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श्री राधारमण प्राकट्य

राधारमण मंदिर में पिछले पौने पांच सौ वर्ष से बिना माचिस के प्रयोग के ही ठाकुरजी की आरती हो रही है।

इस मंदिर के मुख्य श्रीविग्रह का प्राकट्योत्सव 16 मई को मनाया जा रहा है। गोपाल भट्ट स्वामी पर ठाकुर की बहुत अधिक कृपा थी इसी वजह से ठाकुर ने प्राकट्य के लिए उन्हें ही माध्यम बनाया था। मंदिर की प्रथम आरती के लिए अग्नि वैदिक मंत्रों के माध्यम से आज से 476 वर्ष पहले प्रकट की गई थी। इसके लिए अरण्य मंथन का सहारा लिया गया था।

उसके बाद ही ठाकुर ने गोपाल भट्ट स्वामी के मन में यह भाव पैदा किया कि इसी अग्नि से भविष्य में ठाकुर की आरती की जाय। यहीं कारण है कि इस मंदिर में करीब पौने पांच सौ वर्ष से माचिस का प्रयोग नहीं किया गया। आज भी ठाकुर की आरती पौने पांच सौ वर्ष पूर्व प्रकट अग्नि से की जाती है।


इस मंदिर की दूसरी विशेषता यह है कि इस मंदिर के श्रीविगृह में मदनमोहन, गोपीनाथ एवं गोविन्ददेव के दर्शन होते हैं, ऐसा अदभुत दर्शन ब्रज के किसी मंदिर में नही मिलेगा। राधा रमण मंदिर के सेवायत गोस्वामी जी ने तीन मंदिरों के विगृह के राधारमण मंदिर में दर्शन के रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया कि ठाकुर हमेशा भक्त के भक्ति के वशीभूत रहते हैं। गोपाल भट्ट की अटूट भक्ति के कारण ही उन्हेांने उनकी मनोकामना पूरी हुई।

उन्होंने बताया कि माता-पिता की आज्ञा पाकर जब गोपाल भट्ट वृन्दावन को रवाना हुए तो उनके मुख से हरिनाम की ध्वनि गूंज रही थी। उनकी भक्ति ऐसी अटूट थी कि बीहड़ जंगलों से होकर जब वे वृन्दावन जा रहे थे तो रास्ते में हिंसक जीव भी उन्हें आगे जाने का रास्ता दे देते थे। श्रीकृष्ण के दर्शन की अभिलाषा में वृन्दावन जा रहे गोपाल भट्ट को एक दिन निद्रा आ गई और उसी समय उन्होंने देखा कि पीताम्बर धारण किए मुरली लिए ठाकुर उनके सामने खड़े हुए हैं।

निद्रा खुलने पर उन्होंने अपने आपको वृन्दावन में यमुना तट पर तमाल, कदम्ब, आम, मौलश्री से युक्त रमणीक वन में पाया। वे इस अनुपम छटा को देखकर नृत्य करने लगे। जब वे रूप, सनातन के साथ कृष्णभक्ति का प्रचार करने लगे तो एक दिन चैतन्य महाप्रभु ने उनके पास अपना डोर कौपीन और अपने बैठने का पट्टा भेजा था जो राधारमण मंदिर के विशेष उत्सवों में दर्शनीय होता है।

आचार्य गोस्वामीजी ने बताया कि गोपाल भट्ट हरीनाम की धारा प्रवाहित करते हुए एक दिन नेपाल पहुंचे जहां तीसरे दिन गंडकी नदी में स्नान के दौरान जैसे ही उन्होंने गोता लगाया उनके उत्तरीय में दिव्य शालिग्राम आ गए। उन्होंने एक बार उसे नदी में ही प्रवाहित कर दिया किंतु दूसरी बार गोता लगाते ही वे फिर उनके उत्तरेय में आ गए और आकाशवाणी हुई कि गोपाल भट्ट इसी के अन्दर तुम्हारी अमूल्य निधि विराजमान है। वे उसे लेकर वृन्दावन आ गए। यहां वे उसकी सेवा पूजा करने लगे।

गोस्वामी जी ने बताया कि वृन्दावन में सनातन गोस्वामी मदनमोहनजी की, रूप गोस्वामी गोविन्द देवजी की तथा मधु पण्डित गोपीनाथ जी की सेवा और श्रंगार किया करते थे। ठाकुर- श्रंगार में प्रवीण होने के कारण गोपाल भट्ट उक्त तीनों विगृह का श्रंगार नित्य किया करते थे। अधिक आयु होने पर तीन तीन जगह का श्रंगार करने में जब उन्हें कुछ अधिक समय लगने लगा तो नृसिंह चतुर्दशी को संध्या समय शालिग्राम जी का अभिषेक करते समय उन्होंने राधारमण मंदिर के श्रीविगृह के सामने ठाकुर जी से आराधना की और कहा कि हे प्रभु छोटे बालक प्रहलाद के लिए तो आप खंभ चीरकर प्रकट हुए थे किंतु उन पर कृपा क्यों नही हो रही है।

उन्होंने स्वयं ठाकुर से कहा कि तीनों विगृह का श्रंगार करने में काफी समय लग जाता है यदि तीनों ही स्वरूप (मदनमोहन, गोपीनाथ एवं गोविन्ददेव मंदिरों के श्री विगृह) इसी श्रीविगृह में समाहित हो जांय तो वे इसका और भव्य श्रंगार कर अपने को धन्य कर सकते हैं। इतना कहने के साथ ही गोपालभट्ट गोस्वामी उसी रासस्थली की पुलिन भूमि पर मूर्छित हो गए और आज ही के दिन 476 वर्ष पहले ठाकुर जी का त्रिभंग ललित श्री राधारमण विग्रह का प्राकट्य हुआ

बोलिये श्री राधारमण लाल की जय हो

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अक्षय तृतीया , 2022



अक्षय तृतीया वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया कहते हैं।

ऐसी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अगर किसी कार्य का शुभारंभ किया जाए तो वह कार्य कभी समाप्त नहीं होता। केवल कार्य ही नहीं, जो भौतिक संसाधन भी इस अवधि में जुटाए जाएं वे भी हमारे जीवन में चिर स्थाई हो जाते हैं। इस तिथि का कुछ लोगों यह भी सदुपयोग किया है कि वे इस दिन दान पुण्य करते हैं, ताकि उनके किए दान अक्षय हो जाएं।

ऐसे में अक्षय तृतीया के दिन नया काम शुरू करने, नए भौतिक संसाधन जैसे बरतन, सोना, चांदी और अन्य कीमती वस्तुएं, विवाह और दान पुण्य करने का रिवाज बन गया है।
चूंकि यह दिन अपने आप में महत्वपूर्ण है, अत: इस पूरे दिन को अपने आप में अबूझ मुहुर्त कहा गया है, इस दिन न तो राहुकाल देखा जाता है, न चौघडि़या और न ही होरा, पूरे दिन में कभी भी किसी भी समय शुभ कार्य संपन्न किए जा सकते हैं।

आप सभी को अक्षय तृतीय की ढेरों शुभकामनाएं। नए वस्त्र खरीदिए, मांगलिक कार्य कीजिए, कीमती आभूषण खरीदिए और दान पुण्य कीजिए, सभी कुछ अक्षय रहे इस कामना के साथ।


“चन्दन उत्सव कथा”


एक बार माधवेंद्रपुरी जी व्रज मंडल जतीपुरा (गोवर्धन) में आये, जब वे रात में सोये तो गोपाल जी उनके स्वप्न ने आये, और बोले, “पुरी! देखो में इस कुंज में पड़ा हूँ, यहाँ सर्दी, गर्मी, वरसात, में बहुत दुःख पता हूँ। तुम इस कुंज से मुझे बाहर निकालो और गिरिराज जी पर मुझे स्थापित करो।”
जब माधवेंद्रपुरी जी सुबह उठे तो उन्होंने व्रज के कुछ ग्वालो को लेकर उस कुंज में आये और कुंज को ध्यान से खोदा, तो मिट्टी में एक श्री विग्रह पड़ा था, उसे लेकर स्नान अभिषेक करके पुरी जी ने स्थापित कर दिया।
एक दिन फिर श्री गोपाल जी स्वप्न में आये और माधवेंद्रपुरी से कहा, “भीषण ग्रीष्म की तपिश से मेरा शरीर तप रहा है। तुम जगन्नाथपुरी स्थित मलयाचल से वहाँ का चंदन लाकर मेरे शरीर पर लेप करो।”
माधवेंद्रपुरी गोस्वामी चंदन लेने हेतु मलयाचल चले गए। रास्ते में रेमूणाय नामक ग्राम आया, वहाँ ‘ठाकुर गोपीनाथ’ का मंदिर था। मंदिर के दर्शन कर फिर वे मलयाचल से अत्यधिक मात्रा में चन्दन लेकर लौट रहे थे, तब वे रात्रि विश्राम के लिए फिर रेमूणाय ग्राम में ठहर गए।
रात्रि में श्रीनाथ जी ने उन्हें यह स्वप्न दिया कि तुम जो चन्दन लाए हो, उसका यही रेमूणाय गोपीनाथ के शरीर पर ही लेप करवा दो। मेरे अंग में लेपन करने से उनके श्री अंग का ताप भी दूर हो जाएगा क्योंकि ठाकुर गोपीनाथ और मैं एक ही हूँ। माधवेंद्रपुरी ने ऐसा ही किया। यह घटना अक्षय तृतीया के दिन की ही है।
इस प्रकार चंदन-यात्रा की सेवा का समर्पण क्रम सर्वप्रथम जगन्नाथपुरी स्थित ठाकुर जगन्नाथ मंदिर में अक्षय-तृतीया के दिन प्रारम्भ हुआ। वहाँ यह महोत्सव “वैशाख शुक्ल तृतीया से ज्येष्ठ पूर्णिमा” की जल यात्रा तक पूरे एक महीने अत्यंत श्रद्धा व धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
उक्त घटना से प्रेरणा लेकर वृंदावन में चंदन यात्रा की विशिष्ट सेवा की परम्परा का शुभारंभ श्रीलजीव गोस्वामी ने अक्षय-तृतीया के दिन यहाँ के समस्त सप्त देवालयों में कराया। यह सेवा अब यहाँ वृहद् रूप से होती है। एक दिन की यह ठाकुर सेवा अत्यंत समय साध्य व श्रम साध्य है। समस्त सप्त देवालयों के गोस्वामी व भक्त-श्रद्धालु अक्षय-तृतीया के कई माह पूर्व से अपने-अपने मंदिर प्रांगणों में बडे-बडे पत्थरों पर चंदन घिसने का कार्य इस भाव से करते हैं कि प्रभु उनकी इस सेवा को अवश्य ही स्वीकार करेंगे।
अक्षय-तृतीया के एक दिन पूर्व घिसे हुए चंदन को एक जगह एकत्रित कर पुन:और अधिक महीन पीसा जाता है ताकि ठाकुर विग्रहों के किसी भी श्रीअंग को किसी प्रकार का कष्ट न हो।
अक्षय-तृतीया के दिन प्रात: महीन चंदन में यमुना जल, गुलाब जल, इत्र, कर्पूर का पाउडर व केसर आदि का मिश्रण गोस्वामी गणों द्वारा किया जाता है। तत्पश्चात उक्त मंदिरों के सेवायतों द्वारा ठाकुर विग्रहों के श्री अंगों पर इस मिश्रण का लेप किया जाता है। इस लेपन के अंतर्गत ठाकुरजी के शीश मुकुट, पोशाक, वंशी, लकुटि,बाजूवंद, कंधनी, पटका आदि चंदन से ही निर्मित कर कलात्मक रूप से सुशोभित किए जाते हैं।
“जय जय श्री राधे”


बांके बिहारी जी विशेष


इस दिन वृन्दावन के लाड़ले ओर श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के लाड़ले हम सब के प्यारे श्री बाँके बिहारी लाल जी के चरण दर्शन होते है।

श्री बाँके बिहारी जी लाल के चरणों के दर्शन साल में सिर्फ एक बार ही होते है अन्यथा वो पोशाक में छिपे रहते है।

इस दिन श्री बाँके बिहारी जी पेजेब भी पहनाई जाती है कहा जाता है जिनकी शादी में रुकावटे बहुत आती हो वो अक्षय तृतीया को बिहारी जी को पेजेब भेंट कर दे तो उनका वर जल्दी मिल जाता है।

इस दिन अधिक गर्मी होने के कारण श्री बाँके बिहारी जी को चंदन का लेप भी किया जाता है जिससे उनको गर्मी से राहत मिल सके।*देगेl

अक्षय तृतीया के दिन श्री बाँके बिहारी जी पीले वस्त्रों में अपने भगतो को फूल बंगले में विराजकर दर्शन देगे।

अक्षय तृतीया को जो के आटे का सत्तू ,चने के आटे का सत्तू ,गेंहू के आटे का सत्तू,ओर भी अनेक प्रकार के सत्तू का शर्बत बनाकर ठाकुरजी की भोग लगता है परन्तु अब बड़े बड़े शहर होते जा रहे तो वहाँ सत्तू नही मिल पाता तो उसकी जगह आप मीठे शर्बत का प्रसाद भी लगा सकते है

सभी अपने लड्डू गोपाल, जुगल जोड़ी आदि सब का सुंदर श्रृंगार कर चंदन का लेप जरूर लगाए और ठाकुर जी को पायल भी पहनाए ओर शर्बत का भोग भी लगाए


प्रचलित मान्यताएं



पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप–तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने–अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है। ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन–जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥


अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है। ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।


सतयुग और त्रेता का आरंभ बिंदू



भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर–नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं।

वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। पद्म पुराण के अनुसा इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता। मदनरत्न के अनुसार:


अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥



व्रत कथाएं



एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी–देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म–कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी–पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, गौरी–पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक फरसा रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।

मांगलिक कार्य इस दिन से शादी–ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है। बड़े–बुजुर्ग अपने पुत्र–पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरंभ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति–रिवाज के साथ अपने गुड्डा–गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बच्चे सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। कई जगह तो परिवार के साथ–साथ पूरा का पूरा गाँव भी बच्चों के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो सगुन कृषकों को मिलते हैं, वे शत–प्रतिशत सत्य होते हैं।
बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक बडी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव–घर और कुटुंब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है, वर्षा की कामना की जाती है, लड़कियाँ झुंड बनाकर घर–घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और लड़के पतंग उड़ाते हैं। यहाँ इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर ख़रबूज़ा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरंभ किसानों को समृद्धि देता है।
पहले समझते हैं कि तिथि क्या है, सूर्य और चंद्रमा की निश्चित कोणीय दूरी को एक तिथि कहा जाता है। यही कारण है कि अंग्रेजी कलेण्डर में जब दिन जारी रहता है, तभी तिथि समाप्त हो जाती है अथवा अंग्रेजी कलेण्डर में तारीख वही रहती है और तिथि बदल जाती है।
इसके साथ ही हम यह भी देखते हैं कि किसी तिथि का लोप हो जाता है तो किसी तिथि की वृद्धि हो जाती है। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि सनातन कलेण्डर के अनुसार एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच की अवधि को एक दिन कहा जाता है। अगर कोई तिथि एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के बीच ही समाप्त हो जाती है, तो उसे तिथि का लोप होना कहते हैं और अगर एक दूसरे दिन के सूर्योदय के बाद भी तिथि जारी रहती है तो उसे तिथि वृद्धि होना कहा जाता है।
सूर्य और चंद्रमा के कोणीय संबंधों में अक्षय तृतीया एक ऐसा बिंदू है, जहां यह संबंध बिल्कुल सटीक होता है, और सूर्योदय के साथ तिथि का उदय होता है और अगले दिन सूर्योदय से पहले तिथि समाप्त हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अक्षय तृतीया ऐसी तिथि है, जिसमें कभी वृद्धि अथवा लोप नहीं होता। इसी कारण इसे अक्षय कहा गया है, इसका कभी क्षरण नहीं होता।

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रामनवमी 2022


इस साल रामनवमी 10 अप्रैल को है


पूजा का मुहूर्त

नवमी तिथि की शुरुआत 10 अप्रैल को देर सुबह 01:32 मिनट से होगी और 11 अप्रैल को तड़के 03:15 मिनट पर समाप्त होगी. भगवान श्रीराम की पूजा का शुभ मुहूर्त 10 अप्रैल 2022 को सुबह 11:10 मिनट से 01: 32 मिनट तक रहेगा.


रामनवमी क्यों मनाई जाती है

भारत में अनेकों पर्व मनाये जाते हैं खासकर हिन्दू धर्म त्यौहारों का धर्म है. हिन्दू कैलेंडर त्यौहारों से भरा पड़ा रहता है. राम नवमी भी हिन्दू त्यौहार है जिसे पूरे भारत में हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. यह त्यौहार वर्ष में एक बार आता है.

राम नवमीं भगवान राम के जन्मोत्सव के तौर पर मनाया जाता है. भगवान राम को आदर्श पुरुष के रूप में जाना जाता है. पौराणिक कथाओं और कहानियों को खंगाले तो आपको यही सीख मिलती है कि एक पुरुष का चरित्र भगवान राम की तरह होना चाहिए. यही वजह है कि भारतवर्ष में भगवान राम के अनुगामी बहुत है. इसलिए मैंने सोचा की क्यूँ न आपको लोगों को रामनवमी क्यूँ मानते है के विषय में पूरी जानकारी प्रदान करें. तो फिर चलिए शुरू करते हैं.

राम नवमी एक ऐसा हिन्दू त्यौहार है जिसमें पूरे भारतवर्ष में भगवान राम का जन्मदिन हर्शोल्लाश के साथ मनाया जाता है. इस दिन देश में हिन्दू धर्म के अनुयायियों के इस अवसर को काफी धूमधाम से मनाते हैं. कहा जाता है की राम नवमी के दिन भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था.

यही कारण है की हर वर्ष इसी दिन हिन्दू धर्म के अनुयायी भगवान राम के जन्मदिवस को राम नवमी के तौर पर धूम धाम से मनाया जाता है. इस दिन बहुत से लोग अपना आस्था प्रकट करने के लिए भगवान राम के लिये व्रत रखते हैं और साथ में भगवान राम का स्मरण भी करते हैं. चूँकि यह पर्व भगवान राम से जुड़ा हुआ हैं इसीलिए हिन्दू धर्म के लोगों के लिए यह दिन काफी शुभ होता है.

शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि भगवान विष्णु ने सातवे अवतार में भगवान राम के रूप में त्रेतायुग में जन्म लिया था. भगवान राम का जन्म रावण के अत्याचारों को खत्म करने एवं पृथ्वी से दुष्टों को खत्म कर नए धर्म स्थापना के लिए हुआ था. इसीलिये भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में रामनवमी का पर्व मनाया जाता है.

शास्त्रों के अनुसार यह भी माना जाता है कि भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए मां दुर्गा की उपासना की थी. चैत्र मास की नवरात्रि के समापन के बाद ही राम नवमी का पर्व आता है.


रामनवमी का त्यौहार


राम नवमी के दिन ही चैत्र की नवरात्रि का समापन होता है. इस दिन बहुत से हिन्दू लोग अयोध्या जाकर सरयू नदी में स्नान करते हैं. इस दिन बहुत से जगहों में व्रत भी रखे जाते हैं और हवन कराये जाते हैं. ऐंसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से उपासक की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है.


रामनवमी का इतिहास


महाकाव्य के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियां थी और तीनों ने राजा को संतान सुख नही दे पाया जिससे राजा काफी चिंतित थे. राजा को संतान प्राप्ति के लिए महर्षि वशिष्ठ ने कमेष्टि यज्ञ कराने को कहा. उनकी बातें मानकर राजा दशरथ ने महर्षि ऋषि श्रंगी से कमेष्टि यज्ञ कराया.

यज्ञ समापन के पश्चात महर्षि ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को खीर ग्रहण करवाया. इसके ठीक 9 महीने पश्चात सबसे बड़ी रानी कौशल्या ने भगवान राम को, कैकयी ने भारत को और सुमित्रा ने दो जुड़वा बच्चे लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया. भगवान राम कृष्ण जी के सातवे अवतार थे. भगवान श्री राम का अवतरण पृथ्वी से दुष्टों का संहार कर नए धर्म की स्थापना करने के लिए हुआ था.


राम जन्मकथा हिंदी में


शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने सातवे अवतार में भगवान राम के रूप में जन्म लिया था. भगवान राम का जन्म राजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी कौशल्या की कोख से त्रेतायुग में मृत्युलोक में हुआ था.

भगवान राम का जन्म रावण के अत्याचारों को खत्म करने एवं दुष्टों का संहार कर पुनरधर्मस्थापना के लिए हुआ था. भगवान श्री राम का जन्म चैत्र मास की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में हुआ था. प्रभु श्रीराम ने लंका पर भी विजय हासिल किया और दुष्टों का भी वध किया था. भगवान राम को आदर्श पुरुष माना जाता है और भगवान राम ने बहुतों को सद्मार्ग के दर्शन भी कराया.

भगवान राम का सातवां अवतार माने जाने वाले प्रभु श्री राम ने हमेशा की अधर्म पर धर्म की विजय हेतु अवतार धारण किया है। टीवी पर तो हम सभी ने रामायण देखी होगी लेकिन फिर भी कई ऐसे प्रसंग रह जाते हैं जिनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं होती है। कुछ ऐसी ही है प्रभु श्री राम की जन्म कथा। आज जागरण आध्यात्म के इस विशेष प्रस्तुति में हम आपको श्री राम की जन्म कथा के कुछ उन पहलुओं के बारे में बताएंगे जिनसे लोग अंजान हैं। महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। महाराज दशरथ ने श्यामकर्ण घोड़े को चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वाने का आदेश दिया। महाराज ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को बुलावा भेजा। वो चाहते थे कि सभी यज्ञ में शामिल हों। यज्ञ का समय आने पर महाराज दशरख सभी अभ्यागतों और अपने गुरु वशिष्ठ जी समेतअपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि के साथ यज्ञ मण्डप में पधारे। फिर विधिवत यज्ञ शुभारंभ किया गया। यज्ञ की समाप्ति के बाद समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट दी गई हैं और उन्हें सादर विदा किया गया। यज्ञ के प्रसाद में बनी खीर को राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को दी। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों गर्भवती हो गईं। सबसे पहले महाराज दशरश की बड़ी रानी कौशल्या ने एक शिशु को जन्म दिया जो बेहद ही कान्तिवान, नील वर्ण और तेजोमय था। इस शिशु का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस समय पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजित थे। साथ ही कर्क लग्न का उदय हुआ था। फिर शुभ नक्षत्रों में कैकेयी और सुमित्रा ने भी अपने-अपने पुत्रों को जन्म दिया। कैकेयी का एक और सुमित्रा के दोनों पुत्र बेहद तेजस्वी थे। महाराज के चारों पुत्रों के जन्म से सम्पूर्ण राज्य में आनन्द का माहौल था। हर कोई खुशी में गन्धर्व गान कर रहा था और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवताओं ने पुष्प वर्षा की। महाराज ने ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी और उन सभी ने महाराज के पुत्रों को आशीर्वाद दिया। प्रजा-जनों को महाराज ने धन-धान्य और दरबारियों को रत्न, आभूषण भेंट दी। महर्षि वशिष्ठ ने महाराज के पुत्रों का नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखा।


रामनवमी कैंसे मनाई जाती है?


रामनवमी पूरे भारतवर्ष में हिंदू धर्म के अनुयायियों के द्वारा मनाई जाती है. रामनवमी के दिन बहुत से राम जी के स्मरण में व्रत रखते हैं. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से उपासक की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस दिन काफी जगह रामचरित मानस का पाठ होता है.

बहुत से लोग रामनवमी के दिन भगवान राम की कथाएं सुनते है और भजन सुनते हैं. इस दिन अयोध्या में चैत्र राम मेले का आयोजन होता है और असंख्य लोग अयोध्या जाकर सलिला सरयू नदी में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं.

पूजा विधि

इस पावन दिन शुभ जल्दी उठ कर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहन लें. अपने घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें. घर के मंदिर में देवी- देवताओं को स्नान कराने के बाद साफ स्वच्छ वस्त्र पहनाएं. भगवान राम की प्रतिमा या तस्वीर पर तुलसी का पत्ता और फूल अर्पित करें. भगवान को फल भी अर्पित करें. अगर आप व्रत कर सकते हैं, तो इस दिन व्रत भी रखें. भगवान को अपनी इच्छानुसार सात्विक चीजों का भोग लगाएं. इस पावन दिन भगवान राम की आरती भी अवश्य करें. आप रामचरितमानस, रामायण, श्री राम स्तुति और रामरक्षास्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं. भगवान के नाम का जप करने का बहुत अधिक महत्व होता है. आप श्री राम जय राम जय जय राम या सिया राम जय राम जय जय राम का जप भी कर सकते हैं. राम नाम के जप में कोई विशेष नियम नहीं होता है, आप कहीं भी कभी भी राम नाम का जप कर सकते हैं.

हवन सामग्री

आम की लकड़ी, आम के पत्ते, पीपल का तना, छाल, बेल, नीम, गूलर की छाल, चंदन की लकड़ी, अश्वगंधा, मुलैठी की जड़, कपूर, तिल, चावल, लौंग, गाय की घी, इलायची, शक्कर, नवग्रह की लकड़ी, पंचमेवा, जटाधारी नारियल, गोला और जौ आदि हवन में प्रयोग होने वाली सभी सामग्री जुटाएं.

हवन की विधि

हवन पर बैठने वाले व्यक्ति को रामनवमी के दिन प्रातः जल्दी उठना चाहिए. शौच आदि से निवृत्त होकर स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े धारण करने चाहिए. वैदिक शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि यदि हवन पति-पत्नी साथ में करें तो उसका विशेष फल प्राप्त होता है. सबसे पहले किसी स्वच्छ स्थान पर हवन कुंड का निर्माण करें. हवन कुंड में आम लकड़ी और कपूर से अग्नि प्रज्जवलित करें. इसके बाद हवन कुंड में ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चै नमः का जाप करते हुए घी से माता के नाम की आहुति दें. इसी के साथ अन्य देवी-देवताओं के नाम की आहुति दें. इसके बाद संपूर्ण हवन सामग्री से 108 बार हवन सामग्री को आहुति दें. हवन के बाद माता जी की आरती करें. इसके बाद माता को खीर, हलवा, पूड़ी और चने का भोग लगाएं. कन्याओं को भी भोजन कराएं. प्रसाद बांटें. उन्हें दक्षिणा भी दें.


रामनवमी का पर्व कब मनाया जाता है


भगवान राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी कौशल्या की कोख से चैत्र मास की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में हुआ था. इस दिन को बहुत शुभ माना गया है. रामनवमी हर वर्ष हिंदी कैलेंडर के चैत्र मास की नवमी तिथि को मनाई जाती है. रामनवमी चैत्र मास के समापन के दिन मनाई जाती हैं


रामनवमी की कहानी


रामनवमी की कहानी लंकापति रावण से जुड़ी है. कथाओं के अनुसार रावण अपने राज्यकाल में इतना अत्याचार करने लगा था कि रावण के अत्याचार से जनता के साथ साथ देवता भी परेशान. अत्यंत परेशान होकर सारे देवतागण भगवान विष्णु के पास विनती करने गए क्योंकि भगवान विष्णु ने ही रावण को अमर होने का वरदान दिया था.

भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ की पहली रानी कौशल्या की कोख से भगवान राम के अवतार में चैत्र मास की नवमी तिथि को जन्म लिया. तब से चैत्र मास की नवमी तिथि को हर वर्ष भगवान राम के जन्मदिवस के रूप में रामनवमी मनाई जाती है.


रामनवमी का महत्व


हिन्दू धर्म में रामनवमी के त्यौहार को विशेष महत्व दिया गया है. राम नवमी के आठ दिन पहले से मतलब चैत्र मास की पहली तिथि से नवमी तिथि तक कई लोग स्नान कर शुद्ध सात्विक रूप से भगवान राम की पूजा अर्चना एवं उपासना करते हैं.

रामनवमी के व्रत को इसीलिए महत्व दिया गया है क्योंकि मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति सच्चे मन से भगवान राम का स्मरण कर व्रत रखता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है.

इस दिन अयोध्यावासी और बाहरी लोग भी अयोध्या आकर सरयू नदी में स्नान करते हैं क्योंकि मान्यता है कि ऐंसा करने से भगवान राम सारे पाप हर लेते हैं और गलतियां माफ कर देते हैं. रामनवमी चैत्र की नवरात्रि के नवे दिन पूरे भारत मे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है.


रामनवमी की महिमा


रामनवमी की महिमा बहुत ही खास है क्योंकि यह पर्व भगवान राम से जुड़ा हुआ है. हिन्दू धर्म के बहुत से लोग आज भी नमस्कार के रूप में राम-राम कहते हैं और कोई विपत्ति, भय या संकट होने पर हे राम! कहते हैं.

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार राम का नाम भगवान राम से भी बड़ा है. खुद महादेव भी राम का नाम जाप करते है| राम का नाम दुखों को हरने वाला होता है. माना जाता है राम नाम का जप करने वालों के ऊपर कोई भी परिस्थिति हावी नही होती . वहीँ यदि कोई मनुष्य अपने अंतिम क्षणों में भगवान राम का नाम लेता है तब उसकी आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है.


राम लला की आरती

आरती कीजे श्रीरामलला की । पूण निपुण धनुवेद कला की ।।
धनुष वान कर सोहत नीके । शोभा कोटि मदन मद फीके ।।
सुभग सिंहासन आप बिराजैं । वाम भाग वैदेही राजैं ।।
कर जोरे रिपुहन हनुमाना । भरत लखन सेवत बिधि नाना ।।
शिव अज नारद गुन गन गावैं । निगम नेति कह पार न पावैं ।।
नाम प्रभाव सकल जग जानैं । शेष महेश गनेस बखानैं
भगत कामतरु पूरणकामा । दया क्षमा करुना गुन धामा ।।
सुग्रीवहुँ को कपिपति कीन्हा । राज विभीषन को प्रभु दीन्हा ।।
खेल खेल महु सिंधु बधाये । लोक सकल अनुपम यश छाये ।।
दुर्गम गढ़ लंका पति मारे । सुर नर मुनि सबके भय टारे ।।
देवन थापि सुजस विस्तारे । कोटिक दीन मलीन उधारे ।।
कपि केवट खग निसचर केरे । करि करुना दुःख दोष निवेरे ।।
देत सदा दासन्ह को माना । जगतपूज भे कपि हनुमाना ।।
आरत दीन सदा सत्कारे । तिहुपुर होत राम जयकारे ।।
कौसल्यादि सकल महतारी । दशरथ आदि भगत प्रभु झारी ।।
सुर नर मुनि प्रभु गुन गन गाई । आरति करत बहुत सुख पाई ।।
धूप दीप चन्दन नैवेदा । मन दृढ़ करि नहि कवनव भेदा ।।
राम लला की आरती गावै । राम कृपा अभिमत फल पावै ।।

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शुभ नववर्ष

ग्रंथों में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी १ रविवार था। हिन्दू नववर्ष अंग्रेजी माह के मार्च – अप्रैल में पड़ता है। इसी कारण भारत मे सभी शासकीय और अशासकीय कार्य तथा वित्त वर्ष भी अप्रैल (चैत्र) मास से प्रारम्भ होता है।

चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था। हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शरू होता है। इस दिन ग्रह और नक्षत्र मे परिवर्तन होता है। हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है।

पेड़-पोधों मे फूल,मंजर,कली इसी समय आना शुरू होते है, वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है। जीवो में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है। इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था। भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी इसी दिन हुआ था। नवरात्र की शुरुआत इसी दिन से होती है। जिसमे हमलोग उपवास एवं पवित्र रह कर नव वर्ष की शुरूआत करते है।

परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का ही रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया।

न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऎसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं श्रीराम रूप धारण कर उतर आए, श्रीराम का अवतार चैत्र शुक्ल नवमी को होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के ठीक नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी। यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है। संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है हमारा अपना नया साल विक्रम संवत्सर विक्रम संवत का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है।

कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चैत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत मेे ही काल गणना की शुरूआत मानी होगी।

चैत्र मास का वैदिक नाम है-मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त होता है चैत्र में। सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है, पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में।

चारों ओर पकी फसल का दर्शन, आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा गई।

नई फसल घर मे आने का समय भी यही है। इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है, जिससे पेड़ -पौधे, जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है। लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय गीत गुनगुनाने लगते है। गौर और गणेश कि पूजा भी इसी दिन से तीन दिन तक राजस्थान मे कि जाती है। चैत शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है, मेषार्क प्रवेश के दिन जो वार होता है वही संवत्सर का मंत्री होता है इस दिन सूर्य मेष राशि मे होता है।

नव वर्ष एक उत्सव की तरह पूरे विश्व में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग तिथियों तथा विधियों से मनाया जाता है। विभिन्न सम्प्रदायों के नव वर्ष समारोह भिन्न-भिन्न होते हैं और इसके महत्त्व की भी विभिन्न संस्कृतियों में परस्पर भिन्नता है।

भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। प्रायः ये तिथि मार्च और अप्रैल के महीने में पड़ती है। पंजाब में नया साल बैशाखी नाम से १३ अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलंडर के अनुसार १४ मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिळ नव वर्ष भी आता है। तेलगु नया साल मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग+आदि का अपभ्रंश) के रूप में मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नया साल विशु १३ या १४ अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल १५ जनवरी को नए साल के रूप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेंडर नवरेह १९ मार्च को होता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के रूप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड नया वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरूविजा नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है। गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है।लेकिन यह व्यापक नहीं है। अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नया साल पोहेला बैसाखी १४ या १५ अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नया साल होता है।


चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व :

1) इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।

2) सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।

3) प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है।

4) शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।

5) सिखो के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है।

6) स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया।

7) सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।

8) राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। विक्रम संवत की स्थापना की ।

9) युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।

10) संघ संस्थापक प.पू.डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिन।

11) महर्षि गौतम जयंती


भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व :

1) वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।

2) फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।

3) नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।


भारतीय नववर्ष कैसे मनाएँ :

1) हम परस्पर एक दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ दें। पत्रक बांटें , झंडे, बैनर….आदि लगावे ।

2) आपने परिचित मित्रों, रिश्तेदारों को नववर्ष के शुभ संदेश भेजें।

3) इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों पर भगवा पताका फेहराएँ।

4) आपने घरों के द्वार, आम के पत्तों की वंदनवार से सजाएँ।

5) घरों एवं धार्मिक स्थलों की सफाई कर रंगोली तथा फूलों से सजाएँ।

6) इस अवसर पर होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें अथवा कार्यक्रमों का आयोजन करें।

7) प्रतिष्ठानों की सज्जा एवं प्रतियोगिता करें। झंडी और फरियों से सज्जा करें।

8) इस दिन के महत्वपूर्ण देवताओं, महापुरुषों से सम्बंधित प्रश्न मंच के आयोजन करें।

9) वाहन रैली, कलश यात्रा, विशाल शोभा यात्राएं कवि सम्मेलन, भजन संध्या , महाआरती आदि का आयोजन करें।

10) चिकित्सालय, गौशाला में सेवा, रक्तदान जैसे कार्यक्रम।


कब तक मनायें नववर्ष

नववर्ष की पूर्व सन्ध्या से लेकर श्री रामनवमी के दिन तक एक दूसरे को मंगलकामनायें अवश्य दें।अशोक अष्टमी तो आठ अशोक कलिका खाने के लिए ही बनी है।यह नववर्ष का अंग दिवस है।

विगत शोक करे अशोक


श्री राम का मास है चैत्र। नवमी उनकी तिथि है। भगवती चण्डी उनकी आराध्या हैं।

आईये
श्रीरामको सिंहासनपर बैठायें।
नववर्ष का उल्लास बढायें।
आने वाले सम्वत्सर का एक एक दिन मंगलमय हो।
जय हो , विजय हो , सुजय हो ।।
नववर्ष मंगलमय हो।

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“फाल्गुन आयो रे”

हिन्दू पंचाग का आखिरी महीना होता है फाल्गुन, इसके बाद हिन्दू नववर्ष की शुरुआत होती है। हिन्दू पंचाग के अनुसार चैत्र पहला माह होता है और फाल्गुन आखिरी माह माना जाता है। इस माह में दो महत्वपूर्ण पर्व आते हैं जो हिन्दू धर्म में अपना खास महत्व रखते हैं। महाशिवरात्रि, इस दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है और होली, इस दिन होलिका दहन किया जाता है और अगली सुबह रंगों से होली खेली जाती है। फाल्गुन माह में ही चंद्र देव का जन्म माना जाता है, इस कारण से फाल्गुन में चंद्र देव का पूजन शुभ माना जाता है। इस माह में ऋतु में बड़ा परिवर्तन हो रहा होता, बसंत ऋतु के समय नए फूल आ रहे होते हैं जो प्रकृति को खूबसूरत बनाते हैं।

(ब्रज होली की सूची)


इस साल होली 19 मार्च को है। लेकिन ब्रज में होली का खुमार अभी से छाने लगा है। बरसाने की लट्ठमार होली देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। ब्रज भूमि में होली धूमधाम के साथ खेली जाती है। यहां दुनियाभर से लोग होली देखने आते हैं। होली से एक सप्ताह पहले ब्रज में विशेष प्रकार की होली खेलना शुरू हो जाती है। आइए जानते हैं कौन सी होली मनाई जाती है

लड्डू की होली:- इस दिन राधा रानी के गांव बरसाना में फाग आमंत्रण का उत्सव होता है और फिर लड्डू से होली खेली जाती है।

रंगीली गली में लट्ठमार होली:- रंगीली गली में बरसाना में ही नंदगांव के हुरयारों संग लट्ठमार होली खेली जाती है । बरसाने की लट्ठमार होली न सिर्फ देश में मशहूर है बल्कि पूरी दुनिया में भी काफी प्रसिद्ध है। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को बरसाने में लट्ठमार होली मनाई जाती है। नवमी के दिन यहां का नजारा देखने लायक होता है। यहां लोग रंगों, फूलों के अलावा डंडों से होली खेलने की परंपरा निभाते है।
बरसाना में राधा जी का जन्म हुआ था। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को नंदगांव के लोग होली खेलने के लिए बरसाना गांव जाते हैं। जहां पर लड़कियों और महिलाओं के संग लट्ठमार होली खेली जाती है। इसके बाद फाल्गुन शुक्ल की दशमी तिथि पर रंगों की होली खेली होती है।
लट्ठमार होली खेलने की परंपरा भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण अपने दोस्तों संग नंदगांव से बरसाना जाते हैं। बरसाना पहुंचकर वे राधा और उनकी सखियों संग होली खेलते हैं। इस दौरान कृष्णजी राधा संग ठिठोली करते है जिसके बाद वहां की सारी गोपियां उन पर डंडे बरसाती है।
गोपियों के डंडे की मार से बचने के लिए नंदगांव के ग्वाले लाठी और ढालों का सहारा लेते हैं। यही परंपरा धीरे-धीरे चली आ रही है जिसका आजतक पालन किया जा रहा है। पुरुषों को हुरियारे और महिलाओं को हुरियारन कहा जाता है। इसके बाद सभी मिलकर रंगों से होली का उत्सव मनाते है।


नंदगांव में लट्ठमार होली:- बरसाना के बाद अगले दिन नंदगांव में लट्ठमार होली का आयोजन किया जाता है।


फूलों की होली और रंगभरनी होली:- मथुरा के श्री द्वारकाधीश मंदिर में फूलों की होली खेली जाएगी तो वहीं वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में रंगभरनी होली खेली जाएगी।

छड़ीमार होली:- गोकुल में छड़ीमार होली का आयोजन होगा।


गुलाल की होली:- वृंदावन में अबीर और गुलाल से होली खेली जाएगी। यहां वृंदावन में रहने वाली विधवाएं रंगों वाली होली खेलेंगी।
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“होली श्यामा-श्याम की”

व्रज-बरसाने में श्री श्यामा-श्याम रस की होरी खेल रहे हैं। आज बरसाने में श्याम सुन्दर बन-ठन कर आये हैं। यह दोनों ललित हैं

श्री किशोरी जी जब चलती हैं तो कमर में लचक आती है। इन दोनों का रूप ऐसा है, जैसे चमकती हुई ज्योति।
जैसे हवा में दीपक की ज्योति चञ्चल होती है, ऐसे ही इन प्रिया-प्रियतम की लटें गालों पर आती हैं। श्री जी का मन नित्य लुटा हुआ है। दोनों ही चंचल और चपल हैं।
श्रीजी की नासिका में उलझ जाती हैं। श्री जी की लट क्या हैं ? मानो मछली फाँसने वाला काँटा।
जैसे काँटे के नीचे आटे की गोली लगा देते हैं और मछली आकर उसमे फँस जाती है वैसे ही श्रीजी की जो घुँघराली लट जो लटकी लट तो थी काँटा। जो मोती में उलझी वह था काँटे के आगे लगा आटा और मछली फँस गयी। मछली क्या था ? श्याम सुन्दर का मन।
अब होरी का खेल शुरू हुआ। चारों ओर सखियाँ और बीच में श्रीजी। यह गौर चाँद है। अब खेल शुरू होने से पहले सब सखियों ने मिल कर केसर वाला रंग घोला।
जब ठुमकता हुआ यह व्रज का छोरा आया तो, सुन्दर श्याम के बदन पर सोने की कटोरियों में रंग भर-भर के डाला।
श्री राधा और सखियाँ सब उल्लास से विभोर हो गयीं। श्रीजी के और सखियों के हाथ में पिचकारियाँ हैं। निशाना लगा-लगा कर सब श्याम सुन्दर के मुख पर गुलाल छोड़ रही हैं।
कई सखियों ने तो श्याम सुन्दर के हाथ पकड़े और कुछ ने उनके मुख पर रंग मल दिया। श्याम सुन्दर का मुख लाल हो गया।
श्याम सुन्दर ने देखा कि किशोरी जी सखियों के संग प्रसन्न मन हैं, तो श्याम सुन्दर को शरारत सूझी, होरी में नटखटपन न हो तो होरी काहे की ?
गुलाल के खेल में जब श्यामसुन्दर हारने लगे तो नटखटपन करने लगे। नजर बचाकर श्रीजी को रंग की पिचकारी मार दी।
श्रीजी बहुत चतुर हैं, वे जानती हैं कि यह हारेंगे तो कोई-न-कोई नटखटपन जरूर करेंगे। यह 16 कला सम्पूर्ण हैं तो श्रीजी 64 कला सम्पूर्ण।
श्यामसुन्दर ने जैसे ही पिचकारी मारी श्रीजी ने बाएँ हाथ से रंग की धार को रोक दिया।
श्यामसुन्दर ने ताक कर मौका देखकर पिचकारी तो ऐसे ही मारी थी कि श्रीजी को रंग से ऊपर से नीचे तक तर-बतर कर देंगे, पर श्री जी होरी की बड़ी खिलाड़ी हैं।
सारी धारा को तो श्रीजी ने बाएँ हाथ से रोक दिया पर फिर भी कुछ छींटे श्री जी के गोर-कपोलों पर लग गए जैसे अमरूद पर लाल छींटे पर जाते हैं। तो बहुत अच्छे लगते हैं।
यह देखकर श्याम सुन्दर के ह्रदय में आनन्द का सिन्धु लहरा उठा यही ह्रदय की उमंग और उल्लास ही तो होरी है।
जब श्याम-सुन्दर के ह्रदय में आनन्द का सागर लहराया उसी उमंग और उल्लास से श्रीराधा और सखियों को श्याम सुन्दर ने रंग से रंग दिया।
अब जो रंग से भरा संग्राम मचा। श्री प्रिया-प्रियतम के सौन्दर्य की क्या उपमा दी जा सकती है। मानस नेत्रों से हम दर्शन करें और अपने ह्रदय में बसन्त की होरी की उमंग ओर उल्लास भर लें। फिर देखें, बरसाने में होरी का उल्लास।
जब ह्रदय में उल्लास छा गया तब श्री जी-प्रियतम नृत्य करने के लिये उद्यत हुए। कोई सखी के मृदंग सम्भाल ली, किसी ने तबला किसी ने ढोलकी अनन्त वाद्य बजने लगे।
सभी नृत्य कर-कर के राग गाने लगे। अबीर की सभी ने झोलियाँ भर लीं और क्या पुकार रहे हैं-

हो-हो होरी है।
ऐरी सखी चल बरसाने। चलो बरसाने खेलें होरी।
मैं तो बरसाने में जाऊँ मेरी वीर, नाय माने मेरा मनुवा॥

होली प्रसंग (श्रीगर्ग- संहिता)

वीतिहोत्र, अग्निभुक्, साम्बु, श्रीकर, गोपति, श्रुत, व्रजेश, पावन तथा शान्त– ये व्रज में उत्पन्न हुए नौ उपनन्दों के नाम हैं।
ये सब-के-सब धनवान, रूपवान, पुत्रवान बहुत-से शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले, शील-सदाचारादि गुणों से सम्पन्न तथा दान परायण हैं।
इनके घरों में देवताओं की आज्ञा के अनुसार जो कन्याएँ उत्पन्न हुई, उनमें से कोई दिव्य, कोई अदिव्य तथा कोई त्रिगुणवृत्ति वाली थीं।
ये सब नाना प्रकार के पूर्वकृत पुण्यों के फलस्वरूप भूतलपर गोपकन्याओं के रूप में प्रकट हुई थीं। ये सब श्रीराधिका के साथ रहने वाली उनकी सखियाँ थी।
एक दिन की बात है, होलिका-महोत्सव पर श्रीहरि को आया हुआ देख उन समस्त व्रज गोपिकाओं ने मानिनी श्रीराधा से कहा-
रम्भोरू ! चन्द्रवदने ! मुध-मानिनि ! स्वामिनि ! ललने ! श्रीराधे ! हमारी यह सुन्दर बात सुनो।
ये व्रजभूषण नन्दनन्दन तुम्हारी बरसाना नगरी के उपवन में होलिकोत्सव विहार करने के लिये आ रहे हैं।
शोभा सम्पन्न यौवन के मद से मत्त उनके चंचल नेत्र घूम रहे हैं। घुँघराली नीली अलकावली उनके कंधों और कपोलमण्डल को चूम रही है।
शरीर पर पीले रंग रेशमी जामा अपनी घनी शोभा बिखेर रहा है। वे बजते हुए नूपुरों की ध्वनि से युक्त अपने अरूण चरणाविन्दों द्वारा सबका ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं।
उनके मस्तक पर बालक रवि के समान कान्तिमान मुकुट है। वे भुजाओं में विमल अंगद, वक्ष:स्थल पर हार और कानों में विद्युत को भी विलज्जित करने वाले मकराकार कुण्डल धारण किये हुए हैं।
इस भूमण्डल पर पीताम्बर की पीत प्रभा से सुशोभित उनके श्याम कान्ति मण्डल उसी प्रकार उत्कृष्ट शोभा पा रहा है, जैसे आकाश में इन्द्रधनुष से युक्त मेघ मण्डल सुशोभित होता है। अबीर और केसर के रस से उनका सारा अंग लिप्त है।
उन्होंने हाथ में नयी पिचकारी ले रखी है तथा सखि राधे ! तुम्हारे साथ रासरंग की रसमयी क्रीड़ा में निमग्न रहने वाले वे श्याम सुन्दर तुम्हारे शीघ्र निकलने की राह देखते हुए पास ही खडे़ है।
तुम भी मान छोड़कर फगुआ (होली) के बहाने निकलो। निश्चय ही आज होलिका को यश देना चाहिये और अपने भवन में तुरंत ही रंग-मिश्रित जल, चन्दन के पंख और कमकरन्द (इत्र आदि पुष्परस) का अधिक मात्रा में संचय कर लेना चाहिये।
परम बुद्धिमति प्यारी सखी ! उठो और सहसा अपनी सखीमण्डल के साथ उस स्थान पर चलो, जहाँ वे श्याम सुन्दर भी मौजूद हों। ऐसा समय फिर कभी नहीं मिलेगा। बहती धारा में हाथ धो लेना चाहिये- यह कहावत सर्वत्र विदित है।
तब मानवती राधा मान छोड़कर उठीं और सखियों के समूह से घिरकर होली का उत्सव मनाने के लिये निकलीं।
चन्दन, अगर, कस्तुरी, हल्दी तथा केसर के घोल से भरी हुई डोलचियाँ लिये वे बहुसंख्यक व्रजांगनाएँ एक साथ होकर चलीं।
रँगे हुए लाल-लाल हाथ, वासन्ती रंग के पीले वस्त्र, बजते हुए नूपूरों से युक्त पैर तथा झनकारती हुई करधनी से सुशोभित कटिप्रदेश बड़ी मनोहर शोभा थी उन गोपाङ्गनाओं की। वे हास्ययुक्त गलियों से सुशोभित होली के गीत गा रही थीं।
अबीर-गुलाल के चूर्ण मुठ्ठियों में ले-लेकर इधर-उधर फेंकती हुई वे व्रजाङ्गनाओं भूमि, आकाश और वस्त्र को लाल किये देती थीं।
वहाँ अबीर की करोड़ों मुठ्ठियाँ एक साथ उड़ती थीं। सुगन्धित गुलाल के चूर्ण भी कोटि-कोटि हाथों से बिखेरे जाते थे।
इसी समय व्रजगोपियों ने श्रीकृष्ण को चारों ओर से घेर लिया, मानों सावन की साँझ में विद्युन्मालाओं ने मेघ को सब ओर से अवरूद्ध कर लिया हो पहले तो उनके मुँह पर खूब अबीर और गुलाल पोत दिया, फिर सारे अङ्गों पर अबीर-गुलाल बरसाये तथा केसर युक्त रंग से भरी डोलचिायों द्वारा उन्हें विधिपूर्वक भिगोया।
वहाँ जितनी गोपियाँ थी, उतने ही रूप धारण करके भगवान भी उनके साथ विहार करते रहे।
वहाँ होलिका महोत्सव में श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ वैसी ही शोभा पाते थे, जैसे वर्षाकाल की संध्या-वेला में विद्युन्माला के साथ मेघ सुशोभित होता है।
श्रीराधा ने श्रीकृष्ण के नेत्रों में काजल लगा दिया। श्रीकृष्ण ने भी अपना नया उत्तरीय (दुपट्टा) गोपियों को उपहार में दे दिया। फिर वे परमेश्वर श्रीनन्दभवन को लौट गये। उस समय समस्त देवता उनके ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे

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मकर संक्रांति

दिनांक 14.01.2022 शुक्रवार को भगवान् सूर्यदेव 14:12:26 पर मकर राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। इस दिन को सम्पूर्ण भारतवर्ष में अलग-अलग नामों के साथ, अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। जिनमें सबसे प्रचलित है:-

“मकर संक्रान्ति”


सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रान्ति कहते हैं। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति के बीच का समय ही सौर मास है। वैसे तो सूर्य संक्रान्ति 12 हैं, लेकिन इनमें से चार संक्रान्ति महत्वपूर्ण हैं जिनमें मेष, कर्क, तुला, और मकर। सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश का नाम ही मकर संक्रान्ति है। धनु राशि बृहस्पति की राशि है। इसमें सूर्य के रहने पर मलमास होता है। इस राशि से मकर राशि में प्रवेश करते ही मलमास समाप्त होता है और शुभ मांगलिक कार्य हम प्रारंभ करते हैं। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है।

मकर संक्रान्ति के दिन पूर्वजों को तर्पण और तीर्थ स्नान का अपना विशेष महत्व है। इससे देव और पितृ सभी संतुष्ट रहते हैं। सूर्य पूजा से और दान से सूर्य देव की रश्मियों का शुभ प्रभाव मिलता है और अशुभ प्रभाव नष्ट होता है। इस दिन स्नान करते समय स्नान के जल में तिल, आंवला, गंगा जल डालकर स्नान करने से शुभ फल प्राप्त होता है।

मकर संक्रान्ति का दूसरा नाम उत्तरायण भी है क्योंकि इसी दिन से सूर्य उत्तर की तरफ चलना प्रारंभ करते हैं। उत्तरायण के इन छः महीनों में सूर्य के मकर से मिथुन राशि में भ्रमण करने पर दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। इस दिन विशेषतः तिल और गुड़ का दान किया जाता है। इसके अलावा खिचड़ी, तेल से बने भोज्य पदार्थ भी किसी गरीब ब्राह्मण को खिलाना चाहिए। छाता, कंबल, जूता, चप्पल, वस्त्र आदि का दान भी किसी असहाय या जरूरत मंद व्यक्ति को करना चाहिए।

राजा सागर के 60,000 पुत्रों को कपिल मुनि ने किसी बात पर क्रोधित होकर भस्म कर दिया था। इसके पश्चात् इन्हें मुक्ति दिलाने के लिए गंगा अवतरण का प्रयास प्रारंभ हुआ! इसी क्रम में राजा भागीरथ ने अपनी तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया। स्वर्ग से उतरने में गंगा का वेग अति तीव्र था इसलिए शिवजी ने इन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। फिर शिव ने अपनी जटा में से एक धारा को मुक्त किया। अब भागीरथ उनके आगे-आगे और गंगा उनके पीछे-पीछे चलने लगी। इस प्रकार गंगा गंगोत्री से प्रारंभ होकर हरिद्वार, प्रयाग होते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुँचीं यहां आकर सागर पुत्रों का उद्धार किया। यही आश्रम अब गंगा सागर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही राजा भागीरथ ने अपने पुरखों का तर्पण कर तीर्थ स्नान किया था। इसी कारण गंगा सागर में मकर संक्रान्ति के दिन स्नान और दर्शन को मोक्षदायक माना है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था इसीलिए उन्होंने शर-शैय्या पर लेटे हुए दक्षिेणायन के बीतने का इंतजार किया और उत्तरायण में अपनी देह का त्याग किया। उत्तरायण काल में ही सभी देवी-देवताओं की प्राण प्रतिष्ठा शुभ मानी जाती है। धर्म-सिंधु के अनुसार-मकर संक्रान्ति का पुण्य काल संक्रान्ति समय से 16 घटी पहले और 40 घटी बाद तक माना गया है। मुहूर्त चिंतामणि ने पूर्व और पश्चात् की 16 घटियों को ही पुण्य काल माना है।

भारतीयों का प्रमुख पर्व मकर संक्रान्ति अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में वहाँ की परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। इसी दिन से अलग-अलग राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। मकर संक्रान्ति त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है।

उत्तर प्रदेश : मकर संक्रान्ति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है।

गुजरात और राजस्थान : उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है।

आंध्रप्रदेश : संक्रान्ति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है।

तमिलनाडु : किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। घी में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है।

महाराष्ट्र : लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं।

पश्चिमबंगाल : हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है।

असम: भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

पंजाब : एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। धूमधाम के साथ समारोहों का आयोजन किया जाता है।

मकर संक्रान्ति मुहूर्त पुण्य काल मुहूर्त : 14:12:26 से 17:45:10 तक
अवधि: 03 घंटे 22 मिनट

महापुण्य काल मुहूर्त : 14:12:26 से 14:36:26 तक
अवधि : 0 घंटे 24 मिनट

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खिचड़ी उत्सव स्पेशल

सभी को राधे राधे ! श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश

इस उत्सव के बारे में काफी लोगो को बहुत कम जानकारी है तो इस ब्लॉग में हम आपके सब प्रश्नों को रखेगे !

वैसे तो राधावल्लभ जी मंदिर में ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन कोई उत्चसव नहीं होता हो ! इसमें से एक उत्सव है खिचड़ी उत्सव जो राधावल्लभ  सम्प्रदाय में बहुत प्राचीन काल से मनाया जाता है

ये उत्सव इस साल पौष शुक्ला दौज ( 4 जनवरी 2022 से 3 फरवरी 2022 ) एक महीने तक चलेगा !

मंदिर में सुबह 5 बजे से ही ये उत्सव रोज प्रारंभ हो जाता है और समाज गायन होता है ( मतलब की इनके पदों को राधावल्लभ जी को सुनाया जाता है ) आप खिचड़ी उत्सव के  पदों को अगर ध्यान से पढेगे तो अपने आप समझ जायेगे ! इसके बाद मंगला आरती होती है ! और राधावल्लभ जी जो भेष धारण करते है उनको बांटा भी जाता है वो धन्य है जिनको उनके वस्त्र परशादी में मिलते है !

एकादशी के दिन श्रीराधावल्लभलाल ‘ श्रीबिहारीजी बनते हैं


आप घर पर कैसे उत्सव मनाये ?

आप घर पर भी खूब अच्छे से उत्सव मना सकते है ! इस ब्लॉग में दिए दिए  सभी पदों को आप जैसा आपको समय मिले रोज अपने ठाकुर जी को सुनाये और उनको नए नए भेष में सजाये और भोग में खिचड़ी या अन्य गर्म चीज बना कर भोग लगाये !
और आपको रोज इसी राधे कृष्णा वर्ल्ड एप के हित स्पेशल में खिचड़ी उत्सव स्पेशल दर्शन में जाकर रोज दर्शन कर सकते है !


आप हमारे साथ भी आपके ठाकुरों की छवियो को शेयर कर सकते है जो की एप के खिचड़ी उत्सव स्पेशल में जाकर कर सकते है !

( If Anyone Want To Donate For This Seva : You May Click On Sant Seva Icon For Donation )


राधावल्लभ जी के खिचड़ी उत्सव के सभी पदों का हिंदी अनुवाद सहित वाख्या है
सभी हिंदी अनुवाद से समझ पायेगे की पदों का मतलब क्या है


खिचड़ी उत्सव के पद


प्रथम श्री सेवक पद सिर नाऊँ
करहु कृपा श्री दामोदर मोपै. श्री हरिवंश चरण रति पाऊँ ||
गुण गम्भीर व्यास नन्दन जू के तुव परसाद सुयश रस गाऊँ ||
नागरीदास के तुम ही सहायक, रसिक अनन्य नृपति मन भाऊँ ।।1।।

सर्वप्रथम मैं भी सेवक जी के चरणों मे नमस्कार करता हूँ। हे श्री दामोदरजी (सेवकजी का नाम) आप मेरे ऊपर कृपा करिये जिसके फलस्वरूप श्रीहस्विंश चरणाविन्द में मेरी प्रीति हो, प्रेम हो ।

व्यासनन्दन भीडित हस्तिंश प्रभु के सबसे दुर्ज्ञेय, अद्भुत रसमय गुण, ईसता, दीनता, उदारता इत्यादि करके गम्भीर है। आपका कृपा प्रसाद पाकर उनके रस का सुयश मान करूँ। हित नागरीदास जी कहते है कि मुझे केवल आपका ही भरोसा है आप ही मेरे सहायक होतेंगे रसिक अनन्य नृपति-श्रीहित हरिवंश सम्पूर्ण प्रभु के मन को भाने वाला बन जाऊँ ।


जयति जगदीश जस जगमगत जगत गुरु, जगत वंदित सु हरिवंश बानी|
मधुर, कोमल, सुपद, प्रीति-आनंद-रस, प्रेम विस्तरत हरिवंश बानी ॥
रसिक रस मत श्रुति सुनत पीवंत रस, रसन गावन्त हरिवंश बानी ।
कहत हरिवंश हरिवंश हरिवंश हित जपत हरिवंश हरिवंश बानी ।।2।।

श्री सवेक जी महाराज जयति कहकर वाणी और नाम को नमस्कार करते हैं, क्योंकि नाम और वाणी अभेद है “वानी श्री हस्विंश की, के हरिवंश ही नाम “

भी हरिवंश नाम के अर्थ अक्षर हरि ही का ऐश्वर्य यह सब लीला अवतार और उनके लोक, प्राणी मात्र, पशु पंछी, चराचर सब, सर्व-व्यापक तत्व ‘श्रीहित का भजन करते हैं, सब वेद पुराणादिक हरि से जीव तक, इसके आधीन है, परन्तु इस रहस्य को कोई जान नहीं सका। तव भीहरिवंश हित सम्पूर्ण प्रभु, आचार्य रूप में प्रगटे और श्रीहित का वाणी रूपी भजन देकर सबको अलभ्य लाभ दिया इसलिए तुम हे हरिवंश प्रभु, “जगत के ‘ईश हो और गुरू हो यह वाणी जो केवल रस ही भवित करती है जगत चंदनीय है, इसमें आणित जन भी आ गए।

श्री हरिवंश वाणी, एक रस, विशुद्ध नेह गई, मिलन रूपा, रास विलास, नित्य विहार का निरूपण करने वाली है, जो केवल रस ही भक्ति करती है. इसमें भिन्न-भिन्न और रसों की मिलौली नहीं है ‘अब या में मिलौनी मिलै न कछु जो खेलत यस सदा बन में इसलिए पद-पद प्रति केवल इसी वाणी को माधुर्यता और कोमलता की यथार्थ पढ़ती है, इसलिए यह वाणी प्रीतिरूप आनन्द रस पदती को प्राप्त है, और प्रेम का विस्तार करने वाली है।

‘रसिक – प्रिया-प्रीतम और परिकर, जो इस रस में मस्त है वे श्रवण करके इस वाणी द्वारा भवित रस का पान करते हैं “श्याम श्याम प्रगट-प्रगट अक्षर निकट प्रगट रस भवत अति मधुर वाणी और आगे सेवक जी महाराज कहते हैं “नाम वाली निकट श्याम श्यामा प्रगट रहत निशिदिन परम प्रीति जानी।”

और फिर स्वाद पाकर इसी वाणी को गाने लगते हैं प्रशंसा सूचक कहते हैं “हरिवंश, हरिवंश हरिवंश हित ऐसे प्रशंसा करते एक हरिवंश नाम को ही अथवा वाणी को ही जपते हैं।”


जयति वृषभानुजा कुँवरि यथे।
सच्चिदानन्द घन रसिक सिरमौर वर, सकल वाँछित सदा रहत साथे |
निगम आगम सुमति रहे बहु भाषि जहाँ , कहि नहीं सकत गुण गण अगाथे ।
जै श्री हित रूपलाल पर करहु करुणा प्रिये, देहु वृन्दाविपिन मित अबाथे ।।3।

तृषभानु कुँवरी वृष शब्द का एक अर्थ काम है सो यहाँ निकुंज रस के अन्तर्गत का अर्थ ‘प्रेम’ “हित, महापुरुषों ने किया है। प्रेम रूपी भानु यानी ‘श्रीहित मूर्तिवंत श्रीहित “कुंवरी राधे की जै हो ।

पीछे पदों में बता आये है कि यहां निकुंज रस में और रसों की मिलौनी नहीं है समाई नहीं है।

ब्रज वृन्दावन जहाँ दास्यरस, वात्सल्य रस, सख्य रस इत्यादि भिन्न-भिन्न रसों की मिलौनी है और जहाँ इन रसों में सक की लहरें है, उसे तो निगम आगम ने गाया ही है, उनकी गम्य यही तक है, परन्तु यह तो ‘श्रीहित’ का नित्य वृन्दावन है, यहां और की तो कौन कहे- हरि की भी गम्य नहीं, दुर्ज्ञेय है। यदि यहाँ व्रज की श्री वृषभानु जी की कुँवरी ऐसा अर्थ करें तो निगम आगम सुमति रहे बहु भाषि जहां, कहीं नही सकत गुण-गण अगाशे यह कहते नहीं बनता। क्योंकि निगम-आगम ने तो ब्रज वृन्दावन गाया। सेवक वाणी प्रमाण है ” निगम आगम अगोवर राधे, सहज माधुरी रूप निधि तहां श्रीजी की वाणी “अलक्ष राधास्त्र्यं निखलनिगमैरप्यतितरां इत्यादि राधासुध्धानिधि

नागरीदास जी ने सर्वप्रथम पद मे ही कहा है “गुण गम्भीर व्यासनन्दन जू के व्यासनन्दन कौ ? ‘श्रीहित ही तो हैं जो व्यास मिश्र जी के यहाँ प्रगटे “कृपा रूप जो वपु धरयों और श्री राधा कौन ? जो राह य श्रीहित ही तो हैं तहां नागरीदास को अष्टक “रसिक हरिवंश सरवंश श्रीराधिका, राधिका सरवंश, हरिवंश वंशी “पूरा अष्टक देख लेनो इति ।

इसलिये है ‘श्रीहित की मूर्तिवंत कुंवरी श्रीराधे तुम्हारी जय हो तुम सच्चिदानन्द घन स्वरूप हो और रसिकों की सिरमौर हो, जो आपके चरण कमलों की रति प्राप्त करने की वांछ करते हैं। आपके अपार गुण के गणों को वेद पुराण और बहुत भांति के ‘सुमति कहिये विद्वान और वेद आदि पर भाष्य लिखने वाले भाषी, वर्णन नहीं कर सकते।

श्रीहित रूपलाल जी महाराज कहते हैं ऐसी जो श्रीहित राधे है वह मुझ पर करुणा करके मुझे वृन्दावन में बाधा रहित बास प्रदान करें- अर्थात् मुझे अपना सहवारी स्वरूप प्रदान करके ‘नित्य वृन्दावन की कुंजो में स्थान दें।


श्री व्यानन्दन दीनबन्धु सुनि पुकार मेरी मूढ़ मन्द मति लबार भ्रमी जन्म बार-बार, कष्टातुर होरु नाथ शरण गही तरी ।
भजन-भाव बनत नाहिं मनुज देह वृथा जाय, करौ कृपा बेगि प्रभु बहुत भई देरी ।
त्रिगुण जनित सृष्टि मांझ दरसत महिं दिवा साँझ, हृदय तिमिरछाय रह्यो झुक सघन अंधेरी ।
कृपा दृष्टि वृष्टि करी राजत फूलवारी हरी, आतुर पर श्रवौ बूंद शुष्क होत जेरी|
ललित हित किशोरी नाम राखत प्रभु तुमसों काम, याम जात युगन तुल्य करौ नाथ चेरी ।।4।।

हे दीनबन्धु श्रीहरिवंश प्रभु, आप मेरी वन्दना सुनें। मैं मूद मन्द मति, लबार-बक करती रहने वाली, बार बार जन्म लेकर हर जन्म में भटकती रही हूँ। अर्थात् कहीं विश्राम नहीं मिला, और अब कष्टों से आतुर हे नाथ, आप की शरण में आई हूँ। मुझ से भजन-भाव बनता नहीं, यह मनुष्य देह वृशा ही बीत रही है । बहुत काल बीत चुका है, हे प्रभु अब आप मेरे ऊपर शीघ्र कृपा करें। इस त्रिभुणत्मक सृष्टि अर्थात् संसार में चारों ओर त्रिगुणात्मक विषयों की सघन अंधेरी सी मंडराती रहती है और मेरे हृदय में अन्धकार छाया हुआ है जिसके कारण मुझे सुबह-शाम का बोध नहीं होता यानी ओपेड़वन में पता ही नहीं पड़ता कब सुबह हो गई और कब शाम ढल गई।

आप मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि की वर्षा करें, मुझ आतुर पर कृपा की बूँदें भवित होने पर मेरी हृदय रूपी फुलवाड़ी जो सूख रही है फिर से हरी हो जाएगी। मैं हित ललित किशोरी नाम वाली, हे प्रभु केवल आप ही से संबन्ध रखती हूँ, मेरा प्रत्येक प्रहर युगों के समान व्यतीत हो रहा हे नाथ मुझे अपनी दासी बना लें।


जय जय जय राधिके पद सन्तत आराधिके, साधिके शुक, सनक, शेष नारदादि सेवी ।
वृन्दावन विपुल धाम रानी नव नृपति श्याम, अखिल लोकपालदादि ललितादिक नेवी ।
लीला करि विविध भाय बरसत रस अमित चाय, कमल प्राय गुण पराग लालन अलि खेवी।
युग वर पद कंज आस वांछत हित कृष्णदास कुल उदार स्वामिनि मम सुन्दर गुरु देवी ।।5।।

श्रीहित कृष्णदास जी महाराज अपने ही निज स्वरूप हितानन्द में डूबकर कहते हैं, ‘हे श्रीराधे- आपकी जय हो, जय हो, जय हो। वे श्री राधा कैसी है ? जिनके पद कमलों की मै निरन्तर आराधना करता हूँ, और परम भागवत शुक्र, सनक, शेष नारदादि के लिए भी सेव्य रूपा है, क्योंकि उनकी भी वहां गति नहीं है रानी नव नृपति श्याम नवल वृन्दावन नाथ की पद्महिषी, सव धामों के धाम सर्वोच्च धाम नित्य वृन्दावन में ललित आदि सखियों सहित विराजती है और वह वृन्दावन सम्पूर्ण लोकों के लोकपालों द्वारा वंदनीय है। उसी वृन्दावन में रास-विलास की लीला करती हुई, श्रीराधा विविध भावों को दरशाती हुई अनन्त चाव भरे चीजों से रस की वर्षा करती है। प्रियाजी अनन्त चोज भरे हाव-भाव दरशाने के गुणों में निपुण हैं, ऐसे हाव-भाव जब दरशाती है तब श्री मुस्ख कमल से जो मकरन्द निस्झरित होता है उसे लाल जी भंवर की वृत्ति लेकर पान करते हैं।

श्रीहित गोस्वामी कृष्णदास जी महाराज कहते हैं कि श्री राधा के युगल चरण कमलों में मेरी लालसा सदा लगी रहे, भीहित कुल की गुरु-देवी मेरी उदार स्वामिनान से मेरी यही आकांक्षा है।


राधिका सम नागरी प्रवीन को नबीन सखी, रूप गुण सुहाग भाग आगरी न नारी ।
वरून लोक, नाग भूमि, देवलोक की कुमारि, प्यारी जू के रोम ऊपर डारौ सब वारि ।
आनन्दकंद नन्दनन्दन जाके रस रंग रच्यौ, अंग भरि सुधंग नच्यौ मानत हँसि हारि ।
जाके बल गर्व भरे रसिक व्यास से न डरे, कर्म-धर्म-लोक- वेद छौंडि मुक्ति चारि ॥6॥

निकुंज बिलासिनी श्रीराधा के समान हे सखी, कोई भी अन्य नारी नहीं है, क्योंकि यह नागरी है-तहां श्रीजी की वाणी ‘नागरता की रासि किशोरी और ऐसी नागरी है कि चतुरों के समूह के मुकुटमणि सांवरों जो प्रीतम, उनको वितै के, नेक मुख की मोरन मात्र में निवेश कर देती है। और फिर प्रवीन है-गान में कठिन ताल सुर विकटताने सहज में लेती है, नृत्य की विविध गतियों को लेने में, लालजी भी इनसे हारे है। नवीन है-इनका नेह, रंग रस सदा नवीन ही बना रहता है। रूप की सहज माधुरी लाल जी के मन को हरण कर लेती है, तहां श्रीजी की वाणी “रोमालीमिहिरात्मजा सुललिते बन्धूकबन्धु प्रभा” राधासुधानिधि | कोक कलान इत्यादि के विशेष गुणों में निपुन है। इसलिए, हे सखी जो यह श्री हित राधे हैं, इनके भाग की क्या कहिये जिनका सुहाग, सकल लोक चूडामणि रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर भी सदा इनको जपते हैं इन ही का भजन करते रहते हैं। तहां श्रीजी की वाणी “ज्योतिश्यांनपरः सदा जपति या प्रेमापूर्णो हरि” राधासुध निधि |

श्रीजी के इन गुणों का अनन्त विस्तार है। तहां श्रीजी की वाणी ‘वृषभानुनन्दिनी मधुर कला पद संख्या ८१ इत्यादि ऐसे बहुत कही है। वाणी जी में रत्ति भर सोना दिखा के सुमेरु का ध्यान करने के से संकेत है। प्रियाजी की रूप माधुरी, गुणों का वर्णन करने में आज तक कोई पार नहीं पा सका और न ही कभी कोई पा सकेगा जितनों कहो, सो थोड़ा सारांश में इतनो समझ लेनो- अनिर्वचनीय है।

वरून लोक, नागलोक, भूलोक, देलोक की कुमारियों के रूप गुण इत्यादि प्यारी जू के एक रोम पर न्यौजवर है। तहां श्रीजी की वाणी देक्लोक, भूलोक, रसातल सुनि कवि कुल मति डरियो, सहज माथ चुरी अंग अंग की कहि कासों पटतरिये ” देलोक के कवि शुक्रचार्य जी, श्लोक के व्यास जी, रसातल के शेषनाम जी, इन सब कवियों को अपने-अपने लोकों की कुमारियों के रूप गुण का ज्ञान है, परन्तु इनकी भी मति भयभीत है कि इनकी बराबरी किससे करें। इसलिये इनकी उपमा यह स्वयं ही है, इनकी उपमा नहीं

आनंद कंद आनन्द के मूल, नंद-नन्दन, आनन्द को भी आनन्दित करने वाले, इनके रस रंग में डूबे है। महा हर्ष में अंग में भर कर सुगंध नृत्य करते हैं, परन्तु जब प्रियाजी नृत्य की गतिविधियों लेती है- तो हँसते-हँसते अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं। इस हार के ऐसे प्यार भरे दोज है कि कहते नहीं बनता, व्यास जी को पढ़ “पिय को नाचन सिखावत प्यारी ” मान-भुमान लकुट लीए ठाढ़ी डस्पत कुंजबिहारी व्यास स्वामिनी की ठवि निरखत, हँसि-हँसि दे दे करतारी सुहृदयों के हृदयगम्य है।

श्री ‘व्यास जी महाराज कहते हैं, ऐसी स्वामिनी का कृपा रूपी बल प्राप्त करने का मुझे गर्व है और इसी बल के प्रताप से कर्म, धर्म, लोक, वेद यह चारों प्रकार की मुक्तियों को त्यागते मुझे डर नहीं लगा।

नित्य वृन्दावन निकुंज विलासिनी, श्रीहित राधा की कृपा प्राप्त कर व्यास जी मुक्तियों को त्याग दें तो कोई आश्चर्य बात नहीं है। निकुंज की बात तो दूर रही यहाँ तो भूतल पर प्रकट वृन्दावन में सोहनी लगाने वाली की ऐसी स्थिति है कि विहारिनिदास जी बोल उठे “वृन्दावन की हरी चली मुक्ति दुवराड, बिहारिनिदास अवरज कहा. श्यामा महल कमाए। औरों की क्या कहिये ? राधे-राधे !! इति ।


प्यारी जे के चरणारविनद शीतल सुखदाई।
कोटि चन्द मन्द करत नख-विधु जुन्हाई ॥
ताप-शाप-रोग-दोष दारुण दुख हारी लाल इष्ट दुष्ट दवन कुंज भजन चारी ।
श्याम हृदय भूषण जित दूषण हित संगी।
वृन्दावन धूर धूसर यस रसिक रंगी।
शरणागत अभय विरद पतित पावन बानै ।
व्यास से अति अधम आतुर को-को न समानै ।।7।।

श्रीहित राधा प्यारी के चरणकमल शीतल और सुख देने वाले हैं। कैसे है यह चरणारविन्द और इनकी शतलता ? ऐसे अद्भुत चरण है कि जब रसिक शिरोमणि श्रीश्यामसुन्दर इनको अपने अपने वक्षस्थल पर रते है तो इन चरणों की शीतलता प्रेम-काम के ताप को शान्त कर देती है। तहाँ श्रीजी की वाणी –

“वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दम् प्रेमामृतकमकरन्दरसौघपूर्णम् ।
हृदयर्पितं मधुपतेः स्मरताप मुझे निर्वापयत्परमशीतलमाभयामि ||

अतः लालजी को सुख देने वाले हैं। इन चरणारविन्द की शोभा कैसी है ? नखचन्द्र से छिटकने वाली छटा कोटि-कोटि चन्द्रमा की चाँदनी को मन्द करती है, ऐसी है।

ताप, शाप, रोग-दोष दारुन दुखहारी- (भुमिका) इनकी कोक-कलान को देखकर कोटि-कोटि कामदेव लज्जित हो जायें है। क्योंकि वह देखें कि क्रियायें तो सब हमारी है, परन्तु हम इनमें है नहीं। रतिपति ने विचार कियौ- ठीक है, लज्जित तो हम है ही शाप देते हैं- ‘काम-रोग से ग्रसित रहोगे। लालजी से कहा, “तुम्हारी बड़ी कृपा है नहीं तो मिलन में स्वाद कहाँ से आता, परन्तु यह तो बताओ इस रोग का उपचार क्या? “

उत्तर मिला

“रोग हरन निज चरन सरोरुह नैननि धरि कर पंकज चारु ।”

प्रियाजी के चरणारविन्द का आश्रय लेना रोग नास हो जायेगा। लालजी ने सोची इससे तो नित्य हर समय काम पड़ता है। “काम सौ स्याम ही काम पस्यो इस काम के बिना तो विलसन का सारा मजा ही किरकिरा हो जायेगा, ‘शाप स्वीकार कर लिया, चुप्पी साध ली।

प्रियाजी मानवती हुई और तो और लालजी पर दोष मड़ने लभी सखी ने प्रम भरी डाँट लगाई

साँची झूठ बात सुनत तू, करत नहीं निरजोष ।
कवन भवन तें सुन्दर देख्यौ, जाहि लगावत दोषा

श्यामसुन्दर को कौन से भवन में देख लिया जो ‘दोष’ लगा रही हो। लालजी को विरह व्याप गया। दारुन दुःख लालजी को हो गया। क्या करें ?

तेरे विरह भय दारुन दुःख, के ले जाल बखान्यौ ।
तेरे चरन सरन हो सुन्दरी, ‘व्यास’ सखी गढी आन्यौ ।

हो गया उपचार | इति (भूमिका)

कहने का अर्थ है कि प्रेम के चोज, रसास्वादन के हेतु की गई प्रिया-प्रीतम की निज नई हितमई केली का कोई चारापार नहीं है, उसको समझना, अथाह अगाध समुद्र की तह से मोती चुनने के समान है। शब्दकोष में शबद नहीं है जो प्रिया- प्रियतम की केली का यथार्थ वर्णन कर सकें। जो कुछ इन टूटेफुटे शब्दों का सहारा लेकर कहा जाता है वह संकेत मात्र है, उस भाव स्थिति को उर में जाने का, जिसे रसिकजन हित की विलसन कहते हैं।

प्रियाजी की मन्द-मन्द मुस्कान, कटाक्ष भरी चितवन से लेकर ‘अबोलनों तक केवल प्रेम ही का स्वाद लेने को है, ‘काम’ जब-जब, जो जो गजब लालजी पर ढाता है, यह शब्द “ताप, शाप, रोग, दोष, दुष्ट दवा इत्यादि उसी गजब की पराकाष्ठा को सूचित करने का तुच्छ प्रयास करते हैं।

‘कौन-कौन दुख बरनौ प्रिय को, जो दुख करनी कस्यौ । ‘व्यास’ स्वामिनी करुणा करि, हरि को सब ताप हस्यौ ।। “

लोकवत् शब्दार्थ की यहाँ समाई नहीं जहाँ कुंज भवन है, प्रियाजी के चरणारविनंद की बात चली है, वहाँ निकुंज रस है, और सब अर्थ उस रस के अन्तर्गत ही होगा और यदि नहीं तो ऊपर कहे गये शब्दों का अर्थ लोक दृष्टि से तो स्पष्ट है ही, व्याख्या की आवश्यकता नहीं ।

कुंज भवन में विचरण करने वाले यह चरण “गोविन्द जीवन धनम्” तालजी के इष्ट है। इनके हृदय के भूषण है. श्रीहित के सभी है। वहाँ श्रीजी की वाणी “पद अम्बुज जावक जुत भूषण प्रियतम उर अवनी । यह श्रीवरण, रास में रंगे, वृन्दावन की घर में ‘धूसरित हो रहे हैं कैसी है यह वृन्दावन की ‘पूर ? तहाँ श्रीजी की वाणी “घुसरित हो रहे विविध निर्मित घर, नव कपूर पराग न थोरी महापुरुषों ने ठौर-ठौर कहा है ‘क्युखत् है बल्कि ‘नव कपूखद् है। यदि शब्दार्थ की सांकल में बधा रहना है, जो कहिये इस घरको जिसमें प्यारी जू के चरणारविन्द ‘धूसरित हो रहे हैं, कैसी मानेंगे ? नेक संभालियेगा अपने भाव को, शब्द कोष में छूर रेत को, मिट्टी को कहते हैं ‘कपूखत् रेत के लिए कोई शब्द नहीं है।

व्यास जी महाराज कहते हैं कैसी ही पतित क्यों न हो, उसके लिए इन चरणारविन्द की शारण पावन बाना है, जो अभय का दान देने वाले हैं। व्यास जी कहते हैं इन चरणों की शरण ग्रहण करके मेरे जैसे अ म आतुर को को अर्थत्, कौन-कौन, ‘न समाने यानि नहीं तर भए अर्थात् सब तर गए ।

नोट- पद की व्याख्या प्रचलित पाट के आधार पर की गई है। पाठान्तर भेद बहुत है वासुदेव गोस्वमी जी द्वारा रचित, प्रभुदयाल जी मित्तल द्वारा “भक्त कवि व्यास जी के नाम से प्रकाशित व्यास वाणी में यह पद इस प्रकार है

श्रीराधा प्यारी के चरणारविन्द शीतल सुखदाई । कोटि चन्द मन्द करत नख विद्यु जुम्हाई ||
ताप साप रोग सोग दारुण दुख हारी। कालकूट-दुष्ट-दवन, कुंज भवन चारी ॥
स्थाम हृदय भूषण जुत, द्वेषन जित संगी।
श्रीवृन्दावन धूलि धूसर, यस रसिक रंगी ||
सरनामत अभय विरद पतित पावन बाने ।
व्यास से अति अथम आतुर को, कौन समानौ।।


व्यासनन्दन, व्यासनन्दन, व्यासनन्दन गाईये
जिनको हित नाम लेत दम्पति रति पाईये ||
रास मध्य ललितादिक प्रार्थना जु कीनी
कर तें सुकुंवारि प्यारी वंशी तब दीनी ।।
सोई कलि प्रगट रूप वंशी वपु धारयौ
कुंज भवन रास रवन त्रिभुवन विस्तारयौ |
गोकुल रावल सु ठॉम निकट बाद राजै ।
विदित प्रेम राशि जनम रसिकन हित काजै ॥
तिनकों पिय नाम सहित मंत्र दियौ (श्री) राधे ।
सत चित आनन्द रूप निगम अगम साधे ||
(श्री) वृन्दावन धाम तरणिजा सुतीर वासी
श्रीराधा पति रति अनन्य करत नित खवासी ॥
अद्भुत हरि युक्त वंश भनत नाम श्यामा ।
जै श्री रूपलाल हित चित दै पायौ विश्रामा ॥ 8॥

श्रीहितहरिवंश के नाम अथवा वाणी का नाम यानि सुमिरन सदा करना चाहिये। कैसे ? जाम घटी बिसरे नहीं” ऐसे इन श्रीहिस्वंश का नाम जपने से दम्पति प्रिया-प्रियतम में रति होती है। सेवक जी कहते है। “हरिवंश सु नाम सदा तिनके, सुख-सम्पति, दम्पति जु जिनकै ।

श्रीहरिवंशचन्द्र, सम्पूर्ण प्रभु के प्राकट्य की भूमिका खोजते हैं। यस के मध्य में किसी समय | ललितादिक सस्तियों ने प्रार्थना करी हे प्यारी जू अब आगे तो कलयुग में ऐसा समय आने वाला है जब | वेद-विधि को जानने वाले बहुत ही कम रह जाएँगे, भक्ति के मर्म को समझने वाले नहीं होंगे, आप कृपा कीजिए जिससे जीवों को प्रेम लक्षणा भक्ति मिले तब प्रियाजी ने अपने हाथों से वंशी लेकर सखियों को प्रदान कर दी रस की मूल तो वंशी ही है “बाजत रस मूल मुर्तिका आनन्दिनी वही ‘वंशी कलियुग में श्रीहरिवंश आचार्य रूप में व्यास मिश्रजी के यहां अवतारित हुए अथवा वही कलि रूपी वंशी हरिवंश आचार्य रूप में तय मिश्रजी के यहाँ मुकलित हुई। और कुंज भवन के रास रंग को त्रिभुवन में विस्तार कियौ । गोकुल और रावल गातों के निकट “बाद ग्राम है। (बड़ों के मुख से सुना है कि बाद का प्राचीन नाम याच ग्राम था और जब हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य हुआ तो घर-घर पंच शब्द सुनाई देने लगे- “घर-घर पंच शब्द बाजिये सेवक वाणी 11)

यह तो विदित ही है कि प्रेमराशी, श्रीहित हरिवंश, सम्पूर्ण प्रभु का जन्म (अवतार) रसिकों के हित के लिए ही हुआ था। श्रीहित हरिवंश प्रभु को स्वयं श्रीराधा ने अपने प्रियतम के नाम से संयुक्त मन्त्र प्रदान किया। इससे यह समझना चाहिए कि महाप्रभु श्रीहित हरिवंश जी द्वारा स्थापित श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय है जिसकी प्रवर्तक आचार्य मनत्रदाता गुरु स्वयं श्रीराधा है। तहाँ हरिलाल व्यासजी का कथन:

यथैवेष्टं सम्प्रदायकै कर्ताऽऽचार्यो यथा मंत्रदः सद्गुरुश्च ।
मंत्री राधा यस्य सर्वात्मजैव वंदे राधा-पाद-पद्म प्रधानम् ||

पर भीहित राधा कैसी है! सतूचित आनन्द रूप है और वेदों द्वारा आलक्षित हैं। श्रीहितहस्विंश महाप्रभु जी ने यमुना के तीर श्रीधाम वृन्दावन में निवास कियौ श्रीहित राधा और उनके पति श्रीहित लालजी, जो दोऊ मन मिलि एक भए. राधावल्लभलाल, में अनन्य प्रेम रखकर उनकी सेवा में नियुक्त रहते थे।

“हर में वंश जुड़कर यह अद्भुत नाम सम्पूर्ण प्रभु हरिवंश बना है, तहाँ सेवक वाणी -नाम अरद्ध हरै अघ पुंज, जगत्र करे हरि नाम बड़ाई सो हरि वंश समेत सम्पूर्ण प्रेमी अनन्यानि को सुखदाई।” इस सम्पूर्ण नाम का प्रियाजी प्रेम से उच्चारण करती है। “प्रज्ञा हरिवंश प्रतीति प्रमानत प्रीतम श्री हरिवंश प्रियम् । माथा (श्री) हरिवंश गीत गुन गोचर, मुफ्ति मुनत हस्विंश मियं ॥” श्रीरूपलाल जी महाराज कहते हैं कि इन श्रीहित हरिवंश प्रभु के चरणों में वित्त लगाने से मुझको विश्राम मिला है।



प्रथमहिं भावुक भाव विचारै |
बनी तनु-मन नवकिशोर सहचरि वपु हितत गुरु कृपा निहारै ||
भूषन वसन प्रसाद स्वामिनी पुलकि-पुलकि अंग धारै।
भूषन वसन प्रसाद स्वामिनी पुलकि-पुलकि अंग धारै ।
जे श्री रूपलाल हित ललित त्रिभंगी रंग रस विस्तारै ||9||

सर्वप्रथम भजन के आरम्भ में, भजनी को भाव से, अपने सखी स्वरूप का विचार करना चाहिये । श्रीहित गुरु की कृपा का मनन करते हुए तन मन से नवकिशोर सहवरी रूप अपने आपको देखना चाहिये, अपने स्वामिनी द्वारा दिये गए भूषणों और वस्त्रों को रोमांचित होकर धारण करना चाहिये (मानसी में)।

तहाँ श्रीजी की वाणी (श्रीराधासुधानिधि)

“दूकूलं विभ्राणामथ कुचतरे कंधुकपट प्रसादम् स्वामिन्याः स्वकरतलदत्तं प्रणयतः स्थितां नित्यं पायें विविध परिचयैक चतु किशोरीमात्मानम् किमिठ सुकुमारी मुकलये 1॥”

महात्मा भीरतनदासी इस स्तोत्र की टीका कहते है:-(भाषा रूपान्तर) “अब इस श्लोक के भाव में भीहित प्रभुजी, अपना जो सुन्दर सखी स्वरूप, यद्यपि महल में नित्य श्रीहित अली और वंशी रूप है, तहाँ दोहा :
हित स्वरूप विवि हिय में वंशी विवि फरमाहि ।
सखी स्वरूप सखीन में, यो हित निकट रहांहि ॥

फिर भी स्वामिनी जू की दासी भाव की उत्कंठा करते हैं। मेरी श्रीस्वामिनी जु मेरे पर अति कृपा करके अपनी प्रसादी सारी (साड़ी) और कंचुकी अपने कर कमल से जो दी उसको पहर कर “स्थितां नित्य पार्श्वे” नित पास बैठी रहूँ अथवा खड़ी रहूं। वहां क्या करूं? “विविध परिचयैक चतुरा” नाना प्रकार की समयानुर सेवा में चतुर जैसी “किशोरीमात्मानं” किशोरी अवस्था बुवाई परै ” किमहि सुकुमारी नु कलये जैसी सुकुमार सखी स्वरूप अपने में कब देखूं। इति ।

श्रीरूपलाल जी महाराज हिते हैं कि इस सहवरी भाव में स्थित होने से श्रीश्यामा श्याम की कृपा से रंग-रस हृदय में प्रकाशित होने लगता है।


सखी, लखी कुंजधाम अभिराम ।
मनिनु प्रकाश हुलास युगल वर, राजत श्यामा श्याम || हास विलास मोद मद होत न पूरण काम ।
जै श्रीरूपलाल हित अली दंपति रस सेवत आठौ याम ||10||

हे सखी, देख तो सही जो प्रिया प्रियतम का निज धाम उसमें जो कुंज है, कितनी सुन्दर है।
“स्याम सुभग तन विपिन घन थाम विचित्र बनाई सेवकवाणी ||

मनियों के प्रकाश में श्रीश्यामा-श्याम उल्लासपूर्वक सुशोभित है, हास विलास, विनोद मोद विहार में होता रहता है, विहार में चाव बढ़त ही रहता है, कभी घटता नहीं, इसलिए कभी भ्क्षी पूरण काम, तृप्त नहीं होते ।

कामकेलि सतु पाइ दाइ-छल प्रिय ही रिझावत ।
थाइ धरत उर अंक भाइ मन कोक लजावत ॥
चाय चवम्गुन चतुर राइ रसरति संग्रामहि ।
छाड़ सुजस जम प्रकट गाड़ मुन जीवत श्यामहि ।

-सेवक वाणी

श्रीरूपलाल जी महाराज अपने ही हित स्वरूप को नमस्कार करके कहते हैं कि सखी युगल सरकार के लीला रस का सेवन आठों प्रहर करती है –

चोर चित्त ललितादि कोर स्न्यनि निजु निरखतिं ।
थोर प्रीति अन्तर न भोर दंपति छवि परखतिं ॥

-सेवक वाणी

तहाँ श्रीजी की वाणी:
अनुपम सुख भर भरित क्विस असु आनन्द-वारि कण्ठ दम रोकत ।


लाड़िली लालहि भावत है सखि, आनन्दमय हिम की ऋतु आई।
ऐसे रहे लपटाय दोऊ जन चाहत अंग में अंग समाई || हार उतार धरे सब भूषन स्वादी महारज की निधि पाई।
महासुख को ध्रुव सार विहार है, श्रीहरिवंशजू केलि लड़ाई ||11||

हे सखी, प्रिया- प्रियतम के मन भावती आनन्द प्रदान करने वाली सदी की ऋतु आई है। ऐसे गाढ़ आलिंगन में दोनों आबद्ध है, फिर भी यह इच्छ बनी हुई है कि एक दूसरे के अंगों में समा जायें। विहार के सूख का अतिशय करके भोग करने के हेतु दोनों ने अपनी माला एवं भूषण इत्यादि उतार दिये हैं, रसरूपी “निधि का स्वाद पाकर दोनों मत्त है। ध्रुवदासजी महाराज कहते हैं- परम सुस्त जो कोई वस्तु है, उसका सार केवल ‘हित’ का यह विचार है, जिसे श्रीहस्विंश महाप्रभु जी ने अपनी वाणी में गायौ है।


प्रात समै नव कुंज द्वार है ललिताजू ललित बजाई बीना पौढ़े सुनत श्याम श्रीश्यामा, दम्पति चतुर
प्रवीन प्रवीना ॥
अति अनुराग सुहास परस्पर कोक कला गुण निपुण नवीना |
श्रीबिहारिदास बलि बलि पंदसि यह मुदित प्राण न्यौछावर कीना ||12||

वृन्दावन की नवीन कुंज में जहाँ प्रिया प्रियतम ने सिज्जा पर सारी रात व्यतीत करी, तहाँ भोर होने पर, कुंज द्वार पर ललिता जी ने बहुत ही सरस, वीणा पर अलाप छेड़ी अलसाये दोनों सिज्जा पर सोये सोये ही मधुराको रहे हैं। ललिताजी वाणी तो बजाई कि अब उठिये सखियाँ दर्शन को खड़ी हैं, परन्तु वीणा के मधुर सुरों को सुनकर इनकी तो चाह और बढ़ी, दोनों कोक कलाओं में प्रवीन, चतुराई से पौढ़े ही है। एक दूसरे से परस्पर सुहाग है, अति अनुराग है, और कोक-कला के नतीन गुणों से दोनों निपुण है।

श्रीविहारिनदास जी यह इस छवि का अनुभव करते हुए अति प्रसन्न होकर वन्दना को हुए

बलिहार- बलिहार करते प्राण न्यौछावर करते हैं।


जगाय री भई बेर बड़ी ।
अलबेली खेली पिय के संग अलकलड़े के लाड़ लड़ी ।।
तरलि किरन रन्धन है आई, लगी निवाई जानि सुकर वर तहाँ हहौ ही है रही अड़ी।
श्रीविहारिनिदासि रति को कवि वरनै जो छवि मो मन मांझ गड़ी ||13||

सखी के बोल-सखी के प्रति बहुत देर हो गई है, अरी (प्रेम का सम्बोधन है), अब तो जगा सारी रात, अपने अलक लड़े प्रीतम के संग लाडिली जी ने विहार कियौ है (अभी भी पूर्ण ज भए क्या ?) देखो सूर्य की किरणें कुंज लताओं के झरोखों में से छिटक रही है, यह जानकर कि किरणें प्रिया-प्रियतम पर पड़ेगी तो उन्हें गरमी लगने लगेगी, मैं ही लताओं के छिद्रों पर अड़ी खड़ी रही।

श्रीविहारिनि दास जी कहते हैं कि प्रेम की सुरतांत छति का यह दृश्य जो मेरे मन में गड़ा है, इसे कौन कवि वर्णन कर सकता है ? अर्थात् अनिर्वचनीय है।


जागो मोहन प्यारी राधा ।
ठाड़ी सखी दरस के कारण, दीजै कुंवरि जु होइ न बाधा |
हँसत-हँसत दोऊ उठे हैं युगल वर मरगजे बामे फबि रहे दुहुँ तन ।
चारत तन मन लेत बलैयाँ देखि देखि फूलत मन है ही मन ||
रंग भरे आनंद जम्हावत अंस अंस धरि बाहु रहे कसि।
जय श्री कमलनैन हित या छवि ऊपर वारों कोटिक भानु मधुर शशि ||14||

सखियाँ कहती है प्यारेलाल जी, प्रियाजी, अब जानिये आपके दर्शन को सखियों द्वार पर खड़ी है, प्यारी जू यदि आपको किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं पड़ती हो तो, इन्हें (सुस्तांत) छवि का दर्शन देकर कृतार्थ करें बाधा का शब्द सुनते ही दोनों हंस दिये बड़ी चतुर है यह सखियाँ, हमारे रात्रि के विहार का सारा हाल, हमारी छवि का दर्शन देखकर ही जान लेंगी, हम दुरायो चाहें पर सम्भलने का समय ही नहीं दे रही है- द्वार पर खड़ी उतावली हो रही हैं, ऊपर से व्यंग और कस रही है- यदि बाधा नहीं पड़ती हो तो !! दर्शन दीजिये। क्या करते ? उठ बैठे-सस्चियों के मनोरथ पूर्ण करने को दोनों के श्री अंग में सुशोभित हैं। (सुरतांत छवि की शोभा तो मरगजी बागों से ही है जो समस्त विहार के सार को सूचित कर दें।) रतनदास जी लिखते हैं: “सुरतांत के समय अष्टयाम का जो विलास है, इसके सब सुखों का निचोर है। इस समय प्रिया- प्रियतम जू का हृदय और समस्त अंग सर्व सुख करके पूरन महा आनन्दित रसमय होता है ऐसे अद्भुत दर्शन पाकर सखियाँ तन-मन से बलिहार है, मन ही मन फूली नहीं समात है। प्रेम-रंग में सने, आनन्द में प्रिया-प्रीतम जमाई लेते हैं, दोनों के बाहु एक दूसरे में कसे हैं, जैसे कह रहे हों-सखियों हम तो तो रात भर गहरी नींद सो रहे थे-तुम तो यो ही हर बात का बतंगड़ बनाप देती हो। श्रीकमतलजैन जी महाराज अपने श्रीहित वरूप को नमस्कार करते हुए कहते हैं इस अद्भुत छवि पर कोटि-कोटि भानु की उज्ज्वलता और कोटि-कोटि चन्द्रमा की मधुर शीतलता न्यौछवर है “चंदन मयंक जगमगत अतिसे रवि-ससि ही को तेज छियावे ।”


अवहि निसि बीती नाहिंन वाम।
तुम मुख इन्दु किरण छवि व्यापी, कहत प्रिया सों श्याम।।
अंग-अंग अरसान वाम छबि मानि लेढु अभिराम
रहसि माधुरी रूप हित चित्त में होत न पूरन काम ||15||

यह सम्पूर्ण पद अभिवचनीय हितानन्द की लहरों से ऐसा गर्शित है कि इसपद की उपमा को कोई और पद ही दिखाई नही देता । और यदि किसी महात्मा में इस भाव को इतनी ही सुन्दरता से व्यक्त कियौ है तो उन्हें मेरी दण्डवत् स्वीकार हो । भीरूपलाल जी महाराज की कृपा मनाऊँ, जो मुझे बुद्धि प्रकाश दें तो पद के भाव को तनिक खोल सहूँ। जै जै श्रीहरिवंश

वह चैन’ जब थोड़ा-सा अपने स्थान से सरका, तो विपरीत रति के वैम ने प्रियाजी को तनिक झकझोरा-डड़ बैठी। लालजी ने देखा पहले से ही अमित है अब फिर विहार में रत हायेंगी तो और भमित हो जायेंगी, लगे बतराने-प्यारी प्रिया, अभी से क्यों उठ बैठी है- अभी तो रात्रि बीती नहीं है, यह जो ऊपाकालीन प्रकाश आप देख रही है यह तो आपके चन्द्रमुखी मुखारविन्द की कान्ति की किरणें है जिनसे सारा कुंज मन्द-मन्द प्रकाशित हो रहा है और आपके अंग-अंग की अरसान से जो छवि की तरंने उठ रही है, देखिये ना वह कितनी सुन्दर है। प्रियाजी तो भोरी है ही आगे क्या हुआ ? यह तो रहसि माधुरी “एकान्त में माध् पुरी की तरंगे है जो वित्त में उठती रहती है तो प्रिया प्रीतम कभी तृप्त नही होते श्रीरूपलाल जी महाराज कहते है। इति। जै श्रीराधे ।


आजु देख ब्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि
अंस-अंस बाहु दै किशोर जोर रूप राशि,
मनौ तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि पिकनि अपने सुर सो मेलि
मदन मुदित अंग-अंग बीच-बीच सुरत रंग, पल-पल हरिवंश पिवत जैन चषक झेलि ॥16॥

यह श्रीहित चतुरासी जी का पद है। अनेक टीकारों हो चुकी है। प्रेमदासजी महाराज, श्रीलोकनाथ जी महाराज, महात्मा श्रीस्तनदास जी, सुखलाल जी महाराज इत्यादि की प्राचीन टीकाएँ बड़ी भावपूर्ण है। इसके अतिरिक्त आधुनिक टीकाएँ भी है।

प्राचीन टीकाओं से ऊपर उठकर कुछ कहने की मेरी क्षमता नहीं है। इसलिए इस पद का अर्थ प्राचीन टीकाओं के आधार पर ही कर रहा हूँ।

आजु देखी व्रज सुन्दरी मोहन बनी केली: प्रिया- प्रियतम नित नवीन बने रहे हैं और इनके विहार का आदि-अन्त नहीं। इसलिए यहाँ एकरस सदा ‘आज’ भी है। ब्रज-यानि समूह सो सखियों के समूह में जो महासुन्दर प्रियाजी है उनकी और मोहनलाल की केलि बनी है बनी है, यानि जैसी होनी चाहिये वेसी ही, जिसने तुम दोनों को मोहित कर रखा है।

अंस अंबा दें किशोर जोर रूप राशी, मनी तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि:

दोनों के बाहु परस्पर एक दूसरे के भौर – श्याम अंसों पर विराजे है और तुम दोनों किशोर हो , केलि की चाह सदा बनी रहती है । तुम दोनों रूप की राशि हो सो मानों सरस रूप रसमय कनक की बेलि लपट रही है । प्रिया प्रियतम के महा कोमल अंग हैं , जो विहार के समय बेलि और वृक्ष की तरह लपटे रहते हैं ।

नव निकुंज भ्रमर गुंज मंजु घोष प्रेम पुंज , गान करत मोर विकानि अपने सुर सो मेलि :

इन दोनों की जो लपटान है सोई नव निकुंज है । इस नव निकुंज में इन दोनों के अमर रूपी मन मधुर गंजार करते हैं सो प्रेम कौ पुंज है । विलास ही में रास की रचना हो रही है , मनोहर मोर जो श्रीमोहन और कलित कोकिला जो कंतरी जू की परस्पर की रस भरी गोलन है वही गान है जिसे सुर से मिलाकर कर रहे हैं । यह दोनों एक दूसरे को पोषने में तदाकार है , प्रेम के मिले सुर से गा रहे है ।

मदन मुछित अंग – अंग बीच बीच सुरत रंग पल पल श्रीहरिवंश पीवत नैने चाषक झेलि :

तुम्हारे अंग – अंग प्रेममय मदन के आनन्द से भरे है और बीच – बीच में प्रेम के वोज , चुम्बन परिरंभन आदि हो रहे है । श्रीहित सखी जी कहती है तुम्हारा यह प्रेममयी रसासब मैं पल – पल जैन रूपी पात्रों से पान करके जीती है इति ।।


आजु सखी, अद्भुत भाँति निहारि।
प्रेम सुदृढ़ की ग्रंथि जु परि गई, गौर स्याम भुज चारि॥
अबहीं प्रातः पलक लागी है मुख पर श्रमकन वारि।
नागरीदास निकट रस पीवहु अपने वचन विचारि॥17॥

हित नागरीदासजी अपने सखी स्वरूप में स्थित निकटवर्ती सखी से कहते है ।

‘ हे सखी , प्रिया प्रियतम विहार से अमित , अलसाय कर , अभी – अभी नेक सोए है । तुम जगा मत देना ) ।


अबही नेंकु सोए है अलसाय ।
काम केलि अनुराग रंग भरे जागे रैन विहाय ।।
बार – बार सपनेहूँ सूचत रंग के भाय ।
यह सुख निरखि सखीजन प्रमुदित नागरीदास बलि जाय।।18 ।।


परस्पर अनुराग के रंग में भरे प्रेम विहार करते सारी रात बीत गई प्रेम के भर में स्वप्न में भी बार – बार उसी प्रेम के भावों को प्रकट कर रह है

सिज्जा महल में सुख को देखकर सखियाँ आनन्दित हो रही है , नागरीदास जी स्वयं संबोधन करके कहते हैं , ‘ बलिहार जाऊँ । इति ।


सिटपिटात किरनन के लागे ।
उठि न सकत लोचन चकचौधत , ऐचि ऐचि ओढ़त बसन जागे ।
हिय सौ हिय मुख सौ मुख मिलवत रस लम्पट सुरत रस पागे ।
नागरीदास निरखि नैनन सुख मति कोऊ बोलौ जिन आगे ।।19 ।।

सिज्जा महल में , ऊषाकालीन , कुंज के सन्ध्रों में से सुनहरी किरणें सुबह होने का संदेश देती छिटको लगी प्रिया प्रियतम पर पड़ी तो नेक बेवैन से होने लगे । कोमल नेत्र अचानक किरणों का स्पर्श पाकर टि या गए । आनसवलित , जैसे तैजे नेक जागे , और अपने अपने वसन धीरे धीरे खींचातानी करते ओळने लगे , ” देखि संभार पीतपट ऊपर कहाँ चुनरी राती । ” इसी खींचातानी में प्रेम का भर हो आया हिय से हिय , मुख से मुख मिल गए . अधयमृत का आदान – प्रदान होने लगा । दोनों रस – लम्पट सुरत रस में पगे हैं ।

हित नागरीदास जी कहते हैं , हे सखियो अपने नैनों के पुट से इसको झेलो , चुप रहो , और सामने मत जाना , क्योंकि तुम्हे आया देखकर संकुचा जाएंगे तो विहार का सुख जाता रहेगा । तहाँ ध्रुवदास जी का मार्मिक दोहा – “

नाइक तहां न नाइका , रस करवावत केलि । सखी उभै संगम सरस , पियत नैन पुट झेलि ॥


भोर भये सहचरि अब आई ।
यह सुख देखत करत बधाई ।।
कोऊ बीना सारंगी बजावै ।
कोऊ इक राग विभासहिं गावै ।।
एक चरण हित सों सहरावै ।
एक बचन परिहास सुनावें ।
उठि बैठे दोऊलाल रंगीले ।
विधुरी अलक सबै अंग ढीले ।
घूमत अरुण नैन अनियारे ।
भूषण बसन न जात संभारे ।।
हार बार मिलि के उरुझानि । निशि के चिन्ह निरखि मुसिकाने ।।
निरखि निरखि निसि के चिह्न रोमांचित है जाहिं ।
मानौ अंकुर मैन के फिर उपजे तन माहिं।।
20 ।।

प्रातः हुई और सखियाँ सुरतांत छवि का दर्शन करने सेवा में आ पहुँची । दर्शन का सुख पाकर और एक दूसरे को बधाई देती है ।

कोई वीणा तो कोई सारंगी बजा रही है तो कोई राग विभास ही गा रही है । आनुसंगिक अर्थ है कि गाना बजाना एक ही राग में सुर से सुर मिलकर हो रहा है । एक चरण पलोटत है तो हास परिहास कर रही है । सखियों के मनोरथ पूर्ण करने हेतु दोनों उठ बैठे है । प्रियाजी की अलकें बिथुरी है और सभी अंग अंग में अरसान छाई है । प्रेम के भर में मैन अरुण है और गोलाक धूम रहें है । ” अरुण जैन धूमत आलस जुत कुसुम गलित लट पाँती । “

भूषण तसन सब अस्त व्यस्त हो रहे है । प्रियाजी का अंजन लाल जी पर और लालजी की पीक प्यारी के कपोलों पर लगी है । कपोलों की शोभा ऐसी बढ़ी मानों पीक कपोल कमल पर झोरी । ” ऐसी सुन्दर छवि भला कैसे वर्णन की जा सकती है । विहार के समय दोनों के हार और बाल जो परस्पर उलझ गए थे सुरझा रहे है । जैसे – जैसे सुरझाते हैं , और उलझते जाते है । ‘ नख सिखलों दोऊ उरझि रहे , नेकहूँ सुरझत नाहि । ज्यों – ज्यौ रूचि बाढ़ अधिक , त्यौ – त्यौ अधिक उरझाहिं ” ध्रुवदासजी ।

प्रेम बिहार में , श्री अंगों पर रात्रि में लगे चिह्नों को देखकर मुस्करा रहे हैं । ” फूले अधर पयोधर लोचन , उर नख भुज अभिरामिनी । गंडनि पीक मषि न दुरावति , ‘ व्यास ‘ लाज नहीं कामिनी । “

रात्रि के चिन्हों को देख – देखकर फिर दोनों को रोमांच हो रहा है , मानों प्रेम के अंकुर फिर से तन में अंकुरित हो उठे हैं । चाचा श्रीवृन्दावन दास जी अपने एक पद में कहते हैं

सकुचत सुरतांत चिन्ह देवि देखि समुझि – समुझि सुखहि लियें मनहि दिये हितु बढ़ायौ । लसत मरगजे सुवीर , भवन भई शोभा भीर , दुहुन को सुहाग भाग छकि छकि दुलरायो । ” सुहृदयों के हृदयगम्य है ।


राधा प्यारी मेरे नैने सलोल ।
तै निज भजन कनक तन जौवन , लियौ मनोहर मोल ।।
अधर निरंग अलिक लट छूट , रंजित पीक कपोल ।
तू रस मगन भई नहिं जानत , ऊपर पीत निचोल ।।
कुच युग पर नख रेख प्रगट मानौ , शंकर शिर शशि टोल ।
जय श्रीहित हरिवंश कहति कछु भामिनी अति आलस सों बोल ।।21 ।।

यह भी श्रीहित चतुरासी जी का पद है । प्राचीन टीकाओं के आधार पर अर्थ प्रस्तुत है ।

मूल : – राधाप्यारी तेरे नैन सलोल ।
राधाप्यारी तेरे नैन अतिशय करके ललिता सों भरे चंचल है ।
अपार गुण है इन नैनों के । ऐसे रंग भरे कटाक्ष चलते है कि लाल जी के प्राण अपने वश में करते हैं , अति बाँके है , किसी के बस नहीं , अति रिझावर है , नेक चोज की बात देखि , तुरन्त रीझ जाते है ।

मूल : – तै निज भवन कनक तन जीवन लियों मनोहर मोल :
भजन शब्द के दो अर्थ है । एक तो सेवा दूसरा अंगीकार करना । तै निज भजन – भक्ति रति विपरीत सों , कनक तन- जिस श्री अंग में ओटे हुए कनक की सी आभा है , जीवन करके प्यारे को मोल लीयो है । कहने का अभिप्राय यह है कि प्यारो आप पर न्यौछावर हो गयो है ।

मूल : – अधर निरंग अलिक लट छूटी रंजित पीक कपोल :
तुम्हारे अधरों में रस रंग का भर रहा , जो प्रीतम को महा विलास में परमान्द दियौ , जिससे बेनी के बन्ध ढीले हो गए है और चिकुर चन्द्रिका से लटें छूटकर भालस्थली पर राजे है , कपोलों पर पीक लगी है । ।

मूल : – तू रस मगन भई नहीं जानति ऊपर पीत निचोल :
तू रस में ऐसी मगन भई कि तुम्हे पता नहीं पड़ा कि प्रीतम का पीताम्बर तुम्हारे ऊपर कब आ गया । श्रीअंगों की अद्भुत शोभा बढ़ी है ।

मूल : – कुच युग पर नख – रेख प्रगट मानों , शंकर शिर शाशि टोल :
दोनों कुतों पर विहार में प्रीतम के नखों की रेखा सी बन गई है । सो ऐसा प्रतीत होता है , शंकरजी के सिर पर जैसे अर्ध चन्द्रमा विराजे है , वैसे नव रूपी चन्द्रमा के समूह की अबली बन गई है ।
कुच नखरेख धनुष की आकृति मनो शिव शिर शाशि राजै ।
सुनत ‘ सूर ‘ प्रिय वचन सखी मुख , नागरी हँसि मन लाजै ।।

मूल : – जै श्रीहित हरिवंश कहत कछु भामिनी अति आलस सों बोल :
जब प्रियाजी ने ऐसे रंग भरे वचन सुने तब अन्तर में तो अति आनन्दित हुई पर ऊपर से सकुच के आलसवंत भइ बोली ” हित सखे तुम तो ऐसी बातें बनाती ही कि आशचर्य को भी आश्चर्य होता है । इसी प्रकार आनन्द की अलसान में प्रियाजी कुछ कहती रही . ” हित सखी जू कहती है । इति ।


मंगल समय खिचरी जेंवत है श्रीराधावल्लभ कुंजमहल में ।
रति रसमसे गसे गुण तन मन नाहिन संभारत प्रेम गहल में ||
चुटकी देत सखी संभरावत हंसत हंसावत चहल पहल में ।
जै श्रीकुंजलाल हित यह विधि सेवत समै समै सब रहत टहल में ||22||

श्रीवृन्दावन कुंज महल में प्रिया प्रियातम खिचरी आरोग रहे हैं ।
प्रेम रस में भीजे , दोनों के तन मन परस्पर एक दूसरे से जुड़े है , प्रेम की उन्मत्तता के कारण अपने को संभाल नहीं पा रहे हैं ।

प्रेम की गहर में से यह निकलें तो सखियों के मनोरथ पूर्ण हों अत : सखी चुटकी बजाकर सावधान करती है , चहल पहल है हास परिहास कर रही है ।

श्रीकुंजलाल जी महाराज कहते है कि इसी प्रकार सखियाँ हर समय , समय के अनुसार सेवा में रहती है ।


खिचरी जेवत है पिय प्यारी ।
सीत समै रुचि जानि सुगंधन मेलि सखीनु सँवारी || पहले प्रियह जिवावह जेंवत रसिक नरेस महा री
जै श्रीकुंजलाल पिय की बातन की घातन जानन हारी ||23||

प्रिया प्रियतम खिचड़ी आरोग रहे है । शीत समय जानकर सखियों ने सुगन्धित पदार्थ डालकर खिचड़ी को संवार दिया है । रसिक नरेश पहिले प्रियाजी को जिमाते हें फिर स्वयं पाते है । श्रीकुंजलाल जी महाराज कहते हैं । कि प्रीतम बातों में जो खुशामद कर रहे हैं , इन घातों को , प्रियाजी खूब जानती है ।


खिचड़ी राधाबल्लभ जू कौ प्यारौ ।
किसमिस दाख चिरौजी पिस्ता अद्रक सौ रुचिकारी ||
दही कचरिया वर सैधाने बरा पापर बहु तरकारी ।
जायफल जावित्री मिरचा घृत सों सीच संवारी ||24||

अर्थ स्पष्ट है ।


खिचरी जेंवत जुगल किशोर ।
निसि अनुरागे दम्पति उठे उनीदे भोर |
अंग अंग की छवि अवलोकत ग्रास लेत मुख सुखहि निहोर ।
जै श्रीरूपलाल हित ललित त्रिभंगी बिबि मुखचन्द्र चकोर ।।25।।

श्री श्यामा श्याम खिचड़ी आरोग रहे है । सम्पूर्ण रात्रि विहार करने के बाद , अति अनुराग का भर लिए दोनों उनीदे उठे है ।

एक दूसरे के अंग की छवि देख – देखकर सुख का अनुभव करते , बड़े – बड़े निहोरे से खिचड़ी का ग्रास मुख में लेते उजाते हैं ।

श्रीरूपलाल जी महाराज कहते है कि प्रिया – प्रीतम एक दूसरे के मुख को चन्द्र और चकोर की भाँति निहारते रहते हैं ।


अधिक हेत सों पावें पिय प्यारी ।
थार सैंजोये धरें कर आवति , सीत समै रुचिकारकी ।।
बहुत मेवा मिलबारी अचारी , बासौधी लीये सब ठाड़ी ।
यह सेवा हित नित्त कृपा प्रिय सों राधालाल संवारी ।।26।।

प्रिया प्रीतम बड़े प्रेम से खिचरी पा रहे हैं । खिचड़ी के थार संजोकर हाथों में लिए सखियाँ लिए आ रही है , सदी में रुचिकारी है । बहुत प्रकार का मेवा , मिलबरी , अचार बासौधी ( एक प्रकार की बड़ी ) लिए सखियाँ खड़ी है । श्रीराधालाल जी ने यह सेवा श्रीप्रिया प्रीतम की कृपा से संवारी नोट – बड़ों से सुना है कि श्रीराधालाल जी महाराज बड़े अनुराग आ पाए । जब दूसरे सहयोगी बनाने बैठे तो कहते हैं मनो – मन लकड़ी फुक गई परन्तु खिचड़ी सिद्ध नहीं हुई । आखिर उन्हें जैसे तैसे बुलाया गया उन्होंने आकर खिचड़ी को संवारा तो भोग लगा ।


रूप रसासव माते दोऊ श्रीराधाबल्लभ जेंवत खिचरी ।
अरस परस मुसिकात जात बतरात बात बात बोलत बिच बिचरी ।।
खाटे सरस सँधाने नव – नव पापर कचरी लेत रुचि – रुचि री ।
नेह निहोर जिवाँवत हित सखी कोमल मधुर ग्रास घृत निचुरी ।।
फरगुल सुरंग रजाई कनक अंगीठी अगरसत सचरी ।।27।।

रूप रसासब में दोनो मत्त , प्रिया प्रीतम खिचरी पा रहे हैं ।
दानों मुस्कराते जाते है और पाते समय परस्पर बीच – बीच में बतबताते जाते हैं । कई प्रकार के खाटे और सरस आचार , पापर , कचरी बड़े प्रेम से आरोग रहे हैं ।

श्रीहित सखी जू घृत से निवुड़ि खिचरी के कोमल मधुर ग्रास बड़े नेह और निहोरा कर करके प्रियालाल को जिमा रही है ।
श्रीयुगल ने सुरंग ( लाल ) रजाई , फरगुल ओढ़ रखी है और पास में सोने की अंगीठी ‘ अगरसत ‘ डाली हुई रखी है ।
नोट : – अगर मगर एक विशेष प्रकार के वृक्षों को कहते है जिसकी छाल का इत्र भी बनता है जो बहुत कीमती होता है ।


चलौ चलौ सखी देखें दोऊ जैवै ।
भरे थार खिचरी घृत निचुरी के आगे , हँसि हँसि सुकुमार प्यारे कैसे दोऊ जैवें ।।
प्रिया के मुख पीये देत पिय के मुख प्यारी ।
बीच – बीच अधर पान प्रानन सो हेरै ||28||

अर्थ स्पष्ट है ।


प्यारे जैवत है सुकुंवार ।
सरस सुगंध उठत उछगारें भरि खिचरी के थार ।।
पापर कचरी तलप कटाक्षन भृकुटी मुरन को अचार ।
जुरे परस्पर नैन दुहुन के प्रेम रूप को अहार ।।
पहिलै प्रियहिं जिवाँवत जैवत रहत है वदन निहार ।
ऐसी विधि सों जेंवत प्यारे हित सुख की ज्यौनार ।।29।।

दोनों सुकुमार लाड़िली लाल खिचरी आरोग रहे है ।
अब आरोगने की रीति कहते हैं । सिज्जा महल में खिचरी के भरे थाल रखे है , पापर , कचरी भृकुटि मुरन कौ आचार ( सेम का आचार है ) सरस सुगन्ध की उगारें उठ रही है ।

सिज्जा पर परस्पर दोनों के मैने जुड़े है , कटाक्ष चल रहे हैं , लालजी प्रियाजी की प्रेम रूप माधुरी का आहार करते जाते है और संग – संग प्रिया जी को जिमाते हैं और स्वयं जैमते जाते हैं हैं । ऐसी विधि से यह हित रूपी सुख की ज्यौनार परस्पर हो रही है ।


भोर मिलि जैबै दोऊ बनी – बनरा खिचरी ।
झमक सेज तें उठे उनींदे ब्रजजीवन घृत सों निवुरी ।।
मंगल रूप समै मंगल में रूचि सौ खिचरी पावै ।
ओढ़े फरगुल रंग सहानी छवि जीव जिबावै ।
झुकि – झुकि परत नैन अलसोहें हित सजनी फैनी अरु बासौदी ब्रजजीवन मन भावै ।
अदरक कूचा बन्यौ चटपटौ कर पल्लव दोऊ चाटें ।
वे उनके वे उनके मुख सों हँसि – हँसि सों लावै ।।
नथ उठाय बेला पय पीवैं कौतुक रंग मचावै ।
ब्रजजीवन हित कहाँ लगि बरनौ कुंज महल के ठाठै ||30||

प्रिया प्रीतम प्रातः दोनों मिलकर घृत से निचुरी खिचरी आरोग रहे हैं ; बनी बनरा- कहा , सो श्रृंगार सहित विराजे है- ऐसे जानिए । बड़ी छवि सों सिज्जा पर से उनीदें उठे हैं । बड़ी रूचि सों , ये दोनों मंगल रूप , सबेरे के मंगलमय समय में , खिचड़ी आरोग रहे है । सहानी रंग की फर्मुल ओढ़ रखी है , सुन्दर छवि को देखकर सखियां बलिहार है । युगल एक झुकने लगते है तब हित सजनी सम्हार करती है । माखन , मिश्री मगढ़ के लड्डू , पाक , मुरब्बा पाते है ।

अदरक कूचा चटपटा बना है जिसे पल्लू की ओट में दोनों चाट रहे हैं । दोनों हँसते जाते है और एक दूसरे को पवाते जाते है । प्रियाजी नथ उठाकर बेला में से दूध पी रही है । ( बेला एक विशेष प्रकार का चपटा गोल पात्र होता है जिसके किनारे थोड़े ऊपर की ओर उठे हुए होते हैं । और ऊपर से किनारे भीतर की ओर मुड़े रहते हैं । यह ब्रज का बहुत मांगलिक पात्र माना जाता है । घर में पुत्र जन्म होने पर बेला बजाते हैं , शादी व्याह में इसका प्रयोग तरह – तरह के मांगलिक कार्यों में होता है ।

ब्रजजीवन जी महाराज कहते हैं कुंज महल के इस ठाठ का कहाँ तक वर्णन करूँ ।

खिचरी युगल रुचि सों खात ।
पौष शुक्ला दोज तें लै मास एक प्रभात ||
दही कचरी वर संधाने बरा पापर घीय ।
ढिग अंगीठी धरी मीठी लगत प्यारी पीय जल पिवाय धुवाह हाथ अगौछ बीरी देत ||
सखीजन बाँटति तहाँ हित ब्रजलाल जूठन लेत ||31||

अर्थ स्पष्ट है ।


अचवन बीरी दै मंगल आरती सजि बाढ़यौ सखिन मन मोद ।
जै श्रीकुंजलाल हित असीसत एसै ही करौ विनोद ।।
जै श्रीकिशोरलाल हित रूप अलि बाँटत देति लेति सब सखी सहचरि कृष्णदास आसपास निरखत हित को विलास , दौरि – दौरि आवें सखी जूठन कौ लेवै । चलौ चलौ सखी देखै दौऊ जै चुके , जै चुके , जै चुके ||32||

अर्थ स्पष्ट है । 


निरखि आरती मंगल भोर |
मंगल स्यामा स्यामा किशोर ।।
मंगल श्रीवृन्दावन धाम ।
मंगल कुंज महल अभिराम ।।
मंगल घंटा नाद मु होत ।
मंगल थार मणिनु की जोति ।।
मंगल दुंदुभी धुनि छबि छाई ।
मंगल सहचरी दरसन आई ।
मंगल वीणा मृदंग बजावै ।
मंगल ताल झाँझ झरलावै ।।
मंगल सखी यूथ कर जोरै ।
मंगल चंवर लिये चहुँ ओरै ।।
मंगल पुष्पावलि बरसाई ।
मंगल जोति सकल बन छाई ।।
जै श्रीरूपलाल हित हृदय प्रकाश ।
मंगल अद्भुत युगल विलास ||33 ||


यहि विधि मंगल आरती करी ।
निज मंदिर आगै चिक परी ।।
ललितादिक भीतर अनुसरी ।
जै श्रीकमलनेंन हित सेवा भई ।
श्रीराधे , किशोरी राधे , लड़ैती राधे ।
श्यामा प्यारी जय राधे || 34 ||

अर्थ स्पष्ट है ।


इति खिचरी उत्सव श्रृंखला की जै जै श्रीहरिवंश

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बिहार पंचमी

ब्रज में  प्रकटे हैं बिहारी, जय बोलो  श्री हरिदास की।
भक्ति ज्ञान मिले जिनसे, जय बोलो गुरु महाराज की॥

मार्गशीर्ष, शुक्ल पक्ष, पंचमी को ही श्री धाम वृन्दावन में बिहारी श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। इसी दिन अप्रकट रहने वाले प्रभु साक्षात् नित्य वृन्दावन में निधिवन में प्रकट हुए थे। तीनो लोकों के स्वामी को इस दिन रसिक सम्राट स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ने अपनी भक्ति से जीत लिया था और वो अपने सभी भक्तों को दर्शन देने के लिए उनके सामने आ गए।

स्वामी श्री हरिदास जी निधिवन के कुंजो में प्रतिदिन नित्य रास और नित्य विहार का दर्शन किया करते थे, और अत्यंत सुंदर पद भी गाया करते थे। वो कोई साधारण मनुष्य नहीं थे, भगवान की प्रमुख सखी श्री ललिता सखी जी के अवतार थे। जब तक वो धरती पर रहे, उन्होंने नित्य रास में भाग लिया और प्रभु के साथ अपनी नजदीकियों का हमेशा आनन्द उन्हें प्राप्त हुआ। उनके दो प्रमुख शिष्य थे। सबसे पहले थे उनके अनुज गोस्वामी जगन्नाथ जी जिनको स्वामी जी ने ठाकुर जी की सेवा के अधिकार दिए और आज भी वृन्दावन में बांके बिहारी मन्दिर के सभी गोस्वामी जगन्नाथ जी के ही कुल के हैं। उनके दूसरे शिष्य थे उनके भतीजे श्री विठ्ठल विपुल देव जी। बिहार पंचमी के दिन विठ्ठल विपुल देव जी का जन्मदिन भी होता है।

स्वामी जी के सब शिष्य उनसे रोज आग्रह किया करते थे कि वो खुद तो हर दिन नित्य विहार का आनन्द उठाते है कभी उन्हें भी यह सौभाग्य दें जिससे वो भी इस नित्य रास का हिस्सा बन सके। पर स्वामी जी ने कहा की सही समय आने पर उन्हें स्वतः ही इस रास का दर्शन हो जायेगा क्योंकि रास का कभी भी वर्णन नहीं किया जा सकता। इसका तो केवल दर्शन ही किया जा सकता है और वो दर्शन आपको भगवान के अलावा कोई नहीं करा सकता। स्वामी जी का एक कुञ्ज था वो जहाँ वे रोज साधना किया करते थे। उनके सभी शिष्य इस बात को जानने के लिए काफी व्याकुल थे कि ऐसा क्या खास है उस कुञ्ज में।

एक दिन जिस दिन विठ्ठल विपुल देव जी का जन्मदिन था, स्वामी जी ने सबको उस कुञ्ज में बुलाया। जब सब विठ्ठल विपुल देव जी के साथ उस कुञ्ज में गए तो सब एक दिव्या प्रकाश से अन्धे हो गए और कुछ नजर नहीं आया। फिर स्वामी जी सबको अपने साथ वह लेकर आये और सबको बिठाया। स्वामी जी प्रभु का स्मरण कर रहे थे, उनके सभी शिष्य उन का अनुसरण कर रहे थे, और सबकी नजरे उस कुञ्ज पर अटकी हुई थी और सब देखना चाहते थे कि क्या है इस कुञ्ज का राज। तो सबके साथ स्वामी जी यह पद गाने लगे।

माई री सहज जोरी प्रगट भई जू रंग कि गौर श्याम घन दामिनी जैसे।
प्रथम   हूँ   हुती   अब   हूँ   आगे    हूँ   रही   है   न   तरिहहिं   जैसें॥
अंग     अंग     कि     उजराई     सुघराई    चतुराई    सुंदरता    ऐसें।
श्री हरिदास    के    स्वामी    श्यामा    कुंजबिहारी   सम   वस्  वैसें॥

स्वामी जी कि साधना शक्ति से उन दिन उन सबके सामने बांके बिहारी जी अपनी परम अह्लादनी शक्ति श्री राधा रानी के साथ प्रकट हो गए।

चेहरे पे मंद मंद मुस्कान, घुंघराले केश, हाथों में मुरली, पीताम्बर धारण किया हुआ जब प्रभु कि उस मूरत का दर्शन सब ने किया तो सबका क्या हाल हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे अपनी पलक झपकाना भी भूल गए हुए हैं। और ऐसे बैठे मानो कोई शरीर नहीं बल्कि एक मूर्ति हैं।

स्वामी जी कहते है कि देखो प्रभु प्रकट हो गए हैं। प्रभु कि शोभा ऐसी ही है जैसी घनघोर घटा कि होती है। यह युगल जोड़ी हमेशा विद्यमान रहती है। प्रकृति के कण-कण में युगल सरकार विराजमान है। और ये हमेशा किशोर अवस्था में ही रहते हैं। स्वामी जी के आग्रह से प्रिय और प्रीतम एक दूसरे के अन्दर लीन हो गए और फिर वही धरती से स्वामी जी को एक दिव्या विग्रह प्राप्त हुआ जिसमे राधा और कृष्ण दोनों का रूप है और इसी विग्रह के माध्यम से ठाकुर जी हमें श्री धाम वृन्दावन में दर्शन देते हैं। यही कारण है कि ठाकुर जी का आधा श्रृंगार पुरुष का होता है और आधा श्रृंगार स्त्री का होता है।

यह त्यौहार श्री धाम वृन्दावन में आज भी बहुत धूम धाम से मनाया जाता है। सुबह सबसे पहले निधिवन में प्रभु के प्राकट्य स्थल में जो भगवन में प्रतीक चरण चिन्ह है उनका पंचामृत अभिषेक किया जाता है। फिर एक विशाल सवारी स्वामी जी की वृन्दावन के प्रमुख बाजारों से होती हुई ठाकुर जी के मन्दिर में पहुँचती हैं। स्वामी जी की सवारी में हाथी, घोड़े, कीर्तन मंडली इत्यादि सब भाग लेते हैं। सवारी के सबसे आगे तीन रथ चलते हैं। इनमे से एक रथ में स्वामी श्री हरिदास जी, एक में गोस्वामी जगन्नाथजी और एक रथ में विठ्ठल विपुल देव जी के चित्र विराजमान होते हैं। ये रथ राज भोग के समय ठाकुर जी के मन्दिर में पहुँचते हैं और फिर तीनो रसिकों के चित्र मन्दिर के अन्दर ले जाये जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन ठाकुर जी हरिदास जी महाराज कि गोद में बैठकर उनके हाथों से भोग लगाते हैं।

यदि आपको किशोरी जी इस दिन अपने धाम वृन्दावन में बुला ले तो आपका सौभाग्य है परन्तु यदि किशोरी जी नहीं भी बुलाती हैं तो आप सुबह अपने घर पे ही बिहारी जी को भोग लगाये और संध्या के समय प्रभु की आरती करिये और उनके भजन में झूमते रहिये। आप पर कृपा जरूर बरसेगी। और आपको यह जानकार बहुत खुशी होगी कि इसी दिन भगवन श्री राम का जानकी जी के साथ विवाह भी हुआ था। इसलिए बिहार पंचमी को विवाह पंचमी भी कहा जाता है।

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तुलसी विवाह


तुलसी विवाह मुहूर्त


15 नवंबर 2021: दोपहर 1 बजकर 02 मिनट से दोपहर 2 बजकर 44 मिनट तक.
15 नवंबर 2021: शाम 5 बजकर 17 मिनट से 5 बजकर 41 मिनट तक.

तुलसी विवाह का महत्व

तुलसी विवाह जीवन में एक बार अवश्य करना चाहिए, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है । इस दिन व्रत रखने का भी बहुत महत्व है। इससे पूर्व जन्म के पाप समाप्त हो जाते हैं, और पुण्य की प्राप्ति होती है। तुलसी विवाह में तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी से किया जाता है। शालिग्राम जी भगवान विष्णु के प्रतिरूप ही है। तुलसी को विष्णु प्रिया कहते है। तुलसी और विष्णु को पति पत्नी के रूप में माना जाता है। तुलसी के बिना विष्णु भगवान की पूजा अधूरी मानी जाती है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को कार्तिक स्नान करके तुलसी जी व शालिग्राम जी का विवाह किया जाता है। इसी को तुलसी विवाह कहते हैं। इसका व्रत कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से शुरू हो जाता है। नवमी से ग्यारस तक अखण्ड दिए जलाये जाते है। तुलसी विवाह आप स्वयं भी कर सकते हैं या पंडित जी को बुलवाकर भी तुलसी विवाह करवाया जा सकता है। भक्ति भाव के साथ की गई पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती है।


“तुलसी विवाह विधि”

तुलसी का गमला साफ सुथरा करके गेरू और चूने से रंगकर सजायें। साड़ी आदि से सुन्दर मंडप बनाकर गन्ने व फूलों से सजाना चाहिए। परिवार के सभी सदस्य शाम के समय तुलसी विवाह में शामिल होने के लिए नए कपड़े आदि पहन कर तैयार हो जाये। तुलसी के साथ शादी के लिए शालिग्राम जी यानि विष्णु जी की काली मूर्ति चाहिए होती है। ये नहीं मिले तो आप अपनी श्रद्धानुसार सोने, पीतल या मिश्रित धातु की मूर्ति ले सकते हैं या फिर विष्णु जी की तस्वीर भी ले सकते हैं। यदि कोई व्यवस्था ना हो पाए तो पंडित जी से आग्रह करने पर वे मंदिर से शालिग्राम जी की मूर्ति अपने साथ ला सकते है। सबसे पहले गणेश जी का पूजन करें, फिर मंत्रो का उच्चारण करते हुए गाजे बाजे के साथ भगवान विष्णु की प्रतिमा को तुलसी जी के निकट लाकर रखे। भगवान विष्णु का आवाहन इस मन्त्र के साथ करें:-
आगच्छ भगवन देव अर्चयिष्यामि केशव।
तुभ्यं दास्यामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव।।

(हे भगवान केशव, आइये देव मैं आपकी पूजा करूँगा, आपकी सेवा में तुलसी को समर्पित करूँगा, आप मेरे सभी मनोरथ पूर्ण करना )
तुलसी जी व भगवान विष्णु की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करके स्तुति आदि के द्वारा भगवान को निद्रा से जगाये। विष्णु जी को पीले वस्त्र धारण करवाये, पीला रंग विष्णु जी का प्रिय है। कांसे के पात्र में दही, घी, शहद रखकर भगवान् को अर्पित करें। फिर पुरुष सूक्त से व षोडशोपचार से पूजा करें। तुलसी माता को लाल रंग की ओढ़नी ओढ़ानी चाहिए। शालीग्राम जी को चावल नहीं चढ़ाये जाते हैं, इसीलिए उन्हें तिल चढ़ाये। दूध व हल्दी का लेप बनाकर शालिग्राम जी व तुलसी जी को चढ़ाये। गन्ने से बनाये गए मंडप की भी दूध हल्दी से पूजा करें। विवाह के समय निभाये जाने वाली सभी रस्मे करें। तुलसीजी और शालिग्राम जी के फेरे भी करवाने चाहिए।साथ ही “ओम तुलस्यै नमः” मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए। तुलसी माता की शादी के लिए साड़ी, ब्लाउज, मेहंदी, काजल, बिंदी, सिंदूर, चूड़ा आदि सुहाग का सामान तथा बर्तन चढ़ायें। जो भी भोजन बनाया हो वह एक थाली में दो जनो के लिए रखकर फेरों के समय भोग लगाने के लिए रखना चाहिए। कन्यादान का संकल्प करें और भगवान से प्रार्थना करें–”हे परमेश्वर ! इस तुलसी को आप विवाह की विधि से ग्रहण कीजिये। यह पार्वती के बीज से प्रकट हुई है, वृन्दावन की भस्म में स्थित रही है। आपको तुलसी अत्यंत प्रिय है अतः इसे मैं आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। मैंने इसे पुत्री की तरह पाल पोस कर बड़ा किया है। और आपकी तुलसी आपको ही दे रहा हूँ। हे प्रभु ! इसे स्वीकार करने की कृपा करें।” इसके पश्चात् तुलसी और विष्णु दोनों की पूजा करें। तुलसी माता की कहानी सुने। कपूर से आरती करें तथा तुलसी माता की आरती गाएं। भगवान को लगाए गए भोग का प्रसाद के रूप में वितरण करें। सुबह हवन करके पूर्णाहुती करें। इसके लिए खीर, घी, शहद और तिल के मिश्रण की 108 आहुति देनी चाहिए। महिलायें तुलसी माता के गीत गाती है। उसी समय व्रत करने वाली के पीहर वाले कपड़े पहनाते है, इसी समय शालीग्राम व तुलसी माता को श्रद्धानुसार भोजन परोसकर भोग लगाना चाहिए, साथ में श्रद्धानुसार दक्षिणा अर्पित की जानी चाहिए। भगवान से प्रार्थना करें– “प्रभु ! आपकी प्रसन्नता के लिए किये गए इस व्रत में कोई कमी रह गई हो तो क्षमा करें। अब आप तुलसी को साथ लेकर बैकुंठ धाम पधारें। आप मेरे द्वारा की गई पूजा से सदा संतुष्ट रहकर मुझे कृतार्थ करें।” इस प्रकार तुलसी विवाह का परायण करके भोजन करें। भोजन में आँवला, गन्ना व बैर आदि अवश्य शामिल करें। भोजन के बाद तुलसी के अपने आप गिरे हुए पत्ते खाएँ, यह बहुत शुभ होता है। तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराना विष्णु भगवान की भक्ति का एक रूपक है। इसके लिए जो कथा प्रचलित है वह इस प्रकार है:-


“तुलसी विवाह कथा”

जलंधर नाम का एक दानव था। उसकी पत्नी वृंदा कठोर पतिव्रता धर्म का पालन करती थी। जलंधर की पत्नी की पतिव्रता शक्ति के कारण बड़े से बड़े देवता भी उसे परास्त नहीं कर पाये। वह अभिमान से ग्रस्त होकर अत्याचार करने लगा। देवता रक्षा के लिए विष्णु भगवान के पास पहुँचे। विष्णु भगवान ने छल से जलंधर का वेश धारण करके वृंदा का सतीत्व भंग कर दिया। इस कारण जलंधर मारा गया। इस बात पर क्रोधित होकर वृंदा ने विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। विष्णु ने कहा– “हे वृंदा, तुम मुझे बहुत प्रिय हो। तुम्हारे सतीत्व के कारण तुम तुलसी बन कर मेरे साथ रहोगी। तुम्हारे बिना मै कोई भोग स्वीकार नहीं करूँगा। जो मनुष्य तुम्हारा और मेरा विवाह करवाएगा वह परम धाम को प्राप्त होगा।” वृंदा सती हो गई और उसकी राख पर एक पौधे ने जन्म लिया। यही पौधा तुलसी है। पत्थर स्वरुप भगवान विष्णु जिन्हें शालिग्राम कहते हैं और तुलसी का विवाह इसी कारण से कराया जाता है।


“तुलसी माता की कहानी”

कार्तिक महीने में सब औरते तुलसी माता को सींचने जाती थी। सब तो सींच कर आती परन्तु एक बूढ़ी माई आती और कहती कि “हे तुलसी माता ! सत की दाता !, मैं बिलड़ा सींचूं तेरा, तू कर निस्तारा मेरा, तुलसी माता अड़ुआ दे लडुआ दे, पीताम्बर की धोती दे, मीठा मीठा गास दे, बैकुंठ का वास दे, चटके की चाल दे, पटके की मौत दे, चन्दन की काठ दे, झालर की झनकार दे, साई का राज दे, दाल भात का जीमन दे, ग्यारस की मौत दे, श्रीकृष्ण का कांधा दे।” यह बात सुनकर तुलसी माता सूखने लगीं तो भगवान ने पूछा, “हे तुलसी ! तुम क्यों सूख रही हो ? तुम्हारे पास इतनी औरतें रोज आती हैं, तुम्हे मीठा भोग लगाती हैं, गीत गाती है।” तुलसी माता ने कहा, “एक बूढ़ी माई रोज आती है और इस तरह की बात कह जाती है। मैं सब बात तो पूरी कर दूँगी पर कृष्ण का कन्धा कहाँ से दूँगी।” भगवान बोले, “वह मरेगी तो कन्धा मैं दे आऊँगा।” कुछ समय पश्चात बूढ़ी माई का देहांत हो गया। सारे गाँव वाले एकत्रित हो गए और बूढ़ी माई को ले जाने लगे तो वह इतनी भारी हो गयी की किसी से भी नहीं उठी सबने कहा इतना पूजा पाठ करती थी, पाप नष्ट होने की माला फेरती थी, फिर भी इतनी भारी कैसे हो गयी। बूढ़े ब्राह्मण के रूप में भगवान वहाँ आये और पूछा ये भीड़ कैसी है ? तब वहाँ खड़े लोग बोले ये बूढ़ी माई मर गयी है। पापिन थी इसीलिए भारी हो गयी है किसी से भी उठ नहीं रही है तो भगवान ने कहा मुझे इसके कान में एक बात कहने दो शायद उठ जाये। भगवान ने बूढ़ी माई के पास जाकर कान में कहा कि बूढ़ी माई मन की निकाल ले अड़ुआ ले गडुआ ले, पीताम्बर की धोती ले, मीठा मीठा ग्रास ले, बैकुण्ठ का वास ले, चटक की चाल ले, चन्दन की काठ ले, झालर की झंकार, दाल भात का जीमन ले और कृष्ण का कांधा ले। इतना सुनना था की बुढ़िया हल्की हो गयी भगवान अपने कंधे पर ले गए और बुढ़िया को मुक्ति मिल गयी।
हे तुलसी माता ! जैसी मुक्ति बूढ़ी माई की करी वैसी ही हमारी भी करना और जैसे उसको कन्धा मिला वैसे सभी को देना।


गणेशजी का तुलसी को श्राप

एक बार गणेश्वर श्रीगंगाजी के पावन तट पर तपस्या कर रहे थे। उनके अर्द्ध उन्मीलित नेत्र थे तथा मन भगवान् श्रीहरि में लगा था। वे सदैव उन्हीं के चरण कमलों का ध्यान किया करते थे।
‘उस समय वे एक रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान थे। समस्त अंगों पर चन्दन लगा हुआ था। गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था। भुजाओं में स्वर्णाभरण, मस्तक पर देदीप्यमान मुकुट और कानों में कुण्डल सुशोभित थे उनका मुखमण्डल करोड़ों सूर्यों की आभा को भी लजाता हुआ दमक रहा था। उनकी सुन्दर सूँड़ एवं विद्युतोपम श्वेत दन्त भी अद्भुत शोभा के कारण थे। इस प्रकार अद्भुत एवं दिव्य सौंदर्यावतार गणेशजी कुछ-कुछ योग झपकी लेते हुए और कुछ जागते हुए से अत्यन्त शोभायमान लग रहे थे।
‘इसी अवसर पर धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी देवी श्री भगवान् श्रीहरि का स्मरण करती हुई विभिन्न तीर्थों में भ्रमण करने को निकली थी। वह विभिन्न स्थानों पर होती हुई उसी गंगातट पर जा पहुँची जहाँ पार्वतीनन्दन एकदन्त भगवान् श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों में ध्यान में रत थे।
तुलसी ने उमासुवन को देखा तो कुछ विमोहित-सी हो गई। उसने सोचा-कितना अद्भुत और अलौकिक रूप है, गिरिजानन्दन का ? इनसे वार्तालाप करके विचार जानने चाहिए। सम्भव है इनके द्वारा की जाने वाली उपासना कुछ इस प्रकार की हो, जो मेरा प्रयोजन है।’
ऐसा विचार कर तुलसी ने उनके समीप जाकर कहा–’हे गजानन ! हे शूर्पकर्ण ! हे एकदन्त ! हे घटोदर ! मुझे यह तो बताओ कि संसार भर के समस्त आश्चर्य एकमात्र तुम्हारे ही विग्रह में किस प्रकार एकत्र हो गये हैं ? क्या इसके लिए तुमने कोई तपस्या की है ? यदि की है तो वह किस देवता की थी ?’
गणेश्वर तुलसी को देखकर कुछ अचकचाये। सोचा–यह कौन है ? मेरे पास आने का क्या प्रयोजन है इसका ?
जब कोई समाधान न हुआ तो बोले–’वत्से ! मैंने तुम्हें अब से पहिले कभी नहीं देखा। इसलिए तुम कौन हो ? यहाँ किस प्रयोजन से आई हो ? मेरी तपश्चर्या में विघ्न डालने का क्या कारण है ? ‘
तुलसी बोली–’गणेश्वर ! मैं धर्मपुत्र की कन्या तुलसी हूँ। तुम्हें यहाँ तपस्या करते देखकर उपस्थित हो गई।’
यह सुनकर पार्वतीनन्दन ने कहा–’माता ! तपस्या में विघ्न कभी भी उपस्थित नहीं करना चाहिए। इसमें सर्वथा अकल्याण ही होता है। मंगलमय भगवान् तुम्हारा मंगल करें। अब तुम यहाँ से चली जाओ।’
यह सुनकर तुलसी ने अपनी व्यथा कही–’पार्वती तनय ! मेरी बात सुनो। मैं मनोऽनुकूल वर की खोज में ही इस समय तीर्थाटन कर रही हूँ। अनेक वर देखे, किन्तु आप पसन्द आये हो मुझे। अतएव आप मुझे भार्या रूप में स्वीकार कर मेरे साथ विवाह कर लीजिए।’
गणेश्वर बोले–’माता ! विवाह कर लेना जितना सरल है, उतना ही कठिन उसके दायित्व का निर्वाह करना है। इसलिए विवाह तो दुःख का ही कारण होता है। उसमें सुख की प्राप्ति कभी नहीं होती। विवाह काम वासना की प्रधानता रहती है, जो कि तत्त्वज्ञान का उच्छेद करने वाली तथा समस्त संशयों को उत्पन्न करने वाली है। अतएव हे माता ! तुम मेरी ओर से चित्त हटा लो। यदि ठीक प्रकार से खोज करोगी तो मुझसे अच्छे अनेक वर तुम्हें मिल जायेंगे।’
तुलसी बोली–’एकदन्त ! मैं तो तुमको ही अपने मनोनुकूल देखती हूँ इसलिए मेरी याचना को ठुकराकर निराश करने का प्रयत्न न करो। मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लो प्रभो !’
गणेश बोले–’परन्तु, मुझे तो विवाह ही नहीं करना है तब तुम्हारा प्रस्ताव कैसे स्वीकार कर लूँ ? माता ! तुम कोई और वर देखो और मुझे क्षमा करते हुए मेरी ओर से अपना चित्त पूर्ण रूप से हटा लो, इसी में तुम्हारा कल्याण निहित है।’
तुलसी को गणेशजी की बात बहुत अप्रिय लगी और उसने कुछ रोषपूर्वक कहा–’उमानन्दन ! मैं कहती हूँ कि तुम्हारा विवाह तो अवश्य होगा। मेरा यह वचन मिथ्या नहीं हो सकता।’
तुलसी प्रदत्त शाप को सुनकर गणपति भी शाप दिये बिना न रह सके। उन्होंने तुरन्त कहा–’देवि ! तुमने मुझे व्यर्थ ही शाप दे डाला है, इसलिए मैं भी कहता हूँ कि तुम्हें भी जो पति प्राप्त होगा वह असुर होगा तथा उसके पश्चात् महापुरुषों के शापवश तुम्हें वृक्ष होना पड़ेगा।’
शाप सुनकर तुलसी भयभीत हो गई। उसने गणेश्वर की स्तुति की–’हे गणराज ! हे एकदन्त ! हे हेरम्ब ! मुझपर कृपा कीजिए। मेरे अपराध को क्षमा करके दया दृष्टि से देखिये। हे प्रभो ! आप तो सभी विघ्नों का नाश करने वाले हैं। मुझे भी जिन विघ्नों की प्राप्ति होने का शाप आपने दिया है, उनका निवारण भी आप कर सकते हैं। हे दुःखनाशक ! दुःखों को दूर कर दीजिए।’
तुलसी की विनय सुनकर गणेश्वर प्रसन्न हो गये। उन्होंने उसे आश्वासन दिया–’देवि ! तुम समस्त सौरभवन्त पुष्पों की सारभूता बनोगी। कलांश से भगवान् श्रीनारायण की प्रिया बनने का सौभाग्य भी तुम्हें प्राप्त होगा। यद्यपि समस्त देवगण तुमसे प्रसन्न रहेंगे, तथापि भगवान् श्रीहरि को तुम्हारे प्रति विशेष प्रीति रहेगी। नरलोक में मनुष्यों को तुम्हारे माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति करने पर उनके स्वधाम की अथवा मोक्ष की प्राप्ति होगी। किन्तु मेरे द्वारा तुम सदैव त्याज्य ही रहोगी।’
गणपति से उक्त वर प्राप्त कर तुलसी अपने गन्तव्य स्थान को गई और इधर गणेश्वर भी वहाँ से बदरीनाथ के समीप तपश्चर्या के लिए चले गये।
कालान्तर में वही तुलसी वृन्दा हुई और दानवराज शंखचूड़ की भार्या बनी। यह शंखचूड़ पूर्व जन्म में भगवान् श्रीकृष्ण का पार्षद सुदामा था जो रासेश्वरी राधा के शापवश असुर योनि को प्राप्त हुआ था। वह शंखचूड़-भार्या भगवान् के कलांश से वृक्षभाव को प्राप्त होती हुई श्रीहरि की परमप्रिया हुई।’


“तुलसी माता की आरती”

जय जय तुलसी माता, सब जग की सुख दाता॥जय॥
सब योगों के ऊपर, सब लोगो के ऊपर।रुज से रक्षा करके भव त्राता॥जय॥
बटु पुत्री हे श्यामा सुर बल्ली हे ग्राम्या
विष्णु प्रिये जो तुमको सेवे सो नर तर जाता॥जय॥
हरि के शीश विराजत त्रिभुवन से हो वंदित।
पतित जनों की तारिणी तुम हो विख्याता॥जय॥
लेकर जन्म विजन में आई दिव्य भवन में
मानवलोक तुम्हीं से सुख सम्पत्ति पाता॥जय॥
हरि को तुम अति प्यारी श्याम वरुण कुमारी।
प्रेम अजब है उनका तुमसे कैसा नाता॥जय॥

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आँवला नवमी

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की नवमी बहुत खास और शुभ मानी जाती है। इस दिन उत्तर भारत और मध्य भारत में अक्षय नवमी या आँवला नवमी का पर्व मनाया जाता है। जबकि दक्षिण और पूर्व भारत में इसी दिन जगद्धात्री पूजा का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन अच्छे कार्य करने से अगले कई जन्मों तक हमें इसका पुण्य फल मिलता रहेगा। धर्म ग्रंथो के अनुसार आँवला नवमी के दिन आँवले के पेड़ पर भगवान विष्णु एवं शिव जी वास करते हैं। इसलिए इस दिन सुबह उठकर इस वृक्ष की सफाई करनी चाहिए। साथ ही इस पर दूध एवं फल चढ़ाना चाहिए। पुष्प अर्पित करने चाहिए और धूप-दीप दिखाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार आँवला नवमी या अक्षय नवमी उतनी ही शुभ और फलदायी है जीतनी की वैशाख मास की अक्षय तृतीया।

आँवला नवमी कथा – 1

किसी समय काशी नगरी में एक व्यापारी और उसकी पत्नी रहते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी कारण व्यापारी की पत्नी हमेशा दु:खी रहती थी। एक दिन उसे किसी ने कहा कि यदि वह संतान चाहती है तो उसे किसी जीवित बच्चे की बलि भैरव को चढ़ाना होगी। उसने यह बात अपने पति से कही, लेकिन पति को यह बात जरा भी पसन्द नहीं आई।
चूंकि उसकी पत्नी को संतान की बहुत अधिक लालसा थी, इसलिए उसने पति से छुपाकर और अच्छे-बुरे की परवाह किए बिना एक बच्चा चुराकर उसकी बलि भैरव बाबा को दे दी। इसका गंभीर परिणाम हुआ और व्यापारी की पत्नी को कई रोग हो गए। पत्नी की यह हालत देख व्यापारी दु:खी था। उसने इसका कारण पूछा तो पत्नी ने बताया कि बच्चे की बलि के कारण उसकी यह हालत हुए है। (“श्रीजी की चरण सेवा” की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें) यह सुनकर व्यापारी को बहुत क्रोध आया, लेकिन पत्नी की हालत से वह दु:खी था। इसलिए उसने उपाय बताया कि वह इस पाप से मुक्ति के लिए गंगा स्नान करे और सच्चे मन से ईश्वर से प्रार्थना करे। व्यापारी की पत्नी ने कई दिनों तक यह किया।
इससे प्रसन्न होकर गंगा माता ने एक बूढ़ी औरत के रूप में व्यापारी की पत्नी को दर्शन दिए और कहा कि उसके शरीर के सारे रोग दूर हो जाएंगे, यदि वह कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन वृंदावन में व्रत रखकर आँवले के वृक्ष की पूजा करे। व्यापारी की पत्नी ने बड़े विधि-विधान से आँवला नवमी का व्रत-पूजन किया। इससे शीघ्र ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए और उसे एक स्वस्थ व सुन्दर संतान की प्राप्ति हुई। इसी दिन से महिलायें सुख-सौभाग्य, रोग मुक्ति और उत्तम संतानसुख की प्राप्ति के लिए आँवला नवमी का व्रत करती हैं।


आँवला नवमी कथा – 2

एक राजा था, उसका प्रण था वह रोज सवा मन आँवले दान करके ही खाना खाता था। इससे उसका नाम आँवलया राजा पड़ गया। एक दिन उसके बेटे बहु ने सोचा कि राजा इतने सारे आँवले रोजाना दान करते हैं, इस प्रकार तो एक दिन सारा खजाना खाली हो जायेगा। इसीलिए बेटे ने राजा से कहा की उसे इस तरह दान करना बन्द कर देना चाहिए।
बेटे की बात सुनकर राजा को बहुत दुःख हुआ और राजा रानी महल छोड़कर बियाबान जंगल में जाकर बैठ गये। राजा रानी आँवला दान नहीं कर पाए और प्रण के कारण कुछ खाया नहीं। जब भूखे प्यासे सात दिन हो गए तब भगवान ने सोचा कि यदि मैने इसका प्रण नहीं रखा और इसका सत नहीं रखा तो विश्वास चला जायेगा। इसलिए भगवान ने, जंगल में ही महल, राज्य और बाग -बगीचे सब बना दिए और ढेरों आँवले के पेड़ लगा दिए। सुबह राजा रानी उठे तो देखा की जंगल में उनके राज्य से भी दुगना राज्य बसा हुआ है।
राजा रानी से कहने लगा – रानी देख कहते हैं, सत मत छोड़े। सूरमा सत छोड़या पत जाये, सत की छोड़ी लक्ष्मी फेर मिलेगी आय। आओ नहा धोकर आँवले दान करें और भोजन करें। राजा रानी ने आँवले दान करके खाना खाया और खुशी- खुशी जंगल में रहने लगे।
उधर आँवला देवता का अपमान करने व माता पिता से बुरा व्यवहार करने के कारण बहु बेटे के बुरे दिन आ गए। राज्य दुश्मनों ने छीन लिया दाने-दाने को मोहताज हो गए और काम ढूंढते हुए अपने पिताजी के राज्य में आ पहुँचे। उनके हालात इतने बिगड़े हुए थे कि पिता ने उन्हें बिना पहचाने हुए काम पर रख लिया। (“श्रीजी की चरण सेवा” की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें) बेटे बहु सोच भी नहीं सकते कि उनके माता-पिता इतने बड़े राज्य के मलिक भी हो सकते है सो उन्होंने भी अपने माता-पिता को नहीं पहचाना।
एक दिन बहु ने सास के बाल गूँथते समय उनकी पीठ पर मस्सा देखा। उसे यह सोचकर रोना आने लगा की ऐसा मस्सा मेरी सास के भी था। हमने ये सोचकर उन्हें आँवले दान करने से रोका था की हमारा धन नष्ट हो जायेगा। आज वे लोग न जाने कहाँ होंगे ? यह सोचकर बहु को रोना आने लगा और आँसू टपक-टपक कर सास की पीठ पर गिरने लगे। रानी ने तुरन्त पलट कर देखा और पूछा की , तू क्यों रो रही है ?
उसने बताया आपकी पीठ जैसा मस्सा मेरी सास की पीठ पर भी था। हमने उन्हें आँवले दान करने से मना कर दिया था इसलिए वे घर छोड़कर कही चले गए। तब रानी ने उन्हें पहचान लिया। सारा हाल पूछा और अपना हाल बताया। अपने बेटे बहु को समझाया की दान करने से धन कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है। बेटे बहु भी अब सुख से राजा रानी के साथ रहने लगे।
हे भगवान ! जैसा राजा रानी का सत रखा वैसा सबका सत रखना। कहते सुनते सारे परिवार का सुख रखना।


पूजन सामग्री

आँवले का पौधा, फल, तुलसी के पत्ते एवं तुलसी का पौधा, कलश और जल, कुमकुम, सिंदूर, हल्दी, अबीर-गुलाल, चावल, नारियल, सूत, धूप-दीप, श्रृंगार का सामान और साड़ी-ब्लाउज, दान के लिए अनाज।


पूजन विधि

प्रात:काल स्नान कर आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। पूजा करने के लिए आँवले के वृक्ष की पूर्व दिशा की ओर उन्मुख होकर षोडशोपचार पूजन करें। दाहिने हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि लेकर व्रत का संकल्प करें। (“श्रीजी की चरण सेवा” की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें) संकल्प के बाद आँवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा की ओर मुख करके ‘ॐ धात्र्यै नम:’ मंत्र से आह्वानादि षोडशोपचार पूजन करके आँवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धारा गिराते हुए पितरों का तर्पण करें। फिर कर्पूर या घृतपूर्ण दीप से आँवले के वृक्ष की आरती करें।
अब पूजन की कथा कहें एवं सभी महिलायें इक्कट्ठा होकर कथा सुनें। पूजा के बाद पेड़ की कम से कम सात बार परिक्रमा करें, तभी सूत भी लपेटे। वैसे मान्यता है कि जो भी इस दिन आँवले के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा करता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती है। परिक्रमा के समाप्त होने पर फिर वहीं पेड़ के नीचे अथवा पास में बैठकर भोजन करें। ऐसी मान्यता है की इस परम्परा की शुरुआत माता लक्ष्मी ने की थी।
इस संदर्भ में कथा है कि एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आयीं। रास्ते में भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। लक्ष्मी माँ ने विचार किया कि एक साथ विष्णु एवं शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी एवं बेल का गुण एक साथ आँवले में पाया जाता है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव को।
आँवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिन्ह मानकर माँ लक्ष्मी ने आँवले की वृक्ष की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया। इसके बाद स्वयं भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि थी। इसी समय से यह परम्परा चली आ रही है।
इस दिन किसी गरीब अथवा ब्राह्मण महिला को श्रृंगार का सामान एवं साड़ी-ब्लाउज दान करें एवं दक्षिणा दें। इस दिन अपने सामर्थ्य अनुसार गरीबों को अनाज का भी दान करें।


आँवला नवमी का महत्व

1. मान्यता है कि जो व्यक्ति आँवला नवमी या अक्षय नवमी का व्रत रखता है अथवा पूजा करता है उसे असीम शांति मिलती है। उसका मन पवित्र होता है और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। इसलिए उसे बार-बार जन्म लेने की आवश्यकता नही होती है। वह अपने लक्ष्य को भली-भांति समझता है।

2. जो महिलायें आँवला नवमी की पूजा करती हैं उन्हें उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। वह दीर्घायु होता है और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वह अपने वंश का नाम रोशन करने वाला होता है। इसके अतिरिक्त इस पूजा से घर का वंश भी बढ़ता है।

3. कहते हैं आँवला नवमी की पूजा से पति-पत्नी के बीच रिश्ता बहुत ही मधुर होता है। दोनों के बीच आपसी तालमेल बहुत अच्छा रहता है। इसका एक वैज्ञानिक फायदा भी है। कहा जाता है कि ये आँवले के सेवन से गरिष्ठ भोजन जल्दी पच जाता है।

4. आँवला नवमी के दिन आँवले के पेड़ के नीचे बैठकर ही भोजन करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन भोजन करते समय यदि आपकी थाली में आँवला या उसका पत्ता गिरे तो यह बहुत ही शुभ संकेत होता है। माना जाता है कि इससे आप वर्ष भर स्वस्थ्य रहेंगे।

5. अक्षय नवमी को कार्तिक शुक्ल नवमी भी कहते हैं। इसी दिन द्वापर युग का भी आरम्भ हुआ था। इसके अतिरिक्त इस दिन भगवान विष्णु ने कुष्माँडक नामक असुर का वध किया था। तभी उसके रोम से कुष्माँड नामक बेल उत्पन्न हुई थी। इसलिए इस इस बेल का दान करने से बेहतर परिणाम मिलते है।

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शुभ दीपावली

हर साल दिवाली या दीपावली क्यों मनाई जाती है, महत्त्व व इतिहास (दिवाली क्यों मनाते हैं)

आने दिवाली कैसे मानते है, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि
दीपावली या दिवाली क्यों मनाई जाती है, इसके क्या कारण है? –
ये त्योहार हर वर्ष कार्तिक माह की अमावस्या के दिन आने वाला हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों का त्योहार है और हर धर्म का इस दिन के साथ खास महत्व जुड़ा हुआ है. साथ में ही दीपावली को मनाने के पीछे कई सारी कथाएं भी हैं:


लक्ष्मी मां का जन्मदिन– इस दिन मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था और उनका विवाह भी भगवान विष्णु से इसी दिन हुआ था. कहाँ जाता है कि हर साल इन दोनों की शादी का जश्न हर कोई अपने घरों को रोशन करके मनाता है.


लक्ष्मी मां को करवाया था रिहा– भगवान विष्णु के पांचवें अवतार ने कार्तिक अमावस्या के दिन मां लक्ष्मी को राजा बाली की जेल से छुड़वाया था और इसके चलते ही इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है.


जैन धर्म के लोगों के लिए विशेष दिन- जैन धर्म में पूजनीय और आधुनिक जैन धर्म के संस्थापक जिन्होने दीपावली के दिवस पर ही निर्वाण प्राप्त किया था और अपने धर्म के लिए इस दिन को महत्वपूर्ण बनाया.


सिक्खों के लिए विशेष दिन- इस दिन को सिक्ख धर्म के गुरु अमर दास ने रेड-लेटर डे के रूप में संस्थागत किया था, जिसके बाद से सभी सिख्क, अपने गुरु का आशीर्वाद इस दिन प्राप्त करते हैं. सन् 1577 में दीपावली के दिन ही अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की आधारशिला भी रखी गई थी.


पांडवों का वनवास हुआ था पूरा – महाभारत के अनुसार कार्तिक अमावस्या के दिन ही पांडवों का वनवास पूरा हुआ था और इनका बाराह साल का वनवास पूरा होने की खुशी में इनसे प्रेम करने वाले लोगों ने अपने घरों में दीये जलाए थे.


विक्रमादित्य का राज तिलक हुआ था- हमारे देश के महाराजा विक्रमादित्य जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य पर राज किया था, उनका राज तिलक भी इसी दिन किया गया था.


कृष्ण जी ने नरकासुर को मारा था- देवकी नंदन श्री कृष्ण ने नरकासूर राक्षस का वध भी दीपावली से एक दिन पूर्व किया था. जिसके बाद इस त्योहार को धूमधाम से मनाया गया था.


राम भगवान की घर वापसी की खुशी में – इस दिन भगवान राम जी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपना 14 साल का वनवास सफलता पूर्वक करके, अपने जन्म स्थान अयोध्या में लौटे थे. और इनके आने की खुशी में अयोध्या के निवासियों ने दीपावली अपने राज्य में मनाई थी. वहीं जब से लेकर अब तक हमारे देश में इस त्योहार को हर वर्ष मनाया जाता है.


फसलों का त्योहार – खरीफ फसल के समय ही ये त्योहार आता है और किसानों के लिए ये त्योहार समृद्धी का संकेत होता है और इस त्योहार को किसान उत्साह के साथ मनाते हैं.


हिंदू नव वर्ष का दिन – दीपावली के साथ ही हिंदू व्यवसायी का नया साल शुरू हो जाता है और व्यवसायी इस दिन अपने खातों की नई किताबें शुरू करते हैं, और नए साल को शुरू करने के पहले अपने सभी ऋणों का भुगतान करते हैं.


दीपावली का महत्व
दीपावली त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. और ये दिन लोगों को याद दिलाता है कि सच्चाई और भलाई की हमेशा ही जीत होती है.
धारणाओं के मुताबिक, इस दिन पटाखे फोड़ना शुभ होता है और इनकी आवाज पृथ्वी पर रहने वाले लोगों की खुशी को दर्शाती है, जिससे की देवताओं को उनकी भरपूर स्थिति के बारे में पता चलता है.

परंतु आज की स्थिति को देखते हुए पटाखे न जलाएं और अपने आस पास का पर्यावरण शुद्ध रखे

इस दिन लक्ष्मी मां की पूजा करना बहुत महत्वपूर्ण होता है और ऐसा माना जाता है कि अगर सच्चे मन से इस दिन मां की पूजा की जाए तो घर में पैसों की कमी नहीं होती है.
इस अवसर पर लोग उपहारों का आदान प्रदान करते हैं और मिठाई से एक दूसरे का मुंह मीठा करवाते हैं और ऐसा करने से उनके बीच में प्यार बना रहता है. ये त्योहार लोगों को आपस में जोड़कर रखने का भी कार्य करता है.


गणेश लक्ष्मी जी की मूर्ति खरीदते समय इन महत्वपूर्ण बातों का रखें ध्यान, गणेश जी की ऐसी मूर्ति न खरीदें।

दिवाली का पर्व हिंदू धर्म में विशेष माना गया है। दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है। मान्यता है कि दिवाली की रात शुभ मुहूर्त में विधि पूर्वक पूजा करने से लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रों में लक्ष्मी जी को धन की देवी बताया गया है। कलियुग में लक्ष्मी जी की पूजा वैभव प्रदान करने वाली मानी गई है। दिवाली यानि दिपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की भी पूजा की जाती है।

धनतेरस पर यदि गणेश-लक्ष्मी जी की मूर्ति खरीदने जा रहे हैं तो कुछ बातों पर विशेष ध्यान दें। कई बार सही जानकारी न होने के कारण व्यक्ति ऐसी मूर्ति खरीदकर घर ले आते हैं, जिससे वास्तु दोष या अन्य प्रकार की परेशानियां खडी हो जाती हैं इसलिए दिवाली पूजन पर गणेश लक्ष्मी जी की मूर्ति खरीदते समय इन बातों पर अवश्य ध्यान दें।

लक्ष्मी गणेश आपस में जुड़े हुए नहीं खरीदने चाहिए, इसे शुभ नहीं माना गया है. दोनों विग्रह अलग-अलग होना चाहिए।

लक्ष्मी जी का स्थान–
श्री गणेश जी के दाहिने हाथ की तरफ लक्ष्मी माता को बैठाना चाहिए। यानी स्वयं सामने से देखने पर गणेश जी लक्ष्मी जी के दाहिनी तरफ स्थापित होंगे।

गणेश जी की सूंड का रखें ध्यान–
गणपति जी की सूंड़ का भी बहुत महत्व है. गणपति की मूर्ति में उनकी सूंड उनके बाएं हाथ की तरफ मुड़ी होनी चाहिए. दाईं तरफ मुड़ी हुई सूंड तांत्रिक साधना हेतु उपयुक्त होती है. कई मूर्तियों में मैंने देखा है कि सूंड़ में दो घुमाव होते हैं ऐसी मूर्ति भी नहीं लेनी चाहिए।

मोदक वाली मूर्ति शुभ होती है–
मूर्ति खरीदते समय हमेशा गणेश जी के हाथ में मोदक होना जरूरी है। ऐसी मूर्ति सुख-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। यह मोदक बाएं हाथ में होना अति शुभ होता है। यानी गणेश जी की सूंड मोदक या लड्डू की ओर मुड़ी हुई होना बहुत शुभ होता है।

मूषक वाहन–
ध्यान रखना चाहिए कि गणेश जी का वाहन यानी मूषक की उपस्थिति भी बहुत अनिवार्य है।

कौन सी मूर्ति खरीदें–
आजकल वैसे बाजार में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां अधिक उपलब्ध हैं लेकिन मिट्टी की मूर्ति लेना ही शास्त्रसंमत है। यदि मिट्टी की अच्छी आकर्षक मूर्ति उपलब्ध हो तो उसको ही चुनना चाहिए।

लक्ष्मी जी की ऐसी मूर्ति न खरीदें–
लक्ष्मी मां की मूर्ति खरीदते समय ध्यान रखें कि कमल पर विराजित मूर्ति लें उल्लू पर सवारी करती हुई नहीं खरीदनी है। लक्ष्मी माता का हाथ वरद मुद्रा में हो और उस हाथ से धन की वर्षा हो रही हो।।आशीर्वाद देती मां की मूर्ति रहेगी तो जीवन में उनकी कृपा से दरिद्रता दूर रहेगी।

लक्ष्मी गणेश की ऐसी मूर्ति घर पर लाएं–
ऐसी मूर्ति नहीं लेनी चाहिए जिसमें लक्ष्मी गणेश जी खड़े हों। देवी देवता आराम से आसन ग्रहण करके आशीर्वाद दें ऐसे भाव वाली मूर्ति अच्छी होती है।


इस बार दिवाली पूजन के श्रेष्ठ मुहूर्त और सरल विधि –

दीपावली का पर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या तिथि को मनाया जाता है इस बार 4 नवम्बर बृहस्पतिवार को दीपावली पर्व मनाया जायेगा… दीपावली माता लक्ष्मी का प्राकट्य दिवस होने से इस दिन माता लक्ष्मी का विशेष पूजन कर घर की सुख समृद्धि की कामना की जाती है, इस दिन श्री गणेश लक्ष्मी का संयुक्त रूप से पूजन किया जाता है श्री गणेश जी प्रथम पूज्य होने के साथ साथ बुद्धि के भी देवता हैं अतः जीवन में प्राप्त हुआ धन और समृद्धि व्यक्ति के मष्तिष्क पर हावी ना हो और व्यक्ति धन का सदुपयोग कर पाये ऐसी ही सतबुद्धि की प्राप्ति की कामना से गणेश लक्ष्मी का संयुक्त पूजन किया जाता है… दीवाली के दिन संध्याकाल से सम्पूर्ण रात्रि कल तक माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर साक्षात् विचरण करती हैं तथा साफ स्वच्छ सुसज्जित और दीपों से प्रज्वलित स्थान से प्रसन्न होकर वहां प्रवेश करती हैं इसलिए इस दिन विशेष रूप से घर के मुख्य द्वार को सुसज्जित करके दीपों द्वारा प्रकाशित किया जाता है जिससे घर में माँ लक्ष्मी का आगमन हो दीपावली पर संध्या के समय घर के मुख्य द्वार को अवश्य खोलना चाहिए माँ लक्ष्मी के स्वागत और आगमन के लिए दीप प्रज्वलित करने चाहियें। दीवाली के दिन अपने व्यावसायिक स्थलों (ऑफिस, दुकान, फेक्ट्री, फर्म आदि) पर लक्ष्मी पूजन दिन में ही कर लेना चाहिए और संध्या के समय अपने घर पर पूरे परिवार के साथ लक्ष्मी पूजन करना चाहिए।


दीपावली पर किये जाने वाले पूजन के लिए स्थिर लग्न का सर्वाधिक महत्व होता है ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ और मंगल कार्यों के लिए विशेष रूप से स्थिर लग्न को सबसे अच्छा माना गया है इसलिए दिवाली पूजन भी स्थिर लग्न में ही करना चाहिए दीवाली पर स्थिर लग्न में किया गया लक्ष्मी पूजन जीवन में दीर्घकाल तक स्थिर समृद्धि प्रदान करता है


इस बार दिवाली पूजन के श्रेष्ठ मुहूर्त –
इस बार 4 नवम्बर दिवाली के दिन दोपहर 1:45 से 3 बजे के बीच भी स्थिर लग्न (कुम्भ) रहेगी इसलिए जिन लोगों को अपने ऑफिस, कार्यालय, दुकान, व्यवसाय स्थल, फैक्टरी आदि में दीवाली पूजन करना है उनके लिए ये समय श्रेष्ठ होगा… व्यवसाय स्थलों और कार्यालयों पर दोपहर 1:45 से 3 बजे के बीच स्थिर लग्न का श्रेष्ठ मुहूर्त होगा इसी समय में अपने व्यवसाय स्थलों में दीवाली पूजन करें। शाम को घर पर दीवाली पूजन के समय को देखें तो 4 नवम्बर को दीवाली के दिन शाम को 6:30 से शुरू होकर रात 8 बजे तक स्थिर लग्न (वृष) रहेगी और यही समय घर के दीवाली पूजन के लिए शुभ और श्रेष्ठ होगा। इसके अलावा जो लोग दीपावली पर विशेष साधना के लिए महानिशीथकाल में पूजा करते हैं उनके लिए दीवाली पर मध्यरात्रि रात्रि 12:35 बजे से 2:53 के बीच “सिंह लग्न” में साधना का विशेष समय होगा।

व्यवसाय स्थलों पर दीपावली पूजन का मुहूर्त – दोपहर 1:45 से 3 बजे के बीच श्रेष्ठ मुहूर्त होगा

घर पर दीपावली पूजन का मुहूर्त – शाम 6:30 से 8 बजे के बीच दीपावली पूजन का समय श्रेष्ठ मुहूर्त होगा


दिवाली पूजन की सरल विधि

सर्व प्रथम घर के पूजा स्थल को अच्छे से साफ और स्वच्छ करें फिर एक लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं और वस्त्र पर अक्षत अर्थात साबुत चावलों की एक परत बिछा दें और इस पर लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा को विराजमान करें यदि घर में लक्ष्मी गणेश का चाँदी का सिक्का और श्री यन्त्र भी हो तो उन्हें भी इसी आसान पर स्थापित करें पूजन के लिए फूल मिठाई खील बताशे आदि रखें। …… लक्ष्मी गणेश के पूजन के लिए घी का एक दीपक बनाये अन्य दीयों के किये सरसों के तेल का प्रयोग कर सकते हैं। ……….. अब सर्वप्रथम घी का दिया प्रज्वलित करें और इस मन्त्र से भगवन गणेश का ध्यान और आवाहन करें –

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभा निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

इसके बाद इस मंत्र से माता लक्ष्मी का आवाहन करें –

सर्वलोकस्य जननीं सर्वसौख्यप्रदायिनीम |
सर्वदेवमयीमीशां देवीमावाहयाम्यहम् ॥

इसके बाद लक्ष्मी गणेश का रोली से तिलक कर उन्हें पुष्प आदि समर्पित करें और फिर खील बताशे पुष्प, अक्षत और दक्षिणा हाथ में रखकर मन में संकल्प करें के हम दीवाली के इस पावन पर्व पर जीवन की समृद्धि की कामना करते हुए श्री लक्ष्मी गणेश का पूजन कर रहे हैं हमारे पूजन को माँ लक्ष्मी और गणेश जी स्वीकार करें और हमारे पूरे परिवार पर कृपा करें। ……. मन में ऐसा संकल्प करने के बाद हाथ में रखे खील बतेशे लक्ष्मी गणेश को समर्पित कर दें और फिर श्रध्दा से “श्री सूक्त” का पाठ करें और फिर लक्ष्मी माता की आरती गाएं फिर मिठाई और खील बताशे का भोग लक्ष्मी गणेश सहित सभी देवी देवताओं को समर्पित करें और प्रार्थना करें के लक्ष्मी गणेश सदैव हमारे घर में विराजमान रहें और हम पर कृपा बनाये रखें।…
इसके बाद जले हुए घी के दिए से बाकि अन्य सभी दीयों को प्रज्वलित करना चाहिए और घर के पूजास्थल सहित पूरे घर के सभी स्थानों पर दिए जलाने चाहियें विशेष रूप से घर के मुख्य द्वार, घर के ईशान कोण और तुलसी के समक्ष दिए अवश्य रखने चाहियें इसके बाद मिठाई और खील बताशों का प्रसाद सभी को ग्रहण करना चाहिए और बड़ों के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

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धनतेरस


उत्तरी भारत में कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन यह पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जाता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धन्वन्तरी का जन्म हुआ था। इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है।


इस बार धनतेरस 2 नवंबर को है


धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे, तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरी क्योंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं-कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनिया के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।
धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी प्रथा है। अगर सम्भव न हो तो कोई बर्तन खरीदें। इसके पीछे यह कारण माना जाता है, कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है, जो शीतलता प्रदान करता है, और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है, वह स्वस्थ है, सुखी है और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं, उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं।
धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आँगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे, जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई, तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा, उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दु:खी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहाँ किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी, और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये, और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।
विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया, और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुँचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे, उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परन्तु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे, उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की “हे यमराज ! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए ?” दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले, “हे दूत ! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है। इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूँ, सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।” यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।
धनवंतरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है। कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया। तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूँ तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान ली और भगवान विष्णु के साथ भूमंडल पर आ गयीं।
कुछ देर बाद एक जगह पर पहुँचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊँ तुम यहाँ ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए। लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं। उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।
एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो माँगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनन्द से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं।
विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इन्कार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है, यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठपूर्वक बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूँगा। तब लक्ष्मीजी ने कहा कि हे किसान तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूँ वैसा करो। कल तेरस है। तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सायंकाल मेरा पूजन करना और एक ताँबे के कलश में रुपए भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करूँगी। किन्तु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूँगी। इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊँगी। यह कहकर वह दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथनुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। इसी वजह से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी।


“पूजन विधि”

धनतेरस की पूजा दीपावली के पहले कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है साथ हीं यमराज के लिए घर के बाहर दीप जला कर रखा जाता है जिसे यम दीप कहते हैं। कहा जाता है की यमराज के लिए दीप जलने से अकाल मृत्यु का भय नष्ट हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन के बाद, धनवंतरी जी, अमृत के कलश हाथ मे धारणकिये हुए समुद्र से बाहर आए थे । इस कारण धनतेरस को धनवंतरी जयंती भी कहा जाता है। धनतेरस के इस शुभ दिन पर, देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है और प्रार्थना की जाती है कि भकजनों पर माँ हमेशा समृद्धि और सुख की वर्षा करते रहे । इस दिन भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की मूर्तियों भी बाजार से खरीदी जाती है जिसका पूजन दीवाली के दिन किया जाता है।
धनतेरस पूजा में सबसे पहले संध्या को यम दीप की पूजा की जाती है उसके बाद भगवान धन्वन्तरि की पूजा होती है और फिर गणेश लक्ष्मी की पूजा की जाती है।


यम दीप पूजन विधि

चौकी को धो कर सुखा लें। उस चौकी के बीचोंबीच रोली घोल कर 卐(स्वास्तिक या सतिया) बनायें। अब इस 卐(स्वास्तिक या सतिया) पर सरसों तेल का दीपक (गेहूँ के आटे से बना हुआ) जलायें। उस दीपक में छेद वाली कौड़ी को डाल दें। अब दीपक के चारों ओर गंगा जल से तीन बार छींटा दें। अब हाथ में रोली लें और रोली से दीपक पर तिलक लगायें। अब रोली पर चावल लगायें। अब दीपक के अंदर थोड़ी चीनी/शक्कर डाल दें। अब एक रुपए का सिक्का दीपक के अंदर डाल दें। दीपक पर फूल समर्पित करें। सभी उपस्थित जन दीपक को हाथ जोड़कर प्रणाम करें – “हे यमदेव हमारे घर पे अपनी दयादृष्टि बनाये रखना और परिवार के सभी सदस्यों की रक्षा करना।” फिर सभी सदस्यों को तिलक लगाएँ। अब दीपक को उठा कर घर के मुख्य दरवाजे के बाहर दाहिनी ओर रख दे (दीपक का लौ दक्षिण दिशा की ओर होनी चाहिए)।


धन्वन्तरि पूजन विधि

यम दीप की पूजा के बाद धन्वन्तरि पूजा की जाती है।
अब पूजा घर में बैठ कर धूप, दीप (घी का दिया मिट्टी की दिये में), अक्षत, चंदन और नैवेद्य के द्वारा भगवान धन्वन्तरि का पूजन करें। पूजन के बाद धन्वन्तरि के मंत्र का 108 बार जप करें:- “ॐ धं धन्वन्तरये नमः”
जाप के पूर्ण करने के बाद दोनों हाथों को जोड़कर प्रार्थना करें कि – “हे भगवान धन्वन्तरि ये जाप मैं आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। कृप्या हमें उत्तम स्वास्थ प्रदान करे।“
धन्वन्तरि की पूजा हो जाने पर अंत में लक्ष्मीजी का घी का दीपक जला कर पूजन करें ताकि श्रीलक्ष्मीजी की कृपा अदृश्य रूप में आपके घर परिवार पर वर्षभर बनी रहे।


आवश्यक सामग्री:-

एक आटे का दीपक,तीन मिट्टी के दीपक (धन्वन्तरि, यम और लक्ष्मी जी के लिये), बत्ती रूई की, सरसों का तेल/घी, माचिस, एक छेद वाली कौड़ी, फूल, चावल, रोली, गंगाजल, चम्मच, चीनी/शक्कर, आसन, मिठाई/नैवैद्य, धूप और धूपदान तथा एक चौकी।

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“गोपाष्टमी”

गोपाष्टमी, ब्रज में भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। गायों की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण जी का अतिप्रिय नाम ‘गोविन्द’ पड़ा। कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। इसी समय से अष्टमी को गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा, जो कि अब तक चला आ रहा है।
हिन्दू संस्कृति में गाय का विशेष स्थान हैं। माँ का दर्जा दिया जाता हैं क्योंकि जैसे एक माँ का ह्रदय कोमल होता हैं, वैसा ही गाय माता का होता हैं। जैसे एक माँ अपने बच्चो को हर स्थिति में सुख देती हैं, वैसे ही गाय भी मनुष्य जाति को लाभ प्रदान करती हैं।


विधि

गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गो-संवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं। गोपाष्टमी की पूजा विधि पूर्वक विद्वान पंडितो द्वारा संपन्न की जाती है। बाद में सभी प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोग गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ-रक्षा व गौ-संवर्धन का संकल्प करते हैं।
शास्त्रों में गोपाष्टमी पर्व पर गायों की विशेष पूजा करने का विधान निर्मित किया गया है। इसलिए कार्तिक माह की शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को प्रात:काल गौओं को स्नान कराकर, उन्हें सुसज्जित करके गन्ध पुष्पादि से उनका पूजन करना चाहिए। इसके पश्चात यदि संभव हो तो गायों के साथ कुछ दूर तक चलना चाहिए कहते हैं ऐसा करने से प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। गायों को भोजन कराना चाहिए तथा उनकी चरण को मस्तक पर लगाना चाहिए। ऐसा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है।

इस दिन गाय की पूजा की जाती हैं। सुबह जल्दी उठकर स्नान करके गाय के चरण-स्पर्श किये जाते हैं। सुबह गाय और उसके बछड़े को नहलाकर तैयार किया जाता है। उसका श्रृंगार किया जाता हैं, पैरों में घुंघरू बांधे जाते हैं, अन्य आभूषण पहनायें जाते हैं। गो-माता की परिक्रमा भी की जाती हैं। सुबह गायों की परिक्रमा कर उन्हें चराने बाहर ले जाते हैं। गौ माता के अंगो में मेहँदी, रोली, हल्दी आदि के थापे लगाये जाते हैं। गायों को सजाया जाता है, प्रातःकाल ही धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र और जल से गौ-माता की पूजा की जाती है, और आरती उतारी जाती है। पूजन के बाद गौ ग्रास निकाला जाता है, गौ-माता की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा के बाद गौओं के साथ कुछ दूर तक चला जाता है। कहते हैं ऎसा करने से प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। इस दिन ग्वालों को भी दान दिया जाता है। कई लोग इन्हें नये कपड़े दे कर तिलक लगाते हैं। शाम को जब गाय घर लौटती है, तब फिर उनकी पूजा की जाती है, उन्हें अच्छा भोजन दिया जाता है।


कथा

भगवान अब ‘पौगंण्ड-अवस्था’ में अर्थात छठे वर्ष में प्रवेश किया.एक दिन भगवान मैया से बोले – ‘मैया! अब हम बड़े हो गये है.मैया ने कहा- अच्छा लाला! तुम बड़े हो गये तो बताओ क्या करे?
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भगवान ने कहा- मैया अब हम बछड़े नहीं चरायेगे, अब हम गाये चरायेगे.मैया ने कहा- ठीक है! बाबा से पूँछ लेना. झट से भगवान बाबा से पूंछने गयेबाबा ने कहा– लाला!, तुम अभी बहुत छोटे हो, अभी बछड़े ही चराओ .
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भगवान बोले – बाबा मै तो गाये ही चराऊँगा.जब लाला नहीं माने तो बाबा ने कहा – ठीक है लाला!, जाओ पंडित जी को बुला लाओ, वे गौ-चारण का मुहूर्त देखकर बता देगे.
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भगवान झट से पंडितजी के पास गए बोले- पंडितजी! बाबा ने बुलाया है गौचारण का मुहूर्त देखना है आप आज ही का मुहूर्त निकल दीजियेगा, यदि आप ऐसा करोगेतो मै आप को बहुत सारा माखन दूँगा.
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पंडितजी घर आ गए पंचाग खोलकर बार-बार अंगुलियों पर गिनते.बाबा ने पूँछा-पंडित जी क्या बात है?आप बार-बार क्या गिन रहे है
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.पंडित जी ने कहा –क्या बताये, नंदबाबाजी, केवल आज ही का मुहूर्त निकल रहा है इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त है ही नहीं. बाबा ने गौ चारण की स्वीकृति दे दी .
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भगवान जिस समय, जो काम करे, वही मुहूर्त बन जाता है उसी दिन भगवान ने गौ चारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक-माह का“गोपा-अष्टमी”का दिन था.
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अब भगवान अपने सखाओ के साथ गौए चराते हुए वृन्दावन में जाते औरअपने चरणों से वृन्दावन को अत्यंत पावन करते.आगे-आगे गौएँ उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर, बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल,नित्य प्रति वन को जाते.



विशेष

1. इस दिन गाय को हरा चारा खिलाएँ।
2. जिनके घरों में गाय नहीं है वे लोग गौशाला जाकर गाय की पूजा करें।
3. गंगा जल, फूल चढाये, दिया जलाकर गुड़ खिलाये।
4. गाय को तिलक लगायें, भजन करें, गोपाल (कृष्ण) की पूजा भी करें, सामान्यतः लोग अपनी सामर्थ्यानुसार गौशाला में खाना और अन्य समान का दान भी करते हैं।

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भाई दूज

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाये जाने वाले इस पर्व को “यम द्वितीया” के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली के दुसरे दिन मनाये जाने वाले इस पर्व में मृत्यु के देवता यमराज की पूजा होती है। इस दिन बहने अपने भाइयों को अपने घर आमंत्रित करती हैं, और उन्हें तिलक करती हैं। ऐसा माना जाता है कि जो भाई इस दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से अपनी बहन का आतिथ्य स्वीकार करता है, तो उसे और उसकी बहन को यम का भय नही रहता।


“महत्त्व”

ये पर्व भाई के प्रति बहन के स्नेह का प्रतिक होता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के लिए खुशहाली की कामना करती हैं, साथ ही उनके उज्जवल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार यमी (यमुना) अपने भाई यम से मिलने के लिए व्याकुल थीं, तो आज ही के दिन यमदेव ने अपनी बहन यमी को दर्शन दिए थे। साथ ही यमराज ने अपनी बहन को वरदान दिया, कि इस दिन जो भाई बहन यमुना नदी में स्नान करेंगें, उन्हें मुक्ति मिल जाएगी। इसीलिए इस दिन भाई और बहन का यमुना में नहाने का भी विशेष महत्व माना जाता है। इसके अलावा यमी ने अपने भाई से एक वचन ये भी लिया, कि जिस प्रकार यम उनके घर आये हैं, उसी प्रकार आज के दिन हर भाई अपनी बहन के पास जाए। वस्तुतः इस पर्व का मुख्य उद्देश्य भाई और बहन के बीच सौमनस्य और सदभावना का पावन प्रवाह है।
इसके अलावा इस दिन कायस्थ समाज के लोग अपने आराध्य देव चित्रगुप्त की पूजा करते हैं। कायस्थलोग स्वर्ग में धर्मराज का लेखा-जोखा रखने वाले चित्रगुप्त का पूजन सामूहिक रूप से तस्वीरों और मूर्तियों के माध्यम से करते है, साथ ही वे इस दिन अपने सभी बहीखातों की भी पूजा करते हैं। चित्रगुप्त ब्रह्मा के पुत्र है, ये पृथ्वीवासियों के पापों और पुण्यों का लेखा-जोखा रखते हैं। इनकी पूजा को दोपहर में करना सबसे अधिक शुभ माना जाता है।
इस दिन बेरी पूजन और गोधन कूटने की भी प्रथा को मनाया जाता है। जिसमे गोबर से मानव मूर्ति का निर्माण किया जाता है, और उसकी छाती पर ईट रख कर स्त्रियाँ उसे मुसली से तोडती हैं।

मुहूर्त

भाईदूज का त्योहार कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है. भाई दूज का शुभ मुहूर्त 6 नवंबर भाई दूज तिलक का समय : सुबह 7.30 से 9 AM दोपहर 01 बजकर 30 मिनट से लेकर 04 बजकर 25 मिनट तक शुभसमय रहेगा ।

सुबह 9 AM से 10.30 AM तक राहू काल रहेगा यह समय तिलक का मुहूर्त नही है।


“विधि”

इस पर्व पर भाई अपनी बहनों के घर जाते हैं, माना जाता है कि ऐसा करने से दोनों को धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और सुख कि प्राप्ति होती है। इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों को एक उचित आसन पर बैठाती हैं, फिर वे उनकी धुप से आरती उतारती हैं, इसके बाद उनके माथे पर रोली और चावल से तिलक करती हैं। साथ ही बहने अपने भाइयों को फूलों का हार भी पहनती हैं। इसके बाद वे स्वयं अपने हाथ से अपने भाई की पसंद का खाना बनती हैं, और उन्हें खिलाती हैं। इस पर्व पर भाई अपनी बहनों के घर जाते है, माना जाता है कि ऐसा करने से दोनों को धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और सुख कि प्राप्ति होती है। इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों को एक उचित आसन पर बैठाती हैं, फिर वे उनकी धूप से आरती उतारती है, इसके बाद उनके माथे पर रोली और चावल से तिलक करती है। साथ ही बहनें अपने भाइयों को फूलो का हार भी पहनती हैं। इसके बाद वे स्वयं अपने हाथ से अपने भाई की पसंद का खाना बनती हैं, और उन्हें खिलाती हैं।


“व्रत कथा”

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान सूर्य नारायण जी की पत्नी संज्ञा अपने पति सूर्य का तेज सहन न कर पाने के कारण अपनी छायामूर्ति का निर्माण करती है, और छाया को अपनी संतानों यमराज और यमी को सौप कर चली जाती हैं। छाया को यमराज और यमी से कोई स्नेह नही था, किन्तु दोनों भाई बहनों में विशेष स्नेह था। बड़े होने पर भी यमी अपने भाई के घर जाती और उनका सुख दुःख पूछती, साथ ही वो अपने भाई यमराज से बार-बार अपने घर आने का निवदेन करती थी, किन्तु अपने कार्यो में व्यस्त होने की वजह से यमराज उनके निवेदन को टालते रहे। इस दिन भी यमुना ने यमराज को अपने घर भोजन का निमंत्रण दिया और उनसे वचन ले लिया कि वो अपने मित्रो के साथ इस बार जरुर आयेंगे। यमराज ने भी सोच विचार किया और देखा कि वो सबके प्राणों को हरते है, तो कोई भी उन्हें अपने पास बुलाना नही चाहता, किन्तु उनकी बहन बार-बार उनको सदभावना से बुला रही है, तो उनका ये धर्म बनता है, कि वो अपनी बहन के पास जायें। तब वो अपनी बहन के घर गये, यमुना का अपने भाई को देखकर ख़ुशी का ठिकाना नही रहा। उसने स्नान करके स्वयं अपने हाथों से अपने भाई की पसंद के पकवान बनायें और स्वयं ही उन्हें परोसा। अपनी बहन के आतिथ्य को देख कर यमराज भी बहुत प्रसंन्न हुए, और उन्होंने यमुना से कोई वरदान मांगने के लिए कहा। इस पर यमुना ने बड़े ही प्यार से अपने भाई को कहा कि भाई ! आप हर वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो, और मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई का सादर सत्कार करे, और उसका टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। इस पर यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य आभूषण दिए और वापस यमलोक लौट गये। इसी दिन से भाई दूज के व्रत की परंपरा बन गई। इसीलिए भाई दूज के दिन यमराज और यमुना का पूजन किया जाता है।
इस दिन के पीछे एक कथा ये भी है, कि इससे पहले वाले दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था, और इस दिन वो अपनी बहन सुभद्रा के पास गये थे। तब सुभद्रा ने अपने भाई श्री कृष्ण का तिलक करके उनका स्वागत किया था, और उनके लिए उनकी पसंद के पकवान भी बनाये थे।

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गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट मोहोत्सव

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। यहां जानिए गोवर्धन पूजा की सरल विधि-


“पूजन विधि”

गोवर्धन पूजा का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन सुबह शरीर पर तेल की मालिश करके स्नान करना चाहिए। फिर घर के द्वार पर गोबर से प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत बनाएं। इस पर्वत के बीच में पास में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति रख दें। अब गोवर्धन पर्वत व भगवान श्रीकृष्ण को विभिन्न प्रकार के पकवानों व मिष्ठानों का भोग लगाएं। साथ ही देवराज इंद्र, वरुण, अग्नि और राजा बलि की भी पूजा करें। पूजा के बाद कथा सुनें। प्रसाद के रूप में दही व चीनी का मिश्रण सब में बांट दें। इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन करवाकर उसे दान-दक्षिणा देकर प्रसन्न करें।


गोवर्धन पूजा मुहूर्त
शुक्रवार, नवम्बर 5, 2021 को
प्रातःकाल मुहूर्त – 06:36 से 08:47 तक
(अवधि – 02 घण्टे 11 मिनट)

गोवर्धन पूजा सायाह्नकाल मुहूर्त – शाम 03:22 से 05:33 तक
(अवधि – 02 घण्टे 11 मिनट)
प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 05, 2021 को 02:44am
प्रतिपदा तिथि समाप्त – नवम्बर 05, 2021 को 11:14 बजे सुबह तक


“कथा”

एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं, गोप-ग्वालों के साथ गाएं चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि नाच-गाकर खुशियां मनाई जा रही हैं। जब श्रीकृष्ण ने इसका कारण पूछा तो गोपियों ने कहा- आज मेघ व देवों के स्वामी इंद्र का पूजन होगा। पूजन से प्रसन्न होकर वे वर्षा करते हैं, जिससे अन्न पैदा होता है तथा ब्रजवासियों का भरण-पोषण होता है। तब श्रीकृष्ण बोले- इंद्र में क्या शक्ति है? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है। इसी के कारण वर्षा होती है। हमें इंद्र से भी बलवान गोवर्धन की ही पूजा करना चाहिए। तब सभी श्रीकृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। यह बात जाकर नारद ने देवराज इंद्र को बता दी। यह सुनकर इंद्र को बहुत क्रोध आया। इंद्र ने मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर मूसलधार बारिश करें। बारिश से भयभीत होकर सभी गोप-ग्वाले श्रीकृष्ण की शरण में गए और रक्षा की प्रार्थना करने लगे। गोप-गोपियों की पुकार सुनकर श्रीकृष्ण बोले- तुम सब गोवर्धन-पर्वत की शरण में चलो। वह सब की रक्षा करेंगे। सब गोप-ग्वाले पशुधन सहित गोवर्धन की तराई में आ गए। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी उंगली पर उठाकर छाते-सा तान दिया। गोप-ग्वाले सात दिन तक उसी की छाया में रहकर अतिवृष्टि से बच गए। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक जल की एक बूंद भी नहीं पड़ी। यह चमत्कार देखकर ब्रह्माजी द्वारा श्रीकृष्णावतार की बात जान कर इंद्रदेव अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करते हुए कृष्ण से क्षमा याचना करने लगे। श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन को नीचे रखा और ब्रजवासियों से कहा कि- अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो। तभी से यह पर्व गोवर्धन पूजा के रूप में प्रचलित है।


“महत्व”

हमारे कृषि प्रधान देश में गोवर्धन पूजा जैसे प्रेरणाप्रद पर्व की अत्यंत आवश्यकता है। इसके पीछे एक महान संदेश पृथ्वी और गाय दोनों की उन्नति तथा विकास की ओर ध्यान देना और उनके संवर्धन के लिए सदा प्रयत्नशील होना छिपा है। अन्नकूट का महोत्सव भी गोवर्धन पूजा के दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। यह ब्रजवासियों का मुख्य त्योहार है। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा का पर्व यूं तो अति प्राचीनकाल से मनाया जाता रहा है, लेकिन आज जो विधान मौजूद है वह भगवान श्रीकृष्ण के इस धरा पर अवतरित होने के बाद द्वापर युग से आरंभ हुआ है। उस समय जहां वर्षा के देवता इंद्र की ही उस दिन पूजा की जाती थी, वहीं अब गोवर्धन पूजा भी प्रचलन में आ गई है। धर्मग्रंथों में इस दिन इंद्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं की पूजा करने का उल्लेख मिलता है। ये पूजन पशुधन व अन्न आदि के भंडार के लिए किया जाता है। बालखिल्य ऋषि का कहना है कि अन्नकूट और गोवर्धन उत्सव श्रीविष्णु भगवान की प्रसन्नता के लिए मनाना चाहिए। इन पर्वों से गायों का कल्याण होता है, पुत्र, पौत्रादि संततियां प्राप्त होती हैं, ऐश्वर्य और सुख प्राप्त होता है। कार्तिक के महीने में जो कुछ भी जप, होम, अर्चन किया जाता है, इन सबकी फल प्राप्ति हेतु गोवर्धन पूजन अवश्य करना चाहिए।


“गोवर्धनपूजा” (अन्नकूट महोत्सव) “गो संवर्द्धन” सप्ताह प्रारंभ के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ”.!!

जय गोवर्धन गिरिधारी, हम आए शरण तिहारी.।

दीपवाली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपक्ष को गोवर्धन पूजा की जाती है।

इस पर्व पर गाय के गोबर से गोवर्धन की तथा श्रीकृष्ण की आकृति बना उसके चारों तरफ गाय, बछड़ों के साथ श्रद्धा पूर्वक पूजा की जाती है।

इस दिन छप्पन प्रकार की सब्जियों द्वारा निर्मित अन्नकूट एवं दही-बेसन की कढ़ी द्वारा गोवर्धन का पूजन एवं भोग लगाया जाता है।

कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत में यह पर्व हमें मुख्यतः गाय, पहाड़, पेड़-पौधों, ऊर्जा के रूप में गोबर व अन्न की महत्ता बताता हैै।

गाय माता को देवी लक्ष्मी का प्रतीक मानकर लक्ष्मी पूजा के साथ गौ-पूजा की भी अपने देश में परम्परा रही है।

द्वापरकाल में अपने बाल्य काल में श्री कृष्ण ने नन्दबाबा, यशोदा मैया व अन्य ब्रजवासियों को बादलों के स्वामी इन्द्र की पूजा करते हुए देखा ताकि इंद्र देवता वर्षा करें और उनकी फसलें लहलहायें व वे सुख- समृद्धि की ओर अग्रसर हों।

श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि वर्षा का जल हमें गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होता है न कि इंद्र की कृपा से।
इससे सहमत होकर ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा आरम्भ कर दी।

श्रीकृष्ण ब्रजवासियों को इस बात का विश्वास दिलाने के लिए कि गोवर्धन जी उनकी पूजा से प्रसन्न हैं, पर्वत के अंदर प्रवेश कर गए व सारी समाग्रियों को ग्रहण कर लिया और अपने दूसरे स्वरूप में ब्रजवासियों के साथ खड़े होकर कहा:-

“देखो! गोवर्धन देवता प्रसन्न होकर भोग लगा रहे हैं, अतः उन्हें और सामाग्री लाकर चढ़ाएं”।

इंद्र को जब अपनी पूजा बंद होने की बात पता चली तो उसने अपने संवर्तक मेघों को आदेश दिया कि वे ब्रज को पूरा डुबो दें।

भारी वर्षा से घबराकर जब ब्रजवासी श्रीकृष्ण के पास पहुँचे तो उन्होंनेे उनके दुखों का निवारण करने हेतु अपनी तर्जनी पर पूरे गोवर्धन पर्वत को ही उठा लिया।
पूरे सात दिनों तक वर्षा होती रही पर ब्रजवासी गोवर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे।
सुदर्शन चक्र ने संवर्तक मेघों के जल को सुखा दिया।

अंततः पराजित होकर इंद्र श्रीकृष्ण के पास आए और क्षमा मांगी।

उस समय सुरभि गाय ने श्रीकृष्ण का दुग्धाभिषेक किया और इस अवसर पर ब्रजवासियों ने छप्पन भोग का भी आयोजन किया गया।

तब से भारतीय संस्कृति में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परम्परा चली आ रही है।
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अन्नकूट पूजा करो, गोवर्धन है आज,
गोरक्षा से सबल हो, पूरा देश समाज।

श्रीकृष्ण ने कर दिया, माँ का ऊँचा भाल,
सेवा करके गाय की, कहलाये गोपाल।

गौमाता से ही मिले, दूध-दही, नवनीत,
सबको होनी चाहिए, गौमाता से प्रीत।

गइया के घी-दूध से, बढ़ जाता है ज्ञान,
दुग्धपान करके बने, नौनिहाल बलवान।

कैमीकल का उर्वरक, कर देगा बरबाद,
फसलों में डालो सदा, गोबर की ही खाद।

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अहोई अष्टमी 2021

करवा चौथ के चार दिन बाद अहोई अष्टमी का त्योहार आता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान के जीवन में हमेशा सुख और समृद्धि बनाए रखने के लिए करती हैं। नि:संतान महिलाएं बच्चे की कामना में अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। करवा चौथ की तरह ही अहोई अष्टमी का व्रत भी उत्तर भारत में काफी प्रसिद्ध है। इस दिन माताएं माता पार्वती के अहोई स्वरूप की अराधना करती हैं और अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए पूरे दिन निर्जल उपवास करती हैं। शाम के समय आकाश में तारे देखने और अर्घ्य देने के बाद महिलाएं व्रत पारण करती हैं।


जानिए इस व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और आरती…

अहोई अष्टमी पूजा का मुहूर्त:

अहोई अष्टमी का व्रत 28 अक्टूबर 2021 को बृहस्पतिवार के दिन किया जाएगा
अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त – 05:39 PM से 06:56 PM
अवधि – 01 घण्टा 17 मिनट
गोवर्धन राधा कुण्ड स्नान बृहस्पतिवार, अक्टूबर 28, 2021 को
तारों को देखने के लिए सांझ का समय – 06:03 PM
अहोई अष्टमी के दिन चन्द्रोदय समय – 11:29 PM


पूजा विधि: इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर घर के मंदिर की दीवार पर गेरू और चावल से अहोई माता और स्याहु व उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं। आप चाहें तो इस पूजा के लिए मार्केट से लाए गए पोस्टर का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। अब एक मटके में पानी भरकर, उस पर हल्दी से स्वास्तिक बनाएं और मटके को ढक दें। अब ढक्कन पर सिंघाड़े रखें।

फिर सभी महिलाओं के साथ मिलकर अहोई माता का पूजन करें और व्रत कथा पढ़ें। सभी महिलाओं के लिए एक-एक स्वच्छ कपड़ा भी रखें। कथा के बाद इस कपड़े को उन महिलाओं को भेंट कर दें। रात के समय सितारों को जल से अर्घ्य दें और बाद में उपवास को तोड़ें।


अहोई अष्‍टमी व्रत कथा- एक साहूकार के 7 बेटे थे और एक बेटी थी. साहूकार ने अपने सातों बेटों और एक बेटी की शादी कर दी थी. अब उसके घर में सात बेटों के साथ सात बहुएं भी थीं.

साहूकार की बेटी दिवाली पर अपने ससुराल से मायके आई थी. दिवाली पर घर को लीपना था, इसलिए सारी बहुएं जंगल से मिट्टी लेने गईं. ये देखकर ससुराल से मायके आई साहुकार की बेटी भी उनके साथ चल पड़ी.

साहूकार की बेटी जहां मिट्टी काट रही थी, उस स्थान पर स्याहु (साही) अपने साथ बेटों से साथ रहती थी. मिट्टी काटते हुए गलती से साहूकार की बेटीकी खुरपी के चोट से स्याहु का एक बच्चा मर गया. इस पर क्रोधित होकर स्याहु ने कहा कि मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी.

स्याहु के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभियों से एक-एक कर विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें. सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है. इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते हैं, वे सात दिन बाद मर जाते हैं सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा. पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी.

सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और छोटी बहु से पूछती है कि तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है और वह उससे क्या चाहती है? जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मुझ से मांग ले. साहूकार की बहु ने कहा कि स्याहु माता ने मेरी कोख बांध दी है, जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते हैं. यदि आप मेरी कोख खुलवा देतो मैं आपका उपकार मानूंगी. गाय माता ने उसकी बात मान ली और उसे साथ लेकर सात समुद्र पार स्याहु माता के पास ले चली.

रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं. अचानक साहूकार की छोटी बहू की नजर एक ओर जाती हैं, वह देखती है कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है. इतने में गरूड़ पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहू ने उसके बच्चे को मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है. छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है. गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है.

वहां छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करती है. स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहू होने का आशीर्वाद देती है. स्याहु छोटी बहू को सात पुत्र और सात पुत्रवधुओं का आर्शीवाद देती है और कहती है कि घर जाने पर तू अहोई माता का उद्यापन करना. सात-सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना. उसने घर लौट कर देखा तो उसके सात बेटे और सात बहुएं बेटी हुईं मिली. वह ख़ुशी के मारे भाव-भिवोर हो गई. उसने सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देकर उद्यापन किया.

अहोई का अर्थ एक यह भी होता है ‘अनहोनी को होनी बनाना.’ जैसे साहूकार की छोटी बहू ने कर दिखाया था. जिस तरह अहोई माता ने उस साहूकार की बहु की कोख को खोल दिया, उसी प्रकार इस व्रत को करने वाली सभी नारियों की अभिलाषा पूर्ण करें.


“राधा कुंड की मान्यता और इसकी कथा”


“अहोई अष्टमी पर राधा कुंड में स्नान से होती है संतान की प्राप्ति”

भगवान श्री कृष्ण की नगरी मथुरा में गोवर्धन गिरधारी की परिक्रमा के मार्ग में एक चमत्कारी कुंड पड़ता है जिसे राधा कुंड के नाम से जाना जाता है। इस कुंड के बारे में मान्यता है कि नि:संतान दंपत्ति कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि को यहां दंपत्ति एक साथ स्नान करते हैं तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो जाती है।

अहोई अष्टमी का यह पर्व यहां पर प्राचीनकाल से मनाया जाता है। इस दिन पति और पत्नी दोनों ही निर्जला व्रत रखते हैं और मध्य रात्रि में राधाकुंड में डूबकी लगाते हैं तो ऐसा करने पर उस दंपत्ति के घर में बच्चे की किलकारियां शीघ्र ही गूंज उठती है।

इतना ही नहीं जिन दंपत्तियों की संतान की मनोकामना पूर्ण हो जाती है वह भी अहोई अष्टमी के दिन अपनी संतान के साथ यहां राधा रानी की शरण में हाजरी लगाने आता है। माना जाता है कि यह प्रथा द्वापर युग से चली आ रही है।


“राधा कुंड की कथा”

इस प्रथा से जुड़ी एक कथा का पुराणों में भी वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है –

जिस समय कंस ने भगवान श्री कृष्ण का वध करने के लिए अरिष्टासुर नामक दैत्य को भेजा था उस समय अरिष्टासुर गाय के बछड़े का रूप लेकर श्री कृष्ण की गायों के बीच में शामिल हो गया और उन्हें मारने के लिए आया। भगवान श्री कृष्ण ने उस दैत्य को पहचान लिया। इसके बाद श्री कृष्ण ने उस दैत्य को पकड़कर जमीन पर फैंक दिया और उसका वध कर दिया।

यह देखकर राधा जी ने श्री कृष्ण से कहा कि उन्हें गौ हत्या का पाप लग गया है। इस पाप से मुक्ति के लिए उन्हें सभी तीर्थों के दर्शन करने चाहिएं। राधा जी की बात सुनकर श्री कृष्ण ने नारद जी से इस समस्या के समाधान के लिए उपाय मांगा। देवर्षि नारद ने उन्हें उपाय बताया कि सभी तीर्थों का आह्वाहन करके उन्हें जल रूप में बुलाएं और उन सभी तीर्थों के जल को एक साथ मिलाकर स्नान करें जिससे उन्हें गौ हत्या के पाप से मुक्ति मिल जाएगी।

नारद जी के कहने पर श्री कृष्ण ने एक कुंड में सभी तीर्थों के जल को आमंत्रित किया और कुंड में स्नान करके पाप मुक्त हो गए। इस कुंड को कृष्णकुंड कहा जाता है जिसमें स्नान करके श्री कृष्ण गौ हत्या के पाप से मुक्त हुए थे। माना जाता है कि इस कुंड का निर्माण श्री कृष्ण ने अपनी बांसुरी से किया था। नारद जी के कहने पर ही श्री कृष्ण ने यह कुंड अपनी बांसुरी से खोदा था और सभी तीर्थों से उस कुंड में आने की प्रार्थना की जिसके बाद सभी तीर्थ उस कुंड में आ गए।

इसके बाद श्री कृष्ण के कुंड को देखकर राधा जी ने भी अपने कंगन से एक कुंड खोदा । जब श्री कृष्ण ने उस कुंड को देखा तो उसमें प्रतिदिन स्नान करने और उनके द्वारा बनाए गए कुंड से भी अधिक प्रसिद्ध होने का वरदान दिया जिसके बाद यह कुंड राधाकुंड के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

पुराणों के अनुसार अहोई अष्टमी तिथि के दिन ही इन कुंडो का निर्माण हुआ था जिसके कारण अहोई अष्टमी पर इस कुंड में स्नान करने का विशेष महत्व है। कृष्णकुंड और राधाकुंड की अपनी-अपनी विशेषता है। कृष्णकुंड का जल दूर से देखने पर काला और राधाकुंड का जल दूर से देखने पर सफेद दिखता है।

जय जय श्री राधे कृष्णा

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कार्तिक माह 2021

कार्तिक मास कब से कब तक है ?

इस साल कार्तिक माह की शुरुआत 21 अक्टूबर 2021 से प्रारंभ हो रही है. ये 19 नंवबर तक रहेगा


कार्तिक मास में तुलसी की महिमा

ब्रह्मा जी कहे हैं कि कार्तिक मास में जो भक्त प्रातः काल स्नान करके पवित्र हो कोमल तुलसी दल से भगवान् दामोदर की पूजा करते हैं, वह निश्चय ही मोक्ष पाते हैं। पूर्वकाल में भक्त विष्णुदास भक्तिपूर्वक तुलसी पूजन से शीघ्र ही भगवान् के धाम को चला गया और राजा चोल उसकी तुलना में गौण हो गए। तुलसी से भगवान् की पूजा, पाप का नाश और पुण्य की वृद्धि करने वाली है। अपनी लगाई हुई तुलसी जितना ही अपने मूल का विस्तार करती है, उतने ही सहस्रयुगों तक मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित रहता है। यदि कोई तुलसी संयुत जल में स्नान करता है तो वह पापमुक्त हो आनन्द का अनुभव करता है। जिसके घर में तुलसी का पौधा विद्यमान है, उसका घर तीर्थ के समान है, वहाँ यमराज के दूत नहीं जाते। जो मनुष्य तुलसी काष्ठ संयुक्त गंध धारण करता है, क्रियामाण पाप उसके शरीर का स्पर्श नहीं करते। जहाँ तुलसी वन की छाया हो वहीं पर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिसके कान में, मुख में और मस्तक पर तुलसी का पत्ता दिखाई देता है, उसके ऊपर यमराज दृष्टि नहीं डाल सकते।


प्राचीन काल में हरिमेधा और सुमेधा नामक दो ब्राह्मण थे। वह जाते-जाते किसी दुर्गम वन में परिश्रम से व्याकुल हो गए, वहाँ उन्होंने एक स्थान पर तुलसी दल देखा। सुमेधा ने तुलसी का महान् वन देखकर उसकी परिक्रमा की और भक्ति पूर्वक प्रणाम किया। यह देख हरिमेधा ने पूछा कि ‘तुमने अन्य सभी देवताओं व तीर्थ-व्रतों के रहते तुलसी वन को प्रणाम क्यों किया ?’ तो सुमेधा ने बताया कि ‘प्राचीन काल में जब दुर्वासा के शाप से इन्द्र का ऐश्वर्य छिन गया तब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मन्थन किया तो धनवंतरि रूप भगवान् श्री हरि और दिव्य औषधियाँ प्रकट हुईं।

उन दिव्य औषधियों में मण्डलाकार तुलसी उत्पन्न हुई, जिसे ब्रह्मा आदि देवताओं ने श्री हरि को समर्पित किया और भगवान् ने उसे ग्रहण कर लिया। भगवान् नारायण संसार के रक्षक और तुलसी उनकी प्रियतमा है। इसलिए मैंने उन्हें प्रणाम किया है।’
सुमेधा इस प्रकार कह ही रहे थे कि सूर्य के समान अत्यंत तेजस्वी विशाल विमान उनके निकट उतरा। उन दोनों के समक्ष वहाँ एक बरगद का वृक्ष गिर पड़ा और उसमें से दो दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उन दोनों ने हरिमेधा और सुमेधा को प्रणाम किया। दोनों ब्राह्मणों ने उनसे पूछा कि आप कौन हैं ? तब उनमें से जो बड़ा था वह बोला, मेरा नाम आस्तिक है।

एक दिन मैं नन्दन वन में पर्वत पर क्रीड़ा करने गया था तो देवांगनाओं ने मेरे साथ इच्छानुसार विहार किया। उस समय उन युवतियों के हार के मोती टूटकर तपस्या करते हुए लोमश ऋषि पर गिर पड़े। यह देखकर मुनि को क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि स्त्रियाँ तो परतंत्र होती हैं। अत: यह उनका अपराध नहीं, दुराचारी आस्तिक ही शाप के योग्य है।

ऐसा सोचकर उन्होंने मुझे शापित किया – “अरे तू ब्रह्म राक्षस होकर बरगद के पेड़ पर निवास कर।” जब मैंने विनती से उन्हें प्रसन्न किया तो उन्होंने शाप से मुक्ति की विधि सुनिश्चित कर दी कि जब तू किसी ब्राह्मण के मुख से तुलसी दल की महिमा सुनेगा तो तत्काल तुझे उत्तम मोक्ष प्राप्त होगा। इस प्रकार मुक्ति का शाप पाकर मैं चिरकाल से इस वट वृक्ष पर निवास कर रहा था। आज दैववश आपके दर्शन से मेरा छुटकारा हुआ है।
तत्पश्चात् वे दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण परस्पर पुण्यमयी तुलसी की प्रशंसा करते हुए तीर्थ यात्रा को चल दिए। इसलिए भगवान् विष्णु को प्रसन्नता देने वाले इस कार्तिक मास में तुलसी की पूजा अवश्य करनी चाहिए।


तुलसी विवाह की विधि व महत्व

कार्तिक शुक्ला नवमी को द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। इस तिथि को नवमी से एकादशी तक मनुष्य शास्त्रोक्त विधि से तुलसी विवाह का उत्सव करें तो उसे कन्यादान का फल होता है। पूर्वकाल में कनक की पुत्री किशोरी ने एकादशी के दिन संध्या के समय तुलसी की वैवाहिक विधि संपन्न की थी इससे वह वैधव्य दोष से मुक्त हो गई थी। अब तुलसी विवाह की विधि सुनिये-
एक तोला स्वर्ण की भगवान् विष्णु की प्रतिमा बनवाएँ या अपनी शक्ति के अनुसार आधे या चौथाई तोले की बनवाएँ अथवा यह भी न होने पर उसे अन्य धातुओं के सम्मिश्रण से ही बनवाएँ। फिर तुलसी और भगवान् विष्णु की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करके स्तुति आदि के द्वारा भगवान् को निन्द्रा से जगावें। फिर पुरुष सूक्त से व घोडशोपचार से पूजा करें। पहले देशकाल स्मरण करके गणेश पूजन करे, फिर पुण्याह वाचन करके वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए बाजे आदि की ध्वनि से भगवान् विष्णु की प्रतिमा को तुलसी के निकट लाकर रख दें। प्रतिमा को सुंदर वस्त्रों व अलंकारों सजाए रहें उसी समय भगवान् का आह्वान इस मंत्र से करें-

आगच्छ भगवत् देव अर्चयिष्यामि केशव।
तुभ्यं दासयामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव॥

अर्थात्-हे भगवान् केशव ! आइए देव, मैं आपकी पूजा करूँगा, आपकी सेवा में तुलसी को समर्पित करूँगा आप मेरे सब मनोरथों को पूर्ण करें। इस प्रकार आह्वान के बाद तीन-तीन बार अर्ध्य, पाद्य और विष्टर का उच्चारण करके इन्हें भी भगवान् को समर्पित कर दे।

तत्पश्चात् काँसे के पात्र में दही, घी और शहद रखकर उसे कांसे के ढक्कन से ढककर भगवान् को अर्पण करते हुए इस प्रकार कहें- ‘हे वासुदेव, आपको नमस्कार है। यह मधुपर्क ग्रहण कीजिए।’ तब दोनों को एक-दूसरे के समक्ष रखकर मंगल पाठ करें। इस प्रकार गोधूलि बेला में जब भगवान् सूर्य कुछ-कुछ दिखाई दे रहे हों, तब कन्यादान का संकल्प करें और भगवान् से यह प्रार्थना करें- “आदि, मध्य और अंत से रहित त्रिभुवन प्रतिपालक परमेश्वर ! इस तुलसी को आप विवाह की विधि से ग्रहण करें।

यह पार्वती के बीज से प्रकट हुई है, वृंदावन की भस्म में स्थित रही है तथा आदि, मध्य और अंत में शून्य है। आपको तुलसी अत्यंत प्रिय है अतः इसे मैं आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। मैंने जल के घड़ों से सींचकर और अन्य सभी प्रकार की सेवाएँ करके, अपनी पुत्री की भाँति इसे पाला-पोसा है, बढ़ाया है और आपकी तुलसी आपको ही दे रहा हूँ।

हे प्रभो ! कृपा करके इसे ग्रहण करें।” इस प्रकार तुलसी का दान करके फिर उन दोनों (तुलसी और विष्णु) की पूजा करें। अगले दिन प्रातः काल में पुनः पूजा करें। अग्नि की स्थापना करके उसमें द्वादशाक्षर मंत्र से खीर, घी, मधु और तिल मिश्रित द्रव्य की 108 आहुति दें। आप चाहें तो आचार्य से होम की शेष पूजा करवा सकते हैं।

तब भगवान् से प्रार्थना करके कहें- “प्रभो ! आपकी प्रसन्नता के लिए मैंने यह व्रत किया, इसमें जो कमी रह गई हो, वह आपके प्रसाद से पूर्णताः को प्राप्त हो जाए। अब आप तुलसी के साथ बैकुण्ठ धाम में पधारें। आप मेरे द्वारा की गई पूजा से सदा संतुष्ट रहकर मुझे कृतार्थ करें।” इस प्रकार तुलसी विवाह का परायण करके भोजन करें, और भोजन के बाद तुलसी के स्वत: गिरे हुए पत्तों को खाऐं, यह प्रसाद सब पापों से मुक्त होकर भगवान् के धाम को प्राप्त होता है। भोजन में आँवला और बेर का फल खाने से उच्छिष्ट-दोष मिट जाता है


तुलसी दल चयन

स्कन्द पुराण का वचन है कि जो हाथ पूजार्थ तुलसी चुनते हैं, वे धन्य हैं-

तुलसी ये विचिन्वन्ति धन्यास्ते करपल्लवाः।

तुलसी का एक-एक पत्ता न तोड़कर पत्तियों के साथ अग्रभाग को तोड़ना चाहिए। तुलसी की मंजरी सब फूलों से बढ़कर मानी जाती है। मंजरी तोड़ते समय उसमें पत्तियों का रहना भी आवश्यक माना जाता है। निम्नलिखित मंत्र पढ़कर पूज्यभाव से पौधे को हिलाए बिना तुलसी के अग्रभाग को तोड़े। इससे पूजा का फल लाख गुना बढ़ जाता है।


तुलसी दल तोड़ने का मंत्र

तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया।
चिनोमी केशवस्यार्थे वरदा भव शोभने॥
त्वदङ्गसम्भवैः पत्रैः पूजयामि यथा हरिम्।
तथा कुरु पवित्राङ्गि! कलौ मलविनाशिनि॥


तुलसी दल चयन में निषेध समय

वैधृति और व्यतीपात-इन दो योगों में, मंगल, शुक्र और रवि, इन तीन वारों में, द्वादशी, अमावस्या एवं पूर्णिमा, इन तीन तिथियों में, संक्रान्ति और जननाशौच तथा मरणाशौच में तुलसीदल तोड़ना मना है। संक्रान्ति, अमावस्या, द्वादशी, रात्रि और दोनों संध्यायों में भी तुलसीदल न तोड़ें, किंतु तुलसी के बिना भगवान् पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती, अत: निषेध समय में तुलसी वृक्ष से स्वयं गिरी हुई पत्ती से पूजा करें (पहले दिन के पवित्र स्थान पर रखे हुए तुलसीदल से भी भगवान् की पूजा की जा सकती है)। शालिग्राम की पूजा के लिए वर्जित तिथियों में भी तुलसी तोड़ी जा सकती है। बिना स्नान के और जूता पहनकर भी तुलसी न तोड़ें।

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शरद पूर्णिमा 2021

शरद पूर्णिमा कब है ?

20 अक्टूबर, 2021 बुधवार

पूर्णिमा तिथि आरंभ-19 अक्टूबर 2021 को शाम 07 बजे से 
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 20 अक्टूबर 2021 को रात्रि 08 बजकर 20 मिनट पर

श्री वृंदावन धाम में बिहारी जी व राधावल्लभ जी में ये पर्व 20 को रात्रि 8 बजे बजे मनाया जायेगा और खीर का भोग लगाया जाएगा । जो भी भक्त वृंदावन रसिक है वो भी ऐसा कर सकते है । अब आप 20 की रात को भोग लगाएं या 19 की रात ये आप और ठाकुर जी इच्छा पर निर्भर है उप्पर दिया गया समय तिथि है जो कि हमारे यहाँ वल्लभ सम्प्रदाय में विधि निषेध है ।


शरद पूर्णिमा को क्या खास है ?

मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल…

आज के दिन ठाकुर बिहारी जी महाराज महारास रूप मैं दर्शन देते है आज के दिन ठाकुर जी सफ़ेद रंग की पोसाक ओर कटी काछिनी मस्तक पर मोर मुकुट धारण कर जगमोहन मैं दर्शन देते है ।
आज के दिन ठाकुर जी को खीर ओर बुरे की चँद्रकला का भोग लगाया जाता है ।


आज के दिन ही ठाकुर जी बंशी ओर छड़ी धारण करते है ।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणें श्रीबांकेबिहारी के चरणों की वंदना करेंगी। इसके लिए ठाकुर जी भी जगमोहन में विराजमान हो बांसुरी वादन करेंगे। इस अदभुत नजारे को दखने के लिए हजारों भक्तों की वृंदावन में मौजूदगी रहेगी।

इस रात की धवल चांदनी ठाकुर जी की चरण वंदना करती हैं। इसके लिए मंदिर की छत को खोल दिया जाता है।
दिन और रात की आरती का समय भी एक-एक घंटा अतिरिक्त रहेगा।

राजभोग आरती दोपहर एक बजे होगी तो रात में 10.30 बजे शयन आरती की जाएगी। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में भगवान श्रीकृष्ण ने महारास किया था। अन्य देवी-देवता भी श्रीकृष्ण के इस महारास के दर्शनों के लिए यहां आते हैं।


शरद पूर्णिमा को क्या करे ?

  • आप ठाकुर जी को रात्री को स्नान कराए
  • उनको रात को भोग लगाये
  • भोग और ठाकुर जी पर चाँद की किरणें जरुर पदनी चाहेये
  • सुबह उस प्रशादी को सब घर वालो के साथ बाँट कर पाए
  • इस दिन दान करना शुभ माना जाता है क्योंकि आज ठाकुर जी अत्यत प्रसन्न होते है तो उनकी प्रशन्नता हेतु हम गौ माता या संत दान करे ( आप राधेकृष्णावर्ल्ड एप के संत सेवा पर क्लिक करके भी दान कर सकते है जो की सीधा वृंदावन सेवा में लगता है )
  • फिर भोर में ठाकुर जी को नहीं उठाए उनको देर से उठाए फिर भोग लगाये ! क्योकि ठाकुर जी रास से थक जाते है तो उनको अधिक नींद की अवश्यकता होती है !
  • अन्य किसी प्रकार के प्रश्न हेतु व्हात्सप्प करे : 9460500125

शरद पूर्णिमा व्रत कथा

एक साहूकार था जिसके दो बेटियॉं थी। उसकी दोनो बेट‍ियॉं पूर्णिमा का व्रत रखती थी, किन्‍तु बड़ी पुत्री पूर्णिमा का पूरा व्रत करती और छोटी बेटी अधूरा व्रत रखती थी। अर्थात वह शुभ समय से पहले ही व्रत खोलकर खाना खा लेती थी। धीरे-धीरे दोनो पुत्री बड़ी हो गई और उस साहूकार ने दोनो की शादि कर दी।

शादी के बाद साहूकार की बड़ी बेटी के पुत्र हो गया किन्‍तु छोटी बेटी के जो भी संतान होती वह मर जाती। जिससे वह बहुत दुखी रहती थी। एक दिन उसने और उसके पति ने किसी विद्धावान पंडित से इसका कारण पूछा। तो पंडित जी ने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती है जिसके कारण तुम्‍हारी सन्‍तान पैदा होते ही मर जाती है।

दोनो ने पूर्णिमा के व्रत की पूरी विधि के बारे में पूछा और तब पंडित ने उसे पूर्णिमा के व्रत के बारे में विधिपूर्वक बतया। और कहा यदि तुम इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करोगी मो तुम्‍हारी सभी इच्‍छाए पूर्ण हो जाऐगी। ऐसा कहकर वह पंडित तो वहा से चला गया और कुछ दिनो के बाद शरद पूर्णिमा आई।

साहूकार की छोटी बेटी ने शरद पूर्णिमा का व्रत वैसे ही किया जैसे की पंडित ने बताया था। इस व्रत के प्रभाव से उसको पुत्र रत्‍न की प्राप्‍ती हुई किन्‍तु उसका बेटा शीघ्र ही मर गया। उसने अपने मरे हुऐ पुत्र को एक पीढ़े पर लिटाकर एक लाल रंग के कपड़े से ढक दिया। और अपनी बड़ी बहन को बुलाकर लाई और उसने उस पीढ़ के ऊपर बैठने को कहा।

जैसे ही उसकी बड़ी बहन उस पीढ़ पर बैठने लगी तो उस बच्‍चे को उसका घाघरा लग गया जिससे वह बच्‍चा जोर-जोर से रोने लगा। उसने पीछे मुड़कर पीढ़े की तरफ देखा तो उसके ऊपर उसकी छोटी बहन का पुत्र सो रहा था। यह सब देखकर बड़ी बहन अपनी छोटी बहन से बोली -”तू मुझे कलंक लगाना चाहती थी। अभी तो यह मेरे बैठने से मर जाता।

तब उसकी छोटी बहन बोली नही बहन ”यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे ही भाग्‍य से यह जीवित हो गया, तेरे पुण्‍य व्रत के प्रभाव से यह पुन: जीवित हुआ है। यह देखकर उसकी बड़ी बहन बहुत खुश हुई और दोनो बहनों ने पूरे नगर में पूर्णिमा के व्रत के प्रभाव के बारे में बताया। जिसके बाद उस नगर की सभी औरते पूर्णिमा का व्रत करने लगी।

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विजय दशमी (दशहरा)

राधेकृष्णावर्ल्ड की और से विजय दशमी की शुभकामनाएं

दशहरा पर्व की कहानी क्या है, क्यों मनाया जाता है?

दशहरे के इस पर्व को विजयादशमी भी कहा जाता है, इसे जश्न का त्यौहार कहते हैं. आज के वक्त में यह बुराई पर अच्छाई की जीत का ही प्रतीक हैं. बुराई किसी भी रूप में हो सकती हैं जैसे क्रोध, असत्य, बैर,इर्षा, दुःख, आलस्य आदि. किसी भी आतंरिक बुराई को ख़त्म करना भी एक आत्म विजय हैं और हमें प्रति वर्ष अपने में से इस तरह की बुराई को खत्म कर विजय दशमी के दिन इसका जश्न मनाना चाहिये, जिससे एक दिन हम अपनी सभी इन्द्रियों पर राज कर सके.

दशहरा या विजयादशमी महत्व

यह बुरे आचरण पर अच्छे आचरण की जीत की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं.सामान्यतः दशहरा एक जीत के जश्न के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं. जश्न की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं. जैसे किसानो के लिए यह नयी फसलों के घर आने का जश्न हैं. पुराने वक़्त में इस दिन औजारों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्यूंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के जश्न के तौर पर देखते थे. लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत. किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं.

दशहरा के दिन के पीछे कई कहानियाँ हैं, जिनमे सबसे प्रचलित कथा हैं भगवान राम का युद्ध जीतना अर्थात रावण की बुराई का विनाश कर उसके घमंड को तोड़ना.

राम अयोध्या नगरी के राजकुमार थे, उनकी पत्नी का नाम सीता था एवम उनके छोटे भाई थे, जिनका नाम लक्ष्मण था. राजा दशरथ राम के पिता थे. उनकी पत्नी कैकई के कारण इन तीनो को चौदह वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या नगरी छोड़ कर जाना पड़ा. उसी वनवास काल के दौरान रावण ने सीता का अपहरण कर लिया.

रावण चतुर्वेदो का ज्ञाता महाबलशाली राजा था, जिसकी सोने की लंका थी, लेकिन उसमे अपार अहंकार था. वो महान शिव भक्त था और खुद को भगवान विष्णु का दुश्मन बताता था. वास्तव में रावण के पिता विशर्वा एक ब्राह्मण थे एवं माता राक्षस कुल की थी, इसलिए रावण में एक ब्राह्मण के समान ज्ञान था एवम एक राक्षस के समान शक्ति और इन्ही दो बातों का रावण में अहंकार था. जिसे ख़त्म करने के लिए भगवान विष्णु ने रामावतार लिया था.

राम ने अपनी सीता को वापस लाने के लिए रावण से युद्ध किया, जिसमे वानर सेना एवम हनुमान जी ने राम का साथ दिया. इस युद्ध में रावण के छोटे भाई विभीषण ने भी भगवान राम का साथ दिया और अन्त में भगवान राम ने रावण को मार कर उसके घमंड का नाश किया. इन

दशहरा पर्व से जुड़ी कथाएं –
1. राम की रावन पर विजय का पर्व
2. राक्षस महिसासुर का वध कर दुर्गा माता विजयी हुई थी
3. पांडवों का वनवास
4. देवी सती अग्नि में समां गई थी.

आज दहशरा कैसे मनाया जाता हैं ?
आज के समय में दशहरा इन पौराणिक कथाओं को माध्यम मानकर मनाया जाता हैं. माता के नौ दिन की समाप्ति के बाद दसवे दिन जश्न के तौर पर मनाया जाता हैं. जिसमे कई जगहों पर राम लीला का आयोजन होता है, जिसमे कलाकार रामायण के पात्र बनते हैं और राम-रावण के इस युद्ध को नाटिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं.

दशहरा का मेला
कई जगहों पर इस दिन मैला लगता है, जिसमे कई दुकाने एवम खाने पीने के आयोजन होते हैं. उन्ही आयोजनों में नाट्य नाटिका का प्रस्तुतिकरण किया जाता हैं.

इस दिन घरों में लोग अपने वाहनों को साफ़ करके उसका पूजन करते हैं. व्यापारी अपने लेखा का पूजन करते हैं. किसान अपने जानवरों एवम फसलो का पूजन करता हैं. इंजिनियर अपने औजारों एवम अपनी मशीनों का पूजन करते हैं.

इस दिन घर के सभी पुरुष एवम बच्चे दशहरे मैदान पर जाते हैं. वहाँ रावण, कुम्भकरण एवम रावण पुत्र मेघनाथ के पुतले का दहन करते है. सभी शहर वासियों के साथ इस पौराणिक जीत का जश्न मनाते हैं. मेंले का आनंद लेते हैं. उसके बाद शमी पत्र जिसे सोना चांदी कहा जाता हैं उसे अपने घर लाते हैं. घर में आने के बाद द्वार पर घर की स्त्रियाँ, तिलक लगाकर आरती उतारकर स्वागत करती हैं. माना जाता हैं कि मनुष्य अपनी बुराई का दहन करके घर लौटा है, इसलिए उसका स्वागत किया जाता हैं. इसके बाद वो व्यक्ति शमी पत्र देकर अपने से बड़ो के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेता हैं. इस प्रकार घर के सभी लोग आस पड़ोस एवम रिश्तेदारों के घर जाकर शमी पत्र देते हैं एवम बड़ो से आशीर्वाद लेते हैं, छोटो को प्यार देते हैं एवम बराबरी वालो से गले मिलकर खुशियाँ बाटते हैं.

अगर एक पंक्ति में कहे तो यह पर्व आपसी रिश्तो को मजबूत करने एवम भाईचारा बढ़ाने के लिए होता हैं, जिसमे मनुष्य अपने मन में भरे घृणा एवम बैर के मेल को साफ़ कर एक दुसरे से एक त्यौहार के माध्यम से मिलता हैं.

इस प्रकार यह पर्व भारत के बड़े- बड़े पर्व में गिना जाता हैं एवम पुरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं.

हमारे देश में धार्मिक मान्यताओं के पीछे बस एक ही भावना होती हैं, वो हैं प्रेम एवं सदाचार की भावना. यह पर्व हमें एकता की शक्ति याद दिलाते हैं जिन्हें हम समय की कमी के कारण भूलते ही जा रहे हैं, ऐसे में यह त्यौहार ही हमें अपनी नींव से बाँधकर कर रखते हैं.

दशहरे का बदलता रूप
आज के समय में त्यौहार अपनी वास्तविक्ता से अलग जाकर आधुनिक रूप ले रहे हैं, जिसने इसके महत्व को कहीं न कहीं कम कर दिया हैं| जैसे-

दशहरे पर एक दुसरे के घर जाने का रिवाज था, अब ये रिवाज मोबाइल कॉल एवम इंटरनेट मेसेज का रूप ले चुके हैं.

खाली हाथ नहीं जाते थे, इसलिए शमी पत्र ले जाते थे, लेकिन अब इसके बदले मिठाई एवम तौहफे ले जाने लगे हैं, जिसके कारण यह फिजूल खर्च के साथ प्रतिस्पर्धा का त्यौहार बन गया हैं.

रावण दहन के पीछे उस पौराणिक कथा को याद रखा जाता था, जिससे एक सन्देश सभी को मिले कि अहंकार सर्वनाश करता हैं, लेकिन अब तरह- तरह के फटाके फोड़े जाते हैं, जिनके कारण फिजूल खर्च बढ़ गया हैं. साथ ही प्रदुषण की समस्या बढ़ती जा रही हैं एवम दुर्घटनायें भी बढती जा रही हैं.

इस प्रकार आधुनिकरण के कारण त्यौहारों का रूप बदलता जा रहा हैं. और कहीं न कहीं आम नागरिक इन्हें धार्मिक आडम्बर का रूप मानकर इनसे दूर होते जा रहे हैं. इनका रूप मनुष्यों ने ही बिगाड़ा हैं. पुराणों के अनुसार इन सभी त्योहारों का रूप बहुत सादा था. उसमे दिखावा नहीं बल्कि ईश्वर के प्रति आस्था थी. आज ये अपनी नींव से इतने दूर होते जा रहे हैं कि मनुष्य के मन में कटुता भरते जा रहे हैं. मनुष्य इन्हें वक्त एवम पैसो की बर्बादी के रूप में देखने लगा हैं.

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नवरात्री स्पेशल 2022

 नवरात्रि का पर्व आरंभ होने जा रहा है.
घरों में नवरात्रि के पर्व को मनाने के लिए तैयारियां आरंभ हो चुकी हैं. हिंदू धर्म में मां दुर्गा को विशेष स्थान प्राप्त है. मां दुर्गा को शक्ति प्रतीक माना गया है. ऋगवेद के अनुसार माँ दुर्गा ही आदि-शक्ति हैं. पौराणिक कथाओं में मां दुर्गा को सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी माना गया है. इसके साथ ही जीवन में आने वाली हर परेशानियां को दूर करने में मां दुर्गा की पूजा को प्रभावशाली माना गया है. नवरात्रि यानी मां दु्र्गा की उपासना के पावन नौ दिन। नवरात्रि में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा क्रमश: की जाती है जिनके बारे में नित्य जानकारी एप पर उपलब्ध होगी


  1. मां शैलपुत्री
  2. मां ब्रह्मचारिणी
  3. मां चंद्रघंटा
  4. मां कुष्मांडा
  5. मां स्कंदमाता
  6. मां कात्यायनी
  7. मां कालरात्रि
  8. मां महागौरी
  9. मां सिद्धिदात्री

नवरात्रि कब से आरंभ हो रहे हैं


31 मार्च को दोपहर 12.22 से 1 अप्रैल दोपहर 11.53 तक अमावस्या है, जिसके अगले दिन यानी 2 अप्रैल से नवरात्रि प्रारंभ हो जाएंगे।

इस साल चैत्र नवरात्रि 2 अप्रैल से 10 अप्रैल तक संपन्न होंगे।

नवरात्रि में माता की सवारी


नवरात्रि में मां दुर्गा की सवारी को विशेष माना गया है. माता की सवारी दिन के अनुसार निर्धारित होती है. इस वर्ष चैत्र नवरात्रि का पर्व शनिवार को आरंभ हो रहा है.

नव विक्रम संवत 2079 । नए विक्रम संवत का नाम ” नल ” है ।

नए वर्ष का राजा शनि और मंत्री देव गुरु बृहस्पति हैं । इस बार नवरात्रि में माता घोड़े पर सवार होकर आएंगी .



घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

घटस्थापना का शुभ समय सुबह 7.30 से 8.30 के बीच, और सुबह 10.30 से 11.55 तक 2 मूहर्त है

कलश स्थापना नवरात्रि के पहले दिन यानी 02 अप्रैल, शनिवार को ही की जाएगी।


नवरात्रि की तिथियाँ


  • 02-04-2022 – शनिवार – प्रतिपदा तिथि – पहला नवरात्रा – शैलपुत्री देवी ।
  • 03-04-2022 – रविवार – द्वितीय तिथि – दूसरा नवरात्रा – ब्रह्मचारिणी देवी ।
  • 04-04-2022 – सोमवार – तृतीया तिथि – तीसरा नवरात्रा – चंद्रघंटा देवी ।
  • 05-04-2022 – मंगलवार – चतुर्थी तिथि – चौथा नवरात्रा – कुष्मांडा देवी ।
  • 06-04-2022 – बुधवार – पंचमी तिथि – पांचवा नवरात्रा – स्कंदमाता देवी ।
  • 07-04-2022 – गुरुवार – षष्ठी तिथि – छठा नवरात्रा – कात्यायनी देवी ।
  • 08-04-2022 – शुक्रवार – सप्तमी तिथि – सातवा नवरात्रा  – कालरात्रि देवी ।
  • 09-04-2022 – शनिवार – अष्टमी तिथि – आठवां नवरात्रा – महागौरी देवी ।
  • 10-04-2022 – रविवार – नवमी तिथि – नोवा नवरात्रा – सिद्धिदात्री देवी ( रामनवमी ) ।

श्री दुर्गा सप्तशती में स्वयं दुर्गा भगवती ने कहा है-

“ शरदकाले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी …

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्य सुतान्वित:।

मनुष्यो मतप्रसादेन भविषयति:न संशय:।।”

“जो शरद काल की नवरात्रि में मेरी पूजा-आराधना तथा मेरे तीनों चरित्र का श्रद्धा पूर्वक पाठ करता है एवं नवरात्रि पर्यंत व्रत रहते हुए तप करता है, वह समस्त बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य से समपन्न हो यश का भागीदार बन जाता है, इसमें किंचित संशय नहीं है


पूजा विधि

  • नवरात्रि के दिन सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ पानी से स्नान कर लें।
  • पानी में कुछ बूंदें गंगाजल की डालकर स्नान करें या स्नान के पश्चात शरीर पर गंगा जल का छिड़काव करें।
  • कलश स्थापना के स्थान पर दीया जलाएं और दुर्गा मां को अर्घ्य दें।
  • इसके बाद अक्षत और सिंदूर चढ़ाएं।
  • लाल फूलों से मां को सजाएं और फल, मिठाई का भोग लगाएं।
  • धूप, अगरबत्ती जलाकर दुर्गा चालीसा पढ़े और अंत में आरती करें।

दुर्गा चालीसा और आरती एप के नवरात्री स्पेशल आइकॉन में उपलब्ध है

नवरात्र‍ि के दौरान कुछ महत्वपूर्ण चीजें


ऐसी मान्यता है कि नवरात्र‍ि के दौरान कुछ चीजें घर लाई जाएं तो माता रानी जरूर प्रसन्न होती हैं

कमल पर विराजमान मां की तस्वीर- 

आप घर में धन-समृद्धि लाने के लिए नवरात्रि के दौरान देवी लक्ष्मी का ऐसा चित्रपट लाएं, जिसमें वे कमल पर विराजमान हों. इसके साथ ही उनके हाथों से धन की वर्षा हो रही हों. कमल देवी लक्ष्मी का प्रिय फूल है. नवरात्रि में कमल का फूल या उससे संबंधित चित्र घर में लेकर आने से देवी लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है.

सोलह श्रृंगार का सामान-

नवरात्रि के दौरान महिलाओं को घर में सोलह श्रृंगार का सामान जरूर लाना चाहिए. श्रृंगार के सामान को घर के मंदिर में स्थापित करने से मां दुर्गा की कृपा सदैव घर पर बनी रहती है.

सोने या चांदी का सिक्का –

नवरात्रि के दौरान घर में सोने या चांदी का सिक्का लाना शुभ माना जाता है. सिक्के पर माता लक्ष्मी या भगवान गणेश की चित्र बना हुआ हो तो और भी शुभ होता है अपने पर्स में सोने या चांदी का सिक्का जरूर रखें, इससे आप पर मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहेगी.

मोर पंख-

शास्त्रों में मोर पंख को बहुत शुभ माना गया है. नवरात्रि में मां सरस्वती का प्रिय मोर पंख घर लाकर मंदिर में रखने से कई फायदे होते हैं. मोर पंखविद्यार्थियों के कमरे में रखने से उन्हें विद्या की प्राप्ति होती है. लॉकर के पास मोर पंख रखने से आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगता है. ये नकारात्मक ऊर्जा से भी बचाता है.

केले का पौधा-

नवरात्रि में केले का पौधे घर में लाना चाहिए. इसे घर के आंगन में लगाएं और पूजा करने के बाद इस पर रोजाना जल चढ़ाएं. गुरुवार के दिन इस पर दूध भी चढ़ाना चाहिए.


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राधा अष्टमी 2021

आज के इस ब्लॉग में आपको ये सब मिलेगा !


  • राधाष्टमी का व्रत कब करे ?
  • राधा अष्टमी के दिन क्या करें
  • कहाँ हुआ किशोरी जी का प्राकट्य ?
  • श्री राधाकृष्ण क्‍यों गए बरसाना ?
  • बरसाना के महल में राधा अष्टमी के उत्सवों कब है ?
  • श्री राधाजी की आरती

श्री राधा जी के बारे में प्रचलित है कि वह बरसाना की थीं लेकिन सच्चाई है कि उनका जन्‍म बरसाना से पचास किलोमीटर दूर हुआ था।

यह गांव रावल के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर राधा जी का जन्‍म स्‍थान है।



राधाष्टमी का व्रत कब करे ?

तिथि आरंभ- 13 सितंबर 2021 दोपहर 3 बजकर 10 मिनट से
तिथि समाप्त – 14 सितंबर 2021 दोपहर 1 बजकर 9 मिनट तक

व्रत आरंभ- 13 सितंबर 2021 रात 12 बजे से
व्रत समाप्त – 14 सितंबर 2021 सुबह 4 बजे तक


राधा अष्टमी के दिन क्या करें

हम ज्यादा नियमो में विश्वास नहीं करते है पर कुछ जरुरी नियम जरुर पालन करे

  • राधा अष्टमी के दिन सुबह जल्द उठकर स्नान करना चाहिए।
  • फिर स्वस्छ वस्त्र पहनें और राधारानी और भगवान कृष्ण के व्रत का संकल्प लें।
  • इसके बाद राधा और कान्हा की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं और श्रृंगार करें।
  • वह धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, फल और प्रसाद अर्पित करें।
  • श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र का पाठ करें

कैसे हुआ किशोरी जी का प्राकट्य ?

कमल के फूल पर जन्‍मी थीं श्री राधा रानी, रावल गांव में राधा जी का मंदिर है। माना जाता है कि यहां पर राधा जी का जन्म हुआ था। पांच हजार वर्ष पूर्व रावल गांव को छूकर यमुना जी बहती थी। राधा जी की मां कृति यमुना में स्‍नान करते हुए अराधना करती थी और पुत्री की लालसा रखती थी। पूजा करते समय एक दिन यमुना से कमल का फूल प्रकट हुआ। कमल के फूल से सोने की चमक सी रोशनी निकल रही थी। इसमें छोटी बच्‍ची के नेत्र बंद थे। अब वह स्‍थान इस मंदिर का गर्भगृह है। इसके ग्यारह माह पश्चात् तीन किलोमीटर दूर मथुरा में कंस के कारागार में भगवान श्री कृष्‍ण जी का जन्‍म हुआ था व रात में गोकुल में नंदबाबा के घर पर पहुंचाए गए। तब नंद बाबा ने सभी स्थानों पर संदेश भेजा और कृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव मनाया गया। जब बधाई लेकर वृषभानु जी अपनी गोद में राधारानी को लेकर यहां आए तो राधारानी जी घुटने के बल चलते हुए बालकृष्‍ण के पास पहुंची। वहां बैठते ही तब राधारानी के नेत्र खुले और उन्‍होंने पहला दर्शन बालकृष्‍ण का किया।


श्री राधाकृष्ण क्‍यों गए बरसाना

कृष्‍ण के जन्‍म के बाद से ही कंस का प्रकोप गोकुल में बढ़ गया था। यहां के लोग परेशान हो गए थे। नंदबाबा ने स्‍थानीय राजाओं को एकत्रित किया। उस समय ब्रज के सबसे बड़े राजा वृषभानु जी थे। इनके पास ग्यारह लाख गाय थीं। जबकि नंद जी के पास नौ लाख गाय थीं। जिसके पास सबसे अधिक गाय होतीं थीं, वह वृषभान कहलाते थे। उससे कम गाय जिनके पास रहती थीं, वह नंद कहलाए जाते थे। बैठक के बाद निर्णय हुआ कि गोकुल व रावल छोड़ दिया जाए। गोकुल से नंद बाबा और जनता पलायन करके पहाड़ी पर गए। उसका नाम नंदगांव पड़ा। वृषभान, कृति जी राधारानी को लेकर पहाड़ी पर गए। उसका नाम बरसाना पड़ा।

रावल में मंदिर के सामने बगीचा, इसमें पेड़ स्‍वरूप में हैं राधा व श्‍याम

रावल गांव में राधारानी के मंदिर के ठीक सामने प्राचीन उपवन है। कहा जाता है कि यहां पर पेड़ स्‍वरूप में आज भी श्री राधा जी और श्री कृष्‍ण जी विद्यमान हैं। यहां पर एक साथ दो वृक्ष हैं। एक श्‍वेत है तो दूसरा श्‍याम रंग का। इसकी पूजा होती है। माना जाता है कि श्री राधा जी और श्री कृष्‍ण जी वृक्ष स्‍वरूप में आज भी यहां से यमुना जी को निहारते हैं।


चहक उठी है सृष्टि सारी। बज उठी है देखो शहनाई।
कीरत जू के अंगना में। नन्ही-सी लाली है जाई।
सब मिल कर गाओ बधाई।

आँखों मे बस गया नज़ारा आज अटारी का। धरती पर अवतार हुआ वृषभानु दुलारी का।
झूमो नाचो गाओ जन्मदिन श्यामा प्यारी का।


बरसाना के महल में राधा अष्टमी के उत्सव कब है ?


  • 12 सितंबर ऊंचागांव में राधारानी की प्रधान सखी – ललिताजी का जन्मोत्सव ।
  • 13 सितंबर सुप्रसिद्ध राधारानी मंदिर में राधा जन्मोत्सव |
  • 14 सितंबर राधारानी मंदिर में प्रात: राधाजी का जन्म एवं शाम को संगमरमरी छतरी में विशेष दर्शन।
  • 15 सितंबर मोर कुटी पर मयूर लीला का मंचन, शाम को लाड़िलीजी मंदिर में ढ़ांढ़ी ढ़ाढिन नृत्य।
  • 16 सितंबर विलासगढ़ एवं नागजी कुटी में जोगिन लीला।
  • 17 सितंबर सांकरी खोर में चोटी गूंथन लीला एवं शाम को गाजीपुर में नौका विहार लीला।
  • 18 सितंबर ऊंचा गांव में व्याहवला लीला एवं शाम को प्रिया कुण्ड पर नौका विहार लीला।
  • 19 सितंबर साांकरी खोर में मटकी फोड़ लीला एवं विशाल दंगल का आयोजन।
  • 20 सितंबर– राजस्थान के कदमखंडी में चीरहरण लीला का मंचन।
  • 21 सितंबर – राधाबाग, करहला एवं मड़ोई गांव में महारास का आयोजन।

श्री राधाजी की आरती

आरती राधाजी की कीजै। टेक…कृष्ण संग जो कर निवासा, कृष्ण करे जिन पर विश्वासा।
आरती वृषभानु लली की कीजै। आरती…कृष्णचन्द्र की करी सहाई, मुंह में आनि रूप दिखाई।
उस शक्ति की आरती कीजै। आरती…नंद पुत्र से प्रीति बढ़ाई, यमुना तट पर रास रचाई।
आरती रास रसाई की कीजै। आरती…प्रेम राह जिनसे बतलाई, निर्गुण भक्ति नहीं अपनाई।
आरती राधाजी की कीजै। आरती…दुनिया की जो रक्षा करती, भक्तजनों के दुख सब हरती।आरती दु:ख हरणीजी की कीजै। आरती…दुनिया की जो जननी कहावे, निज पुत्रों की धीर बंधावे।
आरती जगत माता की कीजै। आरती…निज पुत्रों के काज संवारे, रनवीरा के कष्ट निवारे।
आरती विश्वमाता की कीजै। आरती राधाजी की कीजै…

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कृष्णजन्माष्टमी 2021

हर वर्ष की तरह इस बार भी जन्माष्टमी बड़ी ही धूम-धाम और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस को कृष्ण भक्त कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस बार 30 अगस्त, सोमवार को पूरे देश में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का त्योहार मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने धरती पर जन्म लिया था। जन्माष्टमी पर घरों और मंदिरों में विशेष रूप से सजावट की जाती है। सभी प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर और धाम में विशेष तरह के आयोजन होते हैं। कृष्ण भक्त इस दिन उपवास रखकर कान्हा की भक्ति में डूबे रहते हैं।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तिथि को लेकर लगभग हर बार कृष्ण और शैव मतावलंवियों के बीच में संशय बना रहता है। तिथि को लेकर आपस में मतभेद होने के कारण जन्माष्टमी दो दिन मनाई जाती है। लेकिन साल 2021 में इस बार सभी जगह एक ही दिन जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार भगवान कृष्ण के जन्म के समय विशेष ज्योतिषी संयोग बना था, ऐसा संयोग इस बार भी बना रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद  कृष्णपक्ष की आधी रात्रि अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और चंद्रमा के वृषभ राशि में गोचर रहने का संयोग बना था। कुछ इसी तरह का संयोग इस बार भी जन्माष्टमी तिथि पर हो रहा है

जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त

जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र 30 अगस्त की सुबह 06 बजकर 39 मिनट पर रहेगा। ऐसे में जन्माष्टमी के पूजा का शुभ मुहूर्त 30 अगस्त की रात 11 बजकर 59 मिनट से रात 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा।


जन्माष्टमी पूजन विधि


बहुत ही सरल विधि से घर पर अपने ठाकुर जी का प्रकट महोत्सव पूजन कर सकते हैं…

शुभ जन्माष्टमी का व्रत एकादशी के जैसे ही रखना चाहिए… फलाहार करके
जयदातार भक्त लोग कृष्ण जन्म के बाद ही फलाहार करते हैं
कुछ भक्त लोग जल भी नहीं लेते
कृष्ण जन्म के बाद ही जल लेते हैं। अन्नं प्रसाद ठाकुर को भोग लगा कर आप अगले दिन लीजिए।

पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की एक सूची यहां दी गई है।

सर्वप्रथम अभिषेक के लिए:

दही, शहद, दूध, घी, गंगा जल,
एक चौकी, पीला साफ कपड़ा,
बाल कृष्ण की मूर्ति (श्री विग्रह)
दीपक, धूपबत्ती, चंदन,

ठाकुर जी का भोग:

माखन, मिश्री, भोग सामग्री , धनिए का पंजीरी ठाकुर जी को विशेष रूप से भोग लगाया जाता है। तुलसी का पत्र, फूल,

कान्हा के श्रृंगार के लिए:

पीले वस्त्र और मोरपंख, बांसुरी और मुकुट, इत्र

पूजन विधि:

  1. बाल कृष्ण को दूध से स्नान कराएं.
  2. इसके बाद बारी-बारी से दही, घी, शहद से नहलाएं.
  3. इसके बाद आखिर में गंगाजल से स्नान कराएं. इन सभी चीजों से बाल गोपाल का स्नान कराने के बाद उसे फेकें नहीं. बल्कि उसे पंचामृत के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
  4. स्नान के बाद बाल गोपाल को बच्चे की तरह सजाएं, श्रृंगार करे
  5. सबसे पहले बाल गोपाल को लंगोट पहनाएं और उसके बाद उन्हें वस्त्र पहनाएं.
  6. इसके बाद उन्हें गहने पहनाए… फूल अर्पित करे, इत्र रुई में लगा कर ठाकुर जी के समीप रखे।
  7. परम भगवान कृष्ण को उनके शुद्ध भक्त वैष्णव संप्रदाय के आचार्यों का लिखित भजन गाकर सुनाए
    और चंदन और अक्षत से तिलक लगाएं.
  8. धूप, दीप दिखाएं
    महा आरती करें…. आरती गाए
    और
    माखन मिश्री, खीर, पूरी, मिठाई,
    हलुआ,और तुलसी पत्ता का भोग लगाएं.
    सभी भोग में एक एक तुलसी पत्र अवश्य डाले।
  9. अब बाल गोपाल को झूले पर बिठाकर झुलाएं और जय कन्हैया लाल की गाएं.
  10. जन्माष्टमी के दिन भक्त लोग रातभर जग कर हरि नाम संकीर्तन करते हैं।
    जितना हो सके हरे कृष्ण महामंत्र का इस शुभ दिन जाप कर सकते हैं करिए।

इस दिन दान जरूर करें



अगर आपके मन में कोई भी प्रशन हो तो कभी भी पूछ सकते है ! Whatsapp : 9460500125


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गुरु पूर्णिमा 2021

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागु पाँव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए॥

व्यास जी को प्रथम गुरु की भी उपाधि दी जाती है क्योंकि गुरु व्यास ने ही पहली बार मानव जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया था। इसके उपलक्ष में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है।


24 जुलाई को आषाढ़-गुरु पूर्णिमा मनाई जाएगी, हिंदू धर्म में कुल पुराणों की संख्या 18 है। इन सभी के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं।

गुरु पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- शुक्रवार 23 जुलाई को सुबह 10:34 बजे
गुरु पूर्णिमा तिथि समाप्त- शनिवार 24 जुलाई को सुबह 08:06 बजे

आज के दिन क्या करे ?


  • ठाकुर जी को नए वस्त्र पहनाये और पंचामृत से स्नान कराए ! क्योकि हमारे सबसे पहले गुरु ठाकुर जी ही है !
  • ठाकुर जी को अच्छे अच्छे पकवानों के साथ भोग लगाये !
  • अगर आप दीक्षित है तो इस बार वृन्दावन में कोरोना की वजह से एंट्री बंद है न ही कोई उत्सव होगे इसलिए अपने घर पर ही अपने गुरु की छवि रख क्र उत्सव मनाये !
  • जिस दिन हमारे जीवन में ठाकुर जी की कृपा से गुरु मिल जाते है तो उसी दिन ये पूर्ण विश्वास हो जाता है की अब ठाकुर जी दूर नहीं इसलिए ये उत्सव बहुत ख़ास है !
  • अगर कोई भक्त व्रत रखना भी चाहते है तो रख सकते है वैसे ये अनिवार्य नहीं है !
  • व्रत 23 जुलाई सुबह से 24 की सुबह तक करना है ! ये निर्जला व्रत नहीं होगा इसलिए आप पानी ले सकते है
  • आज के दिन जितना ज्यादा हो सके या पुरे दिन ही भगवन नाम कीर्तन होना चाहेये !
  • इस दिन दान जरुर करना चाहिए जो की संतो, गौ माता, वानर आदि के लिए हो !
  • दान हेतु आप राधेकृष्णावर्ल्ड के इस लिंक पर क्लिक करके भी जितनी सामर्थ है सेवा भेज सकते है जो की संत और जीव सेवा में लगेगी !


अगर आपके मन में कोई भी प्रशन हो तो कभी भी पूछ सकते है ! Whatsapp : 9460500125


गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस!