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श्री पहुकर दास जी

श्री पहुकर दास जी श्री दामोदरवर जी के शिष्य थे और

जाति के वैश्य थे। श्री राधावल्लभ लाल जी की प्रकट सेवा से उनको अत्यन्त अनुराग था और सेवा में उपयोगी वस्तुओं को वे भेजते रहते थे।

कोई भी उत्तम वस्तु जो उनकी दृष्टि में आती थी, वह कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, वे उसे खरीद कर श्रीजी की सेवा में भेज देते थे। जब वे वृन्दावन आते थे तो झूला, होली, वन विहार, फूल बँगला आदि उत्सव बड़े ठाठ से करते थे।

नन्दगाँव, बरसाना आदि ब्रज के अन्य स्थानों में भी वे वस्त्राभूषण की सेवा करते थे और नित्य सेवा के लिये उन्होंने वर्षासन बाँध दिये थे। पहुकर दास जी अत्यन्त उदार थे और उन्होंने अपना तन, मन, धन अपने इष्ट को अर्पण कर दिया था ।

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श्री द्वारिका दास जी

भगवत मुदित जी कहते हैं कि कलियुग में श्री द्वारिका दास जी के समान कोई गुरु-भक्त नहीं हुआ। एक बार उनके गुरु गोस्वामी दामोदरवर जी उनके घर पधारे और वहाँ उन्होंने कथा, पद-गान आदि के द्वारा मांगलिकता का विस्तार किया विदा होते समय द्वारिका दास जी ने अपना सर्वस्व गुरुजी को भेंट कर दिया और स्वयं पति पत्नी, एक-एक धोती पहनकर खड़े हो गये।

उनने जो सम्पत्ति भेंट की वह बहुत अधिक थी, उसमें अस्सी हजार रुपये और ढेर के ढेर बर्तन, वस्त्र, आभूषण, रथ, पालकी, घोड़े, दास दासी आदि थे। इसके बाद उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि ये सारी वस्तुऐं आपकी हैं। मैंने इनमें ममता लगाने की भूल की थी। आप ही जगत के पालक, सर्जक एवं संहारक हो, आप ही स्वर्ग और नर्क से तारने वाले हो। आपने करुणा करके मुझको श्रीजी का नाम सुनाया और मुझे रसिक धर्म का मर्म समझाया। प्रभु के धाम और आप जैसे प्रभु के भक्त काल ग्रसित प्रपंच से न्यारे होते हैं।

इस प्रकार के निष्कपट बचन सुनकर श्री दामोदरवर जी ने कहा कि इस धन के तुम्हीं भण्डारी हो, तुम्हारे अतिरिक्त इसका कोई और अधिकारी नहीं है। तुम हमारी आज्ञा से प्रभु का भजन करो और इस धन के द्वारा श्री ठाकुर जी का भोग-राग लगाकर सन्तों का पोषण करो। यह कहकर गुरुजी ने अपने शिष्य के धन को एकबार स्वीकार करके उसी को वापिस दे दिया। द्वारिका दास जी का अपने गृहस्थ से कोई मोह नहीं था और वे सदैव गुरु भक्तों की सेवा करते रहते थे।

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श्री मोहन दास जी

भगवद् मुदित जी कहते हैं कि अब मैं परम रसज्ञ एवं प्रवीन श्री मोहन दास जी के गुणों का वर्णन करता हूँ। वे अपने इष्ट की सेवा भावना में सदैव लीन रहते थे और चारों तरफ से मन को खींचकर इष्ट में पूर्ण रूप से अनुरक्त थे। उनके पुत्र माधुरी दास जी उनसे भी अधिक रसिक भक्त हुये। उनको श्री गुरु कृपा से जगत की क्रिया ने स्पर्श भी नहीं किया।

श्री रसिक अनन्य माल में मोहन दास जी के उक्त चरित्र में उनके तथा उनके पुत्र माधुरी दास जी के सम्बन्ध में बहुत कम दिया हुआ है। इन दोनों के सम्बन्ध में श्री गोविन्द अलि जी कृत ‘भक्त गाथा’ (रचना काल सं० १८४४) में दो छप्पय दिये हुये हैं जिनसे उक्त पिता-पुत्र के सम्बन्ध में नीचे लिखे तथ्य ज्ञात होते है

मोहन दास जी कामा के रहने वाले ब्राह्मण थे। इन्होंने एक रासमण्डली बनाई थी और उसमें स्वामी का काम करते थे। इनके पुत्र माधुरी दास बहुत सुन्दर थे और इनकी मण्डली में श्रीराधा बनते थे। ये दोनों श्री दामोदर वर गोस्वामी के शिष्य थे। माधुरीदास जी के बाल हृदय पर श्री राधा का वेष धारण करने का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा और वे क्रमशः उस वेष में तन्मय होते चले • गये। इसके परिणाम स्वरूप उनके शरीर में भी बहुत भारी परिवर्तन हो गया। गोविन्द अलि जी ने बताया है कि उनके तरुण होने पर जब उनके विवाह सम्बन्ध की बात चली तब तक- ‘अप्राकृत भई देह भावना सखी दृढ़ाई। अर्थात उनका शरीर प्रकृति के नियमों को तोड़कर सखी बन चुका था।

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श्री हरिकृष्णपुजारी जी

श्री हरिकृष्णपुजारी जी भी ऐसे ही एक निष्ठावान भक्त थे। आप अनन्य व्रत लेकर श्री ठाकुर जी की सेवा बहुत लगन के साथ करते थे। वे अपने इष्ट के प्रसाद के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं खाते थे। श्रीवृन्दावन के बड़े-बड़े मन्दिरों में भी उन्होंने प्रसाद के साथ भेदभाव होता देखा था। उन मन्दिरों में एकादशी के दिन भक्त लोग ठाकुर जी को निवेदन किये हुए अन्न के प्रसाद को ग्रहण नहीं करते थे और उसके स्थान में फलाहार करते थे । हरिकृष्ण जी का मत था कि इससे स्पष्ट रूप में महाप्रसाद का अनादर होता है और इष्ट की अवज्ञा होती है। इष्ट का प्रसाद निर्गुण वस्तु है और भोग लगाने के बाद वह अन्न नहीं रहता। उसे अन्न समझकर एकादशी के दिन उसका त्याग करना अनुचित है। इसके अतिरिक्त श्री हरिकृष्ण जी सर्वथा बहिर्मुख लोगों में भी प्रभु के दर्शन करते थे। वे कर्कश वचन कभी नहीं बोलते थे और दूसरों के दुर्वचनों को शान्ति पूर्वक सह लेते थे।

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श्री श्याम शाह तोमर जी

श्याम शाह जी तोमर बड़े रसिक अनन्य भक्त थे। श्री गुरु से दीक्षा लेते ही उन्होंने तन, मन, धन उनको अर्पण कर दिया और अपने परिवार से मोह हटा लिया। उनकी एक कन्या विवाह योग्य हो गई थी और जाति वाले उसका सम्बन्ध कर देने के लिये आग्रह कर रहे थे, किन्तु श्याम शाह जी ने उनसे कह दिया कि मैं तो सम्बन्ध उसी से करूँगा जो मेरे अनुगत होकर रहेगा। धनवान लोग तो इस शर्त पर तैयार नहीं होते थे, अतः उन्होंने एक गरीब लड़के को पसन्द करके उसे अपने गुरुजी से दीक्षा दिलवा दी। इसके पश्चात उसको अनन्य धर्म की शिक्षा दी और उसके साथ अपनी पुत्री की सगाई कर दी। विवाह के समय उन्होंने स्वयं कन्यादान नहीं किया और न ही गणपति की स्थापना की। नवग्रह पूजन भी नहीं किया और लड़की को जो कुछ भी दिया उसका संकल्प नहीं किया क्योंकि उनकी दृष्टि में उनका कुछ था ही

नहीं जो कुछ था, प्रभु का था । पुत्री का विवाह करने के बाद श्याम शाह जी अपनी पत्नी के साथ श्रीवृन्दावन आ गये। वहाँ रहते हुए एक बार उन्होंने ‘बरसाने में नन्दगाँव के ब्रजवासियों को बुलाकर उनकी ज्यौनार की और उसका वर्णन एक पद बनाकर दिया।

एक दिन वे ध्यान मग्न यमुना पुलिन में बैठे थे कि श्यामाश्याम का अद्भुत रूप उनके सामने प्रकट हो गया। श्याम शाह जी दर्शन करके तन्मय हो गये और उनके प्राण शरीर को छोड़कर युगल की नित्य सेवा में पहुँच गये।

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श्री कल्याण पुजारी जी

कल्याण पुजारी जी बड़े रसिक अनन्य भक्त थे। उनकी रहनी और कहनी सबसे अलग थी। वे श्री बनचन्द्र गोस्वामी के शिष्य थे और गोस्वामी जी ने उनको श्री राधावल्लभ लाल की सेवा में नियुक्त कर दिया था। वे श्री जी को भोग लगा कर सन्तों को खिला देते थे और स्वयं उनकी जूठन लेकर खाते थे। भक्तजनों का उच्छिष्ट और चरणामृत वे सदैव ग्रहण करते थे। धीरे-धीरे सन्तों में इनका अनुराग इतना बढ़ गया कि उनको मन्दिर की मर्यादा का भी ध्यान नहीं रहता था।

यह देखकर अनेक लोग दुख पाने लगे। लोगों ने पुजारी जी के आचरण की शिकायत श्री बनचन्द्र जी के नाती श्री दामोदरवर गोस्वामी जी से की। श्री दामोदरवर जी ने कल्याण पुजारी जी का ही पक्ष लिया और उन्हें समझाया कि भक्त और भगवान सदा से समान माने जाते रहे हैं। पुजारी भक्तों का सम्मान करता है तो कोई अनुचित कार्य नहीं करता। चुगली खाने वाले चुप तो हो गये परन्तु उनको सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने गोस्वामी दामोदरवर जी के दोनों पुत्रों को बहका कर उनके पास भेजा पुत्रों ने जब अपने पिता से जाकर कहा कि पुजारी एकदम भ्रष्ट हो गया है और वह सेवा के योग्य नहीं रह है तो दामोदरवर जी ने विवश होकर पुजारी जी से मन्दिर की ताली ले ली और अन्य लोगों को सेवा में नियुक्त कर दिया। किन्तु उनकी प्रीति-विहीन सेवा से श्रीराधावल्लभ लाल जी सन्तुष्ट नहीं हुए और उन्होंने स्वप्न में गोस्वामी जी से कहा कि “हम दो दिन से भूखे हैं और हमको पुजारी जी के हटने का बड़ा दुख है। अन्य कोई इस पुजारी के समान प्रेम पूर्वक भोग नहीं रखता है। उसका यह कार्य भी हमें पसन्द हैं कि वह भक्तों में और हममें कोई भेद नहीं समझता आप उसी को बुलाकर हमारी सेवा में नियुक्त कीजिये।” गोसाईं जी उसी समय मन्दिर में गये और सब लोगों को एकत्र करके उनको प्रभु की आज्ञा सुना दी और पुजारी जी से कहा कि आप जैसा करते आये हैं वैसा ही करते रहिये पुजारी जी पुनः प्रभु और भक्तों की सेवा करने लगे।

भगवत मुदित जी कहते हैं कि पुजारी जी की एक बात और सुनिये जो साधु-वैष्णव अन्य मन्दिरों के दर्शन करके पुजारी जी को वहाँ का वृत्तान्त सुनाते थे, उनसे वे पूछते थे कि तुमने इन मन्दिरों में कहीं भी श्री प्रिया जी (श्री राधा) की प्रधानता देखी है। या श्री कृष्ण को उनकी वन्दना करते देखा है ? यह बात यहाँ के सिवाय कहीं नहीं है। इसलिये इधर-उधर न भटक कर अपने इष्ट के ही दर्शन किया कीजिये। दूसरी जगह दर्शन करने में एक और आपत्ति है कि यदि वहाँ की सेवा में अपने यहाँ से कोई विशेषता दिखलाई दे जाय तो अपने मन्दिर के प्रति हीनता का भाव उदय हो सकता है और यदि वहाँ कोई कमी दिखलाई दे जाय तो इससे अपराध में पड़ना पड़ता है।

भगवत मुदित ही कहते हैं कि कल्याण पुजारी की अपने इष्ट में बड़ी निष्ठा थी और उसी के बल पर उन्होंने श्री राधावल्लभ लाल जी की पूर्ण कृपा प्राप्त की थी।

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श्री गोविन्द दास जी

श्री गोविन्द दास जी श्री हरिदास तोमर के भाई थे। ये बड़े रसिक अनन्य भक्त थे। जिस दिन उन्होंने गुरु की शरण ली उसी दिन से संसार से मोह हटा लिया। वे घर में सेवा रखते थे और प्रभु के उत्सव बड़े उत्साह के साथ करते थे। वे खीरहटी परगने के बिहारीपुर गाँव के रहने वाले थे। यह परगना उनको बादशाह ने जागीर में दिया था। वे मुरली बहुत अच्छी बजाते थे और ठाकुर जी को सेवाकाल में मुरली सुनाया करते थे।

एक बार बादशाह ने उनको दिल्ली बुलाया तो वे अपनी सेवा साथ लेकर गये। वे दिल्ली में भी चार घण्टे सेवा करने के बाद बादशाह का मुजरा करते थे। एक दिन बादशाह ने कहा कि हमने सुना है कि आप मुरली बहुत अच्छी बजाते हैं, आप हमको भी सुनाइये । गोविन्द दास जी का मुख तमतमा उठा और बादशाह से बोले कि मेरी मुरली तो ठाकुर जी के सामने बजती है। आपके आगे तो तलवार बजती है। बादशाह इस बात को सुनते ही क्रोधित हो गया और कहा कि ऐसे ही तलवार चलाने वाले हो तो अम्बर डाकू को मार के दिखाओ। गोविन्द दास जी बादशाह का मुजरा करके अपने डेरे पर गये और अम्बर का पता लगा कर उसके पीछे चल दिये। अम्बर पालकी में बैठकर कहीं जा रहा था। गोविन्द दास जी ने उसकी पालकी में तलवार मारी जो पालकी के बाँस को काटकर अम्बर के सिर में लगी और वह वहीं खत्म हो गया। बादशाह सहित सब लोगों ने गोविन्द दास जी के इस पराक्रम की अत्यन्त सराहना की।

भगवत मुदित जी ने लिखा है कि गोविन्द दास जी जितने सेवा में निपुण थे उतने व्यवहार कुशल भी थे। श्री हरि के प्रताप पर श्रद्धा रखकर उन्होंने बादशाह का तनिक भी भय नहीं माना। जिस बादशाह के सेवकों से बड़े-बड़े राजा महाराजा डरते थे, भक्त गोविन्द दास ने श्री गोविन्द के बल पर उसको तिनके के समान भी नहीं गिना इनके भ्राता पुत्र आदि सब प्रवीण रसिक अनन्य थे और सदैव भजन में लीन रहते थे। गोविन्द दास जी ने अपने गुरु की आज्ञा से अपनी पुत्री को अपने से नीची जाति के परिवार में दे दिया और अपनी जाति वालों की परवाह नहीं की।

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श्री हरिदास तोमर जी

श्री भगवत मुदित जी कहते हैं कि श्री हरिदास तोमर क्षत्री कुल में उत्पन्न हुए थे। वे सोडीगने गाँव के निवासी थे। श्री हरिवंश महाप्रभु के नाती श्री नागर वर जी के ये शिष्य थे। इन्होंने जब से श्री गुरु की शरण ग्रहण की तब से अपना सर्वस्व उनको अर्पण कर दिया। इनके पिता ने आरम्भ से ही अपने पुत्र की गुरु-निष्ठा का विरोध करना शुरू कर दिया। उनका कहना था कि हम लोग क्षत्री हैं और मदिरा-माँस सेवन एवं शिकार खेलना हमारे कुल की रीति है। तुमने हमारे इस कुल धर्म को नष्ट कर दिया है। हरिदास जी के पिता हर अवसर पर इसी प्रकार की बातें करते रहते थे। इससे वे बड़े दुखी रहते थे।

एक बार अँधेरी रात में काले साँप ने हरिदास जी को डस लिया। लोग साँप को मारने के लिये दौड़े, परन्तु हरिदास जी उसमें भगवान का दर्शन कर रहे थे। अतः उन्होंने उसे मारने नहीं दिया। उनकी इस प्रकार की निष्ठा के बल से साँप का विष उनको बिलकुल नहीं चढ़ा भगवत मुदित जी ने कहा है कि ऐसे भक्तों से कालरूपी साँप भी भयभीत रहता है, सामान्य साँप का तो कहना ही क्या है। हरिदास जी का एक अन्य पवित्र चरित्र सुनिये। एक बार एक साधु उनके घर आया और कहने लगा कि सुना है आपको संसार की किसी वस्तु से मोह नहीं है। अतः अपनी पत्नी एवं घर-बार मुझको सौंप दीजिये और आप वन में जाकर भजन कीजिये। श्री हरिदास जी ने साधु से कहा कि यह सब पहले से ही आपका है। मैं तो आपका अनेक जन्मों का दास हूँ। आपकी वस्तु को आप ही को देनेवाला मैं कौन होता हूँ ? आप यहाँ आनन्द पूर्वक रहिये। साधु से यह कहकर हरिदास जी प्रसन्नता पूर्वक वन को चल दिये। साधु उनका यह चरित्र देखकर चकित रह गया और उनको वापस बुला लाया उसने हरिदास जी से कहा कि मैंने देख लिया है कि आपको संसार की किसी भी वस्तु से मोह नहीं है। मैं अब आपकी पत्नी, सम्पत्ति एवं घर-बार को अपने बन्धन से मुक्त करता हूँ। यह कहकर साधु अपने स्थान को चला गया।

भगवत मुदित जी कहते हैं कि अब हरिदास जी का एक अन्य अद्भुत चरित्र सुनाता हूँ जिसके सुनने से हृदय पवित्र होता है। हरिदास जी के यहाँ सदैव साधु-सन्त आते रहते थे और वे अपने परिवार सहित उनका पूरा सत्कार करते थे। एक बार एक साधु की दृष्टि उनकी पुत्री पर बिगड़ गई। वह साधु उनके घर रहने लगा और उनकी पुत्री के साथ पाप सम्बन्ध स्थापित कर लिया। एक दिन हरिदास जी की पुत्री और वह साधु छत पर.. लज्जाहीन स्थिति में सो रहे थे। संयोग से हरिदास जी छत पर पहुँच गये। उन्होंने दोनों को इस स्थिति में देखकर अपनी चादर उन पर डाल दी और चुपचाप नीचे उतर गये। जब दोनों की आँखें खुलीं तो पुत्री ने अपने पिता की चादर को पहचान लिया और दोनों अत्यन्त भयभीत हो गये। साधु स्नान करने का बहाना लेकर बाहर जाने लगा तो हरिदास जी उसके साथ हो लिये कुछ दूर जाकर उन्होंने साधु से कहा- मेरा घर-बार एवं परिवार आपका ही है और आप उसका उपभोग करने के लिये स्वतन्त्र हैं। परन्तु सब कार्य सावधानीपूर्वक करना चाहिये क्योंकि इन कामों से साधुओं की निन्दा होने का भय है। साधुओं की निन्दा सुनने से जितना कष्ट मुझे होता है उतना किसी और बात से नहीं होता। उस साधु पर हरिदास जी के इस व्यवहार का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उसके हृदय में सच्चा वैराग्य उत्पन्न हो गया। वह हरिदास जी को गुरु के समान मानने लगा और भगवान की शुद्ध भक्ति करने लगा।

हरिदास जी ने वृन्दावन में यमुना तट पर एक घाट और एक मन्दिर बनवाया। यह दोनों अब भी विद्यमान हैं। मन्दिर में विराजमान ठाकुर जी का नाम युगलकिशोर जी है और घाट का नाम युगल घाट है। भगवत मुदित जी कहते हैं कि इस कलियुग में हरिदास जी जैसा निष्ठावान न हुआ है न होगा।

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श्री भागमती जी

ओड़छा के अधिकारी राजा चिन्तामणि के दो रानियाँ थीं, भागमती और इन्दुमती। इनमें भागमती जी बड़ी थीं और उनके धार्मिक संस्कार बहुत गहरे थे। श्री हरि एवं उनके भक्तों की सेवा तथा गरीब-दुखियों का प्रतिपालन वे हमेशा करती रहती थीं। उनके पति मुगल बादशाह के सरदारों में थे और अधिकांशतः दिल्ली में रहते थे। दोनों रानियाँ ओड़छे में रहती थीं। एक बार नागरीदास जी ओड़छे पधारे और वहाँ श्री हित जी महाराज के धर्म का उपदेश करने लगे। उसमें उन्होंने बताया कि हितजी महाराज ने वर्णाश्रम धर्म एवं विधि-निषेधात्मक शास्त्रों के ऊपर प्रेम धर्म की स्थापना की है और उनकी कृपा से सहस्रों जीव भवसागर का सुखपूर्वक संतरण कर रहे हैं।

एक दासी के मुख से उनकी प्रशंसा सुनकर भागमती जी ने नागरीदासजी को अपने महल में बुलाया नागरीदासजी ने भागमतीजी को श्रीहित जी महाराज के धर्म की रीति-भाँति बतलायी जिसको सुनकर भागमती जी बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने श्री नागरीदास जी के साथ वृन्दावन जाकर महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र श्री बनचन्द्र जी से दीक्षा ले ली। इसके पश्चात् नागरी स जी उनको बरसाने लिबा ले गये। वहाँ उन्होंने उनसे बरसाने वासियों की सेवा पूजा करायी और वहाँ की किशोरावस्था वाली लड़कियों को वस्त्र-आभूषण दिलवाये । इसी प्रकार वृन्दावन में भी भागमती जी ने वहाँ के निवासियों की अन्न, वस्त्र से सेवा की और फिर ओड़छा वापिस चली गयीं।

भागमती जी की अनुपस्थिति में उनके पति दिल्ली से जब वापिस आये तो अपनी पत्नी की ब्रजयात्रा की बात सुनकर अत्यन्त क्रोधित हुए और उन्होंने बहुत देर तक भागमती जी को चाबुक से पीटा। मारते मारते उनके हाथ थक गये किन्तु भागमती जी के मुख पर छाई हुई सहज प्रसन्नता को वे दूर नहीं कर सके। अन्त में राजा चिन्तामणि भागमती जी की छाती पर पलँग बिछाकर अपनी छोटी पत्नी के सहित उस पर सो गये। भागमती जी रात भर भजन करती रहीं राजा और रानी जब सोकर उठे तो उनको उलटियाँ आना शुरू हो गया और अनेक उपचार करने पर भी जब वे बन्द नहीं हुई तो राजा और रानी भागमती जी के चरणों में गिर गये और क्षमा-प्रार्थना करने लगे। राजा ने उनको बताया कि मैंने जो चाबुक तुम्हारे शरीर पर मारी थीं उनके निशान छोटी रानी के शरीर पर दिखलाई दे रहे हैं। अब मैं तुमसे इस महान अपराध के लिये क्षमा याचना करता हूँ। अब मुझे यह बताओ कि मैं इसक मार्जन कैसे करूँ ?

भागमती जी ने उनसे कहा कि आप प्रभु की शरण ग्रहण करके अपने जीवन को सफल बनाइये। राजा ने यह बात सहर्ष मान ली और सब लोग भागमती जी के साथ वृन्दावन आये और श्री बनचन्द्र जी से दीक्षा ले ली। इसके पश्चात भागमती जी उनको बरसाने ले गयीं और वहाँ श्री नागरीदास जी का पूजन कराया। यह सब कार्य हो जाने के पश्चात् भागमती जी ने अपने पति से कहा कि अब आप छोटी रानी के साथ ओड़छा जाइये और मुझे यहाँ एकान्त वास करने दीजिये। राजा-रानी उनको प्रणाम करके वापिस चले गये। ओड़छे से वे जीवन पर्यन्त भागमती जी को उनकी इच्छानुसार धन और वस्त्र आदि भेजते रहे।

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श्री नागरी दास जी

श्री नागरी दास जी बेरछा (बुन्देलखण्ड) के रहने वाले थे और पँवार क्षत्रिय थे। बाल्यकाल से ही उनके मन की वृत्तियाँ भगवत भजन के प्रति आकर्षित थीं और वे किसी सतगुरु की तलाश में थे। भाग्य से श्री चतुर्भुज दास जी से उनकी भेंट हो गयी और उन्होंने उनके साथ वृन्दावन आकर श्रीबनचन्द्र गोस्वामी जी से दीक्षा ले ली नागरी दास जी राज-परिवार से सम्बन्धित थे और श्रीवृन्दावन आते समय वे अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति साथ ले आये थे, जो उन्होंने यहाँ गुरु-इष्ट की सेवा में लगा दी। कुछ ही दिनों में वे रसिक सभा के भूषण हो गये और उनके दर्शन मात्र से अनेक लोगों का जीवन परिवर्तन होने लगा। उनके भजन का सबसे बड़ा आधार श्रीहित महाप्रभु की वाणी थी।

उसी के सहारे श्री श्यामा श्याम के नित्य-विहार के दर्शन करते थे और सदैव उसमें डूबे रहते थे। उन्होंने इस वाणी की प्रशंसा में सैकड़ों दोहे और पद कहे हैं। वे श्रीहित जी महाराज की वाणी का कोई एक पद उठा लेते थे और चौबीसों घण्टे उसी में निमग्न रहते थे। वाणी में वर्णित लीला के अतिरिक्त उनको श्रीकृष्ण की अन्य कोई लीला अच्छी नहीं लगती थी। यहाँ तक कि श्री मद्भागवत में वर्णित लीलाओं में भी उनकी बहुत कम रुचि थी। उनकी इस बात का सम्प्रदाय के कुछ लोग बहुत विरोध करते थे और नागरीदास जी के गुरु परिवार से उनकी चुगली खाते रहते थे।

उनके गुरु जी के पुत्र प्रतिदिन श्रीमद्भागवत की कथा कहते थे। एक दिन उन्होंने स्वयं श्री नागरी दास जी से कहा कि आजकल तो दशम स्कन्ध की कथा चल रही है, अन्य कथाओं को चाहे आप न सुनें लेकिन इस स्कन्ध की कथायें तो आपको सुननी ही चाहिये। नागरीदास जी ने इस आज्ञा को मान लिया और दूसरे दिन कथा सुनने पहुँच गये। उस दिन धेनुक वध की कथा हो रही थी। उसको सुनकर नागरी दास जी अकुला गये और उठकर चले गये। उनके इस आचरण पर कथा कहने वाले गोस्वामी श्री नागरवर जी को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने नागरीदास जी से कथा के बीच में से उठ जाने का कारण बताने का बहुत आग्रह किया तो उन्होंने बताया कि जब आप कथा कह रहे महाप्रभु जी की चौरासी जी के एक पद की भावना कर रहा था उस पद में रस-सागर श्री श्यामसुन्दर रूप-सौन्दर्य की सीमा मानवती श्री राधा की ठोड़ी को सहलाकर उनको मना रहे थे, उसी समय मेरे कान में आपके ये शब्द पड़े कि श्री श्यामसुन्दर ने गधे के रूप वाले धैनुक असुर के दोनों पिछले पैर पकड़ कर उसे दे मारा। यह सुनकर मेरा रोम-रोम जैसे जलने लगा। मेरे मन में बार-बार आने लगा कि चौरासी जी में वर्णित रसिकशेखर श्री श्यामसुन्दर के हाथ में गधे के पैर कैसे शोभा दे सकते हैं।

चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधित, तिन कर गदहनि पग क्यों सोहत ।

गोस्वामी नागरवर जी ने नागरीदास जी को हृदय से लगा लिया और उनकी निन्दा करने वालों को समझाने की चेष्टा की, किन्तु अनेक लोग नागरीदास जी की निन्दा करते ही रहे और उनके भय से नागरीदास बरसाने चले गये था स्थाई रूप से वहाँ बस गये।

बरसाने में उन्होंने गहवर बन की पहाड़ी पर अपनी कुटी बना ली जो कि अभी तक उनके नाम से प्रसिद्ध है। एक दिन आधी रात के समय उन्होंने वहाँ यह आश्चर्यमय दृश्य देखा कि गहवर वन में मृदंग आदि बाजे बज रहे हैं। वहाँ के वृक्षों में अनेक दीपक दमक रहे हैं तथा सखियों के समूह चारों ओर बिजली की तरह चमक रहे हैं। इस छवि को देखकर नागरीदास जी को मूर्छा आगयी। उसी समय उनको श्री राधा की यह आज्ञा सुनाई दी कि हम गहवर वन में नित्यविहार करते हैं। आज हमने सखियों के साथ तुमको दर्शन दिये हैं। हमको इस समय भूख लग रही है। इस समय तू हमको कुछ खिलावे तो बहुत अच्छा है। इसके साथ ही प्रियाजी ने यह भी आज्ञा दी कि बरसाने में तुम मेरे मन्दिर का निर्माण कराओ और प्रतिवर्ष मेरी वर्ष गाँठ किया करो। यह कहकर श्री नवलकिशोर-किशोरी साँकरी खोर की तरफ उतर गये।

यह सब वृत्तान्त नागरीदास जी ने रानी भागमती जी को सुनाया। भागमती जी ने श्री राधा जी की आज्ञा के अनुसार उनका मन्दिर बरसाने में बनवा दिया और वृन्दावन के रसिक समुदाय एवं गुरु परिवार को बुलाकर खूब धूम-धाम से मन्दिर में श्री श्यामा श्याम को प्रतिष्ठित कर दिया। इसी प्रकार श्री राधा के जन्मदिन पर उन्होंने बड़े समारोह से जन्मोत्सव मनाया जो कि अभी तक उसी प्रकार मनाया जाता है। श्री नागरी दास जी को इस प्रकार प्रचुर धन खर्च करते

देखकर एक चोर उनकी कुटिया में चोरी करने पहुँच गया । किन्तु वहाँ एक सिंह को गुर्रता देखकर वह भाग गया। इस प्रकार चोरों ने कई बार नागरीदास जी की कुटिया में चोरी करने की चेष्टा की किन्तु सिंह के भय से वे कुटिया के अन्दर नहीं घुस सके। एक दिन कुछ रसिक उपासक नागरी दास जी के यहाँ आकर ठहरे। नागरी दास जी उनके भोजन की व्यवस्था करने के लिये गाँव में पधारे। सिंह भी पालतू कुत्ते की तरह उनके पीछे हो लिया। नागरीदास जी ने बाजार से सामान खरीद कर उसकी पोटली बाँध ली तो सिंह उनके सामने आकर खड़ा हो गया और पोटली अपनी पीठ पर रखवा कर कुटिया पर ले आया।

नागरीदास जी ने विपुल वाणी की रचना की है जिसमें उन्होंने श्रीहित जी महाराज के धर्म को समझाने की चेष्टा की है। सम्प्रदाय में इनकी वाणी का बहुत अधिक सम्मान है, इसकी कृपा से पिछले साढ़े चार सौ वर्षों में अनेक लोगों को भजन का मार्ग सूझ पड़ा है। श्री भगवत मुदित जी ने बताया है कि सम्प्रदाय में नागरीदास जी का स्थान सेवक जी के समान ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

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श्रीध्रुवदास जी

श्री भगवत मुदित जी कहते हैं कि रसिक ध्रुवदास जी की कथा सुनने से रसिकता प्राप्त होती है। ध्रुवदास जी के सम्पूर्ण प्रेम की समता कोई नहीं कर पाया है।

ध्रुवदास जी कायस्थ कुल में उत्पन्न हुए थे, आप देवबन के रहने वाले थे। इनके पिता श्री श्यामदास जी श्री हरिवंश महाप्रभु के शिष्य थे और ये स्वयं महाप्रभु जी के तृतीय पुत्र श्री गोपीनाथ जी के शिष्य थे। श्री हरिवंश कृपा से किशोरावस्था में ही इनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। ये घर छोड़कर श्रीवृन्दावन में स्थाई निवास करने लगे। इनके मन में श्री श्यामा श्याम के नित्य विहार का गान करने की तीव्र अभिलाषा थी किन्तु इनको वाणी का स्फुरण नहीं हो रहा था। निरुपाय होकर ये एक दिन रास-मंडल पर पड़ गये। तीसरे दिन श्री राधारानी ने अर्ध-रात्रि के समय ध्रुवदास जी के सिर पर चरणों से ठोकर लगाई और कहा कि जो तू चाहता है वह तुझे प्राप्त हो जायगा। यह कहकर श्री राधारानी अन्तर्धान हो गयीं।

इस घटना के साथ ही ध्रुवदास जी को प्रेम धाम श्री वृन्दावन के प्रत्यक्ष दर्शन हो गये और वे मुक्त कण्ठ से श्री वृन्दावन सहित श्री श्यामा श्याम का यश गान करने लगे। श्री ध्रुवदास जी ने छोटी-बड़ी बयालीस लीलाओं की रचना की और सैकड़ों पद लिखे। ध्रुवदास जी ने बहुत सरल भाषा में अपनी वाणी की रचना की है जिसे समझने में कोई कठिनाई नहीं होती है। इसीलिये इनकी वाणी का प्रचार दक्षिण भारत तक हो गया। इस वाणी को पढ़कर अनेक लोग श्री श्यामाश्याम के अद्भुत प्रेम के उपासक बन गये और अपने कुल परिवार का त्याग करके श्री वृन्दावन वास करने लगे। श्री ध्रुवदास जी के गुरु परिवार के लोग भी वाणी सुनकर बहुत प्रसन्न हुए तथा उनके प्रेम की प्रशंसा करने लगे। श्री राधावल्लभलाल जब वनविहार के लिये पधारते थे तो ध्रुवदास जी की कुटी में कुछ देर ठहरते थे। श्री ध्रुवदास जी अपने हाथ से श्री राधावल्लभ जी की रसोई बनाते थे और एकादशी का भेद न मानकर सदैव प्रसाद ग्रहण करते थे। उनके गुरु-परिवार के लोग यदि उनसे विवाद करते तो उसका कोई उत्तर नहीं देते थे, जैसे वे कहते थे वैसे ही मान लेते थे। श्री भगवत मुदित जी कहते हैं कि श्री ध्रुवदास जी की वाणी को सुनकर युगल श्री श्यामाश्याम मुसकराने लगते हैं। अन्य वाणियों से इस वाणी की रीति कुछ अद्भुत है और इसमें भाव-भावना की तरंगें उठती रहती हैं।

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श्री स्वामी दामोदरदास जी

श्री दामोदर स्वामी जी कीर्तिपुर (बिहार) के रहने वाले थे। और श्रीवृन्दावन आते-जाते रहते थे। श्री लालस्वामी जी से दीक्षा लेने के बाद वे वृन्दावन वास करने लगे। वे अहंता- ममता का त्याग करके श्री राधावल्लभ लाल का भजन करते थे और उनके अद्भुत चरित्रों का गान करते रहते थे। उनके देश के लोग जो द्रव्य उनको भेंट के रूप में भेजते थे उसे वे ठाकुर जी की सेवा में लगा देते थे और उनका प्रसाद संतों में बाँट देते थे। उनका श्री यमुना जी से बड़ा सच्चा प्रेम था। वे श्री राधावल्लभलाल की प्रसादी माला, फूल आदि यमुना जी को नित्य प्रति अर्पण करते थे और उनके तट पर बैठकर श्री श्यामा श्याम की प्रेम क्रीड़ा का चिन्तन करते थे। उन्होंने अपने हाथ से श्री मद्भागवत की दस प्रतियाँ लिखी थीं और वे योग्य व्यक्तियों को बाँट दी थीं। वे न किसी से बुरा-भला कहते थे, न किसी की निन्दा करते थे, न कभी मिथ्या बोलते थे और दूसरों के अवगुणों को भी गुण मानकर उनके साथ व्यवहार करते थे। वे अन्य लोगों को अपने से उत्तम मानते थे और स्वयं को सबसे नीचा समझते थे।

एक दिन स्वामी जी को ज्वर आ गया और वे दो दिन तक यमुनाजी न जा पाये। लोगों ने देखा कि अचानक यमुना जी में बाढ़ आ गयी है और पानी गलियों तथा बाजारों में भी घुस आया है। लोगों के लिये महा भय उपस्थित हो गया। अनेकों ने यमुना जी का पूजन किया और भेंट चढ़ाई, लेकिन यमुना जी बढ़ती ही चली गयीं और लोग अपने मकानों को खाली करने लगे। यमुना जी ने भागमती जी को स्वप्न दिया (इनका चरित्र आगे दिया हुआ है) कि मैं दामोदर स्वामी जी के दर्शन करना चाहती हूँ। भागमती जी ने यह बात सब लोगों की उपस्थिति में स्वामी जी से कही। स्वामी जी ने नित्य की भाँति यमुना जी को सब वस्तुएँ भेंट की और एक पद बनाकर उनकी स्तुति की। स्वामीजी का दर्शन करके यमुना जी वापिस लौट गयीं और कुछ ही देर में अपनी नित्य की जगह पर बहने लगीं।

स्वामी जी अपने घर में बहुत ठाठबाट से सेवा करते थे। ब्रजवासियों को यह बात मालूम हो गई और वे रात को चोरी करने के लिये पहुँच गये। दामोदर जी ने उनको देख लिया और वे चुपचाप लेटे रहे। उन्होंने अपने मन में यह मान लिया कि चोर प्रभु की इच्छा से आये हैं और वे अपनी सब वस्तुएँ इनको देना चाहते हैं। चोरों ने मौका देखकर सब सामान की दो गठरियाँ बाँध लीं । एक गठरी तो एक चोर अपने घर उठा ले गया किन्तु जब दूसरा चोर दूसरी गठरी को अकेला उठा नहीं पाया तो स्वामी जी ने स्वयं उठकर गठरी उठवा दी। दूसरा चोर जब गठरी लेकर घर जा रहा था तो उसे सामने से अपना साथी आता मिला। साथी ने पूछा कि तैंने अकेले गठरी कैसे उठा ली ? पड़ौसियों ने इनकी आहट पाली और उनमें से एक को पकड़कर जान से मार दिया तथा गठरी स्वामी जी के यहाँ पहुँचा दी। जब स्वामी जी ने सुना कि एक चोर मार दिया गया है तो स्वामी जी को बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने उस दिन प्रसाद ग्रहण नहीं किया और चोर से वापिस ली गई गठरी में जितना सामान था उसको बेचकर भरे हुए चोर का महोत्सव कर दिया तथा जिस धन के लिये चोर ने अपने प्राण गँवाये थे वह उसी के काम में लगा दिया।

इसी प्रकार ब्रजवासियों ने अनेक बार उनके घर में चोरी की और स्वामी जी प्रसन्न होते रहे। अनेक धनवान लोग स्वामी जी पर श्रद्धा रखते थे और चोरी होने पर हर बार उसकी पूर्ति कर देते थे। एक बार गिरधर पुहकर दास जी (इनका चरित्र आगे दिया है) बहुत सा सामान लेकर स्वामी जी को देने के लिये आये।

सामान को देखकर स्वामीजी उठकर खड़े हो गये और यह कहकर मानसरोवर चले गये कि मैं अब ठाकुर जी के लिये भी सामान संग्रह नहीं करूँगा। उन्होंने स्मरण दिलाया कि सामान के पीछे ही एक ब्रजवासी मारा जा चुका है। उन्होंने उस समय एक दोहा भी कहा जिसका अर्थ इस प्रकार है ब्रज के सब स्त्री-पुरुष श्रीकृष्ण के सखी-सखा है। दामोदर स्वामी कहते हैं कि इसलिये उनके सामने सदैव विनम्र रहना चाहिये, सखी सखा सब

कृष्ण के ब्रजवासी नर-नारि ।
दामोदर जन नै चलौ, उत्तम यह विचार ।।

ब्रजवासियों का ही विचार करके स्वामी जी ने अपनी स्वरूप सेवा अन्यत्र पधरा दी और उसके स्थान पर नाम सेवा रख ली। बर्तनों की जगह उन्होंने दोना-पत्तल रख लिये स्वामी जी ने सैकड़ों पदों की रचना की है जिनको पढ़कर अथवा जिनका गान करके अनेक लोग भवसागर से पार उतरते रहे हैं और उतरते रहेंगे। भगवत मुदित जी कहते हैं कि दामोदर स्वामी जी की कहनी और रहनी में कोई अन्तर नहीं था। महाप्रभु श्री हरिवंशचन्द्र जी ने अपने प्रण के अनुसार स्वामी जी को नित्य-विहार के दर्शन करा दिये ।

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श्री रसिक दास जी

श्री रसिकदास जी बैराट नगर के रहने वाले थे। उनका जन्म कायस्थ कुल में हुआ था। कुछ दिन बाद वे गृहस्थ आश्रम छोड़कर वृन्दावन वास करने लगे। वे महाप्रभु के प्रपौत्र गोस्वामी दामोदरवर जी के शिष्य थे और वे श्री हिताचार्य की रचना हित चौरासी का पाठ एवं चिन्तन निरन्तर करते रहते थे। पाठ करते में उनका मन जिस पद में अटक जाता था उसी का चिन्तन वे बार वार करते रहते थे। वाणी की कृपा से जब रसिकदास जी को श्री श्यामा श्याम का अद्भुत रूप-सौन्दर्य सहज भाव से झलकने लगता था तो वे अपनी सुध-बुध खो देते थे और कई दिनों तक मूर्छा में पड़े रहते थे।

एक बार ठाकुर जी के लिए रसोई करते हुए उनका ध्यान उनके रूप में अटक गया और वे मूर्च्छित होकर दाल की बटलोई में रखी हुई कलछी पर गिर गये और कलछी उनकी जाँध के पार निकल गई। आहट सुनकर सब लोग दौड़े आये और जैसे तैसे कलछी को निकाला। रसिकदास जी को चौबीस घण्टे के बाद होश आया। उस समय उनके रोम-रोम में श्रीश्यामाश्याम की छवि भरी हुई थी और उनकी जाँघ का घाव गायब हो चुका था ।

इसी प्रकार की एक घटना और भी है। एक दिन रसिकदास जी अपने गुरु के मकान की छत पर बैठे हुए लीला-चिन्तन कर रहे थे। उन्होंने देखा कि श्री यमुना जी में अनेक नौकाएँ जगमगा रही हैं जिनमें सखियों के सहित श्री श्यामाश्याम विराजमान हैं। रसिकदास जी उनसे मिलने के लिए दौड़ पड़े और छत से नीचे गिर गये। छत साठ हाथ ऊँची थी लेकिन रसिकदास जी को तनिक भी चोट नहीं आई। जब उनको होश आया तो उन्होंने मकान के दरवाजे पर आकर किवाड़ खुलवाये। मकान में रहनेवाले सब लोग पूछने लगे कि तुम तो मकान की तीसरी मंजिल पर सो रहे थे तुम कहाँ होकर बाहर चले गये ? रसिकदास जी किसी को उत्तर नहीं दे रहे थे। जब उनके गुरु जी ने उनको शपथ दिलाकर

पूछा तब उन्होंने पूरी घटना सुनाई। -रसिकदास जी श्री यमुना पुलिन का भोग लगाया करते थे और समझदार रसिक भक्त लोग उनके इस भाव की प्रशंसा करते थे। भगवतमुदित जी कहते हैं कि रसिकदास जी के ऐसे अनेक चरित्र हैं जिनको सुनकर मनुष्य पवित्र हो जाता है ।

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श्री लालस्वामी जी

भगवत मुदित जी कहते हैं कि श्री हित हरिवंश महाप्रभु के तृतीय पुत्र श्री गोपीनाथ गोस्वामी अनन्य धर्म के प्रतिपालक थे। उन्होंने तथा उनके शिष्य प्रशिष्यों ने अनेक जीवों को भवसागर से पार किया। श्री राधिकावर का मन्दिर देवबन में सर्वप्रथम उन्होंने ही बनवाया था और उस मन्दिर में अष्टयाम सेवा का प्रचलन किया था ।

लालस्वामी जी ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे। किन्तु वे तत्कालीन शासन के कर्मचारी थे और वे उन लोगों के साथ मिलकर शिकार भी खेलते थे। वे सम्पूर्ण रूप से क्षत्री जैसे लगते थे। एक दिन वे किसी सरकारी काम से देवबन गये और कुछ घण्टे वहाँ ठहरे। प्रातः आठ बजे के लगभग जब श्री रंगीलाल जी के मन्दिर में श्रृंगार आरती हुई तो नगर के सब लोग दर्शनों के लिये दौड़ पड़े और लालस्वामी जी भी उनके साथ तमाशा देखने को हो लिये। श्री गोपीनाथ जी उस समय आरती कर रहे थे। लालस्वामी जी उनकी ओर एकटक देखते रह गये और उनको अपनी देह-गेह की सुध नहीं रही। साथ ही लालस्वामी जी को श्री गोपीनाथ जी के श्रीअंग में से एक मादक सुगन्ध आने का अनुभव हुआ। उन्होंने उस समय नीचे लिखा हुआ दोहा कहा

अति सुगन्ध हरिवंश तनय, मलयागर कौ बूट ।
लालदास ढिंग गहि रह्यौ, या मन्दिर कौ खूँट ।।
अर्थात श्रीहित हरिवंश जी के पुत्र चन्दन के पौधे हैं।

इनकी सुगन्ध पर मोहित होकर मैंने अब इस मन्दिर का आश्रय ले लिया है-यह कहकर उन्होंने गुसाईंजी के चरण पकड़ लिये और उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की। उनके साथियों ने उन पर घर लौटने के लिये बहुत दबाव डाला किन्तु वे मन्दिर छोड़ने के लिये तैयार नहीं हुए। उनकी श्रद्धा देखकर श्री गोपीनाथ जी ने उनको मन्त्र दे दिया और मन्त्र मिलते ही लालदास जी पूर्ण मनोयोग पूर्वक भजन में लग पड़े। थोड़े दिन में ही उनके हृदय में ऐसा प्रबल भगवत प्रेम उदय हो गया कि उनके सम्पूर्ण सांसारिक बन्धन टूट गये और वे उत्तम कोटि के अनन्य उपासक बन गये। उन्होंने अपना तन, मन, धन प्रभु के अर्पण कर दिया और मन्दिर में ही रहकर गुरु- इष्ट की सेवा करने लगे। एक दिन वे भावना (मानसिक सेवा) में लीन थे और षंटरस व्यंजन बनाकर गुरु-इष्ट को भोग रख रहे थे कि गुरु जी ने उनको एक रुपये का अँगोछा लाने की आज्ञा दी। वे रुपया लेकर बाजार को दौड़े किन्तु भावना में से पूरी तरह जाग नहीं पाये थे सो एक रुपये के लड्डू ले आये। गुसाईं जी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने अँगोछे की बजाय लड्डू ले आने का कारण जानना चाहा। किन्तु लालदास जी लज्जा के कारण कुछ बता नहीं रहे थे । अन्त में गुरु जी के शपथ दिलाने पर उन्होंने भावना की बात उनसे निवेदन की ।

प्रत्यक्ष अनुभव करके उसका वर्णन अपने पदों में करते रहे। एक दिन लालदास जी एक सन्त के साथ बैठकर प्रसाद पा रहे थे, उनकी पत्नी परोस रही थी। उसने सन्त जी को तो कम खीर दी और अपने पति को अधिक परोस दी। लालदास जी को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने अपनी थाली सन्त जी के सामने सरका दी। उनकी पत्नी ने कहा कि ये थाली तो मैंने आपके लिये परोसी है। लालदासजी ने कहा कि तुमको जितना प्रिय मैं हूँ उतने ही प्रिय मुझको ये सन्त हैं। उस दिन से उनकी पत्नी उनकी प्रकृति समझ गयी और उसने फिर कभी भी सन्तों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया।

श्री भगवैद् मुदित जी कहते हैं कि लालस्वामी जी का मैं अब एक ऐसा चरित्र लिखता हूँ जो रसिक लोगों को अत्यन्त प्रिय है। श्री ठाकुर जी का जब कोई उत्सव आता था तब लालदास जी अपना सर्वस्व उसमें लगा देते थे और पति-पत्नी के पास एक धोती शेष रह जाती थी। स्वामी जी के एक बड़ा सुन्दर बालक था। उसके बड़े होने पर लोग उसके सम्बन्ध के लिये उनके पास आने लगे। निकट के गाँव में एक बड़ा नामी और धनी ब्राह्मण रहता था। उसने कुछ लोग स्वामी जी का घर वार देखने के लिये भेजे। स्वामी जी की बैठक में उस समय कुछ सन्त बैठे थे, वहीं उन अतिथियों को भी बैठना पड़ा। उस समय स्वामी जी घर पर नह । उनकी ने सन्तों के लिये खिचड़ी बनाई थी जब लालदास जी घर आये तो उनको सन्तों के साथ चार आदमी और बैठे पाये। उन्होंने उनको भी अभ्यागत समझा। जब उनको भोजन के लिये सन्तों के साथ बैठाना चाहा तो उनकी पत्नी ने कहा कि पहले सन्तों को भोजन कर लेने दें, इन लोगों को पीछे करायेंगे । किन्तु स्वामी जी ने कहा कि ये हमारे अतिथि हैं इनके बैठे रहने पर हम कैसे भोजन कर सकते हैं ? उनकी पत्नी ने बताया कि ये लोग लड़का देखने आये हैं, इनको पीछे पक्का भोजन कराया जायेगा। यह बात सुनकर स्वामी जी एकदम बिगड़ गये और अपनी पत्नी को भली-बुरी सुनाकर रसोई में से हटा दिया। उस समय उन्होंने एक कवित्त भी कहा जिसका अर्थ इस प्रकार हैं

संसार के लोग अपने जमाई के लिये उत्तम प्रकार के भोजन बनाते हैं और कहीं उनकी पत्नी का भाई उनके घर आ उसके लिये तो उत्तम भोजन के साथ वस्त्र आभूषण भी दिये जाते हैं। भ्रम में पड़ी हुई ऐसी पतित पत्नियाँ समधी के नाई को नाना प्रकार के पकवान बनाती हैं। जिस प्रकार हाथी के खाने के और दिखाने के दाँत अलग-अलग होते हैं, उसी प्रकार संसार का भजन भी दो प्रकार का होता है – एक वास्तविक तथा दूसरा दिखाने का । जिस प्रकार बिल्ली का स्वभाव कभी बदलता नहीं है उसी प्रकार संसारी लोग अपना स्वभाव कभी छोड़ते नहीं है ।

तत्पश्चात् लाल स्वामी जी ने उन लोगों को सन्तों के साथ बैठाकर भोजन करा दिया। वे लोग स्वामी जी के पुत्र का सम्बन्ध लेकर आये थे अतः अच्छी खातिरदारी की आशा रख रहे थे रूखा-सूखा भोजन वे कर नहीं सके और स्वामी जी की आज्ञा लेकर भूखे ही उठ गये। उन्होंने वापिस जाकर लड़की वाले को बताया कि लालस्वामी जी का नाम तो बहुत है किन्तु घर में दरिद्रता का संयोग है और वहाँ सदैव बैरागी लोग पड़े रहते हैं। स्वामी जी ने हमको भी बैरागियों के साथ बैठाकर खिचड़ी खिला दी। यह सम्बन्ध बिल्कुल करने योग्य नहीं है।

किन्तु प्रभु इच्छा से लड़की के पिता के मन पर उक्त बातों का प्रभाव बिल्कुल विपरीत पड़ा और उन्होंने उन लोगों को समझाया कि जो लोग मुझसे पाने की आशा रखते हैं वही तुम्हारा आदर कर सकते हैं। लालस्वामी जी तो कृपापात्र महानुभाव हैं, उनकी दृष्टि में मैं क्या चीज हूँ वे लोकपालों को भी रंक समझते हैं। उनको आजकल पैसे की कुछ तंगी है इसी से प्रभु के रागभोग में कुछ कमी हो रही है। यह कहकर लड़की के पिता ने चौघड़िया मुहूर्त निकलवाकर बहुत बहुमूल्य सगाई लालस्वामी जी के यहाँ भेज दी।

हम ऊपर देख चुके हैं कि स्वामी जी ने लड़की वाले के आदमियों के साथ भेदभाव वर्तने के अपराध में अपनी पत्नी को रसोई में से निकाल दिया था। स्वामी जी ने एक वर्ष के पश्चात् उसको, गुरुजी की आज्ञा से स्वीकार किया और वह भी तब जब उनकी पत्नी ने दण्ड रूप में अपना गहना बेचकर साधुओं का भण्डारा कर दिया। पत्नी ने घर आकर अपने पुत्र के विवाह की तैयारी आरम्भ करा दी। स्वामी जी ने जब बारात के लिये खेल-खिलौने एवं आतिशबाजी का प्रबन्ध होते देखा तो उन्होंने एक कवित्त की रचना की जिसमें उन्होंने कहा है-पुत्र के ब्याह में प्रसन्न होकर पिता अपना सोना व्यय करके अग्नि वर्षा कराता है, कागज के कलियुगी बाग लगाकर फलों के लिये तरसता है। वह संसार से पार करने वाला भगवान का नाम तो नहीं लेता लेकिन भवसागर में डुबोने वाले अनेक नाम लेता रहता है। ऐसे मूर्खों के सम्पूर्ण सम्बन्ध स्वार्थ के लिये होते हैं और उनको परमार्थ की बात

स्पर्श नहीं करती। लड़की के पिता ने विवाह में स्वामी जी को बहुत धन दिया। स्वामी जी के सम्पर्क से उसकी बुद्धि शुद्ध हो गई और वह भी प्रभु का भजन करने लगा।

भगवत मुदित जी कहते हैं कि जो लोग नस्वर संसार का त्याग करके प्रभु के चरणों से लगे हुए हैं उनकी प्रभु सब प्रकार से लज्जा रख लेते हैं और उनके व्यवहार को भी नहीं बिगड़ने देते ।

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श्री जसवन्त राठौर जी

भक्त जसवन्त जी राठौर क्षत्रिय थे। उन्होंने जिस दिन गुरु की शरण ग्रहण की उसी दिन से संसारको मिथ्या मान लिया। उन्होंने अनन्य धर्म को भली प्रकार समझ लिया और श्री राधावल्लभ लाल को अपना सर्वस्व मान लिया। वे पूर्ण गुरु-सेवी तथा साधु-सेवी थे। उन्होंने वृन्दावन में एक मन्दिर का निर्माण कराया और ठाकुर जी के उत्सव उत्साह में विपुल सम्पत्ति खर्च करके • अत्यन्त सुख लिया। वे अपने महलों में सन्तों को पधराते थे और परिवार सहित उनकी सेवा करते थे। वे गुरु एवं साधुओं को संकल्प करके कोई वस्तु नहीं देते थे, क्योंकि वे समझते थे कि मेरे पास जो वस्तु है वह सब प्रभु की है। वे दुख-सुख, लाभ-हानि सबको समान मानते थे। काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ और मोह उनके मन को चंचल नहीं बना सकते थे। उनके यहाँ सन्त लोग पड़े ही रहते थे।

एक दिन एक ठग भक्त का वेष धारण करके उनके पास आया। जसवन्त जी उसको देखकर अपने स्वभाव के अनुसार बहुत प्रसन्न हुए और उसका बहुत आदर किया। वह मगन होकर हरि-गान करता था और सच्चे भक्त के से आचरण करता था। लोग यही समझते थे कि यह सच्चा साधु है। जसवन्त जी के एक बड़ा रूप गुण सम्पन्न पुत्र था। वह हमेशा तीस तोला स्वर्ण के आभूषण पहिने रहता था। आभूषण देखकर ठग के मुँह में पानी भर आया और उसने बालक से प्रेम बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। वह बालक को अनेक प्रकार के खेल खिलाता था और उसको अपने अनुरक्त करता था। एक दिन वह उसे वन में ले गया और उसको मार कर उसका जेबर उतार लिया। जेबर लेकर वह भागा जा रहा था कि रास्ते में उसे जसवन्त जी मिल गये। उन्होंने उससे पूछा कि तुम उदास क्यों दिखलाई दे रहे हो, ऐसा हमसे क्या अपराध बन गया है कि तुम इतने नाराज हो गये हो, तुम्हारे साथ तो मेरा भजन बहुत अच्छा बन रहा है। हम लोग गृहस्थ हैं, किसी ने तुमसे कुछ कह दिया हो तो क्षमा करें । जसवन्त जी की बातें सुनकर ठग भक्त काँपने लगा और मुँह से कुछ अटपटा सा बोलने लगा। जसवन्त जी उसे वापिस घर ले आये।

इधर संध्या हो जाने पर भी जब कुँवर घर नहीं आया तो चारों तरफ उसकी खोज होने लगी, किन्तु कोई पता नहीं लगा। अन्त में नगर में मुनादी कराई गयी। तब एक फकीर ने बताया कि आपके महल में जो बैरागी रहता है उसने लड़के के सारे गहने उतार कर उसको मार डाला है और जमीन में गाड़ दिया है। गड़ा हुआ बालक बाहर निकाला गया। जसवन्त जी यह देखकर विचार में पड़ गये। उन्होंने सोचा कि इस फकीर के कहने से सम्पूर्ण साधु-समाज कलंकित होता है। अतः उन्होंने उस फकीर को ही गिरफ्तार करा लिया और उससे कहा कि ये कुकर्म तूने ही किया हैं और साधु को कलंक लगा रहा है। साधु लोग ऐसे काम नहीं करते तूने ही मेरे पुत्र को मारकर गाड़ा है। यदि तू अपना भला चाहता है तो इस बात को किसी से नहीं कहना, यह कहकर उसको देश निकाला दे दिया।

जब ठग भक्त ने ये बात सुनी तो उसने समझा कि यह बात अब मेरे ऊपर ही आ रही है और वह भाग खड़ा हुआ। जसवन्त जी रास्ते में उसे फिर मिल गये और हाथ जोड़कर कहने लगे कि आप घबड़ायें नहीं आपने जो गहना लिया है उसके साथ-साथ आप और ले लीजिये। बालक तो आपका दास था और उसकी इतनी ही आयु थी। उसके मरने का सोच आप मत कीजिये। सब वेद और पुराण कहते हैं कि प्रभु और भक्त में कोई अन्तर नहीं होता है। आपके हाथ से मरने से उसकी मुक्ति हो गयी, अब आप घर चलिये यह कहकर जसवन्त जी ने अपना मस्तक उसके पैरों में रख दिया और उसे घर ले जाकर शेष गहना भी उसके सामने रख दिया। साथ में सौ मुद्राएँ उसकी भेंट कर दीं। यह देखकर ठग के हृदय में भक्ति का प्रकाश हो गया और उसकी दुर्बुद्धि नष्ट हो गयी। वह अपने अपराध के लिये गिड़गिड़ा कर क्षमा माँगने लगा। ठग भक्त के हृदय में सम्पूर्ण परिवर्तन देखकर जसवन्त जी अपनी पत्नी के पास गये और बोले कि ये साधु मुझको अब बहुत अच्छा लगता है। इसने जो काम किया है इसका इसे बहुत पश्चात्ताप हो रहा है। इसका दुःख दूर करने के लिये इसे अपनी कन्या दे देनी चाहिये। उनकी पत्नी ने कहा कि ये बात मेरे भी मन में आ रही थी। अब अपनी लड़की की सगाई इस साधु के साथ शीघ्र ही कर दीजिये।

पति-पत्नी की यह बात सुनकर श्री राधावल्लभलाल ने भी समझ लिया कि इन लोगों को देह-गेह की बिल्कुल आसक्ति नहीं है और ये अपनी निष्ठा में पूरे हैं। उन्होंने जसवन्त जी के पुत्र को जीवित कर दिया और वह खेलता हुआ सामने से दौड़ा चला आया। जसवन्त जी ने उससे पूछा कि तू इतनी देर से कहाँ था ? बालक ने हँसकर कहा कि मुझे तो ये भगत जी खिला रहे थे। भगवत मुदित जी कहते हैं कि श्री हरि और श्री हरि भक्त समान हैं तथा हमेशा रहेंगे। जसवन्त जी ने अपने पुत्र को मारनेवाले को अपनी पुत्री देकर उसका अत्यन्त सम्मान किया ।

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श्री भुवन जी

श्रीभगवद् मुदित जी कहते हैं कि संसार में कहीं भी भुवन जैसा भक्त नहीं सुना गया है। श्री हरिवंशचन्द्र की कृपा से युगल श्रीश्यामा-श्याम ने उनके हृदय में स्थाई निवारा किया था। भुवन जी के पिता भक्त जनों का सम्मान करने वाले परम शूरवीर योद्धा थे और राणाजी उनका बहुत सम्मान करते थे। वे राधावल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी थे। भुवन जी उनके एक मात्र पुत्र थे और उनके जन्म के थोड़े दिन बाद ही उनके पिता का देहान्त हो गया। बारह वर्ष की आयु होने पर राणा जी ने भुवन जी को सवा लाख का पट्टा देकर उनके पिता के स्थान पर नियुक्त कर दिया उनकी माता ने अपने पुत्र की तरफ से निश्चिन्त होकर श्री राधावल्लभ लाल के लाड़-चाव में अपना पूरा समय लगाना आरम्भ कर दिया । भुवन जी को शिकार खेलने का बहुत शौक हो गया था। इससे उनकी माता उनकी तरफ से बहुत दुखी रहती थीं। वे श्री राधावल्लभ लाल जी से प्रार्थना करती थीं कि हे प्रभो ! आपने मुझे एक पत्र दिया और वह भी हिंसक और निर्दय दिया यह पुत्र मेरे किसी काम का नहीं है। यह कहकर उन्होंने अपना मन पुत्र की तरफ से हटा लिया।

प्रभु इच्छा से एक दिन ऐसा बानक बना कि चूहों ने तीरों से भरा हुआ तर्कस कमरे के फर्स पर डाल दिया जिससे कि उसके तीर चारों तरफ फैल गये आवाज सुनकर भुवन जी घबड़ा कर उठे तो एक तीर उनके पैर में दो अंगुल गड़ गया और वे हाय मैया कह कर चिल्लाने लगे। उनकी माँ ने आकर उनको धिक्कारना आरम्भ किया और कहा कि हे कपूत ! तू क्षत्री होकर कायरों की तरह चिल्लाता है, तू जो जानवरों को कष्ट देता रहता है, उसी का तुझको यह फल मिला है। तू जीवों को कष्ट देना बन्द कर दे और तुझको जिसने यह देह दी है उसका भजन कर माता की यह शिक्षा भुवन जी के मन में पूरी नहीं उतरी और कुछ दिन बाद जब उनको शिकार के लिये आमंत्रित किया गया तो वे उनके साथ हो लिये। वन में इन शिकारियों को हिरण दिखाई नहीं दिये जब सब लोग वापिस आ रहे थे कि भुवन जी को एक हिरनी दिखाई दे गई और उन्होंने उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ा दिया। हिरनी गर्भवती थी इसलिए पूरी तरह से दौड़ नहीं पा रही थी। भुवन जी ने निकट जाकर उसके दो टुकड़े कर दिये। हिरनी गर्भवती थी उसके साथ उसके बच्चे के भी दो टुकड़े होते देखकर भुवन जी को शिकार खेलने से पूरी तरह घृणा हो गई। जब वे घर लौटकर आये तो माँ के चरणों पर पड़ गये और कहा कि माँ मैंने आज से शिकार खेलना छोड़ दिया है। अब तुम मुझे वृन्दावन ले चलो और दीक्षा दिलवा दो। उनकी माता ने उनको वृन्दावन लाकर महाप्रभु श्रीहरिवंशचन्द्र जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री बनचन्द्र जी से दीक्षा दिलवा दी। मन्त्र का जाप करते ही भुवन जी मन में पूर्ण वैराग्य जाग्रत हो गया किन्तु यह सोचकर कि मैं नौकरी छोड़ दूँगा तो धन के अभाव में प्रभु की और उनके भक्तों की सेवा नहीं बन पायेगी। उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी किन्तु हिंसा बचाने के लिये उन्होंने लोहे की तलवार बाँधना छोड़ दिया और उसके स्थान में . सोने की मूठ वाली काठ की तलवार बनवा ली। इस प्रकार वे बहुत दिन तक काठ की तलवार बाँधकर राजसभा में जाते रहे । एक दिन वे तलवार रखकर सरोवर में स्नान कर रहे थे। वहीं कुछ राजपूतों के लड़के नहा रहे थे। भुवन जी के सरोवर में प्रवेश करते ही लड़कों ने उनकी तलवार निकालकर देखी। उन्होंने राणा जी से शिकायत की कि आपका सबसे बड़ा सरदार काठ की तलवार बाँधता है तो अन्य लोगों पर क्या अनुशासन करेगा। राणा जी ने उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया, किन्तु वे बराबर कहते रहे और राणा ने तंग आकर तलवार की असलियत जानने की योजना बनाई। उन्होंने सरदारों की एक सभा की । उसमें नाच-गाने की व्यवस्था की। जब राग-रंग चल रहा था तब राणा जी ने सरदारों से कहा कि सब अपनी-अपनी तलवार निकालकर दिखाओ। राजा ने सबसे पहले अपनी तलवार निकाली और सरदारों को देखने को दे दी। जब भुवन जी की तलवार

दिखाने की बारी आयी तो एक क्षण के लिये वे बड़ी द्विविधा में पड़ गये। वे झूठ से बहुत डरते थे और यही कहना चाहते थे कि मेरी तलवार ‘दार’ (लकड़ी) की है। किन्तु प्रभु ने उनके मुख से निकलवाया कि वह ‘सार’ (लोहा) की है। फिर तो भुवन जी ने पूर्ण विश्वास पूर्वक उसको म्यान से निकालकर सरदारों की ओर देखने को बढ़ा दिया तलवार में ऐसी चमक थी कि सब लोग उसको देखकर डर गये और किसी की हिम्मत उसे हाथ में लेने की नहीं हुई। यह देखकर राणाजी चुगलखोरों पर एक दम बिगड़ उठे किन्तु भुवन जी ने राणा को वास्तविकता बताकर चुगलखोरों की रक्षा कर ली और सारा दोष अपने ऊपर ले लिया। उन्होंने कहा कि पंचों के बीच में श्री राधावल्लभ लाल ने मेरी लाज रख ली और मेरी मिथ्या को सत्य करके दिखा दिया है।

राजा यह बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और भुवनजी का एक लाख का पट्टा सवा लाख का कर दिया। उसने उनसे प्रार्थना की कि अब आपको मेरे यहाँ हाजरी देने की आवश्यकता नहीं है। आप सवा लाख रुपये साल भक्तों की सेवा को लेते रहिये और प्रभु का भजन करिये। इस घटना के बाद भी भुवन जी ने राणा के बहुत बड़े-बड़े काम किये और उनसे बहुत सम्मान प्राप्त किया ।

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श्री जयमल जी

जयमल जी श्री हरिवंश धर्म में बड़े दृढ थे। स्वार्थ परमार्थ को साधने में उनके समान कोई कुशल नहीं था। जयमल जी राजर्षि थे। उन्होंने श्री राधावल्लभ लाल जी को अपने अद्भुत प्रेम के द्वारा वश में कर रखा था। वे सदैव कथा, कीर्तन एवं सत्संग में समय व्यतीत करते थे और श्री ठाकुर जी के उत्सव बड़े चाव से मनाते थे। उनकी देह-गेह में बिल्कुल आसक्ति नहीं थी, आपने अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पित कर रखा था।

एक दिन वे घर में लेटे हुए थे कि उनके मन में विचार आया कि प्रभु की सेज तो हमारी सेज से ऊँची होनी चाहिये। यह सोचकर उन्होंने तीसरी मंजिल पर प्रभु का स्वतन्त्र मन्दिर बनवाया। वहाँ एक चित्रसारी की रचना की तथा उसके बाहर गमलों में अनेक पौधे लगाकर श्रीवृन्दावन का दृश्य उपस्थित किया चित्रसारी तक पहुँचने के लिये उन्होंने एक नसेंनी लगा दी और सेवा करने के बाद उसे उठाकर एक तरफ रख देते थे। उनकी सेवा का भेद उनकी रानी भी नहीं जानती थीं। एक दिन जयमल जी भक्तों के साथ चर्चा में व्यस्त थे। रानी सीढ़ी लगाकर चित्रसारी में पहुँच गयी तो उसने देखा कि गौर-श्याम कान्ति वाले दो किशोर प्रत्यक्ष रूप से सेज पर लेटे हुए हैं और उनकी छवि-झलक से सारा भवन जगमगा रहा है। इस छवि को देखकर रानी काँप उठी और गिरती-पड़ती सीढ़ी से नीचे आ गयी। एक दिन अवसर देखकर उसने अपने पति को सब वृत्तान्त सुना दिया। जयमल जी प्रकट रूप से तो उससे नाराज हुए कि तूने असमय में चित्रसारी के किवाड़ क्यों खोले। किन्तु मन में उन्होंने पत्नी के भाग्य की सराहना की जयमल जी सदैव इसी स्वरूप की भावना करते रहते थे और पौने चार घण्टे तक अष्टयाम सेवा में व्यस्त रहते थे। उसके बाद राजसभा आते थे और सब क्षत्रियों से भजन कराते थे। उन्होंने बड़े-बड़े मणियों की माला बना रखी थी और सब लोग एक ही माला को फेरते थे । डेढ़ घण्टे में माला का सुमेरु घूमकर अपनी जगह पर आ जाता था।

इस प्रकार निष्काम भजन करते हुए उनकी अस्सी वर्ष की आयु हो गयी। उनके इस लम्बे जीवन में शत्रुओं ने जब-जब सिर उठाया तब तब उनको श्री राधावल्लभ लाल जी की कृपा से पराजित होना पड़ा। एक दिन उनके शत्रु मड़ोवर के राजा को किसी ने यह भेद बता दिया कि जयमल जी सबा घण्टे तक भजन करते हैं और कराते हैं। इस अवधि में उनके पास आकर जो कोई अन्य बात कहता है तो उसे मरवा डालते हैं। अतः आप सवा पहर में उनके नगर पर हमला बोल दीजिये तो निश्चय ही विजय होगी। मड़ोवर के राजा ने वैसा ही किया और ३० हजार पैदल सेना तथा १० हजार घुड़सवार लेकर जयमल जी की राजधानी घेर ली। नगर में बड़ा भारी कोलाहल मच गया किन्तु किसी का साहस राजा को सूचना देने को नहीं हो रहा था। अन्त में जयमल जी की माँ रोती हुई उनके पास पहुँची और कहा कि मड़ोवर के राजा ने बहुत बड़ी फौज लेकर नगर को घेर लिया है और वे नगर के अन्दर घुसने लगे हैं, इधर तुम सब सरदारों को लेकर भजन में लगे हो जयमल जी ने माँ को उत्तर दिया कि घबड़ाने की कोई बात नहीं है जो प्रभु की इच्छा होगी वही होगा।

भक्त की दृढ़ इच्छा देखकर प्रभु का धैर्य छूट गया। वे जयमल जी के रूप में उनके घोड़े पर सवार होकर शत्रुओं के सामने आ गये। भगवान ने मड़ोवर वालों को कालरूप में दर्शन दिये और वे एक से अनेक बनकर उनके साथ युद्ध करने लगे। वे एक तीर से सैकड़ों आदमियों को मार रहे थे, यह देखकर मड़ोवर के राजा की सेना अपने शस्त्रों को छोड़कर भाग खड़ी हुई। मैदान खाली देखकर भगवान वापिस जयमल जी के बगीचे में आ गये और घोड़े को उसके स्थान पर बाँध कर अन्तर्धान हो गये।

जयमल जी जब अपना नित्य नियम करके निकले तो उनके मुख पर कोई चिन्ता नहीं थी, और वह कमल की तरह खिला हुआ था। बाहर आते ही उन्होंने अपना घोड़ा मँगाया तो उनको बताया गया कि अभी तो आप शत्रुओं को पराजित करके आये हो। आपके घोड़े से पसीना चुचा रहा है। यह सुनकर जयमल जी बाहर आये और युद्ध क्षेत्र की हालत देखकर चकित हो गये। उन्होंने गद्गद् होकर कहा कि भक्तों की रक्षा तो प्रभु सदैव करते आये हैं, किन्तु मुझसे तो कोई भक्ति बनी नहीं है, न जाने मेरी कौन सी बात पर रीझ गये ।

भगवद् मुदित जी कहते हैं कि प्रभु भक्तों के दुख में दुखी और सुख में सुखी रहते हैं। वे सदैव सच्चे प्रेम के वश में रहते हैं, इस बात को वेद और पुराण बताते हैं ।

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श्री हरिवंश दास जी

हरिवंशदास जी कायस्थ जब से महाप्रभु हित हरिवंश चन्द्र जी की शरण में आकर दीक्षित हो गये तब से श्री राधावल्लभलाल के जन में एकान्त रूप से रम गये। घर परिवार की चिन्ता छोड़कर वे अपने इष्ट की सेवा और सन्तों के सत्संग में अपना सारा समय बिताने लगे। वें जीव मात्र पर दया रखते थे और दीन-दुखियों का कष्ट दूर करते थे। भगवद् मुदित जी कहते हैं कि अब मैं श्री हरिवंशदास जी का एक ऐसा चरित्र लिखता हूँ जिसको सुनकर तन-मन पवित्र हो जाते हैं। एक समय एक साधु वेषधारी उनके यहाँ आया। अपने भजन-कीर्तन से उसने हरिवंशदास जी को बहुत प्रभावित कर दिया। वह उनके मन में ऐसा चढ़ गया कि वे उसको कभी अलग नहीं होने देते थे। किन्तु भीतर ही भीतर साधु का मन हरिवंशदास जी की सम्पत्ति में लगा रहा। एकदिन उसने भोजन बनाकर उसमें जहर मिला दिया और उसी रसोई का श्रीराधावल्लभलाल को भोग लगाया गया।

साधु ने अपनी पत्तल अलग रखकर परिवार के लोगों को विष मिला भोजन परोस दिया परन्तु ठाकुरजी की इच्छा ऐसी हुई कि विष मिला भोजन तो निर्विष हो गया और साधु का भोजन विषमय बन गया और देखते-देखते उसने अपने प्राण त्याग दिये। हरिवंशदास जी यह देखकर दुख के सागर में डूब गये और मन में सोचने लगे कि इस साधु के संग तो हम सेवा सुमिरन करते थे। अब हम किसके साथ भजन करेंगे और किसके साथ मिलकर भवसागर तरेंगे। हे प्रभु आपने मुझसे इनका वियोग क्यों कर दिया भोजन तो हमने मिलकर ही किया था परन्तु साधु ही क्यों मरा है ? इस कलंक को कैसे सहन करूँगा? हे प्रभो या तो आप इसे जीवित करिये अन्यथा इसके साथ मेरा शरीर भी त्याग करा दीजिये। भक्त के यह निष्कपट वचन सुनकर प्रभु ने साधु को एक क्षण में जीवित करके अपने भक्त की आकांक्षा पूर्ण कर दी।

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श्रीमती गंगा-यमुना बाई

ब्रज क्षेत्र का कामा नामक ग्राम उस समय डाकुओं का अड्डा बना हुआ था। एक दिन उस प्रदेश के शासक ने चढ़ाई करके गाँव को तहस-नहस कर दिया। ग्रामवासी यहाँ-वहाँ जाकर छिप गये। इनमें दो बालिकाएँ गंगा-यमुना बाई एकान्त वन में छिप गईं। कई दिन तक ये बिना अन्न-जल के भटकती रहीं। अन्त में एक वैष्णव साधु मनोहर दास उन्हें सहारा देकर मथुरा ले आया। वह संगीत-नृत्य में निपुण था। उसने अपनी बेटियों के समान लाड़ प्यार से पाल-पोस कर उन्हें संगीत-नृत्य की शिक्षा दी और दोनों कलाओं में पारंगत बना दिया। नृत्य कला में निपुण बनाने के पश्चात् उनके द्वारा धन कमाने की लालसा उसके मन में उत्पन्न हुई। उसने राजा मानसिंह के पास जाकर लड़कियों का सौदा दो हजार रुपयों में करना चाहा। राजा ने कहा कि तुम लड़कियों को ले आओ, मैं उनकी योग्यता की परख करके दो हजार रुपये से भी अधिक धन दे सकता हूँ। मनोहर उन्हें आगरा ले जाने के लिये वापिस मथुरा आया। यहाँ आते ही वह बीमार पड़ गया। उसने अपना अन्त समय निकट देखकर अपने गड़े हुए धन का ठिकाना लड़कियों को बता दिया। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसकी ३० हजार रुपये की सम्पत्ति में से लड़कियों ने उसकी उत्तर क्रिया सम्पन्न कर दी ।

श्री वृन्दावन में वास कर रहे, राजा परमानन्द दास जी कभी-कभी गंगा-यमुना बाईयों का संगीत सुनने मथुरा आया करते थे। मनोहर के मरने से वे बन्धन से मुक्त हो गयीं और राजा परमानन्द दास जी की सलाह पर वे वृन्दावन आ गयीं और श्रीहरिवंश महाप्रभु से दीक्षा ले ली। बाईयों ने महाप्रभु को मनोहर का सम्पूर्ण धन अर्पित कर दिया। गुसाईं जी ने उनको आज्ञा दी कि तुम अपने घर में श्री राधावल्लभ लाल की सेवा पधरा लो और हरि एवं हरि जनों की सेवा करो।

गंगा-यमुना बहिनें सेवा के कार्यों में हाथ खोलकर खर्च करने लगीं। वे उत्तम भोग लगाकर सन्तों को वितरण कर देती थीं और वीणा के साथ गाकर अपने प्रभु को रिझाती थीं। वे भोग-विलास को मिथ्या मानती थीं और हानि-लाभ, सुख-दुख को समान समझती थीं। वे प्रभु के नित्य नैमित्यिक उत्सव खूब उत्साह पूर्वक करती थीं। एकदिन मनोहरदास उनको स्वप्न में दिखाई दिया। उसने कहा कि मुझे प्रेत-योनि प्राप्त हुई है, तुमने मेरा धन तो सत्कर्म में लगा दिया है अब तुम अपना चरणामृत पिलाकर प्रेत योनि से मेरा उद्धार कर दो। यह सुनकर दोनों बहिनें मथुरा गईं और वहाँ मनोहरदास ने जो स्थान बताया था उसमें अपना तथा अन्य भक्तों का चरणोदक डालकर मनोहर दास का प्रेत योनि से उद्धार कर दिया और उसके बाद साधुओं का भण्डारा तथा कथा-कीर्तन भी करा दिया।

मथुरा के तत्कालीन हाकिम अजीजबेग ने जब इन बाईयों की संगीत कुशलता और सौन्दर्य की बात सुनी तो उसने दोनों बाईयों को किसी प्रकार अपने यहाँ बुलाकर एक एकान्त स्थान में बैठा दिया। रात के समय जब वह उनके पास जाने को हुआ तो वहाँ द्वार पर एक सिंह को बैठा हुआ पाया। सुबह जब होश आया तो दोनों बाईयों को माता कहकर उनसे क्षमा याचना की। अपने घर जाकर उसने बहुत सा धन इनकी भेंट के लिए भेजा। यह धन दोनों बहिनों ने ठाकुर जी के उत्सव और साधुओं के भण्डारे में व्यय कर दिया ।

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श्री खरगसेन जी

खरगसेन जी का जन्म कायस्थ कुल में हुआ था, और वे आरम्भ से ही वैराग्यवान एवं संत सेवी थे। एक बार रसिकजनों का संग मिलने पर वे श्री राधावल्लभलाल की शरण हो गये थे। मानगढ़ के राजा माधोसिंह के प्रधान थे। गृहस्थ में रहते हुए उन्होंने बड़ी अच्छी स्थिति प्राप्त कर ली थी, और सदैव कथा-कीर्तन, साधु- समागम, सेवा-सुमिरन में ही अपना अधिक समय व्यतीत करते थे। वे दुख-सुख, लाभ-हानि को समान समझते थे, और महाप्रसाद में उनकी दृढ़ निष्ठा थी। वे अपनी सम्पूर्ण सम्पति एवं पुत्र आदि को प्रभु का ही समझते थे एवं उनके नेत्र प्रभु की रूप माधुरी का दर्शन करके शीतल बने रहते थे। वे सदैव श्री राधाबल्लभलाल जी के नाम का उच्चारण एवं उनके यश का गान किया करते थे।

ऐसा सुखमय जीवन बिताते हुए एकदिन उनकी परीक्षा का समय आ गया चुगलखोरों ने राजा से कहा कि तुम्हारा प्रधान तुम्हारा धन लुटाता है, अन्यथा बिना चोरी के इतना खर्च कहाँ से करता है। राजा इस बात को सुनकर बहक गया और उसने खरगसेन जी को तुरन्त बुलाया और उनके ऊपर एक लाख रुपये का दण्ड करके कह दिया कि या तो इसे जल्दी से जल्दी खजाने में जमा करो नहीं तो मैं तुमको बहुत कड़ा दण्ड दूँगा। खरगसेन जी ने विनम्रता पूर्वक निवेदन किया- “आपने जो हाथ उठाकर दिया है वही मैंने लिया है, आपके खजाने में से मैंने एक पैसा भी नहीं लिया है। आप सत्य का पता लगाकर मुझे दण्ड दीजिये।” यह बात सुनकर राजा ने उन्हें बन्दीगृह में डलवा दिया और उनका अन्न-जल भी बन्द कर दिया। किन्तु प्रभु से उनकी यह दुर्दशा नहीं देखी गयी और रात्रि को यम दूतों ने राजा को दर्शन देकर उसको अनेक प्रकार से त्रास दिखाया। राजा जब रोने लगा तब यम के गणों ने उससे कहा कि तैने भक्तों को सताया है इसलिये यमराज ने हम लोगों को भेजा है। राजा मृतक के समान हो गया और उसके शरीर में साँस बाकी रह गयी। राजा की यह हालत देखकर चुगलखोरों को भी कष्ट हुआ कि खरगसेन जी को सताने से राजा ही यह हालत हुई है। वे लोग खरगसेन जी को लेकर राजा के पास गये और राजा को उनके चरणों में डाल दिया। खरगसेन जी को देखकर यम के दूत भाग गये।

तब से राजा खरगसेन जी का बहुत आदर करने लगा और उनको प्रभु के समान मानने लगा। उसने श्री राधावल्लभलाल की शरण ग्रहण कर ली। भगवद् मुदित जी कहते हैं कि सत्संग से मनुष्य सम्पूर्ण रूप से बदल जाता है, सत्संग मंगल रूप है सत्य स्वरूप है। सत्संग से मन में विश्वास उत्पन्न होता है और सुखों का प्रकाश होता है। सत्संग से रास- विलास के दर्शन होते हैं और वृन्दावन वास प्राप्त होता है। खरगसेन जी जीवन भर सत्संग करते रहे, और श्री राधावल्लभ लाल को लाड़ लड़ाते रहे। एक दिन वे श्री राधावल्लभ लाल का गुणगान करते हुए उनको हार धारण करा रहे थे कि उनके प्राण शरीर को छोड़कर प्रभु के चरणों में पहुँच गये।

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श्री सुन्दरदास जी

श्री सुन्दरदास जी भटनागर कायस्थ कुल के थे। ये उत्तर प्रदेश में सहारनपुर जिले के निवासी थे। बादशाह अकबर की नवरत्न सभा के सदस्य अब्दुर्रहीम खानखाना के ये दीवान थे और उनका बादशाह अकबर बहुत आदर करते थे।

गद्दी पर बैठने के कुछ दिनों बाद अकबर बादशाह ने सब राजाओं को आज्ञा दी कि जहाँ-जहाँ वैष्णवों के तीर्थ स्थान हैं. वहाँ मन्दिरों का निर्माण करायें। ऐसे सात तीर्थ स्थानों में श्रीवृन्दावन भी शामिल था। बादशाह के इस ऐलान के बाद हिन्दू राजा लोग मन्दिर बनवाने की पूछताछ करते हुए श्री हरिवंश महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र श्रीबनचन्द्रजी महाराज के पास भी आये। इनमें गोपालसिंह यादव नाम के बादशाह अकबर के एक मनसबदार भी थे। बनचन्द्रजी महाराज ने उनसे कहा कि तुम्हारा प्रस्ताव तो ठीक है किन्तु यहाँ की एक बात बहुत अटपटी है जो तुमको पसन्द नहीं आयेगी। तुम्हारे बनाये हुये मन्दिर में जब ठाकुरजी पधारेंगे उसके एक साल बाद तुम्हारा देहान्त हो जायेगा। गोपालसिंह यादव इसको स्वीकार नहीं कर सका और दुखी होकर उठ गया। इसी तरह राजा मानसिंह भी आया पर यही बात सुनने पर वापिस चला गया। उसने चैतन्य सम्प्रदाय के श्री रूप गोस्वामी के पास जाकर गोविन्द जी का मन्दिर बनवा दिया। इसी तरह अनेक लोग श्रीबनचन्द्र गोस्वामी के पास आये किन्तु मृत्यु के भय से सभी चले जाते थे।

श्रीबनचन्द्र जी के छोटे भाई श्री गोपीनाथ गोस्वामी थे जो देवबन में रहते थे। सुन्दरदास जी उन्हीं के शिष्य थे। वे अपने गुरु के ज्येष्ठ भ्राता को दिल्ली बुलाने के लिये अनेक दिनों से सचेष्ट थे। किन्तु श्री बनचन्द्र गोस्वामी को सेवा से अवकाश नहीं मिलता था। सुन्दरदास जी के अतिरिक्त अन्य शिष्य गण भी श्री बनचन्द्र जी से दिल्ली आने का आग्रह कर रहे थे। अन्त में श्री बनचन्द्र जी दिल्ली पधारे और एक शिष्य के यहाँ ठहर कर उपदेश करने लगे। सुन्दरदास जी ने जब उनके पधारने की खबर सुनी तो उन्होंने अपने घर पर उनकी पधरावनी की और उनको एक लाख रुपया भेंट किया एवं उनसे प्रार्थना की कि आप इस धन से राधावल्लभलाल का रागभोग कराइये और वृन्दावन से बाहर न पधारिये । श्रीवनचन्द्र गोस्वामी इस बात को सुनकर बिगड़ उठे और बोले, अरे मूढ़ ! स्वयं प्रभु भी भक्तों के अधीन रहते हैं और भक्त जब उनको जहाँ पुकारते हैं वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। ऐसा ही स्वभाव उनके भक्तों का होता है। वे भी संसार का हित करते हुए विचरण करते हैं और जहाँ भी वे जाते हैं प्रभु की प्रेरणा से ही जाते हैं क्योंकि भक्त कभी स्वतन्त्र नहीं होते। यह कहकर श्री बनचन्द्र गोस्वामी सुन्दरदासजी की भेंट को छोड़कर श्रीवृन्दावन चले आये इस घटना से सुन्दरदास जी को बहुत पश्चाताप हुआ और उन्होंने अन्न-जल का त्याग करके यह प्रण कर लिया कि जब तक गुसाईं जी प्रसन्न नहीं होंगे तब तक मैं प्रसाद ग्रहण नहीं करूँगा ।

देववन में सुन्दरदास जी के गुरु श्री गोपीनाथ जी ने जब यह घटना सुनी तब वह अपने शिष्य को साथ लेकर अपने ज्येष्ठ भ्राता के पास आये और उसे क्षमा कर देने की प्रार्थना की। भाई के आग्रह पर श्री बनचन्द्र गोस्वामी ने सुन्दरदास जी को क्षमा के आग्रह पर श्री बनचन्द्र गोस्वामी ने सुन्दरदास जी को क्षमा करके प्रसाद ग्रहण कराया किन्तु उनकी भेंट ग्रहण नहीं की। सुन्दरदास जी ने प्रार्थना की कि महाराज यदि आप भेंट ग्रहण नहीं करते हैं तो इससे श्री राधावल्लभलाल के मन्दिर का निर्माण करा दीजिये। बनचन्द्र जी ने उनसे भी यही शर्त रखी कि मन्दिर बनने पर श्री ठाकुर जी के विराजमान होने के एक साल बाद तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी। सुन्दरदास जी यह सुन करके बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने यह समझा कि मेरे पूर्वभाग्य का उदय हो रहा है। उन्होंने कहा कि श्रीवृन्दावन की रज ब्रह्मादिकों को दुर्लभ है उसे आप स्वयं मुझे प्रदान कर रहे हैं। मैं मन्दिर बनवाने के लिये पूर्ण तैयार हूँ और एक वर्ष के उत्सवों का सुख देखने के बाद मैं अपने शरीर को छोड़ दूँगा। मेरी मृत्यु के बाद आप एक कृपा करें कि मन्दिर के बिल्कुल सामने मेरी समाधि बनवा दें। प्रभु ने भी स्वप्न में श्री गोस्वामी जी को आज्ञा दी कि सुन्दरदास जो चाहता है वह कर दीजिये। श्री बनचन्द्र गोस्वामी ने सुन्दरदास जी को कहा कि मुझे प्रभु से आज्ञा प्राप्त हो गई है और मैं तुम्हारे कहने के अनुसार तुम्हारी समाधि बनवा दूँगा। सुन्दरदास जी का मन्दिर सम्वत् १६४२ में बनकर तैयार हो गया।

श्री राधावल्लभ जी के नये मन्दिर में विराजमान हो जाने के बाद सुन्दरदास जी ने बड़ी धूम धाम से उत्सव करना शुरू कर दिया और बहुत धन खर्च कर दिया। यह देखकर कुछ चुगलखोरों ने रहीम खानखाना से चुगली की कि सुन्दरदास तुम्हारा खजाना खाली किये दे रहा है। खानखाना ने इस समाचार को सुनकर सुन्दरदास जी को पत्र लिखा कि तू मेरा कर्मचारी है और तू जो कुछ भी कार्य करे वह उत्तम से उत्तम रूप में करना, नहीं तो मेरी बदनामी होगी । सुन्दरदास जी यह पत्र पाकर एकदम आश्वस्त हो गये और अधिक से अधिक खर्च करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने प्रभु के पाटोत्सव पर सम्पूर्ण ब्रज के ब्रजवासियों को जाति-भेद छोड़कर भोजन कराया। इस प्रकार से उन्होंने पूरे वर्ष के उत्सवों पर अधिक से अधिक खर्च किया और जब वही दिन लौटकर आया जिस दिन प्रभु को मन्दिर में पधराया गया था तो सुन्दरदास जी देह त्यागने के लिए पूर्णरूप से तैयार हो गये। उन्होंने श्री ठाकुर जी का चरणोदक लिया और गुरुजनों का दर्शन करके उनकों भेंट चढ़ाई। उसके बाद समाजियों ने हित चतुरासी जी का “बनी वृषभानु नन्दिनी आजु” वाला पद गाया। सुन्दरदास जी ने श्रीश्यामाश्याम का हृदय में ध्यान करते हुए उपस्थित सब लोगों को दण्डवत प्रणाम की और प्राण त्याग दिये। श्री भगवद् मुदित जी कहते हैं कि संसार में धन अनर्थता का मूल है किन्तु यही जब प्रभु की सेवा में लगा दिया जाता है तो नरक से उद्धार करने वाला बन जाता है। अपना धन और तन प्रभु की सेवा में लगाकर सुन्दरदास जी प्रेम रस में निमग्न हो गये ।

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श्री चतुर्भुजदास जी

भगवत मुदित जी कहते हैं कि श्री हरिवंश चरण कमल की कृपा से और अपने गुरु बनचन्द्र गोस्वामी का भरोसा रखकर रसिक चतुर्भुजदास जी ने गौड़ देश को पवित्र कर दिया। चतुर्भुजदास जी अपने समय के बहुत प्रसिद्ध महात्मा थे। दामोदर दास जी सेवक के मित्र के रूप में उनका नामोल्लेख सेवक जी के चरित्र में हो चुका है। वे स्वयं सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता थे और अनेक विद्वान पंडित उनके साथ में रहते थे। वे श्री हितहरिवंश गोस्वामी द्वारा स्थापित अनन्य रसिक धर्म का सर्वत्र प्रचार करते थे। उन्होंने द्वादश यश नामक एक ग्रन्थ रचा है जो प्रकाशित हो चुका है और जिसमें उनके अनन्य एवं उदार दृष्टिकोण का परिचय मिलता है। उनके ठाकुर जी का नाम मुरलीधर जी था और वे अपनी कविता में ठाकुर जी के नाम की छाप लगाते थे। वे प्रवास काल में भी प्रभु के उत्सव करते रहते थे और जो भी द्रव्य आता था सब ठाकुर जी के उत्सव में लुटा देते थे। उनका चारों ओर जय-जयकार होते देखकर प्रभु विमुखों ने उनका विरोध करना आरम्भ कर दिया किन्तु जिनके रक्षक श्रीराधाबल्लभलाल हैं उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है ?

एक गाँव में विमुखों ने उनको एक ऐसे बाग में ठहरा दिया जो भूतों के निवास स्थल के रूप में प्रसिद्ध था। भूत लोग आस पास न तो खेती होने देते थे और न उस बगीचे में किसी को ठहरने देते थे। भले लोगों ने चतुर्भुज दास जी को वहाँ न ठहरने की राय दी पर वे हठपूर्वक वहीं ठहर गये एवं अपने ठाकुर श्री मुरलीधर जी को विराजमान करके उनकी अष्टयाम सेवा चालू कर दी।

जब घंटा घड़ियाल के साथ आरती आरम्भ हुई तब वहाँ उपस्थित तीस प्रेतों ने आरती के दर्शन किये और वे भगवद्धाम चले गये। बाकी प्रेत बाद में आये और चतुर्भुदासजी से विनय की कि आप एक गढ़ा खुदवाकर उसमें सन्तों का चरणामृत डलवा दें। श्रीचतुर्भुज दासजी ने वैसा ही किया और शेष प्रेतगण भी चरणोदक पान करके भगवद्धाम को प्राप्त हो गये ।

भूतों के उद्धार की यह बात सुन कर आस पास के नगर निवासी स्वामीजी के शरण हो गये तथा उस देश का राजा भी उनके दर्शन करने के लिये आया। राजा ने भी उनसे दीक्षा ले ली तब से वह बगीचा रहने के योग्य बन गया। एकबार गढ़ा के निकट एक गाँव में चतुर्भुजदास जी चातुर्मास कर रहे थे। उस गाँव में सब लोग राधावल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी थे। आपने कथा, कीर्तन, अष्टयाम सेवा आदि चालू कर रखी थी। प्रतिदिन वे शाम के समय सैकड़ों श्रोताओं को भगवद् चरित्र सुनाते थे उस नगर में एक बड़ा मशहूर चोर रहता था। एक दिन वह दिन दहाड़े किसी दुकानदार की थैली छीन कर भाग खड़ा हुआ। राजकर्मचारी उसके पीछे दौड़े और उसको पकड़ने ही वाले थे कि चोर ने कोई उपाय न देख कर झट से अपनी धोती खोल कर साधुओं जैसा वेश बना लिया और चतुर्भुजदास जी की कथा में आकर बैठ गया। राजकर्मचारी उसको ढूँढ़ कर वापिस चले गये। उस समय कथा में यह प्रसंग चल रहा था कि दीक्षा लेने के बाद मनुष्य का नया जन्म हो जाता है तथा उसके करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवदशरण ग्रहण किये हुए व्यक्ति को लोक और परलोक में कोई दण्डित करने में समर्थ नहीं होता। उससे यमराज तक डरने लगते हैं तो संसार के राजाओं का तो कहना ही क्या ? जीव जब गुरु चरणों का आश्रय ले लेता है तभी उसका प्राकृत देह अप्राकृत हो जाता है। यह सब कथा उसने सुनी और सद्भाग्य से वह उसके मन में उतर गई। कथा के बाद वह एकांत में चतुर्भुजदास जी से मिला और उनको अपना सारा वृत्तान्त सुना दिया। उसने उनसे कहा कि स्वामी जी आपने आज जो कथा सुनाई है उसकी सत्यता पर आपने बहुत भार दिया है। मैंने अपने मन में आपकी शरण ग्रहण करली है तथा आपके कथनानुसार मेरा अब नया जन्म हो चुका है। मेरे हृदय में आपके वचनों पर पूर्ण विश्वास हो गया है। अब आप मुझे अपनी शरण में ले लीजिये। चतुर्भुज दास जी ने उसका मुंडन कराकर उसे स्नान कराया और उसको दीक्षा दे दी। अब वह चोर निर्भय होकर बाजार में घूमने लगा।

एक दिन उसको दुकानदार ने पहचान लिया और कई लोगों की मदद से उसको पकड़ लिया और सब लोग मिलकर उसको राजद्वार पर ले गये। राजा के सामने जाकर दुकानदार और चोर ने अपने-अपने पक्ष उपस्थित किये और दोनों अपनी बात पर अड़े रहे। चोर कह रहा था कि मैंने चोरी नहीं की है और अपनी बात को बड़ी दृढ़ता के साथ पुष्ट कर रहा था। राजा बड़ी दुविधा में पड़ गया और सोचने लगा अब तो सत्य बात का पता ‘फारे’ की क्रिया के द्वारा ही हो सकता है। इस क्रिया में अपराधी के हाथ पर पहले तो सूत लपेटा जाता है और फिर घी में भिगोया हुआ पीपल का पत्ता उसके ऊपर चिपका दिया जाता है। फिर उसके ऊपर आग में लाल किया हुआ लोहे का पिण्ड रखा जाता है। चोर के साथ यही किया गया। चोर ने ऊँची आवाज में कहा हे प्रभु ! मेरे गुरुजी ने कहा है कि मेरा नया जन्म हुआ है अतः मेरा हाथ नहीं जलना चाहिये। उसने यह कहकर ‘फारा हाथ में ले लिया और सात कदम चलकर फेंक दिया। प्रभु ने चोर की लज्जा रख ली और चोर का हाथ बिल्कुल नहीं जला लेकिन उधर बनिये का हाथ जल गया। तब तो राजा दुकानदार के ऊपर बड़ा नाराज हुआ और उसे फाँसी का आदेश दे दिया। चोर साधु ने यह कहा कि इसको आप दण्ड न दीजिये। यह जो कुछ भी कह रहा है सब सच कह रहा है। मैंने निश्चित रूप से चोरी की लेकिन वह मेरे पूर्व जन्म की बात है।

श्री चतुर्भुज दास जी का इस प्रकार का प्रभाव देखकर राजा उनके पास आया और उनसे दीक्षा ले ली। भगवद् मुदितजी कहते हैं कि पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है। चतुर्भुज दास जी के संग से चोर का प्राकृत देह अप्राकृत बन गया ।

श्री चतुर्भुज दास जी का एक और बड़ा अद्भुत चरित्र है । वे बड़ी कट्टरता के साथ वैष्णव धर्म का पालन करते थे। शिव और शक्ति के उपासकों से उनको बड़ा परहेज था। उनके पास जो भेंट आती थी उसके लिये पहले वे पूछ लेते थे कि यह भेंट कोई शैव या शाक्त की तो नहीं है। इसी प्रकार यदि रास्ते में कोई कुआँ पड़ता था तो यह पहले जान लेते थे कि ये किसका बनबाया हुआ है यदि शैव या शक्ति का बनवाया होता था तो वे उसका पानी नहीं पीते थे। उनकी कट्टर अनन्यता को देखकर अनेक लोगों ने अनन्य वैष्णव धर्म स्वीकार कर लिया ।

एक दिन भ्रमण करते हुये वे एक नगर में पधारे और एक सुन्दर स्थान देखकर उन्होंने वहाँ ठहरना चाहा किन्तु वह स्थान देवी का था और देवी के पण्डे ने स्वामी जी को बतलाया कि यहाँ राजा आता रहता है और देवी को भैंसों तथा बकरों की बलि चढ़ाता रहता है, यह स्थान आपके ठहरने लायक नहीं है। लेकिन चतुर्भुजदास जी ने देवी के मन्दिर में ही डेरा डाल दिया और देवी को उठाकर किसी दूसरे स्थान में रख दिया। पण्डा बाहर खड़ा हुआ चिल्लाता रहा और देवी से ऐसे विधर्मियों को नष्ट करने की प्रार्थना करता रहा। चतुर्भुज दास जी ने देवी के स्थान में मुरलीधर जी का सिंहासन विराजमान कर दिया। देवी की प्रतिमा उनके तेज प्रताप से उड़कर मन्दिर के बाहर जा पड़ी भक्त के तेज ने देवी के शरीर में जलन पैदा कर रखी थी। उससे बचने के लिए वह एक कन्या के सिर पर आयी और पण्डे से बोली कि तू जाकर स्वामी जी से प्रार्थना कर कि मुझे अपना शिष्य बना लें और मुझे शान्ति प्रदान करें। स्वामीजी ने देवी को बुलाया और उसको दीक्षा देकर कहा कि अब तू जीव-हिंसा कभी मत करना और भक्तों से सदैव प्रेम रखना। यह सब देखकर पण्डे ने भी स्वामीजी से दीक्षा ले ली। देवी ने अब राजा को वैष्णव बनाना चाहा और जहाँ वह सो रहा था वहाँ उसके पलँग को उलटा दे मारा। उसने राजा से कहा कि मैं वैष्णव बन गई हूँ तू भी अपना हित चाहता है तो अपने परिवार सहित जाकर चतुर्भुजदास जी से दीक्षा ले ले। यदि तैंने या अन्य किसी ने मुझे किसी जीव की बलि दी तो उसका मैं सर्वनाश कर दूँगी। राजा ने शहर में इस बात की मनाही करा दी और उस दिन से देवी के सामने नारियल की बलि दी जाने लगी भगवद् मुदित जी कहते हैं कि चतुर्भुजदास जी ने अपने चरित्रों से भक्त की महिमा को प्रकाशित कर दिया। उन्होंने श्री युगल के चरणों में विश्वास रखकर सम्पूर्ण साधनों की तुच्छता प्रदर्शित कर दी।

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श्रीकर्मठी बाई जी

काथरिया बागर नामक गाँव में पुरुषोत्तम नाम के ब्राह्मण रहा करते थे। उनकी एक कन्या थी। विवाह के बाद बाल्यावस्था में वह विधवा हो गयी। विधवावस्था में वह बचपन से ही व्रत-संयम और भगवद् चिन्तन में रम गयी और कठिन जीवन बिताना आरम्भ कर दिया जिससे उसका नाम कर्मठी पड़ गया। बारह वर्ष की उम्र में उसके पिता भी चल बसे। पिता और पति दोनों के देहान्त के बाद कर्मठी बाई को केवल अपने ताऊ का आश्रय रह गया जिनका नाम हरिदास था और जो हरिवंश महाप्रभु के शिष्य थे। हरिदास जी ने कन्या से कठिन साधना छुड़वा दी और उसे भागवत धर्म की शिक्षा दी। थोड़े दिन बाद वे कन्या को लेकर वृन्दावन आये और श्री हरिवंशचन्द्र से दीक्षा दिलवा दी। दीक्षा लेने के बाद कर्मठी गुरु-पद्धति से सेवा करने लगी तथा संसार से सम्पूर्ण रूप से विरक्त होकर साधुजनों की सेवा करने लगी। कुछ दिन में उसके पास का धन समाप्त हो गया और वह रुई कातकर ठाकुर जी का रागभोग चलाने लगी।

कर्मठी बाई जहाँ रहती थी वहाँ पड़ौस में एक वैश्य रहता था। कर्मठी बाई का रूप देखकर उसके मन में दुर्वासना उत्पन्न हुई। एक दिन वह रात के अँधेरे में कर्मठीबाई के घर में घुसने को हुआ तो नाग ने उसे डस लिया और वह मर गया। कुछ दिन बाद वह अपने बेटे को स्वप्न में दिखाई दिया और उसने गढ़े हुये धन का पता बताकर उसको कर्मठी बाई को भेंट करने का निर्देश दिया। बनिये के पुत्र ने कर्मठी जी से धन स्वीकार करके उसके पिता का उद्धार करने की प्रार्थना की। परन्तु कर्मठी बाई ने कहा कि यह धन साधु-सेवा में लगा दो और गुरु दीक्षा लेकर प्रभु का भजन करो ।

इसी तरह एक और घटना कर्मठी बाई के जीवन की है। अकबर की धाय का पुत्र अजीज बेग था जिसको मथुरा नगर जागीर में मिला था। उसने अपनी ओर से हसन बेग को मथुरा का शासक नियुक्त किया था हसन बेग एक दिन श्री वृन्दावन आया और वहाँ की लता-पताओं को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। वृन्दावन में अचानक उसने कर्मठी बाई को यमुना जी में स्नान करके जल लाते हुये देखा और वह उसके रूप पर मोहित हो गया। उसने मथुरा जाकर एक दूती को वृन्दावन भेजा और किसी भी प्रकार कर्मठी बाई को मथुरा लाने की आज्ञा दी। भक्त का वेष बनाकर दूती कर्मठी बाई के पास आने-जाने लगी और हसन वेग को सूचना देती रही। फिर दो दिन नहीं आयी। तीसरे दिन आने पर उसने बहाना बनाकर कहा कि एक परम सिद्ध महात्मा मेरे घर आ

गये थे, इससे दो दिन मैं नहीं आ सकी। कर्मठी ने सहज स्वभाव से उन महात्मा के दर्शन कराने की प्रार्थना दूती से की। दूती कर्मठी जी को मथुरा ले गई और वहाँ उनको अपने घर में बैठा कर स्वयं यमुना स्नान का बहाना बनाकर बाहर चली गयी और हसनबेग से मिल कर उसको सूचना दे दी हसन बेग आकर दूती के मकान के एक कमरे में बैठ गया। फिर दूती कर्मठी के पास जाकर बोली कि जल्दी चलो मैं तुम्हें महात्मा के दर्शन करादूँ और जहाँ पर हसन बेग छुपा बैठा था उसी कमरे में कर्मठी बाई को बैठाकर बाहर से किवाड़ बन्द कर गई। तब हसन बेग ने कर्मठी के साथ अभद्र व्यवहार करना शुरू कर दिया। भय से ग्रस्त कर्मठी बाई ने परम आर्त हृदय से श्री हित जी महाराज का स्मरण किया और उसी क्षण में हसन बेग ने देखा कि सिंह- सिंहनी बड़े बेग से उसकी तरफ झपट रहे हैं। डर के मारे हसन बेग रक्षा के लिये कर्मठी बाई के सामने घिघियाने लगा और उसने भाग कर कमरे के बाहर निकलना चाहा किन्तु वहाँ दरवाजा बन्द था ।

हसन बेग ने चिल्लाकर दूती से कहा कि मुझे सिंहनी खाये जा रही है, तू जल्दी किवाड़ खोल दूती ने किवाड़ खोलकर देखा कि वह थर थर काँप रहा है किन्तु दूती को वहाँ सिंहनी दिखाई नहीं दी और कर्मठी भी वहाँ से जा चुकी थी। दूती ने कर्मठी के घर से खबर मँगाई तो मालूम हुआ कि वह अपने घर में सेवा कर रही है।

हसन बैग को भक्त के प्रताप का परिचय मिल गया था और वह अपना अपराध क्षमा कराने के लिये व्याकुल था। वह कर्मठी के घर जाकर उससे मिला और सौ मोहरें भेंट कीं। कर्मठी ने कहा कि हमें तो साधु-जनों के चरणों की रज अच्छी लगती है, ये धन हमारे काम का नहीं है। कर्मठी के दर्शन से हसन बैग के हृदय में वैराग्य उदय हो गया और वह धन उसने साधुजनों की सेवा में लगा दिया। भगवद् मुदित जी कहते हैं कि इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि भगवान भक्तों के धर्म की रक्षा करते हैं और भक्तों के संसर्ग से संसार के बन्धन कट जाते हैं।

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श्री दामोदर दास ‘सेवक’

श्री भगवद् मुदित जी कहते हैं कि सेवक के समान संसार में आज तक कोई दूसरा सेवक नहीं हुआ। वे सम्पूर्ण धर्मियों में प्रधान थे और श्री हरिवंश के नाम और उनकी वाणी उनका सर्वस्व थे।

मध्य प्रदेश के गौड़ अंचल में गढ़ा नामक स्थान है जहाँ चतुर्भुज दास जी निवास करते थे। उनका सेवक जी के साथ निष्कपट प्रेम था। दोनों ने उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लिया था और दोनों बड़े पण्डित व चतुर थे। उन लोगों का हरि-भक्तों से स्वाभाविक अनुराग था। दोनों किसी सद्गुरु की तलाश में थे। एक दिन श्रीवृन्दावन से रसिक उपासकों की एक टोली गढ़ा पहुँची। रसिकों ने पूरी रात लीलागान किया और ये दोनों (चतुर्भुज दास जी और सेवक जी) प्रेम पूर्वक उसका श्रवण करते रहे। रसिकों ने इनकी श्रद्धा देखकर पूछा कि तुम किसके शिष्य हो ? दोनों ने कहा कि हम अभी किसी के शिष्य नहीं हैं। अब आप बतायें कि हम किसको गुरु बनायें। तब रसिकों ने कहा कि श्रीवृन्दावन में आजकल श्री हरिवंशचन्द्र सब रसिकों द्वारा प्रशंसित हो रहे हैं। यह कह कर रसिकों ने श्री हिताचार्य के रस सिद्धान्त की रूप रेखा उनको समझाई और उनकी जगत क्रिया से अलग रहनी का वर्णन किया ।

यह सुनकर दोनों मित्रों ने श्री हरिवंशचन्द्र से दीक्षा लेने का निर्णय कर लिया किन्तु वे गृहस्थ में से शीघ्र निकल नहीं पाये और उधर हिताचार्य अन्तर्धान हो गये। इस समाचार से दोनों मित्रों को अधिक कष्ट हुआ और वे घर का काम छोड़कर उन्मत्तों की भाँति घूमने लगे। श्रीवृन्दावन से फिर यह खबर आयी कि श्रीहरिवंश जी की गद्दी पर श्रीबनचन्द्र जी विराजमान हैं। चतुर्भुजदास जी ने सेवक जी से कहा कि अब हम लोगों को श्री बनचन्द्र जी से दीक्षा ले लेनी चाहिये। किन्तु सेवक जी ने कहा कि दीक्षा तो मैं हरिवंशचन्द्र जी महाराज से ही लूँगा नहीं तो शरीर का त्याग कर दूँगा। यह सुनकर चतुर्भुजदास जी तो श्रीवृन्दावन चले गये और श्रीबनचन्द्रजी से दीक्षा लेली और इधर सेवक जी ने स्वप्न में देखा कि श्री गुरु ने उनको वृन्दावन पहुँचा दिया है और वहाँ उन्होंने श्रीहित जी के दर्शन किये हैं और स्वप्न में ही उनसे मन्त्र प्राप्त किया है। स्वप्न में ही श्रीगुरु ने उनको श्रीवृन्दावन व यमुना पुलिन एवं श्री प्रिया प्रियतम के दर्शन करा दिये। इसके साथ उन्होंने सेवकजी को वाणी रचना की सामर्थ्य प्रदान कर दी जिससे वे श्री प्रियालाल की रहस्यमयी लीलाओं का गान करने लगे। इस प्रकार श्रीगुरु ने स्वप्न में सेवक जी को अपनी सम्पूर्ण निधि प्रदान कर दी और सेवक जी अपने आपको धन्य समझने लगे।

उधर चतुर्भुजदास जी श्री वृन्दावन से श्री बनचन्द्र गोस्वामी से मन्त्र लेकर वापिस आये। जो मन्त्र वे लाये थे वही सेवक जी ने उनको सुना दिया और उनको अपनी रचना सेवक वाणी भी सुनायी। सेवक वाणी में सर्वस्व श्री हरिवंश ही हैं तथा उनको श्री श्यामा श्याम से सर्वथा अभिन्न माना है। इसलिये भगवद् मुदित जी ने कहा है कि जो लोग सेवक वाणी नहीं जानते, रसिक लोग उनकी बात को प्रामाणिक नहीं मानते

“सेवक वाणी जो नहीं जानें, तिनकी बात रसिक नहीं मानें”.

श्री वृन्दावन में श्री बनचन्द्र जी ने जब इस वाणी को सुना
तो सेवक जी को देखने की उनकी बड़ी तीव्र इच्छा हुई और उन्होंने निश्चय किया कि मैं जिस दिन सेवक को देखूँगा उस दिन उनके ऊपर श्रीजी का भण्डार न्यौछावर करके लुटा दूँगा। सेवक जी ने श्री बनचन्द्र जी का जब यह निश्चय सुना तो वे काँप उठे। वे विचार करने लगे कि मैं तो प्रभु इच्छा से श्री वृन्दावन जा रहा था लेकिन मेरे जाने से श्री ठाकुर जी का भण्डार लुटता है तो अब मैं नहीं जाऊँगा। श्री बनचन्द्र जी ने जब सुना कि सेवक जी नहीं आ रहे हैं तो उन्होंने सेवक जी को आने के लिये आग्रह पूर्ण पत्र लिखा और उनको अपनी शपथ दिला दी। अब सेवक जी विवश हो गये किन्तु वे भण्डार लुटने के भय से भेष बदलकर श्रीजी के दर्शन करने पहुँचे परन्तु बनचन्द्र जी ने उनकी नेह भरी चितवन देखकर उनको बहुत भीड़ में पहचान लिया। श्री बनचन्द्र जी अत्यन्त हर्षित होकर उनसे उठकर मिले। सेवक जी ने प्रार्थना की कि मेरे आने से श्री ठाकुर जी की सामग्री लुटनी नहीं चाहिये और यह कहकर उन्होंने गुसाईं जी के चरणों में अपना माथा रख दिया। बनचन्द्र जी बोले कि मैं भी प्रण किये बैठा हूँ, अब तुम्हीं बताओ कि ये दोनों बातें कैसे बनें ? अब तो इसका एक ही उपाय है कि मैं तुम्हारे ऊपर प्रसादी भण्डार न्यौछावर करके लुटा दूँ और उन्होंने भण्डार लुटा दिया। श्री भगवत मुदित जी कहते हैं कि इस घटना में यह प्रत्यक्ष दिखलाई देता है कि गुरु शिष्यों पर किस प्रकार से रीझते हैं और उनके ऊपर सर्वस्व न्यौछावर करके किस प्रकार रस में भीजते हैं।

श्री बनचन्द्र जी ने उसी दिन से आज्ञा दी कि चौरासी और सेवकवाणी को सदा एक साथ ही लिखना और पढ़ना चाहिये । चरित्र के अन्त में भगवत मुदित जी ने कहा है कि सेवक जी के समान अन्य कोई ऐसा उपासक नहीं हुआ जिनके प्रण की रक्षा स्वयं उनके गुरुदेव ने की।

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श्री प्रबोधानन्द सरस्वती जी

श्री प्रबोधानन्द जी उदासी मत के संन्यासी थे। वे बड़े प्रकाण्ड विद्वान थे। काशी से वे वृन्दावन पधारे तथा उन्होंने श्री वृन्दावन के सारे ठाकुरों के आचार्यों के दर्शन किये। प्रबोधानन्द जी सब आचार्यों के मतों से पूर्ण परिचित थे किन्तु कोई भी मत उनकी समझ में नहीं आ रहा था। एक दिन उनकी भेंट अचानक राजा परमानन्ददास जी से हो गई। नित्य-विहार की चर्चा में प्रबोधानन्द जी का मन नहीं लगा परमानन्ददास जी ने पुराणों की चर्चा की और उस प्रसंग में मानसरोवर का नाम आया रसिक महात्माओं ने मानसरोवर पर कैसे नित्य-विहार का चिन्तन-दर्शन किया है इसका वर्णन सुनकर ये मोहित हो गये। उनके मन में मानसरोवर पर रात्रि बिताने और प्रिया प्रियतम का रास-विलास देखने की इच्छा हुई। वे एक दिन रात्रि के समय मानसरोवर में रह गये।

सायंकाल के समय गोधूलि के पश्चात् वहाँ अँधेरा छा गया। उन्होंने पहले सिंह- सिंहनी को घूमते देखा, फिर नाग-नागिन वहाँ आये। इसके पश्चात तेज हवा से चारों ओर बुहारी से साफ करने जैसी सफाई हो गई और हल्की वर्षा से भूमि की सिंचाई हो गई। इस समय शीतल मन्द समीर चल उठा और प्रबोधानन्द जी को नींद आ गयी।

अर्ध रात्रि के समय युगल निकुंज बिहारी ने प्रबोधानन्द जी को सोते देखकर विचार किया कि इसके मन में अभी कचाई है। अभी यह इस स्थान में रहने लायक नहीं। इसलिए निद्रावस्था में ही उन्हें मथुरा में उनकी कुटिया में पहुँचा दिया गया। सबेरे उठने पर उन्हें प्रतीति हो गई कि मानसरोवर निश्चय ही युगल के नित्य-विहार का स्थल है और उनको दर्शन का पात्र समझकर यहाँ भेज दिया गया है। वे तत्काल परमानन्ददासजी के पास गये और उनसे भाव-विभोर होकर कहा कि मानसरोवर के बारे में आपने ठीक ही बताया था। अब हमें नित्य-विहार की परिपाटी समझाइये और उसके दर्शन कराइये। यह सुनकर परमानन्ददास जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रबोधानन्द जी को बताया कि इस रस के दाता एकमात्र श्री हरिवंश गोस्वामी हैं। यह सुनकर श्री प्रबोधानन्द जी श्री वृन्दावन आये और श्री हिताचार्य से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए। नित्य-विहार रस की प्राप्ति के लिये प्रबोधानन्द जी की अत्यन्त उत्सुकता देखकर महाप्रभु जी ने उनको नित्य-विहार की दीक्षा दी जिसको सुनकर प्रबोधानन्द जी का हृदय उल्लसित हो उठा और उन्होंने तत्काल एक अष्टक’ की रचना करके महाप्रभु जी की स्तुति की। महाप्रभु जी ने प्रसन्न होकर उनका प्रवेश नित्य-विहार में करा दिया और अद्भुत सुख सागर उनके नेत्रों का विषय बन गया।

जिस प्रकार दीपक का संयोग पाकर दीपक प्रकट हो जाता है उसी प्रकार प्रबोधानन्द जी के हृदय में महाप्रभु जी का उपास्य रस अनायास प्रकट हो गया। इस रस के अपने अनुभव को श्री प्रबोधानन्द जी ने श्री वृन्दावन महिमामृतम् नामक शतकों की रचना करके प्रकट किया है। शतकों के अतिरिक्त उन्होंने और भी कई ग्रन्थों की रचना की है। श्री भगवद् मुदित जी कहते हैं कि श्री प्रबोधानन्द जी की वाणी वेदों के समान प्रामाणिक है एवं रसिक अनन्यों को अत्यन्त सुख देने वाली है।

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श्री परमानन्द दास जी

परमानन्ददास जी क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए थे और बादशाह हुमायूँ के अत्यन्त प्रिय चाकर थे। बादशाह ने इनको जिस-जिस काम के लिये नियुक्त किया वह उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ पूरा किया। बादशाह ने उनको सिंध प्रदेश के एक भाग ठट्ठे का राजा बनाकर भेजा और उनको तीन हजारी मनसब प्रदान किया। वहाँ पहुँच कर उन्होंने सब उपद्रवियों का दमन कर दिया और उनका लूटा हुआ बहुत सा धन उनसे वापिस लेकर बादशाह को भेज दिया। उनके इस कार्य से उनकी सर्वत्र बड़ाई हुई और बादशाह ने उनको प्रचुर धन भी दिया।

परमानन्ददास जी जितने शूरवीर थे उतने ही भगवद् भक्त और शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले विद्वान थे। वे बड़े साधु सेवी, मृदुभाषी, दयालु और सत्संगी थे। किन्तु उन्होंने अभी तक कोई गुरु नहीं बनाया था और उसके लिये बहुत बेचैन रहते थे। एक बार श्री हरिवंश महाप्रभु के शिष्य पूरनदास जी प्रभु

इच्छा से ठठ्ठे पहुँच गये। वहाँ के विद्वान लोग उनसे मिले और राजा परमानन्ददास जी से उनकी प्रशंसा की। राजा ने पूरनदास जी को अपने घर पर निमंत्रित किया और उनसे मिलकर बहुत सुखी हुए। पूरनदासजी ने राजा को श्रीहित धर्म का परिचय दिया और हितजी महाराज का “यह जु एक मन” वाला पद गाकर सुनाया तथा व्यास जी के शिष्य होने की कथा सुनायी। राजा ने अपने मन में श्री हरिवंशचन्द्र को गुरु बनाने का निश्चय कर लिया और वे श्री हरिवंश नाम का जाप करने लगे। महाप्रभु जी ने राजा की अत्यन्त लालसा देखकर उनको स्वप्न में दीक्षा दे दी। यह दीक्षा सम्वत् १५६२ की भादों सुदी नवमी को दी गयी। दीक्षा मिलते ही राजा परमानन्ददास जी का जीवन सम्पूर्ण रूप से बदल गया और श्री श्यामा श्याम का नित्य-विहार उनके हृदय में प्रकाशित हो गया। श्री मद् भागवत में वर्णन की हुई भक्ति के अनुसार उन्होंने अपना जीवन बना लिया तथा कथा कीर्तन में अपना समय व्यतीत करने लगे।

पूरनदास जी को उन्होंने काफी दिन अपने पास ठठ्ठे में रखा। किन्तु एक दिन पूरनदास जी ने श्री वृन्दावन जाने के लिये बहुत आग्रह किया और राजा ने रुदन करते हुये उनको विदा दी। उन्होंने पूरनदास जी के साथ श्री गुरु के लिये बहुत सी भेंट भेजी। इस प्रकार वे १२ वर्ष तक ठठ्ठे में रहे और जब वे वृद्ध हो गये तो उन्होंने बादशाह से सेवामुक्त होने की आज्ञा माँगी और श्री वृन्दावन में एकान्त वास करने की इच्छा प्रकट की। बादशाह ने उनको वापिस जाने की मंजूरी दे दी और उन्होंने श्री वृन्दावन आकर प्रत्यक्ष रूप से श्री हरिवंश के दर्शन किये। श्री महाप्रभु ने सबको सुनाकर उनसे कहा कि सत्संग से क्या नहीं होता। देखिये पूरनदास के प्रताप से परमानन्ददास जी के सम्पूर्ण कष्ट नष्ट हो गये हैं।

अनेक वर्षों तक परमानन्ददास जी ने साधु सेवा करते हुए श्रीवृन्दावन वास किया और १०० वर्ष की आयु तक उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट बना रहा। भगवद् मुदित जी कहते हैं कि परमानन्ददास जी ने नित्य दूलह- दुलहिनी श्री राधाबल्लभलाल की अनुपम दिव्य छवि का दर्शन श्री हरिवंशचन्द्र के प्रताप से प्राप्त किया। भक्तों की महिमा का क्या वर्णन किया जा सकता है। पूरनदास जी ने परमानन्ददास जी को श्री हरिवंश के दर्शन प्राप्त करा दिये ।

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श्री हरिदास तुलाधार जी

श्री भगवद् मुदित जी कहते हैं कि अब मैं हरिवंश जी के सेवक हरिदास तुलाधार का पवित्र चरित्र कहता हूँ। श्री हरिदासजी अपने गुरु के अनन्य सेवक थे और उनको विरक्त कुल से भी अत्यन्त अनुराग था। वे साधुओं की सेवा को ही सर्वस्व मानते थे और उनको गृहस्थ से कोई ममत्व नहीं था। उनको कथा-कीर्तन बहुत अच्छा लगता था और भक्तों के साथ मिलकर वे भजन में निमग्न रहते थे। वे उदार, मधुरभाषी, सार और असार को पहचानने वाले तथा श्री श्यामा-श्याम के रास-विलास के उपासक थे। वे काम, क्रोध, लोभ आदि से शून्य एवं सदैव प्रसन्नचित्त रहने वाले व्यक्ति थे। वे लोक और वेद की सीमाओं से निकलकर अपने इष्ट का भजन करते थे। उनके लिये मान-अपमान समान थे और लाभ-हानि में उन्हें हर्ष या शोक नहीं होता था। वे अपने इष्ट के उत्सवों में बहुत धन खर्च करते थे तथा दया और करुणा उनके हृदय में सदैव भरी रहती थी। उनके मन में कोई स्वार्थ की बात नहीं आती थी और सदैव वे परमार्थ करने में लगे रहते थे। अपनी ८५ वर्ष की आयु में एक बार वे साधुओं का दर्शन करने के लिये तीर्थों की यात्रा पर गये। रास्ते में एक घने जंगल के अन्दर एक सिंह ने एक गाय को घेर रखा था। यह देखकर हरिदासजी के मन में बड़ी दया उत्पन्न हुई।

वे गाय को छुड़ाने के लिये सिंह के पास पहुँचे। उसको नृसिंह भगवान समझकर उन्होंने उसके पैर पकड़ लिये और उससे कहा कि गाय को छोड़कर उसकी जगह मुझे खा लो सिंह बोला कि तुम्हारी देह तो बहुत बूढ़ी हो चुकी है इससे मेरी उदर पूर्ति नहीं होगी। हरिदासजी ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो मेरा पुत्र जवान है, तुम उसे खाकर अपनी भूख मिटा लो और इस गाय को छोड़ दो। सिंह इस बात पर तैयार हो गया और हरिदासजी अपने पुत्र को लाने के लिये अपने घर वापिस चले गये। पिता की बात सुनकर पुत्र बहुत हर्षित हुआ और प्रातःकाल होते ही अपने पिता के साथ सिंह के पास पहुँच गया। सिंह ने पिता-पुत्र को आता देखकर बहुत गर्जना की और उनको भगाना चाहा। किन्तु दोनों अत्यन्त शूरवीर थे और उनको मृत्यु का तनिक भी भय नहीं था सिंह भयंकर गर्जना किये जा रहा था किन्तु ये दोनों अत्यन्त शान्त और धीर बने रहे क्योंकि ये सिंह में प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन कर रहे थे। अन्त में सिंह के रूप में स्थित श्रीहरि प्रसन्न हो गये और उन्होंने वैकुण्ठवासी चतुर्भुज रूप में हरिदासजी को दर्शन दिये। किन्तु यह तो दो भुजा वाले श्री वृन्दावनचन्द्र के उपासक थे और इनको वही रूप अच्छा लगता था। इनकी निष्ठा देखकर श्रीहरि युगल रूप में ही इनके सामने प्रकट हो गये। ये आनन्द में रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़े और दोनों के मुखचन्द्रों का एकटक दृष्टि से दर्शन करने लगे। प्रभु ने प्रसन्न होकर इनको यह वरदान दिया कि तुम जब तक जिओगे तब तक निष्काम भक्ति करते रहोगे और अन्त में श्रीवृन्दावन धाम को प्राप्त होओगे।

एकबार ये प्रभु इच्छ के अधीन होकर जगन्नाथपुरी में पहुँच गये। इनके साथ में इनके इष्ट की सेवा थी और ये जगन्नाथपुरी में भी सर्वत्र अपने इष्ट के दर्शन करते थे। ये अपने इष्ट का ही प्रसाद पाते थे और पंडा लोग जो जगन्नाथजी का प्रसाद लाते थे उसको माथे पर चढ़ाकर रख देते थे। जगन्नाथजी में इस बात की चर्चा घर-घर होने लगी और सब लोग इनकी निन्दा करने लगे। इस बात को सुनकर हरिदासजी ने कहा कि जगन्नाथजी स्वयं मुझे कहें तो मैं उनका प्रसाद ग्रहण कर सकता हूँ। जगन्नाथजी की आज्ञा जानने के लिये उनके सिद्ध भक्त रात्रि में मन्दिर में सुलाये गये। उनसे जगन्नाथजी ने कहा कि श्री वृन्दावनचन्द्र युगल किशोर से ही हमारी उत्पत्ति हुई है। वे हमारे अंशी हैं और हम उनके अंश हैं। हरिदासजी अपने इष्ट में अनन्य हैं और केवल उनके प्रसाद को लेते हैं इसमें वे कोई अपराध नहीं कर रहे हैं। संसारी लोग जो मेरे प्रसाद का त्याग करते हैं उनको ही महाअपराध लगता है। इस घटना के बाद पुरी निवासी हरिदासजी का बहुत सम्मान करने लगे और ये जितने दिन जगन्नाथपुरी में रहे, अपने इष्ट का निर्विघ्न भजन करते रहे।

जगन्नाथपुरी के निवास काल में एक दिन ज्योतिषियों ने उनसे कहा कि आपकी आयु दो दिन की शेष रह गयी है। उसके बाद ये कुछ बीमार भी हो गये किन्तु इनकी निष्ठा श्रीवृन्दावन में लगी हुई थी। वैद्यों को बुलाया तो उन्होंने भी कह दिया कि इनकी नाड़ी तो छूट गयी है किन्तु इनका मन इष्ट में लगा हुआ था। लोग कहने लगे कि यह तो पुरुषोत्तम धाम हैं, यहाँ आबन्द से अपने शरीर का त्याग करो। यह सुनकर वह बोले कि मेरा शरीर तो वृन्दावन ही पहुँचेगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह अन्यत्र कहीं भी नहीं गिरेगा। इनकी यह बात सुनकर पालकी का प्रबन्ध किया गया और उसमें इन्हें डाल कर इनके परिवार वालों ने श्रीवृन्दावन की ओर प्रस्थान किया। ये रास्ते में लेटे हुए श्रीवृन्दावन के उत्सवों का ध्यान करते रहे एवं प्रसादी चरणामृत ग्रहण करते रहे। जैसे- जैसे वृन्दावन निकट आता जाता था, वैसे-वैसे इनके शरीर और मुख की कान्ति बढ़ती जाती थी। भगवद्मुदित जी कहते हैं कि हरिदासजी ने काल की कोई परवाह नहीं की और दो महीने में गाते-बजाते हुए श्रीवृन्दावन पहुँच गए । श्रीवृन्दावन में ये साधु सभा की उपस्थिति में शरीर छोड़कर अपने इष्ट को प्राप्त हो गये।

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श्री नवलदास जी

भगवद्मुदित जी कहते हैं कि हित हरिवंश जी के शिष्य नवलदास जी का चरित्र अब मुझसे सुनो जिन्होंने धूसर वैश्यों के कुल को पवित्र किया था और जो रेवाड़ी के रहनेवाले थे। बाल्यकाल से ही उनका साधुओं की सेवा तथा कथा-कीर्तन में मन लगता था और वे अपनी सहज विनम्रता से सबका चित्त हरण कर लेते थे।

एक बार वे सन्तों के साथ श्री वृन्दावन आये और श्री हरिवंशचन्द्रजी से मिले। वे श्री महाप्रभु के प्रति इतने अधिक आकर्षित हुये कि अनेक दिनों तक उनकी सेवा करते रहे। अन्त में नवलदास जी के भाव की दृढ़ता देखकर श्री हित जी महाराज ने उनको अपना शिष्य बना लिया और अपने रसिक अनन्य धर्म की रसरीति भलीभाँति समझा दी। नवलदास जी के मन में महावैराग्य का उदय हो गया और वे सर्वत्र प्रभु के दर्शन करते हुये श्री राधाबल्लभ लाल का गुणगान करने लगे। भूख-प्यास पर भी उन्होंने काबू पा लिया और लोगों के अवगुणों को देखना बन्द कर दिया तथा उनके लिये हानि-लाभ, सुख दुख सब समान हो गये। इसके बाद भगवद्मुदित जी ने श्री नवलदास जी के जीवन की सबसे बड़ी घटना का वर्णन किया है। जिसमें उन्होंने अपनी निष्ठा के बल पर एक सम्पूर्ण जाति को मिटने से बचा लिया था। शेरशाह के मरने के बाद दिल्ली के तख्त पर कुछ दिनों तक हेमू बैठा। अकबर के संरक्षक वैराम खाँ ने हेमू को तख्त पर से हटाने के लिये उसके साथ पानीपत के मैदान में युद्ध किया, जिसमें हेमू पराजित हो गया। हेमू बनिया था। अतः बादशह ने सभी बनियों को कत्ल करने की आज्ञा निकाल दी और वैश्य जाति के हजारों लोग मारे जाने लगे। यह हालत देखकर बादशाह के बजीर ने उनसे कहा कि आपके साथ युद्ध तो बनियों की छोटी-सी उपजाति धूसरों ने किया था। अतः केवल उनको ही सजा मिलनी चाि । तदनुसार रेवाड़ी से २०० धूसर पकड़े गये और उन्हें अनेक प्रकार की यातनायें दी गयीं। जब धूसर कुल का कोई व्यक्ति शेष नहीं रह गया तब किसी ने बादशाह को बताया कि एक धूसर वृन्दावन में रहता है। बादशाह ने नवलदासजी को गिरफ्तार करवाकर दिल्ली बुलाया और उनसे पूछा कि तुम्हारी क्या जाति है ? नवलदास जी ने निर्भय होकर उत्तर दिया कि अब हमारी कोई जाति नहीं है। जिनने हमें जन्म दिया है अब हमने उनकी शरण ग्रहण करली है तथा जाति बन्धन से मुक्त हो गये हैं। इस बात को सुनकर बादशाह चिढ़ गया और आज्ञा दी कि इस फकीर को जंजीरों से बाँधकर बन्दीखाने में डाल दो। नवलदासजी ने हँसकर कहा कि मुझको कोई हजार जंजीरों से बाँधे तो भी मैं उनको तोड़ दूँगा। मैं तो प्रेम के धागे से बँधा हुआ हूँ और उसकी वजह से हिलने-डुलने में असमर्थ हूँ।

जो कोउ जरै जंजीर तन तो तोरूँ सत सात ।
प्रेम तन्त अटक्यौं नवल, मटक्यो तनक न जात ।।

बादशाह इस दोहे को समझ नहीं पाया और अधिक चिढ़ कर उसने उनको पुनः बन्दीगृह में डलवा दिया एवं उनका अन्न-जल भी बन्द कर दिया। तीन दिन के बाद जब बन्दीगृह का दरवाजा खोला गया तो वहाँ केवल जंजीरों का ढेर पड़ा था और नवलदास जी वृन्दावन पहुँच चुके थे। बादशाह ने उनको फिर गिरफ्तार करवाकर दिल्ली बुलाया किन्तु फिर वे जंजीरों को तोड़कर वृन्दावन पहुँच गये। बादशाह ने तीसरी बार अहदियों को उनके पकड़ने को भेजा और इस बार नवलदासजी धूसर जाति की रक्षा के उद्देश्य से पुनः बादशाह के पास आये। बादशाह ने उनको इस बार आसन प्रदान किया तथा उनसे कहा कि तुमने करामात दिखलायी है इसलिये मुझे तुम्हारे ऊपर दया आ गयी है अब तुम बताओ कि तुम क्या चाहते हो ? नवलदास जी ने कहा कि तुमने एक धूसर के अपराध से सभी धूसरों को क्यों बन्दी बना रखा है और उनको तुम व्यर्थ में क्यों सता रहे हो ? इस प्रकार की अनेक बातें उन्होंने बादशाह से कहीं और धूसरों को छुड़वा दिया। धूसर लोग नवलदासजी का गुणगान करते हुए अपने-अपने घर चले गये और तब से वे हितजी महाराज के अनुयायी बन गये।

बादशाह ने नवलदासजी का बहुत आदर किया और अपने पास बैठाकर उनको बहुत सा द्रव्य भेंट करना चाहा किन्तु नवलदासजी ने उसको स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि यह धन तो तुम्हारे ही काम का है। हमको तो केवल मदन गोपाल ही अच्छे लगते हैं

“यह तो काज तुम्हारे आवै, हमकौं मदन गोपालहि भावै” हमको तो काली कमली अच्छी लगती है और हमारे उदर की पूर्ति के लायक सामान प्रभु हमारे पास पहुँचाते रहते हैं। बादशाह ने काली कमली मँगवाकर उनको उढ़ा दी और इस प्रकार सब धूसरों को छुड़वाकर नवलदासजी श्रीवृन्दावन आ गये। भगवद् मुदितजी कहते हैं कि साधुओं के संग से मनुष्य साधु हो । जाता है और उसकी सारी इच्छायें पूर्ण हो जाती हैं। साधु के संग से मनुष्य परमार्थ को समझने लगता है और उसकी स्वार्थ बुद्धि नष्ट हो जाती है। साधु पुरुष सदैव मृदुवाणी बोलते हैं और साधुओं की रीति-भाँति को साधु ही समझ पाते हैं। श्रीभगवद् मुदित जी कहते हैं कि दूसरे के दुख में दुखी और दूसरे के सुख में सुखी रहनेवाला मनुष्य ही हरि का जन है। श्रीराधाबल्लभलाल ऐसे ही व्यक्ति के सहायक होते हैं।

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श्री मोहनदास जी

देवबन निवासी श्री मोहनदास जी नाहरमलजी के सबसे छोटे भाई थे। बिट्ठलदास जी सहित तीनों भाइयों ने महाप्रभु हित हरिवंशचन्द्र जी की रसरीति में अपने को एकान्त रूप से निष्ठावान बना लिया था। गृहस्थ जीवन के प्रति इन तीनों को कोई आकर्षण नहीं था। इष्ट भजन और रसिक भक्तों के साथ सत्संग में ही इनका सारा समय बीतता था ।

मोहनदासजी ने श्री वृन्दावन की आराधना करते हुए गुरुनिष्ठा में ही अपना जीवन, अपने भाइयों के समान ही व्यतीत किया था और जब श्री हिताचार्य ने अपनी लीला का संवरण करके निकुंज गमन किया तो उनके विरह में इन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिये।

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श्री बिट्ठलदास जी

बिट्ठलदास जी नाहरमल के भाई थे और उन्होंने बड़ी दृढ़ता से गुरुमार्ग को ग्रहण किया था। वे देवबन्दै से श्री वृन्दावन आकर गुरुचरणों के आश्रय में रहने लगे थे और नित्यप्रति श्री गुरु के दर्शन और उनका उच्छिष्ट ग्रहण करते थे। इस प्रकार रहते हुए प्रभु इच्छा से अनायास एक दिन उनको बादशाह का पत्र मिला जिसमें उनको जूनागढ़ के हिन्दू सूबेदार (राज्यपाल) का प्रधानमन्त्री नियुक्त किया गया था। बादशाह की इस आज्ञा को लेकर वे अपने गुरु जी से मिले। श्री हिताचार्य ने उनको सलाह दी कि ये सेवा आपको अनायास मिली है अतः इसको प्रभु की इच्छा समझ कर चले जाओ। बिट्ठलदास ने जाने से पूर्व श्री हिताचार्य का एक चित्र बनवाया तथा ऐसा प्रबन्ध कर लिया जिससे उन्हें नित्यप्रति जूनागढ़ में श्री गुरु का उच्छिष्ट प्रसाद मिलता रहे।

बिट्ठलदास जी के जूनागढ़ पहुँचने के कुछ दिन बाद सूबेदार राजा ने द्वारिका जाकर रणछोड़ जी के फौज के साथ दर्शन करने का विचार किया। द्वारिका पहुँचकर सब लोग तो रणछोड़ जी के दर्शन कर आये पर बिठ्ठलदास जी नहीं गये। चुगलखारों ने राजा से इस बात की शिकायत की। राजा ने नाराज होकर बिट्ठलदास जी को भरी सभा में उपस्थित होने की आज्ञा दी और उनसे पूछा कि सब हिन्दुओं ने तो रणछोड़ जी के दर्शन किये मगर तुम दर्शन करने क्यों नहीं गये ? क्या तुम उनको ठाकुर नहीं मानते ? क्या तुम अपना कोई नया मत चलाना चाहते हो ? बिट्ठलदास जी ने नम्रता से उत्तर दिया कि मेरे गुरु श्री हरिवंशचन्द्र हैं, धाम श्री वृन्दावन है, दो भुजा वाले मेरे इष्ट वंशीधारी श्री राधाबल्लभलाल हैं। इनके रास-विलास का प्रकाश मेरे रोम-रोम में भर रहा है। मेरे तन और मन में साँवल- गौर बसे हुए हैं और उसमें चार भुजाओं वाले ठाकुर के लिए स्थान नहीं है। यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया। उसने बिट्ठलदास जी को हुक्म दिया कि अपने कपड़े उतारो और दिखाओ कि तुम्हारे रोम-रोम में कहाँ राधावल्लभ लाल बसे हुए हैं। वस्त्र उतरते ही लोगों ने देखा कि उनके रोम-रोम में द्रुम और लता-पतायें दिखाई दे रही हैं और मुरली की मन्द मधुर ध्वनि के साथ ताल मृदंग और नूपुर बज रहे हैं। यह देखकर सब उपस्थित लोगों को परम आश्चर्य हुआ और राजा सिंहासन से उठकर उनके चरणों में गिर गये, उन्होंने बिट्ठलदास जी से प्रार्थना की कि मेरा अपराध क्षमा करके मुझे अपना शिष्य बना लीजिये। बिट्ठलदास जी ने भी राजा को मृदुवाणी द्वारा सम्मान देकर उसके अज्ञान को नष्ट कर दिया।

उस दिन से राजा इनकी बहुत इज्जत करने लगा। वह नियम से इनका उपदेश सुनता था और कभी इनको घर नहीं बुलाता था, उसने राज्य सम्बन्धी तथा परमार्थ सम्बन्धी सम्पूर्ण काम इनको सौंप दिये तथा अपनी सम्पत्ति भी इनके चरणों में अर्पित कर दी।

बिट्ठलदास जी के अद्भुत गुरु प्रेम का एक और उदाहरण भगवद्मुदित जी ने उनके चरित्र में दिया है। उसके अनुसार जूनागढ़ रहते हुए उन्होंने जब श्री गुरु के निकुंज पधारने की बात सुनी तो उनके प्राण शरीर छोड़कर श्री गुरु चरणों में लीन हो गये। भगवद्मुदित जी कहते हैं कि बिट्ठलदास जी ने बड़ी दृढ़ता के साथ अपने गुरुमत के अनुसार इष्ट और धाम की निष्ठा का पालन किया ।

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श्री नाहरमल जी

भगवत मुदित जी कहते हैं कि नाहरमल जी ने देवबन से आकर श्री वृन्दावन में बास किया था और यहाँ श्री हरिवंश महाप्रभु के प्रताप से युगल के रास विलास के दर्शन किये थे। नाहरमल जी का जन्म देवबन के एक कायस्थ कुल में हुआ था। श्री हरिवंश को गुरु बनाने के बाद उनके सम्पूर्ण शुभ और अशुभ नष्ट हो गये थे। श्री राधाबल्लभलाल से उन्होंने बड़ी निस्वार्थ प्रीति की और जगत प्रपंच से वे सदा दूर रहे। गृहस्थ के सारे कार्य वे प्रभु के मानकर करते थे। अतः हानि-लाभ का उन पर कोई प्रभाव नहीं होता था।

एक दिन वे अपने परिवार सहित गुरु-चरणों के दर्शन करने के लिए श्री वृन्दावन आये। उन्होंने देखा कि हित जी महाराज ब्रजवासियों के बालकों के साथ खेल रहे हैं और उन्हें तीर चलाना सिखा रहे हैं। नाहरमल जी को आया देखकर अपने हाथ का तीर-कमान एक बच्चे के हाथ में देकर उनका महाप्रभु ने सम्मान किया। नाहरमल जी को यह देखकर बड़ा दुःख हुआ कि मैंने श्री गुरु की लीला में बाधा डाल दी।

एक अन्य अवसर पर महाप्रभु जी नाहरमल को अपने साथ लेकर मानसरोवर गये और वहाँ उनको एक आश्चर्यमय दृश्य दिखाया। जब नाहरमल जी ने सरोवर के जल में स्नान करने के लिये प्रवेश किया तो देखा कि अनेक रूपवती सहचरियाँ वहाँ स्नान कर रही हैं। किन्तु जब वे जल से बाहर आए तो उन्होंने अपने गुरुदेव को सरोवर के तट पर अकेले बैठे देखा ।

इसी प्रकार एक बार श्री वृन्दावन आने पर नाहरमल जी को अपने गुरुदेव जी के दर्शन वन में मिले। उन्होंने अपने गौर शरीर पर सुन्दर वस्त्र पहन रखे थे और उनके श्री अंग में से छवि की लहरें उठ रही थीं। श्री महाप्रभु जी श्री राधाबल्लभ जी की सम्पूर्ण सेवा अपने हाथ से करते थे और उस समय वे ईंधन बीनकर अपने वस्त्र के छोर में रखते जा रहे थे। नाहरमल जी को यह देखकर अच्छा नहीं लगा और उन्होंने महाप्रभु जी से प्रार्थना की कि आप आज्ञा दें तो इस कार्य के लिये एक धीमर नियुक्त कर दिया जाय जो प्रतिदिन एक बँहगी ईंधन श्री ठाकुर जी की सेवा में पहुँचा दिया करेगा।

इस बात को सुनकर गोसाईं जी का मन एकदम दुखी “होगया और नाहरमल से रुखाई के साथ कहा कि श्री श्यामसुन्दर अपना भजन करने वालों को सांसारिक सुखों की प्राप्ति कराकर उनसे अपना पीछा छुड़ा लेते हैं। जिससे उनकी प्राप्ति हो सके ऐसी विशुद्ध भक्ति वे किसी को प्रदान नहीं करते। मैंने वही शुद्ध निष्काम भक्ति सन्तों के संग से प्राप्त की है और तू उसे छुड़ाने आया है। तू हमेशा बड़ा रजोगुण लेकर वृन्दावन आता है और मेरे काम को धीमर से कराना चाहता है। तूने यह बड़ा अपराध किया है, तू बड़ा असाधु है। यह कर उन्होंने उसका त्याग कर दिया। नाहरमल जी ने इसे अपना दुर्भाग्य समझकर अन्न-जल का त्याग • कर दिया। नाहरमल को अत्यन्त दखी देखकर श्री राधारानी ने हित जी महाराज से कहा कि नाहरमल निरपराध है। श्री प्रिया जी की आज्ञा पाकर श्री हितजी महाराज ने पत्र लिखकर नाहरमल जी को वृन्दावन बुलाया और उनका अपराध क्षमा करके उन्हें श्री वृन्दावन में ही बसा लिया।

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श्री छबीलदास जी

श्री हित हरिवंशचन्द्र प्रभु के बचपन के एक मित्र श्री छबीलदास थे। छबीलदास जी देवबन्द के एक तम्बोली परिवार के बालक थे। श्री रंगीलाल जी की सेवा में पान पहुँचाते थे। कालान्तर में हितप्रभु के श्री वृन्दावन आ जाने से छबीलदास जी को बहुत कष्ट हुआ। जब छबीलदास जी से वियोग सहन नहीं हुआ तो वे श्री वृन्दावन आकर हित जी महाराज से मिले।

श्री हितप्रभु ने अपने बाल सहचर छबीलदास जी का स्वागत किया । छबीलदास जी से यह जानकर कि वे श्री वृन्दावन में युगल श्री श्यामा श्याम के दर्शन प्राप्त करना चाहते हैं, महाप्रभु जी ने उनको अपने एक सेवक के साथ वन में भेज दिया और वहाँ उनको रास विलास के दर्शन हो गये। श्री युगल की अनुपम छ देखकर छबीलदास जी रूपमाधुरी में छक गये और मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उनकी यह दशा देखकर अनेक लोग उनके चारों ओर इकट्ठे हो गये और जैसे तैसे उनको उठाकर श्री हितप्रभु के पास ले गये महाप्रभु जी ने उनसे पूछा कि आप अभी और कुछ दिन संसार में रहना चाहेंगे या श्यामा श्याम की निकुंज सेवा में प्रवेश करेंगे। इस प्रश्न के उत्तर में छबीलदास जी ने अपना मस्तक उनके चरणों में रख दिया और उनके प्राण शरीर को छोड़कर युगल की नित्यलीला में प्रवेश कर गये। श्री भगवद्मुदित जी कहते हैं कि महत्जनों से कोई किसी प्रकार से भी प्रेम करे तो वे एक क्षण में उसको प्रभु चरणों की प्राप्ति करा देते हैं और उसके प्राकृत शरीर को अप्राकृत बना देते हैं।

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श्री हरिराम व्यास जी

श्री हरिराम जी व्यास ओरछा (बुन्देलखण्ड) के रहनेवाले थे। उनके पिता सुकुल सुमोखन जी बड़े कुलीन परिवार के व्यक्ति थे, और राजा एवं प्रजा दोनों ही उनके अधीन रहते थे। पिता के समान व्यास जी भी बड़े विद्वान और धार्मिक वृत्ति के महानुभाव थे। वे शास्त्र – पुराणों की बड़ी सुन्दर व्याख्या करते थे। उनकी बुद्धि बड़ी चपल और तार्किक थी। शास्त्रों में गुरु महिमा का वर्णन सुनकर उनका मन योग्य गुरु की प्राप्ति के लिये उत्कंठित बना रहता था। श्री रामानन्द जी, रैदास जी, कबीर जी, पीपा जी आदि भक्तों का ध्यान उनको आता रहता था। किन्तु किसी एक की शरण ग्रहण करने का निर्णय नहीं कर पा रहे थे और उनकी व्यालीस वर्ष की आयु हो चुकी थी। श्री व्यास जी के मन की इस द्विविधापूर्ण स्थिति में एक दिन श्री हित हरिवंश महाप्रभु के शिष्य श्री नवलदास जी वैरागी ओरछा पहुँचे । व्यास जी उनसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और उनका बहुत आदर किया। एक दिन सत्संग करते हुए श्री नवलदास जी ने श्री हिताचार्य का ‘आज अति राजत दंपति भोर वाला पद गाया। इस पद के अर्थ का विचार करके व्यासजी तन्मय हो गये। उक्त पद के अन्त में श्रीहिताचार्य ने कहा है “जय श्री हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियो सिरावत मोर” अर्थात् श्री श्यामाश्याम अपने प्रेम विहार के द्वारा मेरे हृदय को शीतल करते हैं। व्यास जी सोचने लगे कि जिनका हृदय शीतल करने के लिए श्रीश्यामाश्याम विहार करते हैं, उन रसिक महानुभाव की महिमा कौन समझ सकता है। व्यास जी की तीव्र रुचि देखकर नवलदास जी ने उन्हें बताया कि श्री हिताचार्य जी की प्रेमोपासना में विधि-निषेध का बन्धन नहीं है तथा योग, यज्ञ, जप, तप, ब्रत आदि शुद्ध भक्ति के आगे तुच्छ बना दिये गये हैं। उपासना में नित्यबिहारी श्री राधाबल्लभ लाल इष्ट हैं। आप उन्हीं को अपना इष्ट एवं श्री हिताचार्य जी को अपना गुरु बना लीजिये।

व्यास जी नवलदास जी के प्रस्ताव से तत्काल सहमत हो गये और कार्तिक के आरम्भ में नवलदास जी के साथ श्री हिताचार्य के दर्शन के लिए श्री वृन्दावन पहुँच गये। मन्दिर में पहुँचकर उन्होंने देखा कि हित जी महाराज ठाकुर जी के लिए रसोई बना रहे हैं, किन्तु व्यास जी तत्काल उनके साथ चर्चा करना चाहते थे। श्री हिताचार्य ने उनकी उत्सुकता देखकर चूल्हे पर चढ़ा हुआ पात्र नीचे उतार दिया और आग बुझा दी। व्यास जी ने नम्रता के साथ कहा कि आपने पात्र क्यों उतार दिया, आप एक साथ दोनों काम कर सकते थे-हाथ से रसोई बना सकते थे और मुख से चर्चा कर सकते थे। करना-धरना ये हाथ का धर्म है और कहना – सुनना मुख का काम है। यह तर्क सुनकर महाप्रभु जी ने उनको एक पद तत्काल बना कर सुनाया (“यह जु एक मन बहुत ठौर करि कहि कौने सच पायौ ) वाला पद हित चौरासी का ५६ नं० पद है। इस पद में महाप्रभु जी ने कहा है कि मनुष्य को एक मन मिला है, उसको एक ही समय दो जगह लगाने से किसी को सुख नहीं मिलता, दो घोड़ों पर सवारी करके कोई दौड़ नहीं सकता। मन लगाने के दो ठिकाने हैं- एक संसार और दूसरा भगवान और उनके भक्त इनमें से संसार प्रत्यक्ष रूप से नाशवान है। अतः बुद्धिमान लोगों को उसमें मन न लगाकर भगवान के भक्तों के चरणों में मन लगाना चाहिए

इस पद का श्री व्यास जी के ऊपर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने भगवान के भक्तों को अपना इष्ट ही बना लिया और जीवन भर उनकी सेवा करते रहे। नाभा जी ने अपनी भक्तमाल में व्यास जी के सम्बन्ध में लिखा है कि उनके इष्ट भगवान न होकर भगवान के भक्त थे। इसके साथ ही उन्होंने श्री हिताचार्य जी से प्रार्थना की कि आप मुझे अपने धर्म की शिक्षा देकर दीक्षा दे दीजिये। महाप्रभु जी ने उनकी श्रद्धा देखकर उनको निज मंत्र दे दिया। वे महाप्रभुजी से विवाद करने के लिए जो पोथियाँ अपने साथ लाये थे वे सब उन्होंने यमुना जी में प्रवाहित कर दीं। उन्होंने युगल उपासना स्वीकार करके कुंजबिहारी श्री राधावल्लभ लाल से प्रीति जोड़ ली। उन्होंने ठाकुर श्री युगलकिशोर जी को प्रकट करके उनके साथ गादी सेवा स्थापित की और हित-पद्धति से उनकी सेवा करने लगे।

एक बार वे रासलीला देख रहे थे। उन्होंने देखा कि श्री प्रिया जी के चरणों में धारण नूपुर टूट गया है और उसके घुँघुरू बिखर गये हैं। रंग में भंग होता देखकर सब दर्शक दुखित हो गये किन्तु किसी को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। व्यास जी ने तत्काल अपना यज्ञोपवीत तोड़कर उसके धागे से नूपुर के घुँघुरू गूँथ दिये और लीला यथावत चलने लगी। (आज से लगभग ४५० वर्ष पूर्व यज्ञोपवीत का इस प्रकार अपमान करना बड़े साहस का काम था किन्तु व्यास जी ने अपने अनन्य प्रेम के आगे वर्णाश्रम धर्म की तनिक भी परवाह नहीं की। इसीलिये उस रासलीला में उपस्थित सब रसिक महानुभावों ने व्यास जी के इस कार्य की बड़ी प्रशंसा की।)

श्री व्यास जी महाराज लम्बे समय तक वृन्दावन वास करने के पश्चात् निकुंजवासी हुए। उनके श्री वृन्दावन आने के १८ वर्ष बाद सम्वत् १६०६ में श्री हरिवंश महाप्रभु का अन्तर्धान हो गया। श्री व्यास जी ने अपनी भजन – भावना के लिये सम्पूर्ण रूप से हितप्रभु का आश्रय ग्रहण कर रखा था। अतः हितप्रभु के निकुंज गमन के पश्चात् श्री व्यास जी को बहुत अधिक विरह का अनुभव हुआ और उन्होंने अत्यधिक दुखी होकर एक पद की रचना की जिसमें उन्होंने कहा है कि श्री हरिवंशचन्द्र रसोपासना और रसिकजनों के आधार थे। उनके बिना अब इस उपासना का भार कौन वहन करेगा और कौन श्रीराधा को प्यार दुलार भरे सुन्दर वचन सुनावेगा ? अब ऐसा उदार कौन रह गया है जो श्री वृन्दावन की सहज माधुरी का वर्णन कर सके ? उनके जैसी पद-रचना के अभाव में सारा संसार अब नीरस हो गया है। उनके बिना मेरा तो एक क्षण सौ युगों के समान व्यतीत हो रहा है। श्री व्यासदास जी कहते हैं कि एक चन्द्रमा के बिना तारों से भरा हुआ आकाश तेजहीन हो गया है।

हुतौ रस रसिकनि को आधार ।
बिनु हरिवंशहि सरस रीति को कापै चलि है भार ।।
को राधा दुलरावै गावै वचन सुनावै चार ।
वृन्दावन की सहज माधुरी कहि है कौन उदार ।।
पद रचना अब कापै ह्वै है निरस भयौ संसार ।
बड़ौ अभाग अनन्य सभा कौ उठिगौ ठाठ सिंगार ।।
जिन बिनु दिन छिन सत-युग बीतत सहज रूप आगार ।
‘व्यास’ एक कुल कुमुद बन्धु बिनु उड़गन जूठौ थार ।।

श्री व्यास जी के तीन पुत्र थे जिनमें सबसे बड़े किशोरीदास थे। श्री हितप्रभु के अन्तर्धान के पश्चात् ये तीनों भाई श्री वृन्दावन आये। श्री व्यास जी ने किशोरीदास जी को स्वामी श्रीहरिदास जी का शिष्य करा दिया और वे श्री कुंजबिहारी को अपना इष्ट मानकर भजन करने लगे। काफी बड़ी आयु प्राप्त करने के बाद श्री वृन्दावन के सब सन्त महन्तों की उपस्थिति में श्री व्यास जी. ने प्रसन्नचित्त से नित्यलीला में प्रवेश किया।

श्री भगवत्मुदित जी ने अपने रसिक अनन्य माल में श्री व्यास जी का इतना ही वृत्तान्त दिया है। नाभा जी की भक्तमाल में श्री व्यास जी का परिचय दिया हुआ है जिसकी बहुत विस्तृत टीका श्री प्रियादास जी ने की है। उसमें से कुछ रोचक और शिक्षाप्रद प्रसंग नीचे दिये जाते हैं।

एकबार वे सन्तों के साथ प्रसाद पाने बैठे। इनकी पत्नी परोस रही थी। दूध परोसते समय मलाई छिटक कर इनके कटोरे में गिर गई। इन्होंने नाराज होकर उन्हें सेवा से अलग कर दिया। वह ग्लानि के कारण तीन दिन बिना भोजन किये पड़ी रहीं। तब सन्तों ने व्यास जी को समझाया। इन्होंने यह दण्ड निश्चित किया कि उनकी पत्नी अपने सब गहने बेचकर सन्तों का भण्डारा करे और यह पद कहा –

जो तिय होय न हरि की दासी ।
कीजै कहा रूप गुन सुन्दर नाहिन स्याम उपासी ।।

इनकी सन्त निष्ठा की एक और कथा है। अपनी पुत्री के विवाह में श्री व्यास जी ने बड़े उत्साह के साथ बरात के लिये अनेक प्रकार के पदार्थ तैयार कराये। वे इतने बढ़िया बने कि उन्हें देखकर इनकी बुद्धि उधेड़बुन में पड़ गयी कि ऐसे स्वादिष्ट पदार्थों को तो भक्तों को खिलाना चाहिये। मस्तिष्क में यह विचार आते ही इन्होंने भावना में ही भगवान का भोग लगाया और चुपके से साधुओं को बुलवा लिया। जब वे आगये तो इन्होंने कुछ को तो वहीं घर पर भोजन करा दिया और कुछ को परोसा बाँध कर दे दिया। जो सन्त नहीं आ सके उनके लिये कुंजों में ही भेज दिया। ( इतने पर भी प्रभु कृपा से भण्डार खाली नहीं हुआ और बरात की भी यथेष्ट खातिर उसी में हो गई ।

श्री व्यास जी जाति तथा ब्राह्मणत्व से ऊपर उठकर शुद्ध वैष्णव-धर्म में परिनिष्ठित हो गये थे। इन्होंने कहा है

सिक अनन्य हमारी जाति ।
कुलदेवी राधा, बरसानो खेरौ, ब्रजवासिन सौ पाँति ।।

इनके कुटुम्ब का भी परिचय देखिये

इतनो है सब कुटुंब हमारौ ।
सैन, घना, नाभा अरु पीपा अरु कबीर, रैदास चमारो ।।
आदि अन्त भक्तन को सरबस राधाबल्लभ प्यारौ ।
आसू कौ हरिदास रसिक हरिवंश न मोहि बिसारौ ।।

एक दिन व्यास जी जरी की पाग ठाकुर जी के मस्तक पर धारण करा रहे थे, किन्तु सिर के चिकना होने के कारण वह बार-बार खिसक जाती थी। कुछ देर तक चेष्टा करने के बाद जब सफल नहीं हुए तो खीझ कर बोले-“प्रभो या तो पाग बँधवा लीजिये, नहीं तो स्वयं बाँध लीजिये।” यह कहकर वे सेवाकुंज चले गये, लेकिन रह-रह कर इनको पाग की याद आती थी ।

अन्त में जब नहीं रहा गया तो वे वापिस आये और देखा कि श्री ठाकुर जी के मस्तक पर बड़े सुन्दर ढंग से पाग बँधी हुई है। वे दर्शन करके कृतकृत्य हो गये और बोले-“जब ऐसी सुन्दर पाग आप बाँध सकते हैं, तो भला मेरी बाँधी हुई क्यों पसन्द आने लगी ?”

वृन्दावन की लता पताओं से श्रीव्यासजी का घनिष्ठ प्रेम था। किसी भी परिस्थिति में श्री वृन्दावन से बाहर जाना उनके लिये असम्भव हो गया था। एक बार ओड़छा के राजा ने उन्हें लिवा लाने के लिये अपने मन्त्री को भेजा लेकिन वे नहीं गये। एक दिन मन्त्री ने देखा कि श्री हरिराम जी भक्तों की जूठी पत्तलों में से ‘सीथ’ ग्रहण कर रहे हैं। उसने समझ लिया कि अब वे आचार भ्रष्ट हो गये हैं और ओड़छा लौटकर उसने राजा को यह घटना सुना दी। अब राजा स्वयं इन्हें मनाने वृन्दावन पहुँचे और आग्रह किया कि एक दिन के लिये ही सही, किन्तु आप एक बार ओड़छा पधारें अवश्य । कहते हैं, जब किसी प्रकार भी राजा न माने तो व्यास जी ने कहा-“जब चलना ही है मुझे अपने भाई-बन्धुओं से मिल लेने दो।”

इस मिलन का दृश्य अलौकिक था। राजा ने देखा कि व्यास जी वृन्दावन की लता और वृक्षों से लिपट-लिपट कर रो रहे हैं और कह रहे हैं- “मुझसे ऐसा क्या अपराध बन गया जो आज तुमसे अलग हो रहा हूँ।” राजा का हृदय पिघल गया और व्यास जी के साथ वे भी रो पड़े। उन्होंने तब व्यास जी के चरणों पर गिर कर अपने दुराग्रह के लिये क्षमा माँगी और व्यास जी से भगवद्-भक्ति का उपदेश लेकर अपने राज्य को लौट गये। नाभा जी की भक्तमाल के टीकाकार श्री प्रियादास ने व्यास जी की सन्त निष्ठा का एक अन्य रोचक उदाहरण दिया है। व्यास जी के घर में निवास करते हुए एक सन्त बड़े मधुर कण्ठ से भगवान की स्तुति किया करते थे। इसलिये व्यास जी उन्हें बार-बार जाने से रोक लेते थे। एक दिन सन्त जाने के लिए अड़ गये और अपना वड़ बटुआ माँगने लगे जिसमें वे अपने शालिग्राम जी को रखते थे। श्री व्यास जी ने शालिग्राम जी की जगह एक चिड़िया को बटुये में बन्द करके सन्त जी को दे दिया। यमुना जी पर पहुँच कर सन्त ने स्नान किया और ठाकुर जी की पूजा करने के लिये ज्याँही बटुआ खोला चिड़िया उसमें से निकल कर श्री वृन्दावन की ओर उड़ गई। यह देखकर सन्त महोदय लौटकर फिर व्यास जी के पास आये और बोले- “हमारे श्री ठाकुर जी आपके यहाँ उड़कर आ गये हैं। व्यास जी ने कहा- हो सकता है। मैं देखकर बताऊँगा।” यह कहकर वे मन्दिर के अन्दर गये और बाहर निकलकर बोले आपका कहना ठीक है आपके ठाकुर जी बाहर नहीं जाना चाहते इसलिये उड़ आये हैं। फिर तो सन्त जी ने सदा के लिये वृन्दावन वास करने का निश्चय कर लिया।

श्री व्यास जी की उपासना लोक- वेद के बन्धनों से पृथक् थी। इसका एक सुन्दर उदाहरण श्री नाभा जी ने अपने भक्तमाल में दिया है। एक दिन शरद पूर्णिमा को प्रिया प्रियतम की रासक्रीड़ा का अनुकरण किया जा रहा था। इस अवसर पर उपस्थित सन्तों के हृदयों में प्रेम की जो बाढ़ आयी उसका वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता। सहसा प्रिया जी ने नृत्य करते हुए ऐसी घूम ली कि दर्शकों की आँखों में बिजली सी कौंध गयी किन्तु उसी समय प्रिया जी के चरण का एक नूपुर टूट कर उसके घुँघरू बिखर गये। यह देखकर श्री व्यास जी ने तत्काल अपना जनेऊ तोड़कर उससे नूपुर को यथावत कर दिया। यह करने के बाद ये महात्माओं की उस भरी सभा में बोले- “इस यज्ञोपवीत को जन्म भर ढोया पर काम आज ही आया।”

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श्री नरवाहन जी

विक्रम की सोलहवीं शताब्दी में वर्तमान श्रीवृन्दावन एक घने जंगल के रुप में स्थित था। यहाँ जो थोड़ी-सी बस्ती थी वह वृन्दावन से पूर्व में बसे हुये राजपुर गाँव में थी। यहाँ चारों तरफ छोटे-छोटे टीले थे जिनके बीच में होकर वर्षाकाल में यमुना जी प्रवाहित होती रहती थीं। इसीलिये वृन्दावन के सब प्राचीन मन्दिर टीलों पर ही बने हुये हैं और नीची जगहों पर बस्ती और बाजार है

उन्हीं दिनों श्री वृन्दावन वास करने के संकल्प से महाप्रभु हित हरिवंशचन्द्र जी वृन्दावन पधारे। उनके साथ श्री राधावल्लभ लाल का स्वरूप भी था जिसे उन्होंने यहाँ की एक ऊँची टेकरी पर स्थापित किया- यह बात स० १५६१ की है। श्री हिताचार्य के सामने, उस समय सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा की आयी। नरवाहन नामक एक डाकुओं के सरदार ने श्री वृन्दावन को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले रखा था और यहाँ के घने जंगलों में वह लूट का माल तथा अपना अन्य सामान छिपा कर रखता था। नरवाहन जी ने अपना प्रभाव क्रमशः अधिक क्षेत्र पर बढ़ा लिया और राजा की उपाधि ग्रहण करके श्री वृन्दावन से पश्चिम की ओर श्री यमुना तट पर स्थित भैगाँव में एक गढ़ी बना ली और वहाँ रहकर यमुना जी से गुजरने वाले व्यापारियों के सामान पर जकात (चुंगी) बसूल करने लगे। उस समय जलमार्ग से ही विशेष व्यापार होता था और उक्त चुंगी से नरवाहन जी को काफी अच्छी आमद हो जाती थी। नरवाहन ने राजा बनने के बाद एक फौज भी बना ली थीं

और उसकी सहायता से लूटपाट एवं चुंगी बसूल करते रहते थे। श्री वृन्दावन में व्याप्त असुरक्षा का कारण नरवाहन जी हैं – यह बात श्री महाप्रभु जी को ज्ञात हो गयी थी। लोगों ने उन्हें बताया कि यदि डाकुओं का यह राजा रास्ते पर आ जाय तो यहाँ आने वाले भक्तजनों को वास करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। उधर राजा नरवाहन के मन में श्री वृन्दावन में आगे हित

महाप्रभुजी के प्रति जिज्ञासा बढ़ी। वे लुके-छिपे महाप्रभुजी की सेवा पद्धति देखते रहते थे एक दिन साहस करके वे महाप्रभु जी के सामने जा उपस्थित हुए। जैसे ही हित प्रभु जी की नजर नरवाहन जी पर पड़ी वे भावविभोर होकर उनके चरणों पर गिर गये। राजा नरवाहन जी के मन में श्री हिताचार्य के दर्शन मात्र से इतना परिवर्तन आ गया कि वे उनसे दीक्षा देने के लिये प्रार्थना करने लगे। महाप्रभु जी ने नरवाहन को आशीर्वाद देकर अपराध मुक्त किया एवं दीक्षा देकर नये मार्ग पर चलने का बल उनके चित्त में उत्पन्न कर दिया।

अपने मन के सारे प्रश्नों का समाधान नरवाहन जी ने श्रेष्ठ गुरु के उपदेश से पा लिया। वे अपना अधिक समय सेवा उपासना में देने लगे। अच्छे भावों के उदय होने से उन्हें स्वयं ही लगा कि चित्त निर्मल होता जा रहा है। धीरे-धीरे वे राजकार्य से बिल्कुल निवृत्त हो गये और उनके कर्मचारी राज्य संचालन में उनकी जगह काम करने लगे। एक दिन की बात है कि एक जैन व्यापारी अपने ७०० आदमियों और शस्त्रबल की सुरक्षा में यमुना में से जा रहा था। जकात माँगने पर उसने शस्त्रों से युद्ध छेड़ दिया। नरवाहन जी की फौज ने उसे पराजित कर दिया और उसे बन्दी बनाकर कैद में डाल दिया। व्यापारी को आज्ञा दी गयी कि जब तक वह इससे दुगुना धन मँगाकर नहीं देगा तब तक कैदखाने में हथकड़ी-बेड़ी में बँधे रहना पड़ेगा।

व्यापारी धन नहीं माँग सका और उसे मृत्युदण्ड की सजा सुना दी गई। इस फैसले को राजा की एक दासी ने सुन लिया। दया और करुणा से वह दासी भर गयी और वणिक की मदद करने की उसकी इच्छा हुई। दासी ने खूब समझ लिया था कि उसके राजा तो अब “राधावल्लभ श्रीहरिवंश’ नाम में ही लगे रहते हैं। दासी चुपचाप बन्दीखाने में गयी और दुखी व्यापारी से कहा कि राजा की सभा में कल तुम्हें प्राणदण्ड देना तय हो गया है। और बचने का कोई उपाय नहीं है। व्यापारी ने दासी के चरण पकड़ लिये घबराते हुये उसने प्रार्थना की कि मुझे अब बचने का कोई उपाय बताओ। दासी ने कहा- देखो, हमारे राजा को श्री राधावल्लभ नाम से बड़ी प्रीति है। वे सदा उनका भजन करते रहते हैं यदि अपने जीवन की रक्षा चाहते हो तो ठाकुर जी से प्रार्थना करो, उनके नाम की रट लगा दो। आधी रात बीतने पर “राधावल्लभ श्री हरिवंश” की जोर से धुन लगाओ। राजा के कान में जब तेरे द्वारा लिया हुआ उनका प्रिय नाम पहुँचेगा तो वे खुद दौड़े तेरे पास आयेंगे, बन्दी व्यापारी को दासी की सलाह जँच गयी। वह अगली दो प्रहर रात बीतने पर जाग उठा और “श्रीराधावल्लभ नाम की ध्वनि लगाने लगा। सुनसान रात्रि में अपने गुरु- इष्ट का नाम सुनकर नरवाहन जी की नींद टूट गयी और वह बन्दी खाने की ओर लपकते हुए आये। वे व्यापारी के चरणों में गिर गये और व्यापारी से यह जानकर कि वह हित महाप्रभु का कृपापात्र है अत्यन्त दुखी होकर व्यापारी से क्षमा याचना करने लगे।

प्रातःकाल होते ही व्यापारी को स्नान कराया गया और स्वच्छ कपड़े पहना कर उसका सम्मान किया गया उसकी सारी सम्पत्ति लौटा दी गयी और उसे आदर पूर्वक विदा किया गया। व्यापारी ने सोचा कि जिनकी कृपा से यह मुक्ति मिली है उनकी शरण ग्रहण करले और यह सम्पति उन्हें भेंट कर दे परन्तु हित महाप्रभु जी ने वह विपुल सम्पत्ति स्वीकार नहीं की और आज्ञा दी कि यह सारी सम्पत्ति साधु वैष्णवों की सेवा में लगा दो। वह व्यापारी उनसे दीक्षा लेकर विदा हो गया।

व्यापारी के चले जाने के बाद नरवाहन जी डरते हुये हित जी महाराज के समीप आये और उनके कृपापात्र को अज्ञानवश इतनी अधिक पीड़ा देने के अपराध की क्षमा माँगी। महाप्रभुजी ने नरवाहन जी की अद्भुत गुरु-निष्ठा पर रीझकर अपने दो अत्यन्त सुन्दर पद उनको भेंट कर दिये और उन पदों में उसका नाम रख दिया।

ये दो पद हैं- श्रीहित चतुरासी पद संख्या ११ तथा १२ । (धार्मिक जगत में शिष्यों द्वारा अपने गुरुओं को अपनी रचनाएँ भेंट करने के तथा उन रचनाओं को गुरु के नाम से ही प्रचलित करने के अनेक उदाहरण देखने में आते हैं। किन्तु गुरु द्वारा अपनी रचना अपने शिष्य को भेंट करने का उपर्युक्त उदाहरण अनोखा है और श्रीहिताचार्य की सहज प्रेमरूपता को उजागर करता है।)

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रसिक नाम ध्वनि


य जय राधावल्लभ गुरु हरिवंश | रँगीलो राधावल्लभ हित हरिवंश ।।
छबीलो राधावल्लभ प्यारौ हरिवंश । रसीलो राधावल्लभ जीवन हरिवंश ।।


श्रीवृन्दावन रानी राधावल्लभ नृपति प्रशंस हित के
बस यश रस उर धरिये करिये श्रुति अवतंस ।।१।।

वंशीवट यमुनातट धीर समीर पुलिन सुख पुञ्ज ।
बिहरत रंग रँगीलो हित सौं मण्डल सेवाकुञ्ज ।। २ ।।

ललिता विशाखा चम्पक चित्रा तुंगविद्या रंगदेवी ।
इन्दुलेखा अरु सखी सुदेवी सकल यूथ हितसेवी ।।३।।

श्रीवनचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र श्रीगोपीनाथ श्रीमोहन ।
नाद विन्दु परिवार रँगीलो हितसौं नित छवि जोहन ।।४।।

नरवाहन ध्रुवदास व्यास श्रीसेवक नागरीदास ।
बीठल मोहन नवल छवीले हित चरणन की आस ।।५।।

हरीदास नाहरमल गोविन्द जैमल भुवन सुजान।
खरगसेन हरिवंशदास परमानन्द के हित प्रान ।। ६ ।।

गंगा यमुना कर्मठी अरु भागमती ये बाई ।
हित के चरण शरण हवै के इन दम्पति सम्पति पाई ।।७।।

दास चतुर्भुज कन्हर स्वामी अरु प्रबोध कल्यान ।
स्वामीलाल दामोदर पुहकर सुन्दर हित उर आन। ८ ।।

हरीदास तुलाधर और यशवन्त महामति नागर।
रसिकदास हरिकृष्ण दोऊ ये प्रेम भक्ति के सागर ।। ६ ।।

मोहन माधुरीदास द्वारिकादास परम अनुरागी ।
श्यामशाह तूमर कुल हित सौं दम्पत्ति में मति पागी ।।१०।।

श्रीहित शरण भये अरु अब हैं फेरहु जे जन हवै हैं ।
प्रेम भक्ति उर भाव चाव सौं वृन्दावन निधि पैहैं।।११ ।।

रसिक मण्डली में या तन कौं तीके ढंग लगावौ ।
दम्पति यश गावौ हरसावौ हित सौं रीझ रिझावी ।।१२।।

देवन दुर्लभ नर देही सो तें सहजहि पाई।
मन भाई निधि पाई सो क्यों जान बूझ बिसराई । । १३ ।।

एक अहंता ममता ये हैं जग में अति दुख दाई ।
ये जब श्रीजू की ओर लगे तब होत परम सुखदाई । । १४ ।।

मात तात सुत दार देह में मति अरुझै मति मन्दा ।
श्रीहितकिशोर कौ ह्वै चकोर तू लखि श्रीवृन्दावन चन्दा । ।१५ ।।