वाणी की ।

पद – 19

बलि बलि श्रीहरिवंश नाम बलि बलित विमल जस ।

बलि बलि श्रीहरिवंश कर्म – व्रत कृत सु नाम बस ॥

बलि बलि श्रीहरिवंश बरन धर्मनि गति जानत ।

बलि बलि श्रीहरिवंश नाम कलि प्रगट प्रमानत ॥

हरिवंश नाम सु प्रताप बलि , बलित जगत कीरति विसद ।

हरिवंश विमल बानी सु बलि , मृदु कमनीय सुमधुर पद ॥

भावार्थ – [ श्रीसेवकजी कहते हैं- ] मैं हरिवंश नाम की बलि – बलि जाऊँ और उनके विमल यश की बलि – बलि जाऊँ और बारम्बार बलि जाऊँ उन श्रीहरिवंश की , जिन्होंने समस्त कर्म और व्रत आदि को नाम का ( अनुगत ) वशवर्ती बना दिया है । अहो ! श्रीहरिवंश वर्णाश्रम धर्म की भी गति ( शक्ति सामर्थ्य ) जानते हैं [ कि ये क्या कितनी शक्ति रखते हैं इस प्रेम राज्य में ? ] कलियुग में तो केवल नाम को ही प्रमाणित किया है श्रीहरिवंश ने , मैं इनकी बलिहारी , बलिहारी , बारम्बार बलिहारी जाता हूँ । मैं श्रीहरिवंश नाम की बलि हूँ और बलि हूँ उस नाम की विश्वव्यापी पवित्र कीत्ति की ! मैं श्रीहरिवंश की विमल वाणी की बलि हूँ और उस वाणी की कोमल मधुर और कमनीय पदावलि की बलि हूँ ।


श्रीहित स्वरूप सार संचयन
( पंचम् प्रकरण )
पूर्व परिचय

श्री हित हरिवंश चंद्र महाप्रभु साक्षात् प्रेम-तत्व के ही अवतार हैं। यह प्रेम व्यापक और एक देशीय भी है। प्रेम स्वयं ब्रह्म है। इस प्रकरण में श्रीहरिवंश के व्यापक हित स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि श्रीहरिवंश ही विश्व की उत्पत्ति पालन और प्रलय के कारण हैं एवं विश्वरूप कार्य भी वही हैं, वे प्रकृति, ब्रह्म और ब्रह्म विद्या भी हैं। श्रीहरिवंश सगुण रूप में व्यासनन्दन हैं। रूप, गुण और प्रेम की खानि हैं। वे प्रेम रस रूप, रसमय तत्व और कृपा के धाम हैं। वे सबकी आत्मा और मन हैं। श्रीहरिवंश ही सबके जीवन और प्राण हैं। किमधिकं श्रीहरिवंश ही सात्विक राजस तामस भाव, लोभ, शुभ कृत्य, शुद्ध विचार, पूजा, परमार्थ, विवेक, तृष्णा, वीर्य (बल) मंगलकारी, धीरता, यश, सुयश रस-लोलुपता आदि अनेक रूपों में हैं। और इसीलिये वे प्रेमी साधकों के लिये कुलदेव, जाति, ऋद्धि, सिद्धि, वेद-विधि, अद्वय तत्व, योग, सुखभोग, प्रतीति, प्रमाण, प्रियतम, प्रियता, श्रवण दर्शन और मनन करने के योग्य, संगीत सार तत्व और सर्वस्व हैं। उक्त बातों का विस्तार श्री सेवक जी के वचनों में इस प्रकार है

पद – 1

प्रथम प्रनम्य सुरम्य मति, मन-बुधि-चित्त प्रश्न।

चरन शरन सेवक सदा, जै जै श्री हरिवंश।

श्रीहरिवंश विपुल गुन मिष्टं, श्रीहरिवंश उपासक इष्टं।

श्रीहरिवंश कृपा मति पाऊँ, श्री हरिवंश विमल गुन गाऊँ।

गाऊँ हरिवंश नाम जस निर्मल, श्रीहरिवंश रमित प्रानं।

कारज हरिवंश प्रताप उद्दित, करन श्री हरिवंश भजन।

विद्या हरिवंश मंत्र चतुरक्षर, जपत सिद्धि भव उद्धरनं।

जै जै श्रीहरिवंश जगत मंगल पर, श्रीहरिवंश चरन शरणं॥१॥

भावार्थ – [श्री सेवक जी कहते हैं-] मैं सर्वप्रथम अपनी सुरम्य मति (सन्मति) से श्रीहरिवंश को प्रणाम करके फिर अपने मन, बुद्धि और चित्त से उनकी प्रशंसा करता हूँ। यह सेवक सदा श्रीहरिवंश की ही चरण-शरण में है। इन श्रीहरिवंशचन्द्र की जय हो, जय हो। श्रीहरिवंश के विपुल (बहुत-से) गुण हैं और सब गुण मधुर हैं। श्रीहरिवंश ही उपासकों के इष्ट तत्व हैं अथवा उपासक भी हैं और इष्ट भी, यदि मैं श्री हरिवंश चन्द्र की कृपा से सन्मति प्राप्त करूँ तो ही उनके निर्मल गुणों का गान कर सकता हूँ; अन्यथा नहीं। मैं श्रीहरिवंश के विमल यश और गुणों का गान करता हूँ; श्रीहरिवंश ही मेरे प्राणों में रम रहे हैं। ये हरिवंश विश्वरूप कार्य बनकर अपने प्रताप का उदय किये हुए हैं और यही हरिवंश विश्व के कारण भी कहे जाते हैं, (अर्थात् सृष्टि के कार्य और कारण दोनों ही आप हैं।) श्रीहरिवंश ही ब्रह्म – विद्या हैं और हरिवंश नाम के चार अक्षर ही वह महामंत्र है, जिसके जप करने से तत्काल सिद्धि मिल जाती है और संसार से उद्धार हो जाता है। ऐसे जगत-मंगल परायण किंवा विश्व के परम मंगल रूप श्री हरिवंश की जय हो, जय हो मैं उन्हें श्री हरिवंश की चरण-शरण में हूँ।

पद – 2

हरिरिति अक्षर बीज रिषि वंशी शक्ति सु अंस।

नख सिख सुंदर ध्यान धरि जै जै श्री हरिवंश।

श्री हरिवंश जी सुंदर ध्यानं, श्रीहरिवंश विसद विज्ञानं।

श्रीहरिवंश नाम-गुन-श्रूपं, श्रीहरिवंश प्रेम-रस रूपं॥

रसमय हरिवंश परम परमाक्षर, श्रीहरिवंश कृपा सदन।

आतम हरिवंश प्रगट परमानंद श्री हरिवंश पुराण में॥

जीवन हरिवंश विपुल सुख संपति, श्रीहरिवंश बलित बरनं।

जै जै श्रीहरिवंश जगत मंगल पर, श्री हरिवंश चरन सरन ॥२॥

भावार्थ – [इस सम्पूर्ण ग्रन्थ-सेवक वाणी में] ‘हरिवंश’ ये चार अक्षर बीज हैं और इसके [उपदेष्टा-प्रकाशक] ऋषि हैं वंशी। इस मंत्र की शक्ति है अंश (अर्थात् अपने लक्ष्य सखी स्वरूप जो श्रीराधा की अंश-किरण है, उसकी प्राप्ति।) [ इस हरिवंश मंत्र का छन्द चतुरक्षर ‘हरिवंश’ ही है और इसके देवता भी श्रीहरिवंश हैं;] जिनका नख-शिख सुन्दर ध्यान धारण करना कर्तव्य है ऐसे श्री हरिवंश की जय हो, जय हो। श्रीहरिवंश ही सुन्दर ध्यान हैं और श्रीहरिवंश ही पवित्र रहस्यात्मक ज्ञान हैं। श्री हरिवंश नाम ही उनके अपने गुण ( प्रेम) का स्वरूप है और श्रीहरिवंश ही प्रेम रस रूप हैं। रसमय श्रीहरिवंश ही परात्पर एवं सर्वश्रेष्ठ अक्षर (अविनाशी) तत्व हैं और श्रीहरिवंश ही कृपा के धाम हैं। प्रगट रूप से विराजमान् परमानंद जय श्री हरिवंश ही [प्रत्येक प्राणी की] आत्मा हैं तथा वस्तु-सिद्धि के प्रमाण-रूप मन भी वही हैं। श्रीहरिवंश ही जीवन, अनन्त सुख एवं अतुल सम्पत्ति हैं। मैं ‘हरिवंश’ इन वर्णों की बलिहारी जाता हूँ। जगत के कल्याण-परायण श्रीहरिवंश की जय हो। मैं इनकी ही चरण-शरण में हूँ।

पद – 3

सरन निरापक पद रमित, सकल असुभ-सुभ नंस।

देत सहज निस्चल भगति, जै जै श्री हरिवंश।

श्रीहरिवंश मुदित मन लोभं, श्रीहरिवंश वचन वर शोभा ।

श्री हरिवंश राय कृत कारं, श्रीहरिवंश त्रिसुद्ध विचारं॥

पूजा हरिवंश नाम परमारथ, श्री हरिवंश विवेक परं।

धीरज हरिवंश विरद बल धीरज, श्री हरिवंश अभद्र हैं ॥

तृस्ना हरिवंश सुजस रस लंपट, श्रीहरिवंश कर्म करना।

जै जै हरिवंश जगत मंगल पर, श्री हरिवंश चरन शरन॥३॥

भावार्थ – जो [श्रीराम के] रमणीय चरणों की शरण का निरूपण करने वाले हैं, जो समस्त पाप-पुण्यों का नाश करने वाले एवं सहज और अविचल भक्ति का दान करने वाले हैं, उन श्रीहरिवंश की जय हो, जय हो। श्रीहरिवंश प्रसन्न मन के लोभ और श्रीहरिवंश ही श्रेष्ठ एवं शोभापूर्ण वचन हैं; (अर्थात् रस प्राप्ति के लोभ और रसमय मधुर वचन रचना रूप हैं।) श्रीहरिवंश ही शरीर धारण करने की कृत कार्यता (सफलता) हैं; [भाव यह कि शरीर-धारण करके जिसने श्रीहरिवंश को पा लिया उसने अपनी काया सफल कर ली।] श्रीहरिवंश ही मन, वचन, कर्म की पवित्रता पूर्ण त्रि शुद्ध विचार हैं। श्रीहरिवंश ही पूजा की पूजा हैं, इनका नाम ही परमार्थियों का परमार्थ है और श्रीहरिवंश ही परात्पर विवेक स्वरूप हैं। श्रीहरिवंश ही साधकों के धैर्य, बल, शक्ति और कीर्त्ति हैं और यही श्रीहरिवंश ही समस्त अमंगलों का हरण करने वाले हैं। वे ही रस की प्यास हैं, रस के सुयश रूप हैं, रस के लोलुप हैं और श्रीहरिवंश ही समस्त कर्मों के कर्ता किंवा करण (कारण, हेतु) हैं। इन जगत-मंगल परायण श्रीहरिवंश की जय हो, जय हो, मैं इन्हीं श्रीहरिवंश की चरण-शरण में हूँ।

पद – 4

श्रीहरिवंश सुगोत कुल, देव जाति हरिवंश।

श्रीहरिवंश स्वरूप हित, रिद्धि सिद्धि हरिवंश।।

श्रीहरिवंश विदित विधि वेदं, श्रीहरिवंश जु तत्व अभेदं।

श्रीहरिवंश प्रकासित जोगं,श्री हरिवंश सुकृत सुख भोग॥

प्रज्ञा हरिवंश प्रतीति प्रमाणित, प्रीतम श्रीहरिवंश प्रियं।

गाथा हरिवंश गीत गुन गोचर, गुपत गुनत हरिवंश गीत।।

सेवक हरिवंश राय संचित सब, श्रीहरिवंश धरम धरनं।

जै जै श्रीहरिवंश जगत मंगल पर, श्री हरिवंश चरन शरन॥४॥

भावार्थ – [प्रत्येक हित-धर्मी के] श्रीहरिवंश ही उत्तम गोत्र, कुल, देव हैं और जाति भी श्रीहरिवंश ही हैं। श्रीहरिवंश ही स्वयं हित (प्रेम) स्वरूप हैं और श्रीहरिवंश ही ऋद्धि-सिद्धि हैं। श्रीहरिवंश ही विख्यात वेद-विधि हैं। श्रीहरिवंश ही अभेद (सर्वव्यापक अद्वय ब्रह्म) तत्व हैं। प्रसिद्ध योग (अष्टांग योग) भी श्रीहरिवंश हैं और समस्त सुकृतों (पुण्यों) का सुख-भोग फल भी वही श्रीहरिवंश हैं। श्रीहरिवंश ही शुद्ध-बुद्धि, विश्वास एवं प्रमाणों से प्रमाणित प्रियतम हैं, (अर्थात् इष्ट रूप हैं) और वही श्रीहरिवंश प्रियता (प्रीति) भी हैं । श्रीहरिवंश गाथा (गान का विषय), गीत, गुण, गुप्त विषय, (गोपनीय) गोचर (प्रकट रूप), तत्व हैं और श्रीहरिवंश ही सबके सार रूप मननीय तत्व एवं जानने योग्य ज्ञेय-तत्व भी हैं। इस प्रकार सेवक जी ने सारतिसार तत्व का संचय किया है। सब तत्वों का सार तत्व श्रीहरिवंश ही है। और मैं उन्हीं श्रीहरिवंश के धर्म को धारण करता हूँ। ऐसे परम-मंगल रूप जगत के लिये कल्याण परायण श्रीहरिवंश की जय हो, जय हो; मैं इन्हीं श्रीहरिवंश की चरण-शरण में हूँ, यही मेरे सर्वस्व हैं।


श्रीहित धार्मिक-कृत्य
( षष्ठ प्रकरण )
पूर्व परिचय

श्री हित हरिवंश चन्द्र के प्रेम-मार्ग पर चलने वाले भक्तजन हित धर्मी कहे गये हैं क्योंकि वे हित धर्म का पालन करते हैं। इन धर्मियों के कर्त्तव्य कर्म क्या हैं? इसका ही इस प्रकरण में संक्षेप वर्णन है। यहाँ कर्तव्य-कर्मों की क्रियात्मक व्याख्या न होकर भावनात्मक व्याख्या है। क्योंकि भावना की शुद्धि और पुष्टि हो जाने पर क्रियाएँ अपने आप शुद्ध हो जाती हैं। अस्तु इस प्रकरण में क्रमशः हित धर्मियों का सङ्ग, श्रीहरिवंश-नाम स्मरण-गान, अनन्यता, निर्भरता और श्री हरिवंश के प्रति सर्वस्व-समर्पण के वर्णन के साथ अन्त में फल की प्राप्ति के निर्देश में बताया गया है कि

जब राधिका स्याम प्रसन्न भये।

तब नित्य समीप सो खैचि लिये।।

यह नित्य-विहार की प्राप्ति ही हित-धर्मी का अन्तिम लक्ष्य और फल है। प्रत्येक कर्त्तव्य, कर्म, धर्म, साधना उपासना का लक्ष्य अनन्त सुख की प्राप्ति है। वह अनन्त सुखों का मूल-श्रीसेवकजी के वर्णनानुसार श्रीहरिवंशचन्द्र द्वारा प्रकटित श्री वृन्दावन-विहार है, जिसकी प्राप्ति के लिये यथोचित विधानों का ही इस प्रकरण में सङ्केत है।

पद – 1

पहिले हरिवंश सुनाम कहाँ।

हरिवंश सधर्मिन संग लैहै।।

हरिवंश सु नाम सदा तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥१॥

भावार्थ – सर्वप्रथम ‘ श्री हरिवंश’ यह सुन्दर नाम कहो, [तब उस नाम की कृपा से] श्रीहरिवंश के सुधर्मियों का सङ्ग प्राप्त होगा। सुखों की सम्पत्ति रूप श्री युगल किशोर जिनके हैं उन्हीं का यह श्री हरिवंश सुन्दर नाम सदा का अपना है-उनकी निज सम्पत्ति है।

पद – 2

हरिवंश सु नाम कौं नित कैं।

मिलि ही कहौ कृत्य सु धर्मिनु क॓॥

हरिवंश उपासना हैं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके ॥

भावार्थ – नित्य-निरंतर ‘ श्री हरिवंश’ इस नाम को ही रटते ( कहते ) रहो और मन मिलाकर [प्रीतिपूर्वक] सुधर्मियों के लीला चरित्रों (कृत्यों) का गान करो। [जो ऐसा करते हैं, और जिनकी सुखमयी सम्पत्ति केवल युगल सरकार हैं, [वही सच्चे धर्मी हैं, वास्तव में ] उन्हीं के श्रीहरिवंश उपासना है, [अन्य के नहीं।]

पद – 3

हरिवंश गिरा रस-रीति कहैं।

सुकृती जन संगठन नित्य रहैं ॥

कछु धर्म विरुद्ध नहीं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥

भावार्थ – जो हरिवंश की वाणी और उनके द्वारा प्रकाशित राजनीति का कथन-वर्णन करता हो और सदा पुण्यात्मा (हित धर्मी-जनों) के सत्सङ्ग में रहता तथा सुख की संपत्ति युगल-दम्पत्ति ही जिनके अपने हों ऐसे धर्मियों के लिये [उनका यह कर्त्तव्य] कुछ भी धर्म विपरीत नहीं है।

पद – 4

हरिवंश प्रसंसत नित्य रहैं।

रस रीति विवर्धित कार्य कहै।

जु कछू कुल कर्म नहीं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके।

भावार्थ – जो जन नित्य निरन्तर श्रीहरिवंश की ही प्रशंसा करते, (अर्थात् उनके लीला-गुण प्रभाव आदि का गान करते रहते हैं), [नित्य-विहार उपासना सम्बन्धी] रस-रीति के बढ़ाने वाले लीला-चरित्र, सेवा-भावना क्रिया आदि का कथन-श्रवण करते हैं एवं श्रीयुगल किशोर रूप सुख-सम्पदा जिनकी अपनी है वे सब तरह से कृतकृत्य हैं। उनके लिये अब कुछ भी व्यवहार आदि कर्म शेष नहीं हैं। [यदि वे कुल व्यवहारादि कृत्यों को न भी करें, तो उनको उससे कोई हानि नहीं हैं।]

पद – 5

हरिवंश सु नाम जु नित्य रटैं।

छिन जाम समान न नैंकु घंटे॥

विधि और निषेध नहीं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥

भावार्थ – जो नित्य श्री हरिवंश नाम ही रटते हैं। जिनके नाम-स्मरण में घड़ी-प्रहर सब एक से ही बीतते हैं जो कभी जरा भी अपनी अविच्छिन्न धारा से हटते नहीं और न घटते ही हैं और जो सुख की सम्पदा दम्पत्तिजू (किशोर-किशोरी) से आत्मीयता रखते हैं, उनके लिये [शास्त्रीय] विधि-निषेध क्या? कुछ भी नहीं है, (अर्थात् वे विधि-निषेध के बन्धनों से ऊपर हो चुके हैं।)

पद – 6

हरिवंश सुधर्म जु नित्य करें।

हरिवंश कही सु नहीं बिसरे ॥

हरिवंश सदा निधि हैं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके।

भावार्थ – जो सदा श्रीहरिवंश के सुन्द धर्म का पालन करते हैं और श्रीहरिवंश ने जो कहा है, उसे नहीं भूलते। युगल सरकार से जिनका ऐकान्तिक प्रेम है, ऐसे प्रेमियों के लिये तो श्रीहरिवंश उनकी सदा की निधि हैं- वे उन प्रेमियों से विलग होना ही नहीं जानते।

पद – 7

हरिवंश प्रतापहिं जानत हैं।

हरिवंश प्रबोध प्रमानत हैं।

हरिवंश सु सर्वस्व हैं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥

भावार्थ – जो श्री हरिवंश के प्रताप (महत्व, स्वरूप) को ठीक-ठीक जानते हैं, जो श्री हरिवंश के द्वारा कहे गये वचनों को ही अपने लिये उत्तम बोध (विवेक, समझ) मानते हैं एवं सुख सम्पत्ति दम्पति ही जिनके अपने हैं उनके तो श्री हरिवंश ही सर्वस्व हैं।

पद – 8

हरिवंश विचार परे जु रहैं।

हरिवंश धरम्म बुरा निगाहें ॥

हरिवंश निबाहक हैं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनकैं॥

भावार्थ – जो श्री हरिवंश (विचारों के ही) परायण हैं उनके धर्म की धुरी को धारण करके उसे निभाना चाहते हैं, ऐसे अनन्य उपासकों के धर्म का निर्वाह श्री हरिवंश ही करते हैं, क्योंकि सुखमय सम्पत्ति दम्पत्ति के वे उपासक हैं।

पद – 9

हरिवंश रसायन पीवत हैं।

हरिवंश कहैं सुख जीवत हैं ॥

हरिवंश हृदय व्रत हैं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥

भावार्थ – अब जिनके श्रीयुगल किशोर ही सुख सम्पत्ति हैं वे श्रीहरिवंश-वाणी और श्रीहरिवंश-रसरीति को ही कहते [सुनते] हैं एवं श्री हरिवंश नाम को ही कहते और श्री हरिवंश नाम को ही सुनते हैं, (अर्थात् उनके लिये श्री हरिवंश नाम-वाणी के सिवाय और कहीं कुछ नहीं है।) ऐसे हित ध र्मियों के हृदय में तो श्री हरिवंश का ही एक दृढ़तम व्रत है।

पद – 10

हरिवंश कृपा हरिवंश कहै।

हरिवंश कहैं हरिवंश लहैं।

हरिवंश सु लाभ सदा तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥

भावार्थ – कोई भाग्यवान् ही श्रीहरिवंश-कृपा से ‘श्री हरिवंश’ यह नाम कह पाता है और जो ‘श्री हरिवंश’ कहता है वह श्री हरिवंश को पाता भी है। सुखमय दम्पति (श्रीराम वल्लभ लाल) ही जिनकी सम्पत्ति है; उनके लिये तो श्रीहरिवंश ही परम लाभ हैं।

पद – 11

हरिवंश परायन प्रेम भरे।

हरिवंश सा मंत्र जपें सुधरे ॥

हरिवंश सु ध्यान सदा तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥

भावार्थ – जो श्रीहरिवंश के रसमय प्रेमसे परिपूर्ण हैं जो भली प्रकार श्री हरिवंश’ इस सुन्दर मन्त्र का ही जप करते हैं और सुख-सम्पत्ति दम्पति ही जिनके सर्वस्व हैं, उन प्रेमियों के लिये श्रीहरिवंश ही सुन्दर ध्यान हैं।

पद – 12

नित श्रीहरिवंश सु नाम कहैं।

नित राधिका स्याम प्रसन्न रहें।

नित साधन और नहीं तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके॥

भावार्थ – जो नित्य निरन्तर श्री हरिवंश’ यही सुन्दर नाम कहता रहता है उस पर श्री राधिका एवं श्री श्याम सुंदर भी नित्य प्रसन्न रहते हैं । जिसके लिये सुख सम्पत्ति दम्पति जू सर्वस्व हैं, फिर उनके लिये और-और साधनों की क्या आवश्यकता है? अर्थात् उनके लिए तो और साधनों का महत्व ही नहीं है।

पद – 13

जब राधिका स्याम प्रसन्न भये।

तब नित्य समीप सु खैचि लये॥

हरिवंश समीप सदा तिनकैं।

सुख संपति दंपति जू जिनके ॥

भावार्थ – जब [श्री हरिवंश-कृपा से] श्री राम एवं श्रीश्याम प्रसन्न हुए तो उन्होंने [उस कृपापात्र अधिकारी जीव को अपने समीप सदा के लिये खींच लिया, जहाँ पर श्रीहरिवंश श्रीयुगल किशोर के समीप नित्य विराजते हैं, फिर तो ऐसे कृपापात्र के लिये सुख की सम्पत्ति श्री युगल किशोर श्रीराम वल्लभ लाल तो उनके अपने ही हैं।

पद – 14

नित नित श्रीहरिवंश-नाम, छिन-छिन जु रटत नर।

नित नित रहत प्रसन्न, जहाँ दंपति किशोर वर॥

जहाँ हरि तहाँ हरिवंश, जहाँ हरिवंश तहाँ हरि।

एक शब्द हरिवंश नाम, राख्यौ समीप करि॥

हरिवंश नाम सु प्रसन्न हरि, हरि प्रसन्न हरिवंश रति।

हरिवंश चरण सेवक जिते, सुनहु रसिक रसरीति गति॥१५॥

भावार्थ – जो जन सदा-सर्वदा प्रतिक्षण ‘श्रीहरिवंश’ नाम ही रटते रहते हैं, उन पर नव-किशोर वर दम्पति श्रीराधावल्लभलाल सदा-सदा प्रसन्न रहते हैं। यह सिद्धान्त है कि जहाँ पर श्री हरि हैं, वहाँ श्रीहरिवंश भी हैं और इसी प्रकार जहाँ श्रीहरिवंश’ हैं, वहाँ श्रीहरि भी अवश्य होंगे। यह दोनों की अभेद स्थिति तो ‘हरिवंश’ नाम से ही सिद्ध है कि इस ‘हरिवंश’ नाम ने एक ही शब्द से दोनों को समीप (एकीभाव) कर रखा है। श्री हरिवंश नाम (स्मरण भजन) से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं और श्रीहरि की प्रसन्नता प्राप्त होने पर श्रीहरिवंश के चरणों की प्रीति प्राप्त होती है।

श्री सेवक कहते है-हे रसिकों! आप जो जन श्रीहरिवंश-चरणों के सेवक हैं, दास हैं अब रस रीति की गति (मार्ग, रहस्य का वर्णन) सुनिये।


श्रीहित-रस-रीति
( सप्तम् प्रकरण )
पूर्व परिचय

छठे प्रकरण में ग्रन्थकार ने – “सुनहु रसिक रस रीति गति” कहकर इस प्रकरण के विषय का सङ्केत किया है। भाव यह कि यों तो सम्पूर्ण ग्रन्थ ही रसोपासना के सिद्धान्त का पोषक और प्रकाशक है किन्तु इस प्रकरण में विशेष रीति से रस विलास की ओर सङ्केत किया जायेगा ऐसा ग्रन्थकार का लक्ष्य प्रतीत होता है।

अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार श्री सेवक का सर्वप्रथम रस के प्रकाशक का वर्णन प्रथम छन्द में करके दूसरे में रस प्रवाहमयी यमुना का वर्णन करते हैं जिसके निकट (साक्षित्व में) यह रस-लीला होती है। चौथे छन्द में रस भूमि अधिष्ठान श्री वृन्दावन का वर्णन करके क्रमश पाँचवें और छठे में श्रीराधा और श्रीकृष्ण के किशोर रसिक स्वरूप का वर्णन करते हैं। सातवें छन्द में श्रीवन की बाह्य केलि रासादि का वर्णन करके आठवें में रति-विहार विषयक हास-परिहास का वर्णन करते हैं और अन्तिम नवम छन्द में श्रीहित-हरिवंश के इष्ट तत्व तल्प-विहार का वर्णन कर देते हैं।

इस वर्णन क्रम का सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर पता चलेगा कि विहार-रस वर्णन का उद्गम और पर्यवसान किस सुन्दर क्रम से हुआ है कि अवतार-क्रम से लेकर नित्य-विहार तक स्थूल से सूक्ष्म तक एक लड़ी बँध गयी है।

सम्पूर्ण ग्रन्थ में केवल इसी प्रकरण के छठे छन्द में ‘वृषभान नन्दिनी’ पद देकर आप ब्रज रसिया अवतार लीला से नित्य विहार तक की एक श्रृंखला स्थापित कर देते हैं।

पद – 1

अब प्रथम छन्द में रस रीति प्रकाशक रसिक आचार्य श्री हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद के तात्विक स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं

व्यास नंदन जगत आधार।

जगमगात जस, सब जग बंदनीय, जगभय विहंडन।

जग सोभा, जग संपदा, जग जीवन, सब जग मंडन।

जग मंगल, जग-उद्धरण, जग निधि, जगत प्रसंस।

चरन शरन सेवक सदा, सु जै जै श्री हरिवंश॥१॥

भावार्थ – व्यास नन्दन श्रीहरिवंशचन्द्र ही समस्त जगत् के आधार हैं, जिनका यश सारे विश्व में जगमगा रहा है। जो समस्त जगत् के वन्दनीय हैं, जो संसार के भय को नष्ट कर देने वाले हैं जो विश्व की शोभा, विश्व की एकमात्र सम्पत्ति, विश्व के जीवन और विश्व-भूषण हैं। ये जगत् का मंगल करने वाले, जगत का उद्धार करने वाले, विश्व की निधि और संसार से प्रशंसनीय हैं। ‘सेवक’ सदा-सदा इन्हीं की चरण-शरण में है, इन श्रीहरिवंशचन्द्र की जय-जय हो।

पद – 2

इस दूसरे छन्द में क्रीड़ा स्थली श्रीवन में स्थित श्रीयमुना जी का स्वरूप और उनके तटवर्ती लता- कुंज का वर्णन करते हैं क्योंकि ये लतागृह ही रस-क्रीड़ा के केन्द्र हैं

जयति जमुना विमल वर वारि।

सीतल तरल तरंगिनी, रत्न बद्ध विवि तटी विराजत।

प्रफुलित बिबिध सरोजगन, चक्रवादि कल हंस राज॥

कूल बिसद वन द्रुम सघन, लता भवन अति रम्य।

नित्य केलि हरिवंश हितसु ब्रह्मादिकनि अगम्य॥२॥

भावार्थ – निर्मल और श्रेष्ठ जल से युक्त श्रीयमुना जय-जयकार को प्राप्त हैं जो शीतल और चञ्चल तरंगों से पूर्ण हैं और जिनके दोनों तट रत्नादिकों से सुबद्ध सुशोभित हैं। जल में जहाँ अनेकों प्रकार के कमल खिल रहे हैं एवं चक्रवाक आदि पक्षियों और सुन्दर हंसों के समूह के समूह शोभित हैं। परम पावन पुलिन पर शोभित श्रीवन सघन द्रुमों से पूर्ण है एवं जहाँ पर अत्यन्त रमणीय लता-भवन विराज रहे हैं । यमुना के इसी तट पर श्री हित हरिवंश चन्द्र की नित्य केलि होती रहती है जो ब्रह्मा आदि के लिये अगम्य है।

पद – 3

श्री हित हरिवंश चन्द्र की प्रकाशित की हुई रस क्रीड़ा में युगल-किशोर का स्वरूप

मूल-सुघर सुंदर सुमति सर्वज्ञ।

संतत सहज सदा सदन, सघन कुंज सुख पुंज बरषत।

सौरभ सरस सुमन चैंन अजित सेन सुरंग हरषत॥

केलि बिसद आनंद रसद, बेलि बढ़त नित जाम।

ठेलि निगम-मग पग सुभग, खेलि कुँवर वर बाम॥

भावार्थ – श्री प्रिया लाल की यह जोड़ी नित्य और स्वाभाविक होने के साथ-साथ सुघर, सुन्दर, परम चतुर एवं सर्वज्ञ भी है। सदा-सर्वदा सघन कुञ्ज-सदन में सुख समूह की वर्षा करती रहती है। [उस सघन कुंज सदन में] सरस सुगन्ध युक्त कोमल पुष्पों से सज्जित शय्या पर विराजमान् होकर युगल-किशोर आनन्द-सुख प्राप्त करके हर्षित होते हैं। युगल-किशोर की केलि पवित्र एवं रसदायक है और जहाँ आनन्द रूपी लता नित्य ही उदित होती और बढ़ती रहती है। जहाँ युवती-शिरोमणि सुन्दरी श्री राम एवं कुँवर वर श्रीलाल जी वेद-मार्ग की मर्यादा को चरणोंसे ठेल अर्थात् तिरस्कृत कर निरन्तर क्रीड़ा परायण रहते हैं।

पद – 4

इस छन्द में युगल-किशोर की रस-रूपता का निर्देश किया जा रहा है

रसिक रमनी रसद रस राशि।

रस-सीवाँ, रस-सागरी, रस निकुंज, रसपुंज बरषत।

रसनिधि,सुविधा रसज्ञ, रस रेख रीति-रस, प्रीति हरषत॥

रस मूरति, सूरति सरस, रस बिलसनि रस रंग।

रस प्रवाह सरिता सरस, रति-रस लहरि तरंग।।४॥

भावार्थ – रसिक श्री लालजी एवं रमणी श्रीराधा दोनों ही रस के दाता और रस की राशि हैं। प्रियतम रस की सीमा और प्रिया रस की समुद्र रूपा हैं दोनों रसमय निकुंज भवन में रस समूह की वृष्टि करते रहते हैं। दोनों रस के भण्डार और भली प्रकार रसज्ञ हैं। दोनों रस की मर्यादा रेखा हैं, और रस रीति की प्रीति से ही प्रसन्न रहते हैं। युगल-किशोर रस की मूर्ति हैं जिनकी छवि बड़ी ही सरस है। आपका सुख विलास भी रसमय है और आनन्द क्रीड़ा भी रसमय। युगल-किशोर रस-धारामय रस सरिता भी हैं और उसमें उठने वाली रति रस की लहरें-तरङ्ग भी ये ही हैं।

पद – 5

इस छन्द में श्रीलाल जी के स्वरूप का वर्णन करते हैं

स्याम सुंदर उरसि बनमाल।

उरगभोग भुजदंड वर, कंबु कंठ मनिगन बिराजत।

कुंचितकच, मुख तामरस, मधु लंपट जनु मधुप राजत॥

सीस मुकुट, कुंडल श्रवण मुरली अधर त्रिभंगा।

कनक कपिस पट सोभिअत, (अति )जनु घन दामिनि संग॥

भावार्थ – श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के हृदय देश पर बनमाला शोभित है। श्रेष्ठ भुज-दण्ड उरग-भोगी मयूर के श्यामवर्ण के समान हैं और शंख सी ग्रीवा में मणि-समूहों की मालाएँ शोभित हैं । कमल से मुख के चारों ओर घुंघराले लगे इस प्रकार फबी हैं जैसे मधु के लोभी भ्रमर कमल का रस पान करने के लिये जुटे हों। आपके सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल और अधरों पर मुरली है। आप ललित त्रिभङ्गी गतिसे खड़े हैं। श्याम घन से दिव्य वपु पर पीले-पीले रेशमी वस्त्र ऐसे शोभा पा रहे हैं जैसे मेघों के साथ दामिनि।

पद – 6

पाँचवें छन्द में विशुद्ध रूप से रसमूर्ति श्री लालजी का वर्णन करके अब और प्रिया जी का वर्णन करते हैं

सुभग सुंदरी सहज सिंगार।

सहज सोभा सर्वांग प्रति, सहज रूप वृषभानु नंदिनी।

सहजानंद कदंबिनी, सहज विपिन वर उदित चंदिनी॥

सहज केलि नित नित नवल, सहज रंग सुख चैन।

सहज माधुरी अंग प्रति, सु मोपै कहत बनै न ६ ॥

भावार्थ – परम सुन्दरों में भी सुन्दर, स्वाभाविक शृङ्गार, स्वाभाविक शोभा एवं सर्वांग प्रति सहज रूप लावण्यमयी श्री वृषभान नंदनी ही हैं। आप सहज (स्वाभाविक) आनन्द की समूह एवं विपिन राज श्री वृन्दावन में नित्य उदित स्वाभाविक चन्द्रिका हैं अनन्त ज्योति हैं। आपकी केलि (क्रीडा विलासादि) सहज स्वाभाविक,नित्य नित्य नवीन,सहजानन्द-समूह मई, सहज सुखमयी और सहज शान्तिमयी है। आपके अङ्ग-अङ्गों में सहज माधुर्य है, जो मुझसे कहते नहीं बनता अर्थात् अनिर्वचनीय है।

पद – 7

युगल सरकार के स्वरूप का परिचय देकर अब उनकी रस क्रीड़ा का वर्णन करते हैं

विपिन निर्यात रसिक रस राशि।

दंपति अति आनंद बस, प्रेम मंत्र निस्संक क्रीड़त।

चंचल कुंडल कर चरन, नैन लोल रति रंग ब्रीड़ा॥

झटकत पट चुटकी चटक, लटकत लट मृदु हास।

पटकत पद उघटत सबद, मटकत भृकुटि विलास॥

भावार्थ – रस की राशि युगल-किशोर रसिक-वर श्रीवृन्दावन में नृत्य कर रहे हैं- अत्यन्त आनन्द के वश में हुए प्रेम-मत्त दम्पति (युगल-किशोर) नि:शंक भाव से क्रीड़ा परायण हैं। क्रीड़ा के समय आपके कुण्डल चंचल हो उठते हैं। आप हाथों, चरणों एवं नेत्रों की चपलता से साक्षात् रति के आनन्द-विनोद को भी लजा देते हैं। कभी परस्पर में एक दूसरे के वस्त्रों को झटक देते हैं, तो कभी उँगलियों से चुटकियाँ चटकाते हैं। नृत्य में लटें लटक-लटक पड़ती हैं और आप मन्द और मधुर हास करते जाते हैं। साथ ही चरणों को ताल स्वर पूर्वक पटकते, [तदनुसार ता ता थेई आदि] शब्दों का उच्चारण करते और लीला पूर्वक अपनी भृकुटियों को भी मटकाते-नचाते हैं।

पद – 8

नवल नागरि नवल जुवराज।

नव नव वन घन क्रीड़ा, नव निकुंज वसंत सर्वस्व।

नव नव रति नित नित बढ़त, नयौ नेह नव रंग नयौ रसु॥

नव विलास कल हास नव, मधुर सरस मृदु बैन।

नव किशोर हरिवंश हित, सु नवल नवल सुख चैन॥

भावार्थ – नवल नागरी श्रीराधा एवं नव-युवराज श्रीकृष्ण इस नित्य नव-वन श्रीवृन्दावन में जो अत्यन्त सघन है, अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हैं और नव-निकुञ्ज में परस्पर के सर्वस्व दान पूर्वक सुख विलास करते हैं। दोनों में नित्य- नित्य नई नई रति-प्रीति की वृद्धि होती, नया स्नेह, नया ही आनन्द रङ्ग और नया ही विलास, नव-नव हास्यादि का माधुर्य, और सरस वचनावली का प्रकाश होता रहता है। श्रीहित हरिवंश के ये नव युगल किशोर नित्य ही नये-नये सुख एवं आनन्द का आस्वादन करते रहते हैं।

पद – 9

इस अन्तिम छन्द में रस विहार की सर्वोपरिता के साथ माधुर्य एवं रसानन्द का वर्णन करते हैं

नवल-नवल सुख चैन, न अपने आप बस।

निगम लोक मर्जाद, भंजि क्रीड़ा रंग रस॥

सुरत प्रसंग निसंक, करत जोई-जोई भावत मन।

ललित अंग चल भंगि, भाइ लज्जित सु कोक गन।

अद्भुत विचार हरिवंश हित, निरखि दासि सेवक जियत।

विस्तरत सुनत गावत रसिक, सु नित नित लीला-रस पियत॥९॥

भावार्थ – नवल युगल-किशोर नित्य नव-नव सुख एवं आनन्द के भण्डार हैं। वे केवल अपने आपके आधीन हैं, उन पर किसी और (वेद-शास्त्र-मर्यादा आदि) का कोई अधिकार या शासन नहीं है अत: ये युगलकिशोर समस्त वेद एवं लोक की मर्यादाओं को तोड़ताड़ कर अपने स्वच्छन्द आनन्द बिहार की क्रीड़ा करते रहते हैं। क्रीड़ा के अवसर पर सुरत-प्रसङ्ग आदि जो-जो कुछ इनके मन आता है-इन्हें अच्छा लगता है, नि:संकोच भाव से वही वही करते हैं। आपके अंगों के लालित्य चाञ्चल्य, भङ्गिमा एवं हाव-भावों को देखकर लोक-कलाओं के समूह भी लजाते हैं।

श्रीसेवकजी कहते हैं कि यह निःशङ्क एवं लोक-वेदातीत, अद्भुत विहार श्रीहित- हरिवंश का ही है, अर्थात् उनके द्वारा प्रकटित है या उनका ही अपना रूप है; जिसका दर्शन करके दासियाँ (सखियाँ, सहचरियाँ, सहेलियाँ एवं सेविकाएँ सभी) अपना जीवन धारण करती हैं। सखियां इसी रस का विस्तार करती, गान करती, श्रवण करती और इसी लीला रस का निरन्तर पान करती हैं।


श्रीहित अनन्य टेक
( अष्टम् प्रकरण )
पूर्व परिचय

प्रेम अपनी प्रथम अवस्था में किसी नाम रूप विशेष के आश्रयत्व में प्रकट होकर फिर अन्तिम अवस्था में व्यापक हो जाता है। उसे प्राथमिक अवस्था में एकान्तिक स्थिरता के लिये अनन्यता की आवश्यकता है। आवश्यकता क्यों है? यह एकान्तिक अनन्यता तो उसका सहज स्वभाव होता है। प्रेमी को अपने प्रेमास्पद की ही बातें प्रिय लगतीं हैं, वह उसे ही देखना चाहता और केवल उसी से सम्बन्ध रखना चाहता है। उस प्रेमी के लिये अपने प्रियतम के सिवाय सारा संसार (कुछ नहीं है) शून्य के बराबर है।

अस्तु, इस प्रकरण में सेवकजी ने ऐसी ही अनन्य निष्ठा का प्रकाशन किया है। आपने पूर्व प्रकरणों में श्रीहरिवंश तत्व का स्पष्टीकरण करके यह बता दिया कि श्रीहरिवंशचन्द्र केवल आचार्य नहीं; अपितु परात्पर प्रेम तत्व हैं जो सर्वव्यापक के साथ एकदेशीय, चर, अचर, स्थूल, सूक्ष्म और कारण से भी परे हैं। यही श्रीप्रिया हैं, यही प्रियतम श्रीकृष्ण, यही वृन्दावन हैं और यही सहचरिगण; अर्थात् नित्य विहार के दिव्य परिकर के मूल कारण आप ही हैं। इन प्रेम रूप श्रीहरिवंशचन्द्र की ही आराधना की आवश्यकता भी उन्होंने प्रकट की। साथ-साथ उस उपासना की शैली आदि का भी निरूपण किया। उसी शैली निरूपण के क्रम में अनन्यता भी एक विषय है।

प्रेम रस का साधक अपने इष्ट तत्व के प्रति अनन्य हो जाय, केवल उसी में डूब जाय, अपनी बुद्धि को बहुमुखी न बनाकर एकमुखी बनावे। यह किस प्रकार होगा? इसके लिये उन्होंने स्वयं अपनी निष्ठा का प्रकार और फल वर्णन करके उपासकों में एक विश्वास की लहर पैदा कर दी है। सेवक जी की अनुभव पूर्ण छाप के साथ-साथ उनकी “हरिवंश दुहाई” शपथ, इस प्रकरण की ही क्या इस सम्पूर्ण ग्रन्थ की आत्मा है। इस विश्वास और अनुभव के सम्बल के ही सहारे साधक का पथ पूर्ण होगा।

इस सम्पूर्ण प्रकरण में अनन्यता सम्बन्धी प्रायः आठ बातों पर विचार किया गया है वे बातें इस प्रकार हैं-समस्त कर्म-धर्म देवोपासना आदि के त्यागपूर्वक श्रीहरिवंश उपासना, इस उपासना में जाति-पाँति, कुल धर्म, विधि निषेध आदि को महत्व न देना, श्रीहरिवंश नाम की अनन्य निष्ठा, अनन्य भावेन रस मूर्त्ति श्रीराधावल्लभलाल के कैशोर रस में ही निष्ठा; मान-अपमानादि में समभाव; श्रीहरिवंशचन्द्र द्वारा वर्णित केलि रस में ही निष्ठा; अवतारों से उठकर अवतारी तत्व श्रीराधावल्लभ में ही स्थिरता, और सबके मूल श्रीहरिवंशचन्द्र के नाम और रस में प्रीति ।

इस प्रकार यह सम्पूर्ण प्रकरण साधक के चित्त को सब ओर से समेट कर एकान्तिक बना देने का आदेश देता है। अब प्रथम छन्द में श्रीसेवकजी अपनी निष्ठा के विचार से सर्वस्व के तिरस्कार पूर्वक अपनी इष्ट उपासना का लक्ष्य प्रकाशित करते हैं

पद – 1

मूल कोउ बहुविधि देवतनि उपासी ।

कर्म धर्म कोउ करहु वेद विधि,

कोउ तीरथ तप ज्ञान ध्यान व्रत,

अरु कोड निर्गुन ब्रह्म उपासी ॥

कोउ जम नेम करत अपनी रुचि,

कोड अवतार कदंब उपासी।

मन क्रम वचन त्रिशुद्ध सकल मत,

हम श्रीहित हरिवंश उपासी ॥

भावार्थ – कोई वेदों की विधि (नियम) के अनुसार कर्म-धर्मों का पालन करते हो तो करो; यदि कोई बहुत प्रकार से देवताओं के ही उपासक हैं, कोई तीर्थाटन, तपस्या, ज्ञान-लाभ, ध्यान एवं व्रत उपवास आदि करते हैं और कोई निर्गुण ब्रह्म के ही उपासक हैं, इसी प्रकार कितने ही अपनी-अपनी रूचि के अनुसार यम-नियमादि का पालन करते हैं तो करें, यदि और कितने एक अवतार-समूह के उपासक हैं तो रहें तु हम तो मन, वचन और कर्म इन तीनों की शुद्धि पूर्वक समस्त मतों के भी सार रूप श्रीहित हरिवंश के ही उपासक हैं, अन्य किसी के नहीं।

पद – 2

जाति पाँति कुल कर्म धर्म व्रत, संसृति हेतु अविद्या नासी ।

सेवक रीति प्रतीति प्रीति हित, विधि निषेध श्रृंखला बिनासी ॥

अब जोई कही करैं हम सोई,आयुस लियें चलैं निज दासी ।

मन क्रम वचन त्रिसुद्ध सकल मत,हम श्रीहित हरिवंश उपासी ॥

भावार्थ – हमने श्रीहित हरिवंश उपासना को स्वीकार करके अपनी जाति, पाँति, कुलोचित कर्म, धर्म, व्रत और आवागमन के मूल कारण अविद्या का विनाश कर दिया है। सेवक की (मेरी) अपनी प्रतीति और प्रीति तो हित में है और इसीसे हमने वेदोक्त विधि और निषेधों की श्रृंखला का भञ्जन कर दिया है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र ने जो कुछ कहा है, हम वही वही करते और उन निजदासी की ही आज्ञाओं का पालन करते हैं। हम मन, वचन एवं कर्म से त्रिशुद्ध होकर समस्त मतों के सार श्रीहित हरिवंशचन्द्र की उपासना करते हैं उनके उपासक हैं।

पद – 3

जो हरिवंश कौ नाम सुनावै,तन-मन- प्रान तासु बलिहारी।

जो हरिवंश- उपासक सेवै सदा सेॐ ताके चरन विचारी ॥

जो हरिवंश-गिरा जस गावै, सर्वस दैऊँ तासु पर बारी।

जो हरिवंश कौ धर्म सिखावै, सोई तौ मेरे प्रभु तैं प्रभु भारी॥

भावार्थ – [ श्रीसेवकजी कहते हैं-] जो कोई मुझे श्रीहरिवंश का नाम सुनाता है, उस पर मेरे तन, मन, प्राण सब न्यौछावर हैं। जो कोई श्रीहरिवंश के उपासक जनों का सेवन करता है मैं उसके चरणों का सदा सविचार (सतर्कता पूर्वक) सेवन करता हूँ। जो श्रीहरिवंश की वाणी (ग्रन्थ) का यशोगान करता है मैं उस पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दूँ और जो श्रीहरिवंश के धर्म (अनन्य हित धर्म) को सिखाता है वह तो मेरे प्रभु ( श्रीहरिवंशचन्द्र) से भी महान् प्रभु है, अर्थात् वह मेरे सर्वाधार प्रभु के तुल्य है।

पद – 4

श्रीहरिवंश सुनाद विमोहीं, सुनि धुनि नित्य तहाँ मन दैहौं ।

श्रीहरिवंश सुनंत चलीं संग, हौं तिन संग नित्य प्रति जैहौं ।

श्रीहरिवंश विलास रास रस, श्रीहरिवंश संग अनुभहौं ।

जो हरि नाम जगत्त सिरोमनि, वंश बिना कबहूँ नहिं लैहौं ॥

भावार्थ – जो श्रीहरिवंश ( श्रीकृष्ण की वंशी) की मधुर तान से विमोहित हो गयीं मैं भी उन्हीं (सखियों) की तरह सदा अपने मन को वहीं उसी रस में लगाऊँगा । जो श्रीहरिवंश (श्रीहरि की वंशी) सुनते ही [ श्रीकृष्ण से मिलने के लिये ] एक साथ होकर चल पड़ीं, मैं उन्हीं के साथ सदा-सदा [ सखि रूप से] चलूँगा। मैं श्रीहरिवंश के विलास और रास रस का अनुभव श्रीहरिवंश के ही साथ करूँगा और जो ‘हरि’ नाम त्रिलोकी में शिरोमणि है उसे भी मैं ‘वंश’ से रहित न लूँगा यदि लूँगा तो उसे ‘वंश’ के सहित ‘हरिवंश’ इस रूप में।

पद – 5

प्रेमी अनन्य भजंन न होइ, जो अंतरयामी भजैं मन में।

जौ भजि देख्यौ जशोदा कौ नंदन, ( तौ) विश्व दिखाई सबै तन में ॥

श्रीहरिवंश सुनाद विमोहीं, ते शुद्ध समीप मिलीं छिन में।

अब यामें मिलौनी मिलै न कछू, जब खेलत रास सदा बन में।।

भावार्थ – यदि अन्तर्यामी भगवान् का मन-मन में भजन किया जाय तो वह अनन्य प्रेमियों का भजन नहीं कहा जायेगा, यदि यशोदानन्दन बालकृष्ण के लिये कहें [कि यह अनन्य प्रेमियों का भजनीय स्वरूप है तो यह भी कहते नहीं बनता क्योंकि बालकृष्ण ] यशोदानन्दन ने अपने श्रीमुख में ही सारा विश्व दिखा दिया है (अर्थात् यह भी ऐश्वर्य भावों से पूर्ण बाल रूप है।) किन्तु जिन सखियों ने श्रीहरिवंश ( श्रीकृष्ण की वंशी) की सुमधुर ध्वनि सुनी और जो मोहित हुईं, वे समस्त प्रकार से शुद्ध होकर (अर्थात् ऐश्वर्य, ज्ञान, माहात्म्य आदि से रहित होकर) एक क्षण में ही प्रियतम नव किशोर से जा मिलीं। अतः स्पष्ट है कि इस रास रस में- [ रसोपासना में] और कुछ ज्ञान, ऐश्वर्य आदि की मिलावट तो हो ही नहीं सकती जबकि नवल किशोर सदा सर्वदा श्रीवन में रास- केलि करते रहते हैं (अर्थात् विशुद्ध रस की उपासना कैशोर भाव एवं विहार क्रीड़ा में ही है; अन्यत्र नहीं ।)

पद – 6

जौं बहु मान करै कोउ मेरौ, किये बहु मानत नाहिं बड़ाई।

जौं अपमान करै कोउ कैहूँ, किये अपमान नहीं लघुताई ॥

श्रीहरिवंश गिरा रस सागर, माँझ मगन्न सबै निधि पाई।

जौं हरिवंश तजौं भजौं औरहिं, तौ मोहि श्रीहरिवंश दुहाई ॥

भावार्थ – यदि कोई मेरा अत्याधिक मान-सम्मान करे तो भी मैं उसके द्वारा किये अपने इस अति सम्मान को अपनी कुछ बड़ाई (प्रभुता) नहीं मानता और यदि कोई मेरा किसी प्रकार का अपमान भी करे तो उसके ऐसा करने (अपमान करने ) पर अपनी लघुता (छोटापन) नहीं मानता क्योंकि मैंने तो श्रीहरिवंश वाणी रूपी रस समुद्र में मग्न होकर सम्पूर्ण आनन्द निधि पा ली है; इसलिये [मुझे इन द्वन्द्वों का कोई ध्यान ही नहीं है और जिनकी कृपा से यह स्थिति प्राप्त हुई है उन] श्रीहरिवंश को छोड़ कर मैं किसी और का भजन करूँ तो मुझे उन्हीं श्रीहरिवंश की ही दुहाई ( शपथ) है। (अर्थात् मैं श्रीहरिवंश को ही सर्वसार जानकर अनन्य भाव से उनका ही भजन करता हूँ।)

पद – 7

कही बन केलि निकुंज निकुंजनि, नव दल नूतन सेज रचाई।

नाथ बिरंमि-बिरंमि कही तब, सो रति तैसी धौं कैसे भुलाई ॥

सत्वर उठे महा मधु पीवत, माधुरी बानी मेरे मन भाई ।

जौं हरिवंश तजौं भजौं औरहिं, तौ मोहि श्रीहरिवंश दुहाई ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश चन्द्र ने अपनी वाणी में वर्णन किया है श्रीवृन्दावन की प्रेम क्रीड़ा का। उस क्रीड़ा में आपने कुञ्ज निकुञ्जों में नवीन किशलय दलों से नूतन शय्या रचना का वर्णन किया है। विहार के प्रवाह में प्रियतम ने ‘विरमि विरमि’ ये जो शब्द कहे हैं वे जिस प्रीति से कहे हैं, वह रति भला कैसे भुलाई जा सकती है? इसी प्रकार आपके द्वारा वर्णित भाव कि ” श्रीलालजी, प्रियाजी का महा मधुर अधरामृत पीकर जागृत हो उठे”, इसकी मधुरता मेरे मन को अत्याधिक प्रिय लगी।

श्रीसेवक कहते हैं कि श्रीहरिवंश-वाणी के इस महा मधुर रस का आस्वादन करके भी यदि मैं श्रीहरिवंश को छोड़कर अन्य किसी का भजन करूँ तो मुझे श्रीहरिवंश की ही दुहाई है।

पद – 8

भुज अंसन दीनें बिलोकि रहे, मुख चंद उभै मधु पान कराई।

आपु विलोकि हृदै कियौ मान, चिबुक्क सुचारु प्रलोइ मनाई ॥

श्रीहरिवंश बिना यह हेत, को जानैं कहा को कहै समुझाई ।

जो हरिवंश तजौं भजौं औरहिं, तौ मोहि श्रीहरिवंश दुहाई।।

भावार्थ – युगल सरकार परस्पर एक दूसरे के कन्धों पर भुजाएँ अर्पित किये मुखकमल का दर्शन करते हुए मुख-माधुरी का पान कर रहे हैं। ऐसा हरिवंश वाणी, श्रीहित चौरासी पद संख्या ३२ में वर्णित है। जब [ प्रियतम के ] हृदय में स्वयं की छवि का दर्शन करके श्रीप्रियाजी ने मान कर लिया तो प्रियतम ने आपका सुन्दर चिबुक सहलाकर आपको मना लिया। श्रीहरिवंशचन्द्र के बिना भला कौन इस हित प्रीति को जान सकेगा और समझाकर कह सकेगा?

[ श्रीसेवकजी कहते हैं- ] ऐसे सर्वज्ञ, रसज्ञ एवं मर्मज्ञ श्रीहरिवंश को छोड़कर यदि मैं किसी और का भजन करूँ तो मुझे श्रीहरिवंश की ही दुहाई है अर्थात् मैं कभी भी उनका परित्याग नहीं कर सकता; वही मेरे सर्वस्व हैं।

पद – 9

श्रीहरिवंश सु नाद सुरीति, सुगान मिलैं बन माधुरी गाई ।

श्रीहरिवंश वचन्न रचन्न सु, नित्य किसोर किसोरी लड़ाई |

श्रीहरिवंश गिरा रस रीति सु, चित्त प्रतीति न आन सुहाई।

जो हरिवंश तजौं भजौं औरहिं, तौ मोहि श्रीहरिवंश-दुहाई ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंशचन्द्र ने अपनी सु वाणी में सुनाद ( सुन्दर वंशीनाद), सुरीति (रस-रीति) और सुगान (प्रेम रस गान) द्वारा वृन्दावन-माधुरी का गान किया है। श्री हरिवंश जी ने अपनी वचन-रचना (वाणी) के द्वारा नित्य किशोर एवं नित्य किशोरी का लाड़-दुलार किया है। श्रीसेवकजी कहते हैं मेरे चित्त को तो बस श्रीहरिवंशचन्द्र की वाणी में वर्णित रस-रीति का ही एकमात्र विश्वास है। मुझे इसके सिवाय और कुछ अच्छा ही नहीं लगता; अतएव यदि मैं श्रीहरिवंश को छोड़ किसी और का भजन करूँ, तो मुझे श्रीहरिवंश की ही शपथ है।

पद – 10

श्रीहरिवंश कौ नाम सु सर्वसु, जानि सु राख्यौ मैं चित्त समाई ।

श्रीहरिवंश के नाम प्रताप कौ, लाभ लह्यौ सो कह्यौ नहिं जाई ॥

श्रीहरिवंश कृपा तैं त्रिशुद्ध कै साँची यहै जु मेरे मन भाई ।

जो हरिवंश तजौं भजौं औरहिं, तौ मोहि श्रीहरिवंश दुहाई ॥

भावार्थ – मैंने श्रीहरिवंश के इस सुन्दर नाम को ही अपना सु सर्वस्व समझकर चित्त में धारण कर रखा है और मैंने श्रीहरिवंश नाम प्रताप का जो लाभ पाया है वह तो मेरी वाणी द्वारा कहा भी नहीं जा सकता (अनिर्वचनीय है।) श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा से मन-वचन, कर्म की त्रिशुद्धि के पश्चात् सत्य रूप से मेरे मन में यही बात अच्छी लगी कि यदि मैं श्रीहरिवंश को छोड़ किसी और का भजन करूँ तो मुझे श्रीहरिवंश की ही शपथ है।

पद – 11

देखे जु मैं अवतार सबै भजि, तहाँ-तहाँ मन तैसौ न जाई ।

गोकुलनाथ महा ब्रज वैभव, लीला अनेक न चित्त खटाई ॥

एक ही रीति प्रतीति बँध्यौ मन, मोहीं सबै हरिवंश बजाई।

जो हरिवंश तजौं भजौं औरहिं, तौ मोहि श्रीहरिवंश दुहाई ॥

भावार्थ – मैंने सब अवतारों को भजकर देख लिया [ उनमें कोई ऐसा आकर्षण विशेष नहीं है ] जिससे उनमें मन अपने आप यानि सहज रूप से नहीं लगता | गोकुलनाथ बालकृष्ण की वैभवपूर्ण ब्रज लीलाएँ भी अनेक हैं; तथापि उनमें भी मेरा चित्त रुचि नहीं मानता या वे लीलायें मेरे चित्त में नहीं खटातीं अपितु मेरा मन तो एक ही रीति की प्रतीति ( विश्वास) में बँध चुका है; वह क्या? जो श्रीहरिवंश ने डंके की चोट में अपनी रसरीति से सबको मोहित कर लिया है, किंवा श्रीहरि ने वंशी बजाकर जिस रीति से सबको मोहित कर लिया; बस उसी रस रीति की प्रतीति मेरे मन में है अन्य की नहीं; अतएव ऐसे रस रूप श्रीहरिवंश को छोड़कर यदि मैं किसी और का भजन करूँ तो करूँ कैसे ? यदि करूँ तो मुझे श्रीहरिवंश की दुहाई है अर्थात् मैं ऐसा त्रिकाल में नहीं कर सकता।

पद – 12

नाम अरद्ध हरै अघ पुंज, जगत्त करै हरि नाम बड़ाई।

सो हरि वंश समेत संपूरन, प्रेमी अनन्यनि कौं सुखदाई ॥

श्री हरिवंश कहंत सुनंत, छिन छिन काल वृथा नहिं जाई ।

जो हरिवंश तजौं भजौं औरहिं, तौ मोहि श्रीहरिवंश दुहाई ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश’ नाम का केवल आधा ‘हरि’ ही समस्त पाप-समूहों का नाश करने में समर्थ है इसलिये विश्व इस ‘हरि’ नाम का यशोगान करता है। किन्तु वही ‘हरि’ नाम वंश के साथ मिलकर ‘हरिवंश’ इस सम्पूर्ण रूप में अनन्य प्रेमियों के लिये सुखदायक बनता है केवल ‘हरि’ आधे रूप में नहीं। इस श्रीहरिवंश नाम का कथन-श्रवण करते कराते क्षण भर समय भी वृथा नहीं जाता, सब सार्थक होता है; अतएव मैं निरन्तर केवल इसी का भजन करता हूँ, यदि इस श्रीहरिवंश नाम को छोड़कर किसी और का भजन करूँ तो मुझे श्रीहरिवंश की ही दुहाई है।

पद – 13

श्रीहरिवंश सु प्रान, सु मन हरिवंश गनिज्जै ।

श्रीहरिवंश सु चित्त, मित्त हरिवंश भनिज्जै ॥

श्रीहरिवंश सु बुद्धि, बरन हरिवंश नाम जस।

श्रीहरिवंश प्रकाश, बचन हरिवंश गिरा रस ।

हरिवंश नाम बिसरै न छिन, श्रीहरिवंश सहाय भल।

हरिवंश चरन सेवक सदा, सपथ करी हरिवंश बल ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश मेरे सुन्दर प्राण हैं, श्रीहरिवंश ही सुन्दर मन हैं, ऐसा जानिये। श्रीहरिवंश ही सुन्दर चित्त और श्रीहरिवंश ही मित्र कहे जाते हैं। श्रीहरिवंश सुन्दर बुद्धि और श्रीहरिवंश के चार वर्ण ही सुयश हैं। श्रीहरिवंश के वचन ( प्रबोध, उपदेश) ही प्रकाश (दिव्य ज्ञान) और श्रीहरिवंश की वाणी रस रूपा है।

श्रीसेवकजी कहते हैं कि मैं सदा सर्वदा श्रीहरिवंश चरणों का ही सेवक हूँ। मुझे श्रीहरिवंश नाम एक क्षण के लिये भी नहीं भूलता और श्रीहरिवंश ही मेरे परम सहायक हैं; अतः मैंने उन्हीं के बल पर उन्हीं (श्रीहरिवंश) की शपथ ली है।


श्रीहित अकृपा-कृपा लक्षण
( नवम् प्रकरण )
पूर्व परिचय

यों तो सब प्राणियों पर प्रभु की कृपा समान रूप से है ही; क्योंकि सब जीव उनके ही अंश हैं, किन्तु यहाँ पर ‘कृपा और अकृपा’ नाम से जिस कृपा का वर्णन किया गया है, इस का अभिप्राय विशेष कृपा से है। प्रभु कृपा से सम्पन्न जीव वही कहा जायगा जो प्रभु प्रेम से सम्पन्न होगा। श्रीहरिवंश-चरणाश्रित होकर युगल किशोर के दिव्य प्रेम रस का जिन किन्हीं बड़भागी जनों ने पान किया है, वे सब भी प्रभु कृपा से सम्पन्न हैं। जिन्होंने उसका आस्वादन नहीं किया, फिर वे कितने ही बड़े क्यों न कहलाते हों, कृपा से रीते कृपा रहित ही हैं। श्रीसेवकजी का यही मत है।

इस प्रकरण में श्रीहरिवंश कृपा से रहित जीवों का परिचय और श्रीहरिवंश कृपा सम्पन्न जीवों का परिचय दो खण्डों में अलग-अलग सोरठों में दिया गया है। प्रथम अकृपा के दस सोरठे इस प्रकार हैं

अकृपा लक्षण

पद – 1

सब जग देख्यौ चाहि, काहि कहौं हरि-भक्ति बिनु ।

प्रीति कहूँ नहिं आहि, श्रीहरिवंश-कृपा बिना ॥

भावार्थ – [ श्रीसेवकजी कहते हैं-] मैंने सब संसार को अच्छी प्रकार (छान बीनकर) देख लिया है। तब किसके लिये कह दूँ कि ये “हरि-भक्ति-विहीन” हैं अर्थात् ‘हरि-भक्ति’ तो सबमें है परन्तु श्रीहरिवंश कृपा के बिना प्रीति अवश्य कहीं नहीं हैं; [ क्योंकि श्रीहरिवंश कृपा में ही प्रीति का उदय है।]

पद – 2

गुप्त प्रीति कौ भंग संग प्रचुर अति देखियत ।

नाहिंन उपजत रंग, श्रीहरिवंश कृपा बिना ॥

भावार्थ – प्राय: देखा जाता है कि सङ्ग (आसक्ति) की प्रचुरता (अधिकता) से गुप्त प्रीति का विनाश (भंग) हो ही जाता है। अतएव श्रीहरिवंश कृपा के अभाव में [ यह विनाश होने पर ] आनन्द (रंग) की उत्पत्ति नहीं हो पाती।

पद – 3

मुख बरनत रस रीति, प्रीति चित्त नहिं आवई।

चाहत सब जग कीर्ति, श्रीहरिवंश कृपा बिना ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश – कृपा से विहीन लोग प्रेम से शून्य होने पर भी सारे संसार में अपनी कीर्ति फैलने की आशा लगाये रखते हैं। यद्यपि वे अपने मुख से प्रेम तत्व रस रीति का वर्णन भी करते हैं किन्तु उनके चित्त में प्रीति का उदय नहीं होता।

पद – 4

गावत गीत रसाल, भाल तिलक सोभित घना |

बिनु प्रीतिहिं बेहाल, श्रीहरिवंश कृपा बिना ॥

भावार्थ – चाहे कोई भले ही बड़े सरस गीत गाता हो और उसके ललाट पर अत्यन्त सुन्दर तिलक भी क्यों न हो ? किन्तु [इन बाह्य चिह्नों से क्या होता है?] वह तो श्रीहरिवंश कृपा रूप प्रेम प्राप्ति के बिना विह्वल ही देखा जायगा।

पद – 5

नाचत अतिहिं रसाल, ताल न सोभित प्रीति बिनु ।

जनु बींधे जंजाल, श्रीहरिवंश कृपा बिना।

भावार्थ – कुछ लोग अत्यन्त रसीले नृत्य करते और ताल भी देते हैं किन्तु प्रीति के बिना उनका नृत्य-ताल शोभा नहीं पाता। वे बेचारे श्रीहरिवंश कृपा के बिना तो नृत्य-ताल के जञ्जाल में ही बिंधे (उलझे) हैं।

पद – 6

मानत अपनौ भाग, राग करत अनुराग बिनु ।

दीसत सकल अभाग, श्रीहरिवंश कृपा बिना।

भावार्थ – कितने एक लोग हृदय में अनुराग के न रहने पर भी रागी ( प्रेमी) की सी क्रिया करके प्रेम दिखाते और अपने भाग्य की स्वयं सराहना करते हैं, [किन्तु यह सब उनका भ्रम है। ] उनका दुर्भाग्य तो स्पष्ट दीख रहा है कि वे श्रीहरिवंश कृपा से विहीन है; [ तब वहाँ अनुराग और सौभाग्य कहाँ ? ]

पद – 7

पढ़त जु वेद पुरान, दान न सोभित प्रीति बिनु ।

बींधे अति अभिमान, श्रीहरिवंश कृपा बिना।

भावार्थ – भले ही कोई वेद एवं पुराणों का पाठ कर रहा है एवं दान भी देता है किन्तु उसके दान और वेद-पाठ प्रेम के बिना शोभा नहीं पाते। वह तो श्रीहरिवंश कृपा के बिना अभिमान का ही शिकार है। वेद पाठ और दान के अभिमान से बिद्ध है।

पद – 8

दरसन भक्त अनूप, रूप न सोभित प्रीति बिनु ।

भरम भटक्कत भूप, श्रीहरिवंश कृपा बिना ॥

भावार्थ – कुछ लोग दर्शनीय भक्त होते हैं [ अर्थात् रूप, रंग, अवस्था और शरीर की गठन आदि उनकी प्रत्येक स्थिति मनोहर होती है और तिस पर वे तिलक मुद्रा, छाप, कण्ठी, माला आदि से अपने आपको और भी सुसज्जित कर लेते हैं । ] इनका रूप भी अनूप (उपमा न दे सकने योग्य) होता है, किन्तु केवल एक प्रीति के बिना यह सब रूप-स्वाँग शोभा नहीं देता। ये भी अपने आपको ‘भक्तराज’ मानकर भ्रम (भ्रान्ति) में ही भटकते रहते हैं, क्योंकि इतना सब होने पर भी यदि श्रीहरिवंश कृपा नहीं है, तो प्रेम मिल नहीं सकता और प्रेम के बिना और सब कुछ नट के स्वांग से अधिक क्या है?

पद – 9

सुंदर परम प्रवीन, लीन न सोभित प्रीति बिनु ।

ते सब दीखत दीन, श्रीहरिवंश कृपा बिना ॥

भावार्थ – कोई सुन्दर है, परम चतुर है और प्रत्येक गुण में लीन है (अर्थात् उन-उन गुणों में पूरी तरह से उसका प्रवेश है) किन्तु यदि उसके प्रीति नहीं है, तो ये सारे गुण शोभा नहीं पाते। वह तो श्रीहरिवंश कृपा के बिना दीन ही दीखता है और उसके सब गुण भी दीन दीखते हैं।

पद – 10

गुन मानी संसार, और सकल गुन प्रीति बिनु ।

बहुत धरत सिर भार, श्रीहरिवंश कृपा बिना ॥

भावार्थ – संसार गुण मानी है (अर्थात गुणों का ही आदर करना जानता है) यदि किसी के पास एक प्रीति के सिवाय अन्य सारे गुण हैं, तो क्या हुआ? वह तो श्रीहरिवंश कृपा के बिना प्रीति को न पाकर सारे गुणों का केवल बोझ अपने सिर पर रखे बैठा है। प्रेम के बिना उन गुणों की क्या महत्ता है ?

कृपा – लक्षण

श्रीहरिवंश कृपा से रहित जीवों की दशाओं का वर्णन करके अब कृपा सम्पन्न बड़भागी जनों का स्वरूप परिचय कराते हैं कि उनमें कौन-कौनसी विशेषताएँ प्रकट हो जाती हैं।

पद – 1

मुख बरनत हरिवंश, चित्त नाम हरिवंश रति ।

मन सुमिरन हरिवंश, यह जु कृपा हरिवंश की ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश की कृपा का यही प्रकट लक्षण है कि जिस पर इस कृपा का स्रोत बहता है, वह मुख से श्रीहरिवंश के गुण एवं लीलाओं का वर्णन करता, चित्त में श्रीहरिवंश-नाम से रति करता और मन में श्रीहरिवंश का ही स्मरण करता है।

पद – 2

सब जीवन सौं प्रीति, रीति निबाहत आपनी ।

श्रवण कथन परतीति, यह जु कृपा हरिवंश की ॥

भावार्थ – जो अपनी रीति (श्रीयुगल किशोर के नित्य विहार रस श्रीवन विहार में अनन्य निष्ठा) का निर्वाह करते हुए विश्व के सब जीवों से प्रीति (सम भाव) रखता और अपने इष्टदेव के गुण, लीला-चरित्र आदि के श्रवण कथन में विश्वास रखता हो, मानो वह श्रीहरिवंश की कृपा का पात्र है अथवा यही श्रीहरिवंश की कृपा का फल है कि उक्त गुणों का अपने में प्रकाश हो ।

पद – 3

शत्रु मित्र सम जानि, मानि मान अपमान।

सम दुख सुख लाभ न हानि, जु कृपा हरिवंश की ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश कृपा का यह स्वरूप है कि कृपा पात्र शत्रु और मित्र में समभाव वाला हो जाय और मान एवं अपमान में भी सम हो जाय। उसके लिये न कुछ सुख रह जाय न दुख; न लाभ न हानि ही भाव यह कि उसके लिये सुख-दुःख एवं लाभ-हानि के द्वन्द्व चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले न हों अथवा श्रीहरिवंश- -कृपा पात्र जन की शत्रु मित्र, मान-अपमान, सुख-दुःख, लाभ और हानि में सम बुद्धि हो जाती है।

पद – 4

नित इक धर्मिन संग, रंग बढ़त नित नित सरस।

नित नित प्रेम अभंग, यह जु कृपा हरिवंश की ॥

भावार्थ – नित्य निरन्तर ऐकान्तिक (अनन्य ) धर्मियों का संग मिलना, नित्य नित्य सरस आनन्द की वृद्धि होना और नित्य प्रति अखण्ड अनुराग की प्राप्ति होना ही श्रीहरिवंश की कृपा है, क्योंकि बिना कृपा के ये सभी बातें सम्भव नहीं हैं।

पद – 5

निरखत नित्यबिहार, पुलकित तन रोमावली ।

आनंद नैन सुढार, यह जु कृपा हरिवंश की ॥

भावार्थ – नित्यविहार का दर्शन हो रहा हो, सम्पूर्ण शरीर आनन्द से पुलकित हो- रोमाञ्चित हो, नेत्रों से आनन्द के आँसुओं का प्रवाह ढल रहा हो, यह सब श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा है।

पद – 6

छिन छिन रुदन करंत, छिन गावत आनंद भरि ।

छिन छिन हहर हसंत, यह जु कृपा हरिवंश की ॥

भावार्थ – जिस पर श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा है, वह प्रेम में उन्मत्त होने के कारण क्षण-क्षण में रोदन करता; क्षण-क्षण में आनन्द से भरकर गाने लगता और फिर क्षण-क्षण में हँसने लगता है।

पद – 7

छिन छिन बिहरत संग, छिन छिन निरखत प्रेम भरि ।

छिन जस कहत अभंग, यह जु कृपा हरिवंश की ।

भावार्थ – श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा प्राप्त हो जाने पर प्रेमी प्रत्येक क्षण युगल सरकार के साथ श्रीवन में विहार करता, क्षण-क्षण में प्रेम से परिपूरित नेत्रों से उनकी महामधुर छबि का दर्शन करता और क्षण-क्षण में उनके शाश्वत यश का मस्ती के साथ गान करता है।

पद – 8

निरखत नित्य किसोर, नित्य नित्य नव नव सुरति ।

नित निरखत छबि भोर, यह जु कृपा हरिवंश की ।

भावार्थ – श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा से पूर्ण प्रेमी नित्य किशोर की नित्य नूतन प्रेम क्रीड़ा (सुरत विलास) का दर्शन करता और फिर प्रातः काल युगल किशोर की (सुरतालस पूर्ण ) छबि का भी दर्शन करता है (अर्थात् वह प्रेमी प्रभु कृपा से उस वस्तु को प्राप्त करता है, जो औरों के लिये अगम्य है। )

पद – 9

त्रिपित न मानत नैंन, कुंज रंध्र अवलोकतन।

यह सुख कहत बनैं न, यह जु कृपा हरिवंश की ॥

भावार्थ – युगल किशोर के ऐकान्तिक विहार को कुञ्ज रन्ध्रों (छिद्रों) से अवलोकन करते रहने पर भी मेरे नेत्र तृप्ति नहीं मानते। यह सुख कुछ कहते नहीं बनता [ इस दिव्य सुख में सराबोर करा देना ] यह श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा है।

पद – 10

कहा कहौं बड़भाग, नित नित रति हरिवंश हित ।

नित बर्धित अनुराग, यह जु कृपा हरिवंश की ।

भावार्थ – मैं अपने महान्तम भाग्य की क्या प्रशंसा करूँ; क्योंकि मेरे हृदय में नित्य नित्य श्रीहित हरिवंशचन्द्र की रति का उदय हो रहा है और यह अनुराग नित्य प्रति बढ़ता ही जा रहा है। यह श्रीहरिवंशचन्द्र की ही कृपा है।

सेवकजी प्रकरण की समाप्ति करते हैं

पद – 11

नित बर्धित अनुराग भाग अपनौ करि मानत ।

नित्य नित्य नव केलि निरखि नैंननि सचु मानत ॥

नित नित श्रीहरिवंश नाम नव नव रति मानत।

नित नित श्रीहरिवंश कहत सोई सिर मानत ॥

आपुनौ भाग आपुन प्रगट कहत जु श्रीहरिवंश बल।

हरिवंश भरोसे भये निडर सु नित गर्जत हरिवंश बल ॥

भावार्थ – अनुराग के नित्य बढ़ने में ही मैं अपना अहो भाग्य मानता हूँ और नित्य नव नवायमान् केलि का अवलोकन कर परम सुख का अनुभव करता हूँ। श्रीहरिवंश नाम के प्रति ( जो विहार का भी मूल है) नित्य नयी प्रीति करता और श्रीहरिवंशचन्द्र ने जो कुछ कहा है उसे सदा सर्वश्रेष्ठ (शिरोमणि रूप) मानता हूँ।

श्रीसेवक जी कहते हैं कि मैं स्वयं अपना भाग्योदय श्रीहरिवंश बल से प्रकट कह रहा हूँ, क्योंकि मैं श्रीहरिवंश – विश्वास से सब प्रकार से निर्भय हो चुका हूँ। इसीलिये अपने विजय और भाग्योदय की गर्जना करता रहता हूँ।


श्रीहित भक्त – भजन
( दशम् प्रकरण )
पूर्व परिचय

इस प्रकरण में भक्तों (उपासकों) के एकमात्र भजनीय तत्व का निरूपण किया गया है। यों तो युगल किशोर प्राणिमात्र के भजनीय हैं। किन्तु युगल किशोर के चरणों में प्रीति उत्पन्न करा देने वाले साधक रसिक-भक्तजनों (उपासकों) के लिये युगलकिशोर से पहले रसिक जन ही भजनीय हैं। यह बात सिद्ध है कि भक्तों की कृपा के बिना भक्ति या प्रेम नहीं मिल सकता, अतएव मन, वचन, कर्म सर्वप्रकार से भजनीय केवल भक्तजन ही हैं। श्रीसेवकजी ने इस भजन के प्रकरण को दो विभागों में बाँट दिया है- एक भक्त भजन सिद्धान्त और दूसरा रस सिद्धान्त।

पहले भक्त भजन सिद्धान्त में भक्तों का स्वरूप, उनके प्रति अनन्य और पूज्य भाव, उनकी आराधना से लाभ आदि बातों का स्पष्टीकरण किया गया है और दूसरे रस सिद्धान्त में युगलकिशोर जो समस्त रसिक जनों के सर्वस्व हैं, उनके ऐकान्तिक विहार का स्वरूप प्रकट किया गया है। युगल किशोर का यह ऐकान्तिक-विहार हित तत्व से किस प्रकार ओतप्रोत है, यह भी प्रकट किया गया है। इस रसमय तत्व की उपलब्धि के लिये साधक क्या करे ? किस भावना से यह रस अनुभव में आ सकेगा, इस प्रकरण का अन्तिम विषय है।

अब प्रथम छन्द में आप यह बताते हैं कि भक्त कौन हैं और उनके प्रति किस प्रकार की पूज्य बुद्धि रखनी चाहिये ।

भक्त भजन-सिद्धान्त

पद – 1

श्रीहरिवंश सुधर्म दृढ़, अरु समुझत निजु रीति ।

तिनकौ हौं सेवक सदा (सु) मन क्रम वचन प्रतीति ॥

मन क्रम वचन प्रतीति प्रीति दिन चरन सँभारौं ।

नित प्रति जूठनि खाऊँ बरन भेदहिं न विचारौं ॥

तिनकी संगति रहत जाति कुल मद सब नसहिं ।

संतत ‘सेवक’ सदा भजत जे श्रीहरिवंशहिं ।

भावार्थ – जो श्रीहरिवंश धर्म में पक्के (दृढ़) हैं और अपनी रीति ( रसोपासना ) को भली प्रकार से समझते हैं, मैं उनका मन, वचन, कर्म एवं विश्वास पूर्वक सदा सर्वदा सेवक हूँ। मन, वचन, कर्म, विश्वास एवं प्रीति के साथ नित्य प्रति उनके चरणों को ही (सर्वस्व की तरह) सँभालता रहता हूँ। मैं उनके प्रति वर्ण भेद (जाति विचार) न मानकर सदा उनका जूँठन ही खाता हूँ या खाऊँ। उन (रस भीनें हरिवंश-धर्मी जनों) की संगति में रहते जाति, कुल आदि के सारे अहंकार नष्ट हो जाते हैं, अतएव मैं श्रीहरिवंश का भजन करने वाले जनों का सदा सर्वदा का सेवक हूँ, (ऐसा श्रीसेवक जी कहते हैं । )

पद – 2

सब अनन्य साँचे सुविधि, सबकौ हौं निजु दास।

सुमिरन नाम पवित्र अति, दरस परस अघ नास॥

दरस परस अघ नास, बास निजु संग करौं दिन।

तिन मुख हरि जस सुनत, श्रवन मानौं न त्रिपित छिन।

कलि अभद्र बरनत सहस, कलि कामादिक द्वंद्व तब। सेवक सरन सदा रहै, साँचे सुविधि अनन्य सब ॥

भावार्थ – जो भली प्रकार से सच्चे अनन्य रसिक हैं, मैं उन सबका निज दास हूँ। उन का नाम स्मरण अत्यन्त पवित्र होता है तथा उनका दर्शन-स्पर्श अघ नाशक है। जिनके दर्शन और स्पर्श से पापों का नाश हो जाता है मैं ऐसे रसिक अनन्यों का निरन्तर सहवास और ऐकान्तिक सहज संग करूँ, उनके मुख से श्रीहरि का सुयश सुनते हुए कभी मेरे कर्ण पुट (कान) एक क्षण भर को भी तृप्ति न माने। (उन रसिकों के द्वारा श्री हरि के सुयश) वर्णन किये जाने पर कलियुग के हजारों हजारों अमंगल, कलह, काम, क्रोध लोभ, मोहादि, द्वन्द्व वहाँ (सेवक के पास ) कैसे रह सकते हैं ? इसलिये जो सच्चे और भली प्रकार से अनन्य हैं, ‘सेवक’ उन सबकी चरण-शरण में सदा रहा आवे, यही अभिलाषा है, (अथवा सदा उनकी चरण शरण में रहता है । )

पद – 3

श्रीराधावल्लभ भजत भजि, भली भली सब होइ ।

रसिक अनन्य सजाति भजि, भली भली सब होइ ॥

भली भली सब होइ, जबहिं हरिवंश चरन रति ।

भली भली तब होइ, रचित रस रीति सदा मति ॥

भली भली सब होइ, भक्ति गुरु-रीति अगाधा।

भली भली सब होइ, भजत भजि श्रीहरि राधा ॥

भावार्थ – अरे भाई ! तू श्रीराधावल्लभ का भजन करने वालों का भजन कर ( अर्थात् अनन्य रसिकों की सेवा कर) इसमें तो तेरा सब प्रकार मंगल लाभ होगा। तू रसिक अनन्यों के सजातीय (रसिक अनन्यों) का भजन कर, सब भला ही भला होगा। विशेष लाभ सुख तू तब पावेगा जब तू श्रीहरिवंश चरणों में रति करेगा और सब प्रकार भला ही भला तब होगा, जब तेरी मति (बुद्धि) श्रीहरिवंश-रचित रस-रीति में सदा के लिये लग जायगी। सब भला ही भला हुआ, ऐसा तो तब कहा जा सकेगा, जब श्रीगुरुदेव द्वारा बतायी गयी रीति ( रसमय हित भजन प्रणाली) में तेरी अगाध भक्ति हो जायगी और मूल बात तो यह है कि जब तू श्रीहरि राधा के भजनानन्दी रसिकों का भजन करने लग जायगा, तभी तेरा भला है- कल्याण ही कल्याण है।

पद – 4

श्रीराधावल्लभ भजत भजि, भली भली सब होइ ।

असुभ अनर्भल संग जन, विमुख तजौ सब कोइ ॥

विमुख तजौ सब कोइ, झूठ बोलत सच मानत।

दोष करत निरसंक, रंक करि संतन जानत॥

अभिमानी गर्विष्ठ, लोभ मद मत्त अगाधा।

दुष्ट परिहरौ दूर, भजत भजि श्रीहरि राधा ॥

भावार्थ – हे भाई! तू श्रीराधावल्लभ का भजन करने वाले भक्तों का भजन सेवन कर, इससे तेरा सर्वविध मंगल होगा और तू अशुभ एवं बुरा सङ्ग त्याग दे, तथा जितने भी भगवद् विमुख जन उन सब को भी त्याग दे। इन विमुखों को इसलिये त्याग कि ये लोग झूठ बोलने में तो सुख मानते, निडर और निःशंक होकर दोष (अपराध) करते और सन्त-महात्माओं को (जो विरक्त और अकिञ्चन होते हैं, उन्हें) गरीब (भिखारी) मानते हैं। इन अभिमानी, गर्व से भरे हुए, लोभ और मद से अत्यन्त मतवाले दुष्टों को तू दूर से ही त्याग दे और श्रीहरि राधा के भजन करने वाले भक्तों का ही भजन सेवन कर।

पद – 5

श्रीराधावल्लभ भजत भजि, भली भली सब होइ।

जिते विनायक सुभ-असुभ, बिघ्न करैं नहिं कोई ॥

बिघ्न करै नहिं कोई, डरैं कलि काल कष्ट भय।

हरैं सकल संताप, हरषि हरि नाम जपत जय ॥

श्रीवृंदावन नित्य केलि, कल करत अगाधा।

हित हरिवंश किसोर, भजत भजि श्रीहरिराधा ॥

भावार्थ – अरे भाई ! तू श्रीराधावल्लभ के भक्तों का ही भजन सेवन कर इससे तेरा सब भला ही भला होगा और जितने भी विनायक, शुभ और अशुभ आदि हैं वे कोई भी तुझे विघ्न नहीं पहुँचा सकते। ये विनायक आदि बिघ्न तो पहुँचावेंगे नहीं और साथ-साथ तुझसे कलियुग के धर्म कलह, कष्ट, काल आदि भय मानेंगे। भक्तजन तेरे समस्त सन्तापों का हरण कर लेंगे। हर्ष पूर्वक श्रीहरि का नाम जपते-गाते तेरी सर्वत्र जय ही होगी। जो श्रीवृन्दावन में नित्य निरन्तर अगाध एवं परम सुन्दर केलि करते रहते हैं, उन श्रीहित हरिवंश किशोर श्रीहरि राधा का भजन करने वाले भक्तों का तू भजन कर।

पद – 6

श्रीराधाबल्लभ भजत भजि, भली भली सब होइ।

त्रिविध ताप नारौं सकल, सब सुख संपति होइ ॥

सब सुख संपति होइ, होइ हरिवंश चरन रति ।

होइ विषय विष नास होइ वृंदावन बसि गति ॥

होइ सुदृढ़ सतसंग, होइ रस रीति अगाधा।

होइ सुजस जग प्रगट होइ पद प्रीति सु राधा ॥

भावार्थ – अरे भैय्या ! श्रीराधावल्लभ के भक्तों का भजन करने से तेरा तो सब प्रकार से भला होगा तथा तेरे तीनों (दैहिक, दैविक और भौतिक) ताप ही क्या और भी सब प्रकार के शोक नाश को प्राप्त होकर तुझे समस्त सुख एवं सम्पत्ति भी प्राप्त होगी। सब सम्पत्ति प्राप्त होकर भी तुझे श्रीहरिवंश चरणों की प्रीति प्राप्त होगी, विषय भोग रूप विषों का नाश होगा और श्रीवृन्दावन का निवास प्राप्त होकर तेरी उत्तम गति (नित्य-विहार में प्राप्ति) भी होगी। तुझे सुदृढ़ सत्संग की प्राप्ति होगी और उसके फल स्वरूप युगल- सरकार की अगाध रस-रीति भी अनुभव होगी। तेरा सुयश संसार में फैल जायगा और श्रीराधा के सुन्दर-चरणों में तेरी अपार प्रीति हो जायगी। ( यह है, श्रीराधावल्लभ के भक्तों के भजन का फल ! )

पद – 7

श्रीराधाबल्लभ भजत भजि, भली-भली सब होइ ।

भीर मिटै भट जमन की, भय भंजन हरि सोइ ॥

भय भंजन हरि सोइ, भरम भूल्यौ भटकत कति ।

भगवत-भक्ति बिचारि, वेद भागौत प्रीति रति ॥

भक्त चरन धरि भाव, तरत भव सिंधु अगाधा।

हित हरिवंश प्रसंस, भजत भजि श्रीहरि राधा ॥

भावार्थ – श्रीराधावल्लभ के भक्तों का भजन-सेवन करते सब भला ही भला होगा, यमराज के योद्धा दूतों का भय मिट जायगा; क्योंकि वे श्रीहरि (राधा वल्लभ) भय का नाश करने वाले हैं (तू जिनके भक्तों का सेवन करता है । ) जब तू यह जान गया कि वे श्रीहरि भय-भञ्जन हैं, तब भ्रम में भूला हुआ कहाँ भटकता फिरता है? भगवद्भक्ति का विचार मनन कर, वेद एवं श्रीमद्भागवत में वर्णित प्रीति में रति कर अर्थात् श्रीमद्भागवत में कही गई नवधा या प्रेम लक्षणा की रीति से श्रीराधा वल्लभ एवं उनके रसिक अनन्य भक्तों से प्रेम कर, और भक्तों के चरणों में भाव रख करके इस अगाध संसार-सागर को क्यों नहीं पार कर जाता? अरे! जिन भक्तों की प्रशंसा श्रीहरिवंश चन्द्र ने भी की है, तू राधावल्लभ के उन भक्तों का ही सेवन कर।

पद – 8

श्रीराधावल्लभ भजत भजि, भली भली सब होइ।

अन्य देव सेवी सकल, चलत पुँजी सी खोइ ॥

चलत पुँजी सी खोइ रोइ झखि द्यौस गँवावहिं।

सोइ छपत सब रैन, जोइ कपि सम जु नचावहिं॥

भोइ विषम विष विषय, कोई सतगुरु नहिं लाधा।

धोड़ सकल कलि कलुष, दोइ भजि श्रीहरि राधा ॥

भावार्थ – अरे भाई! श्रीराधावल्लभ के भक्तों का भजन करने से तेरा सर्वविध मंगल ही होगा। अन्य देवताओं का सेवन करने वाले अन्त में इस संसार से अपनी पूँजी खोकर चले जाते हैं। उनके साथ में कुछ नहीं जाता; क्योंकि उन्होंने सकाम भाव से लौकिक भोग ही देवताओं से प्राप्त किये थे, सो भोग कर ज्यों के त्यों रीते-भक्ति रहित चले जाते हैं।) वे अन्त काल में पूँजी खोकर तो जाते ही हैं, वरं जीवन में भी रो-झींख कर अपने दिन गमाते हैं, सारी रात सोकर नींद में व्यतीत करते हैं और उन्हें स्त्रियाँ अपना वशवर्ती बनाकर बन्दर की तरह नचाती हैं। उनका चित्त विषम (भीषण) विषय रूपी विष से व्याप्त हो जाता है और अन्त तक वे किसी सद्गुरु की प्राप्ति नहीं कर पाते। अतएव हे भाई! तू अन्य देव सेवी लोगों की दशा देख सुनकर सचेत हो जा। श्री हरि राधा केवल इन दोनों का भजन कर और समस्त कलि कल्मषों ( कलियुग के पापों) को धो डाल ।

पद – 9

राधावल्लभलाल बिनु, जीवन जनम अकत्थ।

बाधा सब कुल कर्म कृत, तुच्छ न लागै हत्था ॥

तुच्छ न लागै हत्थ, सत्य समरथ न वियौ तब।

माथ धुनत हरि विमुख, संग जम-पथ चलत जब ॥

गाथ विमल गुन गान, कत्थ जस भवन अगाधा।

नाथ अनाथनि हित, समर्थ मोहन श्रीराधा ॥

भावार्थ – श्रीराधावल्लभलाल के बिना जीवन और जन्म दोनों अकृतकार्य (व्यर्थ) हैं। सारे कुलोचित कर्म और अन्य कर्म भी बाधा स्वरूप और तुच्छ हैं; अन्त में सहायक सिद्ध नहीं होते। अरे भाई! ये जब तुच्छ हैं, यहीं छूट जाते हैं और फिर कोई ऐसा दूसरा नहीं रहता जो समर्थ हो, तेरा साथी हो और तुझे (या उन हरि-विमुख जनों को) अपना सिर पीटते हुए, यमदूतों के साथ संयमनी पुरी के मार्ग में चलना ही पड़ता है तब तू [ इन कुल कर्मों को छोड़कर] श्रीराधामोहन के निर्मल चरित्रों एवं गुणों की गाथा के गीत क्यों नहीं गाता। अरे! उन्हीं का कथन कर, उन्हीं का श्रवण कर क्योंकि वे समर्थ श्रीराधामोहन ही समस्त अनाथों के नाथ हैं !!

जो लोग भक्ति और भगवद्धर्म की महत्ता समझ कर भी उसे ग्रहण नहीं कर पाते उन कर्मठ और सशल्य लोगों का परिचय कराते है

पद – 10

कर्मठ कठिन ससल्य नित सोचत सीस धुनंत।

श्रीहरिवंश जु उद्धरी सोई रसरीति सुनंत ॥

सोइ रसरीति सुनंत अंत अनसहन करत सब।

जब जब जियनि विचारि सार मानत मन मन तब ॥

छिन छिन लोलुप चित्त, समुझि छाँड़त तातैं सठ।

करत न संत समाज, जिते अभिमानी कर्मठ ॥

भावार्थ – जब कठोर कर्मकाण्डी और सशल्य (बहुत देवी देवताओं के पूजने वाले) लोग श्रीहित हरिवंश चन्द्र के द्वारा प्रकट की गयी उस रीति का श्रवण करते हैं, तो अपनी कर्मठता और भटकन के लिये पश्चात्ताप करते हुए सिर पीटने लगते हैं। फिर कभी (अहंकार वश) उस रस रीति (की उत्तमता) को सुन समझकर भी उसके प्रति असहनीय भाव (विद्वेष) ले आते और अन्ततः विपरीत सा करने लगते हैं। किन्तु जब कभी सुस्थिर चित्त से विचार करते हैं तो मन ही मन रस रीति को ही सार मान कर उसकी बड़ाई भी करते हैं। ऐसा करने पर भी वे हैं तो वास्तव में लोलुप चित्त कर्मठ ही, अतः समझ-बूझ कर भी इस दिव्य रस रीति का त्याग कर देते हैं और अपनी कर्मठता में फँसे रहते हैं। इस प्रकार जितने भी अभिमानी कर्मठ (कर्म काण्ड में घोर निष्ठा वाले) हैं, वे (प्रेम भक्ति सम्पन्न) सन्तों का सङ्ग नहीं करते।

दसवें छन्द में अभक्त कर्मठों का स्वरूप बताया गया अब इसमें भावुक भक्तों की रहनी, भावना और उपासना आदि का संक्षिप्त वर्णन किया जाता है

पद – 11

हित हरिवंश प्रसंस मन, नित सेवन विश्राम।

चित निषेध विधि सुधि नहीं, वितु संचित निधि नाम ॥

वितु संचित निधि नाम, काम सुमिरन दासंतन।

जाम घटी न विलंब, बाम-कृत करत निकट जन ।।

ग्राम पंथ आरन्य, दाम दृढ़ प्रेम ग्रथित नित।

ता मत रत सुख रासि, बाम दृश नव किसोर हित ॥

भावार्थ – अनन्य रसिक जन सदा अपने मन ही मन श्रीहरिवंश के रूप एवं गुणों की प्रसंसा और निरन्तर उनकी सेवन भक्ति में ही विश्राम करते अर्थात् स्थित रहते हैं। उनके चित्त में न तो विधि मार्ग की सुधि है और न निषेध की ही वे तो नाम निधि रूप परम धन का ही सञ्चय करते रहते हैं। उनका कार्य है भगवद् स्मरण और भगवद् सेवा वे इस सेवा कार्य में कभी घड़ी पहर का भी विलम्ब न करके अत्यन्त निकट जन (दासी) के भाव के समस्त दासी कृत्य (सेवायें ) करते रहते हैं। चे ग्राम में, मार्ग में, वन पर्वत में सर्वत्र एक प्रेम की ही दृढ़ डोरी से सर्वदा बँधे रहते हैं। इस प्रकार सुख शिवाम दृशा श्रीप्रिया जी एवं नव किशोर हित श्री लाल जी के सुख-चिन्तन के विचार में ही ये रसिक जन सदा रत रहते हैं, (अर्थात् सदा सेवा के ही विचार में मग्न रहते हैं।)

इस छन्द में सेवक जी श्रीराधा-परत्व पूर्वक श्रीवृन्दावन के अविचल विहार की प्रारंभिक रूप रेखा का दिग्दर्शन कराते हैं कि युगल सरकार किस प्रकार स्वच्छन्द भाव से अपनी क्रीड़ा सम्पन्न करते हैं

पद – 12

श्रीराधा आनन कमल, हरि अलि नित सेवंत।

नव नव रति हरिवंश हित, वृंदाविपिन बसंत ॥

वृंदाविपिन बसंत, परस्पर बाहु दंड धरि ।

चलत चरन गति मत्त, करिनि गजराज गर्व भरि ॥

कुंज भवन नित केलि, करत नव नवल अगाधा।

नाना काम प्रसंग करत मिलि हरि श्रीराध ॥

भावार्थ – श्रीहरि रूपी भ्रमर श्रीराधा-मुख कमल का निरन्तर सेवन करता रहता है, जहाँ दोनों के बीच में नित्य प्रति नव-नवायमान् रति ( प्रीति) के रूप में स्वयं श्रीहित हरिवंश ही हैं। यह क्रीड़ा नित्य वृन्दावन में होती है, जहाँ सदा ही वसन्त छाया रहता है। इस वासन्तिक श्रीवृन्दावन में युगल किशोर परस्पर में गलबहियाँ दिये मतवाली गति से पादविन्यास करते हुए समर्थ गजराज एवं मत्त करिणि (हथिनी) की भाँति झूमते चलते हैं। इसी प्रकार निरन्तर नव निकुञ्ज भवन में श्रीहरि और श्रीराधा दोनों मिलकर नाना प्रकार के काम-क्रीड़ा प्रसङ्ग (संयोग) और नित्य नूतन गंभीर क्रीड़ाएँ करते है।

इस छन्द में ‘नाना काम प्रसङ्ग’ के स्पष्ट रूप शय्या-विहार का संकेत करते हैं

पद – 13

मुख विहँस हरिवंश हित, रुख रस रासि प्रवीन।

सुख सागर नागर गुरू, पुहुप सैन आसीन ॥

पुहुप सैंन आसीन, कीन निजु प्रेम केलि बस।

पीन उरज वर परसि, भीन नव सुरत रंग रस ॥

खीन निरखि मद मदन दीन, पावत जु विलखि दुख।

मीनकेतु निर्जित सु लीन, प्रिय निरखि विहँसि मुख ॥

भावार्थ – रस राशि प्रवीण युगल किशोर को देखकर श्रीहित हरिवंश हँस पड़े। श्रीहित हरिवंश * ने देखा कि सुख-सागर स्वरूप चतुर शिरोमणि युगल किशोर पुष्प- शय्या पर विराजमान हैं। और वे अपनी स्वयं की प्रेम-क्रीड़ा के वशीभूत हो रहे हैं। प्रियतम ने प्रिया के पुष्ट एवं श्रेष्ठ उरोजों का स्पर्श किया और दोनों नव-सुरत-आनन्द के रस में सराबोर हो गये। दोनों की यह सुरतानन्दमयी दशा देखकर स्वयं कामदेव का अहंकार भी क्षीण हो गया और वह दीन होकर बहुत प्रकार से व्याकुल हो दुःख पाने लगा। अपने युगल प्रियतम की कामदेव को विजय करने की स्थिति किंवा काम के विलखने (दीन होने की दशा) का दर्शन करके श्रीहित हरिवंश चन्द्र हँस उठे।

श्रीहित हरिवंशचन्द्र युगल किशोर की रसमयी सुरत केलि के अवसर पर भी अपने ‘सजनि’ स्वरूप से उनके समीप निकुञ्ज भवन में शोभित रहते हैं और ‘हित’ स्वरूप से दोनों के हृदय में व्याप्त होकर रस क्रीड़ा सम्पन्न कराते हैं। अब इस विषय का परिचय दे रहे हैं

पद – 14

रस सागर हरिवंश हित लसत सरित वर तीर।

जस जग बिसद सुबिस्तरित बसत जु कुंज कुटीर ॥

बसत जु कुंज कुटीर भीर नव रँग भामिनि भर ।

चीर नील गौरांग सरस घन तन पीतांबर ॥

धीर बहत दक्षिन समीर कल केलि करत अस।

नीरज सैंन सु रचित वीर वर सुरत रंग रस ॥

भावार्थ – रस के सागर श्रीहित हरिवंशचन्द्र [ अपने निज स्वरूप सजनि भाव से ] निरन्तर सरिताओं में श्रेष्ठ यमुनाजी के तीर पर कुञ्ज कुटीर में निवास करते हुए शोभित रहते हैं; आपके पवित्र यश संसार में अच्छी तरह से व्याप्त हैं। आप उस कुञ्ज-कुटीर में निवास करते हैं, जहाँ नवरंग भामिनियों की भीड़ का प्रवाह सा रहा आता है। उन सबके मध्य में नील दुकूल धारिणि गौरांगी श्रीप्रियाजी एवं सरस घन की सी कांति से पूर्ण, पीताम्बरधारी श्रीलालजी शोभा पाते हैं। उस समय श्रीवन में दक्षिण दिशा का शीतल एवं सुगन्धित पवन धीरे-धीरे बह रहा है और युगल किशोर कुछ ऐसी सुन्दर केलि करते हैं कि कमल दलों से सुखद शय्या रचकर उस पर सुरत आनन्द रस के दोनों महान् योद्धा केलि मग्न हो जाते हैं।

अब वृन्दावन विहार के एक दूसरे अंग रास-क्रीड़ा एवं जल विहार की झाँकी कराते हैं कि वह भी वंशी रूप आचार्य श्रीहित हरिवंशचन्द्र द्वारा पूर्ण होती है

पद – 15

पिय बिचित्र बन हरषि मन जिय जस बैंनु कुनंत ।

तिय तरुन्नि सुनि तुष्ट धुनि कियौ तहाँ गवन तुरंत ॥

कियौ तहाँ गवन तुरंत कंत मिलि बिलसत सर्वस।

तंतु रास मंडल जुरंत रस निर्त्त रंग रस ॥

संतत सुर दुंदुभि बजंत, बरषंत सुमन लिया।

अंत केलि जल जनुकि मत्त, इभराट करिनि पिय ॥

भावार्थ – प्रियतम श्रीलालजी ने श्रीवृन्दावन की विचित्र शोभा देखकर प्रसन्न मन हो अपने हृदय स्थित प्रिया यश का वेणु के द्वारा गान किया; तरुणी नारियों सखियों ने उस सुखमय ध्वनि का श्रवण किया और उन्होंने तुरन्त ही वहाँ (लालजी के समीप) गमन किया। वे प्रियतम से मिलकर अपने सर्वस्व दान पूर्वक विलास करने लगीं। श्रीवन में उस समय रसमय रासमण्डल एकत्र हुआ और रस पूर्ण नृत्य का आनन्द बरसने लगा। देवतागण निरन्तर दुन्दुभि बजाने लगे और मुग्ध होकर पुष्पों की वृष्टि करने लगे।

रास क्रीड़ा के पश्चात् अन्त में सब जल क्रीड़ा के लिये जल में प्रवेश कर ऐसे क्रीड़ा करने लगे जैसे मतवाला हाथी अपनी प्रियतमा करिणियों से क्रीड़ा करता है।

अब एक छन्द में शय्या विहार का वर्णन करते हैं-

पद – 16

हरि बिहरत बन जुगल जनु, तड़ित सु बपु घन संग ।

करि किसलय दल सैन भल, भरि अनुराग अभंग ॥

भरि अनुराग अभंग, रंग अपने सचु पावत।

अंग-अंग सजि सुभट, जंग मनसिजहिं लजावत ॥

पंगु दृष्टि ललितादि, तंक निरखत रंध्रनि करि।

मंग आदि रचि सिथिल, सजित उच्छंग धरत हरि ॥

भावार्थ – श्रीहरि श्रीवृन्दावन में विहार कर रहे हैं। उस समय युगल [ श्रीराधावल्लभ लाल] ऐसे शोभा पा रहे हैं, जैसे दामिनि अपने सुन्दर वपु से मेघ के सङ्ग फब रही हो। दोनों अभङ्ग अनुराग से भरे हुए किशलय दलों की सुन्दर शय्या रचकर अपने ही में सुख और आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। वे दोनों सुरत-रण के सुयोद्धा अपने अङ्ग अङ्गों से सजकर युद्ध में कामदेव को भी लजा रहे हैं। इस रस युद्ध को ललितादि सखियाँ | एकटक दृष्टि (थकित दृष्टि) से कुञ्ज भवन के छिद्रों से लगी हुई देख रही हैं और निकुंज भवन में श्रीलालजी प्रियतमा श्रीराधा की माँग रचकर शिथिल वेणी सजाते और उन्हें अपनी गोद में ले लेते हैं।

पुनः एक छन्द के द्वारा रति विहार का ही वर्णन करते हैं-

पद – 17

स्याम सुभग तन बिपिन घन, धाम बिचित्र बनाइ ।

तामैं संगम जुगल जन, काम केलि सचु पाइ ॥

काम केलि सचु पाइ, दाइ छल प्रियहिं रिझावत।

धाइ धरत उर अंक, भाइ गन कोक लजावत ॥

चाइ चवग्गुन चतुर, राइ रस रति संग्रामहिं ।

छाइ सुजस जग प्रगट, गाइ गुन जीवत स्यामहिं॥

भावार्थ – परम सुन्दर वपु श्रीश्याम सुन्दर ने श्रीवृन्दावन की सघन स्थली में विचित्र निकुञ्ज धाम की रचना की। उसमें युगल श्रीप्रिया लाल का मिलन होकर दोनों ही काम केलि का सुख प्राप्त कर रहे हैं। श्रीलालजी अपने छल और दावों से श्रीप्रियाजी को रिझा लेते हैं और लपक कर उन्हें अपनी गोद में लेकर हृदय से लगा लेते हैं। इस क्रीड़ा से मानों वे कोक-समूह को भी लज्जित कर रहे हैं। इस प्रकार चतुर शिरोमणि श्रीलालजी रति रस के संग्राम में चौगुना चाव प्राप्त कर रहे हैं, श्रीश्यामा का सुयश संसार में प्रगट है और आपकी इस गुणावली का गानकर करके ही श्यामसुन्दर अपना जीवन धारण करते हैं।

मानवती श्रीप्रियाजी को रासमण्डल में ले जाने के लिये सखी उद्दीपन विभाव- श्रीवृन्दावन का वर्णन कर रही है; जिसे सुनकर सम्भ्रम मानमयी श्रीप्रियाजी चल पड़ती हैं; जिससे उनका मान-जनित विरहज दुःख मिट जाता है। फिर माधव मास के सुहावने वासन्ती वन में समस्त नव-तरुणियों के साथ विहार सम्पन्न होता है।

पद – 18

सरिता तट सुर द्रुम निकट, अलिता सुमन सुबास ।

ललितादिक रसननि बिबस, चलि ता कुंज निवास ॥

चलि ता कुंज निवास, आस तव हित मग परषत।

रास स्थल उत्तम विलास, सचि मिलि मन हरषत ॥

तासु बचन सुनि चित हुलास, विरहज दुख गलिता।

दासंतन कुल जुवति, मास माधव सुख सलिता ॥

भावार्थ – [ मानवती श्रीप्रियाजी से हित सखी ने कहा- श्रीराधे! देखो; कितना सुन्दर सरित श्रेष्ठ ] यमुना जी का तट है और उसी तट के निकट कल्प वृक्ष है; जिसके सुमनों की सुगंध से भ्रमरगण थकित हो रहे हैं। रास में ललिता आदि सखियाँ रस से विवश हो रही हैं, अतः आप भी उस कुञ्ज निवास की ओर चलो चलो! प्रियतम भी उस निकुञ्ज निवास में आपकी ही आशा लगाये, उत्तम रासस्थल और उसके विलासों की रचना करके आपका मार्ग देख रहे हैं अतः आप भी प्रसन्न मन से चलकर उनसे मिलो।

[ श्रीसेवकजी कहते हैं-] कि उस सखी के वचन सुन कर श्रीप्रियाजी के चित्त में उल्लास हो आया और विरह-जनित सारे दुःख मिट गये। समस्त दासीगणों में श्रेष्ठ युवति श्रीराधा, माधव (रूप वसन्त) मास में सुखमयी सलिता (नदी) की तरह हैं।

इस छन्द में निकुञ्ज गत शय्या पर होती हुई ऐकान्तिक सुरत क्रीड़ा का वर्णन किया गया है जिसका दर्शन प्रातःकाल ललितादिक सखीगण कर रही हैं, सो भी चोरी-चोरी लता-भवन के रन्ध्रों से लगकर-

पद – 19

परषत पुलिन सुलिन गिरा, करवत चित सुर घोर ।

हरवत हित नित नवल रस, बरषत जुगल किसोर ॥

बरषत जुगल किसोर जोर नव कुंज सुरत रन ।

मोर चंद्र चय चलत, डोर कच सिथिल सुभग तन ॥

चोर चित्त ललितादि, कोर रंधनि निजु निरषत।

थोर प्रीति अंतर न, भोर दम्पति छबि परषत ॥

भावार्थ – युगल किशोर की रसमयी वाणी जो यमुना पुलिन का स्पर्श कर रही है अर्थात् पुलिन पर गूँज रही है और युगल किशोर का घो स्वर सखिजनों के चित्त का आकर्षण कर रहा है। युगल किशोर की रति क्रीड़ा को देखकर श्रीहित हर्षित हैं इस प्रकार युगल किशोर नित्य निरन्तर ही इस नूतन रस की वर्षा किया करते हैं। यह नव किशोर जुगल जोड़ी नव निकुञ्ज भवन में निरन्तर सुरत-केलि (रण) किया करती है। केलि अवसर में श्रीलालजी की मोर चन्द्रिका खिसक पड़ती, श्रीप्रियाजी के केशों की डोर शिथिल हो जाती तथा युगल के सुन्दर वपु भी शिथिल हो जाते हैं। युगल की निज सखी ललिता आदि कुंज छिद्रों से चित्र की भाँति अविचल भाव से लगी हुई चोरी-चोरी (छिपकर) इस क्रीड़ा का दर्शन (अवलोकन) करती हैं; क्योंकि उनके हृदय में थोड़ी नहीं वरं अपार प्रीति है; इसीलिये [ मत्सर रहित होकर] वे [ तत्सुख भाव से] प्रातःकाल दम्पति की छवि देखकर रही हैं और मुग्ध हो रही हैं।

अब बसंत केलि के रूपक से शय्या-गत सुरत विहार का वर्णन करते हैं

पद – 20

रितु बसंत बन फल सुमन, चित प्रसंन नव कुंज।

हित दंपति रति कुसल मति, बितु संचित सुख-पुंज ।

बितु संचित सुख-पुंज, गुंज मधुकर सुनाद धुनि ।

रुंज मृदंग उपंग धुंज, डफ झंझि ताल सुनि ॥

मंजु जुवति रस गान, लुंज इव खग तहाँ बिथकितु ।

भुंजत रास विलास कुंज नव, सचि बसंत रितु ॥

भावार्थ – श्रीवृन्दावन के नव निकुञ्जों में फूल एवं फलों से परिपूर्ण बसन्त ऋतु छा रही है; जो चित्त को प्रसन्न करती है। ऐसे समय नव निकुञ्जों में हितमय दम्पति श्रीराधावल्लभलाल जो रति कला में परम चतुर है सुख-पुंज सम्पत्ति (रति विहार) का एकत्रीकरण (संचयन) कर रहे हैं; जिसमें मधुकर की गुञ्जार-ध्वनि के साथ अन्यान्य सुन्दर नाद भी सुन रहे हैं। तरह-तरह के वाद्य यथा रुँझा (रुंज), मृदङ्ग, उपङ्ग, डफ, झाँझें और धुंज आदि ताल पूर्वक बज रहे हैं। साथ ही सुन्दरी युवती जनों का रसमय गान हो रहा है, जिसे सुनकर पक्षीगण विशेष शिथिल होकर अचेतन से हो रहे हैं। इस प्रकार वसन्त ऋतु में नव-निकुञ्ज भवन की रचना करके युगल किशोर रास-विलास का सुख भोग भोगते हैं।

श्रीवृन्दावन विहार अनादि एवं अनन्त है अतः अब इस छन्द में उसकी अनिर्वचनीयता प्रकट करते हैं-

पद – 21

कहत कहत न कही परै, रहत जु मनहिं विचारि ।

सहत सहत बाढ़ भगति, गृह तन गुरु हित गारि ॥

गृह तन गुरु हित गारि, हार अपनी करि मानत।

चार वेद सुंमृति बिचारि, क्रम कर्म न जानत॥

डारि अविद्या करि बिचार, चित हित हरिवंशहि ।

नारि रसिक हृद बन बिहार, महिमा न परै कहि ॥

भावार्थ – श्रीवृन्दावन विहार का वर्णन कथन में नहीं आता, केवल मन ही मन में विचार कर रह जाते हैं। भाव यह कि यह अनुभव गम्य विषय है जो वर्णन में नहीं आ सकता। इस रस विहार के प्रति क्रमशः सहते सहते (धैर्य से) ही भक्ति बढ़ती है, अतएव इसके लिये साधक अपने घर कुटुम्ब, शरीर आदि को श्रीगुरु के चरणों में उनकी ही सेवा में गार दे – लगा दे। जो अपने आपको सम्पूर्ण रूप से सेवा में लगा देता है वह सदा अपनी हार ही मानता है अर्थात् चित्त में दीनता, सरलता, नम्रता आदि सद्भाव रखता है। [ ऐसा अनन्य शरणागत रसिक भक्त ] वेद (ऋक्, यजु, साम और अथर्व), सुन्दर स्मृतियाँ के विचार, वर्णाश्रम कर्म-धर्म आदि कुछ भी नहीं समझता अर्थात् समझकर भी उनकी ओर से बेपरवाह रहता है।

[ श्रीसेवकजी कहते हैं- भाई! तू ] अविद्या रूप महा मोह का परित्याग करके, विचारपूर्वक श्रीहरिवंश के चरणों में अपने चित्त को लगा- उन्हीं से प्रीति कर [ तभी इस विहार का अनुभव होगा।] अस्तु; यह नारि ( श्रीप्रिया एवं सखिजन) और रसिक (श्रीलालजी) के रसमय सरोवर श्रीवृन्दावन का विहार अनन्त महिमामय है, वाणी द्वारा कहने में सर्वथा अशक्य है।

प्रकरण के उपसंहार में ग्रन्थ के प्रतिपाद्य तत्व श्रीहित हरिवंशचन्द्र की महत्ता प्रदर्शित करते हुए स्वयं अपनी निष्ठा का परिचय देते हैं

पद – 22

सेवक श्रीहरिवंश के जग भ्राजत गुन गाइ।

निसिदिन श्रीहरिवंश हित हरषि चरन चित लाइ ॥

हरषि चरन चित लाइ जपत हरिवंश गिरा-जस ।

मनसि बचसि चित लाइ जपत हरिवंश नाम-जस ॥

श्री हरिवंश प्रताप नाम नौका निजु खेवक ।

भवसागर सुख तरत निकट हरिवंश जु सेवक ॥

भावार्थ – भाइयों! यह सेवक तो श्रीहित हरिवंशचन्द्र के विश्व शोभित गुणों को ही गाता रहता है और दिन रात हर्षपूर्वक श्रीहित हरिवंशचन्द्र के चरणों में ही चित्त लगाये रखता है। वह हर्षपूर्वक चरणों में चित्त लगाकर श्रीहरिवंश की वाणी का ही सुयश गाता रहता है, तथा चित्त लगाकर मन एवं वाणी के द्वारा श्रीहरिवंशचन्द्र के नाम का सुयश जपा करता

श्रीसेवकजी कहते हैं कि यह सेवक अपनी जीवन-नौका श्रीहित हरिवंश के नाम प्रताप से ही पार कर रहा है और श्रीहरिवंश की निकटता प्राप्त करके इतने महान् संसार सागर को सुखपूर्वक पार कर गया है।


श्रीहित नाम, प्रभाव धाम – ध्यान
(एकादश प्रकरण)
पूर्व परिचय

दशम प्रकरण की अन्तिम कुण्डलियों में जो रस सिद्धान्त कहा गया है, उस रस की प्राप्ति किनके चरणाश्रय से होगी, उस रस के अधिष्ठान, मूल किंवा विस्तारक कौन हैं? और उनका स्वरूप क्या है? यही सब इस एकादश प्रकरण के विषय हैं। प्रकरण के इस प्रथम छन्द में श्रीवृन्दावन – विलास का स्वरूप प्रकाशित किया गया है, जो हित का ही रूपान्तर मात्र है। दूसरे छन्द में स्पष्टतया आचार्य श्रीहित हरिवंश के कृपा वपु का वर्णन किया गया है, साथ ही उनके शील स्वभाव एवं गुणों का भी। तीसरे छन्द में नवधा भक्ति से भी परे प्रेम-लक्षणा का परिचय देकर चौथे छन्द में उस प्रेम-लक्षणा की प्राप्ति जिन श्रीहितचन्द्र की कृपा से होगी, उनका वर्णन है । पाँचवें छन्द में प्रकरण की फलस्तुति के रूप में नित्य विहार एवं श्रीहित हरिवंशचन्द्र की एकता, समीपता और नित्यता सूचित की गयी है-

पद – 1

सजयति हरिवंशचन्द्र नामोच्चारण बर्द्धित सदा सुबुद्धि,

रसिक अनन्य प्रधान सतु साधु मंडली मंडनो जयति ॥

जै जै श्रीहरिवंश हित प्रथम प्रणउँ सिर नाइ ।

परम रसद निर्विघ्न है जैसे कवित सिराइ ॥

सुकवित सुछंद गनिज्जै समय प्रबंध वन।

सुकवि विचित्र भनिज्जै हरि जस लीन मन ॥

श्रोता सोइ परम सुजान सुनत चित रति करै ।

सेवक सोइ रसिक अनन्य विमल जस विस्तरै ॥

सुजस सुनत बरनत सुख पायौ । कीर भृंग नारद सुक गायौ ।

श्रीवृंदावन सब सुखदानी। रतन जटित वर भूमि रवाँनी ॥

वर भूमि रवाँनि सुखद द्रुम बल्ली, प्रफुलित फलित बिबिध बरनं।

वर भूमि रवाँनि सुखद द्रुम बल्ली, प्रफुलित फलित बिबिध बरनं ।

नित सरद बसंत मत्त मधुकर कुल, बहु पतत्र नादहि करनं ।।

नाना द्रुम कुंज मंजु बर बीथी, बन बिहार राधा रमनं।

तहाँ संतत रहत स्याम स्यामा सँग, श्रीहरिवंश चरन सरनं ॥

भावार्थ – उन श्रीहित हरिवंशचन्द्र की जय हो, जिनके नाम उच्चारण मात्र से ही सदा सुबुद्धि बढ़ती रहती है। जो रसिक अनन्यों में प्रधान और साधु-मण्डली के भूषण हैं, ऐसे श्रीहरिवंशचन्द्र की सदा जय हो। श्रीसेवकजी कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम श्रीहित हरिवंशचन्द्र के चरणों में सिर झुकाकर (नम्रतापूर्वक) प्रणाम करता हूँ, जिससे [वर्णन रूप] यह कविता परम रसदायक बने और बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो जाय। सुन्दर कविता एवं सुछन्द उसी को गिनना चाहिये, जिसमें श्रीवृन्दावन के समय प्रबन्ध (श्रीयुगल किशोर की अष्ट प्रहर लीला, विहार, सेवा भावना) का वर्णन हो और विचित्र (विशेष, उत्तम) कवि भी उसी को गिनना कहना चाहिये, जिसका मन श्रीहरि के यशोगान में ही तल्लीन हो । परम सुजान श्रोता वही है, जो श्रीहरि के यश का श्रवण करते ही उनके प्रति प्रीति करने लग जाय; वही सेवक रसिक अनन्य सेवक (दास) है, जो युगल सरकार के पवित्र यश का प्रचार (विस्तार) करे जिस सुयश को सुनकर एवं वर्णन करके सभीने सुख प्राप्त किया है और जिसका गान कीर-भृंगराज एवं नारद-शुक ने किया है।

[ उन्होंने कहा है ] श्रीवृन्दावन ही समस्त सुखों के दाता हैं। यहाँ की भूमि परम श्रेष्ठ, रमणीय एवं रत्नों से जटित है। इस श्रेष्ठ भूमि श्रीवृन्दावन में रमणीय एवं सुखमय द्रुम (वृक्ष) और लताएँ हैं, जो नाना प्रकार के रखों [के फूल एवं फलों] से फूली फली हैं; जहाँ निरन्तर शरद एवं बसन्त ऋतुएँ छायी ही रहती हैं और लता-वृक्षों के पल्लवों पर बहुत से मधु मत्त भ्रमर मधुर निनाद (शब्द) करते रहते हैं। वृन्दावन में नाना प्रकार की द्रुमलता-कुञ्जे हैं, जो बड़ी ही सुहावनी हैं। जिस श्रीवृन्दावन की श्रेष्ठ गलियों में श्रीराधारमण सदैव विहार करते रहते हैं; मैं उसी वृन्दावन में निरन्तर श्रीश्यामा श्याम के समीप और साथ निवास करने वाले श्रीहरिवंशचन्द्र की चरण-शरण में हूँ।

अब श्रीहिताचार्य पाद का स्वरूप ध्यान वर्णन करते हैं-

पद – 2

रहत सदा सखि संगम रास रंग रस रसाल उल्लास।

लीला ललित रसालं सम सुर तालं वरषत सुख पुंजं ॥

अतुलित रस वरषत सदा सुख निधान बन बासि ।

अद्भुत महिमा महि प्रगट सुंदरता की रासि ॥

सुंदरता की रासि कनक द्रत देह दुति ।

बारिज बदन प्रसन्न हासि मृदु रंग रुचि ॥

सुभ्रू सुष्ठु ललाट पट सुंदर करनं।

नैंन कृपा अबलोकि प्रनत आरति हरनं ॥

सुंदर ग्रीव उरसि बनमालं।

चारु अंस वर बाहु बिसालं ॥

उदर सु नाभि चारु कटि देस।

चारु जानु सुभ चरन सुबेसं ॥

सुभ चरन सुबेस मत्त गजवर गति, पर उपकार देह धरन।

निज गुन विस्तार अधार अवनि पर, बानी बिसद सु बिस्तरनं ।।

करुनामय परम पुनीत कृपानिधि, रसिक अनन्य सभाऽभरनं।

जै जग उद्दोत व्यासकुल दीपक, श्रीहरिवंश चरन शरनं ।।

भावार्थ – श्रीहित हरिवंशचन्द्र सदा सखियों के संग में [ सखि रूप से ] रहते हुए रस के आनन्द-रंग और रसमय रास-उल्लास में डूबे रहते हैं । आपकी लीलाएँ बड़ी ही ललित और रसमयी हैं। रासोत्सव में तो मानो आप ताल – स्वर के समक्रम में सुख-समूह की ही वर्षा करते रहते हैं।

आप सुख निधान श्रीवृन्दावन में निरन्तर निवास करते हुए अतुलित रस की वर्षा करते रहते हैं। आपकी अद्भुत महिमा भूतल पर प्रकट है और आप सुन्दरता की राशि हैं। आपकी देह प्रभा सौन्दर्य राशि- पूर्ण एवं पिघले हुए स्वर्ण के जैसी है। विकसित कमल की तरह प्रसन्न मुख, मदु मुसकान, रूचिमय कान्ति, सुन्दर भृकुटियें, विशाल और देदीप्यमान् ललाट पटल, मनोहर युगल कर्ण एवं कृपा से भरी हुई आँखें जो एक दृष्टिपात से ही अपने प्रणत जनों के समस्त दुःखों का हरण कर लेती हैं। इसी प्रकार सुन्दर ग्रीवा (कण्ठ) हृदय-स्थल पर विराजमान् वनमाला, सुन्दर कन्धे और श्रेष्ठ एवं विशाल भुजाएँ, सुचारु उदर, नाभि और कटि देश हैं। ऐसी ही सुन्दर जंघाएँ और पवित्र सुन्दर चरण हैं।

इन पवित्र और सुहावन चरणों में मत्त गजराज की सी श्रेष्ठ गति है। जिन्होंने केवल पर उपकार के ही लिये देह धारण की है और अपने गुणों का विस्तार किया है। श्रीहिताचार्य ने रसिकों के आधार स्वरूप अपनी पावन और महान वाणी को भूतल पर प्रकट किया और उसका विस्तार किया है। जो करुणामय हैं, परम पावन हैं, कृपानिधि हैं एवं रसिक अनन्यों की सभा (समाज) के आभरण हैं, उन जगत को प्रकाशित करने वाले, व्यास मिश्र के कुल- दीपक परम दुलारे श्रीहित हरिवंशचन्द्र की सदा जय हो; मैं इन्हीं के चरणों की शरण में हूँ।

रसिकाचार्य श्रीहित हरिवंशचन्द्र ने जिस सर्वोपरि रस भक्ति का प्राकट्य किया, अब उसका परिचय देते हैं –

पद – 3

सारासार विवेकी प्रेम पुंज अद्भुत अनुरागं।

हरि जस रस मधु मत्त सर्व त्यक्त्वा दुस्तज कुल कर्म॥

कर्म छाँड़ि कर्मठ भजै ग्यानी ग्यान विहाय ।

व्रतधारी व्रत तजि भजै श्रवनादिक चित लाय॥

श्रवनादिक चित लाय जोग जप तप तजे।

और कर्म सकाम सकल तजि सब भजे ॥

साधन बिबिध प्रयास ते सकल विहाबहीं।

श्रवन कथन सुमिरन सेवन चित लावहीं ॥

अर्चन बंदन अरु दासंतन सख्य और आत्मा समर्पन।

ये नव लच्छन भक्ति बढ़ाई तब तिन प्रेम लच्छना पाई ॥

पाई रस भक्ति गूढ़ जुग जुग जग, दुर्लभ भव इंद्रादि विधि।

आगम अरु निगम पुरान अगोचर, सहज माधुरी रूप निधिं ॥

अनभय आनंद कंद निजु संपति, गुपित सुरीति प्रगट करन।

जै जग उद्दोत व्यास कुल दीपक, श्रीहरिवंश चरन सरनं ॥

भावार्थ – श्रीहित हरिवंशचन्द्र सार असार तत्व के परम विवेकी (क्षीर-नीर निर्णयकारी), प्रेम-पुञ्ज और अद्भुत अनुरागमय हैं। ये श्रीहरि का यश रूपी रसमय मधु पान करके मतवाले हो रहे हैं, और इसीलिये इन्होंने प्रायः अन्य सबके लिये दुस्त्यज कुल कर्मों का भी सर्वतः पूर्णरूपेण परित्याग कर दिया है।

[ आपके इस सुयश से आकर्षित होकर] कर्मठों ने कर्म त्यागकर और ज्ञानियों ने ज्ञान (वेदान्त- विचार) छोड़कर इनके उपदेशानुसार श्रीहरि का भक्ति-भाव से भजन ही किया। इसी तरह व्रत धारियों ने व्रतों का परित्याग करके चित्त लगाकर श्रवण [कीर्तन, स्मरण] आदि नवधा भक्ति के द्वारा भजन किया। अन्य योगी, जपी तपी आदि ने भी श्रवण आदि भक्ति में चित्त लगाकर योग, जप और तप आदि का त्याग कर दिया तथा और भी जो सकामी जन थे, उन सबने भी सकाम कर्मों के त्याग पूर्वक भक्ति ही की।

[ इस प्रकार जो लोग भक्ति की श्रेष्ठता समझकर] जितने भी प्रयासपूर्ण साधन हैं, उन्हें छोड़कर श्रवण-कथन, स्मरण, सेवन भक्ति में ही चित्त लगाते हैं और फिर अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म-समर्पण आदि नवधा भक्ति की ही वृद्धि करते रहते हैं, वही प्रेम-लक्षणा भक्ति प्राप्त करते हैं। अथवा उक्त कर्मठ, ज्ञानी, जपी, तपी और व्रतधारियों को अपने-अपने धर्मों का त्याग करके नवधा भक्ति के आश्रित होना चाहिए।

तब वे लोग उस गूढ़ रसमयी भक्ति को प्राप्त कर लेते हैं जो जगत् में युग-युग तक दुर्लभ तो है ही अपितु इन्द्रादि देवगण, भगवान् शंकर एवं ब्रह्मा के लिये भी दुर्लभ है। यह प्रेम लक्षणा भक्ति वेद, शास्त्र एवं पुराणों के लिये भी अगोचर है और जो स्वाभाविक ही माधुर्य एवं रूप की भण्डार है। यह प्रेमाभक्ति भय रहित, आनन्द की मूल और श्रीहित की निज सम्पत्ति है, क्योंकि इन्होंने ही इस गुप्त एवं सुन्दर रस-रीति भजन को प्रकट किया है। अतः जगत् को इस प्रेम-लक्षणा का प्रकाश देने वाले व्यास कुल दीपक श्रीहित हरिवंशचन्द्र की जय हो।

इस छन्द में श्रीहित चन्द्र का स्वरूप और उनकी शरणागति का फल प्रकाशित करते हैं –

पद – 4

प्रगटित प्रेम प्रकासं सकल जंतु सिसरी कृत चित्तं ।

गत कलि तिमिर समूहं निर्मल अकलंक उदित जग चंद्रं ॥

विसद चंद्र तारातनय सीतल किरन प्रकासि ।

अमृत सींचत मम हृदै सुखमय आनंद रासि ॥

सुखमय आनंद रासि सकल जन सोक हर ।

समुझि जे आये सरन ते डरत न काल डर ॥

दियौ दान तिन अभय द्वन्द दुख सब घटे ।

नित नित नव नव प्रेम कर्म बंधन कटे ॥

कटे कर्म बंधन संसारी सुख सागर पूरित अति भारी ।

विधि निषेध श्रृंखला छुड़ावै ।

निज आलय बन आनि बसावै ॥

आलय बन बसत संग पारस के, आयस कनक समान भयं।

माँगौं मन मनसि दासि अपनी करि, पूरन काम सदा हृदयं ॥

सेवक गुन-नाम आस करि बरनै, अब निजु दासि कृपा करनं।

जै जग उद्दोत व्यासकुल दीपक, श्रीहरिवंश चरन सरनं ॥

भावार्थ – [ श्रीहित हरिवंशचन्द्र ने] प्रेम के प्रकाश को प्रकट करके समस्त जीवों के चित्त को शीतल कर दिया। जगत में प्रेम रूपी इस निर्मल, निष्कलंक हरिवंश चन्द्र के उदय से कलि के अन्धकार (पाप) समूह) विनष्ट हो गये। ये पवित्र चन्द्र श्रीतारानन्दन (श्रीहरिवंश) अपनी शीतल किरणों को प्रकाशित करके मेरे हृदय में सुख पूर्ण आनन्दामृत राशि का सिंचन कर रहे हैं।

श्रीहरिवंशचन्द्र सुखमय हैं और आनंद की राशि हैं ये समस्त शरणागत जनों के शोकों का नाश करने वाले भी हैं; ऐसा समझकर जो जन इनकी शरण में आते हैं, वे फिर काल (मृत्यु) के डर से नहीं डरते। श्रीहरिवंशचन्द्र उन्हें अभय-दान दे देते हैं और उनके सभी द्वन्द्व (जन्म-मरण आदि) दुःख कट कर हृदय में नित्य प्रति नूतन प्रेम बढ़ता है।

श्रीहरिवंश की शरण आने वाले शरणागत के सांसारिक कर्म बन्धन कट कर हृदय में सुख का अत्यन्त विशाल सागर पूर्ण हो लहरा जाता है। श्रीहित चन्द्र उस शरणागत को वेदोक्त विधि निषेधों की साँकलों से छुड़ाकर अपने निज धाम श्रीवृन्दावन में ला बसाते हैं। निज-धाम श्रीवृन्दावन में बसते ही [ उस जीव का स्वरूप बदल जाता है अर्थात् वह ] पारस [ रूप श्रीहरिवंश ] का संग पाकर लोहे से स्वर्ण बन जाता है।

श्रीसेवक जी कहते हैं- हे श्रीहरिवंशचन्द्र! मैं अपने सच्चे मन से आपसे यही माँगता हूँ कि आप भी मुझे अपने मन में दासी स्वीकार कीजिये; क्योंकि आप सदा ही पूर्ण काम हृदय हैं। हे निज दासि! (अर्थात श्रीप्रियाजी के केलि कुञ्ज की विशेष अधिकारिणि और उनकी परम प्रिय सहचरि!) अब आप मुझ पर कृपा कीजिये। ‘सेवक’ इसी कृपा की आशा से तुम्हारे गुण और नामों का वर्णन करता है। [जिनकी कृपा से श्रीप्रियाजी के महलों की खास खबासी मिल सकती है, उन] जगत् प्रकाशक, व्यास कुल दीपक श्रीहित हरिवंशचन्द्र की सदा जय हो, मैं इन्हीं की चरण-शरण में हूँ।

इस अन्तिम छंद में फलस्तुति वर्णन करते हैं –

पद – 5

पढ़त गुनत गुन नाम, सदा सतसंगति पावै ।

अरु बाढ़ रस रीति, विमल बानी गुन गावै ॥

प्रेम-लक्षना भक्ति, सदा आनँद हितकारी।

श्रीराधा जुग चरन, प्रीति उपजै अति भारी॥

निजु महल टहल नव-कुंज में, नित सेवक सेवा करन।

निसिदिन समीप संतत रहै, सु श्रीहरिवंश चरन सरनं ॥

भावार्थ – जो कोई श्रीहित हरिवंशचन्द्र के गुण एवं नामों को पढ़ेगा और मनन करेगा, वह सदा सत्संग संत रसिकों का सङ्ग प्राप्त करेगा। श्रीहित हरिवंशचन्द्र की विमल वाणी का गान करने से रस-रीति बढ़ेगी और सदा आनन्दमय एवं हितकारी प्रेम लक्षणा भक्ति का [ उसके हृदय में ] उदय होगा। श्रीराधा के युगल चरणों में अत्यन्त प्रीति उत्पन्न होगी।

श्रीसेवकजी कहते हैं वह श्रीराधा के निज-महल (ऐकान्तिक निकुञ्ज भवन) में सेवक रूप से सदा सेवा-टहल करेगा और अहर्निश श्रीहित हरिवंशचन्द्र का सामीप्य प्राप्त करेगा। ऐसे [ परम प्रतापमय ] श्रीहित हरिवंशचन्द्र की मैं चरण शरण में हूँ-वही मेरे एकमात्र सर्वाश्रय हैं।


श्रीहित मंगल – गान
( द्वादश प्रकरण )
पूर्व परिचय

इस प्रकरण में मंगलमय श्रीहरिवंशचन्द्र के मंगलमय नाम , रूप , गुण , प्रभाव एवं रहस्यादि का गान किया गया है , अत : इस प्रकरण का नाम ‘ मंगल – गान ‘ है । इसके पृथक् – पृथक् चार छन्दों में से प्रथम में वृन्दावन विहार का स्वरूप , द्वितीय में श्रीहरिवंश की महान् गुणावली , तृतीय में इनके द्वारा प्रकाशित प्रेम धर्म की महत्ता और चतुर्थ में इनके नाम – गुण आदि गान करने का फल बताया गया है । चारों छन्दों में श्रीहरिवंश का स्वरूप – वर्णन ही पिरोया सा है । यह प्रकरण गम्भीर , विचारणीय और नित्य पठनीय है ।

पद – 1

जै जै श्रीहरिवंश व्यास कुल मंगना ।

रसिक अनन्यनि मुख्य गुरु जन भय खंडना ।

श्री बृंदावन बास रास रस भूमि जहाँ ।

क्रीड़त स्यामा स्याम पुलिन मंजुल तहाँ ।

पुलिन मंजुल परम पावन त्रिविध तहाँ मारुत बहै ।

कुंज भवन विचित्र सोभा मदन नित सेवत रहै ।

तहाँ संतत व्यासनंदन रहत कलुष बिहंडना ।

जै जै श्री हरिवंश व्यास कुल मंडना ।

भावार्थ – व्यास मिश्र के वंश के भूषण श्रीहरिवंशचन्द्र की जय हो । रसिक अनन्यों में मुख्य गुरुवर्य एवं अपने [ आश्रित ] जनों के भय का खण्डन करने वाले [ श्रीहित हरिवंशचन्द्र ] की सदा जय हो , जय हो । यमुना के सुन्दर तट पर जहाँ श्रीश्यामा – श्याम क्रीड़ा करते रहते और जो रास – क्रीड़ा की रसमय भूमि है , उसी वृन्दावन में इनका नित्य निवास है । जिस परम – पवित्र पुलिन ( यमुना – तट ) पर सदा [ शीतल , मंद एवं सुगन्ध युक्त ] त्रिविध वायु बहता रहता है और जहाँ कुञ्ज भवनों की विचित्र शोभा है , कामदेव जिन कुञ्जों का निरन्तर सेवन करता है । ऐसे श्रीवृन्दावन में पापों को विनष्ट करने वाले व्यासनन्दन ( श्रीहरिवंशचन्द्र ) सदा – सर्वदा निवास करते रहते हैं । ऐसे व्यासकुल – भूषण श्रीहित हरिवंशचन्द्र की सदा जय हो , जय हो ।

पद – 2

जय जय श्रीहरिवंश चंद्र उद्दित सदा ।

द्विज कुल कुमुद प्रकाश विपुल सुख संपदा ।

पर उपकार बिचार सुमति जग विस्तरी ।

करुणा सिंधु कृपाल काल भय सब हरी ॥

हरी सब कलिकाल की भय कृपा रूप जुबपुधरयौ ।

करत जे अनसहन निंदक तिनहुँपै अनुग्रह करयौ ।

निरभिमान निर्वैर निरुपम निष्कलंक जु सर्वदा ।

जै जै श्रीहरिवंश चंद्र उद्दित सदा ॥

भावार्थ – सदा – सर्वदा उदित रहने वाले श्रीहरिवंशचन्द्र की जय हो , जय हो । जो [ प्रेम रूपी ] अनन्त सम्पत्ति से पूर्ण एवं द्विज समूह रूप कुमुदनी के प्रकाशक ( विकसित करने वाले ) हैं ; जिन्होंने परोपकार के विचार से ही अपनी भक्ति रूपी सुन्दर मति ( सबुद्धि ) का जगत् में विस्तार किया और जिससे उन कृपालु करुणा सिन्धु [ श्रीहरिवंश ] ने काल व्याल के समस्त भय का हरण कर लिया ।

जिन्होंने कलिकाल के समस्त भय का हरण कर लिया उन्हीं ने कृपा रूप दिव्य वपु को धारण किया है । जो लोग आपकी असहनीय निन्दा करने वाले थे , आपने उन पर भी अपना अनुग्रह किया । जो अभिमान से रहित , वैर भाव से रहित , अनुपमेय एवं कलंक से रहित हैं , उन सर्वदा उदय रहने वाले चन्द्र श्रीहरिवंश की जय हो , जय हो ।

पद – 3

श्री हरिवंश प्रसंसित सब दुनी ,

सारासार विवेकित कोबिद बहुगुनी ।

गुप्त रीति आचरन , प्रगट सब जग दिये ,

ज्ञान – धर्म – व्रत – कर्म , भक्ति किंकर किये ।

भक्ति ‘ हित जे सरन आये , द्वंद दोष जु सब घटे ,

कमल कर जिन अभय दीने , कर्म बंधन सब कटे ।

परम सुखद सुसील सुंदर , पाहि स्वामिनि मम धनी ,

जै श्री हरिवंश प्रसंसित सब दुनी ॥

भावार्थ – सम्पूर्ण विश्व के द्वारा प्रशंसित श्रीहित हरिवंशचन्द्र की जय हो , जय हो । ये परम कोविद , अत्यन्त गुणवान और परमार्थ तत्व के सार और असार रहस्य के परम विवेकी हैं । आपने गुप्त रीति के आचरणों ( अर्थात् नित्य – विहार केलि की ऐकान्तिक रहनी और उपासना शैली ) का प्रकाश करके सारे विश्व को दान कर दिया और इसी नित्य – विहार प्रकाश के द्वारा आपने ज्ञान , कर्म , धर्म और व्रत आदि को भक्ति का दास बना दिया ।

जो लोग भक्ति की चाह से आपकी शरण में आये , उनके सारे द्वन्द्व – दु : ख क्षीण हो गये और जिसे इन्होंने अपना अभय कर – कमल प्रदान कर दिया उसके सारे कर्म – बन्धन कट गये ।

श्रीसेवकजी कहते हैं , हे परम सुखदाता , सुशील , एवं सुन्दर स्वामिन् ! हे मेरे समर्थ धनी ! ( प्रभु ) मैं आपकी शरण में हूँ , आप मेरी रक्षा कीजिये । हे समस्त विश्व से प्रशंसित श्रीहरिवंश । आपकी जय हो , विजय हो !

पद – 4

जै जै श्रीहरिवंश नाम गुन जो नर गाइ है ।

प्रेम लक्षणा भक्ति सुदृढ़ करि पाइ है ।

अरु बाढै रसरीति प्रीति चित चित ना टरै ।

जीति विषम संसार कीरति जग बिस्तरै ।।

बिस्तरै सब जग बिमल कीरति साधु संगति ना टरै ।

बास बंदाविपिन पावै श्रीराधिका जू कृपा करें ।

चतुर जुगल किसोर सेवक दिन प्रसादहिं पाई है ।

जै जै श्री हरिवंश नाम गुन जो नर गाइ है ।

भावार्थ – श्रीहरिवंशचन्द्र की जय हो , जय हो । जो मनुष्य श्रीहरिवंशचन्द्र के नाम एवं गुणों का गान करेगा , वह प्रेम – लक्षणा भक्ति को सुदृढ़ता पूर्वक प्राप्त करेगा , उसके चित्त में रस – रीति बढ़ेगी और प्रीति टाले नहीं टलेगी । वह भीषण संसार रूप आवागमन को जीतकर जगत् में अपनी कीर्ति विस्तृत करेगा ।

सारे संसार में अपनी निर्मल कीर्ति का विस्तार करके वह अविचल साधु – संगति को प्राप्त करेगा । वह श्रीवृन्दावन का निवास प्राप्त करेगा और श्रीराधा उस पर कृपा करेंगी अथवा वह वृन्दाविपिनेश्वरी किशोरी जू की कृपा से वृन्दावन – वास प्राप्त करेगा ।

श्रीसेवकजी कहते हैं कि युगल – किशोर का वह चतुर सेवक अपने प्रभु श्रीराधावल्लभलाल के कृपा प्रसाद को दिन – दिन ( नित्य प्रति ) प्राप्त करेगा , जो श्रीहरिवंशचन्द्र के नाम एवं गुणों का नित्य प्रति गान करेगा । अस्तु ; ऐसे महिमाशाली श्रीहरिवंशचन्द्र की जय हो , जय हो ।


श्रीहित धर्मी धर्म विधान
( त्रयोदश प्रकरण )
पूर्व परिचय

इस प्रकरण में राधावल्लभीय हितधर्मियों के परम – धर्म का उल्लेख किया गया है । इसमें प्रधानतया रसिक अनन्यता की दृढ़ता , ध म के स्वरूप को समझने का आग्रह , रसिक अनन्यों के प्रति पूज्य और श्रेष्ठ भावना का आग्रह , मानव देह की महत्ता , सत्संग महिमा , सत्संग करने का आदेश , सत्संग विहीनता में जीवन की व्यर्थता , सत्संग किसका करे ? सत्संग से क्या होगा ? धर्मियों का स्वरूप एवं हित धर्मियों की कृपा की याचना – वाञ्च्छा ; बस इन्हीं विषयों का एक – एक छन्द में वर्णन है ।

इस प्रकरण में बड़ी सच्चाई और स्पष्टता से धर्म के स्वरूप का निरूपण किया गया है जिसका पालन करने से प्रत्येक हित – साध क सच्चा और पक्का धर्मी बन सकता है ।

अस्तु ; अब प्रथम छन्द में अन्यान्य साधनों का हेयत्व और हित धर्म- श्यामा श्याम पद प्रीति – की सर्वोपरिता का प्रकाश करते हुए हित धर्म को ही परम श्रेष्ठ धर्म बताते हैं ; जो शास्त्र एवं संत – सम्मत है ।

पद – 1

साधन विविध सकाम मत , सब स्वारथ सकल सबै जु अनीति ।

ज्ञान ध्यान ब्रत कर्म जिते सब , काहू में नहिं मोहि प्रतीति ॥

रसिक अनन्य निसान बजायौ , एक स्याम स्यामा पद प्रीति ।

श्रीहरिवंश चरन निज सेवक , विचलै नहीं छाँड़ि रसरीति ।।

भावार्थ – नाना प्रकार के साधन और सकाम उपासनाओं के मत , ये सब स्वार्थ – लाभ के लिये किये जाते हैं , इनमें शुद्ध स्वार्थ – रहित प्रेम का सर्वथा अभाव होता है अत : अनीति है । [ इस प्रकार के जितने भी ज्ञान , ध्यान , व्रत एवं कर्म हैं , मुझे इनमें से किसी पर भी विश्वास नहीं है । रसिक अनन्य [ नृपति श्रीहित हरिवंश ] ने जो केवल श्यामा – श्याम के चरणों के अनन्य प्रेम का डंका बजाया है ; उस रसरीति को छोड़कर श्रीहरिवंश – चरणों का निज सेवक [ मैं अथवा अन्य हितधर्मी कोई भी ] विचलित नहीं हो सकता अर्थात् अनन्य भाव से उसी रसरीति में स्थिर रहेगा ।

पद – 2

श्री हरिवंश धरम प्रगट्ट , निपट्ट कै ताकी उपमा कौं नाहिन ।

साधन ताकौ सबै नव लच्छन , तच्छिन बेग बिचारत जाहि न ॥

जो रसरीति सदा अबिरुद्ध , प्रसिद्ध बिरुद्ध तजत्त क्यौं ताहि न ।

जो पै धरमी कहावत हौ , तौ धरंमी धरम समुज्झत काहि न ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंशचन्द्र के द्वारा प्रकट किया गया धर्म अच्छी तरह से उजागर है और सर्वश्रेष्ठ है , जिसकी उपमा के लिये कोई दूसरा है ही नहीं । इस धर्म के साधन हैं- वही नौ लक्षणों से युक्त नवधा भक्ति ; अत : हे भाई ! तू अभी इसी क्षण से शीघ्र जिसका विचार नहीं कर रहा है उसका विचार कर !

यह रसरीति सदैव साधक के अनुकूल है । जो इसके प्रसिद्ध विरोधी हैं , तू उनका त्याग क्यों नहीं करता ? यदि तुम ‘ धर्मी ‘ कहलाते हो तो [ हित ] धर्मियों के वास्तविक धर्म को क्यों नहीं समझते ? अर्थात् समझने का प्रयास करो , समझो ।

पद – 3

जौ पै धरंमिनि सौं नहिं प्रीति , प्रतीति प्रमानत आन न आनिबौ ।

एकहिं रीति सबनि सौं हेत , समीति समेत समान न मानिबौ ।

बात सौं बात मिलै न प्रमान , प्रकृत्ति बिरुद्ध जुगत्ति को ठानिबौ ।

श्री हरिवंश के नाम न प्रेम , धरंमी धरंम समुझ्यौ क्यौं जानिबौ ।

भावार्थ – यदि [ श्रीहरिवंश ] धर्मियों से प्रीति और प्रतीति नहीं है और दूसरों को प्रमाण मानकर उन पर विश्वास करता है किन्तु धर्मियों के प्रति [ अपने हृदय में ] प्रीति एवं प्रतीति नहीं लाता है , यदि सभी मतावलम्बियों से एक ही रीति से हित करता है , हित – धर्मियों के प्रति विशेष समीति ( प्रीति , स्नेह , मित्रता आदि ) और सम्मान नहीं मानता ; यदि श्रीहरिवंश – धर्मियों की बातों से अपनी बातें नहीं मिलाता और अपनी हठधर्मी ही प्रमाणित करता है । यदि प्रकृति के विरुद्ध युक्तियाँ ठानता है और यदि श्रीहरिवंश के नाम से प्रेम नहीं है तो उस धर्मी ने धर्म के स्वरूप को क्या समझा है ? कुछ नहीं ऐसा जानना चाहिये ।

पद – 4

श्रीहरिवंश बचन्न प्रमानिकैं , साकत संग सबै जु बिसारत ।

संसृति माँझ बरियाइ कै पायौ , जु मानुष देह वृथा कत डारत ।

क्यौं न करत्त धरंमिनि कौ संग , जानि बूझि कत आन बिचारत ।

जौ पै धरंमी मरंमी हौ तौ , धरंमिनि सौं कत अंतर पारत ।

भावार्थ – [ एक बार ] श्रीहरिवंश के वचनों को प्रमाण मानकर [ फिर दूसरी बार प्रमाद वश ] शाक्त – उपासकों के संग में लगकर वे सब [ श्रीहरिवंश वचनों की बातें भुला देता है [ और शाक्तों के जैसा ही हो जाता है । ] अरे ! तूने इस जन्म – मरण रूप संसृति के बीच में जाने कैसे किस कठिनाई से मानव – देह पा ली है ; भला , उसे क्यों व्यर्थ किये डाल रहा है ? तू धर्मियों का सङ्ग क्यों नहीं करता ? क्यों जान बूझकर उन्हें अन्य ( पराया ) समझ रहा है ? यदि तू धर्म का मर्मी ( रहस्य जानने वाला या जानने की इच्छा वाला है ) तो फिर क्यों धर्मी जनों से अन्तर कर रहा है ? शीघ्र उनसे एकता , मिलन एवं सत्सङ्ग कर ।

पद – 5

धरंमी – धरम कह्यौ जु करौ , तौ धरंमिनि संग बड़ौ सब तैं ।

अपुनर्भव स्वर्ग जु नाहिं बराबर , तौ सुख मर्त्य कहौ कब तैं ।

कहौ काहे प्रमान बचन विसारत , प्रेमी अनन्य भये जब तैं ।

तब श्रीहरिवंश कही जु कृपा करि , साँचौ प्रबोध सुन्यौ अब तैं ॥

भावार्थ – धर्मीजनों ने जो धर्म का स्वरूप कहा है यदि उसे यदि उसे तुम करने लगो तो [ तुम्हें ज्ञात हो जायेगा कि ] धर्मियों का सङ्ग ही सबसे बड़ा ( उत्तम ) है । अरे ! जब उस [ सत्सङ्ग ] के बराबर अपुनर्भव ( मोक्ष ) एवं स्वर्ग भी नहीं हैं तो फिर भला मृत्युलोक के सुख कैसे बराबर हो सकते हैं ? यदि कोई पूछे कि कहो जी , किन [ वचनों ] के प्रमाण से तुम [ अन्य साधनों के समर्थक ] वचनों को भुला रहे हो तो कहना होगा कि जब से हम [ श्रीहरिवंश – वचनों के आधार से ] अनन्य प्रेमी हो गये हैं और श्रीहरिवंशचन्द्र ने कृपा करके जो कुछ कहा है , हमने जबसे प्रबोध रूप उन सत्य वाक्यों को सुना है ।

पद – 6

श्रीहरिवंश जु कही ‘ स्याम स्यामा ‘ पद कमल संगी सिर नायौ ।

ते न बचन मानत गुरु द्रोही , निसिदिन करत आपनौ भायौ ।

इत ब्यौहार न उत परमारथ , बीच ही बीच जु जनम गमायौ ।

जौ धरंमिनि सौं प्रीति करत नहिं , कहा भयौ धर्मी जु कहायौ ॥

भावार्थ – [ श्रीहरिवंश चन्द्र ने जो कुछ कहा है , उसे यहाँ उपरोक्त छन्द ” कहौ काहे प्रमान …………. प्रेमी अनन्य भये जब तें ” , के प्रमाण में उपस्थित करते हैं । ] श्रीहरिवंश चन्द्र ने कहा है कि ” मैंने श्रीश्यामा – श्याम के चरण – कमल प्रेमियों , भक्तों , रसिकों को अपना सिर झुका दिया है , पर गुरुद्रोही इन वचनों को मानते नहीं , दिन – रात अपनी मनमानी करते रहते हैं । ( इसका परिणाम यह होता है कि ) कि इधर ( संसार में ) उनका न तो व्यवहार बन पाता और न उधर परमार्थ ही बनता है । बस वे बीच में पड़े अपना जन्म खो देते हैं ।

इस प्रकार यदि कोई धर्मी सच्चे हित धर्मियों से प्रीति और सङ्ग नहीं करता , तो उसके धर्मी कहला जाने मात्र से क्या हो गया ? व्यर्थ है ।

पद – 7

करौ श्रीहरिवंश उपासिक संग , जु प्रीति तरंग सुरंग बह्यौ ।

करौ श्रीहरिवंश की रीति सबै , कुल – लोक – बिरुद्ध जु जाइ सह्यौ ।

करौ श्रीहरिवंश के नाम सौं प्रीति , जा नाम प्रताप धरम लह्यौ ।

जु धरमी धरम सरूप कह्यौ , बिसरौ जिन श्रीहरिवंश कह्यौ ॥

भावार्थ – तुम श्री हरिवंश के उस उपासक का सङ्ग करो जो प्रेम – तरा के सुन्दर आनन्द – ज में बह गया हो – सराबोर हो । तुम श्रीहरिवंश की ( अनन्य धर्म सम्बन्धी ) सभी रीतियों का पालन करो । यदि तुमसे अपने कुल एवं लोक का विरोध सहा जा सके तो । श्रीहरिवंश के नाम से प्रेम करो , जिस नाम के प्रताप से तुमने धर्म को प्राप्त किया है और धर्मियों के धर्म का स्वरूप जो कुछ श्रीहरिवंश ने कहा है , उस ( श्रीहरिवंश कथन- “ स्याम – स्यामा पद कमल संगी सिर नायौ ” ) को मत भूलो ।

पद – 8

श्रीहरिवंश धरमजे जानत , प्रीति की ग्रंथि तहीं मिलिखोलत ।

श्रीहरिवंश धरंमिनि माँझ , धरमी सुहात धरंम लै बोलत ॥

श्रीहरिवंश धरमी कृपा करें , तासु कृपा रस मादिक डोलत ।

श्रीहरिवंश की बानी समुद्र कौ , मीन भयौ जु अगाधकलोलत ॥

भावार्थ – जो रसिकजन श्रीहरिवंश धर्म को जानते हैं , वही विज्ञ रसिकजन मिलकर प्रीति की ग्रन्थियों ( गाँठों , उलझनों ) को सुलझा सकते हैं , अन्य नहीं । वही लोग श्रीहरिवंश धार्मियों के बीच में धर्मियों को सुहाती हुई धर्म – युक्त बातें बोल भी सकते हैं । यदि ऐसे हरिवंश धर्मी कृपा करें , तो उनकी कृपा से प्रायः सभी उपासक रस से उन्मत्त होकर विचरण कर सकते हैं । फिर जो कृपा – प्राप्त कर लेगा , ऐसा प्रेमी श्रीहरिवंश की वाणी रूप समुद्र की मछली बनकर उस अगाध रस – सागर में किलोल ( आनन्द – क्रीड़ा ) करता रहेगा ।

पद – 9

व्रत संजम कर्म जुधर्म जिते , सब सुद्ध – बिरुद्ध पिछानत हैं ।

अपनी अपनी करतूत करें , रस मादिक संक न आनत हैं ।

हरिवंश – गिरा रस रीति प्रसिद्ध , प्रतीति प्रगट्ट प्रमानत हैं ।

बलि जाउँ आपनैं धरंमिनि की , जे धरमी धरमहिं जानत हैं ॥

भावार्थ – जितने भी व्रत , संयम , कर्म आदि सुन्दर – सुन्दर धर्म हैं , वे सब इस शुद्ध धर्म ( श्रीहित धर्म ) के विरोधी ( विपरीत रूप ) हैं , ऐसा वे धर्मी गण समझते हैं और चूँकि ये उक्त अपनी – अपनी करतूत ( कर्त्तव्य ) करते भी हैं किन्तु रस से उन्मत्त धर्मी गण उनकी जरा भी परवाह नहीं करते वरं वे तो श्रीहरिवंश की वाणियों में वर्णन की गयी रस – रीति को ही विश्वास पूर्वक प्रकट रूप से प्रमाणित करते और मानते हैं ।

श्रीसेवकजी कहते हैं कि मैं अपने इन धर्मियों की बलिहारी जाता हूँ , जो धर्मी एवं धर्म के तत्व को जानते पहचानते हैं ।

पद – 10

श्रीहरिवंश धरंम सुनंत जु छाती सिरात धरंमिनि की ।

धरम सुनंत पुलक्कित रोमनि हौं बलि प्रेम धरंमिनि की ।

धरम सुनंत प्रसन्न कै बोलत , बोलनि मीठी धरंमिनि की ।

( जु ) धरम सुनाइ धरमहि जाचत , चाहौं कृपा जु धरंमिनि की ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश धर्म का वर्णन सुनते ही सच्चे धर्मी का हृदय शीतल हो जाता है । जो इस धर्म को सुनकर रोम – रोम से पुलकित हो उठता है , मैं ऐसे प्रेमी – धर्मी की बलिहार हूँ । ऐसा प्रेमी निज धर्म का नाम सुनते ही प्रसन्न होकर बोलता है और उसकी बोली ( वाणी ) भी बड़ी मधुर होती है । जो धर्मी गण धर्म का श्रवण कराके फिर धर्म ( की प्रीति , रुचि आदि ) की ही याचना करते हैं मैं ऐसे ही धर्मियों की कृपा चाहता हूँ ।

पद – 11

श्रीहरिवंश प्रसिद्ध धर्म समुझै न अलप तप ।

समुझौ श्रीहरिवंश कृपा सेवहु धर्मिनि जप ॥

धर्मी बिनु नहिं धर्म नाहिं बिनु धर्म जु धर्मी ।

श्री हरिवंश प्रताप मरम जानहिं जे मर्मी ॥

श्री हरिवंश नाम धर्मी जु रति तिन सरन्य संतत रहै ।

सेवक निसिदिन धर्मिनि मिलैं श्रीहरिवंश सुजस कहै ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश चन्द्र का प्रसिद्ध धर्म अल्प तपस्या से कोई नहीं समझ सकता , हाँ जब धर्मी जनों का सेवन ( रूप महातप ) करोगे , तभी श्रीहरिवंश कृपा का स्वरूप समझौगे । क्योंकि सच्चे धर्मी के बिना धर्म की प्राप्ति नहीं होती और जहाँ ( जिसके हृदय में ) धर्म नहीं है वह धर्मी नहीं , श्रीहरिवंश के प्रताप से ही कोई मर्मी इस रहस्य ( मर्म ) को जान पाते हैं अथवा धर्म और धर्मी के इस मर्म को जो जानते हैं वही मर्मी हैं ।

श्रीसेवकजी कहते हैं कि प्रत्येक सेवक का धर्म है कि श्रीहरिवंश नाम के मानने वाले धर्मियों के प्रति जो रति ( प्रीति ) करता है उन्हीं की शरण में वह सदा रहा आवे और दिन रात धर्मियों से मिलकर ( उनका सत्संग करते हुए ) श्रीहरिवंश के सुयश का गान करता रहे ।


श्रीहित काचे धर्मी धर्म विधान
( चतुर्दश प्रकरण )
पूर्व परिचय

तेरहवें प्रकरण में हित – धर्मियों के लिये उनके परम धर्म – सत्सङ्ग का आदेश किया गया । अब इस प्रकरण में कच्चे धर्मियों के स्वभाव , गुण , रहन – सहन , व्यवहार , आचरण , उपासना शैली , निष्ठा , धार्मिक रुचि , छल , द्वेष , घृणा , निन्दा , स्वार्थ आदि की ओर संकेत किया जा रहा है , क्योंकि बुराइयों और बुरों का परिचय होने पर ही उनका त्याग किया जाना सम्भव है ।

कच्चे धर्मी वे हैं , जो गुरु दीक्षा , कण्ठी , तिलक आदि के द्वारा बाह्य आचरणों से वैष्णव तो बन चुके हैं – वैष्णव या राधावल्लभीय तो कहे जाने लगे हैं किन्तु उनके चित्त में न तो भक्ति भावना ही आयी और न इष्ट – निष्ठा ( वैष्णवता ) ही बन पायी , अत : ऐसे लोग जो केवल नाम मात्र को ‘ हित धर्मी ‘ हैं ‘ काचे ‘ धर्मी हैं । इस प्रकरण के पूर्व प्रसंग में काचे धर्मियों के लक्षणों का वर्णन है और अन्त में उनके लिये उचित उपदेश है , इसीलिये इस प्रकरण का सम्पूर्ण नाम “ काचे धर्मी धर्म विधान ” है । प्रकरण के प्रारम्भिक तेरह छन्दों में काचे धर्मियों के लक्षण और शेष अन्त के पाँच छन्दों में ‘ काचे ‘ धर्मियों के लिये उपदेश है – यही उनके लिये ‘ विधान ‘ है ।

अस्तु अब प्रथम छन्द में ‘ काचे धर्मी ‘ की अहंमन्यता रूप छल छन्द का वर्णन करते हैं

पद – 1

श्रीहरिवंश धरंमिनि के सँग ,

आमैं ही आरौं जु रीति बखानत ।

आपुने जान कहैं जु मिलैं मन ,

उत्तर फेरि चवग्गुन ठानत ॥

बैठत जाय बिधर्मिनि में तब ,

बात धरम की एकौ न आनत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी धरंम मरंम न जानत ।।

भावार्थ – श्रीहरिवंश – धर्म का स्वरूप यथार्थ रूप से न जानने पर भी सच्चे श्रीहरिवंश – धर्मियों के सङ्ग में बैठकर उन सबके समक्ष आगे ही आगे ( पूर्ण जानकार की तरह ) रस – रीति का बखान करता है । धर्मियों को अपना जानकर उनसे प्रथम तो अपनी मनमिल बातें करता है किन्तु पश्चात् ( बातों में सिद्धान्त भेद हो जाने पर ) उन्हीं से चौगुने उत्तर ठानता है । धर्मियों से तो बहुत विवाद करता है किन्तु जब विधर्मियों में जा बैठता है , तब धर्म – सम्बन्धी एक बात भी नहीं कह आती ।

( श्रीसेवकजी कहते हैं भाइयो ! ) इन कच्चे धर्मीजनों के ( छल ) छन्द सुनो । ये लोग सच्चे धर्मी जनों के धर्म का मर्म ( रहस्य ) नहीं जानते ।

पद – 2

बातनि जूठनि खान कहैं ,

मुख देत प्रसाद अनूठौड़ ही छाँड़त ।

ग्रंथ प्रमानिकै जो समुझाइये ,

तौ तब क्रोध रारि फिर माँड़त ॥

तच्छिन छाँड़ि प्रेम की बातहिं

फेरि जाति कुल रीति प्रमानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी धरंम मरंम न जानत ॥

भावार्थ – वह कच्चा धर्मी केवल बातों बातों ( वचनों ) में ( धर्मियों ) का उच्छिष्ठ ( गूंठा ) खाने की बात कहता है ( कि मैं तो आप धर्मी – जनों का गूंठा भी खा सकता हूँ , ) किन्तु अनूठा ( सर्वोत्तम , आश्चर्य महिमा मय ) प्रसाद देने पर भी त्याग देता है । यदि ग्रन्थों के प्रमाण द्वारा उसे ( प्रसाद का महत्त्व ) समझाया भी जाय , तो फिर वह उसके बदले में क्रोध पूर्वक झगड़ा ठान देता है । ( फिर कभी क्रोध आ जाने पर ) प्रेम की सब बातें भुलाकर अपनी जाति , कुल – रीति आदि की श्रेष्ठता को प्रमाणित करने लगता है अर्थात् भगवत्प्रासाद की अपेक्षा जाति , कुल – रीति आदि अधिक महत्त्वशील हैं , ऐसा सिद्ध करने लगता है । )

यही सब कच्चे धर्मियों के छल छन्द हैं । ये लोग सच्चे धर्मियों के वास्तविक धर्म का मर्म नहीं जानते ।

पद – 3

धरंमिनि माँझ प्रसंन है बैठत ,

जाय बिधर्मिन माँझ उपासत ।

लालच लागि जहाँ जैसे तहाँ तैसे ,

सोई सोई तिन मध्य प्रकासत ।।

बादहिं होत कुम्हार को कूकर ,

खाली हृदै गुरु रीति न मानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम जानत ॥

भावार्थ – ( वह कच्चा धर्मी ) इधर तो हित धर्मियों में प्रसत्र होकर बैठता अर्थात् इनकी सी बातें करता है और उधर विधर्मियों में जाकर उनकी सी उपासना करता है । लालच के लिये उन विधर्मी – जनों का सङ्ग करता है और उन जैसी बातें करने लगता है । प्रकाशित करने और न करने योग्य सभी विषयों को एकसा समझ कर अविचार पूर्वक प्रकाशित कर देता है । वह शून्य – हृदय ( धर्म के यथार्थ ज्ञान से हीन कच्चा धर्मी ) श्रीगुरु की रीति तो मानता नहीं ( और दूसरों की उपासना भी नहीं करता ) इस तरह व्यर्थ ही कुम्हार का कुत्ता बनता है । ये हैं कच्चे धर्मियों के छल – छन्द । सुनो , ये लोग धर्मियों के धर्म के मर्म को नहीं जानते और व्यर्थ जीवन खो देते हैं ।

पद – 4

नाना तरंग करत छिन ही छिन ,

रोवत रैंट न लार सँभारत ।

तच्छिन प्रेम जनाइ कहंत जु ,

मेरी सी रीति काहे न अनुसारत ॥

तच्छिन झगरि रिसाइ कहंत जु ,

मेरी बराबर औरनि मानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम जानत ।

भावार्थ – वे कच्चे धर्मी क्षण – क्षण में नाना प्रकार की लीलायें करते हैं । ऐसा रोते हैं कि रोते हुए जोर से दहाड़ सी मारते और मुँह से गिरती हुई लार को भी नहीं सम्हालते , ( क्योंकि इसीसे तो उनकी प्रेम – विह्वलता प्रकट होती है न ! ) फिर उसी क्षण दूसरों से अपना प्रेम प्रकट करते हैं कि तुम भी मेरी ही जैसी रीति का अनुसरण क्यों नहीं करते ? ( अर्थात् करो , क्योंकि यही वास्तविक प्रेम है ) फिर उसी क्षण उन्हीं लोगों से क्रोध में भरकर कहने लगता है कि तुम लोग मेरे बराबर औरों को मानते हो ? ( अर्थात् मैं ही सर्वश्रेष्ठ प्रेमी हूँ , मेरे बराबर प्रेमी और हो ही कौन सकता है ? )

( श्रीसेवकजी कहते हैं ) कि इन कच्चे धर्मियों के छल – छन्द सुन लो , ये लोग धर्मियों के धर्म का मर्म नहीं जानते वरं विचित्र पाषण्ड करते हैं ।

पद – 5

मेरौ सौ प्रेम मेरौ सौ कीरंतन ,

मेरी सी रीति काहे अनुसारत ।

मेरौ सौ गान मेरौ सौ बजाइबौ ,

मेरौ सौ कृत्य सबै जु बिसारत ॥

छाँड़ि मर्जाद गुरून सौं बोलत ,

कंचन काँच बराबर मानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद

धरंमी – धरंम मरंम न जानत ।।

भावार्थ – ( कितने एक कच्चे धर्मी अपने प्रेमीपने का ढोंग दिखा कर दूसरों से कहते हैं कि- ) ” मेरे जैसा प्रेम – भाव , मेरे जैसा कीर्तन – भजन और मेरे ही जैसी सभी रीतियों का तुम लोग अनुसरण क्यों नहीं करते ? क्योंकि मेरे जैसा गान , मेरे जैसे वाद्य बजाना और मेरे जैसे सारे कृत्य ऐसे हैं कि जो ( तुमको प्रेम में तन्मय करके ) अन्य अब ( संसार ) को भुला देते हैं ।

ऐसे कहने वाले कच्चे धर्मी लोग अपने को श्रेष्ठ समझ कर शास्त्रीय मर्यादा का भी त्याग करके गुरु जनों से ( बेतुकी अमर्यादित ) बातें करते हैं । वे मूर्ख स्वर्ण और काँच को एक सा समझते हैं भाव यह कि – श्री गुरु चरणों का महत्त्व न जानकर उन्हें साधारण मनुष्य मान कर उन्हीं से अहंकार पूर्वक बातें करते हैं । यही सब कच्चे धर्मियों के छल – छन्द है , सुनो ! ये लोग सच्चे धर्मियों के धर्म का मर्म नहीं जानते ।

पद – 6

देखे जु देखे भले जु भले तुम ,

आपनौ और परायौ न जानत ।

हौं जु सदा रसरीति बखानत

मेरी बराबर ठागनि मानत ।।

कैसे धौं पाऊँ तिहारे हृदै कौं ,

आन द्वार के मोहि न जानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम न जानत ।।

भावार्थ – ( कुछ कच्चे धर्मी अपने को किसी का श्रेष्ठ हितैषी प्रकट करते हुए कहते हैं- ) “ अजी ! देख लिया , खूब देख लिया , तुम बड़े भले हो , बड़े सीधे हो । इतने सीधे कि तुम्हें अभी अपने और पराये का भी बोध नहीं है , कि तुम्हारा अपना कौन है और पराया कौन ? अर्थात् मुझको भी पराया मान रहे हो , जो एक दम तुम्हारा अपना हूँ । मैं जो सदा रस – रीति का बखान करता रहता हूँ , मेरी बराबरी में उन ठगों को ( जो तुम्हें लूटते रहते हैं ) मानते हो । ( अर्थात् वे मेरे तुल्य तुम्हारे हितैषी नहीं हैं । ) मैं ( तो तुम्हारा इतना हितैषी हूँ और तुम मुझे अपना समझते ही नहीं ) अब तुम्हारे हृदय ( के प्रेम ) को कैसे पाऊँ ? ( क्योंकि तुम तो मुझे अपना समझते ही नहीं और मैं तुम्हारा इतना अनन्य मित्र हूँ कि केवल तुम्हीं से मेरा परिचय है ) अन्य द्वार ( सम्प्रदाय ) के लोग तो तुझे जानते पहचानते तक नहीं ।

( ऐसी कपट पूर्ण बातें करने वाले ) ये कच्चे धर्मी – गणों के छल – छन्द हैं , इन्हें सुनो ! ये धर्मियों के धर्म का मर्म ( रहस्य ) नहीं जानते ( और ऐसी बनावटी बातें करते हैं । )

पद – 7

और तरंग सुनौ अति मीठी ,

सखीन के नाम परस्पर बोलत ।

तच्छिन केस गहंत मुष्टि हनि ,

साकत सुद्ध बचावत डोलत ।।

तच्छिन बोलैं तू प्रेत तू राक्षस ,

फेरि परस्पर जाति प्रमानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौं छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम न जानत ।।

भावार्थ – ( श्रीसेवकजी कहते हैं – इन कच्चे धर्मियाँ की ) एक अत्यन्त मीठी ( परिहास पूर्ण ) तरंग और भी सुनो , वे लोग पहले तो आपस में एक दूसरे को सखियों के नाम ले लेकर बुलाते हैं ; ( कहते हैं – अजी चम्पक लता जी ! अजी प्रेम लता जी ! इत्यादि ) किन्तु फिर दूसरे ही क्षण ( लड़ – झगड़ कर ) एक – दूसरे के केशों को पकड़ खींच – खींच कर चूंसे मारते हैं , ( सारा प्रेम – भाव और सखी भाव भुलाकर मार – पीट करने लगते हैं । ) इस प्रकार ये ( हित धर्मी तो ) लड़ते हैं और उनको बचाते फिरते हैं शुद्ध शाक्त – गण , ( क्योंकि वही तो इनके सच्चे हितैषी थे ) लड़ते – लड़ते क्रोध में आकर उस क्षण एक दूसरे को “ तू प्रेत ” ” तू राक्षस !! ” ऐसा कहकर परस्पर में एक दूसरे की जाति प्रमाणित करने लगते हैं ? ( अर्थात् जाति की नीचता साबित करने लगते हैं । )

ये सब कच्चे धर्मियों के छल – छन्द हैं , इन्हें सुनकर इनका त्याग करो , ये लोग सच्चे धर्मी के धर्म – रहस्य भेद को बिलकुल भी नहीं जानते ।

पद – 8

जान्यौ धरम देखी रसरीति जु ,

निष्ठुर बोलत बदन प्रकासित ।

ऐसे न वैसे रहे मँझरैंडव ,

पाछिलियौ जु करी निरभासित ॥

है हैं फेरि जैसे के तैसे हम ,

बारे ते आये संन्यासिनि मानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम न जानत ॥

भावार्थ – ( जो पहले शैव संन्यासी थे किन्तु खाने पीने के लोभ से पीछे हित – धर्मी वैष्णव बन बैठे ) वे कच्चे धर्मी ( क्रोध के आवेश में अपने अनन्य धर्म की उपेक्षा करते हुए ) निष्ठुरता पूर्वक अपने मुख से ऐसा बकने लगते हैं कि- ” हमने तुम्हारे ( अनन्य ) धर्म को जान लिया और रस रीति को खूब देख लिया । ” इस प्रकार वे न तो इधर ( वैष्णव हित स्वामी धर्मी जनों ) के रहे और न उधर ( संन्यासी शैवो ) के ही , बेचारे बीच में ही लटक गये । अन्त में उन्होंने यह प्रकट किया कि अब हम तो फिर जैसे के तैसे हो जायँगे , क्योंकि हम तो बचपन से ही संन्यासी – शैवों को मानते आये हैं ; ( उनमें ही हमारी प्रीति और निष्ठा है , अत : संन्यासी हो जायँगे । वैष्णवता त्याग देंगे । )

( श्रीसेवकजी कहते हैं ) -सुन लो । यही सब कच्चे धर्मी पाखण्डी धर्म ध्वजी लोगों के छल – छन्द हैं । ये सच्चे हित धर्मियों के धर्म का रहस्य क्या जानें ? क्योंकि ये तो पेटू स्वार्थी हैं । )

पद – 9

एक रिसाने से रूखे से दीखत ,

पूछत रीति भभूकत धावत ।

एक रँगमगे बोलत चालत ,

मामिलैंहु बपुरे जु जनावत ॥

एक बदन कै साँची साँची कहैं ,

चित्त सचाई की एकौ न आनत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम न जानत ।।

भावार्थ – कोई तो क्रोध से भरे हुए से और रूखे नीरस से दीखते हैं पर अनन्य रसिक धर्मी अवश्य कहलाते हैं । यदि उनसे रीति ( कायदे ) से भी कोई बात पूछो , तो आग सी उगलते हुए दौड़ते हैं , ( मानो खा जायँगे । ) कुछ एक बड़ी रङ्गमगी ( रसीली ) बातें करते हैं और साधारण स्थिति में भी दीनता का प्रदर्शन करते हैं , ( पर वास्तव में उनके हृदय में न तो रसिकता रहती और न दीनता ही । वे तो केवल शब्दाडम्बर मात्र करते हैं । ) कुछ एक लोग मुख से तो ‘ सत्य सत्य ‘ ( अर्थात् हम सत्य ही कहते हैं , झूठ सम्भाषण नहीं करते ) कहते हैं पर उनके चित्त में सच्चाई की एक भी बात नहीं आती और न रहती ।

( श्रीसेवकजी कहते हैं ) ये सब कच्चे धर्मियों के छल फरेब हैं इन्हें सुनो । ये लोग धर्मियों के धर्म का मर्म तो जानते नहीं छल का मर्म अवश्य जानते हैं ।

पद – 10

एक धरंम समुज्झे बिनाऽव ,

गुसाईं के है जु जगत्त पुजावत ।

मूल न मंत्र टटोरा की रीति ,

धरंमिनि पूछत बदन दुरावत ।।

एक मुलंमा ‘ सौ देत उघारि ,

जु बल्लभ सौं बल्लभ परमानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम जानत ॥

भावार्थ – कोई एक कच्चे धर्मी , धर्म का स्वरूप समझे बिना ही केवल ( श्रीहरिवंश ) गोस्वामी के कहला कर जगत में अपने आपको पुजाते फिरते हैं । इनके पास न तो धर्म का मूल ( अर्थात् धर्म विषयक ज्ञान , धारणा , प्रीति आदि ) ही है और न मन्त्र ( रहस्य ) ही । केवल टटोरे ( अर्थात् अन्धे की भाँति टटोल कर किसी वस्तु का अनुमान करने ) की रीति से ये लोग अपना काम चलाते हैं । सच्चे धर्मियों के समक्ष मुँह छिपाने लगते हैं , जब इनसे धर्म – विषयक बातें पूछी जाती हैं ; ( क्योंकि धर्म से सर्वथा कोरे हैं । ) यदि कोई कच्चे धर्मी धर्म का स्वरूप बताने ही लगे तो मुलम्मा सा उघार देते हैं और वल्लभ शब्द से वल्लभ ( प्रियतम अर्थात् राधावल्लभ शब्द का अर्थ राधा के वल्लभ श्रीकृष्ण ) को प्रमाणित करने लगते हैं । सुनो , ये कच्चे धर्मियों के छल – छन्द हैं , ये लोग धर्मी गणों के धर्म का मर्म नहीं जानते ।

पद – 11

एक गुरून सौं वाद करंत ,

जु पंडित मानी है जीभहि ऐंठत ।

एक दरब्य के जोर बरब्बट ,

आसन चाँपि सभा मधि बैठत ॥

एक जु फेरि रीति उपदेसत ,

एक बड़े बै न बात प्रमानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौं छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम न जानत ।

भावार्थ – कोई एक ( कच्चे धर्मी ) गुरु – जनों से ही वाद – विवाद करते हैं । बड़े मानी पण्डित कहाकर जीभ ऐंठते- पाण्डित्य प्रकाशित करते हैं । कोई एक केवल द्रव्य के जोर से गुरु – जनों की बराबरी करते हुए सभा समाज में उनके आसन को दबाकर – समानता का अपना भाव प्रकट करते बैठते हैं । फिर कोई एक उन्हीं गुरुजी को वहीं रस – रीति का उपदेश करने लग जाते हैं । कोई एक बड़े बनकर अभिमान – वश दूसरों की बातों को ( सत्य होने पर भी ) प्रमाण ही नहीं मानते , ( अपनी ही अपनी धौंकते चले जाते हैं । ) ये हैं नकली धर्मी लोगों के छल छन्द । सुनो , ये धर्मी , धर्म का मर्म नहीं जानते ।

पद – 12

एक धरंमी अनन्य कहाइ ,

बड़ाई को न्यारी कै बाजी सी माँड़त ।

और के बाप सौं बाप कहंत ,

दरब्य के काज धरंमहिं छाँड़त ॥

बोलत बोल बटाऊ से लागत ,

है गुरुमानी न बात प्रमानत ।

काचे धरंमिनि के सुनौ छंद ,

धरंमी – धरंम मरंम न जानत ।

भावार्थ – तो सजातीय ( तुम्हारे सम उपासक अनन्य हित – धर्मी ) बन जाते और खर्च करने के समय विजातीय ( अन्य ) बन जाते हैं ( अर्थात् खीर में एक और महेरी में न्यारे हैं । )

पद – 13

लै उपदेश कहाय अनन्य ,

अन्हाइ अनर्पित जाइ गटक्कत ।

आस करें विषईनि के आगैं ,

जु देखे मैं जोरत हाथ लटक्कत ॥

केतिक आयु कितेक सौ जीवन ,

काहे बिनासत काज हटक्कत ।

श्रीहरिवंश धरंमिहिं छाँड़ि ,

घर घर काहे फिरत्त भटक्कत ॥

भावार्थ – कुछ कच्चे धर्मी श्रीगुरु उपदेश लेकर और अनन्य धर्मी कहला कर भी , स्नान मात्र करके प्रभु अर्पित किये बिना ही वस्तुओं को भोगने लगते हैं । इन लोगों को मैंने विषयी लोगों के सामने आशा पूर्वक हाथ जोड़ते और भीख के लिए हाथ लटकाते देखा है ।

( ऐसे लोलुप और अधर्मी लोगों के लिये श्री सेवकजी महाराज उपदेश करते हैं – कि ) अरे ! कितनी तो तुम्हारी आयु है और कितना थोड़ा तो तुम्हारा यह जीवन है फिर क्यों ( जबरदस्ती ) हटकते – बरजते हुए भी अपने काम बिगाड़ रहे हो ? ( भाव यह कि सच्चे धर्मी बन कर अपना जीवन सफल क्यों नहीं कर लेते ? ) भाई ! श्रीहरिवंश – धर्म को छोड़ कर क्यों घर – घर ( यहाँ – वहाँ दूसरी – दूसरी उपासनाओं में ) भटकते फिरते हो ?

पद – 14

साकत संग अगिन्न लपट्ट ,

लपट्ट जरत्त क्यौं संगति कीजै ।

साधु सुबुद्धि समान सु संतनि ,

जानिक सीतल संगति कीजै ॥

एक जु काचे प्रकृत्ति बिरुद्ध ,

प्रकृत्ति बिरुद्ध करें तौ का कीजै ।

जे आगि के दाझे गये भजि पानी में ,

पानी में आग लगै तौ का कीजै ।।

भावार्थ – ( श्रीसेवक जी कहते हैं- ) भाई ! शाक्तों का सङ्ग अग्नि की तीखी लपट है । लपट का स्वाभाविक धर्म है कि वह सब कुछ जला देती है । तब तू क्यों उस अग्नि लपट रूप शाक्त का सङ्ग करता है ? साधु जन सुन्दर बुद्धि से युक्त और सम – भाव पूर्ण सन्त हैं ऐसा जानकर उन सन्तों का ही शीतल ( शान्तिदायक ) संग कर । एक तो तू ( अपने धर्म में ही ) कच्चा है और वे ( शाक्त गण ) तेरे प्रकृति विरोधी ( अर्थात् तेरी सात्विक उपासना के विपरीत तमोगुण प्रधान उपासना युक्त ) है , फिर यदि वे तेरे लिये प्रकृति के विरुद्ध करते भी हैं , तो तू क्या कर सकेगा ? ( अर्थात् तू उनके उस विपरीत धर्म के प्रवाह में बह जायगा और दिनों दिन तेरा अपने धर्म से अन्तर पड़ता जायगा ) अन्ततोगत्वा तेरा यह हाल होगा कि जैसे कोई आग का जला – भुना शीतलता के लिये पानी में जाय किन्तु उस पानी में ही आग लग जाय तो वह क्या करे ? अर्थात् धर्म के कच्चे पन की आग के जले हुए शाक्त – सङ्ग रूप पानी में शान्ति के लिये गये पर वहाँ भी प्रकृति – विरोध की आग लग जाय तब तो कही शान्ति नहीं होगी । अत : शाक्त सङ्ग को छोड़कर सन्तों का शान्ति दायक सङ्ग करे । )

पद – 15

प्रीति भंग बरनत रस रीतिहि ,

श्रीहरिवंश बचन बिसरावहु ।

आप आपनी ठौर जहाँ तहाँ ,

करि विरुद्ध सब पै निदराबहु ।।

एक संसार दुष्ट की संगति ,

ताहू पै तुम पुष्ट करावहु ।

विनती करहुँ सकल धर्मिनि सौं ,

धर्मी है जिन नाम धरावहु ॥

भावार्थ – ( श्रीसेवकजी कहते हैं- ) हे कच्चे धर्मी भाइयों ! वास्तव में तुम प्रीति से रहित ( प्रीति भङ्ग ) होने पर भी रस रीति का वर्णन करते हो और श्रीहरिवंशचन्द्र के वचनों को भुला रहे हो ( जो उन्होंने कहा है- “ साधुसँगति करि अनुदिन राती ” और ” स्याम – स्यामा – पद – कमल संगी सिर नायौ । ” साधु सङ्ग से प्रीति प्राप्त करके फिर प्रीति – रस – रीति का वर्णन शोभा देता है , केवल वाचिक नहीं । उपदेशक उपदेश देने मात्र से महान् नहीं कहा जा सकता न रसिक ही । भाई तुम अपनी – अपनी जगह पर ( स्थिति में ) ही रहते हो किन्तु ( श्रीहरिवंश वचन के विरुद्ध – आचरण ; शाक्त – सङ्ग , मनमुखी पन आदि ) कर कर के जगत में अपनी निन्दा अवश्य करा लेते हो । एक तो यह संसार ही दुष्ट – सङ्ग है , उस पर भी तुम उसी संसार की पुष्टि करा रहे हो ! ( अर्थात् शाक्तादि लोगों के सङ्ग से आवागमन ही तो बढ़ेगा ? ) अतएव मैं समस्त धर्मियों से विनय करता हूँ कि तुम धर्मी ( हित रस के अनन्य रसिक ) कहलाकर अब ऐसा ( बुरा ) नाम मत पैदा करो ! ( कि ये कच्चे धर्मी किंवा शाक्त – सङ्गी हैं । )

पद – 16

स्वारथ सकल तजि गुरु चरननि भजि ,

गुप्त नाम सुन कधि संतन सौं संग करि

काल – व्याल मुख परयौ कफ बात पित्त भरयौ ,

भ्रम्यौ कत अनन्य कहाय की जिय लाजधरि ॥

सेवक निकट रस रीति प्रीति मन धरि ,

हित हरिवंश कुल कानि सब परिहरि ।

काचे रसिकनि सौं बिनती करत ऐसी ,

गोबिंद दुहाई भाई जो न सेवहु स्यामा हरि ॥

भावार्थ – हे भाई ! तू अपने सारे स्वार्थों का त्याग कर , श्रीगुरु चरणों का भजन कर , अपने इष्ट देव श्रीराधावल्लभलाल के गुण एवं नामों का श्रवण – कथन कर और प्रेमी सन्तों का सत्सङ्ग कर । ( विचार करके देख ! ) तू काल रूपी सर्प के मुख में पड़ा है और तेरा नाशवान् शरीर कफ , वात एवं पित्त से भरा हुआ है । फिर तू किसलिये भ्रम में हो ? अरे , अपने अनन्य कहे जाने की लाज तो ( कम से काम ) अपने चित्त में धारण कर ।

श्रीसेवकजी कहते हैं – कि श्रीहरिवंश के सेवकों के निकट ( निवास करके या उनकी समीपता प्राप्त करके ) रस – रीति एवं प्रीति को अपने मन में धारण कर और श्रीहरिवंश के लिये ( उनकी प्राप्ति , प्रीति के लिये ) अपने कुल की मर्यादा , प्रतिष्ठा आदि सब ( बन्धनों ) का परित्याग कर दे । मैं कच्चे रसिकों से विनती करता हूँ कि हे भाइयो ! यदि तुम श्रीश्यामा – श्याम सेवन नहीं करते हो तो तुम्हें मेरी ओर से श्रीगेविन्द की दुहाई है जो ऐसा न करो । अर्थात् शपथ है , अत : श्रीश्यामा – श्याम का सेवन अवश्य करो ।

पद – 17

परखे सुनहु सुजान और कछु जहाँ कचाई ।

भक्त कहैं परसन्न न तरुता कहैं बुरबाई ॥

दियैं सराहैं सुख हैं दुख दिन राती ।

खैबैं कौं जु सजाति खरच कौं होत बिजाती ।

भावार्थ – ( श्रीसेवकजी कहते हैं- ) हे सज्जनो ! सुनो , उनमें और जो कुछ एवं जहाँ कहीं कच्चापन है , उसका भी वर्णन करता हूँ , मैंने जिसे परख लिया है । ये कच्चे लोग ‘ भक्त ‘ कहने पर प्रसन्न तो होते हैं किन्तु उनकी बुराई ( निन्दा ) कही जाने पर उनमें तरुता ( वृक्ष जैसी सहन – शीलता ) नहीं रहती । वे कुछ देने पर और सराहना किये जाने पर सुखी होते अन्यथा सब समय दिन रात दु : खी ही रहते हैं । आश्चर्य है कि ये खाने के लिये

पद – 18

प्रगटित श्री हरिवंश सूर दुंदुभि बजाइ बल ।

मदन मोह मद मलित निदरि निर्दलित दंभ दल ।।

भरम भाग्य भय भीत गर्व दुर्जन रज खंडन ।

लोभ क्रोध कलि कपट प्रबल पाखंड विहंडन ।।

तृष्णा – प्रपंच – मत्सर – बिसन सर्व दंड निर्बल करे ।

सुभ – असुभ दुर्ग बिध्वंसि बल तब जैति – जैति जग उच्चरे ॥

भावार्थ – श्रीश्यामा – श्याम का सेवन करने या श्रीहरिवंश धर्म का अनन्य भाव से पालन करने से उस साधक के हृदय में श्रीहरिवंश चन्द्र शूर – वीर दुन्दुभि बजाकर ( डंके की चोट से ) बल – पूर्वक प्रकट हो जाते हैं और काम , मोह , अभिमान , दम्भ , पाषण्ड आदि के दल को निरादरित करके मसल डालते हैं । ( उस उपासक के ) भ्रम , भाग्य ( कर्म – संस्कार , परिणाम ) , भय , भीति ( भय से उत्पन्न भाव ) गर्व आदि दुर्जनों के अभिमान ( रजोगुण – धर्म ) का खण्डन करके लोभ , क्रोध , कलह कपट आदि प्रबल पाषण्ड समूह को तहस नहस कर डालते हैं । इसी प्रकार तृष्णा प्रपञ्च , मत्सर ( डाह ) आदि सारे दोषों ( व्यसनों ) को भी अपने दण्ड बल से निर्बल कर देते हैं , पश्चात् पुण्य और पाप रूपी किलों को भी नष्ट – भ्रष्ट कर डालते हैं । तब सम्पूर्ण जगत् जय – जयकार का उच्चारण कर उठता है ।


श्रीहित अलभ्य – लाभ
( पंचदश प्रकरण )
पूर्व परिचय

अलभ्य उस वस्तु को कहते हैं जो कभी किसी को प्राप्त न हुई हो । ऐसी अलभ्य वस्तु है- श्रीहरिवंश नाम । यह पहले किन्हीं साधनों से भी किसी को प्राप्त नहीं था , श्रीहरिवंशचन्द्र ने कृपा पूर्वक जगतीतल पर प्रकट होकर अपने रूप का प्रकाश किया , जिससे कृपा पात्र जनों ने उन्हें जाना और उनके नाम के द्वारा उस अलभ्य वस्तु का लाभ किया , जो अभी तक किसी को प्राप्त न थी ; इसलिये इस प्रकरण में उस अलभ्य लाभ का वर्णन होने से इसका नाम अलभ्य – लाभ ‘ रखा गया है ।

इस अलभ्य लाभ के दृष्टि – गोचर होते हुए भी जो लोग इसका लाभ नहीं लेते मानो वे महा अभागे हैं ।

अस्तु यहाँ चार छन्दों में उस “ अलभ्य लाभ ” श्रीहरिवंश – नाम की महिमा , प्रभाव , गुण – माहात्म्य , नाम को ग्रहण न करने वाले का स्वरूप एवं दशा आदि का संक्षेपत : वर्णन किया गया है ।

पद – 1

श्री हरिवंश नाम है जहाँ तहाँ तहाँ उदारता ,

सकामता तहाँ नहीं कृपालुता विशेषिये ।

हरिवंश नाम लीन जे अजातसत्रु ते सदा ,

प्रपंच दंभ आदि दै तहाँ कछू न पेखिये ॥

हरिवंश नाम जे कहैं अनंत सुक्ख ते लहैं ,

दुराप प्रेम की दसा तहाँ प्रतच्छ देखिये ।

सोई अनन्य साधु सो जगत्र पूजिये सदा ,

सु धन्य धन्य विश्व में जनम सत्य लेखिये ॥

भावार्थ – जहाँ – जहाँ श्रीहरिवंश नाम है , वहाँ – वहाँ उदारता है । वहाँ सकामता ( फल की इच्छा ) नहीं है और कृपालुता तो विशेष रूप से है , ऐसा जानना चाहिये । जो उपासक श्रीहरिवंश – नाम में तल्लीन हैं , वे सदा ही अजात शत्रु ( अर्थात् जिनका शत्रु पृथ्वी क्या त्रिलोकी में उत्पन्न ही नहीं हुआ ऐसे ) हैं । उनके पास प्रपञ्च दम्भ से लेकर और भी बहुत से दोष पाखण्ड आदि कुछ भी नहीं देखे जाते । जो लोग ‘ श्रीहरिवंश ‘ नाम कहते रहते हैं , वे अनन्त सुख को प्राप्त करते हैं और अत्यन्त गोपनीय प्रेम की दशा भी उनमें प्रत्यक्ष देखी जाती है ( अर्थात् श्रीहरिवंश नाम के प्रताप से वह अलभ्य प्रेम दशा भी प्रकट हो जाती है ) जो ऐसा ( उक्त गुणों से सम्पन्न ) है वही अनन्य साधु है , वही सदा – सर्वदा त्रिलोक पूज्य है । वही धन्य – धन्य है और विश्व में जन्म लेना उसी का सचमुच सार्थक है ।

पद – 2

श्रीव्यासनंदन नाम कौ अलभ्य लाभ जानिये ।

हरिवंशचंद्र जो कही सुचित्त है सबै लही ,

बचंन चारु माधुरी सु प्रेम सौं पिछानिये ।

सुनै प्रपंन जे भये अभद्र सर्व के गये ,

तिन्हें मिलैं प्रसंन है न जाति भेद मानियै ॥

सुभाग लाग पाइ हौ प्रसंसि कंठ लाइ हौ ,

सिराइ नैंन देखिकै अभेद बुद्धि आनियै ।

कृपालु कै सु भाखि हैं धरम पुष्ट राखि हैं ,

श्रीव्यासनंदन नाम कौ अलभ्य लाभ जानियै ॥

भावार्थ – निश्चय जानिये कि श्रीव्यासनन्दन नाम का लाभ ही वास्तव में अलभ्य लाभ है ।

श्रीहरिवंश चन्द्र ने जो कुछ कहा है , उसे सभी ( उनके शरणागतों ) ने सुचित्त भाव से प्राप्त किया है । हृदय में प्रेम होने से ही उस वाणी का माधुर्य समझ में आता है ( क्योंकि वह अन्य प्रकार पहचानी ही नहीं जा सकती । ) उस ( वचन माधुरी ) को सनुकर जो लोग ( श्रीहित हरिवंशचन्द्र के ) शरणागत ( भक्त ) हो गये , उनके समस्त अभद्र ( अमंगल , पाप ) विदा हो गये । ऐसे उन भक्तों से प्रसन्नता – पूर्वक मिलना चाहिये , उनसे जाति आदि का भेद ( अर्थात् जाति की उच्चता और हेयता ) नहीं माननी चाहिये । ऐसे प्रेमी मानो हमारे सौभाग्य को उदय करने के ही लिये मिलते हैं – अथवा उनसे सौभाग्य और लाग ( लगन ) प्राप्त हो सकेगी , वे तुमसे प्रसंशा – पूर्वक मिलेंगे और तुम्हें गले लगा लेंगे । तुम उनका दर्शन करके अपने नेत्र शीतल करो और उनके प्रति अभेद बुद्धि ( अर्थात् इष्टदेव श्रीराधावल्लभलाल और रसिक- -महानुभाव दो तत्व नहीं अपितु एक ही वस्तु – तत्व के दो रूप हैं ऐसी बुद्धि ) लाओ । वे भी तब कृपालु होकर तुम्हारे प्रति सुन्दर और मधुर वचनों का भाषण करेंगे , ( सदुपदेश देंगे ) और तुम्हारे धर्म को पुष्ट करके उसकी रक्षा करेंगे ।

( यह समस्त गुण श्रीहरिवंश नाम के ही हैं अत श्रीव्यासनन्दन श्रीहरिवंशचन्द्र के नाम को ही अलभ्य लाभ जानिये । इसके समान कोई अन्य लाभ तो है ही नहीं ।

पद – 3

हरिवंश नाम सर्व सार छाँड़ि लेत बहुत भार ,

राज बिभौ देखिकै विषै विषम भोवहीं ।

जोरु होत साधु संग ऑन करत प्रीति भंग ,

मान काज राजसीन के जु मुक्ख जोवहीं ॥

जहाँ तहाँ अन्न खात सखी कहत आप गात ,

सकल द्यौस द्वंद्व जात रात सर्व सोवहीं ।

प्रसिद्ध व्यासनंदन नाम जानि बूझि छोड़हीं ,

प्रमाद तें लिये बिना जनम बाद खोवहीं ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश नाम ही सबका सार है । कच्चे और अश्रृद्धालु धर्मी लोग उसे छोड़ कर अन्य – अन्य ( उपासना और धर्मों का ) व्यर्थ भार अपने सिर पर लेते हैं और किसी का राज्य – वैभव आदि देख करके विषम विषय – रस में लिप्त हो जाते हैं । यदि कदाचित् सौभाग्य से साधुजनों का सङ्ग प्राप्त हो भी गया तो उन साधुओं से भी और – और प्रकार की खटपट कर करके उनसे प्रीति तोड़ लेते हैं और सम्मान पाने के लिये राजसी लोगों का मुख देखते रहते हैं ।

ये लोग अनन्य तो बनते हैं पर जहाँ – तहाँ अन्न ( विना भोग लगी हुई वस्तु ) खाते फिरते और अपने आपको ( गुरु दीक्षा , कण्ठी , तिलक आदि होने से ) सखी – स्वरूप कहते हैं । उनके सारे दिन द्वन्द्व ( राग – द्वेष , इर्ष्या , असूया , झूठ – कपट आदि ) में ही चले जाते हैं और वे सारी रात सोया करते हैं , केवल कहने के सखी – स्वरूप हैं , भजन – भाव , सेवा , जप , पाठ आदि कुछ नहीं अपितु खाना – पीना और सोना यही सारे विपरीत आचरण हैं । खेद है कि प्रसिद्ध व्यास नन्दन ( श्रीहरिवंश ) नाम को जान बूझ कर छोड़ देते हैं और प्रमाद – वश उस महान् नाम के बिना ही अपने अमूल्य जीवन को व्यर्थ खो देते हैं ।

पद – 4

हरिवंश नाम हीन खीन दीन देखियै सदा ,

कहा भयौ बहुज्ञ द्वै पुरान वेद पढ्ढहीं ।

कहा भयौ भये प्रबीन जानि मानियै जगत्र ,

लोक रीझ सोभ कौं बनाइ बात गढ्ढहीं ॥

कहा भयौ किये करम जज्ञ दान देत – देत

फलनि पाइ उच्च – उच्च देवलोक चढ्ढहीं ।

परयौ प्रवाह काल के कदापि छूटि है नहीं ,

श्रीव्यासनंदन नाम जो प्रतीति सौं न रहीं ॥

भावार्थ – जो लोग श्रीहरिवंश नाम से हीन हैं – रहित हैं , वे सदैव दीन एवं ( धर्म से ) क्षीण देखे जाते हैं । क्या हुआ जो वे लोग बड़े भरी सुज्ञाता होकर पुराण एवं वेद पढ़ते रहते हैं ? यदि वे बड़े प्रवीण ( कुशल ) भी हो गये और उन्हें सारा जगत् जानने और मानने भी लगा । वे संसार को रिझाने के लिये गढ़ – गढ़ कर शोभामयी ( मीठी – मीठी ) बातें भी कहना सीख गये तो भी क्या ? यदि उन्होंने बहुत से कर्म किये , यज्ञ किये और दान दिये तो क्या ? अरे ! दान दे – देकर भोगों के उच्च फल पा गये और ऊँचे – ऊँचे लोकों ( स्वर्ग आदि ) में भी चले गये , तो इससे भी क्या हुआ ?

इतना सब होने पर भी वह व्यक्ति जो श्रीव्यासनंदन नाम को विश्वास पूर्वक नहीं रटता है , सदा ही भव ( आवागमन ) के प्रवाह में पड़ा रहेगा । वह कभी भी उस भव – प्रवाह से नहीं छूट सकता जब तक कि प्रतीति ( विश्वास ) और प्रीति ( प्रेम ) से श्रीव्यासनन्दन नाम को नहीं रटेगा ।


श्रीहित अबोलनौं
( षोडश प्रकरण )
पूर्व परिचय

‘ अबोलनौं ‘ का अर्थ है ‘ न बोलना ‘ इस न बोलने की स्थिति का सङ्केत मान से है । कभी – कभी क्रीड़ा – विलास में युगल किशोर के बीच में ऐसी स्थिति आ प्राप्त होती है , जहाँ श्रीप्रियाजी सब कुछ भूल कर चुप हो रहती हैं , किन्तु प्रेम – आशंका वश श्रीलालजी उसे ‘ मान ‘ समझ बैठते हैं । सेवक जी के मत से यह ‘ मान”प्रकट प्रेम रस सार ‘ है । यह प्रेम रससार कुञ्जान्तर मान नहीं , रूठना नहीं , क्रोध नहीं , घृणा नहीं और न सौतिया डाह जैसी कोई स्थिति ही है । यह है प्रेमाधिक्य का विलास । जब श्रीप्रियाजी अपने प्रियतम श्रीलाल जी के प्रेमाधिक्य से अपनी सुधि – बुधि खो बैठती , मौन हो जाती हैं तब श्रीलाल जी उनकी इस स्थिति को अपनी प्रेम – सम्भ्रम बुद्धि से ‘ मान ‘ समझ बैठते हैं , क्योंकि वे भी तो प्रेम – परवश होने के कारण अपनी बुद्धि खो बैठते हैं , अतएव वे श्रीप्रियाजी को मनाने लगते हैं ।

इस रहस्य को सर्वज्ञ हित सखी खूब समझती हैं , इसलिये श्रीप्रियाजी को वस्तु स्थिति समझाने की कोशिश करती हैं , ताकि मान जैसी स्थिति छूट जाय और दोनों पक्षों में रस की धारा बह चले ।

अन्तत : ऐसा ही होता है । इस अबोलनौ के नित्य – मिलन प्रसंग में प्रेम – विलास की अनिर्वचनीयता की जो अन्तिम – स्थिति दिखायी गयी है , उससे महाप्रभु श्रीहित हरिवंशचन्द्र के प्रेममय नित्य – विहार रस का कुछ अनुमान हो जाता है । अब प्रथम दोहे में यह बताना चाहते हैं कि महाप्रभु पाद की वाणी में किस प्रकार मान सम्भव हो सका ?

पद – 1

बानी श्रीहरिवंश की , सुनहु रसिक चित लाइ ।

जेहि विधि भयौ अबोलनौं , सो सब कहौं समुझाइ ॥

भावार्थ – हे रसिकों ! श्रीहरिवंश की वाणी ( श्रीहित चौरासी , राधा – सुधा निधि आदि ) में ‘ अबोलनौं ‘ ( मौन या मान ) जिस प्रकार से हुआ मैं वह सब समझा कर कहता हूँ , उसे चित्त लगाकर सुनो ।

पद – 2

श्री हरिवंश जु कथि कही , सोरु सुनाऊँ गाइ ।

बानी श्रीहरिवंश की , नित मन रही समाइ ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश चन्द्र ने अपने कथन में ( अपने शब्दों में ) जो कुछ कहा है , वही ( मानादि ) वर्णन करके मैं आपको सुनाऊँगा , क्योंकि श्रीहरिवंश की वाणी निरन्तर मेरे मन में समाई हुई है ।

पद – 3

श्रीहरिवंश अबोलनौं , प्रगट प्रेम – रस – सार ।

अपनी बुद्धि न कछु कहौं , सो बानी उच्चार ॥

भावार्थ – श्रीहरिवंश चन्द्र के द्वारा वर्णन किया गया अबोलनौं ( मौन ) प्रकट रूप से प्रेम रस का सार है , मैं उस विषय में अपनी बुद्धि से कुछ भी नहीं कहता वरं जैसा कुछ श्रीहरिवंश की वाणी में कहा गया है उनका उच्चारण है , ( मैं उन्हीं के शब्दों में कहता हूँ । )

पद – 4

श्रीहरिवंश जु क्रीडहीं , दंपति रस समतूल ।

सहज समीप अबोलनौं , करत जु आनँद मूल ॥

भावार्थ – श्रीहित हरिवंश चन्द्र स्वयमेव प्रेम रस समतुल्य दंपति के रूप में क्रीड़ा करते हैं और उस क्रीड़ा के मध्य सहज रूप से जो अबोलनौं ( मौन की स्थिति ) आ उपस्थित होती है वह आनन्द का मूल है । अर्थात उससे रसानन्द की निष्पत्ति होती है ।

पद – 5

काहे कौं डारति भामिनी , हौं जु कहत इक बात ।

नैंक बदन सनमुख करौ , छिन छिन कलप सिरात ॥

भावार्थ – सखी ने कहा – हे भामिनि ! मैं जो एक बात तुमसे कह रही हूँ , उसे क्यों टाल रही हो ? तनिक तो अपना श्रीमुख इनके सम्मुख करो । देखो , ( श्रीलालजी का ) एक – एक क्षण कल्प की भाँति बीत रहा है ।

पद – 6

वे चितवत तुव बदन बिधु , तू निज चरन निहारति ।

वे मृदु चिबुक प्रलोवहीं , तू कर सौं कर टारति ॥

भावार्थ – वे तो तुम्हारे मुख – चन्द्र को ही ( चकोर वत् ) देख रहे हैं और तुम अपने चरणों की ओर ( दृष्टि नीची किये ) निहार रही हो । वे तुम्हारे कोमल चिबुक को प्रेम पूर्वक सहलाते हैं और तुम ( अनादर पूर्वक ) उनके हाथ को अपने हाथों से टाल देती – झटक देती हो ।

पद – 7

बचन अधीन सदा रहै , रूप समुद्र अगाध ।

प्रान – रवन सौं कत करति , बिनु आगस अपराध ।।

भावार्थ – रूप के अगाध – समुद्र ये श्रीलाल जी सदा ही तुम्हारे वचनों के अधीन रहे आते हैं । इस प्रकार सदा अपने ही अनुकूल रहने वाले प्राण – रमण से तुम अकारण ( बिना किसी अपराध के ) ही क्रोध या मान क्यों करती हो ? ( एक दृष्टि से तो यह तुम्हारा मान भी उनके प्रति अपराध ही है । )

पद – 8

चितयौ कृपा करि भामिनी , लीने कंठ लगाइ ।

सुख सागर पूरित भये , देखत हियौ सिराइ ॥

भावार्थ – ( श्रीहित सखी के वचनों को सुनकर ) भामिनि ( श्रीप्रियाजी ) ने मान का त्याग करके ( श्रीलालजी की ओर प्रेम पूर्ण दृष्टि से देखा और ) उन्होंने अपने प्रियतम को गले लगा लिया , जिससे ( दोनों के मिलते ही मानो ) दो सुख – समुद्र पूर्ण होकर छलक उठे , जिसे देखकर ( श्रीहित अलि का ) हृदय शीतल हो गया ।

पद – 9

सेवक सरन सदा रहै , अनत नहीं विश्राम ।

बानी श्री हरिवंश की , कै हरिवंशहिं नाम ॥

भावार्थ – सेवकजी कहते हैं कि ‘ यह ‘ सेवक तो सदैव इन्हीं श्रीहरिवंश की शरण में रहता है , उसे तो अब अन्यत्र कहीं शान्ति ( विश्राम ) ही नहीं है । एक तो श्रीहरिवंश की वाणी अथवा दूसरे श्रीहरिवंश का नाम , इसके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं शान्ति ( विश्राम ) नहीं है ।

॥ जै जै श्री हरिवंश ॥


फल स्तुति

जयति जयति हरिवंश नाम रति सेवक बानी ।

परम प्रीति रस रीति रहसि कलि प्रगट बखानी॥

प्रेम संपती धाम सुखद विश्राम धरंमिनि ।

भनत गुनत गुन गूढ़ भक्त भ्रम भजत करंमिनि ॥

श्रीव्यासनंद अरबिंद चरन मद तासु रंग रस राचहीं।

‘श्रीकृष्णदास’ हित हेत सौं जे सेवक बानी बाँचहीं ॥

श्रीकृष्णचन्द्र महाप्रभु पाद

सेवक दरसायौ प्रगट हित मग सब सुख सार।

चलैं तिहीं अनुकूल जे पावैं नित्य विहार ॥

सेवै श्रीहरिवंश पद सेवक सो ही मान।

और कहै औरहि भजै सो विभिचारी जानि ॥

सेवक गिरा प्रमान करि सेवै व्यास कुमार।

सेवक सो ही जानिये और सकल विभिचार ॥

सेवक कही सो ही करै परसै नहिं कछु आन।

सेवक सो ही जानिये रसिक अनन्य सुजान ॥

एक महानुभाव

कै हरिवंसहि नाम धाम वृंदावन बस गति।

बानी श्रीहरिवंश सार संच्यौ सेवक मति ॥

पठन श्रवन जे करै प्रीति सौं सेवक बानी।

भव निधि दुस्तर जदपि होइ तिहिं गोपद पानी ॥

( श्री ) व्यासनंद परसाद लहि जुगल रहस दरसै जु उर।

धनि वृंदावन हित रूप बलि सुख विलसैं भावुक धाम धुर ॥

ग्रंथ सिंधु तें सोधि रंग कलि माँहि बढ़ायौ ।

यह हित कृपा प्रसाद अमी भाजन भरि पायौ ॥

रसिक मनौं सुर सभा आनि तिनकौं दरसायौ ।

श्री सेवक निज गिरा मोहिनी बाँटि पिवायौ ॥

पठन श्रवण निसि दिन करै दंपति सुधाम सुख लहै अलि |

बानी स्वरूप हरिवंश तन भनि वृंदावन हित रूप बलि।

॥ जै जै श्रीहरिवंश ।।

श्री सेवकवाणी-टीका ( पंचदश प्रकरण )

(७) पढ़त गुनत गुन नाम सदा सत संगति पावै ।

अरु बाढ़ रस रीति विमल बानी गुन गावै ॥

प्रेम लक्षणा भक्ति सदा आनँद हितकारी ।

श्रीराधा जुग चरन प्रीति उपजै अति भारी॥

निजु महल टहल नव कुंज में नित सेवक सेवा करन। निसिदिन समीप संतत रहै श्रीहरिवंश चरन सरनं ॥

(८) जै जै श्रीहरिवंश नाम गुन जो नर गाइहै।

प्रेम लक्षणा भक्ति सुदृढ़ करि पाइहै ॥

अरु बाढ़ रस रीति प्रीति चित ना टरै ।

जीति विषम संसार कीरति जग बिस्तरै ॥

बिस्तरै सब जग विमल कीरति साधु संगति ना टरै ।

बास वृंदा विपिन पावै श्रीराधिकाजू कृपा करै ।

चतुर जुगल किसोर सेवक दिन प्रसादहि पाई है।

जै जै श्रीहरिवंश नाम गुन जो नर गाइहै ।।

(९) हरिवंश नाम जे कहैं अनंत सुक्ख ते लहैं।

दुरापि प्रेम की दसा तहाँ प्रतच्छ देखिये।

इत्यादि वाक्यों से सिद्ध है कि श्रीहित हरिवंश चन्द्र का नाम मोक्ष-सुख से भी परे दिव्य प्रेममय नित्य विहार को प्रदान करने वाला है। जो ऐसा जानकर इस नाम की शरण लेते और फिर आराधन करते हैं; वही सुदृढ़ भव (अर्थात् लोक एवँ लोकान्तरों के आवागमन, जन्म-मरण आदि) से छूट कर नित्य किशोर श्रीराधावल्लभलाल के अत्यन्त निकट होकर श्रीवृन्दावन धाम में प्रेम केलि का सुख आस्वादन करते हैं। इनके सिवाय शेष सभी काल प्रवाह में पड़े हैं, जैसा कि श्रीध्रुवदास जी ने कहा है

हित ध्रुव और सुख देखियत जहाँ लगि,

सुनियत तहाँ लगि सबै दुख पासि हैं।

श्रीरसखानजी के मत से तो प्रेमी ही मरकर सच्चा जीवन पाता है और शेष सब जीते हुए भी मरे से हैं

प्रेम फाँसि में फँसि मरै सोई जियै सदाहि ।

प्रेम मरम जानै बिना मरि कोऊ जीवत नाहिं ॥

अतएव नित्य जीवन पाने के लिये प्रेम नाम श्रीहरिवंश का आश्रय लेना चाहिये।

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श्री स्फुट वाणी

Shri Hita Sfut Vani- श्री स्फुट वाणी



श्री वृंदावन धाम के रसिक संत श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा लिखित दोहे।


श्रीहित स्फुटवाणी – 1

व्दादश चन्द्र , कृतस्थल मंगल , बुद्ध विरुद्ध , सुर – गुरु बंक |

यद्दी दसम्म – भवन्न भृगू – सुत , मंद सुकेतु जनम्म के अंक ||

अष्टम राहु चतुर्थ दिवामणि , तौ हरिवंश करत नहिं संक |

जो पै कृष्ण – चरण मन अर्पित , तौ करि हैं कहा नवग्रह रंक ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 2

भानु दसम्म , जनम्म निसापति , मंगल – बुद्ध सिवस्थल लीके |

जो गुरु होंय धरम्म – भवन्न के , तौ भृगु – नन्द सुमन्द नवीके ||

तीसरौ केतु समेत विधु – ग्रस , तौ हरिवंश मन कर्म फीके |

गोविन्द छाँडि भ्रमंत दशौं दिस , तौ करि हैं कहा नवग्रह नीके ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 3

नाजानौं छिन अन्त कवन बुधि घटहि प्रकासित |

छुटि चेतन जु अचेत तेउ मुनि भये विष वासित ||

पारासर सुर इन्द्र कलप कामिनि मन फंघा |

परि व देह दुख व्दन्द कौंन कर्म काल निकंघा ||

यहिं डरहिं डरपि हरिवंश हित , जिनव भ्रमहि गुण सलिल पर |

जिहिं नामन मंगल लोक तिहूँ , सु हरि – पद भजु न विलम्ब कर ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 4

तू बालक नहिं भरच्यौ सयानप , काहैं कृष्ण भजत नहिं नीके ।

अतिव सुमिष्ट तजिव सुरभिन – पय , मन बन्धत तन्दुल जल फीके ||

जै श्रीहित हरिवंश नरकगतिदुरभर , यमव्दारै कटियत नकछीके ।

भव अज कठिन मुनीजन दुर्लभ , पावत क्यों मनुज तन भीके ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 5

चकई ! प्रान जु घट रहैं , पिय – बिछुरंत निकज्ज |

सर – अन्तर अरु काल निशि , तरफ तेज घन गज्ज ||

तरफ तेज घन गज्ज , लज्ज तुहि वदन न आवै |

जल – विहून करि नैंन , भोर किहिं भाय बतावै ||

जै श्रीहित हरिवंश विचारि , वाद अस कौंन जु बकई |

सारस यह सन्देह , प्रान घट रहैं जु चकई ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 6

सारस ! सर बिछुरन्त कौ , जो पल सहै शरीर ।

अगिन अनंग जु तिय भखै , तौ जानै पर पीर ||

तौ जाने पर पीर , धीर धरि सकहि ब्रज तन ।

मरत सारसहिं फुट , पुनि न परचौ जु लहत मन ||

जै श्रीहित हरिवंश विचारि , प्रेम विरहा बिनु वा रस |

निकट कन्त नित रहत , मरम कह जानैं सारस ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 7

तैं भाजन कृत जटित विमल चन्दन कृत इन्धन |

अमृत पूरि तिहिं मध्य करत सरषप खल रिन्धन ||

अदभुत धर पर करत कष्ट कंचन हल वाहत |

वार करत पाँवार मन्द वोवन विष चाहत ||

जै श्रीहित हरिवंश विचारिकैं , मनुज देह गुरु चरन गहि ।

सकहि तौ सब परपंच तजि , कृष्ण – कृष्ण गोविन्द कहि ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 8

तातें भैया ! मेरी सौंह कृष्ण गुण संचु |

कुत्सित बाद विकारहिं परधन , सुन सिख मंद परतिय वंचु |

मणिगन -पुंज ब्रजपति छाँडत , हित हरिवंश कर गहि कंचु ||

पाये जान जगत में सब जन , कपटी कुटिल कलियुग – टंच |

इहिं परलोक सकल सुख पावत , मेरी सौं कृष्ण गुण संचु ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 9

मानुष कौ तन पाय , भजौ ब्रजनाथ कौं |

दर्वी लैंकै मूढ़ , जरावत हाथ कौं ||

जै श्रीहित हरिवंश प्रपंच , विषय रस मोहके |

हरि हाँ , बिन कंचन क्यौं चलें , पचीसा लोहके ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 10

तू रति रंगभरी देखियत है री राधे , तें रहसि रमी मोहन सौं व रैन |

गति अति सिथिल प्रगट पलटे पट , गौर अंग पर राजत ऐंन ||

जलज कपोल ललित लटकत लट , भृकुटि कुटिल ज्यौं धनुषधृतमैंन |

सुन्दरि रहव कँहव कंचुकि कत , कनक – कलस कुच बिचनखदैन ||

अधर विम्ब दलमलित आरसयुत , अरु आनन्द सूचत सखि नैंन |

जै श्रीहित हरिवंशदुरत नहिंनागरि , नागर – मधुप मथित सुखसैंन ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 11

आनँद आजु नन्द मैं व्दार |

दास अनन्य भजन रस कारन , प्रगटे लाल मनोहर ग्वार ||

चन्दन सकल धेनु तन मंडित , कुसुम – दास – सोभित आगार |

पूरन कुम्भ बने तोरन पर , बीच रुचिर पीपर की डार ||

युवति – युथ मिल गोप विराजत , बाजत पणव – मृदंग सुतार |

जै श्रीहित हरिवंश अजिर वर वीथिनु , दधि – मधि – दुग्ध – हरद के खार ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 12

मोहनलाल कैं रँग राँची |

मेरे ख्याल परौ जिन कोऊ , बात दशौं दिस माँची ||

कंत अनन्त करौ जो कोऊ , बात कहौं सुनि साँची |

यह जिय जाहु भलैं सिर ऊपर , हौ व प्रगट दै नाची ||

जाग्रत – सयन रहत उर ऊपर , मणि कंचन ज्यौं पाची |

जै श्रीहित हरिवंश डरौं काके डर , हौं नाहिंन मति काची ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 13

मैं जु मोहन सुन्यौ नु गोपाल कौ |

व्योम मुनियान सुर – नारि विथकित भई , कहत नहिं बनत कछु भेद यति ताल कौ ||

श्रवन कुण्डल छुरित रूरत कुन्तल ललित , रुचिर कस्तूरि चन्दन तिलक भाल कौ |

चन्द गति मन्द भई निरखि छबि काम गई , देखि हरिवंश हित बेष नंदलाल कौ ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 14

आजु तू ग्वाल गोपाल सौं खेलिरी |

छाँड़ि अति मान , वन चपल चलि भामिनी , तरु तमाल सौं अरुझ कनक की बेलिरी ||

सुभट सुन्दर ललन , ताप परबल दमन , तू व ललना रसिक काम की केलि री |

वैंनु कानन कुनित , श्रवन सुन्दरि सुनत , मुक्ति सम सकल सुख पाय पग पेलिरी ||

विरह – व्याकुल नाथ , गान गुन युवति तव , निरखि मुख , काम को कदन अवहेलि री |

सुनत हरिवंश हित , मिलत राधारबन , कंठ भुज मेलि , सुख – सिन्धु में झेलिरी ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 15

वृषभानु नन्दिनी राजत हैं |

सुरत – रंग – रस भरी भामिनी , सकल नारि सिर गाजत हैं ||

इत उत चलत परत दोऊ पग , मद गयंद गति लाजत हैं |

अधर निरंग , रंग गंडन पर , कटक काम कौ साजत हैं ||

उर पर लटक रही लट कारी , कटिव किंकिनी बाजत हैं |

जै श्रीहित हरिवंश पलटी प्रीतम पट , जुवति जुगति सब छाजत हैं ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 16

चलौ वृषभानु गोप के व्दार |

जनम लियौ मोहन हित श्यामा , आनंद – निधि सुकुमार ||

गावत जुवति मुदित मिलि मंगल , उच्च मधुर धुनि धार |

विविध कुसुम किसलय कोमल -दल , शोभित वन्दनवार ||

विदित वेद – विधि विहित विप्रवर , करि स्वस्तिनु उच्चार |

मृदुल मृदंग , मुरज , भेरी , डफ , दिवि दुन्दुभि रवकार ||

मागध सूत बंदी चारन जस , कहत पुकारि – पुकारि |

हाटक , हीर , चीर , पाटम्बर , देत सम्हारि – सम्हारि ||

चंदन सकल धेनु – तन मंडित , चले जु ग्वाल सिंगार |

जै श्रीहित हरिवंश दुग्ध – दधि छिरकत , मध्य हरिद्रा गारि ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 17

तेरौई ध्यान राधिका प्यारी , गोवर्द्धन धर लालहिं |

कनक लता सी क्यौं न विराजति , अरुझी श्यामं तमालहीं ||

गौरी गान सु तान – ताल गहि , रिझवति क्यौं न गुपालहीं ||

यह जोवन कंचन – तन ग्वालिन , सफल होत इहीं कालहिं ||

मेरै कहे विलम्व न करि सखि , भूरि भाग अति भालहीं ||

जै श्रीहित हरिवंश उचित हौं चाहति , श्याम कंठ की मालहि ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 18

आरती मदन गोपाल की कीजियें |

देव ऋषि , व्यास , शुकदास सब कहत निजु , क्यौं न बिनु कष्ट रस – सिन्धु कौं पीजियें ||

अगर करि धूप कुमकुम मलय रंजित नव , वर्तिका घृत सौं पूरि राखौ ||

कुसुम कृत माल नंदलाल के भाल पर , तिलक करि प्रगट यश क्यौं न भाखौ ||

भोग प्रभु योग भरि थार धरि कृष्ण पै , मुदित भुज – दण्डवर चमर ढारौ ||

आचमन पान हित , मिलत कर्पूर – जल , सुभग मुख वास , कुल – ताप जारौ ||

शंख दुन्दुभि , पणव , घंट , कल नु रव , झल्लरी सहित स्वर सप्त नाचौ ||

मनुज – तन पाय यह दाय ब्रजराज भज , सुखद हरिवंश प्रभु क्यौं न याँचौ ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 19

आरति कीजै श्याम सुन्दर की |

नन्द के नन्दन राधिका वर की ||

भक्ति करि दीप प्रेम करि वाती |

साधु – संगति करि अनुदिन राती ||

आरति जुवति – युथ मन भावै |

श्याम लीला श्रीहरिवंश हित गावै ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 20

रहौ कोऊ काहू मनहिं दियें |

मेरै प्राणनाथ श्रीश्यामा , सपथ करौं तृण छिौं |

जे अवतार कदम्ब भजत हैं , धरि दृढ़ व्रत जु हिथें |

तेऊ उमगि तजत मर्यादा , वन बिहार रस पियें ||

खोये रतन फिरत जे घर – घर , कौंन काज ऐसे जिमैं |

जै श्रीहित हरिवंश अनत सचु नाहीं , बिन या रजहिं लियें ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 21

हरि रसना राधा – राधा रट |

अति अधीन आतुर यद्दपि पिय , कहियत हैं नागर नट ||

संभ्रम द्रुम , परिरंभन कुंजन , ढूँढ़त कालिन्दी – तट |

विलपत , हँसत , विषीदत , स्वेदत , सतु सींचत अँसुवनि वंशीवट ||

अंगराग परिधान वसन , लागत ताते जु पीतपट |

जै श्रीहित हरिवंश प्रसंषित श्यामा , प्यारी कंचन – घट ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 22

लाल की रूप माधुरी नैंनन निरख नैंक सखी |

मनसिज – मनहरन हास , साँवरौ सुकुमार रासि , नख – सिख अंग – अंगनि उमगि , सौभग – सींव नखी ||

रँगमँगी सिर सुरंग पाग , लटकि रही वाम भाग , चंपकली कुटिल अलक बीच – बीच रखी |

आयत दृग अरुन लोल , कुंडल मंडित कपोल , अधर दसन दीपति की छबि , क्यौं हूँ न जात लखी ||

अभयद भुज – दंड मूल , पीन अंश सानुकूल , कनक – निकष लसि दुकूल , दामिनी धरखी |

उर पर मंदार – हार , मुक्ता – लर वर सुढार , मत दुरद – गति , तियन की देह – दसा करखी ||

मुकुलित वय नव किसोर , वचन – रचन चित के चोर , मधुरितु पिक – शाव नूत – मंजूरी चखी |

जै श्री नटवत हरिवंश गान , रागिनी कल्याण तान , सप्त स्वरन कल इते पर , मुरलिका वरखी ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 23

दोउ जन भींजत अटके बातन |

सघन कुंज के व्दारै ठाढ़े , अम्बर लपटे गातन ||

ललिता ललित रूप – रस भीजी , बूंद बचावत पातन |

जै श्रीहित हरिवंश परस्पर प्रीतम , मिलवत रति रस घातन ||


श्रीहित स्फुटवाणी – 24

सबसौं हित निष्काम मति , वृन्दावन विश्राम |

श्रीराधाबल्लभलाल कौ , ह्रदय ध्यान मुख नाम ||

तनहिं राखि सतसंग में , मनहिं प्रेम रस भेव |

सुख चाहत हरिवंश हित , कृष्ण – कल्पतरु सेव ||

निकसि कुंज ठाढ़े भये , भुजा परस्पर अंस |

श्रीराधाबल्लभ – मुख – कमल , निरख नैंन हरिवंश ||

रसना कटौ जु अन रटौ , निरखि अनफूटौ नैंन |

श्रवण फूटौ जो अन सुनौं , बिनु राधा – जस बैंन ||

|| इति श्रीहित स्फुटवाणी संपूर्ण ||

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श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद

श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद

परमाचार्य श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने अपने लाडले ठाकुर श्री हित राधावल्लभ लाल की रसोई पाक में प्रयुक्त होने वाली लकड़ी बीनने जैसी सेवा जिसे हम सामान्य बुद्धि के लोग अति लघु सेवा कार्य मानते हैं



निज कर-कमलों से कर जहाँ एक ओर प्रगट सेवा के महत्त्व को दर्शाया, वहीं दूसरी ओर सेवा कुंज की सघन निकुञ्जों में स्वेष्ट की सेवा-भावना में संलग्न रह मानसी-सेवा के महत्त्व को प्रगट किया, महत्त्व क्या प्रगट किया वह तो उनका नित्य चिन्तनीय विषय है, उसके बिना तो वह रह ही नहीं सकते । वास्तव में सेवक वही है, जो सेवा के बिना रह न पाये । यदि जिसे हम प्रियतम कहते हैं, उसका सतत् स्मरण न बना रहे तो हम कैसे प्रेमी ?

श्री हिताचार्य जी बात तो क्या कहें । उनके ग्रन्थों में युगल के रसमय लीला-विलास के बहुत भाँति से वर्णन मिलते हैं । नित्य सिद्ध बपुधारी होते हुए भी उन्होंने श्री राधा-सुधा निधि जी में एक साधक की भाँति अनेकानेक रसमयी अभिलाषाओं का चित्रन किया है । सम्प्रदायों के अन्यान्य अनेकों रसिक महानुभावों ने इस रसखेत वृन्दाविपिन में सतत् कीड़ा-पारायण हित दम्पति की अष्ट प्रहरीय सेवा परिचर्या का वर्णन अपनी वाणियों में किया है ।

समय-समय श्री राधावल्लभ लाल की अष्याम सेवा सम्बन्धी प्रकाशन होते रहे हैं । वृन्दावन रसोपासना में श्रीहित मूर्ति युगल-किशोर की अष्टयाम (आठ प्रहर) सेवा का विशेष महत्व है। श्रीहित राधावल्लभ सम्प्रदाय के अनेक आचार्य एवं रसिक सन्तों ने विविध अष्टयाम ग्रन्थ लिखे हैं।
परवर्ती काल में उन्हीं ‘अष्टयाम’ ग्रन्थों से समय समय की सेवा-भावना के पदों का संकलन करके कई अष्टयाम (सेवा भावना पदावली) के लघुकाय ग्रन्थ प्रकाशित होते रहे हैं। प्रस्तुत संग्रहीत अष्टयाम भी उसी परम्परा का एक क्रम है। इस संस्करण में शयन के पदों का विपुल संग्रह किया गया है। साथ ही श्रीराधावल्लभ जी का व्याहुला एवं रसिक नामावलि भी संग्रहीत कर दी गई है जो रसिक भक्तों के लिए अधिक उपयोगी है। सायंकालीन सन्ध्या आरती के पश्चात् गेय पदावली के साथ श्रीसेवक-वाणी का पंचम प्रकरण-‘श्रीहित इष्टाराधन’ विशेष रूप से इस संस्करण में संग्रहीत है, क्योंकि सन्ध्या आरती के पश्चात इस प्रकरण का गान प्रतिदिन ठा. श्रीहित ललित लाड़िली लाल जी महाराज विराजमान श्रीहिताश्रम के समक्ष किये जाने की एक सुष्ठु परम्परा स्थापित हो गयी है

संछिप्त मे पढ़े – (अष्ट्याम सेवा का अर्थ है दिन के आठ पहर की जाने वाली सेवा जिसमे मंगला, श्रृंगार सेवा, धूप सेवा, राजभोग सेवा, एवम् दोपहर को उत्थापन सेवा इसके पश्चात औलाइ, संध्या की आरती, संध्या धूप आरती और फिर ठाकुर जी को शयन कराया जाता है। इन्ही सब सेवाओ भावना को रसिक संतो ने अपने पदों मे सिंचित किया है और इन्ही सब पदों को ‘अष्ट्याम पद’ नामक न संकलन मे एकत्रित किया गया है।)

श्री राधावल्लभ लाल जी के यहाँ महाप्रभु द्वारा तय किये गए अष्ट्याम पद की रीति का आज भी नित्य प्रति पालन किया जा रहा है और बड़े भाव से सखियों द्वारा को इन अद्भुद पदों का गायन कर लाल जी को रिझाया जाता है अतः हित जू के लाडले श्री प्रिय-लाल से विनती है कि इन पदों के द्वारा हामारी मानसी सेवा भी स्वीकार करे ।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~1
मंगला के पूर्व पद

प्रथम श्री सेवक पद शिर नाऊँ।
करौ कृपा श्रीदामोदर मोपै , श्रीहरिवंश चरण रति पाऊँ।।
गुण गंभीर व्यासनन्दन जूके, तुव प्रसाद सुयश रस गाऊँ।
नागरीदास के तुमही सहायक, रसिक अनन्य नृपति मन भाऊ।।

व्याख्या :: सर्व प्रथम में श्री सेवक जी को सर नवा कर नमन करता हूँ।श्री दामोदर दास जी “सेवक जी” ने मुझ पर कृपा कि और में श्री हित हरिवंश जी के चरण कमलों का प्रेमी बन अनुराग का पान करू।। श्री व्यासनन्दन “श्रीहित जी” के गम्भीर गुणों का प्रसाद पाकर उनकी यश कीर्ति को रसमय होकर गाउ।श्री नागरीदास जी कहते है- आप ही मेरे सहायता करने वाले हो की मै श्री हित रसिक शिरोमणि अनन्य के मन को पसन्द आऊ।

प्रात समय नवकुंज द्वार पै, ललिताजू ललित बजाई बीना।
पौढ़े सुनत श्याम श्रीश्यामा, दम्पति चतुर प्रवीन प्रवीना।।
अति अनुराग सुहाग परस्पर, को कला गुण निपुण नवीना।
श्रीविहारनिदास बलि-बलि वन्दसि, यह मुदित प्राण न्यौछावर कीना।।

व्याख्या :: सुबह प्रातः के समय निकुन्ज द्वार पर श्री ललिता जी अनुराग के साथ वीणा वादन कर रही है।शैया पर लेटे हुए ही श्री श्यामाश्याम सुन रहे है वे श्री युगल ,श्रीवृन्दावन रस लीला में बड़े ही पारंगत प्रवीण से प्रवीण है।श्री युगल में प्रेम सौभाग्य एक-दूसरे के लिए अति-विशेष है, सभी प्रकार की कलाओं में निपुण गुण रखने वाले सदा श्री नवल किशोर किशोरी ही है।श्री बिहारिनि दास जी कहते है–मैं बलैयां लेते हुए उनकी वंदना करते हुए आनंदित हो अपने प्राण न्यौछावर करता हूँ।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~2
मंगला के पूर्व पद

अब ही नेक सोय है अरसाय।
काम केलि अनुराग रस भरे जगे रैन बिहाय।।
बार बार सपनेहु सूचत सुख रंग रंग के भाय।
यह सुख निरखत अलिजन प्रमुदित नागरीदास बलिजाय।।

व्याख्या :: अभी-अभी तो श्रीयुग्ल थोड़ा सा सोय है, आलस्य में है।प्रेम खेल के अनुराग रस का थोड़ा-थोड़ा पान कर ये भरपूर हो जगते हुए रात्रि बिताय है। अब श्रीश्यामाश्याम रात्रि लीला के प्रगट सुख के प्रत्येक रँग को स्वप्न में पसन्द कर रहे है।श्री नागरी दास जी कहते है–श्री नवल किशोर किशोरी के इस सुख को देखकर ललितादिक सभी सखियाँ अति-आनन्द में है और में उन पर बलिहारी हूँ।।

भोर भये सहचरी सब आई। यह सुख देखत करत बढ़ाई।।
कोउ बीना सारंगी बजावै। कोउ इक राग विभासहि गावै।।
एक चरण हित सो सहरावै। एक वचन परिहास सुनावै।।
उठि बैठे दोउ लाल रंगीले। विथुरी अलक सबै रंग ढ़ीले।।

व्याख्या :: जब प्रातः हो गयी तो सभी निज सखिया श्री राधावल्लभ लाल के निज महल में आ गयी, उनके रात्रि के सुख को देख कर प्रसन्न हो रही है।कोई एक सखी वीणा बजा रही है तो कोई एक राग विभासः में गान कर रही है। एक सखी प्रेम से विहल हो श्री युगल के चरणों को अति-कोमलता से सहला रही है ,एक सखी रुचि पूर्ण विनोद वर्णन कर रही है। दोनों श्री लाडिली लाल उठ कर बैठ गए है, उनके घुघराले बाल ललाट पर अस्तव्यस्त हो रहै है, उनके रँग रूप श्रंगार ढीला हो चला है।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~3
मंगला के पूर्व पद

घूमत अरुण नयन अनियारे। भूषन वसन न जात समहारे।।
कहुँ अंजन कहुँ पीक रही फबी। कैसे के कहि जात है सो छबि।।
हार बार मिलि कै अरुझाने। निशि के चिन्ह निरखि मुस्कयाने।।

व्याख्या :: श्रीयुगल जोड़ी के लाल कमल समान इधर-उधर फिरते हुए नेत्र अत्यधिक कटीले प्रतीत हो रहे है, वे अपने आभूषण व् वस्त्रो को सम्भाल भी नही पा रहे है।। कही उनके कपोल पर काजल और कही पर पान की पीक अत्यंत मनोरम लग रही है, इस सुन्दर से भी सुन्दर छबि का क्या वर्णन किया जाय, जिव्ह्या में इतनी शक्ति नही है।। श्री श्यामाश्याम के गले में सुन्दर हार बालों में उलझे हुए है।, श्री प्रियाप्रीतम रात्रि के सुख चिन्हों को देख-देख कर ,आपस में मुस्करा रहे है।।

निरखि निरखि निशि के चिन्हन, रोमांचित ह्वै जाहि।
मानो अंकुर मैन के, फिर उपजै तन माही।।

व्याख्या :: रात्रि सुख लीला की निशानियों को देख -देख कर ,श्री राधावल्लभ लाल अत्यधिक रोमांचित हुए जा रहै है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो कामनाओं के नव अंकुर ,दुबारा से शरीर में पैदा हो रहै हो।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~4
मंगला के पूर्व पद

जागो मोहन प्यारी राधा।
ठाड़ी सखी दरस के कारन, दीजे कुंवरि जु होय न बाधा।।
सुनत बचन हँसत उठे है युगलवर, मरगजे बागे फवि रहे दुहुँ तन।
वारत तन मन लेत बलैयां, निरख निरख फूलत मन ही मन।।
रंग भरे आनन्द जम्हावत, अंस अंस धरि बाहु रहे गसि।
जय श्रीकमलनयन हित या छबि ऊपर, वारौ कोटिक भानु मधुर शशि।।

व्याख्या :: हे प्यारे श्रीराधामोहन ! आप जागिये।आपकी सभी सखियाँ दर्शनों के लिये खड़ी हुई है, हे कुँवरि श्रीराधा ! इस दर्शन की बाधा को दूर कीजिए।।इतना सुनते ही श्रीश्यामाश्याम हसंते-हसंते उठ कर बैठ गये, श्रीयुगल श्रीअंगो पर सुशोभित वस्त्रो में शयन के कारण सलवटे पड़ी हुई है।सखियाँ अपने तन मन को न्यौछावर करते हुए ,उनके इस रूप की बलैयां ले रही है और उनको जितना देख -देख कर प्रफुल्लित हो रही है उतना ही उनका मन अन्दर ही अन्दर प्रसन्नता से फूल रहा है।।रात्रि के प्रेम-रंग में भरे हुए श्रीयुगल आनन्द पूर्वक जम्हाई ले रहे है और परस्पर अंसो पर बाहु रखकर गाढ़ आलिंगन में बंधे हुए है। श्रीहित कमलनयन जी महाराज कहते है– श्री राधावल्लभ लाल की इस छवि के ऊपर मै करोड़ो उदित होते हुए सूर्य एवं चन्द्रमाओ को न्यौछावर करता हूँ।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~5
मंगला आरती के पद

रोचक झल्लरी झनकार विविध कल बाजे बाजत।
सुन धाई अलि यूथ प्रेम भरि आरति साजत।।
करत मंगल आरती सखी हाथ कंचन थार।
मरगजे अम्बर बने तन टूटे छूटे उर हार।।

व्याख्या ::श्री जी की निज सखियों ने जब रुचिकर झांझ की मधुर झनकार के साथ बहुत प्रकार के बाजे बजाये। यह सुनकर रसिक सखियाँ दल में दौड़ कर आ गयी व् प्रेम से भरी हुई आरती सजाने लगी।।सखियो के हाथ में सोने की थालियों है और वे मंगल आरती करने लगी। इधर रात्रि के चिन्हों से भरे श्री राधावल्लभलाल सलवटे लिये पटाम्बर व् टूटे छूटे हार माला तन पर सुशोभित करे है।।

चौर चारु फहरात दुहुँ दिशि सुमुखी ढारति।
कर कपूर वर्तिका नेह आरती उतारति।।
इक गहकी गुण गावती एक बहु नृत्य दिखावति।
एक वारने लेत एक कुसुमनि वरषावति।।

व्याख्या :: श्री जी के दोनों दिशाओं में सुन्दर मुख वाली ,कामदेव को लजाने वाली सखियाँ चंवर को सुन्दर मनोहर तरीके से नचा नचाकर घुमा रही है।।एक सखी चाह या लालसा पूर्ण होने पर गुण गा रही है,एक सखी नृत्य दिखा रही है, एक निछावर हो बलेंया ले रही है, एक फूल की वर्षा कर रही है।।

अति शोभित गहवर बन जहँ तहँ कुँजे कमनी।
फूल बन्यो चहुँ ओर परम् शोभित जिहि अवनी।।
श्रीराधा हरि चरण कमल परसन हित सरसती।
अरुण उदय के भये कोटि विधि शोभा दरसती।।

व्याख्या :: अति शोभायमान गहवर वन है ,जहाँ-तहाँ सभी जगह कमनीय कुँजे है।जहां पर भी धरती पर नजर करे वहां चारो ओर परम् शोभायमान फूल ही फूल है।।श्रीराधामोहन के चरण कमलों को छू कर अपना हित प्राप्त करना है।प्रातः उदय के साथ ही श्री लाड़िलीलाल की करोड़ो प्रकार की शोभा दृष्टि होती है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~6
मंगला के उपरान्त पद

नन्द के लाल हरयो मन मोर।
हौं अपने मोतिन लर पोवत कांकर डारि गयौ सखि भोर।।
बंक बिलोकनि चाल छबीली रसिक शिरोमणि नन्दकिशोर।
कहि कैसे मन रहत श्रवन सुनि सरस् मधुर मुरली की घोर।।
इन्दु गोविन्द बदन के कारण चितवन कौ भये नैन चकोर।
जय श्रीहित हरिवंश रसिकरस युवती तू लै मिली सखी प्राण अकोर।।

व्याख्या :: श्री नन्द के लाला ने मेरा मन हर लिया है।मैं तो अपनी मोतियों की लड़ी को पिरो रही थी , ऐरी सखी सुबह भोर में कंकड़ डाल गया वो।।तिरक्षि चलने की चाल देखने में अत्यन्त मनोहारी छैल-छबीली है क्योंकि वह तो रसिको में भी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ श्री नन्द जी का लाल है। अब यह बताओ मन कैसे रह सकता है उसके बिना जब कानो में रसपूर्ण मधु का स्वाद घोलती मुरली सुनाई दे।। चन्द्रमा से भी अद्वतीय गोपपुत्र मनहर तन के कारण उसे देखने में नेत्र चकोर की भांति ताकते हुए अपलक चेतना रहित हो गये है।श्री हित हरिवंश महाप्रभु कहते है — रसिकरस स्त्री श्रीप्रिया जी उनकी समता पर मिलाप करती हुई जब मिलती है तब वह प्राणों से आलिंगन करते है और सखी यह रस पान करके ही तृप्त होती है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~7
स्नान श्रृंगार सेवा के पद

स्नान कुंज में दोऊ आये। रतन जटित जहँ हौज सुहाये।।
जल सुगन्ध तिनमें अति सोहै। खिले कमल जिनमे मन मोहै।
तिन पर भृमर करत गुंजार। फूली झूल रही द्रुम डार।।

व्याख्या :: श्रीयुगल वर स्नान कुंज के अन्दर पधारे है ,जहाँ पर रत्नों से जड़ा हुआ सुन्दर स्नान कुण्ड शोभायमान है।। जिसके सुरभित जल की सुगन्ध अत्यधिक शोभा बढ़ा रही है, उसमे जो कमल खिले है वह मन को मोह रहे है।उन कमलो पर भौरे गुंजार कर रहे है व् रोमांचित हो व्रक्ष की डाले प्रफुल्लता उल्लास में झूल रही है।।

दोउ कुंज सुख पुंज है, तिनकौ एक ही घाट।
स्नान करत जहाँ जुगल वर, तहाँ अलिनुको ठाट।।

व्याख्या ::श्रीयुगल की दोनों कुंज घनी लता छाई है ,यह सुख का समूह है और श्री युगल का एक ही स्नान का घाट है। जिस स्थान पर श्री युगलवर स्नान करते है वहां पर सखियों के ठाठ -बाठ देखने लायक है।।

मज्जन करि बैठी चौकी पर हित कर सिंगार बनावत।
कारी सारी हरी कंचुकी अतरोटा पियरो पहिरावत।।

व्याख्या :: स्नान के बाद श्री प्रिया जी रत्न जड़ित फूलो से सजी चौकी पर विराजमान होती है, सखियाँ परम् हित के साथ उनका श्रंगार करती है।काले रंग की साड़ी, हरे रंग की अंगिया चोली, व् पल्ला तनसुख पीले रंग का पहनाती है।।

लाल लाल चीरा उपरेना पटुका झगा जु सुथन भावत।
बहु भूषन पहिराय तिलक दै हित ब्रजलाल सुभोग लगावत।।

व्याख्या :: श्री लाल जी को लाल पगड़ी ,दुपट्टा ,कमरबंध , झगला व् मनभावन पायजामा धारण कराया।बहुत प्रकार के आभूषण पहना कर उनका तिलक किया , श्री हित ब्रजलाल जी कहते फिर सुन्दर स्वादिष्ट भोग उनके समक्ष प्रस्तुत किया।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~8
स्नान श्रृंगार सेवा के पद

कर सिंगार राजत रंग भीने रीझ लाडिली लाल जिमावत।
कौर-कौर प्रति छबि अवलोकत बलि-बलि जूठन आपुन पावत।।
ललितादिक लीने कर चौरन निरखि-निरखि नैननि जु सिरावत।
जै श्रीहित हरिलाल निकट अलिरूपहि पानदान लै पान खवावत।।

व्याख्या: स्नान के बाद वस्त्र,आभूषण धारण होने के उपरांत, सभी सखियों ने मिल कर श्री युगल का श्रंगार कर उन्हें चन्द्रप्रभा वाली शैय्या पर विराजमान कराया ,रंग में आनन्द मग्न श्री लाडिलीलाल को रीझते हुए प्रसन्नता से भोग प्रस्तुत किया।एक एक कौर (गस्से) सुन्दर छवि का दर्शन करते हुए श्रीलाल जी बलिहारी होते श्री लाडिली को खिला रहे है और फिर स्वयं उनका प्रसादी भोग लगा रहे है।। श्री ललिताजी आदि सभी सखियों ने अपने हाथों को प्रसादी के लिये खोल रक्खे है और वे श्री युगल को देख-देख कर अपने नेत्रो को शीतल कर रही है। गो. श्रीहित हरिलाल जी कहते है-सखी स्वरूप में श्री राधावल्लभ लाल के निकट पान का डिब्बा लेकर उन्हें पान खिला रहे है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~9
धूप आरती के पद

आज नीकी बनी श्रीराधिका नागरी।
ब्रज युवति यूथ में रूप अरु चतुरई- शील श्रंगार गुण सवन ते आगरी।।
कमल दक्षिण भुजा बाम भुज अंश सखि- गावति सरस् मिलि मधुर स्वर रागरी।
सकल विद्या विदित रहसि श्रीहरिवंश हित- मिलत नव कुंज वर श्याम बड़भागी।।

व्याख्या :: आज श्री राधिका जी सभी नारियों में उत्तम बनी हुई है।अरी सखी सभी ब्रज नारियों में रूप , सुशीलता व् श्रंगार की चतुरता आदि गुणों में सबसे आगे ,सर्वोत्तम है।। उनके दाहिने हस्त में कमल व् बाय भुजा के पास अंग सखि मिलकर रसपूर्ण मधुर स्वर में राग-रागनी गा रही है। श्री हित हरिवंश जी कह रहे है- श्री प्रिया जी सर्व-समस्त विधाओं से अवगत है और उन्हें नव कुञ्ज में अतियुवा श्री श्याम जी बड़ा भाग्य मानते हुए मिल गये है।।

आज नागरी किशोर भाँबती विचित्र जोर- कहा कहौ अंग-अंग परम् माधुरी।
करत केलि कण्ठ मेलि बाहु दण्ड- गण्ड-गण्ड परस सरस् रास लास मण्डली जुरी।।
श्यामसुन्दरी विहार बांसुरी मृदङ्ग तार-मधुर घोष नुपुरादि किंकिनी चुरी।
जय श्री देखत हरिवंश आलि निर्तनी सुगंध चालि- वारि फेर देत प्राण देहसौ दुरी।।

व्याख्या :: आज श्री नवलकिशोरकिशोरी जोड़ी विचित्र रूप से मन -भावन लग रही है,उनके श्री अंग-अंग की शोभा परम् माधुर्य का रूप विखेर रही है क्या वर्णन किया जाये।खेल -खेल में गल-बहियाँ दिये, कपोल से कपोल मिल रसपूर्ण ललित नृत्य रास मण्डली जुड़ गई है।।श्रीराधाश्याम सुन्दरी के विहार में मृदङ्ग एकतारा व् नुपर ,चूड़ी की झंकार मधुर स्वर फैला रही है। श्रीहित हरिवंश ओट में देखते हुए कहते है-सखियनि सहित में इनके नृत्य की सौरभ चाल पर चक्कर लगाते हुए तन से प्राण न्यौछावर कर दू।।

भाग 9A
श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
श्रंगार आरती

बनी श्रीराधा मोहन की जोरी।
इन्द्र नील मणि श्याम मनोहर,सातकुंभ तन गोरी।।
भाल विशाल तिलक हरि कामिनि, चिकुर चन्द्र बिच रोरी।
गज नायक प्रभु चाल गयंदनि, गति व्रषभान किशोरी।।
नील निचोल जुवति मोहन पट, पीत अरुण सिर खोरी।
(जय श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति सुरत रंग में बोरी।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~10
श्रंगार आरती

बेसर कौन की अति नीकी।
होड़ परी लालन अरु ललना चोंप बढ़ी अति जीकी।।
न्याव परयो ललिताजु के आगे कौन ललित कौन फीकी।
दामोदर हित बिलग न मानो झुकन झुकी है राधेजू की।।

व्याख्या:: दर्पण देखते समय श्रीश्यामाश्याम में यह होड़ लग गई है कि उन्हें धारण करायी गयी बेसर किसके अधिक फब रही है और इस बात पर बात होने लगी। कोई निर्णय न हो पाने पर दोनों ने इस सम्बन्ध में श्री ललिता जी की राय जाननी चाही।ललिता जी ने श्रीश्याम जी की ओर देखते हुए मुस्करा कर कहा कि आप इस बात का अपने मन में कोई विचार न करे तो मैं सत्य बात कहूँ कि श्रीराधे जू की बेसर अधिक शोभायमान हो रही है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~11
युगल ध्यान

श्रीप्रिया बदन छबि चन्द्र मनो, प्रीतम नैन चकोर।
प्रेम सुधारस माधुरी, पान करत निसि भोर।।1।।

व्याख्या :: श्रीप्रिया जी के मुख की शोभा मानो चन्द्रमा है और श्रीप्रियतम जी के नेत्र रूपी चकोर रात-दिन उस चन्द्रमा को प्रेमामृतमयी माधुरी का पान करते रहते है।।1।।

अंगन की छवि कहा कहो, मन में रहत विचार।
भूषन भये भूषननिको, अति स्वरूप सुकुमार।।2।।

व्याख्या ::मन में इच्छा होते हुए भी श्रीराधावल्लभ लाल के अंगों की छवि का वर्णन करने में असमर्थ हूँ।ये दोनों सुकुमार इतने रूपवान है कि इनके श्री अंग भूषणों के भूषण बन गये है।।2।।

रंग मांग मोतिन सहित, शीश फूल सुख मूल।
मोर चन्द्रिका मोहिनी, देखत भूली भूल।।3।।

व्याख्या :: श्रीप्रिया जी की सिंदूर भरी मांग मोतियों के साथ अति – शोभायमान हो रही है और उसमें भी सुख का मूल , मस्तक पर सीसफूल शोभा की शोभा हो रहा है।श्रीप्रियतम के मस्तक पर मोहिनी मोरचन्द्रिका जो शोभा दे रही है उसको देख कर तो शरीर की समस्त सुध-बुध विस्मृत हो गयी है।।3।।

श्याम लाल बेंदी बनी, शोभा बनी अपार।
प्रगट विराजत शशिन पर, मनों अनुराग सिंगार।।4।।

श्रीप्रिया के मस्तक पर श्याम रंग की बेंदी और श्रीप्रियतम के मस्तक पर लाल रंग की बेंदी धारण है, जिससे इन श्री युगल की शोभा का कोई पार नही है। इन बेंदी को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो श्रीयुगल चन्द्रमाओ पर अनुराग और श्रंगार विराजमान स्वयं हो गये हो।(अनुराग का वर्ण लाल है और श्रंगार का श्याम)।।4।।

कुण्डल कल तांटक चल, रहे अधिक झलकाइ।
मनो छवि के शशि भानु जुग, छबि कमलनि मिलिआइ।।5।।

व्याख्या :: श्री राधावल्लभ लाल के कपोल जो शोभा के कमल है उन पर सुन्दर कुण्डल पीली आभा के सूर्य व् चंचल तांटक (कर्ण फूल) सफेद आभा के चन्द्रमा, ऐसे झलमला रहे है जैसे चन्द्र व् सूर्य दोनों शोभा के कमलो पर मिलने आ रहे हो।।5।।

नासा बेसर नथ बनी, सोहत चञ्चल नैन।
देखत भाँति सुहावनी, मोहै कोटिक मैन।।6।।

श्री प्रिया जी की नासिका में नथ व् श्री प्रियतम जी की नासिका में बेसर अत्यधिक शोभायमान है और तो और इनके ऊपर दोनों के चंचल नेत्र शोभा की भी शोभा ।जिसको देखकर करोड़ो कामदेव स्वयं मोहित हो जाये।।6।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~12
युगल ध्यान

सुन्दर चिबुक कपोल मृदु, अधर सुरंग सुदेश।
मुसकनि वरषत फूल सुख, कहि न सकत छबि लेश।।7।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभलाल की ठोड़ी सुन्दर है व् अधर सुन्दर लाल वर्ण के है। उनकी मुस्कान से सुख के फूल बरसते है जिसके कारण उनकी शोभा का लेशमात्र भी बखान नही हो पा रहा है।।7।।

अंगनि भूषनि झलकि रहे, अरु अञ्जन रंग पान।
नव सत सरवर ते मनों, निकसे कर स्नान।।8।।

श्रीप्रियाप्रियतम के अंगों में भूषण झलक रहे है और उनके नेत्र में अंजन व् अधरों में पान का रंग सुशोभित है।उनका दर्शन करके ऐसा मालूम होता है कि दोनों सोलह श्रंगार रूपी सरोवर में अभी -अभी स्नान करके निकले है।।8।।

कहि न सकत अंगन प्रभा, कुंज भवन रह्यौ छाइ।
मानो बागे रूपके, पहिरे दुहुन बनाइ।।9।।

व्याख्या:: श्रीप्रियाप्रियतम के अंगों की अनिवर्चनीय कान्ति से कुंज-भवन छाया हुआ है। इस कान्ति को देखकर ऐसा मालुम होता है कि दोनों ने सौन्दर्य के वस्त्र सुन्दर प्रकार से धारण कर रखे है।।9।।

रतनागंद पहुंची बनी , बलया बलय सुढार।
अंगुरिन मुंदरी फव रही, अरु मेहँदी रंग सार।।10।।

श्रीप्रिया जी की भुजाओं में रत्न जटित अंगद धारण हो रहे है एवं कलाइयों में पहुंची, चूड़ी और कड़े चढाव-उतार के साथ शोभायमान है। श्रीप्रिया जी की अंगुलियों में अंगूठियां सुशोभित है और वे अंगुलियां मेहंदी के इकसार रंग से रंजित है।।10।।

चन्द्रहार मुक्तावली, राजत दुलरी पोति।
पानि पदिक उर जग मगै, प्रतिविम्बित अंग जोति।।11।।

व्याख्या :: श्री प्रिया जी के वक्षस्थल पर चन्द्रहार, मोतियों की माला एवं पोत की बनी हुई दुलड़ी शोभायमान है तथा पान के आकार का पदक (लटकन) जगमगा रहा है जिसमें श्रीअंग की ज्योति का प्रतिविम्ब पड़ रहा है।।11।।

मनि मय किंकिन जाल छवि, कहौ जोइ सोइ थोर।
मनों रूप दीपावली, झलमलात चहुँ ओर।।12।।

श्रीप्रिया जी की कटि में धारण किंकिणी की छवि को मैं जितना भी कहूँ वह थोड़ा है। इसको देखकर ऐसा मालुम होता है मानो रूप के दीपकों की पंक्ति कटि के चारो ओर झलमला रही है।।12।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~13
युगल ध्यान

जेहर सुमिलि अनूप बनी, नूपुर अनवट चारु।
और छाँड़ि कै या छविहि, हिय कै नैन निहारु।।13।।

व्याख्या :: श्रीप्रिया जी के चरणों में जेहर (चरणों के आभूषण) बड़े सुन्दर ढंग से धारण की हुई है और उसके साथ सुन्दर नूपुर तथा अनवट (चरणों का आभूषण) धारण है। अन्य सब बातों का ध्यान छोड़कर इन चरणों की छवि को ह्रदय के नेत्रो से अर्थात ध्यान में देखना चाहिए।।13।।

विछुवनि की छवि कहा कहौ, उपजत रव रूचि दैन।
मनु शावक कल हंस के, बोलत अति मृदु बैन।।14।।

श्रीप्रिया जी के चरणों में धारण किए हुए बिछुओ की छवि को मैं कैसे वर्णन करू? उनमे से रुचिकारी शब्द निकलता रहता है जिसको सुनकर ऐसा मालूम होता है मानो कलहंस के बच्चे अत्यंत मृदु (कोमल) बोली बोल रहे हैं।।14।।

नख पल्लव सुठि सोहने, शोभा बढ़ी सुभाइ।
मानों छवि चन्द्रावली, कंज दलन लगि आइ।।15।।

व्याख्या::श्रीराधावल्लभलाल के चरणों के, नवीन कोपलों के समान लाल, सुन्दर नखों की शोभा सहज रूप से बढ़ी हुई है। उनको देखकर ऐसा मालूम होता है मानो छवि के चन्द्रमाओ की पंक्ति कमल के दलों में आकर लग गई है।।15।।

गौर वरन सांवल चरण, रचि मेंहदी के रंग।
तिन तरुवनि तर लुटत रहें, रति जुत कोटि अनंग।।16।।

श्रीयुगल के श्याम और गौर चरण मेहंदी के रंग से रँगे हुए है। इनके तलवो के नीचे रति सहित कोटि अंनग (कामदेव) लोटते रहते है।।16।।

अति सुकुमारी लाड़िली, पिय किशोर सुकुमार।
इक छत प्रेम छके रहै, अदभुत प्रेम विहार।।17।।

व्याख्या ::*लाड़िली श्री राधा अत्यन्त सुकुमारी है और उनके प्रियतम श्री श्यामसुन्दर भी किशोर अवस्था के सुकुमार है। ये दोनों अद्भुत प्रेमविहार में निमग्न रहकर अखण्ड प्रेम में छके रहते है।।17।।

अनुपम सांवल गौर छवि, सदा बसहु मम चित्त।
जैसे घन अरु दामिनी, एक संग रहै नित्त।।18।।

श्रीयुगल की अनुपम श्याम-गौर छवि मेरे ह्रदय में सदा उस प्रकार बसी रहे जैसे बादल और बिजली नित्य एक साथ आकाश में रहते है।।18।।

बरनै दोहा अष्टदस, युगल ध्यान रसखान।
जो चाहत विश्राम ध्रुव, यह छवि उर में आन।।19।।

व्याख्या :: श्री हित ध्रुवदास जी कहते है– मैंने श्रीयुगल का अत्यन्त रसपूर्ण ध्यान अठारह दोहो में वर्णन किया है। यदि परम् शान्ति प्राप्त करने की इच्छा है तो इस छवि को अपने ह्रदय में लाना चाहिए।।19।।

पलकनि के जैसे अधिक, पुतरिन सों अति प्यार।
ऐसे लाड़िली लाल के, छिन-छिन चरण संभार।।20।।

जैसे नेत्रो को पलको को पुतलियों से अत्यन्त प्यार होता है अर्थात जैसे पलक पुतलियों पर उनकी संभाल करते रहते है उसी प्रकार श्रीराधावल्लभलाल के चरणों को क्षण-क्षण में संभालना चाहिए अर्थात उनका स्मरण करना चाहिए।।20।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~14

दोउ जन भीजत अटके बातन।
सघन कुंज के द्वारे ठाड़े अंबर लपटे गातन।।
ललिता ललित रूप रस भीजी बूंद बचावत पातन।
जय श्री हित हरिवंश परस्पर प्रीतम मिलवत रतिरस घातन।।

व्याख्या :: श्रीहित वृन्दावन में वर्षा हो रही है और दोनों श्रीश्यामाश्याम सघन निकुन्ज के द्वार पर खड़े हुए बातों में अटके रहे है। वर्षा में भीग जाने के कारण उनके वस्त्र उनके श्रीअंगो से लिपटे हुए है। श्रीयुगल के कमनीय रूप-रस में भीगी हुई श्रीललिता जी कुंज के पत्तो को ठीक करके श्रीयुगल पर बूंदे न पड़ने देने के प्रयास में लगी हुई है।श्रीहित हरिवंश जी कहते है– अत्यन्त प्रिय श्री युगल प्रेम रस के घात-प्रतिघातों का आस्वादन कर रहे है और अपने भीगने का उन्हें रंचक भी ध्यान नही है।।

भोजन कुञ्ज में चलि आये।
जैसी ऋतु वैसी बैठक में, हित सौ लै बैठाये।।
भूषण वसन उतार उचित पुनि, औलाई पहिराये।
कुल्ला करि रुमाल पोंछि तब, निज दासी मन नैन सिराये।।

व्याख्या :: प्रिय सखियों के आग्रह पर श्रीराधावल्लभलाल भोजन कुञ्ज में पधारें है। जिस प्रकार की ऋतू -मौसम है उसी प्रकार का प्रेम से आसन बना कर उन्हें विराजित करती है।। आभूषण व् वस्त्र जो भी उचित लगे वह उतार कर पुनः औलाई धारण कराती है। मुख शुद्धि करा कर व् अंग वस्त्र से पोंछ कर ,तब फिर सखियाँ अपने मन के नेत्रो को शीतल कर रही है।।

मिली जेंवत लाडिलीलाल दोऊ षट विंजन चारु सवै सरसै।
मन की रस की रूचि जो उपजै सखी माधुरी कुञ्ज सबै परसै।।
हटके मन मोहन हारिरह्यौ भटु हाथ जिमावन कौ तरसै।
बीच ही कर कंपित छुटि परौ कबहुँ मुख ग्रास लियें परसै।।

व्याख्या:: श्रीलाडिलीलाल मिल कर भोजन कर रहे है, जहाँ छब्बीस प्रकार के सुन्दर मनोहर मुग्ध करने वाले रसपूर्ण व्यंजन है।श्रीयुगल के मन में रस पूर्ण जो रूचि कारक इच्छा होती है वही भोजन सामिग्री सखी माधुर्य के साथ कुञ्ज में परोस रही है।।संकोच व् मृदु स्वभाव के कारण श्री मोहन लाल मन रुकता है क्योंकि वह जैसे अपने हस्त कमल से भोजन खिलाने को तरस जाते है।बीच में उनका हाथ प्रेम में विह्ल हो कंपता हुआ छूट जाता है, कब मैं श्री प्रिया जी के मुख में ग्रास परोस सकूं।।

दृग सौ दृग जोर दोऊ मुस्काय भरे अनुराग सुधा बरसै।
मनों हार बिहार अहार करें तन में मनों प्राण परे करसै।।
सखी सौंज लिए चहुँ ओर खरी हरखे निरखे, दरसे , परसै।
सुख सिन्धु अपार कह्यौ न परै अवशेष सखी हरिवंश लसै।।

व्याख्या ::*नेत्रो से नेत्र मिलाकर श्रीयुगल मुस्करा रहे है उस समय प्रेम का अमृत बरष रहा है।मानो यह रसकेली क्रीड़ा आहार शरीर कर रहा और मानो प्राण शरीर से निकल कर एक-दूसरे के पास हो।। सखियाँ सभी सामिग्री लिए चारो ओर खड़ी है वे हर्षित है, ताकते हुए दर्शन कर रही है व् उन्हें परोस रही है। श्रीहित हरिवंश जी कहते है–यह सुख का समुद्र अपार है जो कहा नही जा सकता , शेष यही है कि सदा इसमें तैरते रहे।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~15

अली लै आई राजभोग के थार।
निखरी सखरी सामिग्री बहुबिधि रचि मधुर सलौनी विचार।।
दम्पति सन्मुख बैठी निज अलि, बीच धरयौ लै थार।
वे जैवति ये जिंवावती हित सों, कोऊ न मानत हार।।

व्याख्या :: सखियाँ सब राजभोग की थालियाँ सजा कर ले आयी है। पक्की व् कच्ची रसोई की बहुत प्रकार की सामिग्री की रचना मधुर कोमल विचार के साथ प्रस्तुत की है।।श्री युगल के पास उनकी निज सखियाँ बैठी है और मध्य में राजभोग की थालियाँ है।श्रीयुगल भोजन कर रहे है और यह सभी सखियाँ भोजन करा रही है और दोनों में से कोई भी प्रेम में कम नही है।।

प्रथम कौर प्यारी मुख दै पुनि, प्रीतम दै हँसि गारि।
मरम बिंधी बतियाँ बिच-बिच कहि, हँसत हँसावति नारि।।
कबहुँ कौर प्यारी निज अलि मुख, देत लेत अति प्यार।
सो प्रसाद लालन सब सहचरी, हँसि-हँसि देत उदार।।

व्याख्या :: श्री प्रीतम पहला ग्रास श्री प्रिया जी के मुख में देते है फिर हंसते हुए प्रसादी ग्रास लेते है। बीच-बीच में सखियाँ रहस्यपूर्ण उलझी हुई सी बातें करते हुए उन्हें हंसाती व् हंसती रहती है।। कभी श्री प्रिया जी अति प्यार से कौर (ग्रास) अपनी निजी सखियो को देती है व् स्वयम उनसे मुख में लेती है।वो प्रसाद हंस-हंस कर उदारता के साथ सब सखियाँ श्री लाडले को प्रदान करती है।।

ख्वाय प्याय अंचवन दै वीरी, प्रीतम लियो उगार।
बैठें आइ निज सिंहासन पै, निज दासी बलिहार।।

व्याख्या :: सखियो ने इस रस में डूबते श्री प्रीतम को खिलाने पिलाने के बाद आचमन करा कर पान की बड़ी प्रदान की और उन्हें उबारा।फिर सखियो ने आग्रह कर उन्हें अपने निज सिंहासन पर विराजमान कराया और इनकी इस लीला की सभी निज सखियाँ बलिहारी लेने लगी।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~16
राजभोग की आरती

नवल घन श्याम नवल वर राधिका,
नवल नव कुंज नवकेलि ठानी।
नवल कुसुमावली नवल सिज्या रची,
नवल कोकिल कीर भ्रंग गानी।।
नवल सहचरी व्रन्द नवल वीणा मृदङ्ग ,
नवल स्वर तान नव राग बानी।
(जै श्री) नवल गोपीनाथ हित नवल रसरीति सौ,
नवल हरिवंश अनुराग दानी।।

व्याख्या :: नवल श्रीघनश्याम और नवलाओ में श्रेष्ठ श्रीराधिका ने नवीन कुंज में नवीन प्रेम-केलि आरम्भ की है। नवल फूलों से नवीन सिज्या की रचना की गई है एवं नवीन कोकिल, कीर और भृमर गान कर रहे है। नवल सहचरियों का समूह नवल वीणा और मृदङ्ग बजा रहा है और नवीन स्वरों में नवीन तानें युक्त नवीन राग गा रहा है। नवल सहचरी भाव से भावित श्रीहित गोपीनाथ जी कहते है कि नवल श्रीहित हरिवंश जी नवीन रस रीति पूर्वक इस समय नवीन का दान कर रहे है।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~17
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

श्रीराधा मेरे प्राणन हूँ ते प्यारी।
भूलि हू मान न कीजै सुन्दरि हौ तौ शरण तिहारी।।
नेक चितै हंसि बोलिये मोतें खोलिये घूंघट सारी।
जय श्रीकृष्णदास हित प्रीति रीति बस भर लई अंकन बारी।।1।।

व्याख्या:: (श्री श्यामसुन्दर जी प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी से कह रहे है कि) हे श्रीराधा, तुम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो। हे सुन्दरि! मैं तो सदैव तुम्हारी शरण में रहता हूँ अतः तुम्हे मुझसे भूलकर भी मान नही करना चाहिए। तुम अपने घूंघट को खोलो और मंद मुस्कान सहित मेरी ओर देखो। गोस्वामी श्रीकृष्णचन्द्र जी कहते है इतना कहने के बाद श्रीश्यामसुन्दर जी ने प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी को अपनी भुजाओं में भर लिया।।1।।

प्रीतम मेरे प्राणन हू तें प्यारौ।
निशिदिन उर लगाये रहौ हित सों नैक न करिहौ न्यारौ।।
देखत जाहि परम् सुख उपजत रूप रंग गुण गारौ।
जै श्रीकमलनयन हित सुनि प्रिय बैनन तन मन धन सब बारौ।।2।।

व्याख्या::*(इसके उत्तर में श्रीप्रिया जी ने प्रेम से गदगद स्वर में सखी से कहा कि) श्रीप्रियतम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मैं उनको सदैव ह्रदय से लगाये रहती हूँ और एक क्षण के लिए भी अलग नही करना चाहती। वे रूप-रंग एवं गुणों के समूह है और उनको देख कर मेरे ह्रदय में परम् सुख उतपन्न होता है। गोस्वामी श्रीहित कमलनयन जी महाराज कहते है कि श्रीप्रिया जी के मुख से ऐसे प्रेममय वचन सुनकर सखियों ने उन पर अपने तन, मन,धन को न्यौछावर कर दिया।।2।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~18
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

श्रीराधा मेरे प्राणन हूँ ते प्यारी।
भूलि हू मान न कीजै सुन्दरि हौ तौ शरण तिहारी।।
नेक चितै हंसि बोलिये मोतें खोलिये घूंघट सारी।
जय श्रीकृष्णदास हित प्रीति रीति बस भर लई अंकन बारी।।1।।

व्याख्य :: (श्री श्यामसुन्दर जी प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी से कह रहे है कि) हे श्रीराधा, तुम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो। हे सुन्दरि! मैं तो सदैव तुम्हारी शरण में रहता हूँ अतः तुम्हे मुझसे भूलकर भी मान नही करना चाहिए। तुम अपने घूंघट को खोलो और मंद मुस्कान सहित मेरी ओर देखो। गोस्वामी श्रीकृष्णचन्द्र जी कहते है इतना कहने के बाद श्रीश्यामसुन्दर जी ने प्रेम विवश होकर श्रीप्रिया जी को अपनी भुजाओं में भर लिया।।1।।

प्रीतम मेरे प्राणन हू तें प्यारौ।
निशिदिन उर लगाये रहौ हित सों नैक न करिहौ न्यारौ।।
देखत जाहि परम् सुख उपजत रूप रंग गुण गारौ।
जै श्रीकमलनयन हित सुनि प्रिय बैनन तन मन धन सब बारौ।।2।।

व्याख्या ::(इसके उत्तर में श्रीप्रिया जी ने प्रेम से गदगद स्वर में सखी से कहा कि) श्रीप्रियतम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मैं उनको सदैव ह्रदय से लगाये रहती हूँ और एक क्षण के लिए भी अलग नही करना चाहती। वे रूप-रंग एवं गुणों के समूह है और उनको देख कर मेरे ह्रदय में परम् सुख उतपन्न होता है। गोस्वामी श्रीहित कमलनयन जी महाराज कहते है कि श्रीप्रिया जी के मुख से ऐसे प्रेममय वचन सुनकर सखियों ने उन पर अपने तन, मन,धन को न्यौछावर कर दिया।।2।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~19
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

प्रीतम तुम मेरे दृगन बसत हौ।
कहा भोर ह्वै पूछत हौ कै चतुराई करि जु हँसत हौ।।
लीजिये परखि सरूप अपनों पुतरिनमें प्यारे तुम ही लसत हौ।
वृन्दावन हितरूप बलि गई कुंज लड़ावत हिय हुलसत हौ।।3।।

व्याख्या :: (इसके बाद श्रीप्रिया जी ने अपने श्री प्रियतम को सीधा संबोधन करते हुए उनसे कहा कि) हे प्रियतम ! आप मेरे नेत्रो में निवास करते हो।( मुझको मानवती देखकर आप कभी-कभी अपने प्रति मेरी प्रीति पर सन्देह करके जो प्रश्न कर बैठते हो तो उससे मुझे ऐसा लगता है कि)या तो आप भोले बन कर ऐसा प्रश्न कर रहे हो या मन ही मन चतुराई पूर्वक हंस रहे हो। हे प्यारे! अपने प्रति अगर मेरी प्रीति देखनी है तो मेरे नेत्रो में अपने स्वरूप को पहिचान लीजिए क्योंकि मेरी पुतलियों में आप ही निवास कर रहे हो। आपका ह्रदय श्रीहित वृन्दावन में मेरा लाड़-दुलार करने में ही उल्लसित होता है, इस बात को देखकर मैं तुम्हारे ऊपर बलिहार होती रहती हूँ।।3।।

ऐसी करौ नव लाल रँगीलेजू चित्त न और कहूँ ललचाई।
जे सुख दुःख रहे लग देहसौ ते मिट जांहि और लोक बड़ाई।।
संगति साधु वृन्दावन कानन तव गुन गानन मांझ विहाई।
छवि कंज चरण तिहारे बसौ उर देहु यहै ध्रुव कौ ध्रुवताई।।4।।

व्याख्या :: (श्रीहित ध्रुवदास जी की विनती)हे नवलकिशोर! आप ऐसा कीजिए जिससे मेरा मन आपको छोड़कर अन्य किसी वस्तु की ओर आकृष्ट न हो। दूसरी बात मैं आप से यह मांगता हूं कि मेरे शरीर से जो सुख-दुःख लग रहे है वे मिट जाए तथा संसार की मान-प्रतिष्ठा के प्रति मेरे मन में कोई आकर्षण न रहे। तीसरी बात मैं यह चाहता हूँ की साधु स्वभाव रसिक जनों के साथ में मेरा श्रीहित वृन्दावन वास हो तथा मेरा समय आपके गुण गान में व्यतीत हो। मेरी अन्तिम याचना यह है कि आपके चरण कमल मेरे ह्रदय में सदैव निवास करते रहें। श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि मुझको आप यही ध्रुवता अर्थात स्थिरता प्रदान करें।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~20
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

शोभित आज रंगीली जोरी।
सुन्दर रसिक नवल मन मोहन अलबेली नव वयस किशोरी।।
वेशर उभय हंसन में डोलति सो छवि लेत प्राण चित चोरी।
हित ध्रुव मीन यह अखियाँ निरखत रूप प्रेमकी डोरी।।5।।

व्याख्या :: प्रेम रंग में रँगे रँगीले श्रीयुगल जोड़ी आज शोभा पर भी शोभा बनी हुई है।इस जोड़ी में परम् सुन्दर रसिक श्रीश्यामसुन्दर जी और नवीन अवस्था वाली अलबेली किशोरी श्री राधा जी है।।इस समय ये जोड़ी मन्द मुस्कान कर रही है जिसके कारण दोनों की नासिका में धारण की हुई बेसर चंचल बनी हुई है और यह छवि प्राण व् चित को चुरा रही है।श्रीहित ध्रुवदास जी कहते है– मेरे नेत्र जैसे मछली इस जोड़ी के छवि जाल में फंस के रह गए है और प्रेम स्वरूप श्रीराधावल्लभ लाल को परस्पर बांधने वाली रूप-प्रेम की डोरी को देख रहे है।।5।।

सहज स्वाभाव परयौ नवल किशोरी जू कौ, मृदुता दयालुता कृपालुता की राशि है।
नेक हू न रिस कहूँ भूलि हू न होत सखि, रहत प्रसन्न सदा हिए मुँख हासि है।
ऐसी है ललित प्यारी लाल जू की प्राणनप्यारी, धन्य धन्य धन्य तेई जिनके उपासि है।
हित ध्रुव और सुख देखियत जहँ लगि, सुनियत तँह लगि सबै दुःख पासि है।।6।।

व्याख्या :: नवल किशोरी श्रीराधा जी का सहज स्वभाव है कि वे कोमलता,दयालुता और कृपालुता की खदान है।हे सखि, उनको भूलकर भी कभी क्रोध नही आता।उनके मुख पर और ह्रदय में सदा मुस्कान छाई रहती है जिससे वे सदा प्रसन्न बनी रहती है।प्यारे श्रीश्यामसुन्दर की ऐसी प्राण प्यारी सुकुमारी श्रीराधा जिनकी आराध्या है वे भाग्यशाली अनेक बार धन्य है। श्रीहित ध्रुवदास जी कहते है- इन नित्यकिशोरी श्रीराधा के भजन-सुख को छोड़कर जो अन्य सुख देखे या सुने जाते है वे सब दुःख के जाल है।।6।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~21
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ।
बैठी रहौ कुंजन के कोने श्याम राधिका गाऊँ।।
जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढाऊँ।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत विमल विमल यश गाऊँ।।7।।

व्याख्या :: (श्री हित हरिराम व्यास जी की विनती) हे किशोरी जी! श्री राधा जी! में तो केवल आपके चरणों की रज धूल को ही प्राप्त करना चाहता हूँ।आप जब श्री निकुन्ज में विराजमान हो , वही कुंज के किसी कोने में बैठ कर में श्रीश्यामाश्याम का गान करू।।जिस चरण रज स्वयम श्री शिव जी व् श्री सनकादिक आदि ऋषि याचना करते है उस चरण रज को में अपने मस्तक पर धारण करना चाहता हूँ।हे स्वामिनी जी! ये व्यास आपकी निकुन्ज लीला के विमल रस को उसी उज्ज्वलता के साथ गाता रहे।।7।।

किशोरी मोहि अपनी करि लीजै।
और दिये कछु भावत नाही वृन्दावन रज दीजै।।
खग मृग पँक्षि जे या बन के चरण शरण रख लीजै।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत महल टहलनी कीजै।।8।।

व्याख्या :: हे किशोरी! श्री राधा जी! आप मुझे अपना बना लीजिये।मुझे आपने अपार दिया है परन्तु मुझे और कुछ लेना अच्छा नही लगता, मुझे तो आप श्रीहित वृन्दावन की रज प्रदान करें।। इस वन के जितने पशु-पक्षि है वे मुझे, आपकी कृपा से,अपने चरणों की शरण में रख लै। श्रीहित व्यासदास जी कहते है कि मुझे आप हे स्वामिनी! अपने महल की टहलनी बना लीजिए , जिससे मै आपकी छवि सदैव देखता रहूँ।।8।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~22
धूप आरती एवं संध्या समय के पद

परम् धन राधा नाम अधार।
जाहि श्याम मुरली में गावत, सुमरत बारम्बार।।
वेद तंत्र अरु जन्त्र मन्त्र में, एहि कियौ निरधार।
सहचरि रूप धरयौ नँद नन्दन, तऊ न पायौ पार।।
श्रीशुक प्रगट कियौ नहि याते, जान सार कौ सार।
व्यासदास अब प्रगट बखानत, डार भार में भार।।9।।

व्याख्या :: मेरा परम् धन श्रीराधा नाम है जोकि मेरे प्राणों का आधार है।श्री श्यामसुन्दर अपनी मुरली में यही श्रीराधा नाम गाते है और बार-बार उनका सुमरन करते है।।वेद में, तंत्र ग्रन्थों में और जन्त्र- मन्त्र शास्त्र में यही श्रीराधा नाम का निर्धारण सर्व श्रेष्ठ मान कर किया गया है।श्री भगवान नँद- नन्दन ने अनेक अवतारों में अनेक रूप धारण किये किन्तु श्रीराधा नाम का पार नही पा सके।।श्रीमद्भागवत में श्रीशुकदेव जी ने इस नाम को अत्यन्त रहस्यमय समझ कर कही श्रीराधा नाम प्रगट रूप से उल्लेख नही किया।श्रीहित व्यासदास जी कहते है कि– मैने तो गोपनीयता के भार अपने सिर से उतारकर भाड़ में डाल दिया है और मैं अब श्रीराधा नाम की महिमा प्रगट रूप में वर्णन कर रहा हूँ।।9।।

ऐसो कब करिहौ मन मेरौ।
कर करुआ कामरि कांधे पै, कुंजन मांझ बसेरौ।।
ब्रजवासिन के टूक भूख में, घर घर छाछ महेरौ।
भूख लगै जब मांग खऊंगो, गनोँ न सांझ सबेरौ।।
रास विलास व्रत्त करपाऊँ, मेरे खूट न खेरौ।
व्यासदास होय वृन्दावन में, रसिक जनन को चेरौ।।10।।

व्याख्या :: हे श्रीवृन्दावनचंद्र ! मेरा ऐसा मन कब करंगे जब में हाथ में करूवा (मिट्टी का पात्र) और कन्धे पर कमरिया (छोटा कम्बल) रखकर श्रीहित वृन्दावन की कुन्जो में बस जाऊ।। जब मुझे भूख लगे तो में व्रजवासियों के घरों से रोटी का टुकड़ा, छाछ और महेरी (छाछ में बनाया हुआ बाजरे का दलिया) माँगकर भूख की शांति कर लूँ और सुबह-शाम की चिन्ता न करू अर्थात जब भी मधुकरी मिल जाय तभी अपनी उदर पूर्ति कर लूँ। मैं यह चाहता हूँ की आपका रास- विलास ही मेरे जीवन का एक मात्र आधार बन जाये, क्योंकि संसार में मेरा न कही घर है और न गांव अर्थात संसार की किसी वस्तु में मेरी आसक्ति शेष नही रह गई है। श्रीहित व्यासदास जी कहते है– अब तो मैं विदेही(देह की ममता शून्य) बनकर श्रीहित वृन्दावन में श्रीहरि-भक्तो का दास मात्र रह गया हूँ।।10।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~23
अथ संध्या भोग के पद

नमो-नमो जय श्रीहरिवंश।
रसिक अनन्य वेणुकुल मण्डन लीला मान सरोवर हंस।।
नमो (जयति) वृन्दावन सहज माधुरी रास विलास प्रसंश।
आगम निगम अगोचर राधे चरण सरोज व्यास अवतँश।।1।।

व्याख्या :: प्रारम्भ में मैं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी को अनेक बार नमस्कार करके उनका जय-जयकार करता हूँ वे अनन्त रसिक है, वेणुकुल मण्डन है अर्थात श्रीकृष्ण लीला का गान करने वाले सब महानुभावो के समूह के भूषण है और लीला रूपी मान सरोवर में क्रीड़ा करने वाले राजहंस है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र को नमस्कार करने के बाद मैं श्रीश्यामाश्याम के रास विलास में प्रशंसनीय बनी हुई श्रीहित वृन्दावन की सहज माधुरी को नमस्कार करता हूँ।श्रीहित व्यासदास जी कहते है– जिनके वास्तविक स्वरूप का परिचय न आगम ग्रन्थों में मिलता है, न वेदों में मिलता है और न पुराणों में मिलता है उन श्री राधा जी के चरण कमल मेरे कानों के भूषण है अर्थात मेरे कानों को इनका यश ही सबसे अधिक प्रिय है।।1।।

श्रीहरिवंश शरण जे आये।
श्रीव्रषभानु कुँवरि नँदनंदन निज कर अपनी चिठी चढाये।।
दियौ मुखराय कछु नहिं गोयौ किये मनोरथ मन के भाये।
श्रीव्यास सुवन चरणन रज परसत नागरीदास से रंक जिवावे।।2।।

व्याख्या :: जिन भाग्यशालियों ने श्रीहित हरिवंश जी की शरण ग्रहण की उनका नाम श्रीश्यामाश्याम जी ने अपने प्रेमियों की सूची में स्वयं अपने हाथ से लिख लिया। श्रीश्यामाश्याम जी ने उन शरणागत जीवो को अपने सहज सखी स्वरूप के दर्शन करा दिये, उनसे कुछ छिपाया नही तथा उनके मन- वांछित मनोरथ पूर्ण कर दिये।श्रीहित नागरीदास जी कहते है– श्रीव्यास नन्दन की चरणरज के स्पर्श से मेरे समान रंक(दीन-दुखी) भी जी उठे।।2।।

जिनके श्रीहरिवंश सहायक।
तेई सजन भजन अधिकारी वृन्दावन धन बसिवे लायक।।
अलक लड़े आनन्द भरे डोलै सिर पर व्यास सुबन सुखदायक।
कुँवरि कुँवर जाहि सुलभ नागरीदास रसिक शिरोमणि के गुण गायक।।3।।

व्याख्या :: जिन भाग्यशालियों के श्रीहरिवंशचन्द्र सहायक है वे ही श्रेष्ठ जीव भजन के अधिकारी है और सघन श्रीहित वृन्दावन में बसने योग्य है। वे कृपा पात्र जन आनन्द भरे चित्त से घूमते फिरते है क्योंकि उनके रक्षक सुखदायक श्रीव्यासनन्दन जी है। श्रीहित नागरीदास जी कहते है — व्यासनन्दन श्रीहित हरिवंशचन्द्र के गुणों का गान करने वाले जीवों को श्रीश्यामाश्याम सुलभ रहते है।।3।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~24
अथ संध्या भोग के पद

मेरे बल श्रीवृन्दावन रानी।
जाहि निरन्तर सेवत मोहन, वन विनोद सुख दानी।।
जिनकी चरण कृपा ते पाई, कुंज केलि रस सानी।
जय श्रीरूपलाल हित हाथ बिकानी, निधि पाई मनमानी।।4।।

व्याख्या :: श्रीहित वृन्दावन रानी मेरा एकमात्र बल है। श्रीहित वृन्दावन के लीला-विनोद का सुख देने वाले मदनमोहन श्रीश्यामसुन्दर उनका निरन्तर सेवन करते रहते है और उनके चरणों की कृपा से मैने रसमयी निकुन्ज क्रीड़ा पाई है। श्रीहित रूपलाल जी महाराज कहते है — मैं उनके हाथ बिक गया हूँ और मुझे मन वांछित निधि उनकी कृपा से मिल गई है।।4।।

रहौ कोउ काहू मनहि दिये।
मेरे प्राण नाथ श्रीश्यामा, शपथ करौ तृण छिये।।
जे अवतार कदम्ब भजत है, धरि दृढ़ व्रत जु हिये।
तेउ उमगि तजत मर्यादा ,वन विहार रस पिये।।
खोये रतन फिरत जे घर-घर, कौन काज ऐसे जिये।
जय श्रीहितहरिवंश अनत सचु नाही , बिनु या रजहि लिए।।5।।

व्याख्या :: कोई कही भी अपने मन को लगाये रहे, किन्तु मैं तो शपथ पूर्वक कहता हूँ की मेरे प्राणनाथ एकमात्र श्री श्यामा जी है। जो लोग दृढ़ता पूर्वक अनेक अवतारों का भजन करते है वे भी श्रीहित वृन्दावन के रसमयी प्रेमविहार रस का पान करके अपने मर्यादा-मार्ग का त्याग कर देते है। जो व्यक्ति हाथ में आये रत्न को खोकर घर-घर भीख मांगता फिरता है , उसके जीवन का कोई प्रयोजन नही होता। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी कहते है– श्रीहित वृन्दावन की रज प्राप्त किये बिना अर्थात श्रीहित वृन्दावन की शरण ग्रहण किये बिना कही अनत शान्ति नही मिलती।।5।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~25
अथ संध्या भोग के पद

हरि हम कब ह्वै है ब्रजवासी।
ठाकुर नन्द किशोर हमारे ठकुराइन राधा-सी।।
सखी सहेली नीकी मिलि हैं हरिवंशी-हरिदासी।
बंशीवट की शीतल छाया सुभग बहै जमुना-सी।।
जाकी वैभव करत लालसा कर मीड़त कमला सी।
इतनी आस व्यास की पुजबौ वृन्दा विपिन-विलासी।।6।।

व्याख्या :: (श्रीहित व्यासदास जी की ब्रज वास के लिये प्रार्थना।)
हे हरि ! हम कब व्रजवासी होंगे? अर्थात हमको ब्रज का वास कब मिलेगा? जहाँ हमारे स्वामी नन्दकिशोर श्रीश्यामसुन्दर जी और स्वामिनी कुँवर किशोरी श्री राधा जी होंगी।जहाँ श्रीहित हरिवंश जी व् श्री हरिदास जी जैसी भली सखी-सहेली मिलेंगी। जहाँ वंशीवट की शीतल छाया विराजमान रहती हो और सुन्दर स्वरूप में रसरानी श्रीयमुना जी बहती रहती हो। जिस ब्रज के प्रेमवैभव की लालसा करके श्री लक्ष्मी जी भी अपने हाथों को मलते हुए पछताती रहती है।श्रीहित व्यासदास जी कहते है– श्रीहित वृन्दावन में रास- विलास करने वाले हे श्रीश्यामाश्याम, मेरी इस आशा को पूर्ण करो।।6।।

अब मैं श्रीवृन्दावन धन पायौ।
राधेजू चरण शरण मन दीनों श्रीहरिवंश बतायौ।।
सोयौ हुतौ विषय मन्दिर में हित गुरु टेरि जगायौ।
अब तो व्यास बिहार विलोकत शुक नारद मुनि गायौ।।7।।

व्याख्या :: अब मैंने श्रीहित वृन्दावन रूपी धन प्राप्त किया है। श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु के उपदेश अनुसार मैंने श्री राधा जी के चरणों की शरण में अपना मन लगा दिया है।। मैं विषय- मन्दिर में सोया हुआ था, अर्थात विषय- वासना में फंसा हुआ था।मुझे श्रीहित गुरु (श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु) आवाज देकर जगा दिया है( श्रीहित नवलदास जी द्वारा श्रीहित चतुराशी जी का पद जब कानो में पड़ा तभी श्रीहित व्यास दास जी ,श्रीहित वृन्दावन ,श्रीहित जी महाराज के पास आये।)श्रीहित व्यासदास जी कहते है– अब तो मैं उस नित्य विहार के दर्शन करता हूँ, जिसका गान श्रीशुकदेव जी व् श्री नारद जी ने किया है।।7।।

प्यारी लागै श्रीवृन्दावन की धूरि।
राधेजू रानी मोहन राजा राज सदा भरपूरि।।
कनक कलश करुवा महमूदी खासा ब्रज कमरनि की चूर।
व्यासहि श्रीहरिवंश बताई अपनी जीवन मूरि।।8।।

व्याख्या :: मुझे श्रीहित वृन्दावन की धूल प्यारी लगती है।जहां श्री राधा जी रानी है, श्रीमोहन जी राजा है और उनका राज्य सदैव एक छत्र है।जहां मिटटी का करुवा सुवर्ण पात्र के समान है और ब्रज के कमरा (कम्बल) की चूर (टुकड़ा) ही महमूदी खासा (बादशाहों का खास वस्त्र, एक अत्यन्त मुलायम कपड़ा जिसको सर्वप्रथम महमूद नामक कारीगर ने बनाया था।)है।श्रीहित व्यासदास जी कहते है– श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु ने इस श्रीहित वृन्दावन की धूल को अपनी जीवन मूरि (जीवन प्रदान करने वाली जड़ी) बताया है।।8।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~26
अथ संध्या भोग के पद

आय बिराजे महल में, संध्या-समयौ जानि।
आलि ल्याई भोग सब, मेवा अरु पकवान।।
संध्या भोग अली लै आई।
पेड़ा खुरमा और जलेबी (लडुआ खजला और इमरती) मोदक मगद मलाई।।
कंचन थार धरे भरि आगे, पिस्ता अरु बादाम रलाई।
खात खवाबत लेत परस्पर हंसन दसन चमकन अधिकाई।।9।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभलाल संध्या समय जानकर महल में विराजमान हो गये और सखीगण अनेक प्रकार के मेवा व् पकवान उनके भोग के लिये लाई। सखीगण संध्या भोग ले आयी। इस भोग में उन्होंने श्रीयुगल को पेड़ा, खुरमा,जलेबी,लड्डू, खजला, इमरती, मगद के लड्डू और मलाई अर्पित की। सखियों ने इन सामिग्रीयों से सुवर्ण थाल भरकर श्रीयुगल के सामने रखें और जिन वस्तुओं में पिस्ता और बादाम मिल सकते थे उनमें वे मिला दिये। श्रीयुगल एक दूसरे को हंसते हुए खिला रहे है और उनके हंसने से उनकी दन्तावली की चमक प्रगट हो रही है।।9।।

अदभुत मीठे मधुर फल, ल्याई सखी बनाय।
खवावत प्यारे लालको, सु पहिले प्रियहि पवाय।।10।।

पाणि परस मुख देती बीरी पिय तिय तन नयनन में मुसिकाई।
ललितादिक सखी कमलनयन हित दिन मानत आपनो माई।।

व्याख्या :: इसके बाद सखियाँ अदभुत मीठे मधुर फल बनाकर ले आई और पहले श्री प्रिया जी को खिलाकर बाद में श्रीप्रियतम को खिला दिये।।10।।

भोग लगने के बाद, सखियों ने श्रीप्रिया जी को खिलाने के लिये श्री लाल जी के हाथ में पान लगाकर दिया और श्रीलाल जी ने श्रीप्रिया जी के अधरों का स्पर्श करते हुए उनके मुख में पान दिया तब श्रीप्रिया जी नेत्रो में मुस्काई। श्रीहित कमलनयन जी कहते है–श्रीप्रिया जी की मधुर मुस्कान देखकर श्री ललिता जी आदि सखियों ने अपने जीवन के उन क्षणों को धन्य माना।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~27
अथ संध्या भोग के पद

पाग बनी पटका बन्यौ, बन्यौ लाल को भेष।
श्रीराधावल्लभलाल की, सु दौरि आरती देख।।12।।

व्याख्या ::पगड़ी और पटका सहित श्रीराधावल्लभलाल का सुन्दर वेश बना है। उनकी संध्या आरती का दौड़कर दर्शन करना चाहिए।।।12।।

अथ श्री संध्या आरती

आरती कीजै श्याम सुन्दर की, नन्द के नन्दन राधिकावरकी।
भक्ति कर दीप प्रेम कर बाती, साधु संगति करि अनुदिनराती।।
आरति ब्रजयुवति यूथ मनभावै,श्यामलीला श्रीहरिवंश हितगावै।
आरति राधावल्लभलालकी कीजै, निरखि नयनछवि लाहौलीजै।।
सखि चहूँओर चँवर कर लीये, अनुरागन सों भीने हीये।
सनमुख वीणा मृदङ्ग बजावै, सहचरि नाना राग सुनावै।।
कंचनथार जटित मणि सोहै, मध्य बर्तिका त्रिभुवन मोहै।
घण्टा नाद कह्यौ नहि जाई, आनन्द मंगल की निधि माई।।
जयति-जयति यह जोरी सुखरासी, जय श्री रूपलाल हितचरण निवासी।
आरति राधावल्लभलालकी कीजै, निरखि नयनछवि लाहौलीजै।।

व्याख्या :: नन्दनन्दन राधिका पति श्रीश्यामसुन्दर की आरती करनी चाहिए।आरती में प्रेम की बत्ती डालकर भक्ति का दिपक रखना चाहिए और उसको प्रतिदिन साधु पुरुषों के संग के द्वारा जलाना चाहिए।इस प्रकार से तैयार की हुई आरती ब्रज युवतियों के समूह को प्रिय लगती है और इस प्रकार की आरती को देखकर श्रीहित हरिवंश श्रीश्यामाश्याम की लीला का गान करने लगते है।सखियाँ चारो ओर चंवर लिए खड़ी है और उनके ह्रदय प्रेम से भीगे हुए है। कई सखियाँ श्रीश्यामाश्याम के सामने बैठकर वीणा और मृदङ्ग बजा रही है और कई नाना प्रकार के राग सुना रही है।मणि-जटित सुवर्ण के थाल में आरती की बत्तियां त्रिभुवन को मोहित कर रही है। आरती के समय घण्टे का जो शब्द हो रहा है वह आनन्द मंगल की निधि है, उसका वर्णन नही किया जा सकता।श्रीहित रूपलाल जी महाराज कहते है–सुख की राशि श्रीयुगल की जय हो, मैं उनके चरणकमलो में निवास करता हूँ।श्रीराधावल्लभलाल की आरती चाहिए और उनकी छवि को देखकर नेत्रो को लाभान्वित करना चाहिए।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~28
अथ स्तुति के दोहा

चन्द्र मिटे दिनकर मिटै, मिटै त्रिगुण विस्तार।
दृढ़ व्रत श्रीहरिवंश कौ, मिटै न नित्य विहार।।1।।

जोरी युगल किशोरी की, और रची विधि बाद।
दृढ़ व्रत श्रीहरिवंश कौ, निबह्यौ आदि युगादि।।2।।

व्याख्या :: चाहे चंद्रसूर्य मिट जाये तथा त्रिगुण का विस्तार रूप यह सम्पूर्ण सृष्टि नष्ट हो जाये किन्तु सुदृढ़ व्रत वाले श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी का नित्य विहार अस्त नही होगा।(इसका कारण यह है कि श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ने श्रीश्यामाश्याम जी के जिस नित्य विहार का प्रचार संसार में किया वह सहज रूप से त्रिगुण से परे स्थित है और इसलिए चन्द्र-सूर्य अथवा त्रिगुण-जनित सम्पूर्ण सृष्टि के नष्ट होने से उस पर कोई प्रभाव नही पड़ता)।।1।।

नित्य विहार वाले युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम की जोड़ी की रचना श्री ब्रह्मा जी के द्वारा नही की गयी है अर्थात श्री ब्रह्मा जी की बनाई हुई जोड़ियों से वह सर्वथा भिन्न है।इसीलिए श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी का, नित्यविहार के भजन का, सुदृढ़ व्रत अनादि-अनन्त निर्वाह होता चला आया है।।2।।

निगम ब्रह्म परसत नही, जौ रस सबते दूरि।
कियौ प्रकट हरिवंशजू, रसिकन जीवन मूरि।।3।।

रूप बेलि प्यारी बनी, सु प्रीतम प्रेम तमाल।
दोऊ मन मिलि एकै, भये श्रीराधावल्लभलाल।।4।।

व्याख्या :: उपनिषदों में जिसके स्वरूप का वर्णन किया है वह ब्रह्म भी जिसका स्पर्श नही कर पाता वह रस तत्व सर्वथा अप्राप्य (प्राप्त न होने योग्य) बना हुआ था। श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ने पृथ्वी पर प्रकट होकर रसिक जनों के जीवन सर्वस्व उस तत्व को संसार में प्रकट किया।।3।।

(अब इस रस तत्व के प्रकट स्वरूप श्रीराधावल्लभलाल का परिचय देते हुए कहते है कि) प्यारी श्रीव्रषभान नन्दिनी रूप-सौन्दर्य की लता है और प्रियतम श्रीनँदनन्दन प्रेम के तमाल है।श्रीराधावल्लभलाल के रूप में इन दोनों के मन मिलकर एक हो रहे है।।4।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~29
अथ स्तुति के दोहा

निकसि कुंज ठाढ़े भये, भुजा परस्पर अंश।
श्रीराधावल्लभ मुखकमल, निरखि नयन हरिवंश।।5।।

व्याख्या :: (अब इन अदभुत श्रीराधावल्लभ लाल के दर्शन प्राप्त करने का उपाय बतलाते हुए कहते है कि) जो श्रीराधावल्लभ लाल परस्पर अंसो (कंधों) पर भुजा डाले हुए निकुन्ज मन्दिर के द्वार पर खड़े हुए है उनके मुख-कमल के दर्शन श्रीहितहरिवंशचन्द्र जी के नेत्रो से करने चाहिए अर्थात उनकी लिखी वाणी के प्रकाश में उन्हें देखना चाहिए।।5।।

रे मन श्रीहरिवंश भज, जो चाहत विश्राम।
जिहि रस बस ब्रजसुन्दरिन, छाँड़ि दिये सुखधाम।।6।।

व्याख्या :: हे मन! यदि तेरी इच्छा विश्राम प्राप्त करने की है तो हरि की वंशी के अवतार श्रीहितहरिवंश चन्द्र जी का भजन कर, जिस वंशी के रस के वश में होकर ब्रज की गोपिकाओं ने अपने ग्रहस्थ के सम्पूर्ण सुखों का त्याग कर दिया था।।6।।

निगम नीर मिलि एक भयो, भजन दुग्ध सम स्वेत।
श्रीहरिवंश हंस न्यारौ कियौ, प्रकट जगत के हेत।।7।।

व्याख्या :: श्री हित हरिवंश चन्द्र जी के अवतार ग्रहण करने के पूर्व भक्ति रूपी दूध में वैदिक कर्मकाण्ड रूपी पानी मिलकर उसी के समान सफेद बन गया था और उसको भक्ति रूपी दूध से अलग करना नितांत कठिन हो गया था। श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी रूपी हंस ने जगत के कल्याण के हेतु प्रकट होकर वैदिक कर्मकाण्ड रूपी पानी को भक्ति रूपी दूध से अलग कर दिया।।7।।

श्रीराधावल्लभ लाड़िली अति उदार सुकुमारि।
ध्रुव तो भूल्यौ ओर ते तुम जिन देहु बिसारि।।
तुम जिन देहु बिसारि ठौर मौको कहु नाही।
पिय रंग भरी कटाक्ष नेक चितवो मो माही।।
बढ़ें प्रीति की रीति बीच कछु होय न बाधा।
तुम हौ परम् प्रवीण, प्राण बल्लभ श्री राधा।।8।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभ लाल की लाड़िली अति उदार सुकुमारी श्री राधा जी! मैं तो आरम्भ से ही भुला हुआ हूँ किन्तु आप मुझे न बिसराना (भूल कर भी अलग),क्योंकि अगर आपने मुझे बिसरा दिया तो मुझे अन्यत्र कही भी ठहर ने की जगह नही है।आप अपने प्रियतम के रंग से भरी हुई अर्थात प्रेम विहार रस से पूर्ण चितवन से थोड़ा मेरी ओर देखिये।जिससे मेरे ह्रदय में प्रीति की रीति की व्रद्धि हो और उसमें कोई भी बाधा न पड़े।क्योंकि ,हे प्राण प्रिय श्रीराधा जी ,आप परम् प्रवीण हो।।8।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~30
अथ स्तुति के दोहा

बिसरिहौ न बिसारिहौ यही दान मोहि देहु।
श्रीहरिवंश के लाड़िले मोहि अपनी कर लेहु।।9।।

व्याख्या :: श्रीहित हरिवंश जी के लाड़िले हे श्रीराधावल्लभलाल ! आप मुझको यह वरदान दीजिए कि न तो कभी मेरे द्वारा आप भुलाये जायेंगे और न कभी आप मुझे भूलेंगे और इस प्रकार मुझे आप अपना बना लीजिये।।9।।

कैसौउ पापी क्यों न हो श्रीहरिवंश नाम जो लेय।
अलक लड़ेती रीझि कै महल खवासी देय।।10।।

व्याख्या :: कोई कैसा भी पापी क्यों न हो यदि वह श्री हित हरिवंश नाम लेता है तो उस पर रीझ कर लड़ेती श्री राधा जी उसे अपने महल की दासी बना लेती है।।10।।

महिमा तेरी कहा कहूँ श्रीहरिवंश दयाल।
तेरे द्वारे बटत हैं सहज लाड़िली लाल।।11।।

व्याख्या :: हे परम् दयालु श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ! आपकी महिमा का वर्णन कोई क्या कर सकता है? क्योंकि आपके द्वार से सहज लाडिली लाल श्रीराधावल्लभलाल का दान होता है अर्थात जो आपका नाम लेते है उनको आप श्रीराधावल्लभलाल के प्रेम का दान कर देते है।।11।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~31
अथ स्तुति के दोहा

सब अधमन कौ भूप हों नाहिन कछु समझन्त।
अधम उधारन व्यास सुत यह सुनिके हर्षन्त।।12।।

व्याख्या :: यदि कोई जीव व्यास सुत श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के सामने सच्चे ह्रदय से कहता है कि मैं सब अधमो का सिरताज हूँ और बुद्धिहीन हूँ तो अधमो का उद्धार करने वाले श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी इस बात को सुनकर प्रसन्न होते है।।12।।

बन्दौ श्रीहरिवंश के चरण कमल सुख धाम।
जिनकौ वन्दत नित्य ही छैल छबीलो श्याम।।13।।

मैं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के उस सहज सखी स्वरूप के सुखदाई चरण कमलों की वन्दना करता हूँ जिनका नित्य वंदन छैल छबीले श्रीश्यामसुन्दर करते है।(श्रीमदराधासुधानिधि में एवं वाणी ग्रन्थों में सर्वत्र श्रीराधा जी की कृपा प्राप्त करने के लिए श्रीश्यामसुन्दर को सखी जनों की चाटुकारिता (खुशामद)करते दिखाया गया है)।।13।।

श्रीहरिवंश स्वरूप कौ मन वच करौ प्रणाम।
सदा सदा तन पाइये श्री वृन्दावन धाम।।14।।

व्याख्या :: मैं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के स्वरूप को सनातन (नित्य) श्रीहितवृन्दावन धाम की प्राप्ति के लिए मन और वाणी से प्रणाम करता हूँ।।14।।

जोरी श्रीहरिवंश की श्रीहरिवंश स्वरूप।
सेवक वाणी कुंज में विहरत परम् अनूप।।15।।

श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी की जोड़ी श्रीश्यामाश्याम और स्वयं श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी सेवकवाणी रूपी कुंज में परम् अनुपम बिहार करते रहते है।।15।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~32
अथ स्तुति के दोहा

करुणानिधि अरु कृपानिधि श्रीहरिवंश उदार।
वृन्दावन रस कहन कौ प्रगट धरयौ अवतार।।16।।

व्याख्या :: करुणानिधि, कृपानिधि और कृपा करने में परम् उदार श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी ने श्रीहित वृन्दावन रस (नित्य विहार रस) के कथन के लिए पृथ्वी पर प्रकट रूप से अवतार धारण किया है।।16।।

हित की यहां उपासना हित के है हम दास।
हित विशेष राखत रहौ चित नित हितकी आस।।17।।

व्याख्या :: हमारे यहाँ हित की उपासना है, हित के हम दास है, प्राणिमात्र के प्रति अपने चित्त में विशेष हित रखते है तथा नित्य हित की ही आशा लगाये रहते है।।17।।

हरिवंशी हरि अधर चढ़ि गूँजत सदा अमन्द।
दृग चकोर प्यासे सदा पाय सुधा मकरन्द।।18।।

व्याख्या :: श्रीहरि की वंशी श्रीहरि के अधरों पर चढ़कर श्रीराधानाम का उच्च स्वर से सदा गुंजार करती रहती है। इस गुंजार में से जो नामामृत श्रवित हो रहा है उसके पराग का पान करके रसिकजनों के नेत्र सदैव प्यासे अर्थात अतृप्त बने रहते है(नाम और रूप का अभेद होने के कारण नाम-गुंजार में से रसिकजनों को श्रीराधा रूप की स्फूर्ति हो जाना स्वाभाविक है और उसके दर्शन से उनकी कभी तृप्ति नही होती)।।18।।

श्रीहरिवंशहि गाय मन भावै यश हरिवंश।
हरिवंश बिना न निकसिहौ पद निवास हरिवंश।।19।।

व्याख्या :: हे मेरे मन ! तू श्री हित हरिवंश चन्द्र जी का गानकर क्योंकि मुझे श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी का यश ही अच्छा लगता है।मैं अपने सुख से श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के नाम को छोड़कर अन्य कुछ कहना नही चाहता और श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी के चरणकमलो में ही निवास करना चाहता हूँ अर्थात स्थित रहना चाहता हूँ।।19।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~33
स्तुति के पद

दीजै श्री वृन्दावन वास।
निरखूं श्रीराधबल्लभलाल लाल कौ,
लड़ेंती लाल कौ,
यह जोरी मेरे जीवन प्राण,
निरखूं श्रीराधबल्लभलाल कौ,
लड़ेंती लाल कौ।
मोर मुकुट पीताम्बर उर वैजन्ती माल निरखूं ०।।
यमुना पुलिन वंशीवट सेवाकुंज निज धाम।
मण्डल सेवा सुख धाम,मान सरोवर बादग्राम।।निरखूं०।।
बंशी वजावै प्यारो मोहना, लै लै राधा राधा नाम,लै लै प्यारी प्यारी नाम।।निरखूं०।।
देखो या व्रज की रचना नाचै नाचै युगल किशोर, नाचै नाचै नवलकिशोर ।।निरखूं०।।
चन्द्र सखी कौ प्यारौ।।
श्री राधाजू कौ प्यारौ।।
गोपिन को प्यारौ।।
बिरज रखवारौ।।
श्रीहरिवंश दुलारौ।।
दर्शन दीजो दीनानाथ, ऐ जी दर्शन दीजो हितलाल।।निरखूं०।।
यह जोरी मेरे जीवन प्राण।।निरखूं०।।
श्रीराधाबल्लभलाल कौ, लड़ेंती लाल कौ।।निरखूं०।।

व्याख्या :: स्पष्ट है।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~34
स्तुति के श्लोक

श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी कृत

-: श्रीमदराधासुधानिधि से उद्धरत :-

प्रीतिं कामपि नाममात्र जनित प्रोद्दामरोमोदगमां।
राधा माधवयो: सदैव भजतो: कौमार एवोज्वलाम।।
व्रन्दारण्य नव प्रसून निचया नानीय कुंजान्तरे।
गूढ़ शैशव खेलनैर्वत कदा कार्यो विवाहोत्सव:।।1(56)।।

व्याख्या :: श्रीराधावल्लभलाल की प्रीत अवर्चनीय (कही नही जा सकती)है,केवल नाम लेने से ही रोम-रोम में उतपन्न अवाध (ना रूकने वाली) प्रेम होता है।श्रीराधामाधव युगल का भजन ध्यान हमेशा कुमार अवस्था के उज्ज्वल रूप में ही होता है।।श्रीहित वृन्दावन की रमणीय भूमि पर नवीन पुष्पो का चयन करके नाना प्रकार की कुन्जो की रचना बनी हुई है। इनके गुप्त बाल विनोदमय लीला खेल में कब मेरे द्वारा विवाह उत्सव रचा जायेगा।।1(56)।।

साभ्रूनर्तन चातुरी निरुपमा सा चारु नेत्रांचले।
लीला खेलन चातुरी वरतनो तादृग वचष्चातुरी।।
संकेतागम चातुरी नव नव क्रीड़ा कला चातुरी।
राधाया जयतातसुखीजन परीहाहोत्सवे चातुरी।।2(63)।।

व्याख्या :: कमनीय अंग वाली श्रीराधा जी की वह अनुपम भृकुटि नचाने की कुशलता, वह मनोहर नेत्र प्रान्त के लीला पूर्वक संचालक की निपुणता, वह वचन रचना की अनिवर्चनीय चातुरी, संकेत स्थान में आगमन की चातुरी, नवीन-नवीन क्रीड़ा कला की चातुरी और अपनी सखी जन के मध्य में हास-परिहास की चातुरी की जय हो।।2(63)।।

गौरांगे म्रदिमास्मिते मधुरिमा नेत्रांचले द्राघिमा।
वक्षओजे गरिमा तथैव तनिमा मध्ये गतौ मंदिमा।।
श्रोन्यां च प्रथिमा भ्रुवो: कुटिलमा विंबाधरे शोणिमा।
श्रीराधे हर्दिते रसेन जडिमा ध्यानेsस्तुमे गोचर:।।3(174)।।

व्याख्या :: हे श्रीराधा जी! आपके गौर अंगो की मृदुता, मंद हास की माधुरी, नेत्र प्रान्त की विशालता,उरोजों की गुरुता तथा कटि प्रदेश की कृशता, चाल की मंदता और नितंबो की स्थूलता, भृकुटि की वक्रता, अधरों की लालिमा(तथा आपके) ह्रदय में रस की (जो) स्तब्धता है (वह) मेरे ध्यान का विषय बने।।3(174)।।

जाग्रतस्वपन सुषुप्तिषु ।
स्फुरतुमें राधापदाब्जच्छटा।
वैकुण्ठे नरकेथवा मम गतिर्नान्यस्तु राधांविना।।
राधाकेलि कथा सुधांबुधि महा वीचीभिरांदोलितं।
कालिन्दी तट कुंजमन्दिर वरा लिंदे मनों विंदतु।।4(164)।।

व्याख्या :: जाग्रत,स्वपन और सुषुप्त तीनो अवस्थाओं में मेरे ह्रदय में श्रीराधा चरणकमल की छटा स्फुरित होती रहे, वैकुण्ठ लोक अथवा नरक में श्रीराधा जी के बिना मेरा अन्य कोई आश्रय न हो।(अपने प्रियतम के साथ) श्रीराधा जी की क्रीड़ा-कथा रूपी अमृत सागर की महान तरंगों में झकोरे खाता हुआ मेरा मन यमुना तट पर स्थित निकुन्ज मन्दिर के श्रेष्ठ आँगन में आनन्द पाता रहे।।4(164)।।

यदगोविंद कथा सुधारस ह्रदे चेतोमया जंरभितम।
यद्वा तद्गुण कीर्तनार्चन विभूषाधैर्दिन प्रापितम।।
यद्यतप्रीतिरकारि तत्प्रिय जनेष्वात्यन्तिकी तेनमे।
गोपेन्द्रात्मज जीवन प्रणयिनी श्रीराधिका तुष्यतु।।5(114)।।

व्याख्या :: श्रीगोविन्द के कथामृत रूप सरोवर में मैने जो अपने चित्त को डुबाया है अथवा गुणगान, पूजन, श्रंगार-सेवा आदि में जो काल व्यतीत किया है अथवा उनके प्रियजनों के प्रति अत्यन्त बढ़ी हुई जो प्रीति की है, उस सबके फल स्वरूप गोपराजकुमार श्रीश्यामसुन्दर की प्राण प्रिया श्रीराधा जी मुझ पर प्रसन्न हों।।5(114)।।

चन्द्रास्ये हरिणाक्षि देव सुनसे शोणाधरे सुस्मिते–चिल्लक्ष्मी
भुज वल्लिकम्बुरुचिर ग्रीवेगिरिन्द्रस्तानि।।
भन्जनमध्य व्रहन्नितम्ब कदली खण्डोंरूपादाम्बुज–प्रोनमीलन्नख
चन्द्रमण्डलि कदा राधेमया राध्यसे।।6(116)।।

व्याख्या :: हे चन्द्रमुखी, हे मृगनयनी, हे देवी (प्रकाशवती), हे सुन्दर नासिका वाली, लाल अधरों वाली, मन्द हंसने वाली, दिव्य शोभा युक्त भुजलता वाली, शुभ्र शंख जैसे कंठवाली, उन्नत कुच मण्डल वाली, कृश उदर वाली, स्थूल नितंब वाली, कदली खंभ के समान (सुढार) जंघा वाली, तथा जिनके नखचन्द्र मण्डलों में से प्रकाश की किरणें निकलती रहती है ऐसी श्री राधा जी, मैं कब आपकी आराधना करूँगा?।।6(116)।।

राधापाद सरोज भक्तिमचला मुदवीक्ष्य निष्कैतवां–प्रीतस्वं
भजतोपि निर्भर महाप्रेम्णाधिकम सर्वशः।।
आलिंगत्यथ चम्बुतिस्ववदना ताम्बूलमा स्येर्पये–तकण्ठेस्वां
वनमालि कामपि मम न्यस्येत्कथा मोहन:।।7(117)।।

व्याख्या :: श्री राधा जी के चरनकमलो में मेरी निष्कपट एवं निश्चल भक्ति।व् अपने निज भक्त से भी अधिक प्रीति करते हुए मुझ पर महा प्रेम प्रकट करते हुए सर्व आधारित होकर। मेरा आलिंगन तथा चुम्बन करंगे तथा अपना स्वाद लिया हुआ ताम्बूल मेरे मुख को प्रदान करंगे।मेरे कण्ठ में अपनी प्रसादी वनमाला श्री मोहन लाल जी कब मुझे प्रदान करंगे?।।7(117)।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~35
स्तुति के श्लोक

राधानाम सुधरसं रसयितुं जिव्ह्या तु मेविह्वला–
पादौ तत्पदकांकितासु चरतां व्रन्दाटवीवीथिषु:।।
तत्कर्मेव कर: करोतु ह्रदयं तस्या: पदंध्यायता–
त्तमदावोत्सवत: परं भवतुमें तत्प्राणनाथे रति:।।8(141)।।

व्याख्या :: अमृत रस से भरे हुए श्रीराधा नाम के रसास्वाद के निमित्त मेरी रसना व्याकुल बनी रहे। मेरे पग उनके चरणों से चिन्हित श्रीहित वृन्दावन की गलियों में विचरण करते रहे। (मेरे) हाथ उन्ही के (श्री राधा जी के) निमित्त कर्म करें, मेरा ह्रदय उन्ही का ध्यान करे और उनके (श्रीराधा जी के) भाव चाव के साथ – साथ उनके प्राणनाथ (श्रीश्यामसुन्दर जी) में मेरी प्रीति हो।।8(141)।।

व्रन्दारण्यनिकुंज सीमासुसदा स्वानँग रंगोत्सवै–
र्माद्यत्यदभुत माधवाधर सुधामाध्वीक संस्वादनै:।।
गोविन्दप्रिय वर्ग दुर्गम सखी व्रन्दैरनालक्षिता–
दास्यंदास्यति मेकदानु कृपया व्रन्दावनाधीश्वरी।।9(128)।।

व्याख्या :: सदा (नित्य) श्रीहित वृन्दावन की रमणीय निकुन्ज परिधि में विलास-रास के विभिन्न रंगों के उत्सवों में रहने वाली,श्रीश्यामसुन्दर के अदभुत अधरों के अमृत का पान कर स्वाद में आनन्द मत्त रहने वाली।श्रीगोविन्द जी के प्रिय परिकर समूह में दुर्गम -दुर्लभ श्रीहितवृन्दावन सखी गुणों में अलक्षित,श्रीहित वृन्दावन की एक-मात्र स्वामिनी (श्रीराधा जी) क्या कभी कृपा कर मुझे दासों के भी दास (कैंकर्य) बना अपनायेगी।।9(128)।।

श्रीगोपेन्द्र कुमार मोहन महा विद्यएस्फुरन्माधुरी–
सारस्फाररसांबुराशि सहज प्रस्यन्दि नेत्रांचले।।
करुण्यार्दकटाक्षभंगि मधुर स्मेरानना भोरुहे–
हाहास्वामिनी राधिके मयि कृपा दृष्टि मनाद्गीक्षिपि।।10(188)।।

व्याख्या :: श्री गोपो के स्वामी कुमार श्रीश्यामसुन्दर का भी मोहन करने की महाविद्या रसमाधुरी का झरना चलाने वाली,उस रस झरने की रसों की राशि केवल सहज नेत्रों के भावभंगिमा देखने में ही हो जाती है।हे करुणा समुद्र तिरक्षे नेत्रो की स्वामिनी! मधुर नेत्र भंगिमा के साथ परिचालन विशेष शोभा व् भावों में पूजनीय है,हा हा करता हूँ आपकी शरण में हूँ स्वामिनी श्री राधा जी मुझ पर भी तनिक कृपा दृष्टिपात कीजिये।।10(188)।।

धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतांकितदव्रथा वार्त्तया–
सैकान्तेश्वर भक्तियोगे पदवीत्वारोपिता मुर्ध्दनि।।
यो वृन्दावन सीम्नि कश्चनघनाश्चर्य: किशोरीमणि–
स्ततकैकर्यरसामृतादिहपरं चित्तेन मे रोचते।।11(77)।।

व्याख्या :: धर्म , अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार पुरषार्थो की जय हो अर्थात जो लोग इनमें विश्वास रखते है, वे रखे रहै, हम तो उनकी चर्चा को भी व्यर्थ मानते है।ईश्वर के प्रति एकान्त भक्ति योग को भी हम सिर माथे चढ़ाते है किन्तु उससे भी हमको क्या लेना-देना है? हमारे चित्त को तो श्रीहितवृन्दावन की सीमा में विराजमान किसी महान आश्चर्य रूपा नवकिशोरी के दास्य रस के अतिरिक्त और कुछ भी अच्छा नही लगता।।11(77)।।

प्रेम्ण: सन्मधुरोज्ज्वलस्य ह्रदयं श्रंगार लीलाकला–
वैचित्रीपरमावधिर्भगवत: पूज्यैव कापीशता।।
ईशानी च शची महा सुख तनु: शक्ति: स्वतन्त्रापरा–
श्रीव्रन्दावननाथपटमहिषी राधैव सेव्या मम।।12(78)।।

व्याख्या :: प्रेम की श्रेष्ठतम जो मधुर उज्ज्वल श्रंगार लीला कला की स्वामिनी श्री लाल जी के ह्रदय में रहती है,वह विचित्रता की परम (चरम) सीमा है पूजनीया कोई अवर्चनीय ईश्वरी है भगवान श्रीकृष्ण की।श्री पार्वती जी और श्री इन्द्राणी जी अतिशय सुख स्वरूप वाली विग्रह है परन्तु ये स्वतंत्र पराशक्ति है,श्री वृन्दावन स्वामी के साथ सिंहासन पर आरूढ़ होने वाली रानी वह श्रीराधा जी का ही में सेवक हूँ।।12(78)।।

यज्जाप: सक्रदेव गोकुलपते राकर्षकस्तत्क्षणा–
द्यत्र प्रेमवतां समस्त पुरुरुषार्थपुस्फुरे तुच्छता।।
यन्नामांकित मन्त्र जापन पर: प्रीत्या स्वयं माधव–
श्रीकृष्णोपि तदद्भूतंस्फुरतुमे राधेति वर्ण द्वयम।।13(94)।।

व्याख्या :: जिसका एक बार भी उच्चारण गोकुलपति श्रीकृष्ण का तत्काल आकर्षण कर लेता है, जिसके प्रेमियों को समस्त पुरुषार्थो के प्रति तुच्छ बुद्धि हो जाती है, श्रीकृष्ण जी भी स्वयम प्रीति पूर्वक जिस नाम से अंकित मंत्र का जप करते है, वे अदभुत दो अक्षर “रा-धा” मेरे ह्रदय में स्फुरित हो।।13(94)।।

कालिन्दी तट कुञ्ज मन्दिर गतो योगीन्द्र वद्यत्पद–
ज्योतिधर्यान पर: सदा जपतियां प्रेमाश्रुपूर्णो हरि:।।
केनाप्यदभुतमुल्लसदृति रसा नँदेन संमोहिता–
सा राधेति सदा ह्रदिस्फुरतुमे विद्यापरा द्वयक्षरा।।14(95)।।

व्याख्या :: श्री यमुना तट वर्ती निकुन्ज–भवन में विराजकर प्रेम-अश्रुओ से भीगे हुए श्रीहरि, श्री शिव आदि योगीश्वरो की तरह, जिनकी चरण–ज्योति के ध्यान में तत्पर होकर जिसका जाप करते रहते है, किसी अदभुत एवं अनिर्वचनीय उल्लास से परिपूर्ण विहार–रस के आनन्द से सम्मोहित अर्थात अत्यधिक आकर्षक बनी हुई वह रा–धा दो अक्षरों वाली वेदातीत (वेदों के परे की) विद्या मेरे ह्रदय में स्फुरित हो।।14(95)।।

देवनामथ भक्तमुक्त सुह्रदा मत्यंत दूरं च–
यत्प्रेमानन्द रसं महा सुख करं चोच्चारितं प्रेमत:।।
प्रेन्णाकर्णयते जप्तयथया मुदागायत्यथा लिषवयं–
जल्पत्यश्रुमुखो हरिस्तद मृतं राधेति में जीवनम।।15(96)।।

व्याख्या :: जो देवताओं के लिए, भक्ति–भाव युक्त पुरुषो के लिए और श्रीकृष्ण के स्वजनों के लिए बहुत ही दूर है अर्थात अप्राप्य है। जो प्रेमानँद रस स्वरूप है।प्रेमपूर्वक उच्चारण करने पर जो अत्यन्त सुख देने वाला है। आंसुओं से जिनका मुख भीगा हुआ है ऐसे श्रीश्यामसुन्दर प्रेम विवश होकर जिसे सुनते है, जपते है और सखियों के मध्य में हर्षित होकर जिसका कीर्तन करते है वह श्रीराधा जी नामरूपी अमृत मेरा जीवन है (प्राण है)।।15(96)।।

लक्ष्म्या यश्चन गोचरी भवति यन्नापु: सखया: प्रभो:–
संभाव्योपि विरंचि नारद शिव स्वायं भुवध्येर्नय:।।
यो वृन्दावन नागरी पशुपति स्त्री भावलभ्य: कथं–
राधामाधवयोर्ममास्तुसरहो दास्याधिकरोत्सव:।।16(239)।।

व्याख्या :: जो श्री लक्ष्मी जी को भी गम्य नही है तथा जिसे श्रीकृष्ण जी के सखा भी नही प्राप्त कर सके,जो श्री ब्रह्मा जी श्री नारद जी श्री शिव जी व् श्री सनकादिकों को भी सम्भव नही है। जो श्री वृन्दावन की नागरी गोपिकाओं को भाव द्वारा लक्षयित हुआ, वह श्रीराधाश्यामसुन्दर जी का एकान्त कैंकर्य का रूप पूर्ण मधुरता का अधिकार मुझे कब प्राप्त होगा।।16(239)।।

मालाग्रन्थन शिक्षया मृदु मृदु श्रीखण्ड निर्घर्षणा–
देशेनादभुत मोदकादि विधिभि: कुञ्जान्त सन्मार्जने:।।
व्रन्दारण्यरहस्थलीषु विवशा प्रेमोर्तिभारोदगमा–
त्प्राणेशं परिचारिकै: खलुकदादास्यामयाधीश्वरी।।17(242)।।

व्याख्या :: माला गूथने की शिक्षा से तथा मुलायम कोमल चन्दन घिसने की आज्ञा से,स्वादिष्ट अदभुत मोदक आदि की निर्माण कला से तथा कुन्जो के अन्दर सम्मार्जन द्वारा।श्रीहित वृन्दावन की रमणीय एकान्त स्थली में प्रेम में भारी विवश हो लीला प्रारम्भ होने पर,इन उपर्युक्त विविध सेवाओं से मुझ दास द्वारा मेरी स्वामिनी अपने प्रियतम के साथ प्रसन्न हो कब मुझे सेवा में लेंगी।।17(242)।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~36
स्तुति के श्लोक

उच्छिष्ठामृत भुक्तवैव् चरितं श्र्रणवन्स्तवैव स्मर–
न्पदांभोज रजस्तवैव विचरन्कुंजास्तवैवालयान।।
गायन्दिव्य गुणांस्तवैव रसदे पस्यन्स्तवैवाकृतिं–
श्रीराधे तनुवांङ्गमनोभिरमलै: सोहन्तवैवाश्रित:।।18(240)।।

व्याख्या :: हे स्वामिनी! आपके उच्छिष्ट अमृत का भोगी बनू तथा आपके चरित्र का श्रवण व् स्मरण करू,आपके चरण रज का ही स्तवन करू तथा कुञ्ज भवन में विचरण करू।आपके दिव्य गुणों का गान करू तथा रस प्रदान करने वाली आपकी मधुर छवि (आकृति) को ही देखू, श्री राधा जी! में तन, वचन एवं मन से केवल आपके ही आश्रित रहू।।18(240)।।

आशास्य दास्यम व्रषभानु जाया– स्तीरे समध्यास्य च भानुजाया:।।
कदानुवृन्दावनकुञ्ज वीथी– ष्वहन्नु राधेह्यतिथिर्भवेयम।।19(197)।।

व्याख्या :: श्री व्रषभान नन्दिनी आपके दास होने की कामना मन में रखकर तथा श्री यमुना जी के किनारे पर निवास करते हुए श्री राधाजी।क्या कभी श्रीहित वृन्दावन की कुञ्ज गलियों में घूम सकूंगा तथा मैं कभी अतिथि की तरह भी वहां श्री राधा जी आपके पास होंगा।।19(197)।।

यत्र यत्र ममजन्म कर्मभि–र्नारकेsथपरमे पदेsथवा।
राधिका रति निकुन्जमण्डली–तत्र तत्र ह्रदि मे विराजिताम।।20(267)।।

व्याख्या :: मेरे कर्मो के परिणाम स्वरूप नरक में अथवा स्वर्ग में या फिर जहां कही भी मेरा जन्म हो वहां श्री राधां जी की केलि निकुन्ज मण्डली (श्रीप्रियाप्रियतम, सहचरी और श्रीहित वृन्दावन) मेरे ह्रदय में विराजमान रहै।।20(267)।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~37
स्तुति के श्लोक

उच्छिष्ठामृत भुक्तवैव् चरितं श्र्रणवन्स्तवैव स्मर–
न्पदांभोज रजस्तवैव विचरन्कुंजास्तवैवालयान।।
गायन्दिव्य गुणांस्तवैव रसदे पस्यन्स्तवैवाकृतिं–
श्रीराधे तनुवांङ्गमनोभिरमलै: सोहन्तवैवाश्रित:।।18(240)।।

व्याख्या :: हे स्वामिनी! आपके उच्छिष्ट अमृत का भोगी बनू तथा आपके चरित्र का श्रवण व् स्मरण करू,आपके चरण रज का ही स्तवन करू तथा कुञ्ज भवन में विचरण करू।आपके दिव्य गुणों का गान करू तथा रस प्रदान करने वाली आपकी मधुर छवि (आकृति) को ही देखू, श्री राधा जी! में तन, वचन एवं मन से केवल आपके ही आश्रित रहू।।18(240)।।

आशास्य दास्यम व्रषभानु जाया– स्तीरे समध्यास्य च भानुजाया:।।
कदानुवृन्दावनकुञ्ज वीथी– ष्वहन्नु राधेह्यतिथिर्भवेयम।।19(197)।।

व्याख्या :: श्री व्रषभान नन्दिनी आपके दास होने की कामना मन में रखकर तथा श्री यमुना जी के किनारे पर निवास करते हुए श्री राधाजी।क्या कभी श्रीहित वृन्दावन की कुञ्ज गलियों में घूम सकूंगा तथा मैं कभी अतिथि की तरह भी वहां श्री राधा जी आपके पास होंगा।।19(197)।।

यत्र यत्र ममजन्म कर्मभि–र्नारकेsथपरमे पदेsथवा।
राधिका रति निकुन्जमण्डली–तत्र तत्र ह्रदि मे विराजिताम।।20(267)।।

व्याख्या :: मेरे कर्मो के परिणाम स्वरूप नरक में अथवा स्वर्ग में या फिर जहां कही भी मेरा जन्म हो वहां श्री राधां जी की केलि निकुन्ज मण्डली (श्रीप्रियाप्रियतम, सहचरी और श्रीहित वृन्दावन) मेरे ह्रदय में विराजमान रहै।।20(267)।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~38
शयन भोग के पद

पय पै धरयौ कनक कटोर।
सुगंध ऐला मिल्यौ मिश्री लेत देत निहोर।।
(बलि जाऊँ) कबहुँ ये लै कबहुँ वे लै करि कटाक्षन कोर।।
वदन-विधु मनों सुधा पीवत सखिनु नैन चकोर।।

व्याख्या :: दूध के पास में स्वर्ण कटोरे रखे है।जिसमे सुगन्ध , इलाइची व् मिश्री मिली हुई है तथा कृतज्ञता पूर्वक श्री श्यामाश्याम एक दूसरे को अनुग्रह कर ले दे रहे है।में बल – बल जाऊ कभी तो ज्यादा व् कभी तो कम लेन-देन का क्रम नयनों के कोर के साथ अलग-अलग भाव भंगिमा में चल रहा है।श्रीयुगल कला के निधि है और इनके मुखारबिन्द से मानो सखियाँ चकोर की भांति अमृत का पान कर रही है।।

हँस-हँस दूध पियत पिय प्यारी।
चंदन बारि कनक चरु औट्यौ बारी कोटि सुधारी।।
मिश्री लौंग चिरौंजी एला कपूर सुगंध सँवारी।
उज्ज्वल सरस् सचिक्कन सुन्दर स्वाद सुमिष्ठ महारी।।

व्याख्या :: पिय प्यारी श्रीश्यामाश्याम हंस-हंस कर दूध पी रहे हैं। यह दूध चन्दन की लकड़ी जलाकर सुवर्ण के पात्र में गर्म किया गया है और उसके ऊपर करोड़ो अमृत न्यौछावर किये जा सकते है।दूध में मिश्री, चिरोंजी, लौंग, इलाइची और कपूर की सुगन्ध मिली हुई है। यह दूध उज्ज्वल रस युक्त एवं सचिक्कन है और उसका स्वाद अत्यन्त मधुर है।।

नवल नवेली अलवेली सुकुमारी जू कौ, रूप पिय प्रानन को सहज अहाररी।
व्यंजन सुभायन के नेह घृत सौंज बने,रोचक रुचिर हैं अनूप अति चारुरी।।
नैनन की रसना तृपित न होत क्यों हू, नई नई रूचि ध्रुव बढ़त अपार री।
पनिपको पानी प्याय पान मुसिक्यान ख्वाय,राखे उर सेज स्वाय पायो सुख सरारी।।

व्याख्या :: नवेली, अलवेली,सुकुमारी श्रीराधा जी का रूप श्री नवल प्रियतम जी के प्राणों का सहज आहार है। सुन्दर भावों के व्यंजन,जो रूप घृत (घी) में बने हुए है, अत्यन्त रुचिकारी व् सुन्दरता में अनुपम है। इन व्यंजनों को चाखकर श्रीश्यामसुन्दर की नेत्र रूपी रसना (जीभ) किसी प्रकार भी तृप्त नही होती है और श्री प्रियतम जी के मन में नई-नई और अपार रूचि निरन्तर बढ़ती रहती है।श्री प्रिया जी ने अपने श्रीप्रियतम जी को लावण्य रूपी पानी पिलाकर और मुसकान रूपी पान खिलाकर अपनी ह्रदयरूपी शैय्या पर सुला लिया जिससे श्रीप्रियतम जी को सुख का सार प्राप्त हो गया।।


श्री जी सेवा में अष्टयाम के पद
भाग~39
शयन आरती के पद

नागरी निकुन्ज ऐन किसलय दल रचित सेन, कोककला कुशल कुमरि अति उदाररी।
सुरत रंग अंग अंग हाव भाव भृकुटी भंग, माधुरी तरंग मथत कोटि मार री।।
मुखर नुपुरनि स्वाभाव किंकिणी विचित्र राव, विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री।
लाड़िली किशोर राज हंस हंसिनी समाज,सींचत हरिवंश नैन सुरस सार री।।

व्याख्या:: हे सखी! प्रवीण श्री राधा जी निकुन्ज निवास स्थल पर नवपल्लवो के दल से सेंन शय्या रचि गयी है और श्री प्रिया जी रति विद्या में कुशल निपुण व् अति ही उदार है।हे सखी! कामकेलि के रँग में उनके प्रत्येक अंग -अंग के हाव – भाव व् उनके नयनों की कोर से उठती लहर अपने आप में सम्पूर्ण मधुरता की तरंग है जिस पर करोड़ो कामदेव भी छीन है।।प्रधान रूप से उनके नूपुरों स्वभाव अनुसार व् कमर की कोधनी रुनझुन स्वर बड़े ही विचित्र है ठकुराइन के और धीरे -धीरे स्वर का वेग कम हो जाता है श्री स्वामी स्वामिनी हास-परिहास में रतिविहार में चले जाते है।श्रीलाडिली जी श्री किशोर जी यह श्रीयुगल हंस-हंसिनी अपने समाज के साथ ऐसे ही राज करे और यह सुन्दर रस का सार श्रीहित हरिवंश जी के नेत्रो से अंतर्धारा सींचते रहे , हे सखी।।

चांपत चरन मोहनलाल।
कुँवरि राधे पलंग पौढ़ी सुन्दरी नव बाल।।
कबहुँ कर गहि नैन लावत कबहुँ छुवावत भाल
।नन्ददास प्रभु छवि विलोकत प्रीति के प्रतिपाल।।1।।

व्याख्या :: शयन समय शय्या पर श्री मोहन लाल जी श्री प्रिया जी के चरणों को धीरे से दबा रहे है।श्री सुकुमारी राधा जी नव बाल सिज्जा पलंग पर लेटी हुई है।श्री मोहन लाल जी कभी नेत्रो से रूप की चकाचोंध को हाथ बाध् कर देख रहे है और कभी अपनी ललाट (मस्तक) को चरणों में छुवा रहे है।श्रीहित नन्ददास जी कहते है – मैं प्रभु की यह छवि देख कर कह सकता हूँ प्रीति के वे ही केवल रक्षक और पालक है।।

लड़ैती जू के नैनन नींद घुरी।
आलस वश जीवन वश मद वश पिय के अंश ढुरी।।
पिय कर परस्यौ सहज चिबुक वर बाँकी भौह मुरी।
बावरीसखी हित व्यास सुवन बल देखत लतन दुरी।।2।।

व्याख्या :: सखी समाज,श्रीहित वृन्दावन एवं श्रीश्यामसुन्दर की एक मात्र लाड़ भाजन श्रीप्रिया जी के नेत्रो में नीद छाई हुई है।आलस्य एवं यौवन मद के वशीभूत होकर वे अपने श्रीप्रियतम जी क्व अंस (कन्धा) पर झुक गई है। श्रीप्रियतम जी ने सहज रूप से उनकी (श्री प्रिया जी की) चिबुक का स्पर्श किया तो उनकी भृकुटि चढ़ गई।बाबरी सखी कहती है — मैं श्रीहितव्यास नन्दन जी के कृपा बल से यह अत्यन्त रमणीय दृश्य लता की ओट से देख रही हूँ

अति सुंदर भाव

आलस नैन आवत घूम।
लाल चुटकी दै जगावत खुले ताकत भूम।।
खसित भुज पिय अंश तें सम्हराय कर लै चूम।
वृन्दावन हित रूप घूंघट बदन कर रह्यौ झूम।।3।।

व्याख्या :: श्री प्रिया जी के नेत्र आलस्य से झुके आ रहे है।श्रीश्यामसुन्दर जी श्री प्रिया जी को चुटकी बजाकर सावधान करते है और श्री प्रिया जी नेत्र खोलकर भूमि की ओर देखने लगती है।श्री प्रियतम जी के अंस पर रखी हुई श्री प्रिया जी की भुजा निद्रा के कारण खिसक जाती है तो श्री प्रियतम जी भुजा को यथास्थान स्थापित करके श्री प्रिया जी के कर को चूम लेते है। चाचा हित वृन्दावनदास जी कहते है कि श्री प्रिया जी के मुखारबिन्द पर रूप का घूंघट झूम रहा है।(जिसके कारण मुखारबिन्द पर दृष्टि नही ठहर रही)

जदेखों चित्रसारी बनी।
वत छनी।मध्य सेज विराज पौढ़े रसिक दंपति मनी।।
अंग अंग अंनग भीने राधिका धन धनी।
पद कमल सेवत तहाँ हित रूप एकै जनी।।4।।

व्याख्या :: हे सखी, देखो श्रीश्यामाश्याम जी की चित्रसारी(शयन कुञ्ज) शोभायमान है।इस कुंज के छिद्रों में मणियों के दीपक झलक रहे है, अर्थात कुञ्ज के छिद्रों में इस प्रकार की मणियाँ रखी है जो दीपक की भांति प्रकाश कर रही है।श्रीश्यामाश्याम जी के श्रीअंगो में से प्रगट होने वाली सुगन्ध के उदगार एक -दूसरे में छनकर दोनों के निकट पहुंच रहे है।रसिक शिरोमणि श्रीयुगल ने शैया के मध्य में विराजकर शयन किया और श्रीश्यामाश्याम के अंग-अंग में अंनग का रंग छा रहा है। इस समय एक मात्र श्रीहित रूपा सखी (हित सखी) श्रीश्यामाश्याम के चरणों को चाँप (दबा) रही है।।4।।

रस भरे सुभग हिंडोले झूलत।
अति सुकुमार रूपनिधि दोऊ सो छबि देखि परस्पर फूलत।।
नवल तरुनता अंग-अंग भूषण लसत सुभग उरजन मणिमाल।
उभयसिन्धु मनों बढ़े रूपके विच- विच झलकत रंग रसाल।।
रुचिर नील पट्पीत पवन वस्त्र उड़त उठत मनों लहरि उरंग।
हित ध्रुव दिनहि मीन सखियन दृग तृषित फिरत रसमे नितसंग।।

व्याख्या :: श्रीयुगल रस से परिपूर्ण मनोहारी झूला पर झूल रहे है।दोनों परम् कोमलता व् रूप की खदान है,वह रस में लीन एक-दूसरे की छवि को देख कर पल्लवित हो रहे है।।नयी तरुनता में उनका प्रत्येक अंग आभूषणों से शोभायुक्त है और मनोहर मणियों की माला वक्ष स्थल पर शोभायमान है।रूप के यह दोनो-समुद्र मानो बढ़ कर ऐसे लग रहे है कि रूप की लहर पे लहर झलमला रही हो और रँग रसपूर्ण कौतुक में बदल रहा हो।।रुचिकारी नीले व् पीले वस्त्र पवन के कारण उठ कर उड़ रहे है कि मानो नागकेसर की लहर हो।श्रीहित ध्रुवदास जी कहते है कि सखियों के नेत्र तैरती मछली की भांति रस में नित संग होते हुए भी प्यासे घूम रहे है अर्थात इतने रस-समुद्र में भी तृप्त नही है।।

………..•>( सेवा विश्राम )<•………..

इस पद के बाद,सेवाग्रह बन्द करके प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।अभी तक बताई इस सेवा की पद्धति को “अष्टयाम सेवा पद्धति” कहा जाता है।हमारे बाबा जी व श्रीगुरु जी महाराज गो. श्रीहित भजनलाल जी, श्री हित जू महाराज व श्री कृपासिंधु स्वामिनी व लाल जी की अदभुत कृपा से हम यह श्री जी सेवा की अष्टयाम विधि व्याख्या व संकलित कर आप रसिको तक पहुंचा सके।

राधेकृष्णावर्ल्ड की ओर से श्रीहित वृन्दावन धाम से रसिक परिकर को…

।।”जै जै श्री हित हरिवंश”।।
।। जै जै श्री हित हरिवंश ।।

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रसिक नाम ध्वनि


य जय राधावल्लभ गुरु हरिवंश | रँगीलो राधावल्लभ हित हरिवंश ।।
छबीलो राधावल्लभ प्यारौ हरिवंश । रसीलो राधावल्लभ जीवन हरिवंश ।।


श्रीवृन्दावन रानी राधावल्लभ नृपति प्रशंस हित के
बस यश रस उर धरिये करिये श्रुति अवतंस ।।१।।

वंशीवट यमुनातट धीर समीर पुलिन सुख पुञ्ज ।
बिहरत रंग रँगीलो हित सौं मण्डल सेवाकुञ्ज ।। २ ।।

ललिता विशाखा चम्पक चित्रा तुंगविद्या रंगदेवी ।
इन्दुलेखा अरु सखी सुदेवी सकल यूथ हितसेवी ।।३।।

श्रीवनचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र श्रीगोपीनाथ श्रीमोहन ।
नाद विन्दु परिवार रँगीलो हितसौं नित छवि जोहन ।।४।।

नरवाहन ध्रुवदास व्यास श्रीसेवक नागरीदास ।
बीठल मोहन नवल छवीले हित चरणन की आस ।।५।।

हरीदास नाहरमल गोविन्द जैमल भुवन सुजान।
खरगसेन हरिवंशदास परमानन्द के हित प्रान ।। ६ ।।

गंगा यमुना कर्मठी अरु भागमती ये बाई ।
हित के चरण शरण हवै के इन दम्पति सम्पति पाई ।।७।।

दास चतुर्भुज कन्हर स्वामी अरु प्रबोध कल्यान ।
स्वामीलाल दामोदर पुहकर सुन्दर हित उर आन। ८ ।।

हरीदास तुलाधर और यशवन्त महामति नागर।
रसिकदास हरिकृष्ण दोऊ ये प्रेम भक्ति के सागर ।। ६ ।।

मोहन माधुरीदास द्वारिकादास परम अनुरागी ।
श्यामशाह तूमर कुल हित सौं दम्पत्ति में मति पागी ।।१०।।

श्रीहित शरण भये अरु अब हैं फेरहु जे जन हवै हैं ।
प्रेम भक्ति उर भाव चाव सौं वृन्दावन निधि पैहैं।।११ ।।

रसिक मण्डली में या तन कौं तीके ढंग लगावौ ।
दम्पति यश गावौ हरसावौ हित सौं रीझ रिझावी ।।१२।।

देवन दुर्लभ नर देही सो तें सहजहि पाई।
मन भाई निधि पाई सो क्यों जान बूझ बिसराई । । १३ ।।

एक अहंता ममता ये हैं जग में अति दुख दाई ।
ये जब श्रीजू की ओर लगे तब होत परम सुखदाई । । १४ ।।

मात तात सुत दार देह में मति अरुझै मति मन्दा ।
श्रीहितकिशोर कौ ह्वै चकोर तू लखि श्रीवृन्दावन चन्दा । ।१५ ।।

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श्री हित राधा सुधा निधि जी


श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 1

यस्याः कदापि वसनाञ्चल खेलनोत्थ, धन्याति धन्य पवनेन कृतार्थमानी।
योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि, तस्याः नमोऽस्तु वृषभानुभुवो दिशेऽपि।।१।।

जिनके दूकूल के उड़ने से खेलन रुचि ले वह धन्य पवन।जो नहीं प्राप्य योगीन्द्रों को, जो है सन्तत पावन कन-कन ॥

मधुसूदन हैं कृतकृत्य कहाँ, वृषभानु नन्दिनी भव्य जहाँ।

हो गति दुरूह का छोर वहाँ, उस ओर हमारा अमित नमन।।


श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 2

ब्रह्मेश्वरादिसुदुरुहपदारविन्दं, श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवायाः।
सर्वार्थसाररसवर्षिकृपार्द्रदृष्टेस्तस्या नमोस्तु वृषभानुभुवो महिम्ने।।२।।

जो ब्रह्म शिवादिक से भी बढ़कर अतिशोभादि दुरूह कमलपद।

अद्भुत परम पराग विभव की सारभूत अति कृपा दृष्टि नद ॥

उन श्री श्री वृषभानु नन्दिनी की महिमा जो अकथ कथन।

नमस्कार हो पुनः पुनः अति विनय विनम्रित पुनः नमन ॥


श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°3

यो ब्रह्मरुद्रशुकनारदभीष्ममुख्यैरालक्षितो न सहसा पुरुषस्य तस्य।
सद्यो वशीकरण चूर्णमनन्तशक्तिं तं राधिका चरणरेणुमनुस्मरामि।।३।।

जो ब्रह्म रुद्र शुक नारद भीष्म से भी दिये न दिखलाई।

शक्त्यनन्त उस परम पुरुष को वशीकरण वह कर पाई।।

ऐसी उस सम्पन्न शक्ति को सहसा आकर्षित करती जो।

उस राधा पद रज का सुमिरन, सन्तन कर भव दुख हरती जो।


श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°4

आधाय मूर्द्धनि यदा पुरुदारगोप्यःकाम्यं पदं प्रियगुणैरपि पिच्छ मौलेः।
भावोत्सवेन भजतां रस कामधेनुं तं राधिका चरणरेणुमहं स्मरामि||४||

मनः प्राण से नित उदार ऐसी गोपी गण गोकुल की।

मोर पंख धारी के सब गुण-सहित प्राप्य पद आकुल की।

भाव चाव भावोत्सव हित वे कामधेनु सी नित हुलसी।

भक्तों से ध्यायित नित-नित वह स्वामिनि पदरज मन विलसी।


श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°5

दिव्यप्रमोद रस सार निजाङ्गसङ्ग , पीयूषवीचि निचयैरभिषेचयन्ती।”
कन्दर्प कोटि शर मूर्च्छित नन्दसूनुसञ्जीवनी जयति कापि निकुञ्जदेवी।।5।।

जो सदा अपने अङ्ग-जो सदा अपने अङ्ग-सङ्ग रूप अलौकिक आनन्द-रस-सार अमृत की लहरी-समूहों का अभिसिञ्चन कर – करके कोटि-कोटि कन्दर्प-शरों स मूर्च्छित नन्दनन्दन श्रीलालजी को जीवन-दान करती रहती हैं, उन नन्दसूनु-सञ्जीवनी किन्हीं (अनिर्वचनीय) निकुञ्जदेवी की जय हो, जय हो। अलौकिक आनन्द-रस-सार अमृत की लहरी-समूहों का अभिसिञ्चन कर – करके कोटि-कोटि कन्दर्प-शरों से मूच्छित नन्दनन्दन श्रीलालजी को जीवन-दान करती रहती हैं, उन नन्दसूनु-सञ्जीवनी किन्हीं (अनिर्वचनीय) निकुञ्जदेवी की जय हो, जय हो।


श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°6

तन्नः प्रतिक्षण चमत्कृत चारुलीलालावण्य मोहन महामधुराङ्गभङ्गि।

राधाननं हि मधुराङ्ग कलानिधान- माविर्भविष्यति कदा रससिन्धु सारम् ॥6।।

जिस आनन-कमल से प्रतिक्षण महामोहन माधुर्य के विविध अङ्गों की भङ्गिमा युक्त सुन्दर-सुन्दर लीलाओं का लावण्य चमत्कृत होता रहता है और जो माधुर्य के अङ्गों की चातुरी का उत्पत्ति स्थान है, वही समस्त रस-सार-सिन्धु श्रीराधानन हमारे सम्मुख कब आविर्भूत होगा ?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°7

यत्किङकरीषु बहुशः खलु काकुवाणी नित्यं परस्य पुरुषस्य शिखण्डमौलेः ।

तस्याः कदा रसनिधे- वृषभानुजायास्तत्केलिकुञ्ज भवनाङ्गण मार्जनीस्याम् ॥7।।

निश्चय ही, जिनकी दासियों से परम-पुरुष शिखण्ड-मौलि श्रीश्यामसुन्दर नित्य-निरन्तर कातर-वाणी द्वारा भूरि-भूरि प्रार्थना करते रहते हैं, क्या मैं कभी उन रसनिधि श्रीवृषभानुजा के केलि-कुञ्ज-भवन के प्राङ्गण की सोहनी देने वाली हो सकूँगी ? (जिसमें प्रवेश करने के लिये श्रीलालजी को भी सखियों से प्रार्थना करनी पड़ती है)।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 8

वृन्दानि सर्वमहतामपहायादूराद्वृन्दाटवीमनुसर प्रणयेन चेतः ।

सत्तारणीकृतसुभावसुधारसौघं राधाभिधानमिह दिव्यनिधानमस्ति ।।8।।

हे मेरे मन ! तू समस्त महच्चेष्टाओं ( महत् वृन्दों) को दूर से ही छोड़कर प्रीति-पूर्वक श्रीवृन्दाटवी का अनुसरण कर । जहाँ ‘श्रीराधा’ नामक एक दिव्य निधि विराजमान है । जो सज्जनों को भव से उद्धार करने वाले भाव रूप सुधा-रस का प्रवाह है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°9

केनापि नागरवरेण पदे निपत्य संप्रार्थितैकपरिरम्भरसोत्सवायाः ।

सभ्रूविभङ्गमतिरङ्गनिधेः कदा ते श्रीराधिके नहिनहीतिगिरः श्रृणोमि ॥9।।

हे श्रीराधिके ! कोई चतुर-शिरोमणि किशोर आपके श्रीचरणों में बारम्बार गिरकर आपसे परिरम्भण सुखोत्सव की याचना कर रहे हों और आप अपनी भ्रूलताओं को विभङ्गित कर-करके परम रसमय वचन ‘नहीं

नहीं’ ऐसा कह रही हों । हे अति कौतुक-निधि ! मैं आपके इन शब्दों को कब सुनूंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°10

यत्पादपद्मनखचन्द्रमणिच्छटाया विस्फूजितं किमपि गोपवधूष्वदर्शि ।

पूर्णानुरागरससागरसारमूर्तिः सा राधिका मयि कदापि कृपां करोतु ॥10।।

जिनके पाद-पद्म-नख रूप चन्द्रमणि की किसी अनिर्वचनीय छटा का प्रकाश गोप-वधुओं में देखा जाता है, वही परिपूर्ण अनुराग-रस-समुद्र की सार-मूत्ति श्रीराधिका कभी मुझ पर भी कृपा करेंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°11

उज्जृम्भमाणरसवारिनिधेस्तरङ्गैरंगैरिव प्रणयलोलविलोचनायाः ।

तस्याः कदा नु भविता मयि पुण्यदृष्टिवृन्दाटवीनवनिकुञ्जगृहाधिदेव्याः ॥11।।

जिनके नेत्र प्रणय-रस से चञ्चल हो रहे हैं और जिनके अङ्ग उत्फुल्लमान् रस-सागर की तरङ्गों के समान हैं, उन श्रीवृन्दाटवी नवनिकुन्ज भवन की अधिष्ठात्री देवी की पवित्र दृष्टि मुझ पर कब होगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°12

वृन्दावनेश्वरि तवैव पदारविन्दं

प्रेमामृतैकमकरन्दरसौघपूर्णम् ।

हृद्यपितं मधुपतेः स्मरतापमुग्रं

निर्वापयत्परमशीतलमाश्रयामि ॥12।।

हे वृन्दावनेश्वरि ! आपके चरण-कमल एकमात्र प्रेमामृत-मकरन्द

रस-राशि से परिपूर्ण हैं, जिन्हें हृदय में धारण करते ही मधुपति श्रीलालजी

का तीक्ष्ण स्मरताप (काम-ताप) निर्वारित हो जाता है । मैं आपके उन्हीं

परम शीतल चरणारविन्दों का आश्रय ग्रहण करती हूँ, मेरे लिये उनके

सिबाय और कोई गति नहीं है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°13

राधाकरावचितपल्लववल्लरीके,

राधापदाङ्कविलसन्मधुरस्थलीके ।

राधायशोमुखरमत्तखगावलीके,

राधा-विहारविपिने रमतां मनो मे ॥13।।

हे मेरे मन ! तू श्रीराधा-करों से स्पर्श की हुई पल्लव-वल्लरी से मण्डित, श्रीराधा पदाङ्गों से शोभित, मनोहर स्थल-युक्त एवं श्रीराधा यशोगान से मुखरित मत्त खगावली-सेवित श्रीराधा कुञ्ज-केलि कानन श्री वृन्दावन में रमणकर !

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°14

कृष्णामृतं चलु विगाढुमितीरिताहं

तावत्सहस्व रजनी सखि यावदेति ।

इत्थं विहस्य वृषभानुसुतेह लप्स्ये

मानं कदा रसदकेलि कदम्ब जातम् ॥14।।

जब वे मुझसे कहेंगी-“अरी सखि ! श्रीकृष्णामृत^१’ अवगाहन करने के लिए चल” । तब मैं हँसकर कहूंगी-“हे सखि ! तब तक धैर्य रखो जब तक राशि नहीं  आ जाती।” (क्योंकि कृष्णामृत-अवगाहन तो रात्रि में ही अधिक उपयुक्त है ?) उस समय मेरे हास-मय वचनों से रसदायक केलि-समूह का एक अनुपम आनन्द उत्पन्न होगा । मैं कब श्रीवृषभानुनन्दिनी से इस रसमय सम्मान की अधिकारिणी होऊँगी ?

१-श्रीकृष्णामृत शब्द यहाँ क्लिष्ट है । ‘कृष्णा’ यमुना का एक नाम है । श्रीप्रियाजी ने सभी से यमुना-स्मान की ही बात कही यो; किन्तु सखी ने परिहास से आनन्व-पृद्धि के लिए कृष्णामृत पद का अर्थ किया ‘श्रीकृष्ण का एकान्त मिलनरस’ । जिसकी प्राप्ति रात्रि को ही सम्भव बताई, यही हास विशेष है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°15

पादांगुली निहित दृष्टिमपत्रपिष्णुं

दूरादुदीक्ष्यरसिकेन्द्रमुखेन्दुबिम्बम् ।

वीक्षे चलत्पदगतिं चरिताभिरामां-

झङ्कारनूपुरवतीं बत कहि राधाम् ।।15।।

अपने प्रियतम रसिक-पुरन्दर श्रीलालजी के मुखचन्द्र मण्डल को दूर से ही देखकर जिन्होंने लज्जा से भरकर अपनी दृष्टि को अपने ही चरणों की अंगुलियों में निहित कर दिया है और फिर जो सलज्ज गति से(निकुञ्ज-भवन की ओर) चल पड़ी हैं, जिससे चरण-नूपुर झंकृत हो उठे हैं। हाय ! वे अभिराम-चरिता श्रीराधा क्या कभी मुझे दर्शन देंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°16

उज्जागरं रसिकनागर सङ्ग रङ्गैः

कुंजोदरे कृतवती नु मुदा रजन्याम् ।

सुस्नापिता हि मधुनैव सुभोजिता त्वं

राधे कदा स्वपिषि मकर लालितांघ्रिः ।।16।।

हे श्रीराधे ! तुमने अपने पियतम रसिक नागर श्रीलालजी के साथ कुब्ज-भवन में आनन्द-विहार करते हुए मोद में ही सारी रात्रि जागकर व्यतीत कर दी हो तब प्रात:काल मैं तुम्हें अच्छी तरह से स्नान कराके मधुर-मधुर भोजन कराऊँ और सुखद शय्या पर पौढ़ाकर अपने कोमल करों से तुम्हारे ललित चरणों का संवाहन करू। मेरा ऐसा सौभाग्य कब होगा?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°17

वैदग्ध्यसिन्धुरनुराग रसैकसिन्धुर्वात्सल्यसिन्धुरतिसान्द्रकृपैकसिन्धुः ।

लावण्यसिन्धुरमृतच्छविरूप सिन्धुः

श्रीराधिका स्फुरतु मे हृदि केलि सिन्धुः ॥17।।

जो विदग्धता की सिन्धु, अनुराग रस को एकमात्र सिन्धु, वात्सल्यभाव की सिन्धु अत्यन्त घनीभूत कृपा की एकमात्र सिन्धु, लावण्य की सिन्धु और छवि रूप अमृत की अपार सिन्धु हैं । वे केलि-सिन्धु श्रीराधा मेरे हृदय में स्फुरित हों।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°18

दृष्ट्वैव चम्पकलतेव चमत्कृताङ्गी,

वेणुध्वनिं क्व च निशम्य च विह्वलाङ्गी।

सा श्यामसुन्दरगुणैरनुगीयमानैः

प्रीता परिष्वजतु मां वृषभानुपुत्री ॥18।।

जो अपने प्रियतम श्रीलालजी को देखते ही चम्पकलता के समान अङ्ग-अङ्ग से चमत्कृत हो उठती हैं, और कभी मन्द-मन्द वेणु-ध्वनि को सुनकर जिनके समस्त अङ्ग विह्वल हो उठते हैं । अहो ! वे श्रीवृषभानुनन्दिनी मेरे द्वारा गाये हुए अपने प्रियतम श्यामसुन्दर के गुणों को श्रवणकर क्या कभी मुझे प्रीतिपूर्वक आलिङ्गन करेंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°19

श्रीराधिके सुरतरङ्गि नितम्ब भागे

काञ्चीकलाप कल हंस कलानुलापैः ।

मञ्जीरसिञ्जित मधुव्रत गुञ्जिताङ्घ्रिः

पङ्केरुहैः शिशिरयस्व रसच्छटाभिः ।।19।।

हे श्रीराधिके ! हे सुरत-केलि-रञ्जित नितम्ब-भागे ! अहा ! आपका यह काञ्ची-कलाप क्या है मानो कल हंसों का कल-कल अनुलाप है, और चरण-कमलों के नूपुरों की मन्द-मन्द झनकार ही मानों मतवाले भ्रमरों का गुञ्जन है । स्वामिनि ! आप अपने इसी मधुर-रस की छटा से

मुझे शीतल कर दीजिए।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°20

श्रीराधिके सुरतरङ्गिणि दिव्यकेलि

कल्लोलमालिनिलसद्वदनारविन्दे ।

श्यामामृताम्बुनिधि सङ्गमतीव्रवेगिन्यावर्त्तनाभि रुचिरे मम सन्निधेहि ॥20।।

हे दिव्यकेलि-तरङ्गमाले! हे शोभमान् वदनारविन्दे ! हे श्रीश्यामसुन्दर-सुधा-सागर-सङ्गमार्थ तीव्र वेगवती ! हे रुचिर नाभिरूप गम्भीर भंवर से शोभायमान् सुरत-सलिते ! ( मन्दाकिनि रूपे ! ) हे श्रीराधिके ! आप मुझे अपना सामीप्य प्रदान कीजिये।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°21

सत्प्रेम सिन्धु मकरन्द रसौघधारा

सारानजस्रमभितः स्रवदाश्रितेषु ।

श्रीराधिके तव कदा चरणारविन्दं

गोविन्द जीवनधनं शिरसा वहामि ॥

जो अपने आश्रित-जनों पर सत्प्रेम ( महाप्रेम ) समुद्र के मधुर मकरन्द-रस की प्रबल धारा अनवरत रूप से चारों ओर से बरसाते रहते हैं तथा जो गोविन्द के जीवन-धन हैं, हे श्रीराधिके ! आपके उन चरणकमलों को मैं कब अपने सिर पर धारण करूंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°22

सङ्केत कुञ्जमनुकुञ्जर मन्दगामिन्यादाय दिव्यमृदुचन्दनगन्धमाल्यम् ।

त्वां कामकेलि रभसेन कदा चलन्तीं

राधेनुयामि पदवीमुपदर्शयन्ती ॥22।।

हे राधे ! आप काम-केलि की उत्कण्ठा से भरकर सङ्केत-कुण्ज में.पधार रही हों और मैं शीतलचन्दन, गन्ध, परिमल, पुष्पमाला आदि दिव्य और मृदु सामग्री लेकर आपको सङ्केत कुञ्ज का लक्ष्य कराती हुई मन्दमन्द कुनञ्जर-गति से आपका अनुगमन करूं, ऐसी कृपा कब करोगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°23

गत्वा कलिन्दतनया विजनावतारमुद्वरर्तयन्त्यमृतमङ्गमनङ्गजीवम् ।

श्रीराधिके तव कदा नवनागरेन्द्रं

पश्यामि मग्न नयनं स्थितमुच्चनीपे ।।23।।

हे श्रीराधिके ! आप स्नान करने के लिए कलिन्द-तमया यमुना के किसी निर्जन घाट पर पधारें और मैं आपके अनङ्ग-जीवनदाता श्रीअङ्गों का उद्वर्तन (उबटन) करूँ’, उस समय (तट के) उच्च कदम्ब पर स्थित नवनागर शिरोमणि श्रीलालजी को आपकी ओर निरखते हुए मैं कब देखूंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°24

सत्प्रेम राशि सरसो विकसत्सरोजं

स्वानन्द सीधु रससिन्धु विवर्द्धनेन्दुम् ।

तच्छीमुखं कुटिल कुन्तलभृङ्गजुष्टं

श्रीराधिके तव कदा नु विलोकयिष्ये ।।24।।

हे श्रीराधिके ! आपका यह श्रीमुख पवित्र प्रेम-राशि-सरोवर का.विकसित सरोज है अथवा आपके अपने जनों को आनन्द देने वाला अमृत है किंबा रससिंधु का विवर्द्धन करने वाला पूर्णचन्द्र ? अहा ! जिस मुख-कमल के आस-पास काली-काली धुंघराली अलकावली मतवाले भृङ्ग-समूहों के

समान लटक रही है, कब आपके इस

मनोहर मुख-कमल का दर्शन करूँगी।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°25

लावण्य सार रस सार सुखैक सारे

कारुण्य सार मधुरच्छविरूप सारे ।

वैदग्ध्य सार रति केलि विलास सारे

राधाभिधे मम मनोखिल सार सारे ॥25।।

एक सर्व सारातिसार स्वरूप है, जो लावण्य का सार, रस का सार और समस्त सुखों का एक मात्र सार है; वही दयालुता के सार से युक्त मधुर छवि के रूप का भी सार है। जो चातुर्य का सार एवं रति-केलिविलास का भी सार है वही राधा नामक तत्व सम्पूर्ण सारों का सार है, इसी में मेरा मन सदा रमा करे।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°26

चिन्तामणिः प्रणमतां व्रजनागरीणां

चूडामणिः कुलमणिर्वृषभानुनाम्नः ।

सा श्याम काम वर शान्ति मणिर्निकुञ्ज

भूषामणिर्हृदय-सम्पुट सन्मणिर्नः ॥26।।

.

जो आश्रित जनों के लिए समस्त फल-दाता चिन्तामणि हैं, जो व्रजनव – तरुणियों की चूङ़ामणि और वृषभानु की कुलमणि हैं जो श्रीश्यामसुन्दर के काम को शान्त करने वाली श्रेष्ठ मणि हैं । वही निकुञ्ज-भवन की भूषण-रूपा मणि तथा मेरे हृदय-सम्पुट की भी दिव्य मणि (श्रीराधा) हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°27

मञ्जुस्वभावमधिकल्पलतानिकुञ्ज

व्यञ्जन्तमद्भुतकृपारसपुञ्जमेव ।

प्रेमामृताम्बुधिमगाधमवाधमेतं

राधाभिधं द्रुतमुपाश्रय साधु चेतः ।।27।।

जिनका स्वभाब बड़ा ही कोमल है और जो सङ्कल्पाधिक काम-पूरक

कल्पलता के निभृत-निकुञ्ज में विराजती हुई अद्भुत कृपा-रस-पुक्ष का ही

प्रकाशन करती रहती हैं। हे मेरे साधु मन ! तू उसी राधा नामक प्रेमामृत

के अगाध और अबाध (अमर्यादित) अम्बुधि का शीघ्र आश्रय कर ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°28

श्रीराधिकां निज विटेन सहालपन्तीं

शोणाधर प्रसमरच्छवि-मन्जरीकाम् ।

सिन्दूर सम्वलित मौक्तिक पंक्ति शोभां

यो भावयेद्दशन कुन्दवतीं स धन्यः ।।

श्रीप्रियाजी अपने प्रियतम श्रीलालजी के साथ कुछ मधुर मधुर बातें कर रही हैं, जिससे उनके लाल-लाल ओठों से सौन्दर्य-राशि निकलनिकल कर चारों ओर फैल रही है । अहा ! जिनके विशाल भाल पर सिन्दूर-रञ्जित मोतियों की पंक्ति शोभायमान है और दन्त पंक्ति कुन्द-कलियों

को भी लज्जित कर रही है। वही धन्य हैं जो ऐसी श्रीप्रियाजी के भावनापरायण हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°29

पीतारुणच्छविमनन्ततडिल्लताभां

प्रौढानुराग मदविह्वल चारुमूर्त्तिम्।

प्रेमास्पदां व्रजमहीपति तन्महिष्योगोंविन्दवन्मनसि तां निदधामिराधाम् ।।29।।

जिनकी छवि पीत और अरुणिमा-मिश्रित स्वर्ण के समान है, आभा.अनन्त विद्युन्माला की दीप्ति के समान है । जिनकी सुन्दर मूर्त्ति प्रौढ अनुराग में विह्वल है और जो ब्रजराज एवं ब्रजरानी के लिए गोविन्द के समान प्रेमपात्र हैं। उन श्रीराधा को मैं अपने मन में धारण करती हूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°30

निर्मायचारुमुकुटं नव चन्द्रकेण

गुञ्जाभिरारचित हारमुपाहरन्ती।

वृन्दाटवी नवनिकुञ्ज गृहाधिदेव्याः

श्रीराधिके तव कदा भवितास्मि दासी।।30।।

स्वामिनि ! मैं नवीन-नवीन मयूर-चन्द्रिकाओं से निर्मित सुन्दर मुकुट एवं गुञ्जा-रचित हार आपके निकट पहुँचाऊँ। वृन्दावन नव-निकुञ्जगृह की अधिदेवी हे श्रीराधे ! मैं आपकी ऐसी दासी कब होऊँगी ?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°31

सङ्केत कुञ्जमनुपल्लवमास्तरीतुं

तत्तत्प्रसादमभित. खलु संवरीतुम् ।

त्वां श्यामचन्द्रमभिसारयितुं धृताशे

श्रीराधिके मयि विधेहि कृपा कटाक्षम् ॥31।।

स्वामिनि ! मैंने केवल यही आशा धारण कर रखी है कि उन-उन संकेत-कुजों में नवीन-नवीन पल्लवों की सुन्दर शय्या बिछाऊँ और वहाँ पर श्यामचन्द्र (श्रीलालजी) से मिलन कराने के लिए तुम्हें छिपाकर ले जाऊँ। तब आप मेरी इस सेवा से प्रसन्न हो उठें। हे श्रीराधिके ! आप तो मुझ पर अपने इतने ही कृपा-कटाक्ष का विधान कीजिए।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°32

दूरादपास्य स्वजनान्सुखमर्थे कोटि

सर्वेषु साधनवरेषु चिरं निराशः ।

वर्षन्तमेव सहजाद्भुत सौख्य धारां

श्रीराधिका चरणरेणुमहं स्मरामि ॥32।।

मैंने अपने स्वजन-सम्बन्धी वर्ग और कोटि-कोटि सम्पत्तियों के सुख को दूर से ही त्याग दिया है तथा (परमार्थ-सम्बन्धी) समस्त श्रेष्ठ साधनों में भी मेरी चिर निराशा हो चुकी है। अब तो मैं स्वभावतया अद्भुत सुख की धारा का हो वर्षण करने वाले श्रीराधिका-चरण-रेणु का स्मरण करती हूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°33

वृन्दाटवी प्रकट मन्मथ कोटि मूर्त्ते

कस्यापि गोकुलकिशोर निशाकरस्य ।

सर्वस्व सम्पुटभिव स्तनशातकुम्भ

कुम्भद्वयं स्मर मनो वृषभानुपुत्र्याः ॥33।।

हे मेरे मन ! तू श्रीवृषभानुनन्दिनी के स्वर्ण-कलशों के समान युगल स्तनों का स्मरण कर । जो वृन्दावन में प्रकट रूप से विराजमान कोटि कन्दर्प-मूर्त्ति किन्हीं गोकुल-किशोरचन्द्र के सर्वस्व-सम्पुट के समान हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°34

सान्द्रानुराग रससार सरः सरोजं

किं वा द्विधा मुकुलितं मुखचन्द्र भासा ।

तन्नूतन स्तन युगं वृषभानुजायाः

स्वानन्द सीधु मकरन्द घनं स्मरामि ॥34।।

घनीभूत प्रेम-रस-सार-सरोवर का एक सरोज मानो मुखचन्द्र का

प्रकाश पाकर दो रूपों में मुकुलित हो गया है और जो स्वानन्द-अमृत के

मकरन्द का सघन स्वरूप है, मैं श्रीवृषभानुनन्दिनी के उस नवीन स्तन-युग्म

का स्मरण करती हूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°35

क्रीडासरः कनक पङ्कज कुड्मलाय

स्वानन्दपूर्ण रसकल्पतरोः फलाय ।

तस्मै नमो भुवनमोहन मोहनाय,

श्रीराधिके तव नवस्तन मण्डलाय ।।35।।

श्रीराधिके ! केलि-सरोवर की कनक-पङ्कज-कली के समान अथवा

आपके अपने ही आनन्द से परिपूर्ण रसकरूपतरु के फल के समान त्रिभुवनमोहन श्रीमोहनलाल का भी मोहन करने वाले आपके नवीन स्तन-मण्डल

कों नमस्कार है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°36

पत्रावलीं रचयितुं कुचयोः कपोले

बद्धुं विचित्र कबरीं नव मल्लिकाभिः ।

अङ्गं च भूषयितुमाभरणैर्धृताशे

श्रीराधिके मयि विधेहि कृपावलोकम् ।।36।।

हे श्रीराधिके ! मैंने तो केवल यही आशा धारण कर रखी है और आप भी मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि का ऐसा ही विधान करें कि मैं आपके युगल-कुच-मण्डल और कपोलों पर  (चित्र-विचित्र) पत्रावली-रचना करू । मल्लिका के नवीन-नवीन पुष्पों को गूंथकर विचित्र रीति से आपका कबरीबन्धन करू’ और आपके सुन्दर सुकोमल अङ्गों में तदनुरूप आभरप आभूषित करूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°37

श्यामेति सुन्दरवरेति मनोहरेति

कन्दर्प-कोटि-ललितेति सुनागरेति ।

सोत्कण्ठमह्वि गृणती मुहुराकुलाक्षी

सा राधिका मयि कदा नु भवेत्प्रसन्ना ।।37।।

जो दिवस-काल में “हे श्याम ! हा सुन्दर वर ! हा मनोहर ! हे

कन्दर्प-कोटि-ललित ! अहो चतुर शिरोमणि !” ऐसे उत्कण्ठा-युक्त शब्दों से

बारम्बार गान करती हैं । वे आकुल-नयनी श्रीराधिका मुझ पर कब

प्रसन्न होंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°38

वेणुः करान्निपतितः स्खलितं शिखण्डं

भ्रष्टं च पीतवसनं व्रजराज सूनोः ।

यस्याः कटाक्ष शरपात विमूर्च्छितस्य

तां राधिका परिचरामि कदा रसेन ॥38।।

जिनके नयन-वाणों की चोट से श्रीव्रजराजकुमार की मुरली हाथ से छूट गिरती है। सिर का मोर-मुकुट खिसक चलता है और पीताम्बर भी स्थान-च्युत हो जाता है; यहाँ तक कि वे मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं। अहा ! क्या मैं कभी ऐसी श्रीराधिका की प्रेम-पूर्वक परिचर्या करूँगी!

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°39

तस्या अपार रस-सार विलास-मूर्तेरानन्द-कन्द परमाद्भुत सौम्य लक्ष्म्याः ।

ब्रह्मादि दुर्गमगतेर्वृषभानुजायाः

कैङ्कय्र्यमेव ममजन्मनि-जन्मनि स्यात् ।।39।।

जो अपार रस – सार की विलास-मूर्त्ति, आनन्द की मूल एवं परमाद्भुत सुख की सम्पत्ति हैं एवं जिनकी गति ब्रह्मादि को भी दुर्गम है। उन श्रीवृषभानुनन्दिनीजू का कैङ्कर्य्य ही मुझे जन्म-जन्मान्तरों में प्राप्त

होता रहे।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°40

पूर्णानुराग रसमूर्त्ति तडिल्लताभं

ज्योतिः परं भगवतो रतिमद्रहस्यम् ।

यत्प्रादुरस्ति कृपया वृषभानु गेहे

स्पास्किङ्करी भवितुमेव ममाभिलाषः ॥40।।

एक रहस्यमयी परम ज्योति है । जो परात्पर परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण को भी अपने आप में रमा लेती है। जिसकी कान्ति विद्युल्लता के समान देदीप्यमान् है और जो पूर्णतम अनुराग-रस की मूर्ति है । अहो !

कृपापूर्वक ही वह श्रीवृषभानु-भवन में प्रादुर्भूत हुई है। मेरी तो यही अभिलाषा है कि उसी की दासी हो रहूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°41

प्रेमोल्लसद्रस विलास विकास कन्दं

गोविन्द लोचन वितृप्त चकोर पेयम् ।

सिञ्चन्तमद्भुत रसामृत चन्द्रिकौरघैः

श्रीराधिकावदन-चन्द्रमहं स्मरामि ॥41।।

जो प्रेम से उल्लसित रम-विलास का विकास बीज है एवं गोविन्द के अतृप्त लोचन-चकोरों के लिये पेय स्वरूप है, उसी अद्भुत रसामृतचन्द्रिका-धारा-सिञ्चन कारी श्रीराधिका-मुख-चन्द्र का मैं स्मरण करती हूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°42

सङ्कत कुञ्ज निलये मृदुपल्लवेन

क्लृप्ते कदापि नव सङ्ग भयत्रपाढयाम् ।

अत्याग्रहेण करवारिरुहे गृहीत्वा

नेष्ये विटेन्द्र-शयने वृषभानुपुत्रीम् ॥42।।

मैं, रहस्य निकुन्ज गृह में कोमल-पल्लव-रचित रसिकेन्द्र-शय्या पर

नवीन सङ्गम के भय एवं लज्जा से भरी हुई श्रीवृषभानु-किशोरी को करकमल पकड़कर अत्यन्त आग्रह के साथ शयन-गृह में कभी ले जाऊँगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°43

सद्गन्ध माल्य नवचन्द्र लवङ्ग सङ्ग

ताम्बूल सम्पुटमधीश्वरि मां वहन्तीम् ।

श्यामं तमुन्मद-रसादभि-संसरन्ती

श्रीराधिके कारणयानुचरीं विधेहि ।।43।।

 अधीश्वरि ! जब आप रस से उम्मद होकर श्रीलालजी के समीप पधारने लगें, उस समय मैं सुन्दर सुगन्धित मालाएं और नव-कर्पूर लवङ्गयुक्त ताम्बूल-सम्पुट (डवा) ले कर चलूं । हे श्रीराधिके ! कृपा करके आप.मुझे अपनी ऐसी ही अनुचरी बनाइये ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°44

श्रीराधिके तव नवोद्गम चारुवृत्त

वक्षोजमेव मुकुलद्वय लोभनीयम् ।

श्रीणीं दधद्रस गुणैरुपचीयमानं

कैशोरकं जयति मोहन-चित्त-चोरम् ॥44।।

हे श्रीराधिके ! चारु, वर्तुल, मुकुलित स्तन-द्वय द्वारा लोभनीय, नितम्ब विशिष्ट युक्त रस-स्वरूप श्रीकृष्ण के नित्य सेवनादि गुणों द्वारा बर्द्धमान् एवं मोहन के भी चित्त का हरण करने वाला आपका कैशोर जययुक्त हो रहा है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°45

संलापमुच्छलदनङ्ग तरङ्गमाला

संक्षोभितेन वपुषा व्रजनागरेण ।

प्रत्यक्षरं क्षरदपार रसामृताब्धिं

श्रीराधिके तव कदा नु श्रृणोम्यदूरात् ।।45।।

अनेकों अनङ्गों की तरङ्गमाला उच्छलित हो-होकर जिनके श्रीवपु को आन्दोलित कर रही है. ऐसे व्रजनागर श्रीलालजी के साथ आप संलाप करती हों । जिस संलाप के अक्षर-अक्षर में अपार रसामृत-सिन्धु झरता

रहता है । हे स्वामिनि ! मैं समीप ही स्थित होकर आपके उस महामधुर संलाप को कब सुनूंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°46

अङ्क स्थितेपि दयिते किमपि प्रलापं

हा मोहनेति मधुरं विदधत्यकस्मात् ।

श्यामानुराग मदविह्वल मोहनाङ्गी

श्यामामणिजयति कापि निकुञ्ज सीम्नि ।।46।।

यद्यपि अपने प्रियतम की गोद में स्थित हैं, फिर भी अकस्मात् ‘हा मोहन !’ ऐसा मधुर प्रलाप कर उठती हैं। ऐसी श्याम-सुन्दर के अनुरागमद से विह्वल मोहना ही कोई श्यामामणि निकुञ्ज-प्रान्त में जययुक्त विराजमान हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°47

कुजान्तरे किमपि जात-रसोत्सवायाः

श्रुत्वा तदालपित सिञ्जित मिश्रितानि ।

श्रीराधिके तब रहः परिचारिकाहं

द्वारस्थिता रस-हृदे पतिता कदा स्याम् ।।47।।

हे राधिके ! किसी अभ्यन्तर कुञ्ज-भवन में आप अपने प्रियतम के साथ किसी अनिर्वचनीय रसोत्सव में संलग्न हों, जिससे भूषण ध्वनि मिश्रित आपके मधुर आलाप का स्वर सुनाई दे रहा हो और मैं आपको एकान्त परिचारिका, कुञ्जद्वार में स्थित होकर उसे सुनें । और उसे सुनते ही प्रेम-विह्वल होकर रस के सरोवर में डूब जाऊँ । हे स्वामिनि ! ऐसा कब होगा?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°48

वीणां करे मधुमतीं मधुर-स्वरां तामाधाय नागर-शिरोमणि भाव-लीलाम् ।

गायन्त्यहो दिनमपारमिवाश्रु-वर्षैदुःखान्नयन्त्यहह सा हृदि मेऽस्तु राधा ॥48।।

अहो ! जो स्वर-लहरी भरी अपनी मधुमती नाम्नी वीणा को उठाकर कर-कमलों में धारण करके अपने प्रियतम नागर-शिरोमणि श्रीलालजी.की भाव-लीलाओं को गाती रहती हैं और बड़ी कठिनता से अपार सा दिन अश्रुओं को वर्षा द्वारा व्यतीत करती हैं। अहह ! ऐसी प्रेम-विह्वला श्रीराधा मेरे हृदय में निवास करें।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°49

अन्योन्यहास परिहास विलास केली

वैचित्र्य जृम्भित महारस-वैभवेन ।

वृन्दावने विलसतापहृतं विदग्धद्वन्द्वेन केनचिदहो हृदयं मदीयम् ॥49।।

अहो ! पारस्परिक हास-परिहास युक्त विविध-विलास-केलि की विचित्रता से उच्छलित महा रस-विभव के द्वारा श्रीवृन्दावन में विलास करने वाले किन्हीं विदग्ध युगल ने मेरे हृदय का अपहरण कर लिया है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°50

महाप्रेमोन्मीलन्नव रस सुधा सिन्धु लहरी परीवाहैर्विश्वं स्नपयदिव नेत्रान्त नटनैः ।

तडिन्माला गौरं किमपि नव कैशोर मधुरं पुरन्ध्रीणां चूडाभरण नवरत्नं विजयते ॥50।।

जिनके चपल नेत्रों का नर्तन ही महान्तम प्रेम के विकास का नूतनरस से परिपूर्ण सुधासिन्धु है । जिसकी लहरियों के प्रबाह से मानों विश्व को स्नान करा रही हैं। जो विद्युत-पंक्ति के समान गौर और समस्त ब्रजनव तरुणियों की नव-रत्न हैं- शिरोमणि भूषण हैं, वे कोई नव मधुर किशोरी सर्वोपरिता को प्राप्त है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 51

अमन्द प्रेमाङ्कश्लथ सकल निर्बन्धहृदयं

दयापारं दिव्यच्छवि मधुर लावण्य ललितम् ।

अलक्ष्यं राधाख्यं निखिलनिगमैरप्यतितरां रसाम्भोधेः सारं किमपि सुकुमारं विजयते ।।51।।

तीव्र प्रेम के कारण जिनके हृदय के समस्त बन्धन (आग्रह) शिथिल हो चुके हैं, जो दया की सीमा हैं एवं जिनकी दिव्य-छवि लावण्य-माधुर्य से अति-ललित हो रही है, वे निखिल-निगमों को भी अत्यन्त अलक्षित,

रस-समुद्र की सार-स्वरूपा कोई एक अनिर्वचनीय सुकुमारी है । उन श्रीराधा की जय हो, विजय हो ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 52

दुकूलं विभ्राणामथ कुच तटे कंचुक पटं

प्रसादं स्वामिन्याः स्वकरतल दत्तं प्रणयतः।

स्थितां नित्यं पाश्र्व विविध परिचर्य्यैक चतुरां

किशोरीमात्मानं किमिह सुकुमारीं नु कलये ।।52।।

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अहो! मैं अपनी स्वामिनीजी के निज कर-कमलों के स्नेह-पूर्वक दिए हुए प्रसाद रूप दुकूल और कञ्चुकि-पट को अपनी कुच-तटी में धारण करूंगी और सदा अपनी स्वामिनी के पाव में स्थित रहकर विविध परिचाओं में चतुर सुकुमारी किशोरी के रूप में अपने आपको क्या यहाँ देखूँगी।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 53

विचिन्वन्ती केशान् क्वचन करजैः कंचुक पटं क्व चाप्यामुञ्चन्ती कुच कनक दीव्यत्कलशयोः ।

सुगुल्फे न्यस्यन्ती क्वचन मणि मञ्जीर युगलं कदा स्यां श्रीराधे तव सुपरिचारिण्यहमहो।।53।।

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अहो श्रीराधे ! मैं आपकी ऐसी सुपरिचारिका कब बनूंगी? जो कभी अपने कर-नखों से आपके केशों को सुलझाऊँ ? कभी आपके कनककलशों के समान गोल-गोल देदीप्यमान कुच-कलशों पर कञ्चुकि-पट धारण कराऊँ ? तो कभी आपके दोनों सुहावने गुल्फों में मणि के मञ्जीर युगल (नूपुर) पहनाऊँ?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 54

अतिस्नेहादुच्चैरपि च हरिनामानि गृणतस्तथा सौगन्धाद्यैर्बहुभिरुपचारैश्च यजतः।

परानन्दं वृन्दावनमनुचरन्तं च दधतो मनो मे राधायाः पद मृदुल पद्मे निवसतु ॥54।।

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मैं अत्यन्त स्नेह-पूर्वक उच्च स्वर से श्रीहरि के नामों का गान करती रहूँ; सुगन्ध आदि अनेक उपचारों से उनका पूजन करती रहै तथा श्रीवृन्दावन में अनुचरण करती हुई परमानन्द को धारण करती रहूँ, इसके

साथ-साथ मेरा मन निरन्तर श्रीराधिका के मृदुल पाद – पद्मों में बसा रहे ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 55

निज प्राणेश्वर्य्या यदपि दयनीयेयमिति मां

मुहुश्चुम्बत्यालिङ्गति सुरत मद माध्चव्या मदयति ।

विचित्रां स्नेहर्द्धि रचयति तथाप्यद्भुत गतेस्तवैव श्रीराधे पद रस विलासे मम मनः।।55।।

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‘मेरी प्राणेश्वरी की यह दया पात्र है’, ऐसा जानकर अद्भुत गतिशोल प्रियतम मेरा बार-बार चुम्बन करते हैं, और सुरत-मदिरा से मुझे उन्मद बना देते हैं । यद्यपि वे इस प्रकार विचित्र स्नेह-वैभव की रचना करते हैं; तथापि हे श्रीराधे ! मेरा मन तो आपके ही श्रीचरणों के रसबिलास में रहता है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 56

प्रीतिं कामपि नाम मात्र जनित प्रोद्दाम रोमोद्गमां राधा माधवयोः सदैव भजतोः कौमार एवोज्वलाम् ।

वृन्दारण्य नव-प्रसून निचयानानीय कुञ्जान्तरे गूढं शैशय खेलनैर्बत कदा कार्यो विवाहोत्सवः ॥56।।

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श्रीराधा – माधव किसी अनिर्वचनीय उज्ज्वल प्रीति – पूर्ण कौमार अवस्था का ही सेवन करते रहते हैं, जिनमें परस्पर के नामोच्चारण-मात्र में ही प्रफुल्लता-पूर्वक समस्त गेम पुलकित हो उठते हैं । अहो ! क्या कभी ऐसा होगा कि मैं श्रीवृन्दावन से नवीन-नवीन पुष्प चयन करवे लाऊँ, तथा

शैशवावस्था के खेल ही खेल में किसी गूढ़ कुञ्ज के भीतर हर्ष के साथ दोनों का विवाहोत्सव करूँ?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 57

विपञ्चित सुपञ्चमं रुचिर वेणुना गायता

प्रियेण सहवीणया मधुरगान विद्यानिधिः ।

करीन्द्रवनसम्मिलन्मद करिण्युदारक्रमा कदा नु वृषभानुजा मिलतु भानुजा रोधसि ॥57।।

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जैसे मदमाती करिणी वन में गजराज से मिलन प्राप्त करने के लिये उदार गति से आती हो, ऐसे ही जो मद-गज-माती गति से पाद-विन्यास करती हुई श्रीयमुना के पुलिन पर आ पधारी हैं । तथा अपनी वीणा में सुमधुर गान करती हैं, क्योंकि इस कला की आप निधि हैं। अहा ! आपकी

 वीणा के पञ्चम स्वर में मिलाकर श्रीलालजी ने भी अपने वेणु की तान

छेड़ दी है । ऐसी श्रीवृषभानु-नन्दिनी अपने प्रियतम के साथ मुझे यमुना-तट पर कब मिलेंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 58

सहासवर मोहनाद्भुत विलास रासोत्सवे

विचित्रवर ताण्डव श्रमजलाद्री गण्डस्थलौ।

कदा नु वरनागरी रसिक शेखरौ तौ मुदा

भजामि पद लालनाल्ललित जीवनं कुर्वती ।।58।।

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परम मनोहर हास-युक्त अद्भुत विलास-रासोत्सव में विचित्र और

उत्तमोत्तम नृत्य की गतियों के लेने से जिनके युगल गण्डस्थल श्रम-जल (प्रम्वेद) से गीले हो रहे हैं । जन नागरी-मणि श्रीप्रियाजी और रसिकशेखर श्रीलालजी के पद-कमलों के लालन से जीवन को सुन्दर बनाती हुई, कब आनन्द पूर्वक उनका भजन करूँगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स° 59

वृन्दारण्य निकुंज मंजुल गृहेष्वात्मेश्वरीं मार्गयन् हा राधे सविदग्ध दर्शित पथं किं यासिनेत्यालपन् ।

कालिन्दो सलिले च तत्कुच तटी कस्तूरिका पङ्किले स्नायं स्नायमहो कुदेहजमलं जह्यां कदा निर्मलः ॥59।।

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“हा राधे ! मैंने चतुर-सङ्गत द्वारा जो पथ आपको दिखलाया है, उस पर न चलोगी क्या ?” मै इस प्रकार विलाप करती और श्रीवृन्दावन के मंजुल निकुञ्ज-गृहों में आपको खोजती हुई फिरूँ तथा आपकी कुच-तटीचर्चित कस्तूरी से पङ्किल कालिन्दी-सलिल में बारम्बार स्नान करके अपने कुदेह-जनित मल को त्यागकर कब निर्मल होऊंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°60

पादस्पर्श रसोत्सवं प्रणतिभिर्गोविन्दमिन्दीवर

श्यामं प्रार्थयितु सुमंजुल रहः कुञ्जाश्च संमार्जितुम् ।

माला चन्दन गन्ध पूर रसवत्ताम्बूल सत्पानकान्यादातु च रसैक दायिनि तव प्रेष्या कदा स्यामहम् ॥60।।

रस की एकमात्र दाता मेरी स्वामिनि ! प्रणति के द्वारा आपके चरणों का स्पर्श ही जिनके लिये रसोत्सव रूप है, ऐसे इन्दीवर श्याम को आपके प्रति प्रार्थित करूं, सुन्दर सुमञ्जुल एकान्त निकुञ्ज-भवन का

मार्जन करूँ, तथा पुष्प-माल, चन्दन, इत्रदान (परिमल पात्र ), रस युक्त

ताम्बूल और अनेक प्रकार के सुस्वादु पेय पदार्थ आपके कुच-भवन में पहुँचाऊं, भला, कभी ऐसी टहल करने वाली दासी रूप में आप मुझे स्वीकार करेंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°61

लावण्यामृत वार्तया जगदिदं संप्लावयन्ती शरद्राका चन्द्रमनन्तमेव वदनं ज्योत्स्नाभिरातन्वती।

श्री वृन्दावनकुञ्ज मंजु गृहिणी काप्यस्ति तुच्छामहो कुर्वाणाखिल साध्य साधन कयां दत्वा स्वदास्योत्सवम्।।61।।

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जो इस जगत् को अपनी सौन्दर्य-सुधा-वाणी से संप्लावित करती हैं तथा जो अपने श्रीमुख की ज्योत्स्ना से मानो शरत्कालीन अनन्त चन्द्रमाओं का प्रकाश विस्तार करती हैं । अहो ! आश्चर्य है कि श्रीवृन्दावन

मजुल-निकुञ्ज-भवन की उन्हीं अनिर्वचनीय स्वामिनी ने अपनी सेवा का आनन्द देकर समस्त साध्य-साधन कथाओं को मेरे लिये तुच्छ कर दिया है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°62

दृष्ट्या क्वचन विहिता म्त्रेडने नन्दसूनोः

प्रत्याख्यानच्छलत उदितोदार संकेत-देशा।

धूर्तेन्द्र त्वद्भयमुपगता सा रहो नीपवाटयां नैका गच्छेत्कितव कृतमित्यादिशेत्कर्हि राधा ॥62।।

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हे कितव ! हे धूर्त्तशिरोमणि ! आपके दो-तीन-बार प्रार्थना करने पर (उसके उत्तर रूप में) जिन्होंने अपनी दृष्टि के द्वारा उदार संकेत स्थान का निर्देश कर दिया है ऐसी श्रीराधा तुम्हारे वचनों की आशङ्कावश (भयवश) तुमसे मिलने न जा सकेंगी; तब अनुचरी रूप में सङ्ग चलने के लिये मुझे कब आदेश करेंगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°63

सा भ्रूनर्तन चातुरी निरुपमा सा चारुनेत्राञ्चले लीला खेलन चातुरी वरतनोस्तादृग्वचश्चातुरी।

संकेतागम चातुरी नव नव क्रीडाकला चातुरी

राधाय। जयतात्सखीजन परीहासोत्सवे चातुरी ।।63।।

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अहा ! श्रीराधा की निरुपम भृकुटियों की वह नर्तन् चातुरी! सुन्दर-सुन्दर नयन-कोरों का वह लीला-पूर्ण कटाक्ष ! एवं वर-वदनी

श्रीस्वामिनी की मनोहर वचन-चातुरी ! एकान्त में आगमन-निर्गमन की चातुरी के साथ-साथ नवीन केलि-कलाओं की विदग्धता और सखिजनों के हास-परिहास आनन्द की चातुरी ! सभी एक से एक बढ़कर हैं-सभी उत्कृष्ट हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°64

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उन्मीलन मिथुनानुराग गरिमोदार स्फुरन्माधुरी धारा-सार धुरीण दिव्य ललितानङ्गोत्सवः खेलतोः ।

राधा-माधवयोः परं भवतु नः चित्ते चिरार्त्तिस्पृशो कौमारे नव-केलि शिल्प लहरी शिक्षादि दीक्षा रसः ॥64।।

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श्रीराधा-माधव की कौमार-कालीन नवीन-केलि चातुरो-तरङ्गों की परस्पर उपदेश-रूप शिक्षा-दीक्षा का रस परावधि रूप से मेरे चित्त में उदित हो । अहा ! कितने मधुर हैं, ये थीराधा माधव ? दोनों के हृदयों में महानतम उदार अनुराग का विकाश हो रहा है, जिससे माधुर्य-धारा की सारधुरीण का स्फुरण हो रहा है । वह धुरीण क्या है ? दोनों की दिव्यतम ललित अनङ्ग उत्सव की क्रीड़ा, जो कुमार अवस्था में ही चित्त में बड़ी भारी आर्त्ति को उत्पन्न कर रही है, जिससे दोनों परस्पर एक दूसरे के श्रीअङ्गों का बारम्बार स्पर्श कर रहे हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°65

कदा वा खेलन्तौ वजनगर वीथीषु हृदयं

हरन्तौ श्रीराधा व्रजपति कुमारौ सुकृतिनः ।

अकस्मात् कौमारे प्रकट नव कैशोर-विभवौ

प्रपश्यन्पूर्णः स्यां रहसि परिहासादि निरतौ ॥65।।

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क्या कभी मैं श्रीराधा और श्रीव्रजपति-कुमार का दर्शन करके पूर्णता

को प्राप्त होऊँगी? जो किसी समय ब्रज-नगर की वीथियों में खेलते-फिरते

एकान्त पाकर अकस्मात् कोमारावस्था को त्याग कर नव किशोरता के वैभव को प्रकट करके दिव्य हास-परिहास में संलग्न हो गये हैं एवं जो अपनी ऐसी प्रेम-केलि से सुकृती-जनों के हृदय का अपहरण कर रहे हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°66

धम्मिल्लं ते नव परिमलैरुल्लसत्फुल्ल मल्लीमालं भालस्थलमपि लसत्सान्द्र सिन्दूर-बिन्दुम् ।

दीर्घापाङ्गच्छविमनुपमां चन्द्रांशु हासं प्रेमोल्लासं तव तु कुचयोर्द्वन्द्वमन्तः स्मरामि ॥66।।

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हे श्रीराधे ! सौरभ – उल्लसित – नूतन फुल्लमल्ली – माल – गुम्फित

आपकी वेणी, ललाट-पटल पर शोभित अत्यन्त लाल सिन्दूर विन्दु, बड़े-बड़े

नयनों की अनुपम कटाक्षच्छवि, प्रेमोल्लास-पूर्ण चाँदनी के समान मनोहर

हास और आपके युगल बक्षोज की रहस्यता का मैं स्मरण करती हूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°67

लक्ष्मी कोटि विलक्ष्य लक्षण लसल्लीला किशोरीशतैराराध्यं व्रजमण्डलेति मधुरं राधाभिधानं परम् ।

ज्योतिः किञ्चन सिञ्चदुज्ज्वलरस प्राग्भावमाविर्भवद्राधे चेतसि भूरि भाग्य विभवैः कस्याप्यहो जृम्भते ॥67।।

जिन व्रज-सुन्दरियों की लीलाओं में कोटि-कोटि लक्ष्मी-समूहों के विशेष लक्षणीय लक्षण शोभा पाते हैं, उन्हीं शत-शत किशोरियों का जो आराध्य है, एवं उज्ज्वल रस के प्रारम्भिक भाव का सिञ्चन करता हुआ देदीप्यमान (ज्योति-स्वरूप ) अति मधुर, श्रेष्ठ, श्रीराधा नामक तत्व है। वह [श्रीराधा तत्व ] ब्रजमण्डल-स्थित किसी भाग्यवान् ( महापुरुष ) के ध्यान-विभावित चित्त में महाभाग्य वैभव से ही विस्तार को प्राप्त होता है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°68

तज्जीयान्नव यौवनोदय महालावण्य लीलामयं सान्द्रानन्द घनानुराग घटित श्रीमूर्त्ति सम्मोहनम् ।

वृन्दारण्य निकुंज-केलि ललितं काश्मीर गौरच्छवि श्रीगोविन्द इव व्रजेन्द्र गृहिणी प्रेमैक पात्रं महः ॥68।।

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जो अपने नवीन यौवन के उदय-काल में महान्तम सौन्दर्य-लीला से युक्त है तथा जो घनीभूत आनन्द एवं घनानुराग-रचित मूर्त्ति श्रीलालजी का सम्मोहन कर लेता है, जिसकी गौर छवि नवीन केशर के समान है, जो श्रीवृन्दावन-निकुञ्ज-केलि में अति ललित है और जो ब्रजेन्द्र-गृहिणी यशोदा

किंवा कीर्तिदा के लिये श्रीगोविन्द के समान प्रेम का एक ही पात्र है, वह कोई अनिर्वचनीय तेज जय-जयकार को प्राप्त हो रहा है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°69

प्रेमानन्द-रसैक-वारिधि महा कल्लोलमालाकुला व्यालोलारुण लोचनाञ्चल चमत्कारेण संचिन्वती।

किञ्चित् केलिकला महोत्सवमहो वृन्दाटवी मन्दिरे नन्दत्यद्भुत काम वैभवमयी राधा जगन्मोहिनी ॥69।।

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अहो ! प्रेमानन्द-रस के महान् समुद्र की तरङ्ग-मालाओं से आकुल एवं अपने अरुण और चम्चल नेत्राञ्चलों के चमत्कार (कटाक्ष) से केलिकला-महोत्सव का सिञ्चन करती हुई अद्भुत प्रेम-वैभवमयी जगन्मोहिनी अनिर्वचनीय श्रीराधा वृन्दावन के निकुञ्ज मन्दिर में आनन्द-बिहार

करती हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°70

वृन्दारण्य निकुञ्ज सीमनि नव प्रेमानुभाव भ्रमद्भ्रूभङ्गी लव मोहित व्रज मणिर्भक्तैक चिन्तामणिः ।

सान्द्रानन्द रसामृत स्रवमणिः प्रोद्दाम विद्युल्लता कोटि-ज्योतिरुदेति कापि रमणी चूडामणिर्मोहिनी ॥70।।

जिन्होंने नवीन प्रेमानुभाव-प्रकाशन-पूर्ण चञ्चल भ्र-भङ्गी के लेगमात्र से ही ब्रज-मणि श्रीलालजी को मोहित कर लिया, जो भक्तों के मनोरथों को पूर्ण करने के लिये एक ही चिन्तामणि हैं, जो घनीभूत आनन्द रसामृत की निर्झरिणी-रूपा मणि हैं और जिनकी अङ्ग-ज्योति अत्यन्त प्रकाशमान कोटि-कोटि विद्युल्लताओं के समान है, वे कोई अनिर्वचनीया महा-मोहिनी रमणी-चूड़ामणि वृन्दावन की निकुञ्ज-सीमा में उदित हो रही हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°71

लीलापाङ्ग तरङ्गतैरुदभवन्नेकैकशः कोटिशः

कन्दर्पाः पुरदर्पटंकृत महाकोदण्ड विस्फारिणः ।

तारुण्य प्रथम प्रवेश समये यस्या महा माधुरीधारानन्त चमत्कृता भवतु नः श्रीराधिका स्वामिनी ॥71।।

जिनके तरुणावस्था के प्रथम प्रवेश-काल में ही हाव-भाव पूर्वक किये गये एक-एक अपाङ्ग-नर्तन से अत्यन्त दर्प-पूर्ण महा कोदण्ड की टङ्कार को शनैः-शनैः विस्फारित करने वाले कोटि-कोटि कन्दर्प उत्पन्न होते हैं, ऐसी महामाधुरी की अनन्त धाराओं से चमत्कृत श्रीराधिका हो मेरी स्वामिनी हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°72

यत्पादाम्बुरुहेक रेणु-कणिकां मूध्र्ना निधातुं न हि प्रापुर्ब्रह्म शिवादयोप्यधिकृतिं गोप्यैक भावाश्रयाः ।

सापि प्रेमसुधा रसाम्बुधिनिधी राधापि साधारणीभूता कालगतिक्रमेण बलिना हे दैव तुभ्यं नमः ॥72।।

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ओ दैव ! तुझे नमस्कार है ! धन्य है तेरी महिमा ! जिससे प्रेरित होकर काल-क्रम के प्रभाव-वश प्रेमात-रस-समुद्र श्रीलालजी की भी निधि.श्रीराधिका साधारण (सुलभ) हो गई हैं ! अहो ! जो गोपियों के भावों को

एक मात्र आश्रय हैं और जिनकी चरण-कमलों की रेणु के कण-मात्र को

ब्रह्मा, शिव आदि भी अपने सिर पर धारण करने की इच्छा रखते हुए भी प्राप्त नहीं कर पाते।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°73

दूरे स्निग्ध परम्परा विजयतां दूरे सुहृन्मण्डली भृत्याः सन्तु विदूरतो ब्रजपतेरन्य प्रसंगः कुतः।

यत्र श्रीवृषभानुजा कृत रतिः कुञ्जोदरे कामिना, द्वारस्था प्रिय किडुरी परमहं श्रोष्यामि कांची ध्वनिम् ॥73।।

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जहाँ कुञ्ज-भवन अभ्यन्तर भाग में परम-प्रेमी श्रीलालजी एवं श्रीवृषभानुनन्दिनीजू को रति-केलि होती रहती है, ब्रजपति श्रीलालजी के स्नेहीजनों की परम्परा वहाँ से दूर ही विराजे, एवं उनके सखा-गण भी दूर ही विराजमान रहें । भृत्य-वर्ग के लोग तो और भी दूर रहें । (इन लोगों के अतिरिक्त) अन्य-जनों का तो वहाँ प्रसङ्ग ही उपस्थित नहीं होता! यहाँ तो केवल उनकी परम-प्रिय किङ्करी ही द्वार पर स्थित रहकर विहारावसर क्वणित काञ्ची-ध्वनि श्रवण करती है या मैं श्रवण करती हूँ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°74

गौराङ्गे म्रदिमा स्मिते मधुरिमा नेत्रांचले द्राघिमा वक्षोजे गरिमा तथैव तनिमा मध्ये गतौ मन्दिमा ।

श्रोण्यां च प्रथिमा भ्रुवोः कुटिलिमा बिम्बाधरे शोणिमा श्रीराधे हृदि ते रसेन जडिमा ध्यानेऽस्तु मे गोचरः ॥74।।

हे श्रीराधे ! आपके गौर-अङ्गों की मृदुलता, मन्द-मुस्कान की माधुरी, नेत्राञ्चलों की दीर्घता, उरोजों की पीनता, कटि-प्रान्त की

क्षीणता, पाद-न्यास की धीरता, नितम्ब-देश की स्थूलता, भ्रूलताओं की कुटिलता अधर-बिम्बों की रक्तिमा (ललाई) एवं आपके हृदय की रसावेशजन्य जड़ता मेरे ध्यान में प्रकट हो ।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°75

प्रातः पीतपटं कदा व्यपनयाम्यन्यांशु कस्यार्पणात् कुञ्जे विस्मृत कञ्चुकीमपि समानेतुं प्रधावामि वा।

बध्नीयां कवरों युनज्मि गलितां मुक्तावलीमञ्जये नेत्रे नागरि रङ्गकैश्चपि दधाम्यङ्गं व्रर्ं वा कदा ॥75।।

हे नागरि! किसी समय प्रातःकाल आपने किसी का पीत-पट भ्रम में बदलकर पहिन लिया होगा, तब मैं उसे बदलकर नीलाम्बर धारण कराऊँगी । इसी प्रकार निकुञ्ज-भवन में आप अपनी कञ्चुकि भूल आई होगी, मैं दौड़कर उसे शीघ्रता पूर्वक लाऊँगी । विहार में आपकी कबरी

शिथिल हो गई होगी, उसे मैं पुनः बाँधकर संवार दूंगी। आपकी मुक्तामाल टूट गई होगी, उसे पिरो दूंगी और आपके नेत्रों में फिर से अञ्जन लगाकर, कस्तूरी, कुंकुम, मलय आदि के द्वारा अङ्गों के नख-क्षतों को लेपित कर दूंगी। स्वामिनि ! क्या कभी ऐसा होगा?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°76

यद्वृन्दावन – मात्र गोचरमहो यन्नश्रुतीकं शिरोप्यारोढुं क्षमते न यच्छिव शुकादीनां तु यद्ध्यानगम् ।

यत्प्रेमामृत – माधुरी रसमयं यन्नित्य कैशोरकं तद्रूपं परिवेष्टुमेव नयनं लोलायमानं मम ।।76।।

अहो ! जो केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र.नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं। जो शिव और शुक आदि के भी ध्यान में नहीं आता। जो प्रेमामृत-माधुरी

से परिपूर्ण है और जो नित्य किशोर है । उस रूप को देखने के लिये मेरे नेत्र खोजते फिरते हैं-चञ्चल हो रहे हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°77

धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतां किं तद्वृथा वार्तया सैकान्तेश्वर – भक्तियोग पदवी त्वारोपिता मूर्द्धनि ।

यो वृन्दावन सोम्नि कञ्चन घनाश्चर्य्यः किशोरीमणिस्तत्कैङ्कयै रसामृतादिह परं चित्ते न मे रोचते ॥77।।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये उत्तम चार फल यदि विश्व में उत्कृष्टता को प्राप्त हैं तो भले ही रहें, हमें इनकी व्यर्थ चर्चा से क्या ? और ईश्वर की उस एकान्त भक्ति-योग-पदवी को भी हम सिर-माथे चढ़ाते है, अर्थात् भक्ति-योग का आदर तो करते हैं पर उससे भी क्या लेना-देना

है ? हमारे चित्त को तो श्रीवृन्दावन की सीमा में विराजमान किसी घनीभूत आश्चर्यरूपा किशोरी-मणि के कैङ्कर्य रसामृत के अतिरिक्त और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°78

प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं श्रृंगारलीलाकला वैचित्री परमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता ।

ईशानी च शची महासुख तनुः शक्तिः स्वतन्त्रा परा श्रीवृन्दावन नाथ पट्टमहिषी राधैव सेव्या मम ॥78।।

जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृङ्गार-लीला की विचित्र कलाओं की परम अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-की हैं। जो ईश्वर-रूप श्रीकृष्ण की शची हैं तथा परम सुखमय वपु-धारिणी परा और स्वतंत्रा शक्ति हैं । वे श्रीवृन्दावननाथ-श्रीलालजी की पटरानी श्रीराधा ही मेरी सेव्या-आराधनीया हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°79

राधा दास्यमपास्य यः प्रयतते गोविन्द सङ्गाशया सोयं पूर्ण सुधारुचेः परिचयं राकां विना कांक्षति ।

किञ्च श्याम रति-प्रवाह’ लहरी बीजं न ये तां विदुस्ते प्राप्यापि महामृताम्बुधिमहो बिन्दु परं प्राप्नुयुः ॥

जो लोग श्रीराधा के चरणों का सेवन छोड़कर गोविन्द के सङ्गलाभ की चेष्टा करते है, वे तो मानों पूणिमा-तिथि के बिना ही पूर्ण सुधाकर का परिचय प्राप्त करना चाहते हैं। वे अज्ञ यह नहीं जानते कि

श्याम-सुन्दर के रति-प्रवाह की लहरियों का बीज यही श्रीराधा हैं। आश्चर्य है कि ऐसा न जानने से ही वे अमृत का महान् समुद्र पाकर भी उसमें से केवल एक बूंद मात्र ही ग्रहण कर पाते हैं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°80

कैशोराद्भुत माधुरी-भर धुरीणाङ्गच्छविं राधिका प्रेमोल्लास भराधिका निरवधि ध्यायन्ति ये तद्धियः ।

त्यक्ताः कर्मभिरात्मनैव भगवद्धर्मेप्यहो निर्ममाः सर्वाश्चर्य गतिं गता रसमयीं तेभ्यो महद्भ्यो नमः॥80।।

किशोरावस्था के अद्भुत माधुरी-प्रवाह से जिनके अङ्ग अङ्ग की छबि सर्वाग्रगण्य हो रही है, तथा जो प्रेमोल्लास-प्रवाह के द्वारा सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त हैं, ऐसी श्रीराधिका का जो महापुरुष तद्गत-चित्त से निरन्तर

ध्यान करते हैं, उन्होंने कमों को नहीं छोड़ा, वरन् कर्मों ने ही उन्हें छोड़ दिया है और वे परम श्रेष्ठ भगवद्धर्म की ममता से भी मुक्त होकर सर्वाश्चर्य पूर्ण परम रस-मयी गति को प्राप्त हो चुके हैं। उन महान पुरुषों

के लिये बारम्बार नमस्कार है।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°81

लिखन्ति भुजमूलतो न खलु

शंख-चक्रादिकं विचित्र हरिमन्दिरं न रचयन्ति भालस्थले।

लसत्तुलसि मालिकां दधति कण्ठपीठे न वा

गुरोर्भजन विक्रमात्क इह ते महाबुद्धयः ॥81।।

श्रीगुरु के भजन रूप पराक्रम-युक्त वे कोई महाबुद्धिमान् पुरुष-गण इस पृथ्वी पर विरले ही हैं, जो न तो अपने बाहु-मूल में कभी शङ्ख-चक्रादि (वैष्णव-चिह्न) धारण करते और न कभी ललाट-पटल पर विचित्र हरिमन्दिर (तिलक) ही रचते हैं और न उनके कण्ठ-भाग में सुहावनी तुलसी की मालिका ही धारण होती है । (उन्हें तो इन सब बाह्य लक्षणों की सुधि ही नहीं, वे किसी अन्तरङ्ग रस में डूब रहे हैं।)

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°82

कर्माणि श्रुति बोधितानि नितरां कुर्वन्तु कुर्वन्तु मा गूढाश्चर्य्य रसाः स्त्रगादि विषयान्गृह्लन्तु मुञ्चन्तु वा।

कर्वा भाव-रहस्य पारग-मतिः श्रीराधिका प्रेयसः किञ्चिज्ज्ञैरनुयुज्यतां वहिरहो भ्राम्यद्भिरन्यैरपि ॥82।।

गूढाश्चर्य रूप उज्ज्वल रसाश्रित रसिक-गण वेदोक्त कर्मकाण्ड का अनुष्ठान करें या न करें, माला,चन्दन आदि विषय-समूह अर्थात् भोगविलास के उपकरण गृहण करें या न करें। इससे उनको न कोई हानि है और

न लाभ ही । अहो ! श्रीराधाकान्त के भाव में पारङ्गत-मति ऐसे रसिक क्या.कभी अल्पज्ञ, वहिर्मुख अथवा अन्य सकाम पुरुषों में से किसी के साथ मिल सकते हैं ? क्या कभी इस प्रकार के लोगों के साथ उनका मेल खा सकता है ? नहीं।

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°83

अलं विषय वार्तया नरक कोटि वीभत्सया,

वृथा श्रुति कथाश्रमो वत विभेमि कैवल्यतः।

परेश-भजनोन्मदा यदि शुकादयः किं ततः,

परं तु मम राधिका पदरसे मनो मज्जतु ॥83।।

विषय-चर्चा बहुत हो चुकी, इसे बन्द करो; क्योंकि यह कोटि-कोटि नरकों के समान घृणित है । श्रुति-कथा भी व्यर्थ श्रम ही है । अहो ! हमें तो कैवल्य से भय प्रतीत होता है (क्योंकि वह नाम-रूप रहित है) । परम पुरुष भगवान् के भजन में उन्मत्त यदि कोई शुक आदि हैं, तो रहने दो; हमें उनसे क्या प्रयोजन ? हमारा मन तो केवल श्रीराधा के पद रस में ही डूबा रहे, (यह अभिलाषा है।)

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°84

तत्सौन्दय्र्य स च नववयो यौवनश्री प्रवेशः

सा दृग्भङ्गी स च रसघनाश्चर्य वक्षोज कुम्भः।

सोयं विम्बाधर मधुरिमा तत्स्मितं सा च वाणी सेयं लोला गतिरपि न विस्मर्यते राधिकायाः ॥84।।

अहा ! स्वामिनी श्रीराधिका का वह सौन्दर्य ! वह नवीन वय में यौवन-श्री का प्रवेश ! वह नेत्रों को भङ्गिमा ! घनीभूत रस और आश्चर्य से परिपूर्ण वे युगल स्तन-कलश ! इसी प्रकार लाल विम्बाफलों के समान अधरों की बह मधुरिमा, साथ ही मन्द-मन्द मुसकान और रसमयी वाणी ! एवं वह सोलापूर्ण पाद-न्यास (मन्द-मन्द चलना) तो भूलता ही नहीं !!

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°85

यल्लक्ष्मी शुक नारदादि परमाश्चय्र्यानुरागोत्सवैः प्राप्तं त्वत्कृपयैव हि व्रजभृतां तत्तत्किशोरी-गणैः ।

तत्कैङ्कर्य्यमनुक्षणाद्भुत रसं प्राप्तुं धृताशे मयि श्रीराधे नवकुञ्ज नागरि कृपा-दृष्टिं कदा दास्यसि ॥85।।

हे नव- कुञ्ज नागरि ! मैं आपके उस कैङ्गय्र्य-प्राप्ति की आशा को धारण किये हुए हैं। जिससे क्षण-क्षण में अद्भुत रस की प्राप्ति होती है और जिसे उन अनुराग-उत्सव मयी ब्रज-किशोरी गणों ने प्राप्त किया था, जिन गोपी-जनों के अनुराग-उत्सव की लालसा लक्ष्मी, शुक, नारद आदि को भी रहती है। हे श्रीराधे ! मेरे लिये आप अपनी उस कृपा-दृष्टि का दान क्या कभी करोगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°86

लब्ध्वादास्यं तदति कृपया मोहन स्वादितेन,

सौन्दर्यश्री पदकमलयोर्लालनैः स्वापितायाः ।

श्रीराधाया मधुर-मधुरोच्छिष्ट पीयूष सारं,

भोजं-भोजं नव-नव रसानन्द मग्नः कदा स्याम् ॥86।।

श्रीस्वामिनीजी के युग-पद-कमल सौन्दर्यश्री की राशि हैं। उन चरणों को अच्छी तरह से पलोट कर प्यारे ने आपको शयन करा दिया है और श्री लालजी ने आपके मधुर-मधुर अमृत-सार रूप उच्छिष्ट प्रसाद को आपकी अत्यन्त कृपा से प्राप्त करके स्वाद लिया है, मैं उसी प्रसाद को प्राप्त करूं। इस प्रकार मैं आपका दास्य प्राप्त करके कब नव रसानन्द में मग्न होऊँगी?

श्री हित राधा सुधा निधि जी श्लोक स°87

यदि स्नेहाद्राधे दिशसि रति-लाम्पटय पदवीं

गतं ते स्वप्रेष्ठं तदपि मम निष्ठं शृणु यथा।

कटाक्षै