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7. मां कालरात्रि

नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा होती है। इसको महासप्तमी भी कहते हैं। माता का यह रूप शत्रु या दुष्ट लोगों का संहार करने वाला होता है। दुर्गा मां ने रक्तबीज का संहार करने के लिए मां कालरात्रि को अपने तेज से उत्पन्न किया।मां कालरात्रि ने मधु- कैटभ जैसे राक्षसों का संहार किया था। मां कालरात्रि को यंत्र, तन्त्र और मंत्र की देवी भी कहा जाता है। भूत-प्रेत, दानव, पिशाच इनका नाम लेने मात्र से भाग जाते हैं। माता कालरात्रि को काली, महाकाली, भद्रकाली, चंडी, भैरवी भी कहते हैं।

रात्रि के सप्तमी तिथि को जगड़ना भी होता है। इस दिन पुरा घर अच्छी तरह शाम में साफ सुथरा कर अरवा‌ चावल पानी में फूला कर 2-3 घंटे के लिए रख देते हैं। फिर शाम में पीस कर घर के हर सामान पर वो चौरठ छिड़का जाता है और सिंदुर किया जाता है। माता का पट इसी दिन खुलता है। इस बार जगरना मंगलवार 12 अक्टूबर को हैं। माना जाता है कि इस दिन हर चीज को फिर से एक बार जीवित कर देते। पहले पूजा के बाद से बाल में तेल सिन्दूर सब नहीं करते। इस दिन बाल धोकर नहा कर तब शाम‌ में जगरना के साथ ही पुरे श्रृंगार करते और फिर मेला का आयोजन शुरू हो जाता है। यह हमारे बिहार, झारखंड, बंगाल में तो होता है।

सप्तमी के रात ही बहुत जगह बली देने का विधान है।
वैष्णव लोगों के घर या मंदिर जहां कलश‌ बैठता वहां भूआ (कोहरे) या केला का बली दिया जाता है। इस दिन घरों में ‌या मंदिर में माता को चावल, दाल, पापड़, भुजिया, सब्जी, बैंगनी, रसगुल्ले ‌‌का‌ भोग लगाते। फिर अष्टमी के‌ दिन उपवास करते खोइंचा भरते और‌ नवमी को माता को खोइंचा भरते हैं। क्योंकि नवमी माता के मायके का आखिरी दिन होता है।‌ नवमी को हवन‌ कर‌ कन्या पुजन करते।


मां कालरात्रि का स्वरूप

आज माँ दुर्गा के सातवें रूप को “माँ कालरात्रि के नाम से पूजा जाता है। माँ कालरात्रि का वर्ण रात्रि के समान काला है परन्तु वे अंधकार का नाश करने वाली हैं।

दुष्टों व राक्षसों का अंत करने वाला माँ दुर्गा का यह रूप देखने में अत्यंत भयंकर लेकिन शुभ फल देता है इसलिए माँ “शुभंकरी” भी कहलाई जाती हैं।

माँ कालरात्रि के ब्रह्माण्ड के समान गोल नेत्र हैं। अपनी हर श्वास के साथ माँ की नासिका से अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं। अपने चार हाथों में खड्ग, लोहे का अस्त्र, अभयमुद्रा और वरमुद्रा किये हुए माँ अपने वाहन गर्दभ पर सवार हैं।
मां कालरात्रि का स्वरूप अंधेरे के जैसे एकदम काला है, बाल लंबे लंबे बिखरे हुए हैं।गले में मुंड की माला चमक रही है। माता के चार हाथ हैं बायें हाथ में खड्ग, दाहिने हाथ में वरमुद्रा, एक अभयमुद्रा में है और बायें हाथ शस्त्र लिए हैं। माता कालरात्रि का वाहन गधा है।


मां कालरात्रि की पूजा विधि

मां कालरात्रि की पूजा बहुत फलदाई होती है। इस‌ दिन लोग तंत्र पूजा करते हैं।‌इस दिन आधी रात को पूजा किया जाता है। बहुत लोग इस दिन मां को मदिरा भी अर्पित करते हैं। इस दिन मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी चीजें से भोग लगाया चाहिए। माता का पसंदीदा रंग लाल है हो सके तो लाल वस्त्र पहन कर पूजा करें।

माता कालरात्रि की पूजा अक्षत, धूप, दीप, गंध, रोली, चन्दन, रातरानी का फूल चढ़ाएं। माता को पान का पत्ता, सुपारी फिर कपूर से आरती करें। इस दिन काला‌ छागर बली पड़ता है। पहले स्नान ध्यान कर लें फिर कलश पूजा कर तब मां कालरात्रि की पूजा करें। ये मंत्र पढ़ें –

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥
ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम:।

यह कालरात्रि देवी का सिद्ध मंत्र है। आज रात इस मंत्र के जप से पा सकते हैं माता की कृपा। सप्तमी के रात में तिल या सरसों तेल का अखंड दीप जलाना चाहिए। रात में पूजा के समय सिद्धधकुंजिका स्तोत्र, अर्गला स्तोत्र, काली चालीसा या काली पुराण या दुर्गा सप्तशती पाठ पुरा पढ़ें।

घर में सुख शांति नहीं हो, शत्रु से परेशान हैं तो माता का ये मंत्र 108 बार जपें। माता की कृपा बनी रहेगी।

जय त्वं देवि चामुंडे जय भूतार्ति हारिणि।
जय सार्वगते देवी कालरात्रि नमोस्तुते।।

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