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कार्तिक माह 2021

कार्तिक मास कब से कब तक है ?

इस साल कार्तिक माह की शुरुआत 21 अक्टूबर 2021 से प्रारंभ हो रही है. ये 19 नंवबर तक रहेगा


कार्तिक मास में तुलसी की महिमा

ब्रह्मा जी कहे हैं कि कार्तिक मास में जो भक्त प्रातः काल स्नान करके पवित्र हो कोमल तुलसी दल से भगवान् दामोदर की पूजा करते हैं, वह निश्चय ही मोक्ष पाते हैं। पूर्वकाल में भक्त विष्णुदास भक्तिपूर्वक तुलसी पूजन से शीघ्र ही भगवान् के धाम को चला गया और राजा चोल उसकी तुलना में गौण हो गए। तुलसी से भगवान् की पूजा, पाप का नाश और पुण्य की वृद्धि करने वाली है। अपनी लगाई हुई तुलसी जितना ही अपने मूल का विस्तार करती है, उतने ही सहस्रयुगों तक मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित रहता है। यदि कोई तुलसी संयुत जल में स्नान करता है तो वह पापमुक्त हो आनन्द का अनुभव करता है। जिसके घर में तुलसी का पौधा विद्यमान है, उसका घर तीर्थ के समान है, वहाँ यमराज के दूत नहीं जाते। जो मनुष्य तुलसी काष्ठ संयुक्त गंध धारण करता है, क्रियामाण पाप उसके शरीर का स्पर्श नहीं करते। जहाँ तुलसी वन की छाया हो वहीं पर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिसके कान में, मुख में और मस्तक पर तुलसी का पत्ता दिखाई देता है, उसके ऊपर यमराज दृष्टि नहीं डाल सकते।


प्राचीन काल में हरिमेधा और सुमेधा नामक दो ब्राह्मण थे। वह जाते-जाते किसी दुर्गम वन में परिश्रम से व्याकुल हो गए, वहाँ उन्होंने एक स्थान पर तुलसी दल देखा। सुमेधा ने तुलसी का महान् वन देखकर उसकी परिक्रमा की और भक्ति पूर्वक प्रणाम किया। यह देख हरिमेधा ने पूछा कि ‘तुमने अन्य सभी देवताओं व तीर्थ-व्रतों के रहते तुलसी वन को प्रणाम क्यों किया ?’ तो सुमेधा ने बताया कि ‘प्राचीन काल में जब दुर्वासा के शाप से इन्द्र का ऐश्वर्य छिन गया तब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मन्थन किया तो धनवंतरि रूप भगवान् श्री हरि और दिव्य औषधियाँ प्रकट हुईं।

उन दिव्य औषधियों में मण्डलाकार तुलसी उत्पन्न हुई, जिसे ब्रह्मा आदि देवताओं ने श्री हरि को समर्पित किया और भगवान् ने उसे ग्रहण कर लिया। भगवान् नारायण संसार के रक्षक और तुलसी उनकी प्रियतमा है। इसलिए मैंने उन्हें प्रणाम किया है।’
सुमेधा इस प्रकार कह ही रहे थे कि सूर्य के समान अत्यंत तेजस्वी विशाल विमान उनके निकट उतरा। उन दोनों के समक्ष वहाँ एक बरगद का वृक्ष गिर पड़ा और उसमें से दो दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उन दोनों ने हरिमेधा और सुमेधा को प्रणाम किया। दोनों ब्राह्मणों ने उनसे पूछा कि आप कौन हैं ? तब उनमें से जो बड़ा था वह बोला, मेरा नाम आस्तिक है।

एक दिन मैं नन्दन वन में पर्वत पर क्रीड़ा करने गया था तो देवांगनाओं ने मेरे साथ इच्छानुसार विहार किया। उस समय उन युवतियों के हार के मोती टूटकर तपस्या करते हुए लोमश ऋषि पर गिर पड़े। यह देखकर मुनि को क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि स्त्रियाँ तो परतंत्र होती हैं। अत: यह उनका अपराध नहीं, दुराचारी आस्तिक ही शाप के योग्य है।

ऐसा सोचकर उन्होंने मुझे शापित किया – “अरे तू ब्रह्म राक्षस होकर बरगद के पेड़ पर निवास कर।” जब मैंने विनती से उन्हें प्रसन्न किया तो उन्होंने शाप से मुक्ति की विधि सुनिश्चित कर दी कि जब तू किसी ब्राह्मण के मुख से तुलसी दल की महिमा सुनेगा तो तत्काल तुझे उत्तम मोक्ष प्राप्त होगा। इस प्रकार मुक्ति का शाप पाकर मैं चिरकाल से इस वट वृक्ष पर निवास कर रहा था। आज दैववश आपके दर्शन से मेरा छुटकारा हुआ है।
तत्पश्चात् वे दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण परस्पर पुण्यमयी तुलसी की प्रशंसा करते हुए तीर्थ यात्रा को चल दिए। इसलिए भगवान् विष्णु को प्रसन्नता देने वाले इस कार्तिक मास में तुलसी की पूजा अवश्य करनी चाहिए।


तुलसी विवाह की विधि व महत्व

कार्तिक शुक्ला नवमी को द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। इस तिथि को नवमी से एकादशी तक मनुष्य शास्त्रोक्त विधि से तुलसी विवाह का उत्सव करें तो उसे कन्यादान का फल होता है। पूर्वकाल में कनक की पुत्री किशोरी ने एकादशी के दिन संध्या के समय तुलसी की वैवाहिक विधि संपन्न की थी इससे वह वैधव्य दोष से मुक्त हो गई थी। अब तुलसी विवाह की विधि सुनिये-
एक तोला स्वर्ण की भगवान् विष्णु की प्रतिमा बनवाएँ या अपनी शक्ति के अनुसार आधे या चौथाई तोले की बनवाएँ अथवा यह भी न होने पर उसे अन्य धातुओं के सम्मिश्रण से ही बनवाएँ। फिर तुलसी और भगवान् विष्णु की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करके स्तुति आदि के द्वारा भगवान् को निन्द्रा से जगावें। फिर पुरुष सूक्त से व घोडशोपचार से पूजा करें। पहले देशकाल स्मरण करके गणेश पूजन करे, फिर पुण्याह वाचन करके वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए बाजे आदि की ध्वनि से भगवान् विष्णु की प्रतिमा को तुलसी के निकट लाकर रख दें। प्रतिमा को सुंदर वस्त्रों व अलंकारों सजाए रहें उसी समय भगवान् का आह्वान इस मंत्र से करें-

आगच्छ भगवत् देव अर्चयिष्यामि केशव।
तुभ्यं दासयामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव॥

अर्थात्-हे भगवान् केशव ! आइए देव, मैं आपकी पूजा करूँगा, आपकी सेवा में तुलसी को समर्पित करूँगा आप मेरे सब मनोरथों को पूर्ण करें। इस प्रकार आह्वान के बाद तीन-तीन बार अर्ध्य, पाद्य और विष्टर का उच्चारण करके इन्हें भी भगवान् को समर्पित कर दे।

तत्पश्चात् काँसे के पात्र में दही, घी और शहद रखकर उसे कांसे के ढक्कन से ढककर भगवान् को अर्पण करते हुए इस प्रकार कहें- ‘हे वासुदेव, आपको नमस्कार है। यह मधुपर्क ग्रहण कीजिए।’ तब दोनों को एक-दूसरे के समक्ष रखकर मंगल पाठ करें। इस प्रकार गोधूलि बेला में जब भगवान् सूर्य कुछ-कुछ दिखाई दे रहे हों, तब कन्यादान का संकल्प करें और भगवान् से यह प्रार्थना करें- “आदि, मध्य और अंत से रहित त्रिभुवन प्रतिपालक परमेश्वर ! इस तुलसी को आप विवाह की विधि से ग्रहण करें।

यह पार्वती के बीज से प्रकट हुई है, वृंदावन की भस्म में स्थित रही है तथा आदि, मध्य और अंत में शून्य है। आपको तुलसी अत्यंत प्रिय है अतः इसे मैं आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। मैंने जल के घड़ों से सींचकर और अन्य सभी प्रकार की सेवाएँ करके, अपनी पुत्री की भाँति इसे पाला-पोसा है, बढ़ाया है और आपकी तुलसी आपको ही दे रहा हूँ।

हे प्रभो ! कृपा करके इसे ग्रहण करें।” इस प्रकार तुलसी का दान करके फिर उन दोनों (तुलसी और विष्णु) की पूजा करें। अगले दिन प्रातः काल में पुनः पूजा करें। अग्नि की स्थापना करके उसमें द्वादशाक्षर मंत्र से खीर, घी, मधु और तिल मिश्रित द्रव्य की 108 आहुति दें। आप चाहें तो आचार्य से होम की शेष पूजा करवा सकते हैं।

तब भगवान् से प्रार्थना करके कहें- “प्रभो ! आपकी प्रसन्नता के लिए मैंने यह व्रत किया, इसमें जो कमी रह गई हो, वह आपके प्रसाद से पूर्णताः को प्राप्त हो जाए। अब आप तुलसी के साथ बैकुण्ठ धाम में पधारें। आप मेरे द्वारा की गई पूजा से सदा संतुष्ट रहकर मुझे कृतार्थ करें।” इस प्रकार तुलसी विवाह का परायण करके भोजन करें, और भोजन के बाद तुलसी के स्वत: गिरे हुए पत्तों को खाऐं, यह प्रसाद सब पापों से मुक्त होकर भगवान् के धाम को प्राप्त होता है। भोजन में आँवला और बेर का फल खाने से उच्छिष्ट-दोष मिट जाता है


तुलसी दल चयन

स्कन्द पुराण का वचन है कि जो हाथ पूजार्थ तुलसी चुनते हैं, वे धन्य हैं-

तुलसी ये विचिन्वन्ति धन्यास्ते करपल्लवाः।

तुलसी का एक-एक पत्ता न तोड़कर पत्तियों के साथ अग्रभाग को तोड़ना चाहिए। तुलसी की मंजरी सब फूलों से बढ़कर मानी जाती है। मंजरी तोड़ते समय उसमें पत्तियों का रहना भी आवश्यक माना जाता है। निम्नलिखित मंत्र पढ़कर पूज्यभाव से पौधे को हिलाए बिना तुलसी के अग्रभाग को तोड़े। इससे पूजा का फल लाख गुना बढ़ जाता है।


तुलसी दल तोड़ने का मंत्र

तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया।
चिनोमी केशवस्यार्थे वरदा भव शोभने॥
त्वदङ्गसम्भवैः पत्रैः पूजयामि यथा हरिम्।
तथा कुरु पवित्राङ्गि! कलौ मलविनाशिनि॥


तुलसी दल चयन में निषेध समय

वैधृति और व्यतीपात-इन दो योगों में, मंगल, शुक्र और रवि, इन तीन वारों में, द्वादशी, अमावस्या एवं पूर्णिमा, इन तीन तिथियों में, संक्रान्ति और जननाशौच तथा मरणाशौच में तुलसीदल तोड़ना मना है। संक्रान्ति, अमावस्या, द्वादशी, रात्रि और दोनों संध्यायों में भी तुलसीदल न तोड़ें, किंतु तुलसी के बिना भगवान् पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती, अत: निषेध समय में तुलसी वृक्ष से स्वयं गिरी हुई पत्ती से पूजा करें (पहले दिन के पवित्र स्थान पर रखे हुए तुलसीदल से भी भगवान् की पूजा की जा सकती है)। शालिग्राम की पूजा के लिए वर्जित तिथियों में भी तुलसी तोड़ी जा सकती है। बिना स्नान के और जूता पहनकर भी तुलसी न तोड़ें।

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शरद पूर्णिमा 2021

शरद पूर्णिमा कब है ?

20 अक्टूबर, 2021 बुधवार

पूर्णिमा तिथि आरंभ-19 अक्टूबर 2021 को शाम 07 बजे से 
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 20 अक्टूबर 2021 को रात्रि 08 बजकर 20 मिनट पर


शरद पूर्णिमा को क्या खास है ?

मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल…

आज के दिन ठाकुर बिहारी जी महाराज महारास रूप मैं दर्शन देते है आज के दिन ठाकुर जी सफ़ेद रंग की पोसाक ओर कटी काछिनी मस्तक पर मोर मुकुट धारण कर जगमोहन मैं दर्शन देते है ।
आज के दिन ठाकुर जी को खीर ओर बुरे की चँद्रकला का भोग लगाया जाता है ।


आज के दिन ही ठाकुर जी बंशी ओर छड़ी धारण करते है ।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणें श्रीबांकेबिहारी के चरणों की वंदना करेंगी। इसके लिए ठाकुर जी भी जगमोहन में विराजमान हो बांसुरी वादन करेंगे। इस अदभुत नजारे को दखने के लिए हजारों भक्तों की वृंदावन में मौजूदगी रहेगी।

इस रात की धवल चांदनी ठाकुर जी की चरण वंदना करती हैं। इसके लिए मंदिर की छत को खोल दिया जाता है।
दिन और रात की आरती का समय भी एक-एक घंटा अतिरिक्त रहेगा।

राजभोग आरती दोपहर एक बजे होगी तो रात में 10.30 बजे शयन आरती की जाएगी। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में भगवान श्रीकृष्ण ने महारास किया था। अन्य देवी-देवता भी श्रीकृष्ण के इस महारास के दर्शनों के लिए यहां आते हैं।


शरद पूर्णिमा को क्या करे ?

  • आप ठाकुर जी को रात्री को स्नान कराए
  • उनको रात को भोग लगाये
  • भोग और ठाकुर जी पर चाँद की किरणें जरुर पदनी चाहेये
  • सुबह उस प्रशादी को सब घर वालो के साथ बाँट कर पाए
  • इस दिन दान करना शुभ माना जाता है क्योंकि आज ठाकुर जी अत्यत प्रसन्न होते है तो उनकी प्रशन्नता हेतु हम गौ माता या संत दान करे ( आप राधेकृष्णावर्ल्ड एप के संत सेवा पर क्लिक करके भी दान कर सकते है जो की सीधा वृंदावन सेवा में लगता है )
  • फिर भोर में ठाकुर जी को नहीं उठाए उनको देर से उठाए फिर भोग लगाये ! क्योकि ठाकुर जी रास से थक जाते है तो उनको अधिक नींद की अवश्यकता होती है !
  • अन्य किसी प्रकार के प्रश्न हेतु व्हात्सप्प करे : 9460500125

शरद पूर्णिमा व्रत कथा

एक साहूकार था जिसके दो बेटियॉं थी। उसकी दोनो बेट‍ियॉं पूर्णिमा का व्रत रखती थी, किन्‍तु बड़ी पुत्री पूर्णिमा का पूरा व्रत करती और छोटी बेटी अधूरा व्रत रखती थी। अर्थात वह शुभ समय से पहले ही व्रत खोलकर खाना खा लेती थी। धीरे-धीरे दोनो पुत्री बड़ी हो गई और उस साहूकार ने दोनो की शादि कर दी।

शादी के बाद साहूकार की बड़ी बेटी के पुत्र हो गया किन्‍तु छोटी बेटी के जो भी संतान होती वह मर जाती। जिससे वह बहुत दुखी रहती थी। एक दिन उसने और उसके पति ने किसी विद्धावान पंडित से इसका कारण पूछा। तो पंडित जी ने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती है जिसके कारण तुम्‍हारी सन्‍तान पैदा होते ही मर जाती है।

दोनो ने पूर्णिमा के व्रत की पूरी विधि के बारे में पूछा और तब पंडित ने उसे पूर्णिमा के व्रत के बारे में विधिपूर्वक बतया। और कहा यदि तुम इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करोगी मो तुम्‍हारी सभी इच्‍छाए पूर्ण हो जाऐगी। ऐसा कहकर वह पंडित तो वहा से चला गया और कुछ दिनो के बाद शरद पूर्णिमा आई।

साहूकार की छोटी बेटी ने शरद पूर्णिमा का व्रत वैसे ही किया जैसे की पंडित ने बताया था। इस व्रत के प्रभाव से उसको पुत्र रत्‍न की प्राप्‍ती हुई किन्‍तु उसका बेटा शीघ्र ही मर गया। उसने अपने मरे हुऐ पुत्र को एक पीढ़े पर लिटाकर एक लाल रंग के कपड़े से ढक दिया। और अपनी बड़ी बहन को बुलाकर लाई और उसने उस पीढ़ के ऊपर बैठने को कहा।

जैसे ही उसकी बड़ी बहन उस पीढ़ पर बैठने लगी तो उस बच्‍चे को उसका घाघरा लग गया जिससे वह बच्‍चा जोर-जोर से रोने लगा। उसने पीछे मुड़कर पीढ़े की तरफ देखा तो उसके ऊपर उसकी छोटी बहन का पुत्र सो रहा था। यह सब देखकर बड़ी बहन अपनी छोटी बहन से बोली -”तू मुझे कलंक लगाना चाहती थी। अभी तो यह मेरे बैठने से मर जाता।

तब उसकी छोटी बहन बोली नही बहन ”यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे ही भाग्‍य से यह जीवित हो गया, तेरे पुण्‍य व्रत के प्रभाव से यह पुन: जीवित हुआ है। यह देखकर उसकी बड़ी बहन बहुत खुश हुई और दोनो बहनों ने पूरे नगर में पूर्णिमा के व्रत के प्रभाव के बारे में बताया। जिसके बाद उस नगर की सभी औरते पूर्णिमा का व्रत करने लगी।

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विजय दशमी (दशहरा)

राधेकृष्णावर्ल्ड की और से विजय दशमी की शुभकामनाएं

दशहरा पर्व की कहानी क्या है, क्यों मनाया जाता है?

दशहरे के इस पर्व को विजयादशमी भी कहा जाता है, इसे जश्न का त्यौहार कहते हैं. आज के वक्त में यह बुराई पर अच्छाई की जीत का ही प्रतीक हैं. बुराई किसी भी रूप में हो सकती हैं जैसे क्रोध, असत्य, बैर,इर्षा, दुःख, आलस्य आदि. किसी भी आतंरिक बुराई को ख़त्म करना भी एक आत्म विजय हैं और हमें प्रति वर्ष अपने में से इस तरह की बुराई को खत्म कर विजय दशमी के दिन इसका जश्न मनाना चाहिये, जिससे एक दिन हम अपनी सभी इन्द्रियों पर राज कर सके.

दशहरा या विजयादशमी महत्व

यह बुरे आचरण पर अच्छे आचरण की जीत की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं.सामान्यतः दशहरा एक जीत के जश्न के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं. जश्न की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं. जैसे किसानो के लिए यह नयी फसलों के घर आने का जश्न हैं. पुराने वक़्त में इस दिन औजारों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्यूंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के जश्न के तौर पर देखते थे. लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत. किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं.

दशहरा के दिन के पीछे कई कहानियाँ हैं, जिनमे सबसे प्रचलित कथा हैं भगवान राम का युद्ध जीतना अर्थात रावण की बुराई का विनाश कर उसके घमंड को तोड़ना.

राम अयोध्या नगरी के राजकुमार थे, उनकी पत्नी का नाम सीता था एवम उनके छोटे भाई थे, जिनका नाम लक्ष्मण था. राजा दशरथ राम के पिता थे. उनकी पत्नी कैकई के कारण इन तीनो को चौदह वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या नगरी छोड़ कर जाना पड़ा. उसी वनवास काल के दौरान रावण ने सीता का अपहरण कर लिया.

रावण चतुर्वेदो का ज्ञाता महाबलशाली राजा था, जिसकी सोने की लंका थी, लेकिन उसमे अपार अहंकार था. वो महान शिव भक्त था और खुद को भगवान विष्णु का दुश्मन बताता था. वास्तव में रावण के पिता विशर्वा एक ब्राह्मण थे एवं माता राक्षस कुल की थी, इसलिए रावण में एक ब्राह्मण के समान ज्ञान था एवम एक राक्षस के समान शक्ति और इन्ही दो बातों का रावण में अहंकार था. जिसे ख़त्म करने के लिए भगवान विष्णु ने रामावतार लिया था.

राम ने अपनी सीता को वापस लाने के लिए रावण से युद्ध किया, जिसमे वानर सेना एवम हनुमान जी ने राम का साथ दिया. इस युद्ध में रावण के छोटे भाई विभीषण ने भी भगवान राम का साथ दिया और अन्त में भगवान राम ने रावण को मार कर उसके घमंड का नाश किया. इन

दशहरा पर्व से जुड़ी कथाएं –
1. राम की रावन पर विजय का पर्व
2. राक्षस महिसासुर का वध कर दुर्गा माता विजयी हुई थी
3. पांडवों का वनवास
4. देवी सती अग्नि में समां गई थी.

आज दहशरा कैसे मनाया जाता हैं ?
आज के समय में दशहरा इन पौराणिक कथाओं को माध्यम मानकर मनाया जाता हैं. माता के नौ दिन की समाप्ति के बाद दसवे दिन जश्न के तौर पर मनाया जाता हैं. जिसमे कई जगहों पर राम लीला का आयोजन होता है, जिसमे कलाकार रामायण के पात्र बनते हैं और राम-रावण के इस युद्ध को नाटिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं.

दशहरा का मेला
कई जगहों पर इस दिन मैला लगता है, जिसमे कई दुकाने एवम खाने पीने के आयोजन होते हैं. उन्ही आयोजनों में नाट्य नाटिका का प्रस्तुतिकरण किया जाता हैं.

इस दिन घरों में लोग अपने वाहनों को साफ़ करके उसका पूजन करते हैं. व्यापारी अपने लेखा का पूजन करते हैं. किसान अपने जानवरों एवम फसलो का पूजन करता हैं. इंजिनियर अपने औजारों एवम अपनी मशीनों का पूजन करते हैं.

इस दिन घर के सभी पुरुष एवम बच्चे दशहरे मैदान पर जाते हैं. वहाँ रावण, कुम्भकरण एवम रावण पुत्र मेघनाथ के पुतले का दहन करते है. सभी शहर वासियों के साथ इस पौराणिक जीत का जश्न मनाते हैं. मेंले का आनंद लेते हैं. उसके बाद शमी पत्र जिसे सोना चांदी कहा जाता हैं उसे अपने घर लाते हैं. घर में आने के बाद द्वार पर घर की स्त्रियाँ, तिलक लगाकर आरती उतारकर स्वागत करती हैं. माना जाता हैं कि मनुष्य अपनी बुराई का दहन करके घर लौटा है, इसलिए उसका स्वागत किया जाता हैं. इसके बाद वो व्यक्ति शमी पत्र देकर अपने से बड़ो के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेता हैं. इस प्रकार घर के सभी लोग आस पड़ोस एवम रिश्तेदारों के घर जाकर शमी पत्र देते हैं एवम बड़ो से आशीर्वाद लेते हैं, छोटो को प्यार देते हैं एवम बराबरी वालो से गले मिलकर खुशियाँ बाटते हैं.

अगर एक पंक्ति में कहे तो यह पर्व आपसी रिश्तो को मजबूत करने एवम भाईचारा बढ़ाने के लिए होता हैं, जिसमे मनुष्य अपने मन में भरे घृणा एवम बैर के मेल को साफ़ कर एक दुसरे से एक त्यौहार के माध्यम से मिलता हैं.

इस प्रकार यह पर्व भारत के बड़े- बड़े पर्व में गिना जाता हैं एवम पुरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं.

हमारे देश में धार्मिक मान्यताओं के पीछे बस एक ही भावना होती हैं, वो हैं प्रेम एवं सदाचार की भावना. यह पर्व हमें एकता की शक्ति याद दिलाते हैं जिन्हें हम समय की कमी के कारण भूलते ही जा रहे हैं, ऐसे में यह त्यौहार ही हमें अपनी नींव से बाँधकर कर रखते हैं.

दशहरे का बदलता रूप
आज के समय में त्यौहार अपनी वास्तविक्ता से अलग जाकर आधुनिक रूप ले रहे हैं, जिसने इसके महत्व को कहीं न कहीं कम कर दिया हैं| जैसे-

दशहरे पर एक दुसरे के घर जाने का रिवाज था, अब ये रिवाज मोबाइल कॉल एवम इंटरनेट मेसेज का रूप ले चुके हैं.

खाली हाथ नहीं जाते थे, इसलिए शमी पत्र ले जाते थे, लेकिन अब इसके बदले मिठाई एवम तौहफे ले जाने लगे हैं, जिसके कारण यह फिजूल खर्च के साथ प्रतिस्पर्धा का त्यौहार बन गया हैं.

रावण दहन के पीछे उस पौराणिक कथा को याद रखा जाता था, जिससे एक सन्देश सभी को मिले कि अहंकार सर्वनाश करता हैं, लेकिन अब तरह- तरह के फटाके फोड़े जाते हैं, जिनके कारण फिजूल खर्च बढ़ गया हैं. साथ ही प्रदुषण की समस्या बढ़ती जा रही हैं एवम दुर्घटनायें भी बढती जा रही हैं.

इस प्रकार आधुनिकरण के कारण त्यौहारों का रूप बदलता जा रहा हैं. और कहीं न कहीं आम नागरिक इन्हें धार्मिक आडम्बर का रूप मानकर इनसे दूर होते जा रहे हैं. इनका रूप मनुष्यों ने ही बिगाड़ा हैं. पुराणों के अनुसार इन सभी त्योहारों का रूप बहुत सादा था. उसमे दिखावा नहीं बल्कि ईश्वर के प्रति आस्था थी. आज ये अपनी नींव से इतने दूर होते जा रहे हैं कि मनुष्य के मन में कटुता भरते जा रहे हैं. मनुष्य इन्हें वक्त एवम पैसो की बर्बादी के रूप में देखने लगा हैं.

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नवरात्री स्पेशल

 नवरात्रि का पर्व आरंभ होने जा रहा है. घरों में नवरात्रि के पर्व को मनाने के लिए तैयारियां आरंभ हो चुकी हैं. हिंदू धर्म में मां दुर्गा को विशेष स्थान प्राप्त है. मां दुर्गा को शक्ति प्रतीक माना गया है. ऋगवेद के अनुसार माँ दुर्गा ही आदि-शक्ति हैं. पौराणिक कथाओं में मां दुर्गा को सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी माना गया है. इसके साथ ही जीवन में आने वाली हर परेशानियां को दूर करने में मां दुर्गा की पूजा को प्रभावशाली माना गया है. नवरात्रि यानी मां दु्र्गा की उपासना के पावन नौ दिन। नवरात्रि में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा क्रमश: की जाती है जिनके बारे में नित्य जानकारी एप पर उपलब्ध होगी

  1. मां शैलपुत्री
  2. मां ब्रह्मचारिणी
  3. मां चंद्रघंटा
  4. मां कुष्मांडा
  5. मां स्कंदमाता
  6. मां कात्यायनी
  7. मां कालरात्रि
  8. मां महागौरी
  9. मां सिद्धिदात्री


नवरात्रि कब से आरंभ हो रहे हैं

06 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ श्राद्ध समाप्त हो जाएंगे, जिसके अगले दिन यानी 07 अक्टूबर से नवरात्रि प्रारंभ हो जाएंगे।

इस साल शारदीय नवरात्रि आठ दिन के पड़ रहे हैं। तृतीया और चतुर्थी तिथि एक साथ पड़ने के कारण 07 अक्टूबर से शुरू हो रहे नवरात्रि 14 अक्टूबर को संपन्न होंगे। 15 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) का त्योहार मनाया जाएगा।

नवरात्रि में माता की सवारी

नवरात्रि में मां दुर्गा की सवारी को विशेष माना गया है. माता की सवारी दिन के अनुसार निर्धारित होती है. इस वर्ष शरद नवरात्रि का पर्व गुरुवार को आरंभ हो रहा है. माता की सवारी का वर्णन देवीभागवत पुराण में मिलता है. देवीभागवत पुराण के इस श्लोक में दुर्गा जी की सवारी के बारे में बताया गया है-

शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे। 
गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥



घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

घटस्थापना का शुभ समय सुबह 06 बजकर 17 मिनट से सुबह 07 बजकर 07 मिनट तक ही है।

कलश स्थापना नवरात्रि के पहले दिन यानी 07 अक्टूबर, गुरुवार को ही की जाएगी।

श्री दुर्गा सप्तशती में स्वयं दुर्गा भगवती ने कहा है-

“ शरदकाले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी …

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्य सुतान्वित:।

मनुष्यो मतप्रसादेन भविषयति:न संशय:।।”

“जो शरद काल की नवरात्रि में मेरी पूजा-आराधना तथा मेरे तीनों चरित्र का श्रद्धा पूर्वक पाठ करता है एवं नवरात्रि पर्यंत व्रत रहते हुए तप करता है, वह समस्त बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य से समपन्न हो यश का भागीदार बन जाता है, इसमें किंचित संशय नहीं है

 इस वर्ष दुर्गाष्टमी 13 अक्टूबर दिन बुधवार को है


पूजा विधि

  • नवरात्रि के दिन सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ पानी से स्नान कर लें।
  • पानी में कुछ बूंदें गंगाजल की डालकर स्नान करें या स्नान के पश्चात शरीर पर गंगा जल का छिड़काव करें।
  • कलश स्थापना के स्थान पर दीया जलाएं और दुर्गा मां को अर्घ्य दें।
  • इसके बाद अक्षत और सिंदूर चढ़ाएं।
  • लाल फूलों से मां को सजाएं और फल, मिठाई का भोग लगाएं।
  • धूप, अगरबत्ती जलाकर दुर्गा चालीसा पढ़े और अंत में आरती करें।

दुर्गा चालीसा और आरती एप के नवरात्री स्पेशल आइकॉन में उपलब्ध है

नवरात्र‍ि के दौरान कुछ महत्वपूर्ण चीजें

ऐसी मान्यता है कि नवरात्र‍ि के दौरान कुछ चीजें घर लाई जाएं तो माता रानी जरूर प्रसन्न होती हैं

कमल पर विराजमान मां की तस्वीर- 

आप घर में धन-समृद्धि लाने के लिए नवरात्रि के दौरान देवी लक्ष्मी का ऐसा चित्रपट लाएं, जिसमें वे कमल पर विराजमान हों. इसके साथ ही उनके हाथों से धन की वर्षा हो रही हों. कमल देवी लक्ष्मी का प्रिय फूल है. नवरात्रि में कमल का फूल या उससे संबंधित चित्र घर में लेकर आने से देवी लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है.

सोलह श्रृंगार का सामान-

नवरात्रि के दौरान महिलाओं को घर में सोलह श्रृंगार का सामान जरूर लाना चाहिए. श्रृंगार के सामान को घर के मंदिर में स्थापित करने से मां दुर्गा की कृपा सदैव घर पर बनी रहती है.

सोने या चांदी का सिक्का –

नवरात्रि के दौरान घर में सोने या चांदी का सिक्का लाना शुभ माना जाता है. सिक्के पर माता लक्ष्मी या भगवान गणेश की चित्र बना हुआ हो तो और भी शुभ होता है अपने पर्स में सोने या चांदी का सिक्का जरूर रखें, इससे आप पर मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहेगी.

मोर पंख-

शास्त्रों में मोर पंख को बहुत शुभ माना गया है. नवरात्रि में मां सरस्वती का प्रिय मोर पंख घर लाकर मंदिर में रखने से कई फायदे होते हैं. मोर पंखविद्यार्थियों के कमरे में रखने से उन्हें विद्या की प्राप्ति होती है. लॉकर के पास मोर पंख रखने से आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगता है. ये नकारात्मक ऊर्जा से भी बचाता है.

केले का पौधा-

नवरात्रि में केले का पौधे घर में लाना चाहिए. इसे घर के आंगन में लगाएं और पूजा करने के बाद इस पर रोजाना जल चढ़ाएं. गुरुवार के दिन इस पर दूध भी चढ़ाना चाहिए.


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राधा अष्टमी 2021

आज के इस ब्लॉग में आपको ये सब मिलेगा !


  • राधाष्टमी का व्रत कब करे ?
  • राधा अष्टमी के दिन क्या करें
  • कहाँ हुआ किशोरी जी का प्राकट्य ?
  • श्री राधाकृष्ण क्‍यों गए बरसाना ?
  • बरसाना के महल में राधा अष्टमी के उत्सवों कब है ?
  • श्री राधाजी की आरती

श्री राधा जी के बारे में प्रचलित है कि वह बरसाना की थीं लेकिन सच्चाई है कि उनका जन्‍म बरसाना से पचास किलोमीटर दूर हुआ था।

यह गांव रावल के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर राधा जी का जन्‍म स्‍थान है।



राधाष्टमी का व्रत कब करे ?

तिथि आरंभ- 13 सितंबर 2021 दोपहर 3 बजकर 10 मिनट से
तिथि समाप्त – 14 सितंबर 2021 दोपहर 1 बजकर 9 मिनट तक

व्रत आरंभ- 13 सितंबर 2021 रात 12 बजे से
व्रत समाप्त – 14 सितंबर 2021 सुबह 4 बजे तक


राधा अष्टमी के दिन क्या करें

हम ज्यादा नियमो में विश्वास नहीं करते है पर कुछ जरुरी नियम जरुर पालन करे

  • राधा अष्टमी के दिन सुबह जल्द उठकर स्नान करना चाहिए।
  • फिर स्वस्छ वस्त्र पहनें और राधारानी और भगवान कृष्ण के व्रत का संकल्प लें।
  • इसके बाद राधा और कान्हा की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं और श्रृंगार करें।
  • वह धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, फल और प्रसाद अर्पित करें।
  • श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र का पाठ करें

कैसे हुआ किशोरी जी का प्राकट्य ?

कमल के फूल पर जन्‍मी थीं श्री राधा रानी, रावल गांव में राधा जी का मंदिर है। माना जाता है कि यहां पर राधा जी का जन्म हुआ था। पांच हजार वर्ष पूर्व रावल गांव को छूकर यमुना जी बहती थी। राधा जी की मां कृति यमुना में स्‍नान करते हुए अराधना करती थी और पुत्री की लालसा रखती थी। पूजा करते समय एक दिन यमुना से कमल का फूल प्रकट हुआ। कमल के फूल से सोने की चमक सी रोशनी निकल रही थी। इसमें छोटी बच्‍ची के नेत्र बंद थे। अब वह स्‍थान इस मंदिर का गर्भगृह है। इसके ग्यारह माह पश्चात् तीन किलोमीटर दूर मथुरा में कंस के कारागार में भगवान श्री कृष्‍ण जी का जन्‍म हुआ था व रात में गोकुल में नंदबाबा के घर पर पहुंचाए गए। तब नंद बाबा ने सभी स्थानों पर संदेश भेजा और कृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव मनाया गया। जब बधाई लेकर वृषभानु जी अपनी गोद में राधारानी को लेकर यहां आए तो राधारानी जी घुटने के बल चलते हुए बालकृष्‍ण के पास पहुंची। वहां बैठते ही तब राधारानी के नेत्र खुले और उन्‍होंने पहला दर्शन बालकृष्‍ण का किया।


श्री राधाकृष्ण क्‍यों गए बरसाना

कृष्‍ण के जन्‍म के बाद से ही कंस का प्रकोप गोकुल में बढ़ गया था। यहां के लोग परेशान हो गए थे। नंदबाबा ने स्‍थानीय राजाओं को एकत्रित किया। उस समय ब्रज के सबसे बड़े राजा वृषभानु जी थे। इनके पास ग्यारह लाख गाय थीं। जबकि नंद जी के पास नौ लाख गाय थीं। जिसके पास सबसे अधिक गाय होतीं थीं, वह वृषभान कहलाते थे। उससे कम गाय जिनके पास रहती थीं, वह नंद कहलाए जाते थे। बैठक के बाद निर्णय हुआ कि गोकुल व रावल छोड़ दिया जाए। गोकुल से नंद बाबा और जनता पलायन करके पहाड़ी पर गए। उसका नाम नंदगांव पड़ा। वृषभान, कृति जी राधारानी को लेकर पहाड़ी पर गए। उसका नाम बरसाना पड़ा।

रावल में मंदिर के सामने बगीचा, इसमें पेड़ स्‍वरूप में हैं राधा व श्‍याम

रावल गांव में राधारानी के मंदिर के ठीक सामने प्राचीन उपवन है। कहा जाता है कि यहां पर पेड़ स्‍वरूप में आज भी श्री राधा जी और श्री कृष्‍ण जी विद्यमान हैं। यहां पर एक साथ दो वृक्ष हैं। एक श्‍वेत है तो दूसरा श्‍याम रंग का। इसकी पूजा होती है। माना जाता है कि श्री राधा जी और श्री कृष्‍ण जी वृक्ष स्‍वरूप में आज भी यहां से यमुना जी को निहारते हैं।


चहक उठी है सृष्टि सारी। बज उठी है देखो शहनाई।
कीरत जू के अंगना में। नन्ही-सी लाली है जाई।
सब मिल कर गाओ बधाई।

आँखों मे बस गया नज़ारा आज अटारी का। धरती पर अवतार हुआ वृषभानु दुलारी का।
झूमो नाचो गाओ जन्मदिन श्यामा प्यारी का।


बरसाना के महल में राधा अष्टमी के उत्सव कब है ?


  • 12 सितंबर ऊंचागांव में राधारानी की प्रधान सखी – ललिताजी का जन्मोत्सव ।
  • 13 सितंबर सुप्रसिद्ध राधारानी मंदिर में राधा जन्मोत्सव |
  • 14 सितंबर राधारानी मंदिर में प्रात: राधाजी का जन्म एवं शाम को संगमरमरी छतरी में विशेष दर्शन।
  • 15 सितंबर मोर कुटी पर मयूर लीला का मंचन, शाम को लाड़िलीजी मंदिर में ढ़ांढ़ी ढ़ाढिन नृत्य।
  • 16 सितंबर विलासगढ़ एवं नागजी कुटी में जोगिन लीला।
  • 17 सितंबर सांकरी खोर में चोटी गूंथन लीला एवं शाम को गाजीपुर में नौका विहार लीला।
  • 18 सितंबर ऊंचा गांव में व्याहवला लीला एवं शाम को प्रिया कुण्ड पर नौका विहार लीला।
  • 19 सितंबर साांकरी खोर में मटकी फोड़ लीला एवं विशाल दंगल का आयोजन।
  • 20 सितंबर– राजस्थान के कदमखंडी में चीरहरण लीला का मंचन।
  • 21 सितंबर – राधाबाग, करहला एवं मड़ोई गांव में महारास का आयोजन।

श्री राधाजी की आरती

आरती राधाजी की कीजै। टेक…कृष्ण संग जो कर निवासा, कृष्ण करे जिन पर विश्वासा।
आरती वृषभानु लली की कीजै। आरती…कृष्णचन्द्र की करी सहाई, मुंह में आनि रूप दिखाई।
उस शक्ति की आरती कीजै। आरती…नंद पुत्र से प्रीति बढ़ाई, यमुना तट पर रास रचाई।
आरती रास रसाई की कीजै। आरती…प्रेम राह जिनसे बतलाई, निर्गुण भक्ति नहीं अपनाई।
आरती राधाजी की कीजै। आरती…दुनिया की जो रक्षा करती, भक्तजनों के दुख सब हरती।आरती दु:ख हरणीजी की कीजै। आरती…दुनिया की जो जननी कहावे, निज पुत्रों की धीर बंधावे।
आरती जगत माता की कीजै। आरती…निज पुत्रों के काज संवारे, रनवीरा के कष्ट निवारे।
आरती विश्वमाता की कीजै। आरती राधाजी की कीजै…

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कृष्णजन्माष्टमी 2021

हर वर्ष की तरह इस बार भी जन्माष्टमी बड़ी ही धूम-धाम और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस को कृष्ण भक्त कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस बार 30 अगस्त, सोमवार को पूरे देश में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का त्योहार मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने धरती पर जन्म लिया था। जन्माष्टमी पर घरों और मंदिरों में विशेष रूप से सजावट की जाती है। सभी प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर और धाम में विशेष तरह के आयोजन होते हैं। कृष्ण भक्त इस दिन उपवास रखकर कान्हा की भक्ति में डूबे रहते हैं।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तिथि को लेकर लगभग हर बार कृष्ण और शैव मतावलंवियों के बीच में संशय बना रहता है। तिथि को लेकर आपस में मतभेद होने के कारण जन्माष्टमी दो दिन मनाई जाती है। लेकिन साल 2021 में इस बार सभी जगह एक ही दिन जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार भगवान कृष्ण के जन्म के समय विशेष ज्योतिषी संयोग बना था, ऐसा संयोग इस बार भी बना रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद  कृष्णपक्ष की आधी रात्रि अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और चंद्रमा के वृषभ राशि में गोचर रहने का संयोग बना था। कुछ इसी तरह का संयोग इस बार भी जन्माष्टमी तिथि पर हो रहा है

जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त

जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र 30 अगस्त की सुबह 06 बजकर 39 मिनट पर रहेगा। ऐसे में जन्माष्टमी के पूजा का शुभ मुहूर्त 30 अगस्त की रात 11 बजकर 59 मिनट से रात 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा।


जन्माष्टमी पूजन विधि


बहुत ही सरल विधि से घर पर अपने ठाकुर जी का प्रकट महोत्सव पूजन कर सकते हैं…

शुभ जन्माष्टमी का व्रत एकादशी के जैसे ही रखना चाहिए… फलाहार करके
जयदातार भक्त लोग कृष्ण जन्म के बाद ही फलाहार करते हैं
कुछ भक्त लोग जल भी नहीं लेते
कृष्ण जन्म के बाद ही जल लेते हैं। अन्नं प्रसाद ठाकुर को भोग लगा कर आप अगले दिन लीजिए।

पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की एक सूची यहां दी गई है।

सर्वप्रथम अभिषेक के लिए:

दही, शहद, दूध, घी, गंगा जल,
एक चौकी, पीला साफ कपड़ा,
बाल कृष्ण की मूर्ति (श्री विग्रह)
दीपक, धूपबत्ती, चंदन,

ठाकुर जी का भोग:

माखन, मिश्री, भोग सामग्री , धनिए का पंजीरी ठाकुर जी को विशेष रूप से भोग लगाया जाता है। तुलसी का पत्र, फूल,

कान्हा के श्रृंगार के लिए:

पीले वस्त्र और मोरपंख, बांसुरी और मुकुट, इत्र

पूजन विधि:

  1. बाल कृष्ण को दूध से स्नान कराएं.
  2. इसके बाद बारी-बारी से दही, घी, शहद से नहलाएं.
  3. इसके बाद आखिर में गंगाजल से स्नान कराएं. इन सभी चीजों से बाल गोपाल का स्नान कराने के बाद उसे फेकें नहीं. बल्कि उसे पंचामृत के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
  4. स्नान के बाद बाल गोपाल को बच्चे की तरह सजाएं, श्रृंगार करे
  5. सबसे पहले बाल गोपाल को लंगोट पहनाएं और उसके बाद उन्हें वस्त्र पहनाएं.
  6. इसके बाद उन्हें गहने पहनाए… फूल अर्पित करे, इत्र रुई में लगा कर ठाकुर जी के समीप रखे।
  7. परम भगवान कृष्ण को उनके शुद्ध भक्त वैष्णव संप्रदाय के आचार्यों का लिखित भजन गाकर सुनाए
    और चंदन और अक्षत से तिलक लगाएं.
  8. धूप, दीप दिखाएं
    महा आरती करें…. आरती गाए
    और
    माखन मिश्री, खीर, पूरी, मिठाई,
    हलुआ,और तुलसी पत्ता का भोग लगाएं.
    सभी भोग में एक एक तुलसी पत्र अवश्य डाले।
  9. अब बाल गोपाल को झूले पर बिठाकर झुलाएं और जय कन्हैया लाल की गाएं.
  10. जन्माष्टमी के दिन भक्त लोग रातभर जग कर हरि नाम संकीर्तन करते हैं।
    जितना हो सके हरे कृष्ण महामंत्र का इस शुभ दिन जाप कर सकते हैं करिए।

इस दिन दान जरूर करें



अगर आपके मन में कोई भी प्रशन हो तो कभी भी पूछ सकते है ! Whatsapp : 9460500125


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गुरु पूर्णिमा 2021

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागु पाँव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए॥

व्यास जी को प्रथम गुरु की भी उपाधि दी जाती है क्योंकि गुरु व्यास ने ही पहली बार मानव जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया था। इसके उपलक्ष में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है।


24 जुलाई को आषाढ़-गुरु पूर्णिमा मनाई जाएगी, हिंदू धर्म में कुल पुराणों की संख्या 18 है। इन सभी के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं।

गुरु पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- शुक्रवार 23 जुलाई को सुबह 10:34 बजे
गुरु पूर्णिमा तिथि समाप्त- शनिवार 24 जुलाई को सुबह 08:06 बजे

आज के दिन क्या करे ?


  • ठाकुर जी को नए वस्त्र पहनाये और पंचामृत से स्नान कराए ! क्योकि हमारे सबसे पहले गुरु ठाकुर जी ही है !
  • ठाकुर जी को अच्छे अच्छे पकवानों के साथ भोग लगाये !
  • अगर आप दीक्षित है तो इस बार वृन्दावन में कोरोना की वजह से एंट्री बंद है न ही कोई उत्सव होगे इसलिए अपने घर पर ही अपने गुरु की छवि रख क्र उत्सव मनाये !
  • जिस दिन हमारे जीवन में ठाकुर जी की कृपा से गुरु मिल जाते है तो उसी दिन ये पूर्ण विश्वास हो जाता है की अब ठाकुर जी दूर नहीं इसलिए ये उत्सव बहुत ख़ास है !
  • अगर कोई भक्त व्रत रखना भी चाहते है तो रख सकते है वैसे ये अनिवार्य नहीं है !
  • व्रत 23 जुलाई सुबह से 24 की सुबह तक करना है ! ये निर्जला व्रत नहीं होगा इसलिए आप पानी ले सकते है
  • आज के दिन जितना ज्यादा हो सके या पुरे दिन ही भगवन नाम कीर्तन होना चाहेये !
  • इस दिन दान जरुर करना चाहिए जो की संतो, गौ माता, वानर आदि के लिए हो !
  • दान हेतु आप राधेकृष्णावर्ल्ड के इस लिंक पर क्लिक करके भी जितनी सामर्थ है सेवा भेज सकते है जो की संत और जीव सेवा में लगेगी !


अगर आपके मन में कोई भी प्रशन हो तो कभी भी पूछ सकते है ! Whatsapp : 9460500125


गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस!